अब बुक कर सकेंगे महीने में 12 टिकट, IRCTC ने दी सुविधा

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अब आधार कार्ड होने पर भारतीय रेल से यात्रा करना आसान हो जाएगा. IRCTC ने रेलवे टिकट की बुकिंग के लिए आधार वेरिफिकेशन करने पर 1 महीने के अंदर 12 टिकट बुक कराने की आजादी दी है. खास बात यह है कि रेलवे की टिकट बुक कराने के लिए आधार को अनिवार्य नहीं किया गया है. आधार वेरिफिकेशन कराने पर ऑनलाइन टिकट बुकिंग में मौजूदा 6 टिकट की लिमिट को हर महीने के लिए 12 टिकट कर दिया गया है.

IRCTC ने ऑनलाइन टिकट बुकिंग की अपनी गाइडलाइन बदल दी हैं और इस महीने से IRCTC की पोर्टल पर आधार नंबर को अपलोड करने की सुविधा दी गई है . इसमें हरेक अकाउंट पर हर महीने के लिए आधार वेरिफिकेशन होने के बाद 6 टिकट की मौजूदा लिमिट को बढ़ाकर 12 टिकट कर दिया गया है. इस लिमिट में आईआरसीटीसी की वेबसाइट पर किसी अकाउंट में बुक कराए गए टिकट के साथ-साथ रेल कनेक्ट मोबाइल एप्लीकेशन ऐप के जरिए बुक कराए गए टिकट को भी शामिल किया गया है.

रेलवे की आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक आधार कार्ड को ऑनलाइन टिकट के लिए अनिवार्य नहीं किया गया है. बिना आधार कार्ड की इंफॉर्मेशन दिए ऑनलाइन टिकट बुकिंग में हर एक व्यक्ति एक महीने में छठ टिकट बुक करा सकता है. अगर एक महीने में 6 टिकट से ज्यादा टिकट आप बुक कराना चाह रहे हैं तो आपको पैसेंजर का आधार कार्ड वेरीफाई कराना पड़ेगा.AAd

आईआरसीटीसी की वेबसाइट पर कोई भी यात्री माय प्रोफाइल कैटेगरी में आधार केवाईसी पर क्लिक करके अपने आधार नंबर को अपडेट कर सकता है. इस वेरिफिकेशन के दौरान आधार से जुड़े हुए मोबाइल नंबर पर एक वन टाइम पासवर्ड भेजा जाता है. इस पासवर्ड को वेबसाइट पर डालने पर आधार कार्ड का वेरिफिकेशन हो जाता है.

महाराष्ट्र में बाबासाहेब अम्बेडकर का ‘पाठशाला प्रवेश दिवस’ अब होगा “विद्यार्थी दिवस”

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सतारा। बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर जिस दिन पहली बार स्कूल गए थे, उस दिन को महाराष्ट्र सरकार ने ‘विद्यार्थी दिवस’ घोषित कर दिया है. महाराष्ट्र के शिक्षा विभाग द्वारा सात नवंबर को ‘विद्यार्थी दिवस’ मनाने का आदेश दिया गया है.

बाबासाहेब अम्बेडकर ने सतारा के राजवाड़ा चौक स्थित प्रतापसिंह हाईस्कूल में 7 नवंबर 1900 के दिन पहली बार स्कूल में प्रवेश लिया था. इसी दिन से उनके शैक्षणिक जीवन की शुरुआत हुई थी. उस समय उन्हें भीमा कहकर बुलाया जाता था. स्कूल में उस समय उनका नाम रजिस्टर में क्रमांक-1914 पर अंकित था. जिसके सामने आज भी बालक भीमराव के हस्ताक्षर मौजूद हैं.

इस ऐतिहासिक दस्तावेज़ को स्कूल प्रशासन ने बड़े सम्मान और गर्व के साथ सहेज रखा है. उनके स्कूल में प्रवेश लेने की युगांतकारी घटना एक अर्थ में शैक्षणिक क्रांति की शुरुआत मानी जा सकती है. सतारा के प्रवर्तन संगठन के अध्यक्ष अरुण जावले ने 7 नवंबर को ‘पाठशाला प्रवेश दिवस’ के रूप में घोषित करने की मांग महाराष्ट्र के सामजिक न्याय मंत्री राजकुमार बडोले और शिक्षा मंत्री विनोद तावडे के समक्ष उठाई थी.

उनकी मांग पर दोनों ही मंत्रियों ने बाबासाहेब के पाठशाला में प्रवेश दिवस 7 नवंबर को “विद्यार्थी दिवस” के रूप में मनाने का निर्णय लिया है. डॉ. बीआर अम्बेडकर जीवन में शिक्षा के कारण ही क्रांति कर सके, जिससे भारतीय समाज में अभूतपूर्व क्रांति हुई. शिक्षा पाकर प्रबुद्ध बने बाबासाहेब लाखों-करोड़ों दलित-वंचित वर्ग का ऊद्धार किया. सम्पूर्ण विश्व में आदर्श संविधान और भारतीय लोकतंत्र को आकर देने वाले महान शिल्पकार के रूप में बाबासाहेब गौरव बने.

महाराष्ट्र सरकार का यह निर्णय निश्चित ही स्वागत योग्य कदम है. भारत के प्रत्येक नागरिक ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के लिए बाबासाहेब एक आदर्श हैं. महाराष्ट्र से प्रेरणा लेते हुए केंद्र सरकार को 7 नवंबर को “राष्ट्रीय विद्यार्थी दिवस” (National Student Day) के रूप घोषित करना चाहिए.

