NTPC ऊंचाहार कांडः सहायक महाप्रबंधक की अस्पताल में मौत, अब तक 36 लोग मरे

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लखनऊ। राष्‍ट्रीय तापीय विद्युत निगम (एनटीपीसी) के रायबरेली संयंत्र में हुई दुर्घटना में कंपनी के एक सहायक प्रबंधक की मौत हो गयी है. प्राविधिक शिक्षा एवं क्षमता विकास विभाग की सचिव भुवनेश कुमार ने एनटीपीसी ऊंचाहार बिजली संयंत्र के सहायक महाप्रबन्‍धक संजीव कुमार शर्मा के निधन की पुष्टि करते हुए बताया कि उन्‍होंने लखनऊ के एक निजी अस्‍पताल में गुरूवार शाम अंतिम सांस ली.

कुमार ने बताया कि शर्मा बुधवार की शाम एनटीपीसी के संयंत्र में बॉयलर फटने की घटना में गम्‍भीर रूप से झुलस गये थे. डाक्‍टरों के तमाम प्रयासों के बावजूद उन्‍हें बचाया नहीं जा सका. उन्‍होंने बताया कि शर्मा के शव का पोस्‍टमार्टम कराया गया है.

गौरतलब है कि ऊंचाहार स्थित एनटीपीसी के बिजली संयंत्र में बुधवार शाम बॉलयर फटने से अब तक 36 लोगों की मौत हो चुकी है जबकि कई अन्य लोग गंभीर रूप से घायल है. यह हादसा बुधवार शाम करीबी साढ़े तीन बजे हुआ. हादसे के शिकार लोगों को NTPC के अस्पताल और जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया है. कुछ लोगों को स्थानीय निजी अस्पतालों में भी भर्ती कराया गया है.

इस हादसे पर यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संज्ञान लिया है. उन्होंने प्रमुख सचिव और गृह सचिव को पूरे मामले पर नजर रखने और घायलों को तत्काल राहत और बचाव कार्य को कराने का आदेश दिया है.

लैंगिक समानता में भी फिसड्डी हुआ भारतः रिपोर्ट

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नई दिल्ली। देश के प्रधानमंत्री विकास कितने भी दावे कर लें, लेकिन आए दिन आने वाली रिपोर्टें उनके विकास के दावे को साबित कर देती हैं. पहले भूख का ग्लोबल इंडेक्स में पीछे जाना. अब एक रिपोर्ट ने लैंगिक समानता पर भी भारत फिसड्डी बता दिया.

दरअसल, वर्ल्ड इकोनॉमी फोरम ने दो नवंबर को ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स  2017 की सूची जारी की. इस सूची में भारत को दुनिया के 144 देशों की सूची में 108वां स्थान मिला है. पिछले साल इस सूची में भारत का 87वां स्थान था. इस सूची में आइसलैंड, नार्वे और फिनलैंड जैसे देश इस साल भी शीर्ष पर रहे. दक्षिण एशियाई देशों में सबसे ऊपर बांग्लादेश 47वें पायदान पर है.

भारत की खराब रैंकिंग के लिए मुख्यतः दो कारक जिम्मेदार हैं. पहला, “स्वास्थ्य और आयु” जिसमें भारत 141वें स्थान पर है. इस मामले में चीन की हालत सबसे खराब है. रिपोर्ट के अनुसार भारत में लड़कों को तरजीह देने की प्रवृत्ति की वजह से लैंगिक असमानता को बढ़ावा मिलता है.

दूसरा, “आर्थिक गतिविधियों में महिलाओं की भागीदारी” के मामले में भारत दुनिया में 139वें स्थान पर रहा. पिछले साल भारत इस मामले में 136वें स्थान पर था. इस मामले में भारत की स्थिति केवल ईरान, यमन, सऊदी अरब, पाकिस्तान और सीरिया जैसे देशों से ही बेहतर रही.

रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि भारत में महिलाओं की औसत सालाना आय पुरुषों के मुकाबले काफी कम है. महिलाएं एक समान काम के लिए पुरुषों के वेतन का करीब 60 प्रतिशत ही पाती हैं. कुल कामगारों में एक-तिहाई महिलाएं हैं लेकिन इनमें 65 प्रतिशत महिलाएं दिहाड़ी मजदूरी (कामवाली, बेबी सीटर, कुक इत्यादि) करती हैं, जबकि पुरुषों के कामगार वर्ग का केवल 11 प्रतिशत ही दिहाड़ी मजदूर के तौर पर काम करता है. सभी क्षेत्रों को मिलाकर देश में केवल 13 प्रतिशत महिलाएं ही वरिष्ठ पदों, मैनेजर और विधायी पदों पर काम कर रही हैं.

बिहार में अब हुआ शौचालय घोटाला

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पटना। बिहार में आए दिन एक नए घोटाले का खुलासा हो रहा है. बिहार महादलित विकास मिशन में हुए घोटाले के बाद अब बिहार में शौचालय घोटाला सामने आया है. शौचालय घोटाले का मामला तब सामने आया है, जब देशभर में शौचालय बनवाने की मुहीम चल रही है.

बिहार में हुए शौचालय घोटाले का खुलासा पटना के जिलाधिकारी संजय कुमार अग्रवाल ने किया है. जांच में समाने आया है कि एक एनजीओ के अकाउंट में शौचालय बनवाने के नामपर करीब 13 करोड़ की रकम दे दी गई. मामले के दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवा दी गई है और अभी भी जांच जारी है. जानकारी के मुताबिक अभी शौचालय निर्माण एजेंसी से जुड़े खातों को खंगाला जा रहा है.

