मोहन भागवत को आतंकवादी सूची में डालना चाहती थी कांग्रेस

नई दिल्ली। मनमोहन सरकार के समय का एक बड़ा खुलासा सामने आया है, जिससे मानसून सत्र में हंगामा होने के आसार तय हैं. जानकारी में पता चला है कि कांग्रेस की अगुवाई वाली मनमोहन सिंह के कार्यकाल की सरकार अपने अंतिम दिनों में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को आतंकवादियों की सूची में डालना चाहती थी.

बता दें की ‘चैनल टाइम्स नाउ’ के पास मौजूद सबूतों के मुताबिक यूपीए सरकार अपने अंतिम दिनों में आरएसएस चीफ मोहन भागवत को आतंकवादियों की सूची में डालना चाहती थी. इसमें बताया गया कि भागवत को ‘हिंदू आतंकवाद’ फैलाने की शंका के कारण कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार आंतकवादियों की ब्लैक लिस्ट में डालने की कोशिश में थी. अपने कार्यकाल के समय में अजमेर और मालेगांव ब्लास्ट के बाद यूपीए सरकार ने ‘हिंदू आतंकवाद’ थ्योरी दी थी जिसके तहत मोहन भागवत उनकी नजर में चढ़ गये थे. इसके लिए राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के बड़े अधिकारियों पर जांच के लिये योजना तैयार करने का आदेश भी मिला था.

जांच अधिकारी और कुछ आला ऑफिसर अजमेर और कई अन्य बम विस्फोट मामले में तथाकथित भूमिका के लिए भागवत से पूछताछ करना चाहते थे. ये अधिकारी यूपीए के मंत्रियों के आदेश पर काम कर रहे थे, जिसमें तत्कालीन गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे भी शामिल थे. ये अधिकारी भागवत को पूछताछ के लिए हिरासत में लेना चाहते थे.

करंट अफेयर मैगजीन कारवां में फरवरी 2014 में संदिग्ध आतंकी स्वामी असीमानंद का इंटरव्यू छपा था. उस समय वो पंचकुला जेल में थे. इस इंटरव्यू में कथित तौर पर भागवत को हमले के लिए मुख्य प्रेरक बताया गया था जिसके बाद सरकार ने उन्हें घेरने की तैयारी की थी पर मनमोहन सरकार सफल नहीं हो पायी.

 

जग्गा जासूस: फिल्म समीक्षा

Jagga jasoos

5 साल के लंबे इंतजार के बाद निर्देशक अनुराग बसु और रणबीर कपूर एक बार फिर फिल्म ‘बर्फी’ वाला मैजिक दर्शकों को फिल्म ‘जग्गा जासूस’ के रूप में चखाने को तैयार हैं. आइए जानते हैं जग्गा के जासूस बनने की कहानी… ‘जग्गा जासूस’ कहानी है जग्गा (रणबीर कपूर) की, जो बादल बागची का गोद लिया हुआ बेटा है और अचानक बादल एक दिन जग्गा को छोड़ कर चला जाता है, ये कहकर की वो जल्दी वापस लौटेगा पर वो नहीं लौटता. जग्गा तेज तर्रार है, लेकिन बोलने में हकलाता है. उसके पिता ने उसे समझाया था कि अगर वो गाकर अपनी बात बोलेगा तो नहीं हकलाएगा और यही से जग्गा को परेशानी का हल मिलता है. साथ ही नींव पड़ती है एक म्यूजिकल फिल्म ‘जग्गा जासूस’ की. वक्त गुजरता है जग्गा बड़ा हो जाता है और बगची वापस नहीं लौटता, इधर जग्गा को हर बात की गहरायी में जाने की आदत पड़ जाती है और इन्हीं सब के चलते वो अपने स्कूल में एक हत्या का केस सुलझता है. अब उसे अपने खोए हुए पिता का पता लगाना है और वह राज जानना है जिसकी वजह से उसके पिता गायब हुए.

‘जग्गा जासूस’ में अहम भूमिकाएं रणबीर कपूर, कैटरीना कैफ, सौरभ शुक्ला और सास्वत चटर्जी ने निभाई हैं. फिल्म का निर्देशन अनुराग बासु ने किया है और वो ही इसके लेखक भी हैं. फिल्म का संगीत प्रीतम ने दिया है और सिनेमेटोग्राफी रवि बर्मन की है.

यह एक म्यूजिकल फिल्म है यानी डायलॉग्ज भी गाकर ही बोले गए हैं और साथ में म्यूजिक भी है. ये फिल्म हिंदी सिनेमा में अपनी तरह की पहली फिल्म है और इसे एक एक्सपेरिमेंट कहा जा सकता है. हालांकि, हॉलीवुड में इस तरह की कई फिल्में बनी हैं. हिंदी सिनेमा की बात करें तो इससे पहले 1970 में चेतन आनंद की एक फिल्म ‘हीर रांझा’ आई थी, जिसे म्यूजिकल तो नहीं कहा जा सकता, पर इस फिल्म के सारे डायलॉग्ज शायरी में थे.

सबसे पहले तारीफ़ करना चाहूंगे निर्देशक अनुराग बासु की, जिन्होंने हिंदी सिनेमा की रीवायत तोड़ने की हिम्मत दिखाई और साथ है फिल्म का बेहतरीन निर्देशन किया है. इस तरह की फिल्म में अमूमन कड़ी मेहनत लगती है और यहां डायरेक्टर, म्यूजिक डायरेक्टर और लिरिक्स राइटर का बेहतरीन तालमेल बहुत जरूरी है, और यहां अनुराग, प्रीतम और लिरिक्स राइटर अमिताभ भट्टाचार्य ने ये काम को खूबसूरती से निभाया है. इस फिल्म की दूसरी बड़ी खूबी है इसकी लोकेशन्स और रवि बर्मन की सिनेमेटोग्राफी, एक तरफ जहां ये फिल्म खूबसूरत लगती है, वही इसके दृश्यों में एक कॉमिक्स का फील भी महसूस होता है. फिल्म की तीसरी खूबी है रणबीर कपूर जिन्होंने वजनदार परफॉर्मेंस दी है. उनके चेहरे पर मासूमियत भी नजर आती है और आंखों में जिज्ञासा भी. साथ ही उनका हकलाना क्लीशे नहीं लगता और जब भी वो हकलाते हैं आपको महसूस होता है कि काश आप उनकी बात पूरी कर दें. कैटरीना फिल्म में ठीक हैं. सारस्वत चटर्जी जो फिल्म में रणबीर के पिता बने हैं, उन्होंने भी उम्दा अभिनय का परिचय दिया है और कई जगह वो आपकी आंखें नम कर जायेंगे. ये फिल्म तकनीकी तौर पर भी काफी अच्छी है पर देखना ये है कि क्या हिंदी सिनेमा के दर्शक इस प्रयोग का अपना पाएंगे.

इस फिल्म की एक खामी है इसका कहानी कहने का तरीका, जहां कैटरीना बच्चों को जग्गा की कहानी किताबों से पढ़कर सुनती हैं. यहां मुश्किल यह है कि फिल्म का ये हिस्सा बोरिंग लगता है साथ ही इसे जो नाटकीय रूप दिया है यानी स्टेज पर नाटक के रूप में दिखाया गया है, वह कहानी के इमोशन से आपको भटकाता है. इस फिल्म के म्यूजिकल होने से जो एक खामी लगी वह यह है कि गाने में कई बार कही गई कहानी के शब्द संगीत और कोरस में कहीं खो जाते हैं और कुछ पहलू आप के कानो तक साफ नहीं पहुंच पाते. एक और बात ये फिल्म एक कॉमिक्स की तरह है इसलिए लॉजिक काम नहीं करेंगे. अगर लॉजिक लगाएंगे तो ये फिल्म की सबसे बड़ी खामी हो जाएगी. इसलिए इस फिल्म को कॉमिक्स की तरह देखें. यही वजह है कि फिल्म में जग्गा की कहानी कैटरीना जग्गा के किस्से नुमा किताब से पढ़ कर बताती हैं. फिल्म को हमारी तरफ से 3.5 स्टार्स.

