गौतम बुद्ध को आप जानते हैं, लेकिन क्या आप जिद्दू कृष्णमूर्ति और युवाल नोवा हरारी से वाकिफ हैं?

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हमारे दौर मे युवाल नोवा हरारी अपनी किताबों मे इस बात को बहुत अच्छे से समझा चुके हैं कि इंसानियत के सामने वास्तविक खतरे कौनसे होते हैं और इंसानियत उनसे बचने के लिए क्या क्या करती आई है। पिछले 70 सालों मे परमाणु हथियारों ने जो खतरा पैदा किया उसके नतीजे मे ग्लोबलाइज्ड दुनिया के राजनेताओं ने एक नए ढंग की राजनीति, कूटनीति और आर्थिक उपकरणों का निर्माण कर लिया है। शीत युद्ध और आतंकवाद जैसी नई रचनाओं सहित अन्य नयी राजनीतिक आर्थिक रचनाओं ने परमाणु युद्ध से जन्मी सामूहिक आत्मघात की चुनौती को लगोबल कोआपरैशन के एक नए अवसर मे तब्दील कर दिया है।

इसीलिए आज हम बचे हुए हैं।

लेकिन अब अगला खतरा वैश्विक महामारियों और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस सहित बायोटेक्नोलॉजी की तरफ से आ रहा है। यह सबसे बड़ा खतरा साबित होने वाला है। इसका इलाज राजनेताओं या अर्थशास्त्रियों के पास नहीं है। यह खतरा असल मे नए इलाजों की मांग करता है। पहली बार महामारियाँ और बायोटेक्नोलॉजी हमें उस मुकाम पर लाकर खड़ा कर रही हैं जहां इंसानी समाज के सभ्यता बोध और नैतिकता बोध पर सब कुछ निर्भर हो जाने वाला है।

इसीलिए अब धर्म दर्शन और इश्वर सहित मन और चेतना कि बहस पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण होती जा रही है। बाबा साहब अंबेडकर ने साठ साल पहले भारत मे एक नए धर्म की जरूरत पहले ही रेखांकित कर दी थी।

आइए इसे समझने की कोशिश करते हैं।

पूरी दुनिया के गंभीर विचारक और दार्शनिक अब चेतना, विवेक, बुद्धि, नैतिकता, सभ्यता और चेतना के क्रमविकास (?) की बहस पर बहुत ज्यादा जोर दे रहे हैं। पिछली शताब्दी मे जिद्दू कृष्णमूर्ति ने साफ तौर से कहा है कि मनुष्य का शारीरिक विकास जरूर हुआ है लेकिन मन या चेतना का कोई विकास नहीं हुआ है। आज भी वही क्रोध, वही लोभ, वही घृणा और वही सब कुछ इंसान की चेतना को घेरे हुए है। कृष्णमूर्ति ने डेविड बोहेम और पुपुल जयकर सहित मेरी ल्यूटीयन आदि से अपनी गंभीर चर्चाओं मे यह बात बार बार कही है कि मनुष्य की चेतना मे ज्ञात इतिहास की सैकड़ों शताब्दियों मे कोई बदलाव नहीं आया है। जो थोड़ा बहुत बदलाव दिखता है वह ऊपर ऊपर का बदलाव है। वह बदलाव असल मे व्यक्तिगत या सामूहिक आत्मरक्षा की आवश्यकता के कारण किसी खतरे को दी जाने वाली प्रतिक्रिया भर है।

गौतम बुद्ध ने इस बात को एक अलग ढंग से रखा था। उन्होंने चेतना को परिभाषित किए बिना मन और स्व (सेल्फ) को परिभाषित किया। बुद्ध का रास्ता ज्यादा प्रेक्टिकल है। बुद्ध ने चेतना को उसे कार्यान्वित करने वाले उपकरण – मन या स्व या सेल्फ के जरिए पड़ना सिखाया। चेतना इतनी अमूर्त और वायवीय चीज है कि उसे थीओराइज़ करते हुए सभ्यताएं और धर्म तक फिसल जाते हैं। गौतम बुद्ध इसीलिए अपने धम्म का आधार मन या सेल्फ की इन्क्वायरी (खोज) पर रखते हैं। आगे चलकर जिद्दू कृष्णमूर्ति इस बात को विकसित करते हैं। आज युवाल नोवा हरारी भी एक विपश्यना साधक की तरह बुद्ध और कृष्णमूर्ति की दिशा मे कदम बढ़ाते नजर या रहे हैं। हरारी के वक्तव्यों मे चेतना मन और नैतिकता ही नहीं बल्कि एथिक्स और स्पिरिचुआलिटी के नए सूत्र मिल रहे हैं।

