दलितों के लिए भारत भ्रमण पर निकला गौतम बुद्ध

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अहमदाबाद। दलितों पर अत्याचार से एक शख्स इतना व्यथित हुआ कि वह देश के भ्रमण पर निकल गया. इस भ्रमण का उद्देश्य दलितों की स्थिति को सरकार के सामने लाना है. इस शख्स का नाम है गौतम बुद्ध. 11 जुलाई 2016 को उना में हुई घटना ने गौतम बुद्ध के दिलो दिमाग को इतना झकझोर दिया कि वो साइकिल लेकर निकल पड़े.

एबीपी न्यूज के मुताबिक गौतम का कहना है कि मैं भाजपा सरकार को दिखाना चाहता हूं कि देश के किस राज्य में दलितों की क्या स्थिति है. वे कहते हैं सबका साथ-सबका विकास लेकिन स्थिति क्या है, ये दिखाना मेरा मकसद है. गौतम का कहना है “उना में जो हुआ उसका वीडियो दुनियाभर में वायरल हुआ था. जैसा उस दिन मेरे समाज के लोगों के साथ हुआ, वैसा फिर ना हो बस यही चाहता हूं मैं.” 30 साल के गौतम अभी तक 32 जिले घूम चुके हैं. गौतम बुद्ध जिस मिशन को लेकर निकले हैं, उसे सरकार तक पहुंचाने में कितना सफल हो पाते हैं.

बड़े मुस्लिम नेता के बेटे के खिलाफ मायावती का कड़ा एक्शन

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mayawatiलखनऊ। बसपा प्रमुख मायावती एक कड़ी प्रशासक के रूप में विख्यात रही हैं. उत्तर प्रदेश में आज भी हर समाज के लोग इस बात को मानते हैं कि प्रदेश की सत्ता पर जब भी मायावती बैठीं हो तो वो चैन की नींद सो सकते हैं. सरकार हो या फिर पार्टी मायावती कहीं भी अनुशासनहीनता बर्दास्त नहीं करती हैं. यह एक बार फिर से साबित हो गया है. मायावती ने पार्टी के प्रमुख मुस्लिम नेता और राज्यसभा सांसद मुनकाद अली के बेटे को पार्टी से निष्कासित कर दिया है. उस पर गुंडागर्दी का आरोप है.

असल में मुनकाद अली के बेटे सलमान खान पर आरोप है कि उसने मेरठ में एक दलित शख्स की दुकान में तोड़-फोड़ किया. घटना के बाद मायावती ने पार्टी के कद्दावर नेता के पक्ष में खड़े होने की बजाय गरीब दलित को इंसाफ देना ज्यादा जरूरी समझा. और सलमान खान को पार्टी से निष्कासित कर दिया. मायावती का यह फैसला इसलिए भी चौंकाता है कि मायावती ने पार्टी के एक बड़े मुस्लिम चेहरे के परिवार के खिलाफ यह कार्रवाई की है.

मुनकाद अली वर्तमान में लखनऊ, वाराणसी और मिर्जापुर में पार्टी के क्षेत्रीय प्रभारी हैं. वहीं खान की पत्नी हाल के दिनों में बसपा के टिकट पर किठौर नगर पंचायत की अध्यक्ष पद का चुनाव जीती हैं. हालांकि सांसद अली ने बेटे पर लगे आरोपों को निराधार बताकर इसे विरोधियों की साजिश बताया है.

उन्होंने कहा- “मैं पार्टी का निर्णय स्वीकार करता हूं. मैं बीएसपी के लिए कार्य करता रहूंगा और उन सभी जिम्मेदारियों को निभाता रहूंगा जो बहनजी (मायावती) मुझे सौपेंगी.

दूसरी तरफ मायावती ने सलमान को पार्टी से निकाले जाने पर कहा है कि उन्होंने कानून तोड़ा है. पहले भी वो ऐसा करते रहे हैं. अगर पार्टी का अन्य कार्यकर्ता कानून अपने हाथ में लेता है तो उसके खिलाफ भी ऐसी ही कार्यवाई की जाएगी. इस कार्रवाई के साथ मायावती ने यह साफ संदेश दे दिया है कि वह पार्टी में अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं करेंगी.

गुजरात चुनावः चुनाव आयोग ने कतरा भाजपा का पर

नई दिल्ली। गुजरात विधानसभा चुनाव भाजपा एवं खासकर मोदी और अमित शाह की जोड़ी के लिए अब तक की सबसे बड़ी परीक्षा है. दोनों गुजरात में ताबरतोड़ रैलियां कर रहे हैं. मुकाबला कितना कड़ा है, यह इसी बात से समझा जा सकता है कि अमित शाह और मोदी को एक-एक सीट पर मेहनत करनी पर रही है. इधर चुनाव आयोग ने भी इन दोनों की मुसीबत बढ़ा दी है.

चुनाव आयोग ने एक बड़ा आदेश देते हुए चुनाव प्रचार के दौरान जीएसटी के प्रचार-प्रसार पर रोक लगा दी है. आयोग ने कहा है कि 178 वस्तुओं पर लगने वाले कर में कटौती के फैसले का प्रचार-प्रसार न किया जाए, क्योंकि इससे वोटर प्रभावित हो सकते हैं. आयोग का यह फैसला भाजपा के लिए बड़ा झटका है, क्योंकि बीजेपी अपने इस फैसले को चुनाव में भुनाने में लगी हुई थी.

गुजरात चुनाव में नोटबंदी और जीएसटी बड़ा मुद्दा हैं. राहुल गांधी भी हर चुनावी रैली में इन दोनों मुद्दों को लेकर केंद्र सरकार और पीएम मोदी पर निशाना साधते हैं. गुजरात के व्यापारियों ने भी जीएसटी का काफी विरोध किया था. व्यपारियों के विरोध से भाजपा में तब खलबली मच गई, जब उन्होंने कमल का फूल हमारी भूल लिखी रसीद ग्राहकों को देना शुरू कर दिया. इसी विरोध को दबाने के लिए भाजपा ने गुजरात चुनाव से ठीक पहले जीएसटी के टैक्स में कटौती की थी और इसी के भरोसे वह गुजरात चुनाव फतह करना चाहती थी. लेकिन आयोग के फैसले ने भाजपा को झटका तो दे ही दिया है.

पीएम ने किया डॉ. अम्बेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र का उद्घाटन, वी.पी. सिंह को भूले

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जनपथ रोड स्थित डॉ. अम्बेडकर इंटरनेशनल सेंटर

नई दिल्ली। दिल्ली  के लुटियन जोन में डॉ. अम्बेडकर फाउंडेशन की जगह अब डॉ. अम्बेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र (DAIC) बन चुका है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बाबासाहेब के परिनिर्वाण दिवस के ठीक एक दिन बाद आज इसका उद्घाटन कर दिया. एक शानदार कार्यक्रम में सरकार के तमाम मंत्रियों, अधिकारियों और भाजपा कार्यकर्ताओं की मौजूदगी में इस केंद्र का उद्घाटन हुआ. इस केंद्र का शिलान्यास पीएम मोदी ने ही 20 अप्रैल 2015 को किया था.

