भारत में पहली बार नाटक ओलंपिक का आयोजन

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नई दिल्ली। जिस प्रकार खेलों में भारत अपनी मेजबानी को लेकर अपना सिक्का जमाता रहा है उसी तरह भारत अब थियेटर में भी छाप छोड़ने को तैयार है. विश्व रंगमंच के सबसे लोकप्रिय उत्सव थियेटर ओलंपिक की मेजबानी इस वर्ष भारत द्वारा की जायेगी. यह विश्व का आठवां थिएटर ओलंपिक होगा जिसका उद्धाटन दिल्ली में किया जायेगा. भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) में 17 फरवरी 2018 को इसका शुभारंभ होगा.

पर्यटन एवं संस्कृति राज्य मंत्री महेश शर्मा ने बुधवार को राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में प्रेस कांफ्रेंस के दौरान इसकी घोषणा की. संस्कृति मंत्री ने कहा कि किसी शहर या समाज की पहचान पत्थर की दीवारें नहीं बल्कि वहां की संस्कृति और विरासत है. हम विश्व पटल पर करोड़ों डॉलर के खजाने की नहीं बल्कि अपनी संस्कृति की करते हैं. प्रधानमंत्री का सपना है कि भारत का पर्यटन संस्कृति किस तरह से भारत को नई ऊंचाइयों तक ले जाए.

तीन साल पहले आठवें थियेटर ओलंपिक के लिए आवेदन किया गया था जिसे स्वीकार कर लिया गया है जिसके लिए सरकार पूरी तरह तैयार है. इसे हम अन्य शहरों और गांवों तक ले जाएंगे. सरकार ने कल्चरल मैपिंग आफ इंडिया शुरू की है. इसके तहत देश के 6 लाख 20 हजार गावों के कलाकारों का डेटा सरकार के पास होगा. हमें उम्मीद है कि दिल्ली में इसका उद्घाटन प्रधानमंत्री करेंगे और इसका समापन मुंबई में राष्ट्रपति करेंगे.

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय सोसाइटी के चेयरमैन रतन थियम ने कहा कि इस ओलंपिक का सूत्र वाक्य मित्रता का ध्वज होगा. नाटक के पहले प्रयोग से ही मित्र एवं ध्वज का अद्भुत संयोग है. बता दें की इस ओलंपिक में चीन, जापान, रूस, तुर्की, दक्षिण कोरिया सहित तमाम देश इसमें हिस्सा ले रहे हैं. यह थिएटर ओलंपिक 17 फरवरी से 8 अप्रैल तक होगा.

     

2020 में बाबासाहेब को श्रद्धांजलि देने का वक्त

Baba Saheb Ambedkar

पांच साल… आसान नहीं होता है किसी मैगजीन को पांच साल तक निकालते रहना. मेरे लिए भी आसान नहीं रहा है. मैंने जोश में ही शुरू कर दिया था. असल में आंदोलन नया-नया समझ में आया था, सोचा था कि मैगजीन निकालने के लिए बस लिखना भर ही तो पड़ता है, पत्रकार हूं सो यह यकीन था कि लिख लूंगा.

लेकिन जब शुरू कर दिया तब जाकर पता चला कि बाप रे…. लिखना तो सबसे छोटा काम है, उससे बड़ी चुनौती तो दूसरी चीजों की है. यहां तो पोस्टिंग भी खुद ही करनी पर रही थी, टिकट भी खुद ही चिपकाना था, और सबसे बड़ा काम था हर महीने हजारों रुपये जुटाने का. बाकी सारे काम मैं ज्यादा मेहनत कर के कर लेता था लेकिन जब पैसे जुटाने की बात आती थी तो समझ में ही नहीं आता था कि वो कैसे किया जाए. मैं माथा पकड़ के बैठ जाता था.

तब मैं उम्र के जिस दौर में था, उस उम्र में जोश ज्यादा होता है… समझदारी कम. लेकिन ये अच्छी बात रही क्योंकि अगर मैं समझदार रहता तो शायद दलित दस्तक शुरू न करता. आज मैं खुश हूं कि मैं तब नासमझ था. और मैं पूरी जिंदगी नासमझ रहना चाहता हूं.

लेकिन इन पांच सालों में जो भी हो पाया, कोई तभी कर पाता है, जब पीछे कुछ लोग खड़े होते हैं. जैसे बच्चा जब पहली बार चलने के लिए उठ कर खड़ा होता है तो वह चलने की हिम्मत इसलिए कर पाता है क्योंकि पीछे उसका पिता खड़ा होता है. जब मैंने शुरू किया तो मुझे भी पता था कि मेरे पीछे कोई खड़ा है, लड़खड़ा गया तो वो गिरने नहीं देंगे. मेरा यकीन सही साबित हुआ, उन्होंने मुझे गिरने नहीं दिया. मैं कई बार लड़खड़ाया कभी आनंद सर ने थामा, कभी विवेक सर ने, कभी देवमणि जी ने थामा, कभी आर.के देव सर ने, कभी आदर्श सर ने थामा तो कभी राकेश पटेल और ओमप्रकाश राजभर जी ने. कभी संकोचवश इनसे नहीं कह पाया तो फेसबुक पर लिख दिया, आप पाठकों ने आगे बढ़कर मदद की. आज जब मैं यहां खड़ा हूं तो आप सबकी वजह से ही यहां खड़ा हूं.

मैंने चौथी मंजिल के अपने दो कमरों के मकान से इसे शुरू किया था. तब दलित दस्तक के पास अपना कोई ऑफिस तक नहीं था. तीन साल तक किताबों के बीच सोया हूं और किताबों से निकाला भी इसी समाज ने. आदर्श सर और आर.के देव सर ने मिलकर एक साल तक ऑफिस का किराया दिया, मेरठ के देवमणि जी ने फर्नीचर दिया, देहरादून के अनिल जी और हरिदास जी ने शीशे का दरवाजा लगाया और इस तरह दलित दस्तक का पहला ऑफिस खुला.

मेरे पास जर्नलिज्म के अलावा कुछ नहीं है. मुझे बस काम करना आता है. मेरे पास पैसे नहीं है. हां, मेरे पास ओ.पी. राजभर, राकेश पटेल, रवि भूषण, पूजा और देवेन्द्र जैसे दोस्त हैं. मेरे पास आर.के. देव, राजकुमार और संजीव कुमार और पटना के वीरेन्द्र जी जैसे बड़े भाई हैं. अनिल, प्रवीण, नांगिया साहब, पटना के सुशील जी, जगदीश गौतम और गजेन्द्र जैसे साथी हैं. विवेक सर, आनंद सर, आदर्श सर, शांति स्वरूप बौद्ध सर, जैसे गार्जियन हैं. हमने जब दलित दस्तक शुरू किया था तो मेरे पास सिर्फ 50 हजार रुपये थे. उन पचास हजार रुपयों से ही हमने पांच साल का अपना सफर तय किया है.

