दिल्ली के लिए फायदेमंद है ओखी तूफान

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cyclone-ockhiनई दिल्ली। ओखी तूफान ने भले ही दक्षिण भारत में हाहाकार मचाया हो, लेकिन दिल्ली वालों के लिए यह फायदेमंद है. ओखी तूफान दिल्ली में फैले धुंध को काट सकता है. दरअसल अमेरिकी एजेंसी नासा की मानें तो गुजरात और महाराष्ट्र में ओखी का असर तो कम होगा, इसके साथ ही नई दिल्ली और उत्तरी भारत में जो धुंध का जाल बना हुआ है वह भी कम होगा.

नासा ने 4 दिसंबर को एक तस्वीर जारी की है, जिसके आधार पर यह बात कही जा रही है. नासा ने तस्वीर के साथ लिखा है कि जो तूफान आ रहा है उसके कारण उत्तरी भारत में मौजूदा धुंध गायब हो सकती है. गौरतलब है कि राजधानी दिल्ली समेत आस-पास के कई इलाकों में पिछले काफी समय से अपने धुंध ने अपने पैर पसारे हुए हैं. पिछले दिनों स्थिति भयंकर होने के बाद एक बार यह छट गया था लेकिन पिछले दो दिनों से यह फिर से देखने में आ रहा है.

यूपी में तलाक-तलाक-तलाक कहने वालों की खैर नहीं

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश में अब ट्रिपल तलाक कहना भारी पर सकता है. प्रदेश सरकार ने केंद्र सरकार के ट्रिपल कानून को मंजूरी दे दी. मंगलवार को कैबिनेट में इस कानून को हरी झंडी दे दी गई. योगी आदित्यनाथ की सरकार ट्रिपल तलाक पर केंद्र के कानून को सहमति देने वाली पहली सरकार है और उसने बिना किसी संशोधन के इस पर सहमति दे दी है.

ट्रिपल तलाक पर कानून बनाने को लेकर मसौदा राज्यों की सहमति के लिए भेजा गया है, जिसके बाद यूपी की योगी सरकार ने इस पर फैसला लिया. योगी सरकार केंद्र सरकार के इस मसौदे से शत प्रतिशत सहमत है, जिसमें एक साथ ट्रिपल तलाक देने वालों को 3 साल की सजा हो सकती है. सुप्रीम कोर्ट पहले ही अगस्त महीने में ट्रिपल तलाक को गैर कानूनी ठहरा चुकी है. इस बीच यह भी खबर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार संसद के शीतकालीन सत्र में तीन तलाक (तत्काल तलाक) पर प्रतिबंध लगाने के लिए विधेयक लाने की योजना बना रही है.

इस बड़े अधिकारी ने दी आंतंकियों को चुनाव लड़ने की सलाह

Courtsy: PTI
नई दिल्ली। पाकिस्तान में हाफिज सईद के चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद अब भारत में भी आतंकियों को चुनाव लड़ने की सलाह दी जा रही है। भारत के थलसेनाध्यक्ष बिपिन रावत ने कहा है कि पाकिस्तान के आंतकी संगठनों की तरह हमारे आतंकी भी चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा लें. वे हिंसा का रास्ता छोड़कर भारतीय संविधान के अंतर्गत अपनी लोकतांत्रिक शक्तियों का प्रयोग करें.

थल सेनाध्यक्ष बिपिन रावत ने यह बात राजस्थान के सूरतगढ़ में भारत-पाकिस्तान सीमा पर सैन्य तैयारियों का जायजा लेते समय कहा. उन्होंने कहा कि हम चाहते हैं कि हमारे यहां जो आतंकी हैं, वो भी चुनाव में हिस्सा लें और हिंसा का रास्ता छोड़ें. इससे पहले बिपिन रावत ने कहा कि भारत अपने यहां से आतंक का सफाया करेगा. इसके लिए हमने कश्मीर में लगातार कई तरह के अभियान चला रखे हैं.

… तो क्या बाबासाहेब से डर गए थे नेहरू

बाबासाहेब अम्बेडकर आज इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन उनको मानने वालों की तादात लगातार बढ़ रही है। लोग लगातार बाबासाहेब के जीवन से जुड़े तमाम महत्वपूर्ण पहलुओं के बारे में जानना चाहते हैं। लेकिन आज भी बाबासाहेब के जीवन से जुड़े तमाम पहलू ऐसे हैं जो अछूते हैं। इस देश की सरकारों ने डॉ. अम्बेडकर के बारे में न तो खुद जानना चाहा और न ही लोगों को बताने की कोशिश की। लेकिन बहुजन समाज अब बाबासाहेब के जीवन से जुड़े तमाम पहलुओं की पड़ताल करने लगा है। इसी में से एक पहलू बाबासाहेब की मृत्यु से जुड़ा हुआ है।

बाबासाहेब की मौत से जुड़ी तमाम बातों पर से अब भी पर्दा हटना बाकी है। इसमें एक बड़ा सवाल यह भी है कि जब डॉ. अम्बेडकर की मौत दिल्ली में उनके 26 अलीपुर रोड स्थित आवास में हुई, तब भी उनका अंतिम संस्कार दिल्ली में न कर के उनके शरीर को दिल्ली से दूर मुंबई भेजा गया। आखिर क्या वजह रही कि तब की सरकार ने ऐसा किया।

तब जवाहरलाल नेहरू भारत के प्रधानमंत्री थे। और जो हुआ, उन्हीं के आदेश से हुआ। जब बाबासाहेब का परिनिर्वाण हो गया तो इसकी सूचना बहुत कम लोगों को दी गई। नेहरू उनमें से एक थे। कहा जाता है कि सूचना मिलते ही प्रधानमंत्री नेहरू 26 अलीपुर रोड पहुंचे थे, और वहां तब तक जमे रहें जब तक डॉ. अम्बेडकर के पार्थिव शरीर को विशेष विमान से मुंबई नहीं भेज दिया गया। जहां दादर में बाबासाहेब का बौद्ध रिति से अंतिम संस्कार हुआ।