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इससे जुड़े और इसके माध्यम से कितने पैसे किसको ट्रांसफर किये गये, इसकी लगातार जांच हो रही है. जिस एजेंसी व एनजीओ को शौचालय निर्माण के लिए पैसे का भुगतान किया गया है, इसका कहीं कोई प्रूफ नहीं मिला है. इसके अलावा लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग (पीएचईडी) में भी इन एजेंसियों से संबंधित कोई कागजात भी नहीं है. सरकारी अधिकारी ने बताया है कि पैसों की रिकवरी के लिए आरोपियों के मकान, जमीन व अन्य संपत्ति जब्त की जाएगी.

क्या है पूरा मामला? बिहार सरकार ने साल 2013 में तय किया था कि शौचालय निर्माण का पैसा किसी एजेंसी के माध्यम से लाभार्थियों को नहीं दिया जायेगा. इसके बावजूद पीएचईडी के तत्कालीन कार्यपालक अभियंता विनय कुमार सिन्हा और एकाउंटेंट बिटेश्वर प्रसाद सिंह ने वर्ष 2012-13, 2013-14 और 2014-15 में पटना जिले के विभिन्न प्रखंडों में बनने वाले 10 हजार से अधिक शौचालयों का पैसा (13.66 करोड़) मई, 2016 में सीधे एजेंसी को दे दिया.

उस वक्त आनन-फानन में तीन एजेंसियों सहित कई लोगों के विभिन्न खातों में 200 से अधिक चेक काट कर डाल दिया गया. यह गबन उस वक्त किया गया, जब पीएचईडी से शौचालय निर्माण का खाता डीआरडीए में ट्रांसफर होने वाला था.

बिहार : 2019 में हावी रहेगी दलित राजनिति

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बिहार के नेताओं को एक बार फिर दलित याद आने लगे हैं. क्योंकि अब इन लोगों को लगने लगा है कि दलितों को अपने साथ किए बगैर 2019 का चुनावी बैतरनी पार कर पाना संभव नहीं है. तभी तो जेडीयू के दो बड़े नेता श्याम रजक और उदय नारायण चौधरी के बागी तेवर अपनाये जाने के बाद. नीतीश सरकार भी आउट सोर्सिंग में आरक्षण नीति लागू कर दलित की सियासत में कूद गई है.

लेकिन जेडीयू के दलित नेता श्याम रजक का इरादा कुछ और ही बयां कर रहा है. उन्होने कहा है कि एक नया मोर्चा बन गया है और इसके लिए बकायदा उन्हे बिहार सहित गुजरात और राजस्थान से भी आमंत्रण मिल रहा है. वैसे बिहार में लोक जन शक्ति पार्टी के अध्यक्ष राम विलास पासवान और हिन्दुस्तान आवाम मोर्चा के जीतन राम मांझी भी दलितों के सबसे बड़े नेता होने का दावा करते नहीं थकते है. इधर आरजेडी के दलित नेता शिवचंद्र राम की माने तो लालू प्रसाद ने ही दलितों के लिए सबसे ज्यादा काम किया है. वैसे कांग्रेस ने भी दलित के नाम पर राजनीति करने का कोई मौका नहीं छोड़ा है. यानि कुल मिलाकर बिहार में दलित सियासत. आने वाले चुनाव में सभी पार्टियों की मुश्किलें बढ़ाने वाली है. अब देखना ये है कि दलितों को खुश करने के लिए सियासी थाल में कौन कौन से वादे परोसे जाएंगे. लेकिन इतना तो तय है कि कोई भी पार्टी दलितों को दरकिनार करने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगी.

सवर्ण महिलाओं का आंदोलन झूठा नारीवाद!

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नारीवाद की अवधारणा भारत में केवल सवर्ण महिलाओं का फैशन है, क्योंकि यहां फेमिनिज़्म पितृसत्ता का बुलेटप्रूफ़ जैकेट और ब्राह्मणवाद का हथियार है. दरअसल स्त्री अधिकारों और समानता की मुनादी करने वाली सवर्ण नारीवादी महिलाएं ब्राह्मणवादी सिस्टम की कठपुतली हैं, जिन्हें जातीय प्रिविलेज की रक्षा करने के लिए नारीवाद के नाम का झुनझुना पकड़वाया गया है. भारत में नारीवाद का पूरा डिस्कोर्स इस बात पर टिका हुआ कि वे जातिगत प्रिविलेज को बनाये रखने और उसे संरक्षित रखने में कितना सहयोग कर रहा है. इस रूप में यहां नारीवाद का पर्याय केवल सवर्ण नारीवाद और छद्म जातिवाद है.

सवर्ण महिलाओं का आंदोलन झूठा नारीवाद है, क्योंकि इसका नेतृत्व भी उनके हाथ में नहीं, बल्कि सवर्ण पुरुषों के हाथ में है. सवर्ण फेमिनिस्ट दलित-बहुजन महिलाओं के आंदोलन को सवर्ण पुरुषों के बचाव में आगे नहीं बढ़ने देती या विक्टिम ब्लेमिंग-नेमिंग-शेमिंग करने लगती हैं. ब्राह्मण-सवर्ण पुरुषों के हाथों की कठपुतली बने हुए नारीवादी आंदोलन में दलित-बहुजन महिलाएँ अपनी जाति के कारण शामिल नहीं की जाती. सवर्ण महिला में महिला नहीं होती बल्कि केवल सवर्ण होती है, इसलिए जातिगत श्रेष्ठताबोध उन्हें केवल ब्राह्मणवाद का हथियार बनाये रखता है. इसलिए जैसे ही दलित-बहुजन महिलाओं के मुद्दे सामने आते हैं, नारीवादी बगले झाँकने लगते हैं.

