दलित ग्राम प्रधान बिना कसूर 10 दिन से पुलिस हिरासत में

चित्रकूट। फर्जी मुठभेड़ों को लेकर बदनाम उत्तर प्रदेश में योगी सरकार की पुलिस अब मानवाधिकारों के हनन में भी अव्वल होती जा रही है.

एक दलित ग्राम प्रधान को पुलिस पूछताछ के नाम पर कोतवाली ले आई और बिना लिखा-पढ़ी किए पिछले 10 दिनों से हिरासत में रखे हुई है. ग्राम प्रधान के खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं है. यह वाकया चित्रकूट जिले की कर्वी कोतवाली का है. करारी गांव के दलित ग्राम प्रधान को हत्या के एक मामले में पूछताछ के लिए लाया कोतवाली लाया था.

करारी गांव की एक दलित महिला ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के अलावा उच्चाधिकारियों को भेजे शिकायती पत्र में आरोप लगाया कि उसने अदालत के आदेश पर 17 जुलाई, 2018 को गांव के राजाभइया सिंह के खिलाफ दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज कराया था. इस मामले में दोष मुक्त करने के बदले विवेचना अधिकारी ने आरोपी से कथित रूप से एक लाख रुपये की मांग की थी. इसी को लेकर आरोपी ने अपने पिता पर जमीन बेचने का दबाव बनाया, जिसको लेकर दोनों के बीच दो दिन काफी झगड़ा हुआ था और उसके पिता दादू भाई ने 31 जुलाई और एक अगस्त की दरम्यानी रात अपने खेत के बबूल के पेड़ में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी.

शिकायती पत्र के मुताबिक, पुलिस महिला के पति कल्लू, देवर कमलेश, भतीजे सुशील और गांव के दलित ग्राम प्रधान कोदा प्रसाद कोरी को एक अगस्त की देर रात घर से उठा ले गई. पति, देवर और भतीजे को छह अगस्त को कथित हत्या के मामले में जेल भेज दिया है, लेकिन ग्राम प्रधान को अब भी कर्वी पुलिस अपनी हिरासत में रखे हुई है. इस मामले में पुलिस ने कोई लिखा-पढ़ी नहीं की है.

पीड़िता ने यह भी लिखा कि जिस रात पुलिस ने सभी को हिरासत में लिया था, उसके दूसरे दिन अदालत में उसका धारा-164 सीआरपीसी के तहत बयान दर्ज कराया जाना था, जो अब तक दर्ज नहीं कराया गया है. आरोपी उसकी व उसके परिवार की हत्या के लिए खुला घूम रहा है.

दस दिन से पुलिस की हिरासत झेल रहे दलित ग्राम प्रधान कोदा प्रसाद कोरी ने रविवार को फोन पर बताया कि कोतवाल ने कथित हत्या बावत अब तक कोई पूछताछ नहीं की है और न ही थाने से एक भी दिन खाना दिया है. उसके परिजन दोनों पहर 40 किलोमीटर की दूरी तय कर कोतवाली खाना देने आते हैं.

उन्होंने फोन पर बताया कि कोतवाल ने सीधे तौर पर रिश्वत की मांग नहीं की, बल्कि कोतवाल की तरफ से उनके सरकारी जीप चालक और एक पंड़ित होमगार्ड ने कई बार एक लाख रुपये देने पर छोड़ने की बात कह चुके हैं. मैं पचास हजार रुपये तक देने को कह चुका हूं.

इस मामले में जब कोतवाल अनिल सिंह से बात की गई तो उनका कहना था, कल्लू, कमलेश, सुरेश, ग्राम प्रधान कोदा और उसके दो भाइयों रामकुमार व मिठाईलाल के खिलाफ दादू भाई सिंह की हत्या का नामजद मुकदमा दर्ज है. कल्लू, कमलेश और सुशील को छह अगस्त को जेल भेज दिया गया है. ग्राम प्रधान को घटना बावत पूछताछ और दो भइयों की गिरफ्तारी के दबाव के लिए हिरासत में रखा गया है.

एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि लिखा-पढ़ी में जरूर हिरासत में नहीं लिया गया, लेकिन पुलिस अधीक्षक की जानकारी में है. जल्दी ही ग्राम प्रधान का भी चालान किया जाएगा.

दुष्कर्म पीड़िता का अदालत में अब तक बयान न दर्ज कराए जाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि उस घटना के विवेचना अधिकारी सीओ सिटी हैं, इस बारे में वही बता सकते हैं.

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग पहले ही 24 घंटे से ज्यादा समय तक किसी भी आरोपी को हिरासत में न रखने के दिशा-निर्देश दे चुका है, लेकिन यहां की पुलिस के लिए इसका कोई मायने नहीं है.

(ये खबर सिंडिकेट फीड से ऑटो-पब्लिश की गई है. हेडलाइन को छोड़कर क्विंट हिंदी ने इस खबर में कोई बदलाव नहीं किया है.)

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स्‍वतंत्रता दिवस पर अंधविश्‍वास की परछाई

यह प्रश्न अटपटा हो सकता है. लेकिन क्या आपको मालूम है कि 14 अगस्त को पाकिस्तान में आजादी का दिवस मनाया जाता है. इसके पीछे इतिहास में कुछ कहानियां छिपी हुई है. 1929 में तत्कालीन कांग्रेस के अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरु ने ब्रिटिश शासन से पूर्ण स्वराज की मांग की थी. उस समय 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस के लिए चुना गया था. अंग्रेजो ने 14 अगस्‍त को भारत छोड़ने का निर्णय लिया था.

द्वितीय विश्वयुद्ध जो कि 1935 से 1945 के बीच हुआ, उसके बाद अंतरराष्ट्रीय संधि के दबाव में ब्रिटिश संसद में लॉर्ड माउंटबेटन को 30 जून 1948 तक सत्ता का ट्रांसफर करने का अधिकार दिया था. इस पर भारत के पहले गवर्नर जनरल बनने वाले सी. राजगोपालचारी ने कहा था कि यदि वह जून 1948 तक इंतजार करते हैं, तो ट्रांसफर करने के लिए कोई सत्ता ही नहीं बचेगी. इसीलिए 4 जुलाई 1947 को माउंटबेटन भारत को छोड़ने का बिल पेश किया, जिसे 15 दिन में ही पास कर दिया गया. जिसमें यह तय किया गया कि 15 अगस्त 1947 के पहले भारत छोड़ दिया जायेगा.

इस तरह 14 अगस्त 1947 कि बीती रात को भारत छोड़ने का निर्णय लिया गया. इसी समय भारत के दो टुकड़े हो गए, जिसका निर्णय काफी पहले लिया जा चुका था. पाकिस्तान ने उसी दिन अपने आप को आजाद कर लिया. लेकिन भारत ने एक दिन का इंतजार किया. जानते हैं क्यों?

इसकी कहानी बहुत दिलचस्प है. यह कहानी भारत के जड़ों के भीतर तक घुसे अंधविश्वास की कलई खोलता है.

अंग्रेजों के जाने के बाद डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने गोस्वामी गणेश दास महाराज के माध्यम से उज्जैन के ज्योतिष सूर्यनारायण व्यास को हवाई जहाज से दिल्ली बुलवाया और पंचांग देखकर आजादी का मुहूर्त निकलवाया.

पूरे संसार में यह अपने आप में बिरली घटना है जब किसी ने गुलामी की बेड़ियों को खोलने के लिए भी ज्योतिष, शुभ-अशुभ, मुहूर्त, अंधविश्वास का सहारा लिया और इसकी वजह से एक दिन और अपनी गुलामी में रहना पड़ा.

ज्योतिष पंडित सूर्यनारायण व्यास ने 14 तारीख के बजाय 15 तारीख की बीती रात को शुभ लग्न बताया. इसके लिए जो पंचांग बनाया गया उसमें यह बताया गया कि यदि देश 15 तारीख को आजाद होता है तो भारत में लोकतंत्र, सुख शांति और प्रगति बनी रहेगी. 75 वर्ष के भीतर भारत विश्व गुरु बनेगा. इतना ही नहीं, पं. व्यास के कहने पर ही स्वतंत्रता की घोषणा के तत्काल बाद देर रात ही संसद को धोया गया, बाद में बताए मुहूर्त के अनुसार गोस्वामी गिरधारीलाल ने संसद की शुद्धि भी करवाई. इस हिसाब से हम पाकिस्तान से 1 दिन छोटे हो गए.

यह प्रश्न उठता है कि क्या भारत पाकिस्तान से भी ज्यादा लोकतांत्रिक सुख शांति और प्रगति वाला देश है आइए इसका विश्लेषण करते हैं.

पहला भारत में जिस प्रकार से संप्रदायिक हत्याएं हो रही हैं. लिंचिंग जैसी घटनाएं हो रही हैं. दलित और ओबीसी तथा अल्पसंख्यकों का दमन किया जा रहा है. इंसान को जानवर और जानवरों को माता का दर्जा दिया जा रहा है. इससे आप भारत में सांप्रदायिक और लोकतांत्रिक स्थिति का अंदाजा लगा सकते हैं.

दूसरा, भारत की न्याय व्यवस्था आज बिगड़ी हालत में बदल चुकी है. कॉलोसियम परंपराओं में अयोग्य न्यायाधीशों का दबदबा कोर्ट में बढ़ गया है. ईमानदार न्याय प्रिय न्यायाधीशों को जान से हाथ धोना पड़ रहा है. और बेहद दबाव में यह काम करने के लिए मजबूर है.

अगर पाकिस्तान से तुलना करें तो पाकिस्तान में न्याय व्यवस्था कुछ मजबूती दिखाई पड़ती है. जहां पर पूर्व राष्ट्रपति को 1 घंटे खड़े रहने की सजा दी जाती है. तो दूसरी ओर पूर्व प्रधानमंत्री को पनामा केस में सजा दी जाती है. उसी पनामा केस की भारत में फाइलें बंद की जा चुकी है.

तीसरा भारत में जिस प्रकार से प्रेस मीडिया को दबाव में रखा जा रहा है और सोशल मीडिया को कंट्रोल किए जाने की कोशिश हो रही है. इससे नहीं लगता कि लोकतंत्र ज्यादा दिन टिक पाएगा. वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान में गलत कामों के लिए मीडिया में अपने प्रधानमंत्री का मजाक बनाना एक आम बात होती है.

