एक्टर इंदर कुमार का रूला देने वाला सुसाइड वीडियो कितना सच?

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नई दिल्ली। एक्टर इंदर कुमार मौत का चैप्टर एक बार फिर खुल गया है. सोशल मीडिया पर करीब एक साल बाद इंदर कुमार की लाइफ का लास्ट वीडियो सामने आया है जिसमें वह रोते-बिलखते और खुद की जिंदगी पर तरस खाते दिख रहे हैं. वीडियो ने इंदर कुमार के फैन्स के जख्म को हरा-भरा कर दिया है. सोशल मीडिया पर इंदर कुमार का वीडियो देखने के बाद कई लोगों ने आंसू भी बहाया. वायरल हो रहे इंदर कुमार के वीडियो ने बेचैनी बढा दी है.

वीडियो में इंदर कुमार कह रहे हैं कि, ”सुसाइड करना चाहता हूं. जा रहा हूं बहुत दूर. इसका दोष मैं किसे दूं? या ना दूं. एक्टर बनने आया था. सिक्स पैक बनाए. मेरी अय्याशियों ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा… मुझसे कुछ सीख सकते हो तो सीखो. अगर तुम नहीं सीखे तो कल…”  और अंत में इंदर कुमार ने कीस करते हुए वीडियो क्लोज कर दिया है.

बता दें कि पिछले साल जुलाई में अभिनेता इंदर कुमार की मौत की खबर से फिल्म इंडस्ट्री को झकझोर दिया था. दरअसल, पिछले साल 28 जुलाई को जब इंदर कुमार की मौत की खबर सामने आने पर बताया गया था कि वह काफी दिनों से बीमार हैं और अचानक उन्हें दिल का दौरान पड़ने से उनकी मौत हो गई. लेकिन अब जो वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है कि वो तो कुछ और बता रहा है.

वीडियो की सच्चाई-

सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने पर कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं. इसके साथ ही पुलिस के सामने नया मोड़ आ गया है. हालांकि पुलिस की तरफ से कोई अधिकारिक बयान नहीं मिला है लेकिन वीडियो की जांच होनी तय बताई जा रही है. लेकिन सूत्रों का कहना है कि वैरिफाइड एकाउंट से पोस्ट की गईं थीं या नहीं इसकी जांच होनी बाकि है. यदि जांच होती है तो यह बात साफ हो जाएगी कि वीडियो उनको कैसे मिली और कब मिली? वीडियो से इंदर कुमार के मौत की गुत्थी हद तक सुलझ सकती है. बता दें कि कई रिपोर्ट्स का दावा किया है कि इंदर का यह वीडियो उनकी आने वाली फिल्म का एक हिस्सा था जिसको आत्महत्या से जोड़कर दिखाया जा रहा है. हालांकि वीडियो देखने में रियल लग रहा है लेकिन उस वक्त वीडियो इंदर द्वारा पोस्ट ना करना और एक साल बाद वीडियो किसी अन्य के द्वारा पोस्ट कराना कई सवाल खड़ा कर रहा है.

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आदिवासी धर्म कोड को लेकर 12 करोड़ आदिवासियों पर चर्चा

प्रतिकात्मक फोटो- गूगल इमेज

हैदराबाद। आदिवासी धर्म कोड को लेकर जोरदार चर्चा चली. इस दौरान देशभर के 12 करोड़ से अधिक आदिवासियों के बारे में जिक्र किया गया. दो दिन तक चलने वाले राष्ट्रीय अधिवेशन में आदिवासियों के अन्य मुद्दों पर भी जानकारों ने बात की. इस दौरान देशभर के अलग-अलग हिस्सों से आदिवासी नेताओं व जानकारों ने हिस्सा लेकर आदिवासी समुदाय को सशक्त व जागरूक करने को लेकर पहल करने की बात भी कही.

मंगलवार को प्राप्त जानकारी के अनुसार आदिवासी धर्म कोड को लेकर राष्ट्रीय इंडीजिनीयस-आदिवासी धर्म समन्वय समिति द्वारा दो दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन का समापन हैदराबाद में किया गया. एक जानकार ने बताया कि हम लोग इस अधिवेशन में देश में निवास करने वाले 12 करोड़ से अधिक प्रकृति पूजक आदिवासियों के लिए जनगणना फार्म 2021 में अलग धर्म कोड को लेकर चर्चा किए. संभावना है कि जल्द ही इस पर कागजी काम आरंभ किया जाएगा. इस अधिवेशन में झारखंड से पूर्व मंत्री देवकुमार धान के अलावा दिग्गज आदिवासी नेताओं ने भाग लिया. बता दें कि फिलहाल देश में आदिवासियों के मसलों को लेकर आंदोलन चल रहा है. पत्थलगड़ी आंदोलन के गिरफ्तार समर्थकों की रिहाई के लिए जेल भरो आंदोलन आरंभ होने को है.

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भारत में सौर, पवन ऊर्जा क्षेत्र में 3 लाख से भी ज्यादा लोगों को मिलेगा रोजगार

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के नवीकरणीय ऊर्जा के लक्ष्य को पूरा करने के लिए सौर व पवन ऊर्जा क्षेत्रों में तीन लाख से ज्यादा श्रमिकों की जरूरत होगी. भारत ने 2022 तक नवीकरणीय स्रोतों से 175 गीगावाट बिजली उत्पादन का लक्ष्य रखा है.

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने वैश्विक रोजगार बाजार की स्थिति पर अपनी वार्षिक रिपोर्ट में कहा कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की दिशा में कदम बढ़ाने से लाखों नई नौकरियां पैदा होंगी. संयुक्तराष्ट्र की श्रम एजेंसी ने कहा कि 2030 तक दुनियाभर में 2.4 करोड़ नई नौकरियां पैदा होंगी लेकिन पर्यावरण अनुकूल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए सही नीतियों के साथ-साथ श्रमिकों के लिए बेहतर सामाजिक सुरक्षा की जरुरत होगी. एजेंसी ने वैश्विक रोजगार व सामाजिक परिदृश्य 2018 रिपोर्ट में कहा कि भारत ने 2022 तक 175 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य रखा है जो कि उसके कुल उत्पादन का करीब आधा है.

रिपोर्ट में ऊर्जा, पर्यावरण एवं जल परिषद (सीईईडब्‍ल्‍यू) और नेशनल रिसोर्सज डिफेंस काउंसिल (एनआरडीसी) के अनुमानों का हवाला देते हुए कहा गया है कि सौर व पवन ऊर्जा कंपनियों, डेवलपरों और विनिर्माताओं के सर्वेक्षण के आधार पर भारत में सौर और पवन ऊर्जा क्षेत्र में तीन लाख से ज्यादा श्रमिकों की नियुक्ति होगी.

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बसपा और जेडीएस बनें कांग्रेस की हार के कारण!

