रोस्टर पर सरकार के फैसले को तात्कालिक राहत क्यों कह रहा है टीचर्स एसोसिएशन

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वाराणसी, बनारस हिन्दू विवि

नई दिल्ली। ऑल इंडिया यूनिवर्सिटीज एंड कॉलेज एससी, एसटी, ओबीसी टीचर्स एसोसिएशन ने भारत सरकार द्वारा 200 पॉइंट रोस्टर पर अध्यादेश लाए जाने का स्वागत किया है. एसोसिएशन ने कहा है कि इस अध्यादेश के आने से सभी वर्गों के शिक्षकों का न्याय सुनिश्चित होगा, साथ ही दिल्ली विश्वविद्यालय के 4500 एडहॉक शिक्षक राहत महसूस कर रहे हैं.

टीचर्स एसोसिएशन के नेशनल चेयरमैन प्रो. हंसराज ‘सुमन ‘व महासचिव प्रो. के पी सिंह यादव का कहना है कि पिछले एक वर्ष से देशभर के शिक्षक सड़कों पर आंदोलनरत थे, अब अध्यादेश के आने से राहत महसूस कर रहे हैं. उनका कहना है कि इस अध्यादेश की वैद्यता 6 माह की होती है, आगामी संसद सत्र में पास करके कानून बनाना होगा जब जाकर स्थायी राहत मिलेगी, अभी केवल तात्कालिक राहत मिली है.

प्रो. सुमन व प्रो. यादव ने मांग किया कि 5 मार्च 2018 के बाद से डिपार्टमेंट वाइज रोस्टर के आधार पर जिन केंद्रीय विश्वविद्यालयों व राज्यों के विश्वविद्यालयों में सहायक प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर पदों के विज्ञापन आए थे उन सभी विज्ञापनों को तुरंत प्रभाव से निरस्त किया जाये एवं नये विज्ञापन जारी करने के लिए यूजीसी/एमएचआरडी विश्वविद्यालयों/कॉलेजों को सर्कुलर जारी करे जिसमें विश्वविद्यालय/कॉलेज को एक यूनिट मानकर 200 पॉइंट रोस्टर बनाकर नए विज्ञापन जारी किए जाए जिससे नियुक्ति की प्रक्रिया अविलंब शुरू की जाये, तब लगेगा कि सरकार अपने प्रयास में गंभीर है. उन्होंने सरकार से यह अपील भी की है कि आरक्षित वर्ग के लाखों उम्मीदवारों को जो 13 पॉइंट रोस्टर से नुकसान हुआ है उसकी भरपाई का उचित तरीका यहीं है कि अध्यादेश के मद्देनजर 200 पॉइंट रोस्टर के आधार पर पुनः नियुक्तियां की जाये.

अभी भी संदेह बना हुआ है-

प्रो. सुमन व प्रो. यादव का कहना है कि अभी भी इस अध्यादेश के लागू होने में संदेह बना हुआ है जब तक कि ये कार्यान्वित नहीं होने लगता तब तक लोग इसे संदेह की दृष्टि से देखते रहेंगे. पहली स्थिति यह है कि 200 पॉइंट रोस्टर को डीओपीटी के आधार पर लागू करते समय शॉर्टफाल व बैकलॉग की स्थिति का भी सरकार ध्यान रखें, क्योंकि लंबे अरसे से आरक्षित वर्ग की सीटें सामान्य वर्गो से भर्ती जा रही है. पिछले वर्ष जब 13 पॉइंट रोस्टर का आदेश आया तब तो आरक्षित वर्ग की सीटें करीब-करीब खत्म कर दी गई थी, इसलिए सरकार से मांग है कि वे पिछले साल मार्च से लेकर अब तक जितने भी विज्ञापन आए हैं उनको खारिज करे तथा 200 पॉइंट रोस्टर के आधार पर पुनः विज्ञापन देकर आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों के प्रति न्याय करें.

नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू हो

यूजीसी/एमएचआरडी 200 पॉइंट रोस्टर संबंधी अध्यादेश का सर्कुलर जारी कर जल्द से जल्द विश्वविद्यालयों/कॉलेजों को भेजा जाए जिससे लंबे समय से रुकी हुई नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू हो सके. प्रो. सुमन ने बताया है कि शुक्रवार तक चलने वाली डूटा की हड़ताल को जब तक समाप्त नहीं किया जा सकेगा जब तक कि डूटा जीबीएम में इस संदर्भ में कोई निर्णय नहीं लिया जाता. डूटा की जीबीएम शुक्रवार को दिल्ली विश्वविद्यालय में होगी.

जम्मू: बस स्टेशन पर ग्रेनेड अटैक, एक की मौत,

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जम्मू के एक बस स्टैंड पर गुरुवार दोपहर जोरदार धमाका हुआ. पुलिस के मुताबिक ग्रेनेड अटैक में 32 लोग घायल हुए हैं, जिन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है. एक घायल की मौत हो गई है. सुरक्षाकर्मियों ने इलाके की घेराबंदी कर जांच शुरू कर दी है. सुरक्षाबलों ने 10 संदिग्ध लोगों को हिरासत में ले लिया गया है. दोपहर 12 बजे के करीब भीड़भाड़ वाले इलाके में बने बस स्टेशन में एक बस के पास धमाका किया गया. आपको बता दें कि पुलवामा आतंकी हमले के बाद से ही जम्मू-कश्मीर में सुरक्षाकर्मियों को अलर्ट पर रखा गया है.

जम्मू के आईजी मनीष सिन्हा ने बताया कि यह ग्रेनेड से किया गया हमला था. घटनास्थल पर मौजूद लोगों के अनुसार एक संदिग्ध हमलावर ने ग्रेनेड से हमला किया और मौके से फरार हो गया. 10 संदिग्धों को हिरासत में ले लिया गया है. IG का कहना है कि हमले का मकसद सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ना था. इस विस्फोट में 17 साल के मोहम्मद शारिक की मौत हो गई.

चाइनीज ग्रेनेड के इस्तेमाल की आशंका रिपोर्ट के मुताबिक धमाके में चाइनीज ग्रेनेड का इस्तेमाल किया गया है. बताया जा रहा है कि पहले भी यह इलाका आतंकियों के निशाने पर रहा है. टाइम्स नाउ के मुताबिक शुरुआती जांच में सामने आ रहा है कि इस धमाके का मकसद सांप्रदायिक तनाव पैदा करना था. ऐसे में प्रशासन की ओर से आगाह किया गया है कि अफवाहों पर ध्यान न दें. प्रशासन ने जम्मू-कश्मीर की जनता से शांति बनाए रखने की अपील की है. ग्रेनेड धमाका इतना जबर्दस्त था कि आसपास की कई बसों को भी नुकसान पहुंचा है.

बस स्टैंड पहले भी बना निशाना पिछले साल 29 दिसंबर को भी आतंकियों ने बस स्टैंड को निशाना बनाया था. उस समय आतंकी बस स्टैंड पर ग्रेनेड फेंककर भाग गए थे. तब कोई नुकसान नहीं हुआ था. हालांकि बड़ा सवाल यह है कि बस स्टेशन के पास ही पुलिस स्टेशन भी है फिर भी आतंकी अपने मंसूबे में कामयाब हो गए.

गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज (जीएमसी) अस्पताल की प्रधानाचार्या सुनंदा रैना ने बताया, ‘अब तक 28 घायलों को यहां लाया गया है. इनमें से तीन की हालत गंभीर है और दो का ऑपरेशन किया जा रहा है.’ जम्मू के पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) एम के सिन्हा ने बताया कि प्रारंभिक जांच से लगता है कि किसी ने दोपहर के वक्त बस स्टैंड इलाके में हथगोला फेंका, जिसके चलते विस्फोट हुआ. तत्काल मौके पर पहुंचे और स्थिति का जायजा लेने वाले सिन्हा ने बताया कि विस्फोट के बाद बी सी रोड के आसपास के इलाके की घेराबंदी कर दी गई और हथगोला फेंकने वाले को पकड़ने के लिए बड़े स्तर पर तलाश अभियान चलाया जा रहा है.

पुलिस के एक अधिकारी ने बताया कि विस्फोट में बस स्टैंड पर खड़ी सरकारी बस को बहुत ज्यादा नुकसान हुआ. आईजी ने कहा, ‘जब भी चौकसी ज्यादा होती है, हम जांच-पड़ताल सख्त कर देते हैं लेकिन किसी-किसी के उससे बच निकलने की आशंका रहती है और यह ऐसा ही मामला लग रहा है.’ उन्होंने लोगों से शांति बनाए रखने का आग्रह करते हुए कहा, ‘निश्चित तौर पर मंशा सांप्रदायिक शांति एवं सौहार्द बिगाड़ने की थी.’ उन्होंने बताया कि पुलिस सबूत इकठ्ठे कर रही है और हम निश्चित तौर पर उसे (हमलावर को) ढूंढ निकालेंगे.

रोस्टर मुद्दे पर बहुजनों के आगे झुकी सरकार, अध्यादेश को मंजूरी

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फाइल फोटो

नई दिल्ली। विश्वविद्यालयों में 200 प्वाइंट रोस्टर की बहाली को लेकर चल रहे देशव्यापी आंदोलन के बीच केंद्र सरकार ने बहुजन संगठनों की मांग मान ली है. गुरुवार 7 मार्च को कैबिनेट की एक बैठक में 13 प्वॉइंट रोस्टर को पलटकर 200 प्वॉइंट रोस्टर सिस्टम लागू करने के लिए अध्यादेश को मंजूरी दे दी गई. कैबिनेट बैटक के बाद केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने इसकी जानकारी दी. इसके साथ ही साफ हो गया कि देश भर में 13 प्वाइंट रोस्टर को रद्द किए जाने की मांग करने वाले संगठनों के आगे सरकार झुक गई है.

फैसले की जानकारी देते हुए अरुण जेटली ने कहा कि 13 प्वाइंट रोस्टर की वजह से विश्वविद्यालयों में कमजोर वर्गों का प्रतिनिधित्व कम हो जाता, इसकी वजह से केंद्र सरकार ने अध्यादेश लाने का फैसला किया है. हालांकि जिस तरह इस मामले पर सरकार खेलती रही उससे साफ है कि सरकार ने वंचित तबके को प्रतिनिधित्व देने के लिहाज से नहीं बल्कि एससी-एसटी-ओबीसी के संयुक्त आंदोलन से डरकर यह फैसला लिया है.

सरकार के फैसले के बाद तमाम शिक्षक संगठनों ने इसका स्वागत किया है. हालांकि कुछ लोगों ने शंका जताई है कि जब तक अध्यादेश की कॉपी सामने नहीं आ जाती, कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी. कुछ संगठन इस दौरान 13 प्वाइंट रोस्टर के तहत हुई बहालियों को भी रद्द करने की मांग कर रहे हैं. टीचर्स एसोसिएशन के नेशनल चेयरमैन प्रो. हंसराज ‘सुमन ‘व महासचिव प्रो. के पी सिंह यादव ने अध्यादेश लाए जाने का स्वागत किया है. उनका कहना है कि पिछले एक वर्ष से देशभर के शिक्षक सड़कों पर आंदोलनरत थे इसके आने से राहत महसूस कर रहे हैं. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि इस अध्यादेश की वैद्यता 6 माह की होती है, आगामी संसद सत्र में पास करके कानून बनाना होगा जब जाकर स्थायी राहत मिलेगी, अभी केवल तात्कालिक राहत मिली है.

राफेल की फाइल चोरी होना भ्रष्टाचार नहीं राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा – मायावती

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नई दिल्ली। रक्षा मंत्रालय से राफेल की फाइल चोरी होने की बात कहे जाने पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से लेकर बसपा प्रमुख मायावती ने सरकार को निशाने पर लिया है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कांग्रेस मुख्यालय में प्रेस कांफ्रेंस कर इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को जमकर घेरा.

उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि इस सरकार में रोजगार गायब हो गया, किसानों को मिलने वाला सही दाम गायब हो गया, 15 लाख रुपये जो आने थे, वो गायब हो गए. और राफेल की जो फाइले हैं, वो गायब हो गईं. उन्होंने आरोप लगाया कि सरकारी संस्थाएं और मंत्री नरेन्द्र मोदी को बचाना चाहती है.

दूसरी ओर बहुजन समाज पार्टी की मुखिया सुश्री मायावती ने भी इस मुद्दे पर सरकार को जमकर घेरा. एक बयान जारी कर बसपा प्रमुख ने कहा कि रक्षा मंत्रालय से राफेल लड़ाकू विमान सौदे के अहम व गुप्त दस्तावेजों के गायब होने की खबर शर्मनाक और गैर जिम्मेदाराना है. सुप्रीम कोर्ट में इस तरह का सनसनीखेज रहस्योघाटन करने से पहले नरेन्द्र मोदी सरकार को देश से मांफी मांगनी चाहिए कि वो देश हित और देश की सुरक्षा के मामले में विफल साबित हुए हैं. यह राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ गंभीर खिलवाड़ है.