चौथा भारत में शिक्षा व्यवस्था बेहद खस्ता हाल में पहुंच चुकी है. हजारों स्कूलों को बंद किया जा चुका है. आठवीं तक बिना पढ़े पास होने का फरमान जारी है. ऐसी स्थिति में आप समझ सकते हैं कि आम भारतीय की शिक्षा की स्थिति क्या होगी.

पांचवा, ग़रीबी में भारत विकासशील देशों की सूची में काफी पीछे है. 5 जून 2016 जनसत्ता में छपी खबर के मुताबिक भारत को विकासशील देशों की सूची से हटाकर पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ Low इनकम वाली सूची में रखा गया है. इससे आप भारत की गरीबी का अंदाजा लगा सकते हैं.

यह चंद आंकड़े हैं जो यह बताने के लिए काफी है कि पंडित ज्योति सूर्यनारायण व्यास की भविष्यवाणी और उनका पंचांग कहां तक सही है. रही बात भारत के विश्व गुरु बनने की तो शिक्षा की स्थिति के आधार पर यह कहना हास्यास्पद है. मुझे लगता था कि आज के समय में भारत अपनीs अंधविश्वास से निजात पाएं और स्वयंभू विश्व गुरु बनने के दावे से बाहर निकलें.

यह प्रश्न मुंह बाए खड़ा है दुनिया की 100 सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय की सूची में हमारा एक ही विश्वविद्यालय शामिल क्यों नहीं है? दुनिया के अविष्कारों में भारत का एक भी अविष्कारक क्यों नहीं है. हमें अपनी आत्ममुग्धता की बीमारी से निजात पाने की जरूरत है. तभी सही मायने में भारत आजाद कहलाएगा. नहीं तो गुलामी का एक दिन कई हजार सालों के बराबर होगा.

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केरल में बाढ़ से 50 के करीब मौत, हजारों बेघर

केरल में बारिश लोगों पर कहर बनकर टूट रही है. पिछले 40 साल में यहां सबसे भीषण बाढ़ देखी गई है. 8 जिले बाढ़ की चपेट में है. सेना, नेवी से लेकर एनडीआरएफ राहत कार्य में लगे हुए हैं. बाढ़ के कारण मरने वालों का आंकड़ा 39 पहुंच चुका है. हजारों लोग बेघर हैं. लोगों को कैंप में ठहराया जा रहा है. उन्हें खाने पीने की सामग्री पहुंचाई जा रही है. उधर, इडुक्की बांध बारिश के बाद से पूरी तरह भर चुका है. यहां से हर सेकंड 5 लाख लीटर पानी छोड़ा जा रहा है. बांध से छोड़े जा रहे पानी के कारण निचले इलाकों में भी इसका असर दिखाई दे रहा है

केरल में सेना भी एक ओर से मोर्चा संभाले हुए है. आर्मी की 8 टुकड़ियां यहां लगी हैं. खासकर महिला कमांडो की टुकड़ी भी यहां राहत कार्य में जुटी हुई है. एयरफोर्स और नेवी भी केरल में राहत कार्य में जुटी हुई है. नेवी ने ऑपरेशन मदद लॉन्च कर दिया है. एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की 14-14 टीमें लगी हैं. फिलहाल बारिश और बाढ़ के कारण मौत का आंकड़ा 37 तक पहुंच गया है. रविवार को वयनाड में एक 58 वर्षीय महिला की मौत बिल्डिंग गिरने की वजह से हो गई. जबकि 6 लोग घायल बताए जा रहे हैं.

वयनाड के कलेक्टर ए. आर अजय कुमार ने सभी स्कूल-कॉलेजों को सोमवार को बंद रखने के आदेश दिए हैं. यहां हालात स्थाई होने तक लोगों को पानी वाली जगहों पर जाने से मना किया है. पोथुनडी डैम के भी तीन दरवाजे खोल गए हैं. चुल्लीयर, वलयर और मीनकारा जलाशयों में भी पानी खतरे के निशान के ऊपर चला गया है. जिसके चलते आस-पास के इलाकों में अलर्ट जारी किया गया है.

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रुपये में भारी गिरावट

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नई दिल्ली। इस कारोबारी हफ्ते की शुरुआत 69.49 के स्तर पर पहुंचकर करने के बाद रुपये में गिरावट 69.61 के स्तर पर पहुंच गई. हालांकि अब रुपये में थोड़ी मजबूती आना शुरू हो गई है. फिलहाल रुपया डॉलर के मुकाबले 69.42 के स्तर पर कारोबार कर रहा है.

इस कारोबारी हफ्ते की शुरुआत रुपये ने भारी गिरावट के साथ की है. सोमवार को रुपये में ऐतिहासिक गिरावट देखने को मिली. डॉलर के मुकाबले रुपये ने 69.49 के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच कर शुरुआत की.

यह पहली बार है, जब रुपये में डॉलर के मुकाबले इतनी बड़ी गिरावट देखने को मिली. सोमवार को रुपये ने डॉलर के मुकाबले 66 पैसे की भारी गिरावट के साथ शुरुआत की.

शुक्रवार को रुपया डॉलर के मुकाबले 68.83 के स्तर पर बंद हुआ था. बता दें कि विशेषज्ञ पहले ही संभावना जता चुके हैं कि रुपया 70 के स्तर पर पर पहुंच सकता है.

इससे पहले 19 जुलाई को रुपये में सबसे बड़ी गिरावट देखी गई थी. इस दौरान रुपये ने पहली बार 69 का आंकड़ा छुआ था. डॉलर की डिमांड बढ़ने और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने रुपये को कमजोर किया था. 69 का स्तर छूने से एक दिन पहले रुपये ने 19 पैसे की गिरावट के साथ कारोबार की शुरुआत की थी. 18 जुलाई को यह 68.43 रुपये प्रति डॉलर के स्तर पर खुला था.

विशेषज्ञ पहले ही आशंका जता चुके हैं कि रुपये में दबाव बना रहेगा. उनके मुताब‍िक डॉलर में लगातार आ रही मजबूती, कच्चे तेल की कीमतों में जारी उथल-पुथल और विदेशी निवेश प्रवाह में कमी रुपये में गिरावट के लिए जिम्मेदार है.

बैंकरों ने आशंका जताई थी कि अगर रुपया 70 के स्तर पर पहुंच जाता है, तो आरबीआई के लिए इस स्थ‍िति से निपटना काफी मुश्क‍िल हो सकता है.

बैंकरों ने कहा कि भारतीय र‍िजर्व बैंक रुपये को 70 के स्तर पर पहुंचने से रोकने के लिए हर संभव प्रयास करेगा. अब जब रुपया 69.49 के स्तर पर पहुंच गया है, तो केंद्रीय बैंक कोई सुरक्षात्मक कदम उठा सकता है.

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10 बार सांसद रहने वाले पूर्व लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी का निधन

नई दिल्ली। लोकसभा के पूर्व स्पीकर सोमनाथ चटर्जी का निधन हो गया है. वह किडनी की बीमारी से पीड़ित थे. पिछले काफी वक्त से वह कोलकाता के एक अस्पताल में वेंटिलेटर पर थे. चटर्जी 89 साल के थे. चटर्जी माकपा के दिग्गज नेता थे. वह 10 बार लोकसभा के सांसद रहे हैं. वह कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए-1 सरकार में 2004 से 2009 तक लोकसभा के अध्यक्ष रहे थे. चटर्जी सीपीआईएम के केंद्रीय समिति के सदस्य रहे थे, और उन्हें प्रकाश करात के धुर विरोधी के रूप में जाना जाता है. यूपीए-1 शासनकाल में उनकी पार्टी सीपीएम की ओर से सरकार से समर्थन वापस लिए जाने के बाद उनसे स्पीकर पद छोड़ने को कहा गया था, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया. जिस कारण उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया. सोमनाथ चटर्जी का जन्म 25 जुलाई 1929 को बंगाली ब्राह्मण निर्मल चंद्र चटर्जी और वीणापाणि देवी के घर में असम के तेजपुर में हुआ था. दिग्गज नेता के निधन के बाद तमाम नेताओं ने दुख जताया है. सर्वश्रेष्ठ सांसद थे एक बार ममता बनर्जी से मिली थी हार वह पश्चिम बंगाल के बर्धमान, जादवपुर और बोलपुर से लोकसभा सांसद रह चुके थे. हालांकि, 1984 में जादवपुर में ममता बनर्जी से उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा था. उन्हें 1996 में सर्वश्रेष्ठ सांसद का पुरस्कार मिल चुका है. राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने जताया शोक राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने सोमनाथ चटर्जी के निधन पर शोक व्यक्त किया है. उन्होंने ट्वीट में लिखा, ‘सोमनाथ चटर्जी के निधन की खबर सुनकर दुख हुआ. देश और बंगाल के लिए एक बड़ी हानि है. उनके परिवार और शुभचिंतकों के प्रति मेरी संवादनाएं हैं.’ तो वहीं पीएम मोदी ने ट्वीट में लिखा, ‘पूर्व सांसद और अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी भारतीय राजनीति का एक स्तंभ थे. उन्होंने हमारे संसदीय लोकतंत्र को मजबूत किया. वह कमजोर लोगों के कल्याण के लिए एक मजबूत आवाज थे. मैं उनके निधन से दुखी हूं और उनके परिवार व समर्थकों के साथ मेरी संवेदना है. चटर्जी एक संस्थान थे- राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि वह एक संस्थान थे और पार्टी लाइन से हटकर सभी सांसदों के मन में उनके लिए अपार सम्मान था. इस दुख के समय में उनके परिवार के प्रति मेरी संवेदनाएं हैं. तो वहीं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि यह खबर सुनकर बेहद दुखी हूं. उन्हें लोकसभा के सबसे महानतम स्पीकर की श्रेणी में हमेशा याद रखा जाएगा.

