बिहार में असिस्टेंट प्रोफेसर की मॉब लिंचिंग की कोशिश

बिहार के मोतिहारी ज़िले में महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर संजय कुमार पर शुक्रवार को कुछ लोगों ने जानलेवा हमला किया है.घायल हालत में उन्हें बेहतर इलाज के लिए पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पीटल (पीएमसीएच) रेफ़र किया गया है, जहां उनकी स्थिति गंभीर बनी हुई है. उनके सहकर्मी मृत्युंजय कुमार ने बीबीसी से बताया, “इमरजंसी वार्ड में हैं, उनकी जांच हो रही है. सीटी स्कैन और अल्ट्रासाउंड हुए हैं, रिपोर्ट का इंतज़ार कर रहे हैं मृत्युंजय कुमार के मुताबिक एक ही राहत की बात है कि रात तीन बजे के बाद से संजय बेहोश नहीं हुए हैं, पहले तो थोड़ी थोड़ी देर में वे बेहोश हो जा रहे थे.

उधर दूसरी ओर महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी के शिक्षक संघ ने संजय कुमार पर हुए जानलेवा हमले की निंदा करते हुए अपना बयान जारी किया है, जिसमें कहा गया है, “एक कथित फ़ेसबुक पोस्ट को बहाना बनाकर अराजक तत्वों ने मॉब लिंचिंग के रुप में एक साजिश के तहत डॉ. संजय पर हमला किया और उन्हें ज़िंदा जलाने की कोशिश की. एक शिक्षक को सरेआम मारने-जलाने का तांडव होता है और कुलपति महोदय शिक्षक को देखने तक नहीं आते.”

मॉब लिंचिंग की कोशिश

संजय कुमार की ओर मोतिहारी के नगर थाने में दर्ज कराई गई रिपोर्ट में कहा गया है कि उनकी मॉब लिंचिंग की कोशिश की गई, पेट्रोल डालकर ज़िंदा जलाने की कोशिश की गई. संजय कुमार ने 12 लोगों के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराई है, पुलिस ने मामला दर्ज करके मामले की जांच शुरू कर दी है लेकिन संजय कुमार की ओर से कहा जा रहा है कि पुलिस मामले को गंभीरता से नहीं ले रही है और मॉब लिंचिंग की कोशिश को देखते हुए धारा 307 के तहत मुक़दमा दर्ज नहीं किया है.

मोतिहारी के पुलिस अधीक्षक उपेंद्र कुमार शर्मा ने बीबीसी को बताया, “उनकी शिकायत के बाद पुलिस मामले की जांच कर रही है. धारा 307 के तहत तभी मुक़दमा दर्ज हो सकता था, जब उनके शरीर पर उस तरह की इंजरी होती, वैसी इंजरी थी नहीं. लेकिन जितने तरह के मामले हो सकते थे, वो सब लगाए गए हैं. इस मामले में अभी तक किसी को गिरफ्तारी नहीं हुई है.”

स्थानीय पत्रकार नीरज सहाय के मुताबिक ये घटना शुक्रवार दोपहर लगभग एक बजे की है. लेकिन पुलिस ने घटना के करीब सात-आठ घंटे बाद प्राथमिकी दर्ज की.

हमले की वजह क्या?

संजय कुमार पर हमले की वजह क्या इसको लेकर अब तक दो बातें सामने आई हैं. संजय कुमार ने स्थानीय पुलिस के पास जो प्राथमिकी दर्ज कराई है उसमें भी सोशल पोस्ट को हमले की वजह बताया है. हमले से ठीक पहले उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की मौत के बाद दो पोस्ट लिखे थे जो अटल समर्थकों को नागवार लग सकता है.

अपनी एक पोस्ट में उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी को संघी कहा है, जिन्होंने अपनी भाषण देने की कला से हिंदुत्व को मिडिल क्लास के बीच सेक्सी बना दिया. वहीं एक दूसरी पोस्ट में संजय ने लिखा है कि भारतीय फासीवाद का एक युग समाप्त हुआ.

वैसे संजय कुमार की फेसबुक प्रोफ़ाइल पर अब ये पोस्ट नज़र नहीं आ रही है. मृत्युजंय कुमार बताते हैं, “हमलोग पोस्ट तो नहीं ही हटाते. इस पोस्ट पर जितनी गालियां पड़ी थीं उसे देखते हुए फ़ेसबुक ने इसे स्पैम में डाल दिया होगा. इन पोस्टों के चलते ही संजय पर शुक्रवार को ही हमला हो गया.”

विश्वविद्यालय की राजनीति

वैसे केवल सोशल पोस्ट ही हमले की वजह रही हो ऐसा भी नहीं है. दरअसल संजय कुमार बीते कुछ महीनों से विश्वविद्यालय प्रशासन के ख़िलाफ़ संघर्ष करते आ रहे थे. मृत्युंजय कुमार ने बताया कि वे लोग विभिन्न मुद्दों पर विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ़ 29 मई से ही शांतिपूर्ण तरीके से धरने पर बैठे हुए हैं.

मृत्युंजय कुमार का दावा है कि यही बात विश्वविद्यालय से जुड़े कई लोगों को पसंद नहीं आ रही थी. ऐसे में विश्वविद्यालय कैंपस की आपसी राजनीति और जोर अजमाइश की इस हमले में अहम भूमिका रही होगी. इस बात की तस्दीक महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी के शिक्षक संघ की ओर से जारी बयान से भी होती है.

संजय कुमार ने पुलिस के पास दर्ज अपनी शिकायत में ये कहा है कि उनके साथ मारपीट करने वाले लोग उन्हें इस्तीफ़ा देने और यहां से भागने की बात कह रहे थे.

लेकिन इस पूरे मामले ने एक बार फिर बिहार सरकार पर सवालिया निशान लगा दिया है. पहले से मुज़फ़्फ़रपुर बालिक गृह कांड से शर्मसार राज्य प्रशासन की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. विपक्षी दल इस मसले को मुद्दा बनाने की कोशिश करेंगे. मॉब लिंचिंग की इस कोशिश पर कांग्रेस के विधायक शकील अहमद ख़ान ने स्थानीय पत्रकार नीरज सहाय से कहा है, ”इस प्रकरण को देखकर लगता है कि बिहार में भी मॉब लिंचिंग की शुरुआत हो गई है. प्रशासन इस घटना को छिपाने का प्रयास कर रहा है. हमने इस घटना की जांच की मांग की है.”

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पाकिस्तान के 22वें प्रधानमंत्री बने इमरान ख़ान

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इमरान ख़ान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बन गए हैं. उन्होंने शनिवार को एक पाकिस्तान के 22वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली. शपथ ग्रहण समारोह में इमरान खान की पत्नी बुशरा मेनका भी शामिल हुईं. इमरान की पार्टी तहरीक ए इंसाफ़ ने इस बाबत ट्वीट किया.

तहरीक ए इंसाफ़ ने लिखा कि हमने बहुत समय से इस वक्त का इंतजार किया है.

25 जुलाई को हुए चुनाव में पीटीआई पाकिस्तान की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी हालांकि अपने दम पर सरकार बनाने में यह कुछ सीटों से चूक गई. मतों के जादुई आंकड़े को छूने के लिए पीटीआई नेतृत्व ने कथित रूप से मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट-पाकिस्तान (एमक्यूएम-पी), ग्रैंड डेमोक्रेटिक एलायंस (जीडीए), पीएमएल-कैद (पीएमएल-क्यू) और बलूचिस्तान अवामी पार्टी (बीएपी) के साथ साथ निर्दलियों से संपर्क साधा था.

इमरान को बहुमत मिला

पाकिस्तान में भारत के उलट सदन में बहुमत पहले साबित करना होता है. पाकिस्तान की संसद में 173 बहुमत का आंकड़ा होता है और संसद में हुई वोटिंग में इमरान ख़ान को इससे तीन अधिक यानी 176 वोट मिले हैं. नेशनल असेंबली में हुई वोटिंग में पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ को 176 जबकि उनके विरोधी पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) के अध्यक्ष शहबाज शरीफ़ को केवल 96 वोट मिले.