बसपा प्रमुख ने कहा कि बदली हुई परिस्थिति में माननीय सुप्रीम कोर्ट को अपनी निगरानी में जांच करानी चाहिए ताकि देश की जनता संतुष्ट हो सके. बसपा प्रमुख ने मोदी सरकार को घेरते हुए कहा कि पहले पुलवामा और अब राफेल के मामले में भी राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर भी केंद्र की बीजेपी सरकार अपनी घोर विफलता व वादाखिलाफी से लोगों का ध्यान बांटने की कोशिश कर रही है. उन्होंने कहा कि राफेल का मामला अब सिर्फ भ्रष्टाचार का ही नहीं है, बल्कि अब वह राष्ट्रीय सुरक्षा के संबंध में राष्ट्रीय मुद्दा बन गया है.

राहुल गांधी ने कहा- PAK के पोस्टर बॉय हैं PM नरेंद्र मोदी

नई दिल्ली। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर बड़ा हमला बोला है. राहुल गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी पाकिस्तान के पोस्टर बॉय हैं, ना कि कांग्रेस पार्टी. राफेल विमान सौदे पर गुरुवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस करने आए राहुल गांधी से जब पाकिस्तान के मुद्दे पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने PM मोदी पर तीखा वार किया.

राहुल गांधी ने कहा कि नवाज शरीफ की शादी में जाने वाले हम नहीं थे, ISI को पठानकोट में जांच के लिए बुलवाने वाले भी हम नहीं थे. उन्होंने कहा कि नवाज शरीफ की शादी में आप (नरेंद्र मोदी) गए, पठानकोट में ISI को आपने (नरेंद्र मोदी) बुलाया तो पोस्टर बॉय हम कैसे हो गए. नरेंद्र मोदी ही पाकिस्तान के पोस्टर बॉय हैं जो उनसे गले मिलते रहते हैं. कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि नरेंद्र मोदी ने ही नवाज शरीफ को अपने शपथ ग्रहण समारोह में बुलाया था, हमने नहीं बुलाया था.

एयरस्ट्राइक पर जारी सबूतों की बहस को लेकर राहुल गांधी ने कहा कि शहीदों के परिवार वाले ही जवाब मांग रहे हैं, मैंने अखबार में पढ़ा है कि शहीदों के परिवार ने ही सबूतों की मांग की है. उन्होंने कहा कि हमारी पार्टी इस बारे में अपनी बात लगातार सभी के सामने रख रही है.

आपको बता दें कि बालाकोट में वायुसेना द्वारा की गई एयरस्ट्राइक के बाद से ही कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी में जुबानी जंग जारी है. कांग्रेस के कई नेताओं ने एयरस्ट्राइक के सबूत सामने रखने की बात कही थी, जिसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर निशाना साधा था.

प्रधानमंत्री ने कहा था कि कांग्रेस के नेताओं के बयान पाकिस्तान में छप रहे हैं, उनके न्यूज़ चैनल लगातार उन्हें दिखा रहे हैं. प्रधानमंत्री के अलावा भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह और मोदी सरकार के कई मंत्रियों ने कांग्रेस नेताओं को जवाब दिया था. मोदी सरकार में मंत्री वीके सिंह ने तो यहां तक कहा था कि अगर विपक्ष के नेताओं को एयरस्ट्राइक का सबूत चाहिए तो वह खुद बालाकोट जाकर देख लें.

आपको बता दें कि पठानकोट में हुए आतंकी हमले के बाद केंद्र सरकार ने पाकिस्तान के साथ मिलकर जांच की थी, पाकिस्तान से जो टीम भारत आई उसमें ISI के कुछ अधिकारी शामिल थे. इसके अलावा 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ के जन्मदिन के अवसर पर पाकिस्तान गए थे.

श्रोत:-आजतक ममता बनर्जी ने पाकिस्तान में 300 मौतों की रिपोर्ट पर उठाया गंभीर सवाल

रणबीर कपूर-आलिया भट्ट की शादी कराना चाहते हैं ऋषि कपूर

यूएस में मेडिकल ट्रीटमेंट कराने के बाद एक्टर ऋषि कपूर भारत वापस लौटने वाले हैं. इसका खुलासा उनकी पत्नी नीतू कपूर ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए किया. ऋषि कपूर इस महीने के आखिर तक देश लौटे जाएंगे. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ऋषि कपूर के लिए भारत वापस आने के बाद सबसे पहली प्राथमिकता बेटे रणबीर कपूर की आलिया भट्ट से शादी होगी. वे चाहते हैं कि दोनों जल्दी से शादी के पवित्र बंधन में बंध जाए.

सूत्रों के मुताबिक, रणबीर कपूर और आलिया भट्ट की फैमिली साथ में पंडित से मिलने जाएंगे. वे रणबीर-आलिया की शादी के लिए शुभ मुहुर्त की तारीख तय करेंगे. खबरों की मानें तो पंडित से मुलाकात करने की तारीख अप्रैल में फिक्स की गई है. हालांकि अभी तक इस खबर की पुष्टि नहीं की गई है. लेकिन कपल की शादी जल्द होने की खबर जानकर फैंस एक्साइटेड जरूर हो गए हैं.

करण जौहर ने कहा था- ”हर कोई रणबीर-आलिया की जल्द शादी कराने की कोशिश कर रहा है. क्योंकि आप रणबीर कपूर के साथ नहीं जानते, वो कभी भी हाथ से जा सकता है.” करण की ये बातें सुनकर आलिया और रणबीर मुस्कुराने लगे थे. दोनों एक्टर्स के वर्कफ्रंट की बात करें तो वे फिल्म ब्रह्मास्त्र में साथ नजर आएंगे. इसी मूवी के सेट पर उनकी लव स्टोरी परवान चढ़ी थी. मूवी का लोगो कुंभ में रिलीज किया जा चुका है. बुधवार को फिल्म का ऑफिशियल लोगो रिलीज कर दिया गया. फिल्म में अमिताभ बच्चन, मौनी रॉय, नागार्जुन, डिंपल कपाड़िया अहम रोल में हैं. ये फिल्म तीन भागों में रिलीज की जाएगी.

रणबीर कपूर और आलिया भट्ट की शादी की इस साल होने की भरपूर संभावना नजर आती है. वैसे भी रणबीर-आलिया की फैमिली से उनके रिश्ते को मंजूरी मिल गई है. दोनों परिवारों के बीच मेल-जोल और करीबियां अक्सर देखने को मिलती है. पिछले दिनों स्विटजरलैंड में आकाश अंबानी और श्लोका मेहता की प्री वेडिंग सेरेमनी में करण जौहर ने आलिया को रणबीर से जल्द शादी करने की सलाह दी थी.

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बालाकोट / सैटेलाइट इमेज के हवाले से दावा- भारतीय वायुसेना की एयर स्ट्राइक से जैश काे काेई नुकसान नहीं हुआ

पाकिस्तान के खैबर पख्तूनखवा के बालाकाेट में भारतीय वायुसेना के हवाई हमले में जैश के ठिकानाें काे तबाह करने के दावाें पर नए सवाल उठाए गए हैं. न्यूज एजेंसी राॅयटर्स ने सैटेलाइट इमेज का हवाला देकर दावा किया है कि वायुसेना ने जिस जगह हमला कर जैश के अड्डे काे तबाह करने का दावा किया है, वहां स्थित निर्माण ज्याें के त्याें खड़े हैं. यह सैटेलाइट इमेज सैन फ्रांसिस्काे स्थित प्राइवेट सैटेलाइट ऑपरेटर प्लानेट लैब्स इंक ने जारी की है.

4 मार्च की इस सैटेलाइट इमेज में जैश के मदरसे के पास छह इमारतें सुरक्षित दिख रही हैं. हमला 26 फरवरी काे किया था. यानी तस्वीरें हमले के छह दिन बाद की हैं. इसी जगह की अप्रैल 2018 की सैटेलाइट इमेज के आधार पर यह बताया गया है कि हमले के स्थान पर काेई तबाही या विनाश नजर नहीं आता है.

रॉयटर्स की रिपाेर्ट में मिडिलबरी इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज से संबद्ध ईस्ट एशिया नाॅनप्राेलिफरेशन प्राेजेक्ट के डायरेक्टर जेफ्रे लेविस ने कहा है कि इमारतें पूरी तरह से आबाद हैं. लेविस काे 15 साल का हथियार भंडारण क्षेत्राें और हमले के स्थानाें के सैटेलाइट इमेज का विश्लेषण करने का अनुभव है. रायटर्स ने दावा किया है कि इमारत की छताें में भी काेई सुराख नहीं दिख रहा है. न काेई दीवार गिरी है और न ही आसपास के पेड़ गिरे नजर आते हैं. इस संबंध में एजेंसी ने भारतीय विदेश और रक्षा मंत्रालय से ई-मेल से कुछ सवाल पूछे थे, जिसका जवाब अभी तक नहीं दिया गया है.

रिपोर्टर्स ने किए हमले वाले इलाके का दौरा रायटर्स के दाे रिपाेर्टराें ने पिछले मंगलवार और गुरुवार काे बालाकाेट इलाके का दाैरा किया था. रिपाेर्टराें ने स्थानीय लाेगाें से बातचीत भी की थी. इन रिपाेर्टराें ने दावा किया है कि उन्हें जैश के कैंप के तबाह हाेने या किसी के मारे जाने का काेई सबूत नहीं मिले. रिपाेर्टराें काे ग्रामीणाें ने बताया था कि उन्हाेंने तेज धमाके की आवाज सुनी थी. लेकिन ये बम जंगलाें में पेड़ाें पर गिरे, जहां चीड़ के कुछ पेड़ गिरे पड़े थे. जंगल में बम से चार गड्ढे बने हैं, जहां एक कौआ भी मरा पड़ा था.

मीडिया रिपाेर्ट्स में तबाही के निशान दिखने का दावा कुछ भारतीय मीडिया रिपाेर्टाें में बताया गया है कि वायुसेना ने स्पाइस 2000 ग्लाइड बम का इस्तेमाल किया था. ये बम खास निशाने काे ध्वस्त करते हैं. इस बम से यह जरूरी नहीं है कि पूरी बिल्डिंग ध्वस्त हो जाए. भारतीय मीडिया में दिखाई जा रही तस्वीराें में इमारतें टूटी-फूटी नजर आ रही हैं.

वायुसेना ने 12 पेज की रिपाेर्ट केंद्र काे साैंपी भारतीय वायुसेना ने बालाकाेट हवाई हमले काे लेकर 12 पेज की रिपोर्ट केंद्र सरकार काे सौंपी है. सेना के सूत्राें ने बुधवार काे यह दावा किया. इसमें वायुसेना ने बालाकोट के उस क्षेत्र की हाई रिजोल्यूशन तस्वीरें भी साझा की हैं. ये रिपोर्ट सार्वजनिक होगी या नहीं इसका फैसला सरकार ही करेगी.

श्रोत:-दैनिक भास्कर Read it also-ममता बनर्जी ने पाकिस्तान में 300 मौतों की रिपोर्ट पर उठाया गंभीर सवाल

कांग्रेस का बड़ा दांव, मध्यप्रदेश में पिछड़ों को 27 फीसदी आरक्षण

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भोपाल। लोकसभा चुनाव के पहले कांग्रेस पार्टी ने बड़ा दांव खेल दिया है. मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार ने पिछड़े वर्ग को उसका हक देते हुए 27 फीसदी आरक्षण देने की घोषणा की है. मुख्यमंत्री कमलनाथ ने घोषणा करते हुए अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण को 14 फीसदी से बढ़ाकर 27 फीसदी करने की घोषणा की है. इसके साथ ही कांग्रेस की सरकार ने केंद्र सरकार द्वारा गरीब सवर्णों को दिए जाने वाले 10 फीसदी आरक्षण को भी लागू करने पर मुहर लगा दी है.

पिछड़ों को 27 फीसदी आरक्षण दिए जाने के बाद भाजपा इसे एक राजनीतिक स्टंट बता रही है तो वहीं अगड़ी जातियों को दस फीसदी आरक्षण देने को भाजपा द्वारा बनाए गए दबाव की जीत बता रही है. हालांकि पिछड़े वर्ग को आरक्षण में उसका संवैधानिक अधिकार देकर कांग्रेस पार्टी प्रदेश में बढ़त की ओर है.

यूपी में बसपा-सपा गठबंधन को झटका

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भाजपा ज्वाइन करते बसपा के कद्दावर नेता वेदराम भाटी

लखनऊ। भाजपा ने 2014 लोकसभा चुनाव की तरह ही इस बार भी विरोधी पार्टियों में तोड़-फोड़ का काम शुरू कर दिया है. भाजपा ने उत्तर प्रदेश में अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंदी बसपा-सपा गठबंधन को झटका देते हुए पार्टी के एक कद्दावर नेता को भाजपा में शामिल कर लिया है. पार्टी के प्रदेश मुख्यालय में बुधवार 6 मार्च को बसपा के कद्दावर नेता एवं पूर्व मंत्री वेदराम भाटी, पूर्व सांसद सारिका बघेल समेत बसपा, रालोद और सपा के कई नेताओं ने भाजपा का दामन थाम लिया.

