नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव की तारीख जैसे-जैसे पास आ रही है, दलित वोटों को लेकर घमासान तेज हो गया है. 2014 के चुlनाव में अगर भाजपा जीत पाई तो उसकी एक बड़ी वजह यह रही कि दलितों और पिछड़ों ने भाजपा को खुल कर समर्थन दिया था. हालांकि उत्तर प्रदेश के दलित बसपा के पीछे गोलबंद रहें लेकिन उसके बाहर भाजपा दलित वोटों को हासिल करने में सफल रही थी.
लेकिन पिछले कुछ दिनों में भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार को दलितों से जुड़े कई मुद्दों पर आलोचना का शिकार होना पड़ा है. बीते वक्त में रोहित वेमुला की सांस्थानिक आत्महत्या, सहारनपुर की घटना और एससी-एसटी एक्ट में संशोधन की कोशिश के बाद दलित भाजपा से दूर हुए हैं. भाजपा को लेकर दलितों का गुस्सा हरियाणा में अत्याचार के खिलाफ बौद्ध धर्म ग्रहण कर लेने के दौरान भी देखने को मिला जब बौद्ध धर्म अपनाने के बाद लोगों ने भाजपा को वोट न देने की शपथ खाई थी.
यही वजह है कि अब भाजपा और संघ यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि देश का दलित वोटर उनसे क्यों नाराज है? और उन्हें कैसे दुबारा अपने पाले में लाया जा सकता है. खबर है कि इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा समर्थित थिंक टैंक इंडिया फाउंडेशन दलित चिंतन के मुद्दे पर एक बैठक बुलाने की तैयारी में है. यह बैठक जल्द ही बुलायी जा सकती है और यह बैठक अलग-अलग सेशन में आयोजित की जाएगी.
इस बैठक की अध्यक्षता केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह और पार्टी के महासचिव राम माधव करेंगे. इन बैठकों में भाजपा सांसद, पार्टी के बड़े पदाधिकारी और दलित समुदाय से जुड़े प्रतिनिधि शामिल होंगे.
खबर है कि इस बैठक में यह टटोलने की कोशिश की जाएगी कि आखिर दलित समाज भाजपा को लेकर गुस्से में क्यों है? खबर है कि बैठक में रोहित वेमुला की आत्महत्या, चंद्रशेखर रावण पर रासुका लगाने और उसे लगातार बढ़ाते रहने के मुद्दे के प्रभाव पर भी चर्चा होगी. दलित चिंतन बैठक ऐसे समय में किया जा रहा है जब मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में चुनाव होने वाले हैं. लोकसभा चुनाव को लेकर भी भाजपा घबराई हुई है. देखना होगा कि आखिर इस चिंतन का नतीजा क्या निकलता है?
राजस्थान के बाड़मेर जिले में राजपुरोहित समुदाय द्वारा 70 दलित परिवारों को गांव से बहिष्कृत करने का मामला सामने आया है. यह घटना बाड़मेर के कालुदी गांव की है, जो कि बाड़मेर के जिला प्रमुख का भी घर है.
दरअसल गांव के रहने वाले दिनेश उर्फ दाना राम मेघवाल ने बीते 16 अगस्त को बलतोरा पुलिस थाने में एक एफआईआर दर्ज करायी थी. अपनी शिकायत में दिनेश ने गांव के राजपुरोहित समुदाय द्वारा गांव के 70 दलित परिवारों का बहिष्कार करने की बात कही गई है.
एफआईआर के अनुसार, राजपुरोहित समुदाय के कुछ युवकों ने सोशल मीडिया पर दलितों के खिलाफ अपमानजनक बातें लिखी थीं. जिसके बाद नजदीक के ही बैती गांव के निवासी रावतराम ने राजपुरोहित समुदाय के इन युवकों के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज करा दिया था. इस बात से नाराज होकर राजपुरोहित समुदाय ने इस संबंध में एक बैठक बुलायी और इस बैठक में गांव के 70 दलित परिवारों को गांव से बहिष्कार करने का ऐलान कर दिया.
पुलिस ने राजपुरोहित समुदाय के 17 लोगों के खिलाफ आईपीसी की धारा 323, 143, 341, 3(1) और एससी/एसटी एक्ट की धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिया है. बाड़मेर के एसपी मनीष अग्रवाल ने मामले की जांच के आदेश दे दिए हैं. फिलहाल गांव में पुलिस तैनात कर दी गई है. लेकिन गांव से बहिष्कार के बाद दलित परिवारों को सार्वजनिक कुओं का इस्तेमाल नहीं करने दिया जा रहा है. साथ ही दलित परिवारों के दुकानों से सामान लेने और अपने बच्चों को स्कूल भेजने पर भी पाबंदी लगा दी गई है. है.
समाज के भीतर आये दिन होने वाली ऐसी घटनायें बड़ा सवाल खड़ा करती हैं.
नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में एक शर्मनाक घटना सामने आई है जहां एक दलित महिला को सिर्फ इसलिए पीटा गया क्योंकि उसने एक सार्वजनिक हैंड पंप से पानी पी लिया. यह घटना भोजपुर इलाके की है. आरोप है कि एक दलित महिला जब भोजपुर में एक सार्वजनिक हैंड पंप से पानी पीने गई तो स्थानीय गुंडों ने उसकी पिटाई कर दी. फिलहाल यूपी पुलिस इस मामले की जांच कर रही है. यह घटना 17 अगस्त की बताई जा रही है.
घटना को लेकर मुराबाद के एसपी विशआल यादव ने कार्रवाई का भरोसा दिलाते हुए कहा, ‘इस मामले की चांज की जा रही है और दोषी जल्द ही गिरफ्तार किए जाएंगे. गौरतलब है कि बीते कुछ सालों में दलित समुदाय के खिलाफ हिंसा में काफी बढ़ोतरी देखने को मिल रही है.’
बीते दिनों एक दलित युवक की शादी उत्तर प्रदेश में कई महीनों तक सिर्फ कुछ लोगों की दबंगई की वजह से रुकी हुई थी. 27 वर्षीय दलित युवक की शादी सिर्फ इसलिए रुकी हुई थी क्योंकि उसकी बारात ठाकुरों के इलाके से नहीं गुजर सकती है.
कासगंज में लड़की के गांव वाले ठाकुर समुदाय ने अपने इलाके से बारात को ले जाने से मना कर दिया था जिसके बाद दोनों की शादी अटकी पड़ी थी.
दलित युवक संजय कुमार ने अपनी शादी के लिए सरकार के सभी कार्यालयों, डीजीपी, मुख्यमंत्री से लेकर एससी/एसटी आयोग और यहां तक कि स्थानीय अखबारों तक में अपनी बात रखी लेकिन किसी ने उसकी मदद उस वक्त नहीं की.
अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, यह युवक शादी के बारात को अपनी दुल्हन के गांव में ले जाने के लिए मदद मांग रहा है जो कि ठाकुरों के वर्चस्व का इलाका था.
युवक ने कहा कि क्या वह हिंदू नहीं है? उसने प्रखंड विकास परिषद के एक सदस्य से कहा, ‘जब हमारा संविधान कहता है कि हम सभी बराबर हैं और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कहते हैं कि हम सभी हिंदू हैं वे हिंदूवादी पार्टी को लीड करते हैं तो मैं ऐसी चीजों का सामना क्यों कर रहा हूं?’
संजय ने कहा, ‘क्या तब मैं हिंदू नहीं हूं? एक संविधान के द्वारा लोगों के लिए शासन करने का नियम अलग-अलग नहीं हो सकता है.’
गुजरात के ऊना से लेकर महाराष्ट्र तक और यूपी से लेकर झारखंड तक उच्च जाति के कुछ लोगों दलितों को निशाना बना देते हैं. हाल ही में यूपी में एक दूल्हे को घोड़े पर बैठकर शादी में जाने के लिए पुलिस सुरक्षा लेनी पड़ी थी.
हरियाणा में सरकारी स्कूलों में बच्चों को अच्छी शिक्षा और संस्कार देने के दावे कितने सही हैं उसकी एक बानगी गांव सागरपुर के स्कूल में उस समय देखने को मिली. यहां कुछ बच्चें स्कूल चप्पल पहनकर पढाई करने के लिए पहुंचे थे. लेकिन स्कूल में सविता नामक टीचर ने बच्चों को इसी बात को लेकर प्रताड़ित किया और उनके गले में उन्हीं की चप्पलों की माला पहना दी और ग्राऊंड का चक्कर भी लगवाया.
छात्रों का आरोप है कि उनको स्कूल के चक्कर भी लगवाए और धमकी भी दी कि अगर आगे से ऐसा किया तो फिर से सजा दी जाएगी. वहीं इस घटना के सामने आने के बाद दलित परिवारों में रोष देखने मिला. तो वहीं गांव के कुछ दबंगो ने आरोपी टीचर को निर्दोष बताते हुए मामले को दबाने की कोशिश की.
लेकिन पीड़ित दलित छात्राओं ने भरी भीड़ में आरोपी महिला टीचर का नाम लेते हुए बताया की टीचर ने उसके बाल बांधने वाले रिबन से चप्पलों की माला बना कर उनके गले में डाली थी. र इस घटना के बारे में अपने परिजनों को न बताने की भी धमकी दी थी. वहीं आरोपी टीचर का कहना है कि उसने केवल चप्पल की माला पहनाने की बात कही थी.
