दलित विद्यार्थियों के लिए केजरीवाल सरकार की खास योजना

नई दिल्ली। दिल्ली सरकार ने एससी/एसटी छात्रों के लिए एक खास स्कीम का ऐलान किया है. केजरीवाल ने ‘जय भीम मुख्यमंत्री प्रतिभा विकास योजना’ शुरू की है. इसका फायदा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों को मिलेगा. इसके तहत सरकार ने दलित छात्रों को मुफ्त कोचिंग की व्यवस्था करेगी. सरकार की इस योजना की मंशा यह है कि ‘पैसों की कमी के कारण किसी भी स्टूडेंट्स की पढ़ाई नहीं रोकी जा सकती.’

केजरीवाल की इस स्कीम में यूपीएससी परीक्षाओं की तैयारी के लिए दलित छात्रों को मुफ्त कोचिंग की सुविधा दी जाएगी. इसके अलावा इंजीनियरिंग और एमबीबीएस के एंट्रेस एग्जाम के लिए भी मुफ्त कोचिंग की सुविधा दी जाएगी. जिन दलित परिवारों की आमदनी सालाना छह लाख रुपए से कम होगी उनके बच्चों को इसका फायदा मिलेगा. कोचिंग लेने वाले छात्रों में से 75 फीसदी सरकारी स्कूल और 25 फीसदी निजी स्कूलों के बच्चे होंगे.

दलित छात्रों की कोचिंग फीस का 75 फीसदी हिस्सा दिल्ली सरकार देगी. छात्रों के अभिभावकों को सिर्फ 25 फीसदी फीस देना होगा. इसके अलावा सरकार 2500 रुपए प्रति माह का भत्ता भी देगी.

 

गुजरात चुनावः दलित और आदिवासी वोटों पर सबकी नजर

electionअहमदाबाद। गुजरात चुनाव प्रचार के आखिरी दिन मोदी और राहुल गांधी दोनों की नजर दलित और आदिवासी वोटों पर रही. राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर 14वां सवाल दागते हुए दलितों से जुड़ा मुद्दा उठाया. उन्होंने ट्विटर पर लिखा- न ज़मीन, न रोज़गार, न स्वास्थ्य, न शिक्षा… गुजरात के दलितों को मिली है बस असुरक्षा.. ऊना की दर्दनाक घटना पर मोदी जी हैं मौन.. इस घटना की जवाबदेही लेगा फिर कौन.. क़ानून तो बहुत बने दलितों के नाम..कौन देगा मगर इन्हें सही अंजाम?

वहीं दूसरी ओर गुजरात में पटेल समुदाय के बाद अगर बीजेपी को किसी दूसरे तबके की भारी नाराजगी झेलनी पड़ रही है तो वह हैं आदिवासी. गुजरात में आदिवासी बहुल इलाके पूरे गुजरात में हैं, और विधानसभा चुनाव के दोनों ही दौर में उनकी मौजूदगी है.

गुजरात में आदिवासी समुदाय के सबसे कद्दावर और रॉबिन हुड स्टाइल नेता छोटू भाई वसावा ने बीजेपी सरकार को आदिवासी विरोधी करार देते हुए इसे सत्ता से उखाड़ फेंकने का प्रण किया है, जिसने बीजेपी की नींद उड़ा दी है. वसावा ने भीलिस्तान टाइगर सेना और चुनाव लड़ने के लिए भारतीय ट्राइबल पार्टी का गठन किया है और वह पांच विधानसभा सीटों पर कांग्रेस के सहयोग से चुनाव लड़ रहे हैं.

इसी तरह दलित समुदाय भी बसपा के अलावा जिग्नेश मेवाणी और कांग्रेस के साथ खड़ा है. गुजरात में 7 प्रतिशत दलित वोटों में से भाजपा के खेमे में कुछ भी जाने की संभावना बहुत कम है. इस बीच राहुल गांधी ने दलितों का सवाल तब उठाया है जब गुजरात में दूसरे चरण के लिए चुनाव प्रचार का आज आखिरी दिन है. दूसरे चरण का मतदान 14 दिसंबर को होगा और चुनाव के नतीजे 18 दिसंबर को आएंगे.

UP विधानसभा के बाहर मैला ढोने वाली महिलाओं ने किया प्रदर्शन

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उत्तर प्रदेश। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में विधानसभा सभा के बाहर रविवार को मैला ढोने वाली सैकड़ों महिलाओं ने विरोध प्रदर्शन किया. बुंदेलखंड के जालौन से आईं महिलाओं ने हजरतगंज में बनी गांधी प्रतिमा के सामने भी प्रदर्शन किया. दलित अधिकार और स्वाभिमान मार्च के बैनर तले बुलाए गए इस प्रदर्शन का मकसद महिलाओं को इस कुप्रथा से मुक्ति दिलाना है.

बुंदेलखंड दलित अधिकार मंच के नेतृत्व में सैकड़ों मैला ढोने वाली जालौन जिले की महिलाओं ने लखनऊ में प्रर्दशन किया. उन्होंने मुख्यमंत्री से मैला ढोने की प्रथा से मुक्ति दिलाने की मांग की, उन्होंने कहा कि कि 2013 में मैला ढोने की प्रथा को बैन कर दिया गया है, इसके बावजूद बुंदेलखंड में ये प्रथा जारी है.

बुंदेलखंड दलित अधिकार मंच के संयोजक कुलदीप बौद्ध ने कहा कि बुंदेलखंड में दो सूखी रोटी पर आज भी सैकड़ों महिलाएं मैला ढोने को मजबूर हैं. उन्होंने बताया कि जालौन जिले के दो ब्लाक महेबा और कदौरा में 276 महिला मैला ढोने का काम कर रही है. सरकार ने इस प्रथा को बैन करके पुर्नावास की बात कही लेकिन ये प्रथा अभी भी जारी है.

कुलदीप बौद्ध ने बताया कि हमारी मांग है महिलाओं को मैला ढोने से रोका जाए और उनके लिए स्थाई आवास, रोजगार की व्यवस्था की जाए और साथ ही उन्हें पांच एकड़ जमीन दी जाए. लेकिन इस पुर्नावास के तहत जो भी सुविधाएं कहीं गई है वो नहीं मिल रही हैं. इसी के चलते बुंदेलखंड के जालौन जिले की सैकड़ों मैला ढोने वाली महिलाएं अपनी मांगों को लेकर लखनऊ आई हैं.