वेदराम भाटी के पार्टी छोड़ने से सबसे बड़ा झटका बहुजन समाज पार्टी को लगा है. भाटी गौतमबुद्ध नगर के जेवर से दो बार और सिकंदराबाद से दो बार विधायक रह चुके हैं. केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा ने उन्हें सदस्यता दिलाई. वेदराम भाटी के भाजपा में जाने से गुर्जर वोट हासिल करने की चाह में लगी मायावती को गुर्जर वोटरों से झटका मिल सकता है.

13 प्वाइंट रोस्टरः वंचितों को गुलाम बनाने की पहल                 

  आजकल “13 प्वाइंट रोस्टर” आम 85 फीसदी पिछड़े लोगों के लिए एक कौतूहल का विषय बना हुआ है तो समझदार पिछड़ों  के लिए आक्रोश का। लोग जानना चाहते हैं आखिर यह 13 पॉइंट रोस्टर है क्या? लेकिन विशेषज्ञों के अभाव में विस्तार से 13 पॉइंट रोस्टर और इससे सामाजिक  न्याय की क्षति  के बारे में बताने वालों की कमी है जिससे अभी यह जनपदों और गांवों तक के लोगों के लिए समझ से बाहर की बात है।

रोस्टर अंग्रेजी का एक शब्द है। इसका शाब्दिक अर्थ है सूची  (क्रम, लिस्ट)  और वर्तमान संदर्भ में इसे हम नियुक्ति में पदों का क्रम-विभाजन समझ सकते हैं। भारत में नियुक्ति में  रोस्टर का बहुत ही बड़ा महत्व है। क्योंकि भारत एक जाति प्रधान देश है और वेद सहित  अन्य ब्राह्मण ग्रंथों के अध्ययन से पता चलता है कि  हजारों जातियों और कई वर्गों में विभाजित दिख रहे इस मानव समाज को आर्यों के आने के बाद  यानी वैदिक काल में  ब्राह्मण, क्षत्रि, वैश्य  और शूद्र चार वर्णों में  बांटा गया था और अछूत समाज को अवर्ण या अतिशूद्र के रूप में वर्ण से भी बाहर रखा गया था।

शूद्र और अति शुद्र समाज में जन्मे गुरुओं और महापुरुषों के हृदय विदारक अनवरत संघर्ष के बाद आजाद भारत में जब संविधान बनाने का अवसर दुनिया के महान विद्वान भारतरत्न बाबा साहेब डॉक्टर भीमराव आम्बेडकर को प्राप्त हुआ तो उन्होंने पूरे भारतीय समाज को  एससी एसटी ओबीसी और सामान्य इन चार भागों में विभाजित किया और चूंकि एससी एसटी ओबीसी को हजारों वर्षों से उनके सभी मानवीय अधिकारों को छीन कर जानवर से भी बदतर, गुलाम की जिंदगी जीने के लिए मजबूर कर के रखा गया था इसलिए बाबा साहेब ने उनके लिए उनके छीने गए सभी मानवीय अधिकारों को दिलाने की संविधान में विशेष व्यवस्था (आरक्षण/प्रतिनिधित्व/ भागीदारी) किया। लेकिन एससी एसटी और ओबीसी के लिए बाबा साहेब  का यह संवैधानिक प्रयास मनुवादियों को सहन नहीं हुआ और इसलिए संविधान लागू होने के बाद से ही ये इस संविधान की आलोचना करने लगे और संविधान में उल्लेखित व्यवस्था  के लागू होने देने में पग-पग पर रोड़े अटकाते रहे। यह “13 प्वाइंट रोस्टर” भी उनके इसी प्रयास का एक अहम हिस्सा है।

धमाल तब मचा जब सुप्रीम कोर्ट  ने अपने ही पूर्व फैसले के खिलाफ दाखिल अनुमति याचिका को खारिज करते हुए  विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों की नियुक्ति में  “200 प्वाइंट रोस्टर” को खत्म करके 13 पॉइंट का रोस्टर जारी करने संबंधी इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को पुनः कायम रख दिया। साथ ही साथ प्रोफेसरों की नियुक्ति के लिए विश्वविद्यालय को “इकाई (Unit)” न मानकर  “विषयवार विभाग” को ही नियुक्ति का इकाई बना दिया। इसका मतलब यह हुआ कि अब विषयवार विभाग स्तर पर ही प्रोफेसरों की नियुक्ति के लिए विज्ञापन निकाला जाएगा।

वाराणसी, बनारस हिन्दू विवि

इस निर्णय के आने के बाद पहले तो जो एससी एसटी और ओबीसी समाज के बुद्धिजीवी हैं उनके बीच यह 13 पॉइंट रोस्टर चर्चा का विषय बना। इन बुद्धिजीवियों में देश के नामी सोसल एक्टिविस्ट और वरिष्ठ पत्रकार योगेंद्र यादव, दिलीप मंडल, उर्मिलेश, प्रो.रतन लाल, बामसेफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष मा.वामन मेश्राम, प्रो. एम.पी. अहिरवार, प्रो. विवेक कुमार, JNU में सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष के  प्रतीक जयंत जिज्ञासु, जाकिर हुसैन कालेज के असिस्टेंट प्रो. लक्ष्मण यादव इत्यादि प्रमुख हैं।

13 प्वाइंट रोस्टर और इसके भयावह परिणाम

13 प्वाइंट का मतलब 01 से 13 तक का वर्टिकल ( ऊपर से नीचे) क्रमांक (1  2  3  4  5  6  7  8  9  10  11  12  13 ) है। बर्तमान संदर्भ में हम इसे पद- क्रमांक भी समझ सकते हैं। अब किस पद क्रमांक पर एससी एसटी  ओबीसी और सामान्य वर्ग में से  किस वर्ग का  प्रोफ़ेसर रखा या नियुक्त किया जाएगा इसका जो निर्धारण किया गया है उसको रोस्टर (सिस्टम/तरीका) कहते हैं।

तो इस 13 प्वाइंट रोस्टर में ऊपर से क्रमांक 1,2,3 सामान्य वर्ग के लिए, चौथा पद ओबीसी के लिए, फिर पांचवा-छठवां पद सामान्य वर्ग के लिए, सातवां पद अनुसूचित जाति के लिए, आठवां ओबीसी के लिए और फिर फिर नवां-दसवां और ग्यारहवां पद सामान्य के लिए, 12 वां पद ओबीसी के लिए और अंतिम 13 वां पद भी सामान्य वर्ग के लिए निर्धारित है। यानी 13 में 09 पद पर सामान्य, 03 पद पर ओबीसी, और 01 पद पर एससी वर्ग के लोग असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्त किये जा सकते हैं,  जबकि एसटी वर्ग (आदिवासी) को इस 13 पॉइंट रोस्टर से ही गायब कर दिया गया है। इसका मतलब, अब एसटी वर्ग के लोगों को नौकरी नहीं मिलेगी । अभी केवल विश्वविद्यालयों में और भारी विरोध के बाद भी अगर यही रोस्टर रह जाता है तो बाद में किसी विभाग में किसी  भी नौकरी के लिए यही रोस्टर काम करेगा। चूंकि इस रोस्टर के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में प्रोफेसरों की नियुक्ति के लिए विभाग को ही नियुक्ति की इकाई माना है  इसलिए इस निर्णय के बाद कॉलेज /विश्वविद्यालय के अंतर्गत  अब किसी भी विभाग में जरूरत होने पर भी एक-दो या तीन से अधिक व्याख्याताओं के पदों के लिए जानबूझकर  विज्ञापन नहीं निकाला जाएगा। वैसे जरूरत भी नहीं पड़ेगी। और यह तीनों पद सामान्य श्रेणी के व्याख्याताओं की नियुक्ति के लिए ही निर्धारित हैं। इसलिए अब ओबीसी और एससी वर्ग के लोग  भी प्रोफेसर नियुक्त नहीं हो सकेंगे।

क्योंकि यदि विभाग में प्रोफेसर के 4 पदों की नियुक्ति के लिए विज्ञापन होगा तब 13 प्वाइंट रोस्टर के मुताबिक एक ओबीसी और 7 का होगा तब एक पर एससी समाज का उम्मीदवार नियुक्त किया जाएगा। 200 पॉइंट के रोस्टर में 14 वां पद एसटी का, 15 वां एससी का और 16 वां पद ओबीसी का निर्धारित है और चूंकि यह तीनों पद आरक्षित वर्ग के लिए निर्धारित हैं, इसलिए ही लगता है, 16 प्वाइंट का  रोस्टर जानबूझकर नहीं बनाया गया होगा, क्योंकि 16 पॉइंट रोस्टर में 9 सामान्य वर्ग के असिस्टेंट प्रोफेसर होते तो सात आरक्षित वर्ग के भी  बन जाते जो इन्हें किसी भी हालत में मंजूर नहीं। इसलिये भी पिछड़े वर्ग के बुद्धिजीवि  इस 13 पॉइंट रोस्टर का विरोध कर रहे हैं।  चूंकि 200 पॉइंट का रोस्टर सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है इसलिए मान लीजिए, जो संभव नहीं है,  अगर किसी विभाग में 26 स्वीकृत पदों पर प्रोफेसर की नियुक्ति होगी तो 13 के बाद फिर एक से नियूक्ति शुरू की जाएगी यानी किसी भी हालत में एसटी बिल्कुल ही गायब रहेगा और प्रत्येक 13 में 9 सामान्य वर्ग के प्रोफ़ेसर और कर्मचारी नियुक्त होते रहेंगे। और तब आपकी पीएचडी और डिलीट वगैरह की डिग्रियां धरी की धरी रह जाएंगी क्योंकि इस 13 पॉइंट रोस्टर ने आपके प्रोफेसर बनने के अधिकार को छीन लिया है। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में  नामांकन भी इसी 13 पॉइंट रोस्टर के आधार पर होने लगेगा। फिर आप नामांकन के लिए भी दौड़ लगाते रहेंगे लेकिन होगा नहीं।

एससी एसटी और ओबीसी समाज के आरक्षण संबंधी संवैधानिक अधिकार पर मनुवादियों के इतने बड़े हमले के बाद भी देश के इस्टैबलिश्ड राजनीतिक लीडरों  में एकमात्र भारत के नेलसन मंडेला पुत्र और बिहार विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता पूर्व उपमुख्यमंत्री माननीय तेजस्वी प्रसाद यादव ने इस 13 पॉइंट रोस्टर को  गंभीरता से लिया और इसका  मुस्तैदी  से विरोध भी किया। बाकी लोगों ने या तो इस 13 प्वाइंट रोस्टर को समझा नहीं और समझा भी  तो डर और लालच के कारण मात्र खाना पूरी करके मौन हो गए। लेकिन राजद नेता तेजस्वी यादव ने पीएम पर हमला बोलते हुए यहां तक कहा कि, “इस फैसले से लंबी लड़ाई के बाद हासिल आरक्षण की नृशंस हत्या हुई है। प्रधानमंत्री की रहनुमाई में सामाजिक न्याय को कुचला जा रहा है।” वहीं जेएनयू में एसोसिएट प्रोफेसर गंगा सहाय मीणा कहते हैं, “एससी एसटी एक्ट से भी ज्यादा ‘अहम’ रोस्टर का मसला है।”

मेरा तो मानना है  मनुवादी मानव कृत यह  13 पॉइंट रोस्टर पचासी फ़ीसदी पिछड़ों के लिए कैंसर से भी अधिक खतरनाक है। क्योंकि कैंसर केवल उसे  खत्म करता है जिसे यह हो जाता है लेकिन यह 13 प्वाइंट रोस्टर पीढ़ी-दर-पीढ़ी को जानवर बना-बनाकर गुलाम बनाती जाएगी और लोगों को इसका अहसास भी नहीं होगा। इसलिए  समय बर्बाद किए बिना इस 13 पॉइंट रोस्टर को खत्म करा देना ही आने वाली पीढ़ी-दर-पीढ़ी के लिए हितकर होगा।

यहां इस बात का उल्लेख करना जरूरी समझता हूं कि इस दौरान  शायद 13 प्वाइंट रोस्टर के इसी गंभीर परिणाम को समझते हुए  तेजस्वी यादव  यहां तक कहते हैं कि, ” हमें चुनाव में एक भी सीट नहीं मिले तो भी  कोई गम नहीं,  हम गोली भी खा लें तो भी कोई गम नहीं, लेकिन समाज की हिस्सेदारी को पाने के लिए हम अंतिम दम तक संघर्ष करते रहेंगे, क्योंकि यह 13 पॉइंट रोस्टर हमारी पीढ़ियों को बर्बाद कर देने वाला रोस्टर है।” इस 13 पॉइंट रोस्टर का एससी एसटी ओबीसी समाज के प्रबुद्ध लोगों द्वारा विरोध क्यों किया जा रहा है? खासकर 85 फीसदी पिछड़े लोगों को इसे समझना बहुत जरूरी है।

संविधान के अनु. 15 (4) और 16 (4) में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से एससी, एसटी और ओबीसी समाज के लोगों के नौकरी में समुचित प्रतिनिधित्व के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है। अनुच्छेद 340 में भी सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े  ओबीसी समाज  की पहचान कर उनके लिए प्रतिनिधित्व वगैरह की व्यवस्था  करने की बात कही गई है। लेकिन एक  या एक से अधिक पदों पर नियुक्ति के लिए किस वर्ग को किस क्रम पर रखा जाएगा इसका निर्धारण करने के लिए ही बनाई गई व्यवस्था का नाम रोस्टर है।

ओबीसी को आरक्षण मिलने से पहले एससी और एसटी वर्ग के लोगों की नियुक्ति के लिए  40 और 100 प्वाइंट का रोस्टर बनाया गया था। मंडल कमिशन लागू होने के बाद वर्ष 1992 में सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों के फैसला से जब 52 फ़ीसदी पिछड़ों को 27 फ़ीसदी आरक्षण प्राप्त हुआ तो उसके आलोक में नए ढंग से रोस्टर बनाने की आवश्यकता भी पड़ी। भारत सरकार के डीओपीटी मंत्रालय के निर्देश पर यूजीसी (यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन) द्वारा जेएनयू के  एक प्रोफेसर राव साहब  काले की अध्यक्षता में रोस्टर की खामियों को दूर करने के लिए एक तीन सदस्यीय कमेटी बनाई गई, जिसमें एक कानूनविद जोश वर्गीज और दूसरे यूजीसी के तत्कालीन सचिव  डॉ आर के चौहान सदस्य थे।

200 प्वाइंट का ही रोस्टर क्यों ? 

