मुंबई में पांच मंजिला इमारत गिरने से 10 लोगों की मौत, 15 घायल

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मुंबई। मुंबई में बारिश और जलभराव की समस्याओं के बीच डोंगरी के जेजे फ्लाईओवर के पास पांच मंजिला इमारत गिर गई है. इमारत गिरने से 7 लोगों की मृत्यु हो गई है जबकि 10 लोग घायल बताए जा रहे हैं. इनमें से पांच की हालत गंभीर है. यह भी आशंका जताई जा रही है कि अब भी 35 लोग मलबे में फंसे हो सकते हैं.

भिंडी बाजार के पास स्थित यह पांच मंजिला इमारत सुबह करीब 8:30 बजे अचानक गिर गई. बताया जा रहा है कि यह इमारत पहले से ही जर्जर अवस्था में थी. स्थानीय लोगों के मुताबिक इसे पांचवाला बिल्डिंग कहते हैं. हादसे के तुरंत बाद राहत और बचाव का काम शुरू कर दिया गया. फायर ब्रिगेड की 12 गाड़ियां घटनास्थल पर पहुंच गईं. NDRF की टीम भी घटनास्थल के लिए रवाना हो गई. स्थानीय लोग भी राहत और बचाव के काम में जुटे हैं. शुरुआती मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इमारत करीब 50 साल पुरानी है. इसमें 10 से 12 परिवार रह रहे थे.

भारी बारिश के बाद मुंबई में जर्जर इमारतों पर खतरा मंडरा रहा है. बता दें कि मंगलवार को मुंबई में भारी बारिश हुई. 1997 के बाद मुंबई में एक दिन में यह सबसे ज्यादा होने वाली बारिश थी. एक दिन की बारिश में ही मुंबई का बुरा हाल हो गया और कई लोगों की मौत हो गई. मुंबई में ऐसी सैकड़ों इमारतें हैं जिन्हें बीएमसी ने खतरनाक घोषित किया है.

बता दें कि 26 जुलाई को घाटकोपर में 4 मंजिला इमारत गिरने से 17 लोगों की मौत हो गई थी. इस इमारत मे करीब 12 परिवार रहते थे. इसके भूतल में अस्पताल चल रहा था. यह इमारत बीएमसी के खतरनाक इमारतों की सूची में शामिल थी.

‘गोरखपुर में सबसे ज्यादा पिछड़े, दलित और मुसलमान बच्चों की जान गई है’

आजमगढ़। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बुधवार को आजमगढ़ पहुंचे. इस दौरान उन्होंने मंच से एक जनसभा को संबोधित किया. अखिलेश यादव ने योगी सरकार को घेरते हुए कहा कि ‘गोरखपुर में सबसे ज्यादा पिछड़े, दलित और मुसलमान बच्चों की जान गई है.’

पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव आज आजमगढ़ पहुंचे थे. यहां उन्होंने थाना जियनपुर कोतवाली के ग्राम नत्थूपुर में अमर शहीद रामसमुझ यादव की प्रतिमा का अनावरण किया. इस दौरान अखिलेश यादव ने एक जनसभा को संबोधित किया. उन्होंने गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में बच्चों की मौत को लेकर सरकार को घेरा.

अखिलेश यादव ने मंच से कहा कि ‘बगल में ही बच्चों की जान चली गई. अभी और बच्चों की जानें जा रही हैं. गोरखपुर में सबसे ज्यादा पिछड़े, दलित और मुसलमान बच्चों की जान गई है. कितनों को इंसाफ दिए. मैं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से पूछना चाहता हूं कि उन्होंने गोरखपुर में क्या किया.’ अखिलेश यादव ने मंच से ही भाजपा की प्रदेश सरकार को घेरने का प्रयास किया. उन्होंने कहा कि ‘भाजपा सरकार सबसे अधिक भेदभाव करती है.’

उन्होंने भ्रष्टाचार के मामले पर बोलते हुए कहा कि ‘प्रदेश से भ्रष्टाचार कहां समाप्त हुआ है. कौन सा प्रसाद देकर हमारे एमएलसी तोड़ दिए. बीजेपी सरकार हमें भी बताए कि आख़िर कौन सा प्रसाद बांट रही है, जिससे बुक्कल नबाब जैसे एमएलसी बीजेपी में चले गए.’ अखिलेश यादव ने कहा कि ‘एक दिन झाडू लगाने से देश साफ होने वाला नहीं है. अधिकारियों से भी झाडू लगवा दिया.’

यश भारती सम्मान पर बोलते हुए सीएम ने कहा कि ‘यश भारती सम्मान की जांच होने जा रही है. हमने यश भारती वैसे लोगों को दिया जिन्होंने देश का नाम रौशन किया. हम पर आरोप लग रहे हैं कि हमने अपने खास लोगों को यश भारती प्रदान किया. हम तो कहते हैं आपकी सरकार है आप भी अपने खास लोगों को दो, हम कहां रोक रहे हैं.’

ईनाडु इंडिया से साभार

न्यायालय को निशाना बनाने पर मायावती की भाजपा को खरी-खरी

लखनऊ। बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) की सुप्रीमो मायावती ने भाजपा शासित केंद्र और राज्य सरकारों पर निशाना साधा है. मायावती ने आरोप लगाया है कि सत्ताधारी बीजेपी न्यायपालिका पर लगातार हमले और टिप्पणियां कर रही है जो गंभीर चिंता का विषय हैं.

मायावती ने एक बयान जारी कर कहा कि बीजेपी सरकारें, इसके नेता और सांसदों द्वारा जजों के लिए अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया जाता है. साथ ही अदालतों के खिलाफ हाल के दिनों में जो रवैया देखने को मिला है उससे देश के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गई हैं.

मायावती ने डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह मामले का जिक्र करते हुए कहा कि बड़े पैमाने पर हुई हिंसा और आगजनी के बाद पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट की फटकार पर बीजेपी के अनेक नेताओं ने सार्वजनिक तौर पर जो टिप्पणियां की हैं, उसको देश ने नापसंद किया है.