तथागत बुद्धः ऐसे लोग कभी गरीब नहीं होते…

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एक बार तथागत बुद्ध एक गांव में धर्म सभा को संबोधित कर रहे थे. लोग अपनी परेशानियों को लेकर उनके पास जाते और उनका हल लेकर खुशी-खुशी वहां से लौटते. उसी गांव में सड़क के किनारे एक गरीब व्यक्ति बैठा रहता और धर्म सभा में आने-जाने वाले लोगों को ध्यान से देखता. उसे बड़ा आश्चर्य होता कि लोग अंदर तो बड़ा दुखी चेहरा लेकर जाते हैं, लेकिन जब वापस आते हैं तो बड़े प्रसन्न दिखाई देते हैं. उस गरीब को लगा कि क्यों न वह भी अपनी समस्या को बुद्ध के सामने रखे? मन में यह विचार लिए वह भी तथागत बुद्ध के पास पहुंचा.

लोग पंक्तिबद्ध खड़े होकर उन्हें अपनी समस्याएं बता रहे थे और वह मुस्कुराते हुए सबकी समस्याएं हल कर रहे थे. जब उसकी बारी आई तो उसने सबसे पहले तथागत को प्रणाम किया और कहा- ‘तथागत इस गांव में लगभग सभी लोग खुश और समृद्ध हैं. फिर मैं ही क्यों गरीब हूं?’ इस पर बुद्ध मुस्कुराते हुए बोले- ‘तुम गरीब और निर्धन इसलिए हो, क्योंकि तुमने आज तक किसी को कुछ दिया ही नहीं.’ आर्श्चयचकित गरीब बोला- तथागत मेरे पास भला दूसरों को देने के लिए क्या होगा? मेरा तो स्वयं का गुजारा बहुत मुश्किल से हो पाता है. लोगों से भीख मांग कर अपना पेट भरता हूं.’

तथागत बुद्ध कुछ देर शांत रहे, फिर बोले- ‘तुम बड़े अज्ञानी हो. औरों के साथ बांटने के लिए ईश्वर ने तुम्हें बहुत कुछ दिया है. मुस्कुराहट दी है, जिससे तुम लोगों में आशा का संचार कर सकते हो. मुंह से दो मीठे शब्द बोल सकते हो. दोनों हाथ से लोगों की मदद कर सकते हो. ईश्वर ने जिसको ये तीन चीजें दी हैं वह कभी गरीब और निर्धन हो ही नहीं सकता. निर्धनता का विचार आदमी के मन में होता है, यह तो एक भ्रम है इसे निकाल दो.’ यह सुन ज्ञान से उस आदमी का चेहरा चमक उठा.

चेन्नई सुपरकिंग्स और राजस्थान रॉयल्स की IPL में वापसी

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नई दिल्ली। दो साल के निलंबन के बाद आईपीएल की दो बड़ी टीमों चेन्नई सुपरकिंग्स और राजस्थान रायल्स का निलंबन गुरुवार को खत्म हो गया है. अब ये दोनों टीम आईपीएल में फिर से वापसी के लिए तैयार है.

टीम चेन्नई सुपर किंग्स ने अपनी वापसी के जश्न में सोशल मीडिया पर टीम और एमएस धोनी से जुड़ी पुरानी यादों को शेयर करना शुरू कर दिया है. उनका ट्विटर पेज पीली जर्सी वाली टीम की यादों की तस्वीर से पट गया है. चेन्नई के अलावा राजस्थान रॉयल्स की टीम ने भी निलंबन खत्म होने के बाद आईपीएल में वापसी की है.

स्पॉट फिक्सिंग के कारण चेन्नई सुपरकिंग्स और राजस्थान रॉयल्स की टीमों को दो सालों के आईपीएल से निलंबित कर दिया गया था. इन दोनों की जगह दो सीजन के लिए गुजरात लायंस और पुणे सुपरजाएंट की टीम को लाया गया था. अब इन दोनों की वापसी के साथ ही गुजरात और पुणे की टीम का करार खत्म हो गया है. आईपीएल के 2018 में होने वाले सीजन में गुजरात और पुणे नहीं बल्कि चेन्नई और राजस्थान रॉयल्स की टीमें खेलेंगी. जिसमें चेन्नई टीम के कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी हो सकते हैं जिसे फिर से बड़ी वापसी के तौर पर देखा जा रहा है. गौरतलब है की इन दोनों ही टीमो का आईपीएल में जलवा रहा है.

 

कोच सेलेक्शन पर संदीप पाटिल ने साधा निशाना

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नई दिल्ली। भारतीय क्रिकेट में कोच पद लगातार विवादों में रहा है जिसको लेकर बयानवाजी अभी तक थम नहीं रही है. अब नया बयान पूर्व चीफ सिलेक्टर संदीप पाटिल की तरफ आया है. उन्होंने सचिन, सौरव, लक्ष्मण पर बड़ा पलटवार किया है जिसमें एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा है की सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली और वीवीएएस लक्ष्मण को कोच चुनने का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए था.

क्रिकेट सलाहकार समिति (सीएसी) पर निशाना साधते हुए पाटिल ने कहा की सचिन, सौरव, लक्ष्मण भले ही कई कीर्तिमान रचे हों, लेकिन इनमें से किसी ने कोच के तौर पर कभी काम नहीं किया है. हालांकि पाटिल ने ये भी कहा कि शास्त्री को कोच की जगह टीम डायरेक्टर बनाया जाना चाहिए था. पाटिल ने कहा कि वह शास्त्री के साथ खेल चुके हैं और उन्हें नहीं लगता कि कोच का पद उन्हें सूट करता है.

वहीं महान स्पिनर रहे इरापल्ली प्रसन्ना ने कोच चुनने के लिए हुए नाटक पर निराशा जताई और कहा कि सचिन, सौरव और लक्ष्मण को पहले दिन ही कोच के नाम के तौर पर रवि शास्त्री के नाम की घोषणा कर देनी चाहिए थी. प्रसन्ना ने कहा, ‘नाटक की कोई जरूरत नहीं थी. शास्त्री हमेशा से ही पहली पसंद थे. इन तीनो महान खिलाड़ियों ने नाम की घोषणा में ज्यादा समय लिया. एक आम राय बनानी चाहिए थी. जो बातें सामने आ रही हैं उससे ऐसा लगता है कि ये तीनों एक फैसले पर नहीं पहुंचे और सबकुछ आखिरी समय में तय किया गया.’

गौरतलब है कि विराट कोहली पहले से ही रवि शास्त्री को कोच पद देने की पैरवी करते हुए आये हैं जिसे लेकर कयास लगायी जा रही था कि रवि को यह पद दिया जा सकता है अंत में यही निर्णय सबके सामने निकलकर सामने आया.

मोदीराज में भारत के शिक्षण संस्थानों का तेजी से हुआ भगवाकरण

three year of modi govt

मोदी सरकार के पिछले तीन साल भारतीय शिक्षा प्रणाली पर हमले के तीन साल हैं. इस हमले को किसी एक पक्षीय रूप से ना समझा जा सकता है ना ही परिभाषित किया जा सकता है, वास्तव में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की राजनीतिक ईकाई भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार का यह हमला बहुआयामी है. इस हमले की जड़ में सांप्रदायिक राष्ट्रवाद और कॉर्पोरेट का गठजोड और उसके द्वारा तैयार की गई तथाकथित वर्गीय विकास की अवधारणा है. विकास की फासीवादी अवधारणा का यह हमला शिक्षक वर्ग, तार्किक और वैज्ञानिक शिक्षा प्रणाली, छात्रों समान्यतः पूरे छात्र समुदाय और विशेषकर वंचित वर्ग के छात्रों, शिक्षण संस्थानों की स्वायतत्ता के साथ अंततः यह हमला सीधे तौर पर देश के जनवादी, धर्मनिरपेक्ष ढ़ांचे और नागरिक कल्याण और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों पर है.

