लोकसभा और राज्यसभा टीवी का संसद टीवी बनना

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लोकसभा और राज्यसभा के अलग-अलग चैनलों को मिलाकर एक संसद टीवी (Sansad Telivision) बनाने का फैसला सैद्धांतिक और धारणात्मक स्तर पर सही है। असलियत ये है कि सन् 2005-06 के दौरान संसद के दोनों सदनों के माननीय सभापति और स्पीकर की आपसी चर्चा में ‘संसद टेलीविजन नेटवर्क’ नाम से भारतीय संसद का अलग टीवी चैनल शुरू करने का विचार सामने आया था। संसद टीवी नेटवर्क का बुनियादी विचार तत्कालीन लोकसभाध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी का था। इस विचार पर माननीय स्पीकर और माननीय सभापति के बीच शुरुआती सहमति बनी थी। उस वक़्त राज्यसभा के सभापति भैरो सिंह शेखावत थे।
 उन दिनों दैनिक ‘हिन्दुस्तान’ के एक पत्रकार के रूप में मैं राज्यसभा की कार्यवाही और अन्य संसदीय मामलों को ‘कवर’ करता था। यदा-कदा दोनों सदनों के पीठासीन प्रमुखों के अलावा उनके कार्यालय से सम्बद्ध उच्चाधिकारियों से मुलाकात होती रहती थी। जहां तक हमारी जानकारी है, उन दिनों ये सोचा गया था कि दोनो सदनों की कार्यवाही अलग-अलग फ्रिक्वेंसी पर प्रसारित होगी और चर्चा व विमर्श के अन्य कार्यक्रम साझा होंगे। लेकिन कुछ समय बाद राज्यसभा की तरफ से उक्त प्रस्ताव को लेकर कुछ समस्या आने लगी। समस्या बढ़ती गयी, जिसमें राजनीति का पहलू अहम् था। फिर एक दिन संसद टीवी नेटवर्क का वह प्रस्ताव धराशायी हो गया। तब स्पीकर सोमनाथ चटर्जी ने लोकसभा टीवी शुरू करने के प्रस्ताव को हरी झंडी दिखा दी और सदन की जीपीसी से चर्चा के बाद चैनल लांच करने का फैसला हुआ। इस तरह सन् 2006 में लोकसभा टीवी शुरू हो गया।
 राज्यसभा का अलग चैनल लांच करने के फैसले का ऐलान 2010 मे हुआ और 2011 में वह ‘लांच’ हो गया। बेहतर रहता अगर लोकसभा के पहले से चल रहे चैनल और राज्यसभा की नयी पहल को मिलाकर संसद टेलीविजन नेटवर्क नाम से दोनो सदनों का साझा चैनल ‘रिलांच’ होता! पर ऐसा संभव नहीं हुआ। संभवतः इसके लिए ठीक से पहल नहीं हो पाई। इसलिए आज संसद टेलीविजन नेटवर्क नाम से अगर एकीकृत टीवी का पुनर्गठन किया गया है तो यह धारणा और विचार के स्तर पर सही कदम है।
दुनिया के अनेक विकसित लोकतांत्रिक देशों की संसद के पास तो अपने स्वतंत्र टीवी नेटवर्क तक नही हैं। ज्यादातर मुल्कों की संसद की कार्यवाही वहां के लोक प्रसारक (पब्लिक ब्राडकास्टर) ही प्रसारित करते हैं। भारत की संसद का अपना टीवी नेटवर्क है तो यह महत्वपूर्ण बात है पर दोनों सदनों के दो अलग-अलग चैनल रहें, इसे धारणा और व्यावहारिकता के स्तर पर जायज नहीं ठहराया जा सकता।
अब आते हैं, दोनों चैनलों पर। लोकसभा टीवी पहले से जारी था और राज्यसभा चैनल उस के चार-पांच साल बाद शुरू हुआ। पर कम समय में ही वह ज्यादा लोकप्रिय होता गया। उसके कार्यक्रमों की गुणवत्ता ने उसे लोकप्रिय बनाया। बाद के दिनों में वहां भी समस्याएं पैदा होने लगी थीं और उसका असर कंटेंट पर दिखता था। लेकिन अपने कंटेंट और रूप-रंग के स्तर पर वह लोकसभा टीवी के मुकाबले हमेशा बेहतर माना जाता रहा। हालांकि हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि लोकसभा टीवी के भी कुछ वीकली कार्यक्रम बहुत प्रशंसित रहे, जो अब नहीं प्रसारित होते हैं।
 पुनर्गठित संसद टीवी के सामने नयी चुनौती होगी कि वह संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही के लाइव कवरेज़ के अपने बुनियादी दायित्व के अलावा अन्य कार्यक्रमों का संयोजन कैसे करे और गुणवत्ता का स्तर कैसे हासिल करे। हमारे समाज, राजनीति, वैचारिकी और संसदीय लोकतंत्र में निहित स्वतंत्रता, सहिष्णुता और विविधता जैसे मूल्यों की रोशनी में अपने कार्यक्रमों को कैसे आकार दे। इन मूल्यों को कैसे अभिव्यक्ति दे! आज के राजनीतिक माहौल में यह बहुत चुनौतीपूर्ण काम होगा। एक संसदीय टीवी नेटवर्क को किसी सरकार या किसी एक राजनीतिक शक्ति का मंच नही होना चाहिए। उसे भारतीय संसद यानी जनता और राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाली लोकतांत्रिकता का प्रतिनिधित्व करना चाहिए, ऐसी लोकतांत्रिकता जिसमें स्वतंत्रता, सहिष्णुता और विचारों की विविधता के तमाम खूबसूरत रंग शामिल हों!

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