दलित प्रोफेसर पर कमेंट पर एबीवीपी छात्र निष्कासित

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हैदराबाद। हैदराबाद विश्वविद्यालय ने पीएचडी के एक छात्र को सोशल मीडिया पर एक दलित प्रोफेसर के खिलाफ अपशब्द कहने पर एक वर्ष के लिए निष्कासित कर दिया है. विश्वविद्यालय ने गुरुवार को कालूराम पल्सानिया को निष्कासित करने के आदेश जारी किया. पल्सानिया इतिहास विभाग का शोध छात्र था, साथ ही आरएसएस से संबद्ध छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) का नेता भी है. प्रोफेसर द्वारा सेमेस्टर परीक्षा में ‘शिक्षा के भगवाकरण’ के मुद्दे पर एक प्रश्न बनाने पर पल्सानिया ने सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ अपमानजनक शब्द लिखे थे. इसके बाद विश्वविद्यालय ने सात सदस्यीय बोर्ड बनाया था. इसमें विश्वविद्यालय के शिक्षकों के अलावा एक सेवानिवृत न्यायाधीश व एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी शामिल थे. जांच के बाद केंद्रीय विश्वविद्यालय ने एक बयान जारी कर कहा- “विश्वविद्यालय के प्रॉक्टोरियल बोर्ड ने छात्र को सोशल मीडिया पर अर्थशास्त्र के प्रोफेसर के. लक्ष्मीनारायण को अपशब्द बोलने का दोषी पाया.” बोर्ड ने छात्र पर 30,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया है. पल्सानिया ने पिछले नवंबर में सोशल मीडिया पर लक्ष्मीनारायण पर आरोप लगाया था कि ‘वह केवल अपनी ब्लैकमेल करने वाली चालों की मदद से प्रोफेसर बने हैं.’यह पोस्ट बीते महीने चर्चा में आई और इसके बाद परिसर में तनाव फैल गया था. इसके बाद अंबेडकर छात्र समिति और अन्य दलित संगठनों ने पल्सानिया के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की मांग की थी. दलित छात्र रोहित वेमुला की द्वितीय पुण्यतिथि पर इस मुद्दे ने जोर पकड़ लिया, जिसके बाद यह कार्रवाई हुई है.

 

करण कुमार

बीजेपी को तीन तलाक देने वाला पहला राज्य बना राजस्थान- शत्रुध्न सिन्हा

नई दिल्ली। राजस्थान में हुए उपचुनाव में बीजेपी को करारा झटका लगा है. प्रदेश के दो लोकसभा और एक विधान सभा सीट पर हुए उप चुनावों में कांग्रेस ने भाजपा को हरा दिया है. इस हार के बाद बीजेपी नेता और बिहार के पटना साहिब से लोकसभा सांसद शत्रुघ्न सिन्हा ने अपनी ही पार्टी पर तंज कसा है. उन्होंने ट्वीट कर कहा कि राजस्थान बीजेपी को तीन तलाक देने वाला पहला राज्य बन गया है.

शत्रुघ्न सिन्हा ने लिखा, ‘सारे रिकॉर्ड्स तोड़ने वाली सत्तारूढ़ पार्टी बीजेपी के लिए ब्रेकिंग न्यूज़- बीजेपी को तीन तलाक देने वाला पहला राज्य बन गया है राजस्थान. अजमेर- तलाक, अलवर- तलाक, मांडलगढ़- तलाक. हमारे विरोधियों ने अच्छे मार्जिन से इस चुनाव को जीता है. हमारी पार्टी को जोरदार झटका दिया है.’ उन्होंने दूसरा ट्वीट करते हुए बीजेपी को जागने की हिदायत दे डाली.

 

हरियाणा में बाबासाहेब की प्रतिमा को पहुंचाया नुकसान

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हरियाणा। बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त किए जाने की खबर आए दिन आती रहती है. ताजा मामले में हरियाणा के जींद जिले के रानी तालाब इलाके में डॉ. आम्बेडकर की प्रतिमा को नुकसान पहुंचाने की खबर है. यहां कुछ अज्ञात लोगों ने बाबासाहब की एक प्रतिमा को नुकसान पहुंचाया है. पुलिस ने इसकी जानकारी दी है.

पुलिस को इस घटना की सूचना बहुजन समाज पार्टी और डॉ. बी आर आंबेडकर कल्याण संघर्ष समिति के सदस्यों ने शुक्रवार को दी. उन्होंने आरोप लगाया कि प्रतिमा को क्षतिग्रस्त कर दिया गया है. बीएसपी और समिति के सदस्यों ने इलाके में विरोध प्रदर्शन किया जिसके बाद सुरक्षा कड़ी कर दी गई. पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को मामले की जांच कर दोषियों को गिरफ्तार करने का आश्वासन दिया है.

   

भाजपा को रोकने के लिए जेल में लालू से मिलेंगे शरद यादव

पटना। भाजपा के खिलाफ तमाम विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने की कवायद लालू प्रसाद यादव ने शुरू की थी. नीतीश कुमार से अलगाव के बाद बीते साल लालू यादव ने पटना में विशाल रैली आयोजित कर तमाम विपक्षी दलों को इकट्ठा किया था. अब जब बजट सत्र के बाद विपक्षी दलों ने बैठक कर भाजपा को रोकने की रणनीति पर चर्चा तेज कर दी है तो सबको लालू यादव की कमी खलने लगी है. क्योंकि लालू यादव बिहार में विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा और सबसे बड़ी पार्टी भी हैं.

इस कमी को दूर करने के लिए विपक्षी दलों ने नया उपाय ढूंढ़ लिया है. अब लालू यादव से राजनैतिक सलाह-मशविरा करने के लिए जेल में ही बैठक होगी. इसकी जिम्मेदारी जनता दल यू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव को दी गई है.

शरद यादव 5 फरवरी को लालू यादव से रांची जेल में मुलाकात करेंगे, जहां वह विपक्ष की रणनीति के बारे में लालू यादव से चर्चा करेंगे. इससे पहले बजट पेश होने के बाद सोनिया गांधी के नेतृत्व में विपक्षी दलों की बैठक हुई थी. इस बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, एनसीपी के शरद पंवार, राष्ट्रीय लोक दल के अजीत सिंह, सपा से रामगोपाल यादव, राष्ट्रीय जनता दल से लालू यादव की बेटी मीसा भारती सहित कुल 17 विपक्षी दलों के नेता शामिल हुए थे. इस दौरान सोनिया गांधी ने विभिन्न दलों के नेताओं से राज्यों के आपसी मतभेदों को भुलाकर केंद्र में भाजपा को रोकने के लिए साथ आने की अपील की. इस पर सभी दल सहमत दिखें. हालांकि इस दौरान लालू यादव की गैरमौजूदगी सबको खली.

इसी के बाद शरद यादव को लालू यादव से तमाम मुददों पर चर्चा करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है. यादव जहां जेल में लालू यादव से मिलकर रणनीति पर चर्चा करेंगे तो वहीं लालू यादव की बात को सोनिया गांधी और तमाम विपक्ष तक पहुंचाएंगे. इससे पहले विपक्षी दलों को एक साथ लाने के लिए लालू प्रसाद यादव ने कई बार बैठक भी की थी लेकिन चारा घोटाले में फैसला आने के बाद से वह जेल में हैं. 2019 में चुनाव को लेकर विपक्षी दल अभी से गंभीर हैं और भाजपा को रोकने के लिए तमाम रणनीति पर चर्चा कर रहा है.

