देखिए ट्विटर वार में तेजस्वी यादव ने गिराराज सिंह को कैसे धो डाला

नई दिल्ली। बिहार से बीजेपी सांसद और केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज किए जाने के बाद विपक्ष की ओर से सबसे तेज हमला तेजस्वी यादव ने बोला है. इस मामले को लेकर बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी और आरोपी गिरिराज सिंह पर जमकर हमला बोला. तेजस्वी का हमला इतना तेज था कि गिरिराज सिंह तिलमिला गए.

असल में तेजस्वी के ट्विट पर जब गिरिराज सिंह ने जवाब दिया तो तेजस्वी ने भी उन्हें मुंहतोड़ जवाब दे दिया. दलित व्यक्ति की जमीन हथियाने के मामले में तेजस्वी यादव ने अपने ऑफिशियल ट्विटर अकाउंट से लगातार ट्वीट कर राज्य में बीजेपी-जेडीयू गठबंधन और केंद्र की मोदी सरकार पर जमकर निशाना साधा. तेजस्वी ने गिरिराज को लेकर अपने पहले ट्विट में लिखा था-

केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह द्वारा 2 एकड 56 डिसमिल जमीन पर जबरन कब्ज़ा करने के आरोप पर पटना व्यवहार न्यायालय के आदेशनुसार दानापुर थाना में (कांड संख्या 54/2018) FIR की गई है. इसी मंत्री के घर करोड़ों रूपय कैश की भी बरामदगी हुई थी, लेकिन फिर भी ईमानदार है क्योंकि कोई खबर नहीं है.

तेजस्वी ने दूसरा हमला नीतीश कुमार पर किया. उन्होंने लिखा-

नीतीश जी, आपकी नाक के नीचे आपके दुलारे सहयोगी दल के वरिष्ठ नेता और आपके प्यारे केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने लगभग 3 एकड़ गरीबों की जमीन पर जबरन कब्ज़ा कर लिया है. क्या आप अब गठबंधन तोड़ेंगे? क्या आप इस्तीफ़ा देंगे अंतरात्मा बाबू? अब कहां पानी भर रही है आपकी नैतिकता? है कोई जवाब?

तो एक अन्य ट्विट में तेजस्वी ने नीतीश की छवि पर सवाल उठाते हुए लिखा-

‘नीतीश जी अगर आप में नैतिक बल है और अपनी नैतिकता एवं तथाकथित छवि की पूंजी पर घमंड है तो गिरिराज सिंह से तथ्यात्मक बिंदुवार जवाब लेकर दिखाइए ना. पूछिए क्यों दलितों की ज़मीन कब्ज़ा रहे हैं? सामंती मानसिकता के CM पिछड़े वर्ग से आने वाले तेजस्वी से बड़ा कूद-कूद बिंदुवार जवाब मांग रहे थे.’ तेजस्वी यहीं नहीं रुके और तीसरा वार उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी पर किया. पूर्व उपमुख्यमंत्री ने लिखा-

देश के सबसे बड़े अफ़वाह मियां और ख़ुलासा मास्टर सुशील मोदी के मुंह में दही जम गया है. उनके आका नीतीश कुमार बंगले पर बंगले लिए जा रहे हैं. उनके परम सहयोगी केंद्रीय मंत्री गिरीराज गरीबों की जमीन कब्ज़ा रहे हैं. सुशील मोदी इन मुद्दों पर बिल में घुस गए हैं. कहां छुप रहे हो ख़ुलासा मियाँ?

तेजस्वी यादव के इन एक के बाद एक हमले से गिरिराज सिंह तिलमिला उठे. हालांकि गिरिराज के पास कहने को कुछ नहीं था लेकिन तेजस्वी यादव के लगातार हमले से परेशान गिराराज ने तेजस्वी के जवाब में ट्वीट किया और उन्हें आरजेडी की डूबती नैय्या को संभालने की हिदायत दे दी.

दरअसल गिरिराज सिंह ने तेजस्वी यादव के ट्वीट पर जवाब देते हुए लिखा-

‘तेजस्वी जी के ट्वीट से पहली जानकारी मिली, ऐसा प्रतीत होता है कि इसके आर्किटेक्ट वही हैं. FIR के मेरिट पर जानकारी के अभाव में कुछ नहीं कह सकता. लेकिन कानून का हमेशा सहयोग करूंगा. तेजस्वी जी अपने पिता जी के कन्विक्शन और उसके बाद डूबती राजद की नैया बचाने पर चिंतन करे तो भला होगा.’

गिरिराज सिंह के ट्वीट पर पलटवार करते हुए तेजस्वी यादव ने लिखा, ‘हिम्मत है तो सीधे आकर आज चुनाव करा लीजिये. पता लग जाएगा किसकी नैया डूब रही है?जिस व्यक्ति ने बीजेपी को लात मार बाहर फेंका था उसी के कंधों पर बीजेपी अपनी पालकी ढो रही है.’ अपने अगले ट्वीट में तेजस्वी ने लिखा, ‘आपके घर करोड़ों कैश, विदेशी मुद्रा, ज़ेवरात, महँगी घड़ियां मिली थी. बड़ी चालाकी से मामला दबवाया गया था. कौन नहीं जानता. अब दलित की ज़मीन पर कब्ज़ा? माननीय कोर्ट के आदेश से FIR हुआ है जनाब.’

मोदी के मंत्री पर एससी/एसटी एक्ट लगने के बाद बढ़ा बवाल

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पटना। बिहार के असोपुर गांव के राम नारायण प्रसाद की जमीन को जबरन हथियाने के मामले में केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह पर एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कर लिया गया है. मामला सामने आने के बाद विपक्ष ने एक सुर में गिरिराज सिंह को मंत्रीमंडल से बर्खास्त करने की मांग की है. इसको लेकर बढ़ते राजनीतिक दबाव में अब सबकी नजर प्रधानमंत्री मोदी पर है. हालांकि मामला एक हफ्ते पुराना है लेकिन हाल ही में इसके सामने आने के बाद विपक्ष ने भाजपा और पीएम मोदी पर हमला तेज कर दिया है.

दलित समाज से ताल्लुक रखने वाले राम नारायण प्रसाद का आरोप है कि मंत्री ने उसकी दो एकड़ छह डेसिमल जमीन पर कब्जा कर लिया. साथ ही विरोध करने पर उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया. मामला सामने आने के बाद अनुसूचित जाति एवं जनजाति विशेष अदालत के आदेश पर गिरिराज के अलावा 32 अन्य के खिलाफ एक प्राथमिकी दर्ज कर ली गई है. पटना जिले के दानापुर पुलिस थाने के प्रभारी संदीप कुमार सिंह ने इस बात की पुष्टि की है कि अदालत के आदेश के मुताबिक, भारतीय दंड संहिता और एससी/एसटी अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है.

नवादा से भाजपा सांसद गिरिराज सिंह सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम राज्य मंत्री हैं. मामला सामने आने के बाद बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने जदयू भाजपा गठबंधन पर हमला तेज कर दिया है. तेजस्वी यादव ने सवाल उठाया, ‘ज़मीन हथियाने के मामले में अब एक केंद्रीय मंत्री के ख़िलाफ़ मामला दर्ज हुआ है. अब भाजपा के नेता क्यों कुछ नहीं बोल रहे हैं? मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कहां हैं? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गिरिराज सिंह को बर्ख़ास्त कर देना चाहिए. वहीं कांग्रेस पार्टी ने भी इस मुद्दे पर पीएम मोदी से मंत्री गिरिराज के इस्तीफे की मांग की है. देखना है कि पीएम मोदी अपने मंत्री के खिलाफ क्या कार्रवाई करते हैं.

फारुख अब्दुल्ला ने कहा देश कटियार के बाप का नहीं

नई दिल्ली। नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष और जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुक अब्दुल्ला ने भाजपा नेता विनय कटियार पर जमकर अपना गुस्सा निकाला है. विनय कटियार के मुसलमानों को देश छोड़कर चले जाने वाले बयान पर तल्ख टिप्पणी करते हुए फारुख अब्दुल्ला ने कहा कि ये हम सबका देश हैकिसी  कटियार के बाप का देश है.