शिक्षा के बजट में कटौती मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद शिक्षा के लिए आवंटित बजट में लगातार उल्लेखनीय कटौती देखी जा रही है. मोदी सरकार के पहले बजट से ही यह कटौती साफ देखी जा सकती है. मोदी सरकार ने 2014-15 के अपने बजट में स्कूल शिक्षा और साक्षरता के नाम पर 45722 करोड रूपये का आवंटन किया जो उसकी पूर्ववर्ती सरकार के बजट में इसके लिए किये गए बजटीय प्रावधान से 1134 करोड रूपये कम था. उसके पश्चात अगले बजट में सरकार ने इस मद के लिए अनुमानित खर्च के रूप में 42187 करोड रूपये खर्च करने का लक्ष्य रखा जिसे बाद में कम करके 3535 करोड कर दिया गया. फिर सरकार ने अगले 2016-17 के बजट में इसमें कुछ सुधार किया पंरतु सत्ता में आने के बाद अभी तक मोदी सरकार स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता के लिए आवंटित बजट में कुल 3302 करोड रूपये की कटौती कर चुकी है. पिछली सरकार के बजट की तुलना में यह कटौती 7 प्रतिशत रही है जबकि इस दौरान स्कूली शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों की संख्या में 2 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से बढ़ोतरी हो रही है अर्थात तीन साल में स्कूली शिक्षा में शामिल होने वाले छात्रों की संख्या में 6 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है.

इसके अतिरिक्त सरकार की एक प्रमुख योजना सर्व शिक्षा अभियान के लिए भी 2016-17 के बजट में मोदी सरकार ने 1597 करोड रूपये की कटौती की है. वर्तमान में मोदी सरकार ने इस मद के लिए 22500 करोड रूपये आवंटित किये हैं जबकि 2014-15 में इस मद में 24097 करोड रूपये आवंटित किये गये थे. शिक्षक प्रशिक्षण और साक्षर भारत के लिए भी आवंटित बजट को 1158 करोड से घटाकर 879 करोड कर दिया गया है. बेहद महत्वपूर्ण मीड डे मील के बजट में भी पिछले दो सालों में 823 करोड अर्थात 8 प्रतिशत की कटौती की गई है. इसी प्रकार कुल सकल घरेलू उत्पाद में शिक्षा क्षेत्र की हिस्सेदारी में लगातार एक गिरावट दर्ज की जा रही है. मोदी सरकार के सत्ता में आने को बाद 2014-15 में इसमें 0.55 प्रतिशत, 2015-16 में 0.50 प्रतिशत और 2016-17 में 0.48 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है. इसी क्रम में केन्द्र की मोदी सरकार ने अपने शिक्षा के बजट में लगातार कमी की है. 2014-15 में कुल बजट का यह जहां 4.1 प्रतिशत था तो 2015-16 में 3.8 प्रतिशत और 2016-17 में घटकर महज 3.7 प्रतिशत रह गया था. इसी प्रकार वाम समर्थित यूपीए1 के दौरान लागू किया गया शिक्षा अधिकार अधिनियम भी उपयुक्त बजटीय आवंटन की कमी में लगातार निष्प्रभावी हो रहा है.

फीस बढ़ोतरी यह बजटीय कटौती सीधे छात्रों और विशेषकर वंचित वर्ग के छात्रों को अधिक प्रभावित कर रही है. इस बजटीय कटौती के कारण हमले पिछले दिनों विभिन्न शिक्षण संस्थानों में फीस बढ़ोतरी देखी गई है और इस फीस बढ़ोतरी का कोई विशेष प्रतिरोध भी सड़कों पर दिखाई नही दिया है. केवल चण्डीगढ़ विवि का छात्र आंदोलन एक अपवाद था और चण्डीगढ़ विवि के छात्रों ने अपने प्रभावी और निर्णायक आंदोलन से विवि प्रशासन को बढ़ी हुई फीस वापस लेने पर विवश कर दिया. हालांकि आईआईटी में बीटेक की फीस को मौजूदा सरकार ने 90 हजार से बढ़ाकर सीधे 2 लाख रूपये कर दिया और सीएसआईआर और एनईटी की प्रवेश परीक्षा फीस में भी भारी बढ़ोतरी कर दी और यह बढ़ी हुई फीस सभी छात्रों और वंचित वर्ग के छात्रों को विशेष रूप से प्रभावित करने वाली है.

इस फीस बढ़ोतरी का एक दूसरा पहलू छात्रवृति के निष्पादन में भी दिखाई दिया है. विभिन्न संस्थान सामाजिक रूप से वंचित तबके को छात्रों को छात्रवृति प्रदान करते हैं परंतु इस बढ़ी हुई फीस ने उन्हें दी जाने छात्रवृति को भी लंबित कर दिया है और राजीव गांधी राष्ट्रीय छात्रवृति योजना, मौलाना आजाद राष्ट्रीय छात्रवृति योजना, सीएसआइआर- जेआरएफ और यूजीसी-जेआरएफ जैसे संस्थान जो अनेक छात्रों को छात्रवृति उपलब्ध कराते रहे हैं उन्होंने भी छात्रवृति को आठ से नौ महीने तक लंबित कर दिया. जिस कारण सैंकड़ों छात्रों की शिक्षा पर इसका सीधा असर हुआ और उन्हें अपनी शिक्षा जारी रखने में भारी परेशानी का सामना करना पड़ा. हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला की इसी प्रकार की एक लाख सत्तर हजार रूपये छात्रवृति रूकी हुई थी और उसका नतीजा रोहित वेमुला की आत्महत्या के रूप में पूरी दुनिया के सामने था. यूजीसी द्वारा नॉन नेट छात्रवृति को रोके जाने का मसला भी उच्च शिक्षा के 2014-15 के बजट में सरकार द्वारा 3900 करोड रूपये की कटौती का ही परिणाम है. सरकार शिक्षा के बजट में कटौती किये जा रही है जबकि शोध कार्यो और उच्च शिक्षा में संलग्न छात्रों की मांग छात्रवृति को मुद्रास्फीति से जोडे जाने की रही है.

वास्तव में अपने बजटीय भाषण में वित्तमंत्री द्वारा उच्च शिक्षा पर जोर देना भी जुमलेबाज सरकार की जुमलेबाजी और झूठ के अलावा कुछ नही है. सरकार एक तरफ कौशल विकास क बात करती है तो दूसरी तरफ कौशल विकास के लिए बने उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए अवंटित बजट में भारी कटौती करती है. वित्तमंत्री ने अपने पहले बजटीय भाषण में ही ऑनलाइन के माध्यम से उद्यम शिक्षा और प्रशिक्षण ;एमओओसीएसद्ध के बारे में बड़ी बाते की थी. परंतु शिक्षा में कटौती ने उनके दोमुंहेपन को साफ जाहिर कर दिया था. जहां वित्तमंत्री एक तरफ कौशल विकास की बात कर रहे थे तो दूसरी तरफ यूजीसी/ आईआईटी/ आईआईएम/ एनआईटी के बजट में 50 प्रतिशत से अधिक की कटौती की शुरूआत कर रहे थे और आईआईटी और आईआईएम और एनआईटी जैसे शिक्षण संस्थानों में फीस बढ़ोतरी की योजना पर भी काम कर रहे थे.

मोदी सरकार की इन कोशिशों में अन्तराष्ट्रीय वित्त पूंजी के विभिन्न संस्थानों के निर्देश पर शिक्षा के निगमीकरण की स्पष्ट और जोरदार आहट सुनी जा सकती है.