इमरान के शपथ ग्रहण में देश-विदेश से मेहमान पहुंचे हैं इनमें भारत के क्रिकेटर से राजनेता बने नवजोत सिंह सिद्धू भी शामिल हैं.

चुनाव में जीत के बाद इमरान ने क्या कहा था?

चुनाव में बड़ी जीत के बाद इमरान ख़ान प्रेस ने कॉन्फ़्रेंस किया. उसमें उन्होंने कहा कि 22 साल की लड़ाई के बाद मुझे उस मुकाम पर पहुंचाया है. उन्होंने कहा, “मैंने चुनावों में जो वादा किया था उसे पूरा करूंगा. 22 साल पहले मैं क्यों सियासत में आया था? मैं ये समझता हूं कि मेरे मुल्क की जो ताक़त थी, जिस तरह से देश विकास कर रहा था वो नीचे आया. मैं चाहता था कि हमारा देश फिर से बड़ा बने.”

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वनांचल क्षेत्र कुई में आदिवासी छात्रावास एवं आश्रमों को दिए जाने वाले राशन में कटौती

छत्तीसगढ़। वनांचल क्षेत्र कुई में आदिम जाति कल्याण विभाग द्वारा संचालित आदिवासी छात्रावास एवं आश्रमों को दी जाने वाली 42 क्विंटल चावल के स्थान पर केवल 27 क्विंटल चावल दिया गया है। इस तरह 15 क्विंटल चावल की कटौती कर दी गई है। कटौती के संबंध में कोई जानकारी नहीं है, इससे परेशानी बढ़ गई है।

कुकदूर में आदिवासी बालक छात्रावास, नवीन आदिवासी बालक छात्रावास, ठक्कर बापा आदिवासी बालक छात्रावास और कुई के आदिवासी कन्या छात्रावास, आदिवासी बालक आश्रम और आदिवासी कन्या आश्रम संचालित हैं। इन छात्रावास व आश्रम में कुल 300 बच्चे रहकर पढ़ाई कर रहे हैं। नियमत: छात्रावास एवं आश्रमों में रहने वाले छात्रों को प्रति छात्र, प्रतिदिन 500 ग्राम के हिसाब से पूरे माह के लिए सोसाइटी में रियायत दर पर हर माह चावल आवंटन दिया जाता है।

पुराना आदिवासी बालक छात्रावास को 6 के स्थान पर 4 क्विंटल ही दिया गया

नवीन आदिवासी बालक छात्रावास अधीक्षक रामगोपाल वर्मा ने बताया कि अगस्त माह में मिलने वाला चावल 7 क्विंटल 30 किलो के स्थान पर 5 क्विंटल, पुराना आदिवासी बालक छात्रावास कुकदूर को 6 क्विंटल के स्थान पर 4 क्विंटल, ठक्कर बापा आदिवासी बालक छात्रावास कुकदूर को 4 क्विंटल 50 किलो के स्थान पर 3 क्विंटल, आदिवासी कन्या छात्रावास कुई को 8 क्विंटल के स्थान पर 5क्विंटल 50 किलो, आदिवासी बालक आश्रम कुई को 8 क्विंटल के स्थान पर 5 क्विंटल, आदिवासी कन्या आश्रम कुई को 8 क्विंटल के स्थान पर 5 क्विंटल चावल ही दिया गया है। इसकी वजह से वहां के प्रभारियों की परेशानी बढ़ गई है।

यहां दर्ज बच्चों की संख्या

संस्था संख्या बच्चों की संख्या

कुई 2 आश्रम व 1 आश्रम 180 बच्चे

कुकदुर 03 छात्रावास 120 बच्चे

ऐसी कटौती समझ से परे है

अधीक्षिकों का कहना है कि अगस्त माह में पूरे माह स्कूल लगा है। चावल की मात्रा में 15 क्विंटल की कटौती समझ से परे है। अगस्त भर बच्चे छात्रावास में रहेंगे, तो खाएंगे क्या। छात्रावास अधीक्षक श्री वर्मा ने कहा अगस्त महीने की कटौती की गई चावल नहीं दिया तो खुले दुकान से ऊंचे दर पर खरीदना होगा।

बाद में आएगा तो फिर देंगे

सोसाइटी को अगस्त माह का कटौती कर चावल मिला है, उतना छात्रावास अधीक्षकों को दे दिया गया है। बाद में चावल आएगा, तो उन्हें फिर से दिया जाएगा। राकेश यादव, विक्रेता, आ.से स.समिति कुई कुकदुर

समय पर उठाव नहीं कर रहे

समय पर चावल का उठाव नहीं किया जा रहा है। इसे देखकर चावल आवंटन में कटौती की गई है। कीर्ति कौशिक, फूड इंस्पेक्टर पंडरिया

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बसपा ने प्रदेश को चार जोन में बांटा, प्रदेश प्रभारियों की बैठक में हुआ फैसला

रायपुर| बसपा सुप्रीमो मायावती ने निर्देश दिया है कि सितंबर से पहले पार्टी प्रदेश में सभी बूथों पर अपने एजेंटों की नियुक्ति कर ले। इतना ही नहीं सेक्टर और ब्लॉक लेवल पर भी चुनावी टीम इस अवधि के अंदर तैयार ली जाए। सितंबर के पहले या दूसरे हफ्ते में छग बसपा के छह प्रभारी तीसरी समीक्षा बैठक करेंगे। हालांकि इससे पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ उनकी बैठक की संभावना भी है। पार्टी ने चुनाव के मद्देनजर संगठन में बड़ा बदलाव किया है। जिसके बाद प्रदेश को चार जोन में बांटा गया है। पहले पार्टी पांच जोन के आधार पर चुनाव लड़ती रही है। जोन एक में रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़, जांजगीर को रखा गया है। जबकि जोन दो में कोरबा और सरगुजा की लोस और विस सीटें हैं। जोन तीन में महासमुंद, दुर्ग, राजनांदगांव और जोन चार में बस्तर,कांकेर की सीटें रखी गई है। इसी के मुताबिक पार्टी चुनावी गतिविधियां संचालित करेगी। चारों जोन में प्रदेश कार्यकारिणी के पदाधिकारियों के साथ स्थानीय पदाधिकारी भी होंगे। वहीं जोन की टीम की मॉनिटरिंग प्रदेश प्रभारियों के जिम्मे होंगी। बसपा के फिलहाल छह प्रदेश प्रभारी हैं।

सितंबर में तीसरी समीक्षा बैठक

सितंबर के पहले या दूसरे हफ्ते में तीसरी समीक्षा बैठक होगी। जिसमें प्रदेश प्रभारी संगठन के स्तर पर दिए गए निर्देश के आधार पर हुए कामों की प्रगति का रिव्यू करेंगे। कार्यकर्ताओं को सभी 90 सीटों पर तैयारियां करने के लिए कहा है। प्रदेश प्रभारियों की बैठक में हुआ फैसला।

लोकसभा की भी तैयारी

विधानसभा के साथ लोकसभा चुनाव की तैयारियों पर फोकस करने को कहा गया है। पहले बसपा जिलावार विधानसभा सीटों के आधार पर तैयारियां करती थी। लेकिन इस बार लोकसभा क्षेत्र में आने वाली सीटों के मुताबिक चुनाव की रणनीति बनाई जाएगी। प्रभारियों ने कहा कि अब इसी पैटर्न पर तैयारियां करना है।

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इस देशभक्त के लिए आप क्या कहेंगे

सर से लेकर पांव तक बागौर देखा जाए, तो मैले कुचैले कपड़ों के भीतर बसाता गन्धाता जीर्ण होता शरीर जो नहाने पर गीला ही हो पाता होगा, भीगे हुए तो अरसे गुजर चुके होंगे. शायद कोई भिखारी है या घरवालों की ओर से तिरस्कृत ,सभ्य कहलाए जाने वाले समाज का ही हिस्सा. जिसके पास हर रोज ढेरों ढेर दिक्कतें आती जाती होंगी.