उत्तर रेलवे में निकली बंपर भर्तियां, जल्द करें अप्लाई

North Western Railway (NWR) ने Act Apprentice के पदों पर भर्ती के लिए आवेदन आमंत्रित किए हैं. इन पदों के लिए इच्छुक और योग्य उम्मीदवार 29 नवंबर, 2017 तक आवेदन कर सकते हैं. आवेदन से जुड़ी जानकारियां नीचे दी गई हैं. संस्थान का नाम North Western Railway (NWR) पदों के नाम डिविजनल रेलवे मैनेजर ऑफिसर और अन्य पदों की संख्या नोटिफिकेशन के अनुसार पदों की संख्या 1164 है. योग्यता उम्मीदवार ने देश के किसी भी मान्यता प्राप्त संस्थान से आईटीआई प्रमाण पत्र के साथ 10वीं कक्षा पास की हो. उम्र सीमा नोटिफिकेशन के अनुसार इन पदों पर आवेदन करने वाले उम्मीदवारों की न्यूनतम आयु 15 साल और अधिकतम आयु 24 साल होनी चाहिए. चयन प्रक्रिया उम्मीदवारों का शैक्षणिक योग्यता के आधार पर चुना जाएगा. अंतिम तिथि 29 नवंबर, 2017 ग्रामीण डाक सेवक पदों पर निकली भर्ती, 5314 उम्मीदवारों का होगा चयन कैसे करें आवेदन इच्छुक उम्मीदवार North Western Railway (NWR) की आधिकारिक वेबसाइट https://rrcactapp.in/ पर जाकर आवेदन कर सकते हैं.

राहुल गांधी की मदद से ही मेरा बेटा पायलट बनाः निर्भया की मां

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नई द‍िल्ली। निर्भया की मां ने राहुल गांधी का आभार व्यक्त किया है. ये आभार उन्होंने अपने बेटे के पायलट बनने की खुशी में वयक्त किया है. निर्भया की मां कहना है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने उनके बेटे के सपनों को पूरा करने में मदद की है.

निर्भया की मां आशा देवी ने कहा कि राहुल गांधी की बदौलत उनका बेटा पायलट बन पाया. राहुल गांधी ने न सिर्फ पढ़ाई-लिखाई का पूरा खर्चा उठाया बल्‍कि वो लगातार उनके संपर्क में भी रहे. वे उनके बेटे को फोन कर सपनों को पूरा करने के लिए प्रेरित करते रहे और ये समझाते रहे कि आसानी से हार नहीं माननी हैं.

आशा देवी ने कहा कि यह जानने के बाद कि वो डिफेंस फोर्स ज्‍वॉइन करना चाहता है, राहुल गांधी ने उसे स्‍कूल पूरा करने के बाद पायलट की ट्रेनिंग लेने का सुझाव दिया. उन्‍होंने यह भी बताया कि राहुल उनके बेटे से फोन पर बातें भी किया करते थे और उसे सिखाते थे कि कभी हिम्‍मत नहीं हारनी चाहिए. इस वक्‍त निर्भया का भाई गुड़गांव में ट्रेनिंग के आखिरी चरण में है और जल्‍द ही वो कमर्शियल एयर प्‍लेन उड़ाने लगेंगे.

गौरतलब है कि 16 दिसंबर 2012 की रात निर्भया के साथ एक चलती बस में गैंगरेप हुआ था. उसके साथ 6 लोगों ने ऐसी हैवानियत की कि 29 दिसम्बर को उसकी इलाज के दौरान मौत हो गई थी. उस वक्‍त निर्भया का भाई 12वीं में पढ़ रहा था. साल 2013 में उसने राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली स्‍थित इंदिरा गांधी राष्‍ट्रीय उड़ान एकेडमी में एडमिशन ले लिया था. निर्भया का सबसे छोटा भाई पुणे से इंजीनियरिंग कर रहा है.

भीम आर्मी चीफ चन्द्रशेखर को मिली जमानत, समर्थकों में उत्साह

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भीम आर्मी के चीफ चन्द्रशेखर आजाद रावण को जमानत दी. जमानत की इस याचिका को जस्टिस मुख्तार अहमद की बेंच ने मंजूर दी है. रावण को सहारनपुर में हुए जातिय हिंसा से जुड़े सभी चार मामलों में जमानत मिल गई है. जमानत की इस खबर से भीम आर्मी के समर्थकों सहित तमाम दलित संगठनों ने भी खुशी जाहिर की. आपको बता दें कि सहारनपुर जेल में रावण कई दिनों से बीमार चल रहे हैं. इनका इलाज जेल के ही अस्पताल में हो रहा है. हालांकि उनकी सेहत को लेकर अलग अलग-अलग तरह की खबरें आ रही है जिसके बाद से उनके प्रशंसकों में चिंता का माहौल था. लेकिन चंद्रशेखर की रिहाई से देश भर में फैले भीम आर्मी के समर्थकों में खासा उत्साह है. सोशल मीडिया पर वो लगातार इस खुशी को जाहिर भी कर रहे हैं.

भीम आर्मी की स्थापाना करने वाले चन्द्रशेखर, अपने गांव में ‘द ग्रेट चमार’ का बोर्ड लगाने के बाद बहुत कम समय में ही दलित समाज के युवाओं में लोकप्रिय हो गए थे. इसके बाद घटे घटनाक्रम में शब्बीरपुर में ठाकुरों और दलितों के बीच विवाद भी हुआ था, जिसके बाद पुलिस ने रावण को जातीय हिंसा में साजिश रचने के आरोप में मई 2017 में गिरफ्तार कर लिया था. गिरफ्तारी के बाद से वे सहारनपुर जेल में हीं बंद हैं. रावण के अगले सोमवार तक जेल से बाहर आने की संभावना है.