हाल ही में इसका एक बड़ा उदाहरण देखने में तब आया जब राया सरकार ने शिक्षा जगत से जुड़े यौन कुंठित 69 प्रोफ़ेसर्स की सूची जारी की, जिन्होंने अपनी छात्राओं का यौन शोषण किया था. राया की सूची में सम्मिलित लगभग सभी प्रोफ़ेसर्स ब्राह्मण-सवर्ण लेफ़्टिस्ट(इक्का-दुक्का )थे, जिन्हें पीड़ित छात्राओं के बयानों पर जारी किया गया था. सूची जारी करते ही सो कॉल्ड फेमिनिस्ट कविता कृष्णन, निवेदिता मेनन और आयशा किदवई जो सभी सवर्ण हैं, ने बाकयदा बयान देकर राया और सभी पीड़िताओं की आलोचना की. चूंकि लगभग सभी शोषित प्रोफ़ेसर्स ब्राह्मण-सवर्ण थे, ज़ाहिर तौर पर सभी फेमिनिस्टों ने अपने सवर्ण होने का फर्ज निभाया. एक अम्बेडकराइट लड़की नारीवाद का नेतृत्व करें, यह सवर्ण फेमिनिस्टों को बर्दाश्त कैसे हो सकता था. आख़िर क्यों सवर्ण नारीवादियों को उन प्रोफ़ेसर्स के बचाव में आना पड़ा? जवाब साफ है, नारीवादियों का नारीवाद दरअसल ब्राह्मणवादी व्यवस्था से अलग नहीं है.

हमारे देश में जाति का मुद्दा सभी मुद्दों पर भारी पड़ता है और नारीवाद भी उससे अछूता नहीं है. जो स्टेप बहुजन छात्रा राया सरकार ने लिया, यही कदम किसी सवर्ण लड़की ने ऊठाया होता तो क्रांतिवीर, नेशनल हीरोइन, बहादुर लड़की, क्रान्तिलीक आदि तमगों से नवाज़ दी जाती, सोशल मीडिया पर नेशनल फेस बन जाती, नारीवाद का झंडा उसके हाथों में थमा दिया जाता और पूरा मीडिया उन्हें क्रांति कहकर प्रचारित करता.

दलित-बहुजन लड़कियों को सवर्ण औरतों के समान स्पेस नहीं मिलते. अब जबकि दलित-बहुजन लड़कियों ने अपनी लड़ाई खुद लड़ना, बोलना-लिखना शुरू कर दिया है, तो सवर्ण फेमिनिस्टों को अपना आंदोलन जो कि बस हवाबाज़ी है टूटता नज़र आ रहा है इसलिए उन्हें बड़े-बड़े बयान देकर अपने पतियों, भाइयों, बॉयफ्रेंड्स की रक्षा करनी पड़ रही है. पितृसत्ता को गरिया कर अपना चेहरा चमकाने वाली फेमिनिस्ट अंततः पितृसत्ता के शरणागत ही हैं. राया सरकार की सूची से तकलीफ का सबब जनेऊ के पवित्र धागे का ही है.

ड्यू प्रोसेस फ़ॉलो करने की सलाह देने वाली सवर्ण औरतें ये बात अच्छी तरह जानती हैं कि ड्यू प्रोसेस का मतलब ब्रह्मानिकल सिस्टम में खुद को ख़त्म कर देना है जहां जाति देखकर न्याय मिलेगा. यह वही नारीवाद है जहां सवर्ण महिलाओं के साथ होने वाला शोषण राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बनाया जाता है और दलित-बहुजन महिलाओं के साथ कुछ भी हो जाए तो उस पर उफ़्फ़ भी नहीं निकलती.

ये नारीवाद पितृसत्ता का पोषण करने वाला है, जो केवल ब्रह्मानिकल सिस्टम का सबपार्ट है. जब जाति के आधार पर ही महिला मुद्दों का समर्थन या विरोध होना है तो उसे नारीवाद का नाम क्यों दिया जाए? जहां वंचित वर्ग की महिलाओं की आवाज़ की इम्पोर्टेंस न हो ऐसे फेमिनिज़्म को एक मिथक ही कहा जाना चाहिए.

यह लेख दीप्ति का है.

अब बुक कर सकेंगे महीने में 12 टिकट, IRCTC ने दी सुविधा

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अब आधार कार्ड होने पर भारतीय रेल से यात्रा करना आसान हो जाएगा. IRCTC ने रेलवे टिकट की बुकिंग के लिए आधार वेरिफिकेशन करने पर 1 महीने के अंदर 12 टिकट बुक कराने की आजादी दी है. खास बात यह है कि रेलवे की टिकट बुक कराने के लिए आधार को अनिवार्य नहीं किया गया है. आधार वेरिफिकेशन कराने पर ऑनलाइन टिकट बुकिंग में मौजूदा 6 टिकट की लिमिट को हर महीने के लिए 12 टिकट कर दिया गया है.

IRCTC ने ऑनलाइन टिकट बुकिंग की अपनी गाइडलाइन बदल दी हैं और इस महीने से IRCTC की पोर्टल पर आधार नंबर को अपलोड करने की सुविधा दी गई है . इसमें हरेक अकाउंट पर हर महीने के लिए आधार वेरिफिकेशन होने के बाद 6 टिकट की मौजूदा लिमिट को बढ़ाकर 12 टिकट कर दिया गया है. इस लिमिट में आईआरसीटीसी की वेबसाइट पर किसी अकाउंट में बुक कराए गए टिकट के साथ-साथ रेल कनेक्ट मोबाइल एप्लीकेशन ऐप के जरिए बुक कराए गए टिकट को भी शामिल किया गया है.

