पद्मावती हो या पद्मावत, बैन होने से इतिहास नहीं बदल सकता

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फिल्म रिलीज ना होती या रिलीज हो जाती है तो भी इतिहास न बदल पाता, बदलता भी तो सिर्फ चित्रण , घटना नहीं . यह घटना बताती है कि रजवाड़ों के दौर में औरतों की बहुत दुर्गति थी, वरना सैकड़ों औरतों का सामुहिक आत्मदाह कोई जुनून नहीं, एक लाचारी थी .

अलाउद्दीन खिलजी को कमीना कहने से मन को तसल्ली मिलती है, लेकिन #द्रोपदी_चीरहरण के पीछे कोई खिलजी नहीं था, उसके अपने ही थे, क्षत्रिय (राजपूत) ही थे. द्रोपदी को वस्तु की तरह दांव पर लगा दिया, फिर बेइज्जत किया . सीता के साथ भी कोई अच्छा सलूक नहीं हुआ .परंतु हमारे देश की कुकुरमुत्ते की तरह जितनी भी सेनाएं हैं सिर्फ अतीत पर हंगामा करने के लिए हैं .

देश में प्रतिदिन औसतन 28 गैंगरेप हो रहे हैं, लेकिन फिक्र किसे है ? भला हो #अंग्रेजों का देश में आए, हमें कानून दिया, पुलिस दी, अदालतें बनाई . आज के दिन लक्ष्मण ने सरूपनखां का नाक काटा होता तो धारा 326 लग जाती, वो दौर रजवाड़ों के लिए ठीक रहा होगा, प्रजा के लिए नहीं .

विडंबना यही है कि हमारे पास सिर्फ इतिहास है उसी में जी रहे हैं . भविष्य के लिए कोई प्लानिंग नहीं है जबकि विश्व के तमाम विकसित देश 100 साल का एडवांस प्लान लेकर चल रहे हैं, हम सिर्फ तमाशबीन हैं .

इसलिए “टाइगर” सलमान पर्दे पर आतंकियों को मारकर 300 करोड़ कमा चुका है और इधर हमारे फौजियों की विधवाओं को पेंशन के लिए भी मुकदमे लड़ने पड़ते हैं……. .

रवीश कुमार  

जाने 1990 के बाद तीसरी बार ऐसा क्या किया भारतीय क्रिकेट टीम ने.

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नई दिल्ली। भारतीय क्रिकेट टीम 2012 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पर्थ टेस्ट मैच के बाद आज जोहानिसबर्ग में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ हो रहे टेस्ट मैच में बिना किसी स्पिन गेंदबाज के मैदान में उतरी है, आपको बता दें कि 1990 के बाद ये तीसरा मौका है, जब भारतीय टीम बिना किसी स्पिन गेंदबाज़ के टेस्ट मैच खेलने उतरी है.

इस मैच में विराट कोहली ने अजिंक्य रहाणे को रोहित शर्मा के स्थान पर मौका दिया, तो आर. अश्विन की जगह भुवनेश्वर कुमार को जगह दी गई. भारतीय टीम ने तो इस अहम मुकाबले में 5 तेज़ गेंदबाज़ों को मौका दिया है, वहीं द. अफ्रीका की तरफ से भी इस मैच में कोई स्पिन गेंदबाज़ नहीं खेल रहा है. जहां भारत ने अश्विन की जगह भुवनेश्वर कुमार को प्लेइंग इलेवन में शामिल किया है, तो वहीं द. अफ्रीकी टीम ने भी इस मुकाबले के लिए स्पिनर केशव महाराज की जगह तेज़ गेंदबाज़ एंदिले फेलुक्वायो को मौका दिया है.

जोहानिसबर्ग में खेले जा रहे इस मुकाबले के लिए पिच क्यूरेटर ने पिच पर से घास नहीं हटाई थी. पिच पर घास होने की से इस मुकाबले में तेज़ गेंदबाज़ों को विकेट से काफी मदद मिलेगी और यही वजह है कि दोनों टीमों ने इस मुकाबले के लिए अपनी टीमों में किसी भी स्पिन गेंदबाज़ को शामिल नहीं किया है. दक्षिण अफ्रीका के कप्तान फाफ डु प्लेसिस पिच को देखकर काफी खुश नज़र आए और विराट ने इसको लेकर कहा कि ये केपटाउन की तरह ही जीवंत पिच होगी. हालांकि, यहां पर घास उससे ज्यादा है

 

लालू को फिर सजा, तो अब जेल से बाहर नहीं आ सकेंगे लालू यादव

नई दिल्ली। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद को चारा घोटाले से जुड़े एक अन्य मामले में 5 साल की सजा सुनाई गई है. चारा घोटाला के देवघर कोषाघार से जुड़े केस के बाद अब लालू को चाईबासा से जुड़े एक दूसरे केस में दोषी पाया गया है. ऐसे में अब सवाल उठने लगा हैं कि क्या लालू यादव राजनीतिक रूप से सक्रिय रहने की अवस्था में कभी जेल से बाहर आ सकेंगे?

चारा घोटाला से जुड़े देवघर कोषाघार केस में लालू यादव को 23 दिसंबर को रांची की विशेष सीबीआई अदालत ने दोषी माना, जिसके बाद उन्हें जेल भेज दिया गया. इसके बाद 6 जनवरी 2018 को कोर्ट ने उन्हें साढ़े तीन साल की सजा सुनाई और 5 लाख का जुर्माना लगाया. अब तक चारा घोटाला से जुड़े दो केस में लालू को साढ़े 8 साल जेल की सजा सुनाई जा चुकी है.

24 जनवरी को तीसरे केस में एक बार फिर 5 साल की सजा मिलने के बाद लालू यादव की पूरी सजा बढ़कर साढ़े 13 साल की हो गई है. इसमें से अब तक करीब 1 साल दो महीने लालू जेल में गुजार चुके हैं. यानी तीन केस में ही लालू को रांची विशेष सीबीआई अदालत के फैसले के तहत अभी 12 साल से ज्यादा और जेल में रहना पड़ेगा. बड़ा संकट ये है कि कुल 900 करोड़ के चारा घोटाले में लालू के खिलाफ अभी तीन और मामले लंबित हैं.

अगर, लालू को उच्च अदालत से राहत नहीं मिलती है, तो लालू प्रसाद यादव 2019 तो दूर 2024 के लोकसभा चुनाव में भी शायद ही जनता के बीच जा सकें. इन तमाम मामले में लालू यादव को बेल मिलना भी मुश्किल माना जा रहा है. खासतौर पर भाजपा के शासन में रहते तो ऐसा होता नहीं दिखता.

फिलहाल लालू यादव उम्र के उस पड़ाव में हैं जो राजनीतिक सक्रियता के लिहाज से रिटायरमेंट की तरफ बढ़ रहा है. ऐसे में 69 साल के हो चुके लालू की सक्रियता अब 2019 के लोकसभा चुनाव, 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव और उसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में देखने को मिलेगी, इसकी संभावना कम ही है. ऐसे में संभव है कि लालू यादव की पिछले बिहार चुनाव के दौरान जनता के बीच में उपस्थिति उनके राजनैतिक जीवन की आखिरी याद बनकर रह जाए.