 फारुक अब्दुल्ला ने गुरुवार (फरवरी) को कहा, ‘जहां तक कटियार साहब का सवाल है वो तो ये बातें रोज़ ही कहते हैं कि मुसलमानों को यहां नहीं रहना चाहिए. क्या ये कटियार के बाप का देश हैये हम सब का देश हैमेरा भी देश हैआपका भी देश हैइसका भी देश हैये सबका देश है. जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री अब्दुल्ला यहीं नहीं रुके, उन्होंने कहा कि जो ऐसी बातें करते हैंवो नफरत फैलाते हैं. धर्म नफरत की बात नहींहर धर्म मोहब्बत की बात सीखाता हैइज्जत की बात सीखाता हैएक-दूसरे से प्रेम करने की बात सीखाता है.

 

बसपा की नई राजनीति, कर्नाटक में JDS से किया गठबंधन

नई दिल्ली। एक के बाद एक राजनैतिक विफलताओं के बाद बहुजन समाज पार्टी ने आखिरकार गठबंधन की राह पकड़ ली है. कर्नाटक में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव में बसपा एच.डी देवेगौड़ा की पार्टी जनता दल (सेक्युलर) के साथ मिलकर चुनाव लड़ेगी. इसके तहत राज्य की 224 सीटों में से बसपा 20 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. इसकी घोषणा आज 8 फरवरी को एक संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में हुई.

गठबंधन की घोषणा करते हुए बसपा के प्रदेश प्रभारी अशोक सिद्धार्थ, बसपा महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा और जेडी (एस) के महासचिव दानिश अली ने कहा कि यह गठबंधन 2019 के लोकसभा तक जारी रहेगा. प्रेस कांफ्रेस के बाद दलित दस्तक से फोन पर बातचीत करते हुए कर्नाटक में बसपा के प्रभारी अशोक सिद्धार्थ ने बताया कि कर्नाटक में कई सीटों पर बसपा को 15 हजार तक वोट मिलते रहे हैं. गठबंधन के तहत हम ज्यादा सीटों पर जीत सकते हैं. उन्होंने कहा कि गठबंधन की सरकार बनने पर बसपा सरकार में भी शामिल होगी.

कर्नाटक का यह गठबंधन इसलिए भी खास है क्योंकि मायावती द्वारा बहुजन समाज पार्टी की कमान संभालने के बाद यह पहला मौका है, जब पार्टी सीधे तौर पर चुनाव पूर्व गठबंधन कर रही है. इससे पहले बसपा संस्थापक कांशीराम भी गठबंधन के पक्षधर रहे थे. कांशीराम के सक्रिय रहने के दौरान कर्नाटक में बहुजन समाज पार्टी से एक विधायक भी जीत चुका है. तो वहीं पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा कोलेगल विधानसभा की सीट महज 5 हजार वोटों से हार गई थी.

दोनों पार्टियों ने कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एच. डी. कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री के पद का उम्मीदवार बनाया है। फिलहाल जनता दल (सेक्युमलर) की कमान एचडी कुमारस्वातमी के हाथों में है. दोनों पार्टियों के शीर्ष नेता 17 फरवरी को बेंगलुरू में आयोजित एक जनसभा में चुनाव प्रचार अभियान की सामूहिक शुरूआत करेंगे. खबर है कि इस जनसभा में पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवेगौडा और बसपा प्रमुख मायावती भी शामिल रहेंगे. इसके साथ ही दोनों पार्टियों के शीर्ष नेता राज्य में चुनाव प्रचार करेंगे.

विदेशों में मेडिकल की पढ़ाई करना हुआ कठिन

नई दिल्ली। विदेशों में मेडिकल की पढ़ाई करने की इच्छा रखने वाले विद्यार्थियों के लिए बुरी खबर है. विदेशों में मेडिकल की पढ़ाई अब और भी कठिन हो गया है. सरकार के नए नियम के अनुसार इस साल से मेडिकल की पढ़ाई करने के लिए विदेश जाने वाले विद्यार्थियों के लिए नेशनल एलिजिबिलिटी कम इंट्रेस टेस्ट (नीट) पास करना अनिवार्य होगा. इसके तहत स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय का उद्देश्य भारत से अच्छे छात्रों को मेडिकल की पढ़ाई करने के लिए विदेश भेजना माना जा रहा है.

नए नियम के अनुसार नीट की परीक्षा में 50 फीसदी अंक लाने वाले विद्यार्थियों को ही विदेश जाकर मेडिकल की पढ़ाई करने की अनुमति दी जाएगी. स्वास्थ्य मंत्रालय ने चीन के शिक्षा मंत्रालय के साथ बैठक कर ऐसे 45 मेडिकल संस्थानों की सूची तैयार की है जिन्हें गुणवत्तापूर्ण माना गया है. आधिकारिक सूत्रों के अनुसार विद्यार्थियों को एलिजिबिलिटी सर्टिफिकेट देने के दौरान उन्हें इन अच्छे संस्थानों के बारे में गाइडेंस दी जाएगी.

Auto Expo में एक रुपये में चार किलोमीटर चलने वाला स्कूटर

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नई दिल्ली। गौतम बुद्ध नगर यानि की ग्रेटर नोएडा में इन दिनों 14वां ऑटो एक्सपो चल रहा है. इसमें तरह-तरह की गाड़ियां आई हैं. गाड़ियों की इस भीड़ में मेले के दूसरे दिन इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहन बनाने वाली कंपनी ट्वेंटी टू मोटर्स प्राइवेट लिमिटेड (twenty two motors pvt ltd) ने अपना स्कूटर लांच किया. इस स्कूटर की सबसे खास बात इसका माइलेज है. कहा जा रहा है कि स्कूटर से 4 से 5 किमी की दूरी तय करने का खर्च करीब 1 रुपए आएगा. स्कूटर की कीमत 74,740 रुपये है.

कंपनी की तरफ से बताया गया कि स्कूटर आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से लैस है जिसकी मदद से इसे दूर से भी खोजा जा सकता है. स्कूटर में 100 प्रतिशत एलईडी लैंप, ट्विन डिस्क ब्रेक, पोर्टेबल वायरलेस बैटरी, स्मार्ट एप, क्रूज कंट्रोल एवं रिवर्स मोड समेत कई अन्य फीचर दिये गये हैं. इसके लिए कंपनी ने प्री-बुकिंग शुरू कर दी है. वहीं इस स्कूटर की डिलीवरी इस साल दूसरी तिमाही से शुरू हो जाएगी. स्कूटर में लिथियम आयन बैटरी है जिसे पांच घंटे में पूरी तरह चार्ज किया जा सकता है. पूरी तरह चार्ज होने पर यह 60 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से 80 किलोमीटर तक जाने में सक्षम है.

पीएम की आक्रामकता के पीछे है यह डर

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नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार 7 फरवरी को लोकसभा और राज्यसभा में एक लंबा भाषण दिया. इस दौरान पीएम मोदी का रवैया काफी आक्रामक दिखा. तकरीबन सवा घंटे के भाषण में प्रधानमंत्री मोदी कांग्रेस पर जमकर हमला बोलते दिखे. पीएम के इस लंबे और आक्रामक भाषण की राजनीतिक विश्लेषक समीक्षा करने लगे हैं. पीएम के इस भाषण के बाद चुनाव जल्द होने की आशंका जताई जाने लगी है.

माना जा रहा है कि जिस तरह प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कांग्रेस को आड़े हाथों लिया और जिन मुद्दों का ज़िक्र किया, उससे साफ है कि मोदी चुनावी मोड में आ गए हैं. भाषण से यह संकेत भी मिलने लगा है कि चुनाव पहले हो सकते हैं. हाल के दिनों में कांग्रेस का रवैया भी काफी आक्रामक हुआ है शायद इसलिए पीएम ने ज़्यादा आक्रामक होकर जवाब दिया है.

तो वहीं पीएम मोदी के इस भाषण पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा था कि वो जनता को जवाब देने के बजाय कांग्रेस पर जुबानी हमले कर रहे हैं. राहुल गांधी ने कहा-“शायद नरेंद्र मोदी जी भूल गए हैं कि वो देश के प्रधानमंत्री हैं, विपक्ष के नेता नहीं. उनसे सवाल पूछे जा रहे हैं. किसानों के भविष्य का सवाल पूछा रहा है,रफ़ाल का सवाल पूछा जा रहा है, रोज़गार के सवाल पूछे जा रहे हैं, उनको जवाब देना चाहिए.

कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा था कि पीएम कांग्रेस पार्टी की बात करें, वो पब्लिक मीटिंग में ये बात करना चाहते हैं तो करें मगर यहां आपको देश को जवाब देना है. यहां आपको आरोप नहीं लगाने है. यहां आपको सवाल नहीं पूछने हैं.