बिहार में IAS की मुखिया बीवी रितु जायसवाल की दबंगई से दहशत में दलित

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आईएस की दबंग मुखिया पत्नी रितु जयसवाल

सीतामढ़ी। बिहार के सीतामढ़ी में इन दिनों आईएएस की मुखिया बीवी रितु जयसवाल के दलितों के साथ मारपीट का मामला गरमाया हुआ है. रितु जयसवाल पर उनके ही पंचायत के दलितों ने मारपीट औऱ डराने-धमकाने का आरोप लगाया है. मामला सीतामढ़ी जिले के सोनवर्षा प्रखंड के अंतर्गत आने वाले सिंहवाहिनी पंचायत का है. इस मामले में एससी-एसटी थाने में एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कराया गया है. रितु जयसवाल पर प्रताड़ित करने डराने-धमकाने और जातिसूचक गाली देने का आरोप लगा है.

दरअसल बिहार सरकार ने एक योजना शुरू की है. योजना का नाम मुख्यमंत्री सात निश्चय नल जल योजना है. इस योजना के तहत प्रत्येक वार्ड को 15 हजार से 2 लाख रुपए तक वार्ड में जलापूर्ति और अन्य विकास कार्यों के लिए दिया जाता है. रितु जायसवाल पर आरोप है कि उन्होंने इस योजना को कमीशन के लिए अपने हिसाब से चलाने के लिए दलित समाज के वार्ड सदस्य वीरेन्द्र राम पर दबाव बनाया. आरोप के मुताबिक मुखिया का कहना था कि आप हमारे ठेकेदार से काम करवाइए और हम आपको अच्छा कमीशन भी देंगे. लेकिन रितु जायसवाल की बात दलित वार्ड सदस्य वीरेंद्र राम ने नहीं मानी और खुद अपना काम करने लगे.

वीरेंद्र राम का आरोप है कि जब उन्होंने मुखिया रितु जायसवाल की बात नहीं मानी तो मुखिया ने 5 अगस्त 2018 को उन्हें फोन करके धमकाया कि उनकी टीम (कंपनी) बिहार के बडे दबंग नेता का भतीजा का है और यदि मैं उनको ठेकेदारी नहीं दोगे तो सही नहीं होगा. वीरेन्द्र राम का कहना है कि इसके बाद उन्हें फोन पर डराया धमकाया गया. मुखिया अपने समर्थकों के साथ खुद वीरेन्द्र के दरवाजे पर आ गई.

वार्ड सदस्य वीरेन्द्र राम द्वारा दर्ज कराया गया FIR

बकौल वार्ड सदस्य वीरेन्द्र राम, “ मुखिया और उनके गुंडे हमारे टोला में काम कर रहे मजदूरों को और हमारी पत्नी जो मजदूरों से काम करा रही थी उसको पकड़ कर मारने लगी. हमारी पत्नी मुखिया जी का पैर पकड़कर रोने लगी फिर भी मुखिया जी नहीं मानी और वो और उनके समर्थक मारते रहें.” इस घटना के बाद गांव के अन्य दलितों के साथ वार्ड सदस्य वीरेंद्र राम ने SC ST थाना सीतामढ़ी में 5 अगस्त 2018 को FIR दर्ज करवाया, जिसमें एससी एसटी एक्ट के तहत रितु जायसवाल के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया गया है.

रिपोर्टर ने इस मामले में जब रितु जायसवाल से संपर्क करके उनका पक्ष जानना चाहा तो उनका कहना था कि जो हमारी कंपनी है वह बिहार के बड़े दबंग नेता का भतीजा का कंपनी है. और इसलिए मैं अपने गांव में दंगा फसाद नहीं चाहती थी इसलिए मैं उनको समझा रही थी लेकिन उन लोगों ने मेरे साथ बदतमीजी की. एससी-एसटी मामले में खुद को घिरता देख रितु जायसवाल ने भी अपनी तरफ से एक FIR पटना में दर्ज करवा दिया है.

गौरतलब है कि इससे पहले भी मुखिया रितु जायसवाल पर 8 बार अन्य लोगों पर भी हमला करने का आरोप है. इससे संबंधित मामला भी थाने में दर्ज है. पीड़ितों ने ‘दलित दस्तक’ को बताया की मुखिया का पति आईएएस अधिकारी है और वह बार-बार हम लोगों को धमका रहे हैं कि तुम लोग केस वापस ले लो नहीं तो इससे भी बुरा हाल होगा.

  • बिहार से राजीव कुमार की रिपोर्ट 

संसद मानसून सत्र: विपक्ष के विरोध के बीच राज्‍यसभा में नहीं हुआ पेश

नई दिल्‍ली। तीन तलाक बिल राज्यसभा में विपक्ष के हंगामे के कारण पेश नहीं हो सका. राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू ने कहा कि तीन तलाक बिल को सदन में आज नहीं लिया जा सकेगा, क्योंकि इस पर आम सहमति नहीं बन पाई है.अब शीतकालीन सत्र में मोदी सरकार इसे पेश कर सकती है. हालांकि यह भी उम्‍मीद जताई जा रही है कि शीलकालीन सत्र से पहले मोदी सरकार इसके लिए अध्‍यादेश ला सकती है.

विपक्ष ने बिल के संशोधनों पर सलाह ना करने का आरोप लगाया है. गुरुवार को विपक्ष की मांगों को स्वीकार करते हुए कैबिनेट ने तीन तलाक विधेयक में संशोधनों को हरी झंडी दे दी थी. तीन तलाक बिल पर यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने कहा कि हमारी पार्टी की स्थिति बिल को लेकर एकदम साफ है. मैं इस बारे में और कुछ अभी नहीं कहना चाहूंगी.

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खतरे में दुनिया भर में आदिवासी समुदाय

संसाधनों के लिए अंतरराष्ट्रीय भूख की वजह से आदिवासी समुदायों के इलाके नष्ट होते जा रहे हैं. विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर कार्यकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि दुनिया की मानवीय विविधता खोने का खतरा है.

दुनिया भर में रहने वाले 37 करोड़ आदिवासी और जनजाति समुदायों के सामने जंगलों का कटना और उनकी पारंपरिक जमीन की चोरी सबसे बड़ी चुनौती है. वे धरती पर जैव विवधता वाले 80 प्रतिशत इलाके के संरक्षक हैं लेकिन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लोभ, हथियारबंद विवाद और पर्यावरण संरक्षण संस्थानों की वजह से बहुत से समुदायों की आजीविका खतरे में हैं. ग्लोबल वॉर्मिंग का असर हालात को और खराब कर रहा है.

जनजातियां विभिन्न तरह की हैं. संयुक्त राष्ट्र के अनुसार वे 90 देशों में फैली हैं, 5,000 अलग अलग संस्कृतियां और 4,000 विभिन्न भाषाएं. इस बहुलता के बावजूद या उसकी वजह से ही उन्होंने एक तरह के संघर्ष झेले हैं, चाहे वे ऑस्ट्रेलिया में रहते हों, जापान में या ब्राजील में. उनका जीवन दर कम है, गैर आदिवासी समुदायों की तुलना में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच कम है. उनकी आबादी दुनिया की 5 प्रतिशत है लेकिन गरीबों में उनका हिस्सा 15 प्रतिशत है.

जमीन से वंचित

सर्वाइवल इंटरनेशनल की फियोना वॉटसन ने डॉयचे वेले को बताया कि विभिन्न समुदायों की सबसे बड़ी चुनौती ये हैं कि उनकी पुश्तैनी जमीन खोती जा रही है. “दुनिया भर में आदिवासी लोगों का पर्यावरण के साथ निकट रिश्ता है. उनकी आजीविका के लिए जमीन अहम है, लेकिन उनका प्रकृति से आध्यात्मिक रिश्ता भी है.”

औपनिवेशिक काल में जमीनों को हड़पने का जो सिलसिला शुरू हुआ वह आज भी जारी है. विवाद और हिंसा की वजह से भी उनकी जमीन हड़पी जा रही हैं और वे रिफ्यूजी बन रहे हैं. कई बार सरकारें आदिवासी इलाकों में वहां रहने वाले लोगों की परवाह किए बगैर बांध बनाने या सड़क बनाने का फैसला लेती हैं. वॉटसन कहती हैं, “आदिवासी समुदायों को अक्सर पिछड़ा माना जाता है और इसका इस्तेमाल सरकारें और बहुराष्ट्रीय कंपनियां विकास के नाम पर उनकी जमीन का अधिग्रहण करने के लिए करती हैं.”

ब्राजील की मिसाल

एक मिसाल दक्षिणी ब्राजील का गुआरानी समुदाय है जिन्हें पशुपालन और गन्ने की खेती के लिए उनकी जमीन से खदेड़ दिया गया है.वॉटसन बताती हैं कि इस समुदाय में आत्महत्या की दर दुनिया में सबसे ज्यादा है और उस इलाके की जैव विविधता पूरी तरह खत्म हो गई है. विडंबना ये है कि पर्यावरण संरक्षण संस्थाएं भी आदिवासी समुदायों से पूछे बिना उन इलाकों को संरक्षित इलाका बनवा रही हैं, जहां वे सदियों से रहते आए हैं.

आदिवासी अधिकारों पर एशिया में भी विवाद हो रहा है, जहां दुनिया की 70 प्रतिशत आदिवासी आबादी रहती है. आदिवासी मामलों के अंतरराष्ट्रीय कार्यदल के अनुसार मलेशिया का बजाऊ लाउट ग्रुप बंजारा समुदाय है जो आजीविका के लिए समुद्र पर निर्भर है. जहां वे मछली पकड़ रहे थे वह इलाका 2004 में तून सकारान मरीन पार्क बना दिया और 2009 से वहां मछली मारने पर पाबंदी है. ऑस्ट्रेलिया के वोलोनगोंग यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन के अनुसार इससे उनके पोषण और खाद्य सुरक्षा पर असर पड़ा है.

स्वनिर्णय का अधिकार

इसलिए वॉटसन कहती हैं कि आदिवासी समुदायों के लिए खुद फैसले लेने का अधिकार बहुत मायने रखता है. “ये फैसला करने का अधिकार कि वे कैसे जीना चाहते हैं, इसकी अक्सर उपेक्षा की जाती है और इससे गंभीर समस्याएं पैदा हो रही हैं.” अभी तक अंतरराष्ट्रीय तौर पर इस पर भी सहमति नहीं है कि आदिवासी की क्या व्याख्या है. इस शब्द का इस्तेमाल 2007 में संयुक्तराष्ट्र की घोषणा में किया गया और तब से दुनिया भर में आदिवासी समुदाय दिखने लगे हैं.