मैं किसी की आस्था पर कोई सवाल नहीं उठा रही पर ये इंसान मुझे खुद से, औरों से कई गुना बेहतर लगा. इसके कपड़े और हाथ मे लटका थैला गवाह है कि इसका ठिकाना कोई फुटपाथ होगा , खुले आसमान के तले इसकी हर रात गुजरती होगी. जिंदगी समाज और देश को कोसने की कई मज़बूत वजह होंगी इसके पास. पर इसने इस पल को अनदेखा करने के बजाय इसका सम्मान अपनी पूरी शिद्दत से किया.

दूर से ही लकदक करते , नागरिक कहलाए जाने वाले सभ्य लोगों द्वारा आरोहित झंडे को नमन करते वक्त इसने अपने पांव की चप्पलें तक उतार दीं, शायद इस लिए कि इसके भीतर कृतज्ञ भाव का प्रत्यक्ष रूप अपने असल मे जीवित है……

ऐसा हम सब अपने पूजाघरों में करते हैं, आस्था डर या सदियों की पिलाई गयी घुट्टी के चलते हमारी आदत है मन बेमन अपने इष्ट के समक्ष नंगे पांव रहने की.

इस मासूम इंसान की उस चाह को मेरा नमन , जो इन साफ कपड़ो वाले झुंड का हिस्सा बनना चाह रही होगी.

इस इंसान के सलीके को नमन , जिसने लाखों तहज़ीब शुदा इंसानों को बिना शब्द बता दिया कि तहज़ीब किसी आला दर्जे के कॉवेन्ट की बपौती नहीं.

लेखक- Anu Verma के फेसबुक पोस्ट से

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अटलजी को लेकर बहुजनों और सवर्णों में वैचारिक टकराव कितना जायज

अटल बिहारी वाजपेयी का लंबी बीमारी के बाद 16 अगस्त को निधन हो गया. कहा जा रहा है कि उनके साथ एक युग का अंत हो गया. इसकी वजह शायद यह है कि अटल जी आज के दौर के इकलौते व्यक्ति थे, जिनके साथ उस दौर के तमाम नेताओं और पत्रकारों का अपना कोई न कोई किस्सा जुड़ा है. वाजपेयी के गुजर जाने के बाद तमाम लोग उन बातों का भी जिक्र कर रहे हैं जिससे एक बड़े समाज को धक्का लगा था.

बहुजन समाज के एक बड़े हिस्से और सवर्ण बुद्धिजीवियों के बीच अटल जी को लेकर सोशल मीडिया पर वैचारिक बहस भी छिड़ गई.

अटलजी को याद करते हुए बहुजन समाज कई ऐसी बातों का जिक्र कर रहा है, जिससे सवर्ण समाज गुस्से में है. मसलन, वाजपेयी ने अपने शासन में पेंशन योजना को खत्म कर दिया, जिसका खामियाजा देश के नौकरीपेशा मध्यम वर्ग को आज तक भुगतना पर रहा है. अटल जी के शासन में ही सरकारी कंपनियों को धड़ाधड़ बेचा गया. तो ऐसे ही उनके शासनकाल में संविधान समीक्षा की कोशिश भी की गई थी, जिसकी वजह से देश का एक बड़ा समाज उनका विरोधी रहा. मंडल कमीशन के खिलाफ निकाली गई सोमनाथ से अयोध्या तक की यात्रा को भी हरी झंडी वाजपेयी जी ने ही दिखाई. इस यात्रा के रास्ते में हुए दंगों में कई लोगों की जान चली गई थी. गुजरात के दंगों के समय भी वाजपेयी ही प्रधानमंत्री थे, लेकिन उन्होंने मोदी के खिलाफ कोई भी कठोर निर्णय नहीं लिया. कहा जाता है कि उन्हें मना लिया गया, लेकिन यह सवाल अब भी कायम है कि आखिर वो मान कैसे गए. अयोध्या की कहानी अलग है.

परमाणु विस्फोट को अटलजी ने “बुद्ध मुस्कुराए” कहा. चूंकि बुद्ध शांति के अग्रदूत हैं और दुनिया भर में माने जाते हैं. परमाणु विस्फोट जैसी घटना से बुद्ध का नाम जोड़ने से बौद्ध मत को मानने वाले तमाम देशों के लोगों ने वाजपेयी के इस कथन को गलत बताया था.

लेकिन इस सबके अलावा भी अटल जी से जुड़े कई किस्से हैं. हम आपको ऐसे ही चुनिंदा किस्से सुना रहे हैं, जिससे आप अटल जी के व्यक्तित्व के बारे में अंदाजा लगा सकते हैं.

Ø बात 1984-1989 के दौर की है जब राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री थे और अटल बिहारी वाजपेयी किडनी संबंधी बीमारी से जूझ रहे थे. तब भारत में इस बीमारी के लिए उत्तम चिकित्सा व्यस्था उपलब्ध न थी. और आर्थिक वजहों से वाजपेयी अमेरिका जा पाने में सक्षम नहीं थे.

यह बात राजीव गांधी तक पहुंची. एक दिन राजीव गांधी ने उन्हें अपने दफ्तर में बुलाया और कहा कि उन्हें भारत की तरफ से एक प्रतिनिधिमंडल के साथ संयुक्त राष्ट्र भेजा जा रहा है. राजीव गांधी ने वाजपेयी से कहा कि उन्हें उम्मीद है कि इस मौके का लाभ लेते हुए वे न्यूयॉर्क में अपना इलाज भी करवा लेंगे. इस तरह वाजपेयी न्यूयॉर्क गए और उनका इलाज हो सका. जब तक राजीव गांधी जिंदा रहे दोनों में से किसी ने इस बात को सार्वजनिक नहीं किया. बाद में राजीव गांधी की मौत पर प्रतिक्रिया देते हुए अटल जी ने खुद इस बात का जिक्र किया था कि वे जिंदा हैं तो सिर्फ राजीव गांधी की वजह से.

Ø जब अटलजी पहली बार सांसद बने थे तो वह वक्त सांसदों की ऐश का वक्त नहीं था. सुविधाएं भी काफी कम थी. भाजपा नेता जगदीश प्रसाद माथुर और अटलजी दोनों एक साथ चांदनी चौक में रहते थे. दोनों साथ-साथ पैदल ही संसद जाते-आते थे. छह महीने बाद अटलजी ने रिक्शे से चलने को कहा तो माथुरजी को आश्चर्य हुआ. असल में उस दिन उन्हें बतौर सांसद छह महीने की तनख्वाह एक साथ मिली थी. अटलजी के लिए यही उनकी ऐश थी.

Ø चुनाव हारने के बाद अटलजी फिल्म देखने चले जाते थे. लालकृष्ण आडवाणी ने एकबार एक किस्सा सुनाया था. उसके मुताबिक, दिल्ली में नयाबांस का उपचुनाव था. हमने बड़ी मेहनत की, लेकिन हम हार गए. हम दोनों खिन्न थे. दुखी थे. अटलजी ने मुझसे कहा कि चलो, कहीं सिनेमा देख आएं. अजमेरी गेट में हमारा कार्यालय था और पास ही पहाड़गंज में थिएटर. नहीं मालूम था कि कौन-सी फिल्म लगी है. पहुंचकर देखा तो राज कपूर की फिल्म थी- ‘फिर सुबह होगी’. मैंने अटलजी से कहा, ‘आज हम हारे हैं, लेकिन आप देखिएगा सुबह जरूर होगी.’

