मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले जवान तेज बहादुर का नामांकन रद्द

वाराणसी से पीएम नरेन्द्र मोदी के खिलाफ मैदान में सपा प्रत्याशी का नामांकन खारिज कर दिया है. बता दें कि सपा (समाजवादी पार्टी) के प्रत्याशी के तौर पर नामांकन करने वाले बीएसएफ के बर्खास्त सिपाही तेज बहादुर यादव मैदान में उतरे थे.

दरअसल मंगलवार (30 अप्रैल) को प्रेक्षक प्रवीण कुमार की मौजूदगी में नामांकन पत्रों की जांच शुरू हुई. जांच में जिला निर्वाचन अधिकारी सुरेन्द्र सिंह यादव द्वारा बीएसएफ से बर्खास्तगी के संबंध में दो नामांकन पत्रों में अलग-अलग जानकारी देने पर नोटिस देकर 24 घंटे में बीएसएफ से अनापत्ती प्रमाण पत्र लेकर मौजूद होने को कहा था.

जिला निर्वाचन अधिकारी की ओर से तेज बहादुर को कहा था कि वो बीएसएफ की ओर से प्रमाणपत्र लेकर आएं जिसमें यह साफ साफ लिखा हो कि उन्हे नौकरी से किस वजह से बर्खास्त किया गया था। बता दें कि जांच में सामने आया था कि तेज ने पहले नामांकन में ‘भारत सरकार या राज्य सरकार के आधीन पद धारण करने के दौरान भ्रष्टाचार या अभक्ति के कारण पदच्युक्त किया गया’ के सवाल पर हां में जवाब दिया और विवरण में 19 अप्रैल, 2017 लिखा है. वहीं दूसरे शपथ पत्र में लिखा था कि तेज बहादुर यादव को 19 अप्रैल 2017 को बर्खास्त किया गया था लेकिन भारत सरकार व राज्य सरकार द्वारा पद धारण के दौरान भ्रष्टाचार एव अभिक्त के कारण पदच्युत नहीं किया गया.

बता दें कि तेज बहादुर यादव का नामांकन खारिज होने के बाद अब सपा की ओर से शालिनी यादव मैदान में हैं.

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महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में नक्सली हमले में 16 जवान शहीद

मुंबई। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में एक बड़े नक्सली हमले की की खबर है. महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में नक्सलिओं ने IED ब्लास्ट कर पुलिस की गाड़ी उड़ा दी है. इस नक्सली हमले में 16 जवान शहीद हो गए हैं. इस बात की पुष्टि महाराष्ट्र के गृह राज्यमंत्री ने कर दी है. महाराष्ट्र के नक्सल प्रभावित जिले गढ़चिरौली में माओवादियों ने पुलिस की गाड़ी को उस वक्त निशाना बयाना जब पुलिस की टीम उस जगह जा रही थी, जहां सुबह में ही नक्सलियों ने करीब 25 से 30 गाड़ियों को आग के हवाले किया था. बताया जा रहा है कि जिस पुलिस की गाड़ी पर नक्सलियों ने हमला किया है, उसमें 16 सुरक्षा कर्मी मौजूद थे. हालांकि, इस ब्लास्ट के बाद पुलिस और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ जारी है. दोनों ओर से गोलीबारी हो रही है.

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस ने कहा कि यह जानकर कि गढ़चिरौली सी-60 बल के हमारे 16 पुलिस कर्मी आज नक्सलियों द्वारा कायरतापूर्ण हमले में शहीद हो गए, काफी दुख पहुंचा. मेरे संवेदनाएं और प्रार्थनाएं शहीदों के परिवारों के साथ हैं. मैं DGP और गढ़चिरौली SP के संपर्क में हूं.

महाराष्ट्र के मंत्री सुधीर मुन्गान्तीवर गढ़चिरौली नक्सली हमले पर कहा कि हमें लग रहा है कि इस हमले में 15 पुलिस जवान और एक ड्राइवर ने अपनी जान गंवा दी है.

इससे पहले लोकसभा चुनाव के लिए होने वाले पहले चरण के मतदान से एक दिन पहले महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में CRPF की पेट्रोलिंग टीम पर नक्सलियों ने हमला किया था. नक्सलियों द्वारा CRPF की पेट्रोलिंग टीम पर किए गए IED ब्लास्ट की चपेट में कई जवान आए थे.

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धर्मयुद्ध के समक्ष दिग्विजय सिंह!

सत्रहवें लोकसभा का चुनाव अपना आधे से ज्यादा का सफ़र पूरा कर चुका है. अबतक चार चरणों के चुनाव पूरे हो चुके हैं और विपक्ष का हौसला बुलंद है. किन्तु हौसला बुलंद होने के बावजूद इन तीन चरणों में इवीएम जिस तरह से काम कर रहा है, उससे विपक्ष कुछ खौफजदा भी चला है. उसके खौफ को प्रधानमंत्री उसकी हार का डर बता रहे हैं. बहरहाल जिन बाकी सीटों पर चुनाव होना है, उनमे भोपाल की सीट पर पूरी दुनिया की निगाहें टिक गयी हैं. इस प्रतिष्ठित सीट पर किसी कांग्रेसी के जीते 35 साल हो गए हैं. कांग्रेस इस बार 35 साल का सूखा दूर करने की रणनीति के तहत एक दशक तक मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री और दो बार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे दिग्विजय सिंह को यहाँ से उतारने का मन बनाई. प्रायः सोलह साल तक चुनावी राजनीति से दूर रहे दिग्विजय सिंह एक ऐसे नेता हैं, जिनकी पकड़ पूरे प्रदेश में है. अतः उनकी सर्वस्वीकार्य छवि का लाभ उठाने के लिए कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें भोपाल से उतारने का मन बनाया. लेकिन इस वरिष्ठ नेता की एक खासियत यह भी है कि वे समय-समय पर विवादों को जन्म देते रहे हैं. खासतौर संघी आतंकवाद और भाजपा को लेकर सोशल मीडिया पर जारी उनके आक्रामक ट्विट संघ परिवार को काफी विचलित करते रहे हैं . इसलिए संघ परिवार उन्हें हिन्दू –विरोधी साबित करने में बराबर प्रयासरत रहा. उसके अनवरत प्रयास को व्यर्थ करने लिए उन्होंने 2017-18 में तीन हजार किलोमीटर से ज्यादा दूरी की नर्मदा परिक्रमा किया था. बावजूद इसके संघ परिवार उन्हें हिन्दू विरोधी साबित करने की मुहीम से पीछे नहीं हटा. ऐसे में जब लम्बे अन्तराल के बाद दिग्विजय सिंह चुनावी राजनीति में उतरे, तब संघ परिवार ने इसे एक अवसर के रूप में लिया.

प्रत्येक व्यक्ति के खाते में 15 लाख रूपये जमा कराने, हर साल युवाओं को दो करोड़ नौकरियां देने, किसानों की आय दो गुनी करने इत्यादि जैसे जिन लोकलुभावन वादों के सहारे नरेंद्र मोदी 2014 में जोर-शोर से सत्ता में आये, प्रधानमंत्री के रूप में उन वादों को पूरा करने में बुरी तरह विफल रहे. ऊपर से नोटबंदी और जीएसटी से भी उनके प्रति लोगों का बड़े पैमाने पर मोहभंग हुआ. इससे भी आगे बढ़कर जिस तरह 2019 में उनकी पारी के स्लॉग ओवर में सवर्ण आरक्षण और विभागवार आरक्षण लागू होने के साथ 10 लाख आदिवासी परिवारों को जंगल से दूर धकेलने का आदेश जारू हुआ, उससे बहुसंख्य वंचित वर्गों के मतदाताओं में एक तरह से उनके खिलाफ विद्रोह की भावना पनप उठी. ऐसे में सत्रहवीं लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए अवसर काफी कम हो गए.इस स्थिति में संघ परिवार इन मुद्दों से लोगों का ध्यान हटाकर चुनाव को हिंदुत्व जैसे भावनात्मक मुद्दे पर केन्द्रित करने की जुगत भिड़ाने लगा. ऐसे में जब भोपाल की प्रतिष्ठित सिट से दिग्विजय सिंह की उम्मीदवारी की घोषणा हुई, उसने इसे पूरे चुनाव को हिंदुत्व पर केन्द्रित करने के एक स्वर्णिम अवसर के रूप में देखा और इसके लिए उसने ऐसा प्रार्थी उतारने का मन बनाया जिसे सामने देखकर वह संघी आतंकवाद का पुराना राग अलापना शुरू कर दें. कहा जा रहा है कि इसके लिए संघ परिवार ने उमा भारती, नरेंद्र सिंह तोमर, शिवराज सिंह चौहान इत्यादि कई नामों पर विचार-विमर्श करने के बाद मालेगांव ब्लास्ट को लेकर चर्चा में आयीं साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर का नाम आगे बढाया और आनन-फानन में उनको भाजपा ज्वाइन कराकर टिकट दे दिया गया. कथित डिवाइन पॉवर से लैस वही प्रज्ञा ठाकुर 23 अप्रैल को पूरे लाव-लश्कर और शक्ति प्रदर्शन के साथ भोपाल से भाजपा के आधिकारिक प्रार्थी के रूप में अपना नामांकन पत्र दाखिल कर दीं. इन पंक्तियों के लिखने के दौरान उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगानेवाली याचिका भी ख़ारिज हो चुकी हैं.