दो विश्वयुद्धों के बाद और विशेष रूप से केपटलिज़्म की छाया मे जन्म ले रहे फासीवाद के खतरों के बीच अब नैतिकता या सभ्यता कोई किताबी बातें नहीं रह गयी हैं। सभी मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक कह रहे हैं कि जिन समाजों के पास सभ्यता और नैतिकता नहीं है वे आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और बायोटेक्नोलॉजी के द्वारा बहुत तेजी से आत्महत्या करने लगेंगे। नई टेक्नोलॉजी जिस महान शक्ति को जन्म देगी उसे इस्तेमाल करने वाले लोग अगर धर्म जाति लिंग रंग आदि की धारणाओं से ऊपर उठकर नहीं सोच पाएंगे तो वे पूरी दुनिया को खत्म कर डालेंगे।

भारत का दुर्भाग्य यह है कि यहाँ के ईश्वरवादी धर्मों ने जिस तरह के ईश्वर की कल्पना की वह नीति और नैतिकता सहित सामान्य सदाचार का भी सम्मान नहीं करता। वह खुद इंसान को चार श्रेणियों मे विभक्त करके प्राकृतिक न्याय और नैतिकता के जन्म की संभावना को पहले ही बिन्दु पर मार डालता है।

हिटलर और मुसोलिनी को याद कीजिए। उनके पास विज्ञान की जो शक्ति थी उसका उन्होंने क्या इस्तेमाल किया? आजकल की टेक्नोलॉजी उस जमाने से बहुत ज्यादा आगे निकाल गयी है। शहरी जीवन मे और विशेष रूप से ग्लोबलाइज्ड दुनिया मे अब आपके समाज मे नैतिकता बोध और समानता का बोध नहीं है तो आपका समाज महामारियों और आपदा से सबसे पहले मरेगा। पुराने जमाने मे जब जंगलों और गांवों मे जीवन सरल था तब आप असभ्य और अनैतिक बने रहते हुए बचे रह सकते थे। लेकिन अब आप उसी पुराने ढंग से नहीं जी सकते। जिस तरह टेक्नोलॉजी का विकास होता है उसी तरह समाज मे धर्म और सभ्यता का विकास भी होते रहना चाहिए। दुर्भाग्य से भारत के समाज और सार्वजनिक जीवन मे सभ्यता और नैतिकता का बोध लगभग खत्म हो गया है।

इसलिए भारत का समाज अब बहुत खतरनाक स्थिति मे आ चुका है।

एक सरल सी ग्रामीण और वनवासी (वानर) अवस्था मे नैतिकता और सभ्यता की समस्याओं को इग्नोर किया जा सकता था। कई बार यह जरूरी भी नजर आता था। इसीलिए आदिम समुदायों मे नीति, नैतिकता और सभ्यता के कोडीफाइड सूत्र या शास्त्र नहीं जन्मे थे। लेकिन प्राचीन भारत मे नगरीय सभ्यता के उदय के बाद और यूरोप मे नेशन स्टेट के जन्म के बाद नीति नैतिकता और एथिक्स की दार्शनिक बहस ने एकदम से राजनीतिक रूप ग्रहण कर लिया था और दर्शनशास्त्र ही नहीं बल्कि धर्म भी परलोक की बजाय इहलोक के प्रश्नों पर अधिक केंद्रित होता गया। सम्राट अशोक के प्रस्तर स्तंभ नीति और नैतिकता की खबर देते हैं। हज़रत मूसा के टेन कमांडमेंट्स भी नीति के सूत्र है।

भारत का दुर्भाग्य यह रहा कि विश्व की पहली नगरीय सभ्यता (हरप्पा) और दूसरी नगरीय सभ्यता (मगध) मे जन्मी नैतिकता और धर्म को बर्बर आर्यों के धर्म ने नष्ट कर दिया और एक भौतिकवादी ज्ञान की भित्ति पर जन्म ले रही जैन और बौद्ध श्रमण परंपराओं को अपने ही जन्म स्थान पर खत्म कर दिया। इसके बाद ग्रामीण और भेदभाव मूलक वैदिक सभ्यता ने अपनी जहरीली शिक्षाओं से भारत मे विज्ञान और सभ्यता के विकास की संभावना का गर्भपात कर दिया।

यूरोप का सौभाग्य रहा कि वहाँ एसे ईश्वर की कल्पना ने जन्म लिया जिसके लिए नीति और नैतिकता का मूल्य भक्ति और मुक्ति से भी अधिक था। भारत के ईश्वरवादी धर्मों मे ईशकृपा, गुरुकृपा और मोक्ष आदि का मूल्य नैतिकता और मनुष्यता से भी अधिक हो गया।