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नई दिल्ली। कर्नाटक में भाजपा सभी दलों को पछाड़ कर आगे निकल चुकी है. तो वहीं चुनाव में कांग्रेस की करारी हार भी चर्चा का विषय है. कर्नाटक में कांग्रेस के हार की बड़ी वजह जेडीएस और बसपा के साथ गठबंधन न करना रहा. इन दोनों को नजरअंदाज करना कांग्रेस को भारी पर गया है. कर्नाटक में19 फीसदी दलित मतदाता हैं. जबकि जेडीएस का मूल वोटबैंक वोक्कालिगा समुदाय कुल मतदाताओं का करीब 13 फीसदी है. जेडीएस नेता देवगौड़ा इसी समुदाय से आते हैं. कांग्रेस का जेडीएस के साथ गठबंधन न करने के चलते इन दोनों वोट बैंकों में बिखराव हुआजबकि वहीं बीजेपी का मूल वोटबैंक एकमुश्त रहाऔर उसमें किसी तरह की कोई सेंधमारी नहीं हो सकी.  

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक कांग्रेसजेडीएस और बसपा मिलकर एक साथ कर्नाटक में चुनावी रण में उतरते तो नतीजे कुछ और होते. जैसे कि बसपा से गठबंधन का फायदा कुमारस्वामी की पार्टी जेडीएस को मिला. जेडीएस को उम्मीदों से ज्यादा सीटों की बढ़त इस बात का संकेत हैं कि दलित वोट कांग्रेस को नहीं मिले हैं, बल्कि बसपा से गठबंधन के कारण वो जेडीएस के साथ गया है. वहीं दूसरी ओर कर्नाटक में कांग्रेस उम्मीदवार कई सीटों पर बहुत कम वोटों से पीछे रहे.

कांग्रेस का जेडीएस और बसपा से गठबंधन नहीं करने के पीछे कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की जिद थी. तो वहीं अकेले लड़ने के नुकसान के अलावा कांग्रेस बेहतर ढंग से चुनावी प्रबंधन भी नहीं कर पाई. कांग्रेस ने ऐसी ही गलती त्रिपुरा में दोहराई थी. कांग्रेस वहां लेफ्ट के साथ गठबंधन करके चुनावी मैदान में उतर सकती थी, लेकिन वह ऐसा नहीं कर सकी.

जबकि भाजपा तमाम प्रदेशों में पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं को जोड़ने के साथ-साथ नए उत्साह को भी संभालने में सफल रही है. भाजपा ने ताकतवर होने के बावजूद अपनी जीत को पक्का करने के लिए जहां भी जरूरत हुई गठबंधन का सहारा लिया. तो वहीं कमजोर होने के बावजूद कांग्रेस एकला चलो की राह पर चलती रही. जिसने कांग्रेस के साथ से अब कर्नाटक को भी छीन लिया है.

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कैबिनेट में फेरबदलः स्मृति ईरानी को झटका, रेलमंत्री पर अतिरिक्त भार

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नई दिल्ली। कर्नाटक में सरकार बनाने से पहले मोदी के मंत्रालय में एक बार फिर फेरबदल की गई. इसमें स्मृति ईरानी को झटका लगा है जबकि रेलमंत्री पीयूष गोयल की जिम्मेदारी बढा दी गई है. सोमवार को हुए फेरबदल में स्मृति ईरान से सूचना व प्रसारण मंत्री का प्रभार छिने जाने से राजनीतिक चर्चा जोरो पर दिखा. तो वहीं रेलमंत्री को अतिरिक्त प्रभार सौंपे जानें पर भी आलोचना हुई.

प्राप्त जानकारी के अनुसार केंद्रीय मंत्रिपरिषद में फेरबदल करते हुए स्मृति ईरानी का सूचना एवं प्रसारण मंत्री पद राज्यवर्धन सिंह राठौड़ को सौंप दिया गया. बता दें कि राठौड़ इससे पहले सूचना प्रसारण राज्य मंत्री थे. उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बनाया गया है. इसके साथ ही  रेल मंत्री पीयूष गोयल को वित्त मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है.

सूचना व प्रसारण मंत्रालय की मंत्री बनने के बाद स्मृति ईरानी का कार्यकाल विवादों से घिरा रहा. राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार कार्यक्रम के बाद उनकी कड़ी आलोचना की गई और कलाकारों ने भी विरोध जताया. इसी प्रकार मानव संसाधन मंत्री के कार्यकाल के दौरान भी स्मृति ईरानी का जमकर विरोध किया गया था. उसके बाद उन्हें कपड़ा मंत्रालय की जिम्मेदारी दे गई थी. वित्त मंत्री अरूण जेटली की तबियत खराब होने के कारण वित्त मंत्रालय का प्रभार पीयूष गोयल को सौंपा गया है. श्री जेटली का एम्स में ईलाज चल रहा है.

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UPSC में इन पदों पर निकली हैं नई नौकरियां, 39 हजार रुपये तक है सैलरी

UPSC recruitment 2018: यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन (UPSC) ने नई नौकरियों के लिए नोटिफिकेशन जारी किया है. ये नोटिफिकेशन डायरेक्टर, रजिस्ट्रार, प्रोफेसर और टैक्स ऑफिसर की पोस्ट के लिए जारी किया गया है. योग्य और रुचि रखने वाले कैंडिडेट्स ऑफिशियल वेबसाइटupsconline.nic.in पर एप्लिकेशन अप्लाई कर सकते हैं. एप्लिकेशन अप्लाई करने की आखिरी तारीख 31 मई है और सिलेक्शन के लिए कैंडिडेट को पहले रिटेन एग्जाम पास करना होगा. जरूरी डेट्स: ऑनलाइन एप्लिकेशन अप्लाई करने की आखिरी तारीख- 31 मई आनलाइन एप्लिकेशन के लिए फीस पे करने की आखिरी तारीख- 31 मई ऑफलाइन एप्लिकेशन सब्मिट करने की आखिरी तारीख- 1 जून, 2018 कुल वैकेंसी- 18 पे स्केल: इन पोस्ट के लिए सैलरी 15, 600 रुपये से लेकर 39 हजार रुपये तक है. साथ ही 6 हजार रुपये महीने के अलग से दिए जाएंगे. सिलेक्शन प्रोसेस: कैंडिडेट्स को पहले रिटेन एग्जाम देना होगा. रिटेन एग्जाम क्लियर होने के बाद इंटरव्यू के लिए बुलाया जाएगा. आयु सीमा: 25 साल से लेकर 40 साल (नोट- सरकार के नियमों के मुताबिक ही कैंडिडेट्स को आयु में छूट दी जाएगी.) ऐसे करें अप्लाई: -सबसे पहले ऑफिशियल वेबसाइट upsconline.nic.in को ओपन करें. -फिर Apply Online के विकल्प पर क्लिक करें. -ऑनलाइन एप्लिकेशन अप्लाई करने के बाद उसका प्रिंट आउट लेना ना भूलें. Read Also-जून से TV और फ्रिज खरीदना हो सकता है महंगा, इस वजह से बढ़ेंगे दाम
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भारतीय सेना के राजनीतिकरण की आहट

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कर्नाटक के हालिया चुनावी अभियान में भारतीय सेना का जिस प्रकार क्षुद्र राजनीतिक स्‍वार्थों के लिए इस्‍तेमाल किया गया है और जिस प्रकार केंद्र में सत्‍तारूढ़ भाजपा के शीर्षस्‍थ व्‍यक्ति द्वारा भारतीय सैन्‍य इतिहास के साथ तोड़-मरोड़ की गई है, वह एक लोकतांत्रिक राष्‍ट्र के रूप में हमारे भविष्‍य को लेकर खतरे की घंटी है.