आज जब हम वेब चैनल लेकर आए हैं तो आप ये मत समझिएगा कि हमारे पास बहुत ज्यादा पैसे आ गए हैं. घरवालों और दोस्तों की मदद से कुछ लाख रुपये इकट्ठा कर के हमने इसमें भी हाथ डाल दिया है, औऱ मुझे उम्मीद है कि जिस तरह 50 हजार में दलित दस्तक ने पांच साल पूरे कर लिए हैं, उसी तरह दलित दस्तक का वेब चैनल भी लंबा सफर तय करेगा.

इन पांच सालों में दलित दस्तक के पास पैसे नहीं आए. हमने आपको जोड़ा है. दलित दस्तक आप सबका है. मैं बस माध्यम हूं. मैं जिस मोटर साईकिल पर घूमता हूं वो मेरे बड़े भाई ने मुझे दी थी, जिस कार पर घूमता हूं लखनऊ से ओ.पी. राजभर जी ने भेज दी, बोले कि ये धूप और बारिश से बचाएगी. किसी ने बैठने की कुर्सी भेजी तो कोई ऑफिस आकर काम करने के लिए कंप्यूटर दे गया. इस तरह दलित दस्तक के दफ्तर में एक छोटी सी दुनिया है, जिसमें दिल्ली भी है, यूपी भी है, बिहार भी है और उत्तराखंड की भी महक है. इसमें पंजाब और महाराष्ट्रा भी है. और आप सबके बूते ही हम इन पांच सालों में 4 हजार के गांधी शांति प्रतिष्ठान से निकलकर 45 हजार के मावलंकर हॉल में बैठ पाएं. मैं किसी को नहीं भूला.

मैं अपने सभी साथियों का आभार व्यक्त करना चाहूंगा जिन्होंने कार्यक्रम को सफल बनाने में अपना योगदान दिया. साथी अनिल कुमार, गौतम जी, गजेन्द्र, रमेश, अंकुर, वीरेन्द्र, राहुल जी औऱ पूजा और मानवेन्द्र ही थे, जिन्होंने इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए रात दिन एक कर दिया. आप सब के साथ होने से यह सफर आसान हो गया है. आप सबका धन्यवाद दोस्तों.

पांच साल का वक्त किसी को परखने के लिए काफी होता है. पांच साल में तो सरकारों का रिजल्ट निकल जाता है. अब ये आप तय करिए कि हम कहां हैं. एक कहावत है कि जब कोई व्यक्ति अपने पैर पीछे खिंचता है, गिव अप करता है तो तो यह उसके अकेले की विफलता नहीं होती. यह उन तमाम लोगों की हार होती है जो उस व्यक्ति के साथ खड़े होते हैं उसे सपोर्ट करते हैं. और मैं आप सब से वादा करता हूं कि मैं आप सबको हारने नहीं दूंगा. चाहे जितनी चुनौती आए मैं डटा रहूंगा. लेकिन आप सबको हमारे साथ खड़ा रहना होगा. पांचवे साल के कार्यक्रम में सैकड़ों लोगों की उपस्थिति इसलिए रही क्योंकि बहुजन मीडिया का सपना आपका भी सपना है. आप सब चाहते हैं कि बहुजनों का, वंचितों का अपना मीडिया हो. और अगर आप लोग साथ आते हैं तो हम ऐसा कर के दम लेंगे.

मेरा भी एक सपना है. हमने मैग्जीन से शुरू की, फिर वेब चैनल पर आएं. मैं इस वेब चैनल में से वेब निकाल कर फेंक देना चाहता हूं. हमें अब अपना चैनल खोलना होगा. अपना अखबार खोलना है. गांव में बैठे हुए अपने भाईयों के लिए रेडियो शुरू करना है. सोचना आपको है. सन् 1920 में बाबासाहेब ने मूकनायक शुरू किया था. वह दलित-बहुजन पत्रकारिता की शुरुआत थी. 2020 सामने है. हमें साथ आना होगा और बहुजन पत्रकारिता के इस सौंवे साल में बहुजनों का एक चैनल शुरू कर के बाबासाहेब को श्रद्धांजलि देनी होगी. देश भर के सक्षम लोगों से मेरा निवेदन है, मेरी अपील है कि आप साथ आइए. आप यकीन करिए, हम मिल कर यह कर सकते हैं.

असमः बाढ़ से 44 की मौत और 17.2 लाख लोग प्रभावित

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Flood in Assam

गुवाहाटी। असम में भारी बारिश से आई बाढ़ से लोगों का हाल बेहाल है. असम में बाढ़ आने से वहां के हालात खराब है. भारी बारिश से आई इस बाढ़ में 44 लोगो की मौत हो चुकी है वहीं करीब 17.2 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हैं, और राज्य के 24 जिले बाढ़ की चपेट में है. बाढ़ का असर इंसानों के साथ-साथ जानवरों पर पड़ रहा है. गैंडों के लिए मशहूर काजीरंगा नेशनल पार्क आधा डूब चुका है. पार्क के जानवरों को बाढ़ से बचाने की कोशिश जारी है.

आपको बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्वोत्तर के विभिन्न क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति पर चिंता व्यक्त की है. उन्होंने केंद्र की ओर से हरसंभव मदद का वादा किया. मोदी ने कहा कि उन्होंने गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू से व्यक्तिगत रूप से राहत एवं बचाव कार्य का निरीक्षण करने और हरसंभव मदद सुगम बनाने को कहा है. मोदी ने कहा कि उन्होंने बाढ़ की स्थिति पर अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू तथा दिल्ली एवं राज्यों के अधिकारियों से बात की.

असम के बाढ़ पर अधिकारियों ने बुधवार (12 जुलाई) को बताया कि अब तक बाढ़ की वजह से 44 लोगों की मौत हो चुकी है. असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एएसडीएमए) के अधिकारियों के मुताबिक बीते 24 घंटों में अलग-अलग हादसों में पांच लोगों की मौत हुई. एएसडीएमए ने बताया कि बुधवार तक 17 लाख 18 हजार 135 लोग बाढ़ से प्रभावित हुए हैं. 31 हजार लोगों के लिए 294 राहत शिविर लगाए गए हैं. राहत दल राहत एवं बचाव कार्य में लगे हैं और अब तक 2 हजार से ज्यादा लोगों को बचाया गया है.