सवाल उठता है कि आखिर प्रधानमंत्री नेहरू और तब की भारत सरकार देश के पहले कानून मंत्री और संविधान निर्माता डॉ. अम्बेडकर के अंतिम संस्कार के लिए राजधानी दिल्ली में जमीन देने को तैयार क्यों नहीं हुई?…. असल में प्रधानमंत्री नेहरू डर गए थे। उनके डर की वजह बाबासाहेब का लगातार बढ़ता कारवां था, जिससे लाखों लोग जुड़ चुके थे। दिल्ली में गांधीजी की भी समाधी थी। गांधीजी के बाद दिवंगत होने वाले बड़े नेताओं में बाबासाहेब प्रमुख थे। तब तक गांधीजी और बाबासाहेब एक-दूसरे के विरोधी के तौर पर देखे जाने लगे थे। क्योंकि गांधी जी वर्ण व्यवस्था के समर्थक से जबकि डॉ. अम्बेडकर इसका विध्वंस चाहते थे। नेहरू यह नहीं चाहते थे कि भारतीय राजनीति में कोई भी गांधी जी के सामानांतर या आस-पास भी खड़ा हो पाए…, क्योंकि यह कहीं न कहीं कांग्रेस पार्टी के लिए भी चुनौती होती।

दिल्ली में गांधीजी के अलावा जिन प्रमुख नेताओं की समाधियां हैं उनमें खुद देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, जगजीवन राम और राजीव गांधी की समाधि प्रमुख है। कांग्रेस की सरकार में इनकी पुण्यतिथि पर सरकारी आयोजन होते रहे हैं, जिसमें पार्टी के नेता पहुंचते रहे हैं। लेकिन इसके उलट बाबासाहेब के परिनिर्वाण दिवस के दिन दादर स्थित चैत्यभूमि पर लाखों की संख्या में देश भर से लोग पहुंच कर उन्हें श्रद्धांजली अर्पित करते हैं। यह न किसी सरकार द्वारा प्रायोजित होता है और न ही किसी राजनैतिक दल द्वारा। बहुजन समाज में जैसे-जैसे जागृति बढ़ रही है, डॉ. अम्बेडकर को मानने वाले लोगों की तादात भी बढ़ रही है।

नेहरू को यह पता था कि दिनों दिन डॉ. अम्बेडकर का कारवां बढ़ता जाएगा। दिल्ली सत्ता का केंद्र है और यहां लाखों लोगों की जुटान जाहिर तौर पर यहां की राजनैतिक सत्ता को चुनौती देती है। ऐसे में अगर बाबासाहेब के परिनिर्वाण के बाद उनका अंतिम संस्कार दिल्ली में हुआ होता तो चैत्यभूमि पर जाने वाले जनसैलाब का रुख दिल्ली की ओर होता। सोचिए तब 6 दिसंबर को दिल्ली का मंजर कैसा होता…..

जिग्नेश मेवाणी पर हमला

गुजरात। गुजरात में दलित हित की बात लेकर भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले जिग्नेश मेवाणी पर हमला हुआ है। मेवाणी पर मंगलवार को एक रैली के दौरान तकरवाड़ा गांव में हमला हुआ। जिग्नेश ने इस हमले को भाजपा द्वारा किया गया हमला बताया। ट्विटर पर इस घटना की जानकारी देते हुए मेवाणी ने लिखा कि भाजपा डर गई है, इसलिए ऐसे हमले कर रही है।

हमले को लेकर मेवाणी ने पीएम मोदी और अमित शाह पर निशाना साधा है। उन्होंने अपने ट्विट में हमले का जिक्र करते हुए लिखा कि मैं भी गुजरात का बेटा हूं मोदी जी, दिल को बड़ा रखिए। जो जीत रहा हो उस पर हमला करवाओ, यह आपका आईडिया है या अमित शाह का, क्योंकि यह गुजरात की परंपरा तो नहीं है।

दरअसल, गुजरात विधानसभा की सरगर्मियों के बीच जिग्नेश राज्य में कांग्रेस का समर्थन कर रहे हैं। हाल में उन्होंने बनांसकाठा से चुनाव लड़ने का ऐलान किया था और कांग्रेस भी उनके इस कदम को समर्थन कर रही है। जिग्नेश के अलावा गुजरात की राजनीति में पाटीदार नेता हार्दिक पटेल भी मजबूती से भाजपा को टक्कर दे रहे हैं। ये दोनों युवा नेता ही राज्य में बीजेपी के लिए गले की फांस बने हुए हैं।

गुजरात में कितने कामयाब होंगे जिग्नेश मेवाणी

देश में फिलहाल चारो ओर गुजरात चुनाव की चर्चा है। अखबारों और टेलिविजन में हर दिन गुजरात चुनाव की खबरें दिख रही है। इस बीच 27 नवंबर को जिग्नेश मेवाणी ने चुनाव लड़ने की घोषणा कर के गुजरात चुनाव को नया मोड़ दे दिया है। मेवाणी बनासकांठा जिले के वडगांव सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव मैदान में हैं। यह सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है।

इस सीट पर कांग्रेस के मनीभाई वाघेला विधायक हैं। लेकिन मेवाणी के चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद कांग्रेस ने इस सीट पर अपना प्रत्याशी नहीं उतारने की घोषणा की है और मेवाणी को अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन देने को कहा है। आम आदमी पार्टी भी जिग्नेश मेवाणी के खिलाफ प्रत्याशी नहीं उतार रही है। हालांकि बहुजन समाज पार्टी और भाजपा का उम्मीदवार मेवाणी के खिलाफ चुनाव मैदान में हैं।

