एक मिनट के एक करोड़ लेती हैं प्रियंका चोपड़ा

नई दिल्ली बॉलीवुड से हॉलीवुड तक पहुंच गई प्रियंका चोपड़ा काफी महंगी हो गई हैं. मीडिया में इन दिनों इस बात की चर्चा जोरों पर है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक प्रियंका चोपड़ा सिने अवॉर्ड में हिस्सा लेने इंडिया आ रही हैं. इसमें परफार्मेंस के लिए प्रियंका ने एक मिनट के लिए 1 करोड़ रुपए मांगे हैं. इन अवार्ड शो में प्रियंका के पांच मिनट परफार्मेंस की बात कही जा रही है, जिसके लिए वो 4 से 5 करोड़ रुपए फीस लेंगी.

खबर के मुताबिक जी सिने अवार्ड में वह 19 दिसंबर को हिस्सा लेने आएंगी, इसका टीवी पर प्रसारण नए साल के मौके पर अगले महीने दिखाया जाएगा. बता दें कि प्रियंका इन दिनों हॉलीवुड फिल्मों की शूटिंग में बिजी हैं. उनकी अपकमिंग हॉलीवुड फिल्म ‘Isn’t It Romantic’ और ‘A Kid Like Jake’ आने वाली है.

 

जिग्नेश मेवाणी के विधानसभा क्षेत्र में दुबारा होगी वोटिंग

jignesh mewaniगांधीनगर तकनीकी गड़बड़ी के बाद चुनाव आयोग ने गुजरात के छह केंद्रों पर फिर से मतदान करने का आदेश दिया है. इन सभी मतदान केंद्रों पर दूसरे चरण का मतदान हुआ था. इसमें युवा दलित नेता जिग्नेश मेवाणी के विधानसभा के क्षेत्र भी शामिल हैं। निर्वाचन आयोग ने तकनीकी कारणों का हवाला देते हुए शुक्रवार रात दोबारा चुनाव कराने के आदेश दिए और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) में मौजूद डेटा को हटा दिया.

जिन विधानसभा क्षेत्रों में दुबारा मतदान होना है उनमें- वाडगाम विधानसभा क्षेत्र की छानियां -1 और छानियां -2, विरमगाम विधान सभा के बूथ नंबर 27, दस्करोई विधानसभा के नवा नारोदा मतदान केंद्र, सावली क्षेत्र के नहारा -1 और सकरदा -7 में दोबारा के लिए चुनाव कराए गए आदेश दिए गए. यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि युवा दलित नेता जिग्नेश मेवाणी ने वडगाम विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा है.

पिता राजीव गांधी को कितना याद करते होंगे राहुल

राहुल गांधी आज औपचारिक तौर पर कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभाल लेंगे. राहुल गांधी को कांग्रेस की कमान ऐसे वक्त में मिल रही हैं, जब पार्टी अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है. लोकसभा चुनाव में 50 सीटों के नीचे तो कांग्रेस 2014 में ही आ गई थी लेकिन उसके बाद एक-एक कर राज्यों से उसकी सत्ता भी चली गई जिससे पार्टी औऱ कमजोर हो गई है. आज जब राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद की कमान संभाल ली है, जाहिर सी बात है कि उनको पिता राजीव गांधी याद आते होंगे.

 दोनों की जिंदगी में काफी समानताएं हैं. राजीव गांधी राजनीति में नहीं आना चाहते थे. अगर असमय संजय गांधी की मौत न हुई होती तो राजीव शायद एक फैमिली मैन बनकर एयर इंडिया के पायलट ही बने रहते इसी तरह राहुल गांधी भी काफी ऊहापोह के बाद राजनीति में आएं. राजीव गांधी ने अपनी मां इंदिरा को असमय खो दिया और जब राजीव गांधी की मौत हुई तो राहुल बच्चा कहे जाने की उम्र से थोड़े ही बड़े थे. राजीव गांधी को पिता का प्यार नहीं मिला. ऐसे ही राहुल गांधी को भी पिता राजीव का प्यार नहीं मिल पाया. परिवार में उनके साथ सिर्फ मां सोनिया और बहन प्रियंका ही थे. इन दोनों के अलावा राहुल गांधी के सामने हथियारबंद सुरक्षाकर्मी और अनजाने चेहरों वाले नेताओं की फौज थी.

राजीव गांधी ने राजनीति अपनी मां से सीखी, उसी तरह जब राहुल गांधी राजनीति में उतरें तब उनकी भी गुरू के रूप में मां सोनिया ही मौजूद थीं. राहुल गांधी जब राजनीति में आएं तो भले ही विपक्ष वाले उनपर हंसते हों, उन्हें कमतर दिखाने के लिए उन्हें विभिन्न नामों से संबोधित करते हों, लेकिन 2004 में राजनीति में आने के बाद बीते 13 सालों में उन्होंने खुद को साबित किया है, इसमें कोई शक नहीं है. राहुल चाहते तो कब का देश का प्रधानमंत्री बन गए होते लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया आप खुद से पूछिए, भारत में कितने ऐसे राजनेता हैं जो यह मौका गंवाने को तैयार होंगे.

आज जब राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बन गए हैं तो जाहिर है कि उनके सामने ढेर सारी चुनौतियां हैं. लेकिन अध्यक्ष पद पर ताजपोशी की प्रक्रिया में सामने आए गुजरात के चुनाव में राहुल गांधी ने भाजपा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जिस तरह घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया है, उससे यह साफ है कि राहुल को हल्के में नहीं लिया जा सकता. जाहिर है 2019 में केंद्र की सत्ता के लिए होने वाला संघर्ष शानदार होगा. जब राहुल पहली बार लोगों के बीच आए थे तो अखबारों में एक हेडलाइन समान थी, “यह तो बिल्कुल अपने पापा की तरह दिखता है”. कांग्रेसी चाहेंगे कि राहुल अपने पिता की तरह ही पार्टी के अध्यक्ष और फिर देश के प्रधानमंत्री बनें.

 

‘सिंह’ सरनेम पर संघर्ष को उतारू क्षत्रिय

पश्चिमी राजस्थान में दलितों और क्षत्रिय सवर्णों के मध्य सिंह शब्द के इस्तेमाल को लेकर कटुता खतरनाक स्तर पर पहुंच चुकी है. विशेष रूप से जालोर जिले से ऐसी खबरें आ रही हैं, जहाँ पर कुछ दलित युवाओं द्वारा अपने नाम के साथ सिंह लिख देने के कारण उन्हें भयंकर अपमान और उत्पीड़न झेलना पड़ रहा है.