आनंदपाल एनकाउंटरः राजस्थान के कई जिलों में बवाल

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नागौर। राजस्थान के कुख्यात गैंगस्टर आनंदपाल के एनकाउंटर के बाद नागौर जिले का माहौल बेहद गर्म है. आनंदपाल की मौत के 18 दिन बाद उसका अंतिम संस्कार नहीं हो सका. बुधवार को प्रशासन और आनंदपाल के परिजनों के बीच हुई बातचीत बेनतीजा रही. फिर कुछ समय बाद राजपूत समाज हिंसा पर उतर आया. दो जगह हुई फायरिंग में 14 पुलिसकर्मियों सहित 20 लोग घायल हो गए. हालात को देखते हुए नागौर, चुरू, सीकर और बीकानेर में धारा 144 लागू कर दी गई है तथा इंटरनेट सेवाओं पर रोक लगा दी गई है.

आनंदपाल के शव का अंतिम संस्कार करवाने के लिए पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारियों के साथ आनंदपाल के परिजनों और राजपूत समाज की समझौता वार्ता बुधवार देर रात तक जारी रही लेकिन कोई हल नहीं निकल सका. इधर राजपूत समाज की ओर से आनंदपाल के पैतृक गांव में आयोजित की गई श्रद्धांजलि सभा में हजारों की संख्या में लोग जुटे. दिनभर राजपूत नेताओं और आनंदपाल के परिजनों के भाषणों का दौर चला. लेकिन अचानक रात 8 बजे राजपूत समाज के लोग उग्र हो गए और नागौर के पुलिस अधीक्षक परिस देशमुख के वाहन पर फायरिंग कर दी, इसमें 14 सिपाहियों के घायल होने की सूचना है.

जानकारी के अनुसार फायरिंग के दौरान गोली देशमुख के पास से निकली,लेकिन वे बच गए. एक अन्य स्थान पर पुलिस पर हुई फायरिंग में राजपूत समाज के ही छह लोग घायल हुए हैं. घायलों को एंबुलेंस से जयपुर के एसएमएस अस्पताल के लिए रवाना किया गया है. उग्र राजपूत समाज के युवकों ने डेगाना-रतनगढ़ रेल पटरी पर कब्जा कर लिया. इस कारण दो ट्रेनों को भी रोकना पड़ा. राजस्थान के कई जिलों का माहौल बेहद खराब है जिसके लिए पुलिस को दिशा निर्देष दे दिये गये हैं.

सऊदी अरबः मकान में आग लगने से 10 भारतीयों की मौत, 6 घायल

दुबई। सऊदी अरब के नजरान शहर में बुधवार (12 जुलाई) को एक मकान में आग लग जाने से उसमें रह रहे कम से कम 10 भारतीयों की मौत हो गई और 6 अन्य घायल हो गए. सुषमा स्वराज ने गुरुवार को ट्वीट कर इस घटना के बारे में जानकारी दी. उन्होंने कहा कि हम लगातार सऊदी अधिकारियों के संपर्क में हैं. सुषमा ने तुरंत भारतीय अधिकारी को सऊदी रवाना होने के निर्देश भी दिए. वे बोलीं- “हमारे अफसर नजरान के गवर्नर प्रिंस जलूवी बिन अब्देलाजीज के संपर्क में हैं.”

रिपोर्ट्स के मुताबिक, नजराना स्थित जिस घर में आग लगी, उसमें एक भी खिड़की नहीं थी. सऊदी सिविल डिफेंस ने बताया, “ये सभी कंस्ट्रक्शन कंपनी में वर्कर थे और फैसलिया डिस्ट्रिक्ट में गोल्ड मार्केट एरिया के पास रह रहे थे. शुरुआती जानकारी के मुताबिक, इस घर में आग पुराने एयरकंडीशन सिस्टम में शॉर्ट सर्किट की वजह से लगी.”

सऊदी गजट की रिपोर्ट में बताया गया कि इस घटना में 6 घायल हैं, जिनमें से 4 भारतीय वर्कर्स हैं. जब न्यूज एजेंसी ने रियाद में इंडियन एम्बेसी से डिटेल्स जानने की कोशिश की तो एम्बेसी ने बताया कि उनके पास इस घटना की जानकारी नहीं है. हालांकि, सुषमा स्वराज ने इस बारे में जानकारी मिलते ही सऊदी और इंडियन अधिकारियों को तुरंत एक्शन लेने के निर्देश दिए हैं. नजरान के गवर्नर प्रिंस जलूवी बिन अब्देलाजीज ने इस घटना की जांच के लिए एक कमेटी का गठन किया है.

प्रिंस जलूवी ने सिविल डिफेंस, म्युनिसिपल अथॉरिटी और फील्ड टीम के रोल को लेकर फिक्र जताई. उन्होंने कहा कि कंपनियों को ऐसी बिल्डिंग्स रेंट पर लेने से रोकना होगा, जो रहने के लिए अनफिट हैं. उन्होंने फॉरेन वर्कर्स पर एजेंसियों के कंट्रोल का मुद्दा भी उठाया. बता दें कि सऊदी अरब की कंपनियों में साउथ एशिया के 90 लाख वर्कर्स काम करते हैं.

अब सामाजिक बहिष्कार होगा अपराध की श्रेणी में

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पुणे। अब ग्राम पंचायत को संभल जाने की जरुरत है. अक्सर देखा जाता है की पंचायतों द्वारा लोगों का समाज से बहिष्कार कर दिया जाता है. राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की ओर से महाराष्ट्र प्रॉहिबिशन ऑफ पीपल फ्रॉम सोशल बॉयकॉट एक्ट, 2016 को मंजूरी देने के बाद किसी भी व्यक्ति का सामाजिक बहिष्कार अपराध के दायरे में आयेगा. इस प्रकार का कानून बनाए जाने को लेकर समाज सुधारक नरेंद्र दाभोलकर ने आंदोलन चलाया था. गोली मारकर उनकी हत्या किए जाने के बाद यह आंदोलन और तेज हो गया था, जिसके बाद महाराष्ट्र विधानसभा ने 2016 में इस एक्ट को सर्वसम्मति से पारित किया था.

इसके बाद से ही इस एक्ट को लागू किए जाने के लिए राष्ट्रपति की मंजूरी का इंतजार था. राष्ट्रपति ने इस एक्ट को 20 जून को मंजूरी दे दी. इस नए कानून के तहत जातिगत और सामुदायिक पंचायतों की ओर से किसी व्यक्ति के सामाजिक बहिष्कार पर रोक है. ऐसा करने वाले लोगों के दोषी पाए जाने पर 3 साल की कैद, 1 लाख रुपये के जुर्माने या फिर दोनों का प्रावधान है.

नरेंद्र दाभोलकर की बेटी मुक्ता दाभोलकर ने सहयोगी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया से कहा, ‘महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति इस कानून को प्रभावी ढंग से लागू कराने के लिए रणनीति तैयार करेगी. हमारे संगठन ने इसके लिए लंबा संघर्ष किया है.