सारणः दिन में कमिश्नर ने बाबासाहेब की मूर्ति का अनावरण किया, रात में सामंतवादियों ने तोड़ दिया, सड़कों पर उतरे अम्बेडकरवादी

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सारण। बिहार के कुछ इलाकों में जातिवाद किस कदर कायम है और जातिवादियों के हौंसले किस कदर बढ़े हुए हैं यह 10 दिसंबर को हुई एक घटना से समझा जा सकता है. यह घटना इस बात को भी दिखाती है कि सामंतवादी बाबासाहेब के नाम और दलितों को देश की सत्ता का रास्ता दिखाने के लिए उठी ऊंगली से कितना डरते हैं. यही वजह है कि तमाम जगहों से लगातार बाबासाहेब की प्रतिमा को तोड़े जाने की खबरें आती रहती हैं.

दरअसल कल रविवार को बिहार के सारण जिले में मशरक स्थित टोटहां जगतपुर, पानापुर में बाबासाहेब की एक ऊंची लंबी प्रतिमा का अनावरण हुआ. इसका निर्माण अम्बेडकर लोक सेवा संघ के द्वारा करवाया गया. प्रतिमा अनावरण के लिए सारण के कमिश्नर नर्वदेश्वर लाल को बुलाया गया. कमिश्नर साहब ने मूर्ति का अनावरण किया और समाज में फैले जातिवाद को एक बुराई बताया. उन्होंने वंचित समाज एवं महिलाओं के लिए बाबासाहेब के द्वारा किए काम के बारे में भी बताया. पुलिस प्रशासन की मौजूदगी में आस-पास के कई गांवों के अम्बेडकरवादियों के बीच काफी उत्साह था. इस दौरान घंटों तक जय भीम के नारे गूंजते रहे.

शायद जय भीम के यही नारे वहां के सामंतवादियों के कानों में शीशे की तरह पिघल रहे थे. मूर्ति का अनावरण जिले के कमिश्नर कर रहे थे सो उन्होंने चुप्पी साधे रखी. लेकिन गांव के सामंतवादियों के मन में बाबासाहेब और दलित-बहुजन समाज के लिए कितना जहर भरा था यह उसी रात को सामने आ गया. सामंतवादियों ने आंधी रात को बाबासाहेब की उस प्रतिमा को खंडित कर दिया. आज सुबह खंडित प्रतिमा को देखते ही अम्बेडकरवादी सड़कों पर उतर आए हैं. मशरख से लेकर जिला मुख्यालय छपरा में भी अम्बेडकरवादी सड़कों पर उतर गए हैं. अपने मसीहा के अपमान से भड़के अम्बेडकरवादियों ने सड़क से लेकर रेल तक रोक दिया.

हालांकि पुलिस ने लोगों से विरोध वापस लेने की बात कही लेकिन लोग मानने को तैयार नहीं हैं. लोगों का कहना है कि जब तक प्रतिमा तोड़ने वालों की गिरफ्तारी नहीं होगी, वो आंदोलन वापस नहीं लेंगे. फिलहाल जिले भर के अम्बेडकरवादी गोलबंद होते जा रहे हैं बाबासाहेब के अपमान के खिलाफ साथ खड़े हैं. मामले का एक पहलू यह भी है कि यह सीधे तौर पर जिले के कमिश्नर को भी एक चुनौती है, जिन्होंने प्रतिमा का अनावरण किया था. देखना होगा कि भाजपा और जदयू की सरकार में पुलिस सामंतवादियों पर नकेल कसते हैं या नहीं.

 

नागपुर में मायावती ने राम मंदिर के बारे में क्या कहा

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नागपुर। नागपुर में 10 दिसंबर को बसपा प्रमुख मायावती बहुजन नायकों की धरती नागपुर में थी. इस रैली में महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश तथा तेलंगाना के कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया. इस दौरान बसपा प्रमुख ने भाजपा पर जमकर निशाना साधा. बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने भी हिन्दू कोड बिल लागू नहीं होने पर कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था, इसी तरह मैंने भी सहारनपुर में अपने समाज के लोगों के साथ अन्याय होने पर राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया.

महाराष्ट्र औऱ खासकर विदर्भ क्षेत्र में किसानों की आत्महत्या का जिक्र करते हुए मायावती ने कहा कि उनके चार बार मुख्यमंत्री रहने के दौरान उत्तर प्रदेश में किसी किसान ने आत्महत्या नहीं की जबकि भाजपा के कार्यकाल में किसानों के आत्महत्याओं में काफी इजाफा हुआ है और विदर्भ में तो यह प्रमाण सबसे ज्यादा है.

राम मंदिर बनाने को भाजपा का एजेंडा बताते हुए बसपा प्रमुख ने कहा कि राम मंदिर बनने से बहुजन समाज की समस्या का समाधान होने वाला नहीं है. बहुजनों के असली भगवान बाबासाहेब हैं और कोई नहीं. क्योंकि बहुजनों को उनके अधिकार संविधान में बाबासाहेब ने दिलाया. अगर उन अधिकारों को सही तरीके से लागू करना है तो बहुजन समाज पार्टी की सरकार आना बहुत जरूरी है.

एक बार फिर बौद्ध धर्म की ओर जाने की बात कहते हुए कहा कि मायावती ने कहा कि हिन्दू धर्म में बहुजन समाज के लोगों को न्याय नहीं मिल रहा है तथा जातिवादी मानसिकता के तहत उनका बड़े पैमाने पर ऊत्पीड़न हो रहा है. यदि यह नहीं रूकता है तो मैं भी बाबासाहेब के राह पर चलते हुए हुए सामुदायिक रूप से बौद्ध धर्म को जरूर अपना लूंगी.

मायावती ने देश के अनेक राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों तथा 2019 में होनेवाले लोकसभा के चुनावों में बीजेपी को सत्ता से बाहर कर बहुजन समाज की सत्ता निर्माण करने के लिए 85% बहुजन समाज को एकजुट करने का आव्हान किया.

नागपुर में हुए अधिवेशन के बाद जाहिर है कि महाराष्ट्र में बसपा कार्यकर्ताओं का काफी उत्साह बढ़ा है. तो वहीं बाबासाहेब की धरती से एक बार फिर सामूहिक रूप से बौद्ध धर्म में जाने की बात कह कर हिन्दू धर्म को ढोने वालों के कान फिर से खड़े कर दिए हैं.

