क्या कोविंद के आने से दलितों का भला होगा?

रामनाथ कोविंद

भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाले गठबंधन की ओर से उम्मीदवार बनाए जाने के पहले कोविंद भारतीय राजनीति की आला कतार में नहीं देखे जाते थे. सत्ताधारी गठबंधन ने उनके नाम का एलान किया तो ये राजनीति के जानकारों के लिए एक ‘सरप्राइज’ था. कोविंद की तमाम विशेषताओं के जिक्र के साथ भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेताओं ने बार-बार बताया कि वो दलित समुदाय से आते हैं. विपक्ष की ओर से भी उनके मुक़ाबले दलित समुदाय से आने वाली पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार को उम्मीदवार बनाया गया. संख्याबल सत्तापक्ष के साथ था और उम्मीद के मुताबिक कोविंद बड़े अंतर से भारत के 14वें राष्ट्रपति चुन लिए गए.

दलितों के लिए कितना फ़ायदेमंद? लेकिन, क्या कोविंद का राष्ट्रपति बनना दलित समुदाय के लिए फायदेमंद होगा, इस सवाल पर समाजशास्त्री बद्री नारायण कहते हैं कि कोविंद के राष्ट्रपति बनने से दलित समुदाय का स्वाभिमान बढ़ेगा. बद्री नारायण कहते हैं, “आत्म स्वाभिमान बढ़ाने के लिए तो अच्छा ही है. दलितों में भी स्वाभिमान की भावना तो आएगी.” राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन भी मानते हैं कि राष्ट्रपति भवन में कोविंद की मौजूदगी से दलितों का आत्मसम्मान बढ़ेगा, लेकिन वो इसे प्रतीक की राजनीति मानते हैं. सुमन का कहना है कि दलित समुदाय की ओर से जो मुद्दे उठाए जा रहे हैं, चाहे वो रोहित वेमुला का मामला हो या फिर फेलोशिप का मामला, उसमें कुछ नहीं हो रहा है. लेकिन इस कदम से वो खुश ज़रूर होंगे. सुमन कहते हैं, “हमारे देश में बहुत सी ऐसी जातियां हैं जिनमें मुश्किल से कोई आइकन मिलेगा. बहुत सी जातियों में कोई करोड़पति भी नहीं मिलेगा. अगर उस समुदाय से कोई राष्ट्रपति बनता है तो बहुत बड़ी बात है. ” रामनाथ कोविंद के दोस्त क्या कहते हैं?

लेकिन, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर और राजनीतिक विश्लेषक असमर बेग़ की राय अलग है. वो कहते हैं कि राष्ट्रपति चुनाव में इरादा दलितों का फ़ायदा करना नहीं था.

सांकेतिक राजनीति प्रोफ़ेसर बेग़ के मुताबिक, “ये एक समुदाय को साथ जोड़ने के लिए उठाया गया राजनीतिक कदम था. इससे उस समुदाय को कोई फ़ायदा नहीं होगा. अगर आपका इरादा किसी सेक्शन का फ़ायदा करना है तो फिर आप उसके लिए आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक नीतियां लाएंगे.” प्रोफ़ेसर बेग़ ये भी कहते हैं कि जिन देशों में मतदाता लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर परिपक्व हैं, वहां भी राजनीतिक दल ऐसी सांकेतिक राजनीति करना चाहते हैं. लेकिन मतदाता उन्हें उस रास्ते पर जाने नहीं देते. वो कहते हैं कि आप रोटी, कपड़ा, मकान और रोजगार जैसे वास्तविक मुद्दों की बात कीजिए. प्रोफ़ेसर बेग़ कहते हैं, “कंपनियां जब मार्केट में सामान बेचती हैं, तो विज्ञापन देकर माहौल बनाती हैं कि सामान बहुत अच्छा है. ऐसा ही माहौल राजनीतिक दल भी बनाते हैं.”

सुमन कहते हैं कि भारत में हर दल प्रतीकों की राजनीति करता है. कभी महिलाओं के नाम पर और कभी दलित और मुस्लिमों को लेकर, लेकिन भारतीय जनता पार्टी को इसमें महारथ हासिल है. सुमन कहते हैं, ” इसके पहले भी भारतीय जनता पार्टी ने संगठित रूप से अंबेडकर जयंती मनाई. उत्तर प्रदेश में बुद्ध सर्किट यात्रा की. सुलेह देव की जयंती मनाई. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का एक बयान आया है कि दलितों में राम टाइटिल बहुत हैं. मतलब काफी राम भक्त हैं. इसका आशय क्या है. वो अयोध्या में जो मंदिर बनाना चाहते हैं, उसके लिए रामभक्तों को गोलबंद करेंगे.” लेकिन बद्री नारायण कोविंद के राष्ट्रपति बनने को सिर्फ प्रतीक की राजनीति नहीं मानते हैं. वो कहते हैं कि इससे दलितों के बीच संदेश जाएगा कि भारतीय जनता पार्टी उन्हें प्रतिनिधित्व दे रही है. हालांकि, प्रोफ़ेसर बेग़ इस आकलन पर सवाल उठाते हैं. वो कहते हैं कि अगर बात वंचित समुदाय को अधिकार संपन्न बनाने की है तो उन्हें वास्तविक अधिकार वाले पद क्यों नहीं दिए जाते हैं? प्रोफ़ेसर बेग़ कहते हैं, “अगर ऐसे समुदायों का हकीकत में अधिकार संपन्न बनाना है तो उन्हें वास्तविक शक्तियां रखने वाले पद दिए जाएं. जैसे प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के पद हैं. लेकिन उन्हें अधिकार नहीं देने हैं. उनका सिर्फ इस्तेमाल किया जाना है. ऐसे में उन्हें ऐसे प्रतीकात्मक पद दिए जाते हैं.” उधर, बद्रीनारायण मानते हैं कि लोकतंत्र में धीरे-धीरे चीजें बदलती हैं. आगे उन्हें प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री भी बनाया जा सकता है.

सियासी मजबूरी राजनीतिक विश्लेषक सुमन कोविंद के राष्ट्रपति भवन तक पहुंचने को भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक मजबूरी से जोड़कर देखते हैं. वो कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी की जो विचारधारा है, उसमें सैद्धांतिक तौर पर आरक्षण का विरोध किया जाता है और हिंदुत्व सवर्ण समूह को ज्यादा तुष्ट करती है लेकिन राजनीति में आप बहुजन के बिना आगे बढ़ नहीं सकते. सुमन ये भी कहते हैं कि कोविंद के राष्ट्रपति बनने के बाद दलितों की उम्मीदें भी बढ़ेंगी. वो कहते हैं, “दलितों में बहुत आकांक्षा होगी. वो चाहेंगे कि गौरक्षा के नाम पर या अन्य वजहों से दलितों पर जो जुल्म बढ़े हैं, वो न हों. छुआछूत का भी मामला है. संविधान के ज़रिए जो उन्हें आरक्षण मिला है, वहां कोई अतिक्रमण न हो.” राष्ट्रपति के तौर पर इन उम्मीदों पर ख़रा उतरना ही कोविंद की सबसे बड़ी चुनौती होगी.