जेल में स्पेशल ट्रीटमेंट ले रही हैं शशिकला

चेन्नई। तमिलनाडू राज्य की बड़ी पार्टी एआईएडीएमके प्रमुख वीके शशिकला बेंगलुरु की सेंट्रल जेल में स्पेशल ट्रीटमेंट का आनन्द ले रही हैं. बता दें कि उनके खाने के लिए जेल में एक स्पेशल किचन तक बनाया गया है जिसके लिए अधिकारियों को दो करोड़ रुपए देने की खबर है.

शशिकला को इस तरह की सुविधाऐँ देने के मामले में जानकारी लेने पर डीजी सत्यनारायण राव ने कहा कि वह सिर्फ कोर्ट के आदेशों का पालन कर रहे हैं और मैं किसी भी प्रकार की जांच के लिए तैयार हूं. असल में यह खुलासा जेल की वरिष्ठ अधिकारी डी रूपा की एक रिपोर्ट में सामने आया है जिसके जरिए उन्‍होंने अपने बॉस को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है

डी रूपा की रिपोर्ट में कहा गया है कि भ्रष्टाचार के आरोप में चार साल की जेल की सजा काट रहीं एआईएडीएमके प्रमुख ने स्‍पेशल किचन बनवाने के लिए जेल अधिकारियों को दो करोड़ रुपए की रिश्‍वत दी.

डी रूपा ने पत्र लिखकर दोषी अधिकारियों पर कार्यवाही की मांग की है. उन्‍होंने कहा कि जेल के नियमों का उल्लंघन करते हुए शशिकला को स्पेशल किचन की सुविधा मुहैया कराई गई है. गौरतलब है कि डी रूपा ने कुछ हफ्ते पहले ही डीआईजी के तौर पर वहां ज्‍वाइन किया है. उन्‍होंने सोमवार को परप्पन अग्रहरा सेंट्रल जेल का गहन निरीक्षण किया जहां उन्हें यह फर्जीवाड़ा पकड़ में आया.

भाजपा की दलित राजनीति का सच

kovind vs meira

राजनीति की कोई भाषा और परिभाषा नहीं होती. समय, काल, परिस्थितियों के अनुसार जो बात उसके हित में हो, वही उसकी विचारधारा और सिद्धांत बन जाती है. राजनीति नित नए नारे गढ़ती और सीमा विस्तार में अधिक विश्वास करती है.

देश की राजनीति और राजनेताओं के लिए कुछ शब्द बेहद संवेदनशील और सियासी नफे-नुकसान की दृष्टि से लोकप्रिय हैं, जैसे कि दलित, गाय, हिंदू, सेक्युलर, अल्पसंख्यक वगैरह. इन शब्दों को उछालकर खूब सियासत होती है. लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था में सबसे प्रतिष्ठित पद राष्ट्रपति का है.

महामहिम के चुनाव को लेकर इन दिनों खूब राजनीति गरम है. इस बीच ‘दलित’ शब्द बेहद लोकप्रिय हुआ है. राजनीति में दलितवाद को लेकर बेहद उदारता दिखाई जा रही है. दलित शब्द बेहद लोकप्रिय हो चला है. राजनीतिक दल इस पर जरूरत से ज्यादा सहानुभूति उड़ेल रहे हैं.

राजनीति में इस शब्द की महत्ता को देखकर हमें समुद्र मंथन का दृष्टांत सामने दिखता है. दलित शब्द मथानी हो चला है, जबकि कोविंद और मीरा कुमार उस मथानी की डोर बने हैं. कांग्रेस और भाजपा पूरी ताकत से इसे अपनी-अपनी तरफ खींचने में लगे हैं. राष्ट्रपति उम्मीदवार के लिए भाजपा और कांग्रेस की तरफ से घोषित दोनों उम्मीदवारों पर कभी राजनीतिक कदाचार का आरोप नहीं लगा है. इसमें कोई दो राय नहीं कि दोनों व्यक्तित्व महामहिम की पद और गरिमा के बिल्कुल योग्य हैं.

मृदुभाषिणी मीरा की दक्षता, शिष्टता और योग्यता पर उंगली नहीं उठाई जा सकती, फिर भी एक सवाल कचोटता है. असल बात यह कि राष्ट्रपति पद के लिए सर्वसम्मति से घोषित उम्मीदवार होना चाहिए था. ऐसा न होना किसी दुर्भाग्य से कम नहीं है. राजनीतिक अनुभव के लिहाज से देखा जाए, तो मीरा कुमार कोविंद से ज्यादा योग्य मानी जा सकती हैं. वह वर्ष 2009 से 2014 तक वह लोकसभा अध्यक्ष रह चुकी हैं. उन्हें राजनीति और सदन चलाने का अच्छा खासा अनुभव है.

दूसरी सबसे बड़ी बात कि मीरा कुमार और कोविंद, दोनों दलित जाति से आते हैं. लेकिन मीरा कुमार महिला भी हैं. राजनीति के केंद्र में महिलाओं की उन्नति मूल में रहती है, लेकिन जब परीक्षा का वक्त आता है तो सभी पीछे हट जाते हैं. ऐसी स्थिति में एक महिला और वह भी दलित समुदाय से, मीरा कुमार इस पद के लिए सबसे अच्छी सर्वसम्मत उम्मीदवार हो सकती थीं. अगर ऐसा होता तो मीरा देश की दूसरी महिला और पहली दलित महिला राष्ट्रपति होतीं.

सत्ता और प्रतिपक्ष के पास यह अच्छा मौका था, लेकिन फिलहाल आम सहमति बनाने की पहल नहीं की जा सकी. निश्चित तौर पर दलित, पिछड़ों और समाज के सबसे निचली पायदान के लोगों का सामाजिक उत्थान होना चाहिए. उन्हें समाज में बराबरी का सम्मान मिलना चाहिए. ऐसे लोगों का आर्थिक सामाजिक विकास होना चाहिए. लेकिन राजनीति में जाति, धर्म, भाषा, संप्रदाय की मनिया कब तक जपी जाती रहेगी, सवाल यह है. महामहिम की कुर्सी पर विराजमान होने वाला व्यक्ति भारतीय गणराज्य और संप्रभु राष्ट्र का राष्ट्राध्यक्ष होता है.

संवैधानिक व्यवस्था में उसका उतना ही सम्मान और अधिकार संरक्षित है, जितना इस परंपरा के दूसरे व्यक्तियों का रहा है. दलित शब्द जुड़ने मात्र से उस पद की गरिमा नहीं बढ़ जाएगी. राष्ट्रपति के संवैधानिक अधिकारों में कोई बदलाव नहीं आएगा. राष्ट्रपति को असीमित अधिकार नहीं मिल जाएंगे.