वहीं स्कूल की प्रिंसिपल टीचर की गलती को स्वीकार रही है. उनका कहना है मामला शनिवार का है लेकिन उनको कल ही पता चला है. कुछ ग्रामीण उनके पास आए थे तो टीचर ने उनके सामने माफी मांगी थी और आगे से ऐसा ना करने की बात भी कही थी. आगे से ऐसा ना हो उसका ध्यान रखा जाएगा.
रायबरेली। उत्तर प्रदेश के रायबरेली में हथियारबन्द बेखौफ हत्यारों ने नलकूप पर सो रहे दरोगा की धारदार हथियार से हत्याकर मौत के घाट उतार दिया. हत्यारों की क्रूरता का अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि हत्या के बाद वे दरोगा का गुप्तांग भी काटकर उठा ले गए. हत्या की घटना की खबर समूचे क्षेत्र में आग की तरह फैल गई. घटनास्थल पर बेकाबू हुई भीड़ ने चार घंटे तक लखनऊ-इलाहाबाद नैशनल हाइवे को जाम कर दिया. रोड जाम को हटाने में पुलिस के पसीने छूट गए. मृतक दारोगा के भाई की तहरीर पर पुलिस ने अज्ञात हत्यारों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है और छानबीन में जुट गई है.
नलकूप के चौकीदार गुरु प्रसाद निवासी मझिगवां करन के अनुसार, रात करीब 10 बजे करीब आधा दर्जन लोग वहां पहुंचे और बरामदे में सो रहे दरोगा धर्मेन्द कुमार गौतम (48) पुत्र धनश्याम पर धारदार हथियार से हमला कर दिया. चौकीदार ने बताया कि हत्यारों ने उनकी आंख में पट्टी बांधकर दूसरे कमरे में बंद कर दिया और दरोगा को मौत के घाट उतार दिया. बताया जाता है कि दरोगा धर्मेन्द्र कुमार अमेठी जनपद में सर्विलांस सेल में तैनात थे और दो दिन की छुट्टी पर घर आए हुए थे. मृतक दरोगा का मूल निवास हरचंदपुर थाना क्षेत्र का मझिगवां करन गांव है और वर्तमान में उनका परिवार सीएचसी बछरावां के निकट रहता है.
दरोगा धर्मेन्द्र कुमार की नृशंस हत्या की खबर सुबह करीब 4 बजे चौकीदार गुरु प्रसाद द्वारा उनके परिजनों को दी गई. घटना की जानकारी होते ही पास-पड़ोस के गांवों के सैकड़ों लोग घटनास्थल पर पहुंच गए. आक्रोशित लोगों ने लखनऊ-इलाहाबाद राजमार्ग को जामकर दिया और पुलिस प्रशासन मुर्दाबाद के नारे लगाए. घटना की सूचना पर पहुंची पुलिस अधीक्षक सुजाता सिंह व बछरावां विधायक रामनरेश रावत ने लोगों को समझा बुझाकर शांत कराया और जाम खिलवाया.
मृतक के भाई वीरेन्द्र कुमार गौतम जिला पंचायत सदस्य बछरावां ने अज्ञात हत्यारों के खिलाफ थाने में तहरीर दी है. पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया है. घटना को लेकर क्षेत्र मे भय एवं दहशत का माहौल बना हुआ है. पुलिस घटना की छानबीन में जुट गई है.
दरोगा की हत्या के समय कमरे में बंद चौकीदार कमरे के बाहर कैसे निकला और पूरी रात गुजारने के बाद सुबह 4 बजे परिजनों को सूचना देने पहुंचा? रात 10 बजे से सुबह 4 बजे तक चैकीदार कहां रहा? यह सब जांच के विषय हैं.
मुंबई। मुंबई के परेल इलाके में क्रिस्टल टावर में लगी आग को बुझा लिया गया है फायर बिग्रेड की दो घंटे की मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया. घटना में 4 लोगों की मौत हो गई है जबकि 16 लोग घायल हो गए हैं. मरने वालों में एक महिला और एक बुजुर्ग शामिल हैं. घायलों को केईएम अस्पताल में भर्ती कराया गया है. यह आग इस रिहाइशी बिल्डिंग की 12वीं और 13वीं मंजिल पर लगी थी. जिस जगह यह बिल्डिंग है वो हिंदमाता सिनेमा के नजदीक है.
आग लगने की सूचना फौरन दमकल विभाग को दी गई. जानकारी मिलते ही दमकल की गाड़ियां मौके पर पहुंच गई हैं और 2 घंटे बाद आग पर काबू पा लिया. दमकल की 10 गाड़ियां आग पर काबू पाने की कोशिश में जुटी हुई थी.
जानकारी के मुताबिक, जिस टावर में आग लगी थी, वो 15 मंजिला इमारत है. आग कैसे लगी इसका अभी पता नहीं चल सका है. फायर ब्रिगेड फंसे लोगों को बचाने का काम कर रही थी. कई लोगों को इमारत से सुरक्षित बाहर निकाला गया है.
इस आग को थर्ड लेवल का बताया जा रहा था, जो बहुत खतरनाक मानी जाती है. बताया जा रहा है कि आग ऊपर से नीचे की तरफ बढ़ रही थी. 10 से 12 गाड़ियां आग बुझाने का काम कर रही थी. क्रेन के जरिए लोगों को को बचाने का काम किया जा रहा था. बचाए गए लोग काफी डरे हुए हैं. जिन्हें इमारत से निकाला गया है उनमें बच्चे और बुजुर्ग भी शामिल है. बताया जा रहा है कि परेल के हिंदमाता इलाके में यह इमारत 4 साल पहले ही बनी थी. प्रारंभिक रूप से आग का कारण शॉर्ट सर्किट बताया जा रहा है.
गौरतलब है कि जून के महीने में आरटीआई से मिली जानकारी में पता चला था कि मुंबई में पिछले 6 साल में आग की 29,140 घटनाएं रेकॉर्ड की गई हैं. इस आग में 300 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है.
बाढ़ के चलते केरल में आम लोगों की जिंदगी बुरी तरह से प्रभावित हुई है. ऐसे में फिल्मस्टार्स की ओर से मिल रही मदद सुकून देने वाली है. जी हां, अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार, शाहरुख खान और ऋतिक रोशन समेत कई बॉलीवुड एक्टर्स ने बाढ़ प्रभावितों के लिए आर्थिक मदद की है. इस लिस्ट में नया नाम जुड़ा है एक्टर सुशांत सिंह राजपूत का जिन्होंने केरल में बाढ़ प्रभावितों के लिए करीब एक करोड़ रुपये की आर्थिक मदद की है.
दरअसल, सुशांत ने ये फैसला अपने एक फैन के कहने पर लिया. सोशल मीडिया पर उनके एक फैन शुभम रंजन ने कहा था कि वह केरल की बाढ़ पीड़ितों की मदद करना चाहता है, लेकिन उसके पास पैसे नहीं है. इस पर सुशांत सिंह राजपूत ने अपने फैन की ओर से 1 करोड़ रुपए मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा किए हैं.
फैन के लिए लिखा ये मैसेज…सुशांत ने अपना वादा पूरा करते हुए 1 करोड़ रुपए दान किए और इसके बाद सोशल मीडिया पर लिखा- ‘मेरे दोस्त शुभम रंजन जैसा कि मैंने वादा किया था, जो तुम चाहते थे वह काम हो गया है. तुमने मुझे यह करने के लिए प्रेरित किया और मुझे तुम पर गर्व है. तुमने ये तब किया जब इसकी वास्तव में जरूरत थी. ढेर सारा प्यार..’.
2013 में आई केदारनाथ आपदा पर बेस्ड सुशांत सिंह राजपूत की फिल्म भी रिलीज हो रही है. इस फिल्म में सारा अली खान नजर आने वाली है. पहले सारा इसी फिल्म से डेब्यू करने वाली थी, लेकिन अब यह फिल्म 2019 में रिलीज होनी है. सुशांत इन दिनों कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा की फिल्म ‘किज्जी और मनय’ की शूटिंग कर रहे हैं. इस फिल्म से मुकेश डायरेक्शन में अपना डेब्यू करने जा रहे हैं. इसके अलावा उनके पास ‘सोन चिरैया’ जैसी फिल्म भी है.
बता दें कि दक्षिण भारत का राज्य केरल पिछले कई दिनों से बाढ़ की चपेट में है. बाढ़ के चलते केरल में आम लोगों का जन-जीवन बुरी तरह से प्रभावित हुआ है. आपदा की इस घड़ी में सरकार के साथ ही कई आम लोग भी केरल में बाढ़ प्रभावितों की मदद के लिए आगे आए हैं. इनमें फिल्म जगत की भी कई मशहूर हस्तियां हैं, जिन्होंने आगे बढ़कर बाढ़ प्रभावितों की मदद के लिए मुख्यमंत्री राहत कोष में आर्थिक मदद भिजवाई है. केरल में बाढ़ के चलते 300 से ज्यादा लोग अब तक अपनी जान गंवा चुके हैं, जबकि लाखों बेघर हो गए हैं.
नई दिल्ली। 28 अगस्त को देश भर के व्यापारी पूरे देश में भारत बंद रखेंगे. फ्लिपकार्ट-वॉलमार्ट डील के विरोध में अखिल भारतीय व्यापारी संघ (कैट) ने इस बात की घोषणा करते हुए कहा कि यह डील खुदरा व्यापारियों को भुखमरी के कगार पर ला देगी.