वात्सल्य राय का यह लेख बीबीसी हिंदी से साभार लिया गया है.  लेख में कोई बदलाव नहीं किया गया है.

सोनू के बाद अब गायिका सुचित्रा कृष्णामूर्ति को अजान से तकलीफ

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मुंबई। कुछ दिन पहले गायक सोनू निगम ने अजान को आक्रामक, कान फाड़ देने वाली आवाज बताते हुए ट्वीटर पर पोस्ट करते हुए इसकी आलोचना की थी और कहा कि ईश्वर को याद कराने के लिए उनको लाउडस्पीकर की जरूरत नहीं है. उनके बाद अब ताजा मामला फिल्म अभिनेत्री और गायिका सुचित्रा कृष्णामूर्ति के बयान का है जिन्होंने लाऊडस्पीकर के द्वारा होने वाली अजान पर आपत्ति दर्ज की है. ट्विटर पर उन्होंने ट्विट किया है और इसको लेकर अपनी वेदना प्रकट की है.

बता दें की फिल्म अभिनेत्री और गायिका सुचित्रा कृष्णामूर्ति ने ट्विटर पर लिखा है, ‘आज मैं सुबह 4 बजकर 45 मिनट पर घर आई और तो अजान की बहुत ही कर्कश और बहरा कर देने वाली आवाज सुनाई दी. इस तरह धर्म को किसी पर थोपना बेवकूफी है. उन्होंने एक और पोस्ट पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए लिखा है कि वह स्वंय ब्रह्ममुहूर्त में उठ जाती हैं और अपनी रियाज़ और योग करती हैं. मुझे मेरे भगवान की याद दिलाने या मेरे कर्तव्य की याद दिलाने के लिए सार्वजनिक लाउडस्पीकर की आवश्यकता नहीं है. इसके अलावा उन्होंने एक और पोस्ट में लिखा है, उनका दिनभर अजान से या किसी धार्मिक गायन का विरोध नहीं है लेकिन सुबह 5 बजे सभी पड़ोसियों को उठा देना कोई सभ्यता का परिचायक नहीं है.

गौरतलब है कि सोनू निगम ने कुछ महीनों पहले जब अजान को लेकर अपनी आवाज उठाई थी तो उनके विरुद्ध फतवा जारी हो गया था जिसके चलते उन्होंने अपना सिर भी मुंडवा लिया था जिसके बाद उनका काफी विरोध हुआ था और कुछ समुदायों ने उनके खिलाफ आप्पतिजनक टिप्पणियां भी की थीं.

 

दलित नेता ने उद्घाटन किया, कांग्रेसी सासंद ने गंगाजल से धुलवाया

भोपाल। मध्यप्रदेश विधानसभा में कांग्रेस और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के बीच दलितों के मुद्दे पर जारी हंगामे पर बहुजन समाज पार्टी ने सरकार की नीयत पर सवाल खड़े किए हैं.

बसपा विधायकों ने आरोप लगाते हुए कहा है कि सरकार दलितों के नाम पर सदन में ढोंग कर रही है. बसपा विधायक ऊषा चौधरी के मुताबिक जब देश में बाबासाहेब अम्बेडकर की प्रतिमाओं का अपमान किया जाता है तब बीजेपी के नेता आवाज नहीं उठाते लेकिन सियासी फायदे को देखते हुए अब दलितों के मुद्दे पर हंगामा खड़ा कर रहे हैं.

दरअसल, भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया पर दलित का अपमान करने का आरोप लगा रही है और उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी कर रही है. भोपाल के अशोक नगर में ट्रॉमा सेंटर को कथित तौर पर गंगाजल से धुलवाने का आरोप लगाकर सोमवार को विधानसभा में शोर-शराबा हुआ. भाजपा विधायक और मंत्रियों ने सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया को दलित विरोधी करार देते हुए कांग्रेस से माफी मांगने की मांग की.

उधर, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे मुद्दों से ध्यान हटाने का सरकार का षड्यंत्र करार दिया. शोर-शराबा इतना हुआ कि अध्यक्ष डॉ. सीतासरन शर्मा को तीन बार सदन की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी.

प्रश्नकाल के दौरान भाजपा के रामेश्वर शर्मा ने इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि गोपीलाल जाटव हमारे अशोक नगर से विधायक हैं. उन्होंने वहां ट्रॉमा सेंटर का उद्घाटन किया. कांग्रेस के सांसद ने उसे धुलवाया. ये दलितों का घोर अपमान है.

सत्तापक्ष के लोग बार-बार ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम लेने लगे तो अजय सिंह ने कहा कि आपके लोगों ने राज्यसभा में मायावती को बोलने नहीं दिया. वे हिंदुस्तान में दलित वर्ग की सबसे बड़ी नेता हैं.

सिंधिया के ट्रॉमा सेंट्रर को धुलवाने को अनुसूचित जाति की अस्मिता से जोड़ते हुए डॉ. गौरीशंकर शेजवार ने कहा कि मैं नेता प्रतिपक्ष की हैसियत से उस कुर्सी पर बैठता था, क्या उसे गंगाजल से धुलवाएंगे. इस पर नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने कहा कि मुझे आपकी कुर्सी पर बैठने में गर्व है.

विधानसभा में दलित अपमान का मुद्दा उठाने वाले रामेश्वर शर्मा ने कहा कि अनुसूचित जाति के व्यक्ति और विधायक का अपमान होगा. गोपीलाल जाटव नहीं आए. उन्हें सदमा न लग जाए. उन्होंने मांग रखी कि ज्योतिरादित्य सिंधिया को सदन में बुलाया जाए. कटघरे में खड़ा कर उनसे माफी मंगवाई जाए. मैं निंदा प्रस्ताव रखता हूं.

वन विभाग की जमीन पर रिसॉर्ट बनवा रहीं हैं भाजपा मंत्री की पत्नी

रांची। बीजेपी सरकार के मंत्रियों के घोटाले और कब्जे में एक नया नाम जुड़ गया है. छत्तीसगढ़ की बीजेपी सरकार में मंत्री और वरिष्ठ पार्टी नेता बृजमोहन अग्रवाल की पत्नी सविता अग्रवाल और पुत्र 4.12 एकड़ सरकारी वन भूमि खरीद कर रिसॉर्ट बनवा रहे हैं. असल में यह जमीन सितंबर 2009 में खरीदी गई थी. रमन सिंह सरकार के कई अधिकारियों ने इस खरीद-बेच पर सवाल उठाए, यहां तक की हाल ही में 30 जून को भी इस पर आपत्ति जताई गई लेकिन सविता अग्रवाल के पति के मंत्रालय ने लिखित रूप में कहा कि इस मामले में कोई कार्रवाई करना संभव नहीं.

बता दें की बृजमोहन अग्रवाल 1990 से ही रायपुर के विधायक हैं. वो इस समय राज्य के कृषि, जल संसाधन और धार्मिक ट्रस्ट मंत्री हैं. जब उनकी पत्नी ने जमीन खरीदी थी तो वो शिक्षा, लोक निर्माण, संसदीय कार्य, पर्यटन और संस्कृति मंत्री थे. सविता अग्रवाल ने छत्तीसगढ़ के महासमंद जिले के सीरपुर में जो जमीन खरीदी है उस पर श्याम वाटिका नामक रिसॉर्ट बनाया जा रहा है. उनके पति के मंत्रालय ने इस इलाके को विशेष पर्यटक क्षेत्र के रूप में चिह्नित किया है.

