नई दिल्ली।बी.एस.पी. की राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री मायावती जी ने द्रविड़ मूवमेन्ट के जाने-माने नेता व तमिलनाडु के पाँच बार रहे मुख्यमंत्री श्री करूणानिधि के निधन पर गहरा दुःख व शोक व्यक्त किया है.
पार्टी द्वारा जारी एक शोक संदेश में सुश्री मायावती जी ने करुणानिधि के परिवार के साथ-साथ उनके करोड़ों अनुयायियों को इस दुःख को सहन करने की शक्ति देने की कुदरत से प्रार्थना की है.
करुणानिधि को श्रद्धांजलि देते हुए सुश्री मायावती ने कहा कि ग़रीबों, किसानों, मज़दूरों व अन्य मेहनतकश अवाम के लिये आजीवन संघर्ष करते रहने वाले श्री करूणानिधि के निधन से तमिलनाडु को ही नहीं बल्कि देश को अपूर्णीय क्षति हुई है. वे देश की राजनीति में भी अपने योगदान के लिये हमेशा याद किये जाते रहेंगे.
पहले स्वतंत्रता सेनानी के तौर पर तिलका मांझी और उनके साथियों द्वारा अंग्रेजों के खिलाफ छेड़े गए युद्ध की आग आगे बढ़ चली थी. इसके बाद अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांति का बिगुल 1804 में बजा. छतारी के नवाब नाहर खां अंग्रेजी शासन के कट्टर विरोधी थे. 1804 और 1807 में उनके पुत्रों ने अंग्रेजों से घमासान युद्ध किया. इस युद्ध में जिस व्यक्ति ने उनका भरपूर साथ दिया वह उनके परम मित्र उदईया थे. हालांकि उदईया चमार के बारे में बहुत विस्तृत जानकारी नहीं है, लेकिन यह साफ है कि उनकी वीरता का लोहा अंग्रेज भी मानते थे. अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध में नवाब नाहर खां की ओर से लड़ते हुए उन्होंने अकेले ही सैकड़ों अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया. बाद में उदईया चमार पकड़े गए और उन्हें फांसी दे दी गई. उदईया की गौरव गाथा आज भी क्षेत्र के लोगों में प्रचलित हैं.
इसके बाद देश 1857 की क्रांति की ओर बढ़ चला था. 1857 की क्रांति ऐसी थी, जिसके बाद अंग्रेजों और भारतीयों के बीच लगातार सीधी लड़ाई लड़ी जाने लगी. 1857 की क्रांति को घोषित तौर पर पहला स्वतंत्रता संग्राम का युद्ध माना जाता है. भारतीय इतिहासकारों द्वारा इस पूरी क्रांति का श्रेय मंगल पांडे को दे दिया जाता है, लेकिन असल में इस क्रांति के सूत्रधार थे मातादीन वाल्मीकि.
मातादीन के पुरखे अंग्रेजी शासन में सरकारी नौकरी में रहे थे. अतः शीघ्र ही मातादीन को भी बैरकपुर फैक्ट्री में खलासी की नौकरी मिल गई. यहां अंग्रेज सेना के सिपाहियों के लिए कारतूस बनाए जाते थे. इन्हीं कारतूसों को तमाम हिन्दू सैनिक अपने मुंह से खिंचकर और बंदूकों में भरकर इस्तेमाल करते थे. अंग्रेजी फौज के निकट रहने के कारण मातादीन के जीवन पर उसका खासा असर पड़ा था.
मातादीन को पहलवानी का भी शौक था. वह इस मल्लयुद्ध कला में दक्षता हासिल करना चाहते थे, लेकिन अछूत होने के कारण कोई भी हिन्दू उस्ताद उन्हें अपना शागिर्द बनाने को तैयार नहीं होता था. आखिरकार मातादीन की मल्लयुद्ध सीखने की इच्छा पूरी हुई और एक मुसलमान खलीफा इस्लाउद्दीन जो पल्टन नंबर 70 में बैंड बजाते थे, मातादीन को मल्लयुद्ध सिखाने के लिए राजी हो गए. इसी मल्लयुद्ध कला की बदौलत ही मातादीन की जान-पहचान मंगल पाण्डे से हुई थी. लेकिन जल्दी ही मातादीन की जाति जानने के बाद उनके प्रति मंगल पांडे का व्यवहार बदल गया.
एक दिन गर्मी से तर-बतर, थके-मांदे, प्यासे मातादीन ने मंगल पाण्डे से पानी का लोटा मांगा. मंगल पाण्डे ने इसे एक अछूत का दुस्साहस समझते हुए उन्हें झिड़क दिया और कहा, ‘अरे भंगी, मेरा लोटा छूकर अपवित्र करेगा क्या?’ फिर क्या था, इस अपमान से जले मातादीन ने वो राज खोल दिया, जो सालों से दबा हुआ था, और जिसने 1857 की क्रांति की नींव रख दी. मातादीन ने मंगल पांडे को ललकार दिया और कहा कि पंडत, तुम्हारी पंडिताई उस समय कहा चली जाती है जब तुम और तुम्हारे जैसे चुटियाधारी गाय और सूअर की चर्बी लगे कारतूसों को मुंह से काटकर बंदूकों में भरते हो.’
यह सुनकर मंगल पांडे सन्न रह गया. जल्दी ही मातादीन की ये बात हर बटालियन और हर छावनी में फैल गई. मातादीन द्वारा कहे कड़वे सच ने सेना में विद्रोह की स्थिति बना दी. सारे हिन्दू सैनिक सुलग रहे थे. 1 मार्च, 1857 को मंगल पाण्डे परेड मैदान में लाईन से निकल कर बाहर आ गया और एक अधिकारी को गाली मार दी, जिसके बाद विद्रोह बढ़ता चला गया. इसके बाद मंगल पाण्डे को फांसी पर लटका दिया गया. मंगल पांडे को फांसी देने की बात सभी जानते हैं. लेकिन एक सच से तमाम लोग आज भी अंजान हैं. विद्रोह फैलाने के जुर्म में अंग्रेजों ने मातादीन को भी गिरफ्तार कर लिया था, जिसके बाद मातादीन को भी अंग्रेजों ने फांसी पर लटका दिया.
इस तरह मातादीन वाल्मीकि ने जो चिंगारी लगाई थी, आखिरकार वह चिंगारी सन् 1947 में भारत के आजाद होने की वजह बनी.
नई दिल्ली। पिछले साल यानी 2017 में बॉलीवुड ने ओम पुरी जैसे दिग्गज एक्टर को खो दिया. निधन से 6 महीने पहले तक ओम पुरी ने अपनी आखिरी फिल्म ‘लस्थम-पस्थम’ की शूटिंग की थी. यह फिल्म भारत-पाक संबंधों पर बनी है. फिल्म को लेकर ओम पुरी ने एक इंटरव्यू भी दिया था. जिसे उनका आखिरी इंटरव्यू कहा जा रहा है.
खबरों की मानें तो इस इंटरव्यू के एक हफ्ते बाद ही ओम पुरी का निधन हो गया था. फिल्म ‘लस्थम-पस्थम’ में ओम पुरी ने एक टैक्सी ड्राइवर का रोल निभाया है. फिल्म को लेकर ओम पुरी ने कहा था, ‘मेरा रोल अपने आप ही दर्शकों को एक खास मैसेज देगा. मानव ने इतनी अच्छी कहानी लिखी है. लोग इसे देखेंगे तो समझेंगे कि हम लोग बेफिझूल की लड़ाई लड़ रहे हैं.’
‘एक-दूसरे के लिए जबदरस्ती नफरत का भाव पैदा करने की कोशिश की जा रही है. सबसे बड़ी ट्रेजेडी ये थी कि कुछ ही समय में 10 लाख से ज्यादा लोगों की जिंदगी खत्म हो गई. जब विभाजन हुआ तो लोगों ने सोचा कि एक भाई बॉर्डर के इस तरफ रहेगा दूसरा उस तरफ. इसके बाद जब समय मिलेगा दोनों एक-दूसरे से मिल लिया करेंगे.’
‘ऐसा हो नहीं पाया. हालात बदतर होते चले गए. मेरा निवेदन है कि लोग ये फिल्म जरूर देखें और जो मैसेज मिल रहा है उसे समझने की कोशिश करें. विभाजन से दोनों मुल्कों के लोगों ने बहुत कुछ गंवाया है.’ बता दें कि यह फिल्म 9 अगस्त को रिलीज होगी.
नई दिल्ली। एक मछली ने मुंबई के दो मछुआरे भाइयों को एक ही दिन में लखपति बना दिया. शायद उन भाइयों को भी अंदाजा नही था कि उनकी किस्मत इस तरह बदलने वाली है. वह रोज की तरह पालघर समुद्रतट पर मछलियां पकड़ने गए थए और किस्मत से उनके जाल में घोल मछली फंस गई. जब वे मछली को बाजार में बेचने गए तो वह 5.5 लाख में बिकी. आस-पास के लोगों के अनुसार बहुत दिनों के बाद यहां किसी को घोल मछली मिली.
मुंबई का मछुआरा महेश अपने भाई के साथ शुक्रवार को मछली पकड़ने गया था. मुर्बे तट पर उनको अपना जाल भारी लगा. जब उन्होंने देखा तो पाया कि उनके जाल में घोल मछली फंसी थी. मछली का वजन लगभग 30 किलोग्राम था. महेश और उनके भाई द्वारा पकड़ी गई घोल फिश की खबर जंगल की आग की तरह फैल गई. सोमवार को मछली को बेचने के लिए बोली लगाई गई. मछली को खरीदने के लिए व्यापारियों की लंबी लाइन लगी थी. यह बोली बीस मिनट तक चली और और मछली को 5.5 लाख रुपये में एक व्यापारी ने खरीद लिया.
जानिए यह मछली क्यों खास हैं
घोल मछली खाने में स्वादिष्ट तो होती ही है. इस मछली में चमत्कारी औषधीय गुण पाए जाते हैं जिसके कारण पूर्वी एशिया में इसकी कीमत बहुत ज्यादा है. यहां तक कि घोल (ब्लैकस्पॉटेड क्रॉकर, वैज्ञानिक नाम प्रोटोनिबा डायकांथस) को ‘सोने के दिल वाली मछली’ के रूप में भी जाना जाता है. बाजार में अलग-अलग मछली की अलग-अलग कीमतें होती हैं. रविवार को मछुआरे महेश ने उसे सबसे ऊंची कीमत पर बेचा.