 

गुजरात में भाजपा की गंदी पॉलिटिक्स

gujaratअहमदाबाद। ईवीएम छेड़छाड़ की शिकायतों के बीच गुजरात चुनाव का पहला फेज 9 दिसंबर को समाप्त हो चुका है. बाकी बचे 93 विधानसभा सीटों के लिए 14 दिसंबर को चुनाव होने हैं. अभी तक मिल रही रिपोर्ट से यह साफ है कि गुजरात में मुकाबला काफी कड़ा होने जा रहा है. इस बीच सोमवार को चुनाव आयोग ने राहुल गांधी और हार्दिक पटेल को रोड शो की इजाजत नहीं दी. तो दूसरी ओर भाजपा ने राहुल गांधी और कांग्रेस को घेरने के लिए अपनी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति को तेज कर दिया है. अहमदाबाद में शनिवार को अचानक सामने आया पोस्टर भाजपा की इस राजनीति को दिखा रहा है, जिसमें राहुल गांधी की सलमान निजामी नाम के एक युवक के साथ तस्वीर है. निजामी को संसद पर हमला करने वाले अफलज गुरू का समर्थक माना जाता है. इस फोटो का सहारा लेकर भाजपा ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को घेरने की कोशिश की है. पोस्टर पर लिखा गया है कि “अफजल का जो यार है वो देश का गद्दार है”. दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी ने पार्टी में सलमान निजामी नाम के किसी नेता या कार्यकर्ता के होने से इंकार किया है. असल में चुनाव में खुद को पिछड़ता देख भाजपा ने विकास की बजाय अपनी हिन्दुवादी रणनीति पर काम करना तेज कर दिया है. चुनाव के पहले जहां भाजपा नोटबंदी, जीएसटी और गुजरात के विकास को चुनाव का मुद्दा बना रही थी तो वहीं पहले चरण के चुनाव के ठीक पहले भाजपा ने इन मु्द्दों को छोड़कर ऐसे मुद्दे उठाने शुरू कर दिए जिससे हिन्दुओं को धर्म के नाम पर गोलबंद कर के उनका वोट हासिल किया जा सके.

महाराष्ट्र के भाजपा नेता ने पार्टी और सांसदी छोड़ी

नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी को महाराष्ट्र में बड़ा झटका लगा है. पार्टी से नाराज भंडारा-गोंदिया से सांसद नानाभाऊ पटोले ने पार्टी छोड़ दी है. साथ ही उन्होंने लोकसभा की अपनी सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया है. सांसद पटोले ने लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन के कार्यालय और भाजपा नेतृत्व को अपना इस्तीफा सौंप दिया है. पटोले ने यह कदम गुजरात विधानसभा चुनाव के प्रथम चरण के मतदान से ठीक एक दिन पहले उठाया.

पार्टी छोड़ते हुए पटोले ने कहा है कि वह पार्टी इसलिए छोड़ रहे हैं, क्योंकि वह काफी दुखी और पार्टी द्वारा खुद को उपक्षेति महसूस कर रहे हैं. लोकसभा सचिवालय को अपना इस्तीफा सौंपने के तत्काल बाद उन्होंने मीडिया से कहा, “जिस वजह से मैं भाजपा में शामिल हुआ था, वह झूठा साबित हुआ. पटोले ने कहा कि उन्होंने अभी तक यह तय नहीं किया है कि वह किस पार्टी में शामिल होंगे, लेकिन वह ‘किसी समान विचारधारा वाले राजनीतिक दल’ में शामिल होने पर विचार करेंगे.

नाना पटोले ने लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन को भेजे एक पत्र में उन्होंने अपने इस्तीफे के लिए कृषि, अर्थव्यवस्था और बेरोजगारी जैसे 14 मुद्दों को कारण के तौर पर गिनाया. पटोले ने आरोप लगाया कि उन्होंने प्रधानमंत्री के समक्ष भी बार बार मुद्दे उठाए लेकिन उन्होंने उन्हें नजरंदाज कर दिया.

दलितों के लिए भारत भ्रमण पर निकला गौतम बुद्ध

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अहमदाबाद। दलितों पर अत्याचार से एक शख्स इतना व्यथित हुआ कि वह देश के भ्रमण पर निकल गया. इस भ्रमण का उद्देश्य दलितों की स्थिति को सरकार के सामने लाना है. इस शख्स का नाम है गौतम बुद्ध. 11 जुलाई 2016 को उना में हुई घटना ने गौतम बुद्ध के दिलो दिमाग को इतना झकझोर दिया कि वो साइकिल लेकर निकल पड़े.

एबीपी न्यूज के मुताबिक गौतम का कहना है कि मैं भाजपा सरकार को दिखाना चाहता हूं कि देश के किस राज्य में दलितों की क्या स्थिति है. वे कहते हैं सबका साथ-सबका विकास लेकिन स्थिति क्या है, ये दिखाना मेरा मकसद है. गौतम का कहना है “उना में जो हुआ उसका वीडियो दुनियाभर में वायरल हुआ था. जैसा उस दिन मेरे समाज के लोगों के साथ हुआ, वैसा फिर ना हो बस यही चाहता हूं मैं.” 30 साल के गौतम अभी तक 32 जिले घूम चुके हैं. गौतम बुद्ध जिस मिशन को लेकर निकले हैं, उसे सरकार तक पहुंचाने में कितना सफल हो पाते हैं.

बड़े मुस्लिम नेता के बेटे के खिलाफ मायावती का कड़ा एक्शन

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mayawatiलखनऊ। बसपा प्रमुख मायावती एक कड़ी प्रशासक के रूप में विख्यात रही हैं. उत्तर प्रदेश में आज भी हर समाज के लोग इस बात को मानते हैं कि प्रदेश की सत्ता पर जब भी मायावती बैठीं हो तो वो चैन की नींद सो सकते हैं. सरकार हो या फिर पार्टी मायावती कहीं भी अनुशासनहीनता बर्दास्त नहीं करती हैं. यह एक बार फिर से साबित हो गया है. मायावती ने पार्टी के प्रमुख मुस्लिम नेता और राज्यसभा सांसद मुनकाद अली के बेटे को पार्टी से निष्कासित कर दिया है. उस पर गुंडागर्दी का आरोप है.