न्यूजीलैंड में माओरी समुदाय बहुत ही सक्रिय हो गया है. ऑकलैंड यूनिवर्सिटी के जॉन मैककाफरी के अनुसार माओरी भाषा के कोर्स पूरे देश में बहुत लोकप्रिय हो गए हैं. कनाडा में भी आदिवासियों के मामलों पर मीडिया में नियमित रिपोर्ट दी जाती है और वे राष्ट्रीय बहस का हिस्सा हैं. ये उदाहरण दिखाते हैं कि दुनिया भर में आदिवासी समुदायों के साथ गहन संबंध संभव हैं. सरकारों को आदिवासी समुदायों और जनजातियों के महत्व को स्वीकार करना होगा और उनके साथ बातचीत कर भविष्य का रास्ता तय करना होगा.

आभार: अमांडा कूलसन ग्रासनर/एमजे (DW)

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बेंगलुरु में 15 अगस्त से मिलेगा ब्राह्मण फूड

बेंगलुरू। देश के आईटी हब वाले शहर बेंगलुरू में ब्राह्मण लंच बॉक्स लांच होने जा रहा है. यह 15 अगस्त से अपनी सेवाएं देगा. खुद को मानवाधिकार कार्यकर्ता कहने वाले एक शख्स डॉक्टर बी. कार्तिक नव्यन ने एक पोस्टर पोस्ट किया है. इसमें कहा गया है कि बेंगलुरू में 15 अगस्त से कम कीमत पर ब्राह्मण लंच बॉक्स मुहैया कराया जाएगा.

हालांकि इस ट्विट के सामने आने के बाद विवाद शुरू हो गया है. कई लोगों ने इसे जातिवाद फैलाने वाला कदम बताया है तो कईयों का तर्क है कि जब जैन भोजनालय, हिन्दू होटल और मुस्लिम मुगलई जैसे नामों से लोगों को दिक्कत नहीं है तो फिर ब्राह्मण लंच बॉक्स से क्या दिक्कत है? खैर कोई भी कितना भी तर्क दे, इस कदम ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है.

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अब मीडिया सरकार की नहीं बल्कि सरकार मीडिया की निगरानी करती है: पुण्य प्रसून बाजपेयी

दिल्ली में सीबीआई हेडक्वार्टर के ठीक बगल में है सूचना भवन. सूचना भवन की 10वीं मंज़िल ही देश भर के न्यूज़ चैनलों पर सरकारी निगरानी का ग्राउंड ज़ीरो है. हर दिन 24 घंटे तमाम न्यूज़ चैनलों पर निगरानी रखने के लिए 200 लोगों की टीम लगी रहती है.

बीते चार बरस में यह पहला मौका आया है कि मॉनिटरिंग करने वालों के मोबाइल अब बाहर ही रखवा लिए जा रहे हैं. पहली बार एडीजी ने मीटिंग लेकर मॉनिटरिंग करने वालों को ही चेताया कि अब कोई सूचना बाहर जानी नहीं चाहिए जैसे ‘मास्टरस्ट्रोक’ की मॉनिटरिंग की जानकारी बाहर चली गई.

ऐसे में बरसों-बरस से काम करने के बावजूद छह-छह महीने के कॉन्ट्रैक्ट पर काम कर रहे मॉनिटरिंग से जुड़े ऐसे 10 से 15 लोगों को हटाने की तैयारी हो चली है, जो मॉनिटरिंग करते हुए स्थायी सेवा और अधिक वेतनमान की मांग कर रहे थे.

वैसे मॉनिटरिंग करने वालों को साफ़ निर्देश है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को कौन सा न्यूज़ चैनल कितना दिखाता है, उसकी पूरी रिपोर्ट हर दिन तैयार हो. कुछ लालच अपनी छवि को लेकर सूचना एवं प्रसारण मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ को लेकर भी है तो वह भी अपनी रिपोर्ट तैयार कराते हैं कि कौन सा चैनल उन्हें कितनी जगह देता है.

यानी न्यूज़ चैनल क्या दिखा रहे हैं… क्या बता रहे हैं… और किस दिन किस विषय पर चर्चा कराते हैं… उस चर्चा में कौन शामिल होता है… कौन क्या कहता है… किसके बोल सत्तानुकूल होते हैं… किसके सत्ता विरोध में… इन सब पर नज़र है. पर कन्टेंट को लेकर सबसे पैनी नज़र प्राइम टाइम के बुलेटिन पर और ख़ासकर न्यूज़ चैनल का रुख़ क्या है… कैसी रिपोर्ट दिखाई-बताई जा रही है… रिपोर्ट अगर सरकारी नीतियों को लेकर है तो अलग से रिपोर्ट में ज़िक्र होगा और धीरे-धीरे रिपोर्ट दर रिपोर्ट तैयार होती जाती है. फाइल मोटी होती है.

उसके बाद मॉनिटरिंग करने वालों की निगाहों में वह चेहरे भर दिए जाते हैं जिन कार्यक्रम पर ख़ास नज़र रखनी है. यानी रिपोर्ट दर रिपोर्ट का आकलन कुछ इस तरह होता है जिसमें सत्तानुकूल होने की ग्रेडिंग की जाती है और जो सबसे ज़्यादा सरकार का राग गाता है उन्हें आश्वस्त वाली कैटेगरी में डाला जाता है.

जो चैनल बीच की श्रेणी में आते हैं यानी प्रधानमंत्री का चेहरा कम दिखाते हैं, उन्हें मॉनिटरिंग टीम में से कोई फोन कर देता है और दोस्ती भरे अंदाज़ में चेताता है कि आपको और दिखाना चाहिए. संवाद कैसे होता है ये भी कम दिलचस्प नहीं है. बीते हफ़्ते ही नोएडा से चलने वाले यूपी केंद्रित एक चैनल के संपादक के पास फोन आया. पुराना परिचय देते हुए मीडिया पर बात हुई. उसके बाद दोस्ती भरे अंदाज़ में चेताया गया… आपका चैनल कम दिखाता है… किसे कम दिखाता है… अरे! अपने प्रधानमंत्री जी को. अरे नहीं! हम तो ख़ूब दिखाते हैं. वह आपके अनुसार ‘ख़ूब’ होता होगा हम तो मॉनिटरिंग करते हैं न. रिपोर्ट देख रहे थे आपके चैनल का नंबर कहीं बीच में है.अब आप कह रहे हैं तो और दिखाएंगे. अरे जैसा आप ठीक समझें…

तो ये सुझाव है या चेतावनी? सोचिए, कैसे चैनलों के बीच होड़ लगती होगी कि कौन ज़्यादा से ज़्यादा प्रधानमंत्री मोदी को दिखाता होगा. और कितनों को फोन दोस्ती में चेताने के लिए किया जाता होगा. हालांकि इसके आगे मॉनिटरिंग की पहल दोस्ती नहीं देखती. सुझाव के तौर पर उभरती है और इस बार फोन सूचना भवन से बाहर निकल कर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय या बीजेपी दफ्तर तक पहुंचता है, जिसमें किसी ख़ास ख़बर या किसी ख़ास मौके पर चैनल को लाइव काटने (दिखाना) से लेकर चर्चा का विषय तक बताने के लिए होता है. और चैनल ने अगर दिखाया नहीं या चर्चा न की जो सुझाव भरे अंदाज़ में चेतावनी भी होती है. जैसे, ‘अरे आप समझ नहीं रहे हैं… ये कितना महत्वपूर्ण मुद्दा है. आप संपादक हैं आप ही निर्णय लें, देश के लिए क्या ज़रूरी है ये तो समझें. आप देशहित को ध्यान में नहीं रखते. देखिये, वक़्त बदल रहा है, अब पुरानी समझ का कोई मतलब नहीं… आप तो समझते हैं… हमारा ध्यान दीजिए, नहीं तो हम आपके कार्यक्रम में आ नहीं पाएंगे.’

ये महत्वपूर्ण है कि इसके आगे के तरीके चैनलों के मालिकों तक पहुंचते हैं. सामान्य तौर पर तो अब मालिक ही ख़ुद को संपादक मानने लगे हैं तो प्रोफेशनल संपादक की हैसियत भी मालिक/संपादक के सामने अक्सर ट्रेनी वाली हो जाती है. पद-पैसा-मान्यता को बरक़रार रखने के लिए प्रोफेशनल संपादक भी अक्सर बदल जाता है. इन हालातों के बीच जब मॉनिटरिंग करने वालों की तैयार रिपोर्ट की फाइल किसी मालिक/संपादक के पास पहुंचती है तो दो प्रतिक्रियाएं साफ़ दिखाई देती हैं.

पहली, हमारा चैनल इतना शानदार है जो सरकार को नोटिस लेना पड़ा. दूसरा, इतनी मोटी फाइल में कुछ तो सच होगा. तो फिर संपादक की क्लास ली जाती है और चैनल नतमस्तक हो जाता है. हालांकि पहली प्रतिक्रिया के भी दो चेहरे हैं. एक, मालिक/संपादक को लगता है कि फाइल के ज़रिये सौदेबाज़ी की जा सकती है और दूसरा, अगर चैनल पर दिखाए गए तथ्य सही हैं तो फिर सरकारी फाइल सिवाय डराने के और कुछ नहीं.

ऐसे में पत्रकारिता की साख़ पर सवाल न उठे, ये सोच भी जागती है पर इस दायरे में कितने आ पाते हैं ये भी सवाल है. ऐसे मालिक/संपादक हैं, इससे इंकार भी नहीं किया जा सकता. ख़ैर मॉनिटरिंग के इन तरीकों पर ग़ौर करने से पहले ये समझ लें कि मॉनिटरिंग का चेहरा मोदी सरकार की ही देन है, ऐसा नहीं है. हालांकि मोदी सरकार के दौर में मॉनिटरिंग के मायने और मॉनिटरिंग के ज़रिये मीडिया पर नकेल कसने का अंदाज़ ही सबसे महत्वपूर्ण हो गया है.

इनकार इससे भी नहीं किया जा सकता कि मनमोहन सिंह के दौर में यानी 2008 में ही मॉनिटरिंग की व्यवस्था शुरू हुई थी पर तब मनमोहन के दौर में ‘भारत निर्माण’ योजना केंद्र में थी. यानी ग्रामीण इलाकों में भारत निर्माण को लेकर चैनलों की कवरेज पर ध्यान.

