इस्तीफा देकर राजनीति में उतरे ‘जज साहब’, कर दिया बड़ा ऐलान

 लगता है राजनीति समाज को बदलने का आखिरी रास्ता बनती जा रही है। शायद यही वजह है कि समाज बदलने की चाहत लिये अलग-अलग क्षेत्रों के लोग अपनी अच्छी खासी नौकरी छोड़कर राजनीति में उतर रहे हैं। नई जानकारी उत्तर प्रदेश से आ रही है, जहां बहुजन समाज से ताल्लुक रखने वाले मनोज कुमार ने जज की प्रतिष्ठित नौकरी छोड़ कर राजनीति में आने का अपना इरादा जाहिर कर दिया है।

नोएडा सहित तमाम सिविल कोर्ट और एक वक्त में सीबीई के जज रहे मनोज कुमार फिलहाल बिजनौर में पूर्व अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश थे। यहीं से इस्तीफा देकर वह अब राजनीतिक पारी शुरू करने जा रहे हैं। मनोज कुमार ने 17 दिसंबर को एक बड़े कार्यक्रम का ऐलान किया है, जहां बहुजन समाज के तमाम बुद्धिजीवि और दिग्गज मनोज कुमार को समर्थन देने बिजनौर पहुंच रहे हैं।

इसमें पूर्व न्यायाधीश के.जी. बाला कृष्णन सहित पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक, किसान नेता राकेश टिकैत, राजरत्न अंबेडकर, पूर्व सांसद राजकुमार सैनी और दिल्ली सरकार के पूर्व मंत्री और एक्टिविस्ट राजेन्द्र पाल गौतम विशेष तौर पर मौजूद रहेंगे। इस कार्यक्रम को बहुजन मैत्री एवं संविधान जागरूकता महासम्मेलन का नाम दिया गया है। कार्यक्रम बिजनौर जिले के धामपुर के के.एम. इंटर कॉलेज में होगा। कार्यक्रम को 50 से ज्यादा बहुजन समाज के संगठनों ने भी अपना समर्थन दिया है।

दरअसल एक जज का राजनीति में आना एक बड़ा संकेत है। बहुजन समाज से होने के कारण मनोज कुमार के राजनीति में आने को लेकर समाज के लोग काफी उत्साहित हैं। फिलहाल जज साहब ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं, लेकिन चर्चा है कि वह आगामी लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी से चुनाव लड़ सकते हैं। 17 दिसंबर को जब पूर्व जज मनोज कुमार राजनीति की अपनी पारी का ऐलान करेंगे, देखना होगा कि वह क्या ऐलान करते हैं। नजर इस पर भी रहेगी कि आखिर न्यायपालिका जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में जज की नौकरी छोड़कर आखिर वह राजनीति में क्यो आए?

सारनाथ से लुम्बिनी की धम्म यात्रा पर निकले भंते चंदिमा सहित सैकड़ों बौद्ध भिक्खु, हजारों गांवों में करेंगे धम्म प्रचार

तथागत बुद्ध ने कहा था, चरथ भिक्खवे चारिकं बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय लोकानुकम्पाय। यानी, हे भिक्खुओं। बहुजनों के हित के लिए, बहुजनों के सुख के लिए तथा संसार पर अनुकम्पा करने के लिए चारिका यानी विचरण करो।

तथागत के इसी संदेश को चरितार्थ करते हुए  अंतराष्ट्रीय शोध संस्थान के पूर्व अध्यक्ष एवं सारनाथ स्थित धम्मा लर्निंग सेंटर के संस्थापक भंते चंदिमा थेरो ने एक बार फिर से धम्म यात्रा शुरू कर दी है।

सारनाथ से लुम्बिनी की यह यात्रा 29 नवंबर को सारनाथ स्थित धम्मा लर्निंग सेंटर से शुरू हुई। 19 दिनों की यह धम्म यात्रा 17 दिसंबर को तथागत बुद्ध की जन्मभूमि लुम्बिनी पहुंच कर समाप्त होगी। इस बीच यह यात्रा 30 नवंबर को वाराणसी के धौरहरा से सिधौना तक चलेगी। इसके बाद यह यात्रा एक और दो दिसंबर को गाजीपुर, 3 दिसंबर से 6 दिसंबर तक मऊ के अलग-अलग हिस्सों, 7-8 और 9 दिसंबर को गोरखपुर के विभिन्न क्षेत्रों से गुजरेगी।

इसके बाद 10, 11, 12 और 13 दिसंबर को संत कबीर नगर के तमाम गांवों से गुजरते हुए 14 दिसंबर को यह यात्रा सिद्धार्थ नगर पहुंचेगी। 15 दिसंबर को भी यात्रा सिद्धार्थ नगर के अलग-अगल हिस्सों से गुजरते 16 दिसंबर को सिद्धार्थ नगर के कपिलवस्तु पहुंचेगी। इसके बाद 17 दिसंबर को यात्रा तथागत बुद्ध के जन्मस्थान नेपाल के लुम्बिनी पहुंचेगी, जहां इसका समापन होगा।

धम्म चारिका का नेतृत्व कर रहे भंते चंदिमा थेरो ने बताया कि यह यात्रा 350 किलोमीटर लंबी होगी। इस यात्रा में 100 के करीब भंते चल रहे हैं। यह यात्रा हजारों गांवों से गुजरेगी। 19 दिनों की इस यात्रा के बीच 40 स्थानों पर बड़े-बड़े धम्म सभा होगी। बता दें कि साल 2022 में भी भंते चंदिमा के नेतृत्व में सारनाथ से श्रावस्ती तक धम्म चारिका हुई थी।

 इससे पहले 26 नवंबर को संविधान दिवस के मौके पर धम्मा लर्निंग सेंटर सारनाथ में महाराजा अशोक एवं बोधिसत्व बाबा साहब डॉ.भीमराव अंबेडकर के प्रतिमा का लोकार्पण किया गया। धम्म विजयी सम्राट अशोक के हाथ में जहां धम्म का चारों दिशाओं में सिंहनाद के प्रतीक चतुर्दिक मुख किये सिंह आकृतियों के साथ धम्म चक्क युक्त दंड है वहीं बाबा साहब के हाथ में दुनिया का सर्वोत्तम संविधान प्रदर्शित है।

शिक्षक भर्ती घोटाला में सामने आई नई जानकारी, हाई कोर्ट में योगी सरकार को फटकार

दलित और पिछड़े युवाओं के साथ उत्तर प्रदेश में किस तरह अन्याय हो रहा है, यह बुधवार को राजधानी लखनऊ की सड़कों पर साफ दिखा। जब योगी आदित्यनाथ की पुलिस ने दलितों और पिछड़े वर्ग के युवाओं पर जमकर लाठियां भाजी। दरअसल शिक्षक भर्ती घोटाला मामले में बुधवार 29 नवंबर को एक बार फिर से सरकार के खिलाफ हमला बोलते हुए हजारों प्रदर्शनकारियों ने सड़क पर उतर कर प्रदर्शन किया। पिछले 530 दिनों से ज्यादा समय से यह अभ्यर्थी लखनऊ के ईको गार्डेन में अपनी नियुक्ति की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं।

इसी मुद्दे पर इंसाफ मांग रहे हजारों युवाओं ने बुधवार को सुबह चारबाग से विधानसभा तक प्रदर्शन किया। पिछड़े दलितों को न्याय दो के नारे लगाते अभ्यर्थी लगातार विधानसभा की तरफ बढ़ रहे थे। लेकिन इंसाफ देने की बजाय उत्तर प्रदेश के योगी आदित्यनाथ की पुलिस ने हुसैनगंज चौराहे के पास बैरिकेटिंग करके अभ्यर्थियों को रोक दिया। इस दौरान पुलिस की बर्बरता में कई अभ्यर्थी घायल हो गए।