इस केंद्र की परिकल्पना तत्कालिन प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह के नेतृत्व में बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर के शताब्दी जयंती वर्ष के समय 1991 में की गई थी. तब सामाजिक न्याय के एजेंडे को लेकर चलने वाले रामविलास पासवान और शरद यादव जैसे नेताओं ने भी इस केंद्र की बुनियाद रखने की दिशा में सरकार पर काफी दबाव बनाया था. वी.पी. सिंह की सरकार ने ही इस केंद्र के लिए जमीन भी दी गई थी. तब से ज्यादातर वक्त सत्ता में रही कांग्रेस और भाजपा की पूर्ववर्ती सरकारों ने इसकी कोई सुध नहीं ली थी.

मौजूदा केंद्र सरकार ने अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर को बनाने के लिए जनवरी 2018 तक का समय लिया था लेकिन उससे पहले ही यह विशालकाय हैरीटेज तैयार हो चुका है. 3.25 एकड़ में फैले इस सेंटर को बनाने में तकरीबन ढाई साल लगे और इस पर 191 करोड़ की लागत आई है. दिल्ली के जनपथ रोड पर बने इस सेंटर में एक लाईब्रेरी 3 मीटिंग्स हॉल और एग्जिबिशन हॉल भी है. जबकि इस सेंटर में एक साथ करीब 5 हजार लोग बैठ सकते हैं.

राजनीति में जैसा होता है, भाजपा ने पार्टी के अनुसूचित जाति मोर्चा से जुड़े तमाम पदाधिकारियों को दिल्ली बुला लिया था, ताकि वो अपने क्षेत्र में जाकर लोगों को बता सकें कि मोदीजी ने बाबासाहेब के नाम पर क्या किया है.

कार्यक्रम में मौजूद अन्य लोग भी भारत सरकार के इस कदम से खुश थे. उनके लिए इतना ही काफी है कि लुटियन जोन जैसे महत्वपूर्ण जगह पर बाबासाहेब के नाम पर एक शानदार इमारत खड़ी है, जिसमें डॉ. अम्बेडकर और बुद्ध की प्रतिमा है. लेकिन कार्यक्रम में मौजूद कुछ लोगों को इस शानदार केंद्र में कुछ खटक भी गया. कुछ लोगों ने इस केंद्र में लगी बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर और बुद्ध की प्रतिमा को लेकर सवाल उठाया. उनका कहना था कि बाबासाहेब और तथागत बुद्ध की जो प्रतिमाएं लगाई गई है वह और बेहतर हो सकती थी. बसपा की सरकार में जो प्रतिमाएं लगी थीं वो शानदार थी, लेकिन यहां लगी प्रतिमाएं प्रभाव नहीं छोड़ती हैं.

प्रधानमंत्री मोदी ने इस दौरान बाबासाहेब के जीवन के बारे में बात करने की बजाय सरकार की उपलब्धियां ज्यादा गिनवाई. एक जो और बात खटकने वाली थी, वह यह थी कि पूरे कार्यक्रम के दौरान कहीं भी वी.पी सिंह का नाम नहीं लिया गया.

चुनाव हारने से बौखलाए भाजपा नेता ने दलित एसडीएम के साथ की मारपीट

बरेली। चुनाव हारने पर एक भाजपा नेता इतना बौखला गया कि उसने काउंटिंग करवा रहे उप जिलाधिकारी के साथ न सिर्फ गाली गलौच की बल्कि हाथापाई भी की. घटना के बाद जिले के सभी अधिकारी एकजुट हो गए हैं और उन्होंने भाजपा अध्यक्ष के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. अधिकारियों के एसोसिएशन ने मुख्यमंत्री से जिलाध्यक्ष के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है. मामला बरेली का है और घटना एक दिसंबर की है. नवाबगंज के उप जिलाधिकारी एवं निर्वाचन पदाधिकारी राजेश कुमार बरेली में निकाय चुनाव की काउंटिंग करवा रहे थे. इस चुनाव में भाजपा जिलाध्यक्ष रविन्द्र सिंह राठौर के भाई नरेन्द्र सिंह राठौर की पत्नी प्रेमलता राठौर चुनाव लड़ रही थी. नतीजा आने पर प्रेमलता राठौर शहला ताहिर से चुनाव हार गई. हार की सूचना मिलते ही भाजपा जिलाध्यक्ष अपने समर्थकों के साथ जबरन मतगणना केंद्र में पहुंच गया और प्रेमलता राठौर के पक्ष में परिणाम घोषित करने का दबाव बनाने लगा. निर्वाचन अधिकारी राजेश कुमार के मना करने पर वह उनसे गाली गलौच और मारपीट करने लगा. हालांकि वहां मौजूद पुलिसकर्मियों ने उन्हें बचा कर बाहर निकाला.

घटना के बाद उत्तर प्रदेश राज्य सिविल सेवा संघ ने इस मामले में मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर कार्रवाई की मांग की है. लेकिन घटना के तकरीबन एक हफ्ते बाद भी मुख्यमंत्री या प्रमुख सचिव की ओर से अभी तक जिलाध्यक्ष पर कोई कार्रवाई नहीं की गई है न ही कार्रवाई का आदेश आया है. ऐसे में जहां बरेली का प्रशासन दोनों भाईयों के आतंक से डरा हुआ है तो वहीं जिलाध्यक्ष सरकार का आदमी बनकर खुला घूम रहा है.

मामले का एक पहलू यह भी है कि उपजिलाधिकारी राजेश कुमार दलित समाज से ताल्लुक रखते हैं. लोगों का कहना है कि आरोपी यह कहते हुए भी घूम रहे हैं कि देखें एक दलित हमारा क्या बिगाड़ लेता है. फिलहाल बरेली के सारे अधिकारी काली पट्टी बांध कर काम कर रहे हैं. अधिकारियों के एसोसिएशन ने मुख्यमंत्री से मिलने का समय मांगा है लेकिन सीएम ऑफिस का कहना है कि मुख्यमंत्री व्यस्त हैं.

यहां एक अहम सवाल यह भी है कि जिस राज्य में सत्ताधारी पार्टी के एक अदने से जिलाध्यक्ष से जिले का पूरा प्रशासनिक अमला खौफ में है, उस राज्य में कानून की हालत क्या होगी? जिस राज्य में प्रशासनिक अधिकारी तक को न्याय नसीब नहीं है, वहां आम व्यक्ति के प्रति सरकार का रवैया क्या होगा?