यह मछली मुख्यत: सिंगापुर, मलयेशिया, इंडोनेशिया, हॉन्ग-कॉन्ग और जापान में निर्यात की जाती है. घोल मछली जो सबसे सस्ती होती है उसकी कीमत भी 8,000 से 10,000 तक होती है.’ मई में भायंदर के एक मछुआरे विलियम गबरू ने यूटान से एक मंहगी घोल पकड़ी थी. वह मछली 5.16 लाख रुपये में बिकी थी.
घोल मछली का उपयोग दवाइयों और कॉस्मेटिक में भी
घोल मछली का उपयोग दवाई निर्माता कंपनी भी करती हैं. इसकी स्किन में उच्च गुणवत्ता वाला कोलेजन (मज्जा) पाया जाता है. इस कोलेजन को दवाओं के अलावा क्रियाशील आहार, कॉस्मेटिक उत्पादों को बनाने में प्रयोग किया जाता है. बीते कुछ वर्षों में इन सामग्री की वैश्विक मांग बढ़ रही है. यहां तक कि घोल का महंगा कमर्शल प्रयोग भी होता है. उदाहरण के तौर पर मछली के पंखों को दवा बनाने वाली कंपनियां घुलनशील सिलाई और वाइन शुद्धि के लिए इस्तेमाल करती हैं.
नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा रेपो रेट बढ़ाए जाने के बाद अब निजी क्षेत्र के HDFC बैंक ने विभिन्न परिपक्वता अवधि की मियादी जमाओं (एफडी) पर ब्याज दर 0.6 प्रतिशत तक बढ़ाई है. एचडीएफसी बैंक की वेबसाइट पर उपलब्ध सूचना के अनुसार संशोधित ब्याज दरें 6 अगस्त से लागू हो गई हैं. मियादी जमा पर ब्याज दरों में बढ़ोतरी से ऋण की ब्याज दरों पर भी दबाव बनेगा.
बैंक ने छह महीने से लेकर पांच साल की मियादी जमा पर ब्याज दरों में बढ़ोतरी की है. छह महीने से नौ महीने की मियादी जमा पर ब्याज दर 0.4 प्रतिशत बढ़ाकर 6.75 प्रतिशत की गई है.
9 महीने तीन दिन से लेकर एक साल से कम की जमा पर ब्याज दर 0.6 प्रतिशत बढ़ाई गई है. वहीं एक साल की मियादी जमा पर ब्याज दर 0.4 प्रतिशत बढ़ाकर 7.25 प्रतिशत की गई है.
दो साल एक दिन से लेकर पांच साल की मियादी जमा पर ब्याज दर 0.10 प्रतिशत बढ़ाई गई है. रिजर्व बैंक ने पिछले सप्ताह रेपो दर को 0.25 प्रतिशत बढ़ाकर 6.5 प्रतिशत किया था.
गौरतलब है कि RBI ने पिछले हफ्ते हुई मॉनिटरी पॉलिसी कमेटी की मीटिंग में रेपो रेट को 0.25 फीसदी बढ़ाकर 6.50 फीसदी किया था. HDFC बैंक की FD दरें बढ़ने के बाद अब कर्ज दरों में भी बढ़ोत्तरी होने की संभावना है.
जब भी देश की आजादी की बात होती है, उसके संघर्ष की बात होती है तो अक्सर उच्च वर्ग के लोगों के नाम सामने आते हैं. इतिहास के पन्ने पलटने पर भी दलित समाज को मायूसी ही लगती है. असल में एक सोची-समझी साजिश के तहत इतिहासकारों ने आजादी की लड़ाई के इतिहास से दलितों का नाम मिटा दिया. या फिर उनकी पहचान जाहिर नहीं की. शिक्षा के प्रसार के बाद अब इस समाज के लोग आजादी के अपने नायकों को ढूंढ़-ढूंढ़ कर सामने लाने लगे हैं.
अंग्रेजों की गुलामी से देश को आजाद कराने में न जाने कितने दलितों और आदिवासियों ने जान की बाजी लगा दी अपना लहू बहाया और शहीद हो गए. इतिहास के धुंधले पन्नों और इतिहासकारों को कुरेदने के बाद हम जिन्हें ढ़ूंढ़ सके, उनके योगदान को हम इस सामने लाने की कोशिश कर रहे हैं. आज से लेकर 15 अगस्त तक दलित दस्तक हर दिन आपको ऐसे नायकों की वीरगाथा सुनाएगा, जिन्होंने आजादी की लड़ाई में अपना खून बहाया.
आज की कहानी….. क्रांतिकारी तिलका मांझी, सिद्धु संथाल और गोची मांझी के बारे में…
वैसे तो देश की आजादी का पहला स्वतंत्रता संग्राम 1857 का माना जाता है लेकिन अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल 1780-84 में ही बिहार के संथाल परगना में तिलका मांझी की अगुवाई में शुरू हो गया था. तिलका मांझी को हम भारत का प्रथम स्वतंत्रता सेनानी कह सकते हैं.
1857 की क्रांति से लगभग सौ साल पहले स्वाधीनता का बिगूल फूंकने वाले तिलका मांझी को इतिहास में खास तव्वजो नहीं दी गई. तिलका मांझी वो नायक थें, जिन्होंने संथाल आदिवासियों द्वारा किए गए बहुचर्चित संथाल विद्रोह का नेतृत्व किया था. संथाल विद्रोह के दौरान उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर 1771 से लेकर 1784 तक 13 साल अंग्रेजों से लंबी लड़ाई लड़ी.
1778 में उन्होंने पहाड़िया सरदारों से मिलकर रामगढ़ कैंप को अंग्रेजों से मुक्त करवाया. 1784 में तिलका मांझी ने राजमहल के मजिस्ट्रेट क्लीवलैंड को मार डाला. इसके बाद महाराष्ट्र, बंगाल और उड़ीसा प्रांत में दलितों और आदिवासियों ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत शुरू कर दी. इस विद्रोह में अंग्रेजों से कड़ा संघर्ष हुआ जिसमें अंग्रेजों को मुंह की खानी पड़ी.
संथाल विद्रोह के लड़ाके सिद्धु संथाल और गोची मांझी के साहस और वीरता से अंग्रेज कांपते थे. इन दोनों का अलग से कोई विस्तृत इतिहास नहीं मिल सका है, लेकिन इन दोनों लड़ाकों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था.
जहां तक तिलका मांझी की बात है तो क्लीवलैंड को मार डालने के कारण अंग्रेज उनके पीछे पड़ गए. इसके बाद आयरकुट नाम के अंग्रेज अफसर के नेतृत्व में तिलका मांझी और उनके साथियों पर अंग्रेजी सेना ने जबरदस्त हमला कर दिया. कहा जाता है कि उस हमले में तिलका मांझी गिरफ्तार कर लिए गए थे. इसके बाद अंग्रेज उन्हें घोड़े से बांधकर घसीटते हुए भागलपुर ले आएं. इसके बावजूद भी वो जीवित रहे. अंग्रेज यह देखकर हैरान थे कि मिले घसीटे जाने के बावजूद वह जिंदा कैसे हैं.
आखिरकार 13 जनवरी 1785 को भागलपुर के चौराहे पर स्थित एक विशाल वटवृक्ष में लटका कर उन्हें फांसी दे दी गई. इतिहास द्वारा इस महान आदिवासी नायक की उपेक्षा का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा कि उनकी ऐसी कोई पेंटिंग तक उपलब्ध नहीं है, जिसे कृतज्ञ देशवासी सहेज सकें.
नई दिल्ली। 2019 का लोकसभा चुनाव किसी महायुद्ध से कम नहीं है. जिस तरह से तमाम दलों ने इसके लिए कमर कस ली है, वह युद्ध के आगाज के पहले की तैयारी सरीखी है. इस बीच कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों द्वारा प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित किए जाने की संभावना के बीच बसपा प्रमुख मायावती भी अपने किले को दुरुस्त करने में जुट गई हैं. इसके लिए बसपा अपने संगठन को बड़ा करने की तैयारी में है.
अपनी नई रणनीति के तहत पार्टी ने सभी वर्गों को जोड़ने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है. इसके साथ ही तमाम मंडलों की सीधी बैठक में बसपा प्रमुख मायावती ने साफ निर्देश दिया है कि हर जिले में 23 सदस्यों की बूथ कमिटियां जल्द बनाई जाएं. पिछले चुनाव तक इनकी संख्या पांच सदस्यों की थी. इसी तरह जिला को-आर्डिनेटर के स्थान पर अब सेक्टर स्तर के प्रभारी बनाए जा रहे हैं. इसमें एक अध्यक्ष, महामंत्री और कोषाध्यक्ष होंगे. कमिटी में सभी वर्गों को भागीदारी देने को कहा गया है. उसमें भी आधे युवाओं को जगह देने के निर्देश हैं.
दरअसल बीएसपी चीफ धीरे-धीरे गैर एनडीए दलों के बीच केंद्र में आ रही हैं. ऐसे में बीजेपी उनकी मजबूत घेराबंदी करना चाहती है, जिससे निपटने के लिए मायावती भी खुद को मजबूत करने में जुट गई है. मायावती लगातार दिल्ली में ही रहकर रोजाना प्रदेश के मंडलों की समीक्षा कर रही हैं.
तो वहीं बसपा प्रमुख का यह भी मानना है कि किसी जीत के लिए अनुशासन जरूरी है. यही वजह रही कि पिछले दिनों अनुशासनहीनता करने वाले कई नेताओं को पार्टी ने या तो बाहर का रास्ता दिखा दिया या फिर उनकी जिम्मेदारी बदल दी. अब संगठन स्तर पर पार्टी में बदलाव से बसपा कितनी मजबूत बनकर उभरती है, यह देखना होगा.
नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती ने एससी/एसटी विधेयक में संशोधन का स्वागत किया है. हालांकि इस दौरान उन्होंने एक नया मुद्दा उठाकर केंद्र सरकार और पीएम मोदी को मुश्किल में डाल दिया है. बसपा प्रमुख ने मोदी सरकार से गरीब मुसलमानों के लिए आरक्षण मांगा है. उन्होंने आर्थिक आधार पर अल्पसंख्यकों को आरक्षण दिए जाने की मांग का समर्थन करते हुए कहा है कि गरीब मुसलमानों के लिए भी आरक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए.
उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा अध्यक्ष मायावती ने कहा कि “यदि केंद्र सरकार उच्च जाति के गरीब लोगों को संविधान में संशोधन के जरिए आरक्षण देने के लिए कोई कदम उठाती है तो बीएसपी इसका सबसे पहले समर्थन करेगी. मुस्लिम व अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों में भी काफी गरीबी है. ऐसे में अगर केंद्र सरकार उच्च जाति के लिए कोई कदम उठाती है तो मुस्लिमों व दूसरे धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए भी आरक्षण की व्यवस्था की जानी चाहिए.”
इससे पहले एससी/एसटी एक्ट के पारित होने का श्रेय बसपा प्रमुख ने 2 अप्रैल को दलित समाज द्वारा किए गए भारत बंद को दिया. उन्होंने कहा कि दलितों ने जो भारत बंद बुलाया था, जिसमें बीएसपी कार्यकर्ताओं के साथ देश की जनता ने भाग लिया था, यह उसका असर है कि केंद्र को संशोधन बिल लाने के लिए मजबूर होना पड़ा. बसपा प्रमुख ने अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को भी इसका श्रेय दिया. इस दौरान केंद्र सरकार में शामिल दलित नेताओं को कठघरे में खड़ा करते हुए बसपा प्रमुख ने कहा कि जब 2 अप्रैल को आंदोलन किया गया था तो केंद्र सरकार के सभी दलित व आदिवासी मंत्री चुप्पी साधे हुए थे.
मायावती की मांग ने राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है. भाजपा जहां एससी/एसटी संशोधन बिल के जरिए दलित और पिछड़ा वर्ग आयोग के जरिए ओबीसी समाज को साधने की कोशिश कर रही थी, मायावती ने सवर्ण समाज के गरीबों और अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण की मांग उठाकर भाजपा और केंद्र के सामने मुश्किल खड़ी कर दी है.
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मामाजी वो कौन था ?
गांव का था।
दाल,चावल, आंटा,सब्जी, तेल मसाला और रूपए भी मामीजी ने क्यों दिए ?
नेग दिए हैं भांजे ।
नेग क्यों ?
तुम्हारे भाई की शादी है ।
भाई की शादी मे भीखारी को इतना नेग ?
तुम नहीं समझोगे शहर मे रहते हो भांजे ।
क्यों नहीं समझूंगा ? बताइये मामाजी ।
पत्तल लाया था।
फ्री में……?
नहीं तो ।।।।।
फिर इतना सारा राशन क्यों ?खाना खिला देना था।
बहुत गरीब है बेचारा।
खाना क्यों नहीं खिलाये, पूरा तो खाना खाया है।वह घंटों से गांजा पीता रहा।
हमारे घर का नहीं खाएगा।
क्यों …..?
हम लोग चमार हैं ना भांजे।
गलत मामा,चमार तो आदमियत के दुश्मनों ने बनाया है, हम लोग तो चंवरवंश से हैं।
हैं तो पर पाखंडी धर्म- जातिवादी नहीं मानते।
त्याग दो ऐसे धर्म को जहां समानता, मानवता नहीं । देखो भीखारी, गंदा बदबूदार, उसकी सांस संड़ाध मार रही थी,साथ मे खड़ा होने लायक न नहीं था,इतना सम्मान दिया, अपमान कर गया, चमार के घर का नहीं खाऊंगा कहकर चला गया।
भांजे जिनकी चूल्हा गरम की औकात नहीं होती, वही ज्यादा छूआछूत करते हैं।
कौन सी जाति का था वो बदबूदार आदमी ?
मेढक,कछुआ, चूहा का शिकार करने वाला मुसहर।
वो माय गांड मुसहर भी चमार से ऊंचा…….?
डां नन्द लाल भारतीRead it also-समाज
नई दिल्ली। पिछड़ा वर्ग यानि की ओबीसी समाज को अधिकार दिलाने की कवायद करने के उद्देश्य से गठित राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने के लिए इससे संबंधित विधेयक राज्यसभा में पेश हो गया. इससे पहले यह बिल लोकसभा में पारित हो चुका है. 123वां संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा से पास होने के बाद आज राज्यसभा में पेश हुआ.
सरकार की तरफ से बिल में कुछ संशोधन किए गए हैं जिसमें आयोग में महिला सदस्य को भी शामिल किया गया है. साथ ही राज्यों के अधिकारों में हस्तक्षेप को लेकर विपक्ष की शंका को भी दूर करने का प्रयास किया गया है. कांग्रेस ने भी राज्यसभा में इस बिल का समर्थन करने की बात कही है.
इस विधेयक के पारित होने के बाद सामाजिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गो के लिए राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग बनेगा. इस आयोग में एक अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और तीन अन्य सदस्य होंगे . इस प्रकार नियुक्त अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और अन्य सदस्यों की सेवा शर्तें एवं पदावधि के नियम राष्ट्रपति के अधीन होंगी. आयोग को अपनी स्वयं की प्रक्रिया निर्धारित करने की शक्ति होगी.
गौरतलब है कि 1993 में गठित पिछड़ा वर्ग आयोग अभी तक सिर्फ सामाजिक और शैक्षणिक आधार पर पिछड़ी जातियों को पिछड़े वर्गों की सूची में शामिल करने या पहले से शामिल जातियों को सूची से बाहर करने का काम करता था. इस विधेयक के पारित होने के बाद संवैधानिक दर्जा मिलने की वजह से संविधान में अनुच्छेद 342 (क) जोड़कर प्रस्तावित आयोग को सिविल न्यायालय के समकक्ष अधिकार दिये जा सकेंगे. इससे आयोग को पिछड़े वर्गों की शिकायतों का निवारण करने का अधिकार मिल जायेगा.
बता दें कि इस विधेयक को लेकर सरकार की तब किरकिरी हो गई थी जब पिछले वर्ष राज्य सभा में इस बिल पर विपक्ष का संशोधन पास हो गया था. लिहाजा सरकार की तरफ से बिल में कुछ संशोधन कर दोबारा पेश करना पड़ा. कांग्रेस पार्टी ने इस बिल का समर्थन किया है. आगामी चुनाव को देखते हुए इसकी आशंका बहुत कम है कि कोई दल इस बिल का विरोध करेगा.
नई दिल्ली। बिहार के मुज़फ्फरपुर जिले में 34 लड़कियों के साथ दरिंदगी का मामला अभी ठंड़ा भी नहीं पड़ा कि ऐसा ही एक मामला उत्तर प्रदेश से भी सामने आया है. उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक ने एक शेल्टर होम में छापा मार कर 24 लड़कियों को मुक्त कराया है. सूचना के मुताबिक इस शेल्टर होम को अवैध रूप से संचालित किया जा रहा था.
सोमवार की सुबह देवरिया के डीएम और एसपी पुलिस बल के साथ रेलवे स्टेशन रोड पर स्थित मां विंध्यवासिनी नामक शेल्टर होम पर छापे की कार्रवाई की. इस दौरान वहां 24 लड़किया मौजूद पाई गई. जिन्हें वहां से रेस्क्यू किया गया. बालिका गृह में रहने वाली सभी लड़कियां अलग अलग जिलों की रहने वाली हैं. पुलिस सभी से जानकारी ले रही है. अधिकारियों के मुताबिक देवरिया में यह शेल्टर होम अवैध तौर पर चलाया जा रहा था, जिसमें दो दर्जन लड़कियों को रखा गया था.
इस बालिका गृह के बारे में प्रशासन को पहले से ही जानकारी मिल गई थी. लेकिन कार्रवाई अब की गई. इसके बाद डीएम का तबादला कर दिया गया है. ऐसा तब है जब इस शेल्टर होम की मान्यता साल 2017 में ही निरस्त कर दी गई थी. यह भी पता चला है कि यहां से कई और लड़कियां लापता भी हैं. मामला सामने आने के बाद बहुजन समाज पार्टी ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया है. बसपा प्रमुख मायावती ने एक बयान जारी कर घटना की निंदा की है.
मीडिया को जारी अपने बयान में उन्होंने कहा कि-“बिहार की तरह ही उत्तर प्रदेश में देवरिया के नारी संरक्षण गृह में महिलाओं के शोषण व जबरदस्ती देह व्यापार का घिनौना काण्ड यह साबित करता है कि बीजेपी की सरकारों में कितनी ज्यादा अराजकता है. यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री ने भाजपा सरकार में महिलाओं की असुरक्षा को देश के लिए चिंता और शर्म की बात बताई. उन्होंने मांग किया है कि घटना की लीपापोती न कर के इस मामले में कठोर कानूनी कार्रवाई की जाए.”
हिन्दूवादी शक्तियों को हिन्दू धर्म से निरंतर अलग होते जा रहे दलित जातियों के लोगों के हितों की चिंता आज भी नहीं है, चिंता है तो बस इतनी कि हिन्दू धर्म से विघटित हुए लोगों को वापिस हिन्दू धर्म में कैसे मिलाया जाय. इस हेतु प्रत्येक स्तर पर विविध प्रकार से नापाक प्रयास किए जा रहे हैं. दलित वर्ग के लोगों को मन्दिरों में पुजारी बनाए जाए जाने के प्रयास जिनमें से मुख्य है. हिन्दूवादी शक्तियां पुजारी बनाए जाने वाले दलितों को हिन्दू धर्म से विघटित लोगों से संपर्क साधकर उन्हें पुन: हिन्दू धर्म में वापिस लाने का काम दिया जा रहा है.