मेवाणी के चुनाव मैदान में उतरने के बाद गुजरात में राजनीति गरमा गई है। मेवाणी को घेरने के लिए विपक्षी दलों ने तमाम कोशिश शुरू कर दी है। इसी का नतीजा तब देखने को मिला जब तकरीबन एक साल पुराने मामले में अचानक जिग्नेश मेवाणी के खिलाफ 28 नवंबर को गैर जमानती वारंट जारी कर दिया गया। अहमदाबाद की एक अदालत ने जिग्नेश मेवाणी के खिलाफ यह वारंट जारी किया है। जिस मामले में मेवाणी के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया गया है, वह जनवरी महीने का है।

11 जनवरी को वाइब्रेंट गुजरात शिखर सम्मेलन के खिलाफ एक ‘रेल रोको’ विरोध प्रदर्शन के दौरान अहमदाबाद रेलवे स्टेशन पर राजधानी एक्सप्रेस को काफी देर तक रोकने के आरोप में मेवाणी और उनके समर्थकों को गिरफ्तार किया गया था। जनवरी में एक विरोध प्रदर्शन के दौरान दिल्ली जा रही राजधानी एक्सप्रेस को रोकने को लेकर उनके खिलाफ एक मामला दर्ज था। इस मामले की सुनवाई के लिए पेश नहीं होने को लेकर अदालत ने उनके खिलाफ यह वारंट जारी किया है। उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 143 (गैरकानूनी सभा करने), 147 (दंगा) और भारतीय रेल अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। हालांकि मेवाणी के वकील शमशाद पठान ने अपने मुवक्किल को पेशी से छूट दिये जाने की मांग को लेकर अदालत में आवेदन दिया था। पठान ने इस आधार पर छूट की मांग की थी कि उनका मुवक्किल वडगाम विधानसभा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर नामांकन पत्र भरने में व्यस्त था, हालांकि मजिस्ट्रेट ने इस पर विचार करने से मना कर दिया और वारंट जारी कर दिया।

खैर, अदालतों का अपना काम है और हम उस पर टिप्पणी नहीं कर रहे हैं लेकिन यहां महाराष्ट्र के राज ठाकरे के मामलों को याद करना होगा। बात 2008 की है। मनसे के निर्माण के बाद अपनी राजनीति चमकाने के लिए राज ठाकरे के कार्यकर्ताओं ने मुंबई में एक प्रतियोगी परीक्षा देने गए उत्तर भारतीयों को जमकर पीटा। बिहार के कई हिस्सों में उनके खिलाफ कोर्ट में मुकदमें दायर किए गए, लेकिन राज ठाकरे एक बार भी बिहार के किसी अदालत में हाजिर नहीं हुए, आज वो मामला सारे लोग भूल चुके हैं। लेकिन मेवाणी को राहत नहीं मिल सकी।

खैर, अब फिर से आते हैं गुजरात चुनाव पर। जिस जिग्नेश मेवाणी को एक साल पहले पूरे गुजरात के लोग भी नहीं जानते थे, आखिरकार गुजरात चुनाव में वो इतना महत्वपूर्ण होकर क्यों उभर गए हैं? असल में गुजरात में युवा दलित नेता के तौर पर उभरे जिग्नेश पेशे से वकील और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। मेवाणी राष्ट्रीय दलित अधिकार मंच के संयोजक भी हैं। ऊना में गोरक्षा के नाम पर दलितों की पिटाई के ख़िलाफ़ हुए आंदोलन का जिग्नेश ने नेतृत्व किया था। ‘आज़ादी कूच आंदोलन’ में जिग्नेश ने 20 हज़ार दलितों को एक साथ मरे जानवर न उठाने और मैला न ढोने की शपथ दिलाई थी। इस आंदोलन में दलित-मुस्लिम एकता भी दिखाई दी थी।

मेवाणी इसी दलित-मुस्लिम एकता को अपने पक्ष में आगामी विधानसभा चुनाव में भी बनाए रखना चाहते हैं। मेवाणी के इसी गठजोड़ के चलते कांग्रेस उनसे समझौता करने को तैयार हो गई। जहां तक गुजरात में दलितों के दखल की बात है तो राज्य में दलितों का वोट प्रतिशत क़रीब सात फ़ीसदी है। राज्य की कुल आबादी लगभग 6 करोड़ 38 लाख है, जिनमें दलित 35 लाख 92 हज़ार के क़रीब हैं। अब सवाल उठता है कि गुजरात के दलितों के बीच जिग्नेश मेवाणी की कितनी पकड़ है। इसके लिए बोरतवाड़ा का उदाहरण लिया जा सकता है जहां से लौटने के बाद बीबीसी की संवाददाता प्रियंका दूबे ने बीबीसी के लिए एक रिपोर्ट लिखी है।

बोरतवाड़ा को अनुसूचित जाति/जनजाति के तहत आरक्षित सीट घोषित किया गया। गांव में आरक्षित सीट पर हुए इस पहले पंचायत चुनाव को 12 वोटों से जीत कर महेश ने अप्रैल 2017 में सरपंच का कार्यभार संभाला। पर दो महीने के भीतर ही गांव की पंचायत कमेटी उनके ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव ले आई। वजह महेश का दलित होना है। एक दलित होने के कारण पंचायत कमेटी के सदस्य उन्हें पसंद नहीं करते। महेश का कहना है कि उन्हें गांव के 3200 आम लोगों ने वोट देकर सरपंच चुना लेकिन पंचायत कमेटी के पांच ठाकुर उन्हें यानि महेश को और पंचायत को काम नहीं करने देते.” महेश जिग्नेश मेवाणी को अपना नेता मानते हैं। उनका साफ कहना है कि हम उसी को वोट देंगे जो गुजरात के दलितों के लिए जिग्नेश की 12 मांगों को मानेगा. अगर मांगें नहीं मानी गईं तो नोटा दबा देंगे. यानि इसमें कोई शक नहीं है कि गुजरात में दलितों के साथ खड़े होकर जिग्नेश मेवाणी ने उनके बीच अपनी जगह बनाई है। हां, कितनी जगह बना पाए हैं, इस सवाल का जवाब 182 विधानसभा सीटों वाले गुजरात में 9 और 14 दिसंबर को चुनाव के बाद 18 दिसंबर को रिजल्ट के बाद मिलेगा।