 

शासकों की विषमता मूलक प्रवृति के पीछे

लगता है अच्छे दिन का सपना दिखाकर प्रचंड बहुमत में आई मोदी सरकार के बुरे दिन शुरू हो चुके हैं. जहां कई संगठन व बुद्धिजीवी मोदी-राज से त्रस्त होकर उससे मुक्ति की परिकल्पना में निमग्न हो गए हैं, वहीँ खुद सरकार समर्थक बुद्धिजीवी तक भी उसके विकास की पोल खोलने पर आमादा हो गए हैं. ऐसे ही एक बुद्धिजीवी ने कुछ दिन पहले एक अख़बार में बड़ी निष्ठुरता से मोदी के विकास मॉडल को की पोल खोलकर रख दिया था. उन्होंने लिखा था,’ आम आदमी के आर्थिक स्तर को ऊपर उठाने के हमारे आजाद भारत के संकल्प को मंजिल तक पहुंचाने में अब तक की सभी सरकारें नाकाम रहीं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बहुत अपेक्षाएं , लेकिन आर्थिक संतुलन स्थापित करने एवं अमीर –गरीब की खाई को पाटने की दृष्टि से उनकी एवं उनकी सरकार की नीतियां भी संदेहास्पद ही कही जाएँगी. क्योंकि उन्होंने जो दिशा पकड़ी है वह भी ऐसे विकास का प्रारूप है जिसमें अमीर अधिक अमीर ही होता जाएगा? मोदी सरकार भी अपनी जिम्मेदारी पर गरीब व्यक्ति को आर्थिक स्तर पर ऊपर उठाने की कोई योजना प्रस्तुत नहीं कर पायी है. किसी गरीब को गैस सिलेंडर दे देने से या उनके घर तक सड़क या बिजली पहुंचा देने से एक संतुलित आदर्श समाज की रचना नहीं होगी.

..आजादी के शुरुआती तीन चार दशक तक देश के शीर्ष नेतृत्त्व एवं नीति निर्माताओं में राष्ट्र के प्रति समर्पण था और भारत की संस्कृति एवं भारतीयता के प्रति निष्ठां थी, परन्तु नब्बे के दशक तक पहुँचते-पहुंचते हमने जिस बाजारमूलक अर्थव्यवस्था को अपनाना शुरू किया , उसने विकास की परिभाषा को ही बदल कर रख दिया है. विदेशी निवेश के लुभावने एवं चकाचौंध भरे आह्वान में लगा कि रोजगार बढ़ेगा, गरीबी दूर होगी,और सार्वजनिक क्षेत्र की जो कम्पनियाँ घाटे में चल रही हैं वे निजी भागीदारी से मुनाफ कमाने वाली मशीनों में तब्दील हो जायेंगी. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. घाटे के नाम पर सरकारों ने उन सरकारी मशीनों को बंद ही कर दिया , जो आम जनता की सेवा के लिए गठित की गईं थीं. सरकारों ने विकास के नाम पर जनता पर अनचाहा भार ही नहीं लादा बल्कि अपनी लोभ की मानसिकता को भी थोपा. विकास के नाम पर पनप रहा नया नजरिया न केवल घातक है बल्कि मानव अस्तित्व पर खतरे का संकेत भी है. देश के शासक जिस रास्ते पर हमें ले जा रहे हैं वह आगे चलकर अंधी खाई की ओर मुड़ने वाली है.’ इस स्थिति पर लेखक ने सवाल पूछा है,’ आखिर ऐसा क्यों हुआ? क्या इस प्रवृति के बीज हमारी आजादी के लक्ष्य से जुड़े संकल्पों में रहे या यह विश्व बाजार के दबाव में हुआ?

बहरहाल लेखक ने शासकों की विषमतावादी प्रवृति के बीज जानने के क्रम में जो एकाधिक कारण गिनाएं हैं, उसमें एक बात तो तय है कि इसका सम्बन्ध आजादी के लक्ष्यों से जुड़े संकल्पों से तो बिलकुल ही नहीं रहें: आजादी के संकल्प तो बहुत उत्तम रहे. इस बात का खुलासा करते हुए विपिन चन्द्र-मृदुला मुखर्जी –आदित्य मुखर्जी ने ‘आजादी के बाद का भारत’ जैसे महत्वपूर्ण ग्रन्थ में लिखा है- ‘भारत की आजादी इसकी जनता के लिए एक ऐसे युग की शुरुआत थी, जो एक नए दर्शन से अनुप्राणित था.1947 में देश ने अपने आर्थिक पिछड़ापन , भयंकर गरीबी , करीब-करीब निरक्षरता , व्यापक तौर पर फैली महामारी, भीषण सामाजिक विषमता और अन्याय के उपनिवेशवादी विरासत से उबरने के लिए लम्बी यात्रा की शुरुआत थी. 15 अगस्त पहला पड़ाव था , यह औपनिवेशिक राजनीतिक नियंत्रण में पहला विराम था: शताब्दियों के पिछड़ेपन को अब समाप्त किया जाना था, स्वतंत्रता संघर्ष के वादों को पूरा किया जाना था और जनता की आशाओं पर खरा उतरना था. भारतीय राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना तथा राष्ट्रीय राजसत्ता को विकास एवं सामाजिक रूपांतरण के रूप में विकसित एवं सुरक्षित रखना सबसे महत्वपूर्ण काम था. यह महसूस किया जा रहा था की भारतीय एकता को आँख मूंदकर मान नहीं लेना चाहिए. इसे मजबूत करने के लिए यह स्वीकार करना चाहिए कि भारत में अत्यधिक क्षेत्रीय, भाषाई, जातीय एवं धार्मिक विभिन्नताएं मौजूद हैं. भारत की बहुतेरी अस्मिताओं को स्वीकार करते एवं जगह देते हुए तथा देश के विभिन्न भागों और लोगों के विभिन्न तबको को भारतीय संघ में पर्याप्त स्थान देकर भारतीयता को और मजबूत किया जाना था.’

दुःख के साथ कहना पड़ता है आजाद भारत के शुरुआती तीन चार दशक तक देश के शीर्ष नेतृत्त्व एवं नीति निर्माताओं में राष्ट्र के प्रति समर्पण दिखाया: आधारभूत उद्योग-धंधे खड़ा कर देश को विकसित करने का बढ़िया प्रयास किया, किन्तु उस विकास को विविधतामय भारत के विविध समूहों के मध्य वितरित कर भारतीयता को मजबूत करने का प्रयास नहीं किया. ऐसा इसलिए कि चूँकि जाति समाज में व्यक्ति सोच स्व-जाति/ वर्ण के चेतना के मध्य घूर्णित होती रहती है और यह चेतना बड़े से बड़े साधु-संत, लेखक –कलाकार में समग्र- वर्ग की चेतना विकसित ही नहीं होने दिया ,इसलिए आजाद भारत के शासक, जो मुख्यतया सवर्ण समाज से रहे, अपनी स्व-जातीय/वर्णीय स्वार्थ के चलते ऐसी योजना न बना सके जिससे थोड़ा बहुत जो भी विकास हुआ , उसका तमाम सामाजिक समूहों के मध्य वाजिब बंटवारे का मार्ग प्रशस्त हो सके. इस स्व-जातीय/वर्णीय सोच के कारण ही वे 25 नवम्बर, 1949 को डॉ. आंबेडकर द्वारा आर्थिक और सामाजिक विषमता के खात्मे से जुड़ी दी गयी चेतावनी की अनदेखी कर गए. हाँ, उन्होंने एक काम जरुर किया कि वे एससी/एसटी को संविधान द्वारा प्रदान किये आरक्षण को, अनिच्छापूर्वक ही सही, किसी तरह झेलने की मानसिकता विकसित कर लिया . किन्तु जब 7 अगस्त, 1990 को मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित हुई, भारत के परम्परागत विशेषाधिकारयुक्त व सुविधाभोगी वर्ग की वर्णवादी चेतना नाटकीय रूप से तुंग पर पहुँच गयी.