Ø वाजपेयी भी नेहरू जी की काफी इज्जत करते थे. 1977 में जब वाजपेयी विदेश मंत्री के रूप में अपना कार्यभार संभालने साउथ ब्लॉक के अपने दफ़्तर गए तो उन्होंने नोट किया कि दीवार पर लगा नेहरू का एक चित्र ग़ायब है. वाजपेयी ने तुरंत अपने सचिव से पूछा कि नेहरू का चित्र कहां है, जो यहां लगा रहता था. वाजपेयी ने आदेश दिया कि उस चित्र को वापस लाकर उसी स्थान पर लगाया जाए जहां वह पहले लगा हुआ था.

Ø जब अटल बिहारी वाजपेयी संसद पहुंचे और धीरे-धीरे उनकी सक्रियता बढ़ती रही तो कहा जाने लगा था कि हिन्दी में वाजपेयी से अच्छा वक्ता कोई नहीं है. वाजपेयी जब लोकसभा में बोलते तो हर कोई उनको ध्यान से सुनता था. नेहरू भी. किंगशुक नाग की वाजपेयी पर लिखे एक किताब के मुताबिक एक बार नेहरू ने भारत यात्रा पर आए एक ब्रिटिश प्रधानमंत्री से वाजपेयी को मिलवाते हुए कहा था, “इनसे मिलिए. ये विपक्ष के उभरते हुए युवा नेता हैं. हमेशा मेरी आलोचना करते हैं लेकिन इनमें मैं भविष्य की बहुत संभावनाएं देखता हूँ.” तो वहीं एक बार एक दूसरे विदेशी मेहमान से नेहरू ने वाजपेयी का परिचय संभावित भावी प्रधानमंत्री के रूप में भी कराया था.

Ø बात 1996 की है. वाजपेयी ने पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी. तब नरसिम्हा राव ने चुपके से वाजपेयी के हाथ में एक पर्ची पकड़ाई. इस तरह कि कोई देख न पाए. इस पर्ची में राव ने वे तमाम बिंदु लिखे थे जो वह खुद बतौर प्रधानमंत्री करना चाहते थे, किंतु चाहकर भी न कर पाए. आज के दौर में इस तरह की राजनीति की कल्पना नहीं की जा सकती.

Ø अटल जी ने हमेशा पत्रकारों और आलोचकों को संबल दिया. वह आलोचनाओं से घबराते नहीं थे, बल्कि उसका स्वागत करते थे. आज के दौर में जिस तरह मीडिया पर लगातार पाबंदियां लगाई जा रही है, अटल जी के समय ऐसा नहीं था. उन्होंने अपने खिलाफ या सरकार के खिलाफ लिखने वाले पत्रकारों को कभी रोका-टोका नहीं, बल्कि उनकी हौंसला अफजाई की. अटल जी को अपना गुरू बताने वाले वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को उनसे यह बात सिखनी चाहिए.

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दुनिया भर के अम्बेडकरवादियों को जोड़ने वाले राजू कांबले नहीं रहें

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नई दिल्ली। अम्बेडकर इंटरनेशनल मिशन (AIM) के संस्थापक राजू कांबले नहीं रहें. 16 अगस्त को कनाडा के वैंकुअर में उनका निर्वाण हो गया. वह पिछले 20 सालों से कनाडा में ही रह रहे थे. राजू कांबले दुनिया भर के अम्बेडकरवादियों को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण कड़ी थे. उनके जाने से दुनिया के तमाम देशों में रहने वाले अम्बेडकरवादियों को गहरा झटका लगा है. पेशे से साइंटिस्ट राजू केमिकल इंजीनियर थे.

4 जनवरी 1954 को नागपुर में जन्में राजू कांबले एक सामान्य पृष्ठभूमि के थे. लेकिन बाबासाहेब की बातों को आत्मसात कर जीवन में संघर्ष करते हुए उन्होंने प्रोफेशनल और सोशल लाइफ में बुलंदियों को छुआ. वे आजीवन बाबासाहेब अम्बेडकर के विचारों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाने के प्रयास में जुटे रहें. उन्होंने अलग-अलग देशों में फैले दलितों को एक साथ जोड़ने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

अम्बेडकर इंटरनेशनल मिशन के जरिए उन्होंने दुनिया के कई देशों में डॉ. अम्बेडकर कन्वेंशन आयोजित किया. इसमें मलेशिया के क्वालालंपुर में 1998 और 2011 में जबकि फ्रांस के पेरिस में 2014 में कार्यक्रम आयोजित किया गया था. 2018 में अम्बेडकर कन्वेंशन के लिए जापान को चुना गया है, जिसका आयोजन 22-23 सितंबर को होना था. AIM के जरिए वो यूएस, कनाडा, जापान, मिडिल ईस्ट सहित पूरे युरोपिय देशों में फैले अम्बेडकरवादियों को एक मंच पर ले आएं. इसमें जहां अच्छे पदों पर रहने वाले अधिकारी थे तो साधारण काम करने वाले लोग भी थे.

बहुत ऊंचाईयों पर पहुँचने पर भी वे कभी अपने समाज से नहीं कटे बल्कि समाज के लिए समर्पित रहे और जमीनी स्तर पर जाकर दलित एक्टिविज़्म के लिए कार्य किया. उनका मानना था कि हर बहुजन को बाबासाहेब को पढ़ना चाहिए. इसके लिए वो लोगों को किताबें उपलब्ध कराते रहे. वे हमेशा स्टूडेंट्स को विदेश जाकर पढ़ने और खुद को सक्षम बनाकर समाज के लिए कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करते थे. उनका पूरा जीवन समाज के लिए समर्पित रहा. राजू भाऊ का जाना अम्बेडकरी आंदोलन के लिए एक अपूर्णीय क्षति है.

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well Know ambedkarite Rajkumar Kamble no more

New Delhi: Rajkumar Daulatrao Kamble was born on January 4, 1954 in Nagpur, Maharashtra, India. A fearless visionary, Raju Kamble, as he was known more popularly, was a towering Ambedkarite who was relentless in his commitment to take forward the caravan of justice for all oppressed castes. Raju Kamble was the glue that bound all international Ambedkarites together. His magnetic personality, erudite and cultured demeanor, selflessness, infallible commitment towards the Dalit cause and last but not the least, tremendous Ambedkarite knowledge electrified our movement.

It is a testimony to Raju Kamble’s unparalleled contribution to our struggle that he never retreated from the battle to end caste apartheid but rather brought the movement to the globe inspiring NRI Ambedkarites for decades to unite and forge into a formidable force outside India. This also includes the seeds he sowed for promoting Buddhism as a facet of India’s heritage and creating a global cultural platform for Ambedkarites.

A scientist by training, Raju Kamble was a successful Chemical Engineer who did his B.Tech in Chemical Engineering from LIT, Nagpur and a postgraduate degree in chemical Engineering from IISc, Bangalore, INDIA. His work as a Senior Process Engineer in the field of oil exploration, oil refining and petrochemicals for the last 37 years gave him the opportunity to work across the world – from the U.S.A, Canada, Italy, U.A.E and Malaysia.

Raju Kamble was defined by his activism and it was through his tireless commitment that he was able to co-found Dr. Ambedkar International Mission Inc. (AIM) It was his belief that Dalits of the diaspora had powerful responsibility to payback to society and remain committed to Ambedkar’s vision wherever they are in the world. This commitment, rooted in love for all Ambedkarite people, helped AIM grow its international impact for the last 24 years. Through AIM he organized several international Dr. Ambedkar conventions beginning in Kuala Lumpur, Malaysia (1998) and (2011), and Paris, France (2014), and an upcoming convention in Japan (2018) for which his work was in full swing. It was through his leadership that AIM grew to having chapters all around the world including US, Canada, Japan, Middle East, and across Europe.

