एमपी में बसपा को लगा बड़ा झटका…

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बहुजन समाज पार्टी को झटका लगा है. बीना और खुरई से विधानसभा चुनाव लड़ चुके पार्टी के वरिष्ठ नेता सुरेश पटेल अपने समर्थकों सहित बीजेपी में शामिल हो गए हैं. वे मंगलवार को सीएम शिवराज की उपस्थिति में पार्टी की सदस्यता ग्रहण करेंगे.

मध्य प्रदेश के गृहमंत्री भूपेंद्र सिंह सुरेश पटेल को सीएम हाउस लेकर जाएंगे जहां वे बीजेपी की सदस्यता ग्रहण करेंगे इस दौरान सीएम शिवराज उन्हें पार्टी की सदस्यता दिलाएंगे. बताया जा रहा है कि सुरेश पटेल पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व से नाराज चल रहे हैं जिसके चलते उन्होने यह कदम उठाया है.

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चातुर्वण्य व्यवस्था में बहुजन समाज का अस्तित्व?

भारत वर्ष में अनेक महापुरूष पैदा हुये जिनमें तथागत बुद्ध, संत रविदास, कबीर दास, साहुजी महाराज, बिरसा मुण्डा, ज्योतिबा फूले, सावित्री बाई फूले, रामास्वामी नायकर, संत गाडगे, डाॅ0 बी. आर. अम्बेडकर, जगदेव प्रसाद आदि अग्रगण्य हैं, जिन्होंने सदियों से मानवीय अधिकार से वंचित और समाज के नीचले पायदान पर खड़े लोगों के आवाज बनें. इन महापुरूषों ने बहुजन समाज के लिए रोटी, कपडा़ और मकान की लड़ाई नहीं लड़ी है, बल्कि भारत देश में करीब साढे चार हजार वर्ष पहले बनाई गयी अमानवीय एवं घिनौनी जाति व्यवस्था (सामाजिक व्यवस्था) के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी.
मानवता विरोधी वर्ण/जाति व्यवस्था:
हमारे तमाम महापुरूष इस मानवता विरोधी वर्ण/जाति व्यवस्था एवं अन्य सामाजिक बुराइयों के विरूद्ध संघर्ष करते रहे. इन लोगों ने इस भेदभाव जनित वर्ण व्यवस्था को नकार दिया था और माना था कि जिस प्रकार गंदी नाली के बीच खड़ा होकर स्वच्छ पानी पीने की उम्मीद नहीं कर सकते, उसी प्रकार इस जाति व्यवस्था में रहकर हम कभी मान-सम्मान, इज्जत, प्रतिष्ठा, समानता, स्वतंत्रता, बराबरी और न्याय की उम्मीद नहीं कर सकते हैं और न ही कभी स्वाभिमान की जिन्दगी जी सकते हैं. क्योंकि यह सामाजिक व्यवस्था शूद्र समाज ;ैब्ए ैज्ए व्ठब्द्ध को मानवीय अधिकार से वंचित करने का आदेश देता है. इस व्यवस्था में जो जाति कथित रूप से जितना उॅची है उसी हिसाब से समाज में उसे मान-सम्मान और इज्जत प्रतिष्ठा दी जाती है. इसमें योग्यता की कोई कीमत नहीं है. वर्ण व्यवस्था के अन्तर्गत शुद्र समाज आज भी मानसिक रूप से गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ है. हमें आज भी एहसास नहीं हो रहा है कि चातुर्वण्र्य व्यवस्था में मनुवादियों द्वारा रचे गये धर्म रूपी काली कोठरी में कैद हैं. इसमें हमें सतत अपमान मिलता है और रह रह कर अत्याचार एवं बेइज्जत भी किया जाता है फिर भी इसी में जीने को अभ्यस्त अथवा मजबूर है. ?
बहुजन समाज अपना इतिहास नहीं जानते.
बाबा साहब ने कहा था ‘‘जो व्यक्ति अपना इतिहास नहीं जानता है, वह व्यक्ति अपना भविष्य का निर्माण नहीं कर सकता है. हम अपने आपको जानने की कोशिश नहीें करते हैं. सच्चाई यह है कि हमने अपने महापुरूषों के विचारों को नहीं पढ़ा है, न समझा है और न ही उनके विचारों से प्रेरणा लेकर सामाजिक और आर्थिक गुलामी से मुक्ति पाने का प्रयास किया है. क्या हम कभी महसूस या अनुभव करते हैं कि हमारे पूर्वज गुलामी की जिन्दगी जीने के लिए मजबूर क्यों थे ? सदियों से वे नारकीय एवं जलालत की जिन्दगी जीने के लिए विवश थे. ऐसी जीवन जीने का एक मात्र कारण था चातुर्वण्र्य व्यवस्था, जिसमें हम आज भी पल रहे हैं, वही गुलामी हम आज भी झेल रहे हैं और न संभले तो आने वाली पीढ़ी भी यही गुलामी जीने के लिए विवश रहेगी. यह सामाजिक गुलामी का क्रम पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहेगा. क्या हमने कभी विचार किया है कि इस गुलामी से कैसे मुक्त हो सकते हैं ?
बाबा साहब ने जीवन भर हिन्दू सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई लड़ी और इसमें सुधार करने का भी प्रयास किया लेकिन चातुर्वण्र्य व्यवस्था के ठेकेदारों ने कहा कि एक अछूत व्यक्ति हिन्दू धर्म को सुधारने की बात करता है यह कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता. तब बाबा साहब ने कहा कि हिन्दू धर्म को सुधारा नहीं जा सकता है इसे सिर्फ नकारा जा सकता है. बाबा साहब ने हमें नया मार्ग देने के लिए 14 अक्तूबर 1956 (अशोक धम्म विजय दशमी) को हिन्दू धर्म को त्याग कर बौद्ध धर्म को स्वीकार कर लिये. उन्होंने प्रेरणा देकर चले गये कि बौद्ध धर्म में ही व्ठब्ए ैब्ए ैज् को समानता, भाईचारा, न्याय एवं स्वतंत्रता मिल सकता है. बहुजन समाज को अपना इतिहास पढ़ना होगा और उससे प्रेरणा लेने की आवष्यकता है. अपने महापुरूषों के विचारों को अपनाना होगा और उनके बताये हुये मार्ग पर चलना भी होगा. तभी हमारी मुक्ति संभव है.
चातुर्वण्र्य व्यवस्था में बंधे शूद्र और शोषण में उनका जीना
जिस चातुर्वण्र्य व्यवस्था ने हमें कभी अपना नहीं माना, उसने हमें कभी स्वीकार नहीं किया और इसमें हमें कभी मानवता का दर्जा नहीं दिया, फिर भी हम उसेे अपना मान रहे हैं? ऐसे जलालत की जिन्दगी जीने के लिए कब तक मजबूर और लाचार बने रहेंगे? यह मजबूरी कब तक पीढ़ी दर पीढ़ी बनी रहेगी? यह अपमान और कलंक अपने माथे पर रख कर कब तक विवश की जिन्दगी जीते रहेंगे. क्या हम कभी अपने आप से प्रष्न करते हैं कि इस अपमान और कलंक रूपी बोझ से कैसे मुक्त होंगे? हिन्दू धर्म में वर्ण है, वर्ण में शुद्र, शुद्र में जातियाॅ, जातियों में क्रमिक उॅच नीच की व्यवस्था जिसमें अपने से नीचे वाली जातियों पर अत्याचार और शोषण करना अपना अधिकार समझता है. हिन्दू धर्म में जाति रूपी क्रमिक दासता की व्यवस्था में शोषित व्यक्ति कभी भी गौरवान्वित महसूस नहीं कर सकते हैं और न वह स्वाभिमान की जिन्दगी जी सकते है. ऐसी जलालत भरी जिन्दगी में वे गर्व से कैसे कह सकते हैं कि हम हिन्दू हैं??? हिन्दू धर्म में मरी हुई गाय का महत्व ज्यादा है और जिन्दा इन्सानों की कीमत कम है.
धर्म का आधार लेकर शूद्र समाज का शोषण:
चातुर्वण्र्य व्यवस्था में सैकड़़ो पीढ़ियों से जन्म देना माता-पिता का काम था लेकिन उनके बच्चों के जीवन जीने का निर्धारण चातुर्वण्र्य व्यवस्था द्वारा किया जाता था. इस व्यवस्था में मूलवासियों को अपना जीवन जीने की स्वतंत्रता नहीं थी. जब तक हम अपना जीवन का महत्व नहीं समझेंगे तब तक अपना जीवन जीने का नियंत्रण खुद नहीं कर सकते हैं. हमारी दयनीयता की स्थिति यह है कि हम इंसान हैं या नहीं हैं, इस बारे में भी हमें संदेह हो जाता है. अगर हम इंसान हैं तो फिर हमें इस समाज में इंसान का दर्जा क्यों नहीं दिया जा रहा है? क्यों हमारे साथ हर कदम पर भेदभाव होता है? हमारे उपर बेवजह अत्याचार क्यों होता है? बिना कोई अपराध के, बिना कोई बुरा बर्ताव किये हमसे घृणा क्यों करता है? खुद के परिश्रम से हम आगे बढ़ना चाहते हैं तो हमें क्यों रोका जाता है?
अपनी कमाई के पैसे से कपड़ा पहनते हैं, जमीन खरीदते हैं, मकान बनाते हैं, गाड़ी खरीदते हैं तो तथाकथित सवर्णों को तकलीफ क्यों होती है? हमारी तरक्की होने से शोषक जातियों को कष्ट होता है. जब हम अपना हक और अधिकार की मांग करते हैं तो वे इसे अपने स्वाभिमान के खिलाफ समझते हैं. इसे रोकने के लिए धर्म का सहारा लेते हैं और समझते हैं कि तुम्हारी यह मांग हमारे हिन्दू धर्म व्यवस्था के खिलाफ है. शूद्रों के विकास होने से चातुर्वण्र्य व्यवस्था खतरे में पड़ने लगती है. इसलिए तथाकथित सवर्ण हमारे साथ भेदभाव, दुव्र्यवहार, अपमान, और अत्याचार करता है और हमारी उन्नति का हर संभव रास्ता रोकता है. हमारे साथ वह अन्याय करता है इसके लिए वह कभी अफसोस नहीं करता है. हमारे साथ अन्याय करना वह अपना धर्म समझता है. धर्म का सहारा लेकर सवर्ण हमारा शोषण करता है. धर्म के आधार पर ही हमें नीच और अछूत बनाये हुये है.
बीमारियों से भरे चातुर्वण्र्य व्यवस्था से हम बाहर निकलें.