अभ्यर्थियों का कहना था कि 5 जनवरी 2022 को ही मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद आरक्षित वर्ग के 6800 अभ्यर्थियों की नियुक्ति के लिए सूची जारी कर दी गयी लेकिन नियुक्ति आजतक नहीं मिल पायी। हमलोग सिर्फ एक माँग कर रहे हैं कि हमारी मुलाकात माननीय मुख्यमंत्री जी से कराई जाए ताकि हमें नियुक्ति मिल सके। माँगें न मानी गयी तो कल सुबह दोबारा विधानसभा का घेराव करने को मजबूर होंगे।

दूसरी ओर हाल ही में इस मामले में उत्तर प्रदेश के हाईकोर्ट में बहस हुई। इस दौरान ओबीसी समाज के वकील सुदीप सेठ ने मामले की सुनवाई करने वाले जस्टिस भाटिया से कहा कि इस भर्ती में ओबीसी वर्ग को 27 प्रतिशत नहीं, बल्कि 3.80 प्रतिशत ही आरक्षण दिया गया है। जबकि अनुसूचित जाति के 21 प्रतिशत की जगह 16.2 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है। एडवोकेट सुदीप सेठ ने दावा किया कि शिक्षक भर्ती में 6800 सीटों का नहीं बल्कि 19 हजार सीटों का घोटाला हुआ है। इस पर हाई कोर्ट जज ने सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि पीड़ितों को नौकरी दीजिए वरना हम फैसला करेंगे।

सर्वोच्च न्यायालय में संविधान दिवस पर लगी डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा के मायने

26 नवंबर को संविधान दिवस के मौके पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय में बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा का अनावरण किया गया। दिल्ली स्थित सुप्रीम कोर्ट के मुख्य गुंबद के ठीक सामने संविधान निर्माता डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा का अनावरण राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने किया। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डॉ. डी. वाई चंद्रचूड़ भी मौजूद थे। जस्टिस चंद्रचूड़ ने ही इसकी पहल की थी, जिसके बाद एक समिति बनी, जिसने सर्वोच्च न्यायालय में बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा लगाने को लेकर काफी काम किया। खास बात यह है कि डॉ. आंबेडकर की यह प्रतिमा एक वकील के रूप में लगाई गई है। बाबासाहेब की यह पहली और इकलौती प्रतिमा है जो वकील के रूप में लगाई गई है। देखें वीडियो- 

इस दौरान सुप्रीम कोर्ट में हुए कार्यक्रम में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संभा को संबोधित करते हुए सुप्रीम कोर्ट में जजों की भर्ती के लिए आईएएस और आईपीएस की सिविल सेवा परीक्षा की तरह ही परीक्षा आयोजित करने का सुझाव चीफ जस्टिस डी. वाई चंद्रचूड़ को दिया।
मुख्य न्यायधीश जस्टिस डी. वाई चंद्रचूड ने बीते एक साल में सुप्रीम कोर्ट में हुए काम काज के बारे में बताया। इस दौरान एक पोर्टल को भी लांच किया गया। अब शीर्ष न्यायलयों में जजों द्वारा दिये गए फैसले को तमाम अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद किया जाएगा।
कार्यक्रम में अतिथि के तौर पर कानून मंत्री अर्जुन मेघवाल भी पहुंचे थे। उन्होंने बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर द्वारा संविधान निर्माण में दिये गए योगदान की चर्चा की।
इस दौरान हालांकि डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा को आम लोगों के लिए नहीं खोला गया था, लेकिन इसके बावजूद तमाम लोग सुप्रीम कोर्ट के प्रांगण में इस प्रतिमा को देखने पहुंचे। लेकिन उन्हें दूर से ही प्रतिमा को देख कर संतोष करना पड़ा। दलित दस्तक ने जब उनलोगों से सुप्रीम कोर्ट में बाबासाहेब की प्रतिमा के महत्व को लेकर बात की तो तमाम लोगों ने इसे जरूरी कदम बताया।
सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट डॉ. के. एस चौहान से जब सुप्रीम कोर्ट में बाबासाहेब की प्रतिमा, यूपीएससी की तर्ज पर जजों की नियुक्ति के लिए कदम उठाने के राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के बयान और मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डी.वाई चंद्रचूड़ के काम को लेकर बात की गई तो उन्होंने इसके बारे में विस्तार से बताया। यह पूछने पर की क्या संविधान पर खतरा है? सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट ने इससे साफ इंकार किया।
हालांकि दूसरी ओर अब इसी बीच राजस्थान हाई कोर्ट परिसर में स्थापित मनु की मूर्ति के हटाने की मांग भी जोर पकड़ने लगी है। बहुजन समाज के तमाम लोगों का कहना है कि एक ओर तो सुप्रीम कोर्ट में बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा लगाई जाती है लेकिन वहीं दूसरी ओर राजस्थान हाई कोर्ट में मनु की प्रतिमा लगी है। इसको जल्द से जल्द हटा देना चाहिए।

गुजरात में दलित युवक से हैवानियत, मुंह में चप्पल डाला, पट्टे से पीटा

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Vibhuti Patel and dalit Youth Nileshमोरबी, गुजरात। सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही एक तस्वीर ने दलितों के गुस्से को बढ़ा दिया है। इस तस्वीर में एक युवक जो दलित समाज का है, उसकी पीठ पर मौजूद हैवानियत के निशान उस पर ज्यादती की कहानी कह रही है। मामला गुजरात के मोरबी जिले का है। यहां की एक इंटरप्रेन्योर विभूति पटेल उर्फ रानी बा पर दलित युवक ने मारपीट का आरोप लगाया है। युवक का कहना है कि वह रानीबा इंडस्ट्रीज में बकाया अपना पैसा लेने गया था, इस दौरान उसको बेरहमी से पीटा गया। युवक ने यह भी आरोप लगाया कि उसके मुंह में जूता डाल दिया गया और 12 लोगों ने उसे बेल्ट के पट्टे से पीटा। पीड़ित युवक का नाम नीलेश किशोरभाई दलसानिया है। युवक के बयान के बाद यह घटना सामने आई जिसके बाद आरोपी रानी बा फरार है। इससे साफ पता चलता है कि युवक का आरोप सही है। घटना सामने आने के बाद स्थानीय मोरबी पुलिस ने युवक की शिकायत पर विभूति पटेल समेत छह लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है। मामला ए डिवीजन थान में दर्ज किया गया है। पीड़ित युवक 2 अक्टूबर तक रानीबा इंडस्ट्रीज के निर्यात विभाग में काम कर रहा था।

हीरालाल सामरिया बनें मुख्य सूचना आयुक्त, दलित समाज से है संबंध

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मुख्य सूचना आयुक्त हीरालाल सांवरियादलित समाज से ताल्लुक रखने वाले 1985 बैच के IAS अधिकारी हीरालाल सामरिया भारत के नए सूचना आयुक्त बनाए गए हैं। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सोमवार 6 नवंबर को हीरालाल सामरिया को केंद्रीय सूचना आयोग के प्रमुख के रूप में शपथ दिलाई। पूर्व मुख्य आयुक्त वाई.के. सिन्हा का कार्यकाल तीन अक्टूबर को खत्म होने के बाद से यह पद खाली था। सामरिया राजस्थान के भरतपुर के रहने वाले हैं। शपथ ग्रहण के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राज्यसभा के सभापति भी मौजूद रहें।

   

