दिल की बात- बिहार और कथित डबल इंजन

जिस देश या राज्य की आबादी का जितना प्रतिशत ग़रीबी और हाशिए के अंतिम पायदान पर खड़ा होता है उस राज्य के लिए एक संवेदनशील सरकार का होना उतना ही आवश्यक होता है. हर नीतिगत निर्णय, सरकार व प्रशासन की चपलता या शिथिलता का सीधा-सीधा कमज़ोर वर्गों और ग़रीबों की सुरक्षा, आय और जीवन स्तर पर पड़ता है. बिहार एक ऐसा ही राज्य है जिसकी बहुसंख्यक आबादी की आय राष्ट्रीय औसत से कम है. और यह तब है जब लगभग पिछले 14 वर्षों से ऐसी सरकार रही है जो अपने आप को सुशासन या डबल इंजन की सरकार कहने से नहीं अघाती! उद्योग धंधे, पूँजी निवेश, रोजगार के अवसर तो नदारद रहे, फिर भी स्वघोषित सुशासन! शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं व निर्धन नागरिकों का जीवन स्तर सहारा अफ्रीका से भी बदतर! कानून व्यवस्था नाम की चीज़ नहीं, ऊपर से भ्रष्टाचार, भू माफिया और महंगाई की मार सहते विकल्पहीन नागरिक! सुशासन का अर्थ कोई गुणात्मक सुधार नहीं बल्कि उसके पहले के यानि आज से 25-30 वर्ष पूर्व के कार्यकाल का हौआ खड़ा करने और अपनी हर नाकामी पर उसे कोसने की आदत भर है.

एक सरकार का बर्ताव नागरिकों के लिए उसी प्रकार का अपेक्षित है जैसा एक माँ का अपनी संतानों के लिए होता है. सदैव उनका दर्द समझना और उनके भविष्य व हितों के प्रति पूरी संवेदना से सजग होना. बिहार में चमकी बुखार की भेंट में प्रतिवर्ष की भाँति फिर 200 से अधिक बच्चे चढ़ गए और सारी व्यवस्था, सरकार और प्रशासन खानापूर्ति कर कुछ सुधार करने का नहीं बल्कि प्रकृति को दोष देने का प्रयास करता रहा.

चरमराती व्यवस्था, मदमस्त अफ़सर व सरकार और दोनों के बोझ तले कराहती जनता! इसी तरह लू की चपेट में भी आकर 200 से अधिक नागरिकों ने अपने प्राण गँवा दिए! सरकारी अस्पताल बेहतर इलाज देने तक की स्थिति में नहीं! हर साल राज्य में कुछ क्षेत्र सूखाग्रस्त रह जाते हैं और कुछ बाढ़ की चपेट में आकर आम जनजीवन को अस्त व्यस्त कर देते हैं. दोनों ही स्थिति में इसे राज्य का आम नागरिक और गरीब किसान अकेले झेलता है. इन प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए सरकार हर बार पूरी तरह से असमर्थ और उदासीन दिखती है. अगर प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान से सरकार गरीबों को बचा ही नहीं सकतीं तो सरकार चुनने का भला क्या उद्देश्य रह जाता है?

प्राकृतिक आपदाएँ जो बर्बादी का मंज़र सरकारी लापरवाही की देख रेख में असहाय गरीबों पर थोपती है वो तो एक तरफ सरकारी भ्रष्टाचार, अफसरशाही, घोटालेबाज़ी जो अत्याचार कर रही है उसकी बात ना ही की जाए तो बेहतर! पिछले कुछ वर्षों में 40 से अधिक घोटाले, बालिका गृहों में मासूम बच्चियों से सरकारी संरक्षण में हैवानियत, हर जिम्मेदारी से भागती और चारों खाने चित्त होती योजनाओं पर पीठ थपथपाती सरकार!

ऐसे प्रदेश में नागरिक किस आधार पर आशावादी होकर भविष्य की ओर सकारात्मकता से देख सकते हैं? यह नागरिकों को खुद सोचना होगा! सृजन घोटाले या बालिका गृह कांड के अभियुक्तों पर आज तक बिहार पुलिस या CBI हाथ नहीं डाल पाई है क्योंकि सत्तारूढ़ दलों के कई बड़े नाम इन कांडों में सम्मिलित है. यह सब बिहार की जनता आँख मूंदे सह रही है.

आम जनता को भी चाहिए कि वो विज्ञापन के बदले एडिट की हुई ख़बरों के प्रोपगैंडा को सत्य ना मानकर अपने दैनिक जीवन को प्रभावित करने वाली अपनी मूल समस्याओं जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार, कृषि, विकास, समता, समभाव इत्यादि को ही ध्यान में रखकर सरकार का चयन करे. अगर हम चुनावों में हिंदू-मुसलमान और छद्म राष्ट्रवाद के मुद्दे को प्राथमिकता देंगे तो कोई क्यों हमारी समस्याओं का निराकरण करने की ज़रूरत महसूस करेगा?

विगत 5 साल तक किसान कभी समर्थन मूल्य तो कभी खाद, बीज, उचित हर्जाने के लिए कभी मार्च, तो कभी आंदोलन करते रहे तो कभी सड़कों पर सरकारी उदासीनता से निराश दूध, अनाज, फल, सब्जियां फेंकते रहे लेकिन चुनावों के दिन किसानों के खातों में कुछ नाम मात्र यानि 17 रु प्रतिदिन के डालकर केंद्र सरकार ने प्रलोभन देने की चाल चली.

अगले 5 साल में अगर कर्ज़ के तले आत्महत्या करने के लिए कई किसान मजबूर हुए तो उसका दोषी कौन होगा? जब तक देश को समझ आएगा कि ₹6000/वर्ष किसी पार्टी, सरकार या व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि उन्हीं का पैसा, अप्रत्यक्ष रूप से उन्हीं की जेब से निकाल कर उन्हें उपकार बता कर दिया जा रहा है तब तक उनके जीवन के 5 और वर्ष खत्म हो चुके होंगे! सरकार की असली दरियादिली किसानों पर नहीं उन उद्योगपतियों पर फूटती है जिनके अरबों रुपये का कर्ज़ यह सरकार बिना एक पल भी सोचे माफ़ कर देती है. सरकार की प्राथमिकता ग़रीब नहीं, वे धन्ना सेठ हैं जिनके काले धन एर इलेक्ट्रोल बॉंड से ये चुनाव लड़ते हैं और उन्हीं को लाभ पहुंचाने के लिए पूरे 5 साल नागरिकों का खून चूसते हैं.

तथाकथित सुशासन की संवेदनहीन सरकार नाकामियों और घोटालों की सरकार है जो अपनी हर नाकामी के लिए अपने से पहले की सरकार को दोषी ठहराती है, उसी पर ठीकरा फोड़ती है. सुशासन मतलब कोई सकारात्मक बदलाव या कोई गुणात्मक सुधार नहीं, बल्कि तथाकथित जंगलराज का अनर्गल दोषारोपण है. अगर आंकड़ों की बात करें तो आँकड़े साफ साफ दिखाते हैं कि कानून व्यवस्था पिछले 13-14 वर्षों में बद से बदतर होती चली गयी. अर्थव्यवस्था की बात हो तो 90 के दशक से लागू हुए उदारीकरण की नीति के कारण 2005 के बाद पूरे देश के सकल घरेलू उत्पाद और वृद्धि दर में भारी उछाल आने लगा केंद्र की आय, राज्यों की आय और राज्यों को केंद्र से मिलने वाली मदद में 90 के दशक के मुकाबले भारी उछाल आया और जिसका नतीजा पूरे देश ने देखा.

अगर बिहार में सचमुच 2005 के बाद सुशासन का आगमन हुआ तो नीतीश जी बताएँ कि किस मानक में बिहार आज किस राज्य से आगे है? प्रति व्यक्ति आय, स्वास्थ्य, शिक्षा, जीवन स्तर, रोज़गार, पलायन- किसमें बिहार किस राज्य से आगे है? हर मानक में हर राज्य से पीछे, फिर भी सुशासन? 14 साल के तथाकथित सुशासन और डबल इंजन वाली सरकार के बाद अब तो और भी फ़िसड्डी राज्य हो गया है.

बिहार की 60 फ़ीसदी आबादी युवा है. अब बिहार को रूढ़िवादी नहीं बल्कि उनके सपनों और आकांक्षाओं से क़दमताल करने वाली नयी सरकार की ज़रूरत है.

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जयंती विशेषः दुनिया की 27 भाषाओं में छपने वाले महान साहित्यकार थे अण्णा भाऊ साठे

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स्कूली शिक्षा के शुरुआती दिनों में ही मुझे रविन्द्र नाथ टैगोर का नाम पता चल गया था. लेकिन अण्णा भाऊ साठे का नाम जानने में मुझे अगले 20 सालों तक और इंतजार करना पड़ा. अण्णा भाऊ साठे का नाम मुझे तब पता चला जब मैं महाराष्ट्र के एक अखबार से जुड़ा और महाराष्ट्र के अम्बेडकरवादियों के संपर्क में आया. और मैं हैरान रह गया कि आखिर इतना बड़े साहित्यकार की कहानी देश के भीतर एक राज्य तक ही क्यों सीमित है. अण्णा भाऊ साठे ऐसे महान साहित्यकार हैं, जिनकी प्रतिभा का डंका दुनिया के 27 देशों में बजता था. लेकिन भारतीय साहित्यकारों के बीच वह अछूत हैं.

जी हां, अण्णा भाऊ साठे, जिन्होंने अपनी कलम की मशाल बनाकर दलित, मजदूर, गरीब, झुग्गी-झोपड़पट्टी वासियों की समस्या को विश्व के पटल पर रखा. एक अगस्त को इस महानायक की जयंती होती है. महाराष्ट्र के सांगली जिले के वालवा तहसील के वाटे गांव में बेहद गरीब, दलित–मातंग परिवार में एक जनवरी 1920 को अण्णा भाऊ साठे का जन्म हुआ था. पहले उनका नाम तुकाराम रखा गया था लेकिन बाद में वह अण्णा भाऊ नाम से जाने गये.

उनके जीवन की सबसे क्रांतिकारी घटना यह रही कि अण्णा भाऊ स्कूली शिक्षा नहीं ले पाएं. सड़क किनारे दुकानों पर लगे साइन बोर्ड पढ़कर उन्होंने अक्षरों को पहचानना सीखा. उन्होंने खुद साक्षर होकर कलम थाम लिया और विश्वविख्यात साहित्यकार बने. बिना किसी युनिवर्सिटी में गए विश्वस्तरीय साहित्य रचने वाले अण्णाभाऊ अपने दौर के इकलौते साहित्यकार हैं. विश्व के 27 भाषाओं में छपने वाला साहित्यकार विश्वविख्यात तो बन गया, लेकिन उन्हें अपने देश भारत में ही वो ख्याति नहीं मिली, जिसके वह हकदार थे.