शूद्र समाज जो इस देश का मूलवासी है. चातुर्वण्र्य व्यवस्था के अन्तर्गत वह आज भी सामाजिक और आर्थिक रूप से गुलाम बने हुये हैं. शूद्र समाज की सबसे बड़ी विडम्बना है कि उसेे गुलामी का एहसास नहीं हो रहा है. इस समाज को 6743 जातियों में बाॅट कर लाचार और मजबूरी की जिन्दगी जीने के लिए विवश किया गया है. इस सोपानगत सामाजिक व्यवस्था (हिन्दू धर्म) में जिस जाति को जितना नीचे स्तर पर रखा गया है वह उतना ही गरीब, लाचार, उपेक्षणीय है. और उसके साथ उतना ही भेदभाव, द्वेष और अमानवीय व्यवहार किया जाता है. इस व्यवस्था में अपने से नीचे वाली जातियों पर अत्याचार करना और उन्हें दबा कर रखने में तथाकथित उच्च जाति के लोग अपने को गर्व महसूस करते हंै. चातुर्वण्र्य व्यवस्था के पोषक लोग बराबर कहते रहते हैं कि यह कथित सनातन और समृद्ध आदर्श सामाजिक व्यवस्था है. इस व्यवस्था के समर्थक इसे मजबूत बनाये रखना चाहते हैं क्योंकि इसमें जातीय श्रेष्ठा के आधार पर उसे हरामखोरी और मान-सम्मान फोकट में मिलता है. इस व्यवस्था में मानव के एक बड़े हिस्से को दूसरे मानव वर्ग द्वारा इंसान का दर्जा नहीं दिया जाता. इस धर्म आधारित सामाजिक व्यवस्था में उॅच्च नीच की भावना के कारण जातिगत भेदभाव और अत्याचार होता रहता है. हिन्दू धर्म के ब्राह्मण तुलसीदास द्वारा रचितकथित पवित्र ग्रंथ रामचरितमानस में आदेश दिया गया है कि ‘‘पूजये विप्र शीलगुण हीना, पुजिये न शुद्रगुणज्ञान प्रवीणा’’. अर्थात हिन्दू धर्म का कानून कहता है कि सवर्ण यदि आचरण-व्यवहार से गिरा हुआ है फिर भी वह पुज्यनीय, मान-सम्मान पाने योग्य है और शुद्र (ैब् ैज्ए व्ठब्) कितना भी ज्ञानी है आचरण और व्यवहार से निपुण है फिर भी वह मान-सम्मान पाने का हकदार नहीं है. इसी रामचरितमानस में कहा गया है-‘‘ढोल, गॅवार, शूद्र, पशु, नारी सकल ताड़न के अधिकारी’’. अर्थात ढोल, गॅवार, शूद्र पशु, नारी ये सभी अपमानित होने और प्रताड़ना पाने के हीे लायक हैं.
शूद्र समाज को मानसिक गुलाम बनाने के लिए ही इस तरह के धार्मिक ग्रंथों की रचना की गयी है. यह धार्मिक कानून हमारे पूर्वजों के उपर जबरदस्ती थोपा गया है. इस काले कानून को भारतीय संविधान के द्वारा खत्म कर दिया गया है परन्तु धार्मिक व्यवस्था के ठेकेदारों ने यह काला कानून आज भी व्ठब्ए ब्ैए ैज् के उपर अप्रत्यक्ष रूप से लागू किया हुआ है. चार्तुवण्र्य व्यवस्था के ठेकेदार यह घिनौना कानून हमारे उपर लागू करता है तो दोषी वह नहीं है, बल्कि दोषी हम हैं कि इस काला कानून को अपने उपर लागू करने देते हैं और हम इसे पूरे मन से सहज स्वीकार कर लेते हैं तथा आॅख बंद करके इसका समर्थन भी करते हैं. कभी हम खुल कर विरोध करने का साहस नहीं दिखाते हैं. परिवार, समाज को इस घिनौनी व्यवस्था से मुक्त करने का कभी प्रयास नहीं करते हैं. फिर भी हम इस व्यवस्था में समानता, स्वतंत्रता, भाईचारा और न्याय की आशा लगाये बैठे हैं ?
आरक्षण का सिकुड़ना और वर्तमान शिक्षा व्यवस्था का चैपट होना
बाबा साहब ने हमें जाति बंधन से मुक्त होने के लिए कहा था परन्तु हम पुनः जातिगत बंधन में बंधते जा रहे हैं. हमें जातियों में बाॅट कर हमारा सब कुछ समाप्त कर दिया गया है. जब तक हम जातियों में बंटे रहेंगे तब तक चातुर्वण्र्य व्यवस्था मजबूत बनी रहेगी. हमारा बर्बादी का सबसे बड़ा कारण जातियों में बंटे रहना है. जिसका परिणाम हम देख रहे हैं कि जो भी हमें अधिकार मिला था वह धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहे हैं, छीने जा रहे हैं और, यही हाल रहा तो आने वाले समय में हमारी पीढ़ी अधिक बुरा परिणाम झेलने के लिए मजबूर होगी. बाबा साहब का दिया हुआ आरक्षण दिन प्रतिदिन संकुचित और समाप्त हो रहा है. सरकारी व्यवस्था के अन्तर्गत माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा तो बदहाल है ही, व्ठब्ए ैब्ए ैज् को आगे बढ़ने का जो मुख्य आधार सरकारी प्राथमिक शिक्षा, मूलभूत शिक्षा व्यवस्था है, उसे एक सोची-समझी साजिश के तहत नकारा और पंगु बना दिया गया है. स्कूलों के शिक्षकों को जनगणना, टीकाकरण, चुनाव आदि गैर शैक्षणिक कार्यो में लगाकर पठन-पाठन को बाधित किया जाता है. प्राथमिक सरकारी स्कूलों में चलाई जाने वाली महत्वाकांक्षी पोषाहार योजना (खिचड़ी योजना) तो शिक्षा व्यवस्था को चैपट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है. सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के माता-पिता कभी नहीं पूछते हैं कि स्कूल में पढ़ाई क्यों नहीं हो रही है ? जबकि बच्चों को एक दिन पोषाहार नहीं मिलेगा तो शिक्षक से अनेक तरह के प्रश्न करने लगेंगे. स्कूल जाने वक्त माॅ अपने बेटा-बेटी से पूछती है कि प्लेट ले जा रहा है कि नहीं ? लेकिन माॅ बच्चों से कभी नहीं पूछती है कि बैग में सभी किताब ले जा रहा है कि नहीं ? इसलिए शिक्षक भोजन व्यवस्था में उलझे रहते हैं तो छात्र-छात्राएॅ खाने-पीने में व्यस्त रहते हैं. सरकारी स्कूलों में पढ़ाई एच्छिक व गैरजरूरी गतिविधि बन कर रह गई है. सरकारी स्कूलों में (SC, ST, OBC) के अधिकांश बच्चे पढ़ाई करते हैं, जहाॅ पढ़ाई नही के बराबर होती है. जबकि प्राइवेट स्कूलों में तथाकथित सवर्ण समाज के अधिकांश बच्चे पढ़ते है, जहाॅ की पढ़ाई उच्च स्तरीय एवं गुणवत्तापूर्ण होती है. विचारणी प्रश्न है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ा हुआ बच्चा प्राइवेट स्कूलों में पढ़े हुए बच्चों के साथ प्रतियोगिता में बराबरी कैसे कर सकते है? सदियों से लेकर अंग्रेजो का शासन आने तक भारत के शूद्र समाज एवं समूचे समाज की स्त्रियों को प्रायः शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार नहीं था. जबकि अप्रत्यक्ष रूप से शुद्र समाज को आज भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में शिक्षा से वंचित करने का प्रयास किया जा रहा है.
हमारा मार्गदाता हैं तथागत बुद्ध और बाबा साहब.
अगर हम मान-सम्मान, इज्जत, प्रतिष्ठा और स्वाभिमान के साथ जीवन जीना चाहते हैं तो एक मात्र रास्ता है तथागत गौतम बुद्ध का बताया हुआ धम्म मार्ग को स्वीकार करना. इस मार्ग पर चलने से खुद का जीवन में बदलाव तो होगा ही आने वाली पीढ़ियों को सामाजिक गुलामी से मुक्ति भी मिल जायेगी. तथागत बुद्ध हमारे मार्गदाता हैं और जो व्यक्ति उनके मार्ग पर चलते हैं उनके जीवन में सुख, शांति एवं खुशहाली मिलना निश्चित है. तथागत गौतम बुद्ध का धम्म मार्ग अपना कर कई देश विकसित हो गए. वहाॅ की जनता उनके मार्ग पर चल कर सुख, शांति एवं समृद्धि का जीवन जी रहे हैं. परन्तु दुर्भाग्य है शुद्र समाज का कि तथागत बुद्ध एवं बाबा साहब को नहीं समझ रहे हैं और न ही उन्हें अपना मार्गदाता मान रहे हैं. बल्कि उनके बताये हुये रास्ते और उनके विचारों को ठुकरा रहे हैं और अनसुना कर दिये हैं. बाबा साहब का आरक्षण और सुविधाएॅ मुझे बहुत अच्छा लगा लेकिन उनके विचार और मार्गदर्शन हमें इतना गन्दा लगा कि उससे हम बहुत दूर भागते गये. जिसका परिणाम देख रहे हैं कि बहुजन समाज को जिस गति से आगे बढ़ना चाहिए था वह नहीं बढ़ रहे हंै बल्कि समस्या और गंभीर होता जा रहा है और बाबा साहब द्वारा दिया गया अधिकार दिन प्रतिदिन समाप्त होते जा रहा है.
साथियो बाबा साहब की विरासत को संभाल कर न रखने एवं उनके सपनों की दिशा में काम न करके हम बाबा साहब को धोखा नहीं दे रहे हैं बल्कि हम अपने आप को धोखा दे रहे हैं. हम अपनी जमीर के साथ न्याय नहीं कर रहे हैं. हम अपनी आने वाली पीढ़ियों (बेटा, पोता…….) के साथ गद्दारी कर रहे हैं. हमारी संतानें, हमारे बेटी-बेटा ही हमसे एक दिन सवाल करेगें कि बाबा साहब जैसे व्यक्ति ने अकेले दम पर इस समाज की अमानवीय एवं घिनौनी दशा से उबार कर खुशहाली, समृद्धि एवं समानता का अधिकार दिलाया और आज हमलोग करोड़ों की संख्या में रहकर भी उनके दिये गये अधिकार को बचा कर नहीं रख पा रहे हैं तो धोखेबाज और गद्दार होने का प्रमाण-पत्र हमलोग अपनी संतानों से ही प्राप्त करेंगे…..
भवतु सब्ब मंगलम् !
युगेश्वर नन्दन (नागसेन)

