बेगमपुरा बनाम रामराज्य 

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डॉ. आंबेडकर ने अपनी किताब ‘प्राचीन भारत में क्रांति और प्रतिक्रांति’ में भारत के इतिहास को क्रांतियों और प्रतिक्रांतियों के इतिहास के रूप में चिन्हित किया है। वे बहुजन-श्रमण परंपरा को क्रांतिकारी परंपरा के रूप में रेखांकित करते हैं,  जिसके केंद्र में बौद्ध परंपरा रही है। वे वैदिक परंपरा को प्रतिक्रांतिकारी परंपरा के तौर  चिन्हित करते हैं। वे सनातन, ब्राह्मणवादी और हिंदू परंपरा को बदलते समय के साथ वैदिक परंपरा के पर्याय के रूप में इस्तेमाल किए जाने वाले शब्द के रूप में देखते हैं, हालांकि सबका मुख्य तत्व एक है- वर्णाश्रम व्यवस्था का गुणगान और ब्राह्मणों की सर्वश्रेष्ठता का दावा। इसके विपरीत बहुजन-श्रमण पंरपरा है, जो वर्ण-जाति व्यवस्था को खारिज करती रही है और ब्राह्मणों की सर्वश्रेष्ठता के दावे को पूरी तरह नकारती रही है और सभी इंसान को समान दर्जा देने की हिमायती रही है। वैदिक और बहुजन-श्रमण परंपरा के बीच, प्राचीन काल में शुरू हुआ संघर्ष किसी न किसी रूप में आज भी जारी रहा। हिंदी पट्टी में मध्यकाल में यह संघर्ष बहुजन संत कवियों की निर्गुण धारा और द्विज भक्त कवियों की सगुण धारा के रूप में सामने आया। हिंदी भाषा-भाषी समाज में बहुजन निर्गुण संत कवियों की धारा के प्रतिनिधि कवि रैदास और कबीर हैं, तो सगुण भक्त कवियों के प्रतिनिधि कवि तुलसीदास और सूरदास हैं, विशेष तौर पर रामचरित मानस के  रचयिता तुलसीदास।

सिर्फ जन्म के आधार ब्राह्मणों की श्रेष्ठता का दावा वैदिक परंपरा का केंद्रीय तत्व है, जिसकी अभिव्यक्ति तुलसदीस इन शब्दों में करते हैं-

  पूजहिं विप्र सकल गुणहीना,
  सूद्र न पूजहिं ज्ञान प्रवीना

(रामचरित मानस)

इसके विपरीत गुण-कर्म आधारित श्रेष्ठता बहुजन-श्रमण परंपरा का केंद्रीय तत्व है, जिसकी अभिव्यक्ति रैदास इन शब्दों में करते हैं-

  रैदास बाभन मत पूजिए जो होवे गुनहीन,
  पूजिए चरन चंडाल के जो हो गुन परवीन।

 (संत रैदास)   

वैदिक परंपरा परजीवी मूल्यों की वाहक रही है और जबकि बहुजन-श्रमण पंरपरा श्रम को एक श्रेष्ठ मूल्य के रूप में स्वीकार करती है। यही कारण है कि द्विज जातियां दलित-बहुजनों के श्रम पर पलती रही हैं, और इस परजीवीपन पर अभिमान करती रही हैं और इसके आधार पर अपनी श्रेष्ठता का दावा करती रही हैं। उनकी नजर में जो व्यक्ति श्रम से जितना ही दूर है, वह उतना ही श्रेष्ठ है और जो सबसे ज्यादा श्रम करता है, उसे सबसे निम्न कोटि का ठहरा दिया गया। इसके विपरीत   दलित-बहुजन परंपरा श्रम संस्कृति की वाहक रही है। रैदास स्वयं भी श्रम करके जीवन-यापन करते थे और श्रम करके जीने को सबसे बड़ा मूल्य मानते थे। वे घर-बार छोड़कर वन जाने या संन्यास लेने को ढोंग-पाखण्ड कहते थे-

नेक कमाई जउ करइ गृह तजि बन नहिं जाए।

रैदास अभिमानी परजीवी ब्राह्मण की तुलना में श्रमिक को ज्यादा महत्व देते हैं-

धरम करम जाने नहीं, मन मह जाति अभिमान।
ऐ सोउ ब्राह्मण सो भलो रविदास श्रमिकहु जान।।