असल में मुनकाद अली के बेटे सलमान खान पर आरोप है कि उसने मेरठ में एक दलित शख्स की दुकान में तोड़-फोड़ किया. घटना के बाद मायावती ने पार्टी के कद्दावर नेता के पक्ष में खड़े होने की बजाय गरीब दलित को इंसाफ देना ज्यादा जरूरी समझा. और सलमान खान को पार्टी से निष्कासित कर दिया. मायावती का यह फैसला इसलिए भी चौंकाता है कि मायावती ने पार्टी के एक बड़े मुस्लिम चेहरे के परिवार के खिलाफ यह कार्रवाई की है.

मुनकाद अली वर्तमान में लखनऊ, वाराणसी और मिर्जापुर में पार्टी के क्षेत्रीय प्रभारी हैं. वहीं खान की पत्नी हाल के दिनों में बसपा के टिकट पर किठौर नगर पंचायत की अध्यक्ष पद का चुनाव जीती हैं. हालांकि सांसद अली ने बेटे पर लगे आरोपों को निराधार बताकर इसे विरोधियों की साजिश बताया है.

उन्होंने कहा- “मैं पार्टी का निर्णय स्वीकार करता हूं. मैं बीएसपी के लिए कार्य करता रहूंगा और उन सभी जिम्मेदारियों को निभाता रहूंगा जो बहनजी (मायावती) मुझे सौपेंगी.

दूसरी तरफ मायावती ने सलमान को पार्टी से निकाले जाने पर कहा है कि उन्होंने कानून तोड़ा है. पहले भी वो ऐसा करते रहे हैं. अगर पार्टी का अन्य कार्यकर्ता कानून अपने हाथ में लेता है तो उसके खिलाफ भी ऐसी ही कार्यवाई की जाएगी. इस कार्रवाई के साथ मायावती ने यह साफ संदेश दे दिया है कि वह पार्टी में अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं करेंगी.

गुजरात चुनावः चुनाव आयोग ने कतरा भाजपा का पर

नई दिल्ली। गुजरात विधानसभा चुनाव भाजपा एवं खासकर मोदी और अमित शाह की जोड़ी के लिए अब तक की सबसे बड़ी परीक्षा है. दोनों गुजरात में ताबरतोड़ रैलियां कर रहे हैं. मुकाबला कितना कड़ा है, यह इसी बात से समझा जा सकता है कि अमित शाह और मोदी को एक-एक सीट पर मेहनत करनी पर रही है. इधर चुनाव आयोग ने भी इन दोनों की मुसीबत बढ़ा दी है.

चुनाव आयोग ने एक बड़ा आदेश देते हुए चुनाव प्रचार के दौरान जीएसटी के प्रचार-प्रसार पर रोक लगा दी है. आयोग ने कहा है कि 178 वस्तुओं पर लगने वाले कर में कटौती के फैसले का प्रचार-प्रसार न किया जाए, क्योंकि इससे वोटर प्रभावित हो सकते हैं. आयोग का यह फैसला भाजपा के लिए बड़ा झटका है, क्योंकि बीजेपी अपने इस फैसले को चुनाव में भुनाने में लगी हुई थी.

गुजरात चुनाव में नोटबंदी और जीएसटी बड़ा मुद्दा हैं. राहुल गांधी भी हर चुनावी रैली में इन दोनों मुद्दों को लेकर केंद्र सरकार और पीएम मोदी पर निशाना साधते हैं. गुजरात के व्यापारियों ने भी जीएसटी का काफी विरोध किया था. व्यपारियों के विरोध से भाजपा में तब खलबली मच गई, जब उन्होंने कमल का फूल हमारी भूल लिखी रसीद ग्राहकों को देना शुरू कर दिया. इसी विरोध को दबाने के लिए भाजपा ने गुजरात चुनाव से ठीक पहले जीएसटी के टैक्स में कटौती की थी और इसी के भरोसे वह गुजरात चुनाव फतह करना चाहती थी. लेकिन आयोग के फैसले ने भाजपा को झटका तो दे ही दिया है.

पीएम ने किया डॉ. अम्बेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र का उद्घाटन, वी.पी. सिंह को भूले

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जनपथ रोड स्थित डॉ. अम्बेडकर इंटरनेशनल सेंटर

नई दिल्ली। दिल्ली  के लुटियन जोन में डॉ. अम्बेडकर फाउंडेशन की जगह अब डॉ. अम्बेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र (DAIC) बन चुका है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बाबासाहेब के परिनिर्वाण दिवस के ठीक एक दिन बाद आज इसका उद्घाटन कर दिया. एक शानदार कार्यक्रम में सरकार के तमाम मंत्रियों, अधिकारियों और भाजपा कार्यकर्ताओं की मौजूदगी में इस केंद्र का उद्घाटन हुआ. इस केंद्र का शिलान्यास पीएम मोदी ने ही 20 अप्रैल 2015 को किया था.

इस केंद्र की परिकल्पना तत्कालिन प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह के नेतृत्व में बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर के शताब्दी जयंती वर्ष के समय 1991 में की गई थी. तब सामाजिक न्याय के एजेंडे को लेकर चलने वाले रामविलास पासवान और शरद यादव जैसे नेताओं ने भी इस केंद्र की बुनियाद रखने की दिशा में सरकार पर काफी दबाव बनाया था. वी.पी. सिंह की सरकार ने ही इस केंद्र के लिए जमीन भी दी गई थी. तब से ज्यादातर वक्त सत्ता में रही कांग्रेस और भाजपा की पूर्ववर्ती सरकारों ने इसकी कोई सुध नहीं ली थी.

मौजूदा केंद्र सरकार ने अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर को बनाने के लिए जनवरी 2018 तक का समय लिया था लेकिन उससे पहले ही यह विशालकाय हैरीटेज तैयार हो चुका है. 3.25 एकड़ में फैले इस सेंटर को बनाने में तकरीबन ढाई साल लगे और इस पर 191 करोड़ की लागत आई है. दिल्ली के जनपथ रोड पर बने इस सेंटर में एक लाईब्रेरी 3 मीटिंग्स हॉल और एग्जिबिशन हॉल भी है. जबकि इस सेंटर में एक साथ करीब 5 हजार लोग बैठ सकते हैं.

राजनीति में जैसा होता है, भाजपा ने पार्टी के अनुसूचित जाति मोर्चा से जुड़े तमाम पदाधिकारियों को दिल्ली बुला लिया था, ताकि वो अपने क्षेत्र में जाकर लोगों को बता सकें कि मोदीजी ने बाबासाहेब के नाम पर क्या किया है.