उत्तराखंडः टिहरी में सवर्ण जाति के डर से दलितों ने छोड़ा गांव

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टिहरी। उत्तराखंड के टिहरी जिले में एक दूरस्थ गांव गंगी में दो गुटों के बीच हुए संघर्ष के बाद सहमें दलितों ने अपना घर छोड़ दिया है. असल में इस संघर्ष के बाद एक दलित युवक गायब हो गया; जिससे घबराकर 30 दलितों ने घर छोड़ दिया और ब्लॉक मुख्यालय में शरण ले ली.

गंगी गांव में सवर्णों का वर्चस्व है और दलितों की संख्या कम है. पीड़ित पक्ष के लोगों का कहना है कि वह शादी समारोह में ढोल बजाने गया था. जिसके बाद वह वापस लौट आया. लौटने के बाद फिर उसे दुबारा बुलाया गया, जिस पर उसने जाने से इंकार कर दिया. तो वहीं दूसरे पक्ष का कहना है कि ढोल बजाने की बात पहले से तय थी लेकिन राकेश जिसे ढोल बजाना था, वो ऐन वक्त पर नहीं आया. साथ ही उसे बुलाने गई महिला से अभद्रता की.

मामला शांत हो गया होता लेकिन दिक्कत तब हो गई जब राकेश अचानक गायब हो गया. इसके बाद दलित दहशत में हैं. घटना के बाद दोनों पक्षों ने बारी-बारी से मामला दर्ज करवाया है. दूसरी ओर पुलिस का कहना है कि अपनी जान को खतरा बताते हुए दलितों ने भिलंगना ब्लॉक मुख्यालय में शरण ले रखी है. ये लोग संघर्ष के बाद गायब हुए युवक की तलाश और आरोपियों के पकड़े जाने तक गांव वापस लौटने को तैयार नहीं हैं.

गुजरात की पिच पर जिग्नेश की ‘जमात’ की पारी

जिग्नेश के रहने का अंदाज और पहनावा उन्हें मुख्यधारा के नेताओं से अलग करता है. उनकी जिंदगी के दूसरे पहलू भी उन्हें बाकी नेताओं से जुदा करते हैं. और सबसे हटकर उनमें जो बात दिख रही है वह है उनकी जाति से हटकर ‘जमात’ की राजनीति. उनकी शख्सियत उन्हें स्वाभाविक तौर पर इसी राजनीति से जोड़ रही है.

यह सच है कि गुजरात में दलितों की आबादी कोई 7 प्रतिशत है. यह करीब उतनी ही है जितने वोट प्रतिशत के अंतर से पिछली बार भाजपा ने कांग्रेस को हराया था. दलितों से थोड़ी ज्यादा आबादी मुसलमानों की है करीब 9 प्रतिशत. और इन दोनों को मिलाकर इनसे लगभग दोगुनी आबादी आदिवासियों की है करीब 15 प्रतिशत. ये तबके कभी एक थे, क्यों थे और कैसे बिखरे यह एक अलग कहानी है, लेकिन इस तथ्य में उनकी प्रबल संभावना छिपी हुई है कि वे 30 प्रतिशत से ज्यादा की ‘जमात’ में हैं, जो अब तक भी न संगठित है और न आक्रमक, लेकिन यह भी नई बात है कि वंचित-सामाजिक वर्ग की बेचैनी इस बार चुनाव के केंद्र में दिख रही है. और यही बेचैनी जिग्नेश की हर स्पीच और बड़े स्टेटमेंट में उनसे कनेक्ट कर रही है. और इसी बेचैनी ने ‘जमात’ की राजनीति में एक संभावना पैदा की है. इसमें कम-से-कम इस सवाल पर तो सोचा ही जा सकता है कि वोट-बैंक की राजनीति में भी ‘बहुसंख्यक’ का मतलब बदला जा सकता है?

जिग्नेश को किसी वर्ग का चेहरा बताना हो सकता है कि फिलहाल जल्दबाजी हो, लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि उनकी अगुवाई में सामाजिक आंदोलन के प्रतीकों को राजनीति में भी पैर पसारने की जगह मिली है. इसमें एक आत्म-विश्वास तो है ही, यह महत्वकांक्षा भी है कि उनकी जाति या ‘जमात’ से कोई सोशल या पोलिटिकल लीडर भी हो सकता है. एक अच्छा युवा कम्न्यूकेटर, जो उनके पक्ष में हर मंच पर हिंदी, गुजराती और अंग्रेजी धारा-प्रवाह बोल सकता है.

इस संभावना में एक नई बात भी दिख रही है कि यह चुनावी सफलता-असफलता से आगे जा सकती है और इसे असली चुनौती भी वहीं मिलेगी, जहां ‘जमात’ की राजनीति को कांग्रेस और भाजपा से अलग पहचान दिलाने की कवायत होगी. किसी पार्टी की पहचान में छिप जाना इस संभावना का अंत होगा. इनसे अलग विकल्प खड़ा करना एक और संभावना होगी. जितना मैं समझ पा रहा हूं तो शायद भी इसी लाइन पर इससे बहुत आगे समझ रहे हैं. इसलिए जिग्नेश का निर्दलीय खड़ा होना उनकी भविष्य की राजनीति की ओर संकेत दे रहा है.

इसलिए गुजरात की मौजूदा राजनीति में सम्भावना यह भी है कि चुनाव परिणाम मात्र छोटा-सा इंटरवल साबित हो और मुकाबले का अगला दौर इस परिणाम के एक अंतराल बाद जल्द शुरू हो. चुनावी राजनीति में कोई एक दल जीतता है. लेकिन, गुजरात की राजनीति में इस बार नया यह है कि यह चुनावी हार-जीत से आगे ‘जाति’ दिख रही है. यहां पिछले कुछ चुनावों में भाजपा का सामना कांग्रेस जैस दल से होता रहा है, जिसे हराकर शांति से बैठा जा सकता था. लेकिन, इस बार दलीय स्थिति से उलट सामाजिक-जातीय आन्दोलनों ने उसे असली टक्कर दी है.

चुनावी राजनीति में कोई एक दल जीतता है. लेकिन, गुजरात की राजनीति में इस बार नया यह है कि यह चुनावी हार-जीत से आगे ‘जाति’ दिख रही है. यहां पिछले कुछ चुनावों में भाजपा का सामना कांग्रेस जैस दल से होता रहा है, जिसे हराकर शांति से बैठा जा सकता था. लेकिन, इस बार दलीय स्थिति से उलट सामाजिक-जातीय आन्दोलनों ने उसे असली टक्कर दी है. इसलिए गुजरात की मौजूदा राजनीति में सम्भावना यह भी है कि चुनाव परिणाम मात्र छोटा-सा इंटरवल साबित हो और मुकाबले का अगला दौर इस परिणाम के एक अंतराल बाद जल्द शुरू हो.