 

जीत से किया वन डे सीरीज का आगाज, द. अफ्रीका को 6 विकेट धोया

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नई दिल्ली। भारत ने पहले वनडे मुकाबले में द. अफ्रीका को 6 विकेट से हरा दिया। अब 6 वनडे मैचों की सीरीज में भारतीय टीम को 1-0 की बढ़त मिल गई है। इस मुकाबले में द. अफ्रीका के कप्तान ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाज़ी करने के फैसला किया। पहले बल्लेबाजी करते हुए द. अफ्रीका के कप्तान डू प्लेसिस के शानदार शतक के दम पर निर्धारित 50 ओवर में 8 विकेट पर 269 रन बनाए। भारत को जीत के लिए 270 रन का लक्ष्य मिला था जिसे मेहमान टीम ने विराट के शानदार शतक के दम पर 45.3 ओवर में 4 विकेट पर हासिल कर लिया। डरबन में वनडे में ये भारतीय टीम की पहली जीत थी।

गेंदबाजी करते हुए भारत को पहली सफलता जसप्रीत बुमराह ने दिलाई। बुमराह ने 16 रन पर खेल रहे अमला को LBW आउट कर द. अफ्रीका को पहला झटका दे दिया। इसके बाद डि कॉक को 34 रन पर चहल ने LBW आउट कर भारत को दूसरी सफलता दिला दी। मार्करम (09) चहल की गेंद पर बड़ा शॉट लगाने की कोशिश में पांड्या को कैच दे बैठे। पांड्या ने भी बेहतरीन कैच पकड़कर द. अफ्रीका को तीसरा झटका दे दिया। 12 रन बनाकर खेल रहे जे पी डुमिनी को कुलदीप यादव ने अपनी फिरकी से ऐसा चकमा दिया कि वो बोल्ड हो गए। 7 रन बनाकर डेविड मिलर कुलदीप यादव की गेंद पर विराट कोहली को कैच थमा बैठे। चाइनामैन कुलदीप यादव ने अपना तीसरा शिकार क्रिेस मॉरिस को बनाया और 37 रन पर क्लीन बोल्ड कर दिया। द. अफ्रीकी कप्तान डू प्लेसिस ने अपने वनडे करियर का 9 वां शतक लगाया। उन्होंने 101 गेंदों पर अपना शतक पूरा किया। प्लेसिस ने इस मैच में कुल 120 रन बनाए और 112 गेंदों का सामना किया। उनकी पारी का अंत भुवी ने किया। भुवी की गेंद पर प्लेसिस का कैच हार्दिक पांड्या ने पकड़ा। रबादा एक रन बनाकर रन आउट हो गए। फेलुकवायो ने नाबाद 27 रन की पारी खेली।

भारतीय स्पिनर्स ने इस मैच में कमाल की गेंदबाजी की। कुलदीप यादव ने 3 और युजवेंद्र चहल ने 2 विकेट लिए। भारतीय तेज गेंदबाज भुवनेश्वर कुमार और हार्दिक पांड्या ने एक-एक विकेट लिए।

270 रनो का पीछा करते हुए भारतीय पारी के ओपनर बल्लेबाज रोहित शर्मा अच्छी लय में दिख रहे थे और उन्होंने कुछ अच्छे शॉट्स भी लगाए। पहले विकेट के लिए उन्होंने शिखर के साथ मिलकर 33 रन की साझेदारी की। रोहित 20 रन के व्यक्तिगत स्कोर पर मोर्कल की गेंद पर विकेटकीपर डी कॉक के हाथों लपके गए। शिखर धवन अच्छी बल्लेबाजी कर रहे थे। एक गेंद उनके पैड पर लगी और LBW का अपील किया गया। तब तक विराट ने उन्हें दूसरे एंड से आवाज लगाई और रन के लिए दौड़ा दिया लेकिन मार्करम का थ्रो सीधा विकेट पर लगा और धवन रन आउट हो गए। धवन ने 35 रन बनाए। रहाणे ने द. अफ्रीका के खिलाफ शानदार 79 रन की पारी खेली और तीसरे विकेट के लिए कप्तान विराट के साथ रिकॉर्ड 189 रन की साझेदारी की। रहाणे को फेलुकवायो की गेंद पर इमरान ताहिर ने लपका। विराट कोहली ने कप्तानी पारी खेलते हुए शतक लगाया। उन्होंने 119 गेंदों पर 112 रन की पारी खेली। फेलुकवायो की गेंद पर विराट को कैच रबादा ने पकड़ा। डरबन में ये विराट का पहला वनडे शतक था। धौनी 4 रन बनाकर जबकि पांड्या 3 रन बनाकर नाबाद रहे।

 

दलित राजनीति के तीन संकट

दुनिया भर में प्रतिरोध आंदोलनों का विकास अगर देखें, तो पता चलता है कि ये आंदोलन जिनके विरुद्ध प्रतिरोध कर रहे होते हैं, कुछ समय बाद उन्हीं के गुण-अवगुण अपने में शामिल कर लेते हैं। इसका कारण यह माना जाता है कि वे कोई वैकल्पिक संस्कृति नहीं बना पाते। और यहीं से उनका संकट शुरू हो जाता है। श्रमिक आंदोलन का नेतृत्व जिस मैनेजमेंट के खिलाफ लड़ रहा होता है, उसी की संस्कृति से उपजे प्रलोभनों का शिकार हो जाता है। राज्य के खिलाफ उभरे अनेक आंदोलन धीरे-धीरे राज्यसत्ता की संस्कृति में ही तिरोहित होते गए हैं। यही हश्र देश में दलित आंदोलनों का हुआ। दलित आंदोलन जिस वर्चस्व रखने वाली सामाजिक-राजनीतिक संस्कृति के खिलाफ शुरू हुआ था, धीरे-धीरे उसी में तिरोहित होता गया है। वर्चस्व रखने वाले राजनीतिक समूहों के गुण-अवगुण उसमें भी आते गए हैं।

भारत में विभिन्न राज्यों में दलित आंदोलन के कई रूप सक्रिय हैं, अत: इनकी संभावनाओं, समस्याओं और संकट के रूप भी भिन्न होंगे। बिहार में दलित उभार का एक बड़ा धड़ा जहां उग्र वामपंथी संस्थाओं से प्रभावित रहा है, वहीं उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र में स्वायत्त दलित राजनीतिक आंदोलनों का उभार हुआ है। आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कनार्टक जैसे दक्षिणी राज्यों में दलित उभार का नेतृत्व काफी कुछ कांग्रेस के प्रभाव में विकसित होता रहा है। लेकिन सबमें एक आकांक्षा समान रही- वह है शिक्षा व राजनीति के माध्यम से राज्यसत्ता की योजनाओं में हिस्सेदारी व सामाजिक सम्मान की चाह। राज्यसत्ता और लोकतांत्रिक संस्कृति से उन्हें सामाजिक बंधनों से मुक्ति व विकास की दिशा में बढ़ने में मदद भी मिली है।