इस प्रोजेक्ट के लिए अग्रवाल की पत्नी के अलावा बेटे ने भी जमीन खरीदी है. आदित्य सृजन प्राइवेट लिमिटेड और पुरबासा वाणिज्य प्राइवेट लिमिटेड ने इसी प्रोजेक्ट के लिए जमीन खरीदी है. कंपनी रिजस्ट्रार के दस्तावेज के मुताबिक आदित्य सृजन के डायरेक्टर सविता अग्रवाल और अभिषेक अग्रवाल हैं और पुरबासा वाणिज्य के एक डायरेक्टर अभिषेक अग्रवाल हैं. इंडियन एक्सप्रेस के पास मौजूद जमीन रजिस्ट्री रिकॉर्ड के अनुसार सरिता अग्रवाल ने खसरा संख्या 1.38, 1.37 और 1.37 की कुल 4.12 एकड़ जमीन 12 सितंबर 2009 को पांच लाख 30 हजार 600 रुपये में खरीदी पर यह जमीन असल में वन विभाग के नाम हैं जिस पर सारा विवाद उठा है.

रामनाथ कोविंद ने ली राष्ट्रपति पद की शपथ

नई दिल्ली। रामनाथ कोविन्द ने आज भारत के 14वें राष्ट्रपति के रुप में शपथ ली, इस दौरान संसद भवन के सेंट्रल हॉल में आयोजित इस शपथ ग्रहण समारोह में कई गणमान्य लोग मौजूद रहे. चीफ जस्टिस ने रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद की शपथ दिलाई. इससे पहले आज शपथ ग्रहण से पहले कोविंद ने राजघाट जाकर महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि दी इस दौरान उनकी पत्नी भी मौजूद थीं. नव-निर्वाचित राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश के सामने शपथ लेने के बाद उन्हें 21 तोपों की सलामी दी गई. इसके बाद राष्ट्रपति ने अपना भाषण दिया.

इस समारोह में राज्य सभा के सभापति, प्रधानमंत्री, भारत के मुख्य न्यायाधीश, लोक सभा अध्यक्ष, मंत्री परिषद के सदस्य, राज्यपालगण, मुख्यमंत्रीगण, राजनयिक मिशनों के प्रमुख, संसद सदस्यगण और भारत सरकार के प्रमुख असैनिक और सैनिक अधिकारी सेंट्रल हॉल में शामिल रहे.

राष्ट्रपति सेंट्रल हॉल में समारोह सम्पन्न होने पर राष्ट्रपति भवन के लिए प्रस्थान करेंगे, जहां प्रांगण में सेना के तीनों अंगों द्वारा उन्हें गार्ड आफ आनर दिया जाएगा और सेवा-निवृत हो रहे राष्ट्रपति को भी सौहार्दपूर्ण शिष्टाचार प्रदान किया जाएगा.

आपको बता दें कि 20 जुलाई को आए नतीजों में रामनाथ कोविंद को कुल 702044 मिले हैं जबकि मीरा कुमार को 367314 वोट मिले थे. जीत के बाद कोविंद ने जीत के बाद कहा कि सभी लोगों ने मुझपर जो विश्वास जताया है, उसके लिए सभी का आभारी हूं. उन्होंने कहा था, ‘मैं चुनाव में विपक्ष की उम्मीदवार मीरा कुमार को शुभकामनाओं के साथ धन्यवाद देता हूं. जिस पद का गौरव डॉ. राजेंद्र प्रसाद, सर्वपल्लि राधाकृष्णन, एपीजे अब्दुल कलाम जी और प्रणब मुखर्जी ने बढ़ाया है, उस पर पद पर रहना मेरे लिए गौरव की बात और जिम्मेदारी का एहसास करा रहा है. मेरे लिए ये भावुक क्षण है.’

‘नीट’ की लापरवाही की भेट चढ़ी, असुर की बेटी

रांची। नीट की परीक्षा के लिए दिन-रात मेहनत करने वाली नलिनी असुर परीक्षा पास करने के बाद प्रशासन से हार गयीं. असल में झारखंड की आदिम जनजाति असुर से आने वाली नलिनी असुर ने नीट परीक्षा एसटी कैटेगरी में 292 रैंक लाकर पास कर ली थी. यह उनकी जाति में पहली बार है जब किसी आदिम जनजाति की लड़की ने नीट मेडिकल परीक्षा परीक्षा पास की पर नीट की लापरवाही के कारण वह डाक्टर नहीं बन पायेगी. बता दें की नीट प्रशासन की लापरवाही और तकनीकी वजहों से मेडिकल के प्रथम काउंसलिंग में उन्हें नहीं बुलाया गया था जिसके बाद उन्हें दोबारा काउसलिंग का मौका ही नहीं दिया गया.

मिली जानकारी के अनुसार नलिनी ने राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा नीट में रैंक प्राप्त करने के बाद स्टेट मेरिट लिस्ट के लिए आवेदन दिया था. परिषद् द्वारा 19 जुलाई को जारी स्टेट मेरिट लिस्ट में क्रम संख्या 2400 पर नलिनी का नाम था जबकी एसटी कैटेगरी में 292 रैंक मिला था. इसके बावजूद प्रथम काउंसेलिंग के लिए उसका चयन नहीं किया गया. चयन नहीं होने के बाद नलिनी काफी हताश हो गई और मीडिया को जानकारी दी है.

गुमला विषुनपुर प्रखंड के जोभीपाठ गांव निवासी नलिनी असुर के पिता बोनू राम असुर का निधन साल 2001 में हो गया था जिसके बाद पूरे परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी उसकी मां पर आ गई. कठिन परिस्थितियों में भी नलिनी ने पढ़ाई करना नहीं छोड़ा और जब सफलता मिली तो उसके चंद दिनों बाद ही प्रशासनिक खामियों की वजह से उनका सपना टूट गया.

जानकारी देते हुए नलिनी कहती है कि वह डॉक्टर बनने का सपना लिए पिछले दो -तीन सालों से दिन रात कड़ी मेहनत कर रही थी. स्नातक में भी दाखिला नहीं लिया. उसके गांव में पढ़ाई की कुछ खास सुविधा नहीं थी. अच्छी रैंक आने के बाद खुश थी कि एसटी कोटा से कम से कम तो डाक्टर बन जाउंगी पर काउंसेलिंग में नाम नहीं देख कर बुरी तरह निराश हो गयी हुं.