चंद्रशेखर रावण की रिहाई को लेकर आंदोलन शुरू

chandrashekharनई दिल्ली। पिछले तकरीबन छह महीनों से जेल में बंद भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर रावण की रिहाई को लेकर दलित संगठनों ने आंदोलन शुरू कर दिया है। आज 5 दिसंबर को राष्ट्रीय दलित महासभा के बैनर तले दिल्ली में एक कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें एडवोकेट चंद्रशेखर की रिहाई के लिए मंथन किया जाएगा। आंध्र भवन में होने वाले इस कार्यक्रम में तमाम दलित संगठनों के लोग शामिल रहे।

राष्ट्रीय दलित महासभा के संस्थापक अशोक भारती ने कहा कि चंद्रशेखर को लेकर तमाम संगठन आंदोलन करते रहे हैं, लेकिन हमारा प्रमुख एजेंडा आंदोलन से आगे बढ़कर चंद्रशेखर की रिहाई सुनिश्चित करना होगा। उन्होंने कहा कि जब भी कोई दलित युवा आगे बढ़ता है उसे रोकने के लिए तमाम तरह के सरकारी षड्यंत्र में फंसा दिया जाता है। हमारी लड़ाई इसके खिलाफ है। दलित दस्तक से बातचीत में भारती ने कहा कि जब तक चंद्रशेखर की रिहाई नहीं हो जाती हमाई लड़ाई जारी रहेगी और हम शांत नहीं बैठेंगे।

बाबासाहेब के परिनिर्वाण दिवस पर दुनिया भर के अम्बेडकरवादी देंगे श्रद्धांजली

नई दिल्ली। बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर के 61वें परिनिर्वाण दिवस पर देश-विदेश में मौजूद अम्बेडकरवादी उन्हें श्रद्धांजली देने की तैयारियों में जुटे हैं। देश भर में फैले अम्बेडकरवादी संगठन भी परिनिर्वाण दिवस मना रहे हैं। इस बीच बहुजन समाज पार्टी ने बाबासाहेब के परिनिर्वाण दिवस यानि 6 दिसंबर के दिन मंडल स्तर पर कार्यक्रम का आयोजन किया है। पार्टी ने अपने कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया है कि वो हर मंडल में एक स्थान पर इकट्ठा होकर बाबासाहेब का परिनिर्वाण दिन मनाएं। लखनऊ में भी परिनिर्वाण दिवस के आय़ोजन की तैयारी की जा रही है, हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि बसपा अध्यक्ष मायावती इसमें मौजूद रहेंगी की नहीं। इसी तरह कनाडा और अमेरिका सहित दुनिया के अन्य हिस्सों में मौजूद अम्बेडकरवादी संगठनों ने भी बाबासाहेब को श्रद्धांजली देने के लिए विशेष कार्यक्रम आय़ोजित किया है। बाबासाहेब का परिनिर्वाण 6 दिसंबर 1956 को दिल्ली के 26 अलीपुर रोड स्थित उनके सरकारी आवास पर हो गया था। जिस रात को उनका निधन हुआ, उस रात ही उन्होंने अपनी महत्वकांक्षी पुस्तक “भगवान बुद्ध औऱ उनका धम्म” को समाप्त किया था। बाबासाहेब की मृत्यु के बाद उनके पार्थिव शरीर को मुंबई भेज दिया गया यहां दादर में 7 दिसंबर को बाबासाहेब का बौद्ध परंपरा से अंतिम संस्कार हुआ। बाबासाहेब की अंतिम संस्कार क्रिया भदन्त आनंद कौशल्यायन ने किया था। इस दौरान एक औऱ महत्वपूर्ण घटना घटी। बाबासाहेब के अंतिम संस्कार से पहले उन्हें साक्षी मान कर उनके 10 लाख अनुयायियों ने बौद्ध धम्म की दीक्षा ली। उन्हें बौद्ध दीक्षा भदन्त आन्नद कौशल्यायय ने दिलवाई। अम्बेडकरवादी इसी जगह को चैत्य भूमि कहते हैं। अम्बेडकरवादियों के लिए इस स्थान का विशेष महत्व है। आज भी हर 6 दिसंबर को अम्बेडकरवादी चैत्य भूमि पर जाकर बाबासाहेब को अपनी श्रद्धांजली देते हैं।

नीतीश कुमार से न्याय चाहता है भागलपुर का दलित परिवार

पटना। परिवार के तीन सदस्यों की हत्या और बेटी के बलात्कार से सदमें में आया दलित परिवार बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से इंसाफ चाहता है। 25 नवंबर की रात भागलपुर जिले के बिहपुर के झंडापुर गांव में एक दलित परिवार के तीन सदस्यों की बर्बर हत्या कर दी गयी थी। उनकी आंखें निकाल दी गयीं और उनका गला रेत दिया गया। पत्नी मीना देवी का गला रेत दिया। 7वीं में पढ़ने वाली बेटी का सामूहिक बलात्कार किया। उसके सर पर मारा और मरा जानकर चले गए। लेकिन वह बच गई।

 

घटना के बाद लड़की कोमा में है। जाहिर है कि मां-बाप और भाई की हत्या और खुद का बलात्कार किए जाने के बाद उसने अचेत हो जाना बेहतर समझा होगा। अस्पताल के अधीक्षक के मुताबिक उसके सिर में गहरी चोट हैखून के थक्के जम गए हैं। अस्पताल में लड़की के साथ उसके डरे हुए रिश्तेदार हैं।