शिक्षण संस्थानों पर संघी प्रचारकों का कब्जा 2014 के लोकसभा चुनावों में भारी जीत के बाद भाजपा ने संघ से जुड़े हुए लोगों एवं संघ के प्रचारकों को शिक्षा और साहित्य के विभिन्न केन्द्रीय संस्थानों में स्थापित करने और पाठ्य पुस्तकों और पाठ्यक्रम को विकृत करने के काम को एक अभियान की तरह से करना शुरू कर दिया है. संघ और भाजपा ने जहां एक ओर दीनानाथ बत्रा जैसे लोगों को अपनी तथाकथित नई शिक्षा नीति बनाने का जिम्मा दिया है तो वहीं देश के विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों में संघ के लोगों की नियुक्ति करने के काम में भी उतनी ही तत्परता दिखाई है. शिक्षण संस्थानों, मंत्रालयों और सरकार द्वारा संचालित संस्थानों में संघ के लोगों की नियुक्ति दरअसल नीति निर्धारक पदों को कब्जा करके देश की तमाम शिक्षा व्यवस्था पर काबिज होने और उसे अपनी वैचारिक आवश्यकता के अनुरूप बदलने की मुहिम का हिस्सा भर है. भारतीय इतिहास शोध परिषद में एच वाय सुदर्शन राव, एबीवीपी के पूर्व संगठन सचिव राम बहादुर राय को इंदिरा गांधी केन्द्रीय राष्ट्रीय कला केन्द्र का मुखिया बनाया है और आरएसएस के मुखपत्र के पूर्व संपादक बलदेव शर्मा को नेशनल बुक ट्रस्ट का जिम्मा सौंपा है. इसी प्राकर विभिन्न विश्वविद्यालयों के उप कुलपति पदों पर भी भाजपा और संघ से जुडे हुए लोगों को स्थापित करने का काम किया है. हैदरबाद केंन्द्रीय विश्वविद्यालय, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, एफटीआईआई, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, आईआईएमसी आदि सभी संस्थानों संघ से जुडे़ लोगों की पैठ बन चुकी है और अब वह इन सभी संस्थानों में संघी एजेंडा लागू करने को आतुर हैं. छात्रों के दमन से लेकर फीस बढ़ोतरी और पाठ्यक्रम बदलने तक सभी इनके एजेंडे का हिस्सा है. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय पर तो एक ऐसी व्यक्ति का कब्जा है, जो कहता है कि लडकियों को रात में पढ़ना नही चाहिए और यह भी तय करना चाहता है कि उन्हें क्या पहनना और क्या खाना चाहिए. उक्त उप कुलपति का संघ से इतना सीधा संबंध है कि वह 2014 के चुनावों के दौरान मोदी की प्रचार रैलियों में भी दिखाई दिये.

सरकार का छात्रों के खिलाफ मोर्चा मोदी सरकार ने पिछले तीन सालों में लगता है कि विश्वविद्यालय परिसरों में छात्रों के खिलाफ युद्ध की घोषणा ही कर दी है. अपने छात्र संगठन एबीवीपी से द्वारा विरोधी छात्रों को निशाना बनाने से लेकर प्रशासन द्वारा छात्रों को तंग करने के सभी औजार मोदी सरकार कर रही है. पिछले तीन सालों में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से लेकर हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, जाधवपुर विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, गुजरात विश्वविद्यालय, एफटीआईआई और आईआईटी मद्रास तक सभी परिसर देश के सबसे अशांत स्थानों में बदल चुके हैं.

सत्ता में आते ही मोदी सरकार ने मानों छात्र समुदाय पर हमलों की झडी लगा दी थी. सबसे पहले अक्टूबर 2015 में यूजीसी द्वारा नॉन-नेट छात्रवृति को बंद करने से शुरू हुआ यह छात्र प्रतिरोध अब फैलकर हरेक विश्वविद्यालय परिसर में अपनी धमक दे चुका है. जवाहर लाल नेहरू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार के नेतृत्व में छात्रों ने लंबे समय तक विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का घेराव अपनी मांगों के समर्थन में किया.

इसके बाद जनवरी 2016 में रोहित वेमुला की आत्महत्या ने तो मानो पूरे देश में एक सरकार विरोधी उबाल ही लाकर रख दिया था. रोहित वेमुला को संघी छात्र संगठन एबीवीपी, आंध्र के भाजपा नेता और केन्द्रीय मंत्री बंडारू दतात्रेय और मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी के सामूहिक कुकृत्य का शिकार होकर आत्महत्या करने के लिए मजबूर होनापड़ा. रोहित वेमुला की मौत देशभर के वंचित और प्रगतिशील छात्रों को सरकार के विरोध में सड़कों पर उतरने के लिए विवश कर दिया. सरकार और केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने संसद में रोहित वेमुला को लेकर गलत बयानी की और भाजपा ने अपने इस शर्मनाक कृत्य पर पर्दा डालने के लिए रोहित वेमुला को दलित छात्र मानने से ही इंकार कर दिया. रोहित वेमुला अंबेडकर स्टूडेंटस एसोसिएशन का सदस्य था और विश्वविद्यालय परिसर में उनके द्वारा अपने जनवादी अधिकारों के लिए किये जाने वाले संघर्षों को संघ के इशारे पर काम करने वाले उप कुलपति ने एबीवीपी की सिफारिश पर देश विरोधी करार दे दिया. रोहित वेमुला और उनके साथियों को विश्वविद्यालय से निलंबित कर दिया गया और वेमुला और उनके सहयोगियों की छात्रवृति रोक दी गई.

पिछले वर्ष फरवरी 2016 में देशद्रोह के आरोप में एआईएसएफ के नेता और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के अध्यक्ष कन्हैया कुमार को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया. अफजल गुरू विश्वविद्यालय परिसर में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया. जिसमें कश्मीर की अजादी के नारे लगे. कन्हैया कुमार के उपर झूठे मनगंढ़त आरोप लगाकर उन्हें जेल में डाल दिया गया. हालांकि कन्हैया कुमार ना ही उस कार्यक्रम के आयोजक थे और ना ही उन नारों में उनकी कोई भूमिका थी. फिर भी देश में वामपंथी राजनीति को निशाना बनाने और वाम राजनीति के गढ़ जेएनयू को बदनाम करने के लिए कन्हैया कुमार को एक बड़ी साजिश के तहत निशाना बनाया गया. जेएनयू उसके बाद लगातार मोदी सरकार के निशाने पर है. आईआईटी से आये इलेक्ट्रिक इंजीनियर और संघ के पसंदीदा उप कुलपति जिनका कोई उल्लेखनीय योगदान शिक्षा के क्षेत्र में नही रहा है, ने उसके बाद विश्वविद्यालय की दाखिला नीति के बहाने सामाजिक वंचित तबके और छात्राओं को निशाना बनाया. विश्वविद्यालय में अध्ययनरत ओबीसी और एससी, एसटी छात्रों ने दाखिले में 30 अंकों के वाइवा पर सवाल उठाया और वाइवा में शिक्षकों के भेदभाव को लेकर सवाल उठाये जिसे विश्वविद्यालय द्वारा गठित प्रो. अब्दुल नफे कमेटी ने सत्यापित किया. आंदोलन वंचित तबके के छात्रों को सवालों को अनसुना करते हुए उप कुलपति ने उन्हें पुलिस मुकदमों में फंसाने की मुहिम चलाई. उप कुलपति के बदले की भावना से आहत छात्रों ने लगातार आंदोलन रास्ता अपनाया. दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी विवि प्रशासन से कहा कि परिसर में इतनी अशांति है छात्र लगातार आंदोलन कर रहे हैं कुछ तो गलत है. आंदोलनकारी छात्रों पर कईं मुकदमें और कईं जांच उप कुलपति ने बिठा दी हैं. इस आंदोलन को लेकर जेएनयू के छात्र दिलीप यादव पांच दिनों तक आमरण अनशन पर रहे और हालत बिगडने पर उन्हें अस्पताल में दाखिल किया गया परंतु जेएनयू प्रशासन अभी भी बीमार की तरह व्यवहार कर रहा है और वंचित छात्र विरोधी अपने रवैये को बदलने के लिए तैयार नही है.

कमोबेश इसी प्रकार की वंचित वर्ग विरोधी भावना आईआईटी मद्रास प्रशासन ने अंबेडकर पेरियार स्टडी सर्कल पर रोक लगाकर दिखाई. वास्तव में यह संघ और भाजपा की ब्राहमणवादी और मनुवादी मानसिकता है जो वंचित तबकों के नेताओं की पहचान और उनकी राजनीतिक विरासत को सहन करना ही नही चाहती है. फिल्म एवं टेलिविजन इंस्टिटयूट ऑफ इण्डिया पूणे में भाजपा द्वारा सी ग्रेड फिल्मों के नायक गजेन्द्र चौहान की नियुक्ति को लेकर विरोध आंदोलन महीनों तक चला और संस्थान में शिक्षा कार्य ठप रहा. सरकार असंवेदनहीन होकर लगातार उनकी मांगों को अनसुना करती रही और छात्रों को संतुष्ट करने के लिए सरकार की तरफ से बातचीत की कोई पहल नही की गई. हालांकि एफटीआईआई के समर्थन में पूरे देश में छात्र सड़कों पर उतरे.