देश में 90 का दशक दलित राजनीति के उभार का दशक था। तब उत्तर प्रदेश, पंजाब, मध्य प्रदेश, राजस्थान में प्रभावी ढंग से कांशीराम और मायावती के नेतृत्व में बहुजन राजनीति ने अपनी जगह बनाई। मगर पिछले दशक में उत्तर प्रदेश में बहुजन राजनीति कमजोर हुई और यह कई तरह से संकटग्रस्त दिखने लगी। अवसरवाद, धनाकांक्षा, स्वार्थों की टकराहट ने इसकी दूसरी पांत के नेतृत्व को काफी कमजोर किया। महाराष्ट्र में तो अंबेडकर की बनाई आरपीआई दो दशक पहले ही कई धड़ों में बंट गई थी। हालांकि इन विभाजनों का मानचित्र वैचारिक टकराहटों ने गढ़ा था, फिर भी इनके अनेक नेता कांग्रेस के गहरे प्रभाव में थे। कांग्रेस-आरपीआई गठबंधन की प्रक्रिया में धीरे-धीरे आरपीआई कांग्रेस में तिरोहित होती गई, फिर उसका एक बड़ा धड़ा शिवसेना से जुड़ा और फिर उस रास्ते कुछ धड़े भाजपा से जुड़ गए। रामदास अठावले आज भाजपा की केंद्र सरकार में मंत्री भी हैं।

कांशीराम ने दलित नेतृत्व की इस प्रवृत्ति को ‘चमचा एज’ के रूप में समझा था और दलितों की एक स्वायत्त राजनीति विकसित करने का प्रण लिया था, जिसमें उन्होंने दलितों को ‘देने वाली राजनीतिक शक्ति’ के रूप में परिकल्पित किया था, न कि ‘लेने वाले’ समूह के रूप में। बहुजन राजनीति में उनका यह स्वप्न पूरा हो भी रहा था। दलित नेतृत्व के बैनर तले गैर-दलित तबकों को आकर सत्ता में भागीदारी स्वीकार करनी पड़ी। पर बहुजन राजनीति भी जिनके विरुद्ध वैकल्पिक राजनीति देने के एजेंडे पर काम कर रही थी, उसी के अवगुणों का शिकार हो गई। सीमांत से मुख्यधारा में आने की लड़ाई लड़ते-लड़ते वह खुद मुख्यधारा की सीमाओं में उलझ गई।

दलित राजनीति के संकट का दूसरा कारण दलित समूहों में राजनीतिक और सत्ता सुविधाओं के लिए स्पद्र्धा से बना टकराव है। पंजाब में बड़ी दलित आबादी रहती है, जिनकी संख्या लगभग 31 प्रतिशत है, किंतु वहां दो बड़े दलित समूहों- जाटव (चर्मकार) और वाल्मीकि में गहरा विभाजन है। एक समूह कांग्रेस के साथ जाता है, तो दूसरा अकाली दल की तरफ। उसी तरह, उत्तर प्रदेश में जाटव-पासी, बिहार में पासवान-हरिजन (चर्मकार) अलग-अलग राजनीतिक पक्ष तय करते हैं। आंध्र प्रदेश में माला-मादिगा, महाराष्ट्र में महार-मातंग अपने-अपने राजनीतिक हितों के लिए आपस में टकराते हैं। इससे एक संगठित दलित सामाजिक समूह का उभार नहीं हो पाता। यूं भी दलित समूह एक ‘होमोजेनियस’ समूह नहीं है, उसमें कई स्तर व टकराहटों से भरे जातीय, उप-जातीय चरित्र भी काम करते हैं। दलित संख्या के स्तर पर बड़े समुदायों के साथ कई छोटे-छोटे समुदाय भी हैं, जिन्हें अब भी राजनीतिक पहचान नहीं मिली है। दलित राजनीति की एक चुनौती ऐसे छोटे-छोटे समुदायों कोे राजनीति और विकास में भागीदारी दिलाना भी है।

तीसरा संकट भाषा का है। मायावती अपना ‘मनुवाद विरोधी’ पोस्चर कब का खो चुकी हैं, उनकी सर्वजन की भाषा प्रभावी तो रही, किंतु उस पर उन्हें नई धार देनी है। पिछले दिनों दलित समूहों में भी एक नया मध्यवर्ग उभरा है। उससे संवाद के लिए मायावती को भी जाति, सर्वजन के प्रतीकों के साथ नई भाषा गढ़नी होगी। इस बीच दलितों में एक युवा नेतृत्व भी उभरा है, जो टेक्नोसेवी, सिविल सोसायटी आंदोलन की भाषा के साथ एक आक्रामक रुख वाला नेतृत्व है। गुजरात में जिग्नेश मेवाणी, उत्तर प्रदेश में चंद्रशेखर रावण को इसी कोटि में रखा जा सकता है। मायावती के लिए यह भी समस्या है कि कैसे इस नए उभरे नेतृत्व के साथ संवाद स्थापित कर या तो उन्हें अपने में समाहित करें या उनके साथ गठजोड़ करें। दलितों में उभर रहे इस युवा नेतृत्व के लिए एक समस्या यह है कि यह महाराष्ट्र में 70 में उभरे दलित पैंथर की भाषा को पुन: गढ़ने की कोशिश कर रहा है। दलित आकांक्षा और वामपंथी शब्दावलियों का मिला-जुला रूप जो प्रकाश अंबेडकर, नामदेव ढासाल में देखा गया था, उसी भाषा को फिर से इस युवा नेतृत्व ने गढ़ा है। यह भाषा प्रारंभ में तो आकर्षक लगती है, स्ट्रीट फाइट के लिए उत्तेजित भी करती है, पर इसमें बड़े सामाजिक परिवर्तन की कोई योजना अभी तो नहीं दिखती। जिग्नेश स्वयं कांग्रेस के समर्थन से गुजरात का चुनाव जीते हैं। कांग्रेस ने एक तरह से उन्हें अपनी सीट गुजरात में दी है।

जिस लोकतंत्र ने दलित राजनीति के विकास के लिए कैनवास प्रदान किया है, जिस चुनावी लोकतंत्र ने उन्हें उड़ने को आकाश दिया है, उसी तंत्र ने ऐसी काजल की कोठरी भी बना दी है, जिसमें उन्हें बच-बचकर यात्रा करनी पडे़गी। एक वैकल्पिक राजनीति का स्वप्न बनाए रखना है, जो भले पूरी तरह सच न हो, किंतु उसका आभास भी दलित राजनीति में नई जान फूंक सकता है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

साभारः हिन्दुस्तान

बजट को लेकर मायावती ने उठाए गंभीर सवाल

नई दिल्ली। मोदी सरकार द्वारा अपना आखिरी बजट पेश किए जाने पर प्रतिक्रिया देते हुए बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष और यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने इसे पिछले चार सालों की तरह ही केवल लच्छेदार बातों वाला बताया है. बजट पर अपनी पहली प्रतिक्रिया में मायावती ने कहा कि यह केवल लच्छेदार बातों वाला छलावा व गरीब-विरोधी एवं धन्नासेठ समर्थक बजट है. पीएम मोदी को कठघरे में खड़ा करते हुए बसपा प्रमुख ने कहा कि मोदी सरकार को अपनी जुमलेबाजी बंद कर के तथ्यों व तर्कों के आधार पर देश को यह बताना चाहिए कि वह अच्छे दिन कहां हैं, जिसका वायदा उन्होंने देश की सवा सौ करोड़ जनता से सीना तानकर चुनाव के समय किया था. और अगर वो ऐसा नहीं कर सकते तो उन्हें देश से मांफी मांगनी चाहिए.