ब्राह्मणवादी द्विज परंपरा के विपरीत दलित-बहुजन परंपरा के कवि सतगुरु रैदास श्रम की संस्कृति में विश्वास करते हैं। उनका मानना था कि हर व्यक्ति को श्रम करके ही खाने का अधिकार है—

रविदास श्रम कर खाइए, जौ-लौ-पार बसाय।
नेक कमाई जो करई, कबहु न निष्फल जाय।।

बुद्ध की तरह रैदास ने भी ऊंच-नीच अवधारणा और पैमाने को पूरी तरह उलट दिया। वे कहते हैं कि जन्म के आधार पर कोई नीच नहीं होता है, बल्कि वह व्यक्ति नीच होता है, जिसके हृदय में संवेदना और करुणा नहीं है-

दया धर्म जिन्ह में नहीं, हद्य पाप को कीच।
रविदास जिन्हहि जानि हो महा पातकी नीच।।

 उनका मानना है कि व्यक्ति का आदर और सम्मान उसके कर्म के आधार पर करना चाहिए, जन्म के आधार पर कोई पूज्यनीय नहीं होता है। बुद्ध, कबीर, फुले, आंबेडकर और पेरियार की तरह रैदास भी साफ कहते हैं कि कोई ऊंच या नीच अपने मानवीय कर्मों से होता है, जन्म के आधार पर नहीं। वे लिखते हैं —

रैदास जन्म के कारने होत न कोई नीच।
नर कूं नीच कर डारि है, ओछ करम की कीच।।

सतगुरु रैदास का कहना था कि जाति एक ऐसा रोग है, जिसने भारतीयों की मनुष्यता का नाश कर दिया है। जाति इंसान को इंसान नहीं रहने देती। उसे ऊंच-नीच में बांट देती है। एक जाति का आदमी दूसरे जाति के आदमी को अपने ही तरह का इंसान मानने की जगह ऊंच या नीच के रूप में देखता है। बाबासाहब आंबेकर ने भी बाद में इसी बात को दोहराया था। सतगुरु रैदास का कहना है कि जब तक जाति का खात्मा नहीं होता, तब तक लोगों में इंसानियत जन्म नहीं ले सकती।

जात-पात के फेर मह उरझि रहे सब लोग।
मानुषता को खात है, रैदास जात का रोग।।

वे यह भी कहते हैं कि जाति एक ऐसी बाधा है, जो आदमी को आदमी से जुड़ने नहीं देती है। वे कहते हैं एक मनुष्य दूसरे मनुष्य से तब तक नहीं जुड़ सकता, जब तक जाति का खात्मा नहीं हो जाता—

रैदास ना मानुष जुड़ सके, जब लौं जाए न जात।

दलित-बहुजन परंपरा के अन्य कवियों की तरह रैदास भी हिंदू-मुस्लिम के बीच कोई भेद नहीं करते। वे दोनों के पाखण्ड को उजागर करते हैं। वे साफ शब्दों में कहते हैं कि न मुझे मंदिर से कोई मतलब है, न मस्जिद से; क्योंकि दोनों में ईश्वर का वास नहीं है—

मस्जिद सो कुछ घिन नहीं, मन्दिर सो नहीं प्यार।
दोउ अल्ला हरि नहीं, कह रविदास उचार।।

रैदास मंदिर-मस्जिद से अपने को दूर रखते हैं, लेकिन हिंदू-मुस्लिम दोनों से प्रेम करते हैं—

मुसलमान से दोस्ती, हिन्दुवन से कर प्रीत।
रविदास ज्योति सभ हरि की, सभ हैं अपने मीत।।

रैदास बार-बार इस बात पर जोर देते हैं कि हिंदुओं और मुसलमानों में कोई भेद नहीं है। जिन तत्त्वों से हिंदू बने हैं, उन्हीं तत्त्वों से मुसलमान। दोनों के जन्म का तरीका भी एक ही है –

हिन्दू तुरुक महि नाहि कछु भेदा दुई आयो इक द्वार।
प्राण पिण्ड लौह मास एकहि रविदास विचार।।