महाराष्ट्र के मामले का जिक्र करते हुए मायावती ने कहा कि एक मामले में देवेंद्र फडणवीस सरकार को लिखित हलफनामा दाखिल कर अदालत से बिना शर्त माफी मांगनी पड़ी है. असल में मायावती उस मामले का जिक्र कर रही थी जिसमें केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण कानून के तहत ‘शान्ति क्षेत्र’ घोषित करने संबंधी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मामले में सुनवाई थी. इसके दौरान महाराष्ट्र सरकार द्वारा अदालत पर द्वेष के साथ काम करने का आरोप लगाकर जजों को बदलने की मांग की गई थी. बॉम्बे हाईकोर्ट ने गंभीर मामला मानकर इस पर कड़ा रूख अपनाया था, जिसके बाद फडणवीस सरकार को अदालत से मांफी मांगनी पड़ी थी.

छेड़छाड़ और यौन उत्पीड़न में मिली 105 साल की सजा

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लॉस एंजेलिस। अमेरिका में एक स्कूल कोच को सात नाबालिग छात्राओं के यौन उत्पीड़न के जुर्म में 105 साल जेल की सजा सुनाई गई है. लॉस एंजिलिस काउंटी सुपीरियर कोर्ट ने मंगलवार को कैलिफोर्निया के दो जूनियर स्कूल में कोच रहे रोनी ली रोमन (44) को इस अपराध के लिए तय अधिकतम सजा सुनाई.

डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी ऑफिस के अनुसार, सात जून को रोमन को सात नाबालिग लड़कियों के यौन उत्पीड़न का दोषी करार दिया था. उसने छह अपराधों को स्कूल के मैदान पर अंजाम दिया था, जबकि सातवें अपराध को एक पीड़ित के घर पर अंजाम दिया था. साल 2002 में कोरियाटाउन के काएंगा एलीमेन्ट्री स्कूल और हॉलीवुड के वाइन एलीमेंट्री में काम करने के दौरान उसने आठ से 11 साल की लड़कियों के साथ छेड़छाड़ की थी.

पीड़ित लड़कियों की उम्र आठ से ग्यारह वर्ष थी. सरकारी वकील के अनुसार रोनी वर्ष 2002 से ही इस घृणित कृत्य में लिप्त था.

उसने कोरियाटाउन के काहेंगा एलिमेंट्री स्कूल और हॉलीवुड के वाइन एलिमेंट्री स्कूल में कोच रहते ये अपराध किए थे. उसने छह छात्राओं का स्कूल के मैदान पर जबकि एक का उसके घर पर यौन उत्पीड़न किया था.

अमेरिका के कैलिफोर्निया में एक पूर्व स्कूल कोच को स्कूल में हुए कार्यक्रम के बाद 7 बच्चियों के साथ छेड़छाड़ के जुर्म में 105 साल की सजा सुनाई गई है.

अन्ना हजारे फिर करेंगे आंदोलन, मोदी को लिखा खुला पत्र

नई दिल्ली। समाजसेवी अन्ना हजारे एक बार फिर से आंदोलन करेंगे. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर सरकार के प्रति अपनी नाराजगी व्यक्त की है. उन्होंने कहा है कि मोदी सरकार तीन सालों से सत्ता में है, लेकिन अभी तक लोकपाल बिल नहीं लाई. अन्ना हजारे मे लोकपाल बिल ना लाने पर मोदी सरकार के खिलाफ बड़े आंदोलन की धमकी दी है. समाजसेवी अन्ना हजारे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेटर लिखकर भ्रष्टाचार और किसानों की समस्‍याओं पर अपनी नाराजगी जाहिर की थी. हालांकि लेटर का जवाब नहीं मिलने पर अब अन्‍ना ने आंदोलन करने का फैसला लिया है. अन्‍ना ने लेटर में लिखा था कि छह साल बाद भी भ्रष्टाचार को रोकने वाले एक भी कानून पर अमल नहीं हो पाया. लोकपाल, लोकायुक्त की नियुक्ति करने वाले और भ्रष्टाचार को रोकनेवाले सभी सशक्त बिलों पर सरकार सुस्ती दिखा रही है. किसानों की समस्याओं को लेकर स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट पर भी अमल नहीं किया जा रहा है. सरकार के इस रवैए से नाराज अन्ना हजारे ने लेटर में तमाम मसलों के बारे में लिखा था और अब कोई जवाब नहीं मिलने पर दिल्ली में आंदोलन करने का फैसला लिया है. अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार मुक्त भारत को बनाने के लिए 2011 में रामलीला मैदान में आंदोलन किया था. इसके बाद 27 अगस्त 2011 के दिन भारतीय संसद में ‘Sense of the House’ से रिज्युलेशन पास किया गया था. इसमें केंद्र में लोकपाल, हर राज्यों में लोकायुक्त और सिटिजन चार्टर ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर जल्द से जल्द कानून बनाने का निर्णय किया गया था. इसके बाद अन्ना हजारे ने अपना आंदोलन स्थगित कर दिया था. इसे लेकर 6 साल गुजर चुके हैं. अन्ना हजारे ने मोदी को लिखे गए लेटर में कहा कि लोकपाल और लोकायुक्त कानून बनते समय संसद के दोनो सदनों में विपक्ष की भूमिका निभा रही बीजेपी ने भी इस कानून को पुरा समर्थन दिया था. इसके बाद हुए 2014 के लोकसभा चुनाव में आपकी पार्टी सरकार बनी. लोकपाल आंदोलन के बाद देश की जनता ने बड़ी उम्मीद से आपके नेतृत्व में नई सरकार को चुना था. वहीं नई सरकार को मुद्दों पर अमल करने के लिए पर्याप्त समय देना जरुरी था. अन्ना हजारे ने पिछले तीन सालों में कई बार पत्र लिखने का जिक्र भी किया, लेकिन पीएमओ से कोई जवाब नहीं मिला. इतना ही नहीं ना कभी मन की बात में लोकपाल और लोकायुक्त का जिक्र किया गया. उन्होंने लिखा है कि सत्ता में आने से पहले आपने आश्वासन दिया था कि भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाएंगे. हालांकि आप 3 साल से लोकपाल और लोकायुक्त की नियुक्ती नहीं कर सके. सुप्रीम कोर्ट ने भी आपकी सरकार को बार-बार फटकार लगाई है. मोदी ने कहा कि जिन राज्यों में बीजेपी की सरकारें हैं, वहां भी नये कानून के तहत लोकायुक्त नियुक्त नहीं किए गये हैं. इससे ये साफ है कि आप लोकपाल, लोकायुक्त कानून पर अमल करने के लिए इच्छाशक्ति नहीं दिखा रहे हैं. अन्ना हजारे ने देश में लगातार किसानों की आत्महत्या का भी जिक्र किया है. अन्‍ना के अनुसार, मौजूदा वक्त में खेती पैदावारी में किसानों को लागत पर आधारित दाम मिले इसलिए मैंने कई बार पत्र लिखा था. हालांकि न आपकी तरफ से कोई जवाब आया और न ही स्वामीनाथन कमिटी की रिपोर्ट पर कार्रवाई हुई. इसी वजह से पिछले कई दिनों से महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, तमिलनाडू, आंध्रप्रदेश, तेलंगना, हरियाणा, राजस्थान में किसान आंदोलन कर रहे हैं. साथ ही लेटर में अन्‍ना ने राजनैतिक पार्टियों को सूचना के अधिकार के दायरे में लाने की मांग भी की. अन्ना हजारे ने पत्र के जरिए कहा कि पिछले 3 साल में आपकी सरकार ने किसी पत्र का जवाब नहीं दिया. इसके लिए अब मैने दिल्ली में आंदोलन करने का निर्णय लिया है. जब तक लेटर में लिखें मुद्दों पर जनहित में सही निर्णय और अमल नहीं होता तब तक मैं आंदोलन दिल्ली में जारी रखुंगा. अन्ना हजारे ने अगले पत्र में आंदोलन की तारीख की घोषणा करने की बात कही है.