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि आर एस एस और भाजपा भारत को हिन्दू राष्ट्र बना देना चाहते हैं और इसको साकार करने की रणनीति पर विचार करने के लिए यहाँ-वहाँ छोटे बड़े हिन्दू राष्ट्रवादी संगठन मीटिंग करते रहते हैं. आर एस एस और हिंदू महासभा से जुड़े हिंदू राष्ट्र बनाने के इस विचार में 1992 में बावरी मस्जिद गिराने के बाद एक नई जान सी पड़ी थी. केंद्र में मोदी सरकार बनने के साथ ही आर एस एस और भाजपा फुफकारने ही नहीं डसने भी लगे थी. और उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनवा कर संघ ने तरह-तरह के नए पुराने उग्र हिंदुत्ववादियों को पूरी तरह से बेलगाम कर दिया. तथाकथित हिंदू राष्ट्रवादी ये तत्व चाहते हैं कि भारत में हर किसी का खान-पान, पहनावा, रहन सहन और पूजा पद्धति आदि एक समान वैसा हो जैसा ये मानते और चाहते हैं. यह कहना तो मुश्किल है कि तरह-तरह के स्वाथोँ का प्रतिनिधित्व करने वाले ये हिंदू राष्ट्रवादी क्या कोई समान रणनीति बना पाएंगे, पर यह स्पष्ट है कि अपनी उग्र कार्रवाईयों के जरिए आम लोगों का ध्यान उनकी मूल समस्याओं से हटाने की कोशिश जरूर करते रहते हैं. विज्ञान एवं तकनीकी के वर्तमान युग में भी धार्मिक कट्टरपंथी अपना-अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए नित नए-नए तरीके तलाशने में लगे हैं. धर्म के नाम पर उग्रवाद का सहारा लेना भी आजकल नैतिक हो गया है. मन्दिर, मस्जिद, गिर्जाघर, गुरूद्वारे आदि का विवाद उठाना, लोगों की धार्मिक भावनाओं को भड़काना आदि इसी क्रम के आम कृत्य हैं. यही कारण है कि समय-समय पर धर्म परिवर्तन के मामले अक्सर प्रकाश में आते रहते हैं. एक आकलन के अनुसार पाया गया है कि हिन्दू धर्म ही सबसे ज्यादा विघटित हुआ है.
धर्म परिवर्तन का यह काम नया नहीं है. यह भी कि जब-जब भी धर्म परिवर्तन हुआ, तब-तब हिन्दुओं ने ही धर्म परिवर्तन किया. चाहे कोई ईसाई बना या सिख, चाहे कोई मुसलमान बना या बौद्ध…. वे सबके-सब हिन्दू ही रहे हैं. किंतु हिन्दू धर्म के ठेकेदारों को सदैव एक ही चिंता रही है कि उनके धर्म के लोग दूसरे धर्म में जा रहे हैं. उन्हें इसकी चिंता कभी नहीं रही कि ये लोग हिन्दू धर्म छोड़कर दूसरे धर्मों में क्यों जा रहे हैं. जब हिन्दू समाज के दलित वर्ग के लोग हिन्दू धर्म छोड़कर कोई दूसरा धर्म ग्रहण करते हैं तो हिन्दू धर्म के नेता खूब हो-हल्ला मचाते हैं. वस्तुत: दलित वर्ग के लोग दूसरा धर्म इसलिए ग्रहण करते हैं कि वे अच्छीे तरह समझ गए है कि हिन्दू धर्म में रहते उन्हें न तो सामाजिक-आर्थिक समानता मिलेगी और न ही भौतिक अत्याचारों से मुक्ति.
भारतवर्ष एक ऐसा देश है जिसके समाज में गहरा अलगाव रहा है क्योंकि भारतीय जनसमूह में अलग-अलग प्रकार की अनेक जातियां व धर्म हैं. सबकी आर्थिक, धार्मिक एवं सामाजिक स्थिति अलग-अलग हैं. हिन्दू धर्म में व्यापक जाति-भेद ही हिन्दू धर्म के निरंतर विघटन का मूल कारण कहा जाएगा. स्पृश्य हिन्दू और अस्पृश्य हिन्दू के बीच की सामाजिक असमानता ने धर्म परिवर्तन में और चार चाँद लगाए हैं. कितना अफसोसनाक सत्य है कि एक हिन्दू एक गैर-हिन्दू के प्रति मुख्यत: हिन्दूपन की भावना से व्यवहार करता है किंतु अपने ही धर्म की दूसरी जाति के हिन्दू के प्रति जाति-भावना से व्यवहार करता है. अन्य धर्मों के मुकाबले, हिन्दू धर्म अध्यात्मिकता अर्थात रूढ़ीवादिता को अधिक प्राथमिकता देता है. उल्लेखनीय है कि भारत में हिन्दू धर्म जाति-प्रथा के पोषक तत्वों में प्रमुख हैं. हिन्दू धर्म ने श्रमिक वर्ग को अभावों भरा धर्मान्ध जीवन ही दिया है. फलत: पूंजीवादी वर्ग पूंजी के माध्यम से बिना किसी श्रम के धनी बना है और श्रमिक वर्ग सिर पर धर्मान्धता का ताज पहन कर पूंजी से वंचित धर्म के बल पर जीवन चलाता है. पूंजीवादी वर्ग न केवल शासक है अपितु श्रमिकों का नाना प्रकार से शोषण करता रहा है. जगजाहिर है कि जातिगत अत्याचारों के चलते धर्म परिवर्तन की गति को बल मिल रहा है. इससे हमें यह याद आता है कि डा. अंबेडकर को अंततः धर्म द्वारा वैध ठहराई गई जातिप्रथा से बचने के लिए, हिन्दू धर्म का ही त्याग करना पड़ा था. आज भी दलित धर्म-परिवर्तन करने में अपनी मुक्ति देखते हैं.
उल्लेखनीय है कि धार्मिक अधिकारों पर संघ परिवार का पूरा पहरा है. जानना होगा कि हिन्दू धर्म के स्वंभू हिन्दू धर्मरक्षक धर्मांतरण को तो मुद्दा बनाते हैं लेकिन जाति पर आधारित शोषण-दमन, भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार जैसे मसले उनकी नजर में कोई समस्या नहीं हैं. धर्मांतरण की इन घटनाओं के तटस्थ विश्लेषण से यह साफ़ हो जायेगा कि दूसरा धर्म ग्रहण करने वाले ज्यादातर लोग हिंदू समाज की दलित-वंचित जातियों के या फिर गरीब आदिवासी रहे हैं. ऊंची और दबंग जाति के लोग इनके साथ जानवरों सा बर्ताव करते हैं. दलित और वंचित जातियों को समाज में हर जगह भेदभाव का सामना करना पड़ता है.
गौरतलब है कि हिन्दूवादी शक्तियों को हिन्दू धर्म से निरंतर अलग होते जा रहे तथाकथित निम्न जातियों के लोगों के हितों की चिंता आज भी नहीं है, चिंता है तो बस इतनी कि हिन्दू धर्म से विघटित हुए लोगों को वापिस हिन्दू धर्म में कैसे मिलाया जाय. इस हेतु प्रत्येक स्तर पर विविध प्रकार से नापाक प्रयास किए जा रहे हैं. दलित वर्ग के लोगों को मन्दिरों में पुजारी बनाए जाए जाने के प्रयास जिनमें से मुख्य है. हिन्दूवादी शक्तियां पुजारी बनाए जाने वाले दलितों को हिन्दू धर्म से विघटित लोगों से संपर्क साधकर उन्हें पुन: हिन्दू धर्म में वापिस लाने का काम दिया जा रहा है.
उदाहरणार्थ दैनिक जागरण (राष्ट्रीय संस्करण) 05.08.2018 के अनुसार हाल फिलहाल इसकी कमान अनुसूचित जाति से आने वाले महामंडलेश्वर कन्हैया प्रभुनंद गिरि को सौंपी गई है. महामंडलेश्वर कन्हैया प्रभुनंद गिरि धर्म बदलने वाले के संपर्क में है और दावा है कि अनुसूचित जातियों के लोग कुम्भ में ‘घर वापसी’ करेंगे. जागरण संवाददाता, इलाहाबाद के अनुसार, ‘भय, लोभ अथवा उपेक्षा के चलते अतीत में दूसरा धर्म अपनाने वाले अनुसूचित जाति के लोग कुंभ में पुन: हिन्दू धर्म में वापसी करेंगे. धर्मातरण करने वाले लोगों की हिन्दू धर्म में वापसी के लिए जूना अखाड़ा देशभर में संपर्क अभियान चला रहा है. इसकी कमान अनुसूचित जाति से आने वाले महामंडलेश्वर कन्हैया प्रभुनंद गिरि को सौंपी गई है. वह ईसाई, बौद्ध व मुस्लिम धर्म अपनाने वाले लोगों से मिलकर उन्हें धार्मिक, सामाजिक संरक्षण देने का दिलासा देकर पुन: हिन्दू धर्म में आने के लिए प्रेरित कर रहे हैं. कन्हैया के संपर्क में आकर धर्मातरण करने वाले 340 लोग हिन्दू धर्म में लौटने को तैयार हैं. इसमें 185 बौद्ध, 125 ईसाई व बाकी मुस्लिम हैं. सबसे अधिक 140 लोग पूर्वाचल के हैं. मध्य प्रदेश के 40, गुजरात के 34, पंजाब के 46, महाराष्ट्र के 80 लोग भी ऐसा कर सकते हैं.
अखबार में यह भी दावा किया गया है, ‘कुंभ में दूसरा धर्म ग्रहण करने वाले अनुसूचित जाति के लोगों का संगम तट पर मुंडन कराकर स्नान कराया जाएगा और कुछ को ‘महामंडलेश्वर’ भी बनाया जाएगा. महिलाओं का मुंडन नहीं होगा, उन्हें सिर्फ स्नान करना होगा. फिर सामूहिक पूजन कराकर हिन्दू धर्म में वापसी कराई जाएगी. कन्हैया प्रभुनंद बताते हैं कि अनुसूचित जाति के कुछ महात्मा लंबे समय से हिन्दू धर्म का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं. अखाड़ा उन्हें ‘महामंडलेश्वर’ बनाकर सम्मानित करेगा. ऐसे आठ महात्मा हैं, जिनमें अनुसूचित जाति की तीन महिलाएं शामिल हैं. हिन्दू धर्म अपनाने वाले लोगों को तुलसी का पौधा, गीता की पुस्तक, रुद्राक्ष की मालाएं भी भेंट की जाएंगी. साथ ही हिन्दू धर्म के तीज-त्यौहार, संस्कार पर आधारित पुस्तक भी देंगे, जिससे वह खुद धर्म से जोड़ सकेंगे. महामंडलेश्वर कन्हैया प्रभुनंद गिरि कहते हैं कि हिन्दू एक रहें, जाति-भेद में न बंटें, यह मुहिम तेज होगी. उन्हें काफी धनाढ्य लोग भी मिले जो बौद्ध, ईसाई व मुस्लिम बने हैं. उन्हें जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करके प्रताड़ित किया जाता था. ऐसे लोगों को वह पूरा सहयोग देंगे, जो उन्हें प्रताड़ित करेगा उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई कराई जाएगी.’