कार्यक्रम में मौजूद अन्य लोग भी भारत सरकार के इस कदम से खुश थे. उनके लिए इतना ही काफी है कि लुटियन जोन जैसे महत्वपूर्ण जगह पर बाबासाहेब के नाम पर एक शानदार इमारत खड़ी है, जिसमें डॉ. अम्बेडकर और बुद्ध की प्रतिमा है. लेकिन कार्यक्रम में मौजूद कुछ लोगों को इस शानदार केंद्र में कुछ खटक भी गया. कुछ लोगों ने इस केंद्र में लगी बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर और बुद्ध की प्रतिमा को लेकर सवाल उठाया. उनका कहना था कि बाबासाहेब और तथागत बुद्ध की जो प्रतिमाएं लगाई गई है वह और बेहतर हो सकती थी. बसपा की सरकार में जो प्रतिमाएं लगी थीं वो शानदार थी, लेकिन यहां लगी प्रतिमाएं प्रभाव नहीं छोड़ती हैं.

प्रधानमंत्री मोदी ने इस दौरान बाबासाहेब के जीवन के बारे में बात करने की बजाय सरकार की उपलब्धियां ज्यादा गिनवाई. एक जो और बात खटकने वाली थी, वह यह थी कि पूरे कार्यक्रम के दौरान कहीं भी वी.पी सिंह का नाम नहीं लिया गया.

चुनाव हारने से बौखलाए भाजपा नेता ने दलित एसडीएम के साथ की मारपीट

बरेली। चुनाव हारने पर एक भाजपा नेता इतना बौखला गया कि उसने काउंटिंग करवा रहे उप जिलाधिकारी के साथ न सिर्फ गाली गलौच की बल्कि हाथापाई भी की. घटना के बाद जिले के सभी अधिकारी एकजुट हो गए हैं और उन्होंने भाजपा अध्यक्ष के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. अधिकारियों के एसोसिएशन ने मुख्यमंत्री से जिलाध्यक्ष के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है. मामला बरेली का है और घटना एक दिसंबर की है. नवाबगंज के उप जिलाधिकारी एवं निर्वाचन पदाधिकारी राजेश कुमार बरेली में निकाय चुनाव की काउंटिंग करवा रहे थे. इस चुनाव में भाजपा जिलाध्यक्ष रविन्द्र सिंह राठौर के भाई नरेन्द्र सिंह राठौर की पत्नी प्रेमलता राठौर चुनाव लड़ रही थी. नतीजा आने पर प्रेमलता राठौर शहला ताहिर से चुनाव हार गई. हार की सूचना मिलते ही भाजपा जिलाध्यक्ष अपने समर्थकों के साथ जबरन मतगणना केंद्र में पहुंच गया और प्रेमलता राठौर के पक्ष में परिणाम घोषित करने का दबाव बनाने लगा. निर्वाचन अधिकारी राजेश कुमार के मना करने पर वह उनसे गाली गलौच और मारपीट करने लगा. हालांकि वहां मौजूद पुलिसकर्मियों ने उन्हें बचा कर बाहर निकाला.

घटना के बाद उत्तर प्रदेश राज्य सिविल सेवा संघ ने इस मामले में मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर कार्रवाई की मांग की है. लेकिन घटना के तकरीबन एक हफ्ते बाद भी मुख्यमंत्री या प्रमुख सचिव की ओर से अभी तक जिलाध्यक्ष पर कोई कार्रवाई नहीं की गई है न ही कार्रवाई का आदेश आया है. ऐसे में जहां बरेली का प्रशासन दोनों भाईयों के आतंक से डरा हुआ है तो वहीं जिलाध्यक्ष सरकार का आदमी बनकर खुला घूम रहा है.

मामले का एक पहलू यह भी है कि उपजिलाधिकारी राजेश कुमार दलित समाज से ताल्लुक रखते हैं. लोगों का कहना है कि आरोपी यह कहते हुए भी घूम रहे हैं कि देखें एक दलित हमारा क्या बिगाड़ लेता है. फिलहाल बरेली के सारे अधिकारी काली पट्टी बांध कर काम कर रहे हैं. अधिकारियों के एसोसिएशन ने मुख्यमंत्री से मिलने का समय मांगा है लेकिन सीएम ऑफिस का कहना है कि मुख्यमंत्री व्यस्त हैं.

यहां एक अहम सवाल यह भी है कि जिस राज्य में सत्ताधारी पार्टी के एक अदने से जिलाध्यक्ष से जिले का पूरा प्रशासनिक अमला खौफ में है, उस राज्य में कानून की हालत क्या होगी? जिस राज्य में प्रशासनिक अधिकारी तक को न्याय नसीब नहीं है, वहां आम व्यक्ति के प्रति सरकार का रवैया क्या होगा?

उत्तराखंडः टिहरी में सवर्ण जाति के डर से दलितों ने छोड़ा गांव

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टिहरी। उत्तराखंड के टिहरी जिले में एक दूरस्थ गांव गंगी में दो गुटों के बीच हुए संघर्ष के बाद सहमें दलितों ने अपना घर छोड़ दिया है. असल में इस संघर्ष के बाद एक दलित युवक गायब हो गया; जिससे घबराकर 30 दलितों ने घर छोड़ दिया और ब्लॉक मुख्यालय में शरण ले ली.

गंगी गांव में सवर्णों का वर्चस्व है और दलितों की संख्या कम है. पीड़ित पक्ष के लोगों का कहना है कि वह शादी समारोह में ढोल बजाने गया था. जिसके बाद वह वापस लौट आया. लौटने के बाद फिर उसे दुबारा बुलाया गया, जिस पर उसने जाने से इंकार कर दिया. तो वहीं दूसरे पक्ष का कहना है कि ढोल बजाने की बात पहले से तय थी लेकिन राकेश जिसे ढोल बजाना था, वो ऐन वक्त पर नहीं आया. साथ ही उसे बुलाने गई महिला से अभद्रता की.

मामला शांत हो गया होता लेकिन दिक्कत तब हो गई जब राकेश अचानक गायब हो गया. इसके बाद दलित दहशत में हैं. घटना के बाद दोनों पक्षों ने बारी-बारी से मामला दर्ज करवाया है. दूसरी ओर पुलिस का कहना है कि अपनी जान को खतरा बताते हुए दलितों ने भिलंगना ब्लॉक मुख्यालय में शरण ले रखी है. ये लोग संघर्ष के बाद गायब हुए युवक की तलाश और आरोपियों के पकड़े जाने तक गांव वापस लौटने को तैयार नहीं हैं.