रेलवे की आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक आधार कार्ड को ऑनलाइन टिकट के लिए अनिवार्य नहीं किया गया है. बिना आधार कार्ड की इंफॉर्मेशन दिए ऑनलाइन टिकट बुकिंग में हर एक व्यक्ति एक महीने में छठ टिकट बुक करा सकता है. अगर एक महीने में 6 टिकट से ज्यादा टिकट आप बुक कराना चाह रहे हैं तो आपको पैसेंजर का आधार कार्ड वेरीफाई कराना पड़ेगा.AAd

आईआरसीटीसी की वेबसाइट पर कोई भी यात्री माय प्रोफाइल कैटेगरी में आधार केवाईसी पर क्लिक करके अपने आधार नंबर को अपडेट कर सकता है. इस वेरिफिकेशन के दौरान आधार से जुड़े हुए मोबाइल नंबर पर एक वन टाइम पासवर्ड भेजा जाता है. इस पासवर्ड को वेबसाइट पर डालने पर आधार कार्ड का वेरिफिकेशन हो जाता है.

महाराष्ट्र में बाबासाहेब अम्बेडकर का ‘पाठशाला प्रवेश दिवस’ अब होगा “विद्यार्थी दिवस”

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सतारा। बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर जिस दिन पहली बार स्कूल गए थे, उस दिन को महाराष्ट्र सरकार ने ‘विद्यार्थी दिवस’ घोषित कर दिया है. महाराष्ट्र के शिक्षा विभाग द्वारा सात नवंबर को ‘विद्यार्थी दिवस’ मनाने का आदेश दिया गया है.

बाबासाहेब अम्बेडकर ने सतारा के राजवाड़ा चौक स्थित प्रतापसिंह हाईस्कूल में 7 नवंबर 1900 के दिन पहली बार स्कूल में प्रवेश लिया था. इसी दिन से उनके शैक्षणिक जीवन की शुरुआत हुई थी. उस समय उन्हें भीमा कहकर बुलाया जाता था. स्कूल में उस समय उनका नाम रजिस्टर में क्रमांक-1914 पर अंकित था. जिसके सामने आज भी बालक भीमराव के हस्ताक्षर मौजूद हैं.

इस ऐतिहासिक दस्तावेज़ को स्कूल प्रशासन ने बड़े सम्मान और गर्व के साथ सहेज रखा है. उनके स्कूल में प्रवेश लेने की युगांतकारी घटना एक अर्थ में शैक्षणिक क्रांति की शुरुआत मानी जा सकती है. सतारा के प्रवर्तन संगठन के अध्यक्ष अरुण जावले ने 7 नवंबर को ‘पाठशाला प्रवेश दिवस’ के रूप में घोषित करने की मांग महाराष्ट्र के सामजिक न्याय मंत्री राजकुमार बडोले और शिक्षा मंत्री विनोद तावडे के समक्ष उठाई थी.

उनकी मांग पर दोनों ही मंत्रियों ने बाबासाहेब के पाठशाला में प्रवेश दिवस 7 नवंबर को “विद्यार्थी दिवस” के रूप में मनाने का निर्णय लिया है. डॉ. बीआर अम्बेडकर जीवन में शिक्षा के कारण ही क्रांति कर सके, जिससे भारतीय समाज में अभूतपूर्व क्रांति हुई. शिक्षा पाकर प्रबुद्ध बने बाबासाहेब लाखों-करोड़ों दलित-वंचित वर्ग का ऊद्धार किया. सम्पूर्ण विश्व में आदर्श संविधान और भारतीय लोकतंत्र को आकर देने वाले महान शिल्पकार के रूप में बाबासाहेब गौरव बने.

महाराष्ट्र सरकार का यह निर्णय निश्चित ही स्वागत योग्य कदम है. भारत के प्रत्येक नागरिक ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के लिए बाबासाहेब एक आदर्श हैं. महाराष्ट्र से प्रेरणा लेते हुए केंद्र सरकार को 7 नवंबर को “राष्ट्रीय विद्यार्थी दिवस” (National Student Day) के रूप घोषित करना चाहिए.

उत्तर रेलवे में निकली बंपर भर्तियां, जल्द करें अप्लाई

North Western Railway (NWR) ने Act Apprentice के पदों पर भर्ती के लिए आवेदन आमंत्रित किए हैं. इन पदों के लिए इच्छुक और योग्य उम्मीदवार 29 नवंबर, 2017 तक आवेदन कर सकते हैं. आवेदन से जुड़ी जानकारियां नीचे दी गई हैं. संस्थान का नाम North Western Railway (NWR) पदों के नाम डिविजनल रेलवे मैनेजर ऑफिसर और अन्य पदों की संख्या नोटिफिकेशन के अनुसार पदों की संख्या 1164 है. योग्यता उम्मीदवार ने देश के किसी भी मान्यता प्राप्त संस्थान से आईटीआई प्रमाण पत्र के साथ 10वीं कक्षा पास की हो. उम्र सीमा नोटिफिकेशन के अनुसार इन पदों पर आवेदन करने वाले उम्मीदवारों की न्यूनतम आयु 15 साल और अधिकतम आयु 24 साल होनी चाहिए. चयन प्रक्रिया उम्मीदवारों का शैक्षणिक योग्यता के आधार पर चुना जाएगा. अंतिम तिथि 29 नवंबर, 2017 ग्रामीण डाक सेवक पदों पर निकली भर्ती, 5314 उम्मीदवारों का होगा चयन कैसे करें आवेदन इच्छुक उम्मीदवार North Western Railway (NWR) की आधिकारिक वेबसाइट https://rrcactapp.in/ पर जाकर आवेदन कर सकते हैं.