इस प्रकार के प्रयोग केरल में पहले ही किये जा चुके हैं. यह दलितों को सम्मान देने का कार्य नहीं अपितु कुछ लोगों को पुजारी बनाकर ब्राहम्णवाद की पुनर्स्थापना का षड़यत्र है. कमाल तो ये है कि कुछ ब्राह्मणवादी शक्तियां तो दलितों को पुजारी बनाकर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं और कुछ इसके विरोध में कार्य करते हैं. नवंबर 2017 की खबर है कि केरल में दलित कार्यकर्ताओं और पुजारी बनाए गए दलितों पर प्राणघातक हमलों की खबरें अब आम हो गई हैं. अनेक पुजारी ऐसे हैं जो जाति से तो दलित किंतु व्यवहार से केवल और केवल ब्राहम्णवादी ही हैं. यहाँ कहना अतिश्योक्ति न होगा कि उन्होंने वेदों का अध्ययन तो किया किंतु ब्राहमणवाद की हकीकत को जानने का कोई प्रयास नहीं किया. यहाँ सवाल उठता है कि ऐसे दलित पुजारियों को दलित कैसे माना जाए. यूं तो केरल में आए दिन दलितों पर हमले और उनकी हत्या करने के मामले सामने आते रहते हैं. किंतु इसका किसी भी स्तर पर कोई प्रतिरोध देखने को नहीं मिलता. प्रतिरोध हो भी कैसे जो लोग अपने ही घर वालों के विरोध में काम करते हैं, उनका समर्थक हो भी कौन सकता है.
त्रावणकोर देवास्वोम भर्ती बोर्ड (टीडीआरबी) ने 36 गैर-ब्राह्मणों को पुजारी के पद पर चुना गया था जिनमें से छह दलित समुदाय के थे. हालांकि राज्य में गैर-ब्राह्मण भी पुजारी बनते रहे हैं लेकिन इनमें से ज्यादातर को छोटे-मोटे मठ-मंदिरों या निजी धार्मिक स्थलों में पूजा-पाठ की जिम्मेदारी ही मिलती है. पैसा कमाने वाले मन्दिरों में नहीं. इस प्रकार कहा जा सकता है कि इस प्रकार की कवायद जाति-प्रथा के उन्मूलन की दिशा में नहीं, अपितु ब्राहम्णवाद को जिन्दा रखने की दिशा में की जाती हैं. दरअसल, राजनीति के साथ-साथ इस प्रकार के घटिया प्रयोग धार्मिक क्षेत्र में भी खूब देखने को मिल रहे हैं. दुख की बात तो ये है कि दलित जातियों के लालची और नाम की महत्त्वाकांक्षा रखने वाले लोग ऐसे प्रलोभनों में फंसकर अपने ही वर्ग के लोगों को छलने का काम संभाल रहे हैं. इस प्रकार की नापाक गतिविधियां राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में सर्वत्र देखने को मिल रही हैं.
किंतु मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं कि आज का दलित और दमित समाज मन्दिर में प्रवेश करने और पूजा करने की मांग कतई नहीं करता, अब तो केवल ब्राह्मणवादी ताकतें गरीब और निरीह लोगों को जानपूछ कर मन्दिरों तक ले जाना चाहते हैं. कारण है कि देश का अधिकतर दलित और दमित बाबा साहेब डा. अम्बेडकर का अनुयायी है और किसी प्रकार की भी हिन्दुवादी सोच से निजात पाना चाहता है. दलितों को पुजारी बनाने या मन्दिरों में प्रवेश कराने की मुहिम ये सिद्ध करती है कि दलितों को अम्बेडरवादी सोच से अलग-थलग करना है. हिन्दूओं की चाल है कि यदि किसी दलित को मन्दिर में पुजारी बना दिया जाए तो दलितों का एक बड़ा वर्ग मन्दिरों में आना–जाना शुरु कर देगा और इस प्रकार डा. अम्बेडकर का बुद्ध धम्म को अपनाने का विषय ठंडा ही नहीं, दूर की कौड़ी हो जाएगा.
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10 मार्च 2007 वह मनहूस दिन था ,जब मेरे दो पत्रकार साथियों ( अब्दुल हमीद बागवान और योगेंद्र सिंह पंवार ) को भीलवाड़ा पुलिस द्वारा कईं गंभीर धाराओं में दर्ज कराए गए एक मुकदमे में गिरफ्तार कर लिया. मुझे सुबह सुबह तत्कालीन जिला कलेक्टर से यह जानकारी मिली ,यह हैरत करने वाली जानकारी थी ,क्योंकि उस शाम तक मैं अपने दोनों साथियों के साथ ही था ,मेरे निकलने के 1 घण्टे बाद ही यह घटनाक्रम घटित हो गया.
एफआईआर में आरोप लगाया गया कि सुनील जैन और अभिषेक जैन नामक दो व्यवसायियों को बैंक जाते वक्त योजनाबद्ध तरीके से एक घर मे बुलाकर महिलाओं के साथ मिलकर उनके अश्लील फोटो खींचकर उनसे 1लाख रुपये मांगे गये, उनका मोबाइल छीन लिया गया और उनकी सोने की चैन तथा नकदी लूट ली गई. एफआईआर में भादस की धारा 395,384,292 तथा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67 और महिलाओ का अशिष्ट रूपण प्रतिषेध अधिनियम की धारा 4/7 लगाई गई.
अपनी लेटलतीफी के लिये कुख्यात पुलिस ने इस मामले में बहुत तेजी दिखाई और मुकदमा दर्ज होते ही आरोपियों को तुरंत गिरफ्तार कर लिया, भीलवाड़ा जिले का मीडिया इतना उतावला था कि अपने ही साथियों के लिए सीरीज में कहानियां चटकारे ले ले कर प्रकाशित करता रहा.
दरअसल सब कुछ पूर्वनियोजित था ,पुलिस ने यह पटकथा पहले से ही रच रखी थी ,जिसको लोकदिखावे के लिए महज मंचित करना था और उसे किया गया ,एक दलित और एक मुस्लिम समुदाय से आने वाले दो निडर पत्रकारों को रंजिशन फंसाकर 9 माह 3 दिन जैल में रखा गया ,11 साल केस चला और अंततः 18 जुलाई 2018 को अदालत ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया ,इस बीच एक पत्रकार योगेंद्र सिंह पंवार की मृत्यु हो गई, वो जीतेजी अपनी बेगुनाही साबित नहीं कर पाये. भारतीय राज्य और उसकी पूर्वाग्रह से पीड़ित शासन प्रशासन व्यवस्था वंचित समुदाय के लोगों के साथ किस तरह का सुलूक करती है ,किस तरह से उनको बदनाम करती है ,फंसाती है और कईं साल तक अदालती कार्यवाही में डाल कर उनकी ज़िंदगी बर्बाद कर देती उसका जीवंत उदाहरण यह केस है .
कौन थे ये पत्रकार?
भीलवाड़ा शहर की पत्रकारिता में सक्रिय अब्दुल हमीद बागवान दैनिक हिंदुस्तान का लाल अखबार के प्रधान संपादक है और योगेंद्र सिंह पंवार दैनिक नवज्योति के फोटो जर्नलिस्ट थे ,खतरों से खेलकर खबरें प्रकाशित करने वाले बेख़ौफ़ पत्रकार ! तत्कालीन पुलिस और अपराधियों के गठजोड़ को निरन्तर उजागर कर रहे थे ,सूचना के अधिकार से सूचनाएं लेकर उनका विश्लेषण करके अपने समाचार पत्रों में उसको उजागर करने वाले जाबांज़ कलम के सिपाही.
पुलिस महकमा, माफिया तो इनसे खफा थे ही, खबरनवीस बिरादरी भी इनसे नाखुश थी ,एक तो निडर लोग,चाटूकारिता से दूर,लौहा लेने वाले ,दूसरा दलित मुस्लिम समुदाय से आने वाले ,मनुस्ट्रीम मीडिया के आंखों की भी किरकिरी बन गये, नतीजा यह हुआ कि उनको सबक सिखाया गया, ऐसे मुकदमे में फंसा कर जिसकी इन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी .
एक झूठ रचा गया, जो इस तरह था -” भीलवाड़ा निवासी व्यवसायी सुनील जैन और अभिषेक जैन 10 मार्च 2007 को करीब 8 बजे मोटरसाइकिल से ट्रांसपोर्ट नगर से बैंक जा रहे थे कि आजादनगर में एक औरत ने खिड़की से आवाज़ दी कि मेरे किवाड़ की कुंडी खोल दो ,इंसानियत के नाते उन्होंने मोटरसाइकिल रोक कर कुंडी खोल दी तो उस औरत ने उनको अंदर बुला लिया, वे दोनों औरत से बात कर रहे थे कि बाहर से किसी औरत ने दरवाजा बंद कर दिया,इतने में मकान से चार औरतें और दो पुरुष निकले ,जिन्होंने उनके अश्लील फोटो खींच लिए,बैग से 14950 रुपये और 23 ग्राम सोने की चैन तथा मोबाइल लूट लिया और 1 लाख रुपयों की मांग की “
पुलिस ने इस मामले में थाना प्रतापनगर में एक एफआईआर 127/2007 दर्ज कर आरोपियों को गिरफ्तार कर अनुसंधान किया ,शिनाख्त ,फर्द जब्ती और जुर्म प्रमाणित मानकर चालान न्यायालय में पेश किया .