किसी भी स्थिति में आरएसएस के लिए यह चिंता का सबब है. वजह है कि लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद आरएसएस-भाजपा संगठन अपनी ही प्रयोगशाला में सामाजिक-जातीय उथल-पुथल नहीं रोक पाया है. आगे की स्थिति का आंकलन करें तो भले ही गुजरात की राजनीति साम्प्रदायिकता पर आधारित है, फिर भी आरएसएस-भाजपा की दिक्कत यह है कि पूरा समाज आज भी जातियों में बंटा है जो उनकी मांगों को लेकर पहले से थोड़ा संगठित और बहुत ज्यादा आक्रामक होता जा रहा है.

आरएसएस-भाजपा अब तक विशेष तौर पर एसटी, एसटी और ओबीसी जातियों को मुसलमानों (9 फीसदी) के खिलाफ खड़ा करने में कामयाब होता रहा है. लेकिन, आर्थिक कमजोरी और बेकारी के कारण इन जातियों का अंतर्विरोध सड़कों पर देखा गया है और आने वाले समय में यह और ज्यादा मुखर हो सकता है. इसलिए ये सामाजिक-जातीय आंदोलन यदि संगठित न भी हुए और एक-एक जाति कई-कई गुटों में बंट भी गई तो भी हिन्दुत्त्व के नाम पर पूरी की पूरी निचली ‘जमातों’ को एकजुट रख पाने में आरएसएस-भाजपा को माइक्रो लेबल पर जूझना पड़ेगा. दूसरी तरफ, इन जातीय (गुट) आंदोलनों के बीच यदि कोर इशू पर समन्वय की राजनीति (जैसी कि कोशिश शुरू हो चुकी है) बनती है तो आरएसएस-भाजपा को गुजरात के अंदर-बाहर लंबी लड़ाई लड़नी पड़ेगी.

  • यह आलेख शिरीष खरे ने लिखा है। यह लेखक का निजी विचार है।

ये है अम्बेडकर इंटरनेशनल सेंटर, उद्घाटन आज

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नई दिल्ली। 6 दिसंबर को भारत रत्न और संविधान के निर्माता बाबासाहेब डा. भीमराव अम्बेडर का परिनिर्वाण दिवस देशभर में मनाया गया. इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को बाबासाहेब भीम राव अंबेडकर को श्रद्धांजलि अर्पित की. साथ ही राजधानी दिल्ली में तैयार अम्बेडकर इंटरनेशनल सेंटर की पहली तस्वीर भी साझा की.

पीएम मोदी ने 20 अप्रैल 2015 को अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर का शिलान्यास किया था. अब यह सेंटर पूरी तरह से तैयार हो चुका है. आज इस सेंटर का इनोग्रेशन किया जाएगा. केंद्र सरकार ने अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर को बनाने के लिए जनवरी 2018 तक का समय लिया था लेकिन उससे पहले ही यह विशालकाय हैरीटेज तैयार हो गई. इस खूबसूरत सेंटर को बनाने में 31 माह और 17 दिन का समय लगा है और इसकी लागत 191 करोड़ है. 3.25 एकड़ में फैला यह सेंटर राजधानी दिल्ली के जनपथ एरिया में बनाया गया है, जिसमें एक लाईब्रेरी 3 मीटिंग्स हॉल और एग्जिबिशन हॉल भी है. इस सेंटर में करीब 5 हजार लोगों के बैठने की व्यवस्था है. इस सेंटर में करीब 5 हजार लोगों के बैठने की व्यवस्था है.

बिहार कर्मचारी चयन आयोग मामले में आरोपियों की जमानत खारिज

पटना। पटना हाई कोर्ट ने बिहार के बहुचर्चित इंटर स्तरीय पदों के लिए ली गयी प्रतियोगिता परीक्षा का पर्चा लीक मामले में बिहार कर्मचारी चयन आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष सुधीर कुमार सहित चौदह अभियुक्तों को किसी भी प्रकार की राहत देने से साफ इंकार कर दिया है. इसके साथ ही उच्च न्यायालय ने नियमित जमानत याचिका को खारिज कर दिया. जस्टिस प्रभात कुमार झा की एकलपीठ ने आरोपियों की ओर से दायर नियमित जमानत याचिका पर एक साथ सुनवाई करने के बाद बुधवार को सुनाये गये फैसले में यह निर्देश दिया.

सुनवाई के क्रम में राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ता अजय मिश्रा ने अदालत को बताया था कि मामले की जांच में कई अहम सबूत मिले हैं. अदालत को बताया गया था कि इस कांड में अभियुक्त बनाये गये आयोग के पूर्व अध्यक्ष सुधीर कुमार, अटल बिहारी राय, अवधेश कुमार, गुड्डू कुमार, अनिश कुमार उर्फ गोलू, अविनाश कुमार, मुकेश कुमार, ओम प्रकाश गुप्ता, अरूण कुमार, नीति रंजन प्रताप, राम सुमेर सिंह, गौरीशंकर साह, मंजु देवी दिनेश कुमार आजाद आदी अभियुक्तों की संलिप्तता उजागर हुई है.

अदालत ने बुधवार को दिये फैसले में कहा कि अभियुक्तों के विरुद्ध प्रथम दृष्टया संलिप्तता का साक्ष्य प्रस्तुत किया गया है ऐसे में जमानत दिया जाना संभव नहीं प्रतीत होता है.

शशि कपूर के बारे में किसने क्या लिख कर किया याद

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शशि कपूर दुनिया से रुख्सत हो चुके हैं. उन्होंने कोकिलाबेन धीरभाई अंबानी अस्पताल में 4 दिसंबर की शाम 5.20 बजे अंतिम सांस ली. वह 79 वर्ष के थे. उनके बाद उनकी देह भी राख हो चुकी है. अब शशि कपूर के नाम पर कुछ है तो वह है सिर्फ उनकी यादें. अपने इन्हीं यादों में सहेज कर रखे गए शशि कपूर को बालीवुड के तमाम सितारों ने याद किया है. आइए देखते हैं, किसने उनके बारे में क्या लिखा है.

लता मंगेशकर, श्याम बेनेगल जैसे फिल्म जगत के उनके दोस्तों, सह-अभिनेताओं और निर्देशकों ने सिनेमा के लिए उनके जुनून को याद किया. फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल ने उन्हें ईश्वर का नेक बंदा बताया. कलयुग और जुनून में अभिनेता के साथ काम कर चुके बेनेगल ने कहा, वह ईश्वर का नेक बंदा और हर चीज से इतर खूबसूरत इंसान थे.