राहुल गांधी की मदद से ही मेरा बेटा पायलट बनाः निर्भया की मां

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नई द‍िल्ली। निर्भया की मां ने राहुल गांधी का आभार व्यक्त किया है. ये आभार उन्होंने अपने बेटे के पायलट बनने की खुशी में वयक्त किया है. निर्भया की मां कहना है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने उनके बेटे के सपनों को पूरा करने में मदद की है.

निर्भया की मां आशा देवी ने कहा कि राहुल गांधी की बदौलत उनका बेटा पायलट बन पाया. राहुल गांधी ने न सिर्फ पढ़ाई-लिखाई का पूरा खर्चा उठाया बल्‍कि वो लगातार उनके संपर्क में भी रहे. वे उनके बेटे को फोन कर सपनों को पूरा करने के लिए प्रेरित करते रहे और ये समझाते रहे कि आसानी से हार नहीं माननी हैं.

आशा देवी ने कहा कि यह जानने के बाद कि वो डिफेंस फोर्स ज्‍वॉइन करना चाहता है, राहुल गांधी ने उसे स्‍कूल पूरा करने के बाद पायलट की ट्रेनिंग लेने का सुझाव दिया. उन्‍होंने यह भी बताया कि राहुल उनके बेटे से फोन पर बातें भी किया करते थे और उसे सिखाते थे कि कभी हिम्‍मत नहीं हारनी चाहिए. इस वक्‍त निर्भया का भाई गुड़गांव में ट्रेनिंग के आखिरी चरण में है और जल्‍द ही वो कमर्शियल एयर प्‍लेन उड़ाने लगेंगे.

गौरतलब है कि 16 दिसंबर 2012 की रात निर्भया के साथ एक चलती बस में गैंगरेप हुआ था. उसके साथ 6 लोगों ने ऐसी हैवानियत की कि 29 दिसम्बर को उसकी इलाज के दौरान मौत हो गई थी. उस वक्‍त निर्भया का भाई 12वीं में पढ़ रहा था. साल 2013 में उसने राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली स्‍थित इंदिरा गांधी राष्‍ट्रीय उड़ान एकेडमी में एडमिशन ले लिया था. निर्भया का सबसे छोटा भाई पुणे से इंजीनियरिंग कर रहा है.

भीम आर्मी चीफ चन्द्रशेखर को मिली जमानत, समर्थकों में उत्साह

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भीम आर्मी के चीफ चन्द्रशेखर आजाद रावण को जमानत दी. जमानत की इस याचिका को जस्टिस मुख्तार अहमद की बेंच ने मंजूर दी है. रावण को सहारनपुर में हुए जातिय हिंसा से जुड़े सभी चार मामलों में जमानत मिल गई है. जमानत की इस खबर से भीम आर्मी के समर्थकों सहित तमाम दलित संगठनों ने भी खुशी जाहिर की. आपको बता दें कि सहारनपुर जेल में रावण कई दिनों से बीमार चल रहे हैं. इनका इलाज जेल के ही अस्पताल में हो रहा है. हालांकि उनकी सेहत को लेकर अलग अलग-अलग तरह की खबरें आ रही है जिसके बाद से उनके प्रशंसकों में चिंता का माहौल था. लेकिन चंद्रशेखर की रिहाई से देश भर में फैले भीम आर्मी के समर्थकों में खासा उत्साह है. सोशल मीडिया पर वो लगातार इस खुशी को जाहिर भी कर रहे हैं.

भीम आर्मी की स्थापाना करने वाले चन्द्रशेखर, अपने गांव में ‘द ग्रेट चमार’ का बोर्ड लगाने के बाद बहुत कम समय में ही दलित समाज के युवाओं में लोकप्रिय हो गए थे. इसके बाद घटे घटनाक्रम में शब्बीरपुर में ठाकुरों और दलितों के बीच विवाद भी हुआ था, जिसके बाद पुलिस ने रावण को जातीय हिंसा में साजिश रचने के आरोप में मई 2017 में गिरफ्तार कर लिया था. गिरफ्तारी के बाद से वे सहारनपुर जेल में हीं बंद हैं. रावण के अगले सोमवार तक जेल से बाहर आने की संभावना है.

राशन खरीदने के लिए आदिवासी करते हैं 110 किमी पैदल सफर

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दंतेवाड़ा। देश के केद्र सरकार या राज्य सरकारें कितने भी विकास के दावे कर ले, लेकिन जमीनी स्तर पर विकास दिखाई नहीं दे रहा है. दलित, पिछड़ा, आदिवासी, मजदूर और गरीब रोजमर्रा की जरूरतों को पूरी करने के लिए संघर्ष कर रहा है. लेकिन सरकारें सिर्फ विकास का दावा कर रही है. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग(एनएचआरसी) का एक नोटिस सरकारी विकास के दावे की पोल खोल रहा है.

दरअसल, छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के बरकेकलेड गांव के ग्रामीण अपनी रोजमर्रा की वस्तुओं को लेने के लिए 110 किलोमीटर की दूरी तय कर ब्लाक मुख्यालय जाते हैं. आदिवासी बाहुल्य इस गांव से ब्लाक मुख्यालय की दूरी तय करने के लिए ग्रामीणों को कठिन और दुर्गम इलाकों से गुजरना पड़ता है.