काले कमेटी ने आर.के. सभरवाल बनाम स्टेट ऑफ़ पंजाब के मामले में वर्ष 1995 में सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच के फैसले  में दिए गए दिशा निर्देश के आलोक में  यूजीसी द्वारा निर्गत 2 जुलाई 1997 के दिशानिर्देशों के मद्देनजर जांच परख के बाद विश्वविद्यालय स्तर पर नियुक्तियों के लिए 200 पॉइंट का रोस्टर जारी करने की सिफारिश किया ताकि सभी वर्गों को आबादी के हिसाब से यानी एससी को 15% ,एसटी को 7.5 %, ओबीसी को 27% और सामान्य वर्ग को 50.5 % की भागीदारी प्राप्त हो जाए। कमेटी का कहना था कि 100 पॉइंट का रोस्टर रहने पर आदिवासी यानी एसटी समाज की आबादी 7.50 फ़ीसदी है तो 100 व्याख्याताओं की नियुक्ति में  एसटी की 7.50 फ़ीसदी आबादी / आरक्षण के हिसाब से  7 या 8 पदों पर ही इस वर्ग की नियुक्ति की जा सकेगी। चूंकि आदमी को तो आधा किया नहीं जा सकता। अब अगर 100 पदों में से  7 पदों पर एसटी की नियुक्ति की जाती है तो एसटी  को आधा का नुकसान हो रहा है और 8 पदों पर की जाती है तो अन्य की हिस्सेदारी कम हो जाती है। उसी तरह  सामान्य वर्ग के लिए  जो 50 पॉइंट 5%  सीट निर्धारित है  तो फिर  उसे भी  50  या  51  सीटों पर नियुक्ति करनी होगी  तो यहां भी किसी न किसी वर्ग   के साथ अन्याय होगा।

इसलिए कमेटी ने 200 पॉइंट का रोस्टर बनाया और कहा कि 200 के रोस्टर में एसटी को 7.50 ×2= 15, एससी को 15× 2=30, ओबीसी को 27×2= 54 और सामान्य वर्ग को 50.5×2=101 के गणितीय हिसाब से पदों पर नियुक्ति की जा सकेगी, जिसमें किसी की कोई हिस्सेमारी नहीं होगी। आबादी एवं वर्तमान आरक्षण के इसी प्रतिशत सूत्र के आधार पर प्रो. काले कमिटी ने सभी वर्गों की नियुक्ति के लिए 200 पॉइंट का रोस्टर बनाया और  इसे लागू करने की सिफारिश किया जो बिल्कुल ही वैज्ञानिक, तार्किक और न्यायिक है तथा इससे किसी भी वर्ग की  हिस्सेदारी का कोई नुकसान नहीं है।

विश्वविद्यालय/कॉलेज ही इकाई क्यों?

प्रो. काले कमेटी ने एक और सिफारिश किया, वह यह की विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में तीन कटेगरी के शिक्षक हैं। (1). प्रोफेसर  (2). एसोसिएट प्रोफेसर और (3).असिस्टेंट प्रोफेसर। इनकी सेलरी और  सेवा शर्त एक है। इनके तीन स्तरीय कैडर बनाने के साथ-साथ  विश्वविद्यालय / कॉलेजों को ही इनकी नियुक्ति की इकाई होने की भी अनुसंशा किया। सभी वर्गों को समुचित प्रतिनिधित्व दिलाने के लिए इससे बेहतर दूसरा कोई उपाय भी नहीं दिखता। जेएनयू में स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोशल सिस्टम के चेयरपर्सन प्रोफेसर विवेक कुमार कहते हैं कि, ” सरकार विश्वविद्यालय को इकाई मानकर “अनुदान” देती है और ‘आरक्षण’ विभाग को इकाई मान कर देने की बात की जा रही है, यह तो अपने आप में विरोधाभास है।” जेएनयू की शोध छात्रा कनकलता जादव ने तो एक बड़ा ही अहम सवाल पूछकर 13 प्वाइंट रोस्टर समर्थकों के गाल पर तमाचा जड़ दिया  कि विभाग को नियुक्ति की इकाई मानने के कितने साल बाद एसटी एससी ओबीसी का नंबर आएगा?

शार्टफाल और  बैकलॉग 

प्रोफेसर काले कमेटी ने पाया कि बहुत से ऐसे कॉलेज और विश्वविद्यालय हैं जहां आरक्षण तो लागू हो गया है लेकिन असिस्टेंट प्रोफेसरों की आरक्षित सीटों को भी सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों से ही भर दिया गया है  तो संबंधित कॉलेजों / विश्वविद्यालयों में रोस्टर के मुताबिक जितनी आरक्षित  सीटों पर सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों की नियुक्ति कर दी गई है या खाली रखी गयी है  तो  कमेटी ने पहले उतनी सीटों को शार्टफॉल या बैकलॉग मानकर नई नियुक्ति में  उन सीटों को संबंधित आरक्षित वर्गों के उम्मीदवारों से भरने की और फिर बाद की नई नियुक्ति के लिए 200 पॉइंट रोस्टर के साथ भरने की अनुशंसा किया ताकि सभी वर्गों  का बैलेंस/ प्रतिनिधित्व मेंटेन रहे। मतलब साफ है कि जब तक आरक्षित वर्गों का पुराना बैकलॉग पूरी तरह से भर नहीं जाता तब तक किसी नए पद पर सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों की नियुक्ति के लिए विज्ञापन नहीं निकाला जाएगा।

जैसे मान लिया जाए  कि किसी विश्वविद्यालय में वर्ष 2006 से आरक्षण लागू है लेकिन उस विश्वविद्यालय में किसी भी एससी, एसटी और ओबीसी  के प्रोफेसर की बहाली किए बिना ही  56 पदों पर  सामान्य वर्ग के असिस्टेंट प्रोफेसर की बहाली  कर दी गई है तो कानूनन  चाहिए तो यह  कि हड़पी हुई 27 आरक्षित सीटों पर कार्यरत सामान्य वर्ग के  व्याख्याताओं को हटाकर 200 प्वाइंट रोस्टर के  मुताबिक ओबीसी के 15, एससी के 08 और एसटी के 04 व्याख्याताओं की नियुक्ति के लिए विज्ञापन निकालकर इन आरक्षित वर्गों  के व्याख्याताओं की नियुक्ति कर दी जाय।

 लेकिन व्यवहारतः ऐसा करना न उचित होगा न मानवीय ही। इसलिए प्रो. काले कमेटी की  सिफारिश के अनुसार जब आगे उस विश्वविद्यालय में  नए असिस्टेंट प्रोफेसरों की नियुक्ति करनी होगी तो पहले  200 प्वाइंट के रोस्टर के अनुसार उनकी आरक्षित कोटे की सीटें भर ली जाएंगी  और उसके बाद फिर आगे  रोस्टर अनुसार सभी वर्गों की नियुक्ति की जाएगी। लेकिन मनुवादियों द्वारा  इस नियम को भी नहीं मानकर एक दूसरा अमानवीय और असंवैधानिक नया नियम बना दिया गया कि पहले से जिन आरक्षित पदों पर जो असिस्टेंट प्रोफेसर कार्यरत हैं यदि वह पद उनके रिटायरमेंट के बाद खाली होती है तो उन सीटों पर आरक्षित वर्ग के असिस्टेंट प्रोफेसर की बहाली की जाएगी। नई बहाली में उसकी क्षती पूर्ति  नहीं की जाएगी, लेकिन ऐसा कर देने से आरक्षण/प्रतिनिधित्व का जो महत्व और उद्देश्य है वह खत्म हो जाता है क्योंकि फिर तो वर्गों की नियुक्ति का बैलेंस/प्रतिनिधित्व कभी मेंटेन ही नहीं होगा। कई पीढ़ी गुजर जाएगी तो भी नहीं।

वर्तमान स्थिति

प्रोफेसर काले कमिटी की सिफारिश के आलोक में जब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग  (यू जी सी) ने नोटिफिकेशन निकाला तो इसके खिलाफ BHU के विवेकानंद तिवारी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की  और इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मार्च  2017 में 200 पॉइंट के रोस्टर को खारिज करते हुए  विश्वविद्यालय/ कॉलेज को नियुक्ति की इकाई की जगह 13 प्वाइंट रोस्टर के साथ विभाग को नियुक्ति की इकाई मानकर प्रोफेसरों की नियुक्ति का निर्णय दे दिया जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी कायम रख दिया। इस निर्णय के खिलाफ एससी, एसटी और ओबीसी के भारी दबाव पर बीजेपी सरकार SLP लेकर सुप्रीम कोर्ट गयी तो जरूर लेकिन, जैसा कहा जा रहा है, लेकिन  सरकार द्वारा सही ढंग से सबूत के साथ पक्ष नहीं रखने पर सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कर इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्णय को  पुनः कायम रख दिया तो आपने देखा प्रबुद्ध पिछड़ों का आक्रोश सड़क पर आ गया। यहां यह कहने में मुझे तनिक भी हिचक नहीं है कि जब 1775 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने शायद भारत में पहली दफे किसी नंदकुमार देव् नामक एक ब्राह्मण को फांसी की सज़ा देकर फांसी पर लटका दिया तो तब इसका बहुत विरोध हुआ था और विरोध का एक प्रमुख कारण यह भी था कि इस मामले में जज, जूरी और सरकारी वकील सभी के सभी अंग्रेज ही थे। तो इस मामले में भी यह बात उजागर हुई है कि सभी पक्ष,  विपक्ष, सरकारी वकील सहित जज भी एक ही  जाति के थे।

यहां हम सब को यह समझना भी जरूरी है कि उधर इलाहाबाद हाई कोर्ट के  2 जजों का फैसला आया और इधर विश्वविद्यालयों में नए नियम के अनुसार यूजीसी ने रोस्टर बनाकर प्रोफेसरों की बहाली की प्रक्रिया प्रारंभ करने का निर्देश जारी कर दिया और आपको ताज्जुब होगा कि BHU सहित 11 विश्वविद्यालयों में जैसे लूट मची हो, ताबड़तोड़ 700 व्याख्याताओं की भर्ती के लिए विज्ञापन निकाला दिया  गया जिसमें एसटी के लिए एक भी पद नहीं , एससी के लिए मात्र 18 और ओबीसी के लिए मात्र 57 सीटें निर्धारित की गयीं थी। और हरियाणा के एक विश्वविद्यालय ने तो 11 जनवरी को कुल 22 विभागों में प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर के पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन निकाला लेकिन उसमें आरक्षित वर्गों के लिए कोई पद निर्धारित नहीं थे। इससे इनके मन में, चाहे कितने भी ऊंचे पद पर ये बिराजमान क्यों न हों, आज भी आरक्षित वर्गों के प्रति नफरत का जो भाव है, उसे  समझा जा सकता है।

द्वापर और त्रेता युग में तो आम जनता के लिए कोई संविधान नहीं था तो शंबूक की गर्दन कटती थी और एकलव्य का अंगूठा भी कटता था। लेकिन आज भारत में जब विश्वरत्न बाबा साहेब डॉ. आम्बेडकर का भारतीय संविधान मौजूद है तो अब इस 13 पॉइंट रोस्टर से रोज-रोज शंबुकों की गर्दन और एकलव्यों का अंगूठा भी कटता रहेगा। क्योंकि यह रोस्टर दिखाने के लिए 13 प्वाइंट का है असल में यह 03 प्वाइंट रोस्टर है। इसलिए संक्षेप में यह कहना बेहतर होगा कि यह 13 पॉइंट रोस्टर एससी एसटी और ओबीसी समाज के लिए मनुवादी हुकूमत द्वारा निर्गत 85 फीसदी पिछड़ों को जानवर बनाकर गुलाम बनाये रखने का वारंट है, कहिये इनके मौत का वारंट है। यदि चुप रह गए तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुलाम बनी रहेगी और संघर्ष करके जीत लिया तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी राज करेगी।

  • लेखकः एडवोकेट गणपति मंडल, संपर्कः 9304080117

बसपा ने प्रत्याशियों के लिए जारी किया नया निर्देश

लखनऊ। 2019 की तैयारियों में व्यस्त बहुजन समाज पार्टी ने अपने नेताओं के लिए एक नया फरमान जारी किया है. पार्टी ने अपने फरमान में कहा है कि बसपा का कोई भी प्रत्याशी या नेता होर्डिंग्स या बैनर में पार्टी अध्यक्ष मायावती के बराबर फोटो नहीं लगा सकेगा. पार्टी की ओर से जारी निर्देश में यह भी कहा गया है कि बसपा के किसी भी प्रत्याशी या नेता को अब होर्डिंग लगाने से पहले उसे बसपा प्रभारियों को दिखाना होगा और उनकी सहमति लेनी होगी.