लोकसभा स्पीकर ने 6 सांसदों को किया सस्पेंड

नई दिल्ली। संसद के मॉनसून सत्र के छठे दिन आज शून्यकाल के दौरान सदन की कार्यवाही बाधित करने का प्रयास करने वाले छह सांसदों को पांच बैठकों के लिए लोकसभा से निलंबित कर दिया गया. इसके साथ ही लोकसभा की कार्यवाही कल तक के लिए स्थगित कर दी गयी. स्पीकर सुमित्रा महाजन ने बताया, ‘गौरव गोगोई और के सुरेश समेत कई सदस्यों ने कागज फेंके. कामकाज में व्यवधान डालने के लिए 6 सदस्यों को नियम 374 (ए) के तहत सदन की पांच बैठकों से निलंबित किया जाता है. स्पीकर ने निलंबित सांसदों का नाम – अधीर रंजन चौधरी, रंजीत रंजन, एम के राधवन, सुष्मिता देव का नाम बताते हुए कहा कि इन सबने जानबूझ सदन की कार्रवाई में बाधा डाली. स्‍पीकर ने आगे बताया कि सदन के काम में रुकावट डालने और अशोभनीय आचरण के लिए कांग्रेस के छह सदस्य का निलंबन पांच बैठकों तक जारी रहेगा. कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खडगे ने कांग्रेस सांसदों के निलंबन को अनुचित बताते हुए कहा, ‘यह प्रजातंत्र के लिए सही नहीं है. ऐसे कई उदाहरण हैं जब सदस्यों ने नियमों का उल्लंघन किया है. इसका समर्थन नहीं करता हूं लेकिन ऐसी सख्त कार्रवाई सही नहीं है, इस मुद्दे पर हम सभी गांधी प्रतिमा के नीचे विरोध प्रदर्शन करेंगे.‘ वहीं इस घटना पर दुख व्‍यक्‍त करते हुए लोकसभा स्‍पीकर सुमित्रा महाजन ने कहा, ‘प्रश्‍नकाल को बाधित नहीं किया जाना चाहिए. मैंने खडगे जी को कहा था कि प्रश्‍न काल के बाद उन्‍हें बोलने का मौका दिया जाएगा. वेल में हंगामा करना अनुशासन के खिलाफ तो है ही उसपर कागज फाड़ कर चार बार स्‍पीकर पर फेंकना अशोभनीय हरकत है.‘ उन्‍होंने आगे बताया, सांसदों ने मेरे टेबल पर से फाइलें ली। ये सब ऑफिशियल कागजात थे. ऐसा करना अपराध है.

वोडाफोन लाया अनलिमिटेड कॉलिंग और 70 जीबी डाटा प्लान

नई दिल्ली। रिलायंस के 1500 रुपए के स्मार्टफोन ने मार्केट में हंगामा मचा दिया है. वहीं अब जियो को करारा जवाब देने के लिए वोडाफोन ने दो नए प्लान पेश कर दिए हैं, जिनमें 244 रुपये और 346 रुपये के प्लान शामिल हैं. वोडाफोन के ये दोनों प्लान जियो को कड़ी टक्कर दे सकते हैं. 244 रुपये वाले प्लान में मिलेगा 70GB डाटा वोडाफोन के 244 रुपये वाले प्लान में 70 दिनों की वैधता के साथ 70 दिनों तक रोज 1 जीबी 3G/4G डाटा मिलेगा. इसके अलावा इस प्लान में 70 दिनों तक वोडाफोन टू वोडाफोन नेटवर्क पर अनलिमिटेड कॉलिंग की भी सुविधा भी मिलेगी. 346 रुपए के प्लान में 56 दिनों तक रोज मिलेगा 1 जीबी 3G/4G डाटा 244 के अलावा कंपनी ने 346 रुपये का भी एक प्लान पेश किया है. इस प्लान के तहत 56 दिनों तक रोज 1 जीबी 3G/4G डाटा मिलेगा. इसके अलावा किसी भी नेटवर्क पर अनलिमिटेड कॉलिंग की सुविधा भी मिलेगी, हालांकि प्रतिदन अधिकतम 300 मिनट ही कॉल किए जा सकते हैं. यदि यह प्लान भी आप वोडाफोन ऐप के जरिए लेते हैं तो 5 प्रतिशत का कैशबैक मिलेगा. बता दें कि हाल ही में रिलायंस जियो ने 399 रुपये का प्लान पेश किया है जिसमें 84 दिनों की वैधता के साथ 84 जीबी डाटा और सभी अनलिमिटेड कॉलिंग, मैसेज की सुविधा मिल रही है. वहीं, इससे पहले आइडिया सेल्यूलर ने 2 नए प्लान पेश किए थे. पहला प्लान 297 रुपये का तो दूसरा प्लान दूसरा 255 रुपये का है. ये प्लान्स फिलहाल मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के नए यूजर्स के लिए ही पेश किए गए हैं. साथ ही इन प्लान्स का इस्तेमाल केवल वही यूजर्स कर पाएंगे जो वीवो का हैंडसेट यूज कर रहे हैं. तो चलिए इन प्लान्स पर एक नजर डालते हैं.

10वीं पास के लिए INDIAN ARMY में वैकेंसी

नई दिल्ली। INDIAN ARMY (इंडियन आर्मी) में 10वीं पास के लिए कई पदों पर आवेदन आमंत्रित किए गए हैं. इसके लिए विज्ञापन जारी किया गया है.

पदों का विवरण: एलडीसी/ बढ़ई/ पेंटर और लैस्‍कर

कुल पदः 04

आयु सीमा: न्यूनतम आयु 18 वर्ष और अधिकतम आयु 25 वर्ष

शैक्षणिक योग्यता: मान्यता प्राप्त संस्थान से 10वीं पास होना जरूरी. 12वीं पास और आईटीआई प्रमाणपत्र को प्राथमिकता दी जाएगी.

अंतिम तिथि: 06 अगस्त, 2017

ऐसे करें आवेदन: इच्छुक उम्मीदवार संबंधित वेबसाइट पर क्लिक करके सावधानीपूर्वक ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया पूरी करें. इसके बाद अपने आवेदन पत्र के साथ आवश्‍यक दस्‍तावेजों की सेल्‍फ अटेस्‍टेड फोटोकॉपी को इस पते पर the Commandant CMP Centre and School, Neelasandra Lines, Bangalore–560025 भेजें.

सैलरी: 40000 रुपये प्रति माह

संबंधित वेबसाइट का पताः www.indianarmy.nic.in

 

… इस वजह से बंद हो सकता है ‘द कपिल शर्मा शो’