2009 में अंबिका सोनी सूचना एवं प्रसारण मंत्री हुईं तो मॉनिरटिंग के ज़रिये संवेदनशील मुद्दों पर नज़र रखी जाने लगी. पर न तो मनमोहन सिंह, न ही अंबिका सोनी की इसमें रुचि जगी कि मॉनिटरिंग के ज़रिये छवि निखारने की सोची जाए. हां, जानकारी होनी चाहिए ये ज़रूर था.

छवि को लेकर चिंता कांग्रेसी दौर में मनीष तिवारी में जगी, जब वह सूचना एवं प्रसारण मंत्री बने. उनके तेवर निराले थे. पर 2014 में सत्ता बदलते ही मॉनिटरिंग करने-देखने का नज़रिया ही बदल गया. पहले जहां 15 से 20 लोग काम करते थे, यह तादाद 200 तक पहुंच गई और बाकायदा सूचना भवन में शानदार तकनीक लगी. ब्रॉडकास्ट इंजीनिंयरिंग कॉरपोरेशन इंडिया लिमिटेड के ज़रिये भर्तियां शुरू हुईं. ग्रेजुएट लड़के-लड़कियों की भर्ती शुरू हुई. ग्रेजुएट होने के साथ महज़ एक बरस के डिप्लोमा कोर्स वाले बच्चों को 28,635 रुपये देकर छह महीने के कॉन्ट्रैक्ट पर रखा गया. कभी किसी को स्थायी नहीं किया गया.

मॉनिटरिंग पद से ऊपर सीनियर मॉनिटरिंग (37,450 रुपये) और कंटेंट एडिटर (49,500 करोड़ रुपये) जिनकी कुल तादाद 50 हैं उन्हें भी स्थायी नहीं किया गया, भले ही उन्हें भी काम करते हुए चार बरस हो गए हों. यानी मॉनिटरिंग इस बात को लेकर कभी नहीं हुई कि चैनल उन मुद्दों को उठाते हैं या नहीं जो जन अधिकार से जुड़े हों, जो संविधान से जुड़े हों. बीते चार बरस से मॉनिटरिंग सिर्फ़ इसी बात को लेकर हो रही है कि प्रधानमंत्री मोदी की छवि कैसे निखारते रहें.

दिलचस्प तो ये भी है कि मॉनिटरिंग के निशाने पर सबसे पहले डीडी न्यूज़ ही आया, जिसने शुरुआत में ही प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्रा को सबसे कम कवरेज दिया. उसके बाद डीडी न्यूज़ में ही ख़ासा बदलाव हो गया. यानी मॉनिटरिंग का मतलब छवि बनाने, नीतियों के प्रचार-प्रसार में प्राइवेट चैनलों को भी लगा देना. तरीके कई रहे और प्रधानमंत्री के साथ बीते छह महीनों में दूसरा नाम बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का जुड़ा है.

अब चैनल दर चैनल उनके कवरेज के पैमाने को भी मापा जा रहा है और नए-नवेले सूचना प्रसारण मंत्री इस कड़ी में अपनी कवरेज की रिपोर्ट भी मंगाने लगे हैं. पहली बार ‘मास्टरस्ट्रोक’ प्रकरण के बाद सूचना भवन के इमरजेंसी सरीखे हालात हो गए हैं. लगातार पूछताछ, मीटिंग या निगरानी की जा रही है कि मॉनिटरिंग की कोई बात मॉनिटरिंग करने वाला बाहर न भेज दें, इस पर नज़र रखी जा रही है. अब मॉनिटरिंग करने वालों के मोबाइल तक बाहर दरवाज़े पर रखवा लिए जा रहे हैं.मोबाइल नंबरों को भी खंगाला जा रहा है कि आख़िर कैसे मॉनिटरिंग करने वाले शख़्स ने ही ‘मास्टरस्ट्रोक’ पर तैयार हो रही रिपोर्ट को बाहर पहुंचा दिया. अब मीडिया पर नकेल कसने के लिए मॉनिटरिंग की अनोखी मशक्कत जारी है.

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…जब पीएम मोदी ने बढ़ाया हाथ और जेटली ने हाथ मिलाने से कर दिया इनकार!

नई दिल्ली। संसद में गुरुवार का दिन पूरी तरह से राज्यसभा के उपसभापति चुनाव का ही दिन था. लेकिन यह दिन इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण रहा कि करीब तीन महीने के रेस्ट के बाद केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली संसद में पहुंचे थे. इस दौरान एक दिलचस्प वाकया देखने को मिला. हरिवंश सिंह को राज्यसभा का उपसभापति चुने जाने के बाद बधाई देने के क्रम में जब पीएम मोदी ने अरुण जेटली की तरफ हाथ बढ़ाया, तो उन्होंने हाथ मिलाने से इंकार कर दिया.

किडनी ट्रांसप्लांट ऑपरेशन के बाद अरुण जेटली संसद में पहली बार आए थे. उन्होंने राज्यसभा के सभापति के चुनाव में अपना वोट दिया. हरिवंश सिंह की जीत के बाद प्रधानमंत्री मोदी बधाई देने के लिए उनकी सीट की तरफ गए और उन्हें गर्मजोशी से हाथ मिलाकर बधाई दी. उसके बाद वह लौटकर अपनी सीट की ओर आए और बगल में बैठे नेता सदन अरुण जेटली की तरफ हाथ बढ़ाया, लेकिन अरुण जेटली ने मुस्कराते हुए संकेत दिया कि वह हाथ नहीं मिला सकते. उन्होंने तत्काल हाथ जोड़कर नमस्कार कर लिया, जिसका पीएम मोदी ने जवाब भी दिया.

असल में, हाल में हुई किडनी ट्रांसप्लांट सर्जरी की वजह से उन्हें अपने को काफी बचाकर रखना है. डॉक्टरों ने यह सलाह दी है कि वह लोगों से मेलजोल कम से कम रखें. इसकी वजह से वह करीब तीन महीने से घर में ही बैठे थे. उनके वित्त मंत्रालय का प्रभार भी फिलहाल रेल मंत्री पीयूष गोयल संभाल रहे हैं.

यहां तक कि राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू को पहले ही सदन में यह चेतावनी देनी पड़ी कि अरुण जेटली को कोई छूने या उनके करीब जाने की कोशिश न करे, क्योंकि अभी उनकी सेहत सुधार के क्रम में ही है.

सत्तारूढ़ एनडीए के नेताओं के अलावा पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पूर्व रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी जैसे विपक्ष के वरिष्ठ नेताओं ने भी मेज थपथपा कर अरुण जेटली का स्वागत किया.

जेटली सदन के बाहर अपने चेहरे पर एक मास्क लगाए देखे गए थे, लेकिन सदन के अंदर उन्होंने इसे हटा लिया था. ऐसे संकेत हैं कि वह जल्दी ही अपना काम भी संभाल लेंगे.

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राज्यसभा उपसभापति चुनाव में कांग्रेस की हार के जिम्मेदार कौन?

नई दिल्ली। राज्यसभा उपसभापति चुनाव में एनडीए की ओर से जेडीयू उम्मीदवार हरिवंश ने कांग्रेस प्रत्याशी बीके हरिप्रसाद को करारी मात दी है. विपक्ष के पास पर्याप्त संख्या होने की बाद कांग्रेस का चुनाव हार जाना अपने आप में सवाल खड़े कर रहा है. जबकि एनडीए बहुमत से कम होने के बाद जीत हासिल करने में कामयाब रही है. ऐसे में माना जा रहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की ये पांच गलतियां बीके हरिप्रसाद के हार की कारण बनीं.

राज्यसभा उपसभापति के चुनाव के ऐलान के बाद कांग्रेस उम्मीदवार के चयन को लेकर कश्मकश में उलझी रही. जबकि एनडीए ने चुनाव घोषणा के साथ अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया था. विपक्ष में उम्मीदवार को लेकर नामांकन के दिन तक ही माथापच्ची होती रही.

विपक्ष की ओर से पहले एनसीपी की वंदना चव्हाण का नाम सामने आया. इसके बाद नामांकन के दिन आखिरी समय पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने पत्ते खोले और बीके हरिप्रसाद के नाम का ऐलान किया. कांग्रेस का जब तक उम्मीदवार घोषित होता तब तक विपक्ष के कई दलों से एनडीए उम्मीदवार को समर्थन आश्वासन दे चुके थे. ऐसे में इसकी सीधे जिम्मेदार राहुल गांधी को माना जा रहा है.

राज्यसभा उपसभापति के पद के लिए कांग्रेस की ओर बीके हरिप्रसाद के उतरने से लड़ाई विपक्ष की न रहकर कांग्रेस की व्यक्तिगत बन गई. इसीलिए कांग्रेस की ओर से ही समर्थन जुटाने की कोशिश की गई, लेकिन यूपीए के बाकी घटक दल सिर्फ वोट देने तक ही सीमित रखा. जबकि वहीं, एनडीए की ओर से जेडीयू के हरिवंश उम्मीदवार थे.बावजूद इसके पीएम नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह सहित एनडीए के सहयोगी दलों ने विपक्ष के कई दलों से समर्थन के लिए बातचीत की.

राज्यसभा के उपसभापति के चुनाव जीतने के लिए जिस तरह से एनडीए सक्रिय रही. कांग्रेस में उस तरह सक्रियता नहीं दिखा सकी. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कहीं नजर नहीं आए. इसी का नतीजा था कि विपक्ष के पास पर्याप्त संख्या होने के बाद भी कांग्रेस उम्मीदवार को हार का मुंह देखना पड़ा. जबकि एनडीए ने अपने दलों को साधे रखने के साथ-साथ विपक्ष के कई दलों के समर्थन जुटाने में कामयाब रही. एआईएडीएमके, टीआरएस और बीजेडी जैसे दलों ने विपक्ष में होने के बाद भी एनडीए उम्मीदवार के पक्ष में वोटिंग की. हालांकि राहुल गांधी कोशिश करते तो इन दलों का समर्थन हासिल कर सकते थे.

आम आदमी पार्टी, वाईएसआर कांग्रेस और पीडीपी ने राज्यसभा उपसभापति के मतदान से अपने आपको बाहर रखा था. जबकि आम आदमी पार्टी के सासंद संजय सिंह कहते रहे है कि कांग्रेस समर्थन चाहिए तो राहुल गांधी को हमारी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल से बात करें.