जाधवपुर विवि भी केन्द्र की मोदी सरकार के निशाने पर रहा. जाधवपुर विवि में अक्टूबर में आंदोलन की शुरुआत हुई और उसके बाद फरवरी 2016 के बाद जेएनयू और कन्हैया कुमार के समर्थन में और अभिव्यक्ति की आजादी के लिए छात्र सड़कों पर उतरे. इलाहाबाद विवि की छात्रसंघ अध्यक्ष ऋचा सिंह भी एबीवीपी से अपने टकराव के चलते लगातार संघी छात्र गुण्ड़ों के निशाने पर रही. छात्रसंघ अध्यक्ष जोकि एबीवीपी को मात देकर एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीती थी, उन्हें लगातार एबीवीपी का विरोध झेलना पड़ा और इस विरोध को मोदी के सत्ता में आने के बाद बेशुमार ताकत मिली और उन्होंने चुनी हुई अध्यक्षा पर विभिन्न प्रकार से हमले तेज किये. जम्मू एनआईटी भी दक्षिणपंथी छात्रों की दूषित मानसिकता का शिकार हुई. कई दिनों तक धरने और प्रदर्शनों का दौर चला अभी शान्ति हैं परंतु एक दरार स्थानीय और बाहरी के बीच दक्षिणपंथी राजनीति ने बना दी है. अभी हाल ही में अलीगढ़ विश्वविद्यालय एबीवीपी और अन्य छात्रों के बीच आपसी संघर्ष के कारण फिर से चर्चाओं में रहा है. उन पर किसी वास्तव में एबीवीपी विश्वविद्यालयों में अशांति फैलाने माहौल बिगाडने का संघी औजार भर है. चण्डीगढ़ विवि में बढ़ी फीस के खिलाफ छात्रों की नाराजगी और उस पर केन्द्र शासित प्रदेश की पुलिस का बर्बरतापूर्ण हमला पूरी दुनिया ने देखा. छात्रों को इतनी बर्बरता के साथ पीटा गया देखकर लगता था कि मानों कि उन पर बदले की भावना से हमला किया गया हो.

पाठ्यक्रम में दक्षिणपंथी बदलाव वास्तव में शिक्षण संस्थानों और नीति निर्धारक संस्थानों पर कब्जे की संघी कोशिश का एक प्रमुख प्रयास पाठ्यक्रम में बदलाव करने को लेकर भी है. संघ और भाजपा अपने सांप्रदायिक राष्ट्रवाद के एजेंडे को आगे ले जाने और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के नजरिये से देश के इतिहास को तोड मारोड कर पेश करना चाहते हैं. पाठ्यक्रम में इस प्रकार के बदलाव की कोशिशे ना केवल प्राचीन इतिहास को लेकर की जा रही हैं बल्कि बेहद चालाकी के साथ भारत के आधुनिक इतिहास के साथ भी इस प्रकार की छेडखानी करने की कोशिश संघ संरक्षित भाजपा सरकारों द्वारा की जा रही है. हॉल ही में राजस्थान की सामाजिक विज्ञान की कक्षा आठ के पाठ्यक्रम में से बेहद धूर्ततापूर्ण तरीके से भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को गायब कर दिया गया. अब उस पुस्तक में ऐसा कोई जिक्र नही है कि भारत का पहला प्रधानमंत्री कौन था.

हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक राष्ट्रवादियों का इतिहास पुनर्लेखन का यह अभियान काफी पुराना है. 1977 में बनी मोरारजी देसाई सरकार में जनसंघ के सांसदों ने इस प्रकार की मांग उस समय भी की थी. उस समय उन्होंने रोमिला थापर द्वारा लिखित मध्यकालीन भारत की किताब, आधुनिक भारत के इतिहास की बिपिन चन्द्रा और स्वतंत्रता संघर्ष की ए त्रिपाठी, बरूण डे और बिपिन चन्द्रा की किताब को पाठ्यक्रम से हटा देने का सवाल उठाया था. जिसे लेकर जनसंघ के सदस्यों ने उस समय के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को एक ज्ञापन भी दिया था. उनके ज्ञापन में कहा गया था कि इन किताबों में कुछ मुस्लिम शासकों जैसे औरंगजेब की भूमिका की कठोर आलोचना नही की गई है और स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में बाल गंगाधर तिलक और अरविंद घोष के योगदान को ठीक तरीके से सराहा नही गया है. आरएसएस ने अलग से अपने मुखपत्र आर्गेनाइजर में 23 जुलाई 1978 को इन किताबों को पाठ्यक्रम से हटाने के लिए एक अभियान चलाया था. हालांकि कुछ राज्यों में 1990 के बाद भाजपा सरकारें बनने के बाद भाजपा ने पाठ्यक्रमों में बदलाव किये भी थे. केशुभाई पटेल के नेतृत्व में 1995 में भाजपा सरकार ने गुजरात में अपनी पाठ्य पुस्तकों में पढ़ाया कि मुस्लिम, ईसाई और पारसी सभी विदेशी हैं.

दरअसल स्वतंत्रता संग्राम के दौरान तिलक और अरविंद घोष ने राष्ट्रवाद की हिदुत्ववादी अवधारणा को बढ़ाने का काम किया और हिदुत्ववादी गौरव को प्रचारित प्रसारित करने की कोशिश कांग्रेस में रहकर की. उनका मानना था कि हिंदुत्ववादी गौरव को प्रसारित करने और नये सिरे से उसकी व्याख्या करने से हिंदू एकता को बल मिलेगा. मौजूदा मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद इस दिशा में प्रयास किये हैं. मोदी सरकार में मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी ने कक्षा आठ, नौ और दस के पाठ्यक्रम में वेद, उपनिषद के कुछ हिस्सों को शामिल करने के निर्देश दिये. इसके अलावा प्राप्त रिपोर्टो के अनुसार राजस्थान सरकार ने इस दिशा में कईं कोशिशे की राज्य सरकार के शिक्षा मंत्री वासुदेव देवनानी ने एक वैकल्पिक इतिहास के प्रस्ताव को पूरा समर्थन दिया. वैकल्पिक इतिहास का यह प्रयास बताता है कि हल्दी घाटी युद्ध में वास्तव में महाराणा प्रताप की हार ही नही हुई थी और इस युद्ध में उन्होंने मुगल सम्राट अकबर को हरा दिया था. उक्त सरकार के कई अन्य मंत्रियों का भी मानना है कि अभी तक छात्र जो इतिहास पढ़ रहे हैं वह ठीक नही है और वह इतिहास विकृत है. राजस्थान सरकार पाठ्यक्रम में इस प्रकार के बदलाव के लिए कुख्यात है. कक्षा आठ की पाठ्य पुस्तक को एक समीक्षा कमेटी द्वारा फिर से तैयार किया गया. यह पुस्तक सिंधु घाटी सभ्यता को सिंधु घाटी संस्कृति के रूप में पढ़ाती और बताती है कि आर्य भारत के ही मूल निवासी थे. इस किताब में से कई नामों को योजनाबद्ध तरीके से गायब कर दिया गया है. जैसे कि किताब में स्वतंत्रता संग्राम में सरोजनी नायडू एवं अन्य कांग्रेस नेताओं की कोई चर्चा नही है. प्राप्त रिपोर्टों के अनुसार नेल्सन मंडेला और उनके प्रयास और आंदोलन किताब से गायब हैं और इसी प्रकार महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का जिक्र भी किताब में नही है. स्वतंत्रता संग्राम में जवाहर लाल नेहरू की भूमिका को काट दिया गया है.