गुजरात की पिच पर जिग्नेश की ‘जमात’ की पारी

जिग्नेश के रहने का अंदाज और पहनावा उन्हें मुख्यधारा के नेताओं से अलग करता है. उनकी जिंदगी के दूसरे पहलू भी उन्हें बाकी नेताओं से जुदा करते हैं. और सबसे हटकर उनमें जो बात दिख रही है वह है उनकी जाति से हटकर ‘जमात’ की राजनीति. उनकी शख्सियत उन्हें स्वाभाविक तौर पर इसी राजनीति से जोड़ रही है.

यह सच है कि गुजरात में दलितों की आबादी कोई 7 प्रतिशत है. यह करीब उतनी ही है जितने वोट प्रतिशत के अंतर से पिछली बार भाजपा ने कांग्रेस को हराया था. दलितों से थोड़ी ज्यादा आबादी मुसलमानों की है करीब 9 प्रतिशत. और इन दोनों को मिलाकर इनसे लगभग दोगुनी आबादी आदिवासियों की है करीब 15 प्रतिशत. ये तबके कभी एक थे, क्यों थे और कैसे बिखरे यह एक अलग कहानी है, लेकिन इस तथ्य में उनकी प्रबल संभावना छिपी हुई है कि वे 30 प्रतिशत से ज्यादा की ‘जमात’ में हैं, जो अब तक भी न संगठित है और न आक्रमक, लेकिन यह भी नई बात है कि वंचित-सामाजिक वर्ग की बेचैनी इस बार चुनाव के केंद्र में दिख रही है. और यही बेचैनी जिग्नेश की हर स्पीच और बड़े स्टेटमेंट में उनसे कनेक्ट कर रही है. और इसी बेचैनी ने ‘जमात’ की राजनीति में एक संभावना पैदा की है. इसमें कम-से-कम इस सवाल पर तो सोचा ही जा सकता है कि वोट-बैंक की राजनीति में भी ‘बहुसंख्यक’ का मतलब बदला जा सकता है?

जिग्नेश को किसी वर्ग का चेहरा बताना हो सकता है कि फिलहाल जल्दबाजी हो, लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि उनकी अगुवाई में सामाजिक आंदोलन के प्रतीकों को राजनीति में भी पैर पसारने की जगह मिली है. इसमें एक आत्म-विश्वास तो है ही, यह महत्वकांक्षा भी है कि उनकी जाति या ‘जमात’ से कोई सोशल या पोलिटिकल लीडर भी हो सकता है. एक अच्छा युवा कम्न्यूकेटर, जो उनके पक्ष में हर मंच पर हिंदी, गुजराती और अंग्रेजी धारा-प्रवाह बोल सकता है.

इस संभावना में एक नई बात भी दिख रही है कि यह चुनावी सफलता-असफलता से आगे जा सकती है और इसे असली चुनौती भी वहीं मिलेगी, जहां ‘जमात’ की राजनीति को कांग्रेस और भाजपा से अलग पहचान दिलाने की कवायत होगी. किसी पार्टी की पहचान में छिप जाना इस संभावना का अंत होगा. इनसे अलग विकल्प खड़ा करना एक और संभावना होगी. जितना मैं समझ पा रहा हूं तो शायद भी इसी लाइन पर इससे बहुत आगे समझ रहे हैं. इसलिए जिग्नेश का निर्दलीय खड़ा होना उनकी भविष्य की राजनीति की ओर संकेत दे रहा है.

इसलिए गुजरात की मौजूदा राजनीति में सम्भावना यह भी है कि चुनाव परिणाम मात्र छोटा-सा इंटरवल साबित हो और मुकाबले का अगला दौर इस परिणाम के एक अंतराल बाद जल्द शुरू हो. चुनावी राजनीति में कोई एक दल जीतता है. लेकिन, गुजरात की राजनीति में इस बार नया यह है कि यह चुनावी हार-जीत से आगे ‘जाति’ दिख रही है. यहां पिछले कुछ चुनावों में भाजपा का सामना कांग्रेस जैस दल से होता रहा है, जिसे हराकर शांति से बैठा जा सकता था. लेकिन, इस बार दलीय स्थिति से उलट सामाजिक-जातीय आन्दोलनों ने उसे असली टक्कर दी है.

चुनावी राजनीति में कोई एक दल जीतता है. लेकिन, गुजरात की राजनीति में इस बार नया यह है कि यह चुनावी हार-जीत से आगे ‘जाति’ दिख रही है. यहां पिछले कुछ चुनावों में भाजपा का सामना कांग्रेस जैस दल से होता रहा है, जिसे हराकर शांति से बैठा जा सकता था. लेकिन, इस बार दलीय स्थिति से उलट सामाजिक-जातीय आन्दोलनों ने उसे असली टक्कर दी है. इसलिए गुजरात की मौजूदा राजनीति में सम्भावना यह भी है कि चुनाव परिणाम मात्र छोटा-सा इंटरवल साबित हो और मुकाबले का अगला दौर इस परिणाम के एक अंतराल बाद जल्द शुरू हो.

किसी भी स्थिति में आरएसएस के लिए यह चिंता का सबब है. वजह है कि लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद आरएसएस-भाजपा संगठन अपनी ही प्रयोगशाला में सामाजिक-जातीय उथल-पुथल नहीं रोक पाया है. आगे की स्थिति का आंकलन करें तो भले ही गुजरात की राजनीति साम्प्रदायिकता पर आधारित है, फिर भी आरएसएस-भाजपा की दिक्कत यह है कि पूरा समाज आज भी जातियों में बंटा है जो उनकी मांगों को लेकर पहले से थोड़ा संगठित और बहुत ज्यादा आक्रामक होता जा रहा है.

आरएसएस-भाजपा अब तक विशेष तौर पर एसटी, एसटी और ओबीसी जातियों को मुसलमानों (9 फीसदी) के खिलाफ खड़ा करने में कामयाब होता रहा है. लेकिन, आर्थिक कमजोरी और बेकारी के कारण इन जातियों का अंतर्विरोध सड़कों पर देखा गया है और आने वाले समय में यह और ज्यादा मुखर हो सकता है. इसलिए ये सामाजिक-जातीय आंदोलन यदि संगठित न भी हुए और एक-एक जाति कई-कई गुटों में बंट भी गई तो भी हिन्दुत्त्व के नाम पर पूरी की पूरी निचली ‘जमातों’ को एकजुट रख पाने में आरएसएस-भाजपा को माइक्रो लेबल पर जूझना पड़ेगा. दूसरी तरफ, इन जातीय (गुट) आंदोलनों के बीच यदि कोर इशू पर समन्वय की राजनीति (जैसी कि कोशिश शुरू हो चुकी है) बनती है तो आरएसएस-भाजपा को गुजरात के अंदर-बाहर लंबी लड़ाई लड़नी पड़ेगी.