फिर गरमाया जाति जनगणना का मुद्दा, अमित शाह पर भड़के लालू के लाल तेजस्वी

 केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने बिहार में हुए जाति जनगणना में मुस्लिम और यादवों की संख्या जानबूझ कर ज्यादा बताने का आरोप लगाया है। वहीं दूसरी ओर अमित शाह ने अति पिछड़ों की संख्या को कम कर के गिनने का आरोप लगाया। रविवार 5 नवंबर को बिहार के मुजफ्फरपुर पहुंचे शाह ने कहा कि ऐसा लालू यादव के दबाव में किया गया है। साथ ही उन्होंने यह भी याद दिलाया कि बिहार की जाति जनगणना का श्रेय भाजपा को भी जाता है क्योंकि इसका निर्णय तब हुआ था जब सरकार में नीतीश कुमार के साथ भाजपा थी। वहीं दूसरी ओर अमित शाह के इस आरोप पर बिहार के उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने पलटवार किया है। तेजस्वी यादव ने कहा कि अमित शाह झूठ व भ्रम फैला रहे हैं। तेजस्वी ने पांच बिन्दुओं को सामने रखकर अमित शाह को करारा जवाब दिया है। तेजस्वी ने गृहमंत्री अमित शाह को चुनौती देते हुए कहा-

1. अगर बिहार के जातीय सर्वे के आँकड़े गलत है तो केंद्र सरकार पूरे देश और सभी राज्यों में जातीय गणना करा अपने आँकड़े जारी क्यों नहीं करती?

2. BJP शासित राज्यों में BJP जातिगत गणना क्यों नहीं कराती?

3. केंद्र सरकार में कितने 𝐎𝐁𝐂/𝐒𝐂/𝐒𝐓 कैबिनेट मंत्री है और कितने गैर 𝐎𝐁𝐂/𝐒𝐂/𝐒𝐓? इसकी सूची जारी करें। खानापूर्ति के लिए इक्का-दुक्का मंत्री है भी तो उन्हें गैर-महत्त्वपूर्ण विभाग क्यों दिया हुआ है?

4. BJP के कितने मुख्यमंत्री 𝐎𝐁𝐂/𝐒𝐂/𝐒𝐓 है? पिछड़ा और गैर-पिछड़ा मुख्यमंत्री का तुलनात्मक प्रतिशत बताएँ?

5. BJP के बिहार से केंद्र में कितने पिछड़ा और अतिपिछड़ा 𝐂𝐀𝐁𝐈𝐍𝐄𝐓 मंत्री है? 𝐙𝐄𝐑𝐎 है 𝟎?

जवाब देंगे, तो आपके साथ-साथ हिंदुओं की 𝟖𝟓% पिछड़ा और दलित आबादी की भी आँखें खुल जायेंगी।

भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डी.वाई चंद्रचूड़ से दलित दस्तक के संपादक अशोक दास की Exclusive बातचीत

ब्रांडाइस युनिवर्सिटी। अमेरिका के बोस्टन से सटे वाल्थम में स्थित ब्रांडाइस युनिवर्सिटी में तीन दिनों तक चले सेेमिनार के आखिरी दिन भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डी. वाई चंद्रचूड़ पहुंचे। चीफ जस्टिस चंद्रचूड को की-नोट एड्रेस करना था। बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर अनफिनिस्ड लेगेसी के तहत होने वाले इस अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का विषय इस बार Law, Caste and the Pursuit of Justice था। इस दौरान चीफ जस्टिस ब्रांडाइस युनिवर्सिटी में लगी बाबासाहेब आंबेडकर की प्रतिमा को देखने भी पहुंचे। जहां दलित दस्तक के संपादक अशोक दास ने उनसे वंचितों को न्याय के मुद्दे पर सीधी बातचीत की। देखिए वीडियो

छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्यप्रदेश, तेलंगाना एवं मिजोरम विधानसभा चुनाव की घोषणा

छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्यप्रदेश और तेलंगाना एवं मिजोरम सहित पांच राज्यों में चुनाव के तारीखों की घोषणा हो गई है। चुनाव आयोग ने इन पांचों राज्यों में तारीखों का ऐलान कर दिया है। सबसे पहले मिजोरम में सात नवंबर, मध्यप्रदेश में 17 नवंबर, छत्तीसगढ़ में दो चरणों में 7 और 17 नवंबर, राजस्थान में 23 नवंबर और तेलंगाना में 30 नवंबर को चुनाव होंगे। नतीजे तीन दिसंबर को सामने आएंगे। मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने इसकी घोषणा की।

पांचों राज्यों में कुल 679 सीटों पर वोटिंग होगी। इसमें 16 करोड़ मतदाता हिस्सा लेंगे। इसमें 8 करोड़ पुरुष जबकि 7.8 करोड़ महिलाएं हैं। 60 लाख से ज्यादा वोटर नए होंगे, जो पहली बार वोटिंग करेंगे। इस घोषणा के साथ ही राजनीतिक सरगर्मी भी बढ़ गई है। टिकटों को लेकर घमासान बढ़ गया है तो अब मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशियों का नाम भी निकल कर सामने आने लगा है। फिलहाल राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार है। जबकि मध्यप्रदेश में कांग्रेस की चुनी हुई सरकार थी। इसको ज्योतिरादित्य सिंधिया को अपने पाले में मिलाकर और सरकार गिराकर भाजपा ने अपनी सरकार बना ली। और सिंधिया केंद्र में मंत्री बने। तेलंगाना में केसीआर की सरकार है, जबकि मिजोरम में मिजो नेशनल फ्रंट की सरकार है।

मुख्य चुनाव आयुक्त ने बताया कि 17 अक्टूबर को वोटर लिस्ट का प्रकाशन किया जाएगा। इसमें 23 तारीख तक संशोधन हो सकेगा। यानी मतदाताओं को ध्यान देना होगा कि 17 अक्टूबर को मतदाताओं की जो लिस्ट सामने आएगी, उसमें उनका नाम है या नहीं। अगर नहीं है तो वो 23 अक्टूबर तक उसे ठीक करवा सकते हैं। चुनाव आयोग ने चुनाव सुधार को लेकर एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। इसके मुताबिक अब आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को कम से कम तीन बार न्यूजपेपर में अपने बारे में बताना होगा। साथ ही, उनकी पार्टी को भी बताना होगा कि उन्होंने उम्मीदवार को टिकट क्यों दिया।

विधानसभा सीटों की बात करें तो, मिजोरम में- 40 सीटें, मध्यप्रदेश में- 230 सीटें, छत्तीसगढ़ में 90 सीटें, राजस्थान में 200 सीटें और तेलंगाना में 119 सीटें हैं। अब तीन दिसंबर को तय होगा कि सत्ता में किसकी वापसी होगी, कौन आउट होगा। यह चुनावी नतीजे 2024 में लोकसभा चुनाव के पहले राजनीतिक दलों के लिए एक सेमीफाइनल है।

स्वीडन में हुए ग्लोबल इंवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म कांफ्रेंस से इंवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म को मिली नई धार

 कांफ्रेंस दरअसल होता क्या है; इसकी शाब्दिक समझ तो थी, लेकिन कांफ्रेंस के दौरान दरअसल क्या होता है, और उसका मकसद क्या होता है, यह पहले कनाडा तो अब स्वीडन आकर पता चला। स्वीडन में इसको लेकर समझ ज्यादा बढ़ी। यह कांफ्रेंस एतिहासिकता लिए था। यह उस स्वीडन देश में था जहां से दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार शुरू हुआ। तो जिस गोथनबर्ग शहर को इसके लिए चुना गया वहां से शानदार गाड़ियां बनाने वाली दुनिया की प्रतिष्ठित कंपनी Volvo की शुरूआत हुई। ग्लोबल इंवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म नेटवर्क (GIJN) द्वारा आयोजित ग्लोबल इंवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म कांफ्रेंस 2023 (GIJC23) मेरे लिए इस मायने में खास रहा क्योंकि इसने मेरी पत्रकारिता की समझ के भी कई दरवाजे खोले। विदेशी पत्रकारों से मिलना और बातचीत करना कुछ मौकों पर हुआ है, लेकिन अपने 17 साल की पत्रकारिता में यह मेरा पहला मौका था, जब मैं दुनिया भर के पत्रकारों के बीच था। उनसे बात कर पा रहा था, उनके यहां की पत्रकारिता समझ रहा था। इस कांफ्रेंस में सिर्फ पत्रकार नहीं, बल्कि अमेरिका से लेकर यूके सहित दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से तमाम बड़े अखबारों के संपादकों के साथ-साथ पत्रकारिता पढ़ाने वाले प्रोफेसर्स भी मौजूद थे, तो पत्रकारों को कानूनी सपोर्ट करने वाले संगठन मीडिया डिफेंस के Carlos Gaio से भी मुलाकात हुई।