राशन खरीदने के लिए आदिवासी करते हैं 110 किमी पैदल सफर

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दंतेवाड़ा। देश के केद्र सरकार या राज्य सरकारें कितने भी विकास के दावे कर ले, लेकिन जमीनी स्तर पर विकास दिखाई नहीं दे रहा है. दलित, पिछड़ा, आदिवासी, मजदूर और गरीब रोजमर्रा की जरूरतों को पूरी करने के लिए संघर्ष कर रहा है. लेकिन सरकारें सिर्फ विकास का दावा कर रही है. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग(एनएचआरसी) का एक नोटिस सरकारी विकास के दावे की पोल खोल रहा है.

दरअसल, छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के बरकेकलेड गांव के ग्रामीण अपनी रोजमर्रा की वस्तुओं को लेने के लिए 110 किलोमीटर की दूरी तय कर ब्लाक मुख्यालय जाते हैं. आदिवासी बाहुल्य इस गांव से ब्लाक मुख्यालय की दूरी तय करने के लिए ग्रामीणों को कठिन और दुर्गम इलाकों से गुजरना पड़ता है.

आयोग का कहना है कि ग्रामीण 35 किलोग्राम चावल, 2 किलोग्राम चीनी, 2 लीटर केरोसिन, नमक की खरीद के लिए अपनी ज़िंदगी खतरे में डाल रहे हैं. सरकारी दर से उक्त समाग्री की कीमत महज 100 रुपए है. यह समाग्री लेने के लिए ग्रामीणों को 110 किलोमीटर का ​कठिन सफर तय करना पड़ रहा है.

1 नवंबर को मानवाधिकार आयोग द्वारा जारी इस नोटिस में सरकार से चार सप्ताह के भीतर रिपोर्ट मांगी गई है. एनएचआरसी ने अपने मुख्य सचिव के माध्यम से, छत्तीसगढ़ सरकार को नोटिस जारी किया है. इसमें बताया गया है कि राशन के लिए बरकेकलेड और सैंड्रा गांव के निवासियों को इतना लंबा सफर करना पड़ता है, क्योंकि उनके गांव में राशन की दुकान नहीं है.

आयोग को यह भी पता चला है कि छत्तीसगढ़ में ऐसे कई क्षेत्र हैं, जहां लोगों को इस तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है. आयोग का कहना है कि मामले में जिला प्रशासन की कठोर लापरवाही सामने आ रही है. यह स्पष्ट रूप से ग्रामीणों के मानवाधिकारों के उल्लंघन के बराबर है. इसमें ग्रामीणों का पूरा दिन लग जता है. क्षेत्र नक्सली गतिविधियों के लिए जाना जाता है. यहां स्थित वन क्षेत्र जंगली जानवरों से भरा है. ऐसे में प्रशासन को उचित कदम उठाने चाहिए.

जन्मदिन मुबारक किंग खान: अभी तो 52 के हुए हैं… उम्र ही क्या हुई है भला..

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पिता का देहांत हुआ तो उन्हें मुबई जाना पड़ा, वो भी उस लड़की को छोड़ जिससे वो बेपनाह मुहब्बत करते थे. मां का सपना था कि बेटा फिल्मों में नाम करे. शुरू में अनचाहे मन से उन्होंने काम शुरू भी किया लेकिन बाद में यही काम उनका जुनून बन गया. आज उन्हें हम शाहरुख खान के नाम से जानते हैं. शाहरुख बाकी एक्टर्स के मुकाबले ज़मीन से ज़्यादा जुड़े लगते हैं.

यही वजह हो सकती है कि उन्होंने कामयाबी की राह में वही संघर्ष किया है जो हर उस इंसान को करना पड़ता है जिसे विरासत में कुछ नहीं मिलता. ये आदमी बसों और ट्रेनों में घूमा है. किराये के घरों में रहा है. अपनी बचपन की मुहब्बत से लड़-झगड़कर शादी करता है. कई बार बहुत गुस्सा आया तो ज़ाहिर कर दिया लेकिन एहसास होने के बाद माफी भी मांग ली. ना जाने कितनी ही बार अपने डर को सबके सामने साझा किया और ना जाने कितनी बार अपनी मनचाही फिल्में करके मुंह की खाना मंजूर किया. उसने अपने मनपसंद घर को खरीदने के लिए मसाला फिल्में भी कर लीं. वो फिल्म इंडस्ट्री में तब आया जब पिरामिड पर कई लोग बैठे थे.

उन्होंने धीरे से अपनी जगह बना ली. मैंने देखा कि उन्हें हिंदू दक्षिणपंथियों ने गद्दार बताया तो कठमुल्लों ने मुसलमान मानने से इनकार भी किया. हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी में गज़ब की साफ ज़ुबान. ह्यूमर में कोई और खान उसके पास भी नहीं भटक सकता. खुद का मज़ाक बनाने में अव्वल. 12 साल से स्लिप डिस्क के दर्द के बावजूद रोज़ ज्यादा मेहनत. शिष्टाचार और समय का पाबंद जिसके गवाह मेरे ही कई जानकार लोग हैं. शाहरुख बहुत कुछ अपने जैसे लगते हैं.. बहुत कुछ उन जैसा होने का मन चाहता है. जन्मदिन मुबारक शाहरुख. अभी तो 52 के हुए हैं… उम्र ही क्या हुई है भला..

पत्रकार नितिन ठाकुर की लेख..

निकाय चुनावः हापुड़ में टिकट को लेकर बसपा में घमासान

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मान्यवर काशीराम बहुजन समाज को ज्यादा से ज्यादा सत्ता के केंद्र में पहुंचाना चाहते थे. मान्यवर को जानने वाले बताते हैं कि मान्यवर चाहते थे कि बहुजन समाज की हर जाति का काबिलियत रखने वाला नेता सांसद, विधायक और मेयर बने. लेकिन मान्यवर के मिशन को किस तरह पलीता लग रहा है, इसको एक स्थानीय (हापुड उत्तरप्रदेश) केस स्टडी से समझने की कोशिश करते हैं.