अभिनेता आमिर खान ने भी शशि कपूर को श्रद्धांजलि दी. उन्होंने कहा कि वह ना सिर्फ महान स्टार, जुनूनी निर्माता बल्कि शानदार इंसान भी थे. आमिर ने ट्विटर पर लिखा, उनके कार्य से भारतीय दर्शक हमेशा आनंदित हुए. भारतीय थियेटर में उनका योगदान बहुत बड़ा रहा है. पृथ्वी थियेटर नाटक प्रस्तुत करने वालों और दर्शकों का पसंदीदा स्थान रहा है. उनका निधन हमारे लिए दुखद दिन है.

कई फिल्मों में शशि कपूर के साथ काम कर चुकीं शबाना आजमी ने ट्विटर पर उनकी एक ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर साझा की है. उन्होंने कैप्शन दिया है, हम आपको मिस करेंगे… अभिनेत्री सायरा बानो ने उन्हें एक जीवंत व्यक्ति के रूप में याद किया है. दिग्गज अभिनेत्री मौसमी चटर्जी ने भी उन्हें महान अभिनेता के साथ-साथ हंसमुख व्यक्ति बताया. बॉलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार ने दिवंगत अभिनेता के दीवार के बहुत लोकप्रिय संवाद को याद किया. बकौल कुमार शशि कपूर ने अभिनेता बनने की आकांक्षा रखने वालों को बहुत अधिक प्रेरित किया.

इस वजह से फिर से चर्चा में हैं सुष्मिता सेन

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मुंबई। सुष्मिता सेन एक बार फिर से चर्चा में हैं. इस बार चर्चा की वजह इनकी लव लाइफ है. खबर है कि सेन एक बार फिर से अपने एक्स ब्वा़यफ्रेंड के करीब आ गई हैं. सुष्मिता से उम्र में छोटे इस एक्स ब्वायफ्रेंड का नाम रितिक भसीन है. सुष्मिता इन दिनों रितिक के साथ खूब देखी जा रही हैं.

हाल ही में ये दोनों एक पार्टी में एक-दूसरे के काफी करीब भी दिखे. सूत्रों के मुताबिक, इस पार्टी में सुष्मिता और रितिक एक दूसरे के साथ काफी कंफर्टेबल और क्लोज दिखाई दिए. चौंकाने वाली बात यह है कि कुछ दिनों पहले ही यह खबर फैली थी कि सुष्मिता सेन ने अपने ‘बॉयफ्रेंड’ रितिक भसीन से ब्रेकअप कर लिया है. उन रिपोर्ट्स के मुताबिक, दोनों ने चार साल तक डेट करने के बाद अपने रिश्ते को खत्म कर दिया था. लेकिन अब दोनों का फिर से साथ देखा जाना नई कहानी कह रहा है. रितिक भसीन अभी तक बैचलर हैं. उनके पास कुछ नाइटक्लनब हैं. उन्होंतने मुंबई के जय हिंद कॉलेज से पढ़ाई की.

आखिरी टेस्ट ड्रा, भारत ने सीरीज 1-0 से जीती

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नई दिल्ली। भारत और श्रीलंका के बीच दिल्ली में खेला गया पांच टेस्ट सीरीज का आखिरी मुकाबला ड्रॉ पर खत्म हुआ. इसी के साथ ही टीम इंडिया ने 3 मैचों की यह टेस्ट सीरीज 1-0 से जीत ली है. इसी के साथ टीम इंडिया ने ऑस्ट्रेलिया के लगातार 9 टेस्ट सीरीज जीतने के वर्ल्ड रिकॉर्ड की भी बराबरी कर ली है.

भारत की पहली पारी के 536 रनों के जवाब में श्रीलंका की टीम अपनी पहली पारी में 373 रन बनाकर ऑल आउट हो गई, जिससे भारत को 163 रनों की बढ़त मिल गई. दूसरी पारी में टीम इंडिया ने 246 रन बनाकर पारी घोषित कर दी और श्रीलंका को जीत के लिए 410 रन का लक्ष्य दिया.

410 रनों के लक्ष्य का पीछा करते हुए श्रीलंका की टीम ने 299 रन पर 5 विकेट गंवा दिए थे, लेकिन टीम इंडिया मैच जीतने के लिए बचे हुए 5 विकेट हासिल करने में नाकाम रही और मैच को ड्रॉ घोषित कर दिया गया. दूसरी पारी में श्रीलंका की तरफ से धनंजय डी सिल्वा ने 119 रन बनाए जबकि रोशन सिल्वा ने 74 रनों की पारी खेलकर मैच ड्रॉ करा दिया. पांचवें दिन टीम इंडिया के गेंदबाज 87 ओवरों में सिर्फ दो विकेट ही ले पाए.

दलित युवाओं को रिझाने के लिए मोदी सरकार की नई घोषणा

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नई दिल्ली। अंतरजातीय विवाह यानि की इंटरकॉस्ट मैरेज के संबंध में एक नई खबर आई है. इसके मुताबिक केंद्र सरकार ने इंटरकॉस्ट मैरेज करने वालों को ढाई लाख रुपये देने की घोषणा की है. हालांकि यह नियम पहले भी था लेकिन यह उसी को मिलता था, जिसकी सलाना आमदनी 5 लाख तक हो. जिसकी आमदनी पांच लाख से ज्यादा होती थी, उसे यह फायदा नहीं मिलता था. अपने नए फैसले में सरकार ने 5 लाख अधिकतम की सीमा को समाप्त कर दिया है.

इस नए संसोधऩ के बाद दलित से शादी करने वाले सभी लोगों को इस ‘डॉ. अंबेडकर स्कीम फॉर सोशल इंटीग्रेशन थ्रू इंटरकास्ट मैरिज’ योजना का लाभ मिल सकेगा. लड़का या लड़की में से किसी एक को दलित होना चाहिए. अपने ताजा आदेश में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने इस संबंध में आदेश जारी किया है. मंत्रालय ने यह भी कहा है कि इस योजना के लिए आय के आधार पर कोई सीमा नहीं होनी चाहिए. हालांकि मंत्रालय ने आधार नंबर को अनिवार्य कर दिया है. जोड़े को अब अपना आधार नंबर और उससे जुड़ा बैंक अकाउंट भी देना होगा. साथ ही शादी को हिंदू मैरिज एक्ट के तहत रजिस्टर भी होना चाहिए.

यह योजना साल 2013 में शुरू की गई थी. जिसमें केंद्र सरकार का लक्ष्य हर साल कम से कम 500 अंतर जातीय विवाह करने वाले जोड़े को योजना के तहत पुरस्कृत करने का लक्ष्य रखा गया था.