मंडल के खिलाफ जहां विशेषाधिकारयुक्त के युवा आत्म-दाह और राष्ट्र की संपदा दाह में प्रवृत हुए, वहीँ इस तबके की हिमायती एक पार्टी ने राम मंदिर का मुद्दा उठाकर राष्ट्र की हजारों करोड़ की संपदा और असंख्य लोगों की प्राण हानि कराने के साथ भ्रातृत्व के कंगाल भारत की थोड़ी-बहुत दिख रही एकता को भी छिन्न –भिन्न कर दिया, जो विशुद्ध रूप से देश-विरोधी कार्य था. लेकिन सबसे खतरनाक काम किया नरसिंह राव ने, जिन्होंने आरक्षण को कागजों तक सिमटने के कुत्सित इरादे से 24 जुलाई,1991 को भूमंडलीकरण की अर्थनीति अडॉप्ट कर निजीकरण, उदारीकरण, विनिवेशीकरण का सैलाब बहा दिया गया. नरसिंह राव द्वारा शुरू किये गए इस काम को आगे बढ़ाने में अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह ने एक दूसरे होड़ लगाया. 24 जुलाई,1991 को गृहित अर्थनीति के फलस्वरूप ही लाभजनक सरकारी उपक्रमों के औने-पौने दामों में निजी क्षेत्र के हाथों में जाने, सुरक्षा से जुड़े उपक्रमों में विदेशी निवेश ,अमीर-गरीब की खाई आश्चर्यजनक रूप से बढ़ने का सिलसिला शुरू हुआ जो आज डरावना रूप अख्तियार कर चुका है. और यह सब किया गया सिर्फ और सिर्फ आरक्षण के खात्मे को ध्यान में रखकर. बहरहाल नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह ने आरक्षण के खात्मे को ध्यान में रखकर देश का बुनियादी आर्थिक ढांचा ध्वस्त करने और अर्थतंत्र निजीक्षेत्र के मालिकों और विदेशियों के हाथों में देने का जितना काम बीस सालों में किया, उतना नरेंद्र मोदी ने तीन सालों में कर दिखाया है. बहरहाल आज भारत नामक देश आर्थिक और सामाजिक विषमता , जो कि मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या है, के मामले में विश्व चैम्पियन बन चुका और संघ के प्राख्यात मजदूर नेता रहे दत्तो पन्त ठेंगड़ी की भाषा में, ‘जो आर्थिक स्थितियां और परिस्थितयां बन या बनायी जा रही हैं, उसके फलस्वरूप देश का नए सिरे से विदेशियों का गुलाम बनना तय सा दिख रहा है’.नवउदारवादी नीतियों के जरिये देश को विषमता के दलदल में धकेलने और विदेशियों का गुलाम बनाने लायक शासकों की प्रवृति के खिलाफ दलित-आदिवासी –पिछड़ों के संगठन गत दो दशकों से लगातार चीत्कार किये जा रहे हैं, पर शासकों की ओर से आरक्षण के खात्मे के जूनून में निरंतर इसकी अनदेखी होती रही. उनकी इस सुनियोजित चाल की ओर संकेत करते हुए चर्चित समाज विज्ञानी रजनी कोठारी ने अपनी पुस्तक’भारत में राजनीति : कल और आज ‘ में डेढ़ दशक पहले लिख डाला था-‘ जनता अपनी तरफ से राज्य पर दबाव डाल रही है कि वह ऐसा न करे. यह दबाव जातीय और क्षेत्रीय आन्दोलनों के साथ-साथ लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए चलाये जा रहे वर्ग और जाति आधारित संघर्षों के रूप में देखा जा रहा है. पर, समस्या यह है कि ठीक इसी समय राज्य की बागडोर सँभालने वालों ने तक़रीबन नियोजित रूप में अपनी पकड़ ढीली कर दी है. सामाजिक और क्षेत्रीय दायरों के प्रति उनका सरोकार कम पद गया है. एक तरफ राज्य की पुनर्संरचना होने की कोशिश हो रही है, दूसरी तरफ राज्य अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों से मुंह चुरा रहा है. ‘

लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.

संपर्क:9654816191

बसपा नेता के समधी बनेंगे राजबब्बर, बेटे प्रतीक की सगाई हुई

राजनीति के मैदान में कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी भले ही एक-दूसरे के बहुत पास नहीं आ सकी हो, निजी जीवन में दोनों पार्टियों के दो दिग्गज नेता साथ आ गए हैं. कांग्रेस के यूपी प्रदेश अध्यक्ष व अभिनेता राजबब्बर के बेटे प्रतीक बब्बर और बहुजन समाज पार्टी के बड़े नेता पवन सागर की बेटी सान्या सागर शादी करने वाले हैं. राज बब्बर के बेटे प्रतीक बब्बर ने सोशल साइट इंस्टाग्राम पर खुद यह जानकारी दी.

22 जनवरी को एक सादे कार्यक्रम में लखनऊ के मोहनलाल गंज के एक रिसोर्ट में दोनों परिवारवालों की मौजूदगी में शादी से पहले की रोका रस्म हुई. प्रतीक बब्बर ने बीते दिसंबर में गोवा में एक संगीत कार्यक्रम में सान्या को प्रोपोज किया था. तब किसी को भी इसके बारे में जानकारी नहीं थी. यहां तक कि उसके माता-पिता भी इस रिश्ते के बारे में नहीं जानते थे.

प्रतीक ने इंस्टाग्राम अकाउंट के जरिये इस रिश्ते के बारे में बताया कि जब से वह मेरी जिंदगी में आई हैं, मैं एक बहुत ही सुरक्षित व्यक्ति हो गया हूं. प्रतीक और सान्या एक-दूसरे को पिछले आठ साल से जानते हैं. इस पूरे कार्यक्रम को काफी सादगी से किया गया. कार्यक्रम को राजनीतिक भीड़ और मीडिया से भी दूर रखा गया. दरअसल पिछले साल प्रतीक के दादाजी का निधन हो गया था. ऐसे में समारोह सादगी भरा रहा और इसलिए शादी अगले साल होगी.

प्रतीक बब्बर ने  ‘जाने तू या जाने ना ‘, ‘एक दीवाना था ‘ और ‘धोबी घाट ‘ जैसी फिल्मों में अभिनय किया है जबकि सान्या ने फिल्म मेकिंग में अपना पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा किया है और फिल्म मेकिंग में आने को तैयार हैं. यह डिग्री उन्होंने लंदन की गोल्डस्मिथ्स यूनिवर्सिटी से हासिल की है. जहां तक बसपा नेता पवन  सागर की बात है तो सागर बसपा प्रमुख मायावती के करीबी हैं. मायावती के मुख्यमंत्रित्वकाल में सागर ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी के रूप में उनसे अटैच थे औऱ बाद में बसपा ज्वाइन कर लिया.

जयंती विशेषः बिहार में कर्पूरी ठाकुर का कद कोई नहीं छू पाया

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महाकवि कबीर ने कहा है-‘सहज सहज सब कोई कहे, सहज न जाने कोइ।’  हालांकि जननायक कर्पूरी ठाकुर का संपूर्ण जीवन ही सहजता का पर्याय था. कर्पूरी ठाकुर का जन्म भारत में ब्रिटिश शासन काल के दौरान समस्तीपुर के एक गांव पितौंझिया में 24 जनवरी, 1924 को हुआ था. बाद में उनके सम्मान में इस गांव का नाम कर्पूरीग्राम हो गया. सामाजिक रुप से पिछड़ी किन्तु सेवा भाव के महान लक्ष्य को चरितार्थ करती नाई जाति में उनका जन्म हुआ.