14 अप्रैल से आरक्षण के खिलाफ आंदोलन शुरू करेगा ब्राह्मण महासभा

नई दिल्ली। भाजपा सरकार के आने के बाद आरक्षण पर हमले तेज हो गए हैं. जहां संघ प्रमुख मोहन भागवत आरक्षण की समीक्षा की बात कह चुके हैं, तो वहीं भाजपा के मंत्री भी लगातार आरक्षण पर हमला बोलते रहे हैं. मामला संवैधानिक होने और आरक्षण के नाम पर बिहार चुनाव में हार के बाद भाजपा अब सीधे तौर पर आरक्षण पर हाथ डालने से बच रही है, लेकिन उसको समर्थन देने वाले संगठनों ने अब आरक्षण के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है.

अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा अब आरक्षण के खिलाफ आंदोलन शुरू करने जा रही है. ब्राह्मण महासभा आरक्षण के खिलाफ आंदोलन वंचित तबके को संविधान में आरक्षण दिलाने वाले संविधान निर्माता डॉ. आम्बेडकर की जयंती 14 अप्रैल से शुरू करेगी. अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं प्रदेश के पूर्व दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री डॉ. केसी पांडेय ने इसकी घोषणा की है. पांडेय के मुताबिक महासभा 14 अप्रैल से ‘आरक्षण हटाओ-देश बचाओ आंदोलन’ शुरू करेगी. इस दिन सभी जिला मुख्यालयों पर आरक्षण विरोधी प्रदर्शन किया जाएगा.

डॉ. पाण्डेय ने पांच फरवरी को उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में दारुलशफा में आयोजित एक कार्यक्रम में इसकी घोषणा की. इस आयोजन में आरक्षण विरोधी तमाम अन्य संगठनों के लोग भी मौजूद थे. सम्मेलन में ब्राह्मण महासभा के अलावा परशुराम सेना व महिला ब्राह्मण सभा के जिलाध्यक्षों एवं राज्य कार्यकारिणी के लोग मौजूद थे. ब्राह्मण महासभा की इस घोषणा के बाद आरक्षण समर्थक संगठन भी सक्रिय हो गए हैं. तो वहीं सोशल मीडिया पर इस खबर को लेकर बहस छिड़ गई है.

कांग्रेस शासन अच्छा नहीं था, लेकिन संघ परिवारी राज तो विनाशकारी है

मैं सहमत हूं, कांग्रेस का शासन अच्छा नहीं था. उसके कुछ साल तो वाकई बुरे थे. पर उसके बाद का यह ‘संघ परिवारी राज’? यह तो बहुत बुरा, विनाशकारी होने की हद तक बुरा साबित हो रहा है! लोकतांत्रिक संरचनाएं चरमरा रही हैं. संवैधानिक संस्थाएं अपना स्वतंत्र वजूद खो रही हैं. विरोधियों, आलोचकों और असहमति की आवाजों को तरह-तरह से कुचला जा रहा है.

यह बात सही है कि सन् 1947 में जिस तरह स्वतंत्र भारत वजूद में आया, उसे हासिल करने में इस ‘भगवा परिवार के के पूर्वजों’ (जो सन् 1925 से लगातार सक्रिय रहे पर आजादी की लड़ाई में नहीं) का कोई योगदान नहीं था. इनके पूर्वजों में कुछ बेहद गणमान्यों ने ‘टू नेशन थिउरी’ का मोहम्मद अली जिन्ना से पहले ही प्रतिपादन कर दिया था.

इनका मातृसंगठन शुरू से ही कुछ अलग तरह का देश चाहता था. उन्हें मनु का देश और मनु का विधान पसंद था. वे मुल्क को अतीत के राजे-रजवाड़ों की हुकूमत की तरफ ले जाने चाहते थे. वे आधुनिक लोकतंत्र के विरुद्ध थे. यह महज संयोग नहीं कि स्वतंत्र भारत में बहुत सारे भूतपूर्व राजे महराजे जब राजनीति में उतरे तो जनसंघ या स्वतंत्र पार्टी जैसे संगठन उनके स्वाभाविक विकल्प बने. अनेक कांग्रेस में भी आये. पर मुल्क ने आजादी की लड़ाई के दौरान विकसित होते राजनीतिक मूल्यों की रोशनी में सन् 1950 में आंबेडकर के संविधान को अपनाया. इसने हमें संवैधानिक लोकतंत्र दिया. यह सही है कि इसके अमल में असंख्य गलतियां, शरारतें और साजिशें हुईं.

इन सब से सबक लेकर ही यह मुल्क बेहतर दिशा में आगे बढ़ सकता है. शहीद भगत सिंह और डॉ बी आर आंबेडकर के विचारों को मिलाकर ही यह दिशा तय हो सकती है. संघ परिवार की दिशा पहले संकीर्ण मनुवादी और पुनरुत्थानवादी थी, आज पूरी तरह विनाशकारी है. वह भारत नामक एक बनते हुए आधुनिक राष्ट्र राज्य की आधारशिला को ही धाराशाही करने पर तुली है.

उर्मिलेश

पीएम मोदी के गृहनगर में शोषण से परेशान दलित ने की आत्महत्या

वडनगर। देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गृहनगर गुजरात के वडनगर क्षेत्र में शोषण से परेशान होकर एक दलित व्यक्ति ने आत्महत्या कर ली. बीबीसी के मुताबिक घटना वडनगर स्थित शेखपुर गांव की है. आत्महत्या करने वाला व्यक्ति मिड डे मील के प्रबंधक के रूप में काम करता था. मृतक का नाम महेश भाई चावड़ा है. पुलिस ने छह फ़रवरी की शाम को शेखपुर गांव के एक कुएं से महेशभाई का शव निकाला.

इस मामले में सुसाइड नोट में स्कूल के तीन शिक्षकों द्वारा शोषण की बात सामने आई है. सुसाइड नोट के मुताबिक बीते एक-डेढ़ साल से स्कूल के तीन टीचर अमाजी अनारजी ठाकोर, मोमिन हुसैन अब्बास भाई और प्रजापति विनोदभाई महेश को लगातार परेशान कर रहे थे. पुलिस के उनके ख़िलाफ़ आत्महत्या के लिए उकसाने और दलित उत्पीड़न का मामला दर्ज़ गया है. पुलिस के मुताबिक सुसाइड नोट मृतक के बेटी के स्कूल बैग से मिला है.

महेश के छोटे भाई पीयूष व्यास ने कहा कि उन्होंने प्रशासन के सामने तीन मांगें रखी हैं. इन मांगों में 35 साल की इला को सरकारी नौकरी देने और परिवार को तुरंत आर्थिक मदद देना शामिल है. महेश की आत्महत्या के बाद पूरा परिवार सदमे में है. इसी स्कूल में मृतक की पत्नी इला बेन मिड डे मील बनाने का काम करती हैं. महेश भाई की तनख्वाह 1600 रुपये प्रतिमाह थी, जबकि उनकी पत्नी को 1400 रुपये प्रतिमाह वेतन मिलता है.

तो इस तकनीक से बड़ रहा है फर्जी पॉर्न का कारोबार

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जहां एक तरफ आधूनिक तकनीक और ग्राफिक्स का उपयोग कर हॉलीवुड तथा बॉलीवुड में एक से बड़ कर एक फिल्में बनाई जा रही हैं वहीं दूसरी ओर एक इंडस्ट्री ऐसी भी है जहां इसी तकनीक का गलत इस्तेमाल कर फर्जी फोटोज़ और विडियो बनाई जा रही हैं. हम बात कर रहे हैं पॉर्न इंडस्ट्री की जिसमें लोगों की सेक्शुअल फ़ंतासियों को देखते हुए तरह तरह की जाली विडियो बनाई जा रही हैं.

फर्जी पॉर्न बनाने के लिए डीपफ़ेक्स इफेक्ट का इस्तेमाल करके किसी अभिनेत्री या अन्य प्रसिद्ध महिला का चेहरा किसी और के शरीर पर लगाकर पॉर्न वीडियो बनाए जा रहे हैं. तकनीक का इस तरह गलत इस्तेमाल करना न सिर्फ अनैतिक है बल्कि चिंताजनक भी. इस तरह की एडिटिंग का शिकार हुए सेलेब्रिटीज़ में हॉलीवुड अभिनेत्री एमा वॉटसन मिशेल ओबामा, इवांका ट्रंप और केट मिडलटन के साथ साथ कई बॉलीवुड अभिनेत्रीयों के नाम भी शामिल हैं.