Dalit Dastak के Founder और Editor Ashok Das. अशोक दास को भारत से फेलोशिप मिली थीअमेरिका और यूरोप जैसे शहरों के पत्रकार तो कई मौकों पर टकराते रहे हैं, लेकिन पहली बार नाइजीरिया, फिजी, सिंगापुर, पड़ोसी नेपाल और बांग्लादेश के पत्रकारों से मिला। वहीं पर अमन अभिषेक भी मिल गए। अमन पत्रकारिता में तो नहीं हैं, लेकिन वह युनाईटेड स्टेट के University of Wisconsin Madison से पीएच.डी कर रहे हैं। मैं फिजी से प्रकाशित होने वाले फिजी टाइम्स अखबार के एडिटर Fred Wesley, ताईवान के Yian Lee से और बांग्लादेश के पत्रकार Jewel Gomes से मिला। मैं उन देशों का जिक्र कर रहा हूं, जो लगातार विकसित हो रहे हैं, वहां पत्रकारिता की चुनौतियां भी बहुत हैं। इन तमाम देशों के पत्रकारों को ग्लोबल इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म नेटवर्क जिस तरह एक मंच पर लेकर आया था, वह बेहद महत्वपूर्ण था। इन सबसे बात करना, उनके देश में पत्रकारिता की स्थिति के बारे में सुनना और समझना शानदार था। और बातचीत से एक बात तो समझ में आ गई कि किसी भी देश की मीडिया फ्री नहीं है। हां, भारत के कई मीडिया संस्थानों जैसे सत्ता के पैरों में लोटने का काम भी वो नहीं करते। उन्होंने बीच का एक रास्ता निकाल रखा है, और पत्रकारिता की मर्यादा को बचाए हुए हैं।

इस कांफ्रेंस में 125 देशों के करीब 2000 से ज्यादा मीडिया के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोग शामिल हुए। इसके लिए दुनिया भर से 300 पत्रकारों को फेलोशिप दी गई थी। यह कांफ्रेंस खासतौर पर इंवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म यानी खोजी पत्रकारिता को प्रोत्साहित करने के लिए, उन्हें ग्लोबल वर्ल्ड से जोड़ने और खोजी पत्रकारिता करने वाले लोगों को संरक्षण देने के लिए और उन्हें तमाम अन्य जानकारियां उपलब्ध कराने के लिए था, ताकि वो अपना काम बेहतर कर सकें। 19 से लेकर 22 सितंबर, 2023 तक चार दिनों तक लगातार कई सेशन हुए। सुबह नौ बजे से शाम को 7.30 तक सेशन चले। एक समय में कई अलग-अलग विषयों पर अलग-अलग एक्सपर्ट अपनी बात रख रहे थे। पत्रकारिता की नई तकनीक AI पर बात हुई तो वॉच डॉग जर्नलिज्म पर भी बात हुई। इलेक्शन, क्लाइमेट चेंज, अनकवर्ड इंवेस्टिगेशन, हेल्थ केयर इंवेस्टिगेशन, डिजिटल सिक्योरिटी जैसे विषयों पर इसके एक्सपर्ट ने बेहतर काम करने का रास्ता दिखाया। दक्षिण एशिया में पत्रकारिता की चुनौतियों पर बात हुई। ऑन लाइन हरासमेंट से कैसे डिल किया जाए।

GIJN के एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर Devid Kaplan, प्रोग्राम डायरेक्टर Anne Koch के साथ GIJN इंडिया के संपादक दीपक तिवारी (बीच में)

खास बात यह रही कि सिर्फ पत्रकारिता के विषयों को ही नहीं समझाया गया, बल्कि एक संस्थान कैसे मजबूत किया जा सकता है, किसी छोटे संस्थान को बढ़ाने की बिजनेस स्ट्रेटजी क्या होती है, फंड रेजिंग कैसे होती है और मोबाइल जर्नलिज्म को बेहतर तरीके से कैसे किया जा सकता है, यह भी बताया गया।

विदेशी संस्थानों की एक खासियत है। वो सीखाने के साथ-साथ संपर्क बनाने और फिर दिन का सेशन खत्म होने के बाद

Gijn New Executive Director Emilia Diaz Struck

शाम को म्यूजिक और मस्ती के जरिये दुनिया भर के लोगों को पास आने का मौका मुहैया करवाते हैं। वहां यह भी हुआ। अवार्ड नाइट जो ऐतिहासिक था। दुनिया भर में बेहतरीन इंवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म करने वाले पत्रकारों को यहां सम्मानित किया गया।

गाला रिसेप्शन के दौरान एक ही हाल में दुनिया भर के हजारों पत्रकारों की मौजूदगी एक अलग नजारा पेश कर रही थी। सभी बेहतर पत्रकारिता के लिए इकट्ठा हुए थे। सभी बेहतर पत्रकारिता करना चाहते थे। जो सबसे शानदार रहा वह डायरेक्टर डेविड कपल्न की बात रही, जिन्होंने साफ कर दिया कि दुनिया के किसी भी हिस्से में इंवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म करने वाला पत्रकार अकेला नहीं है, बल्कि GIJN उसके साथ है।

इस दौरान जीआईजेएन को अपना नया एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर भी मिल गया। पिछले दस सालों से एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर रहने वाले डेविड कपल्न (Devid Kaplan) ने अपना पद छोड़ दिया, जिसके बाद अवार्ड विनिंग जर्नलिस्ट Emilia Diaz Struck ने नई एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर का पद संभाला। कहा जा सकता है कि दुनिया भर में खोजी पत्रकारिता (इंवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म) को बढ़ाने के लिए ग्लोबल इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म नेटवर्क शानदार काम कर रहा है। स्वीडन के गोथनबर्ग शहर में हुए इस कांफ्रेंस से इंवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म को और धार ही मिलेगी।

 

#GIJC23 स्वीडन डायरी, एपिसोड-01

GIJN Conference

 टर्किश एयरलाइंस में मेरे बग़ल में Yian Lee और Jewel Gomes बैठे हैं। Yian ताइवान में पत्रकार हैं और Jewel बांग्लादेश में पत्रकारिता कर रहे हैं। हम तीनों GIJN कांफ्रेंस के लिए स्वीडन जा रहे हैं। इस फ्लाइट में अलग- अलग देशों के तक़रीबन दो दर्जन से ज़्यादा जर्नलिस्ट हैं जो कांफ्रेंस के लिए जा रहे हैं। हर रंग, रूप और भाषा के लोग। We can say this is like a small world of journalist. हमारी बातचीत शुरू है। हम एक-दूसरे के बारे में जानने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी पत्रकारिता के बारे में जानने की कोशिश कर रहे हैं।

Yian और Jewel इस बात को जानकर हैरान थे की भारत के विपक्षी दलों ने लिस्ट जारी कर कुछ पत्रकारों को इसलिए बैन किया है क्योंकि वो सत्ता के पिछलग्गू बने हुए हैं। लेकिन दोनों ये भी कह रहे हैं कि मीडिया कहीं भी फ्री नहीं है। बावजूद इसके दुनिया भर के जर्नलिस्ट ईमानदारी से अपने हिस्से का काम कर रहे हैं। खोजी पत्रकारिता सहित अन्य विधा की पत्रकारिता को और बेहतर तरीक़े से कैसे किया जा सकता है, इस पर बात करने के लिए इकट्ठा हो रहे हैं।