कैट के सचिव प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि सरकार ई-कॉमर्स कंपनियों को बढ़ावा दे रही है, जिससे खुदरा व्यापारियों की कमर टूट रही है. ऑनलाइन कंपनियां ज्यादातर ग्राहकों को काफी बड़ा डिस्काउंट देती है, जिससे उन्हें नुकसान होने पर भी डर नहीं रहता है.
कैट ने कहा है कि वो भारत बंद के अलावा इस डील के विरोध में 15 सितंबर से पूरे देश में रथ यात्रा भी शुरू होगी. इस रथ यात्रा के समापन पर 16 दिसंबर को एक बड़ी रैली का भी आयोजन किया जाएगा, जिसमें पूरे देश के व्यापारी संगठन हिस्सा लेंगे.
कैट की यह आम सभा नागपुर में आयोजति की गई थी, जिसमें देश भर के 200 व्यापारी संगठनों ने हिस्सा लिया था. व्यापारियों ने फैसला किया है कि आगामी 28 अगस्त को बंद के दौरान सभी व्यापारी अपने प्रतिष्ठानों को बंद रखेंगे और अपने-अपने जिलों में ई-कॉमर्स कंपनियों के खिलाफ प्रदर्शन करेंगे.
अमेरिकी कंपनी वॉलमार्ट ने रविवार को कहा था कि उसने भारतीय कंपनी फ्लिपकार्ट के साथ लगभग 16 अरब डॉलर का सौदा पूरा कर लिया है और अब उसके पास फ्लिपकार्ट की 77 फीसदी हिस्सेदारी है. वॉलमार्ट के इस निवेश में फ्लिपकार्ट के कारोबार को रफ्तार देने को नई इक्विटी फंडिंग के लिए 2 अरब डॉलर का निवेश भी शामिल है.
इस वर्ष मई में तय किया गया यह महासौदा भारतीय खुदरा बाजार का अब तक का सबसे विशाल सौदा है, साथ ही यह वॉलमार्ट द्वारा किया गया सबसे बड़ा अधिग्रहण भी है जो कि कंपनी को अपने प्रतिस्पर्धी अमेजन से मुकाबला करने में मदद करेगा.
नई दल्ली। हरियाणा के हिसार में जून 2017 में गांव भाटला में हैंडपंप से पानी भरने को लेकर शुरू हुआ विवाद अब बौद्ध धर्म परिवर्तन तक पहुंच गया. भाटला में सोमवार को गुरू रविदास मंदिर में कार्यक्रम का आयोजन कर करीब 150 अनुसूचित परिवार के लोगों ने अपना धर्म परिवर्तन करते हुए बौद्ध धर्म अपना लिया. इसमें रोहनात से आए दलित समुदाय के 22 लोग भी शामिल हुए.
धर्म अपनाने से पहले बौद्ध भिक्षुओं ने अनुसूचित वर्ग के लोगों को धर्म दीक्षा दी. उत्तराखंड व सहारनपुर से आए बौद्ध भंतों धर्म सागर, भंते आनंद सागर व भंते निर्भय सागर ने धर्म दीक्षा की प्रक्रिया संपन्न करवाई. इस दौरान उन्होंने भविष्य में कभी बीजेपी को वोट न देने की शपथ भी ली.
धर्म परिवर्त्तन के कार्यक्रम को लेकर रविवार रात से ही तैयारियां शुरू कर ली गई थी. सुबह 10:30 बजे कार्यक्रम शुरू हुआ. दिनेश खापड़ ने समारोह की अध्यक्षता की व श्रवण थुराना ने विशिष्ट अतिथि के तौर पर शिरकत की. वक्ताओं ने अपने संबोधन में इस धर्म पविरर्तन के लिए भाजपा सरकार को जिम्मेवार ठहराया. उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार ने ऐसे अधिकारियों की भर्ती की है, जो दलितों का उत्पीडऩ कर रहे है.
धर्म सागर, भंते आनंद सागर व भंते निर्भय सागर ने कहा रोहनात गांव के लोगों की जमीन 1857 के गदर के बाद अंग्रेजों ने दूसरे गांवों के लोगों को नीलाम कर दी थी. जिसे वापस पाने के लिए करीबन 150 दलित परिवार पिछले 50 साल से सरकार के साथ लड़ाई लड़ रहे हैं. शहीदों के वंशज होने के बावजूद भी उन्हें आज तक अपनी जमीन वापस ना मिली है. उनकी मांगे नहीं मानी गई तो वह भी आने वाले समय में अपने गांव रोहनात में भी बौद्ध धर्म ग्रहण करने का काम करेंगे.
15 जून 2017 माह में गांव भाटला में हैंडपंप से पानी भरने को लेकर दो जातियों के युवाओं में विवाद हो गया था. अगस्त माह में किसी ने दलित समुदाय के बहिष्कार की मुनादी करवा दी. जिसके बाद मामला बढ़ता गया. 2 सितंबर को हाइकोर्ट की ओर से निर्देश के बाद सेशन जज गांव का दौरा करने पहुंचे थे. एससी-एसटी आयोग की टीम तो कभी हाईकोर्ट से कमीश्नर ने गांव में पहुंच कर दौरा किया था. इस मामले में एससी एसटी कमीशन में तथा हिसार अदालत में भी केस चल रहा है.
रजत कल्सन ने कहा मौजूदा सरकार नफरत के सहारे अपनी राजनीतिक चला रही है. इसी राजनीति के चलते हुए हरियाणा को तीन बार आग के हवाले कर चुकी है. उन्होंने कहा कि आने वाले समय मे अन्य जिलों में भी सरकार की दलित विरोधी मानसिकता के चलते इस तरह के बोद्ध धर्म ग्रहण कार्यक्रम के आयोजन किये जाएंगे. बीजेपी को वोट ने करने की शपथ कराई जाएगी. जल्दी ही हांसी में भी 500 दलितों को बौद्ध धर्म ग्रहण कराया जाएगा. उन्होंने दावा किया कि सोमवार को 300 परिवारों ने धर्म परिवर्तन किया है.
नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने केरल की बाढ़ को गंभीर प्राकृतिक आपदा घोषित किया है. इससे पहले केरल हाई कोर्ट को केंद्र ने सूचित किया कि राष्ट्रीय आपदा घोषित करने का कोई वैधानिक प्रावधान नहीं है. कांग्रेस और दूसरे दल राष्ट्रीय आपदा घोषित करने की मांग कर रहे थे.
गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने सोमवार को बताया कि पिछले एक सप्ताह में बाढ़, बारिश और भूस्खलन के कारण हुए नुकसान को देख यह निर्णय लिया गया. जब किसी आपदा को दुर्लभ गंभीर/गंभीर प्रकृति का घोषित किया जाता है तो राज्य सरकार को राष्ट्रीय स्तर पर मदद दी जाती है. केंद्र राष्ट्रीय आपदा कोष से भी अतिरिक्त मदद देने पर विचार कर रहा है. केरल में रविवार को बारिश थमने से लोगों ने थोड़ी राहत की सांस जरूर ली है, लेकिन अभी भी उनकी कठिनाई जस की तस है. सभी जिलों में जिलाधिकारी व्यवस्था पर नजर बनाए हुए हैं.
केंद्रीय मंत्री जे अल्फोंस ने कहा कि इस मुसीबत के समय में मछुआरे सबसे बड़े हीरो बनकर उभरे हैं. बचाव अभियान के दौरान उन्होंने अपनी करीब 600 नावें मदद के लिए दी. बाढ़ के कारण किसी भी घर में बिजली नहीं है, न ही अन्य तरह की सुविधाएं हैं. अभी सबसे ज्यादा वहां पर इलेक्ट्रीशियन, प्लंबर, कारपेंटर की जरूरत है. अभी वहां खाना और कपड़े की जरूरत नहीं है.छह और शव मिलेराज्य में भारी बारिश, बाढ़ और भूस्खलन से सात लाख 24 हजार से ज्यादा विस्थापित लोगों को 5,645 राहत शिविरों में रखा गया है.
एर्नाकुलम जिले के पारूर में रविवार रात छह और शव मिले हैं. स्थानीय विधायक वीडी सतीशन ने बताया कि इसके साथ ही आठ अगस्त से शुरू हुए बाढ़ से मरने वालों की संख्या 216 पहुंच गई है. विमान सेवा शुरूकई दिनों के बाद राज्य में विमान सेवा बहाल हुई है. कोचीन हवाई अड्डा बाढ़ के पानी में पूरी तरह डूब गया था जिससे सेवा बंद करनी पड़ी थी. अब कोच्चि नौसैनिक अड्डे से विमान सेवा शुरू की गई है. महामारी रोकने में जुटा केंद्रकेंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने कहा है कि केंद्र की ओर से केरल को पूरी मदद दी जा रही है. राज्य में करीब 3757 मेडिकल कैंप लगाए गए हैं, जिसमें 90 किस्म की दवाइयां भेजी जा रही हैं. उन्होंने कहा कि महामारी को फैलने से रोकने की तैयारी की जा रही है. केंद्र सरकार ने 100 मीट्रिक टन दालों के अलावा आवश्यक दवाइयां भेजी हैं.
सर्वाधिक प्रभावित स्थानों जहां लोग पिछले तीन दिनों से भोजन या पानी के बिना फंसे हुए हैं, उनमें चेंगन्नूर, पांडलम, तिरुवल्ला और पथानामथिट्टा जिले के कई इलाके, एर्नाकुलम में अलुवा, अंगमाली और पारावुर में शामिल हैं. केरल सरकार ने बाढ़ से कुल 19,500 करोड़ रुपये का नुकसान होने का अनुमान लगाया है.