स तरह के एडिटिंग सॉफ्टवेयर बनाने वाले डिज़ाइनर ताते हैं कि सॉफ्टवेयर को सार्वजनिक किए जाने के एक महीने के अंदर ही एक लाख से ज्यादा बार इसे डाउनलोड किया जा चुका है. तो आप सोच सकते हैं कि कितनी तेज़ी से इसका इस्तेमाल फर्जी पॉर्न के कारोबार में किया जा रहा है. सोशल मीडिया के इस दौर में लोगों को इस तरह के फेक कंटेंट से सतर्क रहने की ज़रूरत है.

49 आदिवासी छात्रों को परिवारों ने लिया गोद

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भोपाल।  भोपाल स्थित अरेरा कालोनी क्षेत्र में आदिवासी अंचलों से आए बच्चों के लिए एक हॉस्टल है. 1996 से चल रहे इस हॉस्टल में अब तक 112 बच्चे रह चुके हैं और इस वक्त भी करीब 49 बच्चे इस हॉस्टल का हिस्सा हैं. यहां बच्चों को मुफ्त शिक्षा मुहैया कराई जाती है. इनको राजधानी के अलग-अलग परिवारों ने गोद ले रखा है और वे ही इनकी पूरी पढ़ाई का खर्च उठाते हैं.

यह हॉस्टल भले ही मामूली हो, लेकिन यहां पढ़ने वाले बच्चे साधारण बच्चों से अलग कॉलोनी में सफाई अभियान चलाते हैं और आपात स्थितियों में लोगों की मदद करते हैं। हाल ही में एक मकान में शार्ट सर्किट से लगी आग को होस्टल के इन बच्चों ने ही बुझाया था। इनमें ज्यादातर बच्चे सेवा भारती द्वारा भेल क्षेत्र में संचालित स्कूल में पढ़ाई कर रहे हैं और ये हॉस्टल भी सेवा भारती संस्था से जुड़े जेजी सगदेव की ही देन है, जिसे उन्होने पत्नी के निधन होने पर मकान दान कर शुरू किया था. कई सामाजिक कार्यकर्ता इस हॉस्टल से जुड़े हुए हैं जिसमें स्टेट बैंक से रिटायर्ड महिला अधिकारी आशा पुणतांबेकर एवं

75 वर्ष की बुजुर्ग महिला आशा मिश्रा, जवाहर विद्यालय की रिटायर्ड प्रिंसिपल सपना सेठी व उनके पति अरुण सेठी, कोचिंग संचालक हिमांशु जोशी के नाम शामिल हैं. इस हॉस्टल से पढ़े छात्र प्रदेश के विभिन्न सरकारी विभागों में असिस्टेंट इंजीनियर, तहसीलदार, सहायक कलेक्टर व कई अन्य पदों पर पदस्थ हैं।

पीयूष शर्मा

कासगंज हिंसा में जलाईं मुसलमानों की दुकानें, हिंदु मुलाजिम हुए बेरोज़गार

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कासगंज। कासगंज सांप्रदायिक हिंसा के चलते 27 जनवरी को घंटाघर चौक पर मुस्लिमों की पांच दुकानें जला दी गाईं जिसमें लगभग 20 हिन्दु काम करते थे. दुकाने जलने के बाद अब ये सभी कर्मचारी बेरोज़गार हो गए हैं. इन्ही में से एक दुकान ‘बाबा शू कंपनी’ के मालिक सरदार अली खान ने बताया कि दुकान जलने से उनका करीब आठ लाख रुपये का नुकसान हो गया, यहां छह लोग काम करते थे जिनमें से चार हिंदु थे. सारा कारोबार ठप्प हो गया, अब फिर से शुरुआत करने में पीढ़ियां लग जाएंगी. सरदार ने कहा कि “जब मेरी दुकान जलाई जा रही थी तब मैने उन्हे रोकने की लेकिन उन्होंने मुझे दुकान से बाहर निकाल कर मारपीट शुरू कर दी.

इसी दुकान पर काम करने वाले वीर बहादुर ने निराशा जताते हुए कहा कि वह पिछले सात सालों से बाबा शू कंपनी में काम कर रहा था. उसे रोजाना 180रुपए मिलते थे लेकिन अब उसे नहीं पता कि वह क्या करेगा. इसी तरह मंसूर अहमद की भी दुकान जला दी गई जिसकी दुकान में छह हिंदू काम करते थे. मंसूर अहमद के अनुसार जिन लोगों ने दुकानें जलाईं उनको पता ही नहीं इस दुकान के ज्यादातर कर्मचारी हिंदू हैं.”

आपको बता दें कि यह मामला कासगंज हिंसा से जुड़ा है जिसमें 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के मौके पर तिरंगा यात्रा को लेकर हिंसा भड़की थी. जिसमें चंदन नाम के एक लड़के की गोली मारकर हत्या करने के बाद हिंसा ने और भयानक रूप ले लिया. और गुस्साए लोगो ने मुस्लिम समुदाय के लोगों की दुकानें जला दी गई और कई वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया था.

पीयूष शर्मा

रविदास जयंती मनाने पर पुलिस ने किया लाठीचार्ज

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खजुराहो। हाल ही में संत शिरोमणि रविदास जी की 641वी जयंती देश भर में हर्षोल्लास के साथ मनाई गई. इस दौरान मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले के राजनगर फौजदार मोहल्ले में पुलिस द्वारा दलितों के साथ मारपीट किए जाने की खबर है. जयंती मना रहे स्थानीय लोगों का कहना है कि रविदास जयंती दलित समाज के लोगों द्वारा मनाई जा रही थी. इसी दौरान कुछ असमाजिक तत्व जयंती के कार्यक्रम में जबरन घुसकर लोगों को परेशान करने लगे. इस पर जब लोगों ने 100 नंबर पर डायल किया तो वहां पहुंची पुलिस ने जयंती मना रहे दलितों पर ही लाठी चार्ज कर दिया.

आरोप यह भी है कि पुलिस कुछ लोगों को पकड़ कर थाने ले गई. महिलाओं ने आरोप लगाया कि पुलिस वाले अक्सर उनके घरों में घुस जाते हैं और उन्हें तंग करते हैं. रविदास जयंती की घटना के बाद गांव के तमाम लोग पुलिस स्टेशन गए लेकिन पुलिस ने उनकी एक न सुनी.

दूसरी ओर पुलिस इस मामले में दूसरी ही कहानी गढ़ रही है. पुलिस वाले अपना पल्ला झाड़ने के लिए दलित बस्ती के लोगों पर ही आऱोप मढ़ रही हैं. औऱ दलितों को किसी भी तरह प्रताड़ित करने से इंकार कर रही है. हालांकि लोगों का आऱोप है कि पुलिस हमारे यहां केवल छोटे लोगों पर ही दबाव बनाती है और बड़े अपराधियों से प्यार से बात करती है. तो वहीं पुलिस का यह भी कहना है कि दलित बस्ती में अवैध शराब की बिक्री होती है, बवाल होता है इसलिए हमें जाना पड़ता है तो ऐसे में सवाल यह उठता है कि अवैध शराब बिक्री पर पुलिस औऱ प्रशासन आखिर क्यों मौन हैं? दलित दस्तक के लिए खजुराहो से कालीचरण अग्रवाल की रिपोर्ट

डॉ. अम्बेडकर को महापुरुष बनाने वाली महानायिका रमाबाई अम्बेडकर

प्रत्येक महापुरुष के पीछे उसकी जीवन-संगिनी का बड़ा हाथ होता है। जीवन साथी का त्याग और सहयोग अगर न हो तो व्यक्ति का महापुरुष बनना आसान नहीं है। रमाताई अम्बेडकर इसी त्याग और समर्पण की प्रतिमूर्ति थीं, जिसके आधार पर डॉ. अम्बेडकर देश के वंचित तबके का उद्धार कर सकें. आज रमाबाई अम्बेडकर की जयंती है। रमाबाई का जन्म महाराष्ट्र के दापोली के निकट वणंद गांव में 7 फरवरी 1898 में हुआ था। इनके पिता का नाम भीकू धूत्रे (वणंदकर) और मां का नाम रुक्मणी था। वह कुलीगिरी का काम करते थे और परिवार का पालन-पोषण बड़ी मुश्किल से कर पाते थे। रमाबाई के बचपन का नाम रामी था। बचपन में ही माता-पिता की मृत्यु हो जाने के कारण रामी और उसके भाई-बहन अपने मामा और चाचा के साथ मुंबई आ गए जहां वो लोग भायखला की चाल में रहते थे। सन् 1906 में रामी का विवाह भीमराव अम्बेडकर से हुआ।

