बिहार के मोतिहारी ज़िले में महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर संजय कुमार पर शुक्रवार को कुछ लोगों ने जानलेवा हमला किया है.घायल हालत में उन्हें बेहतर इलाज के लिए पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पीटल (पीएमसीएच) रेफ़र किया गया है, जहां उनकी स्थिति गंभीर बनी हुई है. उनके सहकर्मी मृत्युंजय कुमार ने बीबीसी से बताया, “इमरजंसी वार्ड में हैं, उनकी जांच हो रही है. सीटी स्कैन और अल्ट्रासाउंड हुए हैं, रिपोर्ट का इंतज़ार कर रहे हैं
मृत्युंजय कुमार के मुताबिक एक ही राहत की बात है कि रात तीन बजे के बाद से संजय बेहोश नहीं हुए हैं, पहले तो थोड़ी थोड़ी देर में वे बेहोश हो जा रहे थे.
उधर दूसरी ओर महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी के शिक्षक संघ ने संजय कुमार पर हुए जानलेवा हमले की निंदा करते हुए अपना बयान जारी किया है, जिसमें कहा गया है, “एक कथित फ़ेसबुक पोस्ट को बहाना बनाकर अराजक तत्वों ने मॉब लिंचिंग के रुप में एक साजिश के तहत डॉ. संजय पर हमला किया और उन्हें ज़िंदा जलाने की कोशिश की. एक शिक्षक को सरेआम मारने-जलाने का तांडव होता है और कुलपति महोदय शिक्षक को देखने तक नहीं आते.”
मॉब लिंचिंग की कोशिश
संजय कुमार की ओर मोतिहारी के नगर थाने में दर्ज कराई गई रिपोर्ट में कहा गया है कि उनकी मॉब लिंचिंग की कोशिश की गई, पेट्रोल डालकर ज़िंदा जलाने की कोशिश की गई. संजय कुमार ने 12 लोगों के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराई है, पुलिस ने मामला दर्ज करके मामले की जांच शुरू कर दी है लेकिन संजय कुमार की ओर से कहा जा रहा है कि पुलिस मामले को गंभीरता से नहीं ले रही है और मॉब लिंचिंग की कोशिश को देखते हुए धारा 307 के तहत मुक़दमा दर्ज नहीं किया है.
मोतिहारी के पुलिस अधीक्षक उपेंद्र कुमार शर्मा ने बीबीसी को बताया, “उनकी शिकायत के बाद पुलिस मामले की जांच कर रही है. धारा 307 के तहत तभी मुक़दमा दर्ज हो सकता था, जब उनके शरीर पर उस तरह की इंजरी होती, वैसी इंजरी थी नहीं. लेकिन जितने तरह के मामले हो सकते थे, वो सब लगाए गए हैं. इस मामले में अभी तक किसी को गिरफ्तारी नहीं हुई है.”
स्थानीय पत्रकार नीरज सहाय के मुताबिक ये घटना शुक्रवार दोपहर लगभग एक बजे की है. लेकिन पुलिस ने घटना के करीब सात-आठ घंटे बाद प्राथमिकी दर्ज की.
हमले की वजह क्या?
संजय कुमार पर हमले की वजह क्या इसको लेकर अब तक दो बातें सामने आई हैं. संजय कुमार ने स्थानीय पुलिस के पास जो प्राथमिकी दर्ज कराई है उसमें भी सोशल पोस्ट को हमले की वजह बताया है. हमले से ठीक पहले उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की मौत के बाद दो पोस्ट लिखे थे जो अटल समर्थकों को नागवार लग सकता है.
अपनी एक पोस्ट में उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी को संघी कहा है, जिन्होंने अपनी भाषण देने की कला से हिंदुत्व को मिडिल क्लास के बीच सेक्सी बना दिया. वहीं एक दूसरी पोस्ट में संजय ने लिखा है कि भारतीय फासीवाद का एक युग समाप्त हुआ.
वैसे संजय कुमार की फेसबुक प्रोफ़ाइल पर अब ये पोस्ट नज़र नहीं आ रही है. मृत्युजंय कुमार बताते हैं, “हमलोग पोस्ट तो नहीं ही हटाते. इस पोस्ट पर जितनी गालियां पड़ी थीं उसे देखते हुए फ़ेसबुक ने इसे स्पैम में डाल दिया होगा. इन पोस्टों के चलते ही संजय पर शुक्रवार को ही हमला हो गया.”
