नई दिल्ली। सामाजिक चिंतक और राजनीतिक विश्लेषक योगेन्द्र यादव ने सुप्रीम कोर्ट में SIR की धज्जियां उड़ा दी है। उनकी दलीलों से देश में SIR पर चुनाव आयोग की मंशा को लेकर एक बड़ी बहस छिड़ गई है। सुप्रीम कोर्ट में योगेन्द्र यादव ने अपनी दलील में SIR को लोकतंत्र से मताधिकार छीनने का सबसे बड़ा अभ्यास बताया।
सुप्रीम कोर्ट में बिहार की मतदाता सूची में हुए Special Intensive Revision (SIR) अभियान पर सुनवाई के दौरान योगेन्द्र यादव ने तीखी दलीलें पेश कीं। उन्होंने अदालत के सामने यह आरोप लगाया कि SIR प्रक्रिया लोकतांत्रिक अधिकारों को कमजोर करने वाली, त्रुटिपूर्ण और पक्षपाती है, जिसके तहत लाखों लोगों का मताधिकार छीन लिया गया है।
योगेन्द्र यादव ने अदालत को बताया कि बिहार में इस विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान लगभग 65 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए। उन्होंने कहा, “हम दुनिया के इतिहास में सबसे बड़े disenfranchisement (मताधिकार वंचन) का सामना कर रहे हैं।”
‘मृत’ घोषित पर जीवित गवाह
अपनी दलील को और ठोस बनाने के लिए उन्होंने दो ऐसे व्यक्तियों को अदालत में पेश किया जिनके नाम मतदाता सूची में
‘मृत’ के रूप में दर्ज थे, जबकि वे जीवित थे। यादव के अनुसार यह घटना SIR प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़ा करती है।
केवल हटाने का अभियान, जोड़ने का नहीं
यादव ने अदालत को बताया कि इस बार संशोधन में किसी भी नए मतदाता का नाम जोड़ने की बजाय केवल नाम हटाने पर जोर दिया गया। उनके अनुसार, यह पहली बार है जब मतदाता सूची संशोधन एकतरफा तरीके से हटाने पर केंद्रित रहा। अदालत में पेश किए गए आंकड़ों में कहा गया कि मतदाता सूची से 31 लाख महिलाओं और 25 लाख पुरुषों के नाम हटाए गए। यादव ने तर्क दिया कि यदि यह केवल मृत्यु या पलायन का मामला होता, तो पुरुषों के नाम अधिक हटने चाहिए थे, लेकिन डेटा इसका उल्टा साबित करता है।
फॉर्म भरने की अनिवार्यता पर सवाल
योगेन्द्र यादव ने यह भी कहा कि पहले मतदाता सूची में नाम बनाए रखने के लिए फॉर्म भरना अनिवार्य नहीं था, लेकिन इस बार बिना फॉर्म के नाम काट दिए गए। उन्होंने इसे “लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाधित करने वाला कदम” करार दिया। उन्होंने SIR को “fraudulent exercise” (धोखाधड़ीपूर्ण अभ्यास) बताया, जो न केवल प्रक्रियागत रूप से गलत है, बल्कि इसका उद्देश्य खास समूहों को राजनीतिक रूप से वंचित करना भी हो सकता है। यादव के अनुसार, यह कदम केवल तकनीकी त्रुटि नहीं बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक रणनीति की ओर इशारा करता है।
सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया
इस सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट भी योगेन्द्र यादव की बात को ध्यान से सुनता रहा। न्यायालय ने योगेन्द्र यादव की प्रस्तुति को “excellent analysis” बताते हुए गंभीरता से सुना और चुनाव आयोग से जवाब तलब किया। इसके बाद मामले की अगली सुनवाई में आयोग को यह स्पष्ट करना होगा कि इतने बड़े पैमाने पर नाम काटने के पीछे आधार और प्रक्रिया क्या थी।
लोकतंत्र पर गहरा सवाल
इस पूरे मामले ने न केवल बिहार बल्कि पूरे देश में मतदाता सूची की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्षी दलों का मानना है कि अगर इस तरह के ‘संशोधन’ जारी रहे तो लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होंगी और चुनावी प्रक्रिया पर जनता का भरोसा हिलेगा।

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