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मंदिर में पूजा करने से रोका तो 50 से ज्यादा लोगों ने बदला धर्म

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मन्दिर

नई दिल्ली। दिल्ली से सटे गाजियाबाद में 50 से ज्यादा लोगों के धर्म परिवर्तन करने का मामला सामना आया है. आरोप है कि एक मंदिर के पुजारी ने एक जाति विषेश को पूजा करने से रोका. इतना ही नहीं पुजारी पर गुस्से में आकर पीटने की धमकी देने और जाति का नाम लेकर गाली देने का भी आरोप है.

मामला 11 सितंबर का है. साहिबाबाद में डिफेंस कॉलोनी में रहने वाले हिमांशु कुमार मंदिर में बजरंग बली की मूर्ति पर चोला चढ़ाने गए थे. हिमांशु का कहना है कि मंदिर के पुजारी ने उन्हें ना सिर्फ चोला चढ़ाने से मना किया बल्कि उनके खिलाफ जातिसूचक शब्दों का भी इस्तेमाल किया और विरोध करने पर मारपीट करने को तैयार हो गया.

पुजारी की हरकत से आहत होकर हिमांशु अपने घर गए और अपनी बात सबके सामने रखी. जिसके बाद इलाके के सभी लोग एक जगह पर जुटे और लोगों ने एकसाथ बौद्ध धर्म अपनाने की बात तय की और रविवार के दिन एकसाथ 50 से ज्यादा लोगों ने गाज़ियाबाद के नवयुग बाज़ार के पास अंबेडकर मैदान मे बौद्ध धर्म अपना लिया.

इसके पहले पिछले शनिवार को लोगों ने पुजारी के खिलाफ पुलिस में भी शिकायत दी थी, लेकिन जब पुजारी को मंदिर से हटा दिया गया तो लोगों ने अपनी शिकायत वापस ले ली.

इन आरोपों पर इलाके के लोगों की अलग-अलग राय है. कुछ का कहना है की पुजारी 8 वर्षों से है और वो कभी भेदभाव नहीं करते, जबकि कुछ आरोपों को सच मान रहे हैं. मंदिर का पुजारी इन आरोपों को गलत बता रहा है.

पीड़ित का कहना है कि बौद्ध धर्म में किसी का अपमान नहीं किया जाता. इसलिए उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाया है. हालांकि इस विषय में मंदिर की तरफ से कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं है. वहीं बौद्ध धर्म की दीक्षा दिलवाने वाले धर्म प्रचारक का कहना है कि 65 से 70 लोगों को बौद्ध धर्म की दीक्षा दी गई है.

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जातीय नफरत से फिर हारा प्यार, मार दिया गया प्रणब

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कहते हैं प्यार से खूबसूरत शै कुछ भी नहीं. इसी तरह इस दुनिया में जातिवाद और ब्राह्मणवाद से बदत्तर, निर्मम और घिनौनी व्यवस्था भी कोई और नहीं है. जाति को लेकर हुए एक और ऑनर किलिंग का मामला सामने आने के बाद ऐसा कहा जा सकता है. तेलंगाना के नलगोंडा के 24 साल का दलित युवक प्रणय सिर्फ इसलिए मार दिया गया क्योंकि उसने एक ऊंची जाति सवर्ण समाज की वैश्य लड़की अमृथा से प्यार किया था. बचपन की दोस्ती और फिर अफेयर के बाद 8 महीने पहले दोनों ने शादी करके ज़िंदगी भर साथ रहने का फैसला किया था. पर अमृथा के ऊंची जात वाले माँ-बाप को बेटी का दलित लड़के से रिश्ता कतई मंजूर नहीं हुआ. लड़की के परिवार की धमकियों और जान के खतरे को देखते हुए दोनों अपने शहर से दूर दूसरी जगह भी रहने चले गए थे. शादी के बाद से ही लड़की के पैरेंट्स ने प्रणय और उसके परिवार को लगातार टॉर्चर करना शुरू कर दिया. प्रणय पर किडनैपिंग, रेप, धमकी, बलवा जैसे कई आरोपों में एफआईआर भी करवाई लेकिन अमृथा के हरकदम पर प्रणय का साथ देने के चलते पुलिसिया कार्यवाही ज़ोर नहीं पकड़ सकी. 8 महीने के बाद गुरुवार को प्रणय की एक स्थानीय अस्पताल के सामने दिनदहाड़े धारदार हथियार से हत्या कर दी गई जब वो अपनी प्रेग्नेंट पत्नी को चैकअप के बाद अस्पताल से बाहर लेकर आ रहा था. अमृथा और प्रणय दोनों ही सॉफ्टवेयर इंजीनियर थे और वेल सेटल्ड भी. आर्थिक पक्ष मजबूत होने के बाद भी प्रणय की जाति ही उसकी जान लिए जाने कारण बन गई. आर्थिक स्थिति भारत में उतना मायने नहीं रखती जितना मायने रखता है ऊँची जात होना. अमृथा 7 महीने की प्रेग्नेंट है. दोनों इस समय आने वाले मेहमान के स्वागत की तैयारी कर रहे थे, भविष्य के सपने बुन रहे थे. पर जातिवाद-ब्राह्मणवाद न ही प्यार देखता है ना इंसानियत. उसे सपने, वजूद, व्यक्ति, भविष्य कुछ नहीं दिखता. अमृथा और प्रणय जैसे लाखों की खुशियां जातिवाद की निर्मम व्यवस्था की भेंट चढ़ गई. सवर्ण बेहतर समाज बनाना तो दूर की बात, अब तक इंसान भी नहीं बन सके हैं. लोग कहते हैं जमाना बदल गया है, बदला तो फिर ये क्यों???

 दीपाली तायड़े

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जेएनयू में लेफ्ट की जीत के मायने

JNUSU के चुनाव में यूनाइटेड लेफ्ट ने भारी बहुमत से विजय हासिल है. इस बार चुनाव में चार लेफ्ट पार्टी साथ में थी, इनके बीच गठबंधन था . ये चार लेफ्ट पार्टी हैं – AISA , DSF . SFI और AISF . पिछले साल भी तीन लेफ्ट पार्टी मिलकर चुनाव लड़ी थी – AISA , SFI , और DSF . इस चुनाव में AISF भी इस गठबंधन में शामिल हो गया है. पिछले साल AISF ने अलग रहकर चुनाव लड़ा था.

पिछले साल चुनाव में जब तीन लेफ्ट पार्टी साथ में थी, अध्यक्ष पद पर यूनाइटेड लेफ्ट को 1506 मत मिले थे . ABVP दुसरे और बापसा तीसरे स्थान था. ABVP को 1042 और बापसा ( बिरसा अंबेडकर फुले स्टूडेंट्स एसोसिएशन ) को 935 मत मिले थे. वाइस – प्रेसीडेंट, जनरल सेक्रेटरी और जॉइंट सेक्रेटरी सभी पद पर भी ABVP दूसरे स्थान और बापसा तीसरे स्थान पर था. इस साल प्रेसीडेंट पद पर यूनाइटेड लेफ्ट को 2151 मत मिले हैं, उसके मतो में भारी बढ़ोतरी हुयी हैं, वही ABVP और बापसा दोनों में मतों में कमी आयी है. ABVP को 972 और बापसा को 675 मत मिले हैं.

चुनाव से पहले ऐसा महसूस हो रहा था कि JNU छात्र समुदाय परिवर्तन चाहता है. इसलिए दूसरी पार्टियों को अपने पक्ष में सकारात्मक बदलाव की उम्मीद थी. अधिकतर छात्रों का मानना था कि ABVP सेंट्रल पेनल में कोई न कोई सीट जीतेगा. दूसरी तरफ, बापसा को भी उम्मीद थी कि वह पिछली साल की तुलना में और भी अच्छा प्रदर्शन करेगा . याद रहे कि बापसा पिछले दो सालो से अच्छा प्रदर्शन कर रहा है. NSUI को भी उम्मीद में था कि उसके साथ मुस्लिम ज्यादा जुड़े हैं, इसलिए वह पिछले सालो की बजाय बेहतर प्रदर्शन करेगा.