हमारे लोकतंत्र पर हुये बड़े से बड़े सांप्रदायिक और जातिवादी हमलों के बाद भी भारतीय सेना एक तंत्र के रूप में कुल मिलाकर सेकुलर रही है, वह राजनीति के कीचड़ से सदैव निर्लिप्‍त रही है. लेकिन स्‍वयं को राष्‍ट्रवादी कहने वाले एक दल द्वारा, उस दल से आने वाले वर्तमान प्रधानमंत्री द्वारा गलत बयानी करके भारतीय सुरक्षा बलों को राजनीति के कीचड़ में धकेलना निश्‍चय ही निंदनीय है. इसी प्रकार यह तथ्‍य भी समान रूप से चिंतनीय है कि हमारे एक सर्वोच्‍च सैन्‍य अधिकारी द्वारा हाल के दौर में जिस प्रकार खुले राजनीतिक बयान दिये गये हैं, उनके कारण धर्म आदि को लेकर हमारी सेनाओं में ध्रुवीकरण की आशंकाओं के बादल मंडराने लगे हैं.

यह सोचककर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि जिस दिन भारतीय सुरक्षा बल तिरंगे की जगह किसी धर्म विशेष के प्रति संकीर्ण सांप्रदायिकता से संचालित होने लगेंगे तो उस दिन क्‍या होगा…

2014 के आम चुनाव से ही भाजपा प्रधानमंत्री पद के तत्‍कालीन उम्‍मीदवार और वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में हर चुनाव में व्‍यापक स्तर पर संकीर्ण विभेदनकारी चुनावी अभियान चलाती आ रही है. अपने राजनीतिक दल भाजपा के चुनावी फायदे के लिए श्री नरेंद्र मोदी तमाम नैतिकता को ताक पर रख पूर्व प्रधानमंत्रियों विशेषत: हमारे देश के पहले प्रधानमंत्री के ऊपर वैयक्तिक हमले करते रहे हैं. इस चुनाव में भी उन्‍होंने तथ्‍यों से परे हटकर भगतसिंह और दूसरे क्रांतिकारियों के खिलाफ खड़ा दिखाने की कोशिश की. लेकिन इस बार तो कर्नाटक के चुनावी समर में बुरी तरह घिर चुके अपने दल की चुनावी नैया पार लगाने के लिए वे भारतीय सैन्‍य बलों के इतिहास तक से छेड़छाड़ करने से नहीं चूके. भारतीय सैन्‍य इतिहास के अराजनीतिक राष्‍ट्रीय चरित्र को दाव पर लगाते हुए भ्रामक तथ्‍यों के सहारे उन्‍होंने भारतीय सेना के दो प्रसिद्ध जनरलों के अपमान का आरोप भी कांग्रेस पर लगा दिया. राष्‍ट्रवाद की कूची से कांग्रेस के चेहरे पर चुनावी मैदान में कालिख पोतने की इस हड़बड़ी में वे भूल गये कि उन्‍होंने भारतीय सेना के धवल इतिहास पर ही दाग लगाने का अपराध कर डाला है.

भारतीय सेना के ये दोनों प्रसिद्ध व्‍यक्ति – फील्‍ड मार्शल के.एम. करियप्‍पा (कोडंडेरा मडप्पा करिअप्पा) और जनरल के.एस. थिमय्या (कोदंडेरा सुबय्या थिमय्या) कर्नाटक के स्‍थानीय कूर्गी समुदाय (वर्तमान कोडावा) से आते हैं और इन दोनों  के बहाने कन्‍नड़ अस्मिता का कार्ड खेलने की कोशिश उन्‍होंने की थी ताकि कांग्रेस के मुख्‍यमंत्री पद के उम्‍मीदवार सिद्धारमैया के कन्‍नड़ कार्ड की काट निकाली जा सके. किंतु भारतीय सेना के इन लब्‍धप्रतिष्ठित अधिकारियों को कर्नाटक का सपूत कहकर मात्र कर्नाटक तक सीमित कर देना और और इनके कथित अपमान के लिए तत्‍कालीन कांग्रेस सरकार को दोषी ठहराने के जोश में प्रधानमंत्री यह भूल गये कि सेना के राजनीतिकरण के दूरगामी दुष्‍परिणाम लोकतंत्र के भविष्‍य के लिए बड़े अशुभ साबित हो सकते हैं.

इस संदर्भ में निकट अतीत के ठोस तथ्‍यों को उलटते-पलटते हुए अपने दल के चुनावी अभियान के दौरान सार्वजनिक मंच से भ्रामक बातों को दुष्‍प्रचारित करना स्‍वयं प्रधानमंत्री पद की गरिमा और प्रतिष्‍ठा को बट्टा लगाने वाला है. गत 3 मई dks कर्नाटक के कलबुर्गी में एक चुनावी सभा में बोलते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि हमने जनरल थिमय्या के नेतृत्‍व में पाकिस्‍तान के खिलाफ 1948 की लड़ाई में जीत हासिल की थी किंतु जिस आदमी ने कश्‍मीर को बचाया, उसी का तत्‍कालीन प्रधानमंत्री नेहरू और तत्‍कालीन रक्षामंत्री वीके कृष्‍ण मेनन ने अपमान किया था. और इसी कारण जनरल थिमय्या को अपने पद की गरिमा बचाये रखने के लिए त्‍यागपत्र देना पड़ा था.

प्रधानमंत्री अपने उस भाषण में सिर्फ यहीं तक नहीं रुके. 1962 के भारत-चीन युद्ध को लेकर फील्‍ड मार्शल करियप्‍पा का उल्‍लेख करते हुए उन्‍होंने मतदाताओं से एक प्रश्‍न के बहाने कांग्रेस पर करियप्‍पा का तिरस्‍कार करने का भी आरोप जड़ दिया. उन्‍होंने पूछा कि फील्‍ड मार्शल करियप्‍पा के साथ भी कांग्रेस सरकार ने क्‍या कियाॽ थिमय्या और करियप्‍पा जैसी प्रसिद्ध सैन्‍य शख्सियतों के साथ कथित रूप से समुचित व्‍यवहार न करने के तत्‍कालीन कांग्रेस सरकारों पर निशाना साधते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह खुलासा भी करना चाहिए था कि कांग्रेस की सरकारों ने किसप्रकार और कब इन शख्सियतों के साथ दुर्व्‍यवहार किया. वास्‍तव में प्रधानमंत्री ने चुनावी फायदे के लिए कांग्रेस को बदनाम करते हुए उसकी सरकारों पर लब्‍धप्रतिष्ठित सैन्‍य अधिकारियों का तिरस्‍कार करने और राष्‍ट्रीय सुरक्षा के साथ समझौता करने के आरोप तो ठोक दिये किंतु ये आरोप हवा-हवाई हैं क्‍योंकि; ऐतिहासिक सच्‍चाइयों से मेल नहीं खाते.