यूपी में इन दिनों निकाय चुनाव चल रहे हैं. हापुड़ नगर पालिका परिषद अबतक सुरक्षित सीट थी लेकिन हापुड़ को इस बार सामान्य कर दिया गया. एक दलित चेहरा जो पिछले कई साल से ज़मीन पर मेहनत कर रहा था, चुनाव से पहले ही शहर में लोकप्रिय हो गया था. नाम है Manish Singh. मनीष को काफी पहले आधिकारिक रूप से प्रत्याशी घोषित किया जा चुका था चूंकि सीट सामान्य हो गयी तो अब नामांकन से ऐन पहले मनीष का टिकिट काटकर किसी अनजान से चेहरे अमित अग्रवाल को टिकिट दे दिया गया. पहली बार इस शख्स का नाम सुना है.

अमित को टिकिट क्यों दिया गया ये सब जानते हैं. ये किसी से छुपा नहीं है कि बसपा में मोटी रकम के बिना टिकिट हासिल करना नामुमकिन है! पार्टी की आर्थिक हालत के लिए ज़रूरी हो सकता है. लेकिन टिकटों की बोली लगाने का ये तरीका कहाँ तक जायज़ है इस पर विचार किया जाना चाहिए. अब सवाल ये है कि क्या बसपा की नीति में दलित रिज़र्व सीट तक ही सीमित हैं? क्या सामान्य सीट पर दलित चुनाव नहीं लड़ सकता?

या युं कहें बसपा … कुछ ऐसा ही विधानसभा के चुनावों में हुआ था. मनीष सिंह तब भी टिकिट के प्रबल दावेदार थे. उस वक़्त भी श्रीपाल नाम के एक अनजान शख्स को टिकिट दे दिया गया. मैंने श्रीपाल को खुद देखा है कि वो अपने मोबाइल में नबंर सेव करना तक नहीं जानते थे. मैं ये नहीं कह रहा कि कम पढ़े लिखे लोग नेतृत्व नहीं कर सकते लेकिन पार्टी को समझने की ज़रूरत कि सिर्फ पैसे के बल कोई कैसे नेतृत्व खरीद सकता है. श्रीपाल के टिकिट का पैमाना बस ये थे कि बड़ा ठेकेदार और पैसे वाला था. नतीजा ये हुआ कि बसपा चुनाव हार गई.

दूसरी बार मनीष का टिकिट कटा है. मनीष का टिकिट कटने का विरोध शहर का दलित और मुस्लिम समुदाय कर रहा है. मनीष का टिकिट कटने के फैसले के विरोध में कल से कई पोस्ट देख चुका हूं. मेरी लिस्ट में बसपा के कट्टर समर्थक उनसे निर्दलीय चुनाव लड़ने की मांग कर रहे हैं. पिछली बार टिकिट कटने पर भी मनीष खामोश रहे थे और इस बार भी खामोश ही नज़र आ रहे हैं.

ये सिर्फ एक मनीष की कहानी नहीं है, पता नहीं मिशन के नाम पर कब तक ज़मीन पर काम करने वालों के साथ छल होता रहेगा. लोकसभा और विधानसभा में करारी हार के बावजूद मायावती अपनी शैली में बदलाव को तैयार नज़र नहीं आती. अगर ऐसा ही चलता रहा तो दलितों की नुमाइंदगी देर सबेर किसी और दलित नेता पर शिफ्ट हो जाएगी. जो लोग बसपा को इस बिना पर समर्थन करते हैं दलितों का सशक्तिकरण किया जा रहा है, उन्हें ठहरकर सोचने की ज़रूरत है.

मेरा मानना है बसपा को सोचने की जरूरत है के वो पिपल पर है या पियुपिल पर…!

जावेद की रिपोर्ट  

विश्वविद्यालय में डीन की नौकरी छोड़ आदिवासियों संग कर रहा है खेती

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Vishal

भुवनेश्वर। आईआईटी खड़गपुर से पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद अच्छी नौकरी और फिर ओडिशा सेंचुरियन यूनिवर्सिटी में डीन की नौकरी, आगे एक बेहतर करियर और बेहतर भविष्य की गारंटी. लेकिन यह सब यहीं पीछे छोड़ ओडिशा के बदहाल आदिवासियों की मदद के लिए खुद किसान बन जाना. यह कहानी है एक होनहार युवा इंजीनियर विशाल सिंह की. होनहार इसलिए, क्योंकि उच्च शिक्षा हासिल कर लेने के बाद मोटी सैलरी के पीछे भागना ही शिक्षा से हासिल एकमात्र हुनर और जीवन का एकमात्र ध्येय नहीं हो सकता है. इंसान को इंसान समझने से बड़ा हुनर शायद ही कोई दूसरा हो. अपने इसी हुनर के कारण विशाल सिंह एक नजीर के रूप में हमारे सामने हैं.

नौकरी से सरोकार तक: वर्ष 2013 में आईआईटी खड़गपुर से स्नातकोत्तर करने के बाद विशाल को अभियंता के रूप में पहली नौकरी मिली यूपी के शाहजहांपुर में. राइस प्रोसेसिंग इंडस्ट्री के रिसर्च डेवलेपमेंट विभाग में बड़ा पद. कुछ दिनों तक काम किया पर मन नहीं लगा. 2014 में नई नौकरी पकड़ी और ओडिशा आ गए. यहां सेंचुरियन यूनिवर्सिटी के एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग विभाग में विभाग प्रमुख बनाए गए. गरीब किसानों की मदद का जज्बा शुरू से मन में था, जो ओडिशा आकर बढ़ गया. यहां आदिवासी किसानों की दुर्दशा देख विशाल विचलित हो उठे. सोचा कि नौकरी के साथ-साथ इनकी मदद के लिए भी काम करेंगे. यहां से शुरुआत हुई. पास के गांवों के दस-दस किसानों का समूह बना कर उन्हें स्वावलंबन, उन्नत व जैविक कृषि के लिए प्रशिक्षित करने लगे. फिर यूनिवर्सिटी के छात्रों को भी इस काम में जोड़ा. इस बीच प्रमोशन हुआ और 2015 में विश्वविद्यालय में डीन बना दिए गए. इससे अभियान को आगे बढ़ाने के लिए और समय मिल गया. उन्होंने गंजाम, गुणुपुर व बालागीर जिलों में भी अपनी मुहिम को बढ़ाया.