नई दिल्ली। कॉमेडियन कपिल शर्मा के लि सुनील ग्रोवर के साथ हुए विवाद के बाद से शुरू हुई मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं. इन दिनों खराब सेहत से जूझ रहे कपिल शर्मा को सोनी टेलीविजन की तरफ से बड़ा झटका लग सकता है. कपिल शर्मा और सुनील ग्रोवर के बीच 16 मार्च को ऑस्ट्रेलिया से लौटते वक्त झगड़ा हो गया था, जिसके बाद से सुनील ग्रोवर ने ‘द कपिल शर्मा शो’ को अलविदा कह दिया. सुनील ग्रोवर के जाने की वजह से शो की टीआरपी को खासा नुकसान झेलना पड़ा था और यह शो टीआरपी रेटिंग्स में ऑल टाइम लो पर भी चला गया था. इसके बाद से ही मीडिया रिपोर्ट्स में शो के ऑफएयर होने को लेकर दावा किया जा रहा था. हालांकि, चंदन प्रभाकर की वापसी और भारती सिंह के शो को ज्वाइन करने की वजह से टीआरपी में थोड़ा सुधार देखने को मिला था. पर अब एक बार फिर से ‘द कपिल शर्मा का शो टॉप 10 से बाहर हो गया है और यह 14 वें पायदान पर पहुंच गया है. टीआरपी के अलावा इन दिनों कपिल शर्मा की तबीयत भी खराब चल रही है. हाल के दिनों में तीन बार शो का शूट कैंसिल करना पड़ा है. शाहरुख खान, ‘गेस्ट इन लंदन’ की स्टार कास्ट और ‘मुबारकां’ की स्टार कास्ट को बिना प्रमोशन के ही शो से वापस जाना पड़ा. इंटरटेनमेंट न्यूज पोर्टल स्पॉटब्वॉय की खबर में दावा किया जा रहा है कि सोनी टेलीविजन कपिल शर्मा के साथ अपना कांट्रेक्ट खत्म कर सकता है. आपको बता दें कि कपिल शर्मा का सोनी टीवी के साथ कॉन्ट्रेक्ट अप्रैल में ही खत्म हो चुका है और चैनल ने इसे बढ़ाने को लेकर अब तक कोई भी फैसला नहीं लिया है. रिपोर्ट में सोर्स के हवाले से बताया गया है कि कपिल शर्मा के कॉन्ट्रेक्ट को नहीं बढ़ाने की एक वजह उनकी हेल्थ भी हो सकती है. पिछले कुछ महीनों में कपिल शर्मा कई बार अपने शो के सेट पर ही बीमार हो चुके हैं. हाल ही में फेसबुक लाइव के दौरान कपिल शर्मा ने कहा था कि वह शो को लेकर स्ट्रेस में चल रहे हैं जिसका असर उनकी हेल्थ पर पड़ रहा है.

रेलवे के खानपान ठेकों पर चुनिंदा माफियाओं का कब्जा

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नई दिल्ली। कैग की रिपोर्ट में रेलवे की पोल खुलने के बाद कैटरिंग विभाग की जांच शुरू हो गयी है जिसमें बड़ी बड़ी खामियां सामने आ रही हैं. संसद में पेश अपनी हालिया रिपोर्ट में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने इन कैटरिंग माफिया की कलई खोली है जिसके बाद पता लगा है कि रेलवे के खानपान के ज्यादातर ठेकों पर कैटरिंग माफिया का कब्जा हो गया है. जांच में पता लगा है कि ज्यादातर स्टेशनों और ट्रेनों की कैटरिंग चुनिंदा फर्मो को मिलती है. ये वही कैटरिंग फर्म हैं जिनके खाने को कैग ने इंसानों लायक मानने से इन्कार कर दिया है.

संसद में पेश अपनी हालिया रिपोर्ट में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने इन कैटरिंग माफिया की कलई खोली है. कैग ने अपनी पड़ताल में पाया कि कुल मिलाकर आठ-दस फर्मो के पास रेलवे के ज्यादातर कैटरिंग ठेके हैं. आईआरसीटीसी की कैटरिंग में भी इन्हीं का वर्चस्व दिखाई देता है. इसका एकमात्र कारण टेंडर की यह शर्त है कि रेलवे कैटरिंग के लिए केवल वही कैटरर आवेदन कर सकते हैं जिनके पास रेलवे की कैटरिंग का पूर्व अनुभव हो. इस शर्त के कारण पहले से जमी-जमाई फर्मो को ही फिर से ठेके मिल जाते हैं जिस कारण नए कैटरर रेस से बाहर रहते हैं.

रेलवे कैटरिंग के सबसे ज्यादा ठेके हासिल करने वाली फर्म आरके एसोसिएट्स है. इसके पास 54 ठेके हैं. इनमें से 21 स्टेशनों के, जबकि 33 ट्रेनों के हैं. इनमें 6 ठेके आईआरसीटीसी द्वारा तथा बाकी जोनल रेलों द्वारा दिए गए हैं. इसके बाद दूसरे नंबर पर है एरेंको कैटरिंग, जो 44 ठेकों की मालिक है. इनमें से 29 ठेके स्टेशनों के तथा 15 ठेके ट्रेनों के हैं. इनमें से सात ठेके इसे आईआरसीटीसी ने और शेष जोनल रेलों ने दिये हैं. वृंदावन फूड प्रॉडक्ट्स के 39 ठेकों के जखीरे में 14 स्टेशनों के तथा 25 ट्रेनों के हैं. इसे आईआरसीटीसी से 11 तथा जोनल रेलों से बाकी ठेके मिले हैं.

 

झुग्गी-बस्तियों के बच्चे डीयू में संवारेंगे सपने

नई दिल्ली। एक तरफ संसाधनो की बहुलता के बावजूद भी सफलता नहीं मिल पाती है तो वहीं दूसरी औऱ कठिन परिस्थितियों से लड़कर दिल्ली की झुग्गी बस्तियों के होनहारों ने दिल्ली विश्वविद्यालय की ऊंची कटऑफ लिस्ट की दीवारों को भेद दाखिला पाने में सफलता पाई है. दूसरे बच्चों के लिए प्रेरणा बने यह होनहार भविष्य में प्रशासनिक अधिकारी, शिक्षक व पत्रकार बन देश की सेवा करना चाहते हैं.

देश के सबसे बड़े कबाड़ बाजार मायापुरी की झुग्गी बस्ती में रहने वाले 17 वर्षीय प्रिंस का दाखिला डीयू के प्रतिष्ठित किरोड़ीमल कॉलेज में हुआ है. वह बताते हैं कि उन्हें 12वीं कक्षा में 94 फीसदी अंक प्राप्त हुए हैं, लेकिन इतने अंक प्राप्त करना उनके लिए आसान नहीं था. प्रिंस ने बताया कि रेलवे लाइन के पास उनका घर होने के कारण वह रात को पढ़ाई करते थे, क्योंकि रात में कम ट्रेनें गुजरती हैं.कई बार शोर से बचने के लिए उन्हें कानों में रूई लगाकर पढ़ाई करनी पड़ती थी. प्रिंस प्रशासनिक अधिकारी बनकर देश की सेवा करना चाहते हैं, लेकिन अधिकारी बनते ही सबसे पहले वह अपने परिवार को यहां से किसी अच्छी जगह ले जाना चाहेंगे.

उत्तर पश्चिम दिल्ली की तिगड़ी झुग्गी बस्ती में रहने वाले देवेंद्र की कहानी भी कम प्रेरणादायक नहीं है. देवेंद्र को शहीद भगत सिंह कॉलेज में दाखिला मिला है. 12वीं कक्षा में 90.7 फीसदी अंक प्राप्त हुआ. इनके पिता चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हैं और मां नीबू-मिर्च बेचती हैं. दोनों एक माह में 10 हजार रुपये कमाते हैं. इस बजट के साथ जीवनयापन करना कई बार बेहद मुश्किल होता है, लेकिन मेरे माता-पिता ने मुझे हमेशा पढ़ाई जारी रखने की प्रेरणा दी है.