तथ्‍य कहते हैं कि 1947-48 के कश्‍मीर युद्ध के समय भारतीय सेना का नेतृत्‍व थिमय्या के पास नहीं था अपितु उस समय भारतीय सेना के प्रमुख एक अंग्रेज अफसर जनरल सर फ्रांसिस बुचर थे. जनरल थिमय्या भी उस दौरान दो सितारा जनरल ही थे जो लेफ्टिनेंट जनरल करियप्‍पा की कमान में सेवारत थे और जनरल करियप्‍पा उस समय एक सैन्‍य कमांडर हुआ करते थे. कश्‍मीर में घुसपैठ करने वाले कबाइलियों के खिलाफ थिमय्या और करियप्पा ने जो सफल अभियान चलाया, उसके लिए सारे मुल्‍क को इन पर सदैव नाज़ रहेगा लेकिन प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के इतिहास बोध का देश क्‍या करे जिन्हें इतना भी पता नहीं कि उस समय देश के रक्षा मंत्री कृष्‍ण मेनन नहीं अपितु सरदार बलदेव सिंह थे. प्रधानमंत्री का यह दावा भी खोखला है कि थिमय्या ने उसी समय त्‍यागपत्र दे दिया था. भारत-चीन युद्ध के संदर्भ में करियप्‍पा के जिक्र का भी कुछ तुक नहीं बैठता क्‍योंकि भारतीय सैन्‍य दस्‍तावेज साफ बताते हैं कि करियप्‍पा 1953 में ही सेवानिवृत्‍त हो चुके थे और 1962 के भारत-चीन युद्ध का वे कभी हिस्‍सा रहे ही नहीं थे.

वैसे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि कृष्‍ण मेनन ने भारतीय सेना के सर्वोच्‍च पद का राजनीतिकरण करने की कुचेष्‍टा की थी और यह भी सत्‍य है कि संसद में तत्‍कालीन प्रधानमंत्री श्री नेहरू ने अपनी सरकार की चीन विषयक नीति से असहमति जताने पर थिमय्या को संसद में झिड़क दिया था. लेकिन वे संदर्भ अलग हैं और एक चुनावी सभा में भारतीय सेना के कंधे पर बंदूक रखकर झूठे तथ्‍यों के आधार पर विपक्षी राजनीतिक दल के चरित्र हनन वाले इस मामले का कैसे भी बचाव नहीं किया जा सकता। पिछले 70 सालों से चुनावों में राजनीतिक नफे-नुकसान के मद्देनज़र होने वाले धर्म और जाति के दुरुपयोग के दंशों से ही हम आज तक नहीं उभर पाये हैं. अब भारतीय सैन्‍य इतिहास की राजनीतिक व्‍याख्‍या-कुव्‍याख्‍या और तथ्‍यात्‍मक त्रुटियों के बल पर मतदाताओं को अपने पीछे लामबंद करने की खतरनाक राजनीति अलग से शुरु हो गई है. राष्‍ट्रवाद के नाम पर छद्म राष्‍ट्रवादियों की इस राष्‍ट्र विरोधी राजनीति के खिलाफ नागरिक समाज को समय की नज़ाकतता को देखते हुए त्‍वरित कदम उठाना होगा ताकि सेना के अराजनीतिक चरित्र की रक्षा समय रहते की जा सके, अन्‍यथा राष्‍ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर अपने राजनीतिक विरोधियों के चेहरे पर कालिख पोतने वाला सेना का यह राजनीतिक दुरुपयोग आगामी दिनों में बेहद विस्‍फोटक स्थितियाँ पैदा कर सकता है.

राष्‍ट्रीय सुरक्षा संदर्भ में पूर्ववर्ती सरकारों से हुई गलतियों और नीतिगत त्रुटियों का लेखाजोखा करने के लिए चुनावी दंगल ठीक जगह नहीं है. अतीत की गलतियों और त्रुटियों पर व्‍यापक विचार-विमर्श के लिए सैन्‍य विशेषज्ञ हैं, संसद है. दूसरों के दामन में दाग लगा दिखाकर वैसे भी आप अपना दामन पाक साबित नहीं कर सकते. लगता है कि सेना के राजनीतिकरण के चलते अपने पड़ोसी देश में जिस तरह बारंबार लोकतंत्र का गला घोटा जाता रहा है, उससे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने कोई सबक नहीं सीखा! अथवा कहीं ऐसा तो नहीं कि राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के अनुशासन में राजनीति का क ख ग सीखने वाले श्री नरेंद्र मोदी को लोकतंत्र की तुलना में सैन्‍य तानाशाही ज्‍यादा रास आती होॽ

हमारे लोकतंत्र ने सेना के अराजनीतिकरण की जो नींव डाली थी और जिस प्रकार कभी भी सेना को बैरकों से बाहर निकलकर राजनीतिक सत्‍ता सूत्र अपने हाथों में लेने का अवसर मुहैया नहीं कराया, उस लोकतांत्रिक आदर्श की पालना पहले सेना प्रमुख जनरल करियप्‍पा से लेकर अब तक कुल मिलाकर भारतीय सैन्‍य बलों द्वारा भी की जाती रही है. इस शक्ति संतुलन को बनाये रखना सेना और लोकतंत्र, दोनों के हित में है. भारतीय सेनाओं की वफादारी सदैव से संविधान के प्रति रही है और हमारी तीनों सेनायें लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई नागरिक सरकार की सर्वोच्‍चता का लिहाज़ करती आई हैं. यह अलग बात है कि हमारी सरकारों ने ही एक-दो मौकों पर सेना के प्रति दोयम दर्जे का व्‍यवहार किया है किंतु तब भी सेना ने कभी अनुशासनहीनता न दिखाई. व्‍यवस्‍थापिका ने भी कभी नीतिगत स्‍तर पर सेना के राजनीतिकरण को बढ़ावा नहीं दिया और न ही शीर्ष सैन्‍य नेतृत्‍व ने अपनी क्षुद्र महत्‍वाकांक्षाओं के लिए कभी सैन्‍य सेवा में रहते हुए राजनीतिक दलों की भाषा में बोलने की गलती की.

पिछले सत्‍तर सालों से भारतीय सेनायें अपने इस अराजनरीतिक चरित्र को बचाती आ रही हैं और यही कारण है कि सांप्रदायिक हिंसा के अनियंत्रित हो जाने की सूरत में आज भी चाहे बहुसंख्‍यक हो या अल्‍पसंख्‍यक, दोनों सेना पर भरोसा रखते हैं.

लेकिन पिछले चार सालों से केंद्र की एनडीए सरकार के शासन में व्‍यवस्‍थापिका और सेना, दोनों ने कई-कई मर्तबा अपनी मर्यादाएँ तोड़ी हैं. उदाहरण हेतु सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत कुछ दिन पहले जम्‍मू-कश्‍मीर के स्‍कूली पाठ्यक्रम को लेकर दिये गये अपने बिन मांगे सुझावों को लेकर विवाद में रहे थे. अब एक बार फिर कश्‍मीर में आजादी की नारा लगाने वाले युवाओं को ताकत के बल पर कुचल देने की धमकी देकर उन्‍होंने फिर अपनी लक्ष्‍मण रेखा का उल्‍लंघन किया है. इससे पूर्व उनके द्वारा असम के दो राजनीतिक दलों की तुलना किये जाने से भी वहाँ की राजनीति गर्मा गई थी. ध्‍यातव्‍य है कि ये वही जनरल रावत हैं जिन्‍हें सबसे वरिष्ठ माने जाने वाले जनरल बक्शी की उपेक्षा करके केंद्र की वर्तमान एनडीए सरकार ने सेना प्रमुख बनाया था.