इसके अलावा गुजरात भी इस प्रकार के प्रयोगों की जमीन बन रही है. ना केवल इतिहास को विकृत किया जा रहा है बल्कि हिटलर की गौरवशाली व्याख्या पाठ्य पुस्तकों में की गई थी. हिटलर के बारे में बताया गया कि हिटलर ने किस प्रकार जर्मन के गौरव को पुनर्स्थापित किया और नई आर्थिक नीति तैयार कर देश को एक बड़ी ताकत बनाया. हिटलर का बखान करते हुए उसे यहूदियों का विरोधी और जर्मन नस्ल की श्रेष्ठता को स्थापित करने वाला बताया गया था. 2005 में इस्राइल के राजनयिक के गुजरात दौरे के बाद और राजनयिक के विरोध के बाद इस पाठ को किताब में हटाया गया था. मई 2016 में गुजरात शिक्षा बोर्ड ने अर्थशास्त्रीय विचार नामक एक पाठ शुरू किया जिसमें दीन दयाल उपध्याय, कौटिल्य और महात्मा गांधी को अर्थशास्त्र विचार के रूप में पेश किया गया. मई 2014 में गुजरात शिक्षा विभाग ने नरेन्द्र मोदी की जीवनी को शिक्षा में शामिल करने की घोषणा की थी जिसका अनुसरण करते हुए छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश आदि राज्यों ने भी इसी प्रकार की घोषणाएं कर डाली थी. इस पाठ में उनके अर्थशास्त्रीय विचारों के अलावा उननके व्यक्तित्व पर अधिक जोर दिया गया. सितंबर 2015 में हरियाणा सरकार ने घोषणा की कि स्कूल पाठ्यक्रम में दीनानाथ बत्रा की लिखी नैतिक शिक्षा को शामिल किया जायेगा. दीनानाथ बत्रा आरएसएस समर्थित शिक्षा बचाओ आंदोलन समिति के संयोजक हैं और आजकल भाजपा शासित राज्यों की शिक्षा को नया रूप देने में लगे हैं. बत्रा कहते हैं कि लेख, प्रस्ताव, कहानी और कविताओं के माध्यम से बच्चों को भारतीय मूल्य और राष्ट्रवाद सिखाया जायेगा.

वास्तव में सांप्रदायिक राष्ट्रवाद का फासीवादी एजेंडा संघ का एक ऐसा जुड़वा एजेंडा है जो हिंदुत्ववादी फासीवाद और निगमीय विकास का गठजोड़ है और शिक्षा का सांप्रदायिकरण इसका एक प्रमुख औजार है. इसी औजार का इस्तेमाल संघ बहुआयामी तरीके से कर रहा है, जिसमें शिक्षा के निगमीकरण से लेकर शिक्षक आंदोलन पर हमले, छात्र आंदोलन को कुचलना, शिक्षण संस्थानों पर संघी मानसिकता वाले लोगों का वर्चस्व और पाठ्यक्रम में बदलाव सभी कुछ शामिल हैं.

यह लेख महेश राठी द्वारा लिखा गया है. लेखक वरिष्ठ पत्रकार है और यह इनके निजी विचार है.

10वीं पास के लिए सरकारी जॉब, 38 हजार होगी सैलरी

नई दिल्ली। दसवीं पास लोगों के लिए सरकारी नौकरी के अवसर हैं. ग्रामीण शहरी शिक्षा विकास संस्थान ( RUSVS) में 10वीं पास के लिए कई पदों पर आवेदन आमंत्रित किए गए हैं। इसके लिए विज्ञापन जारी किया गया है। पदों का विवरण:  प्रोजेक्ट मैनेजर, असिस्टेंट एकाउंटेंट, ऑफिस असिस्टेंट,  पब्लिक रिलेशन असिस्टेंट कुल पदः 444 आयु सीमा: न्यूनतम आयु 18 वर्ष और अधिकतम आयु 40 वर्ष शैक्षणिक योग्यता: मान्यताप्राप्त संस्थान से 10वीं पास होना जरूरी। अंतिम तिथि: 25 जुलाई, 2017 ऐसे करें आवेदन: इच्छुक उम्मीदवार संबंधित वेबसाइट पर क्लिक करके सावधानीपूर्वक ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया पूरी करें। उम्मीदवार आगे की चयन प्रक्रिया के लिए  ऑनलाइन आवेदन पत्र का प्रिंटआउट सुरक्षित रख लें। आवेदन शुल्कः सामान्य उम्मीदवारों को 250 रुपये और SC/ST के लिए 150 रुपये सैलरी: 38000 रुपये प्रति माह संबंधित वेबसाइट का पताः  ruralurbanshiksha.in

भाजपा नेता के घर IT का छापा, करोड़ो जब्त

भोपाल। आयकर विभाग ने भाजपा के नेता के घर पर छापेमारी करके करोड़ो रूपये की संपति जब्त कर ली है. मध्यप्रदेश के बैरागढ़ में भाजपा नेता सुशील वासवानी के घर से आयकर विभाग ने बेनामी एक्ट के तहत उनकी दस करोड़ की संपत्ति को जब्त कर ली है.

बता दें की बैरागढ़ में बन रहे एक मॉल में वासवानी का पैसा लगा है, लेकिन कागजों पर यह सन विजन इंफ्रास्ट्रक्चर एंड गुरुमुखदास कॉन्ट्रेक्टर के नाम है. मिली जानकारी के अनुसार ये राजधानी में बेनामी संपत्ति एक्ट की पहली कार्रवाई है, जबकि मध्यप्रदेश में यह दूसरा प्रकरण है.

बैरागढ़ में नोटबंदी के दौरान महानगर सहकारी बैंक पर आयकर ने छापा मारा था, जिसमें बीजेपी नेता वासवानी के खिलाफ भी कार्रवाई हुई थी. मिली जानकारी के मुताबिक, तब से ही उनकी संपत्ति की जांच चल रही थी. इस बीच उनके दस्तावेजों में कुछ बेनामी संपत्ति का रिकॉर्ड भी मिला. इसकी पड़ताल करने के बाद उन्हें नोटिस भेजा गया था.

बता दें कि वासवानी के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति रखने की शिकायत मिली थी. विभाग के दो अधिकारी भाजपा नेता के घर, दो होटल में और दो बैंक में कागजों की जांच कर रहे हैं. सुशील वासवानी राज्य आवास संघ के उपाध्यक्ष रहे हैं. जानकारी के मुताबिक वासवानी पर आरोप है कि 8 नवंबर के बाद उन्होंने कोऑपरेटिव बैंक के अपने खाते में आय से अधिक पैसा कैश के रूप में जमा किया था जिसकी जानकारी आयकर विभाग को हो गयी थी.

 

अमेरिका के इस अखबार की नजर में आतंकी हैं सीएम योगी

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Newyorks Times

हाल ही में एक अमेरिकी अखबार में काम करने वाले कार्टूनिस्ट बेन गैरिसन ने अपने एक कार्टून के जरिए भारतीय मीडिया पर हमला बोल दिया है. इस कार्टून में गैरिसन ने ज्यादातर भारतीय मीडिया घरानों खासकर टीवी चैनलों को मोदी के इशारे पर चलने वाला दिखाया है. कार्टून में गैरिसन ने मोदी को लेटे हुए दिखाया है, जबकि अन्य मीडिया हाउसों को उनका दूध पीते हुए दिखाया है.

मोदी और भारतीय मीडिया पर इस हमले के बाद अमेरिका के एक मशहूर अखबार के निशाने पर यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं. हम बात कर रहे है अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स की. अखबार ने नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर हमला बोला है. अखबार ने लिखा है कि विकास की बात कहकर तीन साल पहले केंद्र की सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार के विकास एजेंडे की जगह हिंदुत्व ने ले ली है.

अखबार ने ये भी दावा किया कि मोदी सरकार के शासन में देश के करीब 17 करोड़ मुसलमान आर्थिक और समाजिक तौर पर हाशिए पर आ गए हैं. इसके साथ ही अखबार ने योगी आदित्यनाथ के संगठन हिंदू युवा वाहिनी को आतंकी संगठन बताया है और योगी आदित्यनाथ को आतंकी संगठन का सरगना बताया है.

अखबार ने लिखा है कि उत्तर प्रदेश में एक ऐसे महंत को शासन करने के लिए चुना गया है जो कि पहले से ही नफरत भरे बोल बोलता रहा है. न्यूयार्क टाईम्स ने योगी के उस बयान को कोट किया है, जिसमें योगी ने मुसलमान शासकों द्वारा ऐतिहासिक गलतियों का बदला लेने के लिए हिन्दू युवा वाहिनी बनाने की बात कही थी. एक चुनावी रैली में योगी ने चिल्लाकर कहा था, “हम सभी धार्मिक युद्ध की तैयारी कर रहे हैं.”

नदी के तेज बहाव में वाहन सहित बह गए SDM

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जयपुर। भारी बारिश के कारण राजस्थान की नदियां उफान पर हैं. कुछ नदियों में अचानक पानी छोड़े जाने से रास्तो का कटान हो गया है. बांसवाड़ा जिले के कुशलगढ़ उपखण्ड अधिकारी रामेश्वरदयाल मीणा शुक्रवार सुबह बांसवाड़ा से कुशलगढ़ जा रहे थे. इस दौरान वे बिलड़ी के पास ढेबरी नदी पुल को पार कर रहे थे कि नदी का बहाव अचानक तेज हो गया, जिससे उनकी गाड़ी पानी में बह गई.