विश्वविद्यालय की राजनीति
वैसे केवल सोशल पोस्ट ही हमले की वजह रही हो ऐसा भी नहीं है. दरअसल संजय कुमार बीते कुछ महीनों से विश्वविद्यालय प्रशासन के ख़िलाफ़ संघर्ष करते आ रहे थे. मृत्युंजय कुमार ने बताया कि वे लोग विभिन्न मुद्दों पर विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ़ 29 मई से ही शांतिपूर्ण तरीके से धरने पर बैठे हुए हैं.
मृत्युंजय कुमार का दावा है कि यही बात विश्वविद्यालय से जुड़े कई लोगों को पसंद नहीं आ रही थी. ऐसे में विश्वविद्यालय कैंपस की आपसी राजनीति और जोर अजमाइश की इस हमले में अहम भूमिका रही होगी. इस बात की तस्दीक महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी के शिक्षक संघ की ओर से जारी बयान से भी होती है.
संजय कुमार ने पुलिस के पास दर्ज अपनी शिकायत में ये कहा है कि उनके साथ मारपीट करने वाले लोग उन्हें इस्तीफ़ा देने और यहां से भागने की बात कह रहे थे.
लेकिन इस पूरे मामले ने एक बार फिर बिहार सरकार पर सवालिया निशान लगा दिया है. पहले से मुज़फ़्फ़रपुर बालिक गृह कांड से शर्मसार राज्य प्रशासन की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. विपक्षी दल इस मसले को मुद्दा बनाने की कोशिश करेंगे. मॉब लिंचिंग की इस कोशिश पर कांग्रेस के विधायक शकील अहमद ख़ान ने स्थानीय पत्रकार नीरज सहाय से कहा है, ”इस प्रकरण को देखकर लगता है कि बिहार में भी मॉब लिंचिंग की शुरुआत हो गई है. प्रशासन इस घटना को छिपाने का प्रयास कर रहा है. हमने इस घटना की जांच की मांग की है.”
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इमरान के शपथ ग्रहण में देश-विदेश से मेहमान पहुंचे हैं इनमें भारत के क्रिकेटर से राजनेता बने नवजोत सिंह सिद्धू भी शामिल हैं.
रायपुर| बसपा सुप्रीमो मायावती ने निर्देश दिया है कि सितंबर से पहले पार्टी प्रदेश में सभी बूथों पर अपने एजेंटों की नियुक्ति कर ले। इतना ही नहीं सेक्टर और ब्लॉक लेवल पर भी चुनावी टीम इस अवधि के अंदर तैयार ली जाए। सितंबर के पहले या दूसरे हफ्ते में छग बसपा के छह प्रभारी तीसरी समीक्षा बैठक करेंगे। हालांकि इससे पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ उनकी बैठक की संभावना भी है। पार्टी ने चुनाव के मद्देनजर संगठन में बड़ा बदलाव किया है। जिसके बाद प्रदेश को चार जोन में बांटा गया है। पहले पार्टी पांच जोन के आधार पर चुनाव लड़ती रही है। जोन एक में रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़, जांजगीर को रखा गया है। जबकि जोन दो में कोरबा और सरगुजा की लोस और विस सीटें हैं। जोन तीन में महासमुंद, दुर्ग, राजनांदगांव और जोन चार में बस्तर,कांकेर की सीटें रखी गई है। इसी के मुताबिक पार्टी चुनावी गतिविधियां संचालित करेगी। चारों जोन में प्रदेश कार्यकारिणी के पदाधिकारियों के साथ स्थानीय पदाधिकारी भी होंगे। वहीं जोन की टीम की मॉनिटरिंग प्रदेश प्रभारियों के जिम्मे होंगी। बसपा के फिलहाल छह प्रदेश प्रभारी हैं।
Ø बात 1984-1989 के दौर की है जब राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री थे और अटल बिहारी वाजपेयी किडनी संबंधी बीमारी से जूझ रहे थे. तब भारत में इस बीमारी के लिए उत्तम चिकित्सा व्यस्था उपलब्ध न थी. और आर्थिक वजहों से वाजपेयी अमेरिका जा पाने में सक्षम नहीं थे.