आयोग का कहना है कि ग्रामीण 35 किलोग्राम चावल, 2 किलोग्राम चीनी, 2 लीटर केरोसिन, नमक की खरीद के लिए अपनी ज़िंदगी खतरे में डाल रहे हैं. सरकारी दर से उक्त समाग्री की कीमत महज 100 रुपए है. यह समाग्री लेने के लिए ग्रामीणों को 110 किलोमीटर का ​कठिन सफर तय करना पड़ रहा है.

1 नवंबर को मानवाधिकार आयोग द्वारा जारी इस नोटिस में सरकार से चार सप्ताह के भीतर रिपोर्ट मांगी गई है. एनएचआरसी ने अपने मुख्य सचिव के माध्यम से, छत्तीसगढ़ सरकार को नोटिस जारी किया है. इसमें बताया गया है कि राशन के लिए बरकेकलेड और सैंड्रा गांव के निवासियों को इतना लंबा सफर करना पड़ता है, क्योंकि उनके गांव में राशन की दुकान नहीं है.

आयोग को यह भी पता चला है कि छत्तीसगढ़ में ऐसे कई क्षेत्र हैं, जहां लोगों को इस तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है. आयोग का कहना है कि मामले में जिला प्रशासन की कठोर लापरवाही सामने आ रही है. यह स्पष्ट रूप से ग्रामीणों के मानवाधिकारों के उल्लंघन के बराबर है. इसमें ग्रामीणों का पूरा दिन लग जता है. क्षेत्र नक्सली गतिविधियों के लिए जाना जाता है. यहां स्थित वन क्षेत्र जंगली जानवरों से भरा है. ऐसे में प्रशासन को उचित कदम उठाने चाहिए.

जन्मदिन मुबारक किंग खान: अभी तो 52 के हुए हैं… उम्र ही क्या हुई है भला..

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पिता का देहांत हुआ तो उन्हें मुबई जाना पड़ा, वो भी उस लड़की को छोड़ जिससे वो बेपनाह मुहब्बत करते थे. मां का सपना था कि बेटा फिल्मों में नाम करे. शुरू में अनचाहे मन से उन्होंने काम शुरू भी किया लेकिन बाद में यही काम उनका जुनून बन गया. आज उन्हें हम शाहरुख खान के नाम से जानते हैं. शाहरुख बाकी एक्टर्स के मुकाबले ज़मीन से ज़्यादा जुड़े लगते हैं.

यही वजह हो सकती है कि उन्होंने कामयाबी की राह में वही संघर्ष किया है जो हर उस इंसान को करना पड़ता है जिसे विरासत में कुछ नहीं मिलता. ये आदमी बसों और ट्रेनों में घूमा है. किराये के घरों में रहा है. अपनी बचपन की मुहब्बत से लड़-झगड़कर शादी करता है. कई बार बहुत गुस्सा आया तो ज़ाहिर कर दिया लेकिन एहसास होने के बाद माफी भी मांग ली. ना जाने कितनी ही बार अपने डर को सबके सामने साझा किया और ना जाने कितनी बार अपनी मनचाही फिल्में करके मुंह की खाना मंजूर किया. उसने अपने मनपसंद घर को खरीदने के लिए मसाला फिल्में भी कर लीं. वो फिल्म इंडस्ट्री में तब आया जब पिरामिड पर कई लोग बैठे थे.

उन्होंने धीरे से अपनी जगह बना ली. मैंने देखा कि उन्हें हिंदू दक्षिणपंथियों ने गद्दार बताया तो कठमुल्लों ने मुसलमान मानने से इनकार भी किया. हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी में गज़ब की साफ ज़ुबान. ह्यूमर में कोई और खान उसके पास भी नहीं भटक सकता. खुद का मज़ाक बनाने में अव्वल. 12 साल से स्लिप डिस्क के दर्द के बावजूद रोज़ ज्यादा मेहनत. शिष्टाचार और समय का पाबंद जिसके गवाह मेरे ही कई जानकार लोग हैं. शाहरुख बहुत कुछ अपने जैसे लगते हैं.. बहुत कुछ उन जैसा होने का मन चाहता है. जन्मदिन मुबारक शाहरुख. अभी तो 52 के हुए हैं… उम्र ही क्या हुई है भला..

पत्रकार नितिन ठाकुर की लेख..

निकाय चुनावः हापुड़ में टिकट को लेकर बसपा में घमासान

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मान्यवर काशीराम बहुजन समाज को ज्यादा से ज्यादा सत्ता के केंद्र में पहुंचाना चाहते थे. मान्यवर को जानने वाले बताते हैं कि मान्यवर चाहते थे कि बहुजन समाज की हर जाति का काबिलियत रखने वाला नेता सांसद, विधायक और मेयर बने. लेकिन मान्यवर के मिशन को किस तरह पलीता लग रहा है, इसको एक स्थानीय (हापुड उत्तरप्रदेश) केस स्टडी से समझने की कोशिश करते हैं.