अंग्रेजी मतलब उच्च संस्कार और मार्डन युग?

कई बार व्यवहारिक जीवन के उतार-चढ़ाव से गुजरते हुए इस बात का एहसास हुआ कि फर्राटेदार अँग्रेजी ना बोल पाना पिछड़ापन है बरक्स हिन्दी बोलने के. बहुत बार तो इस बात की कसीस दोस्तों-रिश्तेदारों के साथ बिताए गए पलों में ज्यादातर समय देखने को मिले. बहुतेरे मित्र यह बात समझते हुए वाद-संवाद हिन्दी में ही करने की कोशिश करते हैं. कुछ लोगों के लिए अँग्रेजी ना बोल पाना तो उन्हें सीधे कॉलर पकड़ कर मूर्खों के कतार में ले जाकर खड़ा कर देना जैसा ही है. मतलब आप अंग्रेजी भाषा का बात-बात पर प्रयोग करते हुए दिख रहे हैं तो आप बहुत बड़े विद्वेषी हैं वरना मूर्ख. आज तक यह बात नहीं समझ पाया कि जो सहज होकर अंग्रेजी भाषा का प्रयोग नहीं कर पाते या फिर नहीं बोल पाते हैं वो वाकई ऐसे प्रबुद्धजनों के नजरिए में मूर्ख हैं या फिर उनके प्रति इस तरह की नजरिया रखने वाला ही तो मूर्ख नहीं. अंग्रेजी को लेकर खास तरह का टेबू बना हुआ है.

बहुत उधेड़बुन टाइप महसूस होने लग जाता है. जानने की जिज्ञासा बढ़ जाती है. कभी-कभार तो सोचने लग जाता हूं. प्रबुद्ध से पूछ ही लिया जाए क्या? फिर ठहरकर खुद को नकारात्मकता के तरफ से सकारात्मकता की तरफ ध्यान केंद्रित करने में समय खर्च कर देता हूं. किसी ऑफिस में प्रवेश करते ही प्रायः किसी बड़े पद पर विराजमान अधिकारी जब अंग्रेजी से ही अपनी बात की शुरुआत करते हैं तो थोड़ी देर के लिए अचंभित हो उठता हूं. मुझे महसूस होने लगता है आखिर साहेब के टेबल के सामने खड़ा इंसान उस अधिकारी के प्रति क्या सोच रहा होगा. जिसे अंग्रेजी के शब्दों से कभी भेंट ही नहीं हुई हो. अंग्रेजी ही क्यों व्यक्तितौर पर मुझे किसी भी भाषा से कोई कोफ्त नहीं है बल्कि आधा भारत जो गांवों में रहता है उनके बारे में चिंतित हो जाता हूं. उनको सोचने के बाद व्यथित हो उठता हूं.

गांव में रहने वाले मुझे वो बच्चे याद आने लगते हैं और कई बार तो जहन से चेहरा तक नहीं उतरता जो अपने गांव का सरकारी स्कूल के कमरे में नीचे बैठकर बार-बार छत को निहार रहा होता है. मुझे वो आदमी का चेहरा जहन से नहीं उतर पाता है जो कड़ाके व मुसलाधार बारिश के बीच अपने खेतों में काम कर रहा होता है और अचानक किसी दिन उसका कृषि पदाधिकारी से मुलाकात हो जाती है और वो अपने संबोधन में प्रणाम करता है और साहब प्रणाम का उत्तर गुड मार्निंग से देते हैं. अंग्रेजी ना बोल पाने या फिर किसी कारणवश ना समझने के वजह से कई बार हम उस शख्सियत का भरे महफिल या फिर सार्वजनिक स्थानों पर हंसी उड़ाते हैं. उस पर तरह-तरह का व्यंग बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं.