डॉ. अम्बेडकर रमा को ‘रामू ‘ कह कर पुकारा करते थे जबकि रमा ताई बाबा साहब को ‘साहब ‘ कहती थी। बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर जब अमेरिका में थे, उस समय रमाबाई ने बहुत कठिन दिन व्यतीत किये. बाबासाहेब जब विदेश में थे, तब भारत में रमाबाई को काफी आर्थिक दिक्कतों को झेलना पड़ा, लेकिन उन्होंने बाबासाहेब को इसकी भनक नहीं लगने दी। एक समय जब बाबासाहेब पढ़ाई के लिए इंग्लैंड में थे तो धनाभाव के कारण रमाबाई को उपले बेचकर गुजारा करना पड़ा था। लेकिन उन्होंने कभी भी इसकी फिक्र नहीं की और सीमित खर्च में घर चलाती रहीं।

दोनों की गृहस्थी शुरू होने पर सन् 1924 तक दोनों की पांच संताने हुई। किसी भी मां के लिए अपने पुत्रों की मृत्यु देखना सबसे ज्यादा दुख की घड़ी होती है। रमाबाई को यह दुख सहना पड़ा। बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर और रमा ताई ने अपने पांच बच्चों में से चार को अपनी आंखों के सामने अभाव में मरते हुए देखा। गंगाधर नाम का पुत्र ढाई साल की अल्पायु में ही चल बसा। इसके बाद रमेश नाम का पुत्र भी नहीं रहा। इंदु नामक एक पुत्री हुई मगर, वह भी बचपन में ही चल बसी थी। सबसे छोटा पुत्र राजरतन भी ज्यादा उम्र नहीं देख पाया। यशवंत राव उनके सबसे बड़े पुत्र थे जो जिंदा बचे। इन सभी बच्चों ने अभाव में दम तोड़ दिया। जब गंगाधर की मृत्यु हुई तो उसकी मृत देह को ढ़कने के लिए गली के लोगों ने नया कपड़ा लाने को कहा। मगर, उनके पास उतने पैसे नहीं थे। तब रमा ताई ने अपनी साड़ी से कपडा फाड़ कर दिया था। वही मृत देह को ओढ़ा कर लोग श्मशान घाट ले गए और पार्थिव शरीर को दफना आए थे।

रमा इस बात का ध्यान रखती थी कि पति के काम में कोई बाधा न हो। रमाताई संतोष, सहयोग और सहनशीलता की मूर्ति थी। डॉ. अम्बेडकर प्राय: घर से बाहर रहते थे। वे जो कुछ कमाते थे, उसे वे रमा को सौप देते और जब आवश्यकता होती, उतना मांग लेते थे। रमाताई घर का खर्च चला कर कुछ पैसा जमा भी करती थी। बाबासाहेब की पक्की नौकरी न होने से उसे काफी दिक्कत होती थी। आमतौर पर एक स्त्री अपने पति से जितना वक्त और प्यार चाहती है, रमाबाई को वह डॉ. अम्बेडकर से कभी नहीं मिल सका। लेकिन उन्होंने बाबासाहेब का पुस्तकों से प्रेम और समाज के उद्धार की दृढ़ता का हमेशा सम्मान किया। वह हमेशा यह ध्यान रखा करती थीं कि उनकी वजह से डॉ. अम्बेडकर को कोई दिक्कत न हो।

डॉ. अम्बेडकर के सामाजिक आंदोलनों में भी रमाताई की सहभागिता बनी रहती थी। दलित समाज के लोग रमाताई को ‘आईसाहेब’ और डॉ. अम्बेडकर को ‘बाबासाहेब’ कह कर पुकारा थे। बाबासाहेब अपने कामों में व्यस्त होते गए और दूसरी ओर रमाताई की तबीयत बिगड़ने लगी। तमाम इलाज के बाद भी वह स्वस्थ नहीं हो सकी और अंतत: 27 मई 1935 में डॉ. अम्बेडकर का साथ छोड़ इस दुनिया से विदा हो गई।

रमाताई के मृत्यु से डॉ. अम्बेडकर को गहरा आघात लगा। वे बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोये थे। बाबासाहेब का अपनी पत्नी के साथ अगाध प्रेम था। बाबसाहेब को विश्वविख्यात महापुरुष बनाने में रमाबाई का ही साथ था। बाबासाहेब के जीवन में रमाताई का क्या महत्व था, यह एक पुस्तक में लिखी कुछ लाइनों से पता की जा सकती है। दिसंबर 1940 में बाबासाहेब अम्बेडकर ने “थॉट्स ऑफ पाकिस्तान” नाम की पुस्तक को अपनी पत्नी रमाबाई को ही भेंट किया। भेंट के शब्द इस प्रकार थे.. “रमो को उसके मन की सात्विकता, मानसिक सदवृत्ति, सदाचार की पवित्रता और मेरे साथ दुःख झेलने में, अभाव व परेशानी के दिनों में जब कि हमारा कोई सहायक न था, अतीव सहनशीलता और सहमति दिखाने की प्रशंसा स्वरुप भेंट करता हूं…”

डॉ. अम्बेडकर द्वारा लिखे गए इन शब्दों से स्पष्ट है कि माता रमाबाई ने बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर का किस प्रकार संकटों के दिनों में साथ दिया और बाबासाहेब के दिल में उनके लिए कितना सत्कार और प्रेम था। दलित दस्तक इस महान महिला को नमन करता है।

कांग्रेस मुख्यालय पर आज से राहुल दरबार

नई दिल्ली। पार्टी कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद करने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अब पार्टी मुख्यालय में बैठेंगे. राहुल गांधी सप्ताह में दो से तीन दिन पार्टी मुख्यालय पहुंच कर वहां कार्यकर्ताओं से मिलेंगे. पार्टीजनों से मुलाकात का यह सिलसिला बुधवार से शुरू हो रहा है. कांग्रेस अध्यक्ष की इस नई पहल को 2019 आम चुनाव की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है.

कांग्रेस ने बाकायदा अपने ट्वीटर हैंडल पर बुधवार को राहुल गांधी के कार्यकर्ताओं से मुलाकात के कार्यक्रम की जानकारी साझा की है. इसके मुताबिक वे बुधवार सुबह 9.30 से 11 बजे तक मुख्यालय में मौजूद रहेंगे और कार्यकर्ताओं से मिलेंगे. राहुल गांधी का यह कदम इसलिए भी खास है क्योंकि कोई कांग्रेस अध्यक्ष 19 साल बाद ऐसा कर रहा है. सोनिया गांधी पार्टी कार्यालय आने की बजाय अपने 10 जनपथ स्थित आवास से ही सारा काम निबटाती रहीं हैं.

पार्टी सूत्रों ने बताया कि पिछले कुछ दिनों से जिन पार्टी नेताओं-कार्यकर्ताओं ने उनसे मिलने का समय मांग रखा था, उन्हें फोन कर कांग्रेस मुख्यालय बुलाया जा रहा है. इनमें दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों के नेता व कार्यकर्ता शामिल हैं. फिलहाल उन राज्यों के कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता दी जाएगी, जहां इसी साल विधानसभा चुनाव होने हैं. जाहिर सी बात है कि अपने इस कदम से राहुल गांधी अपने कार्यकर्ताओं के और करीब आने में सफल होंगे. और आने वाले दिनों में कांग्रेस को अपने अध्यक्ष के इस कदम से मजबूती मिल सकती है.

चंद्रशेखर रावण की जमानत को लेकर पूर्व न्यायाधीशों ने लिखा सीएम योगी को खत

Bhim Army founder Chandrashekhar Azad 

नई दिल्ली। सहारनपुर मामले में हिंसा फैलाने के आरोप में जेल में बंद भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद रावण की रिहाई को लेकर देश के तीन पूर्व न्यायाधीश सामने आ गए हैं. सिटिजंस फॉर जस्टिस एंड पीस नाम के नागरिक अधिकार संगठन की ओर से पूर्व न्यायाधीश सहित नौ सिविल राइट एक्टिविस्ट ने यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर चंद्रशेखर के खिलाफ सभी आरोपों को खारिज करने और उन्हें ज़मानत देने की मांग की है. साथ ही उनके बिगड़ते स्वास्थ को लेकर चिंता जताई है. पत्र की एक कॉपी गृहमंत्री राजनाथ सिंह औऱ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भी भेजी गई है.