घटना किस वक्त हुई किसी को नहीं पता। परिवार के लोग किसी पुरानी रंजिश की बात से इंकार कर रहे हैं। लेकिन चर्चा है कि झंडापुर गांव में दलितों के 70 घरों के बीच कनिक राम थोड़ा सबल था। हाल ही में उसने मछली पालने का तालाब ठेके पर लिया था। हाल तक इस पर ऊंची जाति वालों का कब्जा रहा है और उन्हें एक दलित का तालाब का ठेका लेना खटक रहा था। परिवार मामले की जांच सीबीआई से कराने की मांग कर रहा है। लेकिन बिहार की भाजपा औऱ नीतीश कुमार के गठबंधन की सरकार फिलहाल पद्मावती की लाज बचाने में जुटी है।

 

मायावती के समर्थन में एकजुट होने लगे दलित और मुस्लिम

mayawatiलखनऊ। 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव के दौरान बहुजन समाज पार्टी ने जिस दलित-मुस्लिम गठबंधन के भरोसे सत्ता में आने की रणनीति तैयार की थी, वह एकजुट होने लगा है। निकाय चुनाव में और खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यह दोनों तबका बसपा के समर्थन में पूरी तरह एकजुट दिखा। यही वजह है कि बसपा अलीगढ़ और मेरठ में मेयर सीट जीतने में कामयाब रही।

बीते दो चुनाव जिसमें 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 का विधानसभा चुनाव शामिल है, दलित भाजपा तो मुस्लिम सपा के पक्ष में दिखे थे। लेकिन दोनों दलों से छले जाने के बाद दलित और मुस्लिम अब बसपा के पक्ष में आ खड़े हुए हैं। निकाय चुनाव में दलितों ने पूरी तरह भाजपा से किनारा कर लिया है। निकाय चुनाव के नतीजों में ज्यादातर सीटों पर बीएसपी दूसरे नंबर पर रही और भाजपा को कड़ी टक्कर दी है। अब बदले हालात में सपा और भाजपा में साफ तौर पर बेचैनी की खबरें आ रही है। 14 मेयर सीटों पर कब्जे के साथ भाजपा भले ही अपनी पीठ थपथपा रही हो, उसे पता है कि जमीन पर उसकी हालात खराब है।

यहां एक पहलू यह भी है कि विधानसभा चुनाव के दौरान बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती दलित-मुस्लिम एकता की रणनीति के साथ काम कर रही थीं। तब तमाम विश्लेषक यह दावा कर रहे थे कि दलित-मुस्लिम गठजोड़ के साथ बसपा यूपी की सत्ता में आ सकती है। लेकिन चुनाव के नतीजे बिल्कुल उल्टे रहे थे। मायावती ने इसका ठीकरा ईवीएम से हुए चुनाव पर फोड़ा था। निकाय चुनाव के नतीजों ने मायावती द्वारा ईवीएम पर उठाए गए सवाल को औऱ मजबूत किया है।

मारुति के चार मॉडलों पर 40 हजार तक डिस्काउंट

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मारुति सुजुकी अपने ग्राहकों के लिए अच्छी खबर लेकर आई है. मारुती अपने चार अलग-अलग मॉडल पर 40 हजार रुपये तक का डिस्काउंट दे रही है. सूचना के मुताबिक यह छूट ऑल्टो 800 से लेकर डियर टूर तक पर है. हालांकि कंपनी ने अपनी नई गाड़ियों को डिस्काउंट से दूर ही रखा है.

किस पर कितना छूट अर्टिगा के डीजल वेरिएंट पर 40 हजार रुपये का डिस्काउंट बैगनआर पर 35 हजार का डिस्काउंट स्विफ्ट पर 30 हजार की छूट ऑल्टो 800 पर 35 हजार की छूट

जाहिर सी बात है कि कोई भी छूट ग्राहकों के लिए फायदे का सौदा होता है. ऑल्टो और वैगनआर मारुति की ऐसी गाड़ियां हैं, जो लगातार डिमांड में रहती हैं. इस डिस्काउंट से इसके खरीदादारों को बड़ा फायदा होगा.

25 लाख रोजगार और 25 लाख घर के वादे के साथ गुजरात कांग्रेस का मेनिफेस्टो जारी

अहमदाबाद। कांग्रेस पार्टी की गुजरात इकाई ने गुजरात विधानसभा चुनाव को लेकर सोमवार को अपना मेनिफेस्टो जारी कर दिया है. पार्टी ने युवाओं को 25 लाख रोजगार और पांच सालों के भीतर 25 लाख घर देने का वादा किया है. बिजली में सुधार, किसानों की कर्जमाफी, पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कटौती सहित ऐसे नौ मुद्दे हैं, जिस पर पार्टी का फोकस है.

कांग्रेस के घोषणापत्र में पाटीदार नेता हार्दिक पटेल की भी छाप दिख रही है. कांग्रेस ने इसमें पाटीदारों के लिए अलग कैटेगरी बनाने की बात कही है. कांग्रेस ने इसे “खुश रहे गुजरात, खुशहाल गुजरात” थीम पर जारी किया है. गुजरात में दो फेज 9 और 14 दिसंबर को वोट डाले जाएंगे. रिजल्ट 18 दिसंबर को आएगा. हालांकि भाजपा ने अभी तक अपना घोषणापत्र जारी नहीं किया है. संभव है कि वह कांग्रेस के घोषणापत्र की राह देख रही हो और अब वह भी जल्दी ही कांग्रेस से ज्यादा लुभावने वादों के साथ अपना चुनावी घोषणापत्र जारी कर सकती है.