लेकिन चुनाव परिणाम ने सारे पूर्वानुमान को धता बता दी और यूनाइटेड लेफ्ट को भारी बहुमत मिला. इस बार मतदान 68 % रहा जो कि पिछली कई सालो में सर्वाधिक है. याद रहे कि 2017 में मतदान का प्रतिशत 59 % था. JNU में आमतौर मतदान 60 % से कम ही रहता है. मतदान का प्रतिशत अधिक होने से लग रहा था कि छात्र कुछ नया परिणाम देगा और वैसा ही हुआ.

समुदाय के सामने सबसे अहम मुद्दा था – ABVP को रोकने के लिए वह किस दल को चुने. ऐसे में यूनाइटेड लेफ्ट के अतिरिक्त एक विकल्प बापसा था. किन्तु बापसा के प्रेसिडेंट पद के उम्मीदवार प्रवीण थलाप्पली अपने भाषण से किसी को ज्यादा आकर्षित नहीं कर पाए. उनका भाषण और प्रश्न – उत्तर दोनों का सेशन भी बहुत साधारण रहा. वह बापसा की विचाधार को सही ढंग से छात्र समुदाय के सामने पेश नहीं कर पाए. इसका कारण यह हो सकता है कि प्रवीण थल्लापेली ने हिंदी में भाषण दिया और वेनॉन- हिंदी पृष्ठ भूमि से आते हैं. धयान रहे कि प्रेसिडेंटि अलडिबेट की स्पीच निर्णायक होती है जिसको सुनने ढेर सारी भीड़ आती है. इसका खामियाजा बापसा के अन्य उमीदवारो को भी झेलना पड़ा. प्रेसिडेंटिअल डिबेट का दिन ही चुनाव प्रचार का अंतिम दिन होता है. दूसरी तरफ, इस चुनाव में एक नई पार्टी छात्र राजद भी था जिसके उम्मीदवार जयंत कुमार थे. उन्होंने भी अपने को दलित–बहुजन राजनीति के उत्तराधिकारी रूप में पेश किया और फुले-अम्बेडकर-पेरियार–सहित सभी बहुजन आइकन का नाम लिया. उन्होंने भी छात्र समुदाय का एक बड़ा मत प्राप्त किया किन्तु वे जीतने से बहुत दूर रहे.

प्रेसिडेंटिअल डिबेट के समय ABVP के लोगो ने उस समय हो-हल्ला मचाया जब यूनाइटेड लेफ्ट के उम्मीदवार ने स्पीच देना शुरू किया जिससे कई बार डिबेट में व्यवधान पड़ा. ध्यान रहे कि कैंपस में ABVP ने कई बार हिंसा की है. जिससे छात्र समुदाय की नजर में ABVP की छवि ख़राब है. इस हिंसा का फायदा यूनाइटेड लेफ्ट को मिला. छात्र समुदाय ने सोचा कि यदि ABVP यूनियन में आ गया तो और ज्यादा हिंसा करेगा. इसलिए ABVP को रोकने के लिए यूनाइटेड लेफ्ट को ही मत दिया जाये.

ABVP की हिंसा, जयंत कुमार की दावेदारी और बापसा उम्मीदवार की साधारण स्पीच से छात्र समुदाय ने मन बना लिया कि यूनाइटेड लेफ्ट को ही मत दिया जाये. इन्ही सब कारणों से छात्र समुदाय ने यूनाइटेड लेफ्ट को ही मत देकर भारी बहुमत से विजयी बनाया.

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जातिवाद का नया रूप

बीते मार्च महीने से लेकर सितंबर महीने तक देश में जो सबसे बड़ा मुद्दा है, वह अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण एक्ट यानि आम बोलचाल की भाषा में एससी-एसटी एट्रोसिटी एक्ट है. पहले सुप्रीम कोर्ट ने इस एक्ट में संशोधन करने का फरमान जारी कर दिया. इसके खिलाफ दो अप्रैल को एससी-एसटी समाज के लोग देश भर में सड़कों पर उतर गए. वंचित तबके के तेवर देख डरी सरकार ने संसद में अध्यादेश लाकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा किया गया संसोधन वापस ले लिया. फिर क्या था, सवर्ण तबका भड़क गया और सुप्रीम कोर्ट के आदेश को फिर से बहाल करने की मांग को लेकर 6 सितंबर को प्रदर्शन कर डाला. इस पूरे धरना-प्रदर्शन और विरोध के केंद्र में जाति थी.

जाति… जिसके बारे में कहा जाता है कि वो जाति नहीं… जाति समाज की सच्चाई है. आप चाहे जितना इससे बचना चाहें, यह घूम फिर कर आपके सामने आ ही जाती है. खास कर वंचित तबके के सामने तो जाति का सवाल जन्म से लेकर मरण तक बना रहता है. गांवों में जाति के सवाल ज्यादा आते थे और माना जाता था कि महानगर जातिवाद से अछूते हैं. अगर जातिवाद है भी तो ढके-छिपे रूप में, ताकि किसी को भनक न लगे. लेकिन जातिवाद ने अब महानगरों को भी अपनी चपेट में लेना शुरू कर दिया है. बीते कुछ सालों में जातीय संघर्ष समाज के भीतर से निकल कर सड़क पर आ गया है. अब लोग जाति को अपने घर और संबंधित समाज के भीतर नहीं छोड़ रहे हैं, बल्कि वो हर वक्त उससे चिपके हुए हैं. घर के बाहर.. सड़क पर भी. सड़क पर सरपट भागती इन गाड़ियां को देखिए… आपको खुद समझ में आ जाएगा. ये गाड़ियां सिर्फ इंसानों को नहीं ढो रही, बल्कि ये उस जातीय अहं का वाहक बन गई हैं, जिसे बार-बार दिखाने और बताने में कुछ खास तबके के लोग अपनी बहादुरी समझते हैं. आप इन गाड़ियों को गौर से देखिए. इन पर लिखी पहचान को देखिए. ब्राह्मण, राजपूत, जाट, गुज्जर जैसे जातीय पहचान लेकर चलने वाली गाड़ियां पहले इक्का-दुक्का दिखती थीं लेकिन यह चलन अब आम हो गया है.

हालांकि उच्च जातीय पहचान लिए इन लोगों के बीच आपको वो जातियां भी दिख जाएंगी जो कल तक अपनी जाति बताने से हिचकती थी. ऑटो पर लिखा चौरसिया और सायकिल पर लिखा जाटव जी, कुछ ऐसे ही उदाहरण हैं. हालांकि गाड़ियों से पहचान को जोड़ने का सिलसिला कोई नया नहीं है. तमाम गाड़ियों में आपको ईश्वर, अल्लाह, जीसस, गुरुनानक और बुद्ध आराम से देखने को मिल जाएंगे. लेकिन हाल तक ये गाड़ियों के भीतर ड्राइविंग सीट के सामने लगते रहे थे. हर कोई अपनी आस्था के हिसाब से तस्वीरों और नाम का चुनाव करता था. हालांकि यह अलग विषय है कि बावजूद इसके हर रोज सड़कों पर होने वाले एक्सिडेंट में कोई कमी नहीं आई है. खैर, यह आस्था का मुद्दा हो सकता है. लेकिन यही ईश्वर जब गाड़ियों से बाहर निकल आते हैं, क्या तब भी इसे महज आस्था माना जाए? शायद नहीं. वजह चाहे जो हो, ये दिखाता है कि राजनीति ने समाज को कितना बांट दिया है. समाज के भीतर बढ़ता जातिवाद एक बेहतर समाज के निर्माण के लिए ठीक नहीं है.

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भीम आर्मी के जांबाज साथी एडवोकेट चन्द्रशेखर रावण के जज्बे को भीम सलाम…..

बहुजनों के बीच अब चन्द्रशेखर रावण किसी पहचान के लिए मोहताज नही हैं.भीम आर्मी के जांबाज साथी एडवोकेट चन्द्रशेखर रावण जी अब राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा नही रह गए हैं लिहाजा उन्हें रिहा कर दिया गया है.एक सुकून मिला है यह जानकर कि चन्द्रशेखर रावण जी को रामराज्य वाली सरकारों ने रिहा कर दिया है.

यूपी और देश मे सच मे रामराज्य आ गया है.स्वभाविक है कि रामराज्य आएगा तो बहुजन को शम्बूक,एकलब्य,रावण,बालि, महिषासुर,हिरणकश्यप की तरह ट्रीट किया जाएगा.आखिर रामराज का मतलब ही तो यही है कि “पूजिय विप्र शीलगुन हीना, शूद्र न गनगुन ज्ञान प्रवीना.”

चन्द्रशेखर रावण बकालत पास हैं.उन्हें भारतीय संविधान की समझ है.वे संविधान निर्माता बाबा साहब डॉ भीम राव अम्बेडकर जी के अनन्य समर्थक हैं लेकिन जाति से अनुसूचित हैं तो वे देश के लिए खतरा हैं क्योंकि वे संविधान पढ़ अपने अधिकार व कर्तव्य जान गए हैं और उसके इम्प्लीमेंट हेतु जद्दोजहद कर रहे हैं.वे यह समझ रहे हैं कि उनका हजारो वर्ष से वंचित समाज संविधान प्रदत्त अधिकारों से आज भी महरूम है.उन्हें यह भान है कि शिक्षित होने के बाद उनका अब यह कर्तव्य है कि वे अपने समाज को संविधान प्रदत्त अधिकार दिलाएं.वे अपने मान-सम्मान से वंचित समाज को समता का अधिकार दिलाना अपना फर्ज मान रहे हैं तो वे अभिजात्य समाज के आंख की किरकिरी तो होंगे ही.