समाज सेवा का हुनर: विशाल ने बताया कि नौकरी छोड़ कर गरीबी उन्मूलन के काम में जुटने के फैसले के बाद वे इस सीमित समय में ही अब तक 8900 आदिवासी किसानों को आत्मनिर्भर बन चुके हैं. बकौल विशाल, 2016 में लगा कि नौकरी बाधा बन रही है. गरीब आदिवासी किसानों को मेरी मदद की अधिक जरूरत थी. मेरे सहयोग से उन सैकड़ों परिवारों का भला हो सकता था, जो अजागरूकता और पिछड़ेपन के कारण नारकीय जीवन जी रहे थे. मैंने नौकरी छोड़ कर पूरी तरह इन आदिवासी किसानों के लिए ही जीवन समर्पित करने का मन बना लिया. लेकिन इस काम को कैसे करूंगा, संसाधन कैसे जुटाऊंगा, इन सभी बातों की पक्की योजना बनाई और फिर नौकरी छोड़ दी. विशाल ने बताया कि उन्होंने आदिवासी किसानों की मदद के लिए एक रूपरेखा तैयार की और फिर उस पर काम शुरू किया.

वह बताते हैं, कुछ बड़ी संस्थाओं और एनजीओ को मैंने इस काम में जोड़ा. मयूरभंज जिले के सुलियापदा ब्लॉक के लोधा व संथाल जनजातियों के उत्थान के लिए 200 एकड़ जमीन पर सहजन, सर्पगंधा, लेमनग्रास की सामूहिक खेती शुरू कराने में सफलता मिली. वहीं सुंदरगढ़ के कुआर मुंडा में जैविक खाद, जैविक कीटनाशक और जैविक टॉनिक का सामूहिक उत्पादन कार्य शुरू कराया गया. किसानों को आर्थिक फायदा हुआ तो हौसला भी बढ़ा. फिर झारसुगुडा में जैविक खाद उत्पादन केंद्र बनाया. मददगार जुड़ते गए और मयूरभंज व बालागीर में भी मुहिम तेज हो गई. झारसुगुड़ा में भी 16 एकड़ भूमि पर जैविक फल, सब्जी व हर्बल पेय का सामूहिक उत्पादन शुरू किया.

किसान पिता से मिली प्रेरणा बनारस के रहने वाले विशाल के पिता ओंकारनाथ सिंह एक साधारण किसान हैं. विशाल बताते हैं कि किसानों की मदद करने की प्रेरणा उन्हें अपने पिता के संघर्ष को देखकर ही मिली. वह कहते हैं, किसानों की स्थिति से मैं पूरी तरह वाकिफ हूं. यही कारण है कि बचपन में ही मैंने कृषि क्षेत्र से जुड़ने का मन बना लिया था. मेरा लक्ष्य गरीबी से जूझने वाले साधनहीन किसानों को आत्मनिर्भर बनाना है.

दैनिक जागरण से साभार

देखें नेहरा के आखिरी मैच में उन्होंने किस तरह किया सबको हैरान

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kohli

नई दिल्ली। भारतीय क्रिकेट टीम के तेज गेंदबादज आशीष नेहरा ने दिल्ली के फिरोजशाह कोटला स्टेडियम में बुधवार को अपना आखिरी अंतरराष्ट्रीय मैच खेला. इस मैच में भारत ने न्यूजीलैंड को पहले टी-20 मैच में 53 रनों से हराया. बारतीय टीम के लिए यह मैच कई मायनों मे खास रहा.

भारत ने 10 साल बाद कीवियों को पहले टी-20 मैच में हराया. इसके अलावा आशीष नेहरा पर भी क्रिकेट फैंस की नजरें लगी हुई थीं. उन्होंने मैच का पहला और आखिरी ओवर कराया. यही नहीं, आमतौर पर फील्डिंग में फिसड्डी माने जाने वाले नेहरा ने अपने आखिरी मैच में चुस्त फील्डिंग से टीम के युवा खिलाड़ियों, कप्तान और दर्शकों की तालियां भी बटोरीं.

देखें, नेहरा के कमाल का यह वीडियो-

यह मामला है कीवी टीम की बल्लेबाजी के 17वें ओवर का. बॉल जसप्रीत बुमराह के हाथ में थी और कीवी खिलाड़ी के शॉट पर बॉल नेहरा के पास आई. नेहरा ने बिना झुके गेंद को अपने पैरों से रोक दिया. यही नहीं, जब नेहरा ने पैर से बॉल को रोका तो गेंद ऊपर उछली और उन्होंने अपने हाथों से गेंद को लपक लिया. युजवेंद्र चहल और कप्तान कोहली यह देखकर नेहरा के लिए तालियां बजाने से खुद को नहीं रोक सके.

आपको बताते चलें कि भारतीय टीम ने आशीष नेहरा को उनके विदाई मैच में जीत का तोहफा दिया. इस जीत के सथ ही भारत ने 3 मैचों की टी-20 सीरीज में 1-0 से बढ़त बना ली है. भारतीय टीम को इस मैच में 53 रनों की बड़ी जीत मिली.

‘हिंदू आतंकवाद’ के लेख पर भाजपा के निशाने पर कमल हासन

kamal hassan

नई दिल्ली। दक्षिण भारतीय अभिनेता कमल हासन इन दिनों चर्चा में हैं. कभी राजनीति में शामिल होने की अटकलों के लिए तो कभी किसी पार्टी समर्थित बयान के लिए. अब कमल हासन एक लेख के माध्यम से चर्चा के केंद्र में आ गए हैं.