भाजपा सरकार इस बजट को जहां किसानों और गरीबों की हितैषी बता रही है तो वहीं मायावती ने कहा कि मोदी सरकार की प्राथमिकताएं देश के करोड़ों गरीबों, मजदूरों, किसानों व अन्य मेहनतकश लोगों के हितों की रक्षक कतई नहीं है. इसी वजह से बेरोजगारी की महामारी है तथा अमीरों व गरीबों के बीच पहले से मौजूद खाई लगातार बढ़ती चली जा रही है. मायावती ने कहा कि केवल भाषणों व लच्छेदार बातों से गरीबों व मेहनतकश जनता का पेट नहीं भरने वाला है, बल्कि सरकार द्वारा जो भी वायदे किए गए हैं, उसका लेखा-जोखा बताना चाहिए.

युवाओं के रोजगार का मुद्दा उठाते हुए मायावती ने कहा है कि युवाओं और ग्रामीण भारत को उसकी अपनी क्षमता के अनुसार बेहतर रोजगार के अवसर मुहैया कराने की जरूरत है. न कि पकौड़ा बेचकर रोजगार अर्जित करने के सरकारी सुझाव की. देश के करोड़ो शिक्षित युवा पहले ही मजबूरी में चाय-पकौड़ा बेचने का काम कर रहे हैं, जो कि ठीक नहीं है. उन्होंने इसे मोदी सरकार की विफलता का जीता-जागता प्रमाण कहा.

राजस्थान में भाजपा की हालत खराब, उप चुनाव में करारी हार

राजस्थान। एक फरवरी को अगर सरकार केंद्रीय बजट पेश न कर रही होती तो सुबह से लेकर शाम तक मीडिया में सिर्फ राजस्थान चुनाव की चर्चा चल रही होती, जहां कांग्रेस ने भाजपा को बड़ी शिकस्त दी है. राजस्थान में दो लोकसभा और एक विधानसभा सीट पर हुए उप चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा को हरा दिया है. अपनी पूरी ताकत झोंकने के बावजूद भाजपा को इन सीटों पर हार का सामना करना पड़ा है. अजमेर औऱ अलवर में जहां लोकसभा सीट पर चुनाव था तो मांडलगढ़ में विधानसभा सीट के लिए.

बीते दो सालों में भाजपा ने लोकसभा उप चुनावों में चौथी सीट गंवाई है. तो. 2014 लोकसभा चुनाव के बाद अब तक हुए 16 उप चुनाव में भाजपा को 14 में हार का मुंह देखना पड़ा है, जबकि कांग्रेस ने उससे चार सीटें जीत ली हैं. इन नतीजों के बाद लोकसभा में कांग्रेस की सीटें बढ़ गई है. यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस राजस्थान की 25 में से 25 सीटें हार गई थी, ऐसे में दो लोकसभा सीटों पर जीत के साथ राजस्थान में उसका खाता खुल गया है. इन नतीजों के बाद राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष सचिन पायलट का कद बढ़ गया है.

इसी साल दिसंबर में राजस्थान में विधानसभा चुनाव होने हैं, उसके पहले यह हार भाजपा के स्थानीय नेतृत्व पर सवाल खड़ा करता है. असल में राजस्थान का उप चुनाव सिर्फ तीन सीटों और तीन प्रत्याशियों की जीत हार का मामला नहीं है. इन तीनों सीटों के लिए भाजपा ने अपने पंद्रह मंत्रियों और 14 विधायकों को लगा रखा था. उन पर इन तीनों सीटों को जिताने की जिम्मेदारी थी औऱ ऐसे में जब भाजपा की हार हुई है तो इसे इन सभी नेताओं की हार के रूप में देखा जा रहा है.

उपचुनावों में भजापा की लगातार होती हार ने अब पार्टी को परेशान करना शुरू कर दिया है. सिर्फ राजस्थान की बात करें तो पिछले चार साल में यहां 8 उपचुनाव हुए हैं, जिनमें छह में कांग्रेस विजयी रही है. पार्टी के सामने अभी 6 और उपचुनाव की चुनौती है. इसमें उत्तर प्रदेश के फूलपुर और गोरखपुर के साथ महाराष्ट्र में गोंदिया और पालघर लोकसभा समेत अभी दो और सीटों पर उप चुनाव होना है. ऐसे में भाजपा के सामने अब उप चुनावों में इज्जत बचाने का सवाल खड़ा हो गया है

देखिए, बजट पर किस विपक्षी नेता ने क्या कहा

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नई दिल्ली। बजट के बाद एक बात लगभग तय होती है. सत्ता पक्ष जहां बजट की तारीफ करता है तो वहीं विपक्षी दल बजट की कमियां गिनाता नजर आता है. बावजूद इसके बजट के बाद कुछ विशेष नेताओं और दलों की टिप्पणियों को काफी तव्वजो दी जाती है. आइए डालते हैं ऐसी टिप्पणियों पर नजर, और देखते हैं कि किसने क्या कहा?

बजट में बिहार के लिए कुछ नहीं- तेजस्वी यादव

आरजेडी नेता और बिहार के डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव ने कहा कि बजट में बिहार के लिए कुछ भी नहीं. बिहार को विशेष पैकेज और विशेष राज्य के दर्जे पर कुछ भी नहीं मिला. नीतीश कुमार बताए क्या यही उनके लिए डबल इंजन है? नीतीश की वजह से ही बीजेपी की केंद्र सरकार बिहार के साथ सौतेला व्यवहार कर रही है. केवल अमीरों की हिमायती है सरकार- अखिलेश

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव ने कहा कि गरीब-किसान-मजदूर को निराशा, बेरोजगार युवाओं को हताशा. कारोबारियों, महिलाओं, नौकरीपेशा और आम लोगों के मुंह पर तमाचा. ये जनता की परेशानियों की अनदेखी करने वाली अहंकारी सरकार का विनाशकारी बजट है. आखिरी बजट में भी बीजेपी ने दिखा दिया कि वो केवल अमीरों की हिमायती है. अब जनता जवाब देगी.

गंभीर परिणाम आएंगे- चिदंबरम

पूर्व वित्त मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने कहा कि 2018-19 के बजट में वित्त मंत्री अरुण जेटली राजकोषीय मजबूती की परीक्षा में फेल हुए हैं और इसके गंभीर परिणाम सामने आएंगे. उन्होंने कहा कि 2017-18 के लिए राजकोषीय घाटे का लक्ष्य सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 3.2% पर रखा गया था, लेकिन इसके 3.5% पर पहुंचने का अनुमान है.

 

बजट में सांसदों को मिली विशेष सहूलियत

नई दिल्ली। इस साल का बजट सांसदों के लिए खुशखबरी लेकर आया है. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सासंदों की मांग को स्वीकार कर लिया है. इसके बाद सांसदों का वेतन हर पांच साल में मुद्रास्फीति के अनुरूप अपने आप बढ़ जाएगा.