इस घटना को देखने वाले कुछ लोगों ने बताया की एसडीएम मीणा और वाहन चालक दोनों गाड़ी में से कूद गए थे. जिसमें चालक करीब दो किलोमीटर की दूरी पर तैर कर बाहर निकला. एसडीएम मीणा के नदी में बहने की घटना से जिला प्रशासन में हलकान मच गया. घटना की सूचना मिलने के बाद जिला अधिकारी, एसपी सहित अन्य अधिकारी मौके पर पहुंचे. एसडीएम को तलाशने के लिए आसपास के गोताखरों को लगाया गया है. साथ ही ग्रामीण भी उन्हें तलाशने में जुटे हैं.

जानकारी देते हुए एसपी कालूराम रावत ने बताया कि एसडीएम कुशलगढ़ लौट रहे थे. तभी रास्ते मे बागीदौरा और कुशलगढ़ के बीच एक रपट पर करीब पांच से सात फीट पानी चल रहा था. जिसकी अनदेखी कर एसडीएम के चालक ने वाहन पानी मे उतार दिया थोड़ा आगे चलते ही तेज बहाव में वाहन बह गया. इससे करीब दो किलोमीटर दूर चालक किसी पेड़ के सहारे से अटक गया लेकिन एसडीएम का कहीं पता नही चला.

बता दे की बांसवाड़ा में गुरुवार शाम से ही बारिश हो रही है. बारिश का दौर जारी होने से जहां सुरवानिया बांध और हेरो डेम में पानी की आवक तेज हो गई है, वहीं कुछ गांवों में दुकानों में पानी घुस गया है. उदयपुर मार्ग पर नीलगिरी के पेड़ गिर गए जिससे रास्ता जाम हो गया. कुछ गांवों में रात से ही बिजली गुल है तो कुछ जगह के रास्ते बिल्कुल बंद हो गये हैं.

     

जेल में बंद नोबेल विजेता शाओबो का निधन, 8 साल से थे जेल में बंद

शेनयांग। नोबल पुरस्कार विजेता ली शाओबो का 61 साल की उम्र में चीन की जेल में निधन हो गया है. उन्होंने देश की साम्यवादी रूढ़ियों से परे जाकर लोकतांत्रिक खुलेपन का सपना देखा था. उनके संघर्ष को सम्मानित करते हुए 2010 में उन्हें नोबल पुरस्कार दिया गया था. उनके निधन के बाद नोबेल कमेटी ने चीन को उनकी मौत का जिम्मेदार ठहराया है वहीं मानव अधिकार वाले ली की पत्नी को आजाद करने का दबाव बना रहे हैं.

शाओबो ने थ्येनआनमेन चौक पर प्रज्ज्वलित हुई संघर्ष की मशाल निरंतर जलाए रखी. 2008 से वह जेल में थे लेकिन मान्यताओं से समझौता कभी नहीं किया. वह दुश्मन भी किसी को नहीं मानते थे, यह उन्होंने अपनी पहली पुस्तक ‘नो एनीमीज’ लिखकर साफ कर दिया था. किसी के प्रति घृणा का भाव भी नहीं था, यहां तक कि कम्युनिस्टों के प्रति भी नहीं. इसका सुबूत उनकी किताब ‘नो हेटर्ड’ देती है.

शेनयांग मेडिकल यूनिवर्सिटी ने गुरुवार को बयान जारी करके शाओबो की मृत्यु की घोषणा की. उन्हें लिवर का कैंसर था जो जेल में रहते हुए ही बढ़कर अंतिम चरण में पहुंच गया था. जब हालत खराब हुई तब महीने भर पहले उन्हें जेल से निकालकर अस्पताल में भर्ती कराया गया.

शाओबो के इलाज के तरीके और स्तर को लेकर भी विवाद था. काफी कोशिश के बाद शाओबो तक पहुंचे अमेरिका और जर्मनी के डॉक्टरों ने उन्हें अविलंब विदेश के किसी अच्छे अस्पताल में पहुंचाने की आवश्यकता जताई थी लेकिन चीन सरकार उस पर तत्काल कुछ करने के लिए तैयार नहीं हुई. नतीजतन, गुरुवार को शाओबो चीन की बंदिशें तोड़कर दुनिया से विदा हो गए.

शाओबो को 2008 में चीन सरकार को राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव और मानवाधिकारों की मांग वाली याचिका देने के बाद गिरफ्तार किया गया था. यह याचिका चार्टर 08 के नाम से चर्चा में आई थी. अगले साल ही उन पर मुकदमा चलाकर 11 साल की सजा सुनाई गई. तभी से वह जेल में थे. इस दौरान उनकी पत्नी को नजरबंद कर दिया गया. लगातार तन्हाई में रहने की वजह से उनकी दशा विक्षिप्तों जैसी हो गई थी. उन्हें अपने पति से जेल में मिलने की इजाजत भी पूरे महीने में सिर्फ कुछ मिनटों के लिये थी.

बुधवार को शाओबो की दशा और बिगड़ गई थी जब उनके कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया और उन्हें सांस लेने में भी कठिनाई होने लगी थी. बावजूद इसके उन्हें वेंटीलेटर सुविधा नहीं दी गई. मानवाधिकार संगठनों ने शाओबो के स्वास्थ्य के बारे में सही जानकारी न दिये जाने का आरोप लगाया था. कहा है कि भारी सुरक्षा वाले अस्पताल से गलत जानकारियां दी जा रही हैं.

नार्वेजियन नोबेल कमेटी के प्रमुख बेरिट रेज एंडरसन ने शाओबो की मौत के लिए चीन को जिम्मेदार ठहराया है. उनका कहना है कि विश्व के कई देश उनका उपचार करने के लिए तैयार थे पर चीन नहीं माना. एंडरसन ने कहा कि 2010 में शाओबो जेल में थे जब उन्हें नोबेल मिला. तब खाली कुर्सी पर सम्मान को रखा गया था. उनका कहना है कि अब उनके सम्मान में इसे हमेशा खाली रखा जाएगा. अमेरिकी मंत्री रेक्स टिलरसन ने चीन से कहा है कि वह अब शाओबो की पत्नी को रिहा करके देश छोड़ने की अनुमति दे. जर्मनी के मंत्री हीको मास ने उन्हें हीरो करार दिया है. चांसलर एंजिला मर्केल के प्रवक्ता ने कहा कि उनकी मौत ने सवाल खड़ा किया है कि चीन सरकार ने उनका इलाज जल्द शुरू क्यों नहीं कराया.

उधर, चीन की सरकारी वेबसाइट पर शाओबो को लेकर सवाल हटा दिए गए हैं. इसके जरिये मीडिया को रोजाना ब्रीफ करने की व्यवस्था थी. चीन के मानवाधिकार कार्यकर्ता ए वेईवीई ने बर्लिन में कहा कि नोबेल विजेता की मौत चीन के क्रूर चेहरे का रूप है. मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि चीन का रवैया उसके अभिमान को दर्शाता है.

अवांछित फोन कॉल से परेशानी में भारत पहले स्थान पर

नई दिल्ली। सर्वे के अनुसार अवांछित फोन कॉल से होने वाली परेशानी के मामले में भारत अन्य देशों की श्रेणी में पहले स्थान पर है. टेलिकॉम कंपनी के लुभावने वादों औऱ बैंकों से कर्ज, कार्ड की पेशकश से लेकर ग्राहकों को फोन कनेक्शन बदलने के लिये सस्ते डेटा की जानकारी देने वाली फोन कालों से आम भारतीय दूरसंचार ग्राहक परेशान हैं। इस तरह की कॉल से परेशान देशों की सूची में भारत पहले स्थान पर है। एक सर्वे में यह निष्कर्ष निकाला गया है।

फोन डायरेक्टरी एप ट्रयूकॉलर ने अपने एक सर्वेक्षण में यह निष्कर्ष निकाला है, इसके अनुसार भारत में औसतन हर मोबाइल धारक को महीने में 22 से अधिक अवांछित कॉल मिलती हैं।

इस मामले में भारत का स्थान अमेरिका, ब्राजील, चिली व दक्षिण अफ्रीका आदि देशों से उपर है। अमेरिका व ब्राजील में दूरसंचार ग्राहक को औसतन हर महीने इस तरह की 20 फोन काल आती हैं जिनमें बैंकों की ओर से कार्ड या कर्ज की पेशकश की जाती है या दूसरी दूरसंचार कंपनियों के प्रतिनिधि सस्ती काल दरों की पेशकश करते हुए लुभाते हैं।

अल्पसंख्यक परिवार पर भीड़ का ट्रेन में हमला

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आगरा। कुछ दिन पहले रेल में यात्रा करते हुए हरियाणा के एक अल्पसंख्यक की मौत का मामला अभी ठंडा भी नहीं हुआ था की अब उत्तर प्रदेश के मैनपुरी के पास ट्रेन में फिर से शर्मनाक घटना हुई है.