He was also instrumental in setting up an annual Dr. Ambedkar Memorial Lecture at Columbia University, the alma mater of Dr.Ambedkar, from 2009 in collaboration with South Asia Institute/Barnard College, Columbia University. He also organized in 2013 an International Conference at Barnard College, Columbia University, New York, to commemorate 100 years of arrival of Dr. Ambedkar to Columbia University in 1913, a landmark turning point, in the liberation of untouchables in India. These efforts also included Dr. Ambedkar memorial lectures through Canada most notably at the University of Calgary. He also worked closely with international Buddhists to host a groundbreaking International Buddhist conference in Nagpur that helped connect international Buddhists from around the world. Finally, his last jewel in his cap was the International Conference at Barnard College, Columbia University to commemorate 125th Birth Anniversary of Dr.Ambedkar – a milestone event in 2016 that still continues to impact Ambedkarites today.

Throughout all of this work Raju Kamble with his exemplifying mentorship connected Dalits of all nationalities to cultivate a global network of Ambedkarite movement. His hospitality was legendary and there was never a gathering too far or time too inconvenient for him to create any opportunities for the Ambedkarite community. He was so committed to the life and writings of B. R. Ambedkar that he kept a supply of his books and would ship them anywhere in the world so that Ambedkar’s words could travel the world. In addition to AIM, he mentored and lifted up leaders from many other Ambedkarite organizations including but not limited to Nagloka, Ambedkar Association of North America, Ambedkar Buddhist Association of Texas, Ambedkar International Center, Equality Labs, Friends for India’s Education, International Commission on Dalit Human Rights, Ambedkar King Study Circle, India Solidarity Network, Boston Study Group, and Federation of Ambedkarite and Buddhist Organisations UK. The strength and diversity in the Global Ambedkarite community is due in no small part to his humility in investing and building a new generation of Dalit leadership around the world.

Beyond his public works, Raju Kamble personally supported many Dalit students in their studies offering them scholarships and helping them with their test preparation fees so that promising students from across India could pursue education and better lives for themselves, their families, and their communities. It was a powerful testament to his legacy that many of these students continued to excel onward in their fields through the significant financial, emotional, and inspirational support he offered.

As we consider the impossible world where we must continue forward in this work without Rajkumar Kamble, we want to honor and remember how his legacy lives on in all of us. His unfortunate and untimely demise leaves a huge void in our movement. But we should keep him in our thoughts and draw motivation from his life and continue to strive in taking Babasaheb’s caravan further, as a fitting tribute to him and his values which he instilled in many of us as a mentor.

With deep love and gratitude, the Global Ambedkarite community salutes him and his timeless example. He is survived by his wife Nanda and two daughters, Prachi and Shaily. His work is due in no small part to the enormous love, compassion, and faith of these incredible women. His and his family’s personal sacrifices have ensured that the Ambedkarite movement outside India has blossomed over the years, and in his memory we will continue to grow it until we indeed see the end of Caste Apartheid once and for all. In honor of this tremendous man and his remarkable family, we offer them our deepest respect and gratitude. Wishing them only love and peace as we hold them all in our thoughts in this very difficult time.

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बहनजी ने यूं किया अटलजी को याद

अटल जी के साथ बसपा संस्थापक मा. कांशीरामजी और बसपा प्रमुख मायावती (फोटोः इंडियन एक्स्प्रेस)

नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के निधन पर दुख जताया है. उन्होंने इसे देश के लिए अपूरणीय क्षति बताया है. पूर्व प्रधानमंत्री को याद करते हुए उन्होंने कहा कि वाजपेयी अनेक मौकों पर पार्टी हित से ऊपर उठकर समाज व देशहित में काम करने वाले नेताओं में से एक थे.

सुश्री मायावती ने कहा- “वे देश के एक ऐसे नेता थे जो भारतीय जनसंघ व बाद में इसके नए अवतार बीजेपी में रहने के बावजूद व्यापक स्तर पर सम्मान की दृष्टि से देखे जाते थे. उन्होंने पार्टी व सरका में रहते हुए अनेक मौकों पर पार्टी हित से ऊपर उठकर समाज व देश की भलाई के लिए काम करने का प्रयास किया.”

पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि कवि मन के श्री वाजपेयी काफी प्रतिभावान व धनी व्यक्तित्व के मालिक थे. उनके बारे में कहा जाता था कि वे सही सोच वाले गलत पार्टी के नेता थे. बसपा प्रमुख ने कहा कि देश के सांसद, केंद्रीय मंत्री और फिर प्रधानमंत्री के रूप में भी उनके अमूल्य योगदान को लोग लगातार याद करते रहे हैं और आगे भी उन्हें इसके लिए याद करते रहेंगे.

पूर्व प्रधानमंत्री के पिछले कई सालों से सक्रिय राजनीति से दूर रहने का जिक्र करते हुए बसपा प्रमुख ने कहा कि अगर वे स्वस्थ्य रहते तो भाजपा शायद कभी इतनी जनविरोधी, संकीर्ण, संकुचित, अहंकारी व विद्वेषपूर्ण नीति वाली पार्टी नहीं हो सकती थी जितनी की आज हर तरफ नजर आती है और जिससे देश में हर तरफ शांति व सद्भाव के बजाय हिंसा व अफरातफरी का माहौल है. इसलिए भी उन्हें व उनके कार्यकाल को लोग और भी ज्यादा याद करते रहे और आगे भी उन्हें इसलिए याद रखा जाएगा.

गौरतलब है कि इससे पहले बसपा प्रमुख मायावती ने कल (16 अगस्त) पूर्व प्रधानमंत्री को देखने और हाल जानने के लिए एम्स भी पहुंची थी.

L K ADVANI… on ATALJI

courtesy- HT

I am at a loss of words to express my deep grief and sadness today as we all mourn the passing away of one of India’s tallest statesmen, Shri Atal Bihari Vajpayee. To me, Atalji was more than a senior colleague- in fact he was my closest friend for over 65 years.

I cherish the memories of my long association with him, right from our days as Pracharaks of the RSS, to the inception of Bharatiya Jana Singh, the struggle of the dark months during the Emergency leading to the formation of Janata Party and later the emergence of the Bharatiya Janata Party in 1980.

Atalji will be remembered as the pioneer of the first ever stable non-Congress coalition government at the Centre and I had the privilege of working as his deputy for six years.

As my senior, he always encouraged and guided me in every possible manner.

His captivating leadership qualities, mesmerising oratory, soaring patriotism and above all, his sterling humane qualities like compassion, humility and his remarkable ability to win over adversories despite ideological differences have all had a profound effect on me in all my years in public life.

I will miss Atalji immensely…

New Delhi.

16th August, 2018

5.45pm

अटल जी की कविता…. ठन गई … मौत से ठन गई

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मौत से ठन गई ठन गई मौत से ठन गई. जूझने का मेरा इरादा न था, मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था, रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई, यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं, ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ, लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ? तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ, सामने वार कर फिर मुझे आज़मा मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र, शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं, दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं प्यार इतना परायों से मुझको मिला, न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये, आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है, नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है पार पाने का क़ायम मगर हौसला, देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई मौत से ठन गई Read it also-मुसहर
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रुपया डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा, जानें क्‍या होगा असर…

नई दिल्ली। डॉलर के मुक़ाबले रुपया लगातार धड़ाम हो रहा है. गुरुवार को रुपये में फिर ऐतिहासिक गिरावट आई है. एक डॉलर की क़ीमत 70.32 रुपये पहुंच गई है. गुरुवार को रुपया 43 पैसे गिरा. अमेरिकी डॉलर के मुक़ाबले रुपया अपने सबसे निम्नतम स्तर पर है. रुपए की ये गिरावट जो इस साल 8 फीसदी से ज्यादा रही है.

मु्द्रा बाजार में रुपया डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर 70.25 पर खुला और जल्द ही कुल 43 पैसे टूटकर 70.32 पर पहुंच गया. पिछले सत्र के कारोबार में डॉलर के मुकाबले रुपया 69.89 के निम्न स्तर पर बंद हुआ था. मुद्रा कारोबारियों के अनुसार, आयातकों की ओर से अमेरिकी मुद्रा की जबरदस्त मांग और विदेशी पूंजी की निकासी से घरेलू मुद्रा में कमजोर रुख देखा गया. इसके अलावा मंगलवार को जारी आंकड़ों के अनुसार व्यापार घाटे में अधिक बढ़ोत्तरी का भी रुपया पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा. वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार देश का व्यापार घाटा पांच साल के उच्च स्तर यानी 18 अरब डॉलर पर पहुंच गया है. बुधवार को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर मुद्रा बाजार बंद रहे थे.