11 साल चले इस केस का निपटारा करते हुए अदालत में सामने आया कि इस प्रकरण के फरियादी अभिषेक जैन और सुनील जैन के बयानों में ही विरोधाभास है,वे जिस महिला की आवाज़ पर कुंडी खोलना बता रहे हैं, कॉल डिटेल यह जाहिर करती है कि उक्त महिला को फरियादी पहले से न केवल जानते थे ,बल्कि बात भी करते थे, उस दिन भी उनकी बात हुई थी ,शिनाख्तगी से पहले सभी आरोपियों को फरियादी को पुलिस ने थाने में दिखाया, उनके नाम पते बताये, फिर शिनाख्त की कार्यवाही की गई. दोनो पत्रकारों से पुलिस नाराज थी ,इसलिए उनको इस प्रकरण में जबरन घसीटा गया ,इतना ही नहीं बल्कि मोबाइल में अश्लील क्लिपिंग के मामले में पुलिस कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पाई ,न ही अब्दुल हमीद बागवान की तरफ से उक्त क्लिपिंग को अन्यत्र भेजने या उसका प्रकाशन ,मुद्रण करने की बात सामने आई ,यहां तक कि फरियादियों से कोई राशि मांगे जाने का तथ्य भी साबित नहीं हुआ है .
इतना ही नहीं बल्कि इस केस की फ़ास्ट ट्रेक कोर्ट में शीघ्र सुनवाई के लिए पुलिस ने स्पेशल केस ऑफिसर की भी नियुक्ति की ,उसी की निगरानी में गवाहों के बयान कराये गये ,लेकिन झूठ तो आखिर झूठ ही होता है ,उसके पांव बड़े कमजोर होते है ,इसलिए वह ज्यादा दिन चल नहीं पाता है ,अंतत गवाह मुकर गये ,वे जिरह में टिक नहीं पाये और उन्होंने इस फंसाने वाली कहानी की सच्चाई उगल दी.
अंततः न्यायालय अपर सेसन न्यायाधीश संख्या 3 भीलवाड़ा ( राज) ने अपने फैसले में कहा कि -” ऐसी स्थिति में जब अब्दुल हमीद द्वारा उन अश्लील क्लिपिंग को कहीं अन्य जगह नहीं भेजा गया या उनका किसी रूप में प्रकाशन ,विक्रय ,परिचालन नहीं किया गया है तो धारा 292 आईपीसी ,धारा 4/7 महिलाओं का अशिष्ट रूपण तथा सूचना प्रोद्योगिकी अधिनियम की धारा 67 के अंतर्गत दोषी ठहराया जाना उचित प्रतीत नहीं होता है ,प्रकरण की विवेचनानुसार अभियोजन पक्ष अभियुक्तगण के विरुद्ध आरोपित अपराध युक्तियुक्त संदेह से परे साबित करने में असफल रहा है ,अतः अभियुक्तगण को संदेह का लाभ देकर दोषमुक्त घोषित किया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है.
9 महीने जी जेल ,मीडिया के अपने ही साथियों द्वारा क्रमबद्ध तरीके से की गई बदनामी और 11 साल की न्यायिक सुनवाई की लंबी प्रक्रिया से गुजर कर अब्दुल हमीद बागवान और योगेंद्र सिंह पंवार दोषमुक्त हो गये है ,इस बीच बहुत कुछ गुजर चुका है, योगेंद्र पंवार अपनी बेगुनाही की खबर सुनने को दुनिया में ही मौजूद नहीं है और अब्दुल हमीद बागवान पत्रकारिता की दुनिया को अलविदा कहकर कन्सट्रक्शन की दुनिया में चले गये है .
दो साथी जो कलम की ताकत से ,सूचना के अधिकार की शक्ति का प्रयोग करते हुए पत्रकारिता के ज़रिए दुनिया को बदलने निकले थे ,उनके साथ कानून और व्यवस्था ने कैसा खेल खेला,किस तरह उनकी जिंदगियों को बर्बाद किया ,किस तरह ब्लैकमेलिंग ,अश्लीलता ,लूट के कलंक का टीका उनके ऊपर अधिरोपित किया ,यह सोचकर रूह कांपती है ,फिर भी अब्दुल हमीद बागवान ने हिम्मत नहीं हारी ,योगसा के दुनिया से चले जाने के बाद भी न्याय की उम्मीद में लड़ते रहे . जब भी मिलते कहते रहे कि -” अपनी बेगुनाही का फैसला एक दिन दुनिया के सामने रखकर बता दूंगा कि हम निर्दोषों को जबरन फंसाया गया ,ताकि हम पत्रकारिता छोड़ दें , हम आरटीआई का उपयोग न करें ,अन्याय अत्याचार के खिलाफ नहीं बोलें ,पर हम एक दिन जीत कर दम लेंगे “
अंततः उन्होंने कर दिखाया,अपनी बेगुनाही साबित कर दी ,उनको फंसाने वाले ज्यादातर पुलिसकर्मी रिटायर्ड हो चुके है ,कुछेक को उनके किये की सज़ा मिल चुकी है, कुछ को मिलनी बाकी है . सबसे दुखद पहलू यह है कि गिरफ्तारी और जैल के वक़्त जिन जिन समाचार पत्रों ने बेहद उत्साहित होकर उनके विरुद्ध धारावाहिक कहानियां छापी ,वे अब इस दोषमुक्ति के फैसले पर एक भी लाईन छापने को तैयार नहीं है ,भारत के दलित अल्पसंख्यक विरोधी मीडिया का दोगलापन इस प्रकरण में साफ साफ नजर आता है,जिसकी भर्त्सना की जानी चाहिए .
कुलमिलाकर इस निर्णय को पढ़कर मुझे व्यक्तिगत रूप से बेहद सुकून मिला है, मैं उम्मीद करता हूँ कि अब्दुल हमीद बागवान जैसा झुझारू,निडर कलम का धनी पत्रकार पुनः पत्रकारिता की दुनिया को प्यार करेगा .
(लेखक दलित,आदिवासी, घुमन्तू और अल्पसंख्यक समुदाय के मुद्दों पर राजस्थान में सक्रिय हैं )
नई दिल्ली। साल 2005 में दलित उद्यमियों को एक मंच पर लाने और आपस में जुड़कर एक ताकत बनने की चाह में उभरे दलित उद्यमियों के संगठन डिक्की में दो फाड़ हो चुका है. संगठन के हरियाणा और उत्तर प्रदेश के फाउंडर प्रेसिडेंट सुभाष सिंह ग्रोवर और आर.के सिंह ने डिक्की से अलग होकर अपना अलग संगठन बना लिया है. इस संगठन का नाम Developing Indian Chamber of Commerce & Industry North रखा गया है, जिसका शार्ट नाम DICCI होता है. इसके अध्यक्ष डिक्की के पूर्व यूपी प्रेसिडेंट आर.के सिंह हैं जबकि उपाध्यक्ष हरियाणा के फाउंडर प्रेसिडेंट सुभाष सिंह ग्रोवर हैं.
अन्य पदाधिकारियों में लक्ष्मी जनरल सेक्रेट्री और विपिन कुमार ट्रेजरार हैं. अशोक कुमार और सोबेस सिंह संस्था के सदस्य हैं. नई संस्था के अध्यक्ष आर.के सिंह ने डिक्की पर कई आरोप लगाए हैं. उन्होंने डिक्की द्वारा नार्थ इंडिया के उद्यमियों की अनदेखी करने का आरोप लगाया. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि डिक्की की कागज पर डिक्की की स्थापना 2005 में नहीं बल्कि 2014-15 में हुई है. उन्होंने चुनौती दी कि अगर यह गलत है तो डिक्की यह कह कर दिखाए.
DICCI MEMBER
इस बीच डिक्की की स्थापना से ही उसके मेंटर के तौर पर जुड़े चंद्रभान प्रसाद ने “दलित दस्तक” से बातचीत में बताया कि डिक्की से अलग होने वाला यह कोई पहले लोग नहीं है. पहले कई अन्य लोग भी डिक्की छोड़कर अलग संगठन बना चुके हैं. उन्होंने तमाम नाम गिनाते हुए कहा कि डिक्की के तमाम पुराने सदस्य डिक्की छोड़कर जा चुके हैं. उन्होंने कहा कि वह भी काफी पहले डिक्की से अलग हो चुके हैं.
एससी/एसटी एक्ट पर अपने पैर पीछे खिंचने को मजबूर हुई केंद्र सरकार ने पिछड़े वर्ग की ताकत को भी मान लिया है. शायद यही वजह है कि सरकार एक विधेयक लाकर पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने को तैयार हो गई है. लेकिन सवाल उठता है कि 2 अप्रैल के आंदोलन के पहले एससी/एसटी एक्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका डालने से करताने वाली सरकार अचानक इस मसले पर अध्यादेश क्यों ले आई. तो इसी तरह मंडल कमीशन की सिफारिश का जमकर विरोध करने वाली भाजपा अचानक ओबीसी समुदाय पर इतनी मेहरबान क्यों है?
जाहिर है कि सरकार का यह कदम देश की तकरीबन 80 फीसदी आबादी की ताकत को अपने पाले में लाने की एक बड़ी कोशिश है, जिसे वह दूर जाते देख रही है. क्योंकि अगर ऐसा न होता तो यह फैसला तब न लिया जाता जब देश चुनाव की देहड़ी पर खड़ा है.
सरकार की इसी रणनीति पर विपक्षी दल सवाल उठाने लगे हैं. पिछड़ा आयोग पर फैसला आते ही उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा प्रमुख मायावती ने सरकार पर सवाल उठाया है. उन्होंने इसे राजनैतिक लाभ के लिए उठाया गया कदम बताया है. बसपा अध्यक्ष का कहना है कि पिछड़े वर्ग को लुभाने के लिए सरकार पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने का विधेयक लाई है. उन्होंने भाजपा पर तंज कसते हुए कहा है कि-
देश के करोड़ों दलितों व आदिवासियों की तरह ही अन्य पिछड़े वर्गों (ओ.बी.सी.) का भी राजनीति, शिक्षा, रोज़गार, न्यायपालिका आदि के क्षेत्र में हर स्तर पर उनके हकों से वंचित रखने का प्रयास करने वाली बीजेपी अब लोकसभा व हिन्दी भाषी प्रमुख राज्यों में विधानसभा आमचुनाव के समय में इनको छलना चाहती है. यह उनकी चुनावी स्वार्थ की राजनीति के सिवाय कुछ भी नहीं है. इस मामले में लगभग पिछले सवा चार साल तक सरकार क्यों सोती रही?
