अब छत्तीसगढ़ में दलित शब्द के इस्तेमाल पर रोक

छत्तीसगढ़ में सरकारी और गैर सरकारी रिकार्डों में दलित शब्द लिखने पर पाबंदी लगा दी गई है. सरकार ने बाकायदा आदेश जारी कर दलित के स्थान पर जाति का उल्लेख करने का निर्देश दिया है. राज्य में विधानसभा चुनाव के ठीक पहले जारी हुए इस आदेश को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री रमन सिंह की सोशल इंजीनियरिंग का हिस्सा करार दिया. पार्टी का दावा है कि यह सर्कुलर नहीं बल्कि एक शिगूफा है.

सरकार ने जारी किया सर्कुलर

छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले राज्य सरकार ने यह सर्कुलर जारी कर अनुसूचित जाति वर्ग के एक बड़े समुदाय को साधने की कोशिश की है. केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए राज्य सरकार ने सभी सरकारी दस्तावेजों में दलित शब्द के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है. छत्तीसगढ़ शासन के सामान्य प्रशासन विभाग ने राज्य के सभी सरकारी विभागों को निर्देशित करते हुए कहा है कि यह शब्द संविधान में नहीं है. इसलिए इसका प्रयोग ना हो. राज्य के गठन के पहले संयुक्त मध्यप्रदेश के दौर में तत्कालीन सरकार ने 10 फरवरी 1982 को नोटिफिकेशन जारी कर हरिजन शब्द पर रोक लगाई थी.

इस शब्द के इस्तेमाल पर सजा का भी प्रावधान किया गया, लेकिन दलित शब्द के प्रयोग पर कितनी सजा का प्रावधान होगा यह स्पष्ट नहीं है. बताया जाता है कि मुख्यमंत्री रमन सिंह के निर्देश के बाद सामान्य प्रशासन विभाग ने इस परिपत्र को जारी कर सभी विभागों को दिशा-निर्देश दिए है. इसके उल्लंघन पर सजा के प्रावधान पर विचार किया जा रहा है.

मुख्यमंत्री रमन सिंह के मुताबिक कांग्रेस ने दलितों को जो सम्मान कभी नहीं दिया. वो बीजेपी के सत्ता में आने के बाद उनकी पार्टी दे रही है. उन्होंने कहा कि दलित शब्द से यह समाज आहत है. इसलिए इस पर पाबंदी लगाई गई है. इससे अनुसूचित जाति वर्ग के सम्मान में और वृद्धि होगी.

अनुसूचित जाति की आबादी बढ़ी

छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जाति वर्ग की आबादी वर्ष 2011 के जनगणना के लिहाज से 12 फीसदी थी. अंदाजा लगाया जा रहा है कि 2018 में इसमें 3 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है. राज्य में अनुसूचित जाति वर्ग के लिए कुल 90 में से 10 सीटें आरक्षित हैं. इसमें से 9 सीटों पर बीजेपी काबिज है. जबकि एक सीट पर कांग्रेस का कब्जा है.

लिहाजा, दलित शब्द के इस्तेमाल पर रोक लगाकर राज्य की बीजेपी सरकार ने इस बड़े वर्ग को अपने खेमे में बनाए रखने की हरसंभव कोशिश कर रही है. राज्य की बीजेपी सरकार ने अनुसूचित जाति वर्ग के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं बरसों से जारी है, लेकिन यह वर्ग महसूस करता था कि सरकारी दस्तावेजों में दलित शब्द उनके सम्मान का हनन करता था. इसलिए इस शब्द को निकाल बाहर फेंका जाए.

सीएम रमन सिंह ने अपने तीसरे कार्यकाल के अंतिम दौर में दलित शब्द को बाहर का रास्ता दिखाकर इस वर्ग को बीजेपी के भीतर बनाए रखने के लिए फौरन आदेश जारी कर दिया.

कांग्रेस ने कहा, यह वोटबैंक की राजनीति

उधर, बीजेपी सरकार का यह फैसला कांग्रेस को रास नहीं आ रहा. उसका मानना है कि रमन सिंह की यह शिगूफे वाली एक चाल है, जो वोट बैंक के खातिर चली गई है. पार्टी के मुताबिक विधानसभा चुनाव के चंद रोज पहले लिए गए इस फैसले का औचित्य सिर्फ वोट बैंक की राजनीति को हवा देना है. कांग्रेस उपाध्यक्ष रमेश वार्लियनि के मुताबिक बीजेपी ने यह नया शिगूफा छोड़ा है. उन्होंने आरोप लगाया कि 15 सालों में कभी भी बीजेपी को अनुसूचित जाति वर्ग का सम्मान नजर नहीं आया. अभी विधानसभा चुनाव आ गया तो पार्टी इस वर्ग के सम्मान को लेकर चिंतित हो रही है. उन्होंने कहा कि यह रमन सिंह की सोची समझी सोशल इंजीनियरिंग है, लेकिन बीजेपी को इसका फायदा नहीं होने वाला.

छत्तीसगढ़ में इसी साल अक्टूबर-नवंबर माह में होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर बीजेपी और कांग्रेस आमने-सामने है. कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने के साथ-साथ पार्टियां उन जाति, समुदाय और धर्म के लोगों को भी सक्रिय करने में जुट गई हैं, जिन वर्गों का वोट थोक के भाव उनकी झोली में गिरता है.

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हरियाणा में 20 अगस्त को फिर हिन्दू धर्म छोड़ेंगे दलित

भाटला के दलितों ने 20 अगस्त को गांव में ही गुरु रविदास मंदिर में बौद्ध धर्म ग्रहण करने का ऐलान किया है. उन्होंने मिर्चपुर कांड जैसी घटना की संभावना जताते हुए हांसी के एसपी से मुलाकात कर सुरक्षा व्यवस्था की मांग की है. भाटला दलित संघर्ष समिति के प्रधान बलवान सिंह ने बताया कि उनके गांव में पिछले एक साल से गांव के दलितों का स्वर्ण समाज के लोगों ने सामाजिक बहिष्कार किया हुआ है. उन्होंने कहा कि सामाजिक बहिष्कार के लिए ही गांव के ही एक समुदाय कुछ लोगों की गठित भाईचारा कमेटी जिम्मेदार है. समिति ने आरोप लगाया कि पुलिस उनका बहिष्कार करने वाले लोगों से मिली हुई है. उन पर कार्रवाई करने की बजाय पीड़ितों पर केस दर्ज कर रही है. गांव के ही दलित राजकुमार भाटला ने बताया कि पिछले एक साल से जारी सामाजिक बहिष्कार के कारण उन लोगों को बहुत परेशानी हो रही है.

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एससी/एसटी और ओबीसी छात्रों को नीतीश कुमार ने दिया बड़ा तोहफा

पटना। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मंगलवार को अनुसूचित जाति ((एससी)/अनुसूचित जनजाति एसटी), दलितों और ओबीसी छात्रों के लिए बड़ा ऐलान किया. उन्होंने कहा कि एससी/एसटी, दलित और ओबीसी समुदाय के छात्र अगर बिहार पब्लिक सर्विस कमिशन (बीपीएससी) की प्रारंभिक परीक्षाएं (पीटी) पास करता है तो सरकार की तरफ प्रत्येक छात्र को 50 हजार रुपए दिए जाएंगे. अगर मुख्य परीक्षा पास करता है तो एक लाख रुपए दिए जाएंगे.

उधर हाल ही में संसद के मानसून सत्र के दौरान राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आयोग को संवैधानिक दर्जा देने से संबंधी संविधान संशोधन विधेयक को लोकसभा ने दो तिहाई से अधिक बहुमत के साथ सर्वसम्मति से मंजूरी दे दी. सदन ने राज्यसभा द्वारा विधेयक में किए गए संशोधनों को निरस्त करते हुए वैकल्पिक संशोधन तथा और संशोधनों के साथ ‘संविधान (123वां संशोधन) विधेयक, 2017’ पारित किया.

बिहार के मुजफ्फरपुर में शेल्टर होम में रह रहे बच्चियों के साथ हुए बलात्कार के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लगातार विपक्ष के निशाने पर हैं. इस घोषणा के बाद उन्हें राहत महसूस हो रही होगी. क्योंकि हो सकता है प्रदेश के एससी, एसटी, दलित और ओबीसी का युवा वर्ग उनके इस घोषणा से सीएम का विरोध करना छोड़ दे.लेकिन बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने सीएम नीतीश पर हमला तेज किए हुए हैं. उन्होंने कहा है कि इस मामले में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बड़े अधिकारियों को बचा रहे हैं. साथ ही उसने कहा नीतीश जी, ‘आप सब दोष दूसरों पर मढ़ते हैं. छोटे कर्मचारियों को फंसाते हैं. बड़े अधिकारियों को बचाते हैं क्योंकि उन्हें नहीं बचाया तो वो आपकी सारी पोल खोल देंगे.’

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प्रधानमंत्री जी बलात्कार राक्षसों की नहीं आपके देवताओं की प्रवृति रही है!