वैसे तो साध्वी प्रज्ञा सिंह 23 अप्रैल को आधिकारिक तौर पर भाजपा की प्रार्थी बनीं, लेकिन पार्टी ने उनके नाम की घोषणा सप्ताह भर पहले ही कर दिया था. और भाजपा की ओर से प्रार्थी घोषित होते ही वह दिग्विजय को उकसाने के मोर्चे पर सक्रिय हो गयीं. उम्मीदवारी की घोषणा होते ही उन्होंने एलान कर दिया कि यह चुनाव दिग्विजय सिंह के खिलाफ नहीं है, यह धर्मयुद्ध है. प्रज्ञा सिंह और उनके सहयोगियों के आतंकवादी घटनाओं में शामिल होने के मामलों की जांच मुंबई पुलिस के जिस आला अधिकारी हेमंत करकरे ने की थी, उनसे दिग्विजय के निजी और मधुर सम्बन्ध थे. इसलिए प्रज्ञा ने दिग्विजय सिंह को उकसाने के लिए भाजपा कार्यकर्ताओं के मध्य हेमंत करकरे पर एक ऐसा बयान दे दिया जिसे लेकर देश में तूफ़ान खड़ा हो गया. उन्होंने करकरे की भूमिका पर कई सवाल उठाते हुए कहा था ,’मैंने कहा था कि तेरा सर्वनाश होगा. जिस दिन मैंने कहा था, उस दिन उसको सूतक लग गया था. ठीक सवा महीने बाद आतंकवादियों ने उसे मार दिया. उस दिन सूतक का अंत हो गया.’ शहीद हेमंत करकरे पर साध्वी के उस पागलपन भरे बयान को भाजपा के प्रवक्ताओं ने तो पहले बचाव करने का प्रयास किया. किन्तु उसे लेकर पूरे देश में जो आक्रोश पैदा हुआ उसे देखते हुए भाजपा के लोगों ने उसे साध्वी का निजी बयान बताकर पल्ला झाड़ लिया. प्रज्ञा सिंह के पागलपन भरे बयान पर देश भर में जो उग्र प्रतिक्रिया हुई, उसे देखते हुए कोई और दल होता तो उनकी उम्मीदवारी वापस ले लेता , किन्तु भाजपा ने वैसा नहीं किया.उलटे उसी दिन बहुत ही दृढ़ता के साथ मोदी ने कह दिया,’मालेगांव विस्फोट में आरोपित साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को भोपाल से भाजपा प्रत्याशी बनाया जाना उन लोगों को सांकेतिक जवाब है, जिन्होंने समृद्ध हिन्दू संस्कृति पर आतंकी का ठप्पा लगाया.यह प्रतीक कांग्रेस पर भारी साबित होगा.’

अब प्रधानमन्त्री के उपरोक्त बयान को पकड़कर कहा जा सकता है कि भाजपा ने भोपाल संसदीय क्षेत्र से हिन्दू संस्कृति के एक उग्र प्रतीक को चुनाव में उतारकर दिग्विजय सिंह को धर्मयुद्ध के समुख खड़ा कर दिया है.और अपना कर्तव्य निर्वहन के लिए साध्वी प्रज्ञा ने अपने आग उगलते बयानों से भोपाल को धर्मयुद्ध के एक समर क्षेत्र में परिणत कर दिया. जिस तरह कोई खौफनाक फ़ास्ट बॉलर हरियल पिच पर अपने बाउंसर और बीमर से किसी बैट्समैन पर हमला बोल देता है, वही काम प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने किया है. किन्तु चतुर सुजान दिग्विजय सिंह ने एक कुशल बैट्समैन की भांति प्रज्ञा के बीमर- बाउंसरों को डक करते या छोड़ते गए हैं. उत्तेजना में आकर कोई ऐसा शॉट नहीं खेला है, जिसे भाजपा लपक कर शेष बचे चुनाव को हिन्दू-मुस्लिम पर केन्द्रित कर सके. लगातार बाउंसर और बीमर फेंककर खिलाडी को आउट नहीं कर पाने से जिस तरह फ़ास्ट बॉलर थक जाते हैं, कुछ वही हाल साध्वी प्रज्ञा का हो गया है. अब वह नपा-तुला भाषण देने लगी हैं, समझ गयी हैं दिग्विजय सिंह उकसावे में नहीं आने वाले हैं. साध्वी को थकाने के बाद अब दिग्गी राजा धर्मयुद्ध की पिच पर स्कोर करना शुरू कर दिए हैं. इस क्रम में उन्होंने भोपाल विजन डाक्यूमेंट जारी कर कर एक जबरदस्त शॉट लगाया है.

इसमें कोई शक नहीं कि दिग्विजय सिंह ने गत 21 अप्रैल,2019 को जो ‘भोपाल विजन’ जारी किया है, वह एक शब्द में असाधारण है. उसमे भोपाल को टूरिस्ट हब बनाने, त्वरित हवाई सेवा शुरू करने, उत्कृष्ट शिक्षा, उत्तम रोजगार इत्यादि के साथ ज्ञान, विज्ञानं, अनुसन्धान केंद्र विकसित करने सहित अन्य कई जो बाते शामिल की गयी हैं, वह सामान्य स्थिति में चुनाव जीतने के लिए काफी कारगर हो सकती हैं. लेकिन मोदी राज में जिस तरह लोगों को हिन्दू धर्म के नशे में मतवाला बनाने का बलिष्ठ प्रयास हुआ है, उसे देखते हुए ‘भोपाल विजन’ साध्वी प्रज्ञा द्वारा छेड़े गए ‘धर्मयुद्ध’ का सामना करने में पर्याप्त रूप से कारगर होगा, इसमें संदेह है. संघ परिवार द्वारा फैलाये गए राष्ट्रवाद और धर्मोन्माद की गिरफ्त में लोग इस कदर फंस गए हैं कि भूख, बेरोजगारी, विकास की बात भूलकर मोदी-मोदी किये जा रहे हैं. ऐसे में यदि दिग्विजय सिंह धर्मयुद्ध से पार पाना चाहते हैं तो उन्हें 2002 की 13 जनवरी को जारी डाइवर्सिटी केन्द्रित ऐतिहासिक भोपाल घोषणापत्र को हथियार के रूप में इस्तेमाल करना पड़ेगा.

दिग्विजय सिंह भूले नहीं होंगे कि नयी सदी में जब नवउदारवादी अर्थनीति से बहुजन समाज त्रस्त था, उसी दौर में 12-13 जनवरी, 2002 को खुद उन्होंने ही मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में दलितों का ऐतिहासिक ‘भोपाल सम्मलेन’ आयोजित किया था, जहां से डाइवर्सिटी केन्द्रित 21 सूत्रीय दलित एजेंडा जारी हुआ,जिसे ऐतिहासिक भोपाल घोषणापत्र कहते हैं. उसी भोपाल घोषणापत्र से दलित, आदिवासियों के साथ परवर्तीकाल में पिछड़ों में नौकरियों से आगे बढ़कर सप्लाई, डीलरशिप, ठेकेदारी, फिल्म-टीवी इत्यादि अर्थोपार्जन की समस्त गतिविधियों में अमेरिका के तर्ज पर सर्वव्यापी आरक्षण की चाह पनपी. आज दलित-आदिवासी और पिछड़े समूह के तमाम जागरूक लोग अपने-अपने तरीके से सभी क्षेत्रों में आरक्षण की अगर मांग बुलंद कर रहे हैं, तो उसके पीछे भोपाल घोषणापत्र का ही बड़ा योगदान है. दिग्विजय सिंह ने भोपाल घोषणापत्र के जरिये न सिर्फ सर्वव्यापी आरक्षण वाली डाइवर्सिटी की आइडिया को सिर्फ विस्तार दिया, बल्कि 27 अगस्त ,2002 को समाज कल्याण विभाग में एससी/एसटी के लोगों को 30% आरक्षण लागू कर रास्ता दिखाया कि सरकारें यदि चाह दें तो बहुजनों को नौकरियों से आगे बढ़कर उद्योग-व्यापार में आरक्षण दिलाया जा सकता है. हालांकि 2004 में भाजपा की उमा भारती सरकार ने विजय सिंह के उस आरक्षण को ख़त्म कर दिया. लेकिन उसके कारण ही यूपी-बिहार सहित अन्य कई राज्यों में नौकरियों से आगे बढ़कर ठेकों,आउट सोर्सिंग जॉब इत्यादि में आरक्षण मिला. सत्रहवें लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल के साथ ही कांग्रेस पार्टी ने सामाजिक न्याय केन्द्रित जैसा घोषणापत्र जारी किया है, वैसा आजाद भरात में इससे पहले कभी नहीं हुआ. राजद-कांग्रेस ने निजी क्षेत्र में आरक्षण, प्रमोशन में आरक्षण, निजीक्षेत्र के शैक्षणिक संस्थानों, सप्लाई, ठेकों इत्यादि में संख्यानुपात में आरक्षण देने की बात अपने घोषणापत्र में शामिल किया है, तो उसकी जड़ें भोपाल घोषणापत्र में ही निहित है.जब भोपाल घोषणापत्र का यह असर है, तब बेहतर होगा दिग्विजय सिंह ‘भोपाल विजन’ के साथ ‘भोपाल घोषणापत्र’ की सर्वव्यापी आरक्षण वाली बात को जोर-शोर उठाते हुए मतदाताओं को आश्वस्त करें कि जीतने पर हमारी पार्टी संख्यानुपात्त में सभी सामाजिक समूहों को सभी क्षेत्रों में हिस्सेदारी देगी. हाँ, इसके लिए सवर्णों के रोष को नजरअंदाज करने का मन बनाना पड़ेगा. वैसे यह अप्रिय सच्चाई है कि सवर्णों ने अपना भविष्य भाजपा के साथ जोड़ लिया है. ऐसे में कांग्रेस को सत्ता पाने के लिए अब पूरी तरह वंचित वर्गों पर निर्भर रहना पड़ेगा और वंचित वर्गों का वोट पाने के लिए उन्हें संख्यानुपात में हर क्षेत्र में आरक्षण अर्थात शेयर सुनिश्चित कराने का उपक्रम चलाना होगा. इसके लिए भोपाल घोषणापत्र को विस्तार देने से श्रेयस्कर कुछ हो ही नहीं सकता.