हालांकि बसपा प्रमुख ने संसद में लाये गये इस विधेयक का स्वागत किया है. लेकिन इस दौरान उन्होंने यह कह कर भी सरकार को घेरने की कोशिश की है कि भाजपा को दलितों व आदिवासियों के संवैधानिक व कानूनी हक को लगातार नकारने, इनके ऊपर जुल्म-ज्यादती करते रहने की नीयत व नीति को त्याग देना चाहिए. साथ ही पिछड़े वर्ग के लोगों के हित व कल्याण के मामले में भी बीजेपी सरकारों को थोड़ी गंभीरता व ईमानदारी अवश्य दिखानी चाहिये. राजनीति के साथ-साथ शिक्षा व सरकारी नौकरियों में इनके आरक्षण के कोटा को खाली रखकर इनका हक नहीं छीनना चाहिये और सभी स्तर पर इनको आरक्षण का लाभ सुनिश्चित करना चाहिये.
जाहिर है कि एक तरफ सरकार दलितों और पिछड़ों को लुभाने के लिए ऐसे फैसले ले रही है तो वहीं विपक्ष इन फैसलों के पीछे सरकार की मंशा की पोल खोलने में लग गया है. इसका फायदा किसे मिलेगा, यह चुनाव के नतीजे बताएंगे.
काले सावले वर्ण का, दुबला-पतला, लगभग 5 फीट ऊंचे अण्णाभाऊ साठे के शब्दों और आवाज में वो करश्मिाई जादू था, जिसे सुनने के बाद आम लोगों के रगों में लहर दौड़ पड़ती थी. अण्णा भाऊ महाराष्ट्र की सर जमी पर 1 अगस्त 1920 में सांगली जिले के वाटेगांव में अनुसूचित जाति में पैदा हुए थे. अण्णा बचपन में काफी शरराती हुआ करते थे.
उनके पिता जी भाऊ साठे मुंबई में अंग्रजों के घर पर माली का काम करते थे. गांव मे अण्णा के साथ उनके भाई-बहन और माँ रहती थी. दुसरे बच्चों की तुलना में अण्णा काफी होशियार और नटखट थे. अण्णा के पिताजी जब छुट्टी के दौरान एक बार उनके गांव आयें, तब उनकी माँ ने अण्णा का स्कूल में दाखिला कराने की सलाह दी. अण्णा स्कूल तो गए, लेकिन अनुसूचित जाति के होने के कारण उनके गुरूजी ने उन्हें पहले ही दिन जमकर डांट लगाई थी. जैसे-तैसे वे दूसरे दिन स्कूल गए लेकिन दूसरे दिन भी डांट मिलने पर वापस स्कूल से भाग आएं और उसके बाद उन्होंने स्कुल का कभी मुंह नहीं देखा.
इधर देशभर में अंग्रजों के खिलाफ आंदोलन तीव्र होता जा रहा था. दूसरी ओर अंग्रजों ने भी अपने घर पर काम कर रहे भारतीय नौकरों को कम कर दिया था. इसी के चलते अण्णा के पिताजी भाऊ की नौकरी छुट गई. भाऊ वापस वाटेगांव लौटे तो उस साल गांव में सूखा पड़ा था. परिवार पहले ही सूखे के कारण दुख की मार झेल रहा था, उसमे भाऊ की नौकरी छिन गई थी. अण्णा के पिताजी ने परिवार के सभी सदस्यों को लेकर मुंबई जाने की ठान ली.
जेब मे पैसे नही थे. गांव-दर-गांव में रूक-रूक कर जो भी काम मिलता था. उसे कर परिवार आगे की राह पकड़ता था. ऐसे भटकते हुए पूरा परिवार पुना तक आ पहुंचा. पुणे के बाहरी इलाकों में इस समय पत्थर तोड़ने के काम में काफी मजदूर लगते थे. किसी ठेकेदार ने उन्हें बहला फुसला कर कि पत्थर तोड़ने के काम में बड़ा पैसा मिलता है, यह कहकर लेकर गया. दिन भर पत्थर तोड़ने के बाद रात को भर पेट खाना भी नसीब नहीं होता था. ऐसे हालात में अण्णा की तबीयत दिन-प्रतिदिन कमजोर होती जा रही थी. मां-पिता देखते लेकिन, कुछ कर नहीं सकते थे. एक रात पूरा परिवार इस जगह से भाग निकला. जैसे तैसे मुबंई में पहुंचा, यहां पर भी उन्हें एक जल्लाद ठेकेदार ने पत्थर तोड़ने के काम पर लगा दिया. इस जगह तो सुरक्षा के लिए तगड़े-तगड़े पहलवान भी रखे थे. यहां एक दिलदार पठान था.
कुछ दिन काम करने के बाद इस पठान से अण्णा की दोस्ती हो गई. यहां से भागने के लिए पठान ने साठे परिवार की मदद की थी. वाटेगांव से लेकर मुंबई की इस भयानक यातनामय यात्रा ने अण्णा के मन पर गहरी चोट की. उसके बाद मुंबई में चेंबुर, मांटुगा, कुर्ला, दादर, की झुग्गियों में स्थानांतरित हुए, काम की तलाश में घुमते रहे, उसके बाद रिश्तेदार के साथ कपड़े बेचने के काम की शुरूआत की.
अण्णा के गांव से ही ताल्लुक रखने वाले अनुसूचित जाति के व्यक्ति से परिचय बढ़ा. उसे पढ़ना लिखना आता था, यह जानकर अण्णा को बहुत आश्चर्य हुआ. इसके बाद अण्णा ने भी ठान लिया कि मुझे भी पढ़ना है. वे रोज काम के बाद दोस्त के घर कॉपी-कलम लेकर जाया करते थे. एक ही महीने में उन्होंने काफी कुछ सीख लिया. बाद में जो हाथ में मिलता था उसे ही पढ़ते रहते थे. यह समय लगभग 1942 के आस-पास का था. मुंबई में कहीं, स्वातंत्र्य आंदोलन की लड़ाई चल रही थी, तो कहीं जाति-भेद की लड़ाई चल रही थी. इस सभी माहौल में हमेशा से ही कामगार, मजदूर, गरीब, पीड़ित लोग पीसे जाते थे. इन सारी घटनाओं का असर भी अण्णा पर हो रहा था. इस समय वह कपड़ा मील में काम किया करते थे. कपड़ा मील में मजदूर युनियन से भी उन्हें काफी नई-नई विचारधारा की जानकारी मिल रही थी. जिसमें समता, बंधुत्व की भी बात कही जाती थी. मिल यूनियन में काफी एकजुटता दिखाई पड़ती थी. इस सब बात का चिंतन-मनन दिमाग चलता रहता था.
अण्णा के मौसरे भाई की नाटक मंडली थी. अण्णा कभी-कभी इस मंडली में काम किया करते थे. मुंबई में अण्णा साठे तथा दो और लोक गायकों ने मिलकर ‘लालबटवा’ नामक कलापथक शुरू किया था. इस पथक के तहत उन्होंने कई कार्यक्रम पेश किये. 1945 में मुंबई के शिवाजी पार्क पर लोगों को जागृति करने का बड़ा जलसे का कार्यक्रम आयोजित किया गया था. इस वक्त स्फूर्ति शाली गीतों से उन्होंने लोगों के दिलों में घर बना लिया. और यहां से वो लोक नाटक के जनक बन गये. हाशिए के लोगों की बात वह कहने लगे थे.
भारत-पाकिस्तान विभाजन के वक्त ‘पंजाब-दिल्ली दंगा’ पर एक प्रदीर्घ लोक-गीत की रचना की. इस गाने से बिंदु से सिंधू का स्वाद पता चलता है. इस पर से अण्णा की सोच का पता चलता है. देश भर के तत्कालीन महत्वपूर्ण मुददों पर उन्होंने लोक-गीत लिखे थे, जो आज भी बड़े चाव से गाये और सुने जाते हैं. अण्णा भाऊ साठे ने अपने लेखन की अमिट छाप समाज पर छोड़ी. साथ ही उन्होंने कथा लेखन, नाटक, प्रवासवर्णन, सिनेमा की कथा, उपन्यास लिखा. केवल दो दिन स्कूल जानेवाले अण्णा भाऊ साठे ने अपनी अद्वितिय बुद्धि कौशल, निरक्षण तथा स्वानुभव से नया इतिहास गढ़ा. उनके इस काम की कद्र महाराष्ट्र शासन ने भी उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित कर के दिया. इसके अलावा उनके लिखे गये लोक गीत रशियन भाषा मे भी प्रसिद्ध हुए. उनका रशिया में खास सत्कार किया गया.