लोकसभा में 2018-19 का केंद्रीय बजट पेश करते हुए जेटली ने कहा कि सांसदों को मिलने वाली आय-भत्तों को लेकर सार्वजनिक स्तर पर काफी बहस हो रही है. इस कारण मैं संसद सदस्यों के वेतन, निर्वाचन क्षेत्र भत्ता और देय अन्य खर्च के लिए कुछ जरूरी बदलाव प्रस्तावित कर रहा हूं जो एक अप्रैल, 2018 से प्रभावी होगा.

जेटली ने कहा, “यह कानून उनके वेतन को हर पांच साल में मुद्रास्फीति के हिसाब से अपने आप बढ़ा दिया जाएगा.” लोकसभा के कुछ सांसदों ने संसद के शीतकालीन सत्र में सर्वोच्च और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन में बढ़ोत्तरी के विधेयक पर बहस के दौरान अपने वेतन में वृद्धि की मांग की थी.

 

सिर्फ 20 प्वाइंट में देखिए पूरा बजट

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नई दिल्ली। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने बजट 2018 में कई घोषणाएं कीं. बजट का मुख्य फोकस किसानों पर रहा, जिससे साफ हो गया कि किसानों को केंद्र में रखकर सरकार अगामी लोकसभा चुनाव के लिए जमीन तैयार कर रही है. किसानों के लिए कई योजनाओं की घोषणा की गई. ‘हवाई चप्परल’ वाले को हवाई जहाज से यात्रा करने की सोच को बल देने के लिए ‘उड़ान योजना’ का भी जिक्र किया गया. बजट की घोषणाएं कितनी पूरी होंगी ये तो आने वाला वक्त बताएगा लेकिन फिलहाल नजर डालते हैं उन घोषणाओं पर, जिनको पढ़कर आप बजट के बारे में सरकार की मंशा को समझ सकते हैं.

 बजट में गरीब परिवारों के लिए राष्ट्रय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना लॉन्च किए जाने की घोषणा की गई है. इसके         तहत देश 10 करोड़ परिवार अर्थात 50 करोड़ लोगों को 5 लाख रुपये प्रति परिवार कैशलेस मेडिकल बीमा कवर दिया     जाएगा.  वर्ष 2022 तक सरकार ने 51 लाख नये घरों का निर्माण किए जाने की घोषणा की है.  उज्जवला योजना के तहत 8 करोड़ गरीब महिलाओं को मुफ्त गैस कनेक्शकन दिए जाने की घोषणा.  सभी वेतनभोगियों को 40 हजार का स्टैंवडर्ड डिडक्श न देने की घोषणा.  वरिष्ठग नागरिकों को जमा राशि पर मिलने वाले ब्याैज आय में 50 हजार रुपये तक की छूट की घोषणा.  ‘उड़ान योजना’ के तहत देशभर में 56 हवाई अड्डों और 31 हेलीपैडों में कनेक्टिविटी सुविधा की घोषणा.  बिटक्वाोइन जैसी करेंसी को लेकर जारी उहापोह के बीच सरकार ने साफ किया है कि भारत सरकार इसे नहीं मानेगी.  अगले वित्त वर्ष का रक्षा बजट 2.95 लाख करोड़ रुपये का होगा.  डिजिटल इंडिया प्लाइन के लिए इस बजट में 3073 करोड़ रुपये का प्रावधान.  ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट एक्सेइस के लिए 5 लाख वाईफाई हॉटस्पॉनट बनाए जाने की घोषणा.  रेलवे के लिए 1.48 लाख करोड़ रुपये का बजट आवंटित किए जाने की घोषणा.  3600 किलोमीटर रेल पटरियों के नवीनीकरण का लक्ष्य निर्धारित.  600 प्रमुख स्टेलशनों को पुन: विकसित करने का कार्य शुरू किए जाने की घोषणा.  जवाहर नवोदय विद्यालय की तर्ज पर आदिवासी बहुल ब्लॉककों में ‘एकलव्यज’ मॉडल आवासीय विद्यालय खोले         जाने की घोषण.  2022 तक शिक्षा में आधारभूत सुधार के लिए ‘राइज’ नामक पहल का प्रस्ताोव किया गया है.  शिक्षकों के लिए एकीकृत बीएड कार्यक्रम शुरू किए जाने की घोषणा एवं स्कूरलों को आधुनिक बनाए जाने की घोषणा.  स्कूघलों में ब्लैरक बोर्ड की जगह स्माषर्ट बोर्ड लगाए जाएंगे. अगले 4 सालों में एक लाख करोड़ रुपये खर्च किए जाने     की घोषणा.  हर तीन लोकसभा सीटों पर एक मेडिकल कॉलेज बनाने की योजना. इस वर्ष 24 नये मेडिकल कॉलेज खोले जाने की     घोषणा.  किसानों की आमदनी बढ़ाने की दिशा में सरकार ने कई महत्ववपूर्ण घोषणाएं की. सरकार ने कहा कि वह सभी खरीफ     फसलों का मूल्यक उत्पांदन लागत से डेढ़ गुना अधिक करने का फैसला.  सौभाग्यस योजना के जरिए 4 करोड़ गरीबों को बिजली कनेक्शधन दिए जाने की घोषणा की गई है.  अगले वित्त वर्ष में 2 करोड़ शौचालय बनाए जाने की भी बात.

 

बजट में एससी/एसटी से फिर धोखाधड़ी

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नई दिल्ली। केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने गुरुवार को आम बजट पेश करते हुए अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति का भी जिक्र किया. जेटली ने इन दोनों समुदाय के लिए धन के आवंटन को बढ़ाकर क्रमश: 56,619 करोड़ रुपये व 39,135 करोड़ रुपये करने की बात कही गई. वित्त मंत्री जेटली ने कहा कि 2017-18 के लिए निर्धारित आवंटन अनुसूचित जातियों के लिए 52,719 करोड़ रुपये व अनुसूचित जनजातियों के लिए 32,508 करोड़ रुपये था, जिसे बढ़ा दिया गया है.

हालांकि सच्चाई यह है कि बजट में पिछले कई सालों से दलितों और आदिवासियों से छल होता रहा है. नियम के मुताबिक देश की अनुसूचित जाति और जनजाति के हित के लिए कुल बजट का एक हिस्सा इन दोनों समुदायों की जनसंख्या के हिसाब से आवंटित करने का नियम है. इसके मुताबिक अनुसूचित जाति के लिए उनकी जनसंख्या के हिसाब से कुल बजट का 16.6 प्रतिशत जबकि जनजाति के लिए 8.6 प्रतिशत बजट राशि देने का प्रावधान है. यानि कि केंद्र सरकार को केंद्रीय बजट का 25.2 प्रतिशत हिस्सा अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आवंटित करना चाहिए था. लेकिन ऐसा हुआ नहीं है.

सरकार चाहे कांग्रेस की रही हो या फिर भाजपा की, पिछले कई सालों से सरकारें ऐसा करने से बचती रही हैं और पिछले बजट में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आवंटित राशि से कुछ पैसे ज्यादा देकर दलितों को बजट में ज्यादा आवंटन देने का ढिंढ़ोरा पीटा जाता है. आंकड़ों की इसी बाजीगरी के जरिए सरकार ने पिछले दो वर्षों में एसटी-एसटी के लिए आवंटित धनराशि में 2 लाख 29 हजार 622.86 करोड़ की कटौती की है. इस बजट में भी ऐसा ही हुआ है. सरकार आंकड़ों की बाजीगरी दिखाकर दलितों और आदिवासियों के लिए बजट में पैसे बढ़ाने का ढिंढ़ोरा पीट रही है.