अंग्रेजी ना बोल पाने वालों का मजाक उड़ाते हैं. कोई अंग्रेजी नहीं बोल पाता है तो अंग्रेजी ना बोलने के लहजे में मजाक उड़ा कर खुश हो लेते हैं. यह हमारे दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा बन चुका है. अंग्रेजी ना बोल पाने वालों के इस कमी का फायदा उठाकर बड़े-बड़े अंग्रेजी इंस्टीच्यूट ने अपने विज्ञापन व प्रचार-प्रसार करने तक का हिस्सा तक बना लिया है. बाजार के दबाव के बीच ऐसे मासूम लोग फंस भी जाते हैं.चंद महीनों में ही फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने की गारंटी के साथ अंग्रेजी कोचिंग इंस्टीच्यूट अच्छी खासी रकम भी कमाती है. चंद महीने में अंग्रेजी सीखा देने वाला कोचिंग का बड़े-बड़े महानगरों से लेकर छोटे-छोटे शहरों तक बड़े-बड़े विज्ञापन-हार्डिंग यंत्र-तंत्र दिवारों पर, सार्वजनिक स्थानों पर चिपका मिलेगा.

खैर,इस भेड़चाल में अंजाने में कुछ समझदार लोग भी शामिल हो जाते हैं. मतलब शहर से जब लोग गांव आते हैं तो धोती-कुर्ता या फिर अपने पूर्वजों के परंपरा का निर्वहन नहीं करने वालों पर यही समान्य बात लागू हो जाता है. गांव के बड़े-बुजुर्ग लोग भी इस परंपरा को निर्वाह ना करने पर मजाक बनाते हैं. उन्हें विलायती बाबू और ना जाने क्या-क्या उपमा देने लग जाते हैं. उनपर जहां-तहां तल्ख टिप्पणियां शुरू हो जाती है. मतलब जो धोती-कुर्ता या फिर पूर्वजों के संस्कृति का पालन नहीं कर रहा है तो वो इंसान बेअक्ल है. इस तरह की आदत तो अब राष्ट्रीय आदतों में बेशुमार हो चुका है. इसे तो अब तो पुरूस्कार मिल जाना चाहिए था. हम इसके आदी हो चुके हैं.

जो अंग्रेजी धाराप्रवाह बोलता है वही केवल विद्वान के श्रेणी में कैसे शामिल किया जा सकता है? क्या अंग्रेजी बोलना विद्वान होने का मापदंड हो सकता है? यह प्रवृत्ति बहुत तेजी के साथ निर्विघ्न होकर फल-फूल रहा है. यह भी एक तरह की मानसिकता है. क्या जो अंग्रेजी बोलेगा वही केवल समाज के गिने-चुने नामचीन लोगों के बीच स्थापित होगा? यह कुछ भी नहीं, बस अपने आप में श्रेष्ठताबोध की निशानी है. खुद पर अंग्रेजी बोलने का गुरूर सवार है. हिन्दीहीन भावना और अंग्रेजी मतलब उच्च संस्कार और मार्डन युग. मुझे ऐसे लोगों पर बस तरस आता है जो श्रेष्ठताबोध के बीच अगले को हीनताभाव से देखता है. खैर, भारत में हिन्दी पट्टी के लोगों के साथ संभावित यह दोष कह लीजिए या फिर कुछ भी लेकिन अधिक पाया जाता है. वे धाराप्रवाह अंग्रेजी नहीं बोल पाते हैं. ज्ञानार्जन का उपलब्धि अंग्रेजी तो कतई नहीं हो सकता.

नोट- मुझे देश के तमाम भाषाओं से सान्निध्य प्रेम है आप इस पोस्ट से अंग्रेजी को लेकर मेरे प्रति कोफ्त का नजरिया मत पाल लीजिएगा. मैं किसी भी भाषा का उतना ही सम्मान करता हूं जितना दूसरों से खुद का सम्मान चाहता हूं.

आशुतोष आर्यन की फेसबुक वॉल से

दिल्ली विश्वविद्यालय में एम.फिल में धांधली का पूरा सच

केंद्र सरकार वैसे तो उच्च शिक्षा में बढ़ावा देने का दावा करती है, लेकिन वास्तविकता कुछ ओर ही है. दिल्ली विश्वविद्यालय में एमफिल/पीएचडी में दाखिला प्रक्रिया में धांधली हुई है. यह धांधली पिछले कई सालों से ऐसी ही चली आ रही है. लेकिन इस बार बड़े पैमाने पर असंवैधानिक तरीके से दाखिला प्रक्रिया पूरी की गई, जिसका विरोध भी छात्रों ने 28 अगस्त को दिल्ली विश्वविद्यालय के आर्ट फैकल्टी में किया.

एमफिल/पीएचडी करने वाले दलित छात्रों के साथ भेदभाव किया गया है. आरक्षण के आधार मिलने वाले दाखिले को अलग-अलग विभाग के विभागाध्यक्षों ने ताक पर रखा. अनारक्षित वर्गों को अधिक सीटों पर दाखिला लिया है. इसका मतलब यह है कि आरक्षित वर्गों की सीटों पर सामान्य वर्ग के छात्रों को दिया गया जो कि असंवैधानिक है. सबसे ज्यादा असंवैधानिक तरीके से दाखिला प्रक्रिया हिंदी विभाग और अफ्रीकन विभाग में हुआ. इसके अलावा अन्य विभागों में इसी तरह असंवैधानिक प्रक्रिया के तहत दाखिला हुआ. आइए हम बताते है किस प्रकार से दिल्ली विश्वविद्यालय की एमफ़िल/पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया में धांधली हो रही है…

  •  एमफ़िल प्रवेश प्रक्रिया के पहले चरण में विभाग ने 875 अभ्यर्थियों की लिखित परीक्षा का क्रमवार परीक्षा परिणाम घोषित किया. अब इस मेरिट के हिसाब से कुल 25 सीटों पर प्रवेश के लिए तीन गुना यानी 75 अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिए बुलाया जाना था. इसमें क्रमवार सीटों का विवरण इस प्रकार होगा- UR- 12*3=36, OBC- 6*3=18, SC-4*3=12, ST-2*3=6, PWD- 1*3=3. यानि प्रवेश प्रक्रिया के पहले चरण लिखित परीक्षा परिणाम पर आरक्षण लागू है.
 