बारिश से राहत के बाद सभी जिलों में जारी किया गया रेड अलर्ट वापस ले लिया गया है. मौसम विभाग ने आने वाले दिनों में भारी बारिश से राहत का दावा किया है. इसके बाद भी राज्य में जान-माल का जो नुकसान हुआ है, उससे केरल और वहां के लोगों का जीवन पटरी पर लौटने में काफी समय लग सकता है.
राज्य के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने कहा, ‘हमारी सबसे बड़ी चिंता लोगों की जान बचाने की थी. लगता है कि इस दिशा में काम हुआ. शायद यह अब तक की सबसे बड़ी त्रासदी है, जिससे भारी तबाही मची है. इसलिए हम सभी प्रकार की मदद स्वीकार करेंगे.’
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने देशवासियों से अप्रत्याशित बाढ़ की विभीषिका का सामना कर रहे केरल की मदद करने की अपील की है. सरकार्यवाह सुरेश भैय्या जोशी ने कहा है कि यद्यपि केंद्र सरकार और राज्य सरकार सहित कई सामाजिक संगठन युद्धस्तर पर काम कर रहे हैं, लेकिन संकट अतिविकट होने के चलते सभी को इसके लिए आगे आना होगा.
उन्होंने कहा कि केरल भयानक संकट के कगार पर खड़ा है. इसे राष्ट्रीय आपदा बताते हुए कहा कि इसमें जहां अभी तक सैकड़ों लोगों की जानें जा चुकी हैं वहीं लाखों लोग बेघर हो चुके हैं. सेना, राष्ट्रीय आपदा बल, केंद्र और राज्य सरकारों सहित सामाजिक संगठनों के प्रयासों की सराहना करते हुए जोशी ने कहा कि संकट विकट है और साधन सीमित हैं. ऐसे में संघ धार्मिक, सामाजिक सहित सभी देशवासियों से अपील करता है कि वे केरल के लोगों के साथ खड़े हों और पीडि़तों की बढ़-चढ़कर हरसंभव सहायता करें.
नई दिल्ली। एशियाई खेलों में मंगलवार को भारत के लिए एक अच्छी खबर आई. एशियाई खेलों में भारत की झोली में शूटर सौरभ चौधरी ने भारत को गोल्ड पदक दिलवाया. देश के लिए गोल्ड जीतने वाले सौरभ सिर्फ 16 साल के हैं.सौरभ मेरठ के कलीना गांव के रहने वाले हैं.
जीतू राय की जगह सौरभ को एशियाई खेलों में भेजा गया है. 10 मीटर एयर पिस्टल में सौरभ ने 586 अंकों के साथ पहला स्थान हासिल किया है. भारत के एक अन्य निशानेबाज अभिषेक वर्मा ने भी क्वालीफाई कर लिया है. वह 580 अंकों के साथ छठे स्थान पर रहे.अभिषेक वर्मा को ब्रांज मैडल मिला.
सौरभ ने क्वालिफिकेशन के दौरान 99, 99, 93, 98, 98, 99 के शॉट्स जमाते हुए 586 का स्कोर किया. उन्होंने तीन बार 99 का स्कोर किया और कोरिया के जिन जिंगोह को पीछे छोड़ा, जिन्होंने 584 का स्कोर किया.
सौरभ ने इस साल की शुरुआत में 10 मीटर एयर पिस्टल में गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रचा था. उन्होंने जर्मनी के सुस में हुए आईएसएसएफ जूनियर वर्ल्ड कप के फाइनल में 243.7 का स्कोर किया था, जो जूनियर वर्ल्ड रिकॉर्ड बना.
इसके पहले बजरंग पुनिया और विनेश फोगाट ने भारत के लिए गोल्ड मैडल जीता है. सौरभ चौधरी को सरकार ने 50 लाख रुपए और सरकारी नौकरी देने का ऐलान किया है.
नई दिल्ली। भाजपा सरकार में एक खास जाति से ताल्लुक रखने वाले अधिकारी भी अपने विभागीय मामलों पर भाजपा और संघ की भाषा बोलने लगे हैं. यहां तक की ये राजनीतिक बयानबाजी करने तक से नहीं चूक रहे हैं तो वहीं संविधान की अनदेखी भी कर रहे हैं. उत्तराखंड के विधालयी शिक्षा के महानिदेशक ने ऐसा ही एक बयान दिया है, जिसके बाद उनके ही शिक्षा विभाग में खासा रोष है.
दरअसल स्वतंत्रता दिवस के मौके पर शिक्षा महानिदेशक की लिखित भाषण की प्रति उनके ऑफिस ने माध्यमिक और प्रारंभिक शिक्षा सहित तमाम शिक्षा परिषदों को भेजा. साथ ही इस भाषण की प्रति को राज्य के सभी विद्यालयों और कार्यालयों में उपलब्ध कराने का फरमान जारी किया. लेकिन इस भाषण में जो लिखा था, उससे शिक्षा विभाग के भीतर ही विवाद हो गया है.
विधालयी शिक्षा के महानिदेशक ने अपने भाषण में आरक्षण को लेकर विवादास्पद बात कही है. साथ ही संघ की भाषा का भी इस्तेमाल किया है. स्वतंत्रता दिवस के भाषण में महानिदेशक आईएएस आलोक शेखर तिवारी ने आरक्षण को अतिवादी कह दिया. तो वहीं संघ और भाजपा के प्रचलित शब्द सामाजिक समरसता का भी जिक्र किया.
महानिदेशक तिवारी ने अपने भाषण में क्या कहा है, ……
“आज देश के सम्मुख क्षेत्रवाद, भाषावाद, बेरोजगारी, पर्यावरण, जल संरक्षण, आरक्षण, असमान क्षेत्रीय विकास के साथ-साथ आतंकवाद,नक्सलवाद जैसे अतिवादी विचारों से निपटने की चुनौती है. इन चुनौतियों का सामना राष्ट्र, समर्थ नागरिकों के माध्यम से कर सकता है.”
देखा आपने महानिदेशक आलोक शेखर तिवारी ने आतंकवाद और नस्लवाद के साथ आरक्षण को रखते हुए आरक्षण को अतिवादी विचार कहा है. तो वहीं इससे निपटने के लिए समर्थ नागरिकों की बात कही है. यहां महानिदेशक तिवारी किन ‘समर्थ नागरिकों’ की बात कह रहे हैं. यह भी देखना जरूरी है.
नई दिल्ली। भारत ने रविवार को स्वदेशी गाइडेड बम-एसएएडब्ल्यू और एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल ‘हेलिना’ का राजस्थान के पोखरण में अलग-अलग फायरिंग रेंज में सफल परीक्षण किया.
रक्षा मंत्रालय के अनुसार, चांधण रेंज में वायु सेना के विमान से स्मार्ट एंटी एयरफिल्ड वीपन (एसएएडब्ल्यू) का सफल परीक्षण हुआ. इसका परीक्षण रविवार को दोपहर दो बजे किया गया.
बताया गया है कि हैलिना का परीक्षण उसकी पूरी रेंज में किया गया. यह परीक्षण पूरी तरह सफल रहा और टेस्ट के दौरान इसने अपने हर टारगेट को हासिल किया. सभी पैरामीटर को टेलिमेटरी स्टेशन, ट्रैकिंग सिस्टम और हेलिकॉप्टर के जरिए मापा गया.
मिसाइल को लॉन्च करने से पहले इनफ्रेयर्ड इमेजिंग सीकर (IIR) के जरिए ऑपरेट किया गया. ये सबसे एडवांस एंटी टैंक सिस्टम है. मिशन के लॉन्च के दौरान डीआरडीओ, भारतीय सेना के अधिकारी मौजूद रहे.
नई दिल्ली। पहले दो टेस्ट गंवाने के बाद टीम इंडिया ने तीसरे टेस्ट में इंग्लैंड को घेर लिया है. दूसरे दिन का खेल खत्म होने तक उसने दो विकेट पर 292 रन बना लिए थे. टीम इंडिया के इस शानदार प्रदर्शन के बीच अपना डेब्यू टेस्ट खेल रहे रिषभ पंत छाए हुए हैं. उन्होंने बल्लेबाजी के बाद विकेटकीपिंग में भी अपना जलवा दिखाया है और वो धोनी के नक्शेकदमों पर दिखाई दे रहे हैं.
रिषभ पंत को बतौर बल्लेबाज काफी ऊपर आंका जाता है लेकिन अपने डेब्यू टेस्ट में उन्होंने बतौर विकेटकीपर भी खुद को साबित कर दिया. तीसरे टेस्ट की पहली पारी में रिषभ पंत ने 5 कैच लपक इतिहास रच दिया.
रिषभ पंत पहले भारतीय विकेटकीपर हैं जिन्होंने डेब्यू टेस्ट की पहली पारी में ही पांच कैच लपके हैं. उनसे पहले ऑस्ट्रेलिया के दो विकेटकीपरये कारनामा कर चुके हैं. 1966 में टेबर और 1978 में जे मैक्लेन ने डेब्यू टेस्ट की पहली पारी में 5 कैच लपके थे.
रिषभ पंत दुनिया के सबसे युवा विकेटकीपर हैं जिसने किसी इंटरनेशन मैच की पारी में 5 कैच लपके हैं. इससे पहले ये रिकॉर्ड इंग्लैंड के क्रिस रीड के नाम था. उस वक्त रीड की उम्र 20 साल 325 दिन थी.