 

बिहार बसपा में घमासान

नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी की बिहार इकाई से बड़ी खबर है. बिहार के प्रभारी तिलक चंद्र अहिरवार ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है. अहिरवार बिहार और झारखंड के प्रभारी थे. हालांकि 28 जनवरी को पार्टी का कहना है कि अहिरवार को निकाल दिया गया है. अहिरवार के बाद अब बिहार में कुछ समय तक उनके जूनियर रहे लालजी मेधंकर को दुबारा बिहार प्रदेश भेज दिया गया है. मेधंकर को पिछले साल अहिरवार से मतभेद के बाद बिहार से हटा लिया गया था. कुछ दिनों तक राजनीतिक वनवास काटने के बाद मेधंकर को पार्टी ने तीन महीने पहले ही राजस्थान के उदयपुर और आस-पास की जिम्मेदारी दी थी. अब अहिरवार के पार्टी छोड़ने के बाद मेधंकर उनकी जगह लेंगे.

तिलक चंद्र अहिरवार पिछले तीन दशक से बसपा से जुड़े हुए थे. बसपा की बुंदेलखंड की राजनीति में तिलक चंद्र अहिरवार कद्दावर नाम है. पार्टी ने उन्हें विधान परिषद में भेजा था. फिर विधानसभा का चुनाव भी लड़ाया था. इसके अलावा पिछले साल उन्हें बुंदेलखंड प्रभारी भी बनाया गया था. लेकिन अप्रैल 2016 में उनसे बुंदेलखंड का प्रभार छीन लिया गया था. पांच महीने पार्टी गतिविधियों से दूर रहने के बाद सितंबर 2016 में बसपा अध्यक्ष मायावती ने एक बार फिर उनपर भरोसा जताते हुए उन्हें बुंदेलखंड व कानपुर मंडल का जोन कोआर्डिनेटर बनाया था. फिलहाल अहिरवार के पास बिहार और झारखंड के प्रभारी की जिम्मेदारी थी.

पार्टी छोड़ने के बाद बसपा की ओर से जारी बयान में अहिरवार पर आरोप लगाया गया है कि बसपा सुप्रीमो ने तिलकचन्द्र अहिरवार को बिहार-झारखंड की ज़िम्मेदारी दी थी लेकिन उन्होंने इस ज़िम्मेदारी को सही से नहीं निभाया और 2019 के लोकसभा चुनाव के लिये यूपी के जालौन-गरौठा-भोगनीपुर सीट पर चिंतित थे. पार्टी ने उनपर मेंबरशिप फीस को जमा न करने का भी आरोप लगाया है. जबकि बिहार के पार्टी कार्यकर्ताओं और बामसेफ से जुड़े लोगों से आ रही खबर के मुताबिक इस पूरे घटनाक्रम को बिहार में होने वाले उपचुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है.

बिहार में जल्दी ही लोकसभा की एक और विधानसभा की दो खाली सीटों पर उप चुनाव होने वाला है. इन तीनों सीटों पर दलित समाज का मत निर्णायक है. इनमें से एक भभुआ विधानसभा की सीट पर प्रदेश प्रभारी की हैसियत से शीर्ष नेतृत्व को सूचित करने के बाद अहिरवार ने पार्टी के पुराने कार्यकर्ता और प्रदेश अध्यक्ष भरत बिंद का टिकट फाइनल कर दिया था. बिंद ने चुनाव प्रचार भी शुरू कर दिया था लेकिन ऐन वक्त पर बिंद का टिकट काटकर बिना प्रदेश कार्यकारिणी से सलाह किए लखनऊ से ही किसी दूसरे का टिकट फाइनल कर दिया गया.

अहिरवार इससे काफी निराश थे, जिसके बाद उन्होंने पार्टी से इस्तीफा दे दिया. अहिरवार के इस अचानक इस्तीफे के बाद बिहार बामसेफ के लोग भी हैरत में हैं. तो वहीं खबर यह भी आ रही है कि जल्दी ही अहिरवार के क्षेत्र बुंदेलखंड में बसपा को बड़ा झटका लग सकता है. आने वाले 15-20 दिनों में अहिरवार के समर्थन में 5000 से ज्यादा लोग बसपा छोड़ सकते हैं.

देश भर में धूमधाम से मनी रविदास जयंती

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देश भर में संत शिरोमणि रविदास जी की जयंती धूमधाम से मनाई गई. यूपी और जाब पंसहित देश के तमाम हिस्सों में लोगों ने संत रविदास को याद कर उनकी वाणी से प्रेरणा ली. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संत रविदास 641वीं जयंती पर गुरु रविदास की जन्मस्थली पहुंचे. यहां आयोजित प्रमुख कार्यक्रम में मुख्यमंत्री आदित्यनाथ मंदिर में करीब 30 मिनट तक रहे और प्रसाद को स्वीकार किया.

हालांकि योगी के वाराणसी जाने पर बसपा प्रमुख मायावती ने उन पर निशाना साधा है. प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने कहा कि गुरु रविदास की जयंती में भाग लेने की बजाय भाजपा के नेताओ को संतों द्वारा प्रचारित नैतिकता का पालन करने की कोशिश करनी चाहिए, जिन्होंने लोगों को जातिवाद और सांप्रदायिक विचार से दूर रहने का सुझाव दिया था. उन्होंने कहा, “बेहतर होगा की यह लोग अपनी राजनीतिक शक्ति का दुरुपयोग ना करें और हिंसा में भागीदार ना बने , जैसा इन्होने कासगंज जिले में किया. “

इससे पहले रविदास जयंती के मौके पर दो दिन पहले से ही देश भर से लोगों का वाराणसी पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया था. पंजाब से गुरु रविदास के अनुयायी विशेष ट्रेनों के माध्यम से वाराणसी पहुंचे थे. देश भर में संत शिरोमणि को मानने वाले लोगों ने अपने-अपने जिलों में कार्यक्रम आयोजित कर पूरी श्रद्धा से संत रविदास जी की जयंती मनाई.

गन्धर्व गुलाटी

 

जमीन के मुददे पर आमने-सामने आए हार्दिक-मेवाणी

गुजरात में जिग्नेश मेवाणी, हार्दिक पटेल और अल्पेश ठाकोर को एक तिकड़ी के रूप में देखा जाता है. गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा को 99 पर रोक देने में कहीं न कहीं इन तीनों युवा नेताओं की भूमिका रही. खासकर जिग्नेश मेवाणी और हार्दिक पटेल ज्यादा करीब माने जाता हैं. लेकिन हाल ही में जमीन से जुड़े एक मामले में मेवाणी और पटेल आमने-सामने दिखे.