संसद को जो विशेषाधिकार है, वह राष्ट्रपति को नहीं है. महामहिम दलितों के लिए कोई अलग से कानून नहीं बना पाएंगे. भारतीय गणराज्य के संविधान में सभी नागरिकों को समता, समानता का अधिकार है, फिर वह दलित हो या ब्राह्मण, हिंदू, सिख, ईसाई, मुसलमान सभी को यह अधिकार है. हमारा संविधान जाति, धर्म, भाषा के आधार पर कोई भेदभाव की बात नहीं करता है. फिर महामहिम जैसे प्रतिष्ठित पद के लिए दलित शब्द की बात कहां से आई. सिर्फ दलित समुदाय में पैदा होना ही क्या दरिद्रता, विपन्नता की पहचान है?

भाजपा रामनाथ कोविंद को लेकर और कांग्रेस व समर्थन करने वाले अन्य 16 दल मीरा कुमार को लेकर लामबंद हैं, क्योंकि दोनों उम्मीदवार दलित समुदाय से हैं. पहले भाजपा ने एक दलित को उम्मीदवार बनाया, जवाब में विपक्ष ने भी वैसा ही किया. वास्तव में क्या कोविंद और मीरा कुमार की हैसियत एक दलित की है? क्या दोनों व्यक्ति आम दलित की परिभाषा में आते हैं? देश की संवैधानिक व्यवस्था में दोनों व्यक्तित्वों का जो सम्मान है, क्या उसी तरह का सम्मान एक आम दलित का है?

बार-बार दलित और गरीब की राजनीति क्यों की जाती है? दलितों की चिंता और गरीबी मिटाने पर घड़ियाली आंसू क्यों बहाए जाते हैं. देश में हजारों हजार की संख्या में दलित नेता हुए जो समाज की मुख्यधारा से हटकर अपनी अलग पहचान बनाई.

डॉ. भीमराव अंबेड़कर का पूरा जीवन ही दलितोत्थान के लिए समर्पित रहा. सामाजिक परिवर्तन में कई हस्तियों ने अहम भूमिका निभाई है. मायावती जैसी दलित नेता यूपी की चार बार मुख्यमंत्री रहीं. इन सबके बाद भी आम दलित की हालत में क्या सुधार हुआ? क्या दलित उत्पीड़न की घटनाओं पर विराम लगा? क्या उना जैसी घटनाएं अब नहीं होंगी? सहारनपुर में क्या फिर दलित और अगड़ा संघर्ष की घटनाएं नहीं होंगी?

इस तरह की घटनाओं से इतिहास अटा पड़ा है. फिर राजनीति दलित पर घड़ियाली आंसू क्यों बहाती है? महामहिम जैसे सम्मानित पद के लिए रामनाथ कोविंद एवं मीरा कुमार का नाम ही स्वयं में पर्याप्त है, उस पर ‘जाति की चाशनी’ चढ़ाना क्यों आवश्यक है? क्या कलावती और अन्य दलितों के यहां किसी राजनेता के भोजन करने से उनके हालात में सुधार आएगा?

राजनीति का मकसद सिर्फ साम्राज्य विस्तार है. वह अपने हित के अनुसार शब्दों का मायाजाल गढ़ती और उसी के अनुसार प्रयोग करती है. उसे वोट बैंक की राजनीति अधिक पसंद है. इसकी वजह है कि राजनीति में जाति, धर्म, भाषा सबसे प्रिय विषय है. समय-समय पर यह मंत्र उसके लिए अमृत का काम करता है.

वह हर सर्जिकल स्ट्राइक को अपने अनुसार भुनाती है. इसके पीछे भी राजनीतिक कारण रहे हैं, क्योंकि 60 वर्षों के राजनीतिक इतिहास में सत्ता की चाबी कांग्रेस के पास रही है. भाजपा के लिए पहली बार अपनी राजनीति साधने का मौका मिला है, भला उस स्थिति में वह अपने सियासी दांव से कैसे पीछे रह सकती है.

दूसरी बात, कांग्रेस पतन की तरफ बढ़ रही है. भाजपा मौका पाकर कांग्रेस मुक्त भारत अभियान को आगे जारी रखना चाहती है. दलित जाति के कोविंद को राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाकर जहां भाजपा ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं, वहीं इसी बहाने मोदी और शाह की जोड़ी आडवाणी और जोशी जैसे राजनीतिक दिग्गजों को किनारे लगाने में भी कामयाब रही है. स्पष्ट है कि वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए भाजपा ने दलित वोटों को पार्टी के पक्ष में लामबंद करने के लिए यह चाल चली है.

भाजपा इससे जहां मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस और दूसरों के मुंह बंद करने में कामयाब रही है, वहीं हाल के सालों में कुछ राज्यों में होने वाले चुनाव में दलित वोट बैंक उसके निशाने पर हैं. कोविंद मूलत उत्तर प्रदेश के कानपुर के परौख गांव से आते हैं. यूपी दलित मतों के लिहाज से लोकसभा चुनाव में अहम भूमिका निभा सकता है. ऐसी स्थिति में कोविंद को राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाना भाजपा की सोची-समझी रणनीति है. अभी तक कयास लगाए जा रहे थे कि सबसे वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी को राष्ट्रपति बनाया जा सकता है, लेकिन मोदी एंड शाह की जोड़ी ने सारे कयासों पर पानी फेर दिया.

हालांकि यह सब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की हरी झंडी के बाद ही हुआ है. कोविंद को उम्मीदवार बनाने में संघ की खासी भूमिका दिखती है. लेकिन भाजपा ने जाति का दांव खेलकर सभी राजनीति दलों को चित्त कर दिया. ऐसे में कोविंद के मुकाबले मीरा कुमार को उतारना कांग्रेस और प्रतिपक्ष की मजबूरी बन गई थी. चुनाव के नतीजे जो भी हों, लेकिन कोविंद के मुकाबले मीरा कुमार हर स्थिति में फिट बैठती हैं.

-प्रभुनाथ शुक्ल (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं), साभार- गांव कनेक्शन

सेना के वाइस चीफ को मिली वित्तीय ताकत

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नई दिल्ली। भारत सरकार ने इंडियन आर्मी को मजबूत बनाने के लिए एक और बड़ा कदम उठाने का फैसला कर लिया है. नये आदेशानुसार आर्मी के वाइस चीफ को ‘वित्तीय फैसले लेने की पूरी ताकत’ दी जाएगी. जिसका मकसद सेना के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराना और किसी भी तरह की जंग  के लिए सुरक्षाबलों को हमेशा तैयार रखना है.