आपको बता दें इससे पहले रिषभ पंत ने छक्का लगाकर अपना खाता खोला था. वो भारत के पहले खिलाड़ी हैं जिसने टेस्ट क्रिकेट में छक्के से अपना खाता खोला है. वैसे पंत से पहले दुनिया के 11 खिलाड़ी ये कारनामा कर चुके हैं.
नई दिल्ली। वर्ष 2005 में पुराने लव बर्ड्स अभिषेक बच्चन और रानी मुखर्जी ने फिल्म ‘बंटी और बबली’ से बॉक्स-ऑफिस पर धमाल मचा दिया था. चोरी करता यह कपल लोगों के लिए फेवरेट कपल बन चुका था. खास बात यह कि इसमें ऐश्वर्या का अभिषेक और अमिताभ के साथ स्पेशल आइटम सांग ‘कजरारे कजरारे’ भी था.
अब खबर है कि निर्माता ‘बंटी और बबली’ का सीक्वेल बनाने की प्लानिंग कर रहे हैं और दर्शकों को उत्साहित करने के लिए खुशखबरी यह है कि इस बार भी बड़े परदे पर फिल्म के सीक्वेल में वही जोड़ी नज़र आ सकती है. जीं हां, अभिषेक और रानी एक बार फिर अपनी ही फिल्म के सीक्वेल में साथ नज़र आने वाले हैं.
क्राइम थ्रिलर फिल्म ‘बंटी और बबली’ के सीक्वेल के लिए आदित्य चोपड़ा ने स्क्रिप्ट तैयार कर ली है. फिल्म को पहले शाद अली ने निर्देशित किया था. इस बार फिल्म को कौन डायरेक्ट करेगा यह तय नहीं हुआ है. फिल्म को यशराज फिल्म्स ही निर्मित करेंगे. इस सीक्वेल में अभिषेक और रानी 10 साल बाद साथ नज़र आएंगे. इसके पहले उन्होंने युवा, हम तुम, बस इतना सा ख्वाब है, कभी अलविदा ना कहना जैसी फिल्मों में काम किया है.
इस सीक्वेल के लिए यह जोड़ी और निर्माता सभी बहुत खुश और उत्साहित हैं. फैंस को याद होगा कि अभिषेक और रानी के पहले रोमांस के बहुत चर्चे थे. हालांकि इसके बाद अभिषेक ने ऐश्वर्या से शादी कर ली. वहीं रानी ने निर्माता आदित्य चोपड़ा से शादी कर ली. रानी की आखिरी फिल्म ‘हिचकी’ को दर्शकों ने बहुत पसंद किया था. वहीं अभिषेक बच्चन फिल्म ‘मनमर्ज़ियां’ में नज़र आने वाले हैं. वे अनुराग कश्यप की ‘गुलाब जामुन’ में भी ऐश्वर्या राय और अमिताभ बच्चन के साथ नज़र आएंगे.
नई दिल्ली। राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में कांग्रेस और बसपा के बीच गठबंधन की संभावना लगभग खत्म हो गई है. दोनों दलों के करीबी सूत्रों के मुताबिक इन तीनों चुनावी प्रदेशों में दोनों दल अब अलग-अलग चुनाव लड़ेंगे. इसके साथ ही पिछले काफी वक्त से दोनों दलों के बीच गठबंधन की संभवना खत्म हो गई है.
कांग्रेस मीडिया में लगातार यह बयान दे रही थी कि बसपा से बातचीत जारी है. लेकिन बसपा ने कभी भी किसी बातचीत की पुष्टि नहीं की. इस बीच पिछले कुछ दिनों से गठबंधन को लेकर किसी तरह का कोई बयान भी सामने नहीं आया. बसपा प्रमुख मायावती जहां सम्मानजनक सीटों की बात कर रही थीं तो कांग्रेस पैकेज डील की. लेकिन गठबंधन की सुगबुगाहट के एक महीने बाद भी दोनों दल किसी फैसले पर नहीं पहुंच पाएं.
बसपा सूत्रों के मुताबिक अब गठबंधन की संभावना खत्म है और बसपा अपने बूते चुनावी तैयारियों मे जुट गई है. इस बात के संकेत इससे भी मिलते हैं कि बसपा सुप्रीमो मायावती ने पार्टी पदाधिकारियों को सितंबर से पहले प्रदेशों में सभी बूथों पर अपने एजेंटों की नियुक्ति कर लेने का फरमान जारी किया है. इतना ही नहीं बसपा सेक्टर और ब्लॉक स्तर पर भी इस अवधि के अंदर अपनी टीम तैयार करने में जुट गई है.
“दलित दस्तक” को मिली सूचना के मुताबिक तीनों प्रदेशों मे लगे पार्टी के पदाधिकारियों से प्रत्याशियों की सूची फाइनल करने को कही गई है. बसपा तीनों प्रदेशों में हर सीट पर अपने प्रत्याशी उतारने की तैयारी में है. जहां पार्टी का प्रत्याशी मजबूत नहीं है, वहां जमीनी कार्यकर्ता को चुनाव में उतारने की तैयारी है. कांग्रेस-बसपा के बीच गठबंधन नहीं हो पाने की सूचना से खासकर भाजपा उत्साहित है. दोनों दलों के अकेले चुनाव लड़ने की स्थिति में भाजपा को फायदा मिलना तय है.
नई दिल्ली। जब वाजपेयी की अंत्योष्ठी पर एक धड़ा उनके प्रधानमंत्री काल में लिए गए जनविरोधी फैसलों को गिनवा रहा था, उनके समर्थकों को मिर्ची लग रही थी. कहा जा रहा था कि आज के दिन जब वाजपेयी की मृत्यु हुई है, उनके विरोध में बात नहीं करनी चाहिए. लेकिन इसी दौरान दो ऐसी घटनाएं घटी, जिसे भी नहीं होना चाहिए था, लेकिन वह हुई.
बिहार के मोतिहारी स्थित सेंट्रल युनिवर्सिटी के प्रोफेसर संजय कुमार को वाजपेयी को लेकर सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणी के कारण मारपीट का सामना करना पड़ा. संजय कुमार का कहना है कि शुक्रवार यानि कल 17 अगस्त को जब वो अपने निवास पर कुछ काम कर रहे थे. तभी राहुल आर. पाण्डेय, अमन बिहारी वाजपेयी, तथा शन्नी वाजपेयी के नेतृत्व में 20-25 लोगों द्वारा उनपर हमला कर दिया. इस दौरान उनसे जमकर अभद्रता की गई और उनके कपड़े तक फाड़ दिए गए. हमलावरों का आरोप था कि वाजपेयी के खिलाफ प्रोफेसर ने अभद्र शब्दों का प्रयोग कर सोशल मीडिया पर लिखा है. जिससे उन्हें आधात पहुंचा है.
अब यह भी देख लेते हैं कि आखिर प्रोफेसर संजय ने क्या लिखा?
प्रोफेसर संजय ने वाजपेयी को लेकर दो पोस्ट लिखा. अगर इन दोनों पोस्टों को देखें तो इसमें वही लिखा है, जो सच है और किसी भी गलत भाषा का इस्तेमाल नहीं किया गया है. बावजूद इसके उनपर हमला किया गया.
प्रोफेसर संजय कुमार ने अपने ऊपर हुए हमले का आरोप वीसी अरविंद अग्रवाल पर लगाया है. मोतिहारी थाने में की शिकायती में उन्होंने आरोप लगाया है कि आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभाने की वजह से उन्हें पहले भी धमकी मिलती रहती है. मुझपर फेसबुक कमेन्ट को बहाना बना कर हमला किया गया है. हमला करने वाले कुलपति के निकट के लोग है. जिन्हें कुलपति ने रैगिंग कमेटी में शामिल कर रखा है.
तो वहीं स्वामी अग्निवेश ने आरोप लगाया कि दिल्ली में भाजपा मुख्यालय पर वाजपेयी जी को श्रद्धांजलि देने के दौरान उनके साथ मारपीट की गई. स्वामी अग्निवेश को इससे पहले झारखंड में भी निशाना बनाया जा चुका है. सवाल है कि विचारों की भिन्नता पर किसी पर जानलेवा हमले का बढ़ता चलन कितना जायज है.
झारखंड के चतरा ज़िले के किसानों के सामने चिंता और चुनौती दोनों ही एक साथ आ पड़ी है. चिंता इस बात की है कि अगर वे अपनी ज़मीन और घर से बेघर हो गए तो कहां जाएंगे, और चुनौती ज़मीन को कैसे बचाएंगे? क्योंकि किसानों के अनुसार उनके पास जिस ज़मीन पर ‘मालिकाना दावा’ करने के कागज़ात हैं, वो वन विभाग की नज़र में मान्य नहीं हैं. दरअसल, चतरा के कई गांवों के किसान और ग्रामीणों पर वन विभाग का दबाव है कि वो जल्द-जल्द से मकान और ज़मीन खाली करें, नहीं तो खाली करवाया जाएगा. वन विभाग ने इस बाबत गांव वालों को नोटिस भी भेजा है. इसी वजह से 600 से भी अधिक किसान परिवारों पर बेघर होने का संकट मंडराने लगा है. चतरा के ज़िला वन अधिकारी (डीएफओ) का कहना है कि वन भूमि को लेकर जो कार्रवाई हो रही है वो सरकार के निर्देश पर है.