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मध्यप्रदेश में मायावती को बड़ा झटका

ग्वालियर। मध्यप्रदेश के गुना-शिवपुरी से ज्योतिरादित्य सिंधिया के ख़िलाफ़ चुनाव मैदान में खड़े बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार लोकेंद्र सिंह राजपूत कांग्रेस में शामिल हो गए हैं. यह दलबदल तब हुआ है जब आने वाले शनिवार को मायावती गुना में रैली करने वाली हैं. बहुजन समाज पार्टी और मायावती के लिए यह एक बड़ा झटका माना जा रहा है. अब बसपा को इस सीट से नया प्रत्याशी ढूंढने की चुनौती होगी.
कांग्रेस ज्वाइन करने के दौरान बसपा के बागी लोकेंद्र सिंह राजपूत

लोकेंद्र सिंह राजपूत ने सिंधिया की मौजूदगी में कांग्रेस की सदस्यता ली. ज्योतिरादित्य सिंधिया इस सीट से 4 बार चुनाव जीत चुके हैं. उनका मुकाबला बीजेपी के केपी यादव से हैं, केपी यादव भी पहले सिंधिया के क़रीबी हुआ करते थे. आपको बता दें कि बीएसपी नेता को कांग्रेस में शामिल करने के फैसले पर बीएसपी सुप्रीमो मायावती और कांग्रेस के बीच खटास और बढ़ सकती है क्योंकि एक तो मायावती मध्य प्रदेश में गठबंधन को लेकर कांग्रेस के रवैये से खासे नाराज हैं. दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में दलितों के बीच प्रियंका गांधी के पैठ बनाने की कोशिशों के चलते उन्होंने महागठबंधन में कांग्रेस को शामिल नहीं होने दिया. रैलियों में भी मायावती बीजेपी के साथ-साथ कांग्रेस पर जमकर प्रहार कर रही हैं.

कांग्रेस में शामिल होने से पहले लोकेंद्र सिंह राजपूत बसपा उम्मीदवार के तौर पर सोशल मीडिया पर भी काफी सक्रिय थे

गौरतलब है कि गुना-शिवपुरी संसदीय सीट सिंधिया परिवार का गढ़ मानी जाती है. ज्योतिरादित्य सिंधिया पांचवीं बार गुना संसदीय क्षेत्र से मैदान में हैं. बीते चार चुनाव उन्होंने लगातार जीते हैं. इस बार उनका मुकाबला बीजेपी के उम्मीदवार केपी यादव से है. गुना-शिवपुरी सीट पर 12 मई को वोट डाले जाएंगे.

जहां तक लोकेंद्र सिंह राजपूत की बात है तो वो हाल तक बसपा प्रत्याशी के तौर पर चुनाव प्रचार कर रहे थे. वो ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी सीधे चुनौती देते हुए चुनाव मैदान में थे. चुनाव प्रचार के दौरान उनका निशाना सिंधिया पर ही ज्यादा था. ऐसे में बसपा के लिए यह बड़ा सवाल बना हुआ है कि आखिर एकाएक ऐसा क्या हुआ कि वो मायावती  की रैली के ठीक पहले कांग्रेस में शामिल हो गए.

सीतापुर में रहस्यमयी बुखार से 60 से ज्यादा लोग बीमार

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सांकेतिक फोटो

सीतापुर। उत्‍तर प्रदेश के सीतापुर से बड़ी खबर सामने आ रही है. सीतापुर में किसी रहस्‍यमयी बुखार के प्रकोप के चलते 60 से ज्‍यादा लोग बीमार हैं. गोंदलामऊ ब्लॉक के नटवलग्रंट गांव में बीमारों की संख्‍या सबसे ज्‍यादा बताई जा रही है. जानकारी के मुताबिक करीब 10 लोगों में मलेरिया की पुष्टि हुई है. जिसके चलते 4 लोगों को बाहर अस्‍पतालों में रेफर किया गया है. हालांकि लोगों में स्‍वास्‍थ्य विभाग की लापरवाही को लेकर काफी नाराजगी है.

 बताया जा रहा है कि पिछले साल भी किसी बुखार या संक्रमण के चलते 50 से ज्‍यादा लोगों की मौत हुई थी. इतनी बड़ी संख्‍या में हुई मौतों के बाद भी स्‍वास्‍थ्‍य विभाग और प्रशासन ने कोई सीख नही ली. हाथ पर हाथ धरे बैठे स्‍वास्‍थ्‍य विभाग के खिलाफ लोगों ने प्रदर्शन भी किए थे. इसके बावजूद सीतापुर के गांवों में कोई कार्रवाई नहीं हुई थी.

सनी देओल के चुनाव लड़ने पर धर्मेंद्र ने दिया यह बयान

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सनी देओल ने हाल ही में भारतीय जनता पार्टी ज्वाइन किया है

मुंबई। धर्मेंद्र का अपने दोनों बेटों सनी देओल और बॉबी देओल के साथ बांडिंग मशहूर है. पिता-पुत्र दोनों एक-दूसरे के काफी करीब रहे हैं. उनके बीच का यह नजदीकी रिश्ता कई बार देखने को मिलता है. हाल ही में अभिनेता सनी देओल ने भारतीय जनता पार्टी ज्वाइन किया है और वह गुरदासपुर से चुनाव लड़ने जा रहे हैं. सनी देओल के राजनीति में आने पर उनके पिता धर्मेंद्र ने बयान दिया है.

 सनी देओल के भारतीय जनता पार्टी ज्वाइन करने के एक सप्ताह बाद उनके पिता धर्मेंद्र ने कहा कि उनके परिवार को राजनीति नहीं आती, लेकिन उनके खून में देशभक्ति दौड़ती है. 83 साल के अपने जमाने के शानदार अभिनेता धर्मेंद्र ने कहा, ‘हम राजनीति की एबीसी भी नहीं जानते, लेकिन देशभक्ति हमारे खून में है. हम देश की सेवा करेंगे.’ गौरतलब है कि धर्मेंद्र ने साल 2004 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर बीकानेर से चुनाव लड़ा था और जीत भी हासिल की थी. सोमवार को गुरदासपुर में नामांकन भरने के बाद सनी देओल ने भी पिता धर्मेंद्र जैसा ही बयान देते हुए कहा था कि ‘देखिए, मैं राजनीति के बारे में ज्यादा नहीं जानता लेकिन मैं देशभक्त हूं.’ सनी देओल के नामांकन के दौरान उनके छोटे भाई बॉबी देओल भी उनके साथ थे.

बताते चलें कि सनी देओल अपने परिवार के तीसरे सदस्य हैं, जिन्होंने राजनीति में एंट्री मारी है. धर्मेंद्र के अलावा उनकी सौलेती मां हेमा मालिनी भी मथुरा से भाजपा सांसद हैं और अभी मथुरा से ही दोबारा लोकसभा चुनाव लड़ रही हैं.

चौथे चरण में भाजपा की साख दांव पर

लोकसभा चुनाव के चौथे चरण में नौ राज्यों की 71 सीटों के लिए वोटिंग जारी है. इस चरण में यूपी और महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा सीटों पर चुनाव हो रहे हैं. यूपी में जहां सपा और बसपा मिलकर चुनाव मैदान में है तो महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन और भाजपा शिवसेना गठबंधन साथ हैं. जिन सीटों पर वोटिंग हो रही है उनमें सबसे बड़ी चुनौती बीजेपी के लिए है, क्योंकि सबसे ज्यादा सीटें उसी के पास थी.

साल 2014 के चुनाव में इन 71 सीटों में से 45 पर बीजेपी, 9 पर शिवसेना, 2 पर एलजेपी, 6-6 पर टीएमसी, बीजेडी 2 पर कांग्रेस और एक पर समाजवादी पार्टी ने जीत दर्ज की थी.

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चौथे चरण के मतदान में हंगामा, बिहार-यूपी में EVM की शिकायत

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फाइल फोटो

नई दिल्ली। चौथे चरण के मतदान के दौरान कई जगहों से ईवीएम खराब होने की शिकायतें आ रही हैं. उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के कई बूथों पर ईवीएम में खराबी के कारण मतदान नहीं शुरू हो पाया है. इसके कारण वोट डालने पहुंचे मतदाता हंगामा कर रहे हैं. सपा ने इसकी शिकायत भी की है.

झारखंड के पलामू सीट के कई बूथों पर EVM खराब होने की शिकायत आई है. चैनपुर के बूथ नंबर 132 पर ईवीएम का बटन नहीं काम कर रहा. वहीं, डालटनगंज के बूथ नंबर 181 और हैदरनगर के बूथ नंबर 101 पर ईवीएम खराब है. बिहार के समस्तीपुर सीट के केवस निजामत बूथ नंबर 223 ,221 पर भी ईवीएम खराब है.

इसके अलावा समस्तीपुर के धुरलख में बूथ संख्या 88 पर ईवीएम खराब होने के कारण मतदान बाधित है. मतदान केंद्र पर लंबी लाइन लगी है और मतदाता हंगामा कर रहे है. समस्तीपुर के भागिरथपुर पंचायत में 7 हजार से अधिक मतदाताओं ने मतदान का बहिष्कार किया है. दो सालों से जूट मिल बंद होने के कारण मजदूर मतदान नहीं करेंगे.

पश्चिम बंगाल के बर्दवान पूर्व के भेदिया हाई स्कूल और गलसि के बाहिर घण्या में बूथ नंबर 267 पर ईवीएम मशीन खराब होने के कारण वोटिंग शुरू नहीं हो पाई. बीरभूम से भी ईवीएम खराब होने की शिकायत आ रही है. वीरभूम में तो उपद्रवी ईवीएम लेकर ही भाग गए. बंगाल से चुनाव में हिंसा की सबसे ज्यादा खबरें आ रही हैं.

उत्तर प्रदेश के कन्नौज में भी ईवीएम खराब होने की शिकायत है. कन्नौज के मिरगावां में बूथ नंबर 86, 87 और 88 पर मतदान शुरू नहीं हो पाया है. सपा का आरोप है कि कन्नौज लोकसभा की छिबरामऊ विधानसभा में बूथ संख्या- 189 में तीन बार ईवीएम बदलने के बाद भी अभी तक मतदान बाधित है. इसके अलावा झांसी के भट्टागांव के मतदान स्थल 415 में अब तक मतदान प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है.

समाजवादी पार्टी ने चुनाव आयोग से इसकी शिकायत भी की है. इस पर उन्नाव सीट से बीजेपी प्रत्याशी साक्षी महाराज ने कहा कि गठबंधन के प्रत्याशी जमानत नहीं बचा पा रहे हैं, इसलिए ये EVM का मुद्दा उठा रहे हैं.