बता दें कि इससे पहले, सरकार ने तीनों सेनाओं के लिए गोलाबारूद और अन्य सैन्य उपकरण की इमर्जेंसी खरीद को मंजूरी दी थी. पिछले साल सितंबर में उड़ी में सैन्य ठिकाने पर हुए आतंकी हमले के मद्देनजर यह मंजूरी दी गई थी. अटैक के बाद ही सेना के लिए करीब 20 हजार करोड़ रुपये के कई रक्षा सौदे रूस, इजरायल और फ्रांस के साथ किए गए. सरकार ने ताजा फैसला ऐसे वक्त में लिया है, जब 13 लाख सैनिकों से लैस इंडियन आर्मी चीन की करतूतों की वजह से लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल पर हाई अलर्ट पर है. दोनों देशों की सेनाएं सिक्किम बॉर्डर के नजदीक बीते कुछ वक्त से आमने-सामने है. वहीं, पाकिस्तान से सटे लाइन ऑफ कंट्रोल पर भी अक्सर सीजफायर उल्लंघन और आतंकी घुसपैठ की घटनाएं होती ही रहती हैं.

सरकार ने आर्मी, नेवी और वायु सेना के उप-प्रमुखों के अंतर्गत रक्षा खरीद से जुड़ी कई कमिटियां बनाई थीं जिसके बाद इन्हें ऑपरेशनल कमियों से निपटने के लिए आकस्मिक वित्तीय शक्तियां दी गई थीं जिसका वित्तीय चीफ जरुरतानुसार उपयोग कर सकते हैं.

बंदूक के बल पर दलित छात्रा के साथ जातिवादियों ने किया गैंगरेप

मैनपुरी। यूपी में दलितों पर अत्याचार बढ़ता ही जा रहा है. सबका साथ सबका विकास वाली भाजपा सरकार जातिवादियों को रोकने में नाकाम साबित हो रही है. आए दिन दलित महिलाओं से बलात्कार की घटनाएं सामने आ रही है. ताजा घटना मैनपुरी के कुरावली थाना क्षेत्र की है. कुरावली क्षेत्र के एक गांव में जातिवादियों ने 12वीं कक्षा की दलित छात्रा के साथ तमंचे के बल पर गैंगरेप किया.

छात्रा शर्म और डर के चलते दो दिन तक पुलिस के पास शिकायत करने नहीं जा सकी. लेकिन दो दिन बाद उसने हिम्मत दिखाई और अपनी मां से जिक्र किया तो माँ ने उसका हौसला बढ़ाया और बुधवार को पुलिस के पास जाकर शिकायत दर्ज कराई. पुलिस अब मामले की जांच करने में जुटी है.

कुरावली थाना क्षेत्र के एक गांव की रहने वाले 17 वर्षीय छात्रा के पिता तथा परिवार के अन्य सदस्य धार्मिक कार्यक्रम में भाग लेने के लिए किशनी गए थे. 9 जुलाई को छात्रा घर पर अपनी विकलांग दादी के साथ घर पर ही थी. रात के लगभग 9 बजे दादी मकान के बाहर पड़े छप्पर में तथा छात्रा कमरे के अंदर सो रही थी. तभी कुंडी के खटकने की आवाज आई तो छात्रा को लगा कि दादी हैं. उसने किवाड़ खोल दिए तभी बाहर खड़े गांव के ही सुभाष उर्फ शीलू पुत्र नरेंद्र ठाकुर और शिवा पुत्र भूपेंद्र सिंह घर के अंदर जबरन घुस गए.

इसके बाद सुभाष ने तमंचा दिखाकर छात्रा को हत्या की धमकी दी और दुष्कर्म किया. इसके बाद दोनों युवक छात्रा को धमकी देते हुए फरार हो गए. बाद में घर पहुंचे परिजनों में मां को छात्रा ने रोते हुए अपनी आप बीती बताई. परिजन छात्रा को लेकर बुधवार की दोपहर थाना पहुंचे. पीड़िता की मां द्वारा थाना में रिपोर्ट दर्ज कराई गई है. पुलिस अब मामले की जांच करने में जुटी है.

जातिवादियों ने किया दलित चाचा-भतीजे पर तलवार से हमला

अजमेर। अजमेर के नसीराबाद कस्बे में कुछ जातिवादी गुंडों ने दलित चाचा-भतीजे पर सरिये और तलवार से हमला कर दोनों को जख्मी कर दिया. हमले में चाचा-भतीजे के गंभीर चोटें आई हैं, जिसके बाद दोनों को जेएलएन अस्पताल में भर्ती करवाया गया है, जहां भतीजे की हालत नाजुक बनी हुई है.

फर्स्ट इंडिया न्यूज के मुताबिक एक महीने पहले हमलावर पक्ष और पीड़ित पक्ष के बीच बच्चों की किसी बात को लेकर विवाद हो गया था. उस वक्त पीड़ित पक्ष ने हमलावरों के खिलाफ मारपीट और जातिसूचक शब्दों से अपमानित करने का मामला दर्ज करवाया था. हमलावर लगातार पीड़ित पक्ष पर मुकदमा वापस लेने का दबाव बना रहे थे.

इसके बाद 28 जून को भी पीड़ित पक्ष को डराने-धमकाने के लिए हमलावर उसकी भैरू चौक स्थित दुकान पहुंचे. तब दुकान पर मौजूद चाचा-भतीजा ने मुकदमा वापस लेने से इनकार कर दिया. इस पर हमलावरों ने उन पर सरिये और तलवार से हमला कर दिया.

 गौमांस ले जाने के शक में भीड़ ने युवक को पीटा

नागपुर। प्रधानमंत्री मोदी के बयान के बाद भी गाय के नाम पर मारपीट और हत्याऐँ कम होने का नाम नहीं ले रहा हैं.  अब ताजा मामला  महाराष्ट्र के नागपुर शहर का है जहां स्कूटी सवार एक युवक को बीफ ले जाने के शक में पिटाई का मामला सामने आया है. यह घटना वहां के भारसिंगी गांव की है जहां भीड ने एक व्यक्ति की गौ बीफ ले जाने के शक में बुरी तरह पिटाई कर दी.

बता दें की सलीम इस्माइल शाह नाम का युवक अपनी स्कूटी से जा रहा था. भीड़ ने उसे रोका और गाय का मांस ले जाने का आरोप लगाते हुए मारने लगे. इस मामले में पुलिस ने चार लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है. पुलिस ने कुछ लोगों को पूछताछ के लिए हिरासत में भी लिया हैं. हिरासत में लिए गए लोगों का नाम मोरेश्वर तांदूळकर, जगदीश चौधरी, अश्विन उईके, रामेश्वर तायवाडे है.