कर्पूरी ठाकुर भारत के स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षक, राजनीतिज्ञ तथा बिहार राज्य के मुख्यमंत्री रहे. लोकप्रियता के कारण उन्हें जन-नायक कहा जाता है. उनका पूरा जीवन संघर्ष की मिसाल रहा. तो अपने राजनीतिक जीवन को भी उन्होंने निष्कलंक और पूरी ईमानदारी के साथ जीया और हमेशा गरीबों और शोषितों की भलाई के लिए सोचते और लड़ते रहें. भारत छोड़ो आन्दोलन के समय उन्होंने 26 महीने जेल में बिताए थे.

आजादी के बाद उनके राजनीतिक जीवन को नई ऊंचाई मिली. तब सत्ता में आने पर देश भर में कांग्रेस के भीतर कई तरह की बुराइयां पैदा हो चुकी थीं, इसलिए उसे सत्ताच्युत करने के लिए सन 1967 के आम चुनाव में डॉ. राममनोहर लोहिया के नेतृत्व में गैर कांग्रेसवाद का नारा दिया गया. कांग्रेस पराजित हुई और बिहार में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी. कमान कर्पूरी ठाकुर को मिली.

वह 22 दिसंबर 1970 से 2 जून 1971 तथा 24 जून 1977 से 21 अप्रैल 1979 के दौरान दो बार बिहार के मुख्यमंत्री रहे. अपने शासनकाल में उन्होंने गरीबों के हक के लिए काम किया. पहली बार मुख्यमंत्री बनने पर उन्होंने अति पिछड़ों को हक दिलाने के लिए मुंगेरी लाल आयोग का गठन किया. उनके दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने पर प्रदेश के शासन-प्रशासन में पिछड़े वर्ग की भागीदारी की बात उठी. तब इसमें उनकी भागीदारी नहीं थी. इसलिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग जोर-शोर से की जाने लगी.

कर्पूरी जी ने मुख्यमंत्री की हैसियत से उक्त मांग को संविधान सम्मत मानकर एक फॉर्मूला निर्धारित किया और काफी विचार-विमर्श के बाद उसे लागू भी कर दिया, जिससे पिछड़े वर्ग को आरक्षण मिलने लगा. इस पर पक्ष और विपक्ष में थोड़ा बहुत हो-हल्ला भी हुआ. अलग-अलग समूहों ने एक-दूसरे पर जातिवादी होने के आरोप भी लगाए. मगर कर्पूरी जी का व्यक्तित्व निरापद रहा. उनका कद और भी ऊंचा हो गया. अपनी नीति और नीयत की वजह से वे सर्वसमाज के नेता बन गए. अपने मुख्यमंत्रित्व काल में उन्होंने जिस सादगी के साथ गरीबों का उत्थान किया, वैसी मिसाल कहीं और देखने को नहीं मिली.

बौद्ध भिक्षु ने दुनिया को चौंकाया, तस्वीर वायरल

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थाईलैंड। तमाम धर्म अपने भीतर के चमत्कार को खूब प्रचारित करते हैं. कुछ धर्म तो चमत्कार की कहानियों पर ही टिके हुए हैं. बौद्ध धम्म ऐसा धम्म है, जहां चमात्कार की बजाय करुणा, प्रज्ञा, शील, शांति, बंधुत्व और सौहार्द की बात की जाती है. आम तौर पर इस धर्म और इसके धर्म गुरुओं से जुड़ी खबरें बहुत कम सामने आती है, लेकिन जब आती हैं तो दुनिया को चौंका जाती है. एक ऐसी ही खबर थाइलैंड से आई है.

थाईलैंड में बौद्ध भिक्षु के शव को एक रस्म के लिए उनकी मौत के बाद कब्र से निकालने की परंपरा रही है. पिछले दिनों जब एक बौद्ध भिक्षु के शव को उनके अनुयायियों ने रस्म के लिए कब्र से बाहर निकाला, तो वहां मौजूद सभी लोगों की आंखें खुली रह गई. देखते ही देखते यह खबर दुनिया भर में फैल गई. असल में बौद्ध भिक्षु के शरीर पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा था और उनके चेहरे पर एक मुस्कान थी.

असल में बौद्ध भिक्षुओं के गुरु Luang Phor Pian की 92 साल की उम्र में 16 नवंबर को परिनिर्वाण हो गया था. परिनिर्वाण यानि मृत्यु के बाद उन्हें उसी बौद्ध परिसर में दफना दिया गया जहां वे सेवा करते थे. दो महीने बाद जब एक खास रस्म के लिए उनका शव कब्र के बाहर निकाला गया तो लुआंग के चेहरे की मुस्कान देखकर बाकी भिक्षु दंग रह गए. मानों वो खुशी से चैन की नींद में सो रहे हों.

इस तस्वीर के सामने आने के बाद एक्सपर्ट्स के लिए भी यकीन करना मुश्किल है कि 2 महीने बाद भी उनका शरीर वैसा ही है. ऐसा लग रहा है मानो इनकी मौत सिर्फ 36 घंटे पहले हुई हो. वहीं भिक्षु के अनुयायियों के मुताबिक उनके चेहरे पर मौजूद मुस्कान इस बात का इशारा है कि वे शांति की अवस्था को प्राप्त हो गए हैं. इसी तरह कुछ साल पहले एक सर्वे में दुनिया के सबसे बड़े खुशहाल व्यक्ति के रूप में एक बौद्ध भिक्षु का नाम सामने आया था.

फिलहाल रस्म के मुताबिक खास रस्म की प्रक्रिया शुरू हो गई है. भिक्षु के शव को साफ कर नए कपड़े पहना दिए गए है और प्रार्थनाओं का दौर शुरू हो चुका है. ये प्रार्थना तबतक चलेगी जबतक उनकी मौत हुए 100 दिन पूरे नहीं हो जाते. 100वें दिन एक बार फिर उन्हें हमेशा के लिए दफना दिया जाएगा.

हिन्दूओं से बौद्ध स्थल को मुक्त कराने के लिए भंते का आंदोलन

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उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में स्थित संकिशा उन 84 बौद्ध स्तूपों में से एक है, जिसका निर्माण सम्राट अशोक ने करवाया था. बौद्ध धर्म को मानने वालों के लिए यह एक अहम स्थान है, जहां बुद्ध को मानने अक्सर जाते रहते हैं. लेकिन इस बौद्ध स्थल का हिन्दूकरण और इस स्थान पर बढ़ रहे हिन्दू धर्म के पुरोहित बौद्ध अनुयायियों को लगातार खटकते रहे हैं. संकिशा के ब्राह्मणीकरण को रोकने और इसे दूसरे धार्मिक ताकतों से आजाद करा कर फिर से एक पवित्र बौद्ध स्थल के रूप में स्थापित करने के लिए भंते धम्मकीर्ती ने एक अभियान शुरू कर दिया है.

इस अभियान के तहत संकिशा से लखनऊ तक एक पदयात्रा निकाल कर इस स्थल को ब्राह्णवादी ताकतों से मुक्त कराने का आंदोलन शुरू किया है. 10 जनवरी को संकिशा से शुरू हुई यह पद्यात्रा 25 जनवरी को लखनऊ पहुंचेगी. जहां एक सभा का आयोजन कर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को ज्ञापन दिया जाएगा.