  • यह आलेख शिरीष खरे ने लिखा है। यह लेखक का निजी विचार है।

ये है अम्बेडकर इंटरनेशनल सेंटर, उद्घाटन आज

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नई दिल्ली। 6 दिसंबर को भारत रत्न और संविधान के निर्माता बाबासाहेब डा. भीमराव अम्बेडर का परिनिर्वाण दिवस देशभर में मनाया गया. इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को बाबासाहेब भीम राव अंबेडकर को श्रद्धांजलि अर्पित की. साथ ही राजधानी दिल्ली में तैयार अम्बेडकर इंटरनेशनल सेंटर की पहली तस्वीर भी साझा की.

पीएम मोदी ने 20 अप्रैल 2015 को अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर का शिलान्यास किया था. अब यह सेंटर पूरी तरह से तैयार हो चुका है. आज इस सेंटर का इनोग्रेशन किया जाएगा. केंद्र सरकार ने अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर को बनाने के लिए जनवरी 2018 तक का समय लिया था लेकिन उससे पहले ही यह विशालकाय हैरीटेज तैयार हो गई. इस खूबसूरत सेंटर को बनाने में 31 माह और 17 दिन का समय लगा है और इसकी लागत 191 करोड़ है. 3.25 एकड़ में फैला यह सेंटर राजधानी दिल्ली के जनपथ एरिया में बनाया गया है, जिसमें एक लाईब्रेरी 3 मीटिंग्स हॉल और एग्जिबिशन हॉल भी है. इस सेंटर में करीब 5 हजार लोगों के बैठने की व्यवस्था है. इस सेंटर में करीब 5 हजार लोगों के बैठने की व्यवस्था है.

बिहार कर्मचारी चयन आयोग मामले में आरोपियों की जमानत खारिज

पटना। पटना हाई कोर्ट ने बिहार के बहुचर्चित इंटर स्तरीय पदों के लिए ली गयी प्रतियोगिता परीक्षा का पर्चा लीक मामले में बिहार कर्मचारी चयन आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष सुधीर कुमार सहित चौदह अभियुक्तों को किसी भी प्रकार की राहत देने से साफ इंकार कर दिया है. इसके साथ ही उच्च न्यायालय ने नियमित जमानत याचिका को खारिज कर दिया. जस्टिस प्रभात कुमार झा की एकलपीठ ने आरोपियों की ओर से दायर नियमित जमानत याचिका पर एक साथ सुनवाई करने के बाद बुधवार को सुनाये गये फैसले में यह निर्देश दिया.

सुनवाई के क्रम में राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ता अजय मिश्रा ने अदालत को बताया था कि मामले की जांच में कई अहम सबूत मिले हैं. अदालत को बताया गया था कि इस कांड में अभियुक्त बनाये गये आयोग के पूर्व अध्यक्ष सुधीर कुमार, अटल बिहारी राय, अवधेश कुमार, गुड्डू कुमार, अनिश कुमार उर्फ गोलू, अविनाश कुमार, मुकेश कुमार, ओम प्रकाश गुप्ता, अरूण कुमार, नीति रंजन प्रताप, राम सुमेर सिंह, गौरीशंकर साह, मंजु देवी दिनेश कुमार आजाद आदी अभियुक्तों की संलिप्तता उजागर हुई है.

अदालत ने बुधवार को दिये फैसले में कहा कि अभियुक्तों के विरुद्ध प्रथम दृष्टया संलिप्तता का साक्ष्य प्रस्तुत किया गया है ऐसे में जमानत दिया जाना संभव नहीं प्रतीत होता है.

शशि कपूर के बारे में किसने क्या लिख कर किया याद

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शशि कपूर दुनिया से रुख्सत हो चुके हैं. उन्होंने कोकिलाबेन धीरभाई अंबानी अस्पताल में 4 दिसंबर की शाम 5.20 बजे अंतिम सांस ली. वह 79 वर्ष के थे. उनके बाद उनकी देह भी राख हो चुकी है. अब शशि कपूर के नाम पर कुछ है तो वह है सिर्फ उनकी यादें. अपने इन्हीं यादों में सहेज कर रखे गए शशि कपूर को बालीवुड के तमाम सितारों ने याद किया है. आइए देखते हैं, किसने उनके बारे में क्या लिखा है.

लता मंगेशकर, श्याम बेनेगल जैसे फिल्म जगत के उनके दोस्तों, सह-अभिनेताओं और निर्देशकों ने सिनेमा के लिए उनके जुनून को याद किया. फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल ने उन्हें ईश्वर का नेक बंदा बताया. कलयुग और जुनून में अभिनेता के साथ काम कर चुके बेनेगल ने कहा, वह ईश्वर का नेक बंदा और हर चीज से इतर खूबसूरत इंसान थे.

अभिनेता आमिर खान ने भी शशि कपूर को श्रद्धांजलि दी. उन्होंने कहा कि वह ना सिर्फ महान स्टार, जुनूनी निर्माता बल्कि शानदार इंसान भी थे. आमिर ने ट्विटर पर लिखा, उनके कार्य से भारतीय दर्शक हमेशा आनंदित हुए. भारतीय थियेटर में उनका योगदान बहुत बड़ा रहा है. पृथ्वी थियेटर नाटक प्रस्तुत करने वालों और दर्शकों का पसंदीदा स्थान रहा है. उनका निधन हमारे लिए दुखद दिन है.

कई फिल्मों में शशि कपूर के साथ काम कर चुकीं शबाना आजमी ने ट्विटर पर उनकी एक ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर साझा की है. उन्होंने कैप्शन दिया है, हम आपको मिस करेंगे… अभिनेत्री सायरा बानो ने उन्हें एक जीवंत व्यक्ति के रूप में याद किया है. दिग्गज अभिनेत्री मौसमी चटर्जी ने भी उन्हें महान अभिनेता के साथ-साथ हंसमुख व्यक्ति बताया. बॉलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार ने दिवंगत अभिनेता के दीवार के बहुत लोकप्रिय संवाद को याद किया. बकौल कुमार शशि कपूर ने अभिनेता बनने की आकांक्षा रखने वालों को बहुत अधिक प्रेरित किया.