अण्णा भाऊ ने अपने जीवन में कई महत्वपूर्ण साहित्य की रचना की. उनके 20 कहानी संग्रह, नाटिका, 12 लोकनाट्य, एक यात्रा वृतांत, 30 उपन्यास, 10 लोकप्रिय पोवाडे के साथ ही अनेक साहित्य कृतिया प्रकाशित हुए. उनके उपन्यास पर 8 फिल्में भी बनीं. उनके द्वारा लिखे साहित्य का रशियन, फ्रेंच, अंग्रेजी के साथ देश-विदेश की 27 भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित हुआ. अण्णा भाऊ की रचना को देश-विदेश के अनेक पुरस्कार-सम्मान प्राप्त हुए. कहा तो यह भी जाता है कि रूस में अण्णाभाऊ के साहित्य के इतना पसंद किया गया कि भारत और रूस के आपस के संबंध ज्यादा बेहतर हो गए.

साहित्य के अलावा उनके जीवन का एक पहलू आंदोलनकारी का भी था. मुंबइ के दादर स्थित मोरबाग कपड़ा मिल में 1936-37 में मजदूरी करते हुए वो श्रमिक आंदोलन से जुड़ गए. उस दौरान वह रशियन साम्यवादी क्रांति से प्रभावित थे. अण्णाभाऊ साठे ने अपने गीत एवं साहित्य को पूंजीवादी व्यवस्था और मजदूरों के शोषण के खिलाफ शस्त्र बनाया. अन्याय-अत्याचार के खिलाफ उनकी कलम आग उगलती थी. लोक नाटिका के माध्यम से उन्होंने सोये हुये समाज को जगाने का काम किया. अगर यह कहा जाए कि संयुक्त महाराष्ट्र के आंदोलन में उनकी कलम तथा वाणी ने जान फूंकी तो गलत नहीं होगा. मातंग समाज के बागी नायक ‘फकीरा’ के जीवन पर ‘फकीरा’ शीर्षक से ही लिखे उपन्यास से उन्हें काफी प्रसिद्धी मिली. इसके लिए उन्हें अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले तथा उन्हें महाराष्ट्र का मैक्सिम गोर्की कहा गया.

हालांकि शुरू में कम्युनिस्ट प्रभाव वाले अण्णाभाऊ बाद में आम्बेडकरवादी विचारधारा के हो गए. बाद के दिनों में अण्णा भाऊ भारतीय वर्ण व्यवस्था के विनाश के लिए आंबेडकरी विचारधारा के अलावा अन्य विकल्प ना होने की बात कहते थे. उनका विचार था कि पूरी व्यवस्था बदले बगैर देश के गरीब, श्रमिक, दलित व किसानों को न्याय नहीं मिलेगा. यही वजह रही कि उन्होंने भारत की स्वतंत्रता पर ही सवाल उठाया था. 15 अगस्त 1947 को जब भारत आजाद हुआ और देश भर में जश्न मनाया जा रहा था, तब अण्णा भाऊ ने सवाल उठाया कि स्वाधीनता किसे मिली? पूंजीपति को या जन सामान्य को? ऐसे सवाल उठाकर अण्णाभाऊ ने जहां आमजन को विचलित कर दिया तो सरकार को परेशान कर दिया. हर प्रकार के अन्याय के खिलाफ बगावत अण्णा भाऊ का स्थायी भाव था. उनकी जयंती पर उनको नमन.

सैलरी में कटौती से परेशान चंद्रयान भेजने वाले वैज्ञानिक

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सदस्य मोतीलाल वोरा ने आज यानी 30 जुलाई को राज्यसभा में ISRO वैज्ञानिकों की तनख्वाह काटने का मामला उठाया. उन्होंने कहा कि जब पूरा देश चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग के बाद इसरो वैज्ञानिकों की सफलता पर उन्हें बधाई दे रहा है, ऐसे में भारत सरकार उनकी सैलरी काट रही है. इसरो वैज्ञानिकों के लिए दो अतिरिक्त वेतन वृद्धि की अनुमति राष्ट्रपति ने दी थी. ताकि देश में मौजूद बेहतरीन टैलेंट्स को इसरो वैज्ञानिक बनने का प्रोत्साहन मिले. साथ ही इसरो वैज्ञानिक भी प्रेरित हो सके.

मोतीलाल वोरा ने कहा कि ये अतिरिक्त वेतन वृद्धि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 1996 में अंतरिक्ष विभाग ने लागू किया था. सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में कहा था कि इस वेतन वृद्धि को स्पष्ट तौर पर ‘तनख्वाह’ माना जाए. मोतीलाल वोरा ने सदन में अपील की कि केंद्र सरकार इसरो वैज्ञानिकों की तनख्वाह न काटे.

इसरो वैज्ञानिकों के संगठन द्वारा इसरो चीफ को लिखी गई चिट्ठी.
इसरो वैज्ञानिकों के संगठन द्वारा इसरो चीफ को लिखी गई चिट्ठी.

भारत सरकार ने Chandrayaan-2 की लॉन्चिंग से ठीक पहले ISRO वैज्ञानिकों की तनख्वाह में कटौती कर दी थी. केंद्र सरकार ने 12 जून 2019 को जारी एक आदेश में कहा है कि इसरो वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को साल 1996 से दो अतिरिक्त वेतन वृद्धि के रूप में मिल रही, प्रोत्साहन अनुदान राशि को बंद किया जा रहा है. ये हाल तब है जब इसरो के वैज्ञानिकों की उपलब्धि पर पूरे देश को गर्व है.

इसरो के वैज्ञानिकों के संगठन स्पेस इंजीनियर्स एसोसिएशन (SEA) ने इसरो के चेयरमैन डॉ. के. सिवन को पत्र लिखकर मांग की थी कि वे इसरो वैज्ञानिकों की तनख्वाह में कटौती करने वाले केंद्र सरकार के आदेश को रद्द करने में मदद करें. क्योंकि वैज्ञानिकों के पास तनख्वाह के अलावा कमाई का कोई अन्य जरिया नहीं है. SEA के अध्यक्ष ए. मणिरमन ने इसरो चीफ को लिखे पत्र में कहा था कि सरकारी कर्मचारी की तनख्वाह में किसी भी तरह की कटौती तब तक नहीं की जा सकती, जब तक बेहद गंभीर स्थिति न खड़ी हो जाए. तनख्वाह में कटौती होने से वैज्ञानिकों के उत्साह में कमी आएगी. हम वैज्ञानिक केंद्र सरकार के फैसले से बेहद हैरत में हैं और दुखी हैं.

SEA ने इसरो चीफ को लिखे पत्र में बिंदुवार ये मांगे रखी हैं…

इसरो वैज्ञानिकों के लिए दो अतिरिक्त वेतन वृद्धि की अनुमति राष्ट्रपति ने दी थी. ताकि देश में मौजूद बेहतरीन टैलेंट्स को इसरो वैज्ञानिक बनने का प्रोत्साहन मिले. साथ ही इसरो वैज्ञानिक भी प्रेरित हो सके. ये अतिरिक्त वेतन वृद्धि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 1996 में अंतरिक्ष विभाग ने लागू किया था. सुप्रीम कोर्ट के आदेश में कहा था कि इस वेतन वृद्धि को स्पष्ट तौर पर ‘तनख्वाह’ माना जाए.

छठे वेतन आयोग में भी इस वेतन वृद्धि को जारी रखने की सिफारिश की गई थी. साथ ही कहा गया था कि इसका लाभ इसरो वैज्ञानिकों को मिलते रहना चाहिए.

दो अतिरिक्त वेतन वृद्धि इसलिए लागू किया गया था कि इसरो में आने वाले युवा वैज्ञानिकों को नियुक्ति के समय ही प्रेरणा मिल सके और वे इसरो में लंबे समय तक काम कर सकें.

केंद्र सरकार के आदेश में परफॉर्मेंस रिलेटेड इंसेंटिव स्कीम (PRIS) का जिक्र है. हम यह बताना चाहते हैं कि अतिरिक्त वेतन वृद्धि और PRIS दोनों ही पूरी तरह से अलग-अलग हैं. एक इंसेंटिव है, जबकि दूसरा तनख्वाह है. दोनों एक दूसरे की पूर्ति किसी भी तरह से नहीं करते.

सरकारी कर्मचारी की तनख्वाह में किसी भी तरह की कटौती तब तक नहीं की जा सकती, जब तक बेहद गंभीर स्थिति न खड़ी हो जाए. ये था केंद्र सरकार का तनख्वाह काटने वाला आदेश

इस आदेश में कहा गया है कि 1 जुलाई 2019 से यह प्रोत्साहन राशि बंद हो जाएगी. इस आदेश के बाद D, E, F और G श्रेणी के वैज्ञानिकों को यह प्रोत्साहन राशि अब नहीं मिलेगी. इसरो में करीब 16 हजार वैज्ञानिक और इंजीनियर हैं. लेकिन इस सरकारी आदेश से इसरो के करीब 85 से 90 फीसदी वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की तनख्वाह में 8 से 10 हजार रुपए का नुकसान होगा. क्योंकि ज्यादातर वैज्ञानिक इन्हीं श्रेणियों में आते हैं. इसे लेकर इसरो वैज्ञानिक नाराज हैं.

बता दें कि वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित करने, इसरो की ओर उनका झुकाव बढ़ाने और संस्थान छोड़कर नहीं जाने के लिए वर्ष 1996 में यह प्रोत्साहन राशि शुरू की गई थी. केंद्र सरकार की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि छठे वेतन आयोग की सिफारिशों के आधार पर वित्त मंत्रालय और व्यय विभाग ने अंतरिक्ष विभाग को सलाह दी है कि वह इस प्रोत्साहन राशि को बंद करे. इसकी जगह अब सिर्फ परफॉर्मेंस रिलेटेड इंसेंटिव स्कीम (PRIS) लागू की गई है.

अब तक इसरो अपने वैज्ञानिकों को प्रोत्साहन राशि और PRIS स्कीम दोनों सुविधाएं दे रहा था. लेकिन अब केंद्र सरकार ने निर्णय किया है कि अतिरिक्त वेतन के तौर पर दी जाने वाली यह प्रोत्साहन राशि 1 जुलाई से मिलनी बंद हो जाएगी.

C श्रेणी में होती है इसरो वैज्ञानिकों की भर्ती, प्रमोशन पर मिलती थी प्रोत्साहन राशि

इसरो में किसी वैज्ञानिक की भर्ती C श्रेणी से शुरू होती है. इसके बाद उनका प्रमोशन D, E, F, G और आगे की श्रेणियों में होता है. हर श्रेणी में प्रमोशन से पहले एक टेस्ट होता है. उसे पास करने वाले को यह प्रोत्साहन अनुदान राशि मिलती है. लेकिन अब जब जुलाई की तनख्वाह अगस्त में आएगी, तब वैज्ञानिकों को उसमें कटौती दिखेगी.