19-22 सितंबर, 2023 तक स्वीडन के Gothenburg में Global Investigative Journalism Conference में 50 से ज़्यादा विषयों पर बात होनी है। 200 देशों के दो हज़ार से ज़्यादा पत्रकार इसमें शामिल हो रहे हैं। इसमें दुनिया भर के अपने विषयों के दिग्गज पत्रकार अपनी बात रखेंगे। सिखाएँगे। गोथेनबर्ग शहर दिखने लगा। मेरी फ्लाइट यूरोप के स्वीडन के धरती पर लैंड होने जा रही है। तापमान 18 डिग्री है।

(18 सितंबर, 2023 को भारत से स्वीडन जाते हुए टर्किश एयरलाइंस के विमान में)

राजस्थान में फिर इंद्र मेघवाल जैसा मामला

उम्मीद है कि राजस्थान में इंद्र मेघवाल का मुद्दा दलित समाज के लोग भूले नहीं होंगे, जहां एक सवर्ण शिक्षक का मटका छूने के कारण इंद्र मेघवाल को शिक्षक ने ऐसा पीटा कि कुछ दिनों बाद इस बच्चे की मौत हो गई थी।

ऐसा ही एक और शर्मनाक मामला फिर से राजस्थान के ही भरतपुर से सामने आया है। जिले के भीमनगर स्थित राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक ने 7वीं कक्षा के दलित छात्र को बेरहमी से महज इसलिए पीट दिया कि छात्र ने टंकी में पानी नहीं होने पर स्कूल में स्टॉफ के लिए रखे वॉटर कैंपर से पानी पी लिया। पीड़ित छात्र के भाई रनसिंह ने शिक्षक के खिलाफ मामला दर्ज कराया है।

भीमनगर पहरिया अंबेडकर कॉलोनी निवासी पीड़ित छात्र रविंद्र जाटव ने बताया कि वह भीमनगर के सरकारी स्कूल में 7वीं कक्षा का छात्र है। शुक्रवार 8 सितंबर को रोजाना की तरह उसने और अन्य बच्चों ने कक्षा कक्ष की सफाई की थी। प्रार्थना के बाद पानी पीने के कैंपर आ गए थे। प्यास लगने पर वह टंकी पर गया, लेकिन उसमें पानी नहीं था।

इस पर उसने दो अन्य छात्रों को देखकर स्कूल स्टॉफ के लिए रखे कैंपर से बोतल में पानी भरकर पी लिया। स्कूल के सर गंगाराम गुर्जर नाराज हो गए। उन्होंने कक्षा में तीनों बच्चों को खड़ा कर दिया। लेकिन सर ने अपने सजातीय दोनों बच्चों को तो बिठा दिया और उसकी डंडे और घूंसों से पिटाई कर दी।

इस घटना के बाद दलित समाज के स्थानीय लोगों ने हाईवे रोक दिया और इंसाफ कि मांग की। हालांकि स्कूल प्रशासन अब अपने बचाव में मामले की लीपापोती में जुटा है। आए दिन दलित समाज के छात्रों के साथ स्कूल में हो रहे इस तरह के जातिवाद समाज की जातिवादी सोच की कलई खोलने के लिए काफी है।

राम मंदिर की आरती में दलितों का आरक्षण

दलितों और आदिवासियों को छोड़कर देश के तमाम मंदिरों के दरवाजे आम तौर पर हिन्दू समाज के सभी लोगों  के लिए हर दिन खुले रहते हैं। लेकिन अयोध्या में बन रहे राम मंदिर में प्रवेश और आरती के लिए हर दिन अलग-अलग जातियों के लोगों के लिए आरक्षित करने की एक दिलचस्प मांग सामने आई है। इसमें दो दिन दलितों के लिए भी आरक्षित करने की मांग की गई है। यह मांग है जगतगुरु परमहंस आचार्य की।

 नए साल 2024 में मकर संक्रांति के बाद अयोध्या के राम मंदिर के गर्भ गृह में राम लला कि प्राण प्रतिष्ठा होनी है। इसके बाद से राम मंदिर के दरवाजे आम जनता के लिए खुलने हैं। इसको देखते हुए जगतगुरु परमहंस आचार्य ने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को एक पत्र भेजा है। इसमें उन्होंने अलग-अलग दिन अलग-अलग जाति और वर्ग के लोगों द्वारा राम लला की आरती कराए जाने की मांग की है।

परमहंस आचार्य ने राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय को एक पत्र भेजा है। इसमें एक साप्ताहिक कैलेंडर चार्ट दिया गया है और बताया गया है कि राम लला मंदिर में हर दिन किस जाति और क्षेत्र के लोगों के लिए आरक्षित हो।

चार्ट के मुताबिक जगतगुरु परमहंस आचार्य का कहना है कि राम मंदिर में रविवार के दिन क्षत्रिय समाज के लोग पूजा और आरती करें। सोमवार का दिन पिछड़े समाज के लिए आरक्षित हो, मंगलवार के दिन राममंदिर में ऐसे लोगों को पूजा और आरती करने दिया जाए जो पराक्रमी हैं और जिन्होंने गोल्ड मेडल जीतकर देश का नाम रोशन किया है। बुधवार के दिन अंतरिक्ष वैज्ञानिक, और बड़े लेखक, साहित्यकार, कवि आदि साहित्यिक दुनिया के लोग आरती करें। बृहस्पतिवार का दिन जगतगुरु, शंकराचार्य समेत धर्माचार्य और साधु-संतों एवं ब्राह्मणों के लिए आरक्षित हो। जबकि शुक्रवार और शनिवार को दलित समाज द्वारा आरती कराई जाए।

 जगतगुरु का तर्क है कि ऐसा करने से छुआछूत का भाव खत्म होगा। उनका कहना है कि उनकी मांग नहीं मानी गई तो वह अन्न-जल त्याग देंगे और बड़ा आंदोलन करेंगे।

 हालांकि राम मंदिर ट्रस्ट ने फिलहाल ऐसे किसी पत्र के मिलने से इंकार किया है। लेकिन जगतगुरु परमहंस आचार्य की अजीबो गरीब मांग से बहस शुरू हो गई है कि आखिर ऐसी मांग से समाज में छूआछूत का भाव कैसे खत्म हो जाएगा? अगर कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति जैसे लेखक, साहित्यकार, गोल्ड मेडेलिस्ट खिलाड़ी दलित या पिछड़े समाज का होगा, तो उसे दलितों और पिछड़ों के लिए आरक्षित दिन पर जाना होगा या फिर प्रतिष्ठित व्यक्तियों के लिए आरक्षित दिन पर? बाबा रामदेव को ये लोग शूद्र मानेंगे या फिर संत? राष्ट्रपति को प्रतिष्ठित व्यक्ति माना जाएगा या आदिवासी समाज का व्यक्ति?