जानकारी के अनुसार कटोल गांव में रहने वाला सलीम शाह बुधवार सुबह अपनी स्कूटी की डिक्की में मांस लेकर जा रहा था.जब युवक भारसिंगी गांव से गुजर रहा था तब कुछ लोगों ने अचानक उसे पकड़ लिया. उन्होंने सलीम पर गाय काटकर उसका मांस ले जाने का इल्जाम लगते हुए पिटाई कर दी. इस घटना का विडियो भी सामने आया है. पुलिस मौके पर पहुंची और सलीम को भीड़ से छुड़वाया. पुलिस ने मारपीट का मामला दर्ज कर 4 अज्ञात लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया है.

   

दलित कॉनक्लेव का आयोजन करेगी कांग्रेस

नई दिल्ली। काग्रेंस की नजर एक बार फिर दलित वोट बैंक को अपने पक्ष में करने की है जिसके लिए वह एक बड़े दलित कॉन्क्लेव का आयोजन करने जा रही है. सत्ता खोने के बाद कांग्रेस एक बार फिर से दलितों, आदिवासियों व गरीबों को अपने साथ लाने की कोशिश में है. जिसके लिए कांग्रेस दलित व आदिवासी तबकों पर फोकस देने व उनसे जुड़े मुद्दों को उठाने में लगी है. इस बाबत कांग्रेस ने आने वाली 21 जुलाई से तीन दिन का एक अंतराष्ट्रीय कॉन्क्लेव करने की योजना बनाई है. बता दें की यह आयोजन 21 से 23 जुलाई तक कनार्टक के बेंगलुरू में आयेजित किया जा रहा है. इस कॉनक्लेव को भीमराव अंबेडकर से जोड़ कर किया जायेगा. जानकारी के अनुसार  इस तीन दिवसीय कार्यक्रम में देश-विदेश से विद्वान व वक्ता आएंगे,  जो सामाजिक अधिकारिता और अंबेडकर पर अपने विचार रखेंगे. इसमें आयोजन का उद्घाटन 21 जुलाई को राहुल गांधी करेंगे, वहीं अगले दिन अंबेडकर पर सेमिनार का आयोजन किया जा रहा है.

दलित कॉनक्लेव के आयोजन के पीछे जहां एक वजह देश में दलितों के खिलाफ बढ़ते अत्याचारों के खिलाफ मुद्दे को उठाना है्, वहीं इसे कहीं न कहीं कनार्टक में होने वाले असेंबली चुनावों से भी जोड़कर देखा जा रहा है. गौरतलब है कि कांग्रेस के सामने एक चुनौती कनार्टक में अपने किले को बचाने की भी रहेगी. बता दें की कर्नाटक में दलित वोट 24 फीसदी है जिसको पाले में लाने के लिए सभी पार्टियां संघर्ष करती नजर आ रही हैं.

तेजस्वी यादव के सुरक्षाकर्मियों ने मीडियावालों को पीटा

पटना। बिहार की राजनीति में इस वक्त भूचाल आया हुआ है. इस बीच पटना सचिवालय में मीडिया वालों के साथ उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के सुरक्षाकर्मियों ने बदसलूकी की है. दरसअल जब तेजस्वी यादव कैबिनेट बैठक में हिस्सा लेने जा रहे थे उस वक्त मीडिया वालों ने सवाल पूछना चाहा तो उन्होंने कहा कि बैठक से वापस आकर बात करेंगे.

इसके बाद जब तेजस्वी यादव बैठक से बाहर निकले तब पत्रकारों ने उनसे सवाल पूछना चाहा. इसी दौरान तेजस्वी के स्पेशल ब्रांच वाले सुरक्षाकर्मी मीडिया वालों से धक्कामुक्की करने लगे. इसके बाद सुरक्षाकर्मी एक कैमरा मैन को खींचते हुए नीचे ले गए और उसके साथ मारपीट की गयी.

इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए बीजेपी नेता सुशील मोदी ने कहा कि यह घटना बेहद दुखद है. मीडिया के जरिए लालू परिवार का भ्रष्टाचार सबके सामने आ गया. नीतीश कुमार को तुरंत इन सुरक्षाकर्मियों पर कार्रवाई करनी चाहिए और सुनिश्चित करना चाहिए कि भविष्य में किसी के साथ ऐसा ना हो. लालू यादव को इसके लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए.

एबीपी न्यूज के मुताबिक जेडीयू प्रवक्ता अजय आलोक ने कहा, ”जो हुआ वो गलत है, पत्रकार और राजनेता एक दूसरे के पूरक हैं. आसे सुरक्षाकर्मियों की पहचान करके उन पर कार्रवाई की जाएगी. अब कैबिनेट की बैठक सचिवालय में नहीं योजना भवन में होगी.”

लालू और उनके परिवार पर लगे आरोपों और सीबीआई और ईडी के छापों के बाद बिहार की राजनीति में आए उफान के बीच आज जब नीतीश की कैबिनेट की बैठक हुई तो उसमें सीएम के साथ उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव भी शरीक रहे. कैबिनेट की मीटिंग महज़ 25 मिनट ही चली. कैबिनेट मीटिंग के बाद तेजस्वी यादव जमकर मोदी और अमित शाह पर बरसे, लेकिन नीतीश खामोश ही रहे.

आपको बता दें यह पहला मौका नहीं है जब मीडिया वालों के साथ बदसलूकी हुई है. इससे पहले जब सीबीआई छापों के बाद पटना में लालू यादव प्रेस कॉन्फेंस करने आए थे उस वक्त तेजस्वी यादव ने कुछ पत्रकारों के साथ बदसलूकी की थी.

पाकिस्तानी सेना ने किया हमला, 2 भारतीय जवान शहीद

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श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के केरन सेक्टर में लाइन ऑफ कंट्रोल के पास पाकिस्तानी आर्मी ने घात लगाकर हमला किया. इसमें दो जवान शहीद हो गए. यह घटना बडगाम जिले में सिक्युरिटी फोर्सेस के साथ हिजबुल मुजाहिदीन के तीन आतंकवादियों के मारे जाने के बाद हुई. उधर, आतंकी हमले में 7 अमरनाथ यात्रियों के मारे जाने के बाद सरकार ने जम्मू-कश्मीर में हाईएस्ट अलर्ट घोषित कर दिया है.

सोमवार को हुए हमले के बाद मोदी सरकार के दो मिनिस्टर कश्मीर कश्मीर पहुंचे. पीएमओ में मिनिस्टर जितेंद्र सिंह और होम मिनिस्ट्री में राज्यमंत्री हंसराज अहीर ने अफसरों से मुलाकात की. दोनों मिनिस्टर गवर्नर एनएन. वोहरा और सीएम महबूबा मुफ्ती से भी मिले. इस दौरान सिक्युरिटी इंतजामों को भी रिव्यू किया गया.