इसी प्रकार प्रधानमंत्री जिस प्रकार भारतीय सेना विशेषत: कर्नाटक से ताल्‍लुक रखने वाले दो वरिष्‍ठ सैन्‍य अफसरों के अपमान का आरोपी ठहराते हुए कांग्रेस की छवि धूमिल करने की जो चेष्‍टा करते हैं, उसके पीछे निहित उनका द्वेष और सत्‍ता की भूख किसी से छिपी नहीं है. ऐसे दुष्‍प्रचार से प्रधानमंत्री और उनका दल चाहे कर्नाटक का चुनाव जीत जाये किंतु ऐसे चुनावी दुष्‍प्रचारों की बड़ी कीमत हमें सेना के दीर्घकालीन राजनीतिकरण के रूप में चुकाने के लिए तैयार हो जाना चाहिए और तैयार हो जाना चाहिए पाकिस्‍तान की जैसे सैन्‍य तानाशाही की आशंकाओं के लिए.

(लेखकीय संपर्क :– डॉ. प्रमोद मीणा, सहआचार्य, हिंदी विभाग, मानविकी और भाषा संकाय, महात्‍मा गाँधी केंद्रीय विश्‍वविद्यालय, जिला स्‍कूल परिसर, मोतिहारी, जिला–पूर्वी चंपारण, बिहार–845401, ईमेल – pramod.pu.raj@gmail.com, pramodmeena@mgcub.ac.in; दूरभाष – 7320920958 )

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जून से TV और फ्रिज खरीदना हो सकता है महंगा, इस वजह से बढ़ेंगे दाम

अगले महीने से आपके लिए टेलीविजन, फ्रिज और वॉशिंग मशीन समेत अन्य सामान खरीदना महंगा हो सकता है. कंज्यूमर ड्यूरेबल फर्म्स ने इसके संकेत दिए हैं. उनका कहना है कि कच्चे तेल और रुपये में जारी लगातार गिरावट का असर इन उत्पादों के दामों को बढ़ाने के तौर पर सामने आ सकते हैं.

कंज्यूमर ड्यूरेबल्स फर्म व्हर्लपूल इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर सुनील डीसूजा ने कहा कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और रुपये में गिरावट का प्रभाव तमाम चीजों पर पड़ता है. इसलिए यह आशंका जताई जा रही है कि उत्पादों के दाम आने वाले समय में बढ़ेंगे. हालांकि दाम कब बढ़ेंगे, इस पर उन्होंने स्पष्ट जवाब नहीं दिया. लेक‍िन उन्होंने इतना जरूर संकेत दिया कि दाम जून से बढ़ने शुरू हो सकते हैं.

डीसूजा ने यह भी कहा कि कच्चे माल के आयात की कीमत का कंपनी के खर्च पर काफी प्रभाव होता है. ऐसे में रुपये में डॉलर के मुकाबले लगातार जारी गिरावट का असर कंपनी के उत्पादों पर भी पड़ेगा. इस वजह से दाम बढ़ने के लिए यह भी एक अहम फैक्टर होगा.

डीसूजा ने बताया कि मौजूदा वित्त वर्ष में कंज्यूमर ड्यूरेबल्स की मांग के अच्छे रहने की संभावना है. उनके मुताबिक अच्छी जीडीपी, बेहतर मानसून और ग्रामीण विद्युतीकरण की तरफ उठाए गए कदमों की बदौलत मांग का आंकड़ा दहाई में पहुंच सकता है.

व्हर्लपूल इंडिया से पहले गोदरेज अप्लाायंसेस ने भी जून से अपने उत्पादों का दाम बढ़ाने की संकेत दिए हैं. पिछले महीने 29 अप्रैल को कंपनी ने कहा था कि जून से उत्पाद के दाम बढ़ाना उसके लिए अब जरूरी हो गया है. क्योंकि कच्चे तेल की कीमतों में लगातार इजाफा होता जा रहा है. इसके अलावा रुपये में भी गिरावट जारी है.

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नए कॉलेज में एडमिशन से पहले इन बातों का रखें ख्याल-

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नई दिल्ली। 10 व 12 वीं की रिजल्ट की घोषणा हो चुकी है. रिजल्ट्स आने के बाद स्टूडेंट्स नए कॉलेज की तलाश में जुट गए हैं. इस दौरान स्टूडेंट्स को नए कॉलेज ढूंढने में दिक्कत आती है. हालांकि नए कॉलेज में एडमिशन लेने से पहले कई तरह की बातें डराती हैं. जैसे कि कॉलेज और उसकी व्यवस्था को लेकर बहुत सारे सवाल उठते हैं. लेकिन इन तमाम दुविधाओं को घर बैठे दूर किया जा सकता है.

अच्छे कॉलेज का चयन करने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखना होगा. इससे कॉलेज तो अच्छा मिलेगा ही साथ ही भविष्य भी सुरक्षित दिखेगा. कई बार आप अपने दोस्तों या आस पड़ोस के स्टूडेंट्स से सुनने को मिलता है कि कॉलेज अच्छा नहीं मिला या उस इंस्टीट्यूट ने ठग लिया इत्यादी. लेकिन इस प्रकार से इंटरनेट के जरिए बेस्ट कॉलेज सर्च कर सकते हैं.

ऐसे करें चयन-

  • सबसे पहले निर्णय करें कि किस विषय की पढ़ाई करनी है. अब उस विषय से संबंधित सरकारी कॉलेज सर्च करें. यदि केंद्रीय विवि में विषय की पढ़ाई होती है तो केंद्रीय विवि को पहले चुनें. यदि आप आर्थिक रूप से मजबूत हैं तो बड़े प्राइवेट कॉलेज चुन सकते हैं.
  • कॉलेज का चयन करने के बाद दोस्तों, शिक्षकों व इंटरनेट के जरिए उसकी रैकिंग जान लें और रिव्यू भी पढें. हालांकि रिव्यू के साथ-साथ वहां पर जाकर भी जांच परख लें.
  • हमारे देश में बहुत सारे कॉलेज फर्जी भी चलाएं जाते हैं. इस तरह के कॉलेज हर साल यूजीसी के द्वारा बंद किए जाते हैं. इसलिए एक बार यूजीसी की वेबसाइट पर जाकर लिस्ट देख लें कि संबंधित कॉलेज किसी विवि से मान्यता प्राप्त है.
  • इन सबके बाद देखें कि वहां का रिजल्ट किस तरह प्रकार का रहा है. कम से कम पांच सालों के आंकड़ा का आंकलन कर लें. इससे आपको वहां की शिक्षा की गुणवत्ता मालूम हो जाएगी.
  • यदि इंजीनियरिंग, मेडिकल आदि की तैयारी करना चाहते हैं तो दोस्तों व सहयोगियों की मदद से अच्छे इंस्टीट्यूट की जानकारी लें. इसके बाद खुद ही वहां जाएं. गूगल पर उस इंस्टीट्यूट का रिव्यू पढें. आप चाहें तो सुपर-30 व इसके जैसी अन्य फ्री वाले इंस्टीट्यूट के लिए भी कोशिश करें.
  • सबसे ध्यान देने वाली बात है कि कॉलेज का चयन शिक्षा की गुणवत्ता के आधार पर करने के हिसाब से ही विषयों का चयन अपनी रूची से करें.
  • फी के बारे में हर प्रकार की बात को स्पष्ट कर लें ताकि आगे चलकर किसी प्रकार का बोझ ना बढे.
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मायावती ने जेडीएस सुप्रीमों देवगौड़ा से की लंबी बात