  • विभाग ने पहली धांधली यहीं की, कि लिखित परीक्षा के परिणाम की एकीकृत मेरिट लिस्ट को श्रेणीवार अलग अलग करके सूचीबद्ध किया. यानि यहाँ विभाग ने GEN, OBC, SC, ST, PWD की अलग अलग मेरिट लिस्ट बनाई. ध्यान दें, यहाँ UR की मेरिट लिस्ट बनाने की बजाय GEN की मेरिट लिस्ट अलग बनाई गई और बाकी सभी आरक्षित वर्ग की अलग मेरिट लिस्ट बनाई गई. यानी पहले चरण पर भी आरक्षण लागू है.
 
  • पहले चरण की लिखित परीक्षा की एकीकृत मेरिट लिस्ट को आरक्षण के मुताबिक़ पहले अलग अलग जाति समूहों में बांटा गया. अब उपरोक्त विभाजन के आधार पर अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिए बुलाया गया. यहीं सबसे बड़ी धांधली यह की गई कि UR की 12 सीटों के लिए जिन 36 अभ्यर्थियों को सफल घोषित करना था, उन्हें GEN श्रेणी की सूची में से सफल किया गया, इसी तरह अलग अलग जाति-समूहों में से मेरिट के आधार पर आवश्यक संख्या में अभ्यर्थी सफल किया गए. UR में GEN को ही “50% विशेष सवर्ण आरक्षण” देकर बुलाने वाले विभागाध्यक्ष का तर्क है कि हम लिखित परीक्षा में तो UR को GEN ही मानेंगे, लेकिन अंतिम परिणाम में UR मानेंगे.
 
  • प्रवेश प्रक्रिया के पहले चरण का UR हिंदी विभाग के अनुसार ‘अपर कास्ट श्रेणी’ है, चूँकि यहाँ 36 अभ्यर्थियों को लिया जाना था, तो UR की कटऑफ मेरिट 263 नंबर तक चली गई. OBC, SC, ST, PWD की अलग अलग मेरिट लिस्ट बना देने से टॉपर भी अपने ही श्रेणी में आ गया. OBC में 18 अभ्यर्थी चुने गए, जिनकी कटऑफ 290 नंबर तक ही रही. यानी 263 नंबर पाने वाला अपर कास्ट अभ्यर्थी लिखित परीक्षा में 50% सवर्ण आरक्षण पाकर साक्षात्कार के लिए बुला लिया गया, जबकि 289 नंबर पाने वाला OBC आरक्षण का कोटे से बाहर करके फ़ेल कर दिया गया.
 
  • यानि लिखित परीक्षा परिणाम में लागू ‘हिंदी विभाग’ का “50% विशेष सवर्ण आरक्षण” देकर UR की सभी सीटों को GEN में आरक्षित करके 263 नंबर तक पाने वाले सवर्णों को शामिल करने और 289 नंबर तक पाने वाले OBC को बाहर करने के लिए लागू किया गया है. यानि विभाग झूठ बोल रहा है कि पहले चरण की प्रवेश प्रक्रिया में हम आरक्षण नहीं देता. जबकि वह 50% अपर कास्ट को दे रहा है.
 
  • पहले चरण यानि इंट्री लेवल पर ही एक बड़ी संख्या में आरक्षित वर्ग के मेरिटधारी अभ्यर्थी को बाहर करके कम मेरिटधारी को शामिल करके विभाग पहले चरण में ही इंट्री नहीं करने दे रहा. विभागाध्यक्ष के अनुसार यह अंतिम परिणाम नहीं है, इसलिए हम “50% विशेष सवर्ण आरक्षण” देकर अपर कास्ट को सफल कर रहे हैं.
 
  • होना यह था कि एकीकृत मेरिट सूची में से शुरू के टॉपर 36 लोगों को UR में सफल कराते, जिसमें सभी श्रेणी के मेरिटधारी शामिल होते. इससे UR की कटऑफ़ 290 नंबर होती. यानि 290 नंबर के ऊपर पाने वाले सभी अभ्यर्थी UR में सफल होते. क्योंकि इनमें से किसी ने किसी भी स्तर पर आरक्षण की कोई छूट नहीं ली है. अर्थात सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार भी ये सभी मेरिटधारी अभ्यर्थी UR में ही सफल होंगे. उसके बाद OBC कोटे के 18 अभ्यर्थियों के लिए मेरिट कटऑफ़ नीचे 255 नंबर तक आएगी और 255 पाने वाला OBC आरक्षण का लाभ लेकर सफल होता. इसी तरह SC के 12 अभ्यर्थियों के लिए कटऑफ़ 238 नंबर तक आती, ST के 6 अभ्यर्थियों के लिए कटऑफ़ 190 नंबर आती और PWD की कटऑफ़ 220 नंबर तक आती.
 
  • अर्थात हिंदी विभाग आरक्षण का विशेष लाभ पाकर सफल होने वाले इन 24 आभ्यार्थियों को बाहर करके “50% विशेष सवर्ण आरक्षण” देकर 24 सवर्णों को साक्षात्कार के लिए बुला रहा है. विभागाध्यक्ष का कहना है कि हम पहले चरण में आरक्षण नहीं दे रहे, जबकि “50% विशेष सवर्ण आरक्षण” दे रहे हैं. यह संवैधानिक और सामाजिक न्याय दोनों के विरुद्ध है. यह न्यायालय की अवमानना है. यह अपराध है.

10 साल की मुस्कान अहिरवार को डायना प्रिंसेस अवार्ड

मध्य प्रदेश के शहर भोपाल में 10 साल की मुस्कान अहिरवार झुग्गी बस्ती में रहती है. दुर्गा नगर बस्ती में रहने वाली यह बच्ची 5वीं क्लास में पढ़ती है. आमतौर पर इस उम्र के बच्चे सहेलियों और गुड़ियों के साथ खेलने में मशगूल रहते हैं. लेकिन मुस्कान अपने उम्र के बच्चों से काफी अलग है. और उसने कुछ ऐसा काम किया है कि उसे अपने काम की बदौलत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है.