लेकिन अब सरकार की इस योजना की हकीकत देखिए. शुरू होने के बाद से ही यह योजना बेहतर तरीके से लागू नहीं हो पाई है. सरकार हर साल पांच सौ शादियों का लक्ष्य लेकर चल रही थी लेकिन 2014-15 में सिर्फ 5 जोड़ों को ही इस सरकारी योजना का लाभ मिल पाया. 2015-16 में केवल 72 लोगों को इसका लाभ मिला. 2017 की बात करें तो इस साल केवल 74 जोड़ों को चुना गया है.

अब सवाल उठता है कि क्या सरकार सच में इस योजना के जरिए अंतरजातीय विवाह को प्रोत्साहित करना चाहती है या फिर सिर्फ इसके बहाने दलित युवाओं को रिझाने की कोशिश कर रही है. क्योंकि सरकार को योजना में छूट देने से पहले सच में योग्य जोड़ों को ढूंढ़ कर उन तक योजना का लाभ पहुंचाना चाहिए था.

दिल्ली के लिए फायदेमंद है ओखी तूफान

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cyclone-ockhiनई दिल्ली। ओखी तूफान ने भले ही दक्षिण भारत में हाहाकार मचाया हो, लेकिन दिल्ली वालों के लिए यह फायदेमंद है. ओखी तूफान दिल्ली में फैले धुंध को काट सकता है. दरअसल अमेरिकी एजेंसी नासा की मानें तो गुजरात और महाराष्ट्र में ओखी का असर तो कम होगा, इसके साथ ही नई दिल्ली और उत्तरी भारत में जो धुंध का जाल बना हुआ है वह भी कम होगा.

नासा ने 4 दिसंबर को एक तस्वीर जारी की है, जिसके आधार पर यह बात कही जा रही है. नासा ने तस्वीर के साथ लिखा है कि जो तूफान आ रहा है उसके कारण उत्तरी भारत में मौजूदा धुंध गायब हो सकती है. गौरतलब है कि राजधानी दिल्ली समेत आस-पास के कई इलाकों में पिछले काफी समय से अपने धुंध ने अपने पैर पसारे हुए हैं. पिछले दिनों स्थिति भयंकर होने के बाद एक बार यह छट गया था लेकिन पिछले दो दिनों से यह फिर से देखने में आ रहा है.

यूपी में तलाक-तलाक-तलाक कहने वालों की खैर नहीं

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश में अब ट्रिपल तलाक कहना भारी पर सकता है. प्रदेश सरकार ने केंद्र सरकार के ट्रिपल कानून को मंजूरी दे दी. मंगलवार को कैबिनेट में इस कानून को हरी झंडी दे दी गई. योगी आदित्यनाथ की सरकार ट्रिपल तलाक पर केंद्र के कानून को सहमति देने वाली पहली सरकार है और उसने बिना किसी संशोधन के इस पर सहमति दे दी है.

ट्रिपल तलाक पर कानून बनाने को लेकर मसौदा राज्यों की सहमति के लिए भेजा गया है, जिसके बाद यूपी की योगी सरकार ने इस पर फैसला लिया. योगी सरकार केंद्र सरकार के इस मसौदे से शत प्रतिशत सहमत है, जिसमें एक साथ ट्रिपल तलाक देने वालों को 3 साल की सजा हो सकती है. सुप्रीम कोर्ट पहले ही अगस्त महीने में ट्रिपल तलाक को गैर कानूनी ठहरा चुकी है. इस बीच यह भी खबर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार संसद के शीतकालीन सत्र में तीन तलाक (तत्काल तलाक) पर प्रतिबंध लगाने के लिए विधेयक लाने की योजना बना रही है.

इस बड़े अधिकारी ने दी आंतंकियों को चुनाव लड़ने की सलाह

Courtsy: PTI
नई दिल्ली। पाकिस्तान में हाफिज सईद के चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद अब भारत में भी आतंकियों को चुनाव लड़ने की सलाह दी जा रही है। भारत के थलसेनाध्यक्ष बिपिन रावत ने कहा है कि पाकिस्तान के आंतकी संगठनों की तरह हमारे आतंकी भी चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा लें. वे हिंसा का रास्ता छोड़कर भारतीय संविधान के अंतर्गत अपनी लोकतांत्रिक शक्तियों का प्रयोग करें.

थल सेनाध्यक्ष बिपिन रावत ने यह बात राजस्थान के सूरतगढ़ में भारत-पाकिस्तान सीमा पर सैन्य तैयारियों का जायजा लेते समय कहा. उन्होंने कहा कि हम चाहते हैं कि हमारे यहां जो आतंकी हैं, वो भी चुनाव में हिस्सा लें और हिंसा का रास्ता छोड़ें. इससे पहले बिपिन रावत ने कहा कि भारत अपने यहां से आतंक का सफाया करेगा. इसके लिए हमने कश्मीर में लगातार कई तरह के अभियान चला रखे हैं.

… तो क्या बाबासाहेब से डर गए थे नेहरू

बाबासाहेब अम्बेडकर आज इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन उनको मानने वालों की तादात लगातार बढ़ रही है। लोग लगातार बाबासाहेब के जीवन से जुड़े तमाम महत्वपूर्ण पहलुओं के बारे में जानना चाहते हैं। लेकिन आज भी बाबासाहेब के जीवन से जुड़े तमाम पहलू ऐसे हैं जो अछूते हैं। इस देश की सरकारों ने डॉ. अम्बेडकर के बारे में न तो खुद जानना चाहा और न ही लोगों को बताने की कोशिश की। लेकिन बहुजन समाज अब बाबासाहेब के जीवन से जुड़े तमाम पहलुओं की पड़ताल करने लगा है। इसी में से एक पहलू बाबासाहेब की मृत्यु से जुड़ा हुआ है।

बाबासाहेब की मौत से जुड़ी तमाम बातों पर से अब भी पर्दा हटना बाकी है। इसमें एक बड़ा सवाल यह भी है कि जब डॉ. अम्बेडकर की मौत दिल्ली में उनके 26 अलीपुर रोड स्थित आवास में हुई, तब भी उनका अंतिम संस्कार दिल्ली में न कर के उनके शरीर को दिल्ली से दूर मुंबई भेजा गया। आखिर क्या वजह रही कि तब की सरकार ने ऐसा किया।

तब जवाहरलाल नेहरू भारत के प्रधानमंत्री थे। और जो हुआ, उन्हीं के आदेश से हुआ। जब बाबासाहेब का परिनिर्वाण हो गया तो इसकी सूचना बहुत कम लोगों को दी गई। नेहरू उनमें से एक थे। कहा जाता है कि सूचना मिलते ही प्रधानमंत्री नेहरू 26 अलीपुर रोड पहुंचे थे, और वहां तब तक जमे रहें जब तक डॉ. अम्बेडकर के पार्थिव शरीर को विशेष विमान से मुंबई नहीं भेज दिया गया। जहां दादर में बाबासाहेब का बौद्ध रिति से अंतिम संस्कार हुआ।