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भाजपा नेता पर बलात्कार का आरोप लगाने वाली लड़की को ट्रक ने मारी टक्कर

उन्नाव बलात्कार कांड की पीड़िता, जिसने भाजपा के दबंग विधायक कुलदीप सेंगर पर बलात्कार का आरोप लगाया था, वह इस वक्त लखनऊ के केजीएमयू अस्पताल में पड़ी है! रायबरेली जाते समय उसकी कार को एक ट्रक ने बड़े संदिग्ध तरीके से टक्कर मारी! यह टक्कर इतनी भयानक थी कि दुर्घटना में उस लड़की की दो चाचियों की मौत हो गई! अस्पताल में पड़े ड्राइवर और उस लड़की की हालत बहुत नाज़ुक बताई जा रही है। लड़की के पिता की पहले ही संदिग्ध अवस्था में मौत हो चुकी है और उसका चाचा रायबरेली जेल में बंद हैं, जिससे मिलने वह अपनी चाची के साथ वहां जा रही थी! यह मामला महज दुर्घटना है या कुछ और? मुझे लगता है, इन चार विंदुओं पर जांच केंद्रित हो तो सही तथ्य सामने आ सकेंगे:

1.टक्कर मारने वाला टृक सामने की तरफ से(Wrong Side) ही आ रहा था! ऐसा क्यों?
2. उस टृक के पीछे लगी नंबर प्लेट पर काला पेंट कर कुछ नंबर छुपा दिए गए थे! ऐसा क्यों?
3. बलात्कार के आरोपी कुलदीप सेंगर जो जेल में हैं, से खतरा के मद्देनजर उस लड़की को दो सुरक्षाकर्मी मिले हुए थे। पुलिस के इन दो गनर ने उन्नाव से रायबरेली जाते वक्त लड़की को असुरक्षित क्यों छोड़ा?
4. बताया जा रहा है, वे दो दिन से लड़की के साथ नहीं थे! किसकी मंजूरी लेकर वे ड्यूटी से गायब थे?
अब बडा सवाल तो ये है कि इस मामले में कौन कराएगा सही ढंग की जांच और कौन सी एजेंसी करेगी जांच? ‘रामराज’ में सिर्फ आदेश जारी होते हैं, जांच कहां होती है?
वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश की फेसबुक वॉल से

टाटा सोशल इंस्टीट्यूट के छात्र संघ के अध्यक्ष पद पर बहुजनों का कब्जा, भट्टा राम नए अध्यक्ष

भट्टाराम

टाटा समाजिक विज्ञान संस्थान, मुंबई में छात्रसंघ चुनाव में राजस्थान के बाड़मेर जिले के टापरा गांव के दलित युवा भट्टा राम ने जीत हासिल कर इतिहास रच दिया है. सुदूर रेगिस्तान के दलित-किसान-मजदूर परिवार में पैदा हुये भट्टाराम एक ऐसे इलाके से आते है, जहां पर जातिगत भेदभाव व छुआछूत भयंकर रूप में विद्यमान है. यह इलाका आज भी सामंतवाद की चपेट में है. आज भी यहां दलितों को छूने तक से परहेज किया जाता है. बच्चों के साथ स्कूलों में भेदभाव आम बात है.

ऐसी विपरीत सामाजिक आर्थिक व भौगोलिक पृष्ठभूमि से आने वाले भट्टाराम ने इस विश्व विख्यात संस्थान के छात्रसंघ के चुनाव में उतरने की ठानी, यह उनकी बड़ी हिम्मत और आत्मविश्वास था. बाड़मेर जिले के पचपदरा ब्लॉक के टापरा गांव के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय से 2014 में हिंदी माध्यम से 12वीं तक शिक्षा ग्रहण की. फिर 2017 में एमबीआर राजकीय कॉलेज बालोतरा से बीए कम्पलीट किया. उच्च शिक्षा के लिए पैसा जमा करने के लिए अप्रैल 2015 से अगस्त 2017 तक आईडिया डिस्ट्रीब्यूटर के यहां सेल्स एक्सिक्यूटिव की नौकरी की और भवन निर्माण में अकुशल श्रमिक के तौर पर मजदूरी भी की.

इसके बाद 8 महीने तक नालंदा एकेडमी वर्धा में रहकर उच्च शिक्षा के लिए तैयारी की और 2018 में जल नीति और शासन के परास्नातक पाठ्यक्रम हेतू टाटा इंस्टीट्यूट मुम्बई पहुंचे. भट्टाराम में अपने इलाके के कालूडी गांव में 70 दलित परिवारों को गांव छोड़ने के लिए मजबूर करने वाले आतंकी जातिवादी तत्वों के खिलाफ जबरदस्त संघर्ष किया और कालूडी के मुद्दे को यूएनओ तक पहुंचाने में सफलता प्राप्त की. जाहिर है कि वर्तमान में वह भट्टाराम टाटा इंस्टीट्यूट के छात्र हैं. टाटा इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष पद का चुनाव जीतना टापरा के इस युवा की बहुत ऊंची उड़ान है. वंचित तबके के छात्रों के लिए भट्टाराम की सफलता एक एक मिशाल है.

समीक्षा: ओमप्रकाश वाल्मीकि का अंतिम संवाद, दलित विमर्श पर गहन चिंतन

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भारतीय दलित साहित्य में ओमप्रकाश वाल्मीकि बड़ा नाम हैं. उनके लेखन में सिर्फ दलित विमर्श ही नहीं, लेखन की बारीकियां और साहित्य से सरोकार भी मौजूद है. उनके लेखन व साहित्य में दलित विमर्श और अन्य मुद्दों पर उनके विचारों का उपयोगी संकलन है ‘‘ओमप्रकाश वाल्मीकि का अंतिम संवाद’’ यह पुस्तक उनसे भंवरलाल मीणा की लंबी बातचीत पर आधारित है.मीणा राजस्थान के आदिवासी क्षेत्र में अध्यापन कार्य करते हैं. किताब में समाज, जाति और धर्म से जुड़े अनेक प्रासंगिक सवाल हैं जिनका वाल्मीकि जी ने तार्किक एवं बेबाक जवाब दिया है.

दसअसल, यह किताब मात्र संवाद भर नहीं, साहित्य में दलित विमर्श और समाज में दलितोत्थान के प्रयासों का एक पारदर्शी चेहरा है, जिसमें उनकी कमियां एवं अच्छाइयां सब स्पष्ट हो गई हैं. खासतौर पर दलित विमर्श की बात की जाए तो वाल्मीकि जी ने पूरे इतिहास को ही खंगालकर उदाहरण पेश किए हैं. बड़े-बड़े लेखकों एवं पाठकों की चूक पर उन्होंने दृढ़ता से न सिर्फ उंगली रखी है बल्कि सही क्या होना चाहिए, यह भी सुझाया है. इस लिहाज से किताब और भी विचारणीय हो जाती है.

धर्म और जाति से जुड़े प्रश्न हमारे देश में हमेशा ही ज्वलंत रहे हैं. शिक्षा के इतने विस्तार के बावजूद गांवों और शहरों में जातिवाद कायम है. जाति के नाम पर चुनाव लड़े और जीते जाते हैं. वाल्मीकि जी हमारे समाज की संरचना एवं सोच से भलीभांति वाकिफ थे. इस किताब में उन्होंने जातिवाद के अलग-अलग रूपों की चर्चा की है. शहरों के शिक्षित लोगों के बीच भी जातिवाद की मजबूत जड़ें हैं. यहां तक कि जो विदेश में रह आए हैं वे भी भारत में आकर वैसा ही रवैया अपना लेते हैं. किस तरह सदियों से चली आ रही जातिवादी व्यवस्था अब भी लोगों के मन में किसी न किसी रूप में जिंदा है- इसके अनेक उदाहरण दिए हैं. मार्क्सवाद के वर्गीय अवधारणा को नकारते हुए उनका कहना है कि भारत में जाति एक सामाजिक सचाई है. कई उदाहरण उन्होंने इसे साबित किया है. एक उदाहरण के तौर पर वे बताते हैं,

‘‘जगजीवन राम उप-प्रधानमंत्री बन चुके थे. बनारस यूनिवर्सिटी में संपूर्णानंद की मूर्ति का उद्घाटन करने जाते हैं, जब उद्घाटन करके आ जाते हैं, तब उस मूर्ति को गंगाजल से धोया जाता है कि एक अछूत ने उसका उद्घाटन किया है, जबकि वे एक सम्पन्न और प्रधानमंत्री पद के दावेदार आदमी थे…. यहां पर कहां है वर्ग और वर्ग का आधार क्या है?भारत में वर्ग हैं ही नहीं, यहां पर वर्ण है. जब तक वर्ण नहीं टूटेगा, वर्ग नहीं बन सकता. भारतीय मार्क्सवादी घर के बाहर वर्गवादी और घर के अंदर वर्णवादी हैं.’’

ये कुछ इतिहास से लिये गए उदाहरण हैं लेकिन उन्होंने भारत के शहरों में व्याप्त जाति व्यवस्था को दर्शाते हुए कुछ समकालीन उदाहरण भी पेश किए हैं. ‘‘जब वह आया है दिल्ली जैसे शहर में उसने क्या अनुभव अर्जित किये हैं? जब वो किराये का मकान लेने जाता है, तब उससे जात पूछी जाती है, जब वह अपने आप को दलित कहता है या एसटी, एससी कहता है, तब उसे मकान नहीं मिलता है.

किताब में उनके व्यक्तिगत जीवन और आचार-विचार से भी जुड़ी बातें हैं. जो बताती हैं कि वे अच्छे लेखक होने के साथ अच्छे इंसान भी थे. जीवन के अंतिम क्षणों में बातचीत के माध्यम से समाज का पथ प्रदर्शन करने वाले विचार देकर उन्होंने अपने पाठकों और चिंतकों को एक नायाब तोहफा दिया है.

समीक्षा – सरस्वती रमेश

किताब — ओमप्रकाश वाल्मीकि का अंतिम संवाद

लेखक/बातचीत– भंवरलाल मीणा

प्रकाशक –राजपाल एन्ड सन्ज़

साभार-हिन्दुस्तान

दलित लड़की को बेहोशी की दवाई देकर किडनैप किया और फिर गैंग रेप

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सांकेतिक चित्र

बांदा। बांदा जिले के तिंदवारी क्षेत्र में पुलिस ने एक दलित किशोरी के अपहरण के बाद उससे कथित रूप से सामूहिक बलात्कार किए जाने का मामला दर्ज किया है. पुलिस सूत्रों ने दर्ज रिपोर्ट के हवाले से बताया कि पिछली 29 मई को तिंदवारी थाना क्षेत्र के एक गांव की रहने वाली 16 साल की एक किशोरी को मोटरसाइकिल सवार दो युवक बेहोशी की दवा देकर उठा ले गये.