मुस्कान अहिरवार बचपन से ही बच्चों के लिए एक लाइब्रेरी शुरू करना चाहती थी. वह यह सब सोच ही रही थी कि उसके पिता का निधन हो गया. पिता की मौत के सदमे से उबरते ही उन्होंने बच्चों को पढ़ाई के प्रति प्रेरित करने का बीड़ा उठाया. एक साल पहले उसने अपने दम पर बच्चों के लिए लाइब्रेरी शुरू की. इस पहल के लिए उन्हें विश्व स्तरीय डायना प्रिंसेस अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है. अब मुस्कान की लाइब्रेरी में 1 हजार से अधिक पुस्तकें हैं. उनकी लाइब्रेरी में रोजाना बस्ती के कई बच्चे पढ़ने आते हैं. मुस्कान भी खुद उनके साथ पढ़ती है. मुस्कान की इस पहल के लिए नीति आयोग ने उन्हें पिछले साल वुमन ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया अवार्डस से सम्मानित किया था. इसके बाद गुजरात के मधीश पारिख ने मुस्कान का नाम डायना अवॉर्ड के लिए प्रस्तावित किया. इस अवॉर्ड के लिए दुनियाभर से करीब 50 हजार एंट्री आई थीं. यह अवॉर्ड समाज के लिए अनोखा काम करने वाले कम उम्र के बच्चों को दिया जाता है. इस अवॉर्ड के लिए दुनियाभर के 240 बच्चों का चयन हुआ है, इनमें भोपाल की मुस्कान का नाम भी शामिल है. द डायना प्रिंसेस अवॉर्ड प्रिंसेस डायना की याद में दिया जाता है. हालांकि इस नन्ही बालिका को इस अवॉर्ड के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है, लेकिन एक नया अवॉर्ड मिलने की खुशी में मुस्कान का चेहरा खिल उठा है.

जानिए, बर्मिंघम म्यूजियम में रखी तथागत बुद्ध की मूर्ति का राज

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बर्मिंघम। तथागत बुद्ध की यह साढ़े सात फुट ऊंची मूर्ति पिछले डेढ़ सौ साल से इंग्लैंड के बर्मिंघम म्यूजियम में सैलानियों और विशेषज्ञों के आकर्षण का केंद्र रही है.

यदि 1861 में बिहार के सुल्तानगंज से इस मूर्ति को अंग्रेज अपने साथ न ले गए होते तो आज यह बिहार के गौरवशाली इतिहास का हिस्सा होती.

इससे जुड़ी एक और विडंबना यह भी है कि अब इसे ‘बर्मिंघम बुद्धा’ के नाम से पुकारा जाना लगा है. यह मूर्ति गुप्त-पाल शासनकाल यानी 500 से 700 ईसवी के समय की है.

भागलपुर के पास रेलवे निर्माण कार्य की शुरुआत में खुदाई के दौरान यह मूर्ति मिली थी. आधे क्विंटल से ज्यादा वजनी यह मूर्ति अशुद्ध तांबे से बनी है.

इसमें तथागत बुद्ध खड़े हैं और उनका एक हाथ अभयमुद्रा में हैं. इसे बर्मिंघम के उद्योगपति सैम्यूएल थॉर्टन ने तब 200 पौंड में खरीदा था और फिर इसे बर्मिंघम म्यूजियम में रखवा दिया था.

आदिवासियों के खेतों से जबरन रेत निकाल रहा है जिलाध्यक्ष

जबलपुर। हमारे देश के नेता तो जनता को लूट ही रहे हैं, सरकारी अधिकारी उन्हें रोकने के बजाए खुद भी उनका साथ दे रहे हैं. वह भी जनता को लूट रहे हैं. अपने पद रौब दिखा रहे हैं. ऐसा ही एक मामला जबलपुर के कुंडम जिले से आया है.

दरअसल, जिलाध्यक्ष संजय पटेल कुंडम में एक आदिवासी की जमीन से जबरन रेत निकाल रहा है. यह रेत जमीन मालिक के बिना अनुमति के निकाल रहा है. यह कोई पहला मामला नहीं है. संजय पटेल ग्राम पंचायत के सचिव और जिला पंचायत के अधिकारियों से भी मारपीट कर पहले भी विवादों में रह चुका है.

जबलपुर से 45 किलोमीटर दूर कुण्डम जिला के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत डबराकला के टोला तौरी में रहने वाले आदिवासी राम स्वरूप, शेषभान सिंह, संदेश गोंटिया सहित अन्य ग्रामीण जबलपुर जनपद अध्यक्ष संजय पटेल के कारनामों से परेशान हो चुके हैं. जनपद अध्यक्ष ने आदिवासियों की जमीन में जेसीबी मशीन की मदद से भसुआ रेत का अवैध उत्खनन बिना अनुमति के शुरू कर दिया है.

जब आदिवासी परिवार को पता चला तो आदिवासियों ने उसके खिलाफ मोर्चा खोलते हुए कार्रवाई की मांगी की है. आदिवासियों ने बताया कि अवैध रूप से उनकी जमीन से रेत निकालने की शिकायत सभी ने एसडीएम और तहसीलदार से की थी, लेकिन अधिकारियों उन्हे झूठा आश्वासन देकर भगा दिया. आज तक घटना स्थल पर और ग्रामीणों से कोई भी अधिकारी मिलने नहीं पहुंचे और न ही जिलाध्यक्ष के खिलाफ कोई कार्रवाई की.

आदिवासियों ने बताया कि जनपद अध्यक्ष द्वारा अवैध रूप से निकाली जा रही भसुआ रेत से देवरी, धनपुरी, उमारिया, कुड़ारी, डूंडी सहित अन्य पंचायतों में निर्माण कार्य पूरे हो चुके हैं. सवाल ये उठता है कि भसुआ रेत से किए गए निर्माण कितने समय तक टिके रहेंगे इसकी कोई गारंटी लेने वाला नहीं है.

गौशाला में स्टॉक हो रही रेत जिलाध्यक्ष संजय पटेल किस तरह घटिया रेत की सप्लाई जबलपुर जनपद की पंचायतों में कर रहे हैं इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कुंडम के डबराकला से रेत निकालकर अध्यक्ष अपने घर जिसमें गौशाला संचालित होती है, में रेत का स्टॉक रखे हुए हैं. बताया जा रहा है कि अध्यक्ष यहीं से रेत की सप्लाई कर पंचायतों में निर्माण कार्यों को पूरा करा रहे हैं.