प्राप्त जानकारी के अनुसार नपसा बौद्ध विराना, पदम सिंह मेघवाल तथा ओयाराम बोरटा को इस बात के लिए असंख्य गालियां दी गई है कि वे गैर राजपूत हो कर सिंह, ठिकाना, बना और सा जैसे शब्द क्यों इस्तेमाल कर रहे है ? इनके डी एन ए पर सवाल उठाए गए है और सोशल मीडिया पर यहां तक भी लिख कर पूछा गया है कि उन्हें पैदा करने के लिए उनकी माँ किसी क्षत्रिय के साथ सोई क्या? बात यहीं खत्म नहीं हुई बल्कि उपरोक्त युवकों को मोबाईल पर जान से मारने की धमकियां भी दी गयी और उनसे माफीनामें लिखवाए गए है, गांव से बहिष्कृत किया गया है और माफी मांगते हुए वीडियो बनवा कर उन्हें वायरल किया गया है. दलित अत्याचार की ऐसी बानगी शायद राजस्थान के अलावा अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलेगी.

कुछ साल पहले पाली जिले के जाडन निवासी चुन्नी लाल मेघवाल को सिर्फ इस बात के लिए सामंती तत्वों ने पीट पीट कर मार डाला, क्योंकि उसने अपनी बेटी का नाम बाईसा रख लिया था, अपने पति की निर्मम हत्या का सदमा पत्नी सह नहीं पाई और वह भी चल बसी. जिस बेटी को चुन्नी लाल बाईसा के रूप में पाल-पोस कर बड़ा करना चाहता था, वह पागल हो गयी! यह तो बानगी भर है. सामंती अत्याचार की इससे भी भयानक अमानवीय उत्पीड़न की कहानियां पश्चिमी राजस्थान के गांव-गांव में बिखरी पड़ी है. दलित महिलाओं से बलात्कार, खाट पर नहीं बैठने देने, बिन्दोली में घोड़े पर नहीं चढ़ने देने, वोट नहीं डालने देने, चुनाव नहीं लड़ने देने, सार्वजनिक स्थलों का उपयोग नहीं करने देने, बात बात में निंदनीय भाषा का प्रयोग करके अपमानित करने, बेगार लेने, मारपीट करने और जान तक ले लेने के प्रकरण अक्सर दर्ज किए जाते हैं. राजस्थान दलित समुदाय के प्रति नफरत, छुआछूत, भेदभाव, शोषण तथा अन्याय और उत्पीड़न का आज भी गढ़ बना हुआ है.

यह बात कितनी शर्मनाक है कि शब्द भी कुछ जातियों ने आरक्षित कर रखें हैं, उनको लगता है कि सिंह जैसे सर नेम सिर्फ उन्हीं के लिए बनाया गया है. अगर इसका इस्तेमाल कोई दलित कर दे तो यह दण्डनीय अपराध है. शायद इसीलिए नरपत बौद्ध को नपसा लिखने, फेसबुक पर घोड़े पर सवार प्रोफ़ाइल फ़ोटो लगाने की सज़ा दी गई है.

जालोर जिले के राजपूत और दलित युवा बुरी तरह से सोशल मीडिया पर इस बात को लेकर एक दूसरे से उलझे हुए हैं कि सिंह कौन लगा सकता है और कौन नहीं? ऐसी चीज़ें उनकी प्रगति में बाधक ही साबित होगी ,अपने नाम के साथ कुछ भी लिखने का अधिकार उन्हें भारत का संविधान देता है और इस पर कोई रोक नहीं लगा सकता है. राजस्थान के विगत एक सदी के इतिहास में कईं गैर राजपूत समुदायों ने स्वयं का क्षत्रियकरण किया है और अपने नामों से राम, लाल, चंद, मल हटा कर सिंह लगा लिये उससे राजपूत समुदाय का क्या नुकसान हुआ? क्या इससे उनके अस्तित्व, गरिमा अथवा मान सम्मान पर किसी प्रकार का अतिक्रमण हुआ? नहीं हुआ, समाजशास्त्री इसे संस्कृतिकरण की प्रक्रिया कहते हैं, जो सतत चलती रहती है. कईं समुदाय ब्राह्मण बने, कुछ वैश्य और कुछ क्षत्रिय तो कुछ गैर हिन्दू समुदायों से जा मिले, यह चलता रहेगा, किसी भी समुदाय को इस प्रक्रिया से भयभीत नहीं होना चाहिए, इससे किसी का अस्तित्व मिटने वाला नहीं है.

यह व्यर्थ का विवाद है, जिसमें अपनी ऊर्जा बिल्कुल भी नष्ट नहीं करनी चाहिए. दलित युवाओं के लिए किसी और समुदाय की नकल करने या मंदिरों में घुसने के आंदोलन करने का समय नहीं है. समय विकट है, दूर की सोच के साथ बड़ी चीजें करने का स्वप्न लेने का समय है. उन्हें साकार करने में जुट जाने का समय है. हम मेहनतकश समुदाय हैं, हमारी अपनी संस्कृति और सभ्यता और विचारधारा है. हमें किसी से भी कोई शब्द या पहचान उधार लेने की जरूरत नहीं है.

(लेखक स्वतन्त्र पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता है.)

गुजरात चुनाव पर इस बड़े चुनावी विश्लेषक की राय सबसे अलग

rahul-hardikगुजरात। गुजरात चुनाव के दूसरे चरण के मतदान के बीच चुनाव में तमाम दलों की स्थिति को लेकर अनुमान सामने आने लगे हैं. चुनाव की पूर्व संध्या पर 13 दिसंबर को चुनाव विश्लेषक योगेन्द्र यादव ने गुजरात को लेकर अपना चुनावी सर्वेक्षण जारी किया है. इस सर्वेक्षण में भाजपा के लिए बड़ी चुनौती की बात कही गई है. अपने सर्वेक्षण में योगेन्द्र यादव ने गुजरात में तीन स्थिति होने की बात कही है.

यादव के मुताबिक पहली स्थिति में भाजपा और कांग्रेस के बीच कड़ी टक्कर की बात कही जा रही है. इसके मुताबिक गुजरात चुनाव में भाजपा और कांग्रेस दोनों को 43 प्रतिशत वोट मिल सकते हैं. हालांकि दोनों के सीटों में अंतर रहेगा. समान वोट प्रतिशत होने के बावजूद भाजपा को 86 सीटें मिलेंगी जबकि कांग्रेस उससे 6 सीट ज्यादा रहेगी. कांग्रेस के हिस्से में 92 सीट आने की संभावना जताई गई है.