इस वजह से फिर से चर्चा में हैं सुष्मिता सेन

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मुंबई। सुष्मिता सेन एक बार फिर से चर्चा में हैं. इस बार चर्चा की वजह इनकी लव लाइफ है. खबर है कि सेन एक बार फिर से अपने एक्स ब्वा़यफ्रेंड के करीब आ गई हैं. सुष्मिता से उम्र में छोटे इस एक्स ब्वायफ्रेंड का नाम रितिक भसीन है. सुष्मिता इन दिनों रितिक के साथ खूब देखी जा रही हैं.

हाल ही में ये दोनों एक पार्टी में एक-दूसरे के काफी करीब भी दिखे. सूत्रों के मुताबिक, इस पार्टी में सुष्मिता और रितिक एक दूसरे के साथ काफी कंफर्टेबल और क्लोज दिखाई दिए. चौंकाने वाली बात यह है कि कुछ दिनों पहले ही यह खबर फैली थी कि सुष्मिता सेन ने अपने ‘बॉयफ्रेंड’ रितिक भसीन से ब्रेकअप कर लिया है. उन रिपोर्ट्स के मुताबिक, दोनों ने चार साल तक डेट करने के बाद अपने रिश्ते को खत्म कर दिया था. लेकिन अब दोनों का फिर से साथ देखा जाना नई कहानी कह रहा है. रितिक भसीन अभी तक बैचलर हैं. उनके पास कुछ नाइटक्लनब हैं. उन्होंतने मुंबई के जय हिंद कॉलेज से पढ़ाई की.

आखिरी टेस्ट ड्रा, भारत ने सीरीज 1-0 से जीती

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नई दिल्ली। भारत और श्रीलंका के बीच दिल्ली में खेला गया पांच टेस्ट सीरीज का आखिरी मुकाबला ड्रॉ पर खत्म हुआ. इसी के साथ ही टीम इंडिया ने 3 मैचों की यह टेस्ट सीरीज 1-0 से जीत ली है. इसी के साथ टीम इंडिया ने ऑस्ट्रेलिया के लगातार 9 टेस्ट सीरीज जीतने के वर्ल्ड रिकॉर्ड की भी बराबरी कर ली है.

भारत की पहली पारी के 536 रनों के जवाब में श्रीलंका की टीम अपनी पहली पारी में 373 रन बनाकर ऑल आउट हो गई, जिससे भारत को 163 रनों की बढ़त मिल गई. दूसरी पारी में टीम इंडिया ने 246 रन बनाकर पारी घोषित कर दी और श्रीलंका को जीत के लिए 410 रन का लक्ष्य दिया.

410 रनों के लक्ष्य का पीछा करते हुए श्रीलंका की टीम ने 299 रन पर 5 विकेट गंवा दिए थे, लेकिन टीम इंडिया मैच जीतने के लिए बचे हुए 5 विकेट हासिल करने में नाकाम रही और मैच को ड्रॉ घोषित कर दिया गया. दूसरी पारी में श्रीलंका की तरफ से धनंजय डी सिल्वा ने 119 रन बनाए जबकि रोशन सिल्वा ने 74 रनों की पारी खेलकर मैच ड्रॉ करा दिया. पांचवें दिन टीम इंडिया के गेंदबाज 87 ओवरों में सिर्फ दो विकेट ही ले पाए.

दलित युवाओं को रिझाने के लिए मोदी सरकार की नई घोषणा

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नई दिल्ली। अंतरजातीय विवाह यानि की इंटरकॉस्ट मैरेज के संबंध में एक नई खबर आई है. इसके मुताबिक केंद्र सरकार ने इंटरकॉस्ट मैरेज करने वालों को ढाई लाख रुपये देने की घोषणा की है. हालांकि यह नियम पहले भी था लेकिन यह उसी को मिलता था, जिसकी सलाना आमदनी 5 लाख तक हो. जिसकी आमदनी पांच लाख से ज्यादा होती थी, उसे यह फायदा नहीं मिलता था. अपने नए फैसले में सरकार ने 5 लाख अधिकतम की सीमा को समाप्त कर दिया है.

इस नए संसोधऩ के बाद दलित से शादी करने वाले सभी लोगों को इस ‘डॉ. अंबेडकर स्कीम फॉर सोशल इंटीग्रेशन थ्रू इंटरकास्ट मैरिज’ योजना का लाभ मिल सकेगा. लड़का या लड़की में से किसी एक को दलित होना चाहिए. अपने ताजा आदेश में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने इस संबंध में आदेश जारी किया है. मंत्रालय ने यह भी कहा है कि इस योजना के लिए आय के आधार पर कोई सीमा नहीं होनी चाहिए. हालांकि मंत्रालय ने आधार नंबर को अनिवार्य कर दिया है. जोड़े को अब अपना आधार नंबर और उससे जुड़ा बैंक अकाउंट भी देना होगा. साथ ही शादी को हिंदू मैरिज एक्ट के तहत रजिस्टर भी होना चाहिए.

यह योजना साल 2013 में शुरू की गई थी. जिसमें केंद्र सरकार का लक्ष्य हर साल कम से कम 500 अंतर जातीय विवाह करने वाले जोड़े को योजना के तहत पुरस्कृत करने का लक्ष्य रखा गया था.

लेकिन अब सरकार की इस योजना की हकीकत देखिए. शुरू होने के बाद से ही यह योजना बेहतर तरीके से लागू नहीं हो पाई है. सरकार हर साल पांच सौ शादियों का लक्ष्य लेकर चल रही थी लेकिन 2014-15 में सिर्फ 5 जोड़ों को ही इस सरकारी योजना का लाभ मिल पाया. 2015-16 में केवल 72 लोगों को इसका लाभ मिला. 2017 की बात करें तो इस साल केवल 74 जोड़ों को चुना गया है.

अब सवाल उठता है कि क्या सरकार सच में इस योजना के जरिए अंतरजातीय विवाह को प्रोत्साहित करना चाहती है या फिर सिर्फ इसके बहाने दलित युवाओं को रिझाने की कोशिश कर रही है. क्योंकि सरकार को योजना में छूट देने से पहले सच में योग्य जोड़ों को ढूंढ़ कर उन तक योजना का लाभ पहुंचाना चाहिए था.