संकिशा से शुरू होने के बाद यात्रा मुहंमदाबाद, फर्रुखाबाद, फतेहगढ़, गोसाइगंज, कन्नौज, उन्नाव और कानपुर होते हुए लखनऊ पहुंचेगी. जहां 24 जनवरी को डॉ. भीमराव अम्बेडकर महासभा, बापू भवन के सामने 25 को समापन कार्यक्रम होगा. समापन के मुख्य अतिथि महाबोधी सोसाइटी के जनरल सेक्रेट्री भूज्य भदंत पी. सिवली महाथेरो होंगे जो सभा को संबोधित करेंगे.

पदयात्रा पर निकले भंते धम्मकीर्ती ने यात्रा की वजह बताया कि संकिशा के बौद्ध स्थल पर चार दशक पहले ही एक पत्थर रख दिया गया है और उसे बिसारी देवी के नाम से प्रचारित किया गया है. तो वहीं हनुमानजी की मूर्ति भी स्थापित करवा दी गई है. हमारी मांग है कि यह पवित्र बौद्ध स्थल है इसलिए इसको मुक्त किया जाए. असल में तमाम बौद्ध स्थलों पर हिन्दूवादी संगठनों का कब्जा बना हुआ है. यहां तक की विश्व प्रसिद्ध और तथागत बुद्ध की ज्ञानस्थली बोधगया में भी हिन्दूकर्मकांड की घुसपैठ हो चुकी है, जिसको हटाने के लिए लगातार मांग चलती आ रही है. फिलहाल देखना होगा कि संकिशा पर उत्तर प्रदेश सरकार क्या रुख अपनाती है.

 

करिश्माई कांशीराम

    Editing : 1 Stock : In Stock Rs. 125/- Name : Das Publication Bank Name :Punjab National Bank ACC- :1518002100509569 Bank Address : Punjab National Bank Branch- Patparganj, Delhi – 110092 IFSC- PUNB0151800

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देश में गरीबी अमीरी की खाई का डरावना सच जानिए

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दिल्ली। आंकड़े चाहे जो कहें, भारत में आपको हर ओर गरीबी दिख जाएगी. गांव में फैली मुफलिसी और शहरों की गलियों में मौजूद बजबजाहट इसी गरीबी की कहानी कहता है. भारत का यह हाल क्यों है, एक आंकड़े से इसका खुलासा हो गया है. असल में भारत के सिर्फ एक फीसदी अमीरों के पास कुल संपदा का 73 फीसदी हिस्सा है. दावोस में एक गैर सरकारी संस्था द्वारा जारी एक नए सर्वे में यह जानकारी सामने आई है. इससे यह बात उजागर होती है कि भारत में अमीरी और गरीबी के बीच खाई लगातार बढ़ती जा रही है.

 पिछले साल के ऑक्सफेम सर्वे से यह खुलासा हुआ था कि देश के महज 1 फीसदी अमीरों के पास कुल संपदा (wealth) का 58 फीसदी हिस्सा है. इस साल इसमें 15 फीसदी की और बढ़ोतरी हो गई है.सर्वे के अनुसार साल 2017 के दौरान भारत के एक फीसदी अमीरों की संपदा में 20.9 लाख करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई है. यह राशि साल 2017-18 के केंद्र सरकार के कुल बजट के बराबर है.

रिपोर्ट के अनुसार पिछले साल देश में 17 नए अरबपति बने हैं. इसके बाद अब देश में कुल अरबपतियों की संख्या 101 हो गई है. देश के तमाम राज्यों की जनता जहां शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा का रोना रोती रहती है, वहीं भारतीय अरबपतियों की संपत्ति बढ़कर 20.7 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो गई है. यह संपत्ति सभी राज्यों कि स्वास्थ्य और शिक्षा बजट के 85 फीसदी के बराबर है. सरकारें कहती हैं कि देश बढ़ रहा है लेकिन तब क्या हो जब इस बढ़त का लाभ कुछ लोगों की मुठ्ठियों में बंद हो जाए.

राजनीतिक हाशिए पर खड़े शरद यादव अब उठाएंगे दलितों की आवाज

बिहार। नीतीश कुमार से अलगाव और राज्यसभा सदस्यता जाने के बाद राजनीतिक हाशिए पर पहुंचे शरद यादव ने अब नया रास्ता चुना है. देश में चल रही दलित राजनीति के उभार के बीच शरद यादव भी अब दलितों की बात करेंगे. इसके लिए उन्होंने बिहार को चुना है. शरद यादव ने 31जनवरी को बक्सर के नंदनगांव जाने का निर्णय लिया है. यहां से वे दलित समाज के उत्पीड़न  की घटना को लेकर सूबे की नीतीश-भाजपा सरकार पर हमला बोलेंगे.

दलित समाज की ओर से यहां नंदनगांव में दलित स्वाभिमान सम्मेलन का 31 जनवरी को आयोजन रखा गया है. शरद यादव इस आयोजन मेंशामिल होंगे. दलित उत्पीड़न के खिलाफ आवाज बुलंद करने के लिए यादव के साथ जयंत चौधरी भी इस आयोजन में शिरकत करेंगे. दलित स्वाभिमान सम्मेलन की जानकारी देते हुए पूर्व जदयू नेता अली अनवर ने बताया कि पुलिस-प्रशासन की दमनकारी नीति की वजह से नंदनगांव के लोगों का जीवन बेहाल है.

स्थानीय पुलिस-प्रशासन के गलत रवैये से न सिर्फ गांव के निर्दोष दलित जेल में हैं बल्कि कई अब भी भागे फिर रहे हैं. इस गांव के लोगों में पूरी तरह से दहशत का माहौल है. बेकसूर लोगों को परेशान किया जा रहा है. पुलिस रात-बेरात दबिश देकर गांववालों को परेशान कर रही है.

दलितों का रास्ता रोका, बोले देवता अपवित्र हो जाएंगे

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आंध्र प्रदेश। एक बार फि‍र से जाति‍वाद का चेहरा नंगा हो गया है. पिछले दिनों जातिवादियों ने दलि‍तों के लि‍ए आम रास्‍ते का इस्‍तेमाल न करने को लेकर फरमान जारी कि‍या था, जिसे न मानने पर दलि‍त समुदाय का सामाजि‍क बहि‍ष्‍कार कर दि‍या गया है. उनके बच्‍चों को स्‍कूल जाने से रोक दि‍या गया है और काम देने से इनकार कर दि‍या गया है. कथित अगड़ी जाति‍ के लोगों का कहना है कि‍ दलि‍तों के गांव के मुख्‍य मार्ग से जाने पर उनके देवता अपवि‍त्र हो जाएंगे. यह मंदि‍र सड़क के बीचों-बीच स्‍थि‍त है. यह घटना 18 जनवरी की है, सामाजि‍क बहि‍ष्‍कार से दलि‍त समुदाय को मुश्‍कि‍लों का सामना करना पड़ रहा है.

 घटना आंध्र प्रदेश के प्रकाशम जि‍ले के कंचरलगुंटा गांव की है. गांव की अगड़ी जाति‍ ‘खम्‍माज’ ने सि‍तंबर, 2017 में मडि‍गा दलि‍त समुदाय के लि‍ए फरमान जारी करते हुए उन्हें मुख्‍य मार्ग का प्रयोग न करने की हि‍दायत दी गई थी. दलि‍त समुदाय के कई लोगों ने इसे मानने से इनकार कर दि‍या था. जिसके बाद खम्‍माज ने मडि‍गा समुदाय के लोगों के साथ बैठक की थी. अगड़ी जाति‍ के लोग इससे बेहद नाराज थे कि‍ फरमान पर अमल नहीं कि‍या जा रहा है. बैठक में दलि‍तों को स्‍पष्‍ट शब्‍दों में चेतावनी दी गई थी कि‍ गांव के मुख्‍य सड़क का इस्‍तेमाल करने पर उनका सामाजि‍क बहिष्‍कार कर दि‍या जाएगा.