जब भी चन्द्रशेखर रावण जैसे लोग विद्रोह करते हैं तो वे रावण,बलि,महिषासुर,शम्बूक,एकलब्य,जगदेव प्रसाद,लालू यादव आदि के रूप में समाज के सामने तिरस्कृत रूप में पेश किए जाते हैं.मुंहजोर लोग इन वंचित समाज के रहनुमाओं को अपने आपको निर्दोष सिद्ध करने का कोई अवसर भी नही देते हैं.ये इन्हें इस तरीके से प्रचारित कर डालते हैं कि सुपद ,कुपद और कुपद,सुपद नजर आने लगता है.

चन्द्रशेखर रावण ने अपने समाज के सम्मान हेतु संघर्ष किया तो वे राष्ट्र विरोधी हो गए.चन्द्रशेखर रावण को रामराज्य वाली सरकार ने मुकदमो में फंसा कर रासुका में निरुद्ध कर राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बता जेल भेज दिया.गजब का तर्क है भाई,पढ़ाया जाता है कि संविधान जलाने,फाड़ने आदि पर देश की नागरिकता तक चली जायेगी तो संविधान फूंकने वाले राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत निरुद्ध न होंगे लेकिन संविधान में लिखी बातों को लागू करने का आग्रह करने वाला रासुका में जेल चला जायेगा.

खैर जब रामराज्य है तो यह होना ही है.हां दुनिया के ग्लोबलाइजेशन के कारण चन्द्रशेखर रावण के साथ शम्बूक जैसा सलूक नही हुआ,यही गनीमत है.चन्द्रशेखर रावण जी ने जितनी बहादुरी से सारी परिस्थितियों का मुकाबला किया है वह काबिलेतारीफ है.उनकी रिहाई पर दिल प्रसन्न हुआ और उम्मीद है कि पुराने तेवर व जज्बे के साथ रावण का न्याय युद्ध जारी रहेगा.

चंद्रभूषण सिंह यादव Read it also-चंद्रशेखर रावण जेल से रिहा, भीम आर्मी समर्थकों में जबरदस्त उत्साह दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये दिए गए लिंक पर क्लिक करेंhttps://yt.orcsnet.com/#dalit-dast

छत्तीसगढ़ की इकलौती सीट जहां बसपा का कब्जा

नई दिल्ली। छत्तीसगढ़ की जैजैपुर विधानसभा बसपा का मजबूत गढ़ है. 2008 में परिसीमन के बाद वजूद में आई जैजैपुर राज्य की इकलौती सीट है जहां से बसपा के केशवचंद्र विधायक हैं. बसपा के इस किले में सेंधमारी के लिए भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के साथ-साथ अजीत जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस (JCCJ) पूरी ताकत के साथ लगी हुई हैं.

राज्य में चंद महीनों के बाद होने वाले विधानसभा होने हैं. बसपा राज्य में अपने जनाधार को बढ़ाने के लिए पूरी टीम लगा रखा है. ऐसे में पार्टी अपनी सबसे मजबूत सीट जैजैपुर को हरहाल में बरकरार रखने की कोशिश में जुटी हुई है. बसपा से मौजूदा विधायक केशव चंद्रा का टिकट पक्का माना जा रहा है. जबकि कांग्रेस और बीजेपी में दावेदारों की लंबी फहरिश्त है.

2008 के परिणाम

2008 में परिसीमन में मालखरौदा, पामगढ़, सक्ती के क्षेत्र को मिलाकर जैजैपुर विधानसभा सीट बनी. 2008 का पहला चुनाव हुआ तो पामगढ़ छोड़कर चुनाव लड़ रहे कांग्रेस प्रत्याशी राजेश्री महंत रामसुंदर दास ने यहां जीत दर्ज की. उन्होंने मालखरौदा के तत्कालीन विधायक निर्मल सिन्हा को पराजित किया था. दिलचस्प बात ये है कि बसपा दूसरे नंबर पर रही.

कांग्रेस के मंहत रामसुंदर दास को 43346 वोट मिले थे.

बसपा के केशवचंद्र को 33907 वोट मिले थे.

2013 विधानसभा के नतीजे

2013 के विधानसभा चुनाव में जैजैपुर की जनता ने आश्चर्यजनक परिणाम दिया. बसपा दूसरे नंबर से पहले नंबर पर आ गई. इसी का नतीजा था इस सीट पर केशवचंद्र ने जीत दर्ज करते हुए बसपा का खाता खोला. वे प्रदेश में बसपा के इकलौते विधायक हैं. कांग्रेस पहले नंबर से तीसरे नंबर पर पहुंच गई.

बसपा के केशवचंद्र को 47188 वोट मिले थे.

बीजेपी के डॉ. कैलाश शाहू को 44609 मिले थे.

छत्तीसगढ़ के समीकरण

आपको बता दें कि छत्तीसगढ़ में कुल 90 विधानसभा सीटें हैं. राज्य में अभी कुल 11 लोकसभा और 5 राज्यसभा की सीटें हैं. छत्तीसगढ़ में कुल 27 जिले हैं. राज्य में कुल 51 सीटें सामान्य, 10 सीटें एससी और 29 सीटें एसटी के लिए आरक्षित हैं.

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दुनिया भर में ‘ब्रांड चमार’ की धमक

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नई दिल्ली। सहारनपुर के शब्बीरपुर में जब भीम आर्मी के चंद्रशेखर आजाद रावण ने अपने गांव के सामने हाइवे पर द ग्रेट चमार का बोर्ड लगाया था तो काफी हो-हल्ला हुआ था. लोगों के लिए यह एक अजूबा था, ऐसा अजूबा जिसे उन्होंने पहले नहीं देखा था. दरअसल भारत में हजारों जातियों की भीड़ में चमार जाति को सबसे हीन माना जाता है. ऐसे में हर कोई यह देख कर हैरान था कि कोई भी ‘चमार’ होने का जश्न कैसे मना सकता है. यह सिलसिला अब आगे बढ़ चुका है. चमार शब्द एक ब्रांड के रूप में स्थापित हो गया है. आज सरकार ने भले ही दलित शब्द पर प्रतिबंध लगाने का फरमान सुना दिया है, दलित और चमार शब्द इस समाज के नई पीढ़ी के युवाओं के बीच एक ब्रांड बन चुका है. अब इस समाज के युवाओं को इस शब्द से एतराज नहीं है. आखिरी छोड़ पर खड़े समुदाय के युवा दलित औऱ चमार जैसे शब्द को एक फैशन लेबल और ब्रांड के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं. गूगल पर दलित टी-शर्ट सर्च करते ही कई स्लोगन वाले टी-शर्ट दिख जाते हैं. इन स्लोगनों में गौरव छिपा हुआ है. आप खुद देखिए.. ‘Untouchable-Property of Dalit’ और ‘Keep Calm And Say Jai Bhim’ जैसे स्लोगन्स के साथ वाली टी-शर्ट्स बड़ी संख्या में दिखाई देती हैं। अब दलित शब्द छुपाने का नहीं बल्कि गर्व करने का प्रतीक बनता जा रहा है. बात सिर्फ टी-शर्ट तक सीमित नहीं है, बल्कि अब इससे आगे बढ़ गई है. मुंबई में आर्टिस्ट सुधीर राजभर ने ‘चमार स्टूडियो’ बनाया है. इस स्टूडियों में वह हैंडबैग्स को फैशनेबल बनाते हैं. 6 महीने पहले इस स्टूडियो को कमर्शली लॉन्च करने वाले राजभर कहते हैं,- ‘इसे मैंने कई मोचियों (चमड़े का काम करने वाले) के साथ शुरू किया, उसमें अधिकतर दलित थे और अपनी छोटी-छोटी दुकानें चलाते थे. बाद में हमने चमड़े के कुछ और कारीगरों को अपने साथ जोड़ा.’ ये प्रोड्क्टस बाजार के अन्य प्रोडक्ट्स को कड़ी टक्कर देते हैं. इन डिजाइनर प्रॉडक्ट्स की कीमत 1500 से 6000 तक होती है. भारत जैसे समाज में इस तरह का बदलाव कोई छोटा बदलाव नहीं है. यह एक क्रांति है. ऐसी क्रांति जिसकी मशाल वंचित तबके के युवाओं ने जलाई भी है और थाम भी रखी है. वो इस मशाल की रौशनी में अपने समाज और शब्दों की नई परिभाषा गढ़ रहे हैं.

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चंद्रशेखर रावण जेल से रिहा, भीम आर्मी समर्थकों में जबरदस्त उत्साह

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नई दिल्ली। भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद रावण को यूपी सरकार ने जेल से रिहा कर दिया है. रावण को आज अहले सुबह तकरीबन 3.30 बजे जेल से रिहा किया गया. रावण रासुका के आरोप में पिछले तकरीबन पंद्रह महीने से जेल में बंद थे. यूपी सरकार ने रावण पर से रासुका हटा लिया है. रावण की रिहाई के दौरान जेल के बाहर उनके सैकड़ों समर्थक मौजूद थे.