गांव वालों की शिकायतें
इनकी 1400 एकड़ से भी अधिक ज़मीन को वन विभाग ने वन भूमि बताकर खाली करने का नोटिस भेजा है. जबकि किसान इन जमीनों पर पूर्वजों के समय से रहते आने की बात कह रहे हैं. लावालौंग प्रखंड के पतरातू गांव के तुलसीदास कहते हैं, “एक साल पहले रेंजर ने आकर हमारी जमीन पर वन विभाग का पिलर गाड़ दिया. विरोध करने पर कहा कि इस पिलर को सिर्फ निशान के तौर पर गाड़ रहे हैं, इससे कोई दिक्कत नहीं होगी. इस साल जून में आकर अधिकारी कहते हैं कि ये वन भूमि है इसपर खेती नहीं करना है और घर भी खाली करो.” विनोद दास कहते हैं कि उनका परिवार तीन पीढ़ी से रहता आ रहा है. उनके पास जमीन का पर्चा, रसीद और नक्शा भी है, पर वन विभाग मानने को तैयार नहीं है. 60 वर्षीय गोपाल राम के मुताबिक वह बाप-दादा से इसी जमीन से गुजर-बसर करते आ रहे हैं. अगर उनसे उनकी ज़मीन छीन ली जाएगी, तो परिवार को लेकर वो कहां जाएंगे. डीएफओ आरएन मिश्रा कहते हैं, “हमें सरकार की तरफ से निर्देश दिया गया है कि सभी वन भूमि चिन्हित कर उसे अतिक्रमण से मुक्त कराया जाए. जिन जगहों पर वन भूमि चिन्हित हुई, वहां के ग्रामीणों को समय दिया गया है कि वे ज़मीन के पेपर दिखाएं और अपना पक्ष रखें.”
वन विभाग का नोटिस
गोपाल राम के गांव में लगभग 20 घरों को वन विभाग की तरफ से खाली करने की नोटिस मिला है. इसी गांव की सुनती देवी बताती हैं कि अधिकारी केस करने की धमकी देते हैं. चार लोगों पर केस भी हो गया है. यहां के किसानों की करीब 50 एकड़ जमीन है, जिसे वन विभाग ने खाली करने को कहा है. कान्हा चट्टी प्रखंड के छेवटा गांव के जुलाल दांगी, आगे जीवन कैसे यापन करेंगे, इसे लेकर चिंता में हैं. वो कहते हैं, “हमारे पूर्वजों ने ज़मींदार से 44 हुकुमनामा पर ज़मीन लिया था. 1957 से लेकर 2012 तक रसीद भी कटी, लेकिन इसके बाद से रसीद कटनी बंद हो गई. अब वन विभाग कोई कागज़ को नहीं मान रहा. जबरन ज़मीन अपने कब्जा में ले रहा है.” जबकि ज़िला भू-अर्जन पदाधिकारी (एलआरडीसी) अनवर हुसैन इस बाबत बहुत ज़्यादा जानकारी नहीं होने की दलील देते हैं. हालांकि वे ये भी मानते हैं, “कागज़ात को जांचने का काम तो भू-अर्जन पदाधिकारी का ही होता है, लेकिन गांव में अधिकतर लोगों ने फर्जी तरीके से कागज़ात बना रखा है.”
सरकारी ज़मीन बताकर
छेवटा के ही कई आदिवासी परिवार इस मुसीबत का सामना कर रहे हैं. यहां के लोगों कहना है कि उनके एक घर पर वन विभाग ने पोकलेन तक चला दिया है. शांता और बिछू देवी कहती हैं, “हमलोगों ने भी ठान लिया है कि ज़मीन किसी भी क़ीमत पर खाली नहीं करेंगे क्योंकि इसके सारे कागज़ात हमारे पास हैं.” वन क़ानून के जानकार और झारखंड जंगल बचाओ आंदोलन के संस्थापक संजय बासु मलिक कहते हैं, “वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत तीन पीढ़ी से रहते आ रहे लोंगों को काफ़ी अधिकार प्राप्त हैं. कोई पर्चा-रसीद धारक या जिनके पास कागज़ात नहीं भी है, वो भी ज़मीन पर दावा कर सकते हैं. इसके लिए लिए क़ानून में प्रावधान है. इसके लिए गांव सभा और आसपास के लोगों को स्वीकृति देनी पड़ती है कि ये यहां तीन पीढ़ी से रहते आ रहे हैं.” बासु ये भी कहते हैं कि ग्रामीणों के पास जो पर्चा है, वो गैरमजरुआ ख़ास ज़मीन का है और उसकी रसीद भी कटती थी, लेकिन राज्य में नई सरकार ने इसे साल 2015 के बाद से बंद कर दिया है. वो कहते हैं, “अब ऐसा लगता है कि सरकार इसे जंगल और सरकारी ज़मीन बताकर अपने कब्जा में लेना चाह रही है.”
पतरातू गांव में तकरीबन 55 एकड़ ऐसी ज़मीन है जिसे वन विभाग वन भूमि बता रहा है. चतरा प्रखंड के पकरिया और ढड़हा गांव में 100 से भी अधिक परिवार इसकी जद में है. यहां के प्रदीप उरांव बताते हैं कि कई घरों को वन विभाग ने जमीन खाली करने का नोटिस दिया था, और उसी दौरान उनकी ज़मीनों पर पिलर गाड़ा गया था. इस गांव में किसानों के पास ज़मीन का पर्चा भी है और रसीद भी. यहां हर परिवार के पास दो से तीन एकड़ ज़मीन है, जिसपर पर वो वर्षों से खेती करते आ रहे हैं. हालांकि डीएफओ का ये कहना है कि जिन जगहों पर वन विभाग की तरफ से ग़लत पिलर गाड़ दिया गया, उसे हटा भी दे रहे हैं. दस्तावेज़, रसीद के बावजूद जमीन को वन भूमि क्यों बताया जा रहा है के प्रश्न पर, डीएफ़ओ कहते हैं कि उनमें अधिकतर ग्रामीणों के पास फ़र्ज़ी कागज़ात हैं. जबकि ज़िला भू-अर्जन पदाधिकारी (एलआरडीसी) अनवर हुसैन सलाह देते हैं, “वन अधिकारी और पीड़ित दोनों को ही इसे लेकर ज़िला भू-अर्जन पदाधिकारी के कार्यलाय में अपील करनी चाहिए.” गांव वालों के लिए ऐसी ही सलाह डीएफ़ओ आरएन मिश्रा की भी है, “अगर उन्हें लगता है कि ग़लत किया गया है तो वे डीसी और न्यायालय में अपील कर सकते हैं.”
दलित और आदिवासी
पकरिया और ढड़हा गांव की अधिकांश आबादी और इससे पीड़ित परिवार दलित और आदिवासी है, जिनकी 250 से एकड़ से अधिक की ज़मीन को वन विभाग वन भूमि बता रहा है. यहां के कई किसानों ने इसे लेकर न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है और कई अन्य इसकी तैयारी कर रहे हैं. चतरा प्रखंड के ही गोडरा, लूपुंगा और लातबेर गांव में ये आंकड़ा तकरीबन 400 के करीब है, जहां के किसानों और ग्रामीणों को वन विभाग की तरफ से कोई नोटिस तो नहीं मिला है. लेकिन सर्वेयर ने ये बताकर, उनकी ज़मीन का रजिस्ट्रेशन नहीं किया है कि ये वन भूमि की ज़मीन है और इसे लेकर किसी भी समय नोटिस या खाली करवाया जा सकता है. लेकिन इस पूरे मामले पर चतरा के ज़िलाधिकारी जीतेंद्र कुमार सिंह सिर्फ ये कहते हुए अपनी बात खत्म कर देते हैं कि इस मामले वो देख रहे हैं. चतरा के सांसद सुनील कुमार सिंह ने इस बारे में बीबीसी को बताया कि ये मामला उनके संज्ञान में है. वो इसे लेकर संबंधित अधिकारियों के संपर्क में हैं. वो कहते हैं, “वन अधिकारियों को जो काम करना चाहिए, वो नहीं कर रहे हैं, बल्कि किसानों और ग्रामीणों को भयभीत कर रहे हैं. दुर्भाग्य ये है कि प्रभावित लोगों की न तो अपत्ति दर्ज की जा रही है और न उनका पक्ष सुना जा रहा है.”
हार मानकर छोड़ दिया है…
कान्हा प्रखंड के भांग कुरकुट्टा गांव में 14 किसान परिवार हैं, जिनकी 40 एकड़ ज़मीन को वन विभाग वन भूमि बता रहा है. वहीं, चतरा प्रखंड के पावो गांव के आदिवासी किसानों का कहना है कि उनकी ज़मीन पर 2005 में ही वन विभाग ने ट्रेंच (ज़मीन काट देना) कर वृक्षा रोपण शुरू कर दिया था. इस बारे में मदन मुंडा कहते हैं कि उनके पास पर्चा, रसीद सब है. इसी को आधार बनाकर लोग हाईकोर्ट तक गए, लेकिन कुछ नहीं हुआ. अंत में हार मानकर छोड़ दिया है. सुनील कुमार सिंह का कहना है, “ज़मीन का कागज़ात चेक करना वन अधिकारी काम नहीं है बल्कि एलआरडीसी, सीओ और डीसी का है. वन अधिकारी की तरफ से जिला प्रशासन के साथ बिना समन्वय बनाए ही कागज़ात को फ़र्ज़ी बताना अधिकारियों की मनमानी है. वन अभ्यारण्य इको ज़ोन सेंसेटिव बनाने का जो ड्राफ्ट तैयार हुआ, उसके पहले पन्ने पर लिखा हुआ है कि प्रभावित ग्रामीणों के साथ बातचीत की जाएगी, जो नहीं की जा रही है.”