किशोरी को पहले हमीरपुर जिले के इचौली ले जाया गया जहां अगवा करने वाले एक लड़के की बहन ने जबरन उसकी मांग में सिंदूर भरवाया. इसके बाद दोनों युवकों ने उसे लुधियाना (पंजाब) में रख कर 51 दिनों तक उससे बलात्कार किया.सूत्रों के मुताबिक किशोरी ने मौका पाकर फोन से खुद के लुधियाना में होने की सूचना परिजन को दी तब परिजन उसे लुधियाना से छुड़ा कर सोमवार को थाने लाए और मुकदमा दर्ज कराया.

प्रभारी निरीक्षक नीरज कुमार सिंह ने बताया कि ‘पीड़िता के पिता की तहरीर पर तेरही माफी गांव के निवासी रामलखन (22), उसकी बहन कलावती उर्फ कल्ली और उसके एक अन्य अज्ञात साथी के खिलाफ अपहरण, षड्यंत्र में शामिल होने, बलात्कार और एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया है. उन्होंने बताया कि आरोपियों की तलाश शुरू कर दी गयी है.

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गठबंधन सरकार गिरी, BJP आज पेश कर सकती है सरकार बनाने का दावा

गठबंधन सरकार गिरी, BJP आज पेश कर सकती है सरकार बनाने का दावाविश्वास प्रस्ताव पर चार दिनों की बहस के बाद कनार्टक में एच. डी. कुमारस्वामी की सरकार गिर गई है. विधानसभा में मंगलवार को मुख्यमंत्री कुमारस्वामी के नेतृत्व में कांग्रेस व जनता दल सेक्युलर (जद-एस) की गठबंधन सरकार विश्वास मत हासिल नहीं कर सकी. 225 सदस्यीय कनार्टक विधानसभा में विश्वास मत के लिए 20 विधायक सदन में उपस्थित नहीं हुए थे. विधानसभा अध्यक्ष के. आर. रमेश कुमार ने विश्वास मत के बाद सदन के सदस्यों को बताया कि मुख्यमंत्री एच. डी. कुमार स्वामी विश्वास मत हासिल नहीं कर सके. उन्होंने बताया कि विश्वास मत के पक्ष में 99 जबकि इसके खिलाफ 105 मत पड़े हैं. इसके साथ ही भाजपा ने कहा है कि वह कनार्टक में सरकार बनाने का दावा पेश करेगी. बताया जा रहा है कि सरकार बुधवार को सरकार बनाने का दावा पेश कर सकती है.

1. कर्नाटक मामले पर राहुल गांधी ने ट्वीट कर कहा, ” अपने पहले दिन से ही कांग्रेस-जद(एस) सरकार भीतर और बाहर के उन निहित स्वार्थ वाले लोगों के निशाने पर आ गयी थी जिन्होंने इस गठबंधन को सत्ता के अपने रास्ते के लिए खतरा और रुकावट के तौर पर देखा.” उन्होंने दावा किया, “उनके लालच की आज जीत हो गयी. लोकतंत्र, ईमानदारी और कर्नाटक की जनता हार गयी.”

2. वहीं पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने भाजपा पर संस्थाओं और लोकतंत्र को व्यवस्थित ढंग से कमजोर करने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा, ”एक दिन भाजपा को यह पता चलेगा कि सब कुछ नहीं खरीदा जा सकता, हर किसी के पीछे नहीं पड़ा जा सकता और हर झूठ आखिरकार बेनकाब होता है.”गौरतलब है कि कर्नाटक में कांग्रेस-जद(एस) की सरकार मंगलवार को विधानसभा में विश्वास मत हासिल करने में विफल रही और सरकार गिर गई. इसी के साथ राज्य में करीब तीन हफ्ते से चल रहे राजनीतिक नाटक का फिलहाल पटाक्षेप हो गया.

3. कर्नाटक में कांग्रेस-जद(एस) गठबंधन की सरकार मंगलवार को विधानसभा में विश्वासमत हासिल करने में विफल रहने के बाद गिर गयी . इसी के साथ राज्य में 14 महीने से अस्थिरता के दौर का सामना कर रहे मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी का कार्यकाल खत्म हो गया. कुमारस्वामी ने विधानसभा में विश्वास प्रस्ताव हारने के तुरंत बाद राज्यपाल वजूभाई वाला को अपना इस्तीफा सौंप दिया. अधिकारियों ने बताया कि परिणाम के तुरंत बाद कुमारस्वामी, उपमुख्यमंत्री जी. परमेश्वर और अन्य वरिष्ठ सहयोगियों के साथ राजभवन गए और इस्तीफा सौंप दिया. 4. कुमारस्वामी को अपने पत्र में राज्यपाल ने कहा, ”मैंने तत्काल प्रभाव से आपका इस्तीफा स्वीकार कर लिया है . वैकल्पिक व्यवस्था होने तक कार्यवाहक मुख्यमंत्री के पद पर बने रहिए. यह कहने की जरूरत नहीं है कि इस दौरान कोई कार्यकारी फैसले नहीं लिए जाने चाहिए.

5. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने मंगलवार को कर्नाटक के मुद्दे पर पार्टी नेताओं के साथ विचार-विमर्श किया. शाह ने इन संकेतों के बीच पार्टी नेताओं के साथ सलाह मशविरा किया कि कर्नाटक में एच डी कुमारस्वामी नीत गठबंधन सरकार के मंगलवार को गिरने के बाद बी एस येदियुरप्पा मुख्यमंत्री पद के लिए भाजपा की पसंद हो सकते हैं. राज्य में शीर्ष पद के लिए भाजपा की पसंद के बारे में पूछे जाने पर पार्टी के एक नेता ने कहा कि येदियुरप्पा जाहिर तौर पर दावेदार हैं, लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शाह सहित पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इस बारे में निर्णय करेगा.

6. विधानसभा में पिछले बृहस्पतिवार को कुमारस्वामी ने विश्वास मत का प्रस्ताव पेश किया था. चार दिनों तक विधानसभा में विश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के बाद कुमारस्वामी ने कहा,”मैं खुशी से इस पद का बलिदान करने को तैयार हूं. कार्यवाही में 21 विधायकों ने हिस्सा नहीं लिया जिससे सदन की प्रभावी क्षमता घटकर 204 रह गयी. कार्यवाही में कांग्रेस-जदएस (17), बसपा (एक), निर्दलीय (दो) के विधायक नहीं आए. इस तरह 103 का जादुई आंकड़ा नहीं जुट पाया.

7. कुमारस्वामी ने कहा कि विश्वास मत की कार्यवाही को लंबा खींचने की उनकी कोई मंशा नहीं थी. उन्होंने कहा, ”मैं विधानसभाध्यक्ष और राज्य की जनता से माफी मांगता हूं. कुमारस्वामी ने कहा, ”यह भी चर्चा चल रही है कि मैंने इस्तीफा क्यों नहीं दिया और कुर्सी पर क्यों बना हुआ हूं. उन्होंने कहा कि जब विधानसभा चुनाव का परिणाम (2018 में) आया था, वह राजनीति छोड़ने की सोच रहे थे.

8. अपने संबोधन में कांग्रेस नेता सिद्धरमैया ने आरोप लगाया कि भाजपा रिश्वत और विधायकों की खरीद फरोख्त के जरिए सत्ता में आने का प्रयास कर रही है. उन्होंने कहा कि 15 विधायकों का इस्तीफा और कुछ नहीं बल्कि यह खरीद फरोख्त है. सिद्धरमैया ने आरोप लगाया कि विधायकों को प्रलोभन देने के लिए 20, 25 और 30 करोड़ रुपये का प्रस्ताव दिया गया . उन्होंने पूछा कि यह धन कहां से आया?

9. मतदान के बाद विजय चिन्ह बनाते हुए भाजपा नेता बी एस येदियुरप्पा ने परिणाम को लोकतंत्र की जीत बताया. उन्होंने कर्नाटक के लोगों को आश्वस्त किया कि भाजपा के सत्ता में आने के साथ विकास का एक नया युग आरंभ होगा. अगले कदम पर येदियुरप्पा ने कहा कि शीघ्र ही उपयुक्त फैसला किया जाएगा. कुमारस्वामी सरकार के विश्वास मत के दौरान बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के विधायक के विधानसभा से गैरहाजिर रहने को पार्टी सुप्रीमो मायावती ने गंभीरता से लेते हुए उन्हें तत्काल प्रभाव से पार्टी से निष्कासित कर दिया है.

10. कर्नाटक में 2018 में विधानसभा चुनाव के बाद 14 महीने में दो मुख्यमंत्री को विश्वास मत में हार के बाद सरकार गंवानी पड़ी है. कर्नाटक में मई में चुनाव के बाद भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी. चुनाव में भाजपा को 104 सीटें मिली थीं. जबकि कांग्रेस को 78 और जेडीएस को 37 सीट मिली थी. इसके बाद राज्यपाल ने भाजपा के येदियुरप्पा को सरकार बनाने का न्योता दिया था. पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद वह बहुमत सिद्ध नहीं कर सके और मात्र छह दिन मुख्यमंत्री रहे.

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UGC ने इन 23 यूनिवर्सिटी को फर्जी घोषित किया

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विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने 23 फर्जी यूनिवर्सिटी की सूची जारी की है. इनमें सबसे ज्‍यादा आठ उत्‍तर प्रदेश में संचालित हो रही हैं. आयोग द्वारा जारी एक नोटिस में कहा गया है कि विद्यार्थियों और आम लोगों को सूचित किया जाता है कि फिलहाल देश के विभिन्न हिस्सों में 23 यूनिवर्सिटी गैरमान्‍यता प्राप्‍त चल रही हैं. ऐसे में छात्र-छात्राएं एडमिशन लेते वक्‍त ध्‍यान रखें.

वहीं इस बारे में यूजीसी सचिव रजनीश जैन ने कहा फिलहाल देश के विभिन्न हिस्सों में यूजीसी अधिनियम का उल्लंघन कर 23 यूनिवर्सिटी स्वघोषित, गैर-मान्यता प्राप्त संस्थान चल रहे हैं. इनमें से आठ विश्वविद्यालय उत्तर प्रदेश में हैं, उसके बाद दिल्ली में (सात) हैं. इसके अलावा केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र और पुडुचेरी में एक-एक फर्जी विश्वविद्यालय हैं. आइए जानते हैं इन यूनिवर्सिटी पर एक नजर.