इंदिरा कैंप झुग्गी में रहने वाली मधु ने 12वीं कक्षा में 88 फीसदी अंक प्राप्त कर हंसराज कॉलेज में दाखिला लिया है. मधु ने बताया कि झुग्गी बस्ती में हर वक्त लाउडस्पीकर बजने के कारण कई बार पढ़ना बेहद मुश्किल होता था. इसके अलावा झुग्गी का माहौल भी बेहद खराब होता है. अगर आस-पास का माहौल अच्छा होता तो मेरे और ज्यादा नंबर आते. भविष्य में पत्रकार या शिक्षक बनकर देश की सेवा करने की चाहत रखने वाली मधु अपनी कामयाबी का श्रेय माता-पिता को देती हैं. इनके पिता जूते की फैक्ट्री में काम करते हैं.

ऐसे विद्यार्थियों को शिक्षा का बेहतर मंच प्रदान करने के लिए काम करने वाले गैर सरकारी संगठन आशा कम्यूनिटी हेल्थ एंड डेवलपमेंट सोसाइटी के एक पदाधिकारी ने बताया कि इस वर्ष इन बच्चों के अलावा झुग्गी बस्ती के कुल 130 बच्चों को डीयू के विभिन्न कॉलेजों मे दाखिला मिला है जो दूसरे गरीब छात्रों के लिए प्रेरणा बन उभरे हैं.

 

खनन माफिया के हमले के बाद, धरने पर बैठे बीजेपी विधायक

लखीमपुर। योगीराज में आम आदमियों का तो बुरा हाल है ही उनकी पार्टी के विधायक तक सुरक्षित नहीं है. लखीमपुर के सदर विधायक योगेश वर्मा व उनके प्रतिनिधियों पर शनिवार देर रात खनन माफिया ने फायरिंग कर दी. विधायक व उनके प्रतिनिधि का कहना है कि हमले की ये घटना अवैध खनन का विरोध के कारण हुई. विधायक के प्रतिनिधि शांतनु तिवारी की तहरीर पर तीन के खिलाफ नामजद व एक अज्ञात के खिलाफ पुलिस ने केस दर्ज किया है.

जानकारी देते हुए छाउछ निवासी शांतनु तिवारी ने बताया कि शनिवार रात 11 बजे वह सदर विधायक योगेश वर्मा के साथ जिला अस्पताल से उनके राजगढ़ स्थित घर गाड़ी से जा रहे थे. ओवरब्रिज के पास बालू भरी सात ट्रैक्टर-ट्रॉली आईं, जिसमें एक ट्रैक्टर चालक ने उनकी गाड़ी में टक्कर मारने का प्रयास किया. इसमें उनके चालक राजू ने गाड़ी किनारे कर ली. तभी खनन माफिया प्रेम वर्मा निवासी कार से वहां आ गए और शांतनु तिवारी व सदर विधायक योगेश वर्मा पर अवैध खनन का विरोध करने को लेकर लाइसेंसी व अवैध असलहों से फायर कर दिए.

इसी बीच शांतनु व चालक राजू वर्मा के शोर मचा देने पर कुछ लोग व पुलिस आ गई और तीनों को पकड़कर कोतवाली ले आई. साथ ही बालू भरे उक्त सातों ट्रैक्टर-ट्रॉलियों को भी कब्जे में ले लिया पर कुछ समय बाद ही तीनों आरोपी रात में ही कोतवाली से भाग गए. पुलिस की लापरवाही पर विधायक समर्थकों के साथ रात में ही कोतवाली गेट पर धरने पर बैठ गए. विधायक ने बताया कि अवैध खनन का मामला और विधायक पर जानलेवा हमले जैसी घटना के बाद भी मामले पर बोलने से एसपी दिन भर बचते रहे. शनिवार देर रात से लेकर रविवार सुबह तक इतना सब हो गया, लेकिन एसपी डॉ. एस चन्नप्पा ने मामले में किसी भी कार्रवाई की जानकारी नहीं दी. रविवार दोपहर एसपी डॉ. एस चन्नप्पा को उनके सरकारी आवास परिसर से ही फोन मिलाया गया, लेकिन कई बार घंटी जाने पर भी फोन नहीं उठाया.

 