 यादव के मुताबिक जो दूसरी स्थिति बन सकती है, उसमें भाजपा को 41 प्रतिशत जबकि कांग्रेस को 45 प्रतिशत वोट मिलने की संभावना है. यहां वोट प्रतिशत के साथ दोनों की सीटों में काफी परिवर्तन देखने को मिल सकता है. यह अंतर तकरीबन 50 सीटों का होने का अनुमान है. यादव के मुताबिक ऐसी स्थिति में कांग्रेस को 113 सीटें मिलेंगी, जबकि भाजपा के हिस्से में 65 सीटें आएंगी.

यादव ने जो तीसरी संभावना जताई है वह भाजपा के लिए बुरी खबर साबित हो सकती है. इसके मुताबिक गुजरात चुनाव में जिस तरह से भाजपा के खिलाफ तमाम वर्गों के लोगों में गुस्सा है, वह प्रदेश से भाजपा का सूपड़ा साफ कर सकती है. इस बात की संभावना ज्यादा है, क्योंकि गुजरात में दलित, आदिवासी, पाटीदार और व्यापारी वर्ग के भाजपा के खिलाफ होने की खबर है. हालांकि 18 दिसंबर को चुनाव के नतीजे आने के बाद साफ हो जाएगा कि यह विश्लेषण सच के कितना करीब बैठता है.

रंग लाया आंदोलन, फिर से बनेगी बाबासाहेब की प्रतिमा

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सारण। बिहार के मशरक स्थित टोटहा जगतपुर में स्थापित बाबासाहेब की प्रतिमा को तोड़ने के बाद जिले भर के अम्बेडकरवादियों द्वारा किया गया आंदोलन रंग ले आया है. सारण के डीएम हरिहर प्रसाद ने जगह की जांच कर फिर से प्रतिमा बनाए जाने का आदेश दिया है. घटना के बाद भड़के विरोध से सकते में आए जिलाधिकारी ने भवन निर्माण विभाग के इंजीनियर के साथ बैठक की. इसमें डीएम ने प्रतिमा स्थल की जांच करने औऱ कोई परेशानी आने की स्थिति में उसे दूर करते हुए फिर से प्रतिमा बनाए जाने का आदेश दिया. जिलाधिकारी ने चौराहे को विकसित करने का भी निर्देश दिया है.

जिला प्रशासन द्वारा इस तरह की सूचना आने के बाद जिले भर के अम्बेडकरवादियों में काफी उत्साह है. घटना के बाद से ही पूरे छपरा जिले में आंदोलन भड़क गया था. लोगों ने पूरे छपरा जिले में सड़क पर प्रदर्शन किया. उन्होंने रेल से लेकर रास्ता तक रोक दिया. अम्बेडकरवादियों के लिए यह प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया था क्योंकि प्रतिमा का विखंडन सीधे तौर पर बाबासाहेब का अपमान था. मामले में इसलिए भी दबाव बन पाया क्योंकि जिले भर के अम्बेडकरवादी संगठन साथ आ गए थे.

साझा विरोध की वजह से ही एक के बाद एक लगातार अधिकारी घटनास्थल का दौरा करते रहें. मशरक के बीडीओ रंजीत कुमार सिंह ने उस स्थल का जायजा लिया और बाबा साहेब की मूर्ति बनवाने के लिए उच्चाधिकारी के पास पत्र भेजा. इसके पहले मढ़ौरा के एसडीओ ने भी मामले की जांच की. इस मामले में संगठनों द्वारा अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला भी दर्ज करवाया गया. बताते चलें कि 10 दिसंबर को सारण के कमिश्नर नर्वदेश्वर लाल ने छपरा जिले के टोटहा जगतपुर पानापुर में बाबासाहेब की प्रतिमा का अनावरण किया था, जिसे उसी रात को जातिवादी गुंडों ने तोड़ डाला था. जिसके बाद जिले भर में आंदोलन भड़क गया था.

रिपोर्ट- नागमणि

टॉपर दलित छात्रों का राष्ट्रपति से पदक लेने से इंकार

Sudhakar Pushker

लखनऊ। लखनऊ स्थित भीमराव अम्बेडकर युनिवर्सिटी के दो टॉपर दलित छात्र राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से गोल्ड मेडल नहीं लेंगे. इन छात्रों का कहना है कि देश भर में लगातार हो रहे दलित उत्पीड़न के कारण उन्होंने यह फैसला लिया है. विश्वविद्यालय का दीक्षांत समारोह 15 दिसंबर को होना है, जिसमें मुख्य अतिथि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद हैं. जिन दो छात्रों ने इंकार किया है उनके नाम रामेन्द्र नरेश और सुधाकर पुष्कर हैं.

रामेन्द्र नरेश ने 2013 से 2016 में मास्टर इन कम्प्यूटर एप्लीकेशन (एमसीएम) में टॉप किया है. इसके बाद नरेश ने 2017 में बीएड में एडमिशन लिया था. हालांकि विश्वविद्यालय प्रशासन ने विश्वविद्यालय के खिलाफ गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाकर रामेन्द्र नरेश समेत 8 छात्रों को निष्कासित कर दिया था. वहीं, 2016 के एमफिल मैनेजमेंट के पास आउट छात्र सुधाकर पुष्कर ने भी मेडल लेने से इंकार किया है.

Ramendra Naresh

इन दोनों का कहना है- “देश के साथ-साथ विश्वविद्यालय में लगातार हो रहे दलित उत्पीड़न की वजह से मेरा मन दुखी हो गया है. इस उत्पीड़न के न रुकने के कारण दलित समाज के साथ बीबीएयू में दलित छात्र व प्रोफ़ेसर दोनों परेशान हैं. मैं ऐसे मेडल को लेकर क्या करूंगा जब मेरे दलित भाईयों को हीनभावना से देखा जाता है और उनको विभिन्न ढंग से प्रताड़ित किया जाता है. हम विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो आर सी सोबती के द्वारा मेडल तभी स्वीकार करेंगे जब विश्वविद्यालय के साथ-साथ संपूर्ण भारत में दलितों को सम्मान और बराबरी की दृष्टि से देखा जाएगा.”