यूपी में इन दिनों निकाय चुनाव चल रहे हैं. हापुड़ नगर पालिका परिषद अबतक सुरक्षित सीट थी लेकिन हापुड़ को इस बार सामान्य कर दिया गया. एक दलित चेहरा जो पिछले कई साल से ज़मीन पर मेहनत कर रहा था, चुनाव से पहले ही शहर में लोकप्रिय हो गया था. नाम है Manish Singh. मनीष को काफी पहले आधिकारिक रूप से प्रत्याशी घोषित किया जा चुका था चूंकि सीट सामान्य हो गयी तो अब नामांकन से ऐन पहले मनीष का टिकिट काटकर किसी अनजान से चेहरे अमित अग्रवाल को टिकिट दे दिया गया. पहली बार इस शख्स का नाम सुना है.

अमित को टिकिट क्यों दिया गया ये सब जानते हैं. ये किसी से छुपा नहीं है कि बसपा में मोटी रकम के बिना टिकिट हासिल करना नामुमकिन है! पार्टी की आर्थिक हालत के लिए ज़रूरी हो सकता है. लेकिन टिकटों की बोली लगाने का ये तरीका कहाँ तक जायज़ है इस पर विचार किया जाना चाहिए. अब सवाल ये है कि क्या बसपा की नीति में दलित रिज़र्व सीट तक ही सीमित हैं? क्या सामान्य सीट पर दलित चुनाव नहीं लड़ सकता?

या युं कहें बसपा … कुछ ऐसा ही विधानसभा के चुनावों में हुआ था. मनीष सिंह तब भी टिकिट के प्रबल दावेदार थे. उस वक़्त भी श्रीपाल नाम के एक अनजान शख्स को टिकिट दे दिया गया. मैंने श्रीपाल को खुद देखा है कि वो अपने मोबाइल में नबंर सेव करना तक नहीं जानते थे. मैं ये नहीं कह रहा कि कम पढ़े लिखे लोग नेतृत्व नहीं कर सकते लेकिन पार्टी को समझने की ज़रूरत कि सिर्फ पैसे के बल कोई कैसे नेतृत्व खरीद सकता है. श्रीपाल के टिकिट का पैमाना बस ये थे कि बड़ा ठेकेदार और पैसे वाला था. नतीजा ये हुआ कि बसपा चुनाव हार गई.

दूसरी बार मनीष का टिकिट कटा है. मनीष का टिकिट कटने का विरोध शहर का दलित और मुस्लिम समुदाय कर रहा है. मनीष का टिकिट कटने के फैसले के विरोध में कल से कई पोस्ट देख चुका हूं. मेरी लिस्ट में बसपा के कट्टर समर्थक उनसे निर्दलीय चुनाव लड़ने की मांग कर रहे हैं. पिछली बार टिकिट कटने पर भी मनीष खामोश रहे थे और इस बार भी खामोश ही नज़र आ रहे हैं.

ये सिर्फ एक मनीष की कहानी नहीं है, पता नहीं मिशन के नाम पर कब तक ज़मीन पर काम करने वालों के साथ छल होता रहेगा. लोकसभा और विधानसभा में करारी हार के बावजूद मायावती अपनी शैली में बदलाव को तैयार नज़र नहीं आती. अगर ऐसा ही चलता रहा तो दलितों की नुमाइंदगी देर सबेर किसी और दलित नेता पर शिफ्ट हो जाएगी. जो लोग बसपा को इस बिना पर समर्थन करते हैं दलितों का सशक्तिकरण किया जा रहा है, उन्हें ठहरकर सोचने की ज़रूरत है.

मेरा मानना है बसपा को सोचने की जरूरत है के वो पिपल पर है या पियुपिल पर…!

जावेद की रिपोर्ट  

विश्वविद्यालय में डीन की नौकरी छोड़ आदिवासियों संग कर रहा है खेती

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Vishal

भुवनेश्वर। आईआईटी खड़गपुर से पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद अच्छी नौकरी और फिर ओडिशा सेंचुरियन यूनिवर्सिटी में डीन की नौकरी, आगे एक बेहतर करियर और बेहतर भविष्य की गारंटी. लेकिन यह सब यहीं पीछे छोड़ ओडिशा के बदहाल आदिवासियों की मदद के लिए खुद किसान बन जाना. यह कहानी है एक होनहार युवा इंजीनियर विशाल सिंह की. होनहार इसलिए, क्योंकि उच्च शिक्षा हासिल कर लेने के बाद मोटी सैलरी के पीछे भागना ही शिक्षा से हासिल एकमात्र हुनर और जीवन का एकमात्र ध्येय नहीं हो सकता है. इंसान को इंसान समझने से बड़ा हुनर शायद ही कोई दूसरा हो. अपने इसी हुनर के कारण विशाल सिंह एक नजीर के रूप में हमारे सामने हैं.

नौकरी से सरोकार तक: वर्ष 2013 में आईआईटी खड़गपुर से स्नातकोत्तर करने के बाद विशाल को अभियंता के रूप में पहली नौकरी मिली यूपी के शाहजहांपुर में. राइस प्रोसेसिंग इंडस्ट्री के रिसर्च डेवलेपमेंट विभाग में बड़ा पद. कुछ दिनों तक काम किया पर मन नहीं लगा. 2014 में नई नौकरी पकड़ी और ओडिशा आ गए. यहां सेंचुरियन यूनिवर्सिटी के एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग विभाग में विभाग प्रमुख बनाए गए. गरीब किसानों की मदद का जज्बा शुरू से मन में था, जो ओडिशा आकर बढ़ गया. यहां आदिवासी किसानों की दुर्दशा देख विशाल विचलित हो उठे. सोचा कि नौकरी के साथ-साथ इनकी मदद के लिए भी काम करेंगे. यहां से शुरुआत हुई. पास के गांवों के दस-दस किसानों का समूह बना कर उन्हें स्वावलंबन, उन्नत व जैविक कृषि के लिए प्रशिक्षित करने लगे. फिर यूनिवर्सिटी के छात्रों को भी इस काम में जोड़ा. इस बीच प्रमोशन हुआ और 2015 में विश्वविद्यालय में डीन बना दिए गए. इससे अभियान को आगे बढ़ाने के लिए और समय मिल गया. उन्होंने गंजाम, गुणुपुर व बालागीर जिलों में भी अपनी मुहिम को बढ़ाया.