कांग्रेस के मेनिफेस्टो की 9 बड़े वादे 1) 25 लाख युवाओं को रोजगार 2) पेट्रोल-डीजल में 10 रुपए तक की कटौती की जाएगी। 3) किसानों को कर्ज माफी। 4) हेल्थ कॉर्ड दिया जाएगा, जिसके तहत फ्री दवाएं मुहैया कराई जाएंगी। 5) बिजली की दरों में 50% की कटौती की जाएगी। 6) 16 घंटे बिजली देने का वादा। 7) 5 सालों में 25 लाख घर देने का वादा। 8) बिजली चोरी के केस वापस लिए जाएंगे। 9) पाटीदारों के स्पेशल कैटेगरी बनाई जाएगी।

तू-तू मैं-मैं के बीच मायावती ने सीएम योगी को जमकर लताड़ा

लखनऊ। यूपी निकाय चुनाव में भाजपा के शहरों तक ही सिमट जाने के बाद बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती और भाजपा नेता योगी के बीच जुबानी जंग जोरों पर है. चुनाव के रिजल्ट के बाद मायावती ने भाजपा को यह कह कर घेरा कि अगर बैलेट पेपर से चुनाव हुए होते तो भाजपा मेयर की सीटें भी नहीं जीत पाती. इस पर बौखलाई भाजपा ने मायावती से बसपा द्वारा जीती दोनों मेयर सीटों पर इस्तीफा देकर फिर से चुनाव कराने को कहा था.

इससे गुस्साई मायावती ने सीएम योगी और भाजपा को जमकर लताड़ लगाई है. मायावती ने एक बार फिर भाजपा को चुनौती देते हुए कहा कि भाजपा सभी 16 मेयर सीटों पर बैलेट पेपर से दुबारा चुनाव करा ले उन्हें अपनी पार्टी और अपने नेता मोदी के विजन का पता चल जाएगा. पार्टी द्वारा जारी बयान में बसपा प्रमुख ने कहा कि बसपा के जीते मेयरों का इस्तीफा मांगना चोरी और ऊपर से सीनाजोरी की बदतर मिसाल है.

बहुजन समाज की नेता मायावती ने 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में बीजीपी की जीत को ईवीएम की जीत बताया. उन्होंने कहा कि भाजपा को वैसा जनसमर्थन बिल्कुल हासिल नहीं है, जैसा कि चुनाव परिणाम जताते हैं. मायावती ने कहा कि अलीगढ़ और मेरठ में बी.एस.पी के पक्ष में जबरदस्त जन उबाल था, जिसकी वजह से भाजपा ने गड़बड़ी नहीं की. क्योंकि इससे भाजपा की और फजीहत हो सकती थी।

पुजारी बनने के ऑफर को दलित युवाओं ने ठुकराया!

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shudra not allow in templeबंगलुरू। केरल के बाद अब पड़ोसी बंगलुरू ने दलित समाज के युवाओं को पुजारी बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. राज्य सरकार ने देवस्थानम विभाग के मंदिरों में यह प्रक्रिया शुरू की है. नियम के मुताबिक पुजारी नियुक्त होने के लिए इच्छुक उम्मीदवारों को पहले आगम शाला में पढ़ाई पूरी करनी होती है. इसके बाद ही उन्हें इस सेवा के लिए अभिप्रमाणित किया जाता है.

हालांकि इससे पहले जब विभाग ने दलित वर्ग के पुजारियों की नियुक्ति को मंजूरी दी थी तो दलित वर्ग से किसी ने भी आगम शास्त्रों की शिक्षा ग्रहण करने की इच्छा नहीं जताई थी. इस बार भी दलितों में इसको लेकर कोई खास रुचि नहीं है. देवास्थानम विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने भी इस बात की पुष्टि करते हुए बताया कि अब लगभग सभी नामांकनकर्ता ब्राह्मण वर्ग से ताल्लुक रखते हैं. गौरतलब है कि देवस्थानम विभाग 34 हजार से अधिक मंदिरों का प्रबंधन करता है, जिनमें करीब 1.2 लाख पुजारी कार्यरत है.

कुमार विश्वास पर भड़के अम्बेडकर वादियों ने की विश्वास की ऐसी-तैसी

नई दिल्ली। कुमार विश्वास जैसे दो कौड़ी के इंसान द्वारा विश्वविभूति बाबासाहेब पर की गई टिप्पणी के बाद दलित संगठनों, बुद्धीजीवियों और एक्टिविस्टों में काफी उबाल है. आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास का एक वीडियो सामने आने के बाद दलित संगठन कुमार विश्वास पर भड़के हुए हैं. इस वीडियो में विश्वास आरक्षण को लेकर टिप्पणी करते दिखाई दे रहे हैं. वीडियो में विश्वास ने भारत रत्न से सम्मानित देश के पहले कानून मंत्री और संविधान निर्माता बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर पर भी आपत्तिजनक टिप्पणी की है. हालांकि विश्वास ने सीधे-सीधे डॉ. अम्बेडकर का नाम तो नहीं लिया है लेकिन वीडियो देखने पर साफ पता चलता है कि उनका इशारा बाबासाहेब की ओर है.

वीडियो के वायरल होते ही विश्वास को लेकर दलित संगठनों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. और जगह-जगह उनके खिलाफ धरना प्रदर्शन शुरू हो गया. रविवार 3 दिसंबर को हरियाणा के बहादुरगढ़ सहित देश भर में दलित संगठन कुमार विश्वास का पुतला फूंक कर विरोध जता रहे हैं. तो रविवार को तमाम अम्बेडकरवादी विरोध जताने विश्वास के घर पहुंच गए, लेकिन डरे विश्वास पीछे के दरवाजे से भाग खड़े हुए. सोशल मीडिया पर भी तमाम एक्टिविस्ट अपने-अपने तरह से विरोध जता रहे हैं.

विश्वास ने एक सप्ताह पहले राजस्थान की एक सभा में डॉ. अम्बेडकर के खिलाफ टिप्पणी की थी. विश्वास जैसे चिरकुट द्वारा डॉ. अम्बेडकर के खिलाफ की गई इस टिप्पणी के बाद आम आदमी पार्टी और उसके संयोजक अरविंद केजरीवाल से विश्वास को पार्टी से निकालने की मांग की है, नहीं तो राजस्थान चुनाव में आप को धूल चटा देने को कहा है. देखना होगा कि केजरीवाल इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर क्या कार्रवाई करते हैं.