असल में बीबीएयू के दलित छात्र दलित अत्याचार और बीबीएयू में हो रहे दलित विद्यार्थियों के साथ भेदभाव को लेकर लगातार मुखर रहते हैं. दलित उत्पीड़न के मुद्दे पर ही 2014 में दीक्षांत समारोह के मुख्य अतिथि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी विरोध किया जा चुका है. तब राम करन निर्मल और उनके साथियों ने मोदी गो बैक के नारे लगाए थे. उस समय रोहित वेमुला के सुसाइड का मामला गरमाया था. उसी को लेकर छात्रों ने विरोध जताया था. इस बार दोनों छात्रों के इंकार के बाद बीबीएयू प्रशासन भी सतर्क है. दीक्षांत सामरोह में उन्हीं छात्रों को शामिल किया जाएगा जिन्हें पास मिला होगा.

फॉलोअपः मशरक में प्रतिमा तोड़ने वालों की एसआईटी जांच की मांग

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छपरा। जिले के मशरक प्रखंड के कर्णकुदरिया में बाबा साहेब के प्रतिमा तोड़े जाने के मामले में विवाद बढ़ता जा रहा है. घटना के बाद अम्बेडकरवादी संगठन लगातार सक्रिय हैं. मुख्यालय पर अम्बेडकर रविदास महासंघ के तत्वाधान में शहर के मालाखाना चौक स्थित अम्बेडकर स्मारक स्थल पर बैठक किया गया, जिसमें बाबा साहेब के प्रतिमा तोड़े जाने की निंदा की गई.

इस अवसर पर अम्बेडकरवादियों ने वरीय पुलिस पदाधिकारियों को एसआईटी गठित कर मामले की जांच की मांग की है. उन्होंने प्रतिमा तोड़ने वाले को गिरफ्तार कर जेल भेजने व उन्हें देशद्रोही घोषित करने की मांग की है.

वक्ताओं ने जिला प्रशासन से बाबासाहेब के नव स्थापित प्रतिमा स्थल पर सरकारी खर्च से नया प्रतिमा स्थापित करने की मांग की है. उन्होंने कहा कि अगर समय रहते यथाशीघ्र डॉ. अम्बेडकर की प्रतिमा स्थापित नहीं की गई तो संघ चरणबद्ध आंदोलन करेंगी और इसकी पूरी जवाबदेही जिला प्रशासन की होगी. उधर डॉ. बीआर अंबेडकर परिगणित जाति कल्याण संघ की बैठक धर्मनाथ राम की अध्यक्षता में की गई. इसमें बाबासाहेब के प्रतिमा खंडित करने की घोर निंदा करते हुए असामाजिक तत्वों को चिन्हित कर यथाशीघ्र गिरफ्तार करने की मांग की गई.

बाबासाहेब के अपमान को लेकर महाराष्ट्र के भंडारा में तनातनी जारी

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भंडारा। बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर के परिनिर्वाण दिवस के दिन महाराष्ट्र के भंडारा में कुछ ऐसा हुआ कि पूरे शहर के अम्बेडकरवादी सड़कों पर उतर आएं. दरअसल परिनिर्वाण दिवस होने की वजह से भंडारा के जवाहरनगर स्थित आयुध निर्माणी में काम करने वाले अम्बेडकरवादी कर्मचारियों ने बाबासाहेब को श्रद्धांजली देने का कार्यक्रम आयोजित किया था. जिसकी वजह से दो कर्मचारियों को अपनी सीट पर पहुंचने में जरा सी देर हो गई.

भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अधीन आने वाले इस आयुध फैक्ट्री के अधिकारी सैन्की बग्गा ने इस पर दोनों कर्मचारियों को काफी फटकार लगाई. कर्मचारियों का आरोप है कि जब उन्होंने परिनिर्वाण दिवस का हवाला देकर देरी की वजह बताई तो इस पर ग्रुप ए कर्मचारी बग्गा और भड़क गया. उसने न सिर्फ दोनों कर्मचारियों को भला बुरा कहा, बल्कि बाबासाहेब के बारे में भी अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हुए आपत्तिजनक टिप्पणी कर दी.

डॉ. अम्बेडकर के बारे में अभद्र टिप्पणी सुनते ही दोनों कर्मचारियों ने तुरंत बग्गा का विरोध करते हुए अन्य कर्मचारियों को सूचित किया. बात बाबासाहेब के अपमान से जुड़ी थी सो तुरंत आग की तरह फैल गई. भंडारा में मौजूद अन्य अम्बेडकरवादी संगठनों ने भी कर्मचारियों से मिलकर अधिकारी पर कार्रवाई करने की मांग को लेकर प्रदर्शन शुरू कर दिया. इस बारे में संविधान निर्माता और भारत रत्न के अपमान को लेकर नजदीकी पुलिस थाने में शिकायत भी दर्ज कराई गई.

घटना की गंभीरता को देखते हुए पुलिस प्रशासन ने ग्रुप ए अफसर बग्गा पर अनुसूचित जाति /जनजाति अधिनियम तथा अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिय, हालांकि अग्रिम जमानत ले लेने के कारण बग्गा की गिरफ्तारी नहीं हो सकी. लेकिन कर्मचारियों ने बग्गा को निलंबित करने की मांग लेकर मोर्चा खोल दिया है. जिसके बाद आयुध निर्माणी प्रशासन का कहना है कि उसने निलंबन के प्रस्ताव को कोलकात्ता बोर्ड को भेज दिया है. हालांकि अभी तक अधिकारी पर कोई कार्रवाई नहीं हुआ है. दूसरी ओर इस पूरे मामले में जिले भर के अम्बेडकरवादी संगठन साथ आ गए हैं और मामले पर नजर बनाए हुए हैं. उनका कहना है कि अगर बाबासाहेब का अपमान करने वाले अधिकारी सैंकी बग्गा पर कार्रवाई नहीं होगी तो वो बड़ा आंदोलन करेंगे, जिसके बाद प्रशासन के हाथ पांव फूले हुए हैं.

आडवाणी को एक और झटका देने की तैयारी में मोदी

आडवाणी और मोदी

नई दिल्ली। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भले ही किसी के अच्छे दिए आए हो या न आए हो, भाजपा के पूर्व दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी के लिए बुरे दिन जरूर आ गए. मोदी ने पहले आडवाणी को सिर्फ एक सांसद तक सीमित कर दिया तो वहीं राष्ट्रपति बनकर राजनीति से गरिमापूर्ण विदाई की उनकी उम्मीदों पर भी पानी फेर दिया. इसी कड़ी में मोदी आडवाणी को एक बड़ा और आखिरी झटका देने की तैयारी में हैं.