क्या होगा असर?

– महंगाई बढ़ेगी – रुपया कमजोर होने से आयात महंगे हो जाते हैं. – तेल के दाम बढ़ेंगे – तेल महंगा होने का मतलब सब्जियां, खाने पीने के सामानों का महंगा होना. – कमजोर रुपए से विदेशों में पढ़ाई और छुट्टियां मनाना महंगा होगा – कंप्यूटर,स्मार्टफोन और कार, आयात होने वाली चीजें महंगी होंगी

हालांकि उद्योगों के कई जानकार मानते हैं कि रुपया का गिरना पक्के तौर पर एक बुरी चीज नहीं है. ये भारतीय निर्यातकों के लिए अच्छी खबर है और खासकर मेड इन इंडिया के लिए ये जरूरी है. बजाय गिरने पर मातम मनाने के क्या हम इसे मेक इन इंडिया के लिए एक मौक़े के तौर पर देखें? इससे अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में भारतीय निर्यात बेहतर मुक़ाबला कर पाएगा और क्या हम विदेशी कंपनियों को भारत में विश्व स्तरीय और निर्यातोन्मुख निर्माण का भरोसा दिला सकते हैं?

पिछले साल एक डॉलर के बराबर 62 रुपए थे अब ये 70 हो चुका है, इस हिसाब से ये 6 से 7 लाख रुपए सालाना ज्यादा का खर्च बैठता है. हालांकि गवर्नर के मुताबिक इसमें चिंता की कोई बात नहीं है. आर्थिक मामलों के मंत्रालय के सचिव सुभाष गर्ग ने एनडीटीवी से कहा कि ये एक अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम है. RBI के पास पर्याप्त विदेशी मुदा भंडार है और 2013 में डॉलर के मुक़ाबले 69 रुपया था. ये अस्थायी दौर है, स्थिर हो जाएगा. अगर रुपया 80 तक भी गिरे तो कोई बात नहीं है. अगर दूसरी मुदाए भी इसी तरह से गिरती हैं. दूसरी मुदाएं भी कमजोर हुई हैं जैसे दक्षिण अफ्रीकी रैंड 2 फीसदी गिरा है, रूस के रुबल में 1.4 प्रतिशत की गिरावट आई है और मैक्सिकन पेसो 0.8 प्रतिशत नीचे आया है.

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नहीं रहें पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी

नई दिल्ली। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न से सम्मानित दिग्गज नेता अटल बिहारी वाजपेयी नहीं रहें. 12 घंटे से ज्यादा समय से वेंटिलेटर पर रहने के बाद उन्होंने एम्स में आखिरी सांस ली. इस बीच देश भर के दिग्गज नेता और तमाम प्रदेशों के मुख्यमंत्री दिल्ली पहुंच चुके हैं. सुबह से ही उनका एम्स जाकर वाजपेयी से मिलने का सिलसिला जारी था. देर शाम उनको देखने के लिए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार औऱ बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती भी पहुंची थीं.

इससे पहले 15 अगस्त की शाम को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वाजपेयी जी का हाल जानने एम्स पहुंचे थे. उसके बाद लाल कृष्ण आडवाणी, गृहमंत्री राजनाथ सिंह, रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण सहित तमाम बड़े नेताओं ने एम्स पहुंच कर पूर्व प्रधानमंत्री से मिले थे. सुबह भाजपा ने अपने राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक को भी रद्द कर दिया था और दोपहर तक पार्टी मुख्यालय पर की गई सजावट को भी हटा दिया गया था.

कंधे तक पानी में डूबकर बच्‍चे ने तिरंगे को दी थी सलामी, उसके साथ जो हुआ वो हैरान करने वाला

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धुबरी/गुवाहाटी। असम के एक स्कूल परिसर में पिछले साल स्वतंत्रता दिवस के मौके पर कंधे तक बाढ़ का पानी भरा होने के बावजूद तिरंगे को सलामी देने वाले नौ साल के जिस बच्चे की तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी, उसका नाम राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) के अंतिम मसौदे में नहीं है.

धुबरी जिले के प्राथमिक विद्यालय के प्रधान शिक्षक ताजेन सिकदर ने बताया कि छात्र हैदर अली खान का नाम 30 जुलाई को प्रकाशित मसौदा एनआसी में नहीं है. हालांकि, उसके परिवार के सदस्यों के नाम इसमें शामिल है. गौरतलब है कि सिकदर भी पिछले साल बाढ़ के पानी में हैदर और दो अन्य के साथ वहां तिरंगे को सलामी देने के लिये खड़े थे. सिकदर ने बताया कि हैदर के परदादा शुकूर अली का नाम 1951 की एनआरसी में था. उनके और हैदर के बीच एक रिश्ता होने और उपयुक्त दस्तावेजों सहित उसका जन्मप्रमाण पत्र, परिवार की जमीन का रिकॉर्ड और उसके स्कूल का प्रमाण पत्र 2015 में एनआरसी में उसका नाम जोड़ने के लिए लिये दिये गए थे.

सिकदर ने कहा कि हैदर के दादा अलोम खाम, मां जयबन खातून, बड़े भाई जयदर और छोटी बहन रीना का नाम अंतिम मसौदे में शामिल है. साथ ही, सिकदर का नाम भी सूची में शामिल है. हैदर के शिक्षक ने कहा कि वह सूची में उसका नाम जुड़वाने में इस परिवार की मदद करेंगे.

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बैंक अकाउंट में बैलेंस कम होने पर नहीं लगेगी पैनल्टी… जाने कैसे

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नई दिल्ली। अगर आपका SBI बैंक में सेविंग अकाउंट है तो यह खबर आपके लिए जानना बहुत जरूरी है. SBI ने सेविंग अकाउंट के लिए एक मिनिमम मंथली एवरेज बैलेंस (MAB) का नियम तय किया हुआ है. अगर ग्राहक इस बैलेंस को बरकरार नहीं रख पाते हैं तो बैंक उनसे जुर्माना वसूलता है. कुछ ही समय पहले के रिपोर्ट भी आई थी कि SBI ने मिनिमम बैलेंस मेंटेन न कर पाने वालों से चार्ज के तौर पर 5 हजार करोड़ रुपए वसूले हैं. इसे लेकर SBI ने क्‍लैरिफिकेशन देते हुए कहा था कि ये चार्ज उसने 40 फीसदी तक कम कर दिया है और उसके चार्ज इंडस्‍ट्री में सबसे कम हैं.

ऐसा उन लोगों के साथ सबसे ज्यादा होता है जिन्‍हें बैंकों के मिनिमम मंथली एवरेज बैलेंस का गणित समझ में नहीं आता है. लोग इसी बात को लेकर कन्‍फ्यूज रहते हैं कि आखिर इस बैलेंस की कैलकुलेशन क्‍या है और कितना पैसा अकाउंट में होना जरूरी है. हम आपको बता रहे हैं कि आखिर कैसे आप इस कैलकुलेशन को समझ सकते हैं और अपने पैसे बचा सकते हैं.

समझें पूरा गणित: मान लीजिए किसी बैंक में मिनिमम मंथली एवरेज बैलेंस रिक्‍वायरमेंट 5000 रुपए है. इसका अर्थ यह हुआ कि रोज दिन खत्‍म होने पर आपके सेविंग्‍स अकाउंट में 5000 रुपए होने चाहिए. अब ये आपके ऊपर है कि आप अकाउंट में पूरे माह केवल 5000 रुपए रखते हैं या फिर उससे ज्‍यादा. इसे एक उदाहरण से समझें..