उन्नाव सीट से ही कांग्रेस प्रत्याशी अनु टंडन ने कहा कि शुरुआत में ईवीएम में गड़बड़ी की खबर आ रही थी, बाद में हमने डीएमऔर इलेक्शन कमीशन के अधिकारियों से बात की तो कुछ ठीक हुआ है. अभी भी कुछ खराब है.

  • साभारः आजतक

बीबीएयू छात्रा ने शिक्षक के जातीय भेदभाव के खिलाफ की कुलपति से शिकायत, मांगा न्याय

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लखनऊ। बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर युनिवर्सिटी, लखनऊ (BBAU) की एक पिछड़े वर्ग की छात्रा ने कुलपति से इतिहास विभाग के दो शिक्षकों पर भेदभाव करने का आरोप लगाया है. शिकायत करने वाली छात्रा कुमकुम लता एम.ए इतिहास के दूसरे सेमेस्टर की छात्रा हैं. छात्रा ने इतिहास विभाग के ही असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रेनू पांडे और डॉ. एस.एस. राय (सिद्धार्थ शंकर राय) पर आरोप लगाया है. इसके बाद छात्रा ने 23 अप्रैल को बीबीएयू के कुलपति को आवेदन देकर इंसाफ की गुहार लगाई है.

पीड़ित छात्रा कुमकुम लता द्वारा कुलपति को लिखा गया आवेदन

कुलपति के लिखे अपने आवेदन में छात्रा ने आरोप लगाया है कि पहले सेमेस्टर के परिणाम में उसके साथ जातीय भेदभाव किया गया है. छात्रा ने इतिहास विभाग के ही असि. प्रोफेसर डॉ. रेनू पांडे और डॉ. एस.एस राय पर भेदभाव के तहत कम नंबर देने का आरोप लगाया है. कुलपति को लिखे आवेदन में छात्रा ने पेपर DH-102, DH-103 और DH-104 में भेदभाव के तहत नंबर देने का आरोप लगाया है. साथ ही अपने रिजल्ट को फिर से जांच (Re Analysed) करने की मांग की है.

पीड़ित छात्र कुमकुम लता द्वारा न्याय के लिए कुलपति को लिखा गया आवेदन

दलित दस्तक से बातचीत करते हुए कुमकुम लता ने आरोपी शिक्षकों पर आरोप लगाया कि उन्हें शिक्षकों द्वारा कॉपी में कुछ और मार्क्स दिखाकर उनसे साइन करवा लिया, लेकिन जब कंप्यूटर के जरिए फाइनल मार्क्स सामने आया तो उसमें छात्रा के 8 नंबर कम थे. छात्रा का आरोप है कि उसे जो नंबर दिखाया गया उसके मुताबिक उन्हें 70 नंबर में 51 नंबर मिले थे, जिसे बाद में 42 नंबर कर दिया गया. छात्रा का कहना है कि वो हमेशा सिक्किम में रही हैं जहां उन्होंने इस तरह का कोई भेदभाव नहीं देखा है. अब ऐसा जातीय भेदभाव देखकर वह काफी आहत हैं. कुमकुम लता का कहना है कि ओबीसी वर्ग से होने के कारण न तो दलित स्टूडेंट उनकी मदद कर रहे हैं और जनरल स्टूडेंट का मदद करने का तो सवाल ही नहीं उठता.

इस बारे में दलित दस्तक ने इतिहास विभाग के ही असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रेनू पांडे और डॉ. एस.एस. राय (सिद्धार्थ शंकर राय) से बात करने की कोशिश की. डॉ. रेनू पांडे ने क्लास में होने की बात कह कर बात नहीं की. शिकायतकर्ता छात्रा को DH-103 और DH-104 पढ़ाने वाले डॉ. एस.एस. राय ने अपना पक्ष रखते हुए इस मामले को दुर्भाग्यपूर्ण बताया. उन्होंने कहा कि ग्रेड ए  या बी प्लस भी बड़ा ग्रेड है. जहां तक छात्रा का कॉपी दिखाकर साइन करवाने का आरोप है तो पहली चीज की कॉपी दिखाकर साइन नहीं करवाया जाता है. हम विद्यार्थियों को सिर्फ इसलिए कॉपी दिखाते हैं कि बच्चे सुधार कर सकें. नंबर कम कर देने की बात है तो हो सकता है कि उनको दूसरे का नंबर याद हो. उनका आरोप दुर्भाग्य पूर्ण है.

पांच साल में 52 फीसदी बढ़ गई पीएम मोदी की संपत्ति, पढ़ें पूरा ब्यौरा

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश की वाराणसी लोकसभा सीट से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपना नामांकन भर दिया. नामांकन से पहले एक बड़े रोड शो का आयोजन किया गया था जहां भारी संख्या में लोग पहुंचे थे. पीएम मोदी ने नामांकन के साथ अपनी संपत्तियों और कर्ज का ब्योरा भी चुनाव आयोग को सौंप दिया. हलफनामे के अनुसार पीएम मोदी की चल संपत्ति 1 करोड़ 41 लाख 36 हजार 119 रुपये है. जबकि अचल संपत्ति के रूप में उनके पास गुजरात के गांधी नगर में एक करोड़ दस लाख रुपये की जमीन है. पीएम मोदी की चल और अचल संपत्ति का योग 2 करोड़ 51 लाख रुपये है. 2014 के आम चुनावों से पहले दायर नामांकन में पीएम मोदी ने अपनी संपत्ति 1 करोड़ 65 लाख बताई थी. लिहाजा इन पांच सालों में उनकी संपत्ति में 52 फीसदी का इजाफा हुआ है.

साल 2014 में पीएम मोदी ने अपनी आय 9 लाख 69 हजार 711 रुपये बताई थी. पांच साल बाद उन्होंने अपनी आय करीब 20 लाख रुपये बताई है. साल 2014 में पीएम मोदी के पास नगदी 29 हजार रुपये थी. 31 मार्च 2019 को खत्म हुए फायनेंशल ईयर को पीएम नरेंद्र मोदी के पास नगदी के रूप में 38 हजार 750 रुपये हैं. हलफनामे के अनुसार पीएम मोदी के पास 1 करोड़ 27 लाख 81 हजार रुपये की फिक्स डिपॉजिट है. साल 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास 44 लाख 23 हजार 383 रुपये फिक्स डिपॉजिट के तौर पर हैं. 2014 में नरेंद्र मोदी के पास एल एंड टी इंफ्रास्ट्रक्चर बॉन्ड (टैक्स सेविंग) डिपॉजिट 20 हजार रुपये थी. इस राशि में कोई इजाफा नहीं हुआ है. आज भी ये रकम 20 हजार रुपये ही है.

साल 2014 में पीएम मोदी के पास 1 लाख 35 हजार रुपये की कीमत के सोने के आभूषम थे. हलफनामे के अनुसार पीएम के पास मौजूदा दौर में सोने की चार अंगूठियां हैं. जिनका वजन 45 ग्राम है. 31 मार्च 2018 के वित्तिय वर्ष में इनकी कीमत 1 लाख 13 हजार 800 रुपये थी.

पीएम मोदी ने नेशनल सेविंग सर्टिफिकेट में 7 लाख 61 हजार 466 रुपये जमा कराए हैं. इसके अलावा उनके पास 1 लाख 90 हजार रुपये की जीवन बीमा भी है. पीएम मोदी को आयकर विभाग से 85 हजार 145 रुपये लेने हैं. पीएमओ पर भी उनके 1 लाख 40 हजार 895 रुपये बकाया हैं. पीएम मोदी के हलफनामे के अनुसार, उनके पास न तो कोई दोपहिया वाहन है और न ही चार पहिया. कमाई का जरिया सरकार से मिलने वाली तनख्वाह और बैंकों से मिलने वाला ब्याज है.

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बसपा सुप्रीमो मायावती आज बुंदेलखंड में करेंगी चुनावी रैली

नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी अध्यक्ष मायावती शुक्रवार को बुंदेलखंड में चुनावी रैली करेंगी. हमीरपुर व जालौन लोकसभा की यह संयुक्त जनसभा जालौन में होगी. हमीरपुर व जालौन दोनों ही सीटें गठबंधन में बहुजन समाज पार्टी के हिस्से में हैं.

वहीं बसपा सुप्रीमो मायावती ने गुरुवार को भाजपा पर नरेंद्र मोदी के मुकाबले विपक्ष का पीएम उम्मीदवार पूछकर जनता का बार – बार अपमान करने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि देश की जनता इस सवाल का माकूल जवाब देगी. उन्होंने चुनाव आयोग पर पीएम पर मेहरबानी का आरोप लगाया है.

मायावती ने ट्वीट कर भाजपा व चुनाव आयोग पर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि बीजेपी एंड कंपनी के लोग यह कह कर कि मोदी के मुकाबले विपक्ष का पीएम पद का उम्मीदवार कौन है, देश की 130 करोड़ जनता का बार-बार अपमान कर रहे हैं. ऐसा ही अहंकारी सवाल पहले उठाया गया था कि नेहरू के बाद कौन? देश ने इसका तगड़ा व माकूल जवाब दिया था. आगे भी जनता जरूर माकूल जवाब देगी.

मायावती ने चुनाव आयोग पर पीएम मोदी के खिलाफ आचार संहिता उल्लंघन के आरोपों पर कार्रवाई न करने का आरोप लगाया है. उन्होंने कहा कि मोदी पर आचार संहिता उल्लंघन के अनेक गंभीर आरोप हैं लेकिन वह पूरी तरह से आजाद व बेपरवाह घूम रहे हैं. इसीलिए मोदी ने महिला सम्मान व मर्यादाओं की सीमा भी लांघनी शुरू कर दी है. वाकई बीजेपी व आरएसएस ने लाजवाब नेता पांच वर्ष तक देश पर थोपा.