दरअसल, कमल हासन ने एक तमिल साप्ताहिक पत्रिका ‘आनंदा विकटन’ में एक लेख लिखा है. जिसमें हासन ने कहा है कि दक्षिणपंथी लोग अब हिंसा पर उतारू हो रहे हैं. उन्होंने लिखा है कि राइट विंग ने अब मसल पावर का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है. राइट विंग हिंसा में शामिल है और हिंदू कैंपों में आतंकवाद घुस चुका है. इस लेख में उन्होंने दक्षिणपंथियों को निशाने पर लिया है.

कमल हासन लिखते हैं कि हिंदू आतंकवाद एक सच बन चुका है. आज के वक्त में कोई नहीं कह सकता कि हिंदू आतंकवाद का कोई वजूद नहीं है. पहले हिंदू कट्टरपंथी बातचीत को अहमियत देते थे और आपसी बहस से मुद्दों को सुलझाते थे लेकिन अब ये हिंसा करते हैं. हासन ने लिखा, ऐसा देखा जा रहा है कि लोगों का सच में विश्वास कमजोर हो रहा है.

हासन ने लिखा है कि दक्षिणपंथियों को अगर ‘हिंदू आतंकवादी’ कहा जाता है तो वे किस आधार पर इसे गलत कह सकते हैं. हासन ने कहा कि दक्षिणपंथियों को ये समझना चाहिए कि हिंसात्मक गतिविधियों से कभी किसी को कोई फायदा नहीं होता है. हासन ने अपने लेख में हिंसा से निपटने के लिए तमिलनाडु सरकार की आलोचना की है जबकि केरल सरकार की तारीफ की है.

भाजपा नेता सुब्रमण्यन स्वामी ने इस मुद्दे पर कमल हासन की आलोचना करते हुए उन्हें नैतिक तौर पर भ्रष्ट बताया है. स्वामी ने कहा कि अभी तक ‘हिंदू आतंकवाद‘ के कोई सबूत नहीं हैं. भाजपा नेता मुरलीधरन ने कमल हासन पर सवाल खड़े किए. उन्होंने कहा कि हासन सच्चाई से मुंह मोड़ रहे हैं.

एयरटेल करेगा 3जी सेवाएं बंद , 4जी पर करेगा फोकस

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नई दिल्ली। मोबाइल कंपनियों के बीच अधिक से अधिक उपभोक्ताओं को जोड़ने की दौड़ में टेलिकॉम क्षेत्र की दिग्गज कंपनी भारती एयरटेल आने वाले वर्षों में अपने 3जी नेटवर्क को बंद कर सकती है. 3जी बंद होने के बाद कंपनी केवल 2जी और 4जी सेवाएं ही प्रदान करेंगी. खबरों की मानें तो कंपनी 3जी नेटवर्क से जुड़े स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल 4G सेवाओं के लिए कर सकती है. यह जानकारी एयरटेल की तरफ से साझा की गई है.

एयरटेल के प्रबंध निदेशक व सीईओ गोपाल विट्टल ने कहा, “कंपनी 3जी पर फिलहाल कुछ भी खर्च नहीं कर रही है. हमारा मानना है कि आने वाले 3 से 4 वर्षों में यह सर्विस 2जी के मुकाबले तेजी से बंद हो जाएगी. ऐसा इसलिए भी हैं, क्योंकि भारत में 50 फीसद फीचर फोन्स शिप किए जा रहे हैं, जिनमें 2जी सर्विस ही इस्तेमाल की जा सकती है.”

गोपाल विट्टल ने बताया कि कंपनी अपने नेटवर्क की डाटा क्षमता को बढ़ाने के लिए 4जी तकनीक में निवेश कर रही है. कंपनी 3जी सर्विस के 2100 मेगाहर्ट्ज बैंड को 4जी सर्विस के लिए इस्तेमाल करेगी. कंपनी के पास कुछ पुरानी प्योर 3जी रेडियो यूनिट्स हैं, जिन्हें रिप्लेस करने की जरुरत है. इसमें कुछ समय लग सकता है. उन्होंने यह भी बताया कि कुछ टेलिकॉम कंपनियों ने मॉर्डन 3जी इक्यूपमेंट्स इंस्टॉल किए हैं, जो 4जी सर्विस को सपोर्ट करते हैं.

सितंबर तिमाही में भारती एयरटेल को 343 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ हुआ है, जबकि वित्त वर्ष 2016-17 में उसे 1,461 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ हासिल हुआ था. कंपनी के ऑपरेटिंग फ्री कैश फ्लो में भी 87 फीसद की भारी गिरावट देखने को मिली है. इस बार सितंबर तिमाही में ऑपरेटिंग कैश फ्लो सिर्फ 520 करोड़ रुपये दर्ज किया गया है, जबकि पिछले साल यह 4,179 करोड़ रुपये था. वहीं, अगर आय की बात करें तो दूसरी तिमाही में कंपनी का रेवेन्यू 104 फीसद घटकर 21,777 करोड़ रुपये रहा. जबकि पिछले वित्तीय वर्ष की दूसरी तिमाही में कंपनी को 24,650 करोड़ की आय हुई थी.

अमेरिकाः वॉलमार्ट स्टोर में फायरिंग से तीन की मौत, कई घायल

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डेनवर

डेनेवर। अमेरिका के डेनेवर में बुधवार को वॉलमार्ट स्टोर में फायरिंग हुई है. स्थानीय पुलिस की ओर से जो जानकारी दी गई है उसके मुताबिक घटना में कई लोगों के मारे जाने की आशंका है. वहीं दूसरी ओर अमेरिकी मीडिया की ओर से जो बताया गया है उसके मुताबिक अब तक एक महिला समेत तीन लोगों की मौत हो चुकी है और कई लोग घायल हैं. पुलिस ने स्थानीय नागरिकों को इलाके से दूर रहने की सलाह दी है.