 दरअसल इस तरह के तमाम धर्माचार्य असल में हिन्दू धर्म की बुराईयों को दूर करने के चाहे जो दावे करें, जमीन पर वह हिन्दू धर्म में फैली कुरितियों और छूआछूत पर वो कुछ भी कहने से परहेज करते हैं। आए दिन दलितों पर जाति के कारण होने वाले तमाम अत्याचार पर ये कभी भी खुल कर नहीं बोलते। दलितों को मंदिरों में जाने पर मारने-पीटने जैसी घटना पर भी ऐसे संतों ने कभी भी आंदोलन करने या फिर अनशन करने की धमकी नहीं दी। इसी तरह दलित समाज से संबंध रखने वाले पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के साथ ओडिशा के जगन्नाथपुरी मंदिर में जब धक्का-मुक्की की गई थी, तब हिन्दू धर्म के धर्माचार्यों ने इसकी कड़ी निंदा नहीं की, न ही इसे गलत बताते हुए इसके खिलाफ आंदोलन करने को कहा।

 ऐसे में राम मंदिर मामले में इस तरह का शिगूफा छोड़ना समझ से परे है। बेहतर यह होता कि जगतगुरु परमहंस आचार्य और उन जैसे अन्य धर्माचार्य जाति के कारण हर दिन दलितों पर हो रहे अत्याचार को लेकर ऊंची जाति और अन्य मजबूत जातियों के खिलाफ आवाज उठाते और अनशन और आंदोलन की घोषणा करते, तब शायद बेहतर संदेश जाता।

घोसी उप चुनाव नतीजे के मायने

सात सीटों पर हुए उपचुनाव में तीन पर भाजपा जीती जबकि चार पर इंडिया गठबंधन के दल। इस उप चुनाव में जिस सीट की सबसे अधिक चर्चा हो रही है, वह है उत्तर प्रदेश की घोसी सीट। जहां समाजवादी पार्टी के सुधाकर सिंह ने भाजपा के दारा सिंह चौहान को 42,759 वोटों से हराया।

यहां भाजपा की ओर से दारा सिंह चौहान मैदान में थे, जबकि समाजवादी पार्टी की ओर से सुधाकर सिंह। दारा सिंह चौहान इसी सीट से सपा के विधायक थे और 22 हजार वोटों से जीते थे, लेकिन मंत्री पद की लालच में वह भाजपा में चले गए। फिर घोसी के विधायक पद से इस्तीफा देकर उप चुनाव की स्थिति पैदा की। भाजपा के टिकट पर घोसी से चुनाव लड़े।

भाजपा के लिए यह प्रतिष्ठा की सीट थी। भाजपा इसे किसी भी कीमत पर जीत कर 2024 लोकसभा चुनाव से पहले विपक्ष पर मनो वैज्ञानिक बढ़त बनाना चाहती थी। दारा सिंह चौहान के लिए प्रचार करने के लिए दर्जन भर से ज्यादा मंत्रियों ने घोसी में चुनाव प्रचार किया। इसके अलावा यूपी के दोनों उप मुख्यमंत्री और खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी दारा सिंह चौहान के पक्ष में प्रचार करने गए। बावजूद इसके भाजपा यह सीट हार गई।

यह तब हुआ जबकि ओमप्रकाश राजभर और संजय निषाद ने भाजपा की ओर से यहां प्रचार किया था, जिनके वोट इस सीट पर निर्णायक थे। घोसी में 55 हजार राजभर, 19 हजार निषाद, 8 हजार ब्राह्मण और 15 हजार ठाकुर मतदाता थे, जो भाजपा के वोट बैंक माने जाते है। बावजूद इसके दारा सिंह चौहान की करारी हार ने उत्तर प्रदेश में जातीय समीकरण से लेकर भाजपा के वर्चस्व को तोड़ दिया है।

समाजवादी पार्टी की बड़ी जीत ने भाजपा को चारो खाने चित्त कर दिया है। इसे लोकसभा चुनाव के पहले जनता का मूड कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन यह साफ है कि जनता किसी पार्टी को आंख मूंद कर सपोर्ट करने की बजाए उम्मीदवारों को भी तरजीह दे रही है। यह आने वाले राजनीति के लिए अच्छा संकेत है।

दलितों पर फूटा मुस्लिमों का कहर

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बीते कुछ दिनों में दलितों के ऊपर मुस्लिम समाज के द्वारा अत्याचार की खबरें सुर्खियों में आनी शुरू हो गई है। उत्तर प्रदेश में देवरिया जिले और महाराज गंज से आने वाली खबर चौंकाने वाली है। यूपी के देवरिया में बीते शनिवार दो सितंबर को दलित समाज के शिक्षक परशुराम भारती को महज इसलिए पीट कर मार डाला गया क्योंकि उन्होंने रास्ता रोके जाने का विरोध किया था।

घटना देवरिया जिले के थाना गौरी बाजार के नगरौली गांव की है। परशुराम भारती रात को बाजार से अपने घर लौट रहे थे। इम्तियाज और उसका परिवार घर के सामने रास्ते में चारपाई और कुर्सी लगाकर बैठा था। इस बात पर परशुराम भारती ने विरोध किया। जिस पर इम्तियाज के घरवालों ने हमला कर दिया। परशुराम को इतना पीटा गया कि उसकी मौत हो गई।

दूसरी घटना में दलित समाज की एक युवती ने भाजपा नेता पर रेप और पिता की हत्या का आरोप लगाया है। प्रदेश के महाराजगंज जिले में भाजपा नेता पर दलित किशोरी के साथ दुष्कर्म के बाद उसके पिता की हत्या करने का आरोप लगा है। पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर कर आरोपी नेता को हिरासत में ले लिया है। आरोपी का नाम राही मासूम रजा है और वह भाजपा के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ का जिलाध्यक्ष है।

मोदी सरकार का ‘इंडिया’ के खिलाफ अभियान

9 और 10 सितंबर को राजधानी दिल्ली में जी-20 समिट के आयोजन के लिए छपे निमंत्रण पत्र के सामने आने के बाद बवाल मच गया है। दरअसल राष्ट्रपति की ओर से डिनर के लिए भेजे गए निमंत्रण पत्र पर प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया की जगह प्रेसिडेंट ऑफ भारत लिखा है, जिस पर नाराजगी जताते हुए कांग्रेस पार्टी ने इसे देश के संघीय ढांचे पर हमला बोला है। साथ ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

डिनर इंविटेशन के लिए छपे इस कार्ड के बाद कई तरह की चर्चा शुरू हो गई है। एक कयास यह लगाया जा रहा है कि क्या केंद्र सरकार देश का नाम जिसे अंग्रेजी में इंडिया और हिन्दी में भारत लिखा जाता है, में से इंडिया हटाने जा रही है।

चर्चा यह भी शुरू हो गई है कि 18-22 सितंबर तक संसद के विशेष सत्र के दौरान सरकार भारतीय संविधान से इंडिया शब्द हटाने से जुड़े बिल को पेश कर सकती है। ऐसे में देश का नाम सिर्फ भारत बुलाये जाने को लेकर बहस तेज हो गई है।

विपक्षी दल कांग्रेस का आरोप है कि जब से विपक्ष ने अपने गठबंधन का नाम इंडिया रखा है, तभी से भाजपा में खलबली है। भाजपा वाले किसी भी हाल में इंडिया कहने से बचने लगे हैं। कांग्रेस के प्रवक्ता पवन खेड़ा ने इस मुद्दे को उठाते हुए पीएम मोदी पर चुटकी ली है और अपने अंदाज में घेरा है।

दरअसल भारतीय संविधान के अनुच्छेद-1 में भारत को लेकर दी गई परिभाषा में साफ तौर पर ‘इंडिया दैट इज भारत’ लिखा हुआ है। लंबे समय से देश का नाम सिर्फ भारत रखने को लेकर चर्चा होती रहती है। इंडिया हटाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी याचिका दायर की गई थी लेकिन सर्वोच्च न्यायलय ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि पहले से ही संविधान में भारत नाम कहा गया है। ऐसे में यह चर्चा बेमानी हो जाती है। एक सवाल वक्त को लेकर भी उठ रहा है, कहा जा रहा है कि भाजपा वाले ऐसा सिर्फ इसलिए करना चाहते हैं क्योंकि विपक्षी गठबंधन ने अपना नाम इंडिया रख लिया है। फिहलाल इस मुद्दे पर बहस तेज हो गई है। देखना होगा कि सरकार की मंशा आखिर है क्या?