 इसके भय से समुदाय के लोगों ने अगड़ी जाति‍ के साथ समझौते का प्रयास कि‍या था. लेकि‍न, कथि‍त तौर पर अगड़ी जाति‍ के लोगों ने कहा कि‍ दलि‍त सड़क पर पैदल तो जा सकते हैं, वाहन के साथ नहीं. दलित समुदाय के एक व्‍यक्‍ति‍ इसका वि‍रोध करते हुए बाइक से जा रहा था. आरोप है कि‍ अगड़ी जाति‍ के कुछ लोगों ने कथि‍त तौर पर बाइक की चाबी ले ली थी. इसके बाद स्‍थि‍ति‍ और बि‍गड़ गई थी. खम्‍माज समुदाय ने गांव के पूरे मडि‍गा समुदाय का बहि‍ष्‍कार कर दि‍या.

 बहि‍ष्‍कार के चलते उनके बच्‍चे गांव में स्‍थि‍त स्‍कूल भी नहीं जा पा रहे हैं. दलि‍त समुदाय के जेसी. रमैया ने बताया, ‘खम्‍माज इस बात को लेकर आक्रोशि‍त हैं कि‍ दलि‍त अब उनके आज्ञाकारी नहीं रहे’. तनातनी बढ़ने के बाद अगड़ी जाति‍ के लोगों ने दलि‍तों को दूध देना तक बंद कर दि‍या. यहां तक कि‍ उन्‍हें खेतों में काम भी नहीं करने दि‍या जा रहा है. रमैया ने बताया कि‍ दलि‍तों से बात करने या दूध देने वालों पर दस हजार रुपये का जुर्माना भी लगा दि‍या गया है.

फिर जनता की अदालत में आप, देखिए क्या अपील की

दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया

नई दिल्ली। पार्टी के 20 विधायकों की सदस्यता रद्द करने के बाद दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने दिल्ली की जनता के नाम खुला खत लिखा है. सोमवार को लिखी गई दो पन्ने की इस चिठ्ठी में सिसोदिया ने बीजेपी पर गंदी राजनीति करने और दिल्ली पर जबरन चुनाव थोपने का आरोप लगाया है. सिसोदिया ने अपनी चिट्ठी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर पर भी शेयर की है.

इसमें सिसोदिया ने लिखा है- “दिल्ली की जनता के लिए मेरा एक पत्र, क्या चुने हुए विधायकों को इस तरह गैर-संवैधानिक और गैर-कानूनी तरीके से बर्खास्त करना सही है? क्या दिल्ली को इस तरह चुनावों में धकेलना ठीक है? क्या ये गंदी राजनीति नहीं है?” सिसोदिया ने इस पत्र में केजरीवाल सरकार द्वारा तीन साल में कराए गए कार्यों को भी गिनाया है और लिखा है कि चुनाव होने की वजह से अब दिल्ली में आचार संहिता लागू हो जाएगी. ऐसी स्थिति में नए काम नहीं हो सकेंगे. इसके बाद फिर लोक सभा चुनाव का समय नजदीक आ जाएगा. उस वक्त भी आचार संहिता लागू हो जाएगी और दिल्ली में विकास कार्य ठप हो जाएगा.

सिसोदिया ने दावा किया है कि 20 विधायकों को संसदीय सचिव बनाकर उन्हें अलग-अलग जिम्मेदारियां दी थीं. इनके काम की वजह से दिल्ली के स्कूलों, अस्पतालों में आश्चर्यजनक सुधार हुआ. सिसोदिया ने लिखा है कि केंद्र की बीजेपी सरकार ने जानबूझकर ऐसा किया है क्योंकि बीजेपी केजरीवाल सरकार के कार्यों से परेशान है.

हालांकि विधायकों की बर्खास्तगी के बहाने सिसोदिया ने पार्टी द्वारा की गई उन घोषणाओं से पार्टी का बचाव भी किया है, जो अभी तक पूरी नहीं हो सकी है. सिसोदिया ने लिखा है कि अब दो साल बचे हैं इन दो सालों में बहुत काम करना था, पूरी दिल्ली में सीसीटीवी कैमरे लगाने हैं, प्री वाई-फाई देने हैं, सरकारी सेवाओं की डोरस्टोप डिलीवरी देनी है. लेकिन अब यह सब काम पूरे नहीं हो पाएंगे.

कर्ज नहीं चुकाने पर दलित को ट्रैक्टर के नीचे कुचला

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उत्तर प्रदेश। सीतापुर से एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है. जिले के भउरी गांव के एक दलित किसान की सिर्फ इसलिए ट्रैक्टर के नीचे कुचल कर हत्या कर दी गई, क्योंकि उसने लोन नहीं चुकाया था. मृतक किसान के भाई ने फायनेंस कंपनी के लोन रिकवरी एजेंट्स पर हत्या का आरोप लगाया है. हैरत की बात यह है कि पांच लाख के लोन में से किसान चार लाख रुपये वापस कर चुका था.

 भउरी गांव के 45 वर्षीय ज्ञान चंद्र ने साल 2015 में फायनेंस कंपनी से 5 लाख रुपए का लोन लिया था, उसने 4 लाख रुपए दिसंबर 2017 तक चुका दिए थे और बाकी पैसे भी जल्द ही चुकाने की बात कही थी. ज्ञान चंद्र की पत्नी ज्ञानवती ने बताया कि उसके पति ने इस साल जनवरी की शुरुआत में भी 35,000 रुपए कंपनी को दिए थे, लेकिन फिर भी कंपनी ने रिकवरी नोटिस जारी कर दिया. फायनेंस कंपनी के एजेंट्स बाकी रकम लेने के लिए शनिवार को ज्ञान के घर पहुंचे थे.

 मृत किसान के भाई ने बताया कि उस वक्त ज्ञान खेत में काम कर रहा था और ट्रैक्टर भी उसके पास था. एजेंट्स सीधा खेत पहुंच गए और ज्ञान से बाकी पैसे मांगने लगे. एजेंट्स ने किसान से कहा कि या तो वह पैसे दे नहीं तो वे लोग ट्रैक्टर जब्त कर लेंगे. इस पर ज्ञान ने कहा कि वह जनवरी के आखिरी तक 65,000 रुपए दे देगा, लेकिन फिर भी एजेंट्स नहीं माने और ट्रैक्टर की चाबी छीन ली.

एजेंट्स को ट्रैक्टर ले जाने से रोकने के लिए ज्ञान बोनट से लटक गया, लेकिन फिर भी उन्होंने ट्रैक्टर चालू कर दिया. तभी अचानक उसका हाथ बोनट से फिसल गया और वह ट्रैक्टर के नीचे आ गया, जिससे मौके पर ही उसकी मौत हो गई.

सीतापुर के सहायक पुलिस अधीक्षक मारतंड प्रकाश सिंह के मुताबिक पांच एजेंट्स के खिलाफ इस मामले में एफआईआर दर्ज कर ली गई है.

लेकिन यह बैंक और लोन की उस व्यवस्था पर सवाल उठाता है, जिसमें करोड़ों और अरबों के कर्जदार पर बैंक और लोन वाली कंपनियां हाथ तक नहीं डालती, जबकि गरीबों के दस और बीस हजार के लिए उन्हें ट्रैक्टर के नीचे कुचल दिया जाता है.