खबर है कि भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह जल्द ही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के संयोजक बन सकते हैं. 15 दिसंबर से शुरू हो रहे संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान एनडीए संसदीय दल के नेता यानि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसका फैसला ले सकता है. अगर ऐसा होता है तो संसद में लालकृष्ण आडवाणी को अपना कमरा खाली करना पड़ सकता है.

संसद भवन में ग्राउंड फ्लोर पर एनडीए संयोजक के लिए एक कमरा आवंटित है. इस कमरे में फिलहाल आडवाणी बैठते हैं. चूंकि लालकृष्ण आडवाणी अभी एनडीए या भाजपा में किसी पद पर नहीं है ऐसे में अमित शाह के आने के बाद एनडीए संयोजक के लिए आवंटित कमरा उन्हें खाली करना होगा.

इससे पहले जब 2014 में मोदी सरकार सत्ता में आई थी उस वक्त भी आडवाणी के कमरे के बाहर से उनकी नेम प्लेट हटा ली गई थी. ऐसे में आडवाणी भाजपा सांसदों के लिए आबंटित कमरे में ही एक कोने में सोफे पर आकर बैठ गए थे. पार्टी में काफी भीतरी घमासान के बाद तीन दिन के बाद उन्हें बैठने के लिए एनडीए अध्यक्ष का कमरा दिया गया था. अब चूंकि अमित शाह का एनडीए संयोजक बनना लगभग तय है तो आडवाणी को कमरा खाली करना पड़ेगा.

गुजरात चुनाव को कितना प्रभावित करेंगे युवा त्रिमूर्ति

hardik-jigneshअहमदाबाद गुजरात में चुनाव प्रचार थमने के बाद अब बारी मतदाताओं की है. दूसरे चरण में राज्य के 14 जिलों की 93 सीटों पर 14 दिसंबर यानि कल वोटिंग होनी है. जहां चुनाव होने हैं, उनमें मध्य गुजरात में अहमदाबाद, दाहोद, खेड़ा, आणंद, पंचमहल और वडोदरा जिले हैं. जबकि उत्तर गुजरात में गांधीनगर, बनासकांठा, साबरकांठा, अरवली, मेहसाना, छोटा उदयपुर अलवल्ली और पाटन जिले में चुनाव होना है. दूसरे दौर की 93 सीटों में से 54 सीटें ग्रामीण क्षेत्र की हैं, तो वहीं 39 सीटें शहरी है.

2012 के चुनाव की बात करे तो शहरी सीटों पर भाजपा मजबूत रही जबकि ग्रामीण सीटों पर कांग्रेस का प्रभाव रहा. लेकिन इस बार सियासी माहौल बदला हुआ है. और इसमें सबसे बड़ी भूमिका उन तीनों युवाओं की है, जो आंदोलन की राह पकड़ कर चुनावी राजनीति में उतर गए हैं.  आखिरी चरण में इन तीनों युवा नेताओं यानि की हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर की असली परीक्षा है. जहां तक ओबीसी नेता अल्पेश की बात है तो कांग्रेस में शामिल होने के बाद वह खुद अपने 7 समर्थकों के साथ चुनावी मैदान में हैं. ऐसे में अल्पेश के सामने इन सभी सीटों पर चुनाव जीतने का दबाव होगा, क्योंकि यह जीत गुजरात की राजनीति में उनके कद को नापेगी.

 वहीं दूसरी ओर दलित नेता जिग्नेश मेवाणी कांग्रेस के साथ मिलकर ही वडगाम सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं. लेकिन भाजपा की घेराबंदी के बाद वह चुनाव प्रचार के लिए अपनी सीट से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं. उनके सामने दलित वोटों को कांग्रेस के पक्ष में गोलबंद करने की चुनौती होगी. तीनों युवाओं में सबसे ज्यादा प्रभाव डालने वाले युवा तुर्क हार्दिक पटेल हैं और भाजपा सबसे ज्यादा इन्हीं से डरी हुई है. इस पाटिदार युवा नेता ने भाजपा के खिलाफ जोरदार ढंग से झंडा बुलंद किया है. इस दौर में वहीं चुनाव होने हैं, जो इलाके पटेल आरक्षण आंदोलन की गवाह बनी थी. देखना होगा कि भाजपा के रथ को रोकने में ये तीनों युवा तुर्क कितने कामयाब हो पाते है.

विराट कोहली और अनुष्का शर्मा की शादी की पूरी रिपोर्ट

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नई दिल्ली। भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान और फ़िल्म अभिनेत्री अनुष्का शर्मा की शादी की खबरों के बीच 11 दिसम्बर को रात 8.51 मिनट पर दोनों सेलिब्रेटिज ने एक साथ ट्वीट कर अपनी शादी की खबर पर मुहर लगा दी. इन दोनों ने शादी के लिए इटली को चुना. यहां फ्लोरेंस में दुनिया की दूसरी सबसे महंगी जगह पर दोनों ने शादी रचाई.

जिस रिसोर्ट में इन दोनों ने शादी रचाई वो आमतौर पर दिसम्बर में बंद रहता है लेकिन जाहिर सी बात है कि जब बात भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान की हो तो ताले खुल ही जाते हैं. शादी की घोषणा वाले ट्वीट को अब तक लाखों लोग लाइक कर चुके हैं तो हजारों लोगों ने इसे रि-ट्वीट भी किया है. इसी तरह विराट और अनुष्का की शादी के बाद फ़िल्म और खेल जगत की तमाम हस्तियों ने ट्वीट कर इन्हें बधाई दी है.

फ़िल्म जगत के दिग्गज नेता अमिताभ बच्चन तो वहीं क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर ने भी दोनों को नई जिंदगी की बधाई दी है. फिलहाल खबर यह है कि ये दोनों 21 दिसम्बर को दिल्ली में और 26 दिसम्बर को मुम्बई में रिसेप्शन करेंगे.

भाजपा विधायक की इसी तस्वीर पर हुआ है बवाल

मध्यप्रदेश के दलित विधायक गोपीलाल जाटव, इसी फोटो पर विवाद हुआ है

नई दिल्ली। पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर घूमती एक तस्वीर ने राजनीति में भीतर तक घुसे जातिवाद का घिनौना चेहरा सामने ला दिया है. तस्वीर सामने आने के बाद भाजपा में भी हलचल मच गई है. दरअसल ये तस्वीर मध्य प्रदेश की है. इसमें मध्य प्रदेश के परिवहन मंत्री भूपेंद्र सिंह और विदिशा के जिला पंचायत अध्यक्ष तोरण सिंह स्टील की थाली में भोजन कर रहे हैं, जबकि  उन्हीं के साथ बैठे दलित विधायक गोपीलाल जाटव पत्तल में भोजन कर रहे हैं.