 असल में कुछ दिनों पहले ही अहमदाबाद के गीतापुरा गांव के पांच दलित परिवारों ने आवासीय प्लॉट की मांग को लेकर देतरोज में ऑफिस के बाहर धरना शुरू कर दिया. इस दौरान जिग्नेश मेवाणी ने वहां पहुंच कर दलितों की मांग का समर्थन किया. वहीं गांव के पाटीदारों ने इसे ग्राम पंचायत की जमीन बताते हुए इसे दलितों को देने का विरोध किया और वो भी धरने पर बैठ गए.  पाटिदार समाज के लोग तहसीलदार ऑफिस पर भी धरने पर बैठे, जिसमें शामिल होने हार्दिक पटेल भी पहुंचे.

इस पूरे मामले पर जिग्नेश मेवाणी और हार्दिक पटेल अलग-अलग पक्ष के साथ खड़े दिखे. तो वहीं हार्दिक पटेल ने इस मामले पर ट्वीट करते धरने पर बैठे दलितों को गुंडों द्वारा जमीन पर जबरदस्ती अतिक्रमण करार दिया. हार्दिक के इस ट्विट से दलित समाज के लोगों में काफी गुस्सा है.

हालांकि प्रशासन ने दलित परिवारों को अपने खेतों को गैर-कृषि भूमि में बदलकर घर बनाने की अनुमति देते हुए मामले को सुलझा लिया, लेकिन हार्दिक पटेल की ‘अपमानजनक टिप्पणी’ के खिलाफ वो जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपने की तैयारी में हैं. हालांकि दलितों के गुस्से को देखते हुए हार्दिक पटेल द्वारा आपत्तिजनक शब्दों के लिए माफी मांग लेने की खबर है.

यूपी में एससी/एसटी की योजनाओं में अधिकारियों का जातिवाद

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दलितों को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार और प्रशासन का रवैया कितना जातिवादी है, यह हाल ही में तब सामने आ गया जब इस वर्ग से संबंधित एक योजना के लिए उत्तर प्रदेश प्रशासन को प्रदेश के 45 जिलों में एक भी योग्य परिवार नहीं मिला.

असल में यूपी के गांवों में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत गरीब वर्ग के अनुसूचित जाति/जनजाति और अल्पसंख्यक वर्ग के परिवार को इस योजना का लाभ मिलता है. लेकिन प्रशासन की रिपोर्ट के मुताबिक यूपी के जिलों में उन्हें एक भी योग्य उम्मीदवार नहीं मिला है. प्रदेश के 45 जिलों के जिलाधिकारियों ने 2016-17 और 2017-18 में आवंटित लक्ष्य को पूरा करने से हाथ खड़ा कर दिया है.

दरअसल प्रधानमंत्री आवास योजना में 2016-17 और 2017-18 में आवंटित आवास निर्माण के लक्ष्य में से 45 जिलों ने 62,780 अनुसूचित जाति, 259 अनुसूचित जनजाति और 1229 अल्पसंख्यक वर्ग के आवास सहित कुल 64,278 आवास निर्माण का लक्ष्य विभाग को दिया गया था. इस पर जिलाधिकारियों का तर्क है कि उनके जिलों के गांवों में लक्ष्य के अनुरूप आवेदक और पात्र नहीं मिल रहे हैं.

हालांकि इस बारे में बहुजन समाज पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व कैबिनेट मंत्री राम अचल राजभर का कहना है- ‘जिलाधिकारियों द्वारा अगर इस तरह की कोई रिपोर्ट जारी की गई है तो वह चौंकाने वाली है. पिछले दिनों एक रिपोर्ट आई थी कि प्रदेश के 29 जिलों में कुपोषण होने की बात कही गई थी. ऐसे में 45 जिलों में किसी गरीब दलित व्यक्ति का नहीं मिलना आश्चर्य की बात है.’

हालांकि केंद्र सरकार से आवास निर्माण की पहली किस्त की रकम जारी होने के कारण विभाग ने अब 64,278 आवास निर्माण की जिम्मेदारी 30 अन्य जिलों को दे दी है. इन जिलों में अमेठी, बागपत, बस्ती, चित्रकूट, एटा, इटावा, फैजाबाद, फर्रुखाबाद, गौतमबुद्ध नगर, हमीरपुर, सीतापुर और वाराणसी आदि जिलों को शामिल किया गया है. दूसरी ओऱ जिलाधिकारियों की रिपोर्ट और मीडिया में खबर आने के बाद मामले ने तूल पकड़ लिया है. आरटीआई एक्टिविस्ट राजेश चौधरी ने इस मामले को लेकर राज्यपाल राम नाईक को चिट्ठी लिखी है. राजेश चौधरी का दावा है कि 45 जिलों के जिलाधिकारियों द्वारा जातिगत मानसिकता के कारण षड्यंत्र पूर्वक गुमराह करने वाले फर्जी आंकड़े प्रस्तुत किए गए हैं. इसकी वजह से अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को ग्रामीण क्षेत्रों में प्रधानमंत्री आवास योजना के लाभ से वंचित होना पड़ा है.

 

यूपी के 29 जिले कुपोषण को लेकर रेड जोन घोषित

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बरेली। उत्तर प्रदेश के बरेली जिले से चौंकाने वाली खबर सामने आई है. खबर बीते साल नवंबर महीने में सामने आई. असल में कुछ महिने पहले जिले में वजन दिवस कार्यक्रम चलाया गया था. वजन दिवस पर तीन चरणों में अभियान चलाया गया. इस दौरान चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई. रिपोर्ट के मुताबिक इसमें जिले में 20 हजार बच्चे अतिकुपोषित मिले. जबकि लगभग 70 हजार बच्चे आंशिक कुपोषित मिले हैं. यह हाल तब है जब पूरा महकमा इसके खिलाफ जंग में जुटे होने का दावा करता है और अधिकारी गांवों को गोद लेकर उनका जिम्मा उठा रहे हैं. इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद उत्तर प्रदेश के जिलों में स्वास्थ सेवाओं की कलई भी खुल गई है.

असल में उत्तर प्रदेश के 29 जिलों को कुपोषण के मामले में रेड जोन घोषित किया गया है. खबर के मुताबिक इन जिलों में दो लाख से ज्यादा बच्चे आंशिक या गंभीर रूप से कुपोषण के शिकार हैं. विश्व बैंक ने इस मामले की तुलना ब्लैक डेथ से की है. कुपोषण के कारण ही विश्व स्वास्थ संगठन यानि WHO कि रिपोर्ट के मुताबिक भारत में टी.बी से होने वाली असमय मौत के मामले भारत में सबसे अधिक है. चिंता की बात तो यह है कि इन तमाम मामलों के सामने आने के बाद भी केंद्र और राज्य सरकारों का रवैये में चिंता नहीं दिख रही है. केंद्र सरकार जहां हजारों करोड़ खर्च कर सरदार पटेल की मूर्तियां बनाने में व्यस्त थी. तो वहीं जिस दौरान यह खबर आई यूपी सरकार लगातार सरकारी विज्ञापनों पर पैसे खर्च करने और अयोध्या में दीवाली मनाने में व्यस्त थी. जबकि प्रदेश के कुपोषित बच्चों को लेकर आई रिपोर्ट पर सरकार की ओर से कोई चिंता नहीं दिखाई गई.

गैर हिन्दू कर्मचारियों के चर्च जाने पर मंदिर प्रशासन ने थमायी नोटिस

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आंध्र प्रदेश के तिरुमला वेंकटेश्वर मंदिर ने अपने 44 गैर हिंदू कर्मचारियों को कारण बताओ नोटिस भेजा है. इस नोटिस में इनसे ये पूछा गया है कि क्यों न इन्हें नियुक्ति नियमों का पालन न करने के चलते बर्खास्त कर दिया जाए.