 

पीएम मोदी के झूठ को रवीश कुमार ने पकड़ा, दिखाया आईना

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वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने पीएम मोदी के एक बयान को लेकर उन पर फिर से निशाना साधा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंग्रेजी चैनल टाइम्स नाउ को दिए इंटरव्यू में कहा था कि आज के दौर में भारत का पासपोर्ट रखना गौरव की बात बन गई है। पीएम मोदी के मुताबिक-

जो लोग देश के बाहर रहते हैं और विदेशी दौरे पर जाते आते रहते हैंउन्हें पता है कि आजकल भारतीय पासपोर्ट को कितने सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है।’ अपने इस बयान से पीएम मोदी यह कहना चाहते थे कि केन्द्र में बीजेपी की सरकार आने के बाद विश्व मंच पर भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी है। लेकिन उनके इसी जवाब पर वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने उन्हें कठघरे में खड़ा कर दिया है.अपने फेसबुक वॉल पर पीएम के इस बयान का जिक्र करते हुए रवीश ने लिखा है कि क्या प्रधानमंत्री कुछ भी बोल देते हैं. बकौल रवीश-प्रधानमंत्री ने टाइम्स नाउ से कहा कि आज भारत के पासपोर्ट की काफी इज्ज़त है। अंग्रेज़ी वाले एंकर जुगल दिन भर तो विपक्ष विरोधी और हिन्दू मुस्लिम पत्रकारिता करते रहते हैंथोड़ा गूगल कर लेते तो पता रहता। भारत से बाहर जाने वाले ही बता सकते हैं कि क्या पहले भारत के पासपोर्ट की इज्ज़त नहीं थीऔर ये इज्ज़त होने का क्या मतलब हैक्या इस आधार पर लोगों को लौटा दिया जाता हैक्या आपको पता है कि शक्तिशाली पासपोर्ट वाले मुल्कों के मामले में भारत का स्थान एशिया में आख़िर के तीन देशों में हैं। ….

रवीश ने आखिर में लिखा है कि- अजीब हाल है। जवाब सुनकर लगा कि आज से पहले भारत ही नहीं था। कोई नाम नहीं जानता था और कोई इज्ज़त नहीं करता था।

वाराणसी में छात्रों से डरी भाजपा, सुनाया अनोखा फरमान

वाराणसी। भाजपा भले ही युवाओं के बूते केंद्र और तमाम राज्यों में सरकार बनाने में सफल रही हो, अब इन्हीं युवाओं के बीच उसका विरोध शुरू हो गया है. वाराणसी में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के वाराणसी दौरे के दौरान से साफ देखने को मिला. मिशन 2019 की तैयारियों को लेकर भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह शनिवार को वाराणसी में युवा उद्घोष कार्यक्रम को संबोधित करने पहुंचे थे. इस दौरान छात्रों को कार्यक्रम में काले कपड़े पहनने पर रोक लगा दिया गया.

कार्यक्रम से पहले ही शांति भंग की आशंका के चलते महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के करीब 25 छात्रों को हिरासत में लिया गया है. इन छात्रों को कैंट थाने में रखा गया. अपने एक दिवसीय वाराणसी दौरे पर अमित शाह करीब 17000 नए युवाओं को काशी विद्यापीठ के खेल मैदान में संबोधित करेंगे.

इस कार्यक्रम में अमित शाह के साथ सूबे के मुखिया योगी अदित्यनाथ, उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, राज्यमंत्री अनुपमा जयसवाल, बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र नाथ पाण्डेय, प्रदेश संगठन मंत्री सुनील बंसल, यूपी सरकार में मंत्री अनिल राजभर और नीलकण्ठ तिवारी भी मौजूद रहे. छात्रों से ये डर भाजपा की लोकप्रियता के दावे पर सवाल खड़े करता है.

भाजपा सरकार ने जूठन को पढ़ाने पर रोक लगाई

जिस राज्य में भाजपा की सरकार बन रही है, वहां निशाने पर दलित और मुस्लिम आ रहे हैं. उत्तर प्रदेश की सहारनपुर की घटना हो या फिर गुजरात के ऊना की घटना निशाने पर लगातार दलित रहे हैं. खास बात यह कि इन घटनाओं में शामिल उपद्रवियों की सरकार अनदेखी कर देती है. ताजा मामला हिमाचल प्रदेश का है, जहां दलितों पर हमले की खबर तो नहीं है लेकिन उन्हें दूसरे तरीके से निशाना बनाया गया है.

 हिमाचल प्रदेश में बीजेपी की सरकार आने के बाद वहां निशाने पर दलित बुद्धिजीवि आ गए हैं. नवनिर्वाचित भाजपा सरकार ने दलित साहित्यकार के रुप में विख्यात ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा ‘जूठन’ को शिक्षण संस्थानों से हटाने का फैसला कर लिया है. ‘जूठन’ के खिलाफ यह आरोप लगाया जा रहा है कि इससे जातिवाद को बढ़ावा मिलता है.

हालांकि हिमाचल सरकार के इस फैसले के खिलाफ दलित बुद्धिजीवियों ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है. जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. विवेक कुमार ने इस पर आपत्ति जाहिर करते हुए कहा–

मै पूछना चाहूँगा की जातिवाद की पीड़ा, दंश एवं अनादर से जूठनजैसी कालजयी आत्मकथा की उत्पत्ति हुई है की जूठन‘ की वजह से जातिवाद पैदा होगा ?  ‘जूठनजैसी क्रातियों को पाठयक्रम में शामिल करने से शिक्षा व्यवस्‍था में प्रजातांत्रिक मूल्यों का समावेश होगा. इसके अध्ययन से  विद्यार्थियों में समाज में जाति पर आधारित अमानवीय प्रथाओं को लड़ने की चेतना जाग्रत होगी जिससे सामाज ज़्यादा प्रगतिशील होगा. शायद कुछ सवर्ण समाज के शासकों को जूठन के माध्यम से अपने समाज के इस वीभत्स एवम् विकृत चेहरे को देख कर लज्जा आ गयी. अब वो इस लज्जा को सब के सामने स्वीकार तो कर नही सकते. इस लिए उन्होने इस ज़ातिवादजैसे लचर आधार का सहारा लिया है. यह तो वही कहावत हो गयी की उल्टा चोर कोतवाल को डाटे . लेकिन कुछ भी हो इस प्रतिबंध से यह तो अवश्य प्रमाणित हो गया की ओम प्रकाश जी की  ‘ जूठनइतनी प्रभावशाली है की वह राजसत्ता को भी भयभीत कर सकती है…ओमप्रकाश वाल्मीकि जी आपकी कलम, कल्पनाशीलता एवं अदंभ साहस को शत शत नमन.

तो वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. कौशल पंवार ने इस पूरे मामले पर सवाल उठाया है. डॉ. कौशल कहती हैं- ये बैन पूरी तरह से गलत है. मेरा मानना है कि किसी भी साहित्य पर बैन नहीं लगाना चाहिए. सवर्ण छात्रों का कहना है कि वो जूठन पढ़ते हुए अपनमानित महसूस करते हैं. तो उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि जब दलित-पिछड़े समाज के बच्चे और तमाम महिलाएं मनुस्मृति और अन्य हिन्दू धार्मिक ग्रंथ पढ़ते हैं तो उन्हें भी तो अपमान से गुजरना पड़ता है. दूसरी बात की जूठन पर रोक के लिए गलत तथ्य पेश किए जा रहे हैं. कहा जा रहा है कि यह उपन्यास है और आजादी के पहले का लिखा है. यह कोरा झूठ है. जूठन उपन्यास नहीं आत्मकथा है, और ये आजादी के पहले का नहीं है. यह झूठा भ्रम फैलाया जा रहा है.