पार्टी अध्यक्ष सुश्री मायावती के निर्देश पर मंगलवार को प्रदेश के सभी मंडलों में नवनियुक्त मंडल-जोन इंचार्जों ने एक बैठक कर पार्टी अध्यक्ष का यह नया आदेश सबको सुना दिया. दरअसल ऐसा पार्टी से जुड़े नए नेताओं को पार्टी के निर्देश बताने के तहत किया गया है.

पार्टी के पुराने नेताओं को तो बसपा के नियम कानून और होर्डिंग-बैनर लगाने का तौर-तरीका पता है, लेकिन चुनाव के मौके पर तमाम जगह समर्थक और पार्टी में आए नए नेता अपने हिसाब से होर्डिंग्स में महापुरुषों और बसपा अध्यक्ष के बराबर या उनसे भी बड़ी अपनी फोटो लगा देते हैं, जिनको समझाने के लिए यह बैठक आयोजित किया गया था. इस बैठक में यह भी तय किया गया कि कोई भी नेता पार्टी की मुखिया मायावती के सामने उनके बराबर या बड़ी फोटो नहीं लगा सकेगा. पार्टी का साफ निर्देश है कि पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती के सामने सिर्फ पार्टी संस्थापक मान्यवर कांशीराम या फिर पार्टी के चुनाव चिन्ह हाथी की तस्वीर ही लगाई जा सकती है.

पार्टी की ओर से जारी दिशा-निर्देश में कहा गया कि बैनर-होर्डिंग्स के ऊपरी हिस्से पर महापुरुषों की फोटो लगेगी और नीचे की तरफ होर्डिंग्स लगवाने वाले की तस्वीर होगी. दरअसल चुनाव के दौरान होर्डिंग्स की अपनी राजनीति होती है. चुनाव के मौके पर तमाम छुटभैये नेता या प्रत्याशी खुद को पार्टी के शीर्ष नेताओं से अपनी करीबी दिखाने के लिए उनकी फोटो के साथ बड़ी-बड़ी होर्डिंग्स लगा कर उसे प्रचारित करते हैं. कार्यकर्ताओं को इन बैनर और होर्डिंग्स से भ्रम न हो, इसलिए बसपा ने इस तरह का निर्देश जारी कर दिया है. साथ ही बहुजन समाज के महापुरुषों की तस्वीर सबसे ऊपर रखने का निर्देश जारी कर बसपा ने साफ कर दिया है कि भले ही उसके टिकट पर कोई भी चुनाव लड़े बहुजन समाज के महापुरुषों का सम्मान पार्टी में सबसे ऊपर है.

जानिए धोनी और रोहित ने कैसे जीती हारी हुई बाजी

ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ दूसरे वनडे में शतकीय पारी खेलने वाले भारतीय कप्तान विराट कोहली ने कहा कि वह 46वें ओवर में विजय शंकर को गेंद सौंपना चाहते थे, लेकिन पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी और उपकप्तान रोहित शर्मा ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया. ‘मैन ऑफ द मैचकोहली ने 120 गेंदों में 116 रनों की पारी खेली, जबकि डेथ ओवरों में भारतीय गेंदबाजों ने शानदर प्रदर्शन किया. भारत ने यह मैच आठ रनों से जीता. विजय शंकर अंतिम ओवर की पहली तीन गेंदों पर दो विकेट चटकाए.

कोहली ने मैच के बाद कहा, ‘मैं ऑस्ट्रेलिया की बल्लेबाजी के दौरान 46वां ओवर शंकर को देने के बारे में सोच रहा था, लेकिन धोनी और रोहित ने मुझे जसप्रीत बुमराह और मोहम्मद शमी के साथ गेंदबाजी जारी रखने की सलाह दी. उनका सोचना था कि अगर हम कुछ विकेट निकाल लेते है तो मैच में बने रहेंगे और ऐसा ही हुआ. बुमराह ने स्टंप्स की सीध में गेंदबाजी की और यह काम आया. रोहित से सलाह लेना हमेशा अच्छा रहता है वह टीम का उपकप्तान है और धोनी लंबे समय से यह काम करते आ रहे हैं.’

गौरतलब है कि 46वें ओवर में बुमराह ने दो विकेट निकाले. उन्होंने ओवर के दूसरी गेंद पर नाथन कूल्टर नाइल (4) और चौथी गेंद पर पैट कमिंस (0) को क्रमश: बोल्ड और विकेट के पीछे धोनी के हाथों कैच कराया और ऑस्ट्रेलिया का स्कोर बदलकर 223/8 हो गया.

भारतीय कप्तान ने आखिरी के ओवरों में शानदार गेंदबाजी के दम पर मैच में टीम की वापसी करने वाले बुमराह की तारीफ की. उन्होंने कहा, ‘बुमराह चैम्पियन गेंदबाज है. एक ओवर में दो विकेट लेकर उसने मैच का रुख हमारे तरफ मोड़ दिया. ऐसे मैचों से आपको काफी आत्मविश्वास मिलता है. विश्व कप में भी हमें ऐसे कम स्कोर वाले मैच मिल सकते है. यह पिच केदार जाधव की गेंदबाजी के लिए सटीक थी. वह आखिरी ओवर में भी गेंदबाजी करना चाहता है.’

वनडे क्रिकेट में 40वां शतक लगाने वाले कोहली ने कहा, ‘यह सिर्फ संख्या है. लेकिन जब आप मैच जीतते हैं, तो अच्छा लगता है. जब मैं बल्लेबाजी के लिए उतरा तो हालात मुश्किल थे. मेरे पास पूरी पारी में बल्लेबाजी करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था. मुझे टीम की गेंदबाजी से ज्यादा खुशी मिली है.’

ऑस्ट्रेलिया के कप्तान एरॉन फिंच ने मार्कस स्टोइनिस कि तारीफ करते हुए कहा कि यह ऐसा मैच था जिसे टीम आखिर तक ले जाना चाहती थी. उन्होंने कहा, ‘यह ऐसा मैच था जिसे हम आखिर तक ले जाना चाहते थे और उम्मीद कर रहे थे कि जीत दर्ज करे. मार्कस स्टोइनिस ने शानदार पारी खेली. मैच में पूरे दिन उतारचढ़ाव होता रहा. मैच का लय एक समय हमारे पक्ष में था, लेकिन हमने इसे खो दिया.’

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Total Dhamaal का जलवा अब तक कायम, कर गई इतनी कमाई

नई दिल्ली: टोटल धमाल से बॉक्स ऑफिस पर लगातार जलवा कायम रखने वाले अजय देवगन, अनिल कपूर और माधुरी दीक्षित  की तिकड़ी अभी भी खूब धमाल मचा रही है. दूसरे हफ्ते भी धांसू कमाई करते हुए करीब 30 करोड़ से ज्यादा की कमाई कर चुकी है. हालांकि कुल कमाई करीब 130 करोड़ के पास पहुंच गई हैं. ‘टोटल धमालको टक्कर देने के लिए इस हफ्ते कार्तिक आर्यन (Kartik Aaryan) और कृति सेनन की फिल्म लुका छुपीसिनेमा घर में रिलीज हुई है. हालांकि इस पर कोई फर्क देखने को नहीं मिला. ट्रेड एनलिस्ट तरण आदर्श ने अपने ट्वीट के जरिए जानकारी दी थी कि मंगलवार तक फिल्म आसानी से 125 करोड़ कमा लेगी.

टोटल धमालका बॉक्स ऑफिस को लेकर तरण आदर्श ने आगे बताया कि दूसरे हफ्ते शुक्रवार को  4.75 करोड़, शनिवार को 7.02 करोड़, रविवार को 11.45 करोड़ और सोमवार को 6.03 करोड़ कमा लिए हैं. रोजाना के आंकड़े के मुताबिक फिल्म ने मंगलवार की करीब 5 से 6 करोड़ के बीच का कलेक्शन कर सकती है. हालांकि अजय देवगन की फिल्म टोटल धमालकी निगाहें 150 करोड़ की तरफ है. देखना होगा कि यह आंकड़ा कब तक छू पाती है. खराब रिव्यू के बावजूद कॉमेडी फिल्म टोटल धमालकी बॉक्स ऑफिस पर रफ्तार थम ही नहीं रही है.

अनिल कपूर, अजय देवगन और माधुरी दीक्षित स्टारर टोटल धमालबॉक्स ऑफिस पर आगे बढ़ रही है. महाशिवरात्रि की छुट्टी की फायदा फिल्म को मिला. ‘टोटल धमालका बजट लगभग 100 करोड़ रुपये बताया जाता है, इस तरह फिल्म ने अच्छा बिजनेस कर लिया है, फिल्म के ओवरसीज बिजनेस को लेकर भी अच्छी खबर आ रही है.

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अमेरिका ने दिया पाकिस्तान को बड़ा झटका

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नई दिल्ली। अमेरिका ने पाकिस्तान को एक बड़ा झटका दिया है. पाकिस्तानी नागरिकों को मिलने वाले वीजा की अवधि को अमेरिका ने घटा दिया है. दरअसल, अमेरिकी दूतावास के प्रवक्ता के हवाले से बताया गया है कि अमेरिका ने पाकिस्तानी नागरिकों के लिए वीजा की अवधि पांच साल से घटाकर तीन महीने कर दिया है. यह जानकारी एआरवाई न्यूज ने अमेरिकी दूतावास के प्रवक्ता के हवाले से दी है. बता दें कि वैश्विक मंच पर आतंकवाद को लेकर आलोचनाओं का सामना कर रहे पाकिस्तान के लिए यह किसी दोहरे झटके से कम नहीं है.

आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान वैश्विक तौर पर अलग-थलक पड़ता नजर आ रहा है. यही वजह है कि आतंकवाद को पनाह देने वाले पाकिस्‍तान को एक बार फिर से झटका लगा है. अमेरिका के डोनाल्ड ट्रंप सरकार ने फैसला किया है कि वह पाकिस्‍तान के नागरिकों को तीन महीने से ज्‍यादा का वीजा नहीं देगी. बता दें कि इससे पहले तक पाकिस्‍तान के नागरिकों को अमेरिका की ओर से पांच साल तक का वीजा दिया जाता था.

image source- The Daily Star

गौरतलब है कि इससे पहले आतंकवाद को लेकर भी पाकिस्तान को अमेरिका ने खरी-खोटी सुनाई थी और पाक की सरजमीं पर आतंकवाद को पनाह न देने के चेतावनी दी थी. अमेरिका ने पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान की सरजमीं पर हुए एयर स्ट्राइक पर भी भारत का साथ दिया था और जैश के आंतकी कैंप पर भारतीय वायुसेना की कार्रवाई को जायज ठहराया था.

साभार- एनडीटीवी

मोदी सरकार की दमनकारी नीतियों के खिलाफ देश भर में सड़कों पर उतरे बहुजन

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बिहार के भागलपुर में भारत बंद के दौरान सड़क पर उतरे बहुजन
नई दिल्ली/पटना/लखनऊ। 13 प्वाइंट रोस्टर और आदिवासी समाज को उनकी जमीन से बेदखल करने के खिलाफ देश के दलित, आदिवासी और पिछड़े समाज ने आज 5 मार्च को देश भर में व्यापक तौर पर भारत बंद का आयोजन किया है. अपने हक के लिए देश के तमाम हिस्सों में वंचित समाज का जागरुक तबका सड़कों पर है.

बिहार भी सुलग रहा है. राज्य के पटना, नवादा, भागलपुर,बांका, मधुबनी और खगड़िया आदि जिलों में बंद और रेल रोकने की खबर है. तो झारखंड में भी बराबर आग लगी है. राज्य के धनबाद और रांची सहित तमाम जिलों से व्यापक बंद की खबरे हैं.

नवादा, बिहार

तो सत्ता के केंद्र दिल्ली में जंतर मंतर पर भी बहुजन आंदोलनकारी भारी संख्या में जुटे हैं. इसमें 13 प्वाइंट रोस्टर के विरोध सहित आदिवासी समाज के लोग भी बहुत संख्या में हैं, जो सरकार द्वारा जमीन से बेदखली का विरोध कर रहे हैं.