राहुल बात नहीं कर सके, जिसके चलते आप का समर्थन नहीं मिला. इसी तरह अगर राहुल गांधी पीडीपी औैर वाईएसआर कांग्रेस से भी बात करते तो हो सकता था कि ये दल उन्हें समर्थन दे देते, लेकिन इसकी कोशिश नहीं की गई.बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए में जेडीयू के उम्मीदवार के उतरने से शिवसेना और अकाली दल की नाराजगी खुलकर सामने आई थी. सत्तापक्ष के ये दोनों दल इस पद पर अपना उम्मीदवार चाहते थे. ऐसे में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी इस नाराजगी का फायदा उठा सकते थे, लेकिन वे ऐसा नहीं कर सके. जबकि वहीं पीएम मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने समय रहते हुए अपने सहयोगी दलों से बातचीत करके उन्हें साधने में कामयाब रहे हैं. इतना ही नहीं विपक्ष के कई दलों में सेंध लगाई. इसी का नतीजा है कि एनडीए बहुमत से कम होने की बावजूद जीतने में कामयाब रही. जबकि विपक्ष पर्याप्त संख्या होने के बाद भी हार का सामना करना पड़ा.

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जानिये कौन है राज्य सभा के उपसभापति

नई दिल्ली। देश की संसद के उच्च सदन यानी राज्यसभा में गुरुवार को उपसभापति पद का चुनाव हुआ. एनडीए गठबंधन की ओर से जेडीयू सांसद हरिवंश मैदान में थे, वहीं विपक्ष की तरफ से बीके हरिप्रसाद उनके सामने थे.हरिवंश को 125 वोट मिले, जबकि हरिप्रसाद के खाते में 105 वोट आए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरिवंश को राज्यसभा का उपसभापति चुने जाने पर बधाई दी. राज्यसभा सांसद पीजे कुरियन के उच्च सदन से रिटायर होने की वजह से यह पद इस साल जून से ही खाली थी. कुरियन केरल से कांग्रेस के टिकट पर राज्यसभा सांसद बने थे.

कौन हैं हरिवंश

सत्ताधारी एनडीए गठबंधन के उम्मीदवार हरिवंश जेडीयू से राज्यसभा सदस्य हैं. जेडीयू ने 2014 में उन्हें बिहार से राज्यसभा में भेजा. 30 जून 1956 को उत्तर प्रदेश के बलिया में जन्में हरिवंश जब बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा कर रहे थे तभी टाइम्स ऑफ़ इंडिया में उनका चयन हो गया. वो साप्ताहिक पत्रिका ‘धर्मयुग’ में उपसंपादक रहे. लेकिन बाद में कुछ दिनों के लिए बैंक में भी काम किया फिर पत्रकारिता में वापसी की और 1989 तक ‘आनंद बाजार पत्रिका’ की साप्ताहिक पत्रिका ‘रविवार’ में सहायक संपादक रहे.

इसके बाद वो 25 सालों से भी अधिक समय के लिए प्रभात ख़बर के प्रधान संपादक रह चुके हैं. राज्यसभा में आने से पहले वो पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के अतिरिक्त सूचना सलाहकार (1990-91) भी रह चुके हैं. 62 साल के हरिवंश बिहार और झारखंड में वहां के जाने-माने अखबार ‘प्रभात खबर’ के एडिटर रहे हैं. खास बात ये है कि वो पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के भी काफी करीबी रहे हैं. प्रधानमंत्री मोदी ने राज्यसभा में हरिवंश के बारे में कहा, “हरिवंश जी पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के करीबी थे और चंद्रशेखर के इस्तीफ़ा देने की जानकारी उन्हें पहले से ही थी, लेकिन उन्होंने अखबार की लोकप्रियता के लिए इस खबर को लीक नहीं किया.”

बीके हरिप्रसाद विपक्ष के उम्मीदवार 

विपक्ष की तरफ से कांग्रेस सांसद बीके हरिप्रसाद को उपसभापति पद के लिए उम्मीदवार बनाया गया है. पहली बार राज्यसभा के लिए 1990 में चुने गए बीके हरिप्रसाद का यह उच्च सदन में तीसरा कार्यकाल है और वो ओडिशा, झारखंड और छत्तीसगढ़ के कांग्रेस प्रभारी हैं. कांग्रेस के महासचिव रह चुके बीके हरिप्रसाद का जन्म बैंगलुरू में 29 जुलाई 1954 में हुआ था.

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जानिये कौन है देवरिया बालिका गृह चलाने वाली महिला…

नई दिल्ली। देवरिया में बालिका संरक्षण गृह में कथित तौर पर लड़कियों के साथ यौन शोषण होने का मामला हाल ही में सामने आया और उसकी संचालक गिरिजा त्रिपाठी अब पुलिस की गिरफ़्त में है.

लेकिन गिरिजा त्रिपाठी पिछले बीस साल से एक-दो नहीं बल्कि गोरखपुर और देवरिया में कई महिला संरक्षण गृह चला रही हैं और इस दौरान दिनों-दिन उनकी तरक़्क़ी भी होती रही.

गिरिजा त्रिपाठी और उनके पति मोहन त्रिपाठी को क़रीब से जानने वाले दिनेश मिश्र बताते हैं, “मोहन त्रिपाठी यहीं नूनखार गांव के रहने वाले हैं. पहले भटनी चीनी मिल में काम करते थे.”

“बाद में मिल बंद हो गई तो नौकरी भी चली गई. गिरिजा त्रिपाठी ने वहीं पर एक संस्था बनाकर महिलाओं को सिलाई-कढ़ाई सिखाना शुरू किया और बाद में वो मां विंध्यवासिनी सेवा समिति बनाकर महिला संरक्षण गृह चलाने लगीं.”

दिनेश मिश्र बताते हैं कि इस संस्था के नाम पर वो कई महिला संरक्षण गृह, विधवा आश्रम और कुछ परामर्श केंद्र चलाती हैं.

सम्मानित होती रहीं है गिरिजा त्रिपाठी

गिरिजा त्रिपाठी आज लोगों की नज़रों में ‘खलनायिका’ जैसी दिख रही हों लेकिन अब से कुछ दिन पहले तक देवरिया और गोरखपुर में उनकी छवि एक समाजसेवी की थी.

सरकारी और ग़ैर-सरकारी स्तर पर चलने वाली कई सामाजिक संस्थाओं और समितियों की वो सदस्य रही हैं. रेडक्रॉस सोसाइटी जैसी संस्थाएं उन्हें सम्मानित करती रही हैं.

पिछले साल फिक्की ने महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में काम करने वाली देश की जिन 150 महिलाओं को सम्मानित किया था, उसमें गिरिजा त्रिपाठी भी शामिल थीं. उन्हें कई स्थानीय कार्यक्रमों में बतौर अतिथि बुलाया जाता रहा था.

बताया जाता है कि ज़िले के अफ़सरों से लेकर राजनीतिक दलों के नेताओं तक से उनके अच्छे संबंध रहे हैं और जानकारों के मुताबिक, यही वजह रही है कि उनकी संस्थाओं में अंदरखाने क्या हो रहा है, ये किसी को पता नहीं चल पाया और इन संस्थाओं को सरकारी फंड मिलता रहा.

जिला पुलिस ने उन्हें दी थी बड़ी ‘भूमिका’

गिरिजा त्रिपाठी की बेटी कंचनलता त्रिपाठी भी इन संस्थाओं को चलाने में उनका सहयोग करती थी और बीजेपी के एक नेता के साथ उनकी तस्वीर घटना के सामने आने के बाद काफ़ी चर्चा में है. कंचनलता त्रिपाठी भी फ़िलहाल पुलिस की गिरफ़्त में है.

वैसे दिलचस्प संयोग ये है कि कुछ समय पहले ही ज़िला पुलिस ने महिला ऐच्छिक ब्यूरो में गिरिजा त्रिपाठी को बड़ी भूमिका दी थी.

देवरिया के पुलिस अधीक्षक रोहन पी कनय बताते हैं, “जब तक किसी के बारे में कोई ग़लत जानकारी न मिल रही हो तो महिलाओं की सेवा में लगे किसी भी व्यक्ति या संस्था को सम्मानित करने में कोई हर्ज़ नहीं. लेकिन जैसे ही हमें अनियमितता की बात पता चली तो निगरानी भी रखी गई और सख़्ती भी बरती गई.”

राजनीतिक और प्रशासनिक गठजोड़

ज़िला प्रशासन के ही एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “गिरिजा त्रिपाठी, उनके कारनामे और उनकी प्रतिष्ठा उस राजनीतिक, प्रशासनिक और सामाजिक गठजोड़ की सच्चाई है जो दिखती सबको है लेकिन आधिकारिक और क़ानूनी रूप से सामने कभी-कभी ही आती है. डीएम, एसपी से लेकर ऐसा कोई अधिकारी नहीं होगा जिसे छोटे से शहर में स्थित इस संस्था के बारे में पता न हो लेकिन कभी ये जानने की कोशिश नहीं की गई कि यहां वास्तव में होता क्या है.”

हालांकि ये अधिकारी एक झटके में गिरिजा त्रिपाठी को पूरी तरह दोषी भी नहीं ठहराते हैं. उनके मुताबिक ये मामला वास्तव में तब इतना तूल पकड़ा, जब विभागीय अधिकारियों से ही गिरिजा त्रिपाठी की अनबन हो गई.

ख़ुद गिरिजा त्रिपाठी भी गिरफ़्तार होने से पहले मीडिया से बात करते हुए ये कह चुकी हैं. उन्होंने चुनौती भी दी थी कि जिस लड़की ने महिला थाने जाकर यौन शोषण जैसी घटना का ज़िक्र किया है, उससे ये बातें ज़बरन कहलवाई गई हैं.

गिरिजा त्रिपाठी को जानने वाले दिनेश मिश्र बताते हैं कि गिरिजा त्रिपाठी ने पहले अपनी संस्था का काम चीनी मिल में अपने पति को मिले छोटे से कमरे से शुरू किया था लेकिन मिल के बंद हो जाने के बाद ये लोग साल 2002 के आस-पास देवरिया आकर यहीं काम करने लगे.