कोलारोडो के थॉरन्टॉन पुलिस की ओर से घटना के किसी भी पीडि़त के बारे में अभी तक कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी गई है. यह भी साफ नहीं है कि किसी हमलावर को हिरासत में लिया गया है या नहीं. थॉरन्टॉन, डेनेवर से उत्तर पश्चिम 16 किलोमीटर दूर स्थित है. थॉरन्टॉन पुलिस डिपार्टमेंट के ऑफिसर विक्टर एविला ने बताया है कि वह अभी स्टोर में मौजूद लोगों की स्थिति के बारे में जानकारी हासिल करने की कोशिशें कर रह हैं.

फायरिंग होते ही स्टोर में मौजूद कस्टमर और कर्मियों ने भागकर जान बचाई और स्टोर पूरी तरह से खाली हो गया था. पुलिस की ओर से बताया गया है कि शाम करीब 6:30 बजे गोलीबारी शुरू हुई है. स्थानीय टीवी चैनल्स की ओर से जो तस्वीरें जारी की गई हैं उनमें साफ नजर आ रहा है कि भारी तादाद में पुलिस की कारों और एंबुलेंस ने स्टोर को घेरा हुआ है.

पिंड नहीं छूट रहा नोटबंदी कांड से

Noteban

सालभर होने को आया लेकिन अब तक पुराने नोटों की गिनती का काम चालू बताना पड़ रहा है. पुराने नोटों के असली नकली होने के सत्यापन का काम भी अधूरा है. जब आंकड़े ही न हों तो नोटबंदी की सफलता विफलता की बात कैसे हो? सरकार अपने फैसले के सही होने का प्रचार कर रही है. और विपक्ष इस फैसले के भयावह असर होने के तर्क दे रही है. नोटबंदी के एक साल गुज़रने के दिन यानी आठ नवंबर को विपक्ष काला दिवस मनाएगी और सरकार जश्न. जनता इस विवाद की चश्मदीद बनेगी. वैसे शुरू से ही भुक्तभोगी जनता इस प्रकरण में मुख्य पक्ष है. सो उसे नोटबंदी के फायदे और नुकसान का हिसाब लगाने में ज्यादा दिक्कत आएगी नहीं. मसला इतना लंबा चौड़ा है कि जनता लाखों करोड़ की संख्या का अनुमान तक नहीं लगा सकती. इसीलिए इस हफ्ते कालादिवस और जश्न के दौरान होने वाले तर्क वितर्क के दौरान उसे जागरूक होने का मौका एकबार फिर मिलेगा.

काला दिवस किस तरह से यह तर्क दिए जाएंगे कि सरकार के इस फैसले ने देश की अर्थव्यवस्था का भट्टा बैठा दिया. नोटबंदी के कारण देश में बहुसंख्य मज़दूरों, और दिहाड़ी कर्मचारियों के रोज़गार चौपट होने को याद दिलाया जाएगा. किसानों को भी याद दिलाया जाएगा कि वे किस तरह परेशान हुए थे. साथ में यह भी बताने की कोशिश होगी कि सरकार के इस फैसले से फायदा किसे हुआ. विपक्ष साबित करेगा कि नोटबंदी से अमीरों को फायदा हुआ. नोटबंदी से अमीरों को फायदा पहुंचने के यही तर्क सबसे सनसनीखेज और दिलचस्प होंगे. वैसे सबसे ज्यादा यह याद दिलाने की कोशिश होगी कि नोटबंदी का ऐलान करते समय जो मकसद बताया गया था वह कितनी बार बदला गया और क्यों बदलना पड़ा.

जश्न का पक्ष नोटबंदी का जश्न किस तरह मनाया जाएगा इसका अंदाजा अभी लगाना मुश्किल है. वैसे भी सरकारी जश्न नोटबंदी को लेकर काला दिवस मनाने की प्रतिक्रिया में है सो जाहिर है कि नोटबंदी को घातक बताने के जो तर्क दिए जाएंगे, उनके काट के लिए सरकार की तरफ से वितर्क दिए जाएंगे. हालांकि न तो नोटबंदी के घातक साबित होने के तथ्य छुपे हुए हैं और न उसके फायदे के दावे अनसुने हैं. लिहाज़ा सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह नोटबंदी का कौन सा नया फायदा सोचकर लाती है. वैसे उसके पास एक तरीका यह भी है कि वह नोटों की गिनती और सत्यापन के काम का चालू होने की बात कहकर समीक्षा की तारीख को आगे खिसका दे.

जनता के लिहाज़ से जनता यानी बहुसंख्य गरीब जनता ने तो नोटबंदी को सहा ही इसलिए था कि कुछ अमीरों को मारा जा रहा है. सो जनता को यह जानने का बड़ी बेसब्री से इंतजार है कि नोटबंदी से कितने अमीर पिटे. जनता की इस आकांक्षा को अगर सरकार या विपक्ष देख समझ रहे हों तो उन्हें भी इस मामले में अपने अपने तर्क बनाकर रख लेना चाहिए. बहुत संभव है कि जनता की आंकाक्षा के हिसाब से विपक्ष यह तर्क पेश करे कि मेहनतकश दिहाड़ी मज़दूर, किसान और छोटे कारोबारी किस बेरहमी से पिटे. और इसके जवाब में सरकार के पास बना बनाया तर्क है ही कि नोटबंदी से सिर्फ वही परेशान हुए जो बेईमान थे. इतना ही नहीं सरकार यह भी दावा कर रही है कि जो नोटबंदी के फैसले की मुखालफत करता है वह बेईमानों का तरफदार और खुद बेईमान है. इतने जबर्दस्त दावे का काट ढूंढना ही मुश्किल काम है. लेकिन सरकार का यह तर्क सुनते हुए मूक जनता नोटबंदी से बेईमानों के परेशान होने के सबूत जरूर देखना चाहेगी. बस यहीं दिक्कत है. क्योंकि एक बार यह एलान हो ही चुका है कि कुल पुराने नोटों में 99 फीसद यानी सारे पुराने नोट बदल ही गए. रही बात विपक्ष रूपी जनता की तो उनके नेता हरचंद कोशिश करेंगे कि जनता को याद दिलाया जाए कि खुद उनका क्या हाल हुआ है.