झारखंड

ऐसे ही उत्तर प्रदेश के बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र और शिक्षक गुस्से में हैं. इसके अलावा राजस्थान के जयपुर में भी बंद का खासा असर है.

वाराणसी, बनारस हिन्दू विवि

आंदोलन की यह चिंगारी दक्षिण के राज्यों में भी पहुंच गई है. दक्षिण के कटक और ओडिसा सहित तमाम जगहों पर दलित, आदिवासी और ओबीसी समाज के लोगों ने सड़क पर उतर कर सरकार की दमनकारी नीति के खिलाफ विरोध दर्ज करवा रहे हैं.

कुल मिलाकर वंचित समाज के गुस्से का आलम यह है कि आंदोलन की यह आग सत्ताधारी दल को जलाने के लिए तैयार है. उन्होंने साफ कह दिया है कि जब तक उनकी मांगों को पूरा नहीं कर दिया जाता, आंदोलन जारी रहेगा.

वंचित बहुजन नौकरियों,खासकर निजीक्षेत्र में आरक्षण की सीमाबद्धता को समझें!

सवर्ण आरक्षण से पनपा : संख्यानुपात में आरक्षण का जज्बा !  गत 7 जनवरी को जब यह तय हो गया कि मोदी सरकार गरीब सवर्णों को आरक्षण देने का विधेयक लोकसभा और राज्य सभा में न सिर्फ लाएगी, बल्कि उसे पारित भी करा लेगी, तब बहुजन बुद्धिजीवियों में भारी निराशा की लहर दौड़ गयी. कारण जिन सवर्णों का राज-सत्ता, ज्ञान-सत्ता और धर्म-सत्ता के साथ ही अर्थ-सत्ता पर भी 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा हो, उस सवर्ण वर्ग के आठ लाख आय वालों को गरीब मानते हुए आरक्षण सुलभ कराना संविधान और सामाजिक न्याय की अवधारणा का खुला मजाक था. किन्तु आरक्षण के मामले में मोदी सरकार द्वारा उलटी गंगा बहाने के प्रयास में भी बहुजन बुद्धिजीवियों को कुछेक सकारात्मक बात नजर आई. इनमें कईयों को इस बात को लेकर ख़ुशी हुई कि इससे आरक्षण का विरोध बंद हो जायेगा तथा ये दूसरों को ‘सरकारी दामाद’ या ‘कोटे वाला/वाली’ कहना बंद कर देंगे. लेकिन इस बात को लेकर ख़ुशी मनाने वालों की सख्या ज्यादे थी कि इससे आरक्षण की 50 प्रतिशत वाली सीमा टूट जाएगी तथा इसका दायरा 100 प्रतिशत तक फ़ैल जायेगा एवं संख्यानुपात में आरक्षण का मुद्दा चल निकलेगा. बहुजन बुद्धिजीवियों का यह अनुमान सही निकला और 7 जनवरी को सोशल मीडिया पर उभरा धीरे-धीरे उभरा ‘जिसका जितनी संख्या भारी –उसकी उतनी भागीदारी’ का नारा 9 जनवरी की रात सवर्ण आरक्षण बिल पास होते ही सैलाब में बदल गया. यूँ तो सवर्ण आरक्षण के विरुद्ध जिसकी जितनी संख्या भारी के रूप में अपनी भावना का प्रकटीकरण करने के लिए तो सबसे पहले सामने आये बहुजन बुद्धिजीवी, किन्तु थोड़े ही अन्तराल में पक्ष-विपक्ष के बहुजन नेता भी होड़ में उतर आये. राजद के तेजस्वी यादव ने उसी दिन आरक्षण का दायरा बढ़ाने के लिए ट्विट कर कहा कि दलित-पिछड़ों को को 90 प्रतिशत आरक्षण मिलना चाहिए.सत्ता पक्ष की अनुप्रिया पटेल ने 8 जनवरी को घोषणा किया कि जिसकी जितनी संख्या, उसकी उतनी भागीदारी के आधार पर आरक्षण मिलना चाहिए. अनुप्रिया पटेल की तरह सपा के तेज तर्रार नेता धर्मेन्द्र यादव ने जाति जनगणना की मांग उठाते हुए सुझाव दिया कि,’आरक्षण व्यवस्था सौ फीसदी होनी चाहिए, जो सभी जातियों के बीच उनके अनुपात में बाँट दिया जाय. इससे आरक्षण को लेकर उठने वाला विवाद ही ख़त्म हो जायेगा.’उन्हीं की तरह ही राजद के जय प्रकाश यादव ने कहा कि, ‘अब दलित –पिछड़ों को 85 प्रतिशत आरक्षण मिलना चाहिए. अब वे 50 प्रतिशत से संतुष्ट नहीं रहने वाले हैं.’ आरक्षण बढाने की इसी होड़ में यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने घोषणा किया कि,’हम सत्ता में आये तो हिन्दू समाज के एससी,एसटी,ओबीसी को 85 प्रतिशत आरक्षण देंगे.’ बहरहाल चुनाव को ध्यान में रखकर आनन-फानन में 9 जनवरी को संसद में पारित सवर्ण आरक्षण पर जब राष्ट्रपति ने 12 जनवरी को अपने हस्ताक्षर की मोहर लगा दिया, तब ऐसा लगा सामाजिक न्यायवादी दल तमाम क्षेत्रों में संख्यानुपात में आरक्षण के लिए सड़कों पर उतर पड़ेंगे. लेकिन वैसा नहीं हुआ. पर, 22 जनवरी को जब सुप्रीम कोर्ट ने विभागवार आरक्षण का रास्ता साफ़ कर दिया, तब जाकर सख्यानुपात में आरक्षण का मामला गरमाया.लेकिन कितना!

विभागवार आरक्षण :मानव जाति के इतिहास के सबसे बेरहम फैसलों में से एक!

13 पॉइंट रोस्टर के द्वारा लागू होने वाला था विभागवार आरक्षण मानव जाति के इतिहास के सबसे बेरहम फैसलों में से एक था, जो चरम सवर्णवादी सरकार की मंशा को ध्यान में रखते हुए देश की सर्वोच्च अदालत ने दिया था. यह चरम अमानवीय इसलिए था क्योंकि इसके जरिये भारत के उस जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग को अवसरों पर पहला हक़ सुनिश्चित करवाने का बलिष्ठ्तम प्रयास हुआ था, जिसका हजारों साल पूर्व की भांति आज भी राज-सत्ता,धर्म-सत्ता और अर्थ-सत्ता के साथ ज्ञान – सत्ता पर 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा है. इसके जरिये एससी/एसटी,ओबीसी से युक्त उन जन्मजात वंचित वर्गों को अवसरों से दूर धकेलने का अभूतपुर्व प्रयास हुआ था, जो आरक्षण के सहारे अभी-अभी राष्ट्र की मुख्यधारा से जुड़ने की प्रक्रिया में शामिल हुए थे. चूँकि भारत का इतिहास आरक्षण पर संघर्ष का इतिहास है, इसलिए सवर्ण आरक्षण के अल्प अंतराल के बाद ही शासक वर्ग द्वारा जिस तरह विभागवार आरक्षण के जरिये बहुजनों के आरक्षण की ताबूत में अंतिम कीलें ठोंकने का कुत्सित प्रयास हुआ, उसके बाद चप्पे-चप्पे पर आरक्षण की मांग उठाते हुए आरक्षण पर संघर्ष को शिखर पर पहुंचा देना चाहिए था, जो नहीं हुआ.

कितना सीमित है:आर-पार की लड़ाई का मुद्दा !

इसमें कोई शक नहीं कि विभागवार आरक्षण के बाद बहुजन छात्र और गुरुजन जिस तरह सडकों पर उतरे ,उससे हताश-निराश बहुजनों में उम्मीद का संचार हुआ, किन्तु इनकी मांगो से भारी निराशा हुई. ये विभागवार आरक्षण के खिलाफ आर-पार की लड़ाई के लिए सडकों पर उतरे थे, किन्तु जो मांग उठाया, वह काफी हद तक कारुणिक रही.यूँ तो 23 जनवरी से ही विभागवार आरक्षण के खिलाफ उनका छिट-फुट विरोध शुरू हो गया था, किन्तु 31 जनवरी,2019 से ही यह प्रभावी रूप में सामने आया. 31 जनवरी के बाद से ही वे विभागवार आरक्षण के खिलाफ आंदोलित हैं. इस सिलसिले वे पांच मार्च को भारत बंद के जरिये अपने आन्दोलन को शिखर पर पहुंचाने जा रहे हैं. बहरहाल 31 जनवरी से लेकर पांच मार्च तक यदि उनकी मांगो पर गौर किया जाय तो बिलकुल ही नहीं लगेगा ये आर-पार की लड़ाई में जुटे हैं: नजर आयेगा बहुत ही सीमित मुद्दों को लेकर लड़ रहे हैं. यदि इनकी लड़ाई के कॉमन एजंडे पर ध्यान दिया जाय तो दिखेगा कि प्रायः सभी के एजंडे में 13 पॉइंट रोस्टर की जगह 200 पॉइंट रोस्टर लागू करना , जाति आधार जनगणना कराना, निजीक्षेत्र और न्यायपालिका में एससी/एसटी/ओबीसी को मिले: मोटामोटी यही मांगे शामिल हैं.इस मामले में ‘आरक्षण बढ़ाने’ की लड़ाई लड़ रहे तेजस्वी यादव,जो बहुजनों की नयी आशा और आकांक्षा के रूप में उभर रहे हैं, का राजद भी अपवाद नहीं है. यदि इन मांगो को यदि कोई आरक्षण बढाने की लड़ाई के लिहाज से ध्यान से देखे तो दिखेगा कि बहुजन छात्र और गुरुजन सरकारी नौकरियों से आगे बढ़कर निजी क्षेत्र और न्यायपालिका तक आरक्षण के विस्तार में ही समाज की मुक्ति तथा सवर्ण और विभागवार आरक्षण का प्रतिकार देख रहे हैं.अगर ऐसा है तो मानना पड़ेगा वंचित वर्ग आरक्षण की लड़ाई में अभी भी प्रायः दो दशक पीछे चल रहा है: उसने भोपाल घोषणापत्र से कोई खास सबक नहीं लिया.

डॉ. आंबेडकर की ‘राज्य और अल्पसंख्यक’ के बाद बहुजनों को मुक्ति की सर्वोत्तम रचना: चंद्रभान प्रसाद का ‘भोपाल दस्तावेज और घोषणापत्र’ !

स्मरण रहे नवउदारवादी अर्थनीति के जरिये निजीकरण, उदारीकरण क गंगा बहाने वाले नरसिंह राव के बाद सत्ता में आकार जब स्वदेशी के परम हिमायती राष्ट्रवादी अटल बिहारी वाजपेयी विनिवेशीकरण के जरिये लाभजनक सरकारी उपक्रमों तक को औने-पौने दामों में निजीक्षेत्र के स्वामियों को बेचने लगे, तब आरक्षण के खात्मे से त्रस्त आरक्षित वर्गों के तमाम संगठन निजीक्षेत्र में आरक्षण की मांग उठाने लगे. ऐसा इसलिए कि सरकारी नकारियों को ही अपनी उन्नति-प्रगति का एकमात्र माध्यम मानने वाले इन वर्गों, खासकर दलित बुद्धिजीवी – एक्टिविस्टों को लगा कि निजीकरण के जरिये सारी नैकरिया निजीक्षेत्र में शिफ्ट हो जाएँगी. ऐसा मानकर ही जब आरक्षित वर्गों के तमाम संगठन गली-कूचों में निजीक्षेत्र में आरक्षण की मांग बुलंद करने लगे, उन्ही दिनों सुप्रसिद्ध दलित चिन्तक चंद्रभान प्रसाद के नेतृत्व में 12-13 जनवरी,2002 को ऐतिहासिक भोपाल कांफ्रेंस हुआ. यह स्वाधीन भारत के इतिहास का संभवतः सबसे महत्वपूर्ण दलित सम्मलेन था, जिसमें भूमंडलीकरण के दौर की चुनौतियों से निपटने के लिए देश के २५० सौ अधिक मनीषी एकत्र हुए थे . इस अवसर पर चंद्रभान प्रसाद द्वारा लिखित ऐतिहासिक भोपाल दस्तावेज और भोपाल घोषणापत्र जारी हुआ. इस लेखक के मुताबिक जन्मजात वंचितों की मुक्ति के लिहाज से डॉ. आंबेडकर की ‘राज्य और अल्पसंख्यक’ के बाद ‘भोपाल दस्तावेज और घोषणापत्र’ जैसी कोई और रचना शायद अबतक नहीं आई है . इसी सम्मेलन में अमेरिका के सर्वव्यापी आरक्षण ‘डाइवर्सिटी’ के तर्ज पर भारत में आरक्षण का दायरा बढ़ाने की ठोस परिकल्पना सामने आई.हालाँकि चंद्रभान प्रसाद ने वह परिकल्पना सिर्फ एससी-एसटी के लिए प्रस्तुत की थी जिसे परवर्तीकाल में ‘बहुजन डाइवर्सिटी मिशन’ के जरिये ओबीसी और वंचितों से धर्मान्तरित अल्पसंख्यकों तक प्रसारित होने का अवसर मिला. बहरहाल चंद्रभान प्रसाद ने भोपाल दस्तावेज में दलितों(एससी-एसटी) के अतीत और वर्तमान की आर्थिक ,सामाजिक, राजनैतिक, शैक्षिक अवस्था का निर्भूल विश्लेषण करते हुए २१वीं सदी में भूमंडलीकरण के सैलाब में दलितों को तिनको की भांति बहने से बचाने के लिए 21 सूत्रीय निर्भूल एजेंडा प्रस्तुत किया था, जो इस देश में वंचितों की मुक्ति में आकाश दीप का काम करता रहेगा. इस क्रम में उन्होंने नौकरियों,खासकर निजीक्षेत्र में आरक्षण से दलितों को मोहमुक्त करने का जैसा प्रयास किया था,वह बेमिसाल है. आज निजी क्षेत्र के आरक्षण के लिए अतिरक्त उत्साह का प्रदर्शन कर रहे बहुजन छात्र और गुरुजनों को चंद्रभान प्रसाद के उस प्रयास पर संजीदगी से विचार करने की जरुरत है.