प्रधानमंत्री ने लाल किले से कहा कि बलात्कार राक्षसी प्रवृति है, जबकि डॉ.आंबेडकर ने अपनी किताब हिंदू धर्म की पहेलियों में हिंदू धर्मशास्त्रों और पुराणों के हवाले से बताया है कि ब्रह्मा, विष्णु और तीनों ने मिलकर सती अनसूया के साथ सामूहिक बलात्कार किया था. उन्होंने यह भी लिखा है कि ब्रह्मा ने अपनी बेटी के साथ ही बलात्कार किया. अहिल्या और अन्य महिलाओं के साथ बलात्कार करने वाला इंंद्र आपका सबसे बड़ा देवता है. प्रधानमंत्री जो मनु आपके के आदर्श हैं, वे शूद्र समाज की महिलओं के साथ बलात्कार के पक्ष में खड़े हैं.

प्रधानमंत्री जी आपको यह भी पता होगा कि आपके महानायक वीरसावरकर मुस्लिम महिलओं का साथ बलात्कार को वीरतापूर्ण कार्य मानते हैं. इसके उलट प्रधानमंत्री जी जिन अनार्य राजाओं को आप राक्षस कहते हैं, उनमें से कोई भी बलात्कारी नहीं था. रावण सीता के अपने पास रखे रहे, लेकिन उन्होंने उन्हें स्पर्श तक नहीं किया. प्रधानमंत्री जी हिंदू संस्कृति का गुणगान करते आप नहीं थकते उसके देवत बलात्कार की संस्कृति के वाहक रहे हैं, राक्षस नहीं.

डॉ.आंबेडकर ने अपनी किताब हिंदू धर्म की पहेलियां ( बाबा साहब डॉ. आंबेडकर संपूर्ण वाग्मय खंड-8 ) के भाग-एक की पन्द्रहवीं पहेली के परिशिष्ट-3 में ब्रह्मा, विष्णु और महेश के बलात्कारी चरित्र की ओर चर्चा की है. आंबेडकर ने लिखा, “ तीनो देव ( ब्राह्मा, विष्णु और शिव ) सती ( अनसूया ) का शील-हरण करने अत्रि (ऋषि ) की कुटिया की ओर चल पड़े. इन तीनों ने ब्राह्मण भिक्षुओं का वेष धारण किया. जब वे वहां पहुंचे, अत्रि बाहर गए हुए थे. अनसूया ने उनका स्वागत किया और उनके लिए भोजन तैयार किया.” इन तीनों ने उनसे निर्वस्त होने को कहा. आंबेडकर विस्तार से पूरी कथा सुनाते हैं. अंत में आंबेडकर की टिप्पणी इस प्रकार है, “इस कहानी में अनैतिकता की दुर्गंध भरी पड़ी है और उसके अंत को जान-बूझकर ऐसा मोड़ दिया गया है, जिसमें ब्रह्मा, विष्णु,महेश के उस वास्तविक कुकर्म पर पर्दा डाल दिया जाय.” ( पृष्ठृ173-174 ). आंबेडकर ब्राह्मा द्वारा अपनी बेटी वाची के साथ बलात्कार की मानसिकता की भी चर्चा करते हैं.’’(पृ.177)

मनुस्मृति भी ब्राह्मणों को गैर-ब्राह्मण स्त्रियों के साथ बलात्कार के लिए प्रोत्साहित करती हुई लगती है.

मनुस्मृति में जहां एक ओर शूद्र वर्ण के किसी व्यक्ति द्वारा ब्राह्मण की स्त्री के साथ व्यभिचार करने पर शूद्र को प्राण दंड का आदेश देती है-

अब्राह्मण: संग्रहणे प्राणान्तं दण्डमर्हति. चतुर्णामपि वर्णानां दारा रक्ष्यतमा: सदा.. (8.359 )

वहीं यदि ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र वर्ग की किसी स्त्री के साथ व्यभिचार करता है तो उसे केवल पांच सौ पर्ण का आर्थिक दंड देना होगा-

अगुप्ते क्षत्रियावैश्ये शूद्रा वा ब्राह्मणो व्रजन् . शतानि पच्च दण्ड्य: स्यात्सहस्रं त्वन्त्ज्यस्त्रियम्..(8.385 )

को भी व्यक्ति इस बात की कल्पना कर सकता है जिस धर्म-संस्कृति के आदर्श नायक किसी भी महिला के साथ बलात्कार को जायज ठहराते हों, या खुद ही बलात्कारी हों और जिनके धर्मग्रंथ किसी खास जाति की महिला के साथ बलात्कार को बहुत छोटा अपराध मानते हो, वह देश कैसै होगा, इस देश के लोग कैसे होंगे, उस कौम की मानसिकता कैसी होगी?

बलात्कार को वीरतापूर्ण और शौर्यपूर्ण कार्य कार्य मानते थे, संघ-भाजपा के आदर्शनायक विनायक दामोदर सावरकर. उन्होंने अपनी किताब सिक्स ग्लोरियस इकोज ऑफ इंडियन हिस्ट्री में इस बात के पक्ष में तर्क दिया है कि, क्यों मुस्लिम महिलाओं के साथ बलात्कार जायज है. वे इतने पर ही नहीं रूकते हिंदुओं को ललकारते हुए कहते हैं कि “ यदि अवसर उपलब्ध हो तो ऐसा न करना कोई नैतिक या वीरतापूर्ण काम नहीं है,बल्कि कायरता है”.(See Chapter VIII of the online edition made available by Mumbai-based Swatantryaveer Savarkar Rashtriya Smarak). उनकी यह किताब 1966 में मराठी में प्रकाशति हुई थी. उसका अंग्रेजी में अनुवाद उपलब्ध है. हम सभी जानते हैं कि सावरकर संघ-भाजपा के सबसे बड़े आदर्श नायकों में एक हैं. अपनी इस किताब में उन्होंने विस्तार इस बात का विवरण दिया है कि मुस्लिम आक्रांताओं ने हिंदू महिलाओं का अपहरण किया था, उन्हें मुसलमान बनाया था और उनके साथ बलात्कार किया था, इसलिए हिंदुओं को भी ऐसा ही करना चाहिए.

अपनी इस किताब में सावरकर साफ-साफ सीख दे रहे हैं कि अवसर मिलने पर हिंदुओं को मुस्लिम महिलाओं के साथ जरूर बलात्कार करना चाहिए. यह उनका नैतिक धर्म है और एक वीरतापूर्ण कार्य है.इस तथाकथित नैतिकता और वीरता का परिचय हिंदूवादी ‘वीरों’ ने अनेक दंगों में दिया है. गुजरात और मुजफ्फर नगर के दंगे इसके सबसे घृणित उदाहरण हैं. कठुआ की मासूम लड़की के साथ बलात्कार का हिंदुवादियों द्वारा समर्थन सावरकर के बताये रास्ते पर चलने का सिर्फ एक कदम है.

1-Savarkar’s Sanction to Use Rape as Political Weapon ( News clik )

2- Reading Savarkar: How a Hindutva icon justified the idea of rape as a political tool (scroll.in )

रामू सिद्धार्थ

Read it also-भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के बारे में डॉ. आंबेडकर की क्या राय
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स्वतंत्रता दिवस पर हिन्दू धर्म से आजाद हुए सैकड़ों दलित, बने बौद्ध

अपनी घोषणा के मुताबिक हरियाणा के जींद में दलित समुदाय के पांच सौ लोगों ने धर्म परिवर्तन कर लिया. जब देश आजादी मना रहा था, ये लोग उस हिन्दू धर्म से आजाद हो गए जिसकी वजह से दलित समाज को शोषण का शिकार होना पड़ता है. दलित ज्वाइंट एक्शन कमेटी के धरनास्थल पर 300 से ज्यादा दलित परिवारों के करीब 500 लोगों ने हिन्दू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपना लिया. उत्तर प्रदेश और दिल्ली से आये छह बौद्ध भिक्षुओं ने धरनास्थल पर ही इन परिवारों को दीक्षा देकर धर्म परिवर्तन कराया.

दरअसल ये लोग पिछले तकरीबन छह महीनों (187 दिन) से दलित ज्वाइंट एक्शन कमेटी केबैनर तले अपनी मांगों को लेकर जींद के लघु सचिवालय में धरने पर बैठे थे. इनकी मांगों में कुरूक्षेत्र के एक गांव की दलित बेटी से हुई दरिंदगी की जांच कराना, हिसार के भटला में दलितों का सामाजिक बहिष्कार करने वालों के खिलाफ मामले दर्ज करने और दलितों पर किए गए झूठे मामले खारिज करना, दलितों पर हो रहे अत्याचार पर अंकुश लगाना आदि शामिल हैं.

कमेटी के संयोजक और धरना संचालक दिनेश खापड़ का कहना है कि वे सरकार से कोई नई मांग नहीं मांग रहे बल्कि उन मांगों को पूरा करने की मांग कर रहे हैं, जिनके बारे में सरकार खुद पहले ही पूरा करने की घोषणा कर चुकी है. जब से देश और हरियाणा में भाजपा की सरकार बनी है तब से दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक गुलामी की जिंदगी जीने को मजबूर है. सरकार ने हर मामले में दलितों की अनदेखी करके दलितों के साथ विश्वासघात किया है.

‘ लोकतंत्र का भविष्य समन्वय में है संघर्ष में नहीं ’

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भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के बारे में डॉ. आंबेडकर की क्या राय थी

आजादी से 1 वर्ष पहले 1946 में डॉ. आंबेडकर ने लिखा कि “ हिंदुओं और मुसलामनों की लालसा स्वाधीनता की आकांक्षा नहीं हैं. यह सत्ता संघर्ष है,जिसे स्वतंत्रता बताया जा रहा है.. कांग्रेस मध्यवर्गीय हिंदुओं की संस्था है, जिसकों हिदू पूंजीपतियों की समर्थन प्राप्त है, जिसका लक्ष्य भारतीयों की स्वतंत्रता नहीं, बल्कि ब्रिटेन के नियंत्रण से मुक्त होना और सत्ता प्राप्त कर लेना है, जो इस समय अंग्रेजों की मुट्ठी में हैं.” ( डॉ, आंबेडकर, संपूर्ण वाग्यमय, खंड-17, पृ.3 ).