“भारत में सबसे प्राचीन या सनातन धर्म तो श्रमण धम्म और संस्कृति है”

उदय निधि स्टालिन ने बयान (2 सितंबर, 2023) दिया है कि “सनातन धर्म का केवल विरोध नहीं, बल्कि उसका उन्मूलन करना है, खत्म करना है।” इस पर भाजपा,आर एस एस, बजरंग दल, हिन्दू महासभा आदि सहित सभी ब्राह्मणवादी संगठनों से जुड़े संत और नेता बौखला गए हैं और तरह तरह से बिलबिला रहे हैं। भारत में सबसे प्राचीन या सनातन धर्म तो श्रमण धम्म और संस्कृति है। ब्राह्मणवादियों का आर्य- ब्राह्मण धर्म तो केवल 1750 ईसापूर्व में भारत पर आर्य ब्राह्मणों के आक्रमण के बाद आया है और अभी तक केवल लगभग 3500 वर्ष पुराना है, जबकि श्रमण धम्म और संस्कृति लगभग 5500 वर्ष पुराना है। ब्राह्मणवादी सनातन धर्म (तथाकथित हिन्दू धर्म) का सामाजिक एवं सांस्कृतिक आधार ही हैं- ऊंच-नीच पर आधारित वर्ण-व्यवस्था एवं जाति व्यवस्था, लिंग- विभेद पर आधारित परिवार एवं समाज व्यवस्था और ब्राह्मण पुरुषों की पवित्रता -श्रेष्ठता एवं अन्य लोगों की अपवित्रता-हीनता, छुआछूत, अन्धविश्वास और अवैज्ञानिक विचारों पर आधारित देवी- देवताओं के लिए जीवन भर चलने वाले कर्मकांड एवं पूजा- पाठ, हिंसा और नफरत आदि।

लेकिन सनातन श्रमण धम्म एवं संस्कृति का आधार ही है- मानवता, बराबरी, स्वतंत्रता, भाईचारा और न्याय। श्रमण धम्म एवं संस्कृति के शील, नैतिकता और विचार ही भारतीय संविधान की प्रस्तावना में वर्णित हैं।

उदय निधि स्टालिन एवं अन्य लोगों ने ब्राह्मणवादी, अमानवीय और असंवैधानिक ब्राह्मणवादी सनातन धर्म को उन्मूलन करने की बातें कही हैं, क्योंकि यह धर्म मानवता, संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध हैं। ये बातें तो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 13(1) में भी अन्तर्निहित हैं कि संविधान लागू होने के पहले भारत में प्रवृत्त (चल रही) विधियां उस मात्रा तक शून्य होंगी जो संविधान के भाग- 3 में नागरिकों के मौलिक अधिकारों से असंगत होगी यानी जो धार्मिक नियम, परंपरा, प्रथाएं और रुढ़ियां समानता स्वतंत्रता, भाईचारा और न्याय के विरुद्ध हैं वे शून्य (खत्म) किए जाते हैं।

वास्तव में अगर हम संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास करते हैं और भारत को एक मजबूत राष्ट्र बनाने के लिए संकल्प लिए हैं तो हमें ब्राह्मणवादी सनातन धर्म, संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था को खत्म कर समानता, भाईचारा और न्याय को स्थापित करना ही होगा।

अडानी ग्रुप की फ्रॉडगिरी पर बड़ी रिपोर्ट, मचा हंगामा

ब्रिटेन के मीडिया संस्थान Financial Times और The Guardian ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मित्र कारोबारी गौतम अडानी को लेकर एक बड़ा धमाका किया है। इस मीडिया संस्थान में अडानी समूह के फ्रॉडगिरी पर दो बड़ी रिपोर्ट आई है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अडानी ग्रुप ने गुपचुप तरीके से खुद अपने शेयर खरीदकर स्टॉक एक्सचेंज में लाखों डॉलर का निवेश किया। यह रिपोर्ट ऑर्गेनाइज्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट (OCCRP) की रिपोर्ट के आधार पर किया गया है।

रिपोर्ट मे अडानी ग्रुप के मॉरीशस में किये गए ट्रांजैक्शंस की डीटेल का पहली बार खुलासा करने का दावा किया गया है। कहा गया है कि ग्रुप की कंपनियों ने 2013 से 2018 तक गुपचुप तरीके से अपने शेयरों को खरीदा। जांच में सामने आया है कि कम से कम दो मामले ऐसे हैं जहां निवेशकों ने विदेशी कंपनियों के जरिये अडानी ग्रुप के शेयर खरीदे और बेचे हैं।

 

इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद अडानी ग्रुप के शेयर तेजी से नीचे गिरे हैं। हिंडेनबर्ग रिपोर्ट के बाद अडानी 2.0 कि यह फाइल चीख-चीख कर बता रही है कि मॉरीशस में फर्जी शेल कंपनियां चला रहे Chang Ching Ling और दुबई के Nasser Ali Shaban Ahil साल 2013 से अपना ब्लैक मनी और हवाला का पैसा अपनी कंपनियों में लगा रहे हैं। अडानी बंधुओं यानी गौतम अडानी और विनोद अडानी के जरिये मॉरीशस, the British Virgin Islands, UAE देशों में शेल कंपनियाँ बनाईं गईं। ये शेल कंपनियाँ Adani की कंपनियों से लिंक थीं। क्योंकि ये दोनों ही चीनी (ताइवानी) और UAE के एजेंट Adani से जुड़ी कंपनियों में डायरेक्टर रहे हैं।

इसे लिखते समय पत्रकारों ने अदानी समूह के काले कारनामों की तमाम फाइलें खोज निकाली। यहां तक कि अदानी समूह की आंतरिक ईमेल तक। सारे दस्तावेजी सबूत भारत के बिके हुए दलाल गोदी मीडिया को नहीं, बल्कि ब्रिटेन के द गार्जियन और फाइनेंशियल टाइम्स को दिए गए। OCCRP की रिपोर्ट कहती है कि अदानी के 75% शेयर्स मॉरीशस में बैठे इन दो लोगों के हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक दूसरे शब्दों में कहें तो गौतम अदानी की दौलत का 75% काला धन है।

हालांकि अडानी समूह ने एक बयान जारी कर इन तमाम आरोपों से इंकार किया है।

मायावती के अकेले चुनाव लड़ने से किसको होगा फ़ायदा

बसपा प्रमुख मायावती ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि वह न तो एनडीए में जाएंगी और न ही इंडिया गठबंधन में। इसके बाद अब दो सवाल सामने है। पहला, बहनजी के इस फैसले से दोनों गठबंधनों में से किसे फायदा होगा और किसे नुकसान। दूसरा, बसपा का यह फैसला कितना सही है।

दरअसल बसपा प्रमुख मायावती ने कभी नहीं कहा कि वो किसी गठबंधन के साथ जाएंगी। लेकिन पिछले कुछ दिनों से मीडिया का एक तबका यह खबर चला रहा था कि मायावती इंडिया गठबंधन में जा सकती हैं और उनकी बातचीत हो रही है। और उन्होंने 40 सीटों की अपनी शर्त रख दी है। जिसके बाद बहनजी को एक बार फिर सामने आकर साफ शब्दों में इससे इंकार करना पड़ा। और साफ करना पड़ा कि बसपा चार राज्यों के विधानसभा और फिर 2024 में लोकसभा चुनाव मैदान में अकेले ही जाएंगी।