उदाहरण: माना 1 जुलाई को आपने अपने सेविंग्स अकाउंट में 5000 रुपए जमा किए. अगले एक माह तक आपने उस अकाउंट से कोई ट्रान्जेक्शन या डिपॉजिट नहीं किया यानी न पैसे निकाले न अकाउंट में जमा किए. तो इसका मतलब यह हुआ कि आपके महीने की शुरुआत से लेकर महीने के आखिर तक अकाउंट में 5000 रुपए का डिपॉजिट मौजूद रहा. यानी आपने बैंक की मिनिमम एवरेज बैलेंस रिक्वायरमेंट पूरी की.

जब कर रहे हैं ट्रान्जेक्शन और डिपॉजिट: आप अपने अकाउंट से भले ही ट्रान्जेक्शन करें या डिपॉजिट करें लेकिन आपका एवरेज 5000 रुपए से कम नहीं होना चाहिए. इसे भी एक उदाहरण से समझें- माना 1 जुलाई को आपने अकाउंट में 5000 रुपए जमा किए. 10 जुलाई को आपने 3000 रुपए निकाल लिए. उसके बाद 20 जुलाई को फिर से 10000 रुपए जमा कर दिए. महीने कें अंत में आपके अकाउंट में 12000 रुपए होंगे. ऐसी सूरत में मिनिमम बैलेंस की कैलकुलेशन ऐसे होगी.

ऐसे समझे पूरी कैलकुलेशन:<br />- 1 जुलाई से 10 जुलाई यानी 9 दिन आपका बैलेंस रहा- 5000×9= 45000 रुपए<br />- 10 जुलाई से 20 जुलाई यानी 10 दिन आपका बैलेंस रहा- 2000×10=20000 रुपए<br />- अब 20 जुलाई से 31 जुलाई यानी 11 दिन आपका बैलेंस रहा- 12000×11= 1,32000 रुपए<br />- अब 1 जुलाई से 31 जुलाई तक कुल बैलेंस देखें तो यह रहा- 1,97,000 रुपए<br />- अब 1 दिन का बैलेंस निकालने के लिए इसमें 31 का भाग देंगे तो आएगा 6354 रुपए

इसका अर्थ यह हुआ कि भले ही आपने ट्रान्जेक्शन और डिपॉजिट किया लेकिन फिर भी आपका एक दिन के आखिर में बैलेंस 5000 रुपए से ज्यादा रहा. ऐसे में आप पर पेनल्टी नहीं लगेगी. अगर यही बैलेंस 5000 रुपए से कम रहता तो बैंक आप पर पेनल्टी वसूलता.

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गंभीर बीमारी से जूझ रहे इरफान खान ने लिया ये फैसला

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नई दिल्ली। दिग्गज अभिनेता इरफान खान इन दिनों लंदन में अपनी एक अजीब किस्म की बीमारी का इलाज करा रहे हैं. इस बीमारी का नाम ‘न्यूरो इंडोक्राइन ट्यूमर’ है. अब वे आगे के फैसले अपनी इस बीमारी को देखकर ही ले रहे हैं.

खबर है कि इरफान ने एआईबी की वेब-सीरीज गोरमिंट छोड़ दी है. इस सीरीज को अमेजॉन प्राइम के बैनर के तले बनाया जा रहा था. इरफान इसे लेकर काफी उत्साहित थे. उन्होंने वेब सीरीज छोड़ने की जानकारी फेसबुक पर एक नोट लिखकर दी.

बता दें कि इरफान का छठा और आखिरी कीमो किया गया था. इससे पहले उनके 5 कीमो किए जा चुके हैं. इस कारण इरफान इन दिनों कमजोर हो गए हैं. खबर यह भी है की पांचवें कीमो के बाद से इरफान के शरीर में अध‍िक ऊर्जा नहीं रह गई है, जिस वजह से उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था.

बता दें इरफान खान ने इस दर्दनाक अपनी बीमारी का खुलासा एक ट्वीट करके किया था. इरफान ने ट्वीट कर लिखा था, जिंदगी में अचानक कुछ ऐसा हो जाता है जो आपको आगे लेकर जाती है.

इरफान ने कहा था, “ऐसे में आप च‍िंतन करना छोड़ देते ह‍ैं, प्लान‍िंग करना बंद कर देते हैं. आप जीवन के दूसरे पहलुओं पर गौर करने लगते हैं. मुझे जीवन में बहुत कुछ मिला है. इन सबके लिए बस मेरे पास एक ही शब्द है, शुक्र‍िया. मुझे जीवन से कोई इच्छा नहीं है, मुझे कोई प्रार्थना अब नहीं करनी है.”

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झंडा अशुद्ध हो जाएगा, कहकर दलित सरपंच को झंडा फहराने से रोका

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के क्षेत्र गोरखपुर से सटे महाराजगंज में एक दलित महिला ग्राम प्रधान को स्वतंत्रता दिवस के मौके पर झंडा फहराने से रोक दिया गया. जब महिला ग्राम प्रधान नियम के मुताबिक स्कूल में झंडा फहराने पहुंची तो जातिवादी प्रिंसिपल ने उन्हें ऐसा नहीं करने दिया. दलित समाज से ताल्लुक रखने वाली ग्राम प्रधान का आरोप है कि स्कूल के प्रिंसिपल ने कहा कि कोई भी दलित आज तक यहां झंडा नहीं फहरा सका है.

महाराजगंज के बृजमनगंज ब्लॉक के महुआरी गांव की आरक्षित सीट से जीत दर्ज कर रीता देवी प्रधान निर्वाचित हुईं. यूपी में नियम है कि गांव का ग्राम प्रधान प्राथमिक विद्यालय में झंडा फहराएगा. इसी नियम के तहत रीता देवी गांव के प्राथमिक विद्यालय महुआरी में देश के स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त पर झंडा फहराने पहुंची थीं. लेकिन उन्हें उनकी जाति की वजह से रोक दिया गया.

रीता देवी के मुताबिक, ” जब वह स्कूल में पहुंची तो सवर्ण जाति से ताल्लुक रखने वाले प्रिंसिपल ने उनको रोक दिया और मेरे हाथ से तिरंगे की डोर लेकर खुद झंडारोहण किया.”

जिस समय यह घटना घटी उन दौरान स्कूल के छात्र और अभिभावक भी मौजूद थे. उन्होंने जब प्रधानाध्यपक के इस रवैये को गलत ठहराते हुए विरोध किया तो प्रधानाध्यापक का कहना था कि विद्यालय में आज तक कोई भी दलित ध्वजारोहण नहीं किया है, इसलिए वह खुद झंडारोहण करेगा. यही नहीं, खबर आ रही है कि दलित महिला प्रधान को विद्यालय परिसर से बाहर जाने के लिए भी बोला गया.

तो वहीं दूसरी ओर इंडियन एक्सप्रेस और जनसत्ता में प्रकाशित खबर के मुताबिक प्रधानमंत्री मोदी के गृह राज्य और भाजपा शासित गुजरात के राजकोट में भी एक दलित सरपंच प्रेमजी जोगल को झंडा नहीं फहराने दिया गया. पाटिदार समाज से ताल्लुक रखने वाली डिप्टी सरपंच के पति ने दलित सरपंच को झंडा फहराने से रोक दिया. राजकोट के गोंडल तालुका के सरपंच प्रेमजी ने पुलिस से इस मामले की शिकायत की है.

सरपंच के मुताबिक- “डिप्टी सरपंच तृषा के पति राजेश सखिया ने मुझे कहा कि मैं तिरंगा नहीं फहरा सकता क्योंकि मैं दलित हूं. उसने कहा कि अगर मैंने झंडा फहराया तो यह अशुद्ध हो जाएगा. राजेश ने समारोह शुरू होने से पहले ही मुझे धमकी देते हुए कहा कि या तो कुर्सी पर ही बैठा रहूं नहीं तो इसे भी खो दूंगा.”