यूपी नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ इलेक्ट्रो कॉम्प्लेक्स होम्योपैथी, कानपुर नेताजी सुभाष चंद्र बोस विश्वविद्यालय (मुक्त विश्वविद्यालय),

अलीगढ़ उत्तर प्रदेश विश्व विद्यालय, कोसी कलां, मथुरा

महाराणा प्रताप शिक्षा निकेतन विश्व विद्यालय, प्रतापगढ़ वारणसी संस्कृत विश्व विद्यालय,

वाराणसी महिला ग्राम विद्यापीठ / विश्व विद्यालय, (महिला विश्वविद्यालय), इलाहाबाद

गांधी हिंदी विद्यापीठ, प्रयाग, इलाहाबाद

इंद्रप्रस्थ शिक्षा परिषद, संस्थागत क्षेत्र, खोड़

दिल्‍ली एडीआर-सेंट्रिक ज्यूरिडिकल यूनिवर्सिटी

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड इंजीनियरिंग

स्व-रोजगार के लिए विश्वकर्मा मुक्त विश्वविद्यालय

कमर्शियल यूनिवर्सिटी लि, दरियागंज

संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय

वोकेशनल यूनिवर्सिटी

अध्यात्म विश्व विद्यालय (आध्यात्मिक विश्वविद्यालय)

वरान्स्य संस्कृत विश्व विद्यालय

ओडिशा नौभारत शिक्षा परिषद, अनूपपूर्णा भवन, राउरकेला

उत्तर उड़ीसा कृषि और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय

वेस्‍ट बंगाल भारतीय वैकल्पिक चिकित्सा संस्थान, कोलकाता

इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव मेडिसिन एंड रिसर्च, कोलकाता

कर्नाटक बडगानवी सरकार वर्ल्ड ओपन यूनिवर्सिटी एजुकेशन सोसाइटी बेलगाम सेंट जॉन्स यूनिवर्सिटी, किशनट्टम

महाराष्‍ट्र राजा अरबी विश्वविद्यालय, नागपुर

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मतदान के दौरान गायब रहने वाले विधायक एन महेश बसपा से निष्कासित

लखनऊ। बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती के निर्देश के बाद भी कर्नाटक में सरकार के विश्वास मत के दौरान गायब रहने वाले बसपा विधायक एन महेश को पार्टी से बाहर कर दिया गया. कर्नाटक में सरकार के विश्वास मत के दौरान मायावती का निर्देश था कि बसपा विधायक एन महेश सरकार के पक्ष में मतदान करने सदन में रहें. इसके बाद भी वह सदन में नहीं पहुंचे.

बसपा सुप्रीमो मायावती का निर्देश था कि कर्नाटक में विश्वास मत के दौरान बसपा के विधायक एन महेश रहेंगे. इसके बाद भी बसपा विधायक एन. महेश नदारद रहे और कर्नाटक की सरकार गिर गई. मंगलवार को सदन में मतदान के दौरान एन महेश को सीएम एचडी कुमारस्वामी के पक्ष वोट डालना था. इसके बाद भी वह मतदान करने नहीं पहुंचे और कुमारस्वामी की सरकार विश्वास मत में पिछड़ गई.

कर्नाटक में सत्ता संघर्ष का ड्रामा मंगलवार को बढ़ गया. बसपा ने एसडी कुमारस्वामी के पक्ष में मतदान न करने वाले विधायक एन महेश को बाहर का रासता दिखा दिया. बसपा विधायक एन महेश ने सोमवार को कहा था कि मुझे पार्टी की सुप्रीमो मायावती का निर्देश है कि मैं विश्वास मत के दौरान सदन में उपस्थित रहूं. विधायक महेश के इस कृत्य से प्रदेश सरकार को झटका लगा है. वह पहले से ही अल्पमत में आ चुकी थी.

महेश ने कहा था कि मंगलवार को मैं सदन में रहूंगा. इसके बाद भी महेश आज सदन से गायब हो गए. विश्वास मत में कर्नाटक की कांग्रेस-जेडीएस(जनता दल सेक्युलर) सरकार गिर गई. सरकार के पक्ष में 99 और विरोध में 105 वोट डाले गए.

महेश के इस कृत्य को बसपा सुप्रीमो मायावती ने घोर अनुशासनहीनता मानते हुए उनको पार्टी से बाहर कर दिया है. बसपा मुखिया ने ट्वीट किया है. मायावती ने लिखा कि कर्नाटक में कुमारस्वामी सरकार के पक्ष में वोट देने के पार्टी हाईकमान के निर्देश का उल्लंघन करके बसपा विधायक एन महेश आज विश्वास मत में अनुपस्थित रहे जो अनुशासनहीनता है जिसे पार्टी ने अति गंभीरता से लिया है और इसलिए एन महेश को तत्काल प्रभाव से पार्टी से निष्कासित कर दिया गया.

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विराट व रोहित में वर्ल्ड कप के दौरान थी तनातनी

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नई दिल्ली। वर्ल्ड कप 2019 के सेमीफाइनल में टीम इंडिया को न्यूजीलैंड के हाथों करारी हार मिली और इसके बाद ये खबर सामने आई कि टीम इंडिया में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है. खबरें ये भी सामने आईं कि टीम इंडिया दो धड़ो में बटी हुई है. इसमें से एक ग्रुप विराट कोहली का तो दूसरा ग्रुप रोहित शर्मा का था. गल्फ न्यूज की मानें तो रोहित शर्मा के ग्रुप को विराट कोहली और रवि शास्त्री के फैसले नागवार गुजरे थे. कई मौकों पर रोहित शर्मा ने विराट के फैसले पर आपत्ति जताई थी. इसके बाद से ही दोनों में मतभेद बढ़ते चले गए. सेमीफाइनल मैच में मो. शमी को बैठाए जाने के फैसले से रोहित शर्मा और उनके ग्रुप के साथी नाराज थे. इसके पीछे वजह ये थी कि शमी ने चार मैचों में 14 विकेट लिए थे और अच्छी गेंदबाजी कर रहे थे. वहीं रवींद्र जडेजा को विश्व कप के कई मैचों में मौका नहीं दिए जाने पर भी मतभेद था. हालांकि जडेजा ने सेमीफाइनल में कमाल की पारी खेली थी और टीम को जीत के करीब पहुंचा दिया था पर भारतीय टीम फिर भी हार गई.

हालांकि सेमीफाइनल की टीम पर नजर डाली जाए तो इसमें सच्चाई नजर आती है. न्यूजीलैंड के खिलाफ सेमीफाइनल मैच में जब जडेजा चौके-छक्के लगा रहे थे तब रोहित शर्मा ड्रेसिंग रूम से उनका उस्ताह बढ़ा रहे थे. गल्फ न्यूज की मानें तो सेमीफाइनल में हार के बाद रोहित शर्मा के गुट ने विराट को कप्तानी से हटाने की बात की कही. गेंदबाजी कोच भरत अरुण ने भी माना था कि कुछ खिलाड़ी एक टीम यूनिट के तौर पर काम कर रहे हैं, लेकिन कभी-कभी ऐसी बातें हो जाती हैं. आपको बता दें कि विराट ने कभी भी कोई आईसीसी टूर्नामेंट नहीं जीता है.

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इमरजेंसी में प्लेटफॉर्म टिकट पर कर सकते हैं ट्रेन में सफर

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नई दिल्ली। ट्रेन से सफर करने वालों के लिए ट्रेन का छूटना, आखिरी वक्त में प्लेटफॉर्म पर पहुंचना और कभी-कभी इमरजेंसी केस में बिना टिकट का सफर करना साधारण बात है. अगर आपको भी कभी अचानक ट्रेन से सफर करना पड़े और तत्काल टिकट नहीं मिल पाया हो तो प्लेटफॉर्म टिकट के आधार पर भी ट्रेन में सवार हो सकते हैं. कई बार ऐसा होता है कि जब तक आप स्टेशन पहुंचते हैं, तब तक ट्रेन खुलने वाली होती है. रिजर्वेशन काउंटर पर भीड़ होती है. ऐसे में लाइन में लगने पर ट्रेन का छूटना तय है. लेकिन, रेलवे के नियम के मुताबिक प्लेटफॉर्म टिकट पर ट्रेन से यात्रा की जा सकती है. आइये जानते हैं क्या कहता है नियम.

रेलवे की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, अगर आपके पास प्लेटफॉर्म टिकट है तो TTE आपको यात्रा से नहीं रोक सकता है. साथ ही आपसे विदाउट टिकट का जुर्माना भी नहीं वसूला जाएगा. इसके लिए आपको ट्रेन में सवार होते ही सबसे पहले TTE से संपर्क करना है. जिस स्टेशन से प्लेटफॉर्म टिकट लिया गया है उसे बोर्डिंग स्टेशन माना जाएगा. आप जहां तक जाना चाहते हैं वहां तक का किराया और 250 रुपये एक्स्ट्रा जोड़कर TTE टिकट बना देता है. आप जिस क्लास में सफर कर रहे हैं, किराया उसी क्लास का होगा.

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मुसलमानों-दलितों की लिंचिंग से नाराज 49 दिग्गज, PM मोदी से मांग- सख्त सजा दी जाए

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मॉब लिंचिंग की बढ़ती घटनाओं के बीच फिल्म जगत की 49 हस्तियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा है. लेटर में देश में भीड़ द्वारा लिंचिंग के बढ़ते चलन पर गहरी चिंता व्यक्त की गई है. पीएम मोदी को लिखे लेटर में मणिरत्नम, अदूर गोपालकृष्णन, रामचंद्र गुहा, अनुराग कश्यप जैसी हस्तियों के हस्ताक्षर हैं. उन्होंने पीएम मोदी से एक ऐसा माहौल बनाने की मांग की है, जहां असहमति को कुचला नहीं जाए. इन हस्तियों ने कहा है कि असहमति देश को और ताकतवर बनाता है.

इस पत्र में लिखा है कि हमारा संविधान भारत को एक सेकुलर गणतंत्र बताता है, जहां हर धर्म, समूह, लिंग, जाति के लोगों के बराबर अधिकार हैं.

इस पत्र में मांग की गई है कि मुसलमानों, दलितों और दूसरे अल्पसंख्यकों की लिंचिंग तुरंत रोकी जाए. पत्र में नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के आधार पर कहा है गया है कि 1 जनवरी 2009 से लेकर 29 अक्टूबर 2018 के बीच धर्म की पहचान पर आधारित 254 अपराध दर्ज किये गए, इस दौरान 91 लोगों की हत्या हुई और 579 लोग घायल हुए. पत्र के मुताबिक मुसलमान जो भारत की आबादी के 14 फीसदी है वे ऐसे 62 फीसदी अपराधों की शिकार बने, जबकि क्रिश्चयन, जिनका आबादी में हिस्सा 2 फीसदी है वे ऐसे 14 फीसदी अपराध के शिकार हुए. पत्र में कहा गया है कि ऐसे 90 फीसदी अपराध मई 2014 के बाद हुआ था, जब नरेंद्र मोदी सत्ता में आए थे.