लेकिन यहां एक सवाल यह भी है कि क्या इंडिया गठबंधन यह चाहता था कि मायावती गठबंधन में शामिल हों? क्योंकि जब गठबंधन को लेकर पहली बैठक आयोजित की गई तो उसमें बहुजन समाज पार्टी को न्यौता तक नहीं दिया गया। यानी साफ है कि इंडिया गठबंधन में शामिल पार्टियां और नेता भी बसपा को गठबंधन में नहीं रखना चाहते थे। ऐसे में यह कहना कि मायावती और बसपा गठबंधन में शामिल नहीं हो रहे हैं, अपने आप में बेतुका सवाल है।

अब सवाल है कि बहनजी के अकेले चुनाव मैदान में जाने से किसे फायदा होगा और किसे नुकसान? यह साफ है कि बसपा और बहनजी के समर्थक किसी भी हालत में भाजपा को वोट नहीं देते हैं। यानी अगर बहनजी को शुरुआत से ही इंडिया गठबंधन में शामिल करने की कोशिश की जाती और बसपा प्रमुख इसके लिए हामी भरती, तो निश्चित तौर पर इंडिया गठबंधन को बसपा के वोट मिलते। यूपी के अलावा यह वोट कमोबेश पूरे देश में मिलते।

यानी बसपा का कोर वोटर बहनजी के साथ रहेगा। वह इंडिया गठबंधन में नहीं जाएगा तो राजनैतिक रुप से भारतीय जनता पार्टी को बसपा की वहज से होने वाला नुकसान नहीं होगा और इंडिया गठबंधन को फायदा नहीं मिलेगा। इसी को आधार बनाकर तमाम विरोधी बसपा को भाजपा की बी-टीम होने का आरोप लगाते रहते हैं।

अपने आज के ट्विट में बहनजी ने इसका भी जवाब दिया है। बसपा प्रमुख मायावती का कहना है कि, वैसे तो बीएसपी से गठबंधन के लिए यहाँ सभी आतुर हैं, किन्तु ऐसा न करने पर विपक्षी द्वारा खिसयानी बिल्ली खंभा नोचे की तरह भाजपा से मिलीभगत का आरोप लगाते हैं। इनसे मिल जाएं तो सेक्युलर न मिलें तो भाजपाई। यह घोर अनुचित तथा अंगूर मिल जाए तो ठीक वरना अंगूर खट्टे हैं, की कहावत जैसी है।

यह तो रही दोनों पक्षों की स्थिति। लेकिन यहां एक बड़ा सवाल यह है कि बसपा का फायदा किसमें है, गठबंधन में, या फिर अकेले रहने में।

निश्चित तौर पर बसपा देश की एक कद्दावर राजनीतिक दल है और देश के कई राज्यों में पार्टी ने अपना दम भी दिखाया है। लोकतंत्र में 20-25 प्रतिशत का वोट बैंक रखने वाली पार्टी को कम कर के नहीं आंका जा सकता है। लेकिन बीते एक दशक में बसपा का ग्राफ लगातार नीचे गया है। इस बीच में सिर्फ बीते लोकसभा चुनाव 2019 में पार्टी तब थोड़ा बेहतर प्रदर्शन कर पाई थी, जब यूपी में सपा और बसपा ने लोकसभा चुनाव मिलकर लड़ा था। इस एक मौके को छोड़ दें तो बसपा का ग्राफ लगातार गिरा है।

बसपा की राजनीति की बात करें तो वह चुनाव के बाद गठबंधन में यकीन करने वाली पार्टी है। लेकिन 2017 के यूपी चुनाव में 19 सीट जीतने और 22 प्रतिशत वोट हासिल करने वाली बसपा 2022 में एक सीट और 13 प्रतिशत वोट तक नीचे गिर चुकी है।

यानी बसपा का कोर वोटर कहीं न कहीं उससे छिटक रहा है। खास कर गैर जाटव दलित वोटर। चिंता की बात यह है कि आकाश आनंद को युवा चेहरे के रुप में सामने लाने और तेलंगाना बसपा की कमान पूर्व आईपीएस अधिकारी आर.एस. प्रवीण को देने के अलावा मायावती ने बीते सालों में पार्टी को मजबूत करने के लिए कोई खास कदम उठाया हो, ऐसा नहीं दिखता। पार्टी के तमाम पुराने साथी भी बसपा छोड़ चुके हैं या फिर निकाले जा चुके हैं।

 ऐसे में बसपा के गठबंधन में शामिल होने या न होने से भले जिसे भी फायदा या नुकसान हो, खुद बसपा के लिए 2024 का चुनाव अस्तित्व की लड़ाई वाला होगा। अगर मायावती इस चुनाव में अपनी घोषणा के मुताबिक अकेले चुनाव लड़ती हैं तो उनके पास संभवतः यह आखिरी मौका होगा; जब वो बसपा को एक बार फिर राजनीतिक के मैदान में खड़ा कर सकें। यह सालों तक बसपा और मायावती के लिए तमाम विपरीत परिस्थियों में लड़ने वाले बसपा समर्थकों के लिए भी जरूरी है।

तोहफा या 200 रुपये का चुनावी लॉलीपॉप

राजनीति में जब नेता को सत्ता से बाहर जाने का डर सताने लगे तो वह सबसे पहले देश की जनता को लालच देना शुरू कर देता है। और जब चुनाव पास हो तो वह समय सत्ता रुपी ऊंट का जनता रुपी पहाड़ के नीचे आने का होता है। भाजपा की सरकार ने यही किया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एलपीजी की कीमत को 200 रुपये कम करने की घोषणा की है। देश के तमाम समाचार पत्रों में करोड़ो रुपये खर्च कर इसे रक्षाबंधन से पहले बहनों को दिया जाने वाला गिफ्ट बताया गया है। लेकिन सवाल यह है कि बीते साढ़े नौ सालों में मोदी सरकार ने उन्हीं बहनों से जो वसूल किया है उसका क्या? क्या तब पीएम मोदी को अपनी बहनें याद नहीं आई?

कांग्रेस पार्टी इसे इंडिया गठबंधन का डर बता रही है। कांग्रेस नेता और प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला का कहना है कि जहां कांग्रेस पार्टी की सरकार है, वहां वह 500 रुपये में गैस सिलेंडर दे रही है, जिसकी वजह से भाजपा डर गई है। सुरजेवाला ने एलपीजी को परिभाषित करते हुए L-लूटों, P- प्रॉफिट कमाओ और G-गिफ़्ट देने का नाटक करो! कहा है।

पक्ष और विपक्ष के आरोपों के बीच इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता कि गैस सिलेंडर और पेट्रोल की बढ़ती कीमतों ने देश की 90 फीसदी आबादी को प्रभावित किया है। मोदी सरकार में गैस की कीमते साल दर साल बेतहाशा बढ़ी है। पिछले तीन सालों में तो इसने सभी रिकार्ड को तोड़ दिया।

जो गैस सिलेंडर 01 मार्च 2014 को कांग्रेस-यूपीए की सरकार में सिर्फ 410 रुपये था, भाजपा-एनडीए की सरकार में वह साल दर साल बढ़ता गया। मोदी सरकार के आते ही 01 मई 2014 को यह कीमत 616 रुपये हो गई थी, जो 01 मई 2021 को 809 रुपये, 01 मई 2022 को 949 रुपये और 01 मई 2023 को 1103 रुपये हो गया है।

अब सवाल यह है कि बीते साढ़े नौ सालों के भीतर तमाम राज्यों के साथ-साथ एक बार लोकसभा का चुनाव भी हो चुका है, तब भाजपा ने कभी पेट्रोल से लेकर गैस सिलेंडर की कीमतों में कोई भारी कटौती नहीं की, बल्कि मूल्य लगातार बढ़ता ही गया। ऐसे में अब राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों के साथ-साथ 2024 के लोकसभा चुनाव के ठीक पहले गैस सिलेंडर के दामों में 200 रुपये की कटौती बहुत कुछ कहती है। 2024 में सरकार चाहे जिसकी आए, यह साफ है कि मोदी सरकार डरी हुई है।