सवाल उठता है कि आखिर प्रधानमंत्री नेहरू और तब की भारत सरकार देश के पहले कानून मंत्री और संविधान निर्माता डॉ. अम्बेडकर के अंतिम संस्कार के लिए राजधानी दिल्ली में जमीन देने को तैयार क्यों नहीं हुई?…. असल में प्रधानमंत्री नेहरू डर गए थे। उनके डर की वजह बाबासाहेब का लगातार बढ़ता कारवां था, जिससे लाखों लोग जुड़ चुके थे। दिल्ली में गांधीजी की भी समाधी थी। गांधीजी के बाद दिवंगत होने वाले बड़े नेताओं में बाबासाहेब प्रमुख थे। तब तक गांधीजी और बाबासाहेब एक-दूसरे के विरोधी के तौर पर देखे जाने लगे थे। क्योंकि गांधी जी वर्ण व्यवस्था के समर्थक से जबकि डॉ. अम्बेडकर इसका विध्वंस चाहते थे। नेहरू यह नहीं चाहते थे कि भारतीय राजनीति में कोई भी गांधी जी के सामानांतर या आस-पास भी खड़ा हो पाए…, क्योंकि यह कहीं न कहीं कांग्रेस पार्टी के लिए भी चुनौती होती।

दिल्ली में गांधीजी के अलावा जिन प्रमुख नेताओं की समाधियां हैं उनमें खुद देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, जगजीवन राम और राजीव गांधी की समाधि प्रमुख है। कांग्रेस की सरकार में इनकी पुण्यतिथि पर सरकारी आयोजन होते रहे हैं, जिसमें पार्टी के नेता पहुंचते रहे हैं। लेकिन इसके उलट बाबासाहेब के परिनिर्वाण दिवस के दिन दादर स्थित चैत्यभूमि पर लाखों की संख्या में देश भर से लोग पहुंच कर उन्हें श्रद्धांजली अर्पित करते हैं। यह न किसी सरकार द्वारा प्रायोजित होता है और न ही किसी राजनैतिक दल द्वारा। बहुजन समाज में जैसे-जैसे जागृति बढ़ रही है, डॉ. अम्बेडकर को मानने वाले लोगों की तादात भी बढ़ रही है।

नेहरू को यह पता था कि दिनों दिन डॉ. अम्बेडकर का कारवां बढ़ता जाएगा। दिल्ली सत्ता का केंद्र है और यहां लाखों लोगों की जुटान जाहिर तौर पर यहां की राजनैतिक सत्ता को चुनौती देती है। ऐसे में अगर बाबासाहेब के परिनिर्वाण के बाद उनका अंतिम संस्कार दिल्ली में हुआ होता तो चैत्यभूमि पर जाने वाले जनसैलाब का रुख दिल्ली की ओर होता। सोचिए तब 6 दिसंबर को दिल्ली का मंजर कैसा होता…..

जिग्नेश मेवाणी पर हमला

गुजरात। गुजरात में दलित हित की बात लेकर भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले जिग्नेश मेवाणी पर हमला हुआ है। मेवाणी पर मंगलवार को एक रैली के दौरान तकरवाड़ा गांव में हमला हुआ। जिग्नेश ने इस हमले को भाजपा द्वारा किया गया हमला बताया। ट्विटर पर इस घटना की जानकारी देते हुए मेवाणी ने लिखा कि भाजपा डर गई है, इसलिए ऐसे हमले कर रही है।

हमले को लेकर मेवाणी ने पीएम मोदी और अमित शाह पर निशाना साधा है। उन्होंने अपने ट्विट में हमले का जिक्र करते हुए लिखा कि मैं भी गुजरात का बेटा हूं मोदी जी, दिल को बड़ा रखिए। जो जीत रहा हो उस पर हमला करवाओ, यह आपका आईडिया है या अमित शाह का, क्योंकि यह गुजरात की परंपरा तो नहीं है।

दरअसल, गुजरात विधानसभा की सरगर्मियों के बीच जिग्नेश राज्य में कांग्रेस का समर्थन कर रहे हैं। हाल में उन्होंने बनांसकाठा से चुनाव लड़ने का ऐलान किया था और कांग्रेस भी उनके इस कदम को समर्थन कर रही है। जिग्नेश के अलावा गुजरात की राजनीति में पाटीदार नेता हार्दिक पटेल भी मजबूती से भाजपा को टक्कर दे रहे हैं। ये दोनों युवा नेता ही राज्य में बीजेपी के लिए गले की फांस बने हुए हैं।

गुजरात में कितने कामयाब होंगे जिग्नेश मेवाणी

देश में फिलहाल चारो ओर गुजरात चुनाव की चर्चा है। अखबारों और टेलिविजन में हर दिन गुजरात चुनाव की खबरें दिख रही है। इस बीच 27 नवंबर को जिग्नेश मेवाणी ने चुनाव लड़ने की घोषणा कर के गुजरात चुनाव को नया मोड़ दे दिया है। मेवाणी बनासकांठा जिले के वडगांव सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव मैदान में हैं। यह सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है।

इस सीट पर कांग्रेस के मनीभाई वाघेला विधायक हैं। लेकिन मेवाणी के चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद कांग्रेस ने इस सीट पर अपना प्रत्याशी नहीं उतारने की घोषणा की है और मेवाणी को अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन देने को कहा है। आम आदमी पार्टी भी जिग्नेश मेवाणी के खिलाफ प्रत्याशी नहीं उतार रही है। हालांकि बहुजन समाज पार्टी और भाजपा का उम्मीदवार मेवाणी के खिलाफ चुनाव मैदान में हैं।

मेवाणी के चुनाव मैदान में उतरने के बाद गुजरात में राजनीति गरमा गई है। मेवाणी को घेरने के लिए विपक्षी दलों ने तमाम कोशिश शुरू कर दी है। इसी का नतीजा तब देखने को मिला जब तकरीबन एक साल पुराने मामले में अचानक जिग्नेश मेवाणी के खिलाफ 28 नवंबर को गैर जमानती वारंट जारी कर दिया गया। अहमदाबाद की एक अदालत ने जिग्नेश मेवाणी के खिलाफ यह वारंट जारी किया है। जिस मामले में मेवाणी के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया गया है, वह जनवरी महीने का है।