देखते-देखते अमीर बन गई गिरिजा त्रिपाठी

जानकारों के मुताबिक देवरिया आने के बाद इन लोगों का पहले से चल रहीं कई अन्य संस्थाओं से जुड़े लोगों से संपर्क हुआ और देखते-देखते गिरिजा त्रिपाठी देवरिया के जाने माने लोगों में शुमार हो गईं. धीरे-धीरे गिरिजा त्रिपाठी को बालिका गृह, शिशु गृह के साथ ही गोरखपुर और देवरिया में वृद्धाश्रम चलाने की भी अनुमति मिल गई.

गिरिजा त्रिपाठी के पड़ोसियों का कहना है कि इन सारी संस्थाओं को चलाते हुए उन्होंने काफ़ी संपत्ति अर्जित की और फिर देवरिया के ही रजला इलाक़े में एक शानदार घर बनवाया.

पड़ोसियों के मुताबिक़ ज़िले में आने वाला कोई बड़ा अधिकारी ऐसा नहीं था जिसकी गिरिजा त्रिपाठी से नज़दीकी न रही हो. यही वजह है कि देवरिया से लेकर दिल्ली तक उन्हें नारी संरक्षण और समाजसेवा के क्षेत्र में तमाम सम्मान और पुरस्कार मिले हैं.

स्टेशन रोड स्थित जिस संस्था पर गत दिनों छापा पड़ा, वहां भी परिवार परामर्श केंद्र चलता था जहां गिरिजा त्रिपाठी बिछड़े और टूटे परिवारों को मिलाने में सहयोग करती थीं.

फ़िलहाल गिरिजा त्रिपाठी, उनके पति मोहन त्रिपाठी और उनकी बेटी कंचनलता त्रिपाठी पुलिस की गिरफ़्त में हैं.

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आजादी के लड़ाई की बहुजन नायिका: ऊदा देवी पासी

वीरांगना ऊदा देवी के सम्बंध में अधिक जानकारी का अभाव है. कुछ लेखकों द्वारा उनका वाजिद अली शाह की सेना में आना उनके पति के कारण माना जाता है, तो कुछ लोगों के मुताबिक वह सीधे वाजिद अली शाह की महिला सेना में भर्ती हुई थीं. दरअसल नवाब वाजिद अली शाह ने बड़ी मात्रा में अपनी सेना में सैनिकों की भर्ती की, जिसमें लखनऊ के सभी वर्गों के गरीब लोगों को नौकरी पाने का अच्छा अवसर मिला.

ऊदा देवी के पति मक्का पासी भी वाजिद अली शाह की सेना में भर्ती हो गए. वह काफ़ी साहसी व पराक्रमी थे. वह लखनऊ के गांव उजरियांव के रहने वाले थे. अंग्रेजों ने लखनऊ के चिनहट में हुए संघर्ष में मक्का पासी और उनके तमाम साथियों को मौत के घाट उतार दिया था. अपने पति की मौत के बाद ऊदा देवी पासी अंग्रेजों से बदला लेने का मौका तलाशने लगीं. जिसके बाद उन्होंने 3 दर्जन अंग्रेज सैनिकों को अकेले मार गिराया था. इस कहानी का पूरा जिक्र हम आगे करेंगे.

जहां तक शहीद वीरांगना ऊदादेवी की बात है तो उनके संदर्भ में सबसे पहले लंदन की इंडियन हाऊस लाइब्रेरी में 1857 के गदर से संबंधित कुछ दस्तावेज व अंग्रेज लेखकों की पुस्तकें प्राप्त हुईं जिसके अनुसार ऊदादेवी नवाब वाजिद अली शाह की बेगम हजरत महल की महिला सैनिक दस्ते की कप्तान थीं.

ऊदा देवी ने वर्ष 1857 के ‘प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम’ के दौरान भारतीय सिपाहियों की ओर से युद्ध में भाग लिया था. इस विद्रोह के समय हुई लखनऊ की घेराबंदी के समय लगभग 2000 भारतीय सिपाहियों के शरण स्थल ‘सिकन्दर बाग़’ पर ब्रिटिश फौजों द्वारा चढ़ाई की गयी. 16 नवंबर, 1857 को बाग़ में शरण लिये इन 2000 भारतीय सिपाहियों का ब्रिटिश फौजों द्वारा संहार कर दिया गया था. इस दौरान वीरांगना ऊदा देवी पासी ने अंग्रेजों से सीधा लोहा लिया.

ऊदा देवी ने पुरुषों के कपड़े पहन कर खुद को एक पुरुष सैनिक के रूप में तैयार किया. और एक बंदूक और कुछ गोला-बारूद लेकर एक ऊँचे पेड़ पर चढ़ गयी. उन्होंने हमलावर ब्रिटिश सैनिकों को सिकंदर बाग़ में तब तक प्रवेश नहीं करने दिया, जब तक कि उनका गोला बारूद समाप्त नहीं हो गया. ऊदा देवी 16 नवम्बर, 1857 को 32 अंग्रेज़ सैनिकों को मौत के घाट उतारकर वीरगति को प्राप्त हुईं.

ब्रिटिश सैनिकों ने उन्हें उस समय गोली मारी, जब वे पेड़ से उतर रही थीं. जब ब्रिटिश सैनिकों ने बाग़ में प्रवेश किया, तो उन्होंने ऊदा देवी का पूरा शरीर गोलियों से छलनी कर दिया. इस लड़ाई का स्मरण कराती ऊदा देवी की एक मूर्ति सिकन्दर बाग़ परिसर में स्थापित की गई है.

उनकी वीरता का दस्तावेज विदेशों अखबारों में भी दर्ज किया गया. ‘लंदन टाइम्स’ के संवाददाता विलियम हावर्ड रसेल ने लड़ाई के समाचारों का जो डिस्पैच लंदन भेजा था, उसमें पुरुष वेशभूषा में एक स्त्री द्वारा पीपल के पेड़ से गोलियाँ चलाने तथा अंग्रेज़ सेना को भारी क्षति पहुँचाने का उल्लेख प्रमुखता से किया गया है. संभवतः ‘लंदन टाइम्स’ में छपी खबरों के आधार पर ही बाद में कार्ल मार्क्स ने भी अपनी टिप्पणी में इस घटना को समुचित स्थान दिया था.

कहा जाता है कि उनकी इस स्तब्ध कर देने वाली वीरता से अभिभूत होकर अंग्रेज़ काल्विन कैम्बेल ने हैट उतारकर शहीद ऊदा देवी को श्रद्धांजलि दी थी.

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पेरियार से प्रभावित थे करुणानिधि, झेलना पड़ा था जातिवाद

द्रविड़ मुनेत्र कड़गम यानी DMK प्रमुख एम करुणानिधि नहीं रहें. 94 साल की उम्र में 7 अगस्त को उनका निधन हो गया. द्रविड़ आंदोलन से जुड़े होने के कारण उन्हें दफनाया जाएगा. मद्रास हाईकोर्ट की अनुमति के बाद उन्हें चेन्नई के मरीन बिच पर दफनाया जाएगा. करुणानिधि राजनीति के वो दिग्गज थे, जिनके सामने से भारतीय राजनीति के लगभग सारे मुकाम गुज़रे थे. इस उम्र में भी करुणानिधि ही DMK के कर्ताधर्ता थे.

करुणानिधि के जीवन की तमाम बातें लोगों को पता है. मसलन, उन्होंने तीन शादियां की थी. सक्रिय राजनीति में आने से पहले वो तमिल फिल्मों में स्क्रिप्ट राइटर थे. फिल्मों से राजनीति में आने का उनका किस्सा भी किसी फिल्म की कहानी सरीखा ही है. राजनीति के इस नायक को कोई टक्कर दे सका तो वे तमिल फिल्मों के असली महानायक एमजीआर और उनकी शिष्या जयललिता ही थे. बावजूद इसके 1969 से लेकर 1977 का दशक ऐसा था जब करुणानिधि और तमिलनाडु की राजनीति एक-दूसरे के पर्याय थे और उन्हें टक्कर देने वाला कोई नहीं था. करुणानिधि पिछले 62 सालों में एक भी चुनाव नहीं हारे थे. फिलहाल वे थिरुवारुर सीट से MLA थे.

लेकिन जो बातें लोगों को नहीं पता है, उसका जिक्र करना भी जरूरी है. मसलन, खासकर उत्तर भारत के लोगों को यह बात कम पता है कि करुणानिधि को जातिवाद का सामना करना पड़ा था. उन्हें बचपन में ही संगीत सीखने के दौरान छूआछूत का शिकार होना पड़ा था. करुणानिधि का परिवार एक खास वाद्यंत्र बजाता था. बालक करुणानिधि के लिए भी यह सीखना जरूरी था, लेकिन उन्हें उनकी जाति के चलते कम वाद्ययंत्र सिखाये जाते थे. यह बात उन्हें बुरी लगती थी. इस कारण करुणानिधि का मन संगीत में नहीं लगा.

उनके मन पर इस घटना का गहरा प्रभाव पड़ा, जिसके बाद वह जातिवाद और भेदभाव के खिलाफ दक्षिण में बिगुल फूंकने वाले ‘पेरियार’ के ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ से जुड़ गए. इस तरह करुणानिधि काफी कम उम्र में ही द्रविड़ लोगों के ‘आर्यन ब्राह्मणवाद’ के खिलाफ आंदोलन में शामिल हो गये.

जब सन् 1937 में तमिलनाडु में हिन्दी अनिवार्य भाषा के तौर पर लाया जा रहा था. करुणानिधि इस कदम के विरोध में उठ खड़े हुये. तब उनकी उम्र मात्र 14साल की थी. इस उम्र में ही वो इसके खिलाफ नारे लिखने लगे थे. इसी दौरान उनकी धारदार शैली पर ‘पेरियार’ और ‘अन्नादुराई’ की नजर गई. ये दोनों उस दौर में तमिल राजनीति के महारथी हुआ करते थे.

करुणानिधि के लेखन और बात रखने की असाधारण क्षमता से प्रभावित होकर इन्होंने करुणानिधि को अपनी पार्टी की पत्रिका ‘कुदियारासु’ का संपादक बना दिया. लेकिन देश की आजादी के साथ ही पेरियार और अन्नादुराई के रास्ते अलग हो गए और करुणानिधि अन्नादुराई के साथ उनके रास्ते पर चले आये. लेकिन अलग होने के बावजूद उनके पूरे जीवन पर पेरियार के विचारों का प्रभाव बना रहा. इसी प्रभाव की वजह से ईश्वर के अस्तित्व से करुणानिधि ने सीधा इंकार कर दिया था.