यह घटना शिकोहाबाद-कासगंज पैसेंजर ट्रेन की है जिसमें सफर कर रहे 10 सदस्यों वाले एक अल्पसंख्यक परिवार को भीड़ ने निशाना बनाकर मार पिटाई शुरू कर दी. इस परिवार में महिलाओं और बुजुर्गों के साथ ही एक दिव्यांग शख्स भी परिवार के साथ सफर कर रहा था पर गुंडो की भीड़ ने किसी को नहीं छोड़ा, सभी के साथ मार पिटाई की गयी.

घटना की जानकारी देते हुए अस्पताल में भर्ती परिवार के एक सख्स ने बताया की हम पर इसलिए हमला हुआ क्योंकि हमारे कपड़े और पहचान उनसे अलग नजर आ रही थी. पुलिस ने मामले में एफआईआर दर्ज कर ली है.

50 साल के पीड़ित मोहम्मद शाकिर ने बताया, ‘भोगांव के पास हम ट्रेन में चढ़े.  ट्रेन ने सिर्फ 4 किमी. तक की ही दूरी तय की होगी जब एक शख्स ने मेरे बेटे दिव्यांग बेटे फैजान का फोन छीन लिया.’ शाकिर ने बताया, ‘फोन छीनने का फैजान ने विरोध किया तो उन लोगों ने मारपीट शुरू कर दी. परिवार की महिलाओं और फैजान को गालियां देने लगे.’ 10 लोगों में से 4 को फ्रैक्चर हुआ है वहीं लगभग सभी सदस्यों को सिर और पेट में चोट लगी है. शाकिर कहते हैं, ‘निबाकरोरी स्टेशन पर जब ट्रेन रुकने वाली थी उससे कुछ पहले इन लोगों ने चेन खींच दी. इसके बाद कुछ और लड़के रॉड लेकर घुस गए और एक साथ हम पर हमला कर दिया.’

मामले की जांच कर रहे पुलिस अधिकारी ने कहा, ‘ऐसा लग रहा है कि पीड़ित महिलाओं को प्रताड़ित किया गया है. उनके शरीर पर चोट के निशान हैं और साथ ही कपड़े भी फटे हुए हैं. फिलहाल वो लोग ज्यादा कुछ कहने की हालत में नहीं है. हमने मामले की जांच शुरू कर दी है. दोषियों को पकड़ लिया जाएगा. गौरतलब है कि पिछले कुछ दिनों में अल्पसंख्यको पर यह दूसरी बड़ी घटना है.

मीरा कुमार ने की मायावती से मुलाकात, मांगा राष्ट्रपति पद के लिए समर्थन

Meira kumar meet Mayawati

लखनऊ। राष्ट्रपति पद के चुनाव की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आ रही है वैसे-वैसे उम्मीदवार अपने लिए समर्थन जुटाने में तेजी से जुट गए हैं. इसी सिलसिले में विपक्ष की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार मीरा कुमार आज लखनऊ पहुंची. आज पहले वह बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती से बसपा ऑफिस में मिली. उनके साथ कांग्रेस के नेता प्रमोद तिवारी व राजबब्बर भी थे. मायावती ने मीरा कुमार का ज़ोरदार स्वागत किया. मायावती के साथ बसपा के महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा भी मौजूद थे.

इस मुलाकात के ज़रिए मीरा कुमार ने मायावती से अपने लिए समर्थन की अपील की. बता दें, मायावती पहले ही मीरा को इस पद के लिए सही उम्मीदवार मान चुकी हैं. मीरा कुमार अब राष्ट्रपति चुनाव के लिए समाजवादी विधायकों से मतों की अपील करेंगी. मीरा लखनऊ में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव से भी मिलेंगी. साथ ही वो कांग्रेस समेत रालोद और दूसरे सहयोगी दलों के नेताओं से भी मुलाकात कर समर्थन जुटाएंगी.

बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है. मायावती ने कहा कि बसपा देश के राष्ट्रपति पद के चुनाव में रामनाथ कोविंद को समर्थन नहीं देगी. बसपा मीरा कुमार का साथ देगी. बसपा के राष्ट्रीय महासचिव सतीश मिश्रा ने कहा कि बसपा सुप्रीमो ने निर्देश दिया है कि पार्टी की तरफ से मीरा कुमार का समर्थन किया जाए.

राष्ट्रपति पद के राजग प्रत्याशी राम नाथ कोविंद यहां पहले ही आकर अपने लिए वोटों की लाबिंग कर चुके हैं. उन्होंने अपने प्रचार अभियान की शुरुआत ही लखनऊ से की थी, जबकि लोकसभा की पूर्व अध्यक्ष मीराकुमार यहां उत्तराखंड के बाद आई हैं. मीराकुमार का इस प्रदेश से राजनीतिक जुड़ाव भी रहा है. पूर्व में वह बिजनौर से चुनाव लड़ चुकी हैं, जिसमें उन्होंने मायावती और राम विलास पासवान को हराया था.

गौरतलब है कि समाजवादी पार्टी के विधानसभा में 47 विधायक हैं, जबकि बहुजन समाज पार्टी के 19 विधायक हैं. कांग्रेस के सात विधायकों का मत उन्हें हासिल हो सकता है. देश में 17 जुलाई को नए राष्ट्रपति के के लिए चुनाव होने जा रहे हैं, जिसके तहत केंद्र की सत्ता पर काबिज एनडीए के रामनाथ कोविंद के मुकाबले में विपक्ष की ओर से पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार उम्मीदवार हैं. लखनऊ में विधानभवन के तिलक हॉल में 17 जुलाई को दस बजे से शाम पांच बजे तक मतदान होगा. वोटिंग तिलक हॉल के चार टेबल पर होगी.

खुशखबरीः रेलवे में जल्द होगी 1 लाख पदों पर भर्ती

नई दिल्लीभारतीय  रेलवे ने खाली पड़े पदों पर भर्तियों को जल्द ही भरने का निर्णय लिया है. रेलवे ने  करीब 1 लाख पदों के लिए भर्ती करने की तैयारी शुरू कर दी हैं. वर्तमान सरकार जल्द ही बेरोजगारों को राहत देने के लिए रेलवे में भर्ती की प्रक्रिया शुरू कर सकती है. बताया जा रहा है कि इसमें ज्यादातर पद सेफ्टी से जुड़े होंगे. सरकार के इस कदम से बेरोजगारों को काफी रहत मिलेगी.

असल में यह भर्तियां रेलवे के अलग-अलग रिजन में निकाली जाएगी जिसमें वेस्टर्न, सेंट्रल, हार्बर नॉर्थ सेंट्रल रेलवे, ईस्टर्न रेलवे आदि शामिल है. सभी भर्तियों में पदों के काम अनुसार उम्मीदवारों की योग्यता आदि तय की जाएगी और आरक्षण संबंधी नियमों के आधार पर उम्मीदवारों को कई वर्ग में छूट भी मिलेगी. पिछले कुछ सालों में इतने बड़े पैमाने में भर्ती नहीं हुई है.

बताया जा रहा है कि सभी भर्तियां अलग-अलग चरणों में होगी. अलग-अलग कैटिगरी के लिए अलग समय पर भर्ती हो सकती है. इस समय रेलवे में सेफ्टी से जुड़े 2.5 लाख पद खली है. रेलवे की यूनियन भी सरकार से इन पदों को भरने की मांग कर रही है जिसके लिये अंतिम प्रक्रिया शुरु हो चुकी है.