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नई दिल्ली। कर्नाटक विधानसभा में भाजपा स्पष्ट बहुमत की ओर बढ़ती दिख रही है. इस बीच एक खबर यह भी आ रही है कि बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो मायावती ने जनता दल (सेक्युलर) के मुखिया व पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा से लंबी बातचीत की है. मायावती व देवगौड़ा के बीच हुई बातचीत की खबर ने कर्नाटक सियासत में नया ट्विस्ट ला दिया है. हालांकि रूझानों में बीजेपी की बढ़त को देखते हुए अब उसे किसी अन्य दल के सहयोग की जरूरत नहीं है. फिर भी लंबी बातचीत ने बीजेपी की चिंता बढ़ा दी है.

सूत्रों के अनुसार बातचीत के दौरान मायावती ने देवगौड़ा से कथित रूप से भाजपा के साथ ना मिलने की नसीहत दी है. मायावती ने सलाह दी कि भाजपा से दूरी बनाए रखने में फायदा है. जानदेश का सम्मान करने को भी कहा.

हालांकि इस बातचीत को लेकर जेडीएस व बसपा की ओर से अधिकारिक तौर पर पुष्टि नहीं की गई है लेकिन सूत्रों का मानना है कि बहुत ही लंबी बातचीत चली है. इस बातचीत का असर जेडीएस पर पड़ेगा या नहीं, ये आने वाला समय बताएगा.

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पाकिस्तानी शायर फैज अहमद फैज की बेटी को भारत में बोलने से रोका

नई दिल्ली। पाकिस्तान-हिंदुस्तान की दुश्मनी का खामियाजा साहित्यकारों को भुगतना पड़ रहा है. हालही में भारत में हुए एक कार्यक्रम के दौरान मशहूर पाकिस्तानी शायर फैज अहमद फैज की बेटी मोनीजा हाशमी को बोलने से रोक दिया. प्राप्त जानकारी के मुताबिक 10 मई को दिल्ली में आयोजित किए गए एशिया मीडिया शिखर सम्मेलन में बतौर वक्ता बोलने वाली थीं लेकिन अंतिम समय में उनका नाम वक्ताओं की सूची से हटा दिया गया.

15वां एशिया मीडिया शिखर सम्मेलन पहली बार भारत में हुआ था. साथ ही मोनीजा हाशमी ने मीडिया को कहा कि देश भर में मेरे साथ ऐसा कहीं नहीं हुआ लेकिन भारत में मुझे पहली बार बोलने से रोका गया. सूत्रों ने कहा कि दिल्ली में मीडिया शिखर सम्मेलन के आयोजकों को पाकिस्तान के नागरिकों के लिए “राजनीतिक मंजूरी” नहीं दी गई थी. हालांकि इसको लेकर लोगों ने सोशल मीडिया पर कड़ी निंदा की. साथ ही वरिष्ठ अधिवक्ता शशीभूषण सिंह ने भी इस तरह से रोकने को सही नहीं ठहराया. ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, कई बार भारत-पाक के मुद्दों को लेकर इस तरह की घटनाएं दोनों देशों में देखने को मिलती हैं. साहित्य को लेकर इस तरह का रवैया दोनों मुल्कों के लिए जोखिम भरा साबित हो सकता है. बता दें कि इनका वीजा क्लीयर कर दिया गया था लेकिन कार्यक्रम में पहुंचने के बाद बोलने से रोक दिया गया.

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मनमोहन सिंह ने राष्ट्रपति से कर दी पीएम मोदी की शिकायत

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नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से नाराज पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने सोमवार को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को चिट्ठी लिखकर शिकायत की है. डॉ. मनमोहन सिंह ने इससे पहले पीएम मोदी के रवैये को लेकर नाराजगी व्यक्त की थी लेकिन मौजूदा पीएम के अंदर किसी प्रकार का प्रभाव ना देखकर उन्होंने राष्ट्रपति से शिकायत की है.

प्राप्त जानकारी के मुताबिक पत्र में मनमोहन सिंह ने पीएम मोदी की आपत्तिजनक भाषा को लेकर शिकायत की है. उन्होंने राष्ट्रपति को लिखा है कि वह पीएम मोदी की ओर से कांग्रेस के खिलाफ ‘बेबुनियाद’, ‘धमकी भरी’ और ‘डराने वाली’ भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं. यह प्रधानमंत्री पद के लिए शोभा नहीं देता.

गौरतलब है कि इससे पहले मनमोहन सिंह ने कर्नाटक चुनाव में भी भाषा को लेकर पीएम मोदी पर निशाना साधा था. उन्होंने यह भी कहा था कि पीएम जिस भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं वैसा आज तक किसी भी प्रधानमंत्री ने नहीं किया है. इस तरह की भाषा प्रधानमंत्री की गरिमा को गिराने का काम कर रही है.

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अब क्यूं बैठ गए सीएम केजरीवाल धरना देने

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नई दिल्ली। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल एक बार धरना देने बैठ गए हैं. सीएम केजरीवाल धरना पर बैठने के पीछे महिला सुरक्षा की बात कही जा रही है. प्राप्त जानकारी के मुताबिक दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल सीसीटीवी लगाने के टेंडर को रोकने के मामले को लेकर नाराज हैं. इसको लेकर उप-राज्यपाल अनिल बैजल के आवास के बाहर धरने पर बैठे हैं. अरविंद केजरीवाल के साथ उनकी कैबिनेट मंत्री और विधायक भी हैं.

सीएम अरविंद केजरीवाल ने उप-राज्यपाल पर भेदभाव करने का आरोप लगाया है. साथ ही कहा कि महिला सुरक्षा को लेकर खिलवाड़ किया जा रहा है. इस अनदेखी को सहन नहीं कर सकते.

हालांकि सीएम के धरने पर बैठने के बाद एलजी ने दिल्ली सरकार की कैबिनेट को मिलने की अनुमति दी. लेकिन सीएम केजरीवाल ने मिलने से मना कर दिया. मुख्यमंत्री का कहना है कि सभी विधायक आम जनता के प्रतिनिधि हैं, इसलिए सभी को मिलने के लिए बुलाया जाना चाहिए.