पत्र में चंद्रशेखर रावण के एनएसए की अवधि को बढ़ाने को लेकर हैरानी जताई गई है. पत्र में चंद्रशेखर आजाद पर बेबुनियाद इल्ज़ाम लगाए जाने की बात कही गई है. साथ ही यह भी कहा गया है कि रावण पर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम रासुका के तहत आरोप थोपे जा रहे हैं. पत्र में इस बात को लेकर भी विरोध जताया गया है कि सरकार की तरफ से रासुका का आदेश उस वक्त आया जब उन्हें ज़मानत मिल चुकी थी और वह रिहा होने वाले थे.

सिविल राइट्स एक्टिविस्ट के ग्रुप ने पत्र में चंद्रशेखर रावण के स्वास्थ को लेकर चिंता जताते हुए कहा है कि अगर चंद्रशेखर रावण को कुछ होता है तो इसकी जिम्मेदारी यूपी के सीएम और गृहमंत्री की होगी. चंद्रशेखर पर लगे आरोपों का जिक्र करते हुए उन्होंने साफ किया है कि भीम आर्मी द्वारा किया गया विरोध प्रदर्शन इतना गंभीर नहीं था जिसके लिए एनएसए लागू किया जाए. और यह नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं और वरिष्ठ न्यायाधीशों का भी मानना है. इस पत्र में भीम आर्मी द्वारा बच्चों के लिए 350 से ज्यादा स्कूल चलाने का भी जिक्र किया गया है, जिसे पिछले 9 महीनों से सरकार ने जबरन बंद करवा दिया है.

सरकार के नाम लिखे इस पत्र में सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस पी बी सावंत, रिटायर्ड हाई कोर्ट जज जस्टिस बी जी कोलसे पटिल, रिटायर्ड हाई कोर्ट जज जस्टिस होसबेट सुरेश, सीजेपी सचिव तीस्ता सितलवार, भीम आर्मी डिफेंस कमेटी के संयोजक प्रदीप नरवाल, लेखक एवं कार्यकर्ता राम पुनियानी, पत्रकार जावेद आनंद, एकैडेमिक मुनीज़ा खान और ग्लोकल यूनीवर्सिटी के प्रोफेसर खालिद अनिस अंसारी ने हस्ताक्षर किया है. इन सबने चंद्रशेखर आज़ाद रावण को तुरंत ज़मानत पर रिहा करने की मांग की है.

“आरक्षण से चयनित दलितों की क्षमता व उत्पादकता विषयक भ्रांति का वास्तविक मूल्यांकन”

आजकल सोशल मीडिया में आरक्षण से चयनित दलितों के संबध में उनकी क्षमता व दक्षता पर अति रंजित प्रचार प्रसार किया जा रहा है. अधिसंख्य लोंगों ने तो यहां तक अवधारणा बना ली है कि परीक्षा में 10% अंक पाने वाले दलित अभ्यर्थियों का इंजीनियरिंग व मेडिकल में दाखिला हो जाता है और ये लोग इंजीनियर डाक्टर बन जाते हैं. आरक्षण विरोधियों का मानना है कि आरक्षण कोटे से बने डॉक्टर मरीजों का क्या ईलाज करेंगे? ऐसे डॉक्टर मरीजों को मारेंगे ही. इसी प्रकार कोटे से बने इंजीनियर द्वारा निर्मित पुल तो गिरेगा ही, क्योंकि दलितों में योग्यता तो होती नहीं. वे ठीक से पढ़ना लिखना भी नहीं जानते. इस प्रकार की नकारात्मक सोच के चलते दलितों का हर पल मनोबल गिराने का प्रयास आज भी जारी है. डॉक्टर इंजीनियर ही नहीं किसी भी सेवा में अक्षमता और अयोग्यता के मनगढ़ंत दोषारोपण का सामना करना तो दलितों की चिरकाल से नियति बन चुकी है.

फेसबुक पर आरक्षण विरोधियों ने आरक्षण समाप्त कराने के लिए एक मंच बना लिया है औरसामान्य जाति के लोंगो को इसमें शामिल होने का आह्वान किया जा रहा है. ताकि पूरी शक्ति के साथ आरक्षण पद्धति का विरोध किया जासके. आरक्षण विरोधियों की समझ में आरक्षण के कारण दलितों के अयोग्य और अक्षम लोग तो नौकरियों में चुने जा रहे हैं, परन्तु योग्य और क्षमता सम्पन्न सामान्य जाति के लोग परेशान घूम रहे हैं. इन आरक्षण विरोधियों के मन में यह भी चिन्ता है कि केन्द्र सरकार द्वारा जो 15% आरक्षण “प्रेसीडेन्सियल आर्डर, 1950” द्वारा दलितों को अनुमन्य किया गया था, उसे भी वे अपने हिस्सा मानकर दलितों से क्षुब्ध प्रतीत होते हैं, जैसे कि देश की नौकरियों पर केवल उन्हीं का अधिकार हो. वे विगत हजारों साल से शत-प्रतिशत सरकारी सेवाओं पर काबिज रहे हैं. क्या हजारों साल मानवाधिकारों से वंचित समाज को यदि 70 वर्षों के स्वतंत्र भारत के कालखंड में कुछ सुविधाएं या संरक्षण संविधान में प्रवृत प्रावधान से मिल भी गयी तो ऐसा क्या अनर्थ हो गया, जो आरक्षण विरोधी इतना तिल मिलाए हुए हैं.

साथ ही यह भी आरक्षण विरोधियों को सोचना होगा कि देश के सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालयों, केन्द्रीय मंत्रिमंडल, सभी राज्यों के मंत्रिमंडलों, आईएएस, आईपीएस, अन्य केन्द्रीय व राज्य सेवाओं, राज्यों के मुख्यमंत्रियों व मंत्रियों देश के विभिन्न राज्यों के राज्यपालों तथा विश्वविद्यालयों के कुलपतियों के पदों में सवर्ण लोगों की कितनी-कितनी संख्या है और इनके सापेक्ष वंचितों का प्रतिनिधित्व इन पदों पर कितना है? सब पदों के आंकड़ें रखकर तथ्यात्मक बात रखनी चाहिए न कि एक सिरे से सब मिलकर दलितों और पिछड़ों के आरक्षण को ही कोसना शुरु कर दें और प्रलाप करें कि यह तो सब कुछ गलत हो रहा है और उनके हिस्से के पद आरक्षण के कारण अक्षम और अयोग्य दलितों में बांटे जा रहे हैं.

यही नहीं, इस पर भी आरक्षण विरोधी बंधुओं को विचार करने की आवश्यकता है कि दुनियां के दूसरे देशों में सामाजिक न्याय के तहत भारत जैसी सुविधाएं या संरक्षण समाज के कमजोर तबकों को उपलब्ध है या नहीं? यहां विश्व के सबसे ताकतवर देश (अमेरिका) का उल्लेख करना समीचीन होगा. अमेरिका में जब यह अहसास किया गया कि अश्वेतों के साथ सामाजिक न्याय नहीं हो पा रहा है तो वहां सकारात्मक कृत्य (एफरमेटिव एक्शन) के द्वारा ऐसे वंचितों को सरकारी व निजी क्षेत्र की सेवाओं में कुछ संरक्षण व रियायतें देने का निर्णय लिया गया जो वहां सबको स्वीकार है,

इसी प्रकार द.अफ्रीका, मलेशिया व ब्राजील आदि देशों में भी अमेरिका की भांति ही वंचितों को एफरमेटिव एक्शन के द्वारा वहां के समाज ने विकास में सहर्ष सहभागिता दी है. लेकिन अत्यंत विडम्बना पूर्ण है कि भारत में सवर्णों में कुछ लोग (सभी सवर्ण नहीं) सदियों से सामाजिक न्याय से वंचित दलितों को न्याय मिलते देखना नहीं चाहते. इसीलिए आये दिन ऐसे लोग योग्यता व प्रतिभा के बहाने आरक्षण को समाप्त कराने के लिए सवर्ण समाज को लामबंद करने की गुहार लगाते रहते हैं. नि:संदेह उनका यह प्रयास सफल नहीं हो सकेगा, क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 16(4) व 16(4-ए) द्वारा पिछड़ चुके अनु.जाति तथा अनु.जन जाति के लोंगो को जो आरक्षण अनुमन्य किया गया है, वह संविधान के अन्तर्गत मौलिक अधिकारों के संवर्ग में आता है. सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार मौलिक अधिकारों में संशोधन या इन्हें रद्द करने का अधिकार किसी को नहीं है. लेकिन लगता है जानकारी के अभावमें आरक्षण विरोधी अकारण हो हल्ला मचाए हुए हैं.