Ø जब अटलजी पहली बार सांसद बने थे तो वह वक्त सांसदों की ऐश का वक्त नहीं था. सुविधाएं भी काफी कम थी. भाजपा नेता जगदीश प्रसाद माथुर और अटलजी दोनों एक साथ चांदनी चौक में रहते थे. दोनों साथ-साथ पैदल ही संसद जाते-आते थे. छह महीने बाद अटलजी ने रिक्शे से चलने को कहा तो माथुरजी को आश्चर्य हुआ. असल में उस दिन उन्हें बतौर सांसद छह महीने की तनख्वाह एक साथ मिली थी. अटलजी के लिए यही उनकी ऐश थी.
Ø वाजपेयी भी नेहरू जी की काफी इज्जत करते थे. 1977 में जब वाजपेयी विदेश मंत्री के रूप में अपना कार्यभार संभालने साउथ ब्लॉक के अपने दफ़्तर गए तो उन्होंने नोट किया कि दीवार पर लगा नेहरू का एक चित्र ग़ायब है. वाजपेयी ने तुरंत अपने सचिव से पूछा कि नेहरू का चित्र कहां है, जो यहां लगा रहता था. वाजपेयी ने आदेश दिया कि उस चित्र को वापस लाकर उसी स्थान पर लगाया जाए जहां वह पहले लगा हुआ था.
Ø बात 1996 की है. वाजपेयी ने पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी. तब नरसिम्हा राव ने चुपके से वाजपेयी के हाथ में एक पर्ची पकड़ाई. इस तरह कि कोई देख न पाए. इस पर्ची में राव ने वे तमाम बिंदु लिखे थे जो वह खुद बतौर प्रधानमंत्री करना चाहते थे, किंतु चाहकर भी न कर पाए. आज के दौर में इस तरह की राजनीति की कल्पना नहीं की जा सकती.

नई दिल्ली। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न से सम्मानित दिग्गज नेता अटल बिहारी वाजपेयी नहीं रहें. 12 घंटे से ज्यादा समय से वेंटिलेटर पर रहने के बाद उन्होंने एम्स में आखिरी सांस ली. इस बीच देश भर के दिग्गज नेता और तमाम प्रदेशों के मुख्यमंत्री दिल्ली पहुंच चुके हैं. सुबह से ही उनका एम्स जाकर वाजपेयी से मिलने का सिलसिला जारी था. देर शाम उनको देखने के लिए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार औऱ बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती भी पहुंची थीं.
बता दें इरफान खान ने इस दर्दनाक अपनी बीमारी का खुलासा एक ट्वीट करके किया था. इरफान ने ट्वीट कर लिखा था, जिंदगी में अचानक कुछ ऐसा हो जाता है जो आपको आगे लेकर जाती है.
उन्होंने टेस्ट में 46, वनडे में एक और प्रथम श्रेणी करियर में 271 कैच लपके. टेस्ट करियर में उन्होंने एकमात्र शतक न्यूजीलैंड के खिलाफ 1968 में वेलिंगटन में लगाया. इस टेस्ट की पहली पारी में उन्होंने 143 रन बनाए थे. भारत ने यह टेस्ट आठ विकेट से जीता था. वाडेकर चार बार नर्वस नाइंटीज का भी शिकार बने, जिसमें एक बार वह 99 रन पर आउट हुए थे. रणजी ट्रॉफी में 17 वर्षो के करियर में उन्होंने 73 मैचों में कुल 4288 रन बनाए जिनमें उनका औसत 57.94 था. उन्होंने 1966-67 में मैसूर के खिलाफ रणजी ट्रॉफी मैच में 323 का सर्वश्रेष्ठ स्कोर बनाया. उन्होंने 18 दलीप ट्रॉफी मैच खेले, छह में वह पश्चिम क्षेत्र के कप्तान रहे.
गौरतलब है कि एक वक्त में वाजपेयी जी और लाल कृष्ण आडवाणी ने साथ मिलकर भाजपा को ऊंचाई पर पहुंचाया था. भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने वाले अटल बिहारी वाजपेयी पहले नेता थे. अब तक के भाजपा नेताओं में कोई भी वाजपेयी जी के करिश्मे की बराबरी नहीं कर पाया है. वाजपेयी न सिर्फ भाजपा बल्कि तमाम विरोधी दलों के बीच भी काफी लोकप्रिय रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी के इतिहास में अटल-आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की तिकड़ी काफी प्रचलित रही है. तीनों नेता पार्टी को उस ऊंचाई तक ले गए, जिसकी कल्पना भाजपा शुरुआती दिनों में देखा करती थी.