पत्र में लिखा गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में लिंचिंग की घटनाओं की आलोचना की है, लेकिन ये काफी नहीं है. पत्र में लिखा गया है, “ऐसा जुर्म करने वालों के खिलाफ क्या कदम उठाया गया है, हमें ऐसा महसूस करते हैं कि ऐसे अपराधों को गैर जमानती बनाया जाए, और दोषियों को ऐसी सजा दी जाए जो नजीर बन जाए. जब हत्या के दोषियों को बिना पैरोल के आजीवन कारावास की सजा दी जा सकती है तो लिंचिंग के मामले में ऐसा क्यों नहीं ह सकता है, जो कि और भी घृणित अपराध है? हमारे देश के किसी नागरिक को डर और खौफ में रहने की जरूरत नहीं है!”

इस पत्र में लोकतंत्र में असहमति की जोरदार पैरवी की गई है और कहा गया है कि असहमति के बिना जम्हूरियत फल-फूल नहीं सकती है. अगर कोई सरकार के खिलाफ राय देता है तो उसे ‘एंटी-नेशनल’ या ‘अरबन नक्सल’ घोषित नहीं कर दिया जाना चाहिए. सत्ताधारी पार्टी की आलोचना करने का मतलब देश की आलोचना करना नहीं होता है. कोई भी पार्टी जब सत्ता में है तो वो दल देश का प्रतीक नहीं बन जाता है, ये देश की कई पार्टियों में से मात्र एक पार्टी ही है. इसलिए सरकार के खिलाफ बोलना या स्टैंड लेना देश विरोधी भावनाएं व्यक्त करने जैसा नहीं है.

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आने वाली पीढ़ियों के लिए पानी बचाना होगा

थार रेगिस्तान में तापमान पचास डिग्री तक पहुंचने, हर तीसरे साल अकाल, दुकाल, त्रिकाल पड़ने पर यहां के ग्रामीण जन परेशान तो होते हैं, पर विचलित नहीं होते. यही कारण है कि दुनिया भर के रेगिस्तानों में थार का रेगिस्तान ही अकेला ऐसा क्षेत्र है जहां जीवन की सघनता और बहुलता है. यहां की जैव विविधता ने जटिल भौगोलिक और मौसमिक परिस्थियों में भी जीवन की आस को कभी छोड़ा नहीं और अपने आप को सदैव परिस्थितियों के अनुकूल ढ़ाल कर जीवन की संभावनाओं को ढूंढा है. जाहिर सी बात है कि रेगिस्तान है, तो पानी की कमी होगी. परंतु इसे पानी की कमी नहीं कह कर रेगिस्तान के साथ कुदरत का व्यवहार कहना ज्यादा उचित होगा. यह वह क्षेत्र है जहां पाताल से खारा और आकाश से मीठा जल बरसता है. लेकिन घनी वर्षा रेगिस्तान को दल-दल बना सकती है जिससे जिससे पूरे क्षेत्र का लवणीय झील में तब्दील होने का खतरा हो सकता है. प्रकृति के फैसले के अनुरूप यहां के जीव जंतुओं ने जहां अपने जीवन को उपलब्ध संसाधनों के अनुकूल ढाल लिया है और दूसरी प्रजातियों के साथ परस्पर सहयोग कर जीवन की संभावनाओं को बनाए रखा है, वहीं मानव जाति ने जल संग्रहण के अनूठे खजानों का निर्माण कर स्वयं के लिए, जीव जंतुओं के लिए और आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन को निर्बाध रूप से चलने का इंतेज़ाम कर लिया था. भारत के ऐसे क्षेत्र, जहां वर्षा थार के रेगिस्तान से कई गुना अधिक होने के बावजूद पेयजल के लिए त्राहिमाम होता है, रेगिस्तान के लोग अपने पुरखों के खजानों से पानी सींच कर संकट को टाल देते हैं.

समय बदला, विकास हुआ, तकनीकी के जरिए मानव ने प्रकृति को नियंत्रण में करने का प्रयास किया. अपने जीवन को सुखी और संपन्न बनाने के लिए ऐसी सुविधाओं का विकास किया कि जरूरतें इशारे भर में सामने मौजूद हो जाए. पानी पाताल में हो चाहे नदियों को बांध कर बनाए गए बांधों में. भारी क्षमता वाले विद्युत चलित पंपो से पाताल और सतही पानी को खींचने और पाइपों लाइनों के जरिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाने की कवायद ने नल से जल की संस्कृति का विकास किया, तो मानव पानी के मूल्य को भूल गया. जिसको जितना मिला, जी भर कर उपयोग किया और जिसको नहीं मिला वह आज भी पानी के एक घड़े के लिए मीलों का सफर करता है. सात पीढ़ियों के लिए धन-दौलत और संसाधन जमा करने वाला इन्सान इस बात से बेपरवाह है कि धरती पर पीने और जीने लायक पानी कितना है, और सूख गया तो नल में जल कहां से आएगा? आने वाली सात पीढ़ियों के जिंदा रहने के लिए पानी और हवा बचेगी भी या नहीं? नल में जल देख कर इतना मोहित हो गया कि पुरखों के दिए जल संग्रहण के कीमती खजानों को भूल गया. उनको अपनी आंखों के सामने लुटता देख कर चुप है. हजारों सालों की अथक मेहनत से बने इन कीमती खजानों को आज बनाने की कल्पना करें, तो अरबों डाॅलर भी कम पड़ जाएं. पानी उपलब्ध कराने के लिए पानी सेे भी तेज गति से पैसा बहाने वाली हमारी सरकारें दिशाहीन नीतियां और योजनाएं बनाती है, जो पानी कम और परेशानियां अधिक देती है.

रेगिस्तान का कोई ऐसा गांव या ढाणी नहीं होगी, जहां पानी के पारंपरिक स्रोत नहीं हो. गांवों के नाम ही पानी के स्रोतों के आधार पर पड़े है. किसी गांव के आगे सर तो किसी गांव के आगे बेरा, बेरी, नाडी, सागर, तला आदि जुड़ कर गांवों का नामकरण हुआ है. पानी के ठांव के बिना गांव का नाम ही कहां. लेकिन पिछले पांच-छः दशकों में पानी उपलब्ध कराने की सरकारी योजनाओं के वशीभूत लोग पारंपरिक जल स्रोतों को न केवल भूलते जा रहे हैं, बल्कि उनकी बर्बादी के चश्मदीद गवाह बन रहे हैं. बाड़मेर से लेकर जैसलमेर, बीकानेर, चूरू, नागौर जोधपुर, पाली, जालोर से लेकर अरावली की तलहटी वाले सीकर, झुंझुंनू तक में हजारों की तादात में बने पुराने जोहड़, तालाब, नाडे, नाडियां, कुंड, बावड़ियां, चूने और पत्थर से बने पक्के कलात्मक तालाब, बेरियां कहीं जर्रजर होकर खंडहर के रूप में अपने वजूद को बनाए हुए हैं, तो कहीं मिट्टी, कचरा, कीचड़ से भरे गांव कचरा पात्र बन गए हैं. अब यह अवैध खनन के ठिकाने बन गए हैं. कभी घर के आंगन से भी साफ-सुथरा रखा जाने वाला पायतन अब मरे हुए पशुओं और घर-आंगन का कचरा फैंकने के काम आने लगे हैं. एक पीढ़ी जिसने इन पारंपरिक जल स्रोतों से पानी पीया है, जल स्रोतों के लिए बनाए गए नियम-कायदों का पालन किया है, मानसून आगमन से पूर्व सामुहिक व्यवस्था में मिट्टी, गाद निकाली है, आज इन स्रोतों की बर्बादी पर केवल इतना ही बोल पाती हैं, कि अब समय बदल गया है.

गांधीवादी विचारक स्व.श्री अनुपम मिश्र ने अपनी पुस्तक ‘आज भी खरे हैं तालाब’ में तालाबों की निर्माण प्रक्रिया और बर्बादी के आंखों देखे अनुभवों को कुछ इस प्रकार लिखा है ‘‘सैकड़ों हजारों तालाब अचानक शून्य से प्रकट नहीं हुए थे. इनके पीछे एक इकाई थी बनवाने वालों की, तो दहाई थी बनाने वालों की. यह इकाई, दहाई मिलकर सैकड़ों हजार बनती थी. पिछले दो सौ बरसों में नए किस्म की थोड़ी सी पढ़ाई पढ़ गए समाज ने इस इकाई, दहाई, सैकड़ा, हजार को शून्य ही बना दिया.’’ शायद यही समय का बदलाव है. नई पीढ़ी जो अंगुलियो के इशारों से संसार नापती है, ने इन स्रोतों को गांव के कचरा पात्र के रूप में ही देखा है, इन बहुमूल्य खजानों को मरणासन्न स्थिति में देखा है, पानी को नल और बोतल में देखा है. पुराने पानी के स्रोतों को फिर से जिंदा करने और उनसे पानी पीने की बात उनके गले ही नहीं उतरती. दो पीढ़ियो के बीच की संवादहीनता से ज्ञान और संस्कार का फासला चौड़ा हो गया.

समय बदल गया है. प्रकृति बदल रही है. मौसम का मिजाज बदल रहा है. रेगिस्तान में पानी के संकट ने दस्तक देनी शुरू कर दी है. न केवल पानी का संकट बल्कि यूं कहें त्रिकाल का संकट. रेगिस्तान में पानी का संकट नहीं है. बरसात के पानी को सहेजने और युक्ति से बरतने का संकट है. पानी के प्रति बरती जा रही बेपरवाही का संकट है. नहर और पाइप लाइन के जरिए लाए जा रहे पराए पानी के भरोसे अपने ठांमों को फोड़ देने का संकट है. नहरों में बहने वाले अथाह पानी में अपने संस्कारों को डूबो कर मार देने का संकट है. पुराने स्रोतों को फिर से ठीक करने के लिए धन का संकट नहीं है, मन बनाने का संकट है. देर से ही सही समाज, सरकार, सामाजिक संगठनों, मीडिया प्रतिष्ठानों ने पारंपरिक जल स्रोतों की सुध लेने, बरसात के पानी को सहेजने, पानी के मसले पर समाज को संगठित करने, फिर से इकाई, दहाई, सैकड़ा हजार बनाने की मुहीम चलाई है. सरकार ने जल शक्ति मंत्रालय बनाया है. जल-शक्ति के साथ जन-शक्ति को जोड़कर पारंपरिक जल स्रोतों फिर से संवारने का समाज के सामने यह अवसर भी है. अपने पारंपरिक जल स्रोतों को फिर जिंदा करने, पानी के संस्कारों के शून्य को भरने, भावी पीढ़ी के हाथों में इन अमूल्य खजानों का भविष्य सौंपने के लिए हजारों हाथों को फिर से उठाने की जरूरत है ताकि आने वाली सात पीढ़ियां चौरासी लाख जीव प्रजातियों के साथ जीवन-यापन कर सके.