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महागठबंधन की रैली में कन्नौज पहुंचीं मायावती तो डिंपल यादव ने पैर छूकर लिया आशीर्वाद

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा के बीच सियासी गठबंधन रिश्तों को भी मजबूत करता हुआ नजर आ रहा है. कन्नौज में समाजवादी-बहुजन समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल महागठबंधन की रैली के दौरान अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव ने मायावती के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लिया. पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव कन्नौज से सांसद हैं और एक बार फिर यहां से चुनावी समर में हैं. बीएसपी सुप्रीमों मायावती यहां आयोजित रैली में उनके लिए वोट मांगने पहुंची थीं.

यह पहला मौका नहीं था. इससे पहले भी 19 अप्रैल को मैनपुरी में आयोजित रैली में भी दोनों दलों के नेताओं के बीच गर्मजोशी देखने को मिली थी. वह ऐसा मौका था, जब मायावती और एसपी नेता मुलायम सिंह यादव 24 साल बाद एक साथ दिखे थे. यही नहीं इस दौरान मुलायम सिंह यादव के पौत्र और मैनपुरी से मौजूदा सांसद तेजप्रताप यादव ने भी मायावती के पैर छूकर आशीर्वाद लिया था.

वहीं, मायावती के भतीजे आकाश आनंद ने भी जब मुलायम सिंह यादव का अभिवादन किया तो उन्होंने उनके सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया. यही नहीं मैनपुरी और कन्नौज में आयोजित रैलियों में मंच के पीछे लगा बैनर भी बीएसपी के नीले कलर का था. इससे पता चलता है कि समाजवाजी पार्टी किस तरह से बीएसपी चीफ को सीटों के बंटवारे से लेकर रैलियों के आयोजन तक में कितना सम्मान दे रही है.

साभार : NDTV इंडिया read it also: कन्नौज में डिंपल यादव के लिए वोट मांगेंगी मायावती

नक्सल हिंसा से पीड़ित आंध्र गए 29 आदिवासी परिवार 15 साल बाद आज लौटेंगे सुकमा

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छत्तीसगढ़ में नक्सल हिंसा के खिलाफ शुरू किए गए सलवा जुडूम के दौरान बस्तर छोड़कर आंध्र प्रदेश में जा बसे आदिवासी परिवारों के अब वापस बस्तर आने की कवायद शुरू हुई है. घोर नक्सल प्रभावित सुकमा जिले के 29 परिवार गुरुवार को वापस अपनी जमीन पर लौट रहे हैं. दावा किया जाता है कि सलाव जुडूम के दौरान नक्सलियों ने इनके घर जला दिए थे. इसके बाद वे दहशत में अपनी जमीन छोड़ पड़ोसी प्रांत आंध्र में निर्वासितों की तरह दिन गुजार रहे थे.

15 साल बाद गुरुवार को वे अपने गांव, अपने घर लौट रहे हैं. सुकमा जिले के एर्राबोर से 7 किमी दूर बसे गांव मरईगुड़ा से इन परिवारों के वापसी की शुरुआत हो रही है. बताया जा रहा है कि अपने गांव से करीब 75 किलोमीटर दूर आंध्रप्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले के कन्नापुरम गांव में इन्होंने ठिकाना ढूंढ़ा और मिर्ची के खेतों में मजदूरी कर गुजर-बसर करने लगे. इन परिवारों को 15 साल तक आंध्र प्रदेश में न तो वोटर आईडी मिली, न वनभूमि का पट्‌टा.

इन परिवारों को वापस लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे सामाजिक कार्यकर्ता शुभ्रांशु चौधरी मीडिया से चर्चा में कहा कि जिन लोगों ने गांव छोड़ा उनके नाम कभी सैकड़ों एकड़ जमीन थी. सैकड़ों एकड़ जमीन के मालिक जिनके खेतों में पहले मजदूर काम करते थे वो मजबूरी में दूसरे के खेतों में दिहाड़ी पर काम करने को मजबूर थे. अभी जो 29 परिवार लौट रहे है उनमें से 24 परिवार के नाम पर जमीन यहां मिल चुकी है.

साभार : न्यूज़ 18 हिंदी

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पीएम मोदी कर रहे आचार संहिता का उल्‍लंघन, थैंक्स टू चुनाव आयोग: मायावती

लखनऊ। बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर चुनाव आचार संहिता के गंभीर उल्‍लंघन का आरोप लगाया है. मायावती ने कहा कि प्रधानमंत्री पर चुनाव आचार संहिता के गंभीर आरोप होने के बाद भी चुनाव आयोग कोई ऐक्‍शन नहीं ले रहा है. बीएसपी अध्‍यक्ष मायावती ने कहा कि पीएम मोदी ने महिला सम्‍मान और मर्यादाओं का उल्‍लंघन करना शुरू कर दिया है.

गुरुवार को मायावती ने ट्वीट कर कहा, ‘पीएम मोदी चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के अनेकों गंभीर आरोपों के बावजूद थैंक्स टू चुनाव आयोग अब तक पूरी तरह से आजाद और बेपरवाह घूम रहे हैं और इसीलिए अब इन्होंने महिला सम्मान और मर्यादाओं की सीमा भी लांघनी शुरू कर दी है. वाकई बीजेपी/आरएसएस ने लाजवाब नेता 5 वर्ष तक देश पर थोपा.’

मायावती ने कहा, बीजेपी ऐंड कंपनी के लोग यह कहकर कि मोदी के मुकाबले विपक्ष का पीएम पद का उम्मीदवार कौन है, देश की 130 करोड़ जनता का बार-बार अपमान क्यों करते रहते हैं? ऐसा ही अहंकारी सवाल पहले उठाया गया था कि नेहरू के बाद कौन? लेकिन देश ने इसका तगड़ा और माकूल जवाब तब भी दिया था और आगे भी जरूर देगा.’

इससे पहले मायावती ने ट्वीट करके आरक्षण मुद्दे पर केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरा था. मायावती ने कहा कि आरक्षण मामले में पीएम नरेंद्र मोदी देश को गुमराह कर रहे हैं. कांग्रेस की तरह इनके शासनकाल में भी एससी/एसटी और ओबीसी आरक्षण की व्यवस्था को पूरी तरह से निष्क्रिय और निष्प्रभावी बना दिया गया है. इसके लिए मोदी सरकार को जवाब देना होगा.

मायावती ने कहा कि सरकार आरक्षण मसले पर अपनी जवाबदेही से बच नहीं सकती. दलितों, आदिवासियों और ओबीसी के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षित लाखों पदों को नहीं भरा जा रहा है. इस वजह से इस वर्ग के लोग अभी तक बेरोजगार हैं. सरकार ऐसा करके इन लोगों का हक मार रही है. मायावती ने इस मसले पर भी केंद्र और राज्य सरकारों से जवाब मांगा. जरूरतमंद को नौकरी देने की बजाय सरकारें उनका हक मार रही हैं. मोदी और बीजेपी जनता को इसका पहले हिसाब दें.

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कन्नौज में डिंपल यादव के लिए वोट मांगेंगी मायावती

नई दिल्ली। सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव, सांसद धर्मेंद्र और अक्षय के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती गुरुवार को कन्नौज से सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की पत्नी सांसद डिंपल यादव के लिए वोट देने की जनता से अपील करेंगी. मायावती की सपा के समर्थन में यह चौथी जनसभा होगी. बसपा सुप्रीमो का गुरुवार को कन्नौज व शाहजहांपुर में चुनावी जनसभा को संबोधित करने का कार्यक्रम है.

बसपा सुप्रीमो पहले शाहजहांपुर (सुरक्षित) सीट से गठबंधन के बसपा प्रत्याशी अमर चंद्र जौहर के समर्थन में बरेली मोड़ ग्राम नवादा इंदेपुर में जनसभा करेंगी. इसके बाद कन्नौज के डीएन इंटर कॉलेज मैदान व मेला मैदान में सपा प्रत्याशी डिंपल यादव के पक्ष में दूसरी जनसभा को संबोधित करेंगी.

डिंपल की मुश्किल बढ़ाने के लिए पिछले चुनाव में बसपा प्रत्याशी के रूप में 1.27 लाख वोट पाने वाले निर्मल तिवारी को भाजपा में शामिल कर लिया है. ऐसे में डिंपल के लिए मायावती की जनसभा का महत्व बढ़ गया है. इस बार भाजपा ने डिंपल के सामने पिछला चुनाव लड़े सुब्रत पाठक को ही मैदान में उतारा है.

मायावती इसके पहले बदायूं, मैनपुरी और फिरोजाबाद में भी अखिलेश यादव के साथ साझा रैली कर चुकी हैं. बदायूं से धर्मेंद्र यादव, मैनपुरी से मुलायम सिंह यादव और फिरोजाबाद से अक्षय यादव सपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं.

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तीसरे चरण का चुनाव सपा- बसपा के मेल का सही परीक्षण

मैनपुरी में मुलायम सिंह यादव के चुनाव प्रचार का दृश्य, 24 साल बाद दोनों नेता एक साथ थे (फाइल फोटो)

17 वीं लोकसभा के तीसरे चरण में गुजरात की सभी 26, केरल की सभी 20, गोवा कि दो, दादर और नगर हवेली की एक दमन दीव कि एक सीट, असम की चार, बिहार की 5, छत्तीसगढ़ की 7, जम्मू-कश्मीर की एक, कर्णाटक की 14, महाराष्ट्र की 14, ओडिशा की 6, बंगाल की 5 और उत्तर प्रदेश की 10 सीटों सहित कुल 116 संसदीय सीटों पर वोट पर चुका है. इनमें बहुजन नजरिये से यूपी की मुरादाबाद, रामपुर, संभल, फिरोजाबाद, मैनपुरी, एटा, बदायूं, आंवला, बरेली और पीलीभीत की दस सीटों का बहुत महत्त्व हैं. तीसरे चरण के इन दस सीटों की सफलता पर न सिर्फ सपा प्रमुख अखिलेश यादव का, बल्कि दलित-पिछड़ों के मेल से जुडी बहुजन राजनीति का भविष्य भी टिका हुआ है. तीसरे चरण में यूपी की जिन संसदीय क्षेत्रों में चुनाव हुआ है, वह समाजवादी पार्टी के गढ़ माने जाते हैं. यही कारण है सपा-बसपा में जो समझौता हुआ, उसमें इस इलाके की दस में से नौ सीटें ही सपा के हिस्से में आयीं, महज एक सीट बसपा को मिली. इस क्षेत्र को सपा का गढ़ कहने का प्रमुख कारण यह है कि 2014 में सपा ने भाजपा की सुनामी में जो कुल 5 सीटें जीती, उनमें तीन सीटों पर मतदान इसी चरण में होना है. 2014 में मैनपुरी से सपा प्रत्याशी तेज प्रताप सिंह यादव, फिरोजाबाद से अक्षय यादव और बदायूं से धर्मेन्द्र यादव सांसद चुने गए थे.