कथा संग्रह: चिराग नगर के भूत (चिरागनगरची भुतं), कृष्णा किनारे की कथा (कृष्णाकाठाच्या कथा), जेल में (गजाआड), नई-नवेली (नवती), पागल मानुष्य (पिसाळलेला माणूस), फरारी, भानामती, लाडी, खुळंवाडी, निखारा, बरबाघ्या कंजारी, गु-हाळ, आबी
नाटक लेखन: इनामदार, पेग्यां की शादी (पेग्यांचे लगीन), सूलतान,
लोकनाटक: तमाशा (नौटंकी), दिमाग की काहणी (अकलेची गोष्ट), खाप-या चोर, देशभक्त घोटाले (देशभक्त घोटाळे), नेता मिल गया (पुढारी मिळाला), बिलंदर पैसे खाने वाले (बिलंदर बुडवे), मौन मोर्चा (मूक मिरवणूक), मेरी मुंबई (माझी मुंबई), शेटजी का इलेक्शन (शेटजीचे इलेक्शन), सुखे में तेरवा महिलना (दुष्काळात तेरावा), कायदे के बिना (बेकायदेशीर), लोकमंत्री, महाराष्ट्र की लोक कला लावणी (लावणी), गीत, महाराष्ट्र में लोक गायन का प्रकार पोवाडा (पोवाडे),
प्रवासवर्णन: मेरा रशिया की यात्रा (माझा रशियाचा प्रवास)
मराठी फिल्मी (चित्रपट)-कथा: फकीरा, ऐसी यें सातारा की करामत (अशी ही साता-याची त-हा), तिलक लागती हू रक्त से (टिळा लाविते मी रक्ताचा), पहाडों की मैना (डोंगराची मैना), मुरळी मल्हारी रायाची, वारणे का बाघ (वारणेचा वाघ), बारा गाव का पाणी (बारागावे पाणी)
अंजु निमसरकर-कांबलेसुचना अधिकारीमहाराष्ट्र सूचना कार्यालय (महाराष्ट्र शासन)9899114130
आदिवास अधिकार यात्रा के दौरान जायस प्रमुख डॉ. हीरा अलावा
भोपाल। मध्यप्रदेश की राजनीति में अपना हिस्सा हासिल करने के लिए आदिवासी युवाओं ने मुहिम शुरू कर दी है. आदिवासी समाज के बीच तेजी से उभरते जय आदिवासी युवा शक्ति संगठन यानि ‘जयस’ ने अपने समाज के लोगों को जागरूक करने के लिए आदिवासी अधिकार यात्रा शुरू कर दिया है. इस यात्रा के जरिए जयस 21 फीसदी आदिवासी आबादी को साधने की तैयारी में है.
हालांकि इससे पहले सीएम शिवराज सिंह चौहान जन आशीर्वाद यात्रा लेकर निकले हैं तो कांग्रेस जनजागरण अभियान चला रही है लेकिन आदिवासी युवाओं की इस यात्रा ने कांग्रेस और भाजपा दोनों की नींद उड़ा दी है. प्रदेश भर के आदिवासी समाज को संबोधित करने वाली आदिवासी अधिकार यात्रा 29 जुलाई को रतलाम से शुरू हो चुकी है, जो मालवा और निमाड़ की आदिवासी सीटों से होती हुई महाकौशल पहुंचेगी. इस दौरान यात्रा आदिवासी प्रभाव वाली सभी 47 सीटों या आसपास से गुजरेगी. यह संगठन पिछले लंबे समय से 5वीं अनुसूची के मसले पर आदिवासियों को जोड़ने में लगा है. झाबुआ, अलिराजपुर, धार, बड़वानी, खरगौन व खंड़वा के आदिवासी अंचलो में संगठन की गहरी पैठ है.
इस संगठन की कमान आदिवासी हकों की खातिर एम्स की नौकरी छोड़ देने वाले 35 साल के डॉ. हीरा अलावा के हाथ में है. यह संगठन प्रदेश में आरक्षित सभी 47 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने या फिर दूसरों को समर्थन देने को तैयार है. संगठन की नजर उन 50 सीटों पर भी है, जहां आदिवासी समाज का 20 फीसदी से ज्यादा वोट है.
इस यात्रा के जरिए जयस की मांग यूं है-
5वीं अनुसूचि के सभी प्रावधानों को सख्ती से लागू किया जाए.
वन अधिकार कानून 2006 के सभी प्रावधानों को धरातल पर लागू किया जाए.
जंगल में रहने वाले आदिवासियों को स्थायी पट्टा दिया जाए.
ट्राइबल सब प्लान के पैसे अनुसूचित क्षेत्रों की समस्याओं को दूर करने में खर्च हों
वर्तमान में आदिवासी क्षेत्र की 47 सीटों में 32 पर बीजेपी और 15 पर कांग्रेस का कब्जा है. जयस को अपने समर्थकों को वहां से अपने खेमे में लाने की चुनौती होगी. लेकिन इस संगठन के दावे को इसलिए हल्के में नहीं लिया जा सकता क्योंकि पिछले साल अक्टूबर में हुए छात्र संघ के चुनावों में धार जिले के छात्र परिषद में उसके नौ अध्यक्ष और 162 सदस्य जीतकर आए थे. अगर जयस और उसके नेता आदिवासी समाज को अपनी बात समझाने में सफल रहे तो मध्यप्रदेश की राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है.
पटना। बिहार के मुजफ्फरपुर में बालिका गृह में नाबालिग बच्चियों के साथ हैवानियत की घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है. मामला सामने आने के बाद नीतीश कुमार जहां रक्षात्मक हैं तो वहीं तेजस्वी यादव हमलावर. इस मामले में बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और लालू यादव के बेटे तेजस्वी यादव ने नीतीश सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. घटना के विरोध में तेजस्वी यादव ने देशव्यापी धरना-प्रदर्शन का आह्वान किया है. तेजस्वी ने एक ट्विट कर 4 अगस्त को दिल्ली के जंतर-मंतर पर जुटने का आवाह्न किया है.
राजद नेता ने कहा है कि बिहार के साथ-साथ दिल्ली के जंतर पर बालिका गृहों में यौन शोषण की घटनाओं के मद्देनजर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से जवाब की मांग को लेकर 4 अगस्त को धरना-प्रदर्शन करेगी. आज शुक्रवार को तेजस्वी यादव ने ट्वीट किया, ‘ एक आवाज़ ऐसी उठाई जाए जिसका शोर आने वाली पीढ़ियों की आत्माओं को झकझोरती रहे। हमारी आने वाली नस्लें ये ना कहें कि हमारे पूर्वज कायर और नामर्द थे. मुज़फ़्फ़रपुर के ‘बालिका गृह’ में बेटियों के साथ हुई हैवानियत के विरोध में विशाल धरना एवं कैंडल मार्च, 4 अगस्त, 5:30 बजे, जंतर-मंतर.
तेजस्वी यादव का ट्विट
तेजस्वी ने इसे नीतीश कुमार सरकार की नाकामी बताया है. तेजस्वी यादव ने आरोप लगाया कि सीएम नीतीश कुमार के राज में पूरे राज्य में कानून व्यवस्था चरमरा गई है. तेजस्वी यादव ने मुज़फ्फ़रपुर बालिका रेप गृह कांड के मुख्य संरक्षक ब्रिजेश ठाकुर के साथ लालू यादव की फोटो को लेकर भी अपनी बात रखी. उन्होंने कहा कि फोटों काफी पुरानी है. उन्होंने कहा कि यह फोटों 1990 के आस-पास की है, जब ब्रिजेश ठाकुर एक रिपोर्टर था. उस समय यह एनजीओ नहीं खुला था. पूर्व उपमुख्यमंत्री ने कहा कि यह फोटों इसलिए फैलाई जा रही है ताकि पूरे मामले से लोगों का ध्यान हटाया जा सके. वहीं दूसरी ओर इस पूरे मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने खुद संज्ञान लेते हुए केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस भेजा है.
श्रीनगर। जम्मू कश्मीर में तैनात सेना के जवान औरंगजेब की आतंकियों द्वारा हत्या से आहत मुस्लिम युवकों ने आतंकियों से इसका बदला लेने की बात ठान ली है. इसके लिए सउदी में नौकरी कर रहे तकरीबन 50 युवा नौकरी छोड़कर भारत लौट आए हैं. इनका अब एक ही मकसद है, सेना में शामिल होकर आतंकियों से औरंगजेब की मौत का बदला.
जम्मू-कश्मीर में बीते 14 जून को सेना के जवान औरंगजेब की आतंकियों ने हत्या कर दी थी. यह घटना दक्षिणी कश्मीर के सलानी गांव में तब हुई थी जब औरंगजेब छुट्टी लेकर ईद मनाने घर जा रहे थे. इस घटना ने पूरे देश को सकते में डाल दिया था. ऐसा लगता है कि इस घटना का असर दूर तक होता दिखाई दे रहा है. मोहम्मद किरामत और मोहम्मद ताज उन 50 लोगों में शामिल हैं जो सऊदी अरब से अपनी नौकरी छोड़ आ कर अब पुलिस और सेना में भर्ती होना चाहते हैं ताकि राइफलमैन औरंगजेब की हत्या का बदला दे सकें.
मोहम्मद किरामत ने बताया, ‘जैसे ही भाई औरंगजेब की हत्या की खबर सुनी हमने उसी दिन सऊदी अरब छोड़ दिया. हमने जबरदस्ती करके नौकरी छोड़ी. हमने किसी तरह से ये सब कुछ मैनेज किया. गांव के 50 युवक हमारे साथ वापस आ गये. हमारा अब एक ही मकसद है औरंगजेब की मौत का बदला.’
सतारा (महाराष्ट्र)। एक आठ महीने की गर्भवती महिला के साथ आठ लोगों द्वारा सामूहिक दुष्कर्म की विभत्स घटना हुई है. घटना महाराष्ट्र के सांगली जिले में सतारा की है. यह घटना मंगलवार की सुबह छह बजे हुई, जब 20 वर्षीय महिला अपने पति (होटल मालिक) के साथ तासगांव के तुर्चि फाटा में एक कारोबारी मीटिंग के लिए आई थी. मामले को गंभीरता से लेते हुए महाराष्ट्र राज्य महिला आयोग ने गुरुवार को स्थानीय पुलिस से रिपोर्ट मांगी है.
तासगांव पुलिस स्टेशन के एक अधिकारी के मुताबिक महिला और उनके पति अपने होटल के कामकाज के लिए एक कर्मचारी की तलाश कर रहे थे. आरोपी मुकुंद माने ने महिला के पति को फोन पर कर कहा कि वह एक ऐसे दम्पति को जानता है जो उनके लिए काम करने को राजी है और उसने इन दोनों को तुर्चि फाटा बुलाया. माने ने उन्हें 20,000 रूपये एडवांस लाने के लिए भी कहा.
जब होटल कारोबारी और उनकी पत्नी बताए हुए स्थान पर पहुंचे तब माने ने अपने साथियों के साथ मिलकर दोनों के साथ मारपीट की और महिला के गहने छीन लिए. इसके बाद पति को गाड़ी के अंदर बंधक बनाकर महिला के साथ बलात्कार किया. महिला ने एफआईआर में आठ में से चार आरोपियों मुकुंद माने, सागर, जावेद खान और विनोद का नाम दर्ज कराया है. घटना के लगभग 48 घंटे बाद भी पुलिस किसी को गिरफ्तार नहीं कर सकी है.