कदाचित आरक्षण विरोधियों के परिज्ञान में यह भी नहीं है कि दलित/वंचित वर्ग की आर्थिक स्थिति आरक्षण केलिए प्रासंगिक नहीं है. वंचित वर्ग को आरक्षण उनके आर्थिक पिछड़ेपन के कारण नहीं मिला हुआ है, बल्कि यह उनके“सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़ेपन” को दृष्टिगत रखकर संविधान में प्रवृत्त किया गया है. इस पिछड़ेपन का प्रमुख कारण समाज में प्रचलित जातिगत भेदभाव को माना गया है. नि:संदेह जब तक भारतीय समाज जातीय विद्वेष से ग्रसित रहेगा, कदाचित आरक्षण को समाप्त करना संभव नहीं होगा. कुछ यही विचार रा.स्व.संघ सहित अन्य समाजसेवी संस्थाओं व राजनीतिक दलों का भी है.

शायद आज की पीढ़ी के लोग यह भी जानने की जिज्ञाशा नहीं रखते कि जाति प्रथा का दंश वंचित तबके के लोग विगत लगभग तीन हजार वर्षों से झेल रहे हैं. समाज ने इनके ऊपर इतने जुल्म ढाये हैं कि सुनकर ही आदमी के रोंगटे खड़े हो जायें. प्रबुद्ध लोग जरा विचार करके देखें कि कितनी प्रताड़ना, अन्याय व मानवाधिकारों से वंचना के दुर्दिन दलितों ने हजारों साल देखे. क्या यह ईश्वर का बनाया कानून हो सकता है? जिसमें दलितों को न शिक्षा काअधिकार हो, न संपत्ति रखने का अधिकार हो और यहां तक कानून हो कि सवर्ण जब चाहें दलितों की संपत्ति लूटसकते हैं.इस अन्याय पूर्ण व्यवहार पर उस समय का शासनतंत्र इनकी रक्षा बिल्कुल नहीं करता था. इसी कारण हजारों वर्षों तक इस वर्ग ने भयावह प्रताड़ना और उत्पीड़न अपने ही सहधर्मियों के हाथों झेला है. तब जाकर इस अन्याय को चुनौति देने के लिए ईश्वर ने एक अंबेडकर पैदा किया. श्रीमद् भगवद्गीता में भगवान कृष्ण ने स्वयं कहा है कि:-

“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत. अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्.. परित्राणाय साधुनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्. धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे..”

भावार्थ:-जब भी जहां धर्म का पतन होता है और अधर्म की प्रधानता होने लगती है तब-तब मैं आता हूं. भक्तों का उद्धार करने, दुष्टों का विनाश करने तथा धर्म की फिर से स्थापना के लि मैं हर युग में प्रकट होता हूं.

अत: ईश्वर का मनुष्य मात्र से यह वादा है कि जब भी पृथ्वी पर अत्याचार बढ़ेगा, ईश्वर इस अत्याचार को समाप्त करने की चिंता स्वयं करेंगे या फिर ऐसे किसी महापुरुष को उत्पन्न करेंगे जो मनुष्य मात्र पर होने वाले अन्याय व उत्पीड़न का शमन कर सके. कुछ ऐसी ही परिस्थितियों में डॉ० अंबेडकर दलित, वंचित वर्ग के परित्राण हेतु दलित घर में जन्म लेते हैं और उनके कष्टों का शमन करने के लिए प्रयास आरंभ करते हैं. डॉ० अम्बेडकर के अथक प्रयासों से वंचितों के नरकीय जीवन का अंत तो कुछ सीमा तक हुआ, लेकिन यह दलितों का दुर्भाग्य रहा कि जातीय विद्वेष की समाप्ति का जो सपना डॉ० अम्बेडकर ने संजोया था, उस सपने का अनुष्ठान पूर्ण होने से पूर्व ही वे संसार से महाप्रयाण कर गये. आरक्षण विरोधी लोगों का मत तो यह भी है कि देश से प्रतिभा पलायन भी बहुतांश में आरक्षण से तंग हो कर सामान्य वर्ग के युवक कर रहे हैं. यह बिल्कुल झूठ है. पलायन सरकारी नौकरी न मिलने के कारण नहीं, बल्कि निजीक्षेत्र में मिलने वाले हाई पैकेजेज के प्रलोभन में हो रहा है और दोष आरक्षण व्यवस्था के सिर मढ़ा जा रहा है. अस्तु, दलितों के विरुद्ध नकारात्मक सामाजिक अवधारणा के चलते और सहधर्मियों द्वारा इन पर बलताः थोंपी गयी आत्महीनता से दलितों को निस्तेज बनाने के प्रयास सदियों से होते रहे हैं. इसके बावजूद भी ये लोग संघर्ष करके अपनी कार्य दक्षता विपरीत सामाजिक परिस्थितियों में भी यह दृष्टिगत रखकर बनाये हुए हैं कि कहीं इनकी नौकरी खतरे में न पड़ जाये. कुछ यही सोचकर ऐसी विकट छवि के संकट के बीच भी दलित अपनी क्षमता व दक्षता के सामंजस्य को अक्षुण्ण बनाये हुए हैं. इन सभी परिस्थितियों की वास्तविकता की परख के लिए दिल्ली स्कूल आफ इकोनोमिक्स (दिल्ली विश्वविद्यालय,दिल्ली) के श्री अश्विनी देशपांडे और अमेरिका की मिशिगन यूनिवर्सिटी के श्री टॉमस ए वेस्काप्फ ने वर्ष 2010 में भारतीय रेल सेवा के आठ जोन के 1980 से 2002 के बीच के आंकड़े एकत्र करके आरक्षण से भर्ती हुए कर्मचारियों व अधिकारियों की दक्षता और उत्पादकता का अध्ययन किया है. यह पेपर इंटरनेट पर उपलब्ध है. वैसे इस भ्रांति पर कि क्या आरक्षण के कोटे से आये कर्मचारियों/अधिकारियों के आने से उत्पादकता और दक्षता बढ़ी है या घटी है? आम तौर पर इस विषय में अधिक अध्ययन नहीं हुआ है. अश्विनी देशपांडे व टामस की जोड़ी ने जो अध्ययन किया, उनके अध्ययन का निष्कर्ष चौंकाने वाला था. शोधकर्ताओं के अनुसार कोटे से आये लोगों से भारतीय रेल की उत्पादकता और दक्षता बढ़ी है घटी नहीं. जबकि इस विषय में दलितों के लिए आरक्षण विरोधियों ने बिल्कुल विपरीत अवधारणा बना रखी है.

यही नहीं, एनडीटीवी इंडिया के हृदयेश जोशी ने भी अपनी एक स्टोरी में कुछ ऐसा ही अनुभव बताया .कहा कि उनके पिता बीमार थे, वे ईलाज के लिए उन्हें भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान(एम्स),नई दिल्ली ले गये. वहां जो चिकित्सकों की टीम उनके पिता का ईलाज कर रही थी, उस टीम में प्रोफेसर राजन सहित सभी डॉक्टर दलित ही थे. जोशी जी ने माना कि उन्हें यह देखकर पहले तो वैसा ही डर लगा, जैसी अवधारणा दलितों के विषय में समाज में बनी हुई है, क्योंकि बीमारी भी थोड़ा गंभीर ही थी. बाद में उनके पिता जब बिल्कुल ठीक हो गये तो प्रोफेसर राजन से हृदयेश जोशी ने उत्सुकतावश पूछा कि आप लोग सभी दलित डॉक्टर एक ही टीम में क्यों काम करते हो? तो उन्होंने कहा कि हम लोग अलग-अलग टीम में काम करेंगे तो सामान्य वर्ग के दूसरे डॉक्टरों की गलती भी हमारे सिर आसानी से मढ़ दी जायेगी. इसका अर्थ यह हुआ कि दलित वर्ग का कर्मचारी समाज की आरक्षण विरोधी मानसिकता के चलते कितना सतर्कता से काम करता है, फिर भी हर पल अक्षमता के दोषारोपण से कितना डरा रहता है.