बाहर आने के बाद चंद्रशेखर रावण ने उनके समर्थन के लिए मौजूद युवाओं को संबोधित किया. उन्होंने कहा कि वो जो लड़ रहे हैं वो लड़ाई विचारधारा की लड़ाई है,व्यक्तिवाद की नहीं. हम सब बाबासाहेब, फुले और बिरसा मुंडा के विचार की लड़ाई लड़ रहे हैं. इस दौरान उन्होंने सीधे-सीधे भाजपा को चुनौती दी है. उन्होंने ऐलान किया कि वो तानाशाहों को सबक सिखाएंगे. भाजपा को खुली चुनौती देते हुए उन्होंने कहा कि वो भाजपा के गुंडों को सबक सिखाएंगे. रावण ने कहा कि जो लोग 50 साल तक सत्ता में रहने का दम भर रहे हैं उन्हें हम 2019 में सत्ता से बाहर कर देंगे. हम न सोएंगे, न सोने देंगे

जेल का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि वहां समाज के छोटे-छोटे बच्चे बंद हैं. बिना किसी का नाम लिए उन्होंने कहा कि उनकी औकात नहीं कि मुझे दिन के उजाले में ले आते. बताते चलें कि चंद्रशेखर रावण की रिहाई की खबर शाम को ही फैल गई थी, जिसके बाद सहारनपुर, दिल्ली, देहरादून सहित आस-पास के कई जगहों से भीम आर्मी के कार्यकर्ता और समर्थक सहारनपुर पहुंच गए थे. गौरतलब है कि रावण को मई 2017 में राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम यानि रासुका के तहत गिरफ्तार किया गया था.

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रोबोट चिट्टी वापस आ गया है

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फिल्म रोबोट (इंथरिन) में मिशन पूरा होने के बाद प्रोफेसर वसीगरन ने अपने बनाए रोबोट चिट्टी को डिसआर्म कर दिया था. हालांकि इस बार जरूरत पड़ने पर डॉक्टर वसीगरन ने चिट्टी को फिर से एक्टिवेट कर दिया है. दरअसल वसीगरन द्वारा चिट्टी को फिर जिंदा करने के पीछे वो विशालकाय पक्षी है, जो पूरे शहर को खत्म कर देना चाहता है. वो खतरनाक पक्षी अक्षय कुमार हैं, जिनको चिट्टी यानि रजनीकांत को रोकना है.

भारतीय सिनेमा जगत की अब तक की सबसे महंगी फिल्म 2.0 का टीजर वीडियो गुरुवार को रिलीज कर दिया गया है. सुपरस्टार रजनीकांत और अक्षय कुमार स्टारर इस फिल्म का कुल बजट तकरीबन 500 करोड़ रुपये है. एस. शंकर के निर्देशन में बनी यह फिल्म उनका ड्रीम प्रोजेक्ट है. फिल्म का टीजर रिलीज किए जाने के कुछ ही मिनटों के भीतर वायरल हो गया. फिल्म के भीतर दिखाया गया वीएफएक्स विश्वस्तरीय है और इस पर दुनिया भर के 15 से ज्यादा VFX स्टूडियोज में काम किया गया है.

अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों की वजह भाजपा के नेता- यूएन रिपोर्ट

नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र यानि यूनाइटेड नेशन की एक रिपोर्ट ने भाजपा नेताओं को कठघरे में खड़ा कर दिया है. यूएन में एक रिपोर्ट सौंपी गई है जो केंद्र में सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी को परेशान कर सकती है. इस रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि बीजेपी के नेता अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ भड़काऊ बयान दे रहे हैं जिससे मुस्लिमों और दलितों पर हमले बढ़ते जा रहे हैं.

यह रिपोर्ट तेंदायी एच्यूमी ने तैयार किया है, जो यूएन में बतौर स्पेशल रिपोर्टर ऑन कंटेमपरोरी फॉर्म्स ऑफ रेसिज्म, रेसियल डिसक्रिमिशन, जेनफोबिया एंड रिलेटेड इनटोलरेंस हैं. इस पद पर नियुक्ति संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार समिति (यूएनएचआर) की ओर से किसी स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञ की ही की जाती है. इस रिपोर्ट को 2017 में यूएन आमसभा में के रिजोल्यूशन में तमाम देशों द्वारा जातिवाद, नस्लीय भेदभाव, विदेशी लोगों को नापसंद करने और असहिष्णुता पर दी गई रिपोर्ट के आधार पर बनाया गया है.

अपने रिपोर्ट में एच्यूमी ने कहा कि हिन्दू राष्ट्रवादी पार्टी भारतीय जनता पार्टी (बीजपी) की जीत को दलितों, मुस्लिमों, आदिवासी और ईसाई समाज के खिलाफ हिंसा से जोड़ा जाता है. अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ बीजेपी नेताओं की ओर से लगातार भड़काऊ बयान दिए जाते रहे हैं जिससे मुस्लिम और दलितों को निशाना बनाया गया.

यह रिपोर्ट राष्ट्रवाद की लोकप्रियता की मानवाधिकारों के लिए चुनौती के सिद्धांत पर तैयार किया गया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि असहिष्णुता को बढ़ावा देने, भेदभाव को आगे बढ़ाने से नस्लीय भेदभाव बढ़ता है और लोगों को बहिष्कार होता है. मुस्लिमों और दलितों पर हमले के अतिरिक्त स्पेशल यूएन रिपोर्टर ने विवादित नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (एनआरसी) का जिक्र किया जिसमें उन्होंने कहा कि कई देशों में राष्ट्रवादी दल अवैध अप्रवासन मामले में प्रशासनिक सुधार लेकर आए जिसमें आधिकारिक नागरिक रजिस्टर से अल्पसंख्यक ग्रुपों को बाहर कर दिया गया.

शादी के एक दिन पहले दुल्हन को छोड़ लड़के के साथ भागा दूल्हा

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यमुनानगर। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा 377 पर दिए गए फैसले के बाद हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है. हरियाणा के यमुनानगर में एक दूल्हा अपनी शादी के एक दिन पहले अपने दोस्त के साथ फरार हो गया है. जांच के बाद पता चला है कि दोनों युवकों का आपस में समलैंगिक संबंध था.

युवक यमुनानगर की कांसापुर रोड स्थित कॉलोनी का रहने वाला था. इसी महीने 11 सितंबर को उसकी शादी थी, लेकिन शादी के पहले महिला संगीत वाले दिन दूल्हा अपने नाबालिग दोस्त के साथ लापता हो गया. दूल्हे की मां ने बताया कि उनके बेटे का नाबालिग दोस्त कुछ दिनों से बेटे की शादी पर एतराज जता रहा था. एक बार फोन पर शादी न करने की धमकी भी दी.

जांच में पता लगा कि दोनों के ही परिजन कुछ माह से उनके चाल-चलन देख उन्हें परिवार से दूर कर रहे थे. दूल्हे के नाबालिग दोस्त की मां की माने तो बीते साल ही उन्होंने अपने बेटे को परिवार से बेदखल कर दिया था. पुलिस ने दोनों के फोन सर्विलांस पर लगाए गए हैं, ताकि उनकी लोकेशन ट्रेस हो सके. प्रारंभिक जांच में मामला समलैंगिकता का लग रहा है. जांच की जा रही है.

जनजाति समाज के शिक्षक ने लगाई गुहार… मुझे प्रिंसिपल से बचाओ

 

मान्यवर जी, मैं आपको सूचित करना चाहता हूँ कि मैं राजकीय सर्वोदय बाल विद्यालय, डी-ब्लॉक,जनकपुरी नई दिल्ली-110058 में व्याख्याता-हिंदी के पद पर कार्यरत था और पूर्ण निष्ठा व लग्न से अपने शैक्षिक कर्तव्यों का निर्वहन कर रहा था लेकिन अनुसूचित जनजाति(ST)से सम्बन्ध रखता हूँ और प्रधानाचार्य जी इसी कारण मुझे हेय दृष्टि से देखते थे. मेरी शैक्षिक क्षमताओं पर सवालिया निशान लगाते थे,कक्षा में मेरे साथ दुर्व्यवहार करते थे तथा स्टाफ के समक्ष भी मुझे नीचा दिखाते थे.

इसके अतिरिक्त विद्यालय में कुछ ऐसी गलत परम्पराएं चल रही थी जिनका समर्थन करना मेरे लिए मुश्किल था,इस कारण भी प्रधानाचार्य जी मेरे प्रति दुर्भावना पाल कर बैठे थे और इसी कारण छात्रों के समक्ष तथा कक्षा में कक्षा जांच की आड़ में मुझे तरह तरह से परेशान किया गया. इसका मैंने विरोध भी किया लेकिन प्रधानाचार्य जी ने शिक्षकों को अनेक प्रकार के प्रलोभन देकर चुप कर रखा है और कुछ प्रधानाचार्य जी के डर के कारण सच को बयां नहीं करते. मैंने सभी जगह इसकी शिकायत की लेकिन कोई भी कार्यवाही नहीं हुई.

मैं क्रमशः सभी सबूत भेज रहा हूँ जो प्रधानाचार्य जी के तानाशाहीपूर्ण रवैये तथा मेरे प्रति दुर्व्यवहार को साबित कर देंगे. शिक्षक सत्य को बयां न करे इसके बदले में उन्हें 6:30 PM के बजाय 6:00 PM पर ही विद्यालय छोड़ने की खुली छूट दी जाती है ताकि शिक्षक आराम से 6:10 PM पर दिल्ली कैंट रेलवे स्टेशन से गुड़गांव,रेवाड़ी,अलवर को जाने वाली ट्रेन को आराम से पकड़ कर उसमें जा सके . यह एक तरह से प्रधानाचार्य जी द्वारा अपने पद का दुरुपयोग व सेवा नियमों का खुला उलंघन है.

मैं आपको मेरे द्वारा अब तक शिक्षा निदेशालय,राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग व माननीय उप मुख्यमंत्री जी को भेजी गई शिकायत की छायाप्रति, शिक्षकों के बयानों की रिकॉर्डिंग्स, प्रधानाचार्य जी के अपमानजनक भाषण,जिसमें उन्होंने छात्रों को ‘हरामी’ कहा तथा उनके माता-पिता को भिखारी के समान बताया,छात्रों के समक्ष ही शिक्षकों के बारे में कहा कि “बच्चों तुम्हारे शिक्षक बुड्ढे हो चुके है,इनकी जांघो में दम नहीं रहा,ये तुम्हारा कुछ भी भला नहीं करेंगे,अपना भला खुद ही कर लो.”