गौरतलब है कि ‘जूठन’ ओमप्रकाश वाल्मीकि के निधन से वर्षों पहले लिखा गया था और वह दलित साहित्य के रुप में पूरे देश भर में लोकप्रिय है. हाल ही में बीते विश्व पुस्तक मेले में दलित साहित्य सबसे ज्यादा बिकने वाला साहित्य था और जूठन उसमें आगे रहा था. जूठन ने लगातार दलित समाज के नए युवाओं को उनके हलिया इतिहास के बारे में बताता है. लगता है भाजपा को यही बात खटक गई है. जाहिर सी बात है कि यह दलित विरोधी फैसला है. जिस तरह से भाजपा सरकार ने जूठन पर बैन का फैसला सत्ता में आने के तुरंत बाद लिया उससे साफ है कि उसकी नजर पहले से ही इस मुद्दे पर बनी हुई थी.

 

दलितों आदिवासियों के लिए अच्छी खबर, उच्च शिक्षा दर बढ़ी

नई दिल्ली। सामाजिक और राजनीतिक चेतना के साथ ही देश के दलित और आदिवासी वर्ग में पढऩे की ललक भी तेजी से बढ़ रही है. केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के ताजे आंकड़े बता रहे हैं कि बीते 5 साल में उच्च शिक्षा में प्रवेश लेने वाले दलित और आदिवासी विद्यार्थियों की संख्या बढ़ी है.

केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से कराए गए एक सर्वे के मुताबिक पिछले 5 वर्षों में उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश दर में कुल 21.5 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई. इसमें अनुसूचित जाति की भागीदारी जो 2012-13 में 16 प्रतिशत थी, 2016-17 में बढ़ कर 21.1 प्रतिशत पर पहुंच गई. इसी तरह अनुसूचित जनजाति की 2012-13 में 11.1 प्रतिशत की भागीदारी 2016-17 में बढ़ कर 15.4 प्रतिशत पर पहुंच गई. खास बात यह है कि दोनों वर्ग में युवाओं के साथ-साथ लड़कियों ने भी उच्च शिक्षा में अपनी रुचि बढ़ाई है.

अगर इस आंकड़े को राज्यवार देखें तो तमिलनाडु पहले नंबर है, जहां दलित और आदिवासी युवाओं ने उच्च शिक्षा में सबसे ज्यादा रुचि ली है. इस लिस्ट में आंध्र प्रदेश दूसरे नंबर पर और महाराष्ट्र तीसरे नंबर पर है, जबकि आबादी के हिसाब से सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश पांचवें नंबर पर है.

दलित-आदिवासियों में पढ़ाई के लिए बढ़ती ललक एक क्रांतिकारी चेतना का प्रतीक कहा जा रहा है. शिक्षा के अभाव के चलते इन वर्गों का लंबे समय तक उत्पीडऩ और शोषण होता रहा है. लेकिन राष्ट्रनिर्माता बाबासाहेब अम्बेडकर द्वारा इस वर्ग को शिक्षा और नौकरी में संविधान में दिलाए आरक्षण की वजह से इस वर्ग की स्थिति बेहतर हुई है. हाल तक गरीबी और सामाजिक असमानता के चलते इस वर्ग के अधिकांश बच्चे बचपन में ही स्कूल छोड़ रोजी-रोजगार में लग जाते थे, आज भी यह स्थिति बनी हुई है लेकिन इसी बीच इस वर्ग के विद्यार्थियों में पढ़ाई की बढ़ती ललक की रिपोर्ट इस समाज के लिए एक अच्छी खबर है.

 

केजरीवाल को हटाने के लिए कांग्रेस और भाजपा ने बनाई नई रणनीति

नई दिल्ली। ऑफिस ऑफ प्रॉफिट के आरोप में चुनाव आयोग द्वारा आम आदमी पार्टी के 20 विधायकों की सदस्यता रद्द करने की सिफारिश के बाद दिल्ली में राजनीतिक दंगल छिड़ गया है. मामले को लेकर जहां दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपनी चुप्पी तोड़ी है, तो वहीं कांग्रेस और भाजपा अपनी नई रणनीति बनाने में जुट गई है.

 चुनाव आयोग के फैसले के बाद केजरीवाल ने सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया दी. केजरीवाल ने कहा, ‘इतिहास गवाह है कि जीत अंत में सचाई की होती है. वहीं दूसरी ओर चुनाव आयोग के फैसले के बाद अब भाजपा और कांग्रेस इसे दिल्ली में अपनी पार्टी की ताकत बढ़ाने के मौके के रूप में देख रही है. चुनाव आयोग द्वारा अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को भेजने के बाद बीजेपी और कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी पर हमला बोलते हुए अरविंद केजरीवाल से इस्तीफे की मांग की है. तो वहीं दोनों पार्टियां इन सीटों पर उप चुनाव के लिए रणनीति पर भी चर्चा करने लगी है.

हालांकि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी ने केजरीवाल का पक्ष लिया है. सोशल मीडिया में केजरीवाल के पक्ष में जारी बयान में बनर्जी ने लिखा- “एक संवैधानिक संस्था का इस्तेमाल ऐसे राजनीतिक विद्वेष के लिए नहीं किया जा सकता. विधायकों को सुनवाई के लिए चुनाव आयोग ने मौका भी नहीं दिया. यह दुर्भाग्यपूर्ण है और न्याय के प्रावधानों के विपरीत है.” तो वहीं इस बीच आम आदमी पार्टी ने बीजेपी शासित राज्यों में पार्लियामेंट्री सचिवों की नियुक्ति पर सवाल उठाते हुए पूछा है कि क्या उनके खिलाफ भी यही कार्यवाही होगी.

फिलहाल इस मामले में अगली सुनवाई सोमवार को हाईकोर्ट में होनी हैलेकिन उससे पहले दिल्ली के सियासी गलियारों में राजनीतिक लड़ाई छिड़ चुकी है

देश भर में याद किए गए रोहित वेमुला

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दो साल पहले 17 जनवरी को हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के दलित छात्र रोहित वेमुला ने हॉस्टल के अपने कमरे में ख़ुदकुशी कर ली थी. उसके बाद रोहित वेमुला को लेकर देश भर के छात्र सड़कों पर उतर आये थे और संसद में बहस भी हुई लेकिन दो साल बीत जाने के बाद भी रोहित वेमुला को न्याय नहीं मिला है.

रोहित की शहादत के 2 साल बाद एक बार फिर से उनको इंसाफ दिलाने की मुहिम तेज़ हो गई है। रोहित की दूसरी पुण्यतिथि पर सोशल मीडिया रोहित वेमुला की इंसाफ की मांग को लेकर एक बार फिर उबल पड़ा.

असल में रोहित की आत्महत्या हमारे आधुनिक संस्थानों पर सवाल उठाता है और यह दिखाता है कि उच्च शिक्षण संस्थान दलितों के प्रति आंतरिक रूप से असंवेदनशील है.

रोहित की आत्महत्या जिसे सांस्थानिक हत्या कहा गया वह आज भी कई सवाल खड़े करता है.

रोहित खगोल विज्ञानी और वैज्ञानिक कार्ल सैगन जैसे लेखक बनना चाहता था, लेकिन जातिवाद के जहर ने उसके सपनो को पूरा करने से पहले ही उसकी जान ले ली.

उनकी मृत्यु के दो साल बाद भी रोहित का परिवार इन्साफ की गुहार लगा रहा है.