जहां तक दलित छात्रों के विरुद्ध जातिगत भेद आधारित आक्रामकता का प्रश्न है, इसमें एक स्टोरी में एनडीटीवी इंडिया ने बताया कि नई दिल्ली में एक बहुत ही प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज है, जिसका नाम वर्द्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज है. इसके 35 छात्रों को फीजियोलॉजी के एक पेपर में जान-बूझकर कई वर्षों तक फेल किया जाता रहा, जबकि सामान्य जाति का एक भी छात्र इस पेपर में फेल नहीं किया गया. इनमें से 14 छात्र तो ऐसे थे, जिन्हें 4 से 14 बार तक फीजियोलॉजी के पेपर में फेल किया गया. यह सब कॉलेज प्रशासन द्वारा दलितों के प्रति उनकी अतिशय घृणा के परिणाम स्वरूप हुआ. इस अन्याय से विक्षुब्ध होकर 30 नवम्बर,2010 को 35 अनु.जा./अनु.ज.जा.के छात्रों ने राष्ट्रीय अनुसूचित आयोग से इसकी शिकायत की. आयोग ने इसकी जांच भालचन्द्र मुंगेकर, पूर्व सदस्य योजना आयोग, जो राज्यसभा के सदस्य भी रह चुके थे,को सौंप दी. उन्होंने जांच के बाद पाया कि कॉलेज प्रशासन ने जातिगत भेदभाव से छात्रों को फेल किया. इसी बीच छात्रों ने दिल्ली हाईकोर्ट से गुहार लगाई कि उनके साथ कॉलेज द्वारा परीक्षाओं में जातिगत भेदभाव से फ़ेल किया जा रहा है. हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद किसी स्वतंत्र एजेंसी से परीक्षा आयोजित करा कर मामले को निबटारा करने का निर्णय दिया. तद्नुसार छात्रों की परीक्षा दिल्ली हाईकोर्ट की निगरानी में कराई गयी और सभी छात्र फीजियोलॉजी के पेपर में उत्तीर्ण हो गये. इस पेपर में उत्तीर्ण घोषित होने पर भी इन छात्रों को द्वितीय वर्ष के छात्रों के साथ बैठकर पढ़ने पर भी आपत्ति की गई. किसी तरह कोर्ट के हस्तक्षेप से ही विवाद निपटा.

इस प्रकार दलित वंचित लोगों के विकास के रास्ते में लगातार अतिरंजित विचारधारा के लोग रोड़े अटकाने सेचूक नहीं रहे. जो देश 21 वीं सदी में विश्व मंच पर शक्ति सम्पन्न देशों की कतार में खड़े होने को आतुर है, उस भारतदेश में यदि वही तीन हजार वर्षों पूर्व की दलित वंचित विरोधी आक्रामक अवधारणा जारी रहेगी तो किस मुंह से हम अपने आपको प्रगतिशील कह सकेगें और क्या यह कदाचित वेद ऋचाओं से पुष्पित व पल्लवित उदात्त भारतीय संस्कृति की अद्वितीय अवधारणा “सर्वे भवन्तु सुखिन:”और “वसुधैव कुटुम्बकम” की अवमानना नहीं है? इस पर खुले दिमाग से हर भारतवासी को विचार करने की आवश्यकता है.

प्रेम चन्द्र छाछर, ज्वाइंट कमिश्नर(से.नि.), वाणिज्य कर विभाग,उ.प्र., पंजाबी कॉलोनी,नि.शिव मंदिर, धामपुर(बिजनौर) Email- premc.chhachhar@yahoo.com

भाजपा के सीएम ने साल भर में चाय-पानी पर खर्च किया 68 लाख

उत्तराखंड के सीएम त्रिवेन्द्र सिंह रावत

नई दिल्ली। देश में 60 से 70 फीसदी परिवार ऐसे हैं जो 15 हजार रुपये से 50 हजार रुपये तक में पूरे महीने अपने घर का खर्च चला लेते हैं. यानि की साल का 1 लाख 80 हजार से लेकर 6 लाख तक. इस पूरी राशि में उस परिवार की थोड़ी बहुत सेविंग्स भी शामिल रहती है. वहीं अगर आपको यह पता चले कि एक मुख्यमंत्री अपने दफ्तर में लोगों को चाय पिलाने में सिर्फ 11 महीनों में 68 लाख रुपये से ज्यादा खर्च कर दे, तो फिर आप क्या कहेंगे??

जी हां, यह खबर सच है. पार्टी विद डिफरेंट का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी के नेता और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने पद संभालने के बाद से अब तक मेहमानों को चाय-पानी कराने में 68 लाख रुपये से ज्यायदा खर्च कर दिया है. राज्ये सरकार ने सूचना का अधिकार कानून (आरटीआई) के तहत यह जानकारी दी है.

 

आरटीआई कार्यकर्ता हेमंत सिंह गौनियों ने 19 दिसंबर, 2017 को सीएम द्वारा चाय-पानी के मद में किए गए खर्च के बारे में जानकारी मांगी थी. राज्य सचिवालय प्रशासन की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, उत्त राखंड सरकार ने 11 महीनों में चाय-पानी पर कुल 68,59,865 रुपये खर्च किए.

इस खबर के सामने आने के बाद सोशल साइट्स में भाजपा और सीएम रावत की खूब खिंचाई हो रही है. सौरव सिन्हा ने लिखा- ‘अब की बार रिफ्रेशमेंट सरकार.’ आलोक कुमार सिंह ने चुटकी लेते हुए लिखा- ‘राष्ट्र।वादी नाश्ताघ है भाई. तो वहीं पंकज कुमार ने नरेंद्र मोदी के बयान का हवाला देते हुए लिखा, ‘बहुत अच्छा! ना खाउंगा, ना खाने दूंगा डायलॉग का क्या हुआ?’ त्रिवेंद्र सिंह रावत ने 18 मार्च, 2017 को उत्तराखंड के मुख्यचमंत्री पद की शपथ ली थी. उत्तराखंड चुनावों में भाजपा ने 70 सदस्यीय विधानसभा में 57 सीटें हासिल की थीं.

वैंकैया नायडू के खिलाफ पूरे विपक्ष ने किया वॉकआउट

नई दिल्ली। राज्यसभा के सभापति वैंकैया नायडू पर पक्षपात करने का आरोप लगाते हुए पूरे विपक्ष ने मंगलवार को राज्यसभा से वॉक आउट कर दिया. वॉक आउट करने वाले दलों में कांग्रेस से लेकर सपा, टीएमसी, आम आदमी पार्टी सहित सभी विपक्ष के दल एकजुट होकर सदन से बाहर आ गए. विपक्ष की इस एकजुटता और वॉक आउट के बाद राज्यसभा की कार्यवाही पूरे दिन के लिए स्थागित हो गई.

सदन से बाहर आए कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा कि विपक्ष के सांसदों का यह काम है कि वह राज्यों से जुड़े जनहित के मुद्दों को नोटिस देकर राज्यसभा के भीतर उठाएं. लेकिन ऐसा कई बार होता है कि मामला इतना जरूरी होता है कि पहले से नोटिस देने की प्रक्रिया को पूरा नहीं किया जा सकता लेकिन इसके बावजूद परंपरा यह रही है कि अगर मामला संवेदनशील और गंभीर है तो सांसदों को अपनी बात उठाने का मौका मिलता है. लेकिन राज्यसभा में लगातार विपक्ष की आवाज दबाने की कोशिश की जा रही है और उन्हें नहीं बोलने दिया जा रहा है. समाजवादी पार्टी सांसद नरेश अग्रवाल ने कहा कि अगर सभापति का यही रवैया रहा तो आगे भी हम निर्णय लेंगे कि क्या करना है? पिछले एक सप्ताह से सभापति इसी ढंग से फैसले कर रहे हैं.

तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने कहा कि सदन के अंदर और सदन के बाहर डेमोक्रेसी का मर्डर हो रहा है. इसलिए सब लोग इकट्ठा होकर यहां पर आए हैं. तो वहीं आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने कहा कि सभापति सदन को इस ढंग से चला रहे हैं कि सदन के बाहर और भीतर दोनों जगह विपक्ष को बोलने नहीं देना है. आज पूरा सदन ऑर्डर में था. कोई वेल में नहीं गया. आज हम सभी लोग अपनी जगह खड़े होकर अपनी बात कह रहे थे. इसके बावजूद सभापित ने सदन को 2:00 बजे तक के लिए स्थगित कर दिया. इसका मतलब सरकार का मकसद है कि बाहर और भीतर दोनों जगह विपक्ष को बोलने मत दो.