समाज सेवा का हुनर: विशाल ने बताया कि नौकरी छोड़ कर गरीबी उन्मूलन के काम में जुटने के फैसले के बाद वे इस सीमित समय में ही अब तक 8900 आदिवासी किसानों को आत्मनिर्भर बन चुके हैं. बकौल विशाल, 2016 में लगा कि नौकरी बाधा बन रही है. गरीब आदिवासी किसानों को मेरी मदद की अधिक जरूरत थी. मेरे सहयोग से उन सैकड़ों परिवारों का भला हो सकता था, जो अजागरूकता और पिछड़ेपन के कारण नारकीय जीवन जी रहे थे. मैंने नौकरी छोड़ कर पूरी तरह इन आदिवासी किसानों के लिए ही जीवन समर्पित करने का मन बना लिया. लेकिन इस काम को कैसे करूंगा, संसाधन कैसे जुटाऊंगा, इन सभी बातों की पक्की योजना बनाई और फिर नौकरी छोड़ दी. विशाल ने बताया कि उन्होंने आदिवासी किसानों की मदद के लिए एक रूपरेखा तैयार की और फिर उस पर काम शुरू किया.

वह बताते हैं, कुछ बड़ी संस्थाओं और एनजीओ को मैंने इस काम में जोड़ा. मयूरभंज जिले के सुलियापदा ब्लॉक के लोधा व संथाल जनजातियों के उत्थान के लिए 200 एकड़ जमीन पर सहजन, सर्पगंधा, लेमनग्रास की सामूहिक खेती शुरू कराने में सफलता मिली. वहीं सुंदरगढ़ के कुआर मुंडा में जैविक खाद, जैविक कीटनाशक और जैविक टॉनिक का सामूहिक उत्पादन कार्य शुरू कराया गया. किसानों को आर्थिक फायदा हुआ तो हौसला भी बढ़ा. फिर झारसुगुडा में जैविक खाद उत्पादन केंद्र बनाया. मददगार जुड़ते गए और मयूरभंज व बालागीर में भी मुहिम तेज हो गई. झारसुगुड़ा में भी 16 एकड़ भूमि पर जैविक फल, सब्जी व हर्बल पेय का सामूहिक उत्पादन शुरू किया.

किसान पिता से मिली प्रेरणा बनारस के रहने वाले विशाल के पिता ओंकारनाथ सिंह एक साधारण किसान हैं. विशाल बताते हैं कि किसानों की मदद करने की प्रेरणा उन्हें अपने पिता के संघर्ष को देखकर ही मिली. वह कहते हैं, किसानों की स्थिति से मैं पूरी तरह वाकिफ हूं. यही कारण है कि बचपन में ही मैंने कृषि क्षेत्र से जुड़ने का मन बना लिया था. मेरा लक्ष्य गरीबी से जूझने वाले साधनहीन किसानों को आत्मनिर्भर बनाना है.

दैनिक जागरण से साभार

देखें नेहरा के आखिरी मैच में उन्होंने किस तरह किया सबको हैरान

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kohli

नई दिल्ली। भारतीय क्रिकेट टीम के तेज गेंदबादज आशीष नेहरा ने दिल्ली के फिरोजशाह कोटला स्टेडियम में बुधवार को अपना आखिरी अंतरराष्ट्रीय मैच खेला. इस मैच में भारत ने न्यूजीलैंड को पहले टी-20 मैच में 53 रनों से हराया. बारतीय टीम के लिए यह मैच कई मायनों मे खास रहा.

भारत ने 10 साल बाद कीवियों को पहले टी-20 मैच में हराया. इसके अलावा आशीष नेहरा पर भी क्रिकेट फैंस की नजरें लगी हुई थीं. उन्होंने मैच का पहला और आखिरी ओवर कराया. यही नहीं, आमतौर पर फील्डिंग में फिसड्डी माने जाने वाले नेहरा ने अपने आखिरी मैच में चुस्त फील्डिंग से टीम के युवा खिलाड़ियों, कप्तान और दर्शकों की तालियां भी बटोरीं.

देखें, नेहरा के कमाल का यह वीडियो-

यह मामला है कीवी टीम की बल्लेबाजी के 17वें ओवर का. बॉल जसप्रीत बुमराह के हाथ में थी और कीवी खिलाड़ी के शॉट पर बॉल नेहरा के पास आई. नेहरा ने बिना झुके गेंद को अपने पैरों से रोक दिया. यही नहीं, जब नेहरा ने पैर से बॉल को रोका तो गेंद ऊपर उछली और उन्होंने अपने हाथों से गेंद को लपक लिया. युजवेंद्र चहल और कप्तान कोहली यह देखकर नेहरा के लिए तालियां बजाने से खुद को नहीं रोक सके.

आपको बताते चलें कि भारतीय टीम ने आशीष नेहरा को उनके विदाई मैच में जीत का तोहफा दिया. इस जीत के सथ ही भारत ने 3 मैचों की टी-20 सीरीज में 1-0 से बढ़त बना ली है. भारतीय टीम को इस मैच में 53 रनों की बड़ी जीत मिली.