मुसलमान मध्यवर्गीय हिंदुओं के वर्चस्व से मुक्ति के लिए अलग पाकिस्तान की मांग कर रहे थे. हिदुओं की नेतृत्व गांधी और मुसलमानों का नेतृत्व जिन्ना कर रहे है. दोनों अपने-अपने समाज के मध्यमवर्गीय हिंदुओं और मुसलानों के अगुवा थे, जिन्हें हिंदू और मुस्लिम धनिक वर्ग का समर्थना प्राप्त था. इसी के चलते डॉ. आंबेडकर गांधी और जिन्ना दोनों को घृणा की हद तक नापसंद करते थे. उन्होंने दोनों के बारे में लिखा- “ गांधी और जिन्ना के संदर्भ में आंबेडकर ने कहा है कि “ मैं श्री गांधी और श्री जिन्ना से घृणा करता हूं- वैसे मैं घृणा नहीं करता, वरन मैं उन्हें नापसंद करता हूं-तो इसलिए कि मैं भारत को अधिक प्यार करता हूं.” आंबेडकर एक स्वतंत्रता, समता, बंधुता आधारित लोकतांत्रिक भारत के निर्माण के मार्ग की दोनों को बाधा मानते थे. गांधी और जिन्ना को नापसंद करने का कारण बताते हुए उन्होंने लिखा है कि “ यदि गांधी, ‘महात्मा’ पुकारे जाते हैं, तो श्री जिन्ना को ‘कायदे- आजम’ कहा जाता है. यदि गांधी कांग्रेस के सर्वेसर्वा हैं तो श्री जिन्ना को मुस्लिम लीग होना ही चाहिए….जिन्ना इस बात पर बल देते हैं कि गांधी यह स्वीकार करें कि वह एक हिंदू नेता हैं. गांधी इस बात पर बल देते हैं कि जिन्ना यह स्वीकार करें कि वह मुस्लिम नेताओं में एक हैं.” इतना ही नहीं आंबेडकर इन दोनों नेताओं को राजनीतिक दिवालियापन का शिकार भी मानते हैं. उन्होंने इनके बारे में लिखा, “ऐसी राजनीतिक दिवालियापन की स्थिति कभी देखने को नहीं मिली, जैसी इन दो भारतीय नेताओं में पाई गई.” आंबेडकर इन दोनों व्यक्तियों को चरम अहंकारी और स्वकेंद्रित मानते हैं. उन्होंने लिखा, “ मैं तो केवल यही बता सकता हूं कि मेरी निगाह में उनकी हैसियत क्या है? पहली बात मेरे दिमाग में जो आती है, वह यह कि उन जैसै दो महान अंहमवादी व्यक्तियों को खोज निकालना बड़ा कठिन है, जो उनसे प्रतिस्पर्धा कर सकें, उनके लिए ( गांधी और जिन्ना ) व्यक्तिगत उत्कर्ष ही सबकुछ है, और देश का हित कुर्सी पर बैठकर एक दूसरे का विरोध करना मात्र है. उन्होेंने भारतीय राजनीति को आपसी कलह का विषय बना दिया है.”

( यह सब कुछ आंबेडकर ने ‘रानाडे, गांधी और जिन्ना’ शाीर्षक अपने भाषण में कहा है. यह भाषण 1943 का है )

फुले की तरह आंबेडकर भी देख रहे थे कि आजादी की लड़ाई का सारा उद्देश्य सवर्ण वर्चस्व की स्थापना है. उनका कहना था कि देश की गुलामी और शूद्रों-अतिशूद्रों की हजारों वर्षों की गुलामी का मामला एक साथ हल होना चाहिए. लेकिन व्यापक बहुजन समाज का दुर्भाग्य यह है कि भारत और पाकिस्तान आजाद नहीं मिली, बल्कि भारत की सत्ता उच्च जातीय और उच्च वर्गीय हिंदुओं के हाथ में गई और पाकिस्तान की सत्ता उच्च जातीय और उच्च वर्गीय मुसलानों के हाथ में गई. जैसा डॉ. आंबेडकर ने भविष्यवाणी की थी.

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मैरीकॉम समेत कॉमनवेल्थ के 10 गोल्ड मेडलिस्ट एशियाड में नहीं खेलेंगे…

नई दिल्ली। इंडोनेशिया के जकार्ता और पालेमबैंग में 18 अगस्त से एशियन गेम्स की शुरुआत होगी. भारत ने 34 खेलों में भागीदारी के लिए 572 एथलीट के नाम का ऐलान कर दिया है. इनमें इसी साल अप्रैल में हुए गोल्डकोस्ट कॉमनवेल्थ गेम्स में पदक जीतने वाले 20 खिलाड़ियों के नाम नहीं हैं. बॉक्सर एमसी मैरीकॉम, शूटर जीतू राय, वेटलिफ्टर संजीता और मीराबाई चानू समेत 10 गोल्ड मेडलिस्ट एशियन गेम्स में दिखाई नहीं देंगे. स्टार बॉक्सर मैरीकॉम को उनका पसंदीदा भार वर्ग नहीं मिला, इसलिए उन्होंने नाम वापस ले लिया. भारत ने चार साल पहले दक्षिण कोरिया के इंचियोन में हुए पिछले एशियन गेम्स में 57 मेडल हासिल किए थे. इनमें 11 गोल्ड, नौ सिल्वर और 37 ब्रॉन्ज शामिल थे.
एशियन गेम्स में इन भारतीय एथलीटों का चयन नहीं हुआ:-
 नोट: तेजस्वनी सावंत और आेम मिठरवाल ने कॉमनवेल्थ में दो अलग-अलग कैटेगरी में मेडल जीते थे, इसलिए कुल 20 खिलाड़ी एशियन गेम्स टीम का हिस्सा नहीं हैं
मैरीकॉम वर्ल्ड चैम्पियनशिप की तैयारी करेंगी : मैरीकॉम को एशियाड के लिए 51 किग्रा भार वर्ग में जगह मिल रही थी, लेकिन वे 48 किग्रा भार वर्ग में ही खेलना चाह रही थीं. इसलिए उन्होंने अपना नाम वापस ले लिया. मैरीकॉम 2014 एशियन गेम्स में भी गोल्ड जीतीं थीं. 2010 के एशियाड में उन्हें ब्रॉन्ज से संतोष करना पड़ा था. अब मैरीकॉम नवंबर में होने वाले वर्ल्ड चैम्पियनशिप की तैयारी करेंगी. वर्ल्ड चैम्पियनशिप में मैरीकॉम इससे पहले पांच बार गोल्ड और एक बार सिल्वर मेडल जीत चुकी हैं.
मीराबाई और संजीता का एशियाड खेलने का सपना टूटा : गोल्ड कोस्ट में सोना जीतने वाली वेटलिफ्टर मीराबाई चानू और संजीता चानू भी एशियाड टीम में नहीं हैं. दोनों अब तक एक बार भी एशियन गेम्स का हिस्सा नहीं बनी. मीराबाई ने चोट के कारण एशियाड से 10 दिन पहले अपना नाम वापस लिया. वहीं, डोप टेस्ट में फेल होने के कारण संजीता चानू को टीम में नहीं चुना गया. अनुशासनहीनता के कारण पूनम यादव को बाहर कर दिया गया. इन तीनों के साथ वेंकट राहुल भी एशियाड टीम में जगह बनाने में नाकाम रहे.
रेसलिंग में बबीता-सोमवीर नहीं : रेसलिंग की टीम में कॉमवेल्थ गेम्स गोल्ड जीतने वाले राहुल अवारे, सिल्वर जीतने वाली बबीता और ब्रॉन्ज पर कब्जा करने वाले सोमवीर को टीम में नहीं लिया गया. बबीता मई में एशियाड ट्रेनिंग कैम्प में नहीं गई थी, जिस कारण उनका नाम टीम में शामिल नहीं किया गया. वहीं, भारतीय कुश्ती संघ के अनुसार, राहुल अवारे और सोमवीर ने अपने वजन को जरूरत के मुताबिक नहीं घटाया इसलिए उनका चयन नहीं किया गया.
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‘ लोकतंत्र का भविष्य समन्वय में है संघर्ष में नहीं ’

लोकतंत्र में प्रयुक्त ‘लोक‘ शब्द अपने अपार विस्तार में समस्त संकीर्णताओं से मुक्त है . ‘लोक’ जाति-धर्म-भाषा-क्षेत्र-वर्ग आदि समूह की संयुक्त समावेशी इकाई है, जिसमें सहअस्तित्व का उदार भाव सक्रिय रहकर ‘लोक‘ को आधार देता है. ‘लोक‘ में सबके प्रति सबकी सहानुभूति का होना आवश्यक है. इसी से ‘लोक‘ एक इकाई के रूप में संगठित होकर अपनी जीवन-शक्ति अर्जित करता है. ‘जिओ और जीने दो‘ का उदार विचार लोक-संग्रह का मार्गदर्शी सिद्धांत है और इस सिद्धांत पर आधारित ‘लोक‘ में न्याय , समानता और शांति की प्रतिष्ठा के लिए ‘लोक‘ ने स्वशासित ‘तंत्र‘ के रूप में लोकतंत्र को समस्त शासन तंत्रों में श्रेष्ठ मान्य किया है.