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खेत की बाड़ उखाड़ रहे थे दबंग, विरोध करने पर दलित महिला को जिंदा जलाया

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मध्य प्रदेश के सतना जिले में दबंगों का कहर एक गरीब दलित महिला पर टूटा है. गांव के दबंगों ने दलित महिला की पहले जमकर पिटाई कि फिर मिट्टी का तेल डालकर उसे जिंदा जला दिया. दिल दहला देने वाली इस घटना के सामने आने के बाद हड़कंप मच गया है. घटना की जानकारी पाकर मौके पर पहुंचे महिला के परिजनों ने किसी तरह आग बुझाई, लेकिन तब तक महिला 90 फीसदी तक झुलस चुकी थी.

मामला सतना की नागौद तहसील के दूर दराज गांव गिनजारा का है. पीड़ित महिला का नाम राधा अहिरवार है, जिसकी सतना जिला अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई.

दरअसल, गांव के दबंग राधा (मृतिका) के खेत की बाड़ उखाड़ रहे थे, जिस पर राधा ने खेत में पहुंचकर दबंगों का विरोध किया. राधा के बेटे ओमप्रकाश की मानें तो 6 दबंगों ने पहले तो राधा को जमकर पीटा, उसके बाद मिट्टी का तेल डालकर राधा को जिंदा जला दिया.

इधर, सूचना मिलते ही पूरी मीडियाकर्मी सतना जिला अस्पताल पहुंच गई. तब बुरी तरह से जली राधा अस्पताल के बिस्तर पर अपनी आखिरी सांसें गिन रही थी. हालांकि इस दौरान दलित राधा ने मरने से पहले मुन्नू उपाध्याय भैया उपाध्याय समेत 6 दबंगों के नाम और उनकी दबंगई के बारे में मीडियाकर्मियों को बताया था.

मरने से पहले महिला ने दिया था ये बयान राधा ने अपने बयान में बताया था कि गांव के दबंगों द्वारा उसके खेत की बाड़ी उखाड़ी जा रही थी, जिसे वो रोकने के लिए गई थी. इस पर दबंगों ने उससे पीटकर लहुलूहान कर दिया और फिर मिट्टी का तेल डालकर जिंदा जला दिया.

वहीं घटनास्थल पर मौजूद राधा के चश्मदीद बेटे ने भी दबंगों के कारनामे को लेकर अपना बयान दिया है. इधर, घटना की जानकारी मिलने के बाद सतना पुलिस और तहसीलदार अस्पताल पहुंचे. पुलिस ने तो महिला का बयान दर्ज कर लिया, लेकिन तहसीलदार साहब डॉक्टर के आने का इंतजार करते रहे. डॉक्टर के आने पर तहसीलदार जैसे ही बयान लेने गए, तो राधा ने दम तोड़ दिया.

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हिमा दास को बधाई देने उमड़ा बॉलीवुड

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हिमा ने एक महीने में 5वां गोल्ड मेडल जीतकर पूरे देश को गौरवान्वित किया है. 400 मीटर पार करने के लिए कुल 52.09 सेकेंड समय लेने वाली हिमा मात्र 19 वर्ष की हैं. बता दें कि ढिंग एक्सप्रेस के नाम से मशहूर 19 साल की हिमा इसी साल अप्रैल में एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 400 मीटर की दौड़ से पीठ दर्द की वजह से बाहर हो गई थीं. हिमा दास की इस उपलब्धि पर उन्हें बॉलीवड सेलेब्स बधाइयां दे रहे हैं.

हिमा ने एक महीने में 5वां गोल्ड मेडल जीतकर पूरे देश को गौरवान्वित किया है. 400 मीटर पार करने के लिए कुल 52.09 सेकेंड समय लेने वाली हिमा मात्र 19 वर्ष की हैं. बता दें कि ढिंग एक्सप्रेस के नाम से मशहूर 19 साल की हिमा इसी साल अप्रैल में एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 400 मीटर की दौड़ से पीठ दर्द की वजह से बाहर हो गई थीं. हिमा दास की इस उपलब्धि पर उन्हें बॉलीवड सेलेब्स बधाइयां दे रहे हैं.

अनिल कपूर ने लिखा, पांचवां स्वर्ण पदक जीतने के लिए बधाई. आसाम के प्रति आपकी दयालुता हम सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत है. एक महान एथलीट एक स्वर्णिम हृदय के साथ. आने वाले समय में आपको इसी प्राकर से सफलता मिलती रहे.

निर्देशक शेखर कपूर ने हिमा को ‘सुपर गर्ल’ बताया. उन्होंने लिखा, सुपरगर्ल के लिए सब संभव है.

बिग बी ने बधाई देते हुए लिखा,’बधाई, बधाई, बधाई.. जय हिंद.. गर्व हम सबको आप पे हिमा दास जी, आपने भारत का नाम स्वर्ण अक्षरों से लिख दियाl’

कपिल शर्मा ने हिमा को स्टार बताते हुए कहा कि हिमा हमें आप पर गर्व है, छोटी लड़की. एक सितारे की तरह यू ही चमकती रहो.

ढिंग एक्सप्रेस के नाम से मशहूर 19 साल की हिमा इसी साल अप्रैल में एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 400 मीटर की दौड़ से पीठ दर्द की वजह से बाहर हो गई थीं. इससे पहले हिमा ने इसी महीने 2, 6, 13 और 17 जुलाई 2019 को भी अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय इवेंट के 200 मीटर दौड़ में चार गोल्ड मेडल अपने नाम किया था.

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दरवाजे पर टकटकी लगाए इंतजार करती रही मां और ‘आजाद’ देश के लिए शहीद हो गए

नई दिल्ली। 23 जुलाई 1906 को मध्यप्रदेश भावरा में चंद्रशेवर तिवारी का जन्म हुआ था. उनके पिता का नाम सीताराम तिवारी और मां जगरानी देवी थी. जिनकी इकलौती औलाद चंद्रशेखर थे. किशोर अवस्था में ही वह बड़े – बड़े सपनों को पूरा करने के लिए अपना घर छोड़कर मुंबई निकल पड़े थे. जहां उन्होंने बंदरगाह में जहाज की पेटिंग का काम किया था. उस वक्त मुंबई में रहते हुए चंद्रशेखर को फिर से वहीं सवाल परेशान करने लगा था कि अगर पेट पालना ही है तो क्या भाबरा बुरा था.

काशी में ली संस्कृत भाषा की शिक्षा चंद्रशेखर ने वहां से संस्कृत की शिक्षा लेने के लिए काशी की ओर कूच किया. इसके बाद चंद्रशेखर ने अपने घर के बारे में सोचना बंद कर दिया और देश के लिए खुद को पूरी तरह से समर्पित कर दिया. उस समय देश में महात्म गांधी के नेतृत्व में चलाए जा रहे असहयोग आंदोलन का बोल बाला था. उन्होंने काशी के अपने विद्यालय में भी इसकी मशाल जलाई और पुलिस के अन्य छात्रों के साथ उन्हें भी हिरासत में ले लिया. उन्हें 15 बेंतो की सख्त सजा सुनाई गई थी. जिसे आजाद ने आसानी से स्वीकार कर लिया और हर बेंत की मार खाने के बाद वह वंदे मातरम चिल्लाते थे. उसी दिन उन्होंने इस चीज का प्रण लिया कि अब कोई पुलिस वाला उन्हें हाथ नहीं लगा पाएगा. वो आजाद ही रहेंगे. वहीं, जब जज ने उनसे उनके पिता नाम पूछा तो जवाब में चंद्रशेखर ने अपना नाम आजाद और पिता का नाम स्वतंत्रता और पता जेल बताया जिसके बाद से ही चंद्रशेखर सीताराम तिवारी का नाम चंद्रशेखर आजाद पड़ा.

सब्र का इम्तिहान वहीं, उत्तर प्रदेश में लोगों का सब्र टूटता जा रहा था और गांव के लोगों ने पुलिस थाने में आग लाग दी थी. इसमें करीब 23 पुलिस कर्मियों की मौत हो गई थी. इस हादसे से निराश होकर गांधी जी ने असहयोग आंदोलन को स्थगित करने का फैसला लिया.

चंद्रशेखर आजाद अब अपनी पढ़ाई – लिखाई को छोड़कर देश की आजादी के काम में जुट गए थे. वहीं, चंद्रशेखर के पिता की जल्दी ही मृत्यु हो गई थी. इसके बावजूद वह अपनी अकेली मां के हाल चल भी नहीं पूछते थे. इसके साथ ही 9 अगस्त 1925 को क्रांतिकारियों ने एक निर्भीक डकैती को अंजाम दिया. इसमें बिस्मिल, अशफाक उल्लाह खान और आजाद समेत करीब 10 क्रांतिकारी शामिल थे.

वहीं, एक बार इलाहाबाद में पुलिस ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया था और गोलियां चलाना शुरु कर दी थी. दोनों तरफ से फायरिंग की जा रही थी. चंद्रशेखर ने अपनी जिंदगी में कसम खाई हुई थी कि वह कभी भी जिंदा पुलिस के हाथ नहीं लगेंगे. इसलिए उन्होंने उस समय खुद ही को गोली मार दी थी.

दरवाजे पर टकटकी लगाए इंतजार करती रही मां चंद्रशेखर आजाद की मां हमेशा ही उनके वापस आने का इंतजार करती रही. शायद यह वजह थी कि उन्होंने अपनी दो उंगलियां बांध ली थी और ये प्रण लिया था कि वो इसे तब तक नहीं खोलेंगी जब तक की चंद्रशेखर वापस नहीं आ जाते. लेकिन अफसोस उनकी दो उंगलियां बंधी ही रह गई और चंद्रशेखर ने अपनी आखिरी सांस धरती मां को समृपित कर दी.

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निधन से पहले शीला दीक्षित ने लिखा था सोनिया गांधी को चौंकाने वाला खत

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नई दिल्ली। दिल्ली में बतौर मुख्यमंत्री 15 साल तक लगातार एकछत्र राज करने वालीं शीला दीक्षित के निधन के तीन दिन बाद भी दिल्ली कांग्रेस में चल रही गुटबाजी पर विराम नहीं लगा है. मरहूम शीला दीक्षित गुट के लोगों का कहना है कि उन्होंने अपनी मौत से तीन दिन पहले यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी के नाम एक पत्र लिखा था. सूत्रों का कहना है कि शीला ने अपने पत्र में दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के वर्तमान हालात और गुटबाजी के बारे में खुलकर लिखा था. हालांकि, इस पत्र के बारे में आधिकारिक तौर पर कोई पुष्टि नहीं हो रही है.