सवाल पुनर्वास का भी है
किसान भले ही चाहे जो भी दलील दें लेकिन एलआरडीसी अनवर हुसैन कहते हैं, “बहुत से ग्रामीणों की रसीद फ़र्ज़ी हैं. ये लोग अंचल स्तर के कर्मचारियों से सांठगांठ कर फ़र्ज़ी ढंग से रसीद कटाते आए हैं. रही बात पर्चे की तो ये अनुमंडल से मिलता है, जिसे जांचा जाना चाहिए कि कब, कैसे और किस आधार उन्हें ज़मीन का पर्चा दिया गया है.” दूसरी तरफ़ आदिवासी किसानों को ज़मीन खाली करने को लेकर मिले नोटिस के बारे में डीएफओ आरएन मिश्रा ने भी साफ़ तौर से इंकार किया. किसानों के मकानों पर पोकलेन चलाने वाले आरोप को भी निराधार बताते उन्होंने कहा, “तीन-चार गांव में पोकलेन चला, लेकिन किसी भी आदिवासी के गांव या घर पर नहीं.”
भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान में पूर्व प्रधानमंत्री के निधन की खब़र को मीडिया ने अच्छा-ख़ासी जगह दी है.
भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और तीन बार भारत के प्रधानमंत्री रहे वाजपेयी को पाकिस्तान की मीडिया ने दोनों देशों के बीच रिश्ते सुधारने की कवायद का श्रेय दिया है. पाकिस्तान की मीडिया ने अपने देश के विदेश मंत्रालय और निर्वाचित प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के श्रद्धांजलि संदेश भी छापे हैं.
चीन की एक मीडिया आउटलेट ने इस बात को प्रमुखता से छापा कि कैसे वाजपेयी की नीति शुरूआत में चीन को एक ख़तरे के रूप में देखती थी लेकिन बाद में व्यावहारिक हो गई.
बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका की मीडिया ने भी उनके निधन पर रिपोर्ट लिखी है.
पाकिस्तान के प्रमुख उर्दू और अंग्रेज़ी अख़बारों ने अपनी वेबसाइट पर वाजपेयी के निधन की ख़बरों को प्रमुखता से छापा है.
द एक्सप्रेस ट्रिब्यून की रिपोर्ट की हैडलाइन है – “इमरान खान ने अपने श्रद्धांजलि संदेश में वाजपेयी की भारत-पाक रिश्तों की कोशिशों की सराहना की.”
साल 1999 में वाजपेयी अमृतसर से बस में पाकिस्तान के शहर लाहौर गए थे और तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को गले लगाया था. दोनों देशों के लिए ये ऐतिहासिक पल था.
साल 2001 में आगरा शहर में उन्होंने पाकिस्तान सेना प्रमुख जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के साथ शिखर वार्ता की थी. दोनों देश किसी ज्वाइंट स्टेटमेंट पर राज़ी नहीं हो पाए थे और सम्मेलन को असफल करार दिया गया था. लेकिन वाजपेयी की छवि और बेहतर हुई.
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने अपनी श्रद्धांजलि संदेश में कहा है कि वाजपेयी एक स्टेट्स्मैन थे जिन्होंने भारत-पाक संबंधों को सुधारने में योगदान दिया और हमेशा ‘सार्क’ के समर्थक रहे.
बहुत से उर्दू अख़बार जैसे जंग, जसारत, जिन्ना, डेली एक्सप्रेस और दुनिया ने भी उनके निधन की ख़बर को छापा है.
दुनिया अख़बार की सुर्ख़ी थी – “पाकिस्तान ने वाजपेयी के निधन पर जताया शोक.”
उर्दू टीवी चैनल डॉन न्यूज़ ने उनके 1999 में पाकिस्तान दौरे की तस्वीरें वॉइसओवर रिपोर्ट में पेश की. रिपोर्ट में बताया गया कि वाजपेयी दोनों देशों के रिश्तों में सुधार चाहते थे जिसके लिए उन्होंने कोशिशें भी की.
चीन की ज़्यादातर मीडिया ने शंघाई की ‘द पेपर’ वेबसाइट के श्रद्धांजलि लेख को शेयर किया है. राष्ट्रवादी अख़बार ग्लोबल टाइम्स ने भी इसी को जगह दी है.
पुरानी सरकारी मीडिया खबरों के हवाले से वेबसाइट के लेख में बताया गया है कि वाजपेयी की चीन को पहले ख़तरे की तरह देखते थे, अमरीका के साथ संबंधों को प्राथमिकता दी और 1998 में सत्ता में आने के बाद परमाणु बम बनाया.
लेकिन वेबसाइट के मुताबिक वाजपेयी ने बाद में व्यवहारिक राह अपना ली. उन्होंने तिब्बत को चीन का हिस्सा माना, दोनों देशों की सीमा के मुद्दे को बातचीत से सुलझाया और आपसी सहयोग को बढ़ावा दिया. जून 2003 में अपने चीन दौरे पर वाजपेयी ने ऐतिहासिक ज्वाइंट डेक्लेरेशन भी साइन की.
बाकी क्षेत्रों में ऐसी रही कवरेज
बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका की प्रमुख मीडिया ने अपनी-अपनी वेबसाइट पर वाजपेयी के निधन की ख़बर को जगह दी.
हिमालयन टाइम्स ने छापा है कि नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने गुरूवार को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को श्रद्धांजलि संदेश भेजा था और उनसे फ़ोन पर भी बात की थी.
ओली ने कहा कि भारत और दुनिया ने अपना बड़ा नेता खो दिया और नेपाल ने अपना सच्चा दोस्त और शुभचिंतक.
अफ़ग़ानिस्तान के नेताओं ने भी वाजपेयी के निधन पर दुख जताया. पूर्व राष्ट्रपति हामिद करज़ई और भारत में अफ़गानिस्तान की राजदूत शाइदा अब्दली ने उन्हें श्रद्धांजलि दी.
अफ़गानिस्तान के मुख्य कार्यकारी अब्दुल्लाह ने ट्वीट किया, “मेरे साथ सभी अफ़गानिस्तानी भारत और पूर्व भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के परिवार और मित्रों के दुख में शरीक है. उनका जाना एक बड़ी क्षति है. वो हम अफगानियों के बुरे वक्त में हमारे साथ खड़े रहे. उनकी आत्मा को शांति मिले.”
“उनकी छोरी थी, मार दी..कोई जुल्म नहीं करया. मार दी ते बढ़िया करया. पांच-छह और ऐसा कर दें तो छोरियां डरण लाग जांगी, भाजेंगी नहीं.”
ममता की पड़ोस की बुज़ुर्ग महिला मुझसे ये बातें कह रहीं थी. वही महिला जो ममता से शायद रोज़ मिलती होंगी. वही महिला जिसने बचपन से ममता को बड़े होते देखा. ममता वही लड़की है जिसे हरियाणा के रोहतक में दो बाइक सवारों ने लघु सचिवालय के सामने आठ अगस्त को दिन-दहाड़े गोली मार दी थी. इस हत्या के आरोप में ममता के माता-पिता पुलिस हिरासत में हैं. मंगलवार (14 अगस्त) को उसके रिश्ते के एक भाई और दोनों शूटर्स को पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया.
लेकिन मामला इतना ही नहीं है और इसलिए यहां खत्म भी नहीं हो जाता. सोशल मीडिया पर बहुत से लोगों को ऐतराज़ रहा कि लड़की की जाति न लिखी जाए. कई लोग कहते रहे कि लड़के ने लड़की को बहलाया-फ़ुसलाया. कई उनकी उम्र के अंतर पर भी ज़ोर देते रहे. लेकिन ऐसे लोग कम नहीं हैं जो साफ़ कह रहे हैं कि ये हत्या जायज़ है.
क्यों मारी गई ‘ममता’?
ममता को उसके माता-पिता ने अपने रिश्तेदारों से गोद लिया था जब वह एक साल की थी. उसे प्यार था सुमिन से जो उन्हीं के यहां किराये के कमरे पर रहता था. ममता एक जाट परिवार से थीं जो हरियाणा में एक अगड़ी जाति मानी जाती है. वहीं सुमिन वाल्मिकी जाति से है जो एक अनुसूचित जाति है.
पुलिस में दर्ज एफ़आईआर के मुताबिक ममता 2017 में अपने प्रेमी सुमिन के साथ घर से चली गई और दोनों ने आर्य समाज मंदिर में शादी कर ली. तब सुमिन की उम्र 26 साल थी और ममता के पिता के आरोप के मुताबिक तब ममता की उम्र 17 साल थी.
दोनों ने शादी करते ही हाई कोर्ट में अपनी सुरक्षा के लिए याचिका लगाई. लेकिन ममता के पिता के आरोप के बाद पुलिस ने पाया कि ममता ने अपने आधार कार्ड में गड़बड़ी की है. पुलिस ने जालसाज़ी के आरोप में सुमिन और उसके पिता को गिरफ्तार कर लिया और कोर्ट ने ममता को करनाल शहर के नारी निकेतन भेज दिया.
पिछले सात महीनों से सुमिन के साथ-साथ उसके पिता भी इसी जालसाज़ी के आरोप में जेल में हैं. इस बीच ममता 18 साल की हो गई और सुमिन के साथ जीवन बिताने के फ़ैसले पर अड़ी रही.
आठ अगस्त को सुमिन पर लगे मुकदमे की तारीख़ पर ममता दो पुलिसकर्मियों के साथ रोहतक कोर्ट आई थी. जब वो बाहर निकली तो दो बाइकसवारों ने उस पर गोलियां चला दीं. उसके साथ आए सब-इंस्पेक्टर की भी मौत हो गई.