उल्लेखनीय है कि दिल्ली में सीसीटीवी लगाने टेंडर को रोकने के मामले को लेकर अरविंद केजरीवाल ने अपने मंत्रियों व विधायक के साथ मिलकर अनिल बैजल से मिलने के लिए मार्च निकालने की घोषणा की थी. उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने उप राज्यपाल (एलजी) को पत्र लिखकर उनसे मिलने के लिए समय भी मांगा था. वैसे सीएम केजरीवाल का धरना देना कोई नई बात नहीं है. इनकी यही खूबियां इनको आम आदमी का नेता बताती है.

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सिंगापुर मीटिंग कर्नाटक में बिगाड़ सकती है कांग्रेस की कमेस्ट्री

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नई दिल्ली। कर्नाटक चुनाव में सरकार बनाने की दावेदारी भाजपा व कांग्रेस दावा कर ही है. ऐसे में सूत्रों के हवाले से एक बड़ी खबर मिली है कि कांग्रेस के दिग्गज नेता देवगौड़ा के बेटे और पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी कांग्रेस को छोड़ बीजेपी के साथ जाने के मूड में हैं. जेडीएस से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी के साथ सौदेबाजी के लिए ही वह सिंगापुर गए हैं.

कांग्रेस के दिग्गज नेता का यूं सिंगापुर जाकर मीटिंग करने वाली बात ने कर्नाटक की राजनीति में खलबली मचा दी है लेकिन इससे कांग्रेस पर खतरा मंडराने लगा है. ऐसे में कांग्रेस के कुछ नेताओं का यह भी कहना है कि जेडीएस को बीजेपी के साथ जाने से रोकने के लिए ही पार्टी दलित सीएम की थ्योरी उछाल रही है. लेकिन इसे खासा फायदा नहीं होगा. बता दें कि कांग्रेस आधिकारिक रूप से कह रही है कि वह पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में वापसी कर रही है जबकि पार्टी के ही कुछ नेताओं के त्रिशंकु विधानसभा की आशंका सता रही है.

इसके साथ ही त्रिशंकु विधानसभा और दलित मुख्यमंत्री को लेकर जारी इस चर्चा से बीजेपी से सीएम उम्मीदवार बीएस येदियुरप्पा बेफिक्र दिखते हैं. उन्होंने अटकलों का खारिज करते हुए दावा किया है कि वह 17 मई की शाम सीएम पद की शपथ लेगें. इन सारे दावों की परख 15 मई मंगलवार को रिजल्ट आने के बाद हो जानी है. ऐसे में देवगौड़ा के बेटे और पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी कांग्रेस को छोड़ कर जाने वाली बात कांग्रेस की कमेस्ट्री बिगाड़ सकती है.

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कर्नाटक चुनाव और दलित मुख्यमंत्री का दांव

हर कोई यह मान कर चल रहा है कि कर्नाटक चुनाव का नतीजा त्रिशंकु होगा और जनता दल सेक्युलर के सहयोग के बिना किसी भी पार्टी की सरकार नहीं बनेगी. ऐसे में कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों की नजर जेडीएस की ओर है. इस बीच कांग्रेस के मुख्यमंत्री प्रत्याशी सिद्धारमैया ने दलित मुख्यमंत्री की बात उठाकर कर्नाटक की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है. तो पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा की पार्टी जेडीएस ने भी कहा है कि अगर कांग्रेस सिद्दारमैया को मुख्यमंत्री नहीं बनाती है तो उसका समर्थन किया जा सकता है.

इन दोनों बयानों ने कर्नाटक में दलित मुख्यमंत्री की बहस को तेज कर दिया है. दलित मुख्यमंत्री की चर्चा तेज होने पर कर्नाटक में मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम सबसे आगे दिखने लगा है. खुद खड़गे भी मुख्यमंत्री पद की चाहत रखते हैं और उन्होंने इस बात को स्वीकार भी किया है. कर्नाटक के दिग्गज कांग्रेसी नेता मल्लिकार्जुन खड़गे का कहना है कि कि वह खुद सीएम पोस्ट की रेस में हैं. खड़गे कहते हैं- ‘मैं मुख्यमंत्री का पद इसलिए नहीं चाहता कि मैं दलित हूं. मैं पार्टी का वरिष्ठ नेता हूं और इस नाते मेरे नाम पर विचार होना चाहिए.’ लेकिन इस पूरी बहस में सबसे बड़ा फैसला जेडीएस सुप्रीमो एचडी देवेगौड़ा का होगा. क्योंकि दलित मुख्यमंत्री की स्थिति में भी वह नाम कौन होगा, यह तय करने में देवेगौड़ा की भूमिका प्रमुख होगी. खगड़े के अलावा कांग्रेस के ही दो अन्य दिग्गज दलित नेता पीडब्ल्यूडी मंत्री एचसी महादेवप्पा और सात बार से कोल्लार के सांसद रहे केएच मुनियप्पा भी सीएम पद की रेस में बताए जा रहे हैं. कर्नाटक के राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि त्रिशंकु विधानसभा होने की स्थिति में देवेगौड़ा खड़गे के नाम के बदले महादेवप्पा या मुनियप्पा के नाम पर समर्थन दे सकते हैं. इस पूरे मामले में एक ट्विस्ट और है. प्रदेश में बसपा 20 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. ऐसे में अगर बसपा के दर्जन भर विधायक भी चुने जाते हैं और कोई तीसरी पार्टी इतनी ही सीटें से पिछड़ती है तो फिर बसपा भी महत्वपूर्ण होकर उभर सकती है. ऐसे में बाजी देवेगौड़ा के हाथ से निकल कर मायावती के हाथ में आ सकती है. हालांकि कर्नाटक की राजनीति कैसी होगी, यह 15 मई को नतीजा आने के बाद ही साफ होगा. क्योंकि अगर किसी एक दल को बहुमत मिल जाता है तो फिर सारी बहस वहीं खत्म हो जाएगी और अगर विधानसभा त्रिशंकु रहा तो किसी के लिए भी सरकार बनाने की कवायद लंबी हो सकती है.

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SC/ST एक्ट में बड़ा बदलाव लाने की तैयारी में मोदी सरकार

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नई दिल्ली. SC/ST एक्ट में मोदी सरकार बड़ा बदलाव ला सकती है. विरोध व आलोचना झेलने के बाद भाजपा सरकार जल्द ही अध्यादेश ला सकती है. अध्यादेश लाकर मोदी सरकार SC/ST एक्ट के घेरे से बाहर निकलने की पूरी कोशिश करेगी. सूत्रों का कहना है कि एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदलने के लिए केंद्र सरकार जल्द ही अध्यादेश ला सकती है. इस अध्यादेश को लाने के बाद सरकार इसे विधेयक के रूप में संसद में पेश करेगी.

बताया जा रहा है कि विधेयक के जरिए ही इसे संविधान की नौवीं अनुसूची के दायरे में लाया जाएगा. इस संबंध में 16 मई को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है. हालांकि सरकार अध्यादेश के बाद ही फैसला ले सकती है.  गौरतलब है कि SC/ST एक्ट में गिरफ्तारी को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर केंद्र सरकार ने अभी पुनर्विचार याचिका डाली हुई है.

उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ही दलित संगठनों ने दो अप्रैल को भारत बंद बुलाया था. इस भारत बंद में दलित नेताओं व समर्थकों ने सरकार की कड़ी आलोचना की थी. साथ ही कहा कि इससे दलितों पर अपराध बढ़ेगा. हालांकि इसके बाद ही करीब दल दलितों की मौत की घटना भी हुई थी जिससे कि दलित समर्थकों और भी बल मिला. SC/ST एक्ट को लेकर विपक्ष ने भी मोदी सरकार को घेरा था.

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MP Board Results 2018: दूध बेचने वाले के लड़के ने किया 10वीं में टॉप

MP Board Results 2018: MPBSE के 10वीं और 12वीं के बोर्ड परीक्षा परिणाम आज जारी हो चुके हैं. 10वीं से Harshvardhan Parmar ने टॉप किया है. साजापुर के रहने वाले हर्षवर्धन परमार ने दिन-रात एक करके तैयारी की और टॉपर बनें. हर्षवर्धन के पिता दूध बेचकर परिवार चलाते हैं. उनका सपना है बेटा हर्षवर्धन अच्छी पढ़ाई करके बड़ा अफसर बने. वहीं हर्षवर्धन का सपना है कि वो आगे पढ़ाई करके एनडीए अफसर बने. वो आर्मी में जाना चाहता है. हर्षवर्धन का कहना है कि वो माता-पिता के सपनों को पूरा करना चाहते हैं और हर फील्ड में सफल होना चाहते हैं.

बता दें, मध्यन प्रदेश माध्यामिक शिक्षा बोर्ड (मशिमं) ने 10वीं और 12वीं के रिजल्टे घोषित कर दिए हैं. रिजल्ट ऑफिशियल वेबसाइट mpbse.nic.in और mpresults.nic.in. पर जारी किए गए हैं. इस स्कींम के तहत 12वीं में 70 फीसदी से ज्या.दा अंक लाने वाले स्टूiडेंट्स को आगे की पढ़ाई के लिए वित्तीय मदद दी जाएगी. इसके साथ ही 10वीं और 12वीं में 70 फीसदी से ज्यादा अंक लाने वाले स्टूिडेंट्स की सरकार की ओर से करियर काउंसलिंग भी की जाएगी.

10वीं में हर्षवर्धन परमार के अलावा विद‍िशा की अनामिका साध ने भी टॉप किया है. 10वीं में प्रभात शुक्ला और प्रसाद पटेल दूसरे स्थान पर रहे. 12वीं में आर्ट्स में शिवार पवार, फाइन आर्ट्स में तमन्ना कुशवाह, 12वीं साइंस (बायोलॉजी) में दीपल जैन, गणित में ललित पंचोरी, कॉमर्स में आयुषी धेंगुला ने टॉप किया है.

साभार NDTV इंडिया इसे भी पढ़ें–धारा 144 को लांघ दलित मृतक के घर पहुंचे जिग्नेश
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गिरफ्तार आदिवासियों की रिहाई के लिए 15 मई को जेल भरो आंदोलन

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नई दिल्ली/कोरबा. पत्थलगड़ी आंदोलन के समर्थन में गिरफ्तार आदिवासी नेताओं को रिहा कराने के लिए आदिवासी समुदाय सड़कों पर उतरने की तैयारी कर रहा है. पत्थलगड़ी आंदोलन को तेज करने वाले आदिवासियों को गिरफ्तार करने के बाद आदिवासी समाज में आक्रोश बढ़ता दिख रहा है. गुस्साएं आदिवासियों का कहना है कि सरकार गिरफ्तारी करा हमारे अधिकारों को नहीं छिन सकती.

प्राप्त जानकारी के मुताबिक पत्थलगड़ी आंदोलन के समर्थकों को झारखंड व छत्तीसगढ़ में गिरफ्तार किया गया है. आदिवासी नेता का कहना है कि सरकार आदिवासी परंपरा व अधिकारों का हनन कर रही है. सरकार की दमनकारी नीतियों का विरोध और भी व्यापक पैमाने पर किया जाएगा. सूत्रों का कहना है कि बिना किसी शर्त के 14 मई को गिरफ्तार आदिवासी समर्थकों छोड़ने की अपील की गई थी लेकिन खबर मिलने तक किसी को रिहा नहीं किया गया था. इसके बाद आदिवासी नेता ने कहा कि हम लोग 15 मई को व्यापक रूप से प्रदर्शन कर रिहाई की मांग करेंगे.

आदिवासी जानकारों का मानना है कि पत्थलगड़ी आंदोलन जायज है. इसको रोकने के लिए गिरफ्तारी करना असंवैधानिक है. जानकारी के अनुसार आदिवासी समुदाय और गांवों में पारम्परिक विधि-विधान-संस्कार के साथ पत्थलगड़ी (बड़ा शिलालेख गाड़ने) की वर्षों पुरानी परंपरा है. इन पत्थलगड़ियों में मौजा, सीमाना, पुरखों की स्मृति, ग्रामसभा और अधिकार की जानकारी रहती है. कई जगहों पर अंग्रेज-दुश्मनों के खिलाफ लड़कर शहीद होने वाले वीर सूपतों के सम्मान में भी पत्थलगड़ी की जाती रही है. ऐसे में पत्थलगड़ी आंदोलनकारियों को गिरफ्तार करना सरकारी की मनमानी दर्शाती है.

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भीम आर्मी के सदस्यों पर पुलिस ने कसा शिकंजा

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मेरठ। सहारनपुर में भीम आर्मी के जिलाध्यक्ष के भाई सचिन वालिया की हत्या के बाद पुलिस को जहां हत्यारों को गिरफ्तार करना चाहिए था, पुलिस ने उल्टा भीम आर्मी के सदस्यों पर ही शिकंजा कसना शुरू कर दिया है.

मेरठ में पुलिस ने भीम आर्मी के छह सदस्यों को यह आरोप लगाते हुए गिरफ्तार कर लिया है कि वे दंगा भड़काने की कोशिश कर रहे थे. पुलिस का आरोप है कि गिरफ्तार युवक सोशल मीडिया के जरिए लोगों को उकसा रहे थे. हालांकि कुछ दिन पहले ही एक वीडियो जारी कर सचिन वालिया की मौत पर जश्न मनाने वाले युवाओं की ओर से पुलिस आंखें मूंदे है.

पुलिस गिरफ्तार युवाओं के कब्जे से सात मोबाइल फोन बरामद हुए हैं. पुलिस का आरोप है कि यह लोग करीब 20 से ज्यादा वॉट्सऐप ग्रुपों पर माहौल खराब कर दंगा भड़काने की साजिश में लोगों को इस मुहिम से जोड़ रहे थे. आरोपितों में एक रविंद्र मार्शल आर्ट्स का इंटरनैशनल खिलाड़ी और गोल्ड मेडलिस्ट है. पकड़े गए युवाओं के नाम राहुल, नितिन, दीपक, बंटी, सत्यवीर और रविंदर हैं. एडीजी ने बताया कि आरोपित राहुल, सतवीर और रविंद्र तीनों मेरठ जिले के हस्तिनापुर क्षेत्र, दीपक मेरठ शहर और नितिन व बंटी मोदीनगर, गाजियाबाद के रहने वाले हैं.

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