11 जनवरी को वाइब्रेंट गुजरात शिखर सम्मेलन के खिलाफ एक ‘रेल रोको’ विरोध प्रदर्शन के दौरान अहमदाबाद रेलवे स्टेशन पर राजधानी एक्सप्रेस को काफी देर तक रोकने के आरोप में मेवाणी और उनके समर्थकों को गिरफ्तार किया गया था। जनवरी में एक विरोध प्रदर्शन के दौरान दिल्ली जा रही राजधानी एक्सप्रेस को रोकने को लेकर उनके खिलाफ एक मामला दर्ज था। इस मामले की सुनवाई के लिए पेश नहीं होने को लेकर अदालत ने उनके खिलाफ यह वारंट जारी किया है। उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 143 (गैरकानूनी सभा करने), 147 (दंगा) और भारतीय रेल अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। हालांकि मेवाणी के वकील शमशाद पठान ने अपने मुवक्किल को पेशी से छूट दिये जाने की मांग को लेकर अदालत में आवेदन दिया था। पठान ने इस आधार पर छूट की मांग की थी कि उनका मुवक्किल वडगाम विधानसभा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर नामांकन पत्र भरने में व्यस्त था, हालांकि मजिस्ट्रेट ने इस पर विचार करने से मना कर दिया और वारंट जारी कर दिया।

खैर, अदालतों का अपना काम है और हम उस पर टिप्पणी नहीं कर रहे हैं लेकिन यहां महाराष्ट्र के राज ठाकरे के मामलों को याद करना होगा। बात 2008 की है। मनसे के निर्माण के बाद अपनी राजनीति चमकाने के लिए राज ठाकरे के कार्यकर्ताओं ने मुंबई में एक प्रतियोगी परीक्षा देने गए उत्तर भारतीयों को जमकर पीटा। बिहार के कई हिस्सों में उनके खिलाफ कोर्ट में मुकदमें दायर किए गए, लेकिन राज ठाकरे एक बार भी बिहार के किसी अदालत में हाजिर नहीं हुए, आज वो मामला सारे लोग भूल चुके हैं। लेकिन मेवाणी को राहत नहीं मिल सकी।

खैर, अब फिर से आते हैं गुजरात चुनाव पर। जिस जिग्नेश मेवाणी को एक साल पहले पूरे गुजरात के लोग भी नहीं जानते थे, आखिरकार गुजरात चुनाव में वो इतना महत्वपूर्ण होकर क्यों उभर गए हैं? असल में गुजरात में युवा दलित नेता के तौर पर उभरे जिग्नेश पेशे से वकील और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। मेवाणी राष्ट्रीय दलित अधिकार मंच के संयोजक भी हैं। ऊना में गोरक्षा के नाम पर दलितों की पिटाई के ख़िलाफ़ हुए आंदोलन का जिग्नेश ने नेतृत्व किया था। ‘आज़ादी कूच आंदोलन’ में जिग्नेश ने 20 हज़ार दलितों को एक साथ मरे जानवर न उठाने और मैला न ढोने की शपथ दिलाई थी। इस आंदोलन में दलित-मुस्लिम एकता भी दिखाई दी थी।

मेवाणी इसी दलित-मुस्लिम एकता को अपने पक्ष में आगामी विधानसभा चुनाव में भी बनाए रखना चाहते हैं। मेवाणी के इसी गठजोड़ के चलते कांग्रेस उनसे समझौता करने को तैयार हो गई। जहां तक गुजरात में दलितों के दखल की बात है तो राज्य में दलितों का वोट प्रतिशत क़रीब सात फ़ीसदी है। राज्य की कुल आबादी लगभग 6 करोड़ 38 लाख है, जिनमें दलित 35 लाख 92 हज़ार के क़रीब हैं। अब सवाल उठता है कि गुजरात के दलितों के बीच जिग्नेश मेवाणी की कितनी पकड़ है। इसके लिए बोरतवाड़ा का उदाहरण लिया जा सकता है जहां से लौटने के बाद बीबीसी की संवाददाता प्रियंका दूबे ने बीबीसी के लिए एक रिपोर्ट लिखी है।

बोरतवाड़ा को अनुसूचित जाति/जनजाति के तहत आरक्षित सीट घोषित किया गया। गांव में आरक्षित सीट पर हुए इस पहले पंचायत चुनाव को 12 वोटों से जीत कर महेश ने अप्रैल 2017 में सरपंच का कार्यभार संभाला। पर दो महीने के भीतर ही गांव की पंचायत कमेटी उनके ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव ले आई। वजह महेश का दलित होना है। एक दलित होने के कारण पंचायत कमेटी के सदस्य उन्हें पसंद नहीं करते। महेश का कहना है कि उन्हें गांव के 3200 आम लोगों ने वोट देकर सरपंच चुना लेकिन पंचायत कमेटी के पांच ठाकुर उन्हें यानि महेश को और पंचायत को काम नहीं करने देते.” महेश जिग्नेश मेवाणी को अपना नेता मानते हैं। उनका साफ कहना है कि हम उसी को वोट देंगे जो गुजरात के दलितों के लिए जिग्नेश की 12 मांगों को मानेगा. अगर मांगें नहीं मानी गईं तो नोटा दबा देंगे. यानि इसमें कोई शक नहीं है कि गुजरात में दलितों के साथ खड़े होकर जिग्नेश मेवाणी ने उनके बीच अपनी जगह बनाई है। हां, कितनी जगह बना पाए हैं, इस सवाल का जवाब 182 विधानसभा सीटों वाले गुजरात में 9 और 14 दिसंबर को चुनाव के बाद 18 दिसंबर को रिजल्ट के बाद मिलेगा।

चंद्रशेखर रावण की रिहाई को लेकर आंदोलन शुरू

chandrashekharनई दिल्ली। पिछले तकरीबन छह महीनों से जेल में बंद भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर रावण की रिहाई को लेकर दलित संगठनों ने आंदोलन शुरू कर दिया है। आज 5 दिसंबर को राष्ट्रीय दलित महासभा के बैनर तले दिल्ली में एक कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें एडवोकेट चंद्रशेखर की रिहाई के लिए मंथन किया जाएगा। आंध्र भवन में होने वाले इस कार्यक्रम में तमाम दलित संगठनों के लोग शामिल रहे।

राष्ट्रीय दलित महासभा के संस्थापक अशोक भारती ने कहा कि चंद्रशेखर को लेकर तमाम संगठन आंदोलन करते रहे हैं, लेकिन हमारा प्रमुख एजेंडा आंदोलन से आगे बढ़कर चंद्रशेखर की रिहाई सुनिश्चित करना होगा। उन्होंने कहा कि जब भी कोई दलित युवा आगे बढ़ता है उसे रोकने के लिए तमाम तरह के सरकारी षड्यंत्र में फंसा दिया जाता है। हमारी लड़ाई इसके खिलाफ है। दलित दस्तक से बातचीत में भारती ने कहा कि जब तक चंद्रशेखर की रिहाई नहीं हो जाती हमाई लड़ाई जारी रहेगी और हम शांत नहीं बैठेंगे।