जमीन मालिक रामस्वरूप सिंह ने कहा कि मेरी जमीन से कब रेत निकाली जाने लगी, इसकी जानकारी ही मुझे नहीं लगी. एसडीएम-तहसीलदार को शिकायत की, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई. एक अन्य आदिवासी ग्रामीण शेषभान सिंह ने बताया कि कई माह से रामस्वरूप की जमीन से भसुआ रेत निकाली जा रही है और ग्रामीणों को यही बताया जा रहा था कि इसकी परमीशन अधिकारियों से ली गई है.

ग्रामीण संदेश गोंटिया ने बताया कि रोजाना गांव में डंफर, ट्रेक्टरोंका जमावड़ा रहता था, रात-रात भर रेत निकलती थी,ग्रामीणों के पूछने पर शासन का कार्य बताकर चुप कर दिया जाता था.

डबराकला के सरपंच बिसन लाल झारिया ने बताया कि रेत के लिए जनपद अध्यक्ष ने कोई परमीशन नहीं ली है, अवैध रूप से रेत निकालकर अध्यक्ष अपने गृह निवास में रख रहे हैं जहां गौशाला भी है.

‘द आदिवासी विल नॉट डांस’ पर झारखंड सरकार ने लगाया बैन

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रांची। झारखंड में एक किताब पर प्रतिबंध लगाए जाने का मामला तूल पकड़ने लगा है. लेखक हांसदा सोवेन्द्र शेखर की किताब “द आदिवासी विल नॉट डांस” पर झारखंड सरकार द्वारा बैन लगाए जाने पर बुद्धिजीवी हांसदा के समर्थन में उतर आए हैं. उनका कहना है, “ द आदिवासी विल नॉट डांस” पर झारखंड सरकार द्वारा प्रतिबन्ध लगाने पर हम आश्चर्यचकित एवं निराश हैं. प्रतिबन्ध बेतुका है एवं एक खतरनाक मिसाल प्रस्तुत करता है।”

झारखंड सरकार ने संथाली महिलाओं के अश्लील चित्रण का आरोप लगाते हुए हांसदा की किताब ‘आदिवासी विल नॉट डांस’ पर बैन लगा दिया. इस किताब की एक कहानी ‘नवंबर इज द मंथ ऑफ माइग्रेशन्स’ को लेकर विवाद खड़ा हुआ है. यह एक ऐसी महिला की कहानी है जिसे महज 50 रुपयों और कुछ पकौड़ों के लिए जिस्मफरोशी करनी पड़ती है. राज्य सरकार ने इस कहानी पर आदिवासी संस्कृति को बदनाम करने और संथाल महिलाओं को गलत तरीके से पेश करने का आरोप लगाते हुए अश्लील करार दिया है.

ये मसला विधानसभा में विपक्षी दल झारखंड मुक्ति मोर्चा की ओर से उठाया गया और किताब पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई. इसके फौरन बाद ही शाम तक मुख्यमंत्री रघुबर दास ने इसकी सभी प्रतियों को जब्त करने और लेखक सोवेंद्र शेखर पर कार्रवाई करने का आदेश दे दिया.

हांसदा के समर्थन में आए लोग साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार प्राप्त लेखक हांसदा सोवेन्द्र शेखर की किताब पर बैन के विरोध में बुद्धिजीवियों ने कहा है, “किताब में कुछ खुले यौन दृश्य हैं लेकिन उन्हें अश्लील कहना अत्यन्त ही पाखंडपूर्ण है. अगर उन किताबों, जिसमें ऐसे दृश्य शामिल हैं, पर प्रतिबंध लगाना होता तो कामसूत्र सहित हजारों उपन्यास पर प्रतिबन्ध लग जाता. जिन्हें लगता है कि यौन दृश्य अश्लील हैं वे कुछ और पढ़ने के लिए स्वतंत्र हैं.”

कहा गया कि कहानी में वर्णित काल्पनिक घटना संथाली महिलाओं पर किसी तरह का आक्षेप नहीं लगाती. यह संभव है कि कहानी किसी वास्तविक घटना से प्रेरित हो लेकिन ऐसा अगर है तो यह कहानी को और भी न्यायसंगत बनाती है.

समर्थकों के नाम वाले पत्र में लिखा है, “द आदिवासी विल नौट डान्स” पर प्रतिबन्ध न सिर्फ दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि भारत में छिछले आधार पर किताबों को प्रतिबंधित करने की कड़ी में एक नया उदाहरण है. प्रतिबन्ध की यह सनकस्वतंत्रता, लोकतंत्र एवं तार्किकता पर खतरनाक हमला है.”

हांसदा की किताब पर बैन को लेकर ज्यां द्रेज, अरुंधति रॉय, हर्ष मंदर, नंदिनी सुंदर, बेला भाटिया, हरिवंश (राज्यसभा सदस्य), कविता श्रीवास्तव सहित बड़ी संख्या में लेखक, फिल्ममेकर, शिक्षक, शोधार्थी, सामाजिक कार्यकर्ता और नागरिकों ने अपना विरोध दर्ज कराया है.

BRD अस्पताल में जारी है मौत का सिलसिला, 72 घंटों में 61 बच्चों ने तोड़ा दम

गोरखपुर। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में बीआरडी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में एक बार फिर बड़ी संख्या में बच्चों की मौत का मामला सामने आया है. मात्र दो दिनों में इस अस्पताल में 42 बच्चों की मौत हो चुकी है. इनमें से सात की मौत वहां की महामारी इंसेफ्लाइटिस के कारण हुई है. बाकी अन्य बीमारियों से ग्रसित थे.

वहीं मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इसके साथ ही यहां बालरोग रोग विभाग में पिछले 72 घंटों में अब तक कुल 61 बच्चों ने दम तोड़ दिया है. बीआरडी मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉक्टर पीके सिंह का कहना है कि अचानक ज्यादा मौतें भले ही हो गयी हैं, लेकिन इस मौसम में ये कोई असामान्य बात नहीं है. उन्होंने कहा कि प्रयास चल रहा है कि यहां बीमारियों के कारण मौत पर अंकुश लग सके.