लोकतंत्र के सिर पर बंधा गरीबी का कफन

पिछले दिनों की बात है. उत्तर प्रदेश में एक महिला ने गरीबी और भूख के कारण दम तोड़ दिया. मृत महिला के चार बच्चों के पास इतने भी पैसे नहीं थे कि अपनी मां का अंतिम संस्कार भी कर सकें. बच्चों ने भीख मांगकर अंतिम संस्कार के लिए पैसे जुटाए तब जाकर मां का अंतिम संस्कार किया. बच्चों को भीख देने वाला समाज अगर सामाजिक दायित्व समझ कर मृत महिला का अंतिम संस्कार अपने पैसों से कर देता तो समाज में एक अच्छा संदेश जाता. भीख के पैसे से हुआ अंतिम संस्कार समाज और हमारे सिस्टम दोनों को लानत कर रहा है. आजकल मीडिया में ‘‘जीरो टोलरेंस‘‘ की बातें बहुत सुनने को मिलती हैं. पर हैरत एवं गैरत की बात ये है कि हमारा समाज, लोकतांत्रिक सिस्टम और लोकतंत्र का तथाकथित चौथा स्तम्भ माना जाने वाला मीडिया ऐसी घटनाओं को ‘‘फुल टोलरेंस‘‘ के साथ पचा जाता है. ‘‘के न्यूज चैनल‘‘ जरूर साधुवाद का पात्र है जिसने इस घटना को प्राइम टाइम में डिबेट के रूप में बहुत प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत किया. अन्य चैनल ने इस घटना को प्रमुखता से दिखाया हो ऐसी जानकारी नहीं है. मुझे लगता है कि उक्त घटना अगर बिहार या बंगाल जैसे किसी राज्य में घटित हुई होती तो, हफ्ते भर मीडिया की सुर्खियों में रहती. भारत का संविधान सभी नागरिकों को गरिमा पूर्ण जीवन जीने का अधिकार देता है. पर भूख और गरीबी से अभिशप्त जीवन को किसी भी दृष्टि गरिमापूर्ण नहीं माना जा सकता. हम भारत के महाशक्ति एवं बड़ी अर्थव्यवस्था होने के चाहे लाख दावे करें पर इन दावों के बीच आंकड़े बयां कर रहे हैं कि दुनिया के कुल भूखे लोगों में एक तिहाई भूखी आबादी भारत में जिल्लत की जिन्दगी जी रही है. रोजाना करीब बीस करोड़ गरीब लोग दो जून की रोटी जुटाने में असमर्थ रहते हैं देश में एक तरफ रसोई गैस सिलंडर बांटने की योजना के प्रचार-प्रसार में लाखों रूपये खर्च किए जा रहे है तो दूसरी तरफ इन गरीबों के यहां चूल्हा तक नहीं जल पाता है परिणामस्वरूप इन्हें रात को भूखे पेट ही सोना पड़ता है. भारत में प्रतिवर्ष करीब पच्चीस लाख गरीब लोग भूख के कारण दम तोड़ देते हैं. भूख से दम तोड़ने वाले लोगों में अनुसूचित जाति, जनजाति एवं अति पिछड़ी जातियों के लोगों की संख्या अधिक होती है. संयुक्त राष्ट्र संघ के खाद्य एवं कृषि संगठन की रिपोर्ट ‘‘द स्टेट ऑफ फू्ड इनसिक्यूरिटी इन द वर्ल्ड‘‘ के अनुसार भारत दुनिया के भूखे देशों की सूची में शीर्ष पर शामिल है. गरीबों की गरीबी और भुखमरी दूर करने के लिए राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, टारगेटिड डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम, अनाज बैंक योजना और अन्त्योदय जैसी अनेकों सरकारी योजनाएं चलायी जा रही हैं. जो राजनीतिक उदासीनता के कारण नाकाफी साबित हो रही हैं. देखा यह गया है कि गरीबों में बांटने के लिए अनाज गोदामों एवं अनाज बैंकों में रखा अनाज सड़-गल जाता है लेकिन गरीबों तक नहीं पहुंच पाता. भुखमरी का कारण गरीबी और गरीबी का कारण बेरोजगारी है और गांवों में बेरोजगारी का मुख्य कारण भूमिहीनता है. एक तरफ धर्म की दुकानें चलाने वाले तथाकथित साधू-संतों, बापू और बाबाओं को सत्संग आदि के लिए हजारों एकड़ जमीन सरकारों द्वारा दे दी जाती है. लेकिन भूमिहीन गरीबों को भूमि आवंटित करने में सरकारें उदासीनता दिखाती हैं. जबकि हमारा संविधान बापू-बाबाओं के बजाए गरीबों के हितों के प्रति अति प्रतिबद्ध है. फिर ऐसी क्या वजह है कि हमारी लोकतांत्रिक सरकारों को गरीबों के बजाए बाबाओं की चिंता अधिक रहती है. भूख से मरने का यूपी का मामला अकेला मामला नहीं हैं. प्रतिदिन देश भर में ऐसी घटनाएं घटित होती रहती रहती हैं, वह बात अलग है कि शासन-प्रशासन के दबाव में ऐसी घटनाएं चर्चा का विषय नहीं बन पाती. देश में भ्रष्टाचार आदि के नाम पर बड़े-बड़े आन्दोलन हुए. आन्दोलनों के साथ राजसत्ताओं का आना-जाना भी हुआ. देश से गरीबी-भुखमरी खत्म करने के राजनीतिक वायदे भी होते रहे हैं. पर गरीबी-भुखमरी की समस्या अभी भी कायम है. फिर भी ताज्जुब की बात है कि गरीब हितों का ढ़िंढोरा पीटने वाले संगठन भी भुखमरी से होने वाली मौतों पर चुप रहते है. क्या इस मुद्दे पर देश में कोई आन्दोलन नहीं होना चाहिए. आखिर भुखमरी से मृत किसी गरीब के अंतिम संस्कार के लिए भीख मांगने का सिलसिला कब तक चलता रहेगा. यूपी की उक्त घटना को देखकर लगता है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र ने सिर पर गरीबी कफन बंधा है. यह लेख ओपी सोनिक ने लिखा है. लेखक के निजी विचार है.

झुग्गियों के बच्चों को शिक्षा दे रहे हैं आईआईटी छात्र

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नई दिल्ली। कॉलेज जाने वाले छात्रों का समूह जिस तरह गरीब बच्चों को झुग्गी बस्तियों में जाकर शिक्षा दे रहा है इस तरह की पहल को कई लोग मन में सपने लिए सोचते रह जाते हैं. मगर, आयुष, मोनिका, अभिषेक, पूजा जैसे कई छात्रों की पहल बताती है कि कड़ी लग्न और मेहनत से काम किया जायें तो कुछ भी संभव है.

ग्रुप के युवा आयुष की पहल पर 7 वर्ष पहले झुग्गी-झोपड़ी के बच्चों को पढ़ाने का काम शुरू किया गया था जो एक कड़ी के रूप में शुरू हुआ. आज यह काम मजबूत जंजीर बन चुका है. कॉलेज जाने वाले इन छात्रों ने ‘यंग एसोसिएशन’ नाम का समूह बनाकर दिल्ली में पांच जगहों पर झुग्गी-झोपड़ी और अनाथालय के बच्चों को पढ़ाने का काम कर रखा है. छात्रों के इस समूह में आईआईटी दिल्ली सिहित विभिन्न इंजीनियरिंग कॉलेज, पत्रकारिता के साथ-साथ डीयू के कई कॉलेज के छात्र शामिल है. जानकारी देते हुए छात्र आयुष केसरी बतातें हैं कि वर्ष 2010 की बात थी जब वह उत्तम नगर से नोएडा मेट्रो से कॉलेज जाते थे तब वह अक्सर इंद्रप्रस्थ मेट्रो स्टेशन के पास झुग्गी झोपड़ी में बच्चों को खेलते देखा करते थे. एक दिन उसके मन में इस बस्ती में जाने का विचार आया, दूसरे दिन वह अपने एक साथी शशांक के साथ बस्ती में गए. आयुष ने बताया कि इसके बाद उसने अपने कॉलेज में दोस्तों से इन बच्चों के लिए कुछ करने के लिए कहा, तो सबने कहा कि क्यों न शानिवार-रविवार को इन बच्चों को पढ़ाया जाए.

छात्रों के समूह की एक कोर टीम है जिसमें हर वर्ष सितंबर में बदलाव किया जाता है. मौजूदा टीम में पांच लोग हैं पूजा मिश्र, मोनिका गुप्ता, वर्षा कुटील, ऋचा त्रिपाठी और अभिषेक कुमार. इसके अलावा समूह में करीब 25 छात्र हैं. जिसमें आईआईटी दिल्ली के तीन छात्र भी शामिल हैं.

इसमें आयुष केसरी अब निगरानी की काम देखते हैं. उनकी साथी मोनिका ने बताया कि समूह के सदस्य झंडेवालान के पास स्थित कत्यानी बालिका आश्रम की अनाथ बच्चियों के अलावा इंद्रप्रस्थ मेट्रो स्टेशन के पास अन्ना बस्ती, उत्तम नगर के पास काली बस्ती, पूर्वी दिल्ली के दल्लूपुरा और ललिता पार्क में शानिवार और रविवार को दो घंटा पढ़ाने का काम करते हैं. इसको अलावा नोएडा सेक्टर 12-22 और गाजियाबाद में भी एक जगह पाठशाला लगाई जाती है. इन सभी छात्रों का एक ही मकसद है गरीब छात्रों को शिक्षित करके उनकी जिंदगी में बदलाव लाना .