आरक्षण की सीमायें !

चंद्रभान प्रसाद ने आरक्षण की सीमाबद्धता पर आलोकपात करते हुए भोपाल दस्तावेज में लिखा था – ‘लगभग सभी दलित आन्दोलनों में आरक्षण का मुद्दा बारं-बार आता है और इसे प्रगति के निर्णायक साधन के रूप में देखा जाता है. शासकीय नौकरियों और विधानसभाओं में आरक्षण और छात्रवृत्तियों के रूप में शिक्षा में कुछ मदद के अलावा,अनुसूचित जाति, जनजाति ने राज्य या समाज से कुछ उल्लेखनीय नहीं लिया. गरीबी हटाने, बकरी व सुअर पालने, रोड किनारे दूकान खोलने के लिए लघु ऋणों के जरिये समुदाय को अधिकारसंपन्न बनाने की योजनाओं से अनुसूचित जाति/जनजाति को कुछ ठोस हासिल नहीं हुआ. इस प्रकार प्रगति के एक साधन के बतौर आरक्षण पर विश्वास अनुसूचित जाति/जनजाति की चेतना को गढ़ता रहा. पर, यह कठोर सचाई है कि बहुत से सरकारी विभागों में अनुसूचित जाति/ जनजाति का कोटा खाली रहता है. हमें अनुसूचित जाति/जनजाति की प्रगति और शोषण-मुक्ति में शासकीय नौकरियों में आरक्षण की सीमित भूमिका को भी समझना होगा. जब तक हम यह नहीं समझते, आंदोलनों को एच्छिक उद्देश्यों की ओर परिवर्तित करना मुश्किल होगा.

मान लीजिये एक समय सीमा के मध्य सरकार पूरी तरह से निर्धारित आरक्षण का कोटा भर देती है तो कितने अनुसूचित जाति /जनजाति के सदस्यों को रोजगार मिलेगा ? केन्द्रीय श्रम मंत्रालय के वार्षिक प्रतिवेदन 2000-2001 के अनुसार राज्य (केंद्र सरकार, सार्वजनिक क्षेत्र इकाइयों,राज्य सरकारों, स्थानीय निकायों) के तहत 1.94 करोड़ नौकरिया हैं. इसका अर्थ है यदि अनुसूचित जाति/जनजाति को उनका वर्तमान कोटा 22.50 प्रतिशत पूरा दे दिया जाय तो 45 लाख से ज्यादा लोग रोजगार नहीं नहीं पा सकते. यदि 45 लाख को पांच से गुणा किया जाय ( मान लें कि सरकारी नौकरी करने वाले एक कर्मचारी से पांच लोगों का परिवार पलता है) तो लक्ष्य 2.25 करोड़ की जनसँख्या से ज्यादे नहीं पहुंच सकता. चूंकि 1991 की जनगणना के मुताबिक 84.63 करोड़ लोगों में से दलितों की आबादी 20.59 करोड़ है, जिनमें 13.82 करोड़ अनुसूचित जाति एवं 6.67 करोड़ आदिवासी हैं, तब सवाल पैदा होता है शेष 18 करोड़ एससी-एसटी आबादी का क्या होगा?

कितना कारगर निजी क्षेत्र में आरक्षण!

राज्य के तहत नौकरियों की अपर्याप्तता से वाफिफ कई शिक्षित अनुसूचित जाति/ के लोग निजी क्षेत्र में आरक्षण का अधिकार बढाने की बात कर रहे हैं. यह सराहनीय है क्योंकि यह अनुसूचित जाति/ जनजाति के अग्रसर होने के लिए दूसरा कदम है. लेकिन हमें इस क्षेत्र की सीमाओं को भी समझना होगा. केन्द्रीय श्रम मंत्रालय के वार्षिक प्रतिवेदन के अनुसार संगठित निजी क्षेत्र में कुल रोजगार केवल 86.96 लाख है. इस प्रकार यदि अनुसूचित जाति/ जनजाति निजी क्षेत्र में आरक्षण का अधिकार प्राप्त भी कर ले और निजी क्षेत्र इमानदारी से 22.50 प्रतिशत कोटा लागू कर दे तो 19.57 लाख लोगों को ही नौकरिया मिल पाएंगी. यदि 19.57 लाख को पाँच से गुणा किया जाय तो 97.85 लाख अनुसूचित जाति/ जनजाति के लोगों को लाभ मिल पायेगा. इस प्रकार यदि सरकारी क्षेत्र की नौकरियों से लाभान्वित होने वाले 2.25 करोड़ और निजी क्षेत्र से लाभान्वित होने वाले 97.85 लाख की कुल आबादी को जोड़ लिया जाय तो भी 17 करोड़ अनुसूचित जाति/ जनजाति के लोग शेष रह जायेंगे. यह आरक्षण और आरक्षण के आंदोलनों की सीमाओं को दर्शाता है.’

ऐसे में जिस आरक्षण के लाभ के दायरे से अनुसूचित जाति/ जनजाति की प्रायः 90 प्रतिशत आबादी बाहर है, वह आरक्षण दलितों को वर्तमान आर्थिक स्थिति से ऊपर उठाने में सहायक नहीं हो सकता, इसलिए भोपाल घोषणापत्र में आरक्षण से परे रणनीति पर विचार करने का आह्वान करते हुए कहा गया था -’ हमें ऐसी रणनीति बनाने के बारे में सोचना होगा जो इस समुदाय के प्रत्येक सदस्य के लिए लागू हो और जिसके द्वारा भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रत्येक क्षेत्र में अनुसूचित जाति/ जनजाति की पर्याप्त भागीदारी सुनिश्चित हो सके.’

विश्व परिदृश्य

भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रत्येक क्षेत्र में दलितों की भागीदारी सुनिश्चित करवाने की रणनीति बनाने के क्रम में चंद्रभान प्रसाद ने अमेरिकी और दक्षिण अफ्रीकी मॉडल को अपनाने का सुझाव हुए लिखा है-‘दुनिया के कई देशों में भारत में विद्यमान स्थिति जैसी समानांतर स्थितियां हैं. इन समान स्थितियों, परिस्थितियों के सामाजिक-ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक पहलुओं की जांच –पड़ताल करना प्रत्येक समझदार व्यक्ति के लिए जरुरी है. उन प्रयासों का भी मूल्यांकन करना जरुरी है जो समानता पर आधारित समाज के निर्माण के लिए जरुरी है. हम दो उप-महाद्वीपों के अनुभवों का परिक्षण करेंगे. देश हैं संयुक्त राष्ट्र अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका. दोनों देश भेदभाव,नस्लवाद,रंगभेद,हिंसक भूतकाल असमानता और शांतिपूर्ण विरोधों के कोलाहल भरे इतिहास से गुजरे हैं. भारत की विशिष्ट जाति-व्यवस्था के बावजूद यहां की असमानताओं के कारण ये देश भारत के लिए सम्भावनायें पैदा करते हैं. अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका और भारत बहु-संस्कृति, बहु-जातिय, बहु-भाषाई और बहुलतावादी समाज हैं. अमेरिका भारत के साथ प्रजातांत्रिक आकार और इतिहास में मुकाबला करता है, जबकि दक्षिण अफ्रीका खूनी रंगभेद के युग के बाद एक संवेदनशील प्रजातंत्र के रूप में पल्लवित हो रहा है.’’

स्मरण रहे चंद्रभान प्रसाद ने उपरोक्त बातें 2002 तक उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर कही थी. तब उन्होंने उन्होंने भारतीय अर्थ व्यवस्था के प्रत्येक क्षेत्र में एससी/एसटी की भागीदारी सुनिश्चित करवाने के लिए अमेरिका की डाइवर्सिटी पॉलिसी और दक्षिण अफ्रीका रोजगार समानता अधिनियम के जरिये एक नया क्रन्तिकारी मार्ग सुझाया जिसके जरिये हमने जाना कि अमेरिका ने भारत के दलित -आदिवासियों की भांति अपने देश के कालों, रेड इंडियंस,हिस्पैनिक्स इत्यादि को संपदा-संसाधनों भागीदार बनाने के लिए अम्बेडकरी आरक्षण की जो आइडिया को उधार लिया,उस आरक्षण को सिर्फ नौकरियों तक सीमित न रखकर सप्लाई, सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों, फिल्म-मीडिया इत्यादि अर्थोपार्जन की समस्त गतिविधियों तक प्रसारित कर दिया,जिसके फलस्वरूप अमेरिकी दलितों में भूरि-भूरि उद्योगपतियों, ठेकेदारों, पत्रकारों, फिल्म स्टारों इत्यादि का उदय हुआ. चंद्रभान प्रसाद द्वारा सुलभ कराइ गयी जानकारी से ही भारत में सर्वप्यापी आरक्षण के विचार का बीजारोपड़ हुआ. परवर्तीकाल में भोपाल दस्तावेज और घोषणापत्र से ही प्रेरणा लेकर बहुजन डाइवर्सिटी मिशन से जुड़े लेखकों ने शक्ति के स्रोतों(आर्थिक, राजनैतिक , शैक्षिक ,धार्मिक ) में सामाजिक और लैंगिक विविधता के प्रतिबिम्बन का अभियान छेड़ा.

रंग ला रहा है विद्या गौतम का देश की हर ईंट में भागीदारी का आन्दोलन!

आज नौकरियों की सीमाबद्धता को देखते हुए ‘देश की हर ईंट में भागीदारी’ के स्लोगन के साथ अखिल भारतीय आंबेडकर महासभा की राष्ट्रीय अध्यक्ष विद्या गौतम एससी,एसटी,ओबीसी के लिए संख्यानुपात में सर्वव्यापी आरक्षण की लड़ाई में चला रही हैं. इस लड़ाई को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने 2018 के अगस्त में सप्लाई, डीलरशिप, निर्माण,सफाई, मरम्मत, वितरण व आवंटन; सभी प्रकार की नियुक्तियों, मनोनयन, सभी आयोगों व निगमों के पदाधिकारियों, राज्य व केंद्र सरकार मंत्रीमंडलों, संविदा पर भर्तियों इत्यादि में एससी,एसटी और ओबीसी के संख्यानुपात में आरक्षण के लिए 46 दिनों का आमरण अनशन किया,जिसमें उनके समर्थन में कई राज्यों के 4 हजार से अधिक लोग भूख हड़ताल पर बैठे. नौकरियों की सीमाओं से भलीभांति अवगत विद्या गौतम का देश की हर ईंट में भागीदारी के पीछे तर्क है ,’हमें न जमीन, ना व्यापार, ना उद्योग,किसी भी साधन-संसाधन में हिस्सेदारी नहीं मिली: साधन के नाम पर केवल आरक्षण के तहत सरकारी नौकरी में हिस्सेदारी प्राप्त हुई. जिनको नौकरी मिली ,उनका जीवन स्तर सुधरा: जिनको नौकरी नहीं मिली उनके जीवन से बदहाली नहीं जा सकी.जब तक किसी बेटे को बाप के सपदा-संसाधन में हिस्सा नहीं मिल जाता,तब तक वो बेटा बराबर का भाई नहीं हो सकता. उसी प्रकार जिस कौम को राष्ट्र के सम्पदा-संसाधनों में हिस्सा नहीं मिल जाता ,वह कौम राष्ट्र की मुख्यधारा से नहीं जुड़ सकती. ऐसी कौम मजबूर ही बनी रहेगी. इसीलिए ‘ भीख नहीं भागीदारी ,देश की हर ईंट में चाहिए हिस्सेदारी!’