क्या कह रहे हैं जानकार और विद्वान लोग वैसे बदले माहौल में ये लोग चुप रहना ही पसंद कर रहे हैं फिर भी इशारों में तो बोल ही लेते हैं. तटस्थ भाव से किसी फैसले की समीक्षा मिलना दुर्लभ होता जा रहा है. फिर भी कुछ घंटों पहले एक समीक्षा पूर्व योजना आयोग के सदस्य रहे अरुण मायरा ने की है. उन्होंने कहा है कि जनता ने नोटबंदी के मामले में सरकार को माफ़ कर दिया. यानी मायरा ने नोटबंदी को घातक माना लेकिन सरकार को राहत दी कि सरकार को ज्यादा चिंतित होने की जरूरत नहीं क्योंकि जनता ने माफ़ कर दिया है. जनता की ओर से मायरा के जरिए सरकार को माफी के क्या मायने हैं यह खुद में एक समीक्षा की मांग करता है. लेकिन उनके इस जजमेंट में एक सुझाव तो है ही कि सरकार अगर चाहे तो नोटबंदी से जनता को हुए नुकसान के लिए माफी मांगने की मुद्रा अपना सकती है. इस तरह से नोटबंदी का जश्न मनाए जाने के दौरान हमें यह देखने को भी मिल सकता है कि सरकार नोटबंदी से तबाह हुए गरीबों और ईमानदारों को धन्यवाद ज्ञापित कर रही हो और नोटबंदी के अनुष्ठान में उनके बलिदान का महिमामंडन करके उन्हें प्रसन्न कर रही हो.

सुधीर जैन वरिष्ठ पत्रकार और अपराधशास्‍त्री हैं… (एनडीटीवी से साभार)

‘दलित विकास के करोड़ों रूपए डकार गए नीतीश कुमार’

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नई दिल्ली। बिहार महादलित विकास मिशन में हुए ट्रेनिंग घोटाले पर राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने नीतीश कुमार पर निशाना साधा है. तेजस्वी यादव ने ट्विटर पर एक खबर शेयर करते हुए ट्वीट किया, ‘नीतीश जी कैसे मुख्यमंत्री हैं, हर दूसरे दिन इनकी नाक के नीचे घोटाले होते रहते हैं. ईमानदारी का चोला ओढ़कर घोटाले करवाते रहते हैं दलितों के विकास के करोड़ों रुपये डकार गए.’

राजद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शिवानंद तिवारी ने भी नीतीश कुमार पर हमला बोला है. तिवारी ने एक बयान में कहा कि नीतीश सरकार घोटालों का रिकॉर्ड बना रही है. धान ख़रीद घोटाला, गर्भाशय घोटाला, मेधा घोटाला, दलित छात्रों की छात्रवृत्ति का घोटाला, सृजन घोटाला और अब महादलित मिशन में घोटाला. ये घोटाले उजागर हुए हैं. और न जाने कितने घोटाले उजागर होने के इंतजार में होंगे.

शिवानंद तिवारी ने कहा कि हर घोटाला उजागर होने के बाद नीतीश कुमार का रटा-रटाया वक्तव्य होता है, जांच का आदेश दे दिया गया है, दोषी बख्शे नहीं जाएंगे, फिर कुछ अंतराल के बाद नया घोटाला सामने आ जाता है. बिहार के प्रशासनिक तंत्र में भ्रष्टाचार का घुन लग गया है, जहां हाथ डालिए वहीं पोल मिलता है. नीतीश कुमार का रुतबा और इक़बाल लगभग समाप्त हो गया है.

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इस घोटाले में तीन आईएएस अधिकारी सहित दस लोगों पर प्राथमिकी दर्ज की गई है. जिसके बाद से मुख्य आरोपी आईएएस एसएम राजू अपने विभाग और आवास से गायब हो गये हैं. सामान्य प्रशासन विभाग ने आईएएस एसएम राजू को उपस्थित होकर नोटिस लेने और जवाब देने का निर्देश दिया है. ट्रेनिंग घोटाले की शिकायत वर्ष 2016 में निगरानी ब्यूरो को मिली थी. इसमें अब तक चार करोड़ 25 लाख रुपये से ज्यादा की गड़बड़ी सामने आ चुकी है. आशंका जतायी गयी है कि यह राशि और भी ज्यादा हो सकती है.

महादलितों के विकास के लिए सरकार ने 2007 में महादलित विकास मिशन का गठन किया था. इस पूरे मामले में हुई अब तक की जांच में तीन तरह से की गयी धांधली सामने आयी है. जिन ट्रेनिंग सेंटरों में दलित छात्रों का नामांकन एक जिले में किया गया है, उन्हीं छात्रों का नाम दूसरे, तीसरे और चौथे ट्रेनिंग में दर्ज करवा कर पैसे निकाल लिये गये. इस तरह एक छात्र के नाम पर कई बार रुपये निकाले लिये गये. इसके अलावा कई ऐसी एजेंसियों को ट्रेनिंग सेंटर दे दिया गया, जो सिर्फ कागज पर ही मौजूद हैं. इनका हकीकत में कोई अता-पता ही नहीं है.