यद्यपि जैन और बौद्ध धर्म जैसे अनीश्वरवादी धर्मों मे नीति नियम और विनय सर्वाधिक महत्वपूर्ण थे लेकिन उनके पतन के बाद नैतिकता और सभ्यता का भी पतन हो गया।

सौभाग्य से यूरोप मे जिस इसाइयत का जन्म हुआ वह जीसस की हत्या से जन्मी आत्मग्लानि पर खड़ी नैतिकता के बोध पर टिकी थी। भारत मे जो ब्राह्मण धर्म जन्मा वह गैर ब्राह्मणों से घृणा और सोशल डिस्टेंस के आग्रह पर टिका था। यूरोप की इसाइयत ओरिजिनल सिन और जीसस की हत्या के दो नैतिक आघातों की प्रतिक्रिया मे जन्मी और इसीलिए इसाइयत एक नए ढंग की नैतिकता का निर्माण कर सकी जो कि भारत के किसी भी ईश्वरवादी धर्म मे नहीं थी।

अनीश्वरवादी जैन और बौद्ध धर्म मे यह नैतिकता अपने सबसे विकसित स्वरूप मे मौजूद थी। इसी जैन नैतिकता ने एक तरफ श्रीमद राजचन्द्र के जरिए और दूसरी तरफ जॉन रस्किन के जरिए मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा गांधी बनाया था। जॉन रस्किन ने बाइबल मे वर्णित अंगूर के बागान के मजदूरों की कहानी और जीसस की शिक्षाओं के आधार पर जिस ‘सामाजिक अर्थनीति’ की कल्पना दी वह ईसाई नैतिकता पर खड़ी थी। इसने गांधी को बहुत प्रभावित किया और गांधी ने इसे सर्वोदय की कल्पना का आधार बनाया।

भारत का दुर्भाग्य यह है कि यहाँ के ईश्वरवादी धर्मों ने जिस तरह के ईश्वर की कल्पना की वह नीति और नैतिकता सहित सामान्य सदाचार का भी सम्मान नहीं करता। वह खुद इंसान को चार श्रेणियों मे विभक्त करके प्राकृतिक न्याय और नैतिकता के जन्म की संभावना को पहले ही बिन्दु पर मार डालता है। ईसाइयों का गॉड और इस्लाम का अल्लाह सभी इंसानों को बराबरी का दर्जा देता है। ईसाई गॉड तो बाइबल के जरिए यह भी कहता है कि गॉड ने इंसान को अपनी शक्ल मे बनाया है। इसी बात को आधार बनाकर प्रोटेस्टेंट सुधारकों ने चर्च की सत्ता को ही नहीं बल्कि पारंपरिक थियोलॉजी को भी कड़ी चुनौती दी। प्रोटेस्टेंट इसाइयत की नयी धारा ने ज्ञान विज्ञान और शिक्षा सहित समाज सेवा को आगे बढ़ाने मे बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इधर भारत मे शिक्षा को मुट्ठीभर लोगों तक सीमित कर दिया गया। रोजगार के अवसरों को जाति व्यवस्था की लोहे की दीवारों मे बांध दिया गया। यूरोप मे चूंकि सभी मनुष्य ईश्वर की बराबरी की संताने थे इसलिए वे अपने रोजगार ही नहीं अपने जीवनसाथी चुनने के लिए भी स्वतंत्र थे। इस स्वतंत्रता ने ज्ञान विज्ञान और नैतिकता सहित सभ्यता के विकास का रास्ता खोल दिया। लेकिन भारत मे विवाह और रोजगार को जाति और वर्ण व्यवस्था ने छोटे छोटे डब्बों मे बंद करके ज्ञान विज्ञान और सभ्यता के जन्म की संभावना को खत्म कर दिया।

ईश्वर की धारणा, ईश्वर के नैतिकता और नीति से संबंध को इस विस्तार मे जाने के बाद दुबारा देखिए।

किसी समाज का या किसी धर्म का ईश्वर कैसा है उसी से यह भी तय होगा कि वह समाज सभ्य बनेगा या नहीं।  भारत के ईश्वर को और यूरोप के ईश्वर को देखिए। आपको आज के भारत और आज के यूरोप का अंतर साफ नजर आएगा।

अब इस अंतर के आईने मे कोरोना वाइरस या बायोटेक्नोलॉजी या आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के खतरों को देखिए। आप आसानी से समझ पाएंगे कि भारत को सभ्यता और नैतिकता की सख्त जरूरत है। भारत मे जो ईश्वर और धर्म प्रचलित है वह भारत के समाज को एक सामूहिक आत्मघात की तरफ ले जा रहा है। इसे रोकना लगभग असंभव नजर आता है।

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