तस्वीर पिछले 3-4 दिनों से सोशल मीडिया में वायरल हो रही थी. मीडिया में तस्वीर सामने आने के बाद भाजपा बैकफुट पर है. बचाव के लिए उसने दलित विधायक को ही सामने कर दिया है. यानी कि पीड़ित खुद भेदभाव करने वालों के बचाव में आया है. भाजपा विधायक जाटव इस फोटो को वायरल किए जाने को ‘राजनीतिक हथकंडा’ बता रहे हैं. उनके मुताबिक, तोरण सिंह के अचानक आने पर उन्होंने अपनी स्टील की थाली उनकी ओर बढ़ा दी, क्योंकि वे अतिथि थे. उसके बाद कई लोगों ने पत्तल में ही खाना खाया.

लेकिन दलित विधायक का यह बयान गले नहीं उतर रहा है. क्योंकि बीते शुक्रवार को परिवहन मंत्री भूपेंद्र सिंह और विदिशा जिला पंचायत के अध्यक्ष तोरण सिंह के साथ अशोकनगर से विधायक गोपीलाल जाटव कार्यक्रम में साथ थे. सभी के लिए एक स्थान पर भोजन की व्यवस्था भी थी. कार्यक्रम के बाद सभी खाना खाने गए. जहां मंत्री और जिला पंचायत अध्यक्ष दोनों तो स्टील की थाली में खाना खा रहे हैं, वहीं जाटव पत्तल में खाना खाते हुए दिख रहे हैं. दलित विधायक की सफाई के बावजूद सवाल यह है कि क्या मंत्री-विधायक के कार्यक्रम में आयोजक सिर्फ दो ही थालियों का प्रबंध कर सके होंगे यह बात गले से नहीं उतरती है.

वैसे भी जिस देश में दलित सांसद ही आरक्षण का बिल संसद में फाड़ देते हों वहां वो राजनीतिक दलों के कितने बड़े “यस मैन” हैं इसको साबित करने के लिए किसी सबूत की जरूरत नहीं है. इस घटना ने ये भी साबित कर दिया है कि भाजपा के सवर्ण नेता अपने दलित विधायकों और सांसदों के बारे में कैसी सोच रखते हैं.

दलित विद्यार्थियों के लिए केजरीवाल सरकार की खास योजना

नई दिल्ली। दिल्ली सरकार ने एससी/एसटी छात्रों के लिए एक खास स्कीम का ऐलान किया है. केजरीवाल ने ‘जय भीम मुख्यमंत्री प्रतिभा विकास योजना’ शुरू की है. इसका फायदा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों को मिलेगा. इसके तहत सरकार ने दलित छात्रों को मुफ्त कोचिंग की व्यवस्था करेगी. सरकार की इस योजना की मंशा यह है कि ‘पैसों की कमी के कारण किसी भी स्टूडेंट्स की पढ़ाई नहीं रोकी जा सकती.’

केजरीवाल की इस स्कीम में यूपीएससी परीक्षाओं की तैयारी के लिए दलित छात्रों को मुफ्त कोचिंग की सुविधा दी जाएगी. इसके अलावा इंजीनियरिंग और एमबीबीएस के एंट्रेस एग्जाम के लिए भी मुफ्त कोचिंग की सुविधा दी जाएगी. जिन दलित परिवारों की आमदनी सालाना छह लाख रुपए से कम होगी उनके बच्चों को इसका फायदा मिलेगा. कोचिंग लेने वाले छात्रों में से 75 फीसदी सरकारी स्कूल और 25 फीसदी निजी स्कूलों के बच्चे होंगे.

दलित छात्रों की कोचिंग फीस का 75 फीसदी हिस्सा दिल्ली सरकार देगी. छात्रों के अभिभावकों को सिर्फ 25 फीसदी फीस देना होगा. इसके अलावा सरकार 2500 रुपए प्रति माह का भत्ता भी देगी.

 

गुजरात चुनावः दलित और आदिवासी वोटों पर सबकी नजर

electionअहमदाबाद। गुजरात चुनाव प्रचार के आखिरी दिन मोदी और राहुल गांधी दोनों की नजर दलित और आदिवासी वोटों पर रही. राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर 14वां सवाल दागते हुए दलितों से जुड़ा मुद्दा उठाया. उन्होंने ट्विटर पर लिखा- न ज़मीन, न रोज़गार, न स्वास्थ्य, न शिक्षा… गुजरात के दलितों को मिली है बस असुरक्षा.. ऊना की दर्दनाक घटना पर मोदी जी हैं मौन.. इस घटना की जवाबदेही लेगा फिर कौन.. क़ानून तो बहुत बने दलितों के नाम..कौन देगा मगर इन्हें सही अंजाम?

वहीं दूसरी ओर गुजरात में पटेल समुदाय के बाद अगर बीजेपी को किसी दूसरे तबके की भारी नाराजगी झेलनी पड़ रही है तो वह हैं आदिवासी. गुजरात में आदिवासी बहुल इलाके पूरे गुजरात में हैं, और विधानसभा चुनाव के दोनों ही दौर में उनकी मौजूदगी है.

गुजरात में आदिवासी समुदाय के सबसे कद्दावर और रॉबिन हुड स्टाइल नेता छोटू भाई वसावा ने बीजेपी सरकार को आदिवासी विरोधी करार देते हुए इसे सत्ता से उखाड़ फेंकने का प्रण किया है, जिसने बीजेपी की नींद उड़ा दी है. वसावा ने भीलिस्तान टाइगर सेना और चुनाव लड़ने के लिए भारतीय ट्राइबल पार्टी का गठन किया है और वह पांच विधानसभा सीटों पर कांग्रेस के सहयोग से चुनाव लड़ रहे हैं.

इसी तरह दलित समुदाय भी बसपा के अलावा जिग्नेश मेवाणी और कांग्रेस के साथ खड़ा है. गुजरात में 7 प्रतिशत दलित वोटों में से भाजपा के खेमे में कुछ भी जाने की संभावना बहुत कम है. इस बीच राहुल गांधी ने दलितों का सवाल तब उठाया है जब गुजरात में दूसरे चरण के लिए चुनाव प्रचार का आज आखिरी दिन है. दूसरे चरण का मतदान 14 दिसंबर को होगा और चुनाव के नतीजे 18 दिसंबर को आएंगे.