कुमार विश्वास और ब्राह्मणवादी धर्म की असलियत

हाल ही में कुमार विश्वास ने डॉ. अम्बेडकर पर जो टिप्पणी की है उसके मद्देनजर कुछ बातें समझनी और समझानी जरुरी हैं. एक सुशिक्षित व्यक्ति द्वारा अम्बेडकर पर जातिवाद के बीज बोने का आरोप लगाना और उसकी अगली ही सांस में अपने खुद के घर में पलते आये जातिवाद और सामंतवाद को बड़े अजीब तरीके से एक अच्छा उदाहरण बनाकर पेश करना एक विचित्र बात है. वे मात्र डेढ़ मिनट के अंदर अम्बेडकर पर जातिवादी होने का आरोप लगा देते हैं और अपनी दादी से साथ दहेज़ में गुलाम की तरह आई एक दलित सफाईकर्मी महिला का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि किस तरह वह महिला हमारी मां और चाची को ठीक से घूँघट न काढ़ने पर गालियां दिया करती थीं और उस गाली के भय से ब्राह्मणी परिवार की ये महिलायें उनसे घबराती थीं.

कुमार विश्वास कहते हैं कि आजकल यह बदल गया है. गांव पहले जैसे नहीं रहे हैं. कोई नेता आरक्षण और जातिवाद की राजनीति करने आया और कुमार विश्वास के गांव और परिवार में जो ‘आदर्श स्थिति’ बनी हुई थी उसे भंग करके चला गया. ये व्यक्ति या नेता कौन है जिसने कुमार विश्वास के राम-राज्य को नष्ट कर दिया? वे स्वयं इसका उत्तर देते हैं- कहते हैं “एक व्यक्ति आया जिसने आरक्षण की जातिवाद की राजनीति शुरू की” निश्चित ही ये आदमी डॉ. अम्बेडकर हैं. अब सवाल ये उठता है कि क्या कवि कुमार विश्वास किसी भूल चूक में ऐसा वक्तव्य दे रहे हैं? या वे बीजेपी आरएसएस स्टाइल ध्रुवीकरण की राजनीति कर रहे हैं? या क्या वे सच में अपनी नैतिकताबोध और सभ्यताबोध का परिचय दे रहे हैं? इन तीनों संभावनाओं को समझिये, वे किसी भूल चूक में वक्तव्य नहीं दे रहे हैं. ये कोई स्टिंग ओपरेशन की सीडी नहीं है बल्कि वे सार्वजनिक रूप से एक जिम्मेदार मंच से और सोच समझकर बोल रहे हैं. दूसरी संभावना ये है कि क्या वे ध्रुवीकरण की राजनीति कर रहे हैं? कुमार संभवतया आम आदमी पार्टी की तरफ से दलित और हिन्दू ध्रुवीकरण की राजनीति नहीं कर सकते.

ठीक से देखें तो अभी के हालात में कोई भी पार्टी दलित-हिन्दू ध्रुवीकरण करके जीत नहीं सकती क्योंकि राजनीतिक रूप से सफलता तय करने की स्थिति में अभी भी हिन्दू मुस्लिम ध्रुवीकरण ही जरुरी बना हुआ है, अभी इसी गाय में इतना दूध बचा हुआ है कि इससे अगले कई चुनाव जीते जा सकेंगे, इसलिए इस मुद्दे को छोड़कर कोई नये ध्रुवीकरण की कल्पना केजरीवाल या कुमार विश्वास नहीं कर सकते. दलित –हिन्दू ध्रुवीकरण को चुनावी राजनीति की सफलता की रणनीति बनाना अभी कम से कम आम आदमी पार्टी के लिए असंभव है.

तीसरी संभावना को देखिये, क्या वे इमानदारी से अपने सभ्यताबोध और नैतिकताबोध का परिचय दे रहे हैं? मेरा मानना है कि यही बात सच है. वे एक बहुत गहरी ब्राह्मणवादी मानसिकता को सहज ही उजागर कर रहे हैं. उनके मन में कभी ये बात नहीं उठती कि कोई स्त्री किसी दुसरी स्त्री के साथ आजीवन गुलाम की तरह दहेज़ में कैसे दी या ली जा सकती है? फिर वे ये भी नहीं सोच पाते कि उस महिला को आजीवन सफाई का काम ही क्यों करना है? आगे वे ये भी नहीं सोच पा रहे कि अपने ही ब्राह्मण परिवार की स्त्रियों को घुंघट क्यों करना है? आगे वे ये भी नहीं सोच पा रहे हैं कि उस ‘गुलाम’ दलित महिला को किस स्त्रोत से इतना साहस मिल जाता है कि वह एक ब्राह्मण स्त्री को घुंघट न कर पाने की स्थिति में उसी के पति के सामने चुनौती दे दे?

इन बिन्दुओं को ध्यान से समझिये. ये असल में भारत में फैले ब्राह्मणवाद और उसके गर्भ से निकले बर्बर धर्म के जहर का असली स्वरुप है जिसने इस मुल्क को गुलाम अन्धविश्वासी और असभ्य बनाये रखा है. इन बिन्दुओं में प्रवेश करते हुए आप एक विशेष तरह की नैतिकता, न्याय और सभ्यता को देख पायेंगे जो आपको सिर्फ भारत के ब्राह्मणवादियों के घर में ही मिलेगी.

राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद का पर्चा भरा, बधाईयों का तांता लगा

नई दिल्ली। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी पार्टी के अगले राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने की तैयारी में हैं. आज सोमवार को राहुल गांधी ने कांग्रेस मुख्यालय जाकर अध्यक्ष पद का नामांकन भर दिया. इसके बाद उनका पार्टी का अध्यक्ष बनने का रास्ता करीब-करीब पूरी तरह साफ हो चुका है. राहुल के नामांकन दाखिले के दौरान उनके साथ सोनिया गांधी तथा पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सहित कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे. आज नामांकन की आखिरी तारीख थी. नामांकन के बाद कांग्रेस के तमाम दिग्गज नेताओं ने राहुल गांधी को बधाई दी है.