दलित-बहुजन परंपरा के अन्य कवियों की तरह संत रैदास के मन में भी अपनी जाति और पेशे को लेकर कोई हीनताबोध का भाव नहीं है। वे यह कहते हैं —

ऐसी मेरी जाति विख्यात चमार।

तुलसी के वर्णाश्रम आधारित रामराज्य के विपरीत रैदास बेगमपुरा के रूप में एक ऐसे समाज की कल्पना करते हैं, जिसे बाद में जोतीराव फुले के आदर्श बलि राज, डॉ. आंबेडकर के आदर्श समाज की कल्पना और मार्क्स के समाजवादी समाज की कल्पना दोहराती दिखती है-

बेगमपुरा सहर को नाउ, दुखु-अंदोहु नहीं तिहि ठाउ।
ना तसवीस खिराजु न मालु, खउफुन खता न तरसु जुवालु।।

अब मोहि खूब बतन गह पाई, ऊहां खैरि सदा मेरे भाई।
काइमु-दाइमु सदा पातिसाही, दोम न सोम एक सो आही।।

आबादानु सदा मसहूर, ऊहाँ गनी बसहि मामूर।
तिउ तिउ सैल करहिजिउ भावै, महरम महल न को अटकावै।

कह रविदासखलास चमारा, जो हम सहरी सु मीतु हमारा।
बेगमपुरा सहर को नाउ, दुखु-अंदोहु नहीं तिहि ठाउ।

ना तसवीस खिराजु न मालु, खउफुन खता न तरसु जुवालु।
अब मोहि खूब बतन गह पाई, ऊहां खैरि सदा मेरे भाई।

काइमु-दाइमु सदा पातिसाही, दोम न सोम एक सो आही।
आबादानु सदा मसहूर, ऊहाँ गनी बसहि मामूर।

तिउ तिउ सैल करहिजिउ भावै, महरम महल न को अटकावै।
कह रविदासखलास चमारा, जो हम सहरी सु मीतु हमारा।

इस पद में संत रैदास ने अपने समय की व्यवस्था से मुक्ति की तलाश करते हुए जिस दुखविहीन समाज की कल्पना की है; उसी का नाम ‘बेगमपुरा’ या बेगमपुर शहर है। रैदास साहेब इस पद के द्वारा बताना चाहते हैं कि उनका आदर्श देश बेगमपुर है; जिसमें ऊंच-नीच, अमीर-गरीब और छूतछात का भेद नहीं है। जहां कोई टैक्स देना नहीं पड़ता है; जहां कोई संपत्ति का मालिक नहीं है। कोई अन्याय, कोई चिंता, कोई आतंक और कोई यातना नहीं है। रैदास अपने शिष्यों से कहते हैं- ‘ऐ मेरे भाइयो! मैंने ऐसा घर खोज लिया है यानी उस व्यवस्था को पा लिया है, जो हालांकि अभी दूर है; पर उसमें सब कुछ न्यायोचित है। उसमें कोई भी दूसरे–तीसरे दर्जे का नागरिक नहीं है; बल्कि सब एक समान हैं। वह देश सदा आबाद रहता है। वहां लोग अपनी इच्छा से जहां चाहें जाते हैं। जो चाहे कर्म (व्यवसाय) करते हैं। उन पर जाति, धर्म या रंग के आधार पर कोई प्रतिबंध नहीं है। उस देश में महल (सामंत) किसी के भी विकास में बाधा नहीं डालते हैं। रैदास चमार कहते हैं कि जो भी हमारे इस बेगमपुरा के विचार का समर्थक है, वही हमारा मित्र है।’

रैदास के बेगमपुरा के विपरीत तुसलीदास के रामराज्य की परिकल्पना वर्णाश्रम धर्म यानि वर्ण-जाति व्यवस्था पर आधारित है। राम-राज्य का सबसे बड़ा लक्षण बताते हुए तुलसीदास लिखते हैं कि राम-राज्य में सभी लोग अपने वर्णाश्रम धर्म का पालन करते हुए वेदों के दिखाए रास्ते पर चलते हैं-