स्वतंत्रता-प्राप्ति के साथ भारत ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्वीकार किया. हमारे संविधान के प्रारंभ में प्रस्तुत पंक्ति ‘हम भारत के लोग……‘ हमारी समावेशी प्रकृति की साक्षी है. इस ‘हम‘ में ‘सर्व’ का भाव है- किसी वर्ग, वर्ण, संप्रदाय, समूह, आदि का नहीं. यह ‘हम‘ शब्द ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः‘ की ओर इंगित करता है . इस ‘हम‘ में समस्त भारतवासियों के कल्याण और उत्थान की उदार भावना समाहित है. ‘सबका साथ, सबका विकास‘ इसका संकल्प है और इसी संकल्प की संपूर्ति में हमारी स्वतंत्रता एवं स्वायत्तता की सार्थकता है. समसामयिक संदर्भ में इस सत्य को ईमानदारी से स्वीकार करने की आवश्यकता है- ‘लोक‘ (जनसामान्य) को भी और ‘तंत्र‘ (नेतृत्व़-प्रशासन) को भी.

यह विचारणीय है कि सैद्धांतिक स्तर पर देश की एकता और अखंडता के प्रति प्रतिबद्धता का संकल्प निरंतर दोहराने और सामाजिक-न्याय, समानता एवं समरसता के लोक लुभावन नारे उछालने वाले हमारे ‘तंत्र’ ने व्यावहारिक धरातल पर सत्ता पर अबाध अधिकार पाने की दुराशा में वोट बैंक बनाने के लिए ‘लोक‘ को अनेक समूहों में बांटने की जो कूट रचनाएं रचीं उनके कारण आज हमारा लोकतंत्र भयावह समस्याओं से ग्रस्त है . भड़काऊ भाषण, समस्त ‘लोक‘ के स्थान पर ‘समूह विशेष’ के हितसाधन का प्रयत्न, उग्र-हिंसक आंदोलन और आंकड़ों के गणित में उलझी कथित राजनीति ने जनजीवन को असंतोष, अशांति असुरक्षा और भय से भर दिया है. ‘लोक‘ की निरंकुशता और ‘तंत्र‘ की तानाशाही स्वतंत्रता का पथ कंटकाकीर्ण कर रही है. एक ओर ‘लोक‘ तथाकथित आंदोलनों के बहाने हिंसा पर उतारू है, वाहन फूंके जा रहे हैं, निर्दोषों की हत्या हो रही है, सडकों पर दूध बहाया जा रहा है, सब्जियां फेंकी जा रही हैं, सार्वजनिक जीवन अशांत किया जा रहा है– अर्थात वह सब हो रहा है जो लोकतंत्र में ‘लोक‘ (जनता) को नहीं करना चाहिए. दूसरी ओर ‘तंत्र’ कहीं उग्र आन्दोलनकारियों पर लाठियां-गोलियां बरसाता नजर आता है तो कभी उनकी उचित-अनुचित मांगों को स्वीकार करता, मुआवजा बाँटता और घुटने टेकता दिखाई देता है. दोनों ही स्थितियाँ लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं .

हमारी वर्तमान उपर्युक्त स्थिति के लिए तंत्र की सत्ता लोलुपता, सत्ता पाने के लिए समूह अथवा वर्ग विशेष के तुष्टीकरण की प्रवृत्ति तथा जाति-धर्म आधारित वोट बैंक की दूषित राजनीति उत्तरदायी है.

लोकतंत्र में सत्ता जनता की सेवा का माध्यम है, विलासितापूर्ण सामंती दुरभिलाषाओं की पूर्ति का नहीं. सेवा के पथ पर संघर्ष नहीं होता किंतु अधिकाधिक सुख-सुविधा संचय की चाहत, जनता की गाढ़ी कमाई के बल पर व्यक्तिगत विलासिताएँ जुटाने की इच्छा राजनीतिक दलांे के मध्य गलाकाट स्पर्धा पैदा करती है. दुर्भाग्य से हमारा लोकतंत्र इसी दिशा में अग्रसर है. सत्ता के रथ को विलासिता के पंकिल-पथ से विरत कर सेवा और त्याग के पथ पर अग्रसर करना आज प्राथमिकता बन गई है.

आज सार्वजनिक राजनीतिक जीवन में वाक्संयम अत्यावश्यक हो गया है क्योंकि बड़े पदों पर बैठे लोगों द्वारा कही गई बातें जनसाधारण के क्रिया-पथ का विनिश्चय करती हैं . हमारे नेतृत्व में वाकसंयम का अभाव हमारे समाज पर दुष्प्रभाव डाल रहा है. कदाचित भारतीय राजनीति में स्वतंत्रता प्राप्ति के तत्काल पश्चात से ही यह दोष से व्याप्त हो गया था. इसीलिए प्रख्यात कवि पंडित श्यामनारायण पांडेय ने सन 1956 में प्रकाशित ‘शिवाजी‘ महाकाव्य में चेतावनी दी थी-

उन्मत्त भाषण खोर नेता देश को बहका न दें . अनुरक्त अनुशासित प्रजा की जिन्दगी दहका न दें ..

लगभग साठ वर्ष पूर्व महाकवि ने हमें जो चेतावनी दी थी उसके प्रति असावधानी दर्शाने का दुष्परिणाम आज हमारे सामने है. वर्तमान सामाजिक राजनीतिक स्थितियाँ इस तथ्य की साक्षी हैं.

दुर्भाग्य से आज ‘लोक’ विभिन्न राजनीतिक दलों में बँटा हुआ है. प्रत्येक साधारण नागरिक प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष रूप से विचार के स्तर पर किसी ना किसी दल के निकट है और उसी के नेता की बात पर पूरी तरह विश्वास करता है– चाहे वह बात सही हो अथवा नहीं. यह स्थिति चिंताजनक है. अपनी पसंद के नेता पर विश्वास करना सहज स्वाभाविक है किंतु उसके गलत निर्णयों का भी आंख मूंदकर समर्थन करना लोकतंत्र के हित में नहीं है. इसे किसी भी स्थिति में उचित नहीं कहा जा सकता.

सामान्यतः ‘लोक‘ अपने ‘तंत्र’ द्वारा निर्देशित पथ पर आगे बढ़ता है किंतु वर्तमान प्रतिकूल परिस्थितियों में ‘लोक‘ को आगे बढ़कर ‘तंत्र’ का मार्गदर्शन करने की आवश्यकता है. वोटों के चुनावी गणित में उलझी तुष्टीकरण की आत्मघाती राजनीति करने वालों के कारण ‘तंत्र’ अपने ‘लोक‘ को सही दिशा नहीं दे पा रहा है. अतः ‘लोक‘ को ‘अप्प दीपो भव‘ के सिद्धांत पर अपने कल्याण का पथ स्वयं निर्मित करना होगा. दलीय दल-दल में धंसे समूहों के हित की राजनीति करने वालों को सही दिशा दिखानी होगी और यह तब संभव होगा जब ‘लोक‘ समूह विशेष के हित-साधन की संकीर्ण मानसिकता से उबरकर, निजी स्वार्थों की बलि देकर संपूर्ण समाज के लिए समर्पित सेवाभाव से कार्य करने वाले समाजसेवियों को तंत्र में प्रतिष्ठित करे , अपराधिक पृष्ठभूमि वाले बाहुबलियों को तंत्र में प्रवेश न करने दे. ‘लोक‘ की ऐसी सक्रियता से ही ‘तंत्र’ में सुधार संभव होगा और हमारा लोकतंत्र अपनी विकास-यात्रा सतत जारी रख सकेगा.

लोकतंत्र को भीड-तंत्र में बदलना खतरनाक खेल है. रैलियों, सभाओं, यात्राओं के रूप में ‘तंत्र‘ खुलेआम यह खेल खेलता रहा है. शक्ति-प्रदर्शन की इस होड़ में शक्ति, समय और धन का दुरुपयोग तो होता ही ह,ै साथ ही जनजीवन भी यातायात आदि व्यवस्थाओं के बाधित होने से असुविधा अनुभव करता है. यही भीड़ उग्र और हिंसक होकर राष्ट्रीय-संपत्ति को भी क्षति पहुंचाती है. अप्रिय घटनाएं घटती हैं. आज जब शासन को जनता तक और जनता को शासन तक अपनी बात पहुंचाने के लिए दूरदर्शन, समाचार-पत्र, ईमेल, सोशल-मीडिया जैसे अनेक प्रभावशाली संसाधन उपलब्ध हैं तब ऐसे भीड़ भरे प्रदर्शनों-सभाओं का क्या औचित्य है ? लोकहित में राष्ट्रीय-संपत्ति की सुरक्षा के लिए ‘लोक‘ और ‘तंत्र‘ दोनों को भीड़ जुटाने से बचने की आवश्यकता है.

लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक की भूमिका एक जागरूक प्रहरी की होती है. ‘लोक‘ की जागरूकता से ‘तंत्र‘ गलत निर्णय नहीं ले सकता, वह अपनी मनमानी नहीं कर सकता और जागरूक ‘तंत्र‘ लोक-कल्याण में बाधक आपराधिक तत्वों को नहीं पनपने देता. इस प्रकार लोकतंत्र की सफलता ‘लोक‘ और ‘तंत्र‘ दोनों की जागरूकता पर निर्भर करती है. विडम्बना यह है कि आज हम अपने सामूहिक स्वार्थों के प्रति जागरूकता प्रकट करते हैं, लोकहित के प्रति नहीं. यदि हम विभाजित मानसिकता को त्यागकर राष्ट्रीय-चेतना के एक सूत्र में बंध कर सारे समाज के हित-साधनों के लिए जागरूक हों, आपसी वैमनस्य भूलें, विगत घटनाओं की कटुता त्यागकर पारस्परिक सहयोग का संकल्प लें तो हमारा लोकतंत्र अधिक सशक्त और सार्थक बनेगा. यह स्मरणीय है कि हमारे लोकतंत्र की जीवनशक्ति विभिन्न समूहों के मध्य समन्वय में है ,संघर्ष में नहीं.

डाॅ. कृष्णगोपाल मिश्र विभागाध्यक्ष-हिन्दी शासकीय नर्मदा स्नातकोत्तर महाविद्यालय होशंगाबाद म.प्र

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 रणवीर सिंह और दीपीका पादुकोण की शादी फिक्स

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नई दिल्ली। बॉलीवुड स्टार दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह की शादी फिक्स हो गई है. खबरों के मुताबिक रणवीर और दीपिका इसी साल 20 नवंबर को शादी के बंधन में बंधने वाले हैं. यह शादी इटली में होगी. शादी में गिने चुने लोगो को ही बुलाया जाएगा जिनमें उनके कुछ दोस्त और करीबी ही शामिल हैं.

कहा जा रहा है कि शादी में शामिल होने वालों की संख्या 30 के करीब ही है. इस खबर को फिल्मफेयर की एक रिपोर्ट में कंफर्म किया गया है. रणवीर और दीपिका की शादी पिछले काफी समय ले बी टाउन का सबसे हॉट टॉपिक बनी हुई है. शादी को लेकर कई तरह की खबरें सामने आ चुकी हैं. ये ग्रैड वेडिंग इटली में होगी. जिसके बाद इंडिया में सभी के लिए रिसेप्शन का आयोजन किया जाएगा.

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रेलवे ने 15 अगस्त से बदला समय, ट्रेन का नया टाइम देखकर निकलें

नई दिल्ली। ट्रेन से सफर करने वाले यात्रियों के लिए जरूरी खबर. उत्तर रेलवे ने 15 अगस्त से ट्रेनों के टाइम में परिवर्तन किया है. उत्तर रेलवे ने एक साथ 301 ट्रेनों के समय में बदलाव किया है. रेलवे ने 57 ट्रेनों का डिपार्चर टाईम (गाड़ी छूटने का समय) आगे और 58 ट्रेनों का पीछे किया गया है. इतना ही नहीं 102 ट्रेनों का अराईवल टाईम (पहुंचने का समय) आगे और 84 ट्रेनों का पीछे किया गया है. रेलवे ने यात्रियों से अनुरोध किया है कि वे अपनी रेल यात्रा शुरू करने से पहले अपनी ट्रेन का नया समय रेलवे इंक्वायरी से पता कर लें.

जिन महत्वपूर्ण ट्रेनों का समय बदला गया है, उसने अमृतसर से चलने वाली शताब्दी एक्सप्रेस का समय सुबह 5 बजे से बदलकर 4:55 कर दिया गया है यानी 5 मिनट पहले कर दिया गया है. शाम 5 बजे देहरादून से छूटने वाली शताब्दी एक्सप्रेस 15 अगस्त से 4 बजकर 55 मिनट पर स्टेशन से छूटेगी. हमसफर एक्सप्रेस का समय जो पहले हजरत निजामुद्दीन से सुबह 8 बजकर 30 मिनट का था वो 8 बजकर 25 मिनट कर दिया गया है. इसके अलावा हिमाचल एक्सप्रेस का समय रात 10 बजकर 55 मिनट से बदलकर 10 बजकर 50 मिनट कर दिया गया है और ये दिल्ली से इस समय छूटेगी. हरिद्वार से चलने वाली लोकमान्य तिलक सुपरफास्ट एक्सप्रेस का समय शाम 6 बजकर 45 मिनट से बदलकर 6 बजकर 30 मिनट कर दिया गया है. यानी इस ट्रेन का छूटने का समय पूरे 15 मिनट जल्दी कर दिया गया है. गरीब रथ एसी एक्सप्रेस का समय आनंद विहार से रात 8 बजकर 55 मिनट से बदलकर 8 बजकर 40 मिनट कर दिया गया है. इसके अलावा तेजस एक्सप्रेस आनंद विहार टर्मिनल से 3 बजकर 50 मिनट की जगह 3 बजकर 45 मिनट पर छूटेगी. बाकी आप 15 अगस्त से यात्रा के दौरान अपनी ट्रेन का टाइम देखकर निकले.

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एयरो इंडिया शो पर केंद्र के फैसले से वायुसेना हैरान, कुमारस्वामी ने जताया विरोध

बेंगलुरू। आईएएफ ने एयरो इंडिया शो को बेंगलुरु से उत्तर प्रदेश शिफ्ट करने के केंद्र के प्रस्ताव पर चिंता प्रकट की है. एयरफोर्स का कहना है कि लखनऊ के बाहरी इलाके में ‘बख्शी का तालाब’ एयरपोर्ट एक छोटा सा स्टेशन है, इसमें इतनी सुविधाएं नहीं हैं कि इतने बड़े इवेंट का आयोजन किया जा सके. इस फैसले पर इसलिए भी हैरानी जताई जा रही है क्योंकि बेंगलुरु पिछले 22 सालों से एयरो इंडिया शो की मेजबानी कर रहा है.

सूत्रों के मुताबिक एयरफोर्स का कहना है कि लखनऊ में सुविधाओं के सुधार में 12-14 महीने लगेंगे. एयरफोर्स ने रनवे की मरम्मत न होने और एयरक्राफ्ट को पार्क करने और विक्रेताओं के लिए स्टेशन में जगह न होने का भी मुद्दा उठाया है. इसके साथ ही एयरफोर्स ने लखनऊ से ‘बक्शी का तालाब’ तक की सड़क यात्रा को भी ‘दु:स्वप्न’ की तरह बताया है. सूत्र ने बताया कि आईएफ ने कहा है कि उत्तर प्रदेश हवाई अड्डे में आधुनिक नौवहन की सुविधाएं भी नहीं हैं. शो के लिए इतने कम वक्त में लखनऊ एयरपोर्ट को तैयार करने में अपनी अक्षमता व्यक्त करते हुए आईएफ ने कहा कि कितना भी जोर लगाने के बाद यह बेंगलुरु की सुवुधाओं का मुकाबला नहीं कर सकता. बता दें कि एयरो इंडिया बेंगलुरु में येलहंका एयरफोर्स स्टेशन पर आयोजित द्विवार्षिक इंटरनेशनल एयर शो और विमानन प्रदर्शनी है. रक्षा मंत्रालय द्वारा एचएएल की साझेदारी में इसका आयोजन किया जाता है. पिछले साल हुए शो 11वें संस्करण में 549 कंपनियों (270 भारतीय और 279 विदेशी) ने इसमें भाग लिया था. इसमें भाग लेने वाले 72 विमानों ने 27,678 वर्ग मील के क्षेत्र को ढका था. 51 से अधिक देशों ने इसमें हिस्सा लिया था. एयरो इंडिया के लिए आयोजन स्थल को बदलने की खबरों के बाद इस मुद्दे पर राजनीति भी शुरू हो गई है. कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने इस मुद्दे पर अपनी पीड़ा प्रकट की है. कुमारस्वामी ने आरोप लगाया कि, “मोदी सरकार ने यह निर्णय राजनीतिक कारणों से लिया है. हम इस तरह के कदम का विरोध करते हैं क्योंकि एयरोनॉटिकल साइंस में बेंगलुरु अग्रणी है. एयरो इंडिया जैसे किसी कार्यक्रम को आयोजित करने के लिए इसका सबसे बड़ा एयरबेस भी है. यदि केंद्र इसको स्थानान्तरित करता है तो कर्नाटक के लोग बीजेपी को सबक सिखाएंगे.”