शौचालय में सोने को मजबूर है ओडिशा का यह आदिवासी परिवार

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केओनझर। ओडिशा के केओनझर जिले में एक बेघर आदिवासी परिवार स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत बनाए गए शौचालय में रहने पर मजबूर है. इछिंदा गांव के दक्तर नायक, ओडिशा माइनिंग कारपोरेशन द्वारा बनवाये गए शौचालय में रह रहे हैं क्योंकि उनके पास कोई पक्का मकान नहीं है. परिवार के हालात के बारे में ओडिया डेली के द्वारा बताए जाने के कुछ घंटो के बाद ही अधिकारियों ने बताया कि परिवार को एक पक्के घर में ले जाया गया है. केओनझर जिले के कलेक्टर ने कहा कि “नायक के परिवार को यहां ओएमसी द्वारा घर का निर्माण समाप्त होने तक रहना होगा. ओडिशा के एक अखबार संबाद से मिली एक तस्वीर में नायक शौचालय के दरवाजे के पास बैठे हुए है. वहीं दूसरी तरफ शौचालय के ठीक बगल में नायक की बेटी निशा सो रही है. जो नायक के परिवार के हालात को बयां कर रहे हैं. दक्तर नायक एक श्रमिक हैं.ये और इनका परिवार बेहद बुरी परिस्थितियों में रह रहे हैं. कभी ये किसी के जर्जर मकान में रहते तो कभी पॉलिथीन के नीचे. बारिश के दिनों में इनके लिए कई परेशानियां खड़ी हो गईं. नायक ने अखबार को बताया कि पिछले कुछ दिनों से वो और उनका परिवार इस शौचालय के अंदर ही सो रहे हैं. उनकी पत्नी नंदिनी बाहर खाना बनाती हैं और शौच के लिए उनका परिवार जंगल में जाता है. प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत गांव के 40 आदिवासी परिवारों को बीपीएल श्रेणी में घर दिया गया है. लेकिन नायक को घर नहीं मिला. यहां तक कि माइन्स एंव मिनीरल संशोधन अधिनियम के अंतर्गत खनिज-प्राप्ति वाले क्षेत्रों में आदिवासियों के विकास के लिए गठित डिस्ट्रीक्ट मिनीरल फाउंडेशन उनके हालात में बहुत सुधार नहीं कर पाए हैं.

शौचालय बनवाने के लिए डीएम ने दी पत्नी को बेचने की नसीहत

औरंगाबाद। बिहार के औरंगाबाद के डीएम कंवल तनुज अपने एक बयान से विवाद में फंस गए हैं. डीएम कंवल तनुज जम्होर में स्वच्छता अभियान पर भाषण दे रहे थे. औरंगाबाद कलेक्टर कंवल तनुज का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है. वीडियो में दिख रहा है कि कलेक्टर जम्होर पंचायत में स्वच्छता महाभियान सभा को संबोधित कर रहे हैं. इस दौरान वह बेहद गुस्से में थें. कलेक्टर ने मंच से सभी को अपने घर में शौचालय बनाने की सीख दे रहे थे, तभी एक शख्स ने उन्हें टोक दिया. उसने कहा कि हुजूर रहने के लिए घर नहीं है शौचालय बनवाने के लिए पैसे कहां से लाऊं. कलेक्टर ने कहा कि पैसे नहीं है तो जाओ बेच दो अपनी पत्नी को और शराब पीओ. अगर ये मानसिकता है तो जाकर नीलाम कर दीजिए अपने घर की इज्जत और कह दीजिए सरकार से कि नहीं बनेगा हमसे शौचालय. डीएम कंवल तनुज ने कहा, ‘’ऐसा कौन सा गरीब आदमी है जो मुझे कह दे कि मेरी बीवी की इज्जत ले लो और मुझे 12 हजार रुपए दे दो. कोई ऐसा नहीं होगा. जाकर देखिए कितनी गरीबी है. ’अरे जाओ बेच दो अपनी बीवी को. अगर ये मानसिकता है तो जाकर नीलाम कर दी जाए घर की इज्जत और कह दीजिए सरकार से कि नहीं बनेगा शौचालय.’’ वीडियो वायरल होने के बाद कलेक्टर ने सफाई दी है. उन्होंने कहा कि बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है. घर में शौचालय न होने की वजह से महिलाओं की इज्जत पर आंच आती है. सरकार शौचालय बनाने के लिए 12 हजार रुपए दे रही है. नियम है कि 12 हजार रुपए तभी मिलेगा जब लाभ पाने वाला व्यक्ति घर में शौचालय बना लेगा. मैं यही बात ग्रामीणों को समझा रहा था.

निठारी कांड: मनिंदर पंढेर और सुरेंद्र कोली को फांसी की सजा

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नई दिल्ली। नोएडा के बहुचर्चित निठारी कांड में गाजियाबाद की सीबीआई कोर्ट ने मोनिंदर सिंह पंढेर और सुरिंदर कोली को मृत्युदंड का फैसला सुना दिया है. यह सजा युवती का अपहरण कर रेप और मर्डर के मामले में सजा सुनाई गई है. गाजियाबाद की स्पेशल सीबीआई कोर्ट ने पिंकी सरकार हत्याकांड में पंधेर और सुरेंद्र कोली को शनिवार को रेप और मर्डर दोषी पाया था. असल मेें निठारी कांड दिसंबर 2006 में राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आया था. निठारी कांड के एक अन्य मामले में पहले भी कोली को फांसी की सजा मिल चुकी है. पंधेर को कोर्ट ने हत्या और रेप की कोशिश समेत सबूत मिटाने और साजिश रचने का दोषी पाया गया. बता दें की 12 साल पहले 20 जून, 2005 को आठ साल की एक बच्ची ज्योति नोएडा के निठारी इलाके से अचानक गायब हो गई थी. इसके बाद से इस इलाके में लगातार बच्चे गायब होने लगे. एक साल तक लगातार बच्‍चों के गायब होने यह सिलसिला चलता रहा और करीब दर्जनभर बच्चे गायब हो गए. मामला राष्ट्रीय स्तर पर आने के बाद पुलिस की अलग-अलग टीमों ने एनसीआर समेत देश के कई इलाकों में सर्च ऑपरेशन चलाया. 7 मई 2006 को 21 साल की लड़की पायल जब गायब हुई तो पुलिस को अहम सुराग उसके मोबाइल से मिला. पुलिस ने उस नंबर की कॉल डिटेल निकलवाई. उसके बाद जब उसमे से एक नंबर पर कॉल की गई तो उसका नाम मनिंदर सिंह पंधेर का था. जिसके बाद पुलिस ने इस मामले में पंधेर और उसके नौकर कोली को आरोपी बनाया. इसके बाद पूरे निठारी मामले का खुलासा हुआ था, जिसमें ज्योति, पुष्पा विश्वास, नंदा देवी, पायल, रचना, हर्ष, कुमारी निशा, रिम्पा हलधर, सतेंद्र, दीपाली, आरती, पायल, पिंकी सरकार, अंजली, सोनी, शेख रजा खान और बीना का रेप किया गया था. रेप के बाद उन्हें मारकर पंढेर के घर में दफन कर दिया गया था. गौरतलब है की निठारी कांड के 6 मामलों में कोर्ट सुरेंद्र कोली को दोषी मानते हुए फांसी की सजा सुना चुकी है. पिछले साल अक्टूबर में कोर्ट ने कोली को नंदा देवी मर्डर केस में किडनैपिंग, रेप और सबूत मिटाने का दोषी पाया था. इससे पहले के भी पांच मामले में सीबीआई कोर्ट ने कोली को दोषी करार देते हुए फांसी की सजा सुनाई थी पर इस बार फांसी पर पुख्ता मोहर लग गयी है.