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भारतीय वनडे क्रिकेट टीम के प्रथम कप्तान का निधन

नई दिल्ली। पूर्व भारतीय क्रिकेट कप्तान अजित वाडेकर का बुधवार रात मुंबई के जसलोक अस्पताल में निधन हो गया. वह 77 वर्ष के थे. वह लंबे समय से कैंसर की बीमारी से जूझ रहे थे. वाडेकर की कप्तानी में भारत ने इंग्लैंड और वेस्टइंडीज में पहली बार टेस्ट मैच और पहली बार टेस्ट सीरीज जीती थी. वाडेकर ने मोहम्मद अजहरुद्दीन की कप्तानी के दौरान भारतीय टीम के मैनेजर के रूप में भी जिम्मेदारी निभाई थी. बाद में वह मुख्य चयनकर्ता भी बने. उनके परिवार में पत्नी रेखा के अलावा दो पुत्र और एक पुत्री है.

आठ साल के अंतरराष्ट्रीय करियर में बायें हाथ के बल्लेबाज वाडेकर ने कुल 37 टेस्ट मैच खेले. 1971 से 1974 के दौरान उन्होंने 16 टेस्ट मैचों में भारतीय टीम की कप्तानी की, जिसमें से चार मैच जीते, चार हारे, जबकि आठ मैच ड्रॉ रहे. वह दो वनडे मैच भी खेले और दोनों में उन्होंने भारतीय टीम की कमान संभाली. वनडे क्रिकेट में वह भारतीय टीम के पहले कप्तान थे. वनडे कप्तान के रूप में उन्हें दोनों मैचों में हार का सामना करना पड़ा. वाडेकर कुशल क्षेत्ररक्षक भी थे.

उन्होंने टेस्ट में 46, वनडे में एक और प्रथम श्रेणी करियर में 271 कैच लपके. टेस्ट करियर में उन्होंने एकमात्र शतक न्यूजीलैंड के खिलाफ 1968 में वेलिंगटन में लगाया. इस टेस्ट की पहली पारी में उन्होंने 143 रन बनाए थे. भारत ने यह टेस्ट आठ विकेट से जीता था. वाडेकर चार बार नर्वस नाइंटीज का भी शिकार बने, जिसमें एक बार वह 99 रन पर आउट हुए थे. रणजी ट्रॉफी में 17 वर्षो के करियर में उन्होंने 73 मैचों में कुल 4288 रन बनाए जिनमें उनका औसत 57.94 था. उन्होंने 1966-67 में मैसूर के खिलाफ रणजी ट्रॉफी मैच में 323 का सर्वश्रेष्ठ स्कोर बनाया. उन्होंने 18 दलीप ट्रॉफी मैच खेले, छह में वह पश्चिम क्षेत्र के कप्तान रहे.

वाडेकर के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ट्वीट कर शोक जताया है. अपने ट्वीट में प्रधानमंत्री ने लिखा, ‘अजित वाडेकर को भारतीय क्रिकेट में दिए उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए याद किया जाएगा. एक महान बल्लेबाज और शानदार कप्तान, जिनकी कप्तानी में हमारी टीम ने कई यादगार लम्हे दिए. इन उपलब्धियों के साथ-साथ उन्हें प्रभावी क्रिकेट प्रशासक के रूप में भी आदर के साथ याद किया जाएगा. उनके निधन से दुखी हूं.’

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वाजपेयी जी बेहद गंभीर, भाजपा कार्यालय से सजावट हटी, तमाम नेताओं ने रद्द किया कार्यक्रम

नई दिल्ली। भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का स्वास्थ बिगड़ता जा रहा है. स्थिति को देखते हुए वाजपेयी जी का बचना मुश्किल लग रहा है. स्थिति खराब होने के बाद वो पिछले 12 घंटों से अधिक समय से वेंटिलेटर पर हैं. इस बीच भाजपा ने अपने पार्टी मुख्यालय से 15 अगस्त के दिन की गई सजावट को हटा लिया है. तो वहीं भाजपा के तमाम बड़े नेताओं ने अपना कार्यक्रम रद्द कर दिया है. कई नेता तो दिल्ली की ओर निकल चुके हैं.

एम्स में सघन चिकित्सालय में वाजपेयी जी को देखने के लिए भाजपा नेताओं के पहुंचने का सिलसिला लगातार जारी है. 15 अगस्त की शाम को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वाजपेयी जी का हाल जानने एम्स पहुंचे थे. उसके बाद लाल कृष्ण आडवाणी, गृहमंत्री राजनाथ सिंह, रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण सहित तमाम बड़े नेता एम्स पहुंच रहे हैं. तो वहीं भाजपा ने अपने राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक को भी रद्द कर दिया.

गौरतलब है कि एक वक्त में वाजपेयी जी और लाल कृष्ण आडवाणी ने साथ मिलकर भाजपा को ऊंचाई पर पहुंचाया था. भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने वाले अटल बिहारी वाजपेयी पहले नेता थे. अब तक के भाजपा नेताओं में कोई भी वाजपेयी जी के करिश्मे की बराबरी नहीं कर पाया है. वाजपेयी न सिर्फ भाजपा बल्कि तमाम विरोधी दलों के बीच भी काफी लोकप्रिय रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी के इतिहास में अटल-आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की तिकड़ी काफी प्रचलित रही है. तीनों नेता पार्टी को उस ऊंचाई तक ले गए, जिसकी कल्पना भाजपा शुरुआती दिनों में देखा करती थी.

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पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी की हालत नाजुक, जानिए कौन-कौन सी है बीमारी

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की तबीयत पिछले 36 घंटों से नाजुक बनी हुई है. उन्हें जीवन रक्षक प्रणाली पर रखा गया है. दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ने एक बयान जारी कर यह जानकारी दी. एम्स की ओर से गुरुवार को भी मेडिकल बुलेटिन जारी किया गया. एम्स के मुताबिक उनकी हालत अभी भी नाजुक बन गई है.

वाजपेयी को गुर्दा (किडनी) नली में संक्रमण, छाती में जकड़न, मूत्रनली में संक्रमण आदि के बाद 11 जून को एम्स में भर्ती कराया गया था.

एम्स ने एक बयान में कहा, ‘‘दुर्भाग्यवश, पिछले 24 घंटों में उनकी हालत ज्यादा बिगड़ गई है. उनकी हालत नाजुक है और वह जीवन रक्षक प्रणाली पर हैं.’’

डिमेंशिया के मुख्य लक्षण:

– नाम, जगह, तुरंत की गई बातचीत को याद रखने में परेशानी

– अवसाद से पीड़ित होना

– संवाद स्थापित करने/बात करने में दिक्कत होना

– व्यवहार में बदलाव आना

– कुछ निगलने में दिक्कत होना

– चलने-फिरने में परेशानी होना

– निर्णय लेने की क्षमता का प्रभावित होना

– चीजों को रखकर भूल जाना

वाजपेयी एम्स के कार्डियो थोरेसिक सेंटर के गहन चिकित्सा कक्ष में हैं. किडनी में संक्रमण, छाती में संकुलन और पेशाब कम होने के चलते 93 वर्षीय पूर्व प्रधानमंत्री और बीजेपी के वरिष्ठ नेता वाजपेयी को बीते 11 जून को अस्पताल में भर्ती कराया गया था.

बता दें कि अटल बिहारी वाजपेयी डिमेंशिया नाम की गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं और 2009 से ही व्हीलचेयर पर हैं. कुछ समय पहले भारत सरकार ने उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया. अटल बिहारी वायपेयी 1991, 1996, 1998, 1999 और 2004 में लखनऊ से लोकसभा सदस्य चुने गए थे. वो बतौर प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूर्ण करने वाले पहले और अभी तक एकमात्र गैर-कांग्रेसी नेता हैं. 25 दिसंबर, 1924 में जन्मे वाजपेयी ने भारत छोड़ो आंदोलन के जरिए 1942 में भारतीय राजनीति में कदम रखा था.

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