सितंबर, 2007 में दिया उनके भाषण का यह वाक्य उनकी शैली और विचारों की एक नज़ीर पेश करता है, जिसमें पेरियार से प्रभावित इस दिग्गज नेता ने कहा था- “लोग कहते हैं कि सत्रह लाख साल पहले एक आदमी हुआ था. उसका नाम राम था. उसके बनाए पुल रामसेतु को हाथ ना लगायें. कौन था ये राम? किस इंजीनियरिंग कॉलेज से ग्रेजुएट हुआ था? कहां है इसका सबूत?”

तमिलनाडु में पेरियार द्वारा लगाई गई और अन्नादुराई और करुणानिधि की संभाली गई गैर ब्राह्मणवादी, हिन्दी विरोधी राजनीति का बोलबाला आज तक है, क्योंकि उसे करुणानिधि जैसे बड़े नेता द्वारा मजबूत आधार मिला. करुणानिधि को दलित दस्तक की श्रद्धांजलि.

बसपा प्रमुख ने करुणानिधि को यूं दी श्रद्धांजली

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एम. करुणानिधि की अनसुनी बातें

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Ø तामिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री और डीएमके अध्यक्ष एम करुणानिधि नहीं रहें Ø उनका जन्म 3 जून 1924 को तमिलनाडु के नागापट्टिनम जिले में हुआ था Ø वो 94 साल के थे और पिछले कुछ दिनों से बीमार थे Ø सेहत की वजह से वो बीते दो साल से राजनीति से दूर थे Ø बचपन में संगीत सीखने के दौरान उन्हें जातिभेद का सामना करना पड़ा था Ø पेरियार और अन्नादुराई ने पहली बार करुणानिधि की प्रतिभा को पहचाना Ø पेरियार से काफी प्रभावित थे करुणानिधि Ø वह करीब 8 दशकों तक राजनीति के क्षेत्र में सक्रिय रहे Ø उन्होंने कुल 13 बार विधानसभा का चुनाव लड़ा और हमेशा जीते Ø 27 जुलाई 1969 को करुणानिधि डीएमके के अध्यक्ष बने Ø 1969 में ही वो पहली बार मुख्यमंत्री बनें Ø वो दिल्ली की राजनीति से दूर ही रहे Ø वो पांच बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे Ø करुणानिधि ने आखिरी विधानसबा चुनाव थिरुवरूर विधानसभा सीट से जीता था Ø करुणानिधि ने अपने बेटे एम.के स्टालिन को अपना राजनीतिक वारिस घोषित किया है Ø राजनीति से पहले वो फिल्मों में सक्रिय थे Ø उन्होंने करीब 50 तमिल फिल्मों की पटकथा और संवाद लेखा Ø उन्होंने तीन शादियां की थी Ø उनका काला चश्मा उनकी खास पहचान था Ø अपने चश्मे से उन्हें इतना लगाव था कि उन्होंने इसे 46 साल बदला 2017 में बदला Ø पुराना चश्मा भारी होने के कारण उन्होंने नया हल्का चश्मा पहनना शुरू किया Ø करुणानिधि ने 1960 में एक्सीडेंट में एक आंख खराब होने के कारण काला चश्मा पहनना शुरू किया Ø 40 दिन तक तलाश किए जाने के बाद यह चश्मा जर्मनी से आया था Ø सबसे पहले पेरियार के आत्मसम्मान आंदोलन से जु़ड़े थे करुणानिधि Ø आर्यन ब्राह्मणवाद के खिलाफ आंदोलन में भी थे शामिल करुणानिधि Ø करुणानिधि के समर्थक उन्हें कलाईनार (कला का विद्वान) कह कर बुलाते थे इसे भी पढ़े-अण्णाभाऊ साठेः महाराष्ट्र की धरती का तड़पता सूरज
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विदेशी जमीन पर दोहरा शतक मारने वाले पहले भारतीय बल्लेबाज

नई दिल्ली। आज भारतीय क्रिकेटर दिलीप सरदेसाई की 78वीं जयंती है. उनके जन्मदिन पर गूगल ने डूडल बना कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की है. सरदेसाई को स्पिन बॉलिंग के खिलाफ भारत का सर्वश्रेष्‍ठ बल्‍लेबाज माना जाता था. सरदेसाई की शानदार बल्लेबाजी की बदौलत भारतीय क्रिकेट ने 1971 में सही मायनों में जब चलना सीखा था, तब वेस्ट इंडीज और इंग्लैंड जैसी टीमों को उन्हीं की जमीन पर हराना शुरू किया था. गूगल द्वारा बनाए गए डूडल में सरदेसाई बैट से बॉल को मारते हुए दिखाई दे रहे हैं.

दिलीप सरदेसाई का जन्म 8 अगस्त 1940 को गोवा में हुआ था, वह गोवा के पहले ऐसे खिलाड़ी थे, जिन्होंने टीम इंडिया के लिए खेला था. उन्होंने 1959 में स्कूल टूर्नामेंट में शानदार 435 रन बनाकर क्रिकेट जगत में अपनी जबरदस्त उपस्थिति दर्ज कराई थी. सरदेसाई ने अपने क्रिकेट करियर की शुरुआत सन 1959-60 में यूनिवर्सिटीज के बीच होने वाली रोहिंटन बारिया ट्रॉफी से की थी. जिसमें उन्‍होंने 87 की औसत से कुल 435 रन बनाए थे. सन 1960-61 में भारत में यूनिवर्सिटीज के खिलाफ खेलने आई पाकिस्‍तान टीम के खिलाफ उन्‍होंने पुणे में 194 मिनट तक डटे रहकर 87 रन बनाए थे.

सरदेसाई पहले भारतीय बल्लेबाज थे, जिन्होंने विदेशी जमीन पर दोहरा शतक मारा था. अंतरराष्‍ट्रीय क्रिकेट में उनकी शुरुआत इंग्‍लैंड के खिलाफ 1961 में हुई थी. 30 मैंचों की 55 पारियों में उन्होंने 39.23 के औसत से कुल 2001 रन बनाए थे. उनका सर्वाधिक स्कोर 212 रन है, जो उन्होंने 1971 में वेस्टइंडीज के खिलाफ किंग्स्टन के सबीना पार्क में बनाया था. हालांकि सरदेसाई ने अपने पूरे टेस्ट क्रिकेट करियर में सिर्फ दो छक्के मारे थे. उन्होंने अपने पूरे करियर में प्रथम श्रेणी के 179 मैचों की 271 पारियों में 41.75 की औसत से कुल 10230 रन बनाए थे. इनमें 25 शतक और 56 अर्द्धशतक शतक शामिल हैं.

2 जुलाई 2007 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया था. चेस्ट इंफेक्शन के बाद उन्हें बॉम्बे हॉस्पिटल में एडमिट किया गया था, जहां उन्होंने आखिरी सांस ली थी.

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देश भर के 9000 शेल्टर होम की होगी जांच

नई दिल्ली। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक दो राज्यों के बालिका गृहों में यौन उत्पीड़न के मामले सामने आने के बाद अब केंद्र सरकार ने पूरे देश में मौजूद 9000 शेल्टर होम का ऑडिट करने का आदेश दिया हैं. ये रिपोर्ट दो महीने में जमा करनी होगी.

महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने कहा है, ”मैंने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग से कहा है कि दो महीनों में सभी बाल देखभाल संस्थानों का सोशल ऑडिट सुनिश्चित किया जाए. इसके लिए मैंने प्रारूप भी तैयार कर दिया है.”

ऑडिट का ये नया प्रारूप पुराने से अलग होगा जिसमें सिर्फ़ बच्चों व बेड की संख्या और अन्य सुविधाओं की जांच की जाती थी.

अब शेल्टर होम चलाने वालों की पृष्ठभूमि और बच्चों की हालत की भी जांच की जाएगी.

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अलविदा करुणानिधि

नई दिल्ली। तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री और डीएमके प्रमुख एम करुणानिधि की मौत के साथ ही दक्षिण भारत की राजनीति का एक लंबा चला अध्याय खत्म हो गया. मंगलवार 7 अगस्त को इस दिग्गज नेता ने 94 साल की उम्र में अंतिम सांस ली. करुणानिधि की मौत की खबर से तमिलानाडु समेत पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई. उनके समर्थक छाती पीटकर रोते देखे गए. इस बीच उनके पार्थिव शरीर को श्रद्धांजलि देने के लिए हजारों की संख्या में नेतागण व समर्थक चेन्नई के राजाजी हॉल पहुंच रहे हैं. हाईकोर्ट ने उनके शरीर को चेन्नई के मरीना बीच पर दफनाने की अनुमति दे दी है.

भारतीय राजनीति में करुणानिधि के कद का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनको श्रद्धांजलि देने के लिए तमाम दिग्गज नेता चेन्नई में राजाजी हॉल पहुंचे. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी करुणानिधि को श्रद्धांजलि देने चेन्नई पहुंचे. इसके अलावा रक्षा मंत्री निर्मला सीतारामण, कमल हासन, केरल के पूर्व मुख्यमंत्री ओमान चांडी, जयललीता की भतीजी दीपा जयकुमार सहित तमाम दिग्गजों ने राजाजी हाल पहुंच कर उन्हें श्रद्धांजलि दी. बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती ने भी एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दक्षिण के दिग्गज नेता को श्रद्धांजलि दी.

राजधानी दिल्ली में राज्यसभा और लोकसभा में डीएमके प्रमुख करुणानिधि को श्रद्धांजलि देने के बाद सदन की कार्यवाही दिनभर के लिए स्थगित हो गई. विदुथलाई चिरुथईगल कात्ची (वीसीके) प्रमुख थोल थिरुमावलवन ने तमिलनाडु के श्रद्धांजलि देने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि के लिए भारत रत्न की मांग की. तो वहीं दूसरी ओर मद्रास हाईकोर्ट द्वारा करुणानिधि के पार्थिव शरीर को चेन्नई के मरीन बीच पर दफनाने की अनुमति मिलते ही उनके बेटे स्टालिन और बेटी कनिमोझी फूट-फूट कर रोने लगे.

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