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पुलिस ने जारी की उमर खालिद के हमलावर की तस्वीर

नई दिल्ली। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र नेता उमर खालिद पर हमला करने वाले युवक की पहचान हो गई है. पुलिस ने घटना स्थल के आस-पास मौजूद सीसीटीवी फुटेज को खंगालने के बाद एक तस्वीर जारी किया है. जिसमें यह शख्स कॉन्स्टिट्यूशन क्लब के बगल में स्थित विट्टलभाई मार्ग पर 2.30 बजे एक शख्स भागता दिखाई दे रहा है. उमर खालिद पर सोमवार को दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब के बाहर हमला हुआ है. एक आदमी ने उमर पर तब हमला किया जब वो कॉन्स्टिट्यूशन क्लब के बाहर अपने दोस्तों के साथ चाय पी रहे थे. हालांकि हमलावर कामयाब नहीं हो सका और मौके से फरार हो गया. घटनास्थल से एक पिस्तौल भी बरामद हुआ, जिसमें 6 जिंदा कारतूस थे. पुलिस को दिए अपने बयान में उमर खालिद ने बताया कि वह ‘यूनाइटेड अगेंस्ट हेट’ नाम से चल रही एक मुहिम से जुड़े हैं और इसी के एक कार्यक्रम में शामिल होने वह कॉन्स्टिट्यूशन क्लब पहुंचे थे. उमर के मुताबिक- “प्रोग्राम शुरू होने में टाइम था तो मैं दोस्तों के साथ चाय पीने चला गया. जब चाय पीकर लौट रहा था तो किसी ने पीछे से हमला किया. मेरा गला दबोचा. मुझे जमीन पर गिरा दिया और एक बंदूक निकालकर मुझ पर तान रहा था. उस वक्त मैंने उसकी बंदूक को दूर किया. दोस्तों ने पुश किया. वो भागा और भागते हुए गोली की आवाज आई.” इस घटना के बाद पुलिस मौके पर पहुंची और वहां से एक पिस्तौल बरामद किया. उमर खालिद की शिकायत पर पार्लियामेंट स्ट्रीट थान में आर्म्स एक्ट और हत्या के प्रयास का केस दर्ज किया है. उमर खालिद ने इस मसले पर एक ट्वीट किया है. जिसमें उन्होंने लिखा है कि उन्हें डराकर चुप नहीं कराया जा सकता. उमर ने गौरी लंकेश के साथ अपनी तस्वीर शेयर करते हुए ये भी लिखा कि उन्होंने ये गौरी लंकेश से सीखा है.

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15 अगस्त को हरियाणा में 1500 दलित बदलेंगे धर्म

जींद। हरियाणा के जींद में 184 दिनों से धरने पर बैठे दलितों ने 15 अगस्त को धर्म परिवर्तन की बात कही है. धरने पर बैठे दलितों का आरोप है कि राज्य सरकार से संपर्क और बातचीत करने की उनकी कोशिशें नाकाम रही हैं. अपनी मांगों को लेकर सरकार की उदासनीता के बाद दलितों ने अब धर्म परिवर्तन का ऐलान किया है. पीड़ित दलितों ने बताया कि धरनास्थल पर ही वो सभी अपना धर्म परिवर्तन करेंगे. यह पूरा धरना दलित जाइंट ऐक्शन कमिटी के तहत चलाया जा रहा है. कमिटी ने कहा कि उनकी तरफ से सरकार से संपर्क और बातचीत करने की सारी कोशिशें नाकाम रहीं. अब मजबूरी में उन्हें धर्म परिवर्तन जैसा कदम उठाना पड़ेगा.

दलित नेताओं ने प्रदेश सरकार पर दलितों की सुनवाई न होने और उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं. झांसा गांव में दलित लड़की से रेप, आसन कांड, भिवानी कांड, भटला जैसी घटनाओं को लेकर यहां के लोग आक्रोशित हैं. दलित नेताओं ने कहा कि इन मामलों में न्याय नहीं मिलने और लगातार उत्पीड़न के कारण वे धर्म परिवर्तन करेंगे. धर्म परिवर्तन की घोषणा के बाद अब तक दलित समाज की मांगों को लेकर आंख मूदंने वाली सरकार में हड़कंप मच गया है.

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भीमकवी वामनदादा कर्डक

भारत में शुरुआत से ही सिंधु संस्कृती समतावादी, मानवतादी रही है. बाद में चार हजार साल पूर्व में आर्यों ने भारत पर आक्रमण कर के वर्णभेद, जातीभेद निर्माण किया. उसके खिलाफ में तथागत बुध्द, गुरू कबीर, गुरू नानक, गुरू नामदेव, गुरू तुकाराम, गुरू गाडगेबाबा इन्होने आंदोलन किया. बाद में महात्मा फुले, छ.शाहू महाराज, डॉ.बाबासाहब आंबेडकर इन्होने जन-आंदोलन किया. डॉ.बाबासाहब के आंदोलन में अनेक कवी तथा गायकों ने योगदान दिया है. इनमें से वामनदादा कर्डक जी ने बाबासाहब के आंदोलन को गीत-गायन द्वारा पूरे भारत भर फैलाया.

जनम:- वामनदादा कर्डक का जनम 15 अगस्त 1922 मे नासिक जिले के सिन्नर तहसील में देषवंडी गांव में हुआ. उनके पिताजी का नाम तबाजी, माता का नाम सईबाई, बडे भाई का नाम सदाषिव तथा बहन का नाम सावित्री था. उनके घर खेती थी. खेतीबाडी लायक पालतु जानवर थे. लेकिन कभी कभी उनकी मॉं लकडीयों के बंडल बेचती थी. उनके पिताजी बैलों का व्यापार करते थे. वामनदादा की शादी अनुसया से हुयी. उनको मीरा नाम की लडकी भी हुई. लेकीन माँ और बेटी जल्दी ही गुजर गयी. बाद मे वामनदादा ने शांताबाई से दुसरी शादी की. बाद में वामनदादा उनकी माताजी के साथ मुंबई में मजदुरी करने के लिए आये. उन्होने मील श्रमिक का काम किया. बाद में कोयले की भंडारण में काम किया. बाद में उन्हे टाटा कंपनी में नोकरी मिल गयी. शिवडी के बीडीडी के किराया घर में रहते थे. उस समय समता सैनिक दल मजबुत था. वे उसमें शामिल हो गये. एक बार उन्हे एक आदमी ने खत पढने को कहा, लेकीन उन्हे पढना-लिखना नही आता था इसका उन्हे बहुत दुःख हुआ. उन्होने देहलवी नाम के अध्यापक से पढना-लिखना शुरू कर दिया. बाद में उनका पढना लिखना बढ गया.

शुरूआत में दादा सिनेमा में जाकर कलाकार बनना चाहते थे. उन्हे मिनर्व्हा फिल्म कंपनी में एक्स्ट्रा कलाकार का काम मिल गया. वे उस समय कारदार तथा रणजित स्टुडियों मे जाते थे. 1943 में उन्होने सर्वप्रथम डॉ.बाबासाहब आंबेडकर जी को देखा. उनके भाषण का दादा पर बहुत असर हुआ. दादा ने हिंदी-मराठी साहित्य पढा था. उस समय महाराष्ट्र में 1927 मे डॉ.बाबासाहब आंबेडकरजी ने महाड़ के चवदार तालाब के पानी के लिए सत्याग्रह शुरू कर दिया तथा 1930 में नासिक के कालाराम मंदिर प्रवेष का सत्याग्रह किया. इससे जनता में जोशो-उल्लास का निर्माण हुआ. हजारो लोग बाबा साहब जी के आंदोलन में शामिल हुए.

गायन पार्टी की स्थापना:- शुरूआती दौर में महाराष्ट्र मे पेषवाओं के जमाने में जलसे चलते थे. लेकीन बाद में महात्मा ज्योतिबा फुले के सत्यशोधक आंदोलन के लोगों ने सामाजिक परिवर्तन के जलसे चलाए. बाद में सभी गायक और कलाकार बाबासाहब के आंदोलन मे सामाजिक परिवर्तन के जंग मे शामिल हो गये. शुरूआती दौर में मुंबई में शाहीर घेंगडे बाबासाहब पर शाहीरी गीत गाते थे. उनका एक गीत मराठी में था. उसका मतलब था के, ‘‘महार का एक बच्चा बहोत होशियार, लंडन से आया बॅरिस्टर बनकर’’ यह गीत बाबासाहब को बहुत पसंद था. उस समय भीमराव कर्डक तथा केरूबा गायकवाड (अकोला) जैसे शाहीर थे. वामनदादा ने गायन पार्टी की स्थापना की थी.

उस समय डॉ.बाबासाहब आंबेडकरजी ने 1927 मे समता सैनिक दल स्थापन किया था तथा 1936 में स्वतंत्र मजदूर पार्टी की स्थापना की. बाद में 1942 मे नागपूर में शेड्यूल कास्ट फेडरेशन की स्थापना की. उस समय 1933-35 में नागपूर कामठी के विधायक बाबू हरदास इन्होने सर्वप्रथम जयभिम का नारा दिया. 1943 मे बहुचर्चित फिल्म किस्मत में गाना था ‘‘दुर हटो ए दुनिया वालों हिंदुस्तान हमारा है.’’ दादाने उस समय गीत लिखा था, ‘‘दुर हटो ये कॉंग्रेस वालो फेडरेशन हमारा है’’ यह गीत उन दिनो बाबासाहब के आंदोलन में बहोत प्रसिध्द हुआ. दादा की कोई संतान नही थी. दादा कहते थे मुझे बाबासाहब से प्रेरणा मिली. ओर वह कहते थे मुझ जैसे गुंगे को जुबान मिली. बाद में दादा पुरे भारत में बाबासाहब के आंदोलन में गित लिखते रहे और गाते रहे. उन्होने कहा था भीम तेरे जन्म से हमारे करोड़ो परिवारों का उध्दार हुआ.