UP विधानसभा के बाहर मैला ढोने वाली महिलाओं ने किया प्रदर्शन

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उत्तर प्रदेश। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में विधानसभा सभा के बाहर रविवार को मैला ढोने वाली सैकड़ों महिलाओं ने विरोध प्रदर्शन किया. बुंदेलखंड के जालौन से आईं महिलाओं ने हजरतगंज में बनी गांधी प्रतिमा के सामने भी प्रदर्शन किया. दलित अधिकार और स्वाभिमान मार्च के बैनर तले बुलाए गए इस प्रदर्शन का मकसद महिलाओं को इस कुप्रथा से मुक्ति दिलाना है.

बुंदेलखंड दलित अधिकार मंच के नेतृत्व में सैकड़ों मैला ढोने वाली जालौन जिले की महिलाओं ने लखनऊ में प्रर्दशन किया. उन्होंने मुख्यमंत्री से मैला ढोने की प्रथा से मुक्ति दिलाने की मांग की, उन्होंने कहा कि कि 2013 में मैला ढोने की प्रथा को बैन कर दिया गया है, इसके बावजूद बुंदेलखंड में ये प्रथा जारी है.

बुंदेलखंड दलित अधिकार मंच के संयोजक कुलदीप बौद्ध ने कहा कि बुंदेलखंड में दो सूखी रोटी पर आज भी सैकड़ों महिलाएं मैला ढोने को मजबूर हैं. उन्होंने बताया कि जालौन जिले के दो ब्लाक महेबा और कदौरा में 276 महिला मैला ढोने का काम कर रही है. सरकार ने इस प्रथा को बैन करके पुर्नावास की बात कही लेकिन ये प्रथा अभी भी जारी है.

कुलदीप बौद्ध ने बताया कि हमारी मांग है महिलाओं को मैला ढोने से रोका जाए और उनके लिए स्थाई आवास, रोजगार की व्यवस्था की जाए और साथ ही उन्हें पांच एकड़ जमीन दी जाए. लेकिन इस पुर्नावास के तहत जो भी सुविधाएं कहीं गई है वो नहीं मिल रही हैं. इसी के चलते बुंदेलखंड के जालौन जिले की सैकड़ों मैला ढोने वाली महिलाएं अपनी मांगों को लेकर लखनऊ आई हैं.

सारणः दिन में कमिश्नर ने बाबासाहेब की मूर्ति का अनावरण किया, रात में सामंतवादियों ने तोड़ दिया, सड़कों पर उतरे अम्बेडकरवादी

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सारण। बिहार के कुछ इलाकों में जातिवाद किस कदर कायम है और जातिवादियों के हौंसले किस कदर बढ़े हुए हैं यह 10 दिसंबर को हुई एक घटना से समझा जा सकता है. यह घटना इस बात को भी दिखाती है कि सामंतवादी बाबासाहेब के नाम और दलितों को देश की सत्ता का रास्ता दिखाने के लिए उठी ऊंगली से कितना डरते हैं. यही वजह है कि तमाम जगहों से लगातार बाबासाहेब की प्रतिमा को तोड़े जाने की खबरें आती रहती हैं.

दरअसल कल रविवार को बिहार के सारण जिले में मशरक स्थित टोटहां जगतपुर, पानापुर में बाबासाहेब की एक ऊंची लंबी प्रतिमा का अनावरण हुआ. इसका निर्माण अम्बेडकर लोक सेवा संघ के द्वारा करवाया गया. प्रतिमा अनावरण के लिए सारण के कमिश्नर नर्वदेश्वर लाल को बुलाया गया. कमिश्नर साहब ने मूर्ति का अनावरण किया और समाज में फैले जातिवाद को एक बुराई बताया. उन्होंने वंचित समाज एवं महिलाओं के लिए बाबासाहेब के द्वारा किए काम के बारे में भी बताया. पुलिस प्रशासन की मौजूदगी में आस-पास के कई गांवों के अम्बेडकरवादियों के बीच काफी उत्साह था. इस दौरान घंटों तक जय भीम के नारे गूंजते रहे.

शायद जय भीम के यही नारे वहां के सामंतवादियों के कानों में शीशे की तरह पिघल रहे थे. मूर्ति का अनावरण जिले के कमिश्नर कर रहे थे सो उन्होंने चुप्पी साधे रखी. लेकिन गांव के सामंतवादियों के मन में बाबासाहेब और दलित-बहुजन समाज के लिए कितना जहर भरा था यह उसी रात को सामने आ गया. सामंतवादियों ने आंधी रात को बाबासाहेब की उस प्रतिमा को खंडित कर दिया. आज सुबह खंडित प्रतिमा को देखते ही अम्बेडकरवादी सड़कों पर उतर आए हैं. मशरख से लेकर जिला मुख्यालय छपरा में भी अम्बेडकरवादी सड़कों पर उतर गए हैं. अपने मसीहा के अपमान से भड़के अम्बेडकरवादियों ने सड़क से लेकर रेल तक रोक दिया.

हालांकि पुलिस ने लोगों से विरोध वापस लेने की बात कही लेकिन लोग मानने को तैयार नहीं हैं. लोगों का कहना है कि जब तक प्रतिमा तोड़ने वालों की गिरफ्तारी नहीं होगी, वो आंदोलन वापस नहीं लेंगे. फिलहाल जिले भर के अम्बेडकरवादी गोलबंद होते जा रहे हैं बाबासाहेब के अपमान के खिलाफ साथ खड़े हैं. मामले का एक पहलू यह भी है कि यह सीधे तौर पर जिले के कमिश्नर को भी एक चुनौती है, जिन्होंने प्रतिमा का अनावरण किया था. देखना होगा कि भाजपा और जदयू की सरकार में पुलिस सामंतवादियों पर नकेल कसते हैं या नहीं.

 

नागपुर में मायावती ने राम मंदिर के बारे में क्या कहा

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नागपुर। नागपुर में 10 दिसंबर को बसपा प्रमुख मायावती बहुजन नायकों की धरती नागपुर में थी. इस रैली में महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश तथा तेलंगाना के कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया. इस दौरान बसपा प्रमुख ने भाजपा पर जमकर निशाना साधा. बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने भी हिन्दू कोड बिल लागू नहीं होने पर कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था, इसी तरह मैंने भी सहारनपुर में अपने समाज के लोगों के साथ अन्याय होने पर राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया.