पुलिस ने तुरंत उसके माता-पिता और जन्म देने वाले माता-पिता को कथित ‘ऑनर किलिंग’ के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया. वैसे जब इस केस से जुड़े लोगों से बात हुई तो मामला ‘कथित’ नहीं लगा.
ममता की शादी की तैयारियां की जा रही थीं
श्याम कॉलोनी में ममता का बड़ा सा घर सुनसान पड़ा था. दरवाज़ा खटखटाने पर उसकी भाभी बाहर आई. उन्हें अपना परिचय दिया तो वो बिना कुछ कहे अंदर चली गईं. उनके बच्चे ने कहा कि हमको बात नहीं करनी. पड़ोस में बात करने की कोशिश की तो एक बुज़ुर्ग महिला ने कहा कि उन्हें कुछ नहीं पता. जब पुलिस आई, तभी पता चला कि कुछ हुआ है. गली में दो घर छोड़ कर रहने वाली ये महिला कह रही थीं कि वो अभियुक्त मां-बाप का पूरा नाम भी नहीं जानतीं. तभी एक और महिला वहां आईं और मुझे ममता और उसके परिवार के बारे में बताने लगीं. उन्होंने बताया कि वो पहले ममता के माता-पिता के साथ कोर्ट भी जा चुकीं हैं. बातों-बातों में उनके मुंह से निकल गया कि पिछले साल ममता का रिश्ता हो रहा था और रस्म के लिए लोग आने वाले थे. वो बोलीं, “जिसको बट्टा लगता है, उनकी खाट खड़ी होती है. उनका कलेजा फटता है. छोटी बात नहीं है. मारना मजबूरी हो जाती है. मेरी लड़की करती ऐसा तो मैं भी मार देती.” जब मैंने उनसे पूछा कि शादी तो हो ही गई थी, कथित बट्टा तो लग ही गया था तो फिर मारने से हासिल क्या हुआ तो उन्होंने कहा कि ‘अगर वो वाल्मीकि लड़का हमारी गली में उसको लेकर घूमने लग जाता तो?’
उन्होंने माना कि अगर लड़का अपनी जाति का होता तो शादी करने में बुराई नहीं थी.
इन बुज़र्ग महिला की बातों से पता चला कि ममता की किसी और से शादी की तैयारियां हो रही थीं. तो क्या इसी वजह से आनन-फ़ानन में उसे घर से बिना बताए जाना पड़ा और शादी कर ली? इसके अलावा सबसे बड़ा मसला सुमिन का जाति से वाल्मीकि होना था. 15 मिनट की रिकॉर्डेड बातचीत में लड़की और लड़के की उम्र में अंतर या लड़की के करियर की बात उन्होंने नहीं की.
पंचायत ने किया अंतिम क्रिया से इनकार
ममता का शव अस्पताल में लावारिस था. माता-पिता जेल में थे. रोहतक शहर से 3-4 किलोमीटर दूर सिंहपुरा गांव में सुमिन का घर है. जब वहां पहुंची तो एक पुलिसकर्मी ने दरवाज़ा खोला. ममता की हत्या के बाद से ही वहां पुलिस सुरक्षा कड़ी कर दी गई है. मुझे पता चला कि सुबह ही इसी गांव में ममता पर गोली चलाने वाले लोग पकड़े गए हैं.
सुमिन के छोटे भाई दिनेश ने बताया कि वे लोग ममता का दाह-संस्कार करना चाहते थे लेकिन गांव की पंचायत ने मना कर दिया क्योंकि खाप के सिस्टम के हिसाब से आठ गांवों में भाईचारा है और लड़का और लड़की के गांव इन्हीं आठ गांवों में आते हैं.
दिनेश ने ये भी बताया कि जब सुमिन को जालसाज़ी के आरोप में थाना ले जाया गया था तब खुद एसएचओ ने कहा कि ‘जाट की लड़की को लेकर गए हो, बस ये मसला है और गड्ढ़ी खेड़ी वाले (अभियुक्त पिता का गांव) तुम्हें मारेंगे.’
उन्होंने कहा, “भाई को समझाया था कि ग़लत हुआ है क्योंकि ये लोग हमारी जाति वालों को अपनाएंगे नहीं.”
“यहां जाट बिरादरी के लोगों ने अंतरजातीय शादी की है. एक बहू धानक(अनुसूचित जाति) जाति की भी है लेकिन ये लोग कहते हैं कि हम ला सकते हैं लेकिन तुम ऐसा नहीं कर सकते.”
मैंने उनसे पूछा कि जाट तो कहते हैं कि दलितों और जाटों में भाईचारा होता है, इसके जवाब में उन्होंने कहा कि ‘ऐसा होता तो फिर ये विरोध होता ही क्यों, हमारे घर में सब कुछ है, सब सुविधा है, हमारे भी दो हाथ-पैर हैं.’
सुमिन के पिता 23 साल तक भारतीय सेना में रहे हैं.
दलित बहू तो ठीक लेकिन दलितों को नहीं देंगे बेटी
इस गांव के सरपंच तो नहीं मिले लेकिन उन्होंने फ़ोन पर कहा कि उनके भाई और बेटे से इस मामले पर जानकारी ले ली जाए. सरपंच के भाई अतर सिंह ने बताया कि क्योंकि मामला आठ गांव के भाईचारे का था और ममता के यहां दाह-संस्कार पर विवाद हो सकता था, इसलिए पंचायत ने मना कर दिया. साथ ही उन्होंने दिनेश की कही बात भी दोहराई कि जाट लड़का अगर अनुसूचित जाति की लड़की से शादी कर ले तो पंचायत को ऐतराज़ नहीं होता लेकिन लड़की के ऐसा करने पर विवाद हो जाता है. वो कहते हैं कि पहले हरिजनों और जाटों का भाईचारा होता था लेकिन अब कोई ऐसा नहीं मानता. सरपंच के बेटे सहदेव ने बीच में कहा कि वो भी एक अनुसूचित जाति की लड़की से शादी करना चाहते थे लेकिन घरवाले नहीं माने और फिर अरेंज मैरिज हुई.
महिलाओं ने की ममता की अंतिम क्रिया
हरियाणा की महिला आयोग की अध्यक्षा प्रतिभा सुमन ने बताया कि उन्होंने प्रशासन को लिख कर दिया था कि ममता की अंतिम क्रिया आयोग करना चाहता है.
“जिन मां-बाप ने अपनी बेटी की जान ले ली, उन्हें कोई अधिकार नहीं होना चाहिए उसकी अंतिम क्रिया का.”
प्रतिभा सुमन बताती हैं कि ग्रामीण स्तर पर इन बुराइयों को ढंकने में सरपंचों की अहम भूमिका होती है.
वो खुद एक घटना के बारे में बताते हुए रोने लगती हैं कि एक गांव में एक सरपंच के परिवार ने ही अपने घर की बहू को ईखों में ले जाकर बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया क्योंकि वो अपने पति की ज़्यादतियों से परेशान थी और उसे छोड़ किसी और पुरुष के साथ रहना चाहती थी. इस अपराध में उस महिला के बेटे भी शामिल थे.
महिला आयोग की सदस्यों ने ही ममता की अर्थी को कंधा दिया और पूरी अंतिम क्रिया की.
कहाँ हैं हरियाणा के युवा नेता?
हरियाणा की ऑनर किलिंग मामलों में एक बात हमेशा नज़र आती है कि सभी राजनीतिक दल इस के ख़िलाफ़ बयान देने से बचते हैं.
इस वक़्त हरियाणा में युवा नेताओं की पूरी खेप तैयार हो रही है लेकिन वे भी इस तरह की घटनाओं पर बोलने से कतराते हैं.
महिला मुद्दों पर सालों से काम कर रही जगमति सांगवान राष्ट्रीय मीडिया में एक जाना-माना नाम है.
वो कहती हैं, “नेताओं के लिए ये खापें और जातिवादी लोग एक वोट बैंक हैं और इसलिए ये ख़ुद को इन मसलों से दूर रखते हैं”
“ज़रूरत तो हमारे युवाओं को एक स्वर में इन घटनाओं की निंदा करने की है. लेकिन जब हम लोग कॉलेजों में जाकर प्रेम-विवाह को लेकर छात्रों की राय पूछते हैं तो वो कहते हैं कि इसमें कोई बुराई नहीं लेकिन वही बच्चे अपने घरों में, गाँवों में जाकर कुछ और कहने लगते हैं. उनमें वही बात आ जाती है कि मेरी बहन ऐसा कैसे कर लेगी!”
जगमति कहती हैं कि जहां इतने लोग प्यार में एक-दूसरे को धोखा देते हैं, यहां इस लड़के ने शादी ही तो की है और प्यार की वजह से ही जेल भी काट रहा है
सुमिन के घर में पुलिस सुरक्षा दी गई है
नाबालिग़ की अपनी मर्ज़ी से की गई शादी वैध
भारत के कानून के मुताबिक़ बाल-विवाह या नाबालिग़ का विवाह गैर-कानूनी है.
लेकिन हिंदू मैरिज एक्ट के मुताबिक अगर ये शादी हो जाती है तो उसे अवैध नहीं माना जाएगा.
लड़की चाहे तो इसे बालिग़ होने पर अवैध मान सकती है और तलाक़ का आधार बना सकती है.
अगर वो बालिग़ होने पर अपनी शादी खत्म नहीं करना चाहती है तो ये विवाह कानून की नज़र में वैध है.