1952 के लोकसभा के चुनाव में डॉ.बाबासाहब आंबेडकरजी मुंबई से चुनाव में उम्मीद्वार थे. उस समय हजारों कवी गायक तथा कार्यकर्ताओं ने बाबासाहब का आंदोलन उत्साह के साथ चलाया. उस समय गायक कृष्ण शिंदे ये मराठा समाज से थे. वे प्रजा समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता थे. वे बाबासाहब के चुनाव में बाबासाहब के साथ थे. उन पर बाबासाहब का गहरा असर पडा. उन्होने बहोत सारे गीत गाये थे. 1956 में उन्होंने नागपूर में धम्म दिक्षा ली थी. बाद में प्रल्हादजी शिंदे, नागोराव पाटणकर, लक्ष्मण केदार, मिलिंद शिंदे, सरतापे, प्रतापसिंग बोदडे, हरेंद्र जाधव, लक्ष्मण राजगुरू, सुधिर फडके, श्रावण यषवंते, गोविंद मशालकर, नामदेव ढसाल, विठ्ठल उमप, जयवंत कुळकर्णी, पुश्पा वाघधरे, सुरेष वाडकर, अनिरूध्द वनकर, राहुल आन्वीकर, उत्तरा केळकर, अनिल खोब्रागडे, प्रकाश पाटणकर, आनंद शिंदे, मिलिंद शिंदे, सागर समदुर, गवई-मिसाळ, प्रभाकर धाकडे, आनंद षिंदे, डि.आर.इंगळे, इन जैसे कवी-गायक-संगितकारोंने बाबासाहब के आंदोलन पर बहोत गीत तयार किये ओर गाये इनसे लोगोंमे बहोत जागृती हुयी.

उस समय डॉ.बाबासाहब आंबेडकरजी नें अंग्रेज सरकार को बताकर बहोत सारे युवकों को पढाने के लिए इंग्लंड-अमेरिका भेज दिया. लेकिन उनमे से कोई भी सामाजिक आंदोलन के लिए काम में नही आया. इसलिए 1956 की आगरा की सभा में कहा था की, ‘मुझे पढे-लिखे लोगों ने धोका दिया है.’ लेकिन उस समय दादासाहब गायकवाड तथा वामनदादा कर्डक जैसे कम पढे लिखे नेताओं ने आंदोलन को आगे बढाया. उस समय बॅ.खोब्रागडेजी को बाबासाहब ने उनके पिताजी को कहकर उनके खुद के खर्चे से लंडन भेजने को कहा. बाद में बॅ.खोब्रागडेजी ने आंदोलन आगे चलाया. उस समय बाबासाहब का आंदोलन पूरे भारत में ताकत से चल रहा था. पार्टी बहोत मजबुत थी. प्रा.एन शिवराज, प्रा.बी.पी.मौर्य, जोगेन्द्रनाथ मंडल, एल.आर.बाली, अॅड.बी.सी.कांबळे, अॅड.आवळे बाबू, भैय्यासाहेब आंबेडकर, प्रा.आर.डी.भंडारे, शांताबाई दाणी, रा.सु.गवई, दादासाहब रूपवते और ना.ह.कुंभारे ये आंदोलन में शामिल थे. बाद में आंदोलन मे गुटबाजी हुयी.

बाद में भैय्यासाहब आंबेडकर तथा कांशिराम साहब ने एकता के लिए बहोत प्रयास किये. बाद में 1972 में दलित पैंथर की स्थापना हुयी.वामनदादा एक गीत में कहते है की, हम तुफानों मे के दिए है. वामन दादाजी ने निस्वार्थ सामाजिक आंदोलन चलाया. दादा एक गीत मे कहते है, ‘बताउ कितना में दादा, तुम सब यहाँ पर एकता से रहो. उन्होने सामाजिक विषमता के खिलाफ बहोत सारे गीत लिखे ओर गाये. 1956 में जब बाबासाहब आंबेडकरजी ने नागपूर में लाखो लोगों के साथ बौध्द धम्म अपनाया.

उस समय वामनदादाने गीत लिखा था, ‘वामन इस धरतीपर ऐसा हुआ ही नही, ओर पाँच लाख लोग बुध्द को शरण गये नही’. वामनदादा कहते है आजादी का मतलब हमे समझने दो, ओर दो वक्त का खाना हमे मिलने दो. दादा आगे गीत मे कहते है, मैदान मे आकर बेभान होकर दंगा मत करो, और इंसान के बेटे होकर इंसान के दुश्मन मत बनो. आगे वह गीत में कहते है महिलाओं के मुक्ती के लिए आये महात्मा फुले ओर लडकियों की पढाई हो गयी खुली. आगे पढाई के बारे मे दादा एक गीत में कहते है, तुम्हे पढाई की इच्छा हो, ओर तुम इधर-मत भटको ऐसा बच्चों को कहते हे. दादा दुसरे गीत में कहते है ‘मुझे गुस्सा नही आता यही मेरा गुनाह है’. दादा एक गीत मे ऐसा कहते है की, ‘भीम अगर तूम्हारे विचारों के पाँच लोग रहते तो उनके तलवार की धार अलग ही रहती’. वामनदादा छ.शिवाजी महाराज के बारे मे कहते है की, ‘शिवजी के राज में नही थी कुछ कमी, ओर खुशी से रहते थे हिन्दु और मुसलमान’ ऐसे महान भीमकवी का 15 मई 2004 को निधन हुआ. वामनदादा ने कोई भी संपत्ती जमा नही की. ऐसा उनका त्याग था. उनके त्याग और कार्य को अभिवादन.

सुरेश घोरपडे पूर्व न्यायाधीश

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दिल्ली में उमर खालिद पर जानलेवा हमला

नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में संसद के पास स्थित कॉन्स्टिट्यूशन क्लब के बाहर जेएनयू के छात्र उमर खालिद पर जानलेवा हमला हो गया. खालिद मोब लिन्चींग पर आयोजित एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने आये थे. कार्यक्रम में जाने के पहले उमर खालिद जब अपने दोस्तों के साथ बाहर चाय पी रहे थे तभी उनपर ये हमला हुआ. घटना दोपहर तकरीबन तीन बजे की है. घटना स्थल पर मौजूद लोगों के मुताबिक जब खालिद चाय पी रहे थे तभी 5-6 युवकों ने हमला कर दिया, जिस पर खालिद के साथ मौजूद लोगों की उनके साथ हाथापाई हो गई, जिसमें रिवाल्वर गिर गया. किसी को गोली नहीं लगी, लेकिन हमलावर भागने में कामयाब रहें। पुलिस ने रिवाल्वर बरामद कर लिया है. हालांकि कुछ लोगों का यह भी कहना था कि उन्होंने गोली की आवाज नहीं सुनी. इस मामले में पुलिस ने उमर खालिद से शुरुआती पूछताछ के बाद उन्हें और पूछताछ के लिए पीछे के दरवाजे से बाहर लेकर चली गई. इस घटना के बाद सुरक्षा व्यवस्था को लेकर दिल्ली पुलिस पर सवाल उठ गए हैं. 15 अगस्त के ठीक पहले दिल्ली के केंद्र में संसद के पास इस तरह का हमला हमलावरों के हौंसले को भी बताता है. पूरा घटनाक्रम क्या है, यह वहां का सीसीटीवी फुटेज सामने आने के बाद सामने आएगा. यह घटना दिल्ली पुलिस के लिए एक चुनौती बन गई है.

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यूपी शिया वक्फ बोर्ड ने स्वतंत्रता दिवस पर ‘भारत माता की जय’ बोलना किया अनिवार्य

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के शिया वक्फ बोर्ड ने 15 अगस्त को होने वाले स्वतंत्रता दिवस के आयोजन पर ‘भारत माता की जय’ बोलना अनिवार्य कर दिया है. शनिवार को बोर्ड ने इस संबंध में काफी कड़े शब्दों में कहा कि अगर उनके निर्देशों को फॉलो नहीं किया गया तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी.

शिया वक्फ बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिज़वी ने कहा, ‘शिया वक्फ बोर्ड ने एक आदेश जारी किया है जिसके तहत 15 अगस्त को वक्फ बोर्ड की संपत्ति पर किए गए किसी भी कार्यक्रम में राष्ट्रगान के बाद भारत माता की जय बोलना ज़रूरी होगा. कोई भी अगर इस आदेश का पालन नहीं करेगा तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी.’

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रानी लक्ष्मीबाई की जान बचाने वाली योद्धाः झलकारी बाई

1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम और बाद के स्वतन्त्रता आन्दोलनों में देश के अनेक वीरों और वीरांगनाओं ने अपनी कुर्बानी दी. इतिहासकारों ने उन्हें अनदेखा करने की कोशिश की, लेकिन उन्हें इतनी अधिक लोक मान्यता मिली कि उनकी शहादत बहुत दिनों तक गुमनाम नहीं रह सकी. अपने शासक झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के प्राण बचाने के लिए स्वयं बलिदान हो जाने वाली वीरांगना झलकारी बाई ऐसी ही एक अमर शहीद वीरांगना हैं.

अपनी मातृभूमि झांसी और राष्ट्र की रक्षा के लिए झलकारी बाई के दिये गये बलिदान को तब के इतिहासकार भले ही अपने स्वार्णिम पृष्टों में न समेट सके हों किन्तु झांसी के लोक इतिहासकारों, कवियों एवं लेखकों ने वीरांगना झलकारी बाई के स्वतंत्रता संग्राम में दिये गये योगदान को श्रद्धा के साथ स्वीकार किया.