महाराष्ट्र औऱ खासकर विदर्भ क्षेत्र में किसानों की आत्महत्या का जिक्र करते हुए मायावती ने कहा कि उनके चार बार मुख्यमंत्री रहने के दौरान उत्तर प्रदेश में किसी किसान ने आत्महत्या नहीं की जबकि भाजपा के कार्यकाल में किसानों के आत्महत्याओं में काफी इजाफा हुआ है और विदर्भ में तो यह प्रमाण सबसे ज्यादा है.

राम मंदिर बनाने को भाजपा का एजेंडा बताते हुए बसपा प्रमुख ने कहा कि राम मंदिर बनने से बहुजन समाज की समस्या का समाधान होने वाला नहीं है. बहुजनों के असली भगवान बाबासाहेब हैं और कोई नहीं. क्योंकि बहुजनों को उनके अधिकार संविधान में बाबासाहेब ने दिलाया. अगर उन अधिकारों को सही तरीके से लागू करना है तो बहुजन समाज पार्टी की सरकार आना बहुत जरूरी है.

एक बार फिर बौद्ध धर्म की ओर जाने की बात कहते हुए कहा कि मायावती ने कहा कि हिन्दू धर्म में बहुजन समाज के लोगों को न्याय नहीं मिल रहा है तथा जातिवादी मानसिकता के तहत उनका बड़े पैमाने पर ऊत्पीड़न हो रहा है. यदि यह नहीं रूकता है तो मैं भी बाबासाहेब के राह पर चलते हुए हुए सामुदायिक रूप से बौद्ध धर्म को जरूर अपना लूंगी.

मायावती ने देश के अनेक राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों तथा 2019 में होनेवाले लोकसभा के चुनावों में बीजेपी को सत्ता से बाहर कर बहुजन समाज की सत्ता निर्माण करने के लिए 85% बहुजन समाज को एकजुट करने का आव्हान किया.

नागपुर में हुए अधिवेशन के बाद जाहिर है कि महाराष्ट्र में बसपा कार्यकर्ताओं का काफी उत्साह बढ़ा है. तो वहीं बाबासाहेब की धरती से एक बार फिर सामूहिक रूप से बौद्ध धर्म में जाने की बात कह कर हिन्दू धर्म को ढोने वालों के कान फिर से खड़े कर दिए हैं.

 

गुजरात में भाजपा की गंदी पॉलिटिक्स

gujaratअहमदाबाद। ईवीएम छेड़छाड़ की शिकायतों के बीच गुजरात चुनाव का पहला फेज 9 दिसंबर को समाप्त हो चुका है. बाकी बचे 93 विधानसभा सीटों के लिए 14 दिसंबर को चुनाव होने हैं. अभी तक मिल रही रिपोर्ट से यह साफ है कि गुजरात में मुकाबला काफी कड़ा होने जा रहा है. इस बीच सोमवार को चुनाव आयोग ने राहुल गांधी और हार्दिक पटेल को रोड शो की इजाजत नहीं दी. तो दूसरी ओर भाजपा ने राहुल गांधी और कांग्रेस को घेरने के लिए अपनी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति को तेज कर दिया है. अहमदाबाद में शनिवार को अचानक सामने आया पोस्टर भाजपा की इस राजनीति को दिखा रहा है, जिसमें राहुल गांधी की सलमान निजामी नाम के एक युवक के साथ तस्वीर है. निजामी को संसद पर हमला करने वाले अफलज गुरू का समर्थक माना जाता है. इस फोटो का सहारा लेकर भाजपा ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को घेरने की कोशिश की है. पोस्टर पर लिखा गया है कि “अफजल का जो यार है वो देश का गद्दार है”. दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी ने पार्टी में सलमान निजामी नाम के किसी नेता या कार्यकर्ता के होने से इंकार किया है. असल में चुनाव में खुद को पिछड़ता देख भाजपा ने विकास की बजाय अपनी हिन्दुवादी रणनीति पर काम करना तेज कर दिया है. चुनाव के पहले जहां भाजपा नोटबंदी, जीएसटी और गुजरात के विकास को चुनाव का मुद्दा बना रही थी तो वहीं पहले चरण के चुनाव के ठीक पहले भाजपा ने इन मु्द्दों को छोड़कर ऐसे मुद्दे उठाने शुरू कर दिए जिससे हिन्दुओं को धर्म के नाम पर गोलबंद कर के उनका वोट हासिल किया जा सके.

महाराष्ट्र के भाजपा नेता ने पार्टी और सांसदी छोड़ी

नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी को महाराष्ट्र में बड़ा झटका लगा है. पार्टी से नाराज भंडारा-गोंदिया से सांसद नानाभाऊ पटोले ने पार्टी छोड़ दी है. साथ ही उन्होंने लोकसभा की अपनी सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया है. सांसद पटोले ने लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन के कार्यालय और भाजपा नेतृत्व को अपना इस्तीफा सौंप दिया है. पटोले ने यह कदम गुजरात विधानसभा चुनाव के प्रथम चरण के मतदान से ठीक एक दिन पहले उठाया.

पार्टी छोड़ते हुए पटोले ने कहा है कि वह पार्टी इसलिए छोड़ रहे हैं, क्योंकि वह काफी दुखी और पार्टी द्वारा खुद को उपक्षेति महसूस कर रहे हैं. लोकसभा सचिवालय को अपना इस्तीफा सौंपने के तत्काल बाद उन्होंने मीडिया से कहा, “जिस वजह से मैं भाजपा में शामिल हुआ था, वह झूठा साबित हुआ. पटोले ने कहा कि उन्होंने अभी तक यह तय नहीं किया है कि वह किस पार्टी में शामिल होंगे, लेकिन वह ‘किसी समान विचारधारा वाले राजनीतिक दल’ में शामिल होने पर विचार करेंगे.

नाना पटोले ने लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन को भेजे एक पत्र में उन्होंने अपने इस्तीफे के लिए कृषि, अर्थव्यवस्था और बेरोजगारी जैसे 14 मुद्दों को कारण के तौर पर गिनाया. पटोले ने आरोप लगाया कि उन्होंने प्रधानमंत्री के समक्ष भी बार बार मुद्दे उठाए लेकिन उन्होंने उन्हें नजरंदाज कर दिया.