दरअसल पिछले दिनों तिरुमला वेंकटेश्वर मंदिर के एक कर्मचारी का एक वीडियो वायरल हो गया जिसमें वह चर्च जाते हुए दिख रहे थे. इसके बाद से मंदिर के गैर हिंदू कर्मचारियों को लेकर सवाल उठने लगे हैं.

सभी गैर हिंदू कर्मचारियों को 11 जनवरी को नोटिस भेजा गया. नोटिस में साल 1989 में सरकारी ऑर्डर संख्या 1060 का हवाला दिया गया है कि “शिक्षण संस्थानों के मामले में किसी भी वर्ग के लिए नियुक्ति केवल उसी व्यक्ति की होगी जो हिंदू धर्म स्वीकार करता है.”

नोटिस में कहा गया है, “ सर्विस रिकॉर्ड देखने के बाद ये पता चला है कि आप ईसाई हैं. हमारे मंदिर नियमों के मुताबिक ऐसे लोगों को यहां नौकरी करने की इजाजत नहीं है. आपको तीन सप्ताह के भीतर स्पष्टीकरण देना होगा”.मंदिर प्रबंधन के इस नोटिस पर सवाल उठने लगे हैं.

हालांकि मंदिर के प्रबंधन ने कहा है कि अगर किसी गैर हिंदू कर्मचारी को नौकरी से हटाया जाता है तो उसे राज्य में किसी दूसरे सरकारी डिपार्टमेंट में नौकरी दे दी जाएगी.

 

अल्पसंख्यकों पर हमले को लेकर 67 नौकरशाहों ने लिखी पीएम को चिट्ठी

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उत्तर प्रदेश। यूपी के कासगंज की घटना के बाद बरेली के डीएम कैप्टन राघवेन्द्र विक्रम सिंह द्वारा फेसबुक पर लिखे गए पोस्ट ने देश के सर्वोच्च सेवा के अधिकारी का दर्द बयां कर दिया था. अपने पोस्ट में सिंह ने लिखा था कि ‘अजब रिवाज़ बन गया है. मुस्लिम मुहल्लों में जबरदस्ती जुलूस ले जाओ और पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाओ. क्यों भाई वे पाकिस्तानी हैं क्या? यही यहां बरेली में खैलम में हुआ था. फिर पथराव हुआ. मुकदमे लिखे गए.’ हालांकि इस पोस्ट के वायरल होने और सरकार की ओर से दबाव बढ़ने के बाद डीएम ने अपनी पोस्ट को हटा लिया था, लेकिन इस पोस्ट से बहस का दौर शुरू हो गया.

अब भारत में अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों पर हो रहे हमलों के खिलाफ देश के पूर्व नौकरशाह सामने आए हैं. देश के 67 पूर्व नौकरशाहों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ हो रहे हमले पर चिंता व्यक्त की है. बीते 28 जनवरी को पीएम मोदी को लिखे गए पत्र में इन लोगों ने कई घटनाओं का जिक्र किया है, जहां अल्पसंख्यकों के साथ ज्यादती हुई. पत्र में अल्पसंख्यकों पर हुई पांच हिंसा की घटनाओं के साथ अलवर में हुई पहलू खान घटना का भी जिक्र किया गया है.

अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक इस पर दस्तखत करने वालों में पूर्व स्वास्थ्य सचिव केशव देसीराजू, सूचना प्रसारण मंत्रालय के पूर्व सचिव भास्कर घोष, पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबउल्लाह के अलावा सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर और अरुणा रॉय भी शामिल हैं. मीडिया में आई मुसलमान समुदाय को प्रॉपर्टी न बेचने या उन्हें किरायेदार न रखने की ख़बरों का जिक्र करते हुए इन पूर्व नौकरशाहों ने कहा कि अपनी रोजाना जिंदगी में मुसलमान ऐसी बातों का सामना करते हैं, जिससे इस धार्मिक समुदाय के माहौल में गुस्सा बढ़ना तय है.

कासगंज की घटना और उसके बाद सरकार के मंत्रियों के द्वारा दिए जाने वाले उत्तेजक बयानों के बीच देश के पूर्व नौकरशाहों की यह चिट्ठी मोदी सरकार और उसके काम करने के तरीके पर बड़ा सवाल खड़ा करती है.

चंद्रशेखर रावण पर रासुका बढ़ा, आंदोलन को तैयार भीम आर्मी

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उत्तर प्रदेश। यूपी की योगी सरकार ने भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर रावण पर रासुका को फिर से बढ़ा दिया है। उत्तर प्रदेश सरकार के गृह उपसचिव द्वारा 23 जनवरी को इस बारे में आदेश जारी किया गया। इसके बाद अब चंद्रशेखर को रासुका यानि की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत तीन महीने और जेल में काटना पड़ेगा। सहारनपुर की घटना के बाद गिरफ्तार किए गए रावण 2नवंबर, 2017 से रासुका के तहत जेल में हैं।

रावण पर रासुका की अवधि बढ़ने को लेकर तमाम दलित संगठनों ने विरोध किया है। भीम आर्मी के राष्ट्रीय प्रवक्ता मंजीत सिंह नौटियाल ने घोषणा की है कि यदि 17 फरवरी तक चंद्रशेखर रावण पर से सभी 27 मुकदमों को वापस लेकर उन्हें रिहा नहीं किया जाएगा तो 18 फऱवरी से अनिश्चितकालीन हड़ताल की जाएगी। वहीं चंद्रशेखर रावण से मिलने पहुंचे भीम आर्मी डिफेंस कमेटी के संयोजक प्रदीप नरवाल ने कहा कि- ‘मैं चंद्रशेखर से मिला. उन्होंने मुझसे कहा है कि उनकी जान खतरे में हैं और भाजपा सरकार उनको जेल में मरवाना चाहती है. उन्होंने कहा है कि उनकी फिक्र किए बिना भीम आर्मी को पूरे देश में मजबूत किया जाए.’ वहीं रिटायर्ड आई.पी.एस अधिकारी और जनमंच के संयोजक एस.आर. दारापुरी ने चंद्रशेखर रावण पर रासुका की अवधि बढ़ाए जाने को दलित दमन का प्रतीक कहा है.

दो नवंबर, 2017 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चंद्रशेखर उर्फ रावण को जमानत दे दी थी. लेकिन उसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने रासुका लगाकर उन्हें गिरफ्तार कर लिया था. राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, 1980 के तहत किसी व्यक्ति को पहले तीन महीने के लिए गिरफ्तार किया जा सकता है. फिर आवश्यकतानुसार तीन-तीन महीने के लिए गिरफ्तारी की अवधि बढ़ाई जा सकती है. एक बार में तीन महीने से अधिक की अवधि नहीं बढ़ाई जा सकती है. चंद्रशेखर रावण की भी रासुका तीन महीने बढ़ा दी गई है और यूपी सरकार चंद्रशेखर रावण के साथ जिस तरह का बर्ताव कर रही है, माना जा रहा है कि उनकी रासुका को बाद में भी बढ़ा दिया जाएगा.