वीरांगना झलकारी बाई का जन्म 22 नवंबर 1820 ई० को झांसी के समीप भोजला नामक गांव में एक सामान्य कोरी परिवार में हुआ था. झलकारी बाई को औपचारिक शिक्षा ग्रहण करने का अवसर तो नहीं मिला किन्तु वीरता और साहस झलकारी में बचपन से मौजूद था. थोड़ी बड़ी होने पर झलकारी की शादी झांसी के पूरनलाल से हो गयी जो रानी लक्ष्मीबाई की सेना में तोपची था. शुरुआत में वो घेरलू महिला थी किन्तु सैनिक पति का उन पर बड़ा प्रभाव पड़ा. धीरे–धीरे उन्होंने अपने पति से सारी सैन्य विद्याएं सीख ली और एक कुशल सैनिक बन गईं.

इस बीच झलकारी बाई के जीवन में आई कठिनाइयों के दौरान उनकी वीरता और निखर कर सामने आई. इसकी भनक धीरे – धीरे रानी लक्ष्मीबाई को भी मालूम हुई. रानी झांसी ने झलकारी बाई को बुलावा भेजा. और जब झलकारी बाई रानी लक्ष्मीबाई के सामने आईं, तो वो दोनों एक-दूसरे को देखते रह गए. दोनों की शक्लें एक-दूसरे से काफी मिलती थी. रानी ने झलकारी बाई को पहले अपनी महिला सेना में शामिल कर लिया और बाद से उनकी वीरता और साहस को देखते हुए उन्हें महिला सेना का सेनापति बना दिया.

जब रानी लक्ष्मीबाई का अग्रेंजों के विरूद्ध निर्णायक युद्ध हुआ उस समय रानी की ही सेना का एक विश्वासघाती सैनिक अंग्रेजी सेना से मिल गया और धोखे से झांसी के किले के ओरछा गेट का फाटक खोल दिया. फिर क्या था, अंग्रेजी सेना झांसी के किले में घुस पड़ी. उस समय रानी लक्ष्मीबाई को अंग्रेजों की सेना से घिरता हुआ देख वीरांगना झलकारी बाई ने बलिदान और राष्ट्रभक्ति की अदभुत मिशाल पेश की थी.

जैसा कि हमने बताया की झलकारी बाई की शक्ल रानी लक्ष्मीबाई से मिलती थी. रानी लक्ष्मीबाई को बचाने के लिए झलकारी बाई ने एक उपाय सोचा. अपनी सूझ बुझ और रण कौशल का परिचय देते हुए वह स्वयं रानी लक्ष्मीबाई बन गयी और असली झांसी की रानी लक्ष्मीबाई को सकुशल किले से बाहर निकाल दिया और खुद अंग्रेजी सेना से संघर्ष करती हुई शहीद हो गईं. अंग्रेजों को लगा कि रानी को मारकर उन्होंने युद्ध जीत लिया.

लेकिन उस धोखेबाज सैनिक के बताने पर पता चला कि यह रानी लक्ष्मीबाई नहीं बल्कि महिला सेना की सेनापति झलकारी बाई है जो अंग्रेजी सेना को धोखा देने के लिए रानी लक्ष्मीबाई बन कर लड़ रही है. अंग्रेज बलिदान की इस मिसाल को देख चकित रह गए. वीरांगना झलकारी बाई के इस बलिदान को बुन्देलखण्ड तो क्या भारत का स्वतन्त्रता संग्राम कभी भुला नहीं सकता.

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हैंडपंप लगवाकर विधायक ने की दलित परिवार की मदद, पानी पिलाकर पूरी की प्रतिज्ञा

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भदोही। यूपी के भदोही जिले में स्थानीय विधायक के सहयोग से पानी की समस्या से जूझ रहे एक दलित परिवार के चेहरे पर मुस्कान लौट आई है. स्थानीय विधायक की मदद के कारण 24 घंटे में घर में हैंडपंप लग गया और पानी की दिक्कत दूर हो गई. इतना ही नहीं ज्ञानपुर विधायक विजय मिश्रा ने हैंडपंप से पानी निकालकर खुद पिया और परिवार के मुखिया को पिलाकर उसकी प्रतिज्ञा भी पूरी की.

दरअसल, भदोही जिले के सागरपुर बवई गांव निवासी दलित लालमणि पेयजल समस्या से जूझ रहा था. इसकी जानकारी विधायक विजय मिश्रा को हुई तो उन्होंने सहयोग किया. इससे उसके घर 24 घंटे के अंदर हैंडपंप लग गया . हालांकि हैंडपंप लगने के बाद भी लालमणि उसका पानी नहीं पी रहा था. उसकी जिद थी कि जब तक विधायक स्वयं हैंडपंप चलाकर उद्घाटन नहीं करेंगे तब तक वह पानी नहीं पिएगा.

इस प्रतिज्ञा के साथ वह पिछले हैंडपंप लग जाने के बावजूद उसका पानी नहीं पी रहा था. विधायक को जैसे ही इस बारे में जानकारी मिली, वह लालमणि के घर पहुंचे और हैंडपंप चलाकर उद्घाटन किया. इसके बाद लालमणि ने हैंडपंप का पानी ग्रहण किया. इस बात की चर्चा समूचे क्षेत्र में बनी हुई है.

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धर्मांतरित आदिवासियों को भी मिलता रहेगा आरक्षण का लाभ : केंद्र सरकार

बलिया। केंद्रीय मंत्री जुएल उरांव ने कहा है कि केंद्र सरकार अनुसूचित जनजाति में आने वाले धर्मांतरित हिंदुओं, ईसाइयों तथा मुसलमानों को अनुसूचित जनजाति के तहत मिलने वाली सुविधा को रोकने पर विचार नहीं कर रही है. मौजूदा व्यवस्था जारी रहेगी. उरांव ने स्वामी करपात्री जी के जयंती समारोह में भाग लेने के बाद यहाँ संवाददाताओं से बातचीत में कहा कि भाजपा अनुसूचित मोर्चा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की पिछले दिनों दिल्‍ली में हुई बैठक में एक प्रस्‍ताव के जरिये यह मांग की गयी है कि धर्मांतरित हिंदुओं, ईसाइयों तथा मुसलमानों को अनुसूचित जनजाति के बतौर दी जाने वाली सुविधा रोक दी जाये, लेकिन केंद्र सरकार का रुख कानून के अनुसार स्पष्ट है. यह सुविधा इन धर्मांतरित समुदायों को मिलती रहेगी.

उन्‍होंने कहा “आज की संवैधानिक व्‍यवस्‍था के हिसाब से अनुसूचित जनजाति में किसी भी धर्म का व्‍यक्ति हो, वह चाहे ईसाई हो, मुस्लिम हो या हिंदू हो, उसे अनुसूचित जनजातियों को मिलने वाले अधिकार पाने का हक है. अनुसूचित जाति में धर्म परिवर्तन की स्थिति में ऐसा नहीं होता. यह कानूनी स्थिति है. मैं भारत सरकार का मंत्री हूं. मंत्री संविधान और कानून के हिसाब से चलता है.”

गौरतलब है कि भाजपा अनुसूचित जनजाति मोर्चा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की पिछले रविवार को नयी दिल्ली में हुई बैठक में मोर्चे की झारखंड इकाई के अध्यक्ष रामकुमार पाहन ने एक प्रस्‍ताव पेश करते हुए कहा था कि अनुसूचित जनजाति को मिलने वाले आरक्षण का लाभ धर्मांतरित आदिवासी उठा रहे हैं. इसी प्रकार दूसरे धर्म के लोग जानबूझ कर आदिवासी लड़कियों से विवाह कर वह सारा लाभ प्राप्त कर रहे हैं, जो अनुसूचित जनजाति को मिलना चाहिए. उन्‍होंने प्रस्‍ताव रखते हुए कहा था कि जिस आदिवासी ने अपने मूल धर्म को त्याग दूसरे धर्म को अपना लिया है, उसे अनुसूचित जनजाति के तहत आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए. साथ ही जिस आदिवासी महिला ने किसी गैर आदिवासी से शादी कर ली है, उसे भी आरक्षण का लाभ नहीं दिया जाना चाहिए.

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दाऊद के नाम पर बसपा विधायक को धमकी, ‘1 करोड़ रुपये दो वरना तुम्हारे लिए एक गोली काफी है’

लखनऊ। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के विधायक उमाशंकर सिंह ने उनसे एक करोड़ रुपये की रंगदारी मांगे जाने का दावा करते हुए अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहीम से जान का खतरा बताया है. बलिया के रसड़ा क्षेत्र से विधायक सिंह ने रविवार को यहां संवाददाताओं को बताया कि गत छह अगस्त को उन्हें मोबाइल पर अपना ई-मेल देखने का संदेश आया था. तब उन्होंने इसे गंभीरता से नहीं लिया. चूंकि आमतौर पर युवा उन्हें अपना बायोडाटा भेजते हैं, लिहाजा उन्होंने सोचा कि ऐसा ही कोई ई-मेल आया होगा, जिसे वह बाद में देख लेंगे.़

विधायक ने बताया कि आठ अगस्त को उन्हें उसी नम्बर से एक और संदेश मिला, जिसमें लिखा था कि “आखिरी चेतावनी, जीना या मरना, एक करोड़ रुपये”. ई-मेल देखने पर उन्हें उस पर दाऊद इब्राहीम की तस्वीर नजर आयी. ई-मेल में लिखा था,‘‘ आप बलिया के लोगों की सेवा कर रहे हैं. अगर आप इसे जारी रखना चाहते हैं तो एक करोड़ रुपये दो, वरना तुम्हारे लिये एक ही गोली काफी है. हम आपको किसी भी वक्त मार सकते हैं.’’

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