मुलायम सिंह यादव से सपा की कमान अपने हाथ में लेने के बाद अखिलेश यादव का यह पहला चुनाव है. 2017 में भाजपा के हाथों सत्ता गवाने के बाद अखिलेश ने परिवार के वरिष्ठ सदस्यों की इच्छा के विरुद्ध जाकर एक बहुत ही अप्रत्याशित और बड़ा कदम उठाते हुए बरसों की घोर दुश्मन रही बसपा से चुनावी गठजोड़ किया. यह उनका एक बहुत जोखिम भरा कदम था जो उन्होंने अपनी पार्टी का वजूद बचाने और भाजपा को शिकस्त देने के इरादे से उठाया. काबिले गौर है कि मुलायम सिंह यादव ने अपने बेटे अखिलेश यादव को शादी के कुछ ही दिन बाद राजनीति में उतारते हुए कन्नौज लोकसभा का उपचुनाव लड़वा दिया और वे सांसद बने. सांसद बनने के बाद टीपू (अखिलेश यादव का घर नाम) ने सडकों पर उतरकर संघर्ष करना शुरू किया. उनके ऐसा करने से पार्टी को बहुत लाभ मिला, जिसके फलस्वरूप सपा 2012 में पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई. सत्ता में आकर अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री के रूप में यूपी में मेट्रो परियोजनाएं संचालन करने, लखनऊ–आगरा एक्सप्रेस वे जैसे इन्फ्रास्ट्रक्चर आधारित परियोजनाओं के साथ युवाओं को लैपटॉप व गरीब महिलाओं को पेंशन देने की योजनायें भी शुरू करने के साथ विकासाधारित अन्य कई काम किये. किन्तु उनके ये काम भाजपा का सामना करने के लिए पर्याप्त साबित नहीं हुए. लिहाजा 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी की सुनामी में उड़ने के साथ 2017 में योगी के हाथों यूपी की सत्ता भी गंवा बैठे.

2017 में विधानसभा का चुनाव परिणाम आने के पहले ही शायद उन्हें यूपी में भाजपा के अप्रतिरोध्य रूप में उभरने का आभास हो गया था, इसलिए उन्होंने भाजपा को रोकने के लिए कुछ करने का संकेत कर दिया. इसमें भविष्य में बसपा के साथ तालमेल बनाने के संकेत भी शामिल था. बहरहाल यूपी की सत्ता भाजपा के हाथ में जाने के बाद उनकी मंशा का अनुमान लगाते हुए कुछ बहुजन बुद्धिजीवी उनपर बसपा के साथ गठबंधन करने व सामाजिक न्याय की राजनीति पर लौटने का निरंतर दबाव बनाने लगे. इसका उनपर असर पड़ा और उन्होंने एक अन्तराल के बाद बसपा से गठबंधन करने की घोषणा भी कर दिया. अब लोगों को इंतजार इस बात का था कि सपा-बसपा मेल की औपचारिक घोषणा कब होती है. और लोग जिसका इन्तजार कर रहे थे वह घड़ी 2019 के जनवरी 7-9 के मध्य मोदी द्वारा संविधान की धज्जियाँ उड़ाते हुए सवर्ण आरक्षण का बिल पास करवाने के बाद निकट आ गयी.

8-14 जनवरी, 2019: ये सात दिन भारत के बहुसंख्य वंचित आबादी के लिहाज से जितने घटना बहुल रहे, उसकी मिसाल नयी सदी में दुर्लभ है. सबसे पहले जिस तरह मोदी सरकार ने गरीब सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने के अपने प्रस्ताव को, संविधान की धज्जियां उड़ाते हुए दो दिनों के अंदर ही संसद में पारित कर लिया, उससे आरक्षण पर संघर्ष बिलकुल सतह पर आ गया. हालाँकि जिस तरह मंडलवादी आरक्षण की घोषणा के साथ विशेषाधिकारयुक्त तबका आत्म-दाह से लेकर राष्ट्र की संपदा-दाह इत्यादि जैसी गतिविधियों में संलिप्त होकर अपना रोष प्रकट किया था, उस तरह की कोई उग्र प्रतिक्रिया वाचित वर्गों की ओर से नहीं हुई. किन्तु जिस वर्ग का राज-सत्ता, धर्म-सता, ज्ञान-सत्ता के साथ-साथ अर्थ-सत्ता पर प्रायः 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा है, उस वर्ग के लोगों की गरीबी का बिना कोई ठोस अध्ययन किये जिस तरह संविधान में संशोधन कर 48 घंटों में आरक्षण सुलभ कराया गया, उससे असंख्य जातियों में बंटा वंचित वर्ग रातो-रात एक दूसरे के निकट आकर संख्यानुपात में सर्वव्यापी आरक्षण की मांग बुलंद करने लगा. इन दो दिनों में वंचना के कॉमन अहसास से इनमें ऐसा भावांतरण हुआ कि परस्पर शत्रुता से लबरेज हजारों जातियां भ्रातृ-भाव लिए एक दूसरे के निकट आने लगीं. और जिस दिन राष्ट्रपति कोविंद ने सवर्ण आरक्षण पर समर्थन की मोहर लगायी उसी 12 जनवरी को पिछले 25 सालों को कटुता भुलाकर सपा-बसपा एक दूसरे के निकट आयीं. उनके निकट आते ही देश की राजनीति की दिशा तय करने वाले उत्तर-प्रदेश के हजारों जातियों में बंटे वंचितों में होली-दीवाली जैसा जश्न का माहौल पैदा हो गया. कहीं लोग आँखों में ख़ुशी के आंसू लिए एक दूसरे के गले मिले तो कहीं मिठाई बांटकर एक दूसरे का मुंह मीठा किये. इस घटना के दो ही दिन बाद 14 जनवरी को जब बिहार के तेजस्वी यादव मायावती जी का चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेने के बाद खुद वह तस्वीर अपने ट्विटर पर डाले, बहुजनों को प्रायः दो दशक पुराना आना सपना पूरा होता नजर आया.

12 जनवरी को सपा-बसपा के मेल के बाद के इतिहास का एक-एक पल बहुजन राजनीति में रूचि रखने वाले हर किसी के जेहन में दर्ज हो चुका है, जिसका जिक्र करना समय का दुरुपयोग कलायेगा. बहरहाल 12 जनवरी के बाद दुबारा अविस्मरणीय क्षण 19 अप्रैल, 2019 को आया जब मायावती और मुलायम मैनपुरी में एकसाथ मंच पर आये.निश्चय ही मैनपुरी में मायावती जी और मुलायम सिंह यादव का एक साथ मंच पर आना नयी सदी में न सिर्फ बहुजन, बल्कि सम्पूर्ण भारतीय राजनीति के बेहद यादगार दिनों में एक रहा. इसदिन 24 सालों की कटुता भुलाकर जिस तरह मायावती और मुलायम ने एक दूसरे के प्रति आदर व्यक्त किया, वह बहुजन एकता के आकांक्षी लोगों की पलके बार-बार भिंगो गया. मायावती ने उस ऐतिहासिक अवसर पर कहा, ’मुलायम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह फर्जी पिछड़े वर्ग के नहीं हैं. मुलायम सिंह असली पिछड़े वर्ग के हैं, वह मोदी की तरह फर्जी पिछड़े वर्ग के नहीं हैं. आप मुझसे जानना चाहेंगे कि 2 जून 1995 के गेस्ट हाउस कांड के बाद भी सपा-बसपा गठबंधन कर चुनाव क्यों लड़ रहे हैं? इस गठबंधन के तहत मैं मैनपुरी में खुद श्री मुलायम सिंह यादव के समर्थन में वोट मांगने आई हूं. जनहित तथा पार्टी के मूवमेंट के लिए कभी-कभी हमें कुछ कठिन फैसले लेने पड़ते हैं. देश के वर्तमान हालात को देखते हुए यह फैसला लिया गया है. मेरी अपील है कि पिछड़ों के वास्तविक नेता मुलायम सिंह यादव को चुनकर आप संसद भेजें. उनके उत्तराधिकारी अखिलेश यादव अपनी जिम्मेदारी पूरी निष्ठा से निभा रहे हैं.’’ मायावती के बाद संबोधित करने की अपनी बारी आने पर मुलायम सिंह यादव सपा को जिताने तथा कार्यकर्ताओं से मायावती का हमेशा सम्मान करने की अपील करते हुए कहा ‘‘आज महिलाओं का शोषण हो रहा है. इसके लिए हमने लोकसभा में सवाल उठाया. संकल्प लिया गया कि महिलाओं का शोषण नहीं होने दिया जाएगा. आज हमारी आदरणीय मायावती जी आई हैं. हम उनका स्वागत करते हैं. मैं आपके इस अहसान को कभी नहीं भूलूंगा. मायावती जी का हमेशा बहुत सम्मान करना. समय-समय पर उन्होंने हमारा साथ दिया है.’’

नयी सदी में देश के बहुजन बुद्धिजीवियों-एक्टिविस्टों ने जिस नारों के मूर्त रूप रूप लेने की सर्वाधिक कामना की है, उनमें अन्यतम एक रहा है, ‘मिले मुलायम–कांशीराम हवा में उड़ गए जय सियाराम’. अर्थात अगर मायावती और मुलायम मिल जाएँ तो भाजपा का अंत तथा भारतीय राजनीति में विराट बदलाव आ जायेगा. वर्षों से बहुजनवादी जो सपना देख रहे थे, उस पर 12 जनवरी, 2019 के बाद 19 अप्रैल, 2019 को अंतिम मोहर लग गयी. अब वर्षों से सपा-बसपा के मेल से लोग जिस परिणाम की आशा पाले हुए थे, उसका परिक्षण तीसरे चरण का चुनाव परिणाम से सामने आने के बाद हो जायेगा. अगर इस चरण में गठबंधन प्रत्याशित परिणाम देने में सफल हो जाता है तो उसका असर बाकी चार चरणों के चुनाव पर पड़ना तय है.