डिफेंस मिनिस्ट्री के स्पोक्सपर्सन ने न्यूज एजेंसी को बताया कि अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि पाकिस्तानी आर्मी ने एलओसी पार कर हमला किया या फिर अपने इलाके से फायरिंग की. हमला पैट्रोलिंग कर रहे जवानों पर किया गया. इसमें दो जवान बुरी तरह जख्मी हो गए. बाद में इलाज के दौरान दोनों की जान चली गई.

न्यूज एजेंसी के मुताबिक, जितेंद्र सिंह और हंसराज अहीर नरेंद्र मोदी के ऑर्डर पर कश्मीर गए थे. राज्यपाल और मुख्यमंत्री से उन्होंने पूरी सिक्युरिटी को लेकर जानकारी ली. इसके बाद लोकल कमांडर्स के साथ मीटिंग की. इसमें सिक्युरिटी रिव्यू किया गया. इस मीटिंग में आर्मी कमांडर्स के अलावा, चीफ सेक्रेटरी, पुलिस चीफ यानी डीजीपी के अलावा सीआरपीएफ के डीजी भी मौजूद थे. बीएसएफ के आला अफसर भी मीटिंग का हिस्सा बने. इंटेलिजेंस एजेंसियों के अफसरों से भी बातचीत की गई.

होम मिनिस्ट्री ने बुधवार को एक स्टेटमेंट जारी किया. कहा- कश्मीर में अमरनाथ यात्रियों पर दुर्भाग्यपूर्ण हमला हुआ. कुछ लोगों की मौत हुई और कुछ घायल हुए. इसके बाद पूरे सिक्युरिटी एस्टेबिलिशमेंट को हाईएस्ट अलर्ट पर रखा गया है. बता दें कि सोमवार रात हुए आतंकी हमले में 7 अमरनाथ यात्री मारे गए थे. 19 लोग घायल हुए थे. मारे गए लोगों में 6 महिलाएं थीं. सभी लोग गुजरात के वलसाड जिले के रहने वाले थे. घटना अनंतनाग जिले में हुई थी.

खेत में मजदूरी कर बालिका वधु को बनाया डॉक्टर

जयपुर। प्रतिभा को चमकने से कोई नहीं रोक सकता है यह बात एक बार फिर सही साबित हुई है. जयपुर के गांव करेरी की रहने वाली रूपा यादव ने संसाधनों की कमी के बावजूद वो कर दिखाया दिया जिसके लिए संपन्न लोग लाखों रुपये लेकर बैठे रहते हैं.

बता दें की छोटी सी उम्र में रूपा की शादी होने के बावजूद 12 साल बाद वह अब मेडिकल की पढ़ाई करने जा रही है. रूपा की शादी केवल 8 साल  की उम्र में कर दी गई थी उस समय उनके पति की की उम्र सिर्फ 12 साल थी . उस समय रुपा सिर्फ तीसरी कक्षा में पढती थी. इसके बाद 15 साल की उम्र में जब वो दसवीं के एग्जाम दे रहीं थी उस दौरान उनका गौना हुआ. दसवीं के परिणाम में रूपा ने 84 फीसदी अंक दर्ज किए.

आगे की पढ़ाई के लिए उनका दाखिला एक प्राइवेट स्कूल में करा दिया. वहीं इसी दौरान उनके एक चाचा की मौत इलाज के अभाव में हो गई जिसके बाद रूपा ने ठान ली डॉक्टर बनने की.

बेहद साधारण परिवार में जन्मी रुपा का पढ़ाई खर्चा पूरा करने के लिए पति ने खेत में काम किया. बाद में रुपा का दाखिला एक कोचिंग संस्थान में करा दिया. पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए उनके पति ने टेम्पो तक चलाया. लेकिन जब कोचिंग को इस बारे में बताया गया तो कोचिंग ने 75 प्रतिशत फीस माफ कर दी. इस बार के सीपीएमटी के रिजल्ट में रुपा ने  603 अंक प्राप्त किए और उनकी नीट रैंक 2283 है.

जानकारी देते हुए कोचिंग संस्थान के निदेशक नवीन माहेश्वरी ने बताया कि रूपा और उसके परिवार के जज्बे की मेहनत औऱ जज्बे को सलाम करते हैं. रुपा को कोचिंग संस्थान की ओर से एमबीबीएस की पढ़ाई के चार साल तक संस्थान की ओर से मासिक छात्रवृत्ति दी जाएगी ताकी उन्हें डाक्टरी की पढ़ाई के लिए कोई दिक्कत न हो.

ISIS के खात्मे के लिए भारत ने फिलीपींस को दिए 5 लाख डॉलर

नई दिल्ली। भारत ने फिलीपींस को आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट से लड़ाई के लिए 5 लाख डॉलर यानी तकरीबन 3.2 करोड़ रुपये की आर्थिक मदद दी है. ऐसा पहली बार है जब भारत ने किसी देश को आतंकी समूहों से सुरक्षा के लिए आर्थिक सहायता मुहैया कराई है. देश के दक्षिणी इलाके के मारावी शहर में लगभग 2 महीने से ज्यादा समय से आईएस ने कब्जा कर रखा है और सुरक्षाबल इसे मुक्त कराने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

भारत की तरफ से यह सहायता विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और फिलीपींस के विदेश मंत्री अलन पीटर काएटानो के बीच 6 जुलाई को हुई बातचीत के बाद दी गई है. मनीला में भारतीय दूतावास की तरफ से जारी बयान में कहा गया, ‘मारावी सिटी में लोगों के मारे जाने पर सुषमा स्वराज ने शोक व्यक्त किया है.’

सूत्रों के मुताबिक फिलीपींस की सेना और IS समर्थित आतंकी समूहों के बीच 26/11 जैसा संघर्ष चल रहा है, जो बीचे 7 हफ्तों से जारी है. इस संघर्ष में अब तक 90 से ज्यादा जवान शहीद हो चुके हैं. लड़ाई में 380 आतंकवादी और दर्जनों आम नागरिक भी मारे जा चुके हैं. आतंकियों ने सैकड़ों लोगों को अभी भी बंधक बना रखा है.

इस संकट से निपटने के लिए आर्थिक मदद करने वालों में भारत अब सबसे बड़ा देश है. फिलीपींस का नए बेस्ट फ्रेंड चीन ने इस संकट की स्थिति में 2 करोड़ रुपये से भी कम की आर्थिक मदद दी है. फिलीपींस के राष्ट्रपति रॉड्रिगो डुटर्ट ने मिंदानाओ प्रांत में बीते 60 दिनों से मार्शल लॉ लागू किया हुआ है. उन्होंने अगले 15 दिनों में इस इलाके से आतंकवादियों का सफाया करने का दावा किया है.