यहां मेडिकल कॉलेज में आक्सीजन की कमी के कारण 40 बच्चों की मौत की का प्रकरण अभी पुराना भी नहीं पड़ा था कि 48 घंटे में 42 बच्चों की मौत के कारण जिले में खलबली मची है. कॉलेज में नवजात आइसीयू में 10 तथा इसके साथ ही पीडियाट्रिक आईसीयू में 11 बच्चों की मौत हो गई है. बीते 48 घंटे में 66 मरीज भर्ती किए गए थे, जिनमें से 42 की मौत हो गई है. भर्ती मरीजों में इंसेफ्लाइटिस के 19 में से सात मरीजों की मौत हो गई है.

बताया गया कि आसपास के इलाके के लोग अपने बच्चों को अति गंभीर होने पर इलाज के लिए इसी अस्पताल लेकर आते हैं. इस वजह से अस्पताल पर भी काफी दबाव रहता है. गौर हो कि इस महीने की शुरुआत में बीआरडी मेडिकल कॉलेज में इंसेफलाइटिस से पीड़ित 60 से ज्यादा बच्चों की मौत का मामला सामने आया था. इस मामले में ऑक्सीजन की कमी से दर्जनों बच्चों की मौत के आरोप लगे थे. इस मामले में विपक्षी पार्टियों ने राज्य सरकार पर जमकर हल्ला बोला था, हालांकि यूपी सरकार ने ऑक्सीजन की कमी से इनकार किया था.

शानदारः बीबीएयू के बसंत कन्नौजिया को 100 में से 94 नंबर

बसंत कन्नौजिया
लखनऊ। BBAU के संघर्षशील और छात्रहित में सदैव खड़े रहने वाले बहुजन छात्र बसन्त कुमार कनौजिया ने एक शानदार उपलब्धि हासिल की है. बसंत ने इतिहास के एम फिल प्रवेश परीक्षा में 100 में से 94 अंक लाकर विवि में टॉप किया है. बसंत की यह उपलब्धि बीबीएयू के इतिहास में अनुसूचित वर्ग के छात्रों की एक और उपलब्धि के रूप में दर्ज हो गई है. बसन्त डॉ बाबा साहेब के आदर्शों पर चलने वाले छात्र हैं. बसंत कन्नौजिया शिक्षक बनना चाहते हैं. इसके अलावा बसंत सिविल सर्विस की तैयारी कर देश के उच्च सेवा में जाना चाहते हैं. बसंत हरदोई के रहने वाले हैं. मुख्यालय से 55 किलोमीटर दूर मल्लावा के करवा गांव में उनका पुश्तैनी घर है. हालांकि उन्होंने अपनी पढ़ाई लखनऊ से ही की है. वह साल 2012 में बीबीएयू में आए. 2012-2014 में उन्होंने यहां से एम.ए किया. 2015-2017 में बी.एड किया. उसके बाद एम.फिल के प्रवेश परीक्षा में यह उपलब्धि हासिल की है. एक बहुत ही साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले बसंत की यह सफलता सिर्फ उनकी अकेले भर की नहीं है, बल्कि इसमें बसंत के पिता छोटेलाल कन्नौजिया और मां कमला देवी का भी संघर्ष छिपा है. बसंत के पिता ने एक बहुत ही साधारण नौकरी करते हुए बसंत को पढ़ाया और बसंत ने भी अपने मां-बाप के मेहनत की लाज रखी. हालांकि बीबीएयू प्रशासन ने उनकी राह भी रोकने की कोशिश की, कई मामलों में उनको फंसाया गया लेकिन सारी बाधाओं को पार कर बसंत ने यह उपलब्धि हासिल की है. दलित दस्तक बसंत जी को इस उपलब्धि के लिए बधाई देता है और बहुजन समाज की इस प्रतिभा के उज्जवल भविष्य की कामना करता है.

मुंबई में रिकॉर्डतोड़ बारिश, BMC ने दी हाईटाइड की चेतावनी

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मुंबई। मुंबई में सुबह से हो रही भारी बारिश के कारण जगह-जगह भारी जलभराव हो गया है. भारी बारिश के कारण हवाई सेवा भी बाधित है. शाम साढ़े चार बजे हाई टाइड की चेतावनी दी गई है. कई निचले इलाके पानी में डूबे हुए हैं. रेलवे ट्रैक पर पानी भर गया है जिससे मुंबई लोकल पर असर पड़ा है. पश्चिम और मध्य रेलवे 10 से 15 मिनट की देरी से चल रही है. मुंबई में 2005 के बाद ये सबसे ज्यादा बारिश है.

बता दें कि एक हफ्ते की राहत के बाद शनिवार सुबह से सोमवार देर शाम तक मुंबई भारी बारिश का गवाह रहा जिसके कारण यहां ट्रैफिक की रफ्तार धीमी पड़ गई. मुंबई के केईएम अस्पताल में तो इतना पानी भर गया जिसे देख हर कोई हैरान रह गया. बीएमसी पंपों के ज़रिए पानी निकालने में जुटी है, हालांकि तेज़ बारिश की वजह से पानी निकालने में दिक्क़त आ रही है.

हाई टाइड के मद्देनजर प्रशासन ने मरीन ड्राइव समेत तमाम समुद्री इलाके में अलर्ट घोषित कर दिया है. जो लोग टाइड का लुत्फ उठाने किनारे खड़े हैं उन्हें लगातार हटने के लिए निर्देशित किया जा रहा.

हालात ऐसे हैं कि दफ्तरों में जल्दी छुट्टी दे दी गई है ताकि लोग समय से घर पहुंच सकें. महाराष्ट्र सीएम ने मुंबई पुलिस और बीएमसी से बात की है. सीएम ने मंत्रालय के स्टाफ को भी जल्द घर जाने को कहा है. मुंबई में 3 घंटे में 65 मिमी. बारिश हो चुकी है. बीएमसी ने हेल्पलाइन नंबर 1916 जारी किया है. मौसम विभाग ने कहा है कि अगले दो दिन मुंबई में भारी बारिश हो सकती है.