इसके अतिरिक्त भाषण में छात्रों से ‘हरामी’ कहा तथा उनके माता-पिता के बारे में कहा कि “भिखारी के जैसे आकर खड़े हो जाते है.”

इस अपमानजनक भाषण की रिकॉर्डिंग भी भेज रहा हूँ. इस तरह की अभद्र भाषा इस्तेमाल प्रधानाचार्य जी खुलेआम प्रार्थना स्थल पर करते है, इसके बावजूद शिक्षकों ने जांच टीम के समक्ष झूँठ बोला. जांच टीम ने भी मेरे द्वारा बताए गए सबूतों को दरकिनार करके मामले को दबाने की कोशिश की तथा एक झूँठी रिपोर्ट तैयार की.

अब प्रधानाचार्य जी शिक्षकों को खुलेआम 6:00 PM पर ही छोड़ देते है जबकि विद्यालय का समय 6:30 PM का है . प्रधानाचार्य जी इनको इसलिए छोड़ते है ताकि ये शिक्षक सत्य को न बोले.

अतः माननीय जी मैं कुछ शिक्षकों के बयानों की रिकॉर्डिंग तथा विद्यालय समय से पूर्व जाते हुए शिक्षकों की वीडियो रिकॉर्डिंग भेज रहा हूँ . विद्यालय के निर्धारित समय से पूर्व विद्यालय को छोड़ने के लालच में ये शिक्षक अपना जमीर बेचते थे और इस कारण गवाओं के अभाव में मैंने और मेरे परिवार ने अत्यधिक पीड़ा का सामना का किया है.

अतः आपसे गुजारिश है कि आप मामले को संज्ञान में लेकर उचित व आवश्यक कार्यवाही करें तथा आपकी पत्रिका में इस मामले को जगह देने का कष्ट करें तथा मुझे न्याय दिलाने का कष्ट करें . आपकी अति कृपा होगी. सधन्यवाद!

भवदीय हरि सिंह मीन-व्याख्याता-हिंदी (अनुसूचित जनजाति कर्मचारी) राजकीय सर्वोदय बाल विद्यालय, निहाल विहार, नांगलोई,नई दिल्ली-110041.

छात्र संघ बहाली की मांग कर रहे छात्रों को प्रशासन ने धकिया कर बाहर निकाला

हिंदी विश्वविद्यालय में पिछले साल छात्र संघ की मांग को लेकर विभिन्न छात्र संगठनों के द्वारा आंदोलन किया गया था. प्रशासन आंदोलनरत छात्रों को शांत करने के लिए तथा छात्र संघ की मांग को कमजोर करने के लिए मौखिक तौर पर आश्वस्त करते  की इस वर्ष छात्रसंघ चुनाव करवाना संभव नहीं है.इसलिए अगले वर्ष सितंबर माह में छात्र संघ का चुनाव निश्चित होगा. इसके लिए छात्रों से छात्र संघ चुनाव से संबंधित सुझाव भी मांगे गए थे. जिससे विभिन्न छात्र संगठनों में छात्रसंघ का प्रारूप बनाकर विश्वविद्यालय के समक्ष प्रस्तुत किया. कुलपति के आश्वासन के बाद उस वक्त छात्रों ने  अपना आंदोलन वापसवापस ले लिया था.

  पुनः इस वर्ष छात्रों ने छात्र संघ की मांगों को लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन से जवाब मांगा तो विश्वविद्यालय प्रशासन ढील-मूल रवैया अपनाते हुए कोई सार्थक जवाब नहीं दिया. तो विभिन्न छात्र संगठन जिसमें आइसा, ए.आइ.एस.एफ. अन्य छात्र संगठन एक साथ मिलकर लगातार 5 दिन से छात्र संघ की मांग को लेकर विश्वविद्यालय के प्रशासनिक भवन के अंदर आंदोलनरत थे. परंतु आज सुबह आंदोलनरत छात्रों को बल प्रयोग करते हुए विश्वविद्यालय के प्रशासनिक भवन से बाहर खदेड़ दिया गया.  अब आंदोलनरत छात्र प्रशासनिक भवन केबाहर बैक छात्र संघबहाल की मांग को लेकर आंदोलनरत हैं. विश्वविद्यालय प्रशासन आंदोलन में छात्रों को शांत कराने के लिए तथा छात्र संघ की मांगों को कमजोर करने के लिए रोज नए-नए हथकंडे अपना रहा है. आंदोलनरत छात्रों पर उनके विभाग तथा प्रशासन के लोगों द्वारा विभिन्न प्रकार से धमकियां दी जा रही हैं.

धरना पिछले 5 दिनों से लगातार जारी है तथा विश्वविद्यालय प्रशासन चुनाव कराने के लिए आवश्यक तैयारियां जैसे चुनाव समिति संविधान आदि तैयार कर चुका है परंतु पूर्व में दिए गए आश्वासन से भाग रहा है. लगातार बहानेबाजी करने तथा छात्र संघ चुनाव टालने में लगा हुआ है.

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राजस्थान यूनिवर्सिटी में ABVP-NSUI फेल, ‘दलित छात्र’ ने बनाया जीत का रिकॉर्ड

राजस्थान की छात्र राजनीति के सबसे बड़े केंद्र राजस्थान यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ चुनाव के नतीजे दोनों प्रमुख छात्र संगठनों के लिए चौंकाने वाले रहे. बागी निर्दलीय उम्मीदवार विनोद जाखड़ ने चार हजार से अधिक वोटों से एससी उम्मीदवार की रिकॉर्ड जीत हासिल की.

राजस्थान यूनिवर्सिटी के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब निर्दलीय एससी उम्मीदवार अध्यक्ष बना है. विनोद ने इस जीत के साथ ही यूनिवर्सिटी में निर्दलीय उम्मीदवार के अध्यक्ष बनने की हैट्रिक पूरी हो गई. लेकिन इसी के साथ एक बार फिर यहां अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) और और नेशनल स्टूडेंट यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) की स्टूडेंट पॉलिटिक्स भी पूरी तरह से फेल हो गई.

जातिगत समीकरण बैठाते हुए दोनों संगठनों ने जाट उम्मीदवार को टिकट बांटे और इसी के साथ एनएसयूआई के बागी विनोद की जीत की संभावनाएं भी प्रबल हो गई. 22 हजार 677 छात्रों में से कुल 11 हजार 516 ने वोट डाला और सबसे अधिक समर्थन जुटाने सफल रहे निर्दलीय विनोद जाखड़.

यूं तो विनोद की आम छात्रों में मजबूत पकड़ और विद्यार्थी हितों के लिए लंबे समय से सक्रियता काम आई लेकिन एक वजह उसकी कई बड़े आंदोलनों में भूमिका, भूख हड़ताल आदि को एनएसयूआई ने टिकट बांटते समय दरकिनार करना भी रहा. इसके चलते विद्याथियों के लिए हैल्प डेस्क लगाकर कैम्पस में उनकी मदद करने वाले विनोद को बगावत करनी पड़ी. और जीत भी हासिल हुई.

दोनों दलों ने जातिगत समीकरणों के आधार पर जाट उम्मीदवारों को टिकट दी. जानकारों के अनुसार यह मैसेज गलत गया और पढ़े-लिखे स्टूडेंट्स ने संगठन गत राजनीति से ऊपर उठकर वोट डाले.

एनएसयूआई की उम्मीदवारों की कतार में पहले पायदान पर आने वाले विनोद को अंतिम समय पर टिकट नहीं मिलने से आम स्टूडेंट की सहानुभूति मिली.

पूर्व में यूनिवर्सिटी राजस्थान कॉलेज से छात्रसंघ अध्यक्ष रह चुके थे विनोद, छात्रों से सम्पर्क भी काम आया. यूनिवर्सिटी कैम्पस के हॉस्टल स्टूडेंट्स का भी विनोद का फायदा मिला.

एनएसयूआई पदाधिकारी पर यूनिवर्सिटी में हुए हमले के मामले में अरावली हॉस्टल पर आरोप लगे थे. ऐसे में एससीएसटी वोटों का भी ध्रुवीकरण हुआ.

दोनो संगठनों पर धन, बल के आरोप लगे. पैसे लेकर टिकट बांटने के आरोप लगने से संगठनों के प्रति आम स्टूडेंट की नाराजगी भी बढ़ी. कैम्पस में दोनों बड़े संगठनों के भीतर घात का भी निर्दलीय को फायदा मिला. एनएसयूआई और कांग्रेस के नेताओं का निर्दलीय प्रत्याशी को खुलेआम सपोर्ट.

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अब तक दलित व अति पिछड़ा लोगों को पूर्ण रूप से नहीं मिला आरक्षण

भागलपुर| राष्ट्रीय लोक समता पार्टी की ओर से बुधवार को दलित अति-पिछड़ा अधिकार जिला सम्मेलन का आयोजन किया गया. इस दौरान पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सह पूर्व सांसद भूदेव चौधरी ने कहा कि दलित, अति पिछड़ा समाज के लोगों को शिक्षित और संगठित होना होगा. समाज में शिक्षा की घोर कमी है. देश को आजाद हुए 70 वर्ष हो गए है, लेकिन अभी तक दलित व अति पिछड़ा लोगों को आरक्षण पूर्ण रूप से नहीं मिला है. न्यायपालिका में अभी भी मात्र 250 परिवार का ही कब्जा है जो कि गलत है. अध्यक्षता दलित-महादलित जिला अध्यक्ष नंद किशोर हरि ने की. संचालन अति पिछड़ा जिला अध्यक्ष रवि प्रकाश रवि ने की. सम्मेलन में युवा प्रदेश अध्यक्ष हिमांशु पटेल, राष्ट्रीय महासचिव निचिकेता मंडल, महिला प्रदेश अध्यक्ष उर्मिला पटेल, छात्र प्रकोष्ठ प्रदेश अध्यक्ष बेलाल राजा, जिला अध्यक्ष रवि शेखर भारद्वाज, महानगर अध्यक्ष ओम भास्कर आदि ने संबोधित किया. मौके पर जिला मीडिया प्रभारी कुणाल सिंह, अमित, पूजा कुमारी, मिथलेश सिंह, रंजन सिंह आदि मौजूद थे.