सूत्रों के मुताबिक, सोनिया गांधी को लिखे इस खत में शीला दीक्षित ने राज्य प्रभारी पीसी चाको के साथ चल रहे सियासी टकराव का जिक्र किया था. शीला ने पार्टी के एक बड़े नेता को इन सबका जिम्मेदार बताया था.

शीला दीक्षित ने अपने आखिरी खत में लिखा था- ‘मैं दिल्ली कांग्रेस को मजबूत करने के लिए फैसले ले रही हूं, लेकिन …. नेता के इशारे पर चलकर प्रभारी पीसी चाको बेवजह कदम उठा रहे हैं.

शीला दीक्षित ने लिखा है- ‘जानबूझकर मेरे फैसलों में अड़ंगा लगाया जा रहा है…. आखिर में नतीजे बताते हैं कि कैसे तीसरे नंबर की कांग्रेस बिना गठजोड़ के दो नंबर पर आ गई.’

शीला दीक्षित ने यूपीए की अध्यक्ष सोनिया गांधी को यह पत्र 8 जुलाई को लिखा था. इसके बाद मामले को सुलझाने के लिए सोनिया गांधी के करीब नेताओं ने शीला दीक्षित, अजय माकन और पीसी चाकों से मुलाकात की थी. इस मुलाकात के बाद मामले को हल करने का आश्वासन दिया था.

गौरतलब है कि शीला दीक्षित सबसे ज्यादा तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं. 1998 से 2013 तक उन्होंने दिल्ली का शासन संभाला. उन्हें दिल्ली को आधुनिक बनाने का श्रेय दिया जाता है. बीते दिनों उन्हें दिल्ली कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया था.

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कर्नाटक: फ्लोर टेस्ट की नई डेडलाइन

कर्नाटक में जारी सियासी संकट में रोजाना नया ट्विस्ट देखने को मिल रहा है. राज्यपाल द्वारा सदन में विश्वास मत के लिए दी गई दो डेडलाइन की समयसीमा खत्म हो चुकी है. ऐसे में माना जा रहा था कि सोमवार को सदन में विश्वास मत पर वोटिंग हो जाएगी लेकिन एक बार फिर सदन मंगलवार तक के लिए स्थगित कर दी गई. स्पीकर ने वोटिंग के लिए आज शाम छह बजे की डेडलाइन रखी है. अब यह देखना होगा कि आज भी वोटिंग हो पाती है या नहीं. इसी बीच बागी विधायकों ने स्पीकर से मिलने के लिए और समय मांगा है.

कर्नाटक के 13 बागी विधायकों को स्पीकर केआर रमेश कुमार ने पत्र लिखकर 11 बजे तक मिलने के लिए बुलाया था. जिसके बाद विधायकों ने स्पीकर को पत्र लिखकर बंगलूरू विधान सौधा में उनके सामने पेश होने के लिए ज्यादा समय की मांग की है. उनका कहना है कि उन्हें चार हफ्ते का समय दिया जाए.

कर्नाटक विधानसभा की कार्यवाही मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी द्वारा पेश विश्वास प्रस्ताव पर तीन दिन तक चर्चा के बाद भी इस पर मतविभाजन कराए बिना मंगलवार तक के लिए स्थगित कर दी गई. देर रात 11 बजकर 45 मिनट पर कर्नाटक विधानसभा की कार्यवाही को मंगलवार सुबह तक के लिए स्थगित कर दिया गया. स्पीकर ने कहा है कि शक्ति परीक्षण की प्रक्रिया मंगलवार शाम छह बजे तक पूरी हो जाएगी.

उच्चतम न्यायालय कर्नाटक के दो निर्दलीय विधायकों की उस नयी याचिका पर आज सुनवाई करेगा, जिसमें मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी द्वारा पेश विश्वास प्रस्ताव पर राज्य विधानसभा में तत्काल शक्ति परीक्षण कराने की मांग की गई है.प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति अनिरूद्ध बोस की पीठ ने निर्दलीय विधायक-आर शंकर और एच नागेश की याचिका पर सोमवार को सुनवाई करने से मना कर दिया.

कर्नाटक के स्पीकर ने अपने ऊपर लगे उस आरोप का जवाब दिया जिसमें कहा जा रहा था कि वह जानबूझकर सत्ताधारी पार्टियं को बहुमत साबित करने के लिए समय दे रहे हैं. उन्होंने कहा, ‘मैं उन्हें धन्यवाद कहना चाहता हूं. मैं प्रार्थना करता हूं कि भगवान उन्हें सदबुद्धि दे.’ बागी विधायकों ने स्पीकर से पेश होने के लिए चार हफ्तों का समय मांगा है जिसपर उन्होंने कहा, ‘यह सब अदालती कार्यवाही से संबंधित है. इसे अदालत में निपटाया जाएगा.’

भाजपा की सोभा करंदलजे ने कहा, ‘उनके पास बहुमत नहीं है. वह अल्पमत वाली सरकार है. विधायक मुंबई में हैं. वह वापस नहीं आना चाहते. देखते हैं शाम तक क्या होता है. पूरा विश्वास है कि यह सरकार निश्चित तौर पर चली जाएगी. यह लोगों की सरकार नहीं है. लोग नाराज हैं, विधायक नाराज हैं.’

भाजपा नेता जे शेट्टार ने कहा, ‘यह इस सरकार का आखिरी दिन है. हमारा मानना था कि कल इस सरकार का आखिरी दिन होगा लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी और अन्य लोगों के बीच मिलापी कुश्ती के कारण उन्होंने इसे एक दिन के लिए बढ़ा दिया. हम देखेंगे कि क्या होता है और यदि वोटिंग होती है तो सरकार निश्चित तौर पर गिर जाएगी.’

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चंद्रयान-2 लॉन्चिंग: मिशन के वो 15 सबसे मुश्किल मिनट जब धड़कनें थम जाएंगी

नई दिल्ली। भारत के महत्वाकांक्षी मिशन चंद्रयान-2 की कुछ घंटों में लॉन्चिंग होनी है. इस बेहद कठिन मिशन को लक्ष्य तक पहुंचाना किसी करिश्मे से कम नहीं होगा. श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से लॉन्चिंग के बाद मिशन को चांद तक पहुंचने में 40 दिन से ज्यादा का समय लगने वाला है. इस मिशन के सबसे तनावपूर्ण क्षण चांद पर लैंडिंग से पहले के 15 मिनट होंगे. खुद भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो के चीफ के सिवन ने कहा है कि लैंडिंग के अंतिम 15 मिनट बेहद चुनौतीपूर्ण रहेंगे क्योंकि उस दौरान हम ऐसा कुछ करेंगे जिसे हमने अभी तक कभी नहीं किया है. याद हो कि 15 जुलाई को क्रायोजेनिक इंजन में लीकेज के कारण चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग अंतिम क्षणों में टालनी पड़ी थी.

सिवन ने कहा, ‘चंद्रमा की सतह से 30 किलोमीटर दूर चंद्रयान-2 की लैंडिंग के लिए इसकी स्पीड कम की जाएगी. विक्रम को चांद की सतह पर उतारने का काम काफी मुश्किल होगा. इस दौरान का 15 मिनट काफी चुनौतीपूर्ण होने वाला है. हम पहली बार सॉफ्ट लैंडिंग की करेंगे. यह तनाव का क्षण केवल इसरो ही नहीं बल्कि सभी भारतीयों के लिए होगा.’ सॉफ्ट लैंडिंग में सफलता मिलते ही भारत ऐसा करने वाला दुनिया का चौथा देश बन जाएगा. अभी तक अमेरिका, रूस और चीन के पास ही यह विशेषज्ञता है.

चांद की सतह को छूने से पहले क्या होगा? धरती और चंद्रमा के बीच की दूरी लगभग 3 लाख 84 हजार किलोमीटर है. लॉन्चिंग के बाद चंद्रमा के लिए लंबी यात्रा शुरू होगी. चंद्रयान-2 में लैंडर-विक्रम और रोवर-प्रज्ञान चंद्रमा तक जाएंगे. चांद की सतह पर उतरने के 4 दिन पहले रोवर ‘विक्रम’ उतरने वाली जगह का मुआयना करना शुरू करेगा. लैंडर यान से डिबूस्ट होगा. ‘विक्रम’ सतह के और नजदीक पहुंचेगा. उतरने वाली जगह की स्कैनिंग शुरू हो जाएगी और फिर 6-8 सितंबर के बीच शुरू होगी लैंडिंग की प्रक्रिया. लैंडिंग के बाद लैंडर (विक्रम) का दरवाजा खुलेगा और वह रोवर (प्रज्ञान) को रिलीज करेगा. रोवर के निकलने में करीब 4 घंटे का समय लगेगा. फिर यह वैज्ञानिक परीक्षणों के लिए चांद की सतह पर निकल जाएगा. इसके 15 मिनट के अंदर ही इसरो को लैंडिंग की तस्वीरें मिलनी शुरू हो जाएंगी.

देशी तकनीक से निर्मित चंद्रयान-2 में कुल 13 पेलोड हैं. आठ ऑर्बिटर में, तीन पेलोड लैंडर ‘विक्रम’ और दो पेलोड रोवर ‘प्रज्ञान’ में हैं. पांच पेलोड भारत के, तीन यूरोप, दो अमेरिका और एक बुल्गारिया के हैं. लॉन्चिंग के करीब 16 मिनट बाद जीएसएलवी-एमके तृतीय चंद्रयान-2 को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करेगा. लैंडर ‘विक्रम’ का नाम भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम ए साराभाई के नाम पर रखा गया है. दूसरी ओर, 27 किलोग्राम ‘प्रज्ञान’ का मतलब ‘बुद्धिमता’ है. इसरो चंद्रयान-2 को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतारेगा.

‘बाहुबली’ जीएसएलवी मार्क-… से होगी लॉन्चिंग 4 टन तक का भार (पेलोड) ले जाने की अपनी क्षमता के कारण ‘बाहुबली’ कहे जा रहे जीएसएलवी मार्क-… रॉकेट ने जीसैट-29 और जीसैट-19 उपग्रहों का सफल प्रक्षेपण किया है. अंतरिक्ष एजेंसी ने इसी रॉकेट का इस्तेमाल करते हुए क्रू मॉड्यूल वायुमंडलीय पुन: प्रवेश परीक्षण (केयर) को सफलतापूर्वक अंजाम दिया था. इसरो के प्रमुख के सिवन के मुताबिक, अंतरिक्ष एजेंसी दिसंबर 2021 के लिए निर्धारित अपने मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम ‘गगनयान’ के लिए भी जीएसएलवी मार्क-… रॉकेट का ही प्रयोग करेगी.

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