– लेखक एच.एल. दुसाध बहुजन डायवर्सिटी मिशन के संस्थापक अध्यक्ष हैं।

भाजपा ने एक और दलित सांसद-मंत्री का टिकट काटा, तो यूं छलका दर्द

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ विजय सांपला (फाइल फोटो)

नई दिल्ली। उदित राज के बाद भारतीय जनता पार्टी ने अपने एक और नेता और केंद्रीय राज्यमंत्री विजय सांपला का टिकट काट दिया है. पार्टी के इस फैसले से आहत सांपला ने इसे ‘गौहत्या’ करार दिया है. पंजाब के होशियारपुर से सांसद सांपला सामाजिक न्याय एवं आधिकारिता मंत्रालय में राज्यमंत्री हैं. 2014 में पहली बार सांसद बनें विजय सांपला ने टिकट कटने के बाद ट्विट किया-

कोई दोष तो बता देते ? मेरी ग़लती क्या है कि :- 1. मुझ पर भ्रष्टाचार का कोई इल्ज़ाम नहीं है। 2.आचरण पर कोई ऊँगली नहीं उठा सकता । 3. क्षेत्र में एयरपोर्ट बनवाया । रेल गाड़ियाँ चलाई । सड़के बनवाई । अगर यही दोष है तो मैं अपनी आने वाली पीडीयों को समझा दुंगा कि वह ऐसी ग़लतियाँ न करें।

गौरतलब है कि भाजपा ने अपने तमाम वर्तमान सांसदों का टिकट काटा है, इसमें कई दलित सांसद भी हैं.

कांग्रेस पहुंचे उदित राज की नई राजनीति क्या होगी?

 उदित राज ने अपने गले से कमल छाप गमछा उतार दिया है. अब उन्होंने तीरंगा छाप नया गमछा डाल लिया है जिस पर हाथ का निशान बना हुआ है. उनके ट्विटर का कवर इमेज भी बदल चुका है. अब उसमें नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की तस्वीर के बदले राहुल गांधी की तस्वीर चस्पा हो गई है. उदित राज ने चौकीदारी से भी इस्तीफा दे दिया है, अब वो पहले की तरह पढ़े लिखे डॉ. उदित राज बन गए हैं. जी हां, उदित राज कांग्रेस पार्टी में पहुंच गए हैं. कल तक मोदी के चौकीदार ग्रुप के सक्रिय सदस्य रहे उदित राज अब राहुल गांधी के राफेल ग्रुप में शामिल हो गए हैं.

23 अप्रैल को काफी ऊहापोह में रहने और पल-पल अपना फैसला बदलने के बाद उदित राज ने 24 अप्रैल को कांग्रेस पार्टी ज्वाइन कर लिया. अब बड़ा सवाल यह है कि उदित राज कांग्रेस में कौन सी जिम्मेदारी निभाएंगे. यह सवाल इसलिए क्योंकि भाजपा ने फिलहाल उदित राज को कहीं न नहीं छोड़ा है. उसने ऐसे वक्त में उदित राज का टिकट काटा कि उनके पास निर्दलीय लड़ने का भी रास्ता नहीं बचा रह गया. 23 अप्रैल को दिल्ली में नामांकन के लिए आखिरी तारीख थी.

उदित राज ने अपने बयान में इसका जिक्र भी किया. उन्होंने कहा कि अब अगर निर्दलिय लड़ भी जाऊंगा तो इतने कम समय में लाखों लोगों तक अपना नया चुनाव चिन्ह कैसे पहुंचाऊंगा. यानि कि भाजपा को यह डर था कि वह अगर उदित राज का टिकट काट देती है तो वह निर्दलीय ताल ठोक सकते हैं. शायद इसीलिए उन्होंने उदित राज की सीट को आखिर तक फंसाए रखा.

अब बड़ा सवाल यह है कि कांग्रेस पहुंचे उदित राज की अगली रणनीति क्या होगी? क्योंकि दिल्ली में तो फिलहाल लोकसभा चुनावों में बाजी उनके हाथ से निकल चुकी है. ऐसे में क्या कांग्रेस उदित राज को किसी अन्य राज्य से मौका देगी? अगर ऐसा होता है तो संभव है कि उदित राज कांग्रेस से अपनी नई राजनीति की शुरुआत उत्तर प्रदेश में कर सकते हैं. कांग्रेस पार्टी को भी उत्तर प्रदेश में एक बड़े दलित चेहरे की जरुरत है. फिलहाल कांग्रेस के भीतर उत्तर प्रदेश में कोई ऐसा कद्दावर नेता नहीं है तो राजनीतिक तौर पर आधार वाला नेता हो. पी.एल. पुनिया उत्तर प्रदेश से हैं भी तो सालों तक प्रशासनिक अधिकारी के पद पर रहने के कारण उनकी छवि खांटी परंपरागत राजनीतिज्ञ वाली नहीं बन पाई है.

तो क्या यह माना जाए कि कांग्रेस पार्टी उत्तर प्रदेश में उदित राज को मायावती के बरक्स मजबूत करने की रणनीति पर काम कर सकती है? भाजपा ज्वाइन करते वक्त भी उदित राज ने दिल्ली में अरविंद केजरीवाल और यूपी में बसपा और मायावती के बरक्स काम करने की इच्छा जताई थी, लेकिन भाजपा ने न तो उन्हें दिल्ली में कोई महत्वपूर्ण रोल दिया और न ही उत्तर प्रदेश में. ऐसे में उदित राज कांग्रेस से भी इस तरह की भूमिका की उम्मीद लगाए बैठे होंगे. फिलहाल इससे इंकार नहीं किया जा सकता. क्योंकि वर्तमान लोकसभा चुनाव में प्रियंका गांधी को उत्तर प्रदेश के राजनैतिक मैदान में उतार कर यह साफ कर दिया है कि कांग्रेस भले ही लोकसभा चुनाव में तीसरे नंबर के लिए लड़ रही हो, विधानसभा चुनाव में वह पहले नंबर के लिए लड़ेगी. संभव है कि ऐसे में उदित राज उसके लिए कारगर हो सकते हैं.

तमाम बहस से इतर उदित राज की घटना ने राजनीति के सबसे गहरे रंग को दिखाया है. जिसमें न विचारधारा प्रमुख है और न पार्टी, महत्वपूर्ण है तो पद और पावर में बने रहना. पूरे राजनैतिक जगत की यही कहानी है. इस हमाम में किसी को किसी से ऐतराज नहीं.

बदलती पत्रकारिता के दौर में वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश की चुनाव रिपोर्टिंग की यादें

Indian political parties

आजकल का पत्रकारीय माहौल देखकर ‘चुनाव में पत्रकार की अपनी हिस्सेदारी’ विषय पर लिखने का मन हुआ. मेरा मानना है, किसी लेखक, बुद्धिजीवी, एकेडेमिक, सामाजिक या राजनीतिक कार्यकर्ता की तरह एक सक्रिय पत्रकार, खासतौर पर रिपोर्टर या एंकर को चुनाव में किसी एक उम्मीदवार के पक्ष में मतदान की सार्वजनिक अपील करने का नैतिक अधिकार नहीं है. मेरे हिसाब से ऐसा करना पत्रकारिता के मानदंडों पर उचित नहीं.

मैंने अपने निजी जीवन में इसे अक्षरशः लागू किया. पत्रकारिता में आने के बाद मैंने कभी किसी उम्मीदवार के पक्ष में मतदान के लिए लोगों से सार्वजनिक तौर पर अपील नहीं की. अपनी रिपोर्टिंग या विश्लेषण में भी किसी एक उम्मीदवार का समर्थन नहीं किया. हां, गुण दोष जरुर बताए. संविधान-पक्षी वैचारिकता और मेहनतकश अवाम का पक्षधर होने के नाते किसी राजनीतिक धारा के सकारात्मक और नकारात्मक पक्ष जमकर गिनाए. पर वह लेखन किसी खास व्यक्ति के इर्द-गिर्द केंद्रित नहीं रह. उसके केंद्र में धारा और विचार रहे.

अगर कोई बहुत खास परिचित या निजी तौर पर नजदीकी उम्मीदवार हुआ तो उसके क्षेत्र का जायजा लेने भले चला गया पर रिपोर्टिंग स्वयं नहीं की. यह सोचकर कि शायद चुनाव रिपोर्टिंग में मैं आब्जेक्टिव नहीं हो पाऊंगा. मैं नहीं जानता, पत्रकारिता के मानदंडों पर इसे सही माना जायेगा या ग़लत. पर हम जैसे लोगों के अंदर ऐसा नैतिक-बोध या प्रोफेशनल-बोध संभवतः ‘नवभारत टाइम्स’ के तत्कालीन प्रधान संपादक राजेंद्र माथुर ने पैदा किया. जिन दिनों हमने ‘नवभारत टाइम्स’, पटना के नये-नये संस्करण के लिए रिपोर्टिंग शुरु की, माथुर साहब किसी कार्यशाला या अन्य कार्यक्रमों के बहाने पटना आया करते थे. दिल्ली से भी सर्कुलर या नोट भेजकर हम जैसे नये पत्रकारों को शिक्षित करते रहते थे. मुझे याद आ रहा है, एक बार उन्होंने एक नोट भेजा, जिसमें ‘नवभारत टाइम्स’ दिल्ली में छपी एक लंबी रिपोर्ट नत्थी थी. उसके रपटकार थे: सुप्रसिद्ध कवि और पत्रकार विष्णु खरे. उन दिनों खरे साहब ‘नवभारत टाइम्स’ में ही काम करते थे. माथुर साहब ने नोट में बताया कि ऐसी रिपोर्ट क्यों नहीं लिखी जानी चाहिए.

mediaबहुत पुरानी बात है. आजकल के विवादास्पद भाजपा नेता एम जे अकबर उन दिनों यशस्वी युवा संपादक हुआ करते थे. बहुत कम उम्र में ही आनंद बाजार ग्रुप के अंग्रेजी अखबार ‘टेलीग्राफ’ के संपादक बन गये थे. बिहार के किशनगंज से कांग्रेस टिकट पर चुनाव मैदान में उतर गए. अचरज भी हुआ. एक सक्रिय संपादक किसी पार्टी का सदस्य और उम्मीदवार बनकर चुनाव क्यों और कैसे लड़ रहा है? चुनाव के दौरान किशनगंज में मैंने उनसे यह सवाल भी किया: ‘चुनाव जीतने या हारने के बाद क्या आप फिर से संपादक बनकर काम करेंगे और करेंगें तो आप आब्जेक्टिव कैसे रह सकेंगे?’ उन्होंने मुझे घूरा और बगल में खड़े मशहूर फोटोग्राफर कृष्ण मुरारी किशन को इंगित कर कहा: ‘इससे पूछिए कि मैं कितना आब्जेक्टिव रहता हूं.’ बहरहाल, पत्रकारीय नैतिकता की सबकी अपनी-अपनी परिभाषा और बोध है. उनकी जगह अगर हम होते तो चुनावी-राजनीति में उतरने के बाद कालम या किताबें भले लिखते रहते पर संपादक या रिपोर्टर का दायित्व हरगिज नहीं संभालते. अगर पत्रकारिता में वापसी करते तो चुनावी-राजनीति को पूरी तरह बाय-बाय करके. अपने देश की पत्रकारिता में ऐसे अपवाद भी हैं कि किसी पत्रकार ने चुनाव लड़ा और हारने या जीतने के कुछ समय बाद उसने राजनीति से खुद को अलग कर लिया. फिर पत्रकारिता में दाखिल हुआ और अच्छा काम किया। आज भी कुछ ऐसे उदाहरण हैं. पर ऐसे पत्रकारों ने एम जे अकबर से अलग रास्ता अपनाया. राजनीति छोडकर वे फिर पूरी तरह पत्रकार बनकर लौटे. उत्तर से दक्षिण के राज्यों में ऐसे कई पत्रकार मिल जायेंगे. ऐसा एक उदाहरण अभी आशुतोष (‘सत्य हिन्दी’) हैं.

लगभग साढ़े तीन दशक के पत्रकारिता जीवन में चुनाव के आकलन या रिपोर्टिंग में मुझसे भी गलतियां हुई हैं. रिपोर्टर के तौर पर कई बार किसी क्षेत्र के बारे में मेरा आकलन गलत भी हुआ. हर गलती से सबक लेता रहा. लेकिन आजकल देश की मुख्यधारा पत्रकारिता का रंग-ढंग बिल्कुल अलग है. पूर्वाग्रह से भरी तथ्यहीन या एकपक्षीय रिपोर्टिंग या लेखन आज की पत्रकारिता के लिए आम बात है.

संभवतः अपने पत्रकारिता जीवन की पहली चुनाव रिपोर्टिंग मैंने सन् 1984 में की थी. लेकिन विधिवत और नियमित चुनाव रिपोर्टिंग करने का सिलसिला सन् 1986 में बिहार के बांका उपचुनाव से शुरू हुआ, जहां तब के फायरब्रांड समाजवादी दिग्गज जार्ज फर्नांडीज मैदान में उतरे थे. उनके मुकाबले कांग्रेस की मनोरमा सिंह उतरी थीं. वह पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रशेखर सिंह की धर्मपत्नी थीं. जहां तक याद आ रहा है, उन्होंने उस विवादास्पद चुनाव में जार्ज को हराया था. जार्ज ने बड़े स्तर पर चुनाव धांधली का आरोप लगाया.

फाइल फोटो

सन् 1986 से सन् 2009 तक, हर आम चुनाव को कवर किया. वैसे तो बाद के दिनों में भी जम्मू-कश्मीर आदि के चुनाव की रिपोर्टिंग की. लेकिन अब नियमित और राज्यव्यापी चुनाव रिपोर्टिंग के लिए नहीं जाता. हां, अवसर मिलने पर जायजा लेने कुछेक चुनिंदा क्षेत्रों में जरुर जाता हूं. अपने सक्रिय पत्रकारीय(रिपोर्टर के तौर पर) जीवन में दिल्ली, बिहार(झारखंड सहित), जम्मू-कश्मीर, आंध्र प्रदेश (तेलंगाना सहित), केरल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान और यूपी(उत्तराखंड सहित) आदि जैसे राज्यों में चुनाव की रिपोर्टिंग की. लेकिन सबसे सघन चुनाव रिपोर्टिंग का मेरा अनुभव बिहार, केरल, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और जम्मू-कश्मीर का रहा.

दुखद है कि हिन्दी में इन दिनों कुछेक अपवादों को छोड़कर अच्छी चुनाव रिपोर्टिंग नहीं हो रही है. पर अंग्रेजी में अब भी कुछ लोग बहुत अच्छी रिपोर्टिंग कर रहे हैं. नाम लेने का जोखिम ये है कि जिन कुछ अच्छे पत्रकारों का नाम गलती से छूट जायेगा, वे मेरी इस टिप्पणी को पढ़ें या न पढ़ें, पर मुझे अपनी गलती से तकलीफ होगी. लगेगा, कुछ लोगों का नामोल्लेख न करके मुझसे अनजाने में अन्याय हुआ है. इसलिए यहां किसी का नाम नहीं ले रहा हूं। पर ये बताना जरुरी है कि इस वक्त सबसे अच्छी चुनाव रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों में कुछ महिला पत्रकार सबसे आगे दिख रही हैं. इनमें कुछ अखबार में हैं और कुछ न्यूज पोर्टल में. इक्का-दुक्का रिपोर्टर टेलीविजन में भी अच्छी रिपोर्टिंग कर रहे हैं. इन सबको बधाई और शुभकामनाएं.

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एक सांसदी टिकट के लिए उदित राज का इतना छटपटाना खल गया

2014 में भाजपा ज्वाइन करने के दौरान उदित राज (फाइल फोटो) Photo Credit: Indian Express

24 फरवरी 2014 को मैं भाजपा के दफ्तर में मौजूद था, जब उदित राज भाजपा ज्वाइन करने वाले थे. बतौर पत्रकार मैं भाजपा कवर कर रहा था. मैं भी हैरान था कि उदित राज को ऐसा क्या सूझा कि उन्होंने भाजपा ज्वाइन करने का मन बना लिया. खैर, उदित राज मंच पर आएं, वही अफसरों वाला रुवाब था उनका… जिसे कई अम्बेडकरवादियों ने उनसे मिलने के वक्त महसूस किया होगा. राजनाथ सिंह के सामने उन्होंने भाजपा की सदस्यता ली. केजरीवाल से लेकर मायावती तक को रोकने की बात कही. वहां मंच के बाईं ओर एक कोने में उदित राज के समर्थकों ने जगह घेर रखी थी, जहां से वो ‘जय भीम’ और ‘उदित राज जिन्दाबाद’ के नारे लगा रहे थे. उदित राज के हाव भाव को देख कर लग रहा था कि वो भाजपा में अपनी शर्तों के साथ आ रहे हैं. लेकिन 2019 आते-आते स्थिति बदल गई.

 भाजपा ने उत्तर पश्चिम दिल्ली से अपने वर्तमान सांसद उदित राज का टिकट काट दिया है. भाजपा ने उनकी जगह गायक हंस राज ‘हंस’ को टिकट दिया है. उदित राज का टिकट कटने की संभावना तभी से जताई जा रही थी, जब से भाजपा ने उनकी सीट को छोड़कर बाकी के छह लोकसभा क्षेत्रों से अपने उम्मीदवार तय कर दिए थे. उदित राज ने 2014 लोकसभा चुनाव के पहले 24 फरवरी 2014 को भाजपा ज्वाइन किया था.

उदित राज को भी इसका अंदेशा हो गया था. यही वजह थी कि वह सोमवार को एक के बाद एक ट्विट करते रहे और भाजपा नेताओं से तकरीबन सार्वजनिक गुहार लगाते दिखे. उन्होंने यह कह कर भी भाजपा को डराने की कोशिश किया कि उनके पास कांग्रेस और आम आदमी पार्टी से ऑफर है, लेकिन वह अपनी पार्टी के फैसले का इंतजार कर रहे हैं. उदित राज के इस बयान ने टिकट मिलने और संसद में दुबारा पहुंचने की उनकी बेचैनी को भी दिखाया. वह काफी असहाय से दिख रहे थे. उदित राज को जानने वालों के लिए यह एक झटका था. एक दौर में जिस उदित राज के आमंत्रण पर दर्जनों सांसद पहुंच जाया करते थे, उसका महज एक सांसद बनने को लेकर छटपटाना निराश करने वाला था.

अपने आखिरी दांव को चलते हुए उदित राज ने आज 23 अप्रैल को यह अल्टिमेटम भी दे दिया कि टिकट नहीं मिलने पर वह भाजपा छोड़ देंगे, लेकिन इसके बावजूद भाजपा के नेताओं ने न तो उदित राज से बात करनी जरूरी समझी और न ही उन्हें मनाने की कोशिश की. और जिस तरह से अचानक उनका टिकट कटने की खबर आई उससे साफ है कि भाजपा को उनके पार्टी में रहने या नहीं रहने से कोई फर्क नहीं पड़ता है.

उदित राज के लिए मुश्किल यह है कि उन्होंने भाजपा के साथ समझौता नहीं किया था, बल्कि अपनी पार्टी इंडियन जस्टिस पार्टी का विलय ही भाजपा में कर दिया था. इसलिए उनके पास अब घरवापसी का भी कोई रास्ता नहीं है. एक बड़ी सोच वाले व्यक्ति का यूं एक छोटे से पद के लिए इतने बड़े समझौते कर लेना भी निराश करता है. उदित राज की आगे की राह क्या होगी, यह देखना होगा. लेकिन महज एक सांसदी के लिए उनका छटपटाना काफी खल गया.