वर्णाश्रम निज निज धरम निरत वेद पथ लोग।
चलहिं सदा पावहिं सुखद नहिं भय शोक न रोग।।

रामराज्य में वर्णाश्रण व्यवस्था को कोई उल्लंघन नहीं कर सकता है।हम सभी जानते हैं कि वर्णाश्रण धर्म के पालन का मतलब है कि शूद्र द्विजों की सेवा करें और महिलाएं पुरुषों की सेवा करें। उत्पादन और सेवा के सारे कार्य गैर-द्विज शूद्र-अतिशूद्र करें। वर्ण-धर्म का पालन ही राम-राज्य है।

तुलसीदास कहते हैं कि राम राज्य के आदर्श राजा राम का जन्म ही ब्राह्मणों और गाय के हितों के लिए हुआ है-

विप्र, धेनु, सुर, संत हित लीन्ह मनुज अवतार।
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार।।”   

इतना ही नहीं ऐसा उल्लिखित है कि रामराज्य के आदर्श राजा राम स्वयं ही घोषणा करते हैं कि उन्हें द्विज (सवर्ण) सबसे प्रिय हैं-

सब मम प्रिय सब मम उपजाए।
सब ते अधिक मनुज मोहि भाए॥

तिन्ह महँ द्विज द्विज महँ श्रुतिधारी
तिन्ह महुँ निगम धरम अनुसारी॥

इतना ही नहीं, तुसलीदास शूद्रों-अतिशूद्रों की समता की मांग को कलयुग एक बड़ा लक्षण बताते हुए कहते हैं कि कलयुग में शूद्र द्विजों (सवर्णों) से कहते हैं कि हम तुमसे कम नहीं है और जो ब्राह्मण ब्रह्म ज्ञानी हैं; उनको शूद्र आंख तरेरते हुए डाटते हैं –

बादहिं सृद्र द्विजन्ह सन, हम तुम्ह ते कछु घाटि।
जानइ ब्रह्म सो विप्रवर, आँखि देखावहिं डाटि।

तुलसी के आदर्श रामराज्य के राजा राम उन्हीं शूद्रों-अतिशूद्रों ( पिछड़े-दलितों) को गले लगाते हैं, जो  खुद को उनके दास या सेवक के रूप में प्रस्तुत करते हैं। तुलसी के राम स्वयं कहते हैं कि शूद्र (नीच प्राणी) तभी मुझे प्रिय हो सकता है, जब वह उनका दास बन जाए और उनका भक्त बन जाए। राम साफ शब्दों में कहते हैं कि —

भगतिवंत अति नीचउ प्रानी।
मोहि प्रानप्रिय असि मम बानी॥

संत रैदास के उलट तुलसी के राम चरित मानस और राम का चरित्र पूरी तरह द्विजों और मर्दों के वर्चस्व की स्थापना करने वाला है। सच तो यह है कि राम के चरित्र का गुणगान करने वाला रामचरित मानस मनु-स्मृति और पुराणों की कलात्मक अभिव्यक्ति है। राम के चरित्र को न्याय का प्रतीक बताकर और रामचरित मानस को प्रगतिशील साहित्य घोषित कर रामविलास शर्मा, शिवकुमार मिश्र, विश्वनाथ त्रिपाठी और नामवर सिंह जैसे वामपंथी आलोचकों ने भी उत्तर भारत में द्विज पुरुषों के सांस्कृतिक वर्चस्व की परंपरा को और मजबूत बनाया। अनेक अन्य हिंदी लेखकों ने भी अपने सृजनात्मक साहित्य के माध्यम से यही किया। ऐसा करके उन्होंने हिंदी समाज के वर्ण-जातिवादी और पितृसत्तात्मक चरित्र को मजबूत बनाया। इसके बरक्स बहुजन परंपरा के आलोचकों चंद्रिका प्रसाद ‘जिज्ञासु’, कंवल भारती और डॉ. धर्मवीर जैसे बहुजन आलोचकों  ने संत रैदास को बहुजन-श्रमण परंपरा के शीर्ष कवि के रूप में स्थापित किया और भारत की क्रांतिकारी बहुजन-श्रमण परंपरा को स्थापित करने की कोशिश किया।

 न्याय, समता, बंधुता और समृद्धि के समान बंटवारे पर आधारित प्रबुद्ध भारत का निर्माण रैदास के बेगमपुरा का निर्माण करके किया जा सकता है, रामराज्य की स्थापना करके नहीं।

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