पांच तारीख को नामांकन पत्रों की जांच होगी. 11 तारीख को नाम वापिस लेने की आखिरी तारीख है और उसी दिन नाम का औपचारिक ऐलान कर दिया जाएगा. हालांकि राहुल गांधी का निर्विरोध चुना जाना तय है. राहुल अपनी मां सोनिया गांधी के उत्तराधिकारी होंगे जो इस पद पर 19 साल से इस पद पर हैं. सूचना है कि राहुल गांधी नामांकन पत्र के चार सेट दाखिल करेंगे. वरिष्ठ पार्टी नेता सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह, गुलाम नबी आजाद, एके एंटनी और अहमद पटेल तथा पार्टी के मुख्यमंत्री प्रस्तावक के रूप में पत्रों पर हस्ताक्षर करेंगे. इस मौके पर देश के पूर्व पीएम डॉक्टर मनमोहन सिंह ने कहा कि राहुल गांधी कांग्रेस के डार्लिग हैं और वह पार्टी की महान परंपरा को आगे बढ़ाएंगे.

विराट कोहली ने फिर मारा 200

भारतीय टीम के कप्तान विराट कोहली ने फिर से दोहरा शतक जमाया है. कोहली ने अपने होम ग्राउंड दिल्ली के फिरोजशाह कोटला के मैदान पर अपने करियर का 6वां दोहरा शतक बनाया. खास बात यह है कि अपने छह के छह दोहरे शतक कोहली ने बतौर कप्तान लगाए हैं. इसके साथ ही कोहली वेस्टइंडीज के पूर्व कप्तान और महान खिलाड़ी ब्रायन लारा से आगे निकल गए हैं. लारा ने बतौर कप्तान पांच दोहरा शतक लगाया था.

कोहली ने दूसरे दिन 156 रन से आगे खेलना शुरू किया और कुछ ही देर में अपनी छठी टेस्ट डबल सेंचुरी भी पूरी कर ली. इससे पहले नागपुर में खेले गए दूसरे टेस्ट मैच में विराट कोहली ने 5वां दोहरा शतक लगाया था. दिल्ली में भारत औऱ श्रीलंका के बीच टेस्ट मैच हो रहा है, जिसमें कोहली ने यह शानदार खेल दिखाया है.

कश्मीर के लिए चुनाव लड़ेगा यह आतंकवादी

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लाहौर। मुंबई आतंकवादी हमले के मास्टरमाइंड हाफिज सईद ने चुनाव लड़ने की घोषणा की है. शनिवार को इस बात की पुष्टि करते हुए उसने कहा कि उसकी पार्टी जमात उद दावा साल 2018 में पाकिस्तान में होने वाले आम चुनाव में मिल्ली मुस्लिम लीग के बैनर तले भाग लेगी. बकौल सईद, “मिल्ली मुस्लिम लीग अगले वर्ष आम चुनाव में उतरने की योजना बना रही है. मैं भी 2018 को उन कश्मीरियों के नाम करता हूं जो स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे हैं. सईद ने कहा, ‘मैं भारत को बताना चाहता हूं कि मैं कश्मीरियों को समर्थन देना जारी रखूंगा. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वहां क्या मुसीबतें हैं.” गौरतलब है कि इस साल जनवरी से नजरबंद रहे सईद को पाकिस्तान सरकार द्वारा किसी अन्य मामले में आगे और हिरासत में न रखने का फैसला करने के बाद 24 नवंबर को रिहा कर दिया गया था.

दलित साहित्य के लिए बड़ी खबर, ऑक्सफोर्ड ने छापी एक दलित साहित्यकार की जीवनी

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 नई दिल्ली। दलित साहित्य के लिए एक बड़ी खबर है. दुनिया के बड़े पब्लिकेशन हाउस ऑक्सफोर्ड प्रेस ने दलित साहित्यकार श्योराज सिंह बेचैन की आत्मकथा “मेरा बचपन मेरे कंधे पर” का अंग्रेजी संस्करण प्रकाशित किया है. ऑक्सफोर्ड ने यह किताब ‘My Childhood on my Shoulders’ शीर्षक से प्रकाशित किया है. अंग्रेजी संस्करण का विमोचन बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर के 61वें परिनिर्वाण दिवस पर होगा, जिसके बाद यह पाठकों के लिए उपलब्ध होगी. श्योराज सिंह बेचैन दलित साहित्य और हिन्दी साहित्य का एक बड़ा नाम हैं. दलित दस्तक से बात करते हुए श्योराज सिंह ने इसे पूरे दलित साहित्य के लिए बड़ी उपलब्धि बताया. उन्होंने कहा कि इससे हमारी आगामी पीढ़ी को भी प्रेरणा मिलेगी कि जब इतनी गरीबी से उठकर मैं दिल्ली विश्वविद्यालय का प्रोफेसर बन सकता हूं तो वो भी बहुत कुछ कर सकते हैं.

वीडियो देखें

यह पहली बार है जब किसी दलित साहित्यकार की जीवनी ऑक्सफोर्ड जैसे दुनिया के बड़े प्रकाशन से प्रकाशित हो रही है. 278 पन्नों की इस किताब का अंग्रेजी अनुवाद दीपा जफर और तपन बासु ने किया है. इस किताब का हिन्दी में प्रकाशन सन् 2009 में वाणी प्रकाशन ने किया था. तब से इसके चार संस्करण आ चुके हैं. यह आत्मकथा देश के तकरीबन दर्जन भर  विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती है तो देश के बाहर 17 विश्वविद्यालयों ने अपने सिलेबस में रखा है. दलित साहित्य के क्षेत्र में इसका एक बड़ा योगदान है. जाहिर है कि बाबासाहेब के परिनिर्वाण के दिन श्योराज सिंह बेचैन की इस आत्मकथा का ऑक्सफोर्ड जैसे नामी-गिरामी पब्लिकेशन से अंग्रेजी संस्करण आना दलित साहित्य के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा.