पटना की रैली के बाद कौन पड़ा लालू यादव के पीछे

पटना। पटना में 27 अगस्त को लालू यादव के नेतृत्व में हुई विपक्ष की रैली के बाद उऩपर शिकंजा कसने लगा है. आयकर विभाग ने राजद को नोटिस जारी कर रैली के खर्च का हिसाब मांगा है. आयकर विभाग ने अपने नोटिस में पूछा है कि इतनी बड़ी रैली के लिए पैसा कहां से जुटाया गया.

इससे पहले मंगलवार को आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय की संयुक्त टीम ने लालू के छोटे बेटे और पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव और पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी से घंटों बेनामी संपत्ति के मामले में पूछताछ की थी.

असल में इस रैली में पहुंचने वाले कार्यकर्ताओं के रहने के लिए बड़े-बड़े शामियाने लगाए गए थे. साथ ही भोजन की भी व्यवस्था की गई थी. पार्टी के मुताबिक रैली में हिस्सा लेने के लिए राजद के जो भी समर्थक पटना पहुंचे थे, उनके रहने और खाने पीने का इंतजाम पार्टी के 80 विधायक, सात पार्षद और तीन सांसदों के जिम्मे था.

आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में ‘देश बचाओ, बीजेपी भगाओ’ रैली आयोजित की थी. रैली में लालू यादव ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर जमकर निशाना साधा था. इस रैली में लालू यादव और उनके परिवार के अलावा शरद यादव, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, गुलाम नबी आजाद, सीपीआई नेता डी राजा आदि मंच पर मौजूद थे.

लालू यादव के खिलाफ आयकर की इस कार्रवाई को कई लोग बिहार के नए गठबंधन की राजनैतिक बौखलाहट मान रहे हैं. माना जा रहा है कि रैली में पहुंचे राजद समर्थकों की भारी भीड़ के कारण लालू यादव और उनके परिवार को परेशान करने के लिए नीतीश कुमार और भाजपा की सरकार नोटिस भेजकर लालू यादव को घेरना चाहती है.

सब्सिडी वाला गैस सिलेंडर हुआ 8 रु. महंगा

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नई दिल्ली। तेल कंपनियों ने सब्सिडी वाले गैस सिलेंडर में 8 रुपए और गैर-सब्सिडी वाले सिलेंडर में 74 रुपए की बढ़ोतरी की है. नई दरें शुक्रवार से लागू हो गईं. सरकार ने कहा था कि हर महीने सब्सिडी वाले सिलेंडर के रेट 4 रुपए बढ़ेंगे. इंडियन ऑयल कंपनी के मुताबिक, दिल्ली में सब्सिडी वाला सिलेंडर अब 487.18 रुपए का मिलेगा. अभी तक यह 479.77 रुपए का था.

केंद्र ने सिब्सिडी वाले एलपीजी सिलेंडर की कीमत अगले साल मार्च तक हर महीने 4 रुपए बढ़ाने का ऑर्डर दिया था. ऐसा कर सरकार मार्च, 2018 तक घरेलू गैस सिलेंडरों पर मिल रही छूट खत्म करना चाहती है. पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अगस्त में संसद में कहा था, ”पिछले साल सरकार ने ऑयल कंपनियों को सब्सिडी पर मिलने वाले सिलेंडरों (14.2 KG) के दाम हर महीने 2 रुपए बढ़ाने का ऑर्डर दिया था, लेकिन अब इसे 4 रुपए कर दिया है.” यानी अगले साल मार्च तक सिलेंडर की कीमत 32 रुपए बढ़ेगी.

नए रेट के मुताबिक, दिल्ली में अब गैर-सब्सिडी वाला एलपीजी सिलेंडर 597.50 रु. का मिलेगा. पहले इसकी कीमत 524 रुपए थी. सरकार एक फाइनेंशियल ईयर में सब्सिडी दरों में कंज्यूमर को 14.2 किलो वाले 12 सिलेंडर सब्सिडी दरों पर देती है. इससे ज्यादा सिलेंडर लेने पर गैर-सब्सिडी की कीमत अदा करनी होती है.

न्यूज एजेंसी के मुताबिक, मई में जारी सरकार के नए ऑर्डर और जीएसटी लागू होने के बाद ऑयल कंपनियां दो बार सिलेंडरों के दाम बढ़ा चुकी हैं. जुलाई में सिलेंडर एक साथ 32 रुपए महंगे हुए, जो पिछले 6 साल में सबसे ज्यादा था. देशभर में 18 करोड़ के ज्यादा कंज्यूमर एलपीजी सब्सिडी का फायदा ले रहे हैं. इनमें पिछले एक साल के दौरान प्रधानमंत्री उज्ज्वला स्कीम के तहत बांटे गए 2.5 करोड़ कनेक्शन भी शामिल हैं. इसके अलावा 2.66 करोड़ कंज्यूमर गैर-सब्सिडी सिलेंडर इस्तेमाल करते हैं.

आदिवासियों को बांटकर अपना वर्चस्व बनाये रखना चाहती है झारखंड सरकार?

 

झारखंड आंदोलन के दिनों झारखंडी समाज ने जो एकजुटता और मूल्य विकसित किये थे लगता है अब वे तेजी से विघटित हो रहे हैं. कुछ समय पहले राजनीतिक अस्थिरता की वजह से अराजकता की स्थिति थी, अब एक सशक्त सरकार के होने के बावजूद असंतोष जैसी अवस्था है. फिलहाल दो मुद्दों पर झारखंड के समाज में बहस चल रही है- एक युवा आदिवासी लेखक सोवेंद्र शेखर हांसदा का मामला और दूसरा हाल ही में झारखंड सरकार द्वारा पारित ‘झारखंड धर्म स्वतंत्र विधेयक 2017’ का मामला. इन दोनों मुद्दों के दावे कथित आदिवासी हित से संबंधित हैं.

युवा आदिवासी लेखक एवं साहित्य अकादमी सम्मान से सम्मानित सोवेंद्र शेखर हांसदा के लेखन को आदिवासी विरोधी घोषित कर कुछ गुटों ने उनके विरुद्ध राजनीतिक घेरेबंदी तैयार की. यह मुद्दा बहुत तुल पकड़ता गया और इसको लेकर विधानसभा तक में हंगामा हुआ. सोवेंद्र पर आरोप है कि वे आदिवासी स्त्रियों का अश्लील चित्रण करते हैं और उन्हें आदिवासी जीवन दर्शन की समझ नहीं है. यह बात ऐसे प्रचारित की गयी कि देखते ही देखते यह अस्मिता का शुद्धतावादी रूप ग्रहण कर लिया और आदिवासी समाज का एक समूह अपने ही लेखक के विरुद्ध हो गया. परिणामस्वरूप उनकी किताबों पर प्रतिबंध लगा दिया गया, साथ ही उन्हें उनकी नौकरी से भी निलंबित कर दिया गया.

कुछ लोगों को सोवेंद्र की कहानी पुस्तक ‘द आदिवासी विल नॉट डांस’ और उपन्यास ‘द मिस्ट्रीयस एलिमेंट्स ऑफ रूबी बास्के’ से आपत्ति है. किसी रचना से असहमति और आपत्ति स्वाभाविक बात हो सकती है. साहित्य और चिंतन की दुनिया में बिना असहमति से विचार में नयापन संभव ही नहीं है. लेकिन, किसी से असहमत होकर उसकी जुबान बंद करा देना कहां तक उचित है? साहित्य में आलोचना की जगह होती है. आलोचना और आलोचक रचनाकार को सचेत करते हैं. उसके लिए साहित्यिक कसौटी होती है. यहीं रचनाकार और उसकी रचना की वैधता जांची जाती है और उसकी उम्र तय होती है. लेकिन, किसी साहित्यकार की रचना का फैसला उससे बाहर फौजदारी तरीके से किया जाना अलोकतांत्रिक है. जिस शुद्धतावादी नजरिये से सोवेंद्र की लेखनी पर हमला किया गया, उससे क्या यह नहीं लग रहा है कि कथित आदिवासी अस्मिता और जीवन दर्शन की बात करनेवाले ठीक उसी तरह की कट्टरता प्रदर्शित कर रहे हैं, जिस तरह इस्लामिक और हिंदू कट्टरतावादियों ने कभी सलमान रश्दी को तो कभी एमएफ हुसैन को प्रतिबंधित किया था? अगर यही नजरिया उचित है तो फिर सआदत हसन मंटो का साहित्य कहां रखा जायेगा? यह चिंताजनक बात है. साहित्य के राष्ट्रीय परिदृश्य में लगभग गायब आदिवासी उपस्थिति के बावजूद एक युवा आदिवासी लेखक पर प्रतिबंध लगाना क्या यह आदिवासी बौद्धिकता के विरुद्ध साजिश नहीं है?

दूसरा मुद्दा है आदिवासियों के धर्मांतरण का. झारखंड सरकार ने अभी हाल में ही ‘झारखंड धर्म स्वतंत्र विधेयक 2017 ’ पारित किया है. इस विधेयक के बारे में सरकार यह दावा कर रही है कि वह इसके द्वारा आदिवासियों के जबरन धर्म परिवर्तन को रोकेगी. सरकार को लगता है कि यहां आदिवासियों का तेजी से ईसाईकरण हो रहा है. लेकिन, यह विधेयक मूलत: आदिवासियों के ईसाईकरण को रोकने के बजाय आदिवासियों के हिंदुत्वकरण का मार्ग प्रशस्त करनेवाला है. यह आदिवासी हित का नहीं, बल्कि आरएसएस के एजेंडे का हिस्सा है. आरएसएस का ध्यान बहुत पहले से झारखंड के आदिवासियों पर केंद्रित है, वह इसलिए नहीं कि यहां ईसाईकरण बढ़ रहा है, बल्कि इसलिए क्योंकि यहां के आदिवासी समुदायों ने संगठित होकर अलग ‘सरना धर्म कोड’ की मांग शुरू कर दी है.

देश में ग्यारह करोड़ की आबादी वाले आदिवासी समुदाय की धार्मिक पहचान के लिए कहीं भी कोई ‘कॉलम’ की व्यवस्था नहीं है. वे ‘अन्य’ में ही खुद को शामिल करते हैं. आमतौर पर उन्हें ‘हिंदू’ मानकर उनकी धार्मिक पहचान का हरण कर लिया जाता है, जबकि आदिवासी ‘हिंदू’ नहीं हैं. इसलिए अब आदिवासी समुदाय अपने ‘सरना धर्म’ के ‘कोड’ की मांग को लेकर देशव्यापी आंदोलन कर रहे हैं. इस आंदोलन ने पूरे देश के आदिवासी समुदायों को एक धार्मिक पहचान का विचार दिया. प्रसिद्ध आदिवासी चिंतक डॉ रामदयाल मुंडा ने आदिवासी धर्म और आध्यात्मिकता को वैचारिक आधार देते हुए ‘आदि धरम’ नाम से महत्वपूर्ण किताब लिखी है. यह विचार संघ के ‘एक धर्म हिंदू’ का प्रतिपक्ष है.

पिछली बार जब रांची में आरएसएस के सह सरकार्यवाह डॉ कृष्ण गोपाल जी ने कहा था कि ‘आदिवासियों को ‘सरना धर्म कोड’ की जरूरत नहीं है, संघ उन्हें हिंदू मानता है’- तब आदिवासी समाज में इसकी व्यापक प्रतिक्रिया हुई थी. संघ यह बिल्कुल नहीं चाहता कि आदिवासी हिंदुत्व के फ्रेम से बाहर हो जायें. उन्हें रोकने के लिए कोई न कोई वैधानिक रास्ता जरूरी था. इस विधेयक के द्वारा कठोरता के साथ ईसाईयत पर दबाव बनाया जायेगा और यह आदिवासियों के हिंदुकरण के लिए मार्ग प्रशस्त करेगा. भाजपा और संघ के विचार में आदिवासी हिंदू हैं. लेकिन, सवाल यह है कि आदिवासियों को ‘हिंदू’ मानना क्या उनका धर्मांतरण नहीं है? अगर संघ या भाजपा को आदिवासी अस्मिता की चिंता होती, तो वह तत्काल ‘सरना धर्म कोड’ लागू कर देती. इससे न आदिवासियों के ईसाईकरण का खतरा होता, न उनके हिंदू होने या अन्य होने का भय होता. लेकिन यह उनके लिए ही जोखिम भरा दांव है. कांग्रेस या अन्य दल भी ‘सरना धर्म कोड’ के पक्ष में नहीं हैं. आदिवासियों को हथियाने की केवल होड़ है.

ऐसी खींचतान में आदिवासी ‘आदिवासी’ हैं का विचार कहीं खो जाता है और आदिवासी अस्मिता और अस्तित्व के मूल मुद्दे भटका दिये जाते हैं. युवा लेखक सोवेंद्र शेखर का मामला हो या आदिवासियों के धर्मांतरण का मामला, इस तरह के मुद्दे उछालनेवालों में आदिवासियत की भावना नहीं है. वे आदिवासियों को बांटकर अपना वर्चस्व बनाये रखना चाहते हैं. वे आदिवासियों के ‘मसीहा’ होना चाहते हैं. लेकिन, आदिवासियों को आत्मनिर्णय का अधिकार दिये बिना कोई कैसे उनका चिंतक हो सकता है?

डॉ. अनुज लुगुन, सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया साभारः प्रभात खबर

आधे से ज्यादा आबादी वाला समाज क्यों है दलित और पिछड़ा?

इस देश के सभी नागरिक स्वतंत्र हैं? क्या यह प्रश्न कुछ अटपटा लगा. यदि हां, तो आप में चिंतन की थोड़ी संभावना अवशेष है. यदि नहीं तो इसका अनुमान आप स्वयं लगाये. इस देश मे समस्या इसी बात की है कि आप अपने दायित्वों और कर्तव्यों को दूसरे के हाथों मे सौंपकर कौए की भांति सौ साल जीने की परिकल्पना में मस्त हैं. जब आपने अपने जीवन की डोर दूसरे के हाथों में दे दी है तो बेसब्री से उसके अंगुलियों की हरकतों का इंतजार करना आपकी लाचारी है.

सदाचारी बनने के लिए सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता हासिल करनी होती है, यह कार्य दुरूह नहीं है. जहां एक प्रख्यात विधिवेत्ता और लोकतंत्र के जनक डा. अम्बेडकर ने भारत में लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली स्थापित करके राजतंत्र और अधिनायकवाद के कैफिन में 26 जनवरी 1950 को अंतिम कील ठोक दी थी. जब उन्होंने भारतीय संविधान को समस्त देशवासियों से अंगीकृत और आत्मार्पित करने की वचनबद्धता ग्रहण करा दी. आधुनिक भारत के शिल्पी डा. अम्बेडकर ने उस समय एससी, एसटी, ओबीसी और विशेष तौर से महिलाओ को आगाह किया था कि “जब तक आप सभी सामाजिक स्वतंत्रता हासिल नहीं कर लेते, कानून आपको जो भी स्वतंत्रता देता है वह आपके किसी काम की नहीं है.

कानून ने आपको किसी भी परीक्षा मे उत्तीर्ण होने की स्वतंत्रता दी थी, परंतु सामाजिक स्वतंत्रता के अभाव मे आपने IAS में उत्तीर्ण होने के बावजूद सेवा और अपने समाज का प्रतिनिधित्व करने का अवसर खो दिया. क्योंकि आपने सामाजिक स्वतंत्रता हासिल करने के अपने दायित्व को फरेबी हांथो मे सौंप दिया, ज़िन्होंने अपनी फितरत से 314 पिछड़ी जाति के चयनित IAS उम्मीदवारों को को सड़क पर ला पटका, बेरोजगार कर लाचार कर दिया. कम से कम अब तो सामाजिक स्वतंत्रता हासिल करने की प्रतिबद्धता दिखाईये, नहीं तो पक्षपाती निष्ठुर हाथों में अपना गला घुटता देखते रहिये और कानून की दुहाई देते रहिये, जो पक्षपात और अर्थशास्त्र के भारतनाट्यम में व्यस्त है.

इतिहास बताता है कि जहां नैतिकता और अर्थशास्त्र के बीच संघर्ष होता है वहां जीत हमेशा अर्थशास्त्र की होती है. निहित स्वार्थो को तब तक स्वेच्छा से नहीं छोड़ा गया है जब तक मजबूर करने के लिए पर्याप्त बल न लगाया गया हो. पिछड़ी जाति के चयनित 314 IAS उम्मीदवारों ने नैतिकता और अर्थशास्त्र के बीच जबरदस्त संघर्ष खड़ा कर दिया था, जहां नैतिकता दिखाने का तात्पर्य था कि पिछड़ी जातियो को अर्थशास्त्र के लिहाज से मजबूत करनात. ज़िन्होंने पिछड़ी जातियो को मजबूर रखने की कसमें खा रखी हैं वो कैसे नैतिक हो सकते थे. लिहाजा उन्होंने नैतिकता को लात मारकर अर्थशास्त्र पर विजय प्राप्त करना श्रेयस्कर समझा. उन्हें यह ज्ञात है कि पिछड़ी जातियां संख्या बल में विशालकाय होने के बावजूद राजनीतिक तौर पर फिसड्डी है, इसलिये ये पर्याप्त बल प्रयोग नहीं कर सकते. क्योंकि इनके धर्म की संप्रभुता पिछड़ी जातियो को इनके अधीन रखने मे पूर्णतया सक्षम है.

यदि हम एक संयुक्त एकीकृत आधुनिक भारत चाहते हैं तो सभी धर्मो के शास्त्रों की संप्रभुता का अंत होना चाहिये. सभी स्वावलंबी देशवासियों का आह्वान है कि एकीकृत भारत और मजबूत राष्ट्रनिर्माण के लिए सभी धर्मावलंबियों को शास्त्रों की संप्रभुता के अंत के लिए तत्पर होकर मजबूत और अखण्ड राष्ट्रनिर्माण की नैतिकता प्रदर्शित करनी चाहिये. जो इसमें बाधक बने उसे राष्ट्रद्रोही घोषित करके सरकार को पक्षपात से ऊपर उठकर राज्य धर्म का पालन करते हुए, ऐसे देशद्रोहियो को कठोरतम सजा देनी चाहिये. “भारत छोड़ो” आन्दोलन के 75वें वर्षगांठ पर आईये शपथ ले कि जिस तरह हमने अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर किया उसी तरह “फरेबियों और पक्षपातियों” को भारत से बेदखल करके छोडेंगे.

देश की आधे से ज्यादा आबादी वाले समाज को पिछड़ा क्यों कहा गया, क्या इससे हीन भावना नहीं आती जो व्यक्ति की गरिमा को चिथड़े करती हो? जिस देश मे लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली हो, व्यस्क मताधिकार का अधिकार हो, इन खूबियों के बावजूद 52 प्रतिशत आबादी वाला समाज अधिकारों से प्रवंचित हो, कुछ वजहें तो होगी ही, इनकी असफलता की? यह गंभीर और चिन्तनीय प्रकरण है. इस देश में दो तरह की विचारधाराए सक्रिय है… 1. अगड़ा वर्ग जो पिछड़ी जातियों को अपने पीछे रखने और अपना चरण स्पर्श कराते रहने की साजिशों मे लगी रहती हैं. 2. अनुसूचित वर्ग जो इन्हे बड़े भाई का सम्मान देकर परस्पर कदम ताल से चलने व गले मिलने को आतुर है, जिन्हें यह हेय दृष्टी से देखते हैं.

अगड़ो की इस कुटिल साजिश को यह समझ ही नहीं पाते और कवच बन अगड़ों की सेवा में तल्लीन रहना अपनी नीयति मान बैठना इनके पिछड़े होने की सबसे बड़ी वजह है. पिछड़ी जातियों की पिछड़ा वर्ग बनाने की निष्क्रियता और अकर्मण्यता ही अधिकारों से वंचित होने की मुख्य वजह है. पिछड़ी जातियां पिछड़ा वर्ग न बने इसकी हर कवायद में पुरोहितवाद सक्रिय रहता है. यह उद्धरण कितना सटीक है कि “जब तक इस धरती पर बेवकूफ लोग ज़िन्दा रहेंगे ज़रा सा भी चालाक आदमी खाने के लिये नहीं मरेगा”. कल्पना करिए शातिर क्या करेगा?

इनके अधिकारों पर इतिहास में पहली बार इतना बड़ा हमला किया गया है, इस समाज के संघ लोक सेवा आयोग से चयनित 314 IAS उम्मीदवारों को साजिश के तहत एक झटके मे बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. यानि कि पिछड़ी जाति के 314 ज़िलाधिकारियों को बेरोजगार करके सड़क पर पटक दिया गया फिर भी फ्रिज में जमे इनके खून में कोई ऊबाल नहीं आया. यूपी में 80 ज़िले हैं यानि कि हिन्दी भाषी क्षेत्र से पिछड़ो के प्रतिनिधि सभी ज़िलाधिकारियों को हटा दिया गया, बल्कि उनकी नौकरियां छीन ली गयी. यदि ऐसी घटना अगड़े समाज के साथ होती तो कोहराम मच जाता, उनका खून जो खौलता है. यदि आपके धमनियों रुधिर है तो सजा दो ऐसी सरकार को जिसने आपके रक्त को गंदी नाली का पानी समझने की गुस्ताखी की है?

यह लेख गौत्तम राने सागर ने लिखा है.

आफताब शिवदासानी ने श्रीलंका में की दूसरी शादी

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नई दिल्‍ली। ‘मस्‍ती’ और ‘ग्रेंड मस्‍ती’ जैसी फिल्‍मों में नजर आ चुके आफताब शिवदासानी ने श्रीलंका में रॉयल अंदाज में शादी की है, लेकिन उन्‍होंने यह शादी अपनी ही बीवी निन दोसांझ से की है. जून 2014 में शादी कर चुके इस जोड़े ने एक बार फिर हिंदू रीति-रिवाज से शादी की है और इस रॉयल शादी के फोटो आफताब ने सोशल मीडिया पर भी पोस्‍ट किए हैं.

दरअसल 2014 में आफताब और निन ने कोर्ट मैरेज की थी. ऐसे में श्रीलंका में छुट्टियां मनाते हुए इस जोड़े ने अपनी शादी को खूबसूरत अंदाज में करने का मन बनाया. इंस्‍टाग्राम पर आफताब ने इस शादी का एक फोटो पोस्‍ट की है जिसमें निन दोसांझ डिजाइनर योशिता के डिजाइन किए हुए सॉफ्ट पिंक जोड़े में नजर आ रहा है.

आफताब ने एक फोटो सोशल मीडिया पर शेयर करते हुए लिखा, ‘मेरी प्रिय, तुम्‍हारे लिए अपने प्‍यार को मैं शब्‍दों में बयां नहीं कर सकता. मैं इससे ज्‍यादा खुश नहीं हो सकता. मैं तुम्‍हें अपनी जिंदगी में पाकर हर दिन ईश्‍वर का शुक्रिया अदा करता हूं. ‘निन की बहन प्रवीण दोसांझ ने भी इस शादी के अपडेट सोशल मीडिया पर दिए हैं. प्रवीण ने एक्‍टर कबीर बेदी से शादी की है. आफताब की इस शादी में उनके दोस्‍त तुषार कपूर भी शामिल हुए हैं.

जेल से बाहर आए राम रहीम के पड़ोसी ने खोले कई राज

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रोहतक। रोहतक जेल में बंद गुरमीत राम रहीम के पड़ोसी रहे दलित नेता स्वदेश किराड़ ने जेल से बाहर आने के बाद कई राज खोला है. साध्वी के यौन शोषण मामले में रोहतक की सुनारिया जेल में बंद राम रहीम दो दिनों तक शोर मचाने के बाद अब शांत है. जेल के अंदर राम रहीम को चक्की में बंद किया गया है. चक्की जेल प्रशासन की अप्रूवल सेल को कहते हैं, जिसमें 12 कैदियों के रहने की जगह होती है.

जेल में राम रहीम को दो काले कंबल और बिछाने के लिए बिस्तर दिया गया है. साथ ही दो नंबरदार दिए गए हैं. 24 अगस्त को जेल पहुंचने के बाद बाबा ने 25 और 26 अगस्त को कुछ नहीं खाया. इसके बाद वह खाना खाने लगा है. खाने में मिनरल वाटर की बोतल और फल वह अपने कैदी वाले खाते से ले रहा है. हालांकि वह बहुत कम बात करता है. बाबा को उसके सेल से बाहर नहीं निकाला जा रहा है. और न ही किसी औऱ को उसके सेल के आस पास जाने दिया जा रहा है. यहां पर केवल गिने चुने स्टॉफ मेंबर को ही जाने की इजाजत है.

जेल के बाहर अब भी सुरक्षा घेरा बना हुआ है. पहले यहां जेल के तीन किलोमीटर तक सुरक्षा घेरा था, जिसे अब एक किलोमीटर कर दिया गया है. यहां से आगे जाने से पहले हर किसी से कड़ी पूछताछ की जा रही है.

इससे पहले 24 अगस्त को जेल पहुंचने के बाद राम रहीम जेल के अंदर चिल्लाता रहता था कि मैं की कित्ता-साड्डा की कसूर.

ब्लू व्हेल ने ली एक और जान, सुसाइड नोट में लिखा-‘कभी इससे निकल नहीं सकते’

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मदुरै। तमिलनाडु के मदुरै में एक 19-वर्षीय छात्र ने बुधवार शाम को पंखे से लटककर आत्महत्या कर ली है, और पुलिस का कहना है कि यह कदम मोबाइल गेम ‘ब्लू व्हेल चैलेंज’ से जुड़ा हुआ है.

पुलिस को विग्नेश के बाएं हाथ पर उकेरी गई व्हेल मछली की तस्वीर भी मिली है, जिसके नीचे ‘Blue Whale’ लिखा भी हुआ है. एक पुलिसकर्मी ने बताया कि उसके कमरे से एक सुसाइड लेटर भी मिला है. इसमें लिखा है, ‘ब्लू व्हेल कोई खेल नहीं बल्कि खतरा है और एक बार इसमें घुसने के बाद आप कभी इससे निकल नहीं सकते.’

तमिलनाडु में ब्लू व्हेल गेम से यह पहली मौत है. पुलिस ने बताया कि मृतक बीकॉम सैकंड ईयर का छात्र था. बुधवार सुबह उसके पिता ने उसे फंदे से लटकता हुआ पाया.

केंद्र सरकार ने ब्लू व्‍हेल गेम को बैन कर दिया था. केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने गूगल, फेसबुक, वॉट्सऐप, याहू इंडिया, इंस्‍टाग्राम और माइक्रोसॉफ्ट को ब्‍लू व्‍हेल से जुड़े लिंक्स को हटाने को कहा है. साथ ही इस तरह के गेम से जुड़ा मामला सामने आने पर पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने को भी कहा है.

देश के कई हिस्सों से ब्लू व्हेल गेम के चलते मौतों के मामले सामने आए हैं. इस गेम के आखिर में मौत ही विकल्‍प होता है. बच्‍चे इसके ज्‍यादा शिकार बन रहे हैं. बताया जाता है कि इस गेम की शुरूआत रूस से हुई. 22 साल के फिलिप बुडेकिन नाम के शख्स ने इसे बनाया. फिलिप वर्तमान में तीन साल के लिए जेल में हैं.

मोदी केबिनेट में फिर होगा बदलाव, 6 मंत्रियों ने दिया इस्तीफा

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ब्रिक्स सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए चीन रवाना होने वाले हैं. यह सम्मेलन 3 से 5 सितंबर के तक होगा. इससे पहले वो अपने मंत्रिमंडल का विस्तार करेंगे. इस विस्तार के चलते जहां राजीव प्रताप रूडी, फग्गन सिंह कुलस्ते और उमा भारती समेत 6 मंत्रियों के इस्तीफे मांग लिए गए हैं वहीं इनकी जगह नए लोगों को जगह दी जा सकती है. कैबिनेट मंत्रियों ने गुरुवार रात अपने इस्तीफे भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को सौंपे हैं.

जिन लोगों ने इस्तीफा दे दिया है उनमें जल संसाधन मंत्री उमा भारती, कलराज मिश्र, महेंद्रनाथ पांडेय, कौशल विकास और राजीव प्रताप रुडी, संजीव बालियान और फग्गन सिंह कुलस्ते शामिल हैं. रेल मंत्री सुरेश प्रभु पहले ही इस्तीफे की पेशकश कर चुके हैं.

उम्मीद की जा रही है कि मोदी मंत्रिमंडल में उन राज्यों नए चेहरों को जगह मिल सकती है जहां आने वाले वक्त में विधानसभा चुनाव होने हैं. इसके अलावा मोदी मंत्रिमंडल के फेरबदल में मिशन 2019 का असर भी नजर आ सकता है. ऐसे में साफ है कि कैबिनेट में बड़ा बदलाव अगले 2 दिनों के भीतर ही होने जा रहा है.

इन सारे बदलावों के बीच माना जा रहा है कि आने वाले कुछ ही दिनों में होने वाला कैबिनेट बदलाव साल 2019 के आम चुनावों से पहले का आखिरी बड़ा बदलाव होगा. सरकार का आखिरी साल तो चुनावी तैयारियों में ही बीतता है. यानी नए विभाग संभालने वाले मंत्रियों के पास अपना काम दिखाने के लिए एक साल से भी कम का वक्त होगा.

इस्तीफे के बाद राजीव प्रताप रुडी ने कहा, ‘पार्टी का निर्णय हुआ कि आप अपना इस्तीफा दें, ये बिल्कुल सामान्य है. सरकार में काम करने का मौका मिला, आगे भी पार्टी में काम करने का मौका मिले बस इसी अभियान के साथ चलते हैं. ये सरकार और प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार होता है. इस में कोई तर्क नहीं होता.’

गुरुवार को अरुण जेटली, नरेंद्र तोमर समेत कई वरिष्ठ मंत्रियों ने बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से मुलाकात भी की है. वैसे तो इस बैठक को गुजरात चुनाव की तैयारियों के लिए बुलाया गया था लेकिन इस दौरान केंद्रीय कैबिनेट पर चर्चा की बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता.

वित्त और रक्षा मंत्री जेटली ने भी बड़े फेरबदल के साफ संकेत दिए हैं. एक कार्यक्रम में आए जेटली ने कहा है कि उन्हें नहीं लगता कि अब ज्यादा दिन उन्हें 2-2 मंत्रालयों का भार संभालना होगा.

आप हमेशा हमारे कप्तान रहेंगे: कोहली

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कोलंबो। भारत ने चौथे वनडे में श्रीलंका को 168 रनों से रौंद डाला. विराट कोहली (131) और रोहित शर्मा (104) के शतकों से 5 विकेट पर 375 रन बनाए. जवाब में श्रीलंका की पारी 42.4 ओवरों में 207 रनों पर सिमट गई. भारत ने अब पांच मैचों की सीरीज में 4-0 की बढ़त बना ली है. इस हार के साथ ही श्रीलंका का 2019 विश्व कप के लिए सीधे क्वालीफाई करना थोड़ा मुश्किल हो गया.

गुरुवार को खेले गए सीरीज का चौथा वनडे महेंद्र सिंह धोनी का 300वां वनडे मैच था. गुरुवार को मैच शुरू होने से पहले धोनी को भारतीय टीम ने चांदी से बना बल्ला भेंट किया. इस दौरान कप्तान विराट कोहली ने भावुक अंदाज में धोनी से कहा, “आप हमेशा हमारे कप्तान रहेंगे. हम में से 90 प्रतिशत खिलाड़ियों ने अपना करियर आपकी कप्तानी में शुरू किया. आपको यह स्मृति चिह्न देना सम्मान की बात है और आप हमेशा हमारे कप्तान रहोगे.’

धोनी 300 वनडे मैच खेलने वाले छठे भारतीय हैं. इससे पहले सचिन तेंडुलकर, मोहम्मद अजहरुद्दीन, राहुल द्रविड़, सौरव गांगुली और युवराज सिंह यह मुकाम हासिल कर चुके हैं.

बलात्कारी बाबा की बेटी के खिलाफ ‘लुकआउट नोटिस’ जारी, लगा देशद्रोह का आरोप

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नई दिल्ली। गुरमीत राम रहीम को कोर्ट से भगाने के मामले में पुलिस ने हनीप्रीत के खिलाफ हरियाणा पुलिस ने लुकआउट नोटिस जारी कर दिया है. हनीप्रीत राम रहीम की मुंहबोली बेटी है. डेरा प्रमुख को दोषी करार देने के बाद राम रहीम के गनमैन उसे कोर्ट से भगाकर लेकर जाना चाहते थे.

इस पूरे मामले की साजिश हनीप्रीत ने रची थी, जिसके चलते पुलिस ने हनीप्रीत के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर दिया है. वहीं हनीप्रीत के विदेश भागने की आशंका के चलते पुलिस ने उसके और डेरे के प्रवक्ता के खिलाफ लुकआउट नोटिस भी जारी किया है, ताकि वे कहीं विदेश ना भाग जाए .

25 अगस्त को डेरा प्रमुख राम रहीम को सीबीआई की स्पेशल कोर्ट ने साध्वियों से यौन शोषण मामले में दोषी ठहराया था. सूत्रों की मानें तो दोषी ठहराए जाने के बाद राम रहीम को भगाने का प्लान तैयार किया गया था. हरियाणा पुलिस और सेना की मुस्तैदी से उनके प्लान पर पानी फिर गया.

रेप के दोषी गुरमीत राम रहीम को 20 साल की सजा हो गई है, लेकिन उनके साथ साये की तरह रहने वाली हनीप्रीत गायब है. वह राम रहीम की गोद ली हुई बेटी है. पहले इनका नाम प्रियंका तनेजा था बाद में वह हनीप्रीत बन गईं. वह राम रहीम के साथ कई फिल्मों में काम कर चुकी है. वह उसी हेलीकॉप्टर में सवार थीं, जिसमें राम रहीम को पंचकूला कोर्ट तक लाया गया था. डेरा सच्चा सौदा में हनीप्रीत की सबसे ज्यादा चलती है इसलिए उन्हें डेरा की अगली उत्तराधिकारी के तौर पर भी देखा जा रहा था.

हरियाणा के फतेहाबाद की रहने वाली हनीप्रीत और विश्वास गुप्ता की शादी राम रहीम ने ही कराई थी. हालांकि दोनों की शादी ज्यादा दिन नहीं चल सकी. कुछ समय बाद उसने राम रहीम से शिकायत की कि उसके ससुराल वाले दहेज के लिए परेशान कर रहे हैं. इसके बाद राम रहीम ने साल 2009 में उसे गोद ले लिया था. हालांकि राम रहीम पहले से ही तीन बच्चों का बायलॉजिकल पिता है, जिनमें दो बेटियां अमनप्रीत, चमनप्रीत और बेटा जसमीत इंसा शामिल हैं.

बेनजीर हत्याकांड में दो पुलिसवालों को 17 साल की सजा, मुशर्रफ भगोड़ा घोषित

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इस्लामाबाद। बेनजीर भुट्टो हत्‍या मामले पर आतंक निरोधी अदालत की ओर से गुरुवार को फैसला सुनाया गया जिसमें दो को कैद और पांच आरोपियों को बरी कर दिया गया. साथ ही परवेज मुशर्रफ को फरार घोषित कर दिया गया है.

पाकिस्तान में दो बार प्रधानमंत्री रहीं बेनजीर भुट्टो की 27 दिसंबर 2007 को रावलपिंडी के लियाकत बाग में एक चुनावी रैली के दौरान हत्या कर दी गई थी. हत्या के तत्काल बाद मामला दर्ज किया गया था जिसकी सुनवाई बुधवार को रावलपिंडी में खत्म हुई. सुनवाई के दौरान कई उतार-चढ़ाव आए. हत्या के समय बेनजीर की उम्र 54 साल थी. आतंकवाद विरोधी अदालत के न्यायाधीश असगर खान ने गुरुवार को इस मामले में फैसला सुनाया. अदालत में रावलपिंडी के पूर्व सीपीओ सउद अजीत और रावल टाउन के पूर्व पुलिस अधीक्षक खुर्म शहजाद मौजूद थे.

अजीज और शहजाद को 17 साल जेल की सजा सुनाई गई. अदालत ने उन्हें पांच-पांच लाख रुपये का जुर्माना अदा करने का भी निर्देश दिया. अदालत ने पांच अन्य आरोपियों को बरी कर दिया और मुशर्रफ को भगोड़ा घोषित किया. उनकी संपत्ति जब्त करने का भी आदेश दिया गया है. जब बेनजीर की हत्या की गई थी तब परवेज मुशर्रफ पाकिस्तान के राष्ट्रपति थे और वह भी बेनजीर मामले में एक आरोपी थे.

पांचों संदिग्धों के खिलाफ मुख्य सुनवाई जनवरी 2008 में शुरू हुई जबकि मुशर्फ, अजीज तथा शहजाद के खिलाफ सुनवाई फेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी की नयी जांच के बाद 2009 में शुरू की गई. इस अवधि में आठ अलग- अलग न्यायाधीशों ने मामले की सुनवाई की जिन्हें विभिन्न कारणों से बदला भी गया.

आदित्य की हत्या में पूर्व जदयू एमएलसी का बेटा रॉकी यादव दोषी करार

पटना। गया के आदित्य सचदेवा हत्याकांड (गया रोडरेज केस) में फैसला आ गया है. बिहार के गया में 16 महीने पहले हुए आदित्य मर्डर केस में कोर्ट ने जदयू की निलंबित एमएलसी मनोरमा देवी के बेटे रॉकी यादव समेत तीन को दोषी ठहराया है.कोर्ट अब 6 सितंबर को रॉकी समेत तीनों दोषियों की सजा का एलान करेगा.

रॉकी ने 7 मई 2016 को सड़क पर गाड़ी को साइड ना देने के चलते हुए विवाद में रॉकी यादव ने आदित्य सचदेवा को गोली मार दी थी. आदित्य के साथ उसके चार दोस्त भी कार में सवार थे. लैंड रोवर पर सवार रॉकी और उसकी मां मनोरमा देवी के बॉडीगार्ड राजेश कुमार ने उन्हें रोका और पहले मारपीट की. जब आदित्य और उसके दोस्त भागने लगे तो फायरिंग की गई. गोली आदित्य के सिर में लगी और मौके पर ही उसकी मौत हो गई.

मृतक आदित्य सचदेवा महज 19 साल का था. 12वीं में पढ़ने वाला आदित्य कार की पिछले सीट पर बैठा था. आदित्य के पिता एक कारोबारी हैं. गोली उसके सिर में लगी थी.

इस मामले में रॉकी यादव के साथ घटना के वक्त मौजूद टेनी यादव और एमएलसी के बॉडीगार्ड राजेश कुमार को जेल भेजा गया था. फिलहाल टेनी यादव और राजेश कुमार बाहर है और रॉकी यादव अभी भी जेल में है.

आपको बता दें कि रॉकी यादव नेशनल शूटिंग चैंपियनशिप भी जीत चुका है. उसे घातक हथियार रखने का शौक था और इनकी तस्वीरें भी वो फेसबुक पर डालता रहता था. रॉकी इटली में बनी .380 बोर की बरेटा पिस्टल अपने पास रखता था.

रॉकी दिल्ली में पढ़ाई और फायरिंग क्लब में प्रैक्टिस साथ-साथ करता था. वह 2010 से नेशनल राइफल्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया का सदस्य था. 2014 में आयोजित 57 वीं नेशनल शूटिंग चैंपियनशिप में विजेता बनने के बाद रॉकी को सात हथियार रखने की अनुमति मिल गई थी.

300वां वनडे मैच खेल रहे हैं धोनी, रचेंगे कई इतिहास

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कोलंबो। महेंद्रसिंह धोनी गुरुवार को कोलंबो में श्रीलंका के खिलाफ अपना 300वां अंतरराष्ट्रीय वनडे खेल रहे हैं. ऐसे में पूरी संभावना है कि भारत के पूर्व कप्तान धोनी कोई इतिहास रचें. धोनी दुनिया के ऐसे एकमात्र कप्तान है जिनके नेतृत्व में टीम इंडिया ने आईसीसी के तीनों खिताब जीते. उनकी अगुआई में टीम इंडिया ने 2007 टी20 विश्व कप, 2013 चैंपियंस ट्रॉफी और 2011 वनडे विश्व कप खिताब अपने नाम किए.

यदि सफल रन चेज में सबसे ज्यादा औसत की बात की जाए तो धोनी ने इसमें विराट कोहली और एबी डी’विलियर्स जैसे दिग्गजों को पीछे छोड़ा है. इस मामले में धोनी का औसत आश्चर्यजनक रूप से 101.84 है.

सुरेश रैना ट्वीट कर धोनी को 300वें मैच के लिए शुभकामनाएं दी.

धोनी वनडे में छक्के लगाने के मामले में भारत के वीरेंद्र सहवाग, तेंडुलकर और विराट जैसे बल्लेबाजों से भी आगे हैं. 300वां वनडे मैच खेल रहे धोनी अभी तक 209 छक्के लगा चुके हैं, वे भारत की तरफ से 200 से ज्यादा छक्के लगाने वाले एकमात्र बल्लेबाज हैं.

धोनी के नाम छठे या उससे निचले क्रम में बल्लेबाजी कर सबसे ज्यादा रन बनाने का रिकॉर्ड दर्ज है. वे वनडे में छह या निचले क्रम में बल्लेबाजी कर अभी तक 4601 रन बना चुके हैं. धोनी के नाम वनडे में सबसे ज्यादा रनों की पारी खेलने वाले विकेटकीपर का रिकॉर्ड भी दर्ज है. यह कारनामा उन्होंने 31 अक्टूबर 2005 को जयपुर में श्रीलंका के खिलाफ किया था ‍जब उन्होंने नाबाद 183 रनों की पारी खेली थी.

इसके अलावा बीसीसीआई ने एक वीडियो शेयर करते हुए लिखा, हम धोनी मील का पत्थर साबित होने वाले 300वें मैच के लिए तैयार हैं, क्या आप हैं.

इतिहास रच सकते हैं धोनी धोनी ने अपने वनडे करियर के इतिहास में आज कई कीर्तिमान बना सकते हैं. आज वे अपना 300 वां वनडे मैच खेलेंगे. साथ ही वें 100 स्टंप आउट करने के जादुई आंकड़े को छूने से महज एक स्टंप दूर हैं. गौरतलब है कि धोनी ने श्रीलंका के खिलाफ पल्लेकेल वनडे में 99वीं बार स्टंपिंग की थी. धोनी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के तीनों प्रारूपों में भारत की तरफ से सबसे ज्यादा शिकार करने वाले विकेटकीपर है. उनके नाम 299 मैचों में 737 शिकार दर्ज है. धोनी के नाम वनडे में श्रीलंका के कुमार संगकारा के साथ सबसे ज्यादा स्टम्पिंग का रिकॉर्ड दर्ज है। दोनों 99-99 स्टम्पिंग कर चुके हैं. धोनी के पास इस रिकॉर्ड को तोड़ने का मौका है.

नोटबंदी को लेकर सामने आया सरकार का झूठ

नई दिल्ली। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की ओर से जारी किए गए नोटबंदी से जुड़े आंकड़ों ने एक बार फिर हड़कंप मचा दिया है. RBI की आंकड़ों की मानें तो नोटबंदी एक तरह का फ्लॉप शो रहा, और इसको लेकर जितने बड़े दावे किए जा रहे थे, वैसा कुछ भी नहीं हुआ.

आंकड़ों के सामने आने से नोटबंदी के बाद बैंकों में वापस जमा हुई रकम यह बता रही है कि देश के करेंसी मार्केट में ब्लैक मनी उस अनुपात में मौजूद नहीं थी, जितना सरकार दावा कर रही थी. पिछले साल 8 नवंबर की आंधी रात को नोटबंदी की घोषणा को ऐतिहासिक फैसला बताते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने दावा किया था कि उनका यह फैसला आतंकवाद और नक्सलवाद की कमर तोड़ कर रख देगा, लेकिन ऐसा कुछ भी होता नजर नहीं आ रहा है. अमेरिकी विदेश मंत्रालय की तरफ से जारी आंकड़े बताते हैं कि 2015 के मुकाबले 2016 में भारत में आतंकी हमलों में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई. नोटबंदी की घोषणा को बड़ा फैसला बताते हुए प्रधानमंत्री ने कहा था कि इससे सरकार को ‘काला धन, आतंकी फंडिंग और नकली करेंसी’ को रोकने में मदद मिलेगी. लेकिन आरबीआई के आंकड़ों ने सरकार के दावे पर ही सवाल उठा दिया है. मोदी ने कहा था कि ये कदम भ्रष्टाचार, कालेधन और नकली नोटों के खिलाफ लड़ाई को तेज करेगा. मैं सभी देशवासियों से इस महायज्ञ में मदद करने की अपील करता हूं. इसके अलावा नोटबंदी को लेकर सरकार में भी विरोधाभासी बयान आ रहे हैं. प्रधानमंत्री मोदी ने जहां नोटबंदी की घोषणा करते हुए इसका उद्देश्य काले धन, भ्रष्टाचार औऱ आतंकवाद को रोकना बताया था तो वहीं वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इससे बिल्कुल उलट बयान दिया है. वित्त मंत्री अरुण जेटली का कहना है कि नोटबंदी का लक्ष्य पैसे को जब्त करना नहीं था बल्कि इसे आधिकारिक प्रणाली में लाना और फिर उस पर कर लगाना था. साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि सरकार का अगला कदम चुनावों में कालेधन पर लगाम कसना होगा. हालिया आकड़ों के सामने आने के बाद कांग्रेस ने भी भाजपा पर निशाना साधा है. कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट किया कि यह कदम ‘‘भारी आपदा’’ है जिससे ‘‘निर्दोष लोगों की मौत हुई’’ और अर्थव्यवस्था को ‘‘तबाह’’ कर दिया. ‘‘क्या प्रधानमंत्री अपराध स्वीकार करेंगे’’.

तो वहीं नोटबंदी को लेकर पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदंबरम द्वारा दिया आंकड़ा सरकार को सवालों के घेरे में खड़ा करता है. चिदंबरम ने ट्विट कर दावा किया कि नोटबंदी के दौरान नोटों की छपाई में 21 हजार करोड़ रुपये खर्च हुए जबकि आरबीआई के पास सिर्फ 16 हजार करोड़ रुपये वापस आए. चिदंबरम की मानें तो नोटबंदी से सरकार को सीधे तौर पर 5 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है.

चिदंबरम में ट्विट में लिखा ‘‘99 फीसदी नोट कानूनी रूप से बदले गए. क्या नोटबंदी कालेधन को सफेद करने के लिये तैयार की गयी योजना थी?’’ उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि नोटबंदी के कदम के पीछे जो अर्थशास्त्री था वह ‘‘नोबल पुरस्कार का हकदार’’ है क्योंकि आरबीआई के पास 16,000 करोड़ रुपये आए लेकिन नए नोटों की छपाई में 21,000 करोड़ रुपए खर्च हो गए.

मायावती ने अपनी रैली के कार्यक्रम में किया बदलाव

मेरठ। सहारनपुर के शब्बीरपुर मामले पर राज्यसभा से इस्तीफा देने और उसके बाद 18 सितंबर से प्रदेश भर में कार्यकर्ता सम्मेलन का ऐलान करने वाली बसपा प्रमुख मायावती ने अपने कार्यक्रम में बदलाव कर दिया है. पहले दो मंडलों को मिलाकर एक रैली की घोषणा करने वाली बसपा ने इसे बदलते हुए अब तीन मंडल पर एक रैली कर दिया है. इसी के साथ अब 18 सितंबर को मेरठ में होने वाली रैली में मेरठ, सहारनुपर और मुरादाबाद के कार्यकर्ता शामिल होंगे. पार्टी का मानना है कि कुल नौ रैली में नौ महीने लगते, जो काफी लंबा वक्त हो जाता. इस बदलाव से अब नौ की जगह कुल छह रैली होगी. दो रैलियों के बीच महीने भर के अंतर को भी घटाया जा सकता है. हालांकि मेरठ की रैली के बाद आगे की रैलियों का कार्यक्रम तय होने की खबर है.

असल में बसपा प्रमुख मायावती द्वारा ऐसा करने के पीछे शक्ति प्रदर्शन भी माना जा रहा है. बीएसपी सूत्रों की मानें तो रणनीति में बदलाव कर बसपा… गैर बीजेपी दलों को अपनी ताकत दिखाना चाहती है. लालू यादव द्वारा पटना में बुलाई गई रैली के पहले मायावती ने साफ किया था कि गठबंधन बनने से पहले सीटों का बंटवारा जरूरी है. ऐसे में माना जा रहा है कि बीएसपी का प्लान अपना जनाधार दिखाकर दूसरे दलों से ज्यादा सीट हासिल करने का है. इस सम्मेलन से जुड़ी एक खबर यह भी आ रही है कि इसमें बसपा प्रमुख मायावती का निशाना केंद्र और यूपी सरकार दोनों पर रहेगा. और इसके जरिए चुनावी समीकरण साधे जाएंगे. खबर है कि सम्मेलन में दलित, मुस्लिम और किसानों से जुड़े मुद्दे के अलावा मायावती तमाम केंद्रीय मुद्दों को भी उठाएंगी. मेरठ में होने वाले कार्यकर्ता सम्मेलन के प्रभारी मुनकाद अली तीनों मंडलों के पार्टी पदाधिकारियों और प्रमुख लोगों के साथ रैली की तैयारियों में जुट गए हैं. पहले सम्मेलन में ढाई से तीन लाख कार्यकर्ताओं के शामिल होने की उम्मीद जताई जा रही थी, लेकिन अब रैली के दो मंडलों की बजाए तीन मंडलों के कार्यकर्ताओं के शामिल होने पर इस टारगेट को 5 लाख कर दिया गया है. देखना होगा कि इस बदली रणनीति के साथ बसपा अपनी इन रैलियों के जरिए केंद्र और अन्य विपक्षी पार्टियों को क्या संदेश दे पाती है.

विकास की कीमत चुकाते आदिवासी

पिछली एक शताब्दी में ‘विकास’ की सबसे ज्यादा कीमत किसी ने चुकाई है तो वे हैं आदिवासी. उनकी अमीरी ही उनके लिए अभिशाप बन गई. जिस वनभूमि पर उनका आवास है, वह अपने गर्भ में कोयला, लोहा, बॉक्साइट, हीरा, यूरेनियम आदि बहुमूल्य खनिज छिपाए हुए है. बिना इन वनों के विनाश के इस संपदा का दोहन मुमकिन नहीं है. आदिवासियों के शत्रु और भी हैं, जैसे उनकी सरलता-निष्कपटता और भोलापन! कभी उनकी वनोपज और वन से संग्रहीत उत्पादों को नमक के मोल पर खरीदा जाता था और कभी समाप्त न होने वाले ऋणों के बदले उनसे आजीवन और पीढ़ी दर पीढ़ी बंधुआ मजदूरी कराई जाती थी और उनकी स्त्रियों का अंतहीन शोषण किया जाता था.

आदिवासियों को छला जा सकता है क्योंकि वे भोले हैं, लेकिन वे कायर नहीं हैं. उन्हें दबाया नहीं जा सकता. भारत के स्वाधीनता संग्राम का एक अचर्चित पाठ आदिवासियों के प्रखर संघर्ष का भी है. स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास में ऐसे सैकड़ों उदाहरण बिखरे पड़े हैं जो एक नए विमर्श की शुरुआत कर सकते हैं. इनमें आदिवासियों की वीरगाथाएं भरी पड़ी हैं. विचारधारा और संगठनात्मक कौशल की दृष्टि से अनगढ़ आदिवासी आंदोलनों का बर्बरता से दमन किया गया, जिनमें अपार जनहानि हुई. आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिए संवैधानिक प्रावधानों में पांचवीं और छठी अनुसूची प्रमुख है. पांचवीं अनुसूची में देश के दस राज्यों के वे क्षेत्र शामिल हैं, जहां आदिवासियों की जनसंख्या पचास प्रतिशत से अधिक है. इन क्षेत्रों में आदिवासी जीवन शैली और जीवन दर्शन की रक्षा करते हुए आदिवासियों की रूढ़ियों, परंपराओं और मान्यताओं के अनुरूप शासन चलाने और विकास योजनाओं का निर्माण तथा संचालन करने का प्रावधान है.

ठी अनुसूची में उत्तर-पूर्व के वे राज्य रखे गए हैं जहां आदिवासियों की जनसंख्या अस्सी प्रतिशत तक है. इन क्षेत्रों में आदिवासियों की पारंपरिक कानून व्यवस्था लागू है और भूमि का क्रय-विक्रय प्रतिबंधित है. पांचवीं और छठी अनुसूचियां राज्यपालों को विशेष शक्तियां और अधिकार देती हैं. लेकिन इन प्रावधानों का कितना पालन हो रहा है यह जगजाहिर है. पंचायत एक्सटेंशन इन शेड्यूल एरिया कानून यानी पेसा 1996 में पारित किया गया जो आदिवासियों की भूमि के अधिग्रहण के लिए ग्राम सभा की अनुमति को आवश्यक बनाता है. दिसंबर 2006 में संसद द्वारा पारित और सरकार द्वारा 1 जनवरी 2008 से अधिसूचित वन अधिकार कानून, 13 दिसंबर 2005 से पूर्व वन भूमि पर काबिज अनुसूचित जनजाति के सदस्यों को वनों में निवास करने और इनसे आजीविका अर्जित करने का अधिकार देता है.

सवा सौ वर्ष पुराने ब्रिटिशकालीन भूमि अधिग्रहण कानून का स्थान लेने वाला 2013 का नया भूमि अधिग्रहण अधिनियम जमीन के उचित मुआवजे, पुनर्वास और पुनर्स्थापन का दावा करता है और बिना किसानों की सहमति के निजी उद्योगपतियों द्वारा उनकी भूमि के अधिग्रहण पर रोक लगाता है तथा सामाजिक प्रभाव के आकलन को अनिवार्य बनाता है. इन क्रांतिकारी आदिवासी हितैषी कानूनी प्रावधानों के बावजूद आंकड़े बताते हैं कि स्वतंत्रता के बाद करीब पांच करोड़ एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया जा चुका है या उसके उपयोग में परिवर्तन किया जा चुका है. इस अधिग्रहण से प्रभावित पांच करोड़ लोगों में बहुसंख्य आदिवासी हैं. आदिवासियों की आजीविका और जीवन शैली का आधार परंपरागत कृषि रही है जिसे धीरे-धीरे हाशिए पर धकेला गया है.

आदिवासियों की स्थिति समाज के अन्य समुदायों की तुलना में अब भी बहुत पिछड़ी है. विकास के हर पैमाने पर- शिक्षा, स्वास्थ्य, आयु, आय, रोजगार, शिशु मृत्यु दर, मातृ सुरक्षा आदि- सभी में वे राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे हैं. व्यापक भ्रष्टाचार ने आदिवासी विकास के लिए जारी की गई विपुल धनराशि की जमकर बंदरबांट की है. आधुनिक आर्थिक विकास का तूफानी प्रवाह आदिवासियों तक पहुंचा और उनकी संपन्नता को बहा ले गया. आदिवासी नई आर्थिक गतिविधियों और वित्तीय संस्थाओं का लाभ उठाने के लिए परिपक्व नहीं थे.

नतीजतन, दूसरे तबकों के साथ प्रतिस्पर्धा में वे टिक न पाए और विकास संपन्नता के स्थान पर गरीबी लाने का माध्यम बन गया. छठी अनुसूची में आने वाले उत्तर-पूर्व के आदिवासी इलाकों में उग्रवाद और पांचवीं अनुसूची में आने वाले कुछ राज्यों के कतिपय क्षेत्रों में नक्सलवाद पनपा.शासन इसे विकास में सबसे बड़े अवरोध के तौर पर देखता है. बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि स्थिति ठीक विपरीत है- विकास के अभाव में उग्रवाद और नक्सलवाद ने अपनी जड़ें जमाई हैं.

इसी से जुड़ा यह विमर्श भी है कि क्या उग्रवाद और नक्सलवाद की समस्या को कानून व्यवस्था की समस्या माना जाए या इसे एक सामाजिक-आर्थिक समस्या मानकर हल करने की चेष्टा की जाए और यह भी कि राह से भटके आदिवासियों के साथ क्या उग्रवादी और नक्सली जैसा व्यवहार किया जाए या इन्हें उग्रवाद और नक्सलवाद के पीड़ित के रूप में आकलित किया जाए. हाल के वर्षों में पलायन आदिवासियों की सर्वप्रमुख समस्या रही है. कृषि ही जब मुनाफे का धंधा न रही हो तब परंपरागत कृषि के लाभप्रद होने की तो आशा ही व्यर्थ है और इसी पारंपरिक कृषि और वनोपजों के संग्रहण पर आदिवासियों की अर्थव्यवस्था आधारित रही है.

आदिवासी अर्थव्यवस्था सूदखोरों और वन माफियाओं के द्वारा आक्रांत रही है. तमाम कागजी कानूनों और जमीनी जन प्रतिरोधों के बावजूद पिछले डेढ़ दशक में कोयला और खनिज उत्खनन की मात्रा तथा इन पर आधारित पावर एवं स्टील उद्योगों की संख्या बढ़ी है. आदिवासियों को आधा-तीहा मुआवजा देकर उनकी जमीन से उन्हें बेदखल किया गया है. मुआवजे की राशि का संचय या सदुपयोग करने के लिए आवश्यक कौशल के अभाव में आदिवासियों ने पैसा भी खर्च कर दिया. मालिक से नौकर बने आदिवासियों को या तो अपनी जमीन पर बने कारखानों में अकुशल श्रमिक बनना पड़ता है या रोजगार की तलाश में पलायन करना पड़ता है. इसी पलायन से जुड़े हैं मानव तस्करी, देह व्यापार और बंधुआ मजदूरी. कमाने खाने के लिए लंबे समय तक बाहर रहने वाले आदिवासी बिल्कुल अपने घुमंतू आदिवासी साथियों की भांति कई बार जनगणना आदि में सम्मिलित नहीं किए जाते और अनेक लाभों से वंचित रह जाते हैं.

आदिवासियों की अधिकांश समस्याओं का समाधान ऐसी शिक्षा हो सकती है जो उनकी मातृभाषा में दी जाए और जिसका पाठ्यक्रम कृषि, वानिकी, वनौषधि, लोकगीत, संगीत, नृत्य, खेल, युद्ध कौशल आदि को समाहित करता हो. लेकिन प्रचलित शिक्षा का माध्यम और पाठ्यक्रम दोनों आदिवासियों की सभ्यता और संस्कृति की उपेक्षा पर आधारित है. राजनीति में प्रवेश कर शीर्ष स्थान पर पहुंचने वाले आदिवासी नेताओं में भी अपनी सर्वश्रेष्ठता का अहंकार देखने में आता है.

अंतर केवल इतना होता है कि वे चुनावी राजनीति के लिए आदिवासियों से जुड़कर भी पिछड़ेपन को बरकरार रखना चाहते हैं ताकि उन्हें मुद्दों का अभाव भी न हो और पिछड़े आदिवासी समाज में उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी भी उभर न सकें. वास्तव में अगर आदिवासियों की भलाई कोई सरकार चाहती है तो उसे नेहरूजी के उन विचारों पर अमल करना होगा, जो उन्होंने ‘आदिवासी पंचशील’ में कहे थे. नेहरू ने कहा था, ‘आदिवासियों को अपनी प्रतिभा और विशेषता के आधार पर विकास के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए. हमें उन पर कुछ भी थोपने से बचना चाहिए. उनकी पारंपरिक कलाओं और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए हर संभव प्रयत्न करना चाहिए.’

राजू पांडेय का यह लेख जनसत्ता से साभार

बीमा, बैंकिंग और PSU के अधिकारियों को नहीं मिलेगा आरक्षण का लाभ

नई दिल्ली। पीएसयू और बैंकिंग सेक्टर में आरक्षण को लेकर मोदी सरकार ने बड़ा फैसला किया है. अब पब्लिक सेक्टर कंपनियों (PSU) और सरकारी वित्तीय संस्थानाओं (सरकारी बैंक और बीमा कंपनियां) में काम करने वाले ओबीसी अधिकारियों को आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकेगा. अबतक ये लाभ उनके बच्चों को मिलता रहा है. मोदी सरकार ने आज ये अहम फ़ैसला लिया है. फ़ैसले का मक़सद आरक्षण का लाभ इन संस्थानों में छोटे पदों पर काम कर रहे ओबीसी कर्मचारियों तक पहुंचाना है.

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पिछले सप्ताह क्रीमी लेयर की सीमा 6 लाख रुपए से बढाकर 8 लाख रुपए की दी थी। उन्होंने बताया कि क्रीमी लेयर की सीमा तय करने का आधार महंगाई को बनाया जाता है। जेटली ने कहा कि क्रीमी लेयर के लिए सालाना आदमनी और सामाजिक स्थिति को आधार बनाया जाता है।

देशभर में क़रीब 300 पब्लिक सेक्टर की कंपनियां हैं जिनमें एनटीपीसी (NTPC), ओएनजीसी (ONGC), सेल (SAIL), भेल (BHEL), आईओसी (IOC) और कोल इंडिया (COAL INDIA) जैसी कंपनियां शामिल हैं. वहीं सरकारी वित्तीय संस्थानों में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ बड़ौदा और पंजाब नेशनल बैंक जैसे सरकारी बैंक और एलआईसी जैसी सरकारी बीमा कंपनियां शामिल हैं.

पीएसयू, बीमा कंपनियों और सरकारी बैंकों के अधिकारियों के बच्चे अब ओबीसी आरक्षण का लाभ नहीं ले सकेंगे. ऐसी कंपनियों-संस्थाओं में अब नीचे के स्तर पर कार्यरत कर्मचारियों के बच्चों को ही ओबीसी आरक्षण का लाभ मिलेगा. इससे पहले सरकार ओबीसी आयोग को संवैधानिक दर्जा देने का निर्णय ले चुकी है. हालांकि अभी इस फैसले के लागू होने में संसद की बाधा बरकरार है.

क्यों हुआ ये फ़ैसला? दरअसल मंडल कमीशन की सिफ़ारिशें लागू होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 1992 में इंदिरा साहनी केस में फ़ैसला सुनाते हुए सरकार को निर्देश दिया था कि ओबीसी के अंदर सामाजिक और आर्थिक रूप से संपन्न लोगों को आरक्षण की परिधि से बाहर का एक फॉर्मूला बनाया जाए. इसके बाद सरकार की एक विशेषज्ञ कमिटी ने क्रीमी लेयर का फॉर्मूला तैयार किया था. इस फॉर्मूला के तहत क्रीमी लेयर के छह पैमाने बनाए गए जिनमें आय के अलावा पद को भी शामिल किया गया.

केंद्र और राज्य सरकारों के तहत आने वाले ग्रुप ‘ए’ और ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों को क्रीमी लेयर के तहत माना गया जिन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलता है. लेकिन 24 साल बीतने के बाद भी पब्लिक सेक्टर कंपनियों और सरकारी वित्तीय संस्थानों में सरकारी सेवा के ग्रुप ए और बी का समकक्ष अभी तक निर्धारित नहीं किया गया था. जिसके चलते इन संस्थानों में काम कर रहे अधिकारियों के बच्चों को आरक्षण का लाभ मिल रहा था. आज मोदी सरकार ने इस विसंगति को दूर कर दिया है.