आज विद्या गौतम से प्रेरणा लेकर माता सावित्री बाई फुले महासभा की राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्देश सिंह जैसे अन्य कई संगठनों के लोग शक्ति के समस्त स्रोतों में एससी-एसटी-ओबीसी के संख्यानुपात में आरक्षण की लड़ाई लड़ रहे हैं. ऐसे में आज जबकि सवर्ण और विभागवार आरक्षण से आक्रोशित होकर बहुजन छात्र और गुरुजन तथा सामाजिक न्यायवादी दलों के नेता वंचित समुदायों की गुलामी से मुक्ति के लिए संख्यानुपात में आरक्षण बढाने की लड़ाई में उतरने का मन बना रहे हैं, बेहतर है वे नौकरियों में आरक्षण की सीमाबद्धता की उपलब्धि करते हुए विद्या गौतम की भांति सप्लाई, डीलरशिप, निर्माण,सफाई, मरम्मत, वितरण व आवंटन; सभी प्रकार की नियुक्तियों, मनोनयन, सभी आयोगों व निगमों के पदाधिकारियों, राज्य व केंद्र सरकार मंत्रीमंडलों, संविदा पर भारतियों इत्यादि में एससी,एसटी और ओबीसी को संख्यानुपात में आरक्षण दिलवाने के लिए कमर कसें.

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रोस्टर पर सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका खारिज, भर्तियों से SC-ST गायब

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नई दिल्ली। उच्च शिक्षण संस्थानों की भर्तियों में 200 प्वाइंट रोस्टर की फिर से बहाली को लेकर चल रहे आंदोलन में बहुजन समाज को झटका लगा है. इलाहाबाद हाई कोर्ट में 200 प्वाइंट रोस्टर की फिर से बहाली की मांग खारिज होने के बाद केंद्र सरकार इस पर पुनर्विचार याचिका दाखिल करने और ऐसा नहीं होने पर इस मुद्दे पर अध्यादेश लाने की बात कहती रही, लेकिन हकीकत यह है कि इस मुद्दे पर केंद्र ने बहुजनों को धोखा दे दिया है.

इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर रिव्यू पेटिशन खारिज हो गया है. इसके ठीक बाद अब तमाम विश्वविद्यालयों में 13 प्वाइंट रोस्टर के तहत भर्तियां निकालने लगी हैं. इन भर्तियों में सवर्ण तबके के हिस्से में 90 से 95 फीसदी तक सीटें आ रही हैं, जबकि ओबीसी के हिस्से में 5 से 10 फीसदी. सबसे ज्यादा झटका दलित और आदिवासी समाज को लगा है, जिनको इन भर्तियों में एक भी सीट नहीं मिल रही है.

13 प्वाइंट रोस्टर के तहत निकली इन दो भर्तियों को देखिए. उत्तर प्रदेश के वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर की तरफ से 1 मार्च 2019 को एक विज्ञापन निकला है. 13 प्वाइंट रोस्टर विभागवार आरक्षण की बात करता है. ऐसे में जिस चालाकी से विभागवार पद निकाले गए हैं वह साफ तौर पर दलित, आदिवासी और पिछड़े समाज के प्रति इस विश्वविद्यालय के शीर्ष पदों पर बैठे लोगों के भेदभाव पूर्ण नजरिए को साबित करता है.

इसमें फिजिक्स, केमेस्ट्री, मैथेमेटिक्स और अर्थ एंड प्लानेटरी साइंस इन चार विभागों के लिए प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर पद के लिए नियुक्तियां निकाली गई है. इन सभी विभागों में अलग अलग पदों पर 7-7 रिक्तियों के विज्ञापन निकाले गए हैं. इसमें कुल 28 में से 24 पद गैर बहुजनों के हिस्से में आय़ा है, जबकि ओबीसी के हिस्से में चार पद आए हैं. जहां तक दलित और आदिवासी समाज की बात है तो वह मुंह ताकता आरक्षण का मजाक बनता देख रहा है. इसी तरह जननायक चंद्रशेखर युनिवर्सिटी बलिया में तमाम विभागों और पदों को मिलाकर कुल 70 पदों के लिए विज्ञापन निकाले गए हैं. इसमें गैर बहुजन वर्गों ने 60 पद अपने कब्जे में ले लिया हैं, जबकि पिछड़े वर्ग यानि ओबीसी के हिस्से में 10 सीटें आई हैं. एक बार फिर यहां भी दलित औऱ आदिवासी समाज के हाथ कुछ नहीं लगा है.

शैक्षणिक संस्थाओं के अलावा अब रेलवे में भी 13 प्वाइंट रोस्टर लागू करने का आदेश जारी हो चुका है. ऐसे में देश के बहुजन इस अत्याचारी व्यवस्था के खिलाफ एक बार फिर 5 मार्च को भारत बंद की तैयारी में हैं. उनका साफ कहना है कि जब तक उन्हें इंसाफ नहीं मिलता, और सरकार इसको लेकर अध्यादेश नहीं लाती, तब तक वो 13 प्वाइंट रोस्टर के खिलाफ और 200 प्वाइंट रोस्टर की बहाली के लिए जंग जारी रखेंगे.

5 मार्च को बहुजन समाज का भारत बंद

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नई दिल्ली। दलित, आदिवासी और पिछड़े समाज के साथ हो रहे अत्याचार और उनके अधिकारों पर डाका डालने की कोशिश के खिलाफ तमाम बुद्धीजिवियों और बहुजन समाज के भिन्न-भिन्न संगठनों ने 5 मार्च को भारत बंद का ऐलान किया है. इस दौरान देश भर में मौजूद बहुजन समाज के लोगों से इस बैठक में शामिल होकर वंचित तबके के अधिकार को और संविधान को बचाने की गुहार लगाई गई है. इसका आयोजन संविधान बचाओ संघर्ष समिति सहित तमाम संगठनों ने किया है.

राजधानी दिल्ली सहित देश के तमाम हिस्सों में बड़ी संख्या में लोग इसकी तैयारियों में जुट गए हैं. खास तौर पर उच्च शिक्षा में अनुचित रोस्टर प्रणाली को लागू किए जाने के खिलाफ उच्च शिक्षा के शिक्षकों और शोधार्थियों में खासा रोष है. तो वहीं जंगल से बेदखल करने को लेकर आदिवासी समाज भी गुस्से में है. वर्तमान वक्त में देश के संविधान पर भी तमाम हमले हो रहे हैं, जिसकी वजह से देश के वंचितों के अधिकारों पर संकट गहरा गया है. इसको लेकर पूरे बहुजन समाज के लोग सड़कों पर आने की तैयारी में हैं.

मीडिया का वॉर हिस्टीरिया

भारतीय मीडिया ने बालाकोट में भारतीय सेना की कार्रवाई के बाद हुई मौतों के आंकड़ों पर जो खबर चलाई, वो एजेंडा सेटिंग का हिस्सा था. संख्या क्या है कोई नहीं जान पाएगा, जब तक पाकिस्तान आधिकारिक तौर पर नहीं बता दे. लेकिन वह क्यों बता देगा? पत्रकार किसी खास पार्टी को लाभ पहुंचाने के मकसद में फंस गए या उस मुहिम का हिस्सा बन गए ये वही जाने. मेरे हिसाब से भारत ने पाकिस्तान में घुसकर कर हमला किया, यही महत्वपूर्ण था और पाकिस्तान पर शुरुआती दवाब बनाने के लिए काफी था. आगे की लड़ाई कूटनीतिक ही होनी थी. कितने मरे, यह सिर्फ उनके लिए था जिनको इस उन्माद को वोट में परिवर्तन करना या होता दिख रहा था.

लोकतंत्र में कोई सवाल सत्ता पक्ष से नहीं पूछा जाना अहितकर होता है. दुर्भाग्य से सोशल मीडिया पर सवाल पूछने वाले ट्रोलर्स के निशाने पर रहते हैं. फिर, अगर सत्ता पक्ष इस कार्रवाई को वोट में बदलना चाहता है तो विपक्ष को भी सवाल पूछने का पूरा हक है. तीनों सेना के प्रमुखों ने अपनी पीसी में कभी भी संख्या का जिक्र नहीं किया. फिर मीडिया तथाकथित मौतें क्यों जारी करता रहा, यह बड़ा सवाल है. सेना ने संख्या नहीं बताई तो क्या सेना का शौर्य घट गया? इसके उलट सेना के प्रति लोगों की आस्था और मजबूत हुई है. मीडिया का वॉर हिस्टीरिया सिर्फ वोट के मकसद से है. असली युद्ध अब कूटनीतिक तरीके से लड़ा जाता है. हम पहले ही चार युद्ध जीत चुके हैं. एक और जंग जीत जाएंगे, उससे क्या पाकिस्तान ठीक हो जाएगा? पाकिस्तान मेरी समझ से कूटनीतिक तरीके से ही दवाब में आएगा. उस पर आर्थिक, व्यापारिक पाबंदी से लेकर दूसरे दवाब बनाने होंगे.

बहरहाल इस दिशा में भारत बेहतर प्रयास कर सकता है. कर भी रहा होगा, लेकिन चुनावी एजेंडा बाकी सारी बातों पर हावी है. यह बहुत बुरा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सर्वदलीय बैठक तक में नहीं जाते हैं. निश्चित तौर पर हमारे लिए अभिनंदन का लौटना न सिर्फ जेनेवा संधि की जीत है, बल्कि गर्व का विषय है. पर यह दुर्भाग्य है कि विंग कमांडर अभिनन्दन जब पाकिस्तान से आ रहे होते हैं, तब दिन भर मीडिया वाघा बॉर्डर पर तो रहता है, लेकिन उसी दिन पांच अर्धसैनिक बल और पुलिस की मुठभेड़ में मौत हो जाती है और मीडिया उस तरफ कैमरा तक नहीं घुमाना चाहता है, क्यों? क्योंकि शोक कभी वोट पैदा नहीं करता, वोट उन्माद पैदा करता है. मीडिया और प्रधानमंत्री एक दूसरे के पूरक हैं. मीडिया उन्माद और वॉर हिस्टीरिया पैदा कर रहा है, तो इसका लाभ उठाकर नरेंद्र मोदी अपने चुनावी कार्यक्रम को अश्वमेघ घोड़ा की तरह दौड़ा रहे हैं, लेकिन उनसे पूछा जाने वाला कोई सवाल सेना के खिलाफ बताया जाता है. यह दरअसल उनकी राजनीति के प्रति उन्माद पैदा करता है.

  • लेखक पत्रकार रहे हैं. फिलहाल शिक्षा जगत से जुड़े हैं.

पीएम मोदी ने वही किया जिसका अंदेशा था

इंडिया टुडे कनक्लेव में पीएम मोदी

पीएम मोदी ने सेना की उपलब्धि को ठीक उसी तरह भुनाया जिसका अंदेशा था. इंडिया टुडे कॉनक्लेव में वो ठीक वही बोले जिसका अंदाज़ा था. उन्होंने मोदी विरोध और देश विरोध एक कर दिया. खुद पर उठ रहे सवालों को सेना के शौर्य और क्षमता पर प्रश्न बना दिया. मोदी सरकार के राजनीतिक फैसलों पर विपक्षियों के एतराज़ को आतंकियों पर हो रही कार्रवाई पर ऐतराज़ बना डाला.

ये बेहद खतरनाक रास्ता है. नरेंद्र मोदी उस तरफ चल पड़े हैं. एक सीधी-सीधी सैन्य तानाशाही होती है जिसमें सेनाध्यक्ष ही राष्ट्राध्यक्ष बन जाता है. आधा मुल्क सेना की ताकत से डर कर विरोध नहीं करता और बाकी आधा उस वरदी के सम्मान में मूक रहता है. भारत सौभाग्यशाली है कि इस तरह की तानाशाही उसने कभी देखी नहीं लेकिन मोदी दूसरी तरह से इसी चीज़ को देश और अपने विरोधियों पर लाद रहे हैं.

अपने हर फैसले के बचाव में सेना, सेना की क्षमता, सेना के सम्मान को ढाल बनाना खुद ही सेना का अपमान है. वैसे भी नरेंद्र मोदी ‘देशविरोध’ या ‘देश के अपमान’ पर जो सबक कॉन्क्लेव में खड़े होकर दे रहे थे मेरी निजी राय में उन्हें ये नैतिक अधिकार नहीं है. उनके गुजरात शासन में भारत ने जो कुछ 2002 में झेला उसकी कालिख मिटी नहीं है. देश ज़्यादा शर्मिंदा तब होता है जब अपने ही सिद्धांतों के खिलाफ हो रही किसी वारदात का गवाह बनता है. उनका अपना राजनैतिक प्रादुर्भाव उस दुर्घटना का परिणाम है. किसी को देशहित या देशविरोध समझाने की क्लास लेने की उन्हें कतई ज़रूरत नहीं है. इस देश का हर व्यक्ति चाहे वो किसी भी दल, धर्म, जाति, लिंग, राज्य से संबंध रखता हो देश का भला ही चाहता है, हां तौर-तरीके जुदा हो सकते हैं.

बाकी सेना के ‘कुछ ज़्यादा ही’ इस्तेमाल को लेकर मेरी फिक्र को कृपया मोदी से जोड़कर सीमित करके ना देखें, क्योंकि मोदी कल रहें या ना रहें मगर इस फॉर्मूले की सफलता नए प्रधानमंत्रियों को इसके इस्तेमाल के लोभ में ज़रूर डालती रहेगी. ये ज़्यादा चिंताजनक है.

  • टीवी पत्रकार नितिन ठाकुर के फेसबुक वॉल से