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SC/ST एक्ट: सात साल की सजा से कम के मामलों में बिना नोटिस गिरफ्तारी नहीं

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नई दिल्ली। अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद हुए संशोधन को लेकर भले ही हौवा खड़ा किया गया हो लेकिन हकीकत यही है कि इस अधिनियम के तहत दर्ज जिन मामलों में सात साल से कम सजा का प्रावधान है, उनमें बिना नोटिस के गिरफ्तारी नहीं हो सकती. हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने इस अधिनियम के तहत 19 अगस्त को दर्ज एफआईआर रद्द करने की मांग वाली याचिका इस निर्देश के साथ निस्तारित कर दी कि गिरफ्तारी से पहले अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पालन किया जाएगा.

अरनेश कुमार मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने दिशानिर्देश दिए हैं कि यदि सात साल से कम की सजा के अपराध के संबंध में एफआईआर दर्ज है तो ऐसे मामले में सीआरपीसी की धारा 41 व 41A के प्रावधानों का पालन किया जाएगा और विवेचक को अभियुक्त की गिरफ्तारी से पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि गिरफ्तारी अपरिहार्य है अन्यथा न्यायिक मजिस्ट्रेट उक्त गिरफ्तार व्यक्ति की न्यायिक रिमांड नहीं लेगा. दरअसल हाईकोर्ट में सात साल से कम की सजा के ऐसे मामलों में जो आईपीसी की धाराओं के अलावा, अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम, आवश्यक वस्तु अधिनियम, गो-हत्या निवारण अधिनियम आदि के तहत दर्ज एफआईआर को चुनौती देने वाली याचिकाएं अक्सर दाखिल होती हैं. ऐसे मामलों में हाईकोर्ट सरकारी वकील के इस आश्वासन पर याचिकाओं को निस्तारित कर देता है कि अभियुक्त की गिरफ्तारी से पहले अरनेश कुमार केस में दी गई सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था का अनुपालन किया जाएगा.

हाल में एक याचिका न्यायमूर्ति अजय लाम्बा व न्यायमूर्ति संजय हरकौली की खंडपीठ के समक्ष सुनवाई के लिए पेश हुई. यह याचिका गोण्डा के राजेश मिश्रा ने दाखिल की थी. इसमें अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण पर संशोधित अधिनियम के तहत दर्ज प्राथमिकी को चुनौती दी गई थी. साथ ही विवेचना के दौरान याची की गिरफ्तारी न किए जाने की भी मांग की गई थी. संसद ने अधिनियम में संशोधन 17 अगस्त 2018 को पास किया था और राजेश मिश्रा के खिलाफ एफआईआर इसी संशोधित अधिनियम के तहत दर्ज हुई थी.

न्यायालय ने मिश्रा की याचिका को यह कहते हुए निस्तारित कर दिया कि प्राथमिकी में जो धाराएं लगी हैं, उनमें सजा सात साल तक की ही है. लिहाजा गिरफ्तारी से पूर्व अरनेश कुमार मामले में दिए दिशानिर्देशों का पालन किया जाए. मामले की सुनवाई के दौरान अपर शासकीय अधिवक्ता (प्रथम) नंद प्रभा शुक्ला ने न्यायालय को आश्वासन दिया कि सजा सात साल से कम है, लिहाजा मामले में विवेचक सुप्रीम कोर्ट के अरनेश कुमार फैसले का पालन करेंगे. क्या है मामला यह मामला गोण्डा जिले का है. शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति की शिवराजी देवी ने 19 अगस्त 2018 को गोण्डा के खोड़ारे थाने पर याची राजेश मिश्रा और अन्य तीन लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराते हुए आरोप लगाया था कि विपक्षीगण पुरानी रंजिश को लेकर उसके घर पर चढ़ आए, उसे और उसकी लड़की को जातिसूचक गालियां दीं, घर में घुसकर लात, घूंसों व लाठी-डंडे से मारा.

क्या है अरनेश कुमार मामले में दिशानिर्देश सुप्रीम कोर्ट ने अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य मामले में दो जुलाई 2014 के अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि सीआरपीसी की धारा 41(1) के तहत जिन मामलों में अभियुक्त की गिरफ्तारी की आवश्यकता नहीं है, ऐसे मामलों में पुलिस अधिकारी अभियुक्त को एक नोटिस भेजकर तलब करेगा. यदि अभियुक्त नोटिस का अनुपालन करता है तो उसे गिरफ्तार नहीं किया जाएगा, जब तक कि पुलिस अधिकारी गिरफ्तारी की अनिवार्यता का कारण दर्ज नहीं करता. और यह मजिस्ट्रेट के परीक्षण का विषय होगा.

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हारे मैच में लोकेश राहुल और ऋषभ पंत का धमाल…

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नई दिल्ली। 5वें टेस्ट के आखिरी दिन इंग्लैंड को जीत के लिए जूझना पड़ा. वजह लोकेश राहुल और ऋषभ पंत रहे. इन दोनों ने असाधारण रूप से छठे विकेट के लिए 204 रनों की साझेदारी कर डाली. ओपनर लोकेश राहुल (149) और युवा ऋषभ पंत (114) ने करियर की यादगार पारी खेलकर टीम इंडिया के जीत की उम्मीद जगाई और इंग्लैंड के दिल में रेकॉर्ड हार का डर पैदा कर दिया, लेकिन एक बार जैसे ही यह जोड़ी टूटी, यह तय हो गया कि अब पंत और राहुल के बीच हुई छठे विकेट के लिए 204 रनों की साझेदारी हुई, जो चौथी इनिंग में किसी भी विकेट के लिए भारत की ओर से दूसरी सबसे बड़ी साझेदारी है. यह साझेदारी इसलिए भी मायने रखती है, क्योंकि भारत संघर्ष कर रहा था. शायद ही किसी को इन दोनों से इस तरह के खेल की उम्मीद रही होगी. बता दें कि इससे पहले इसी मैदान पर 1979 में सुनील गावसकर और चेतन चौहान ने पहले विकेट के लिए 213 रनों की साझेदारी की थी. चौथी पारी में यह किसी भी विकेट के लिए सबसे बड़ी साझेदारी है.

इस मामले में तीसरे नंबर पर राहुल द्रविड़ और सौरभ गांगुली की जोड़ी है, जिसने 1998-99 में न्यू जीलैंड के खिलाफ हेमिल्टन में तीसरे विकेट के लिए नाबाद 194 रन जोड़े थे. विराट कोहली और मुरली विजय ने 2014-15 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ एडिलेड में 185 रन जोड़े थे, जो चौथी बड़ी साझेदारी है.

इंग्लैंड ने ओवल टेस्ट 118 रन से जीतने के साथ ही पांच टेस्ट मैचों की इस सीरीज को 4-1 से अपने नाम कर लिया. बता दें कि सीरीज के आखिरी टेस्ट की आखिरी पारी में जब भारतीय टीम ने 464 रन के विशाल लक्ष्य के सामने दो रन के योग पर ही अपने तीन अहम विकेट गंवा दिए, तब सिर्फ लाज बचाने की बात हो रही थी.

चौथे दिन का खेल खत्म होने तक भारत ने 3 विकेट पर 58 रन बनाए थे और अंतिम दिन फैंस बस यही उम्मीद कर रहे थे कि बल्लेबाज बोर्ड पर इतने रन टांग दें, जिससे शर्मनाक हार से बचा जा सके. लेकिन, आखिरी दिन भारत इतिहास रचने के करीब पहुंच जाएगा, यह किसी ने भी नहीं सोचा था.

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एसबीआई ने दिया झटकाः अब दूसरा व्यक्ति नहीं जमा कर सकेगा आपके खाते में पैसा

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नई दिल्ली। भारतीय स्टेट बैंक ने अपने तमाम ग्राहकों को बड़ा झटका दे दिया है. बैंक ने अपने खाते में पैसा जमा करने के नियमों में बड़ा बदलाव किया है. इसका असर पूरे देश में बैंक के करोड़ों ग्राहकों पर पड़ेगा. यह किया बदलाव

बैंक ने जो नया नियम बनाया है, उसके अनुसार एक कोई दूसरा व्यक्ति आपके खाते में पैसा नहीं जमा करा पाएगा. यह नियम केवल बैंक में जाकर के पैसा जमा करने पर होगा. हालांकि ऑनलाइन ट्रांसफर करने पर किसी तरह की कोई रोक नहीं लगाई है.

बाप भी नहीं कर पाएगा बेटे के खाते में पैसा जमा

इसका असर ऐसे समझिए. अगर आप पिता है और दूरदराज के गांव में रहते हैं और आपका बेटा शहर में रहकर पढ़ाई कर रहा है तो उसके खाते में किसी भी हाल में पैसा जमा नहीं कर सकेंगे. अगर आपको ऑनलाइन बैंकिंग के बारे में समझ नहीं है, तो फिर काफी मुश्किल हो जाएगी.

लेना होगा अनुमति लेटर

इस नियम के तहत ग्राहकों को दूसरे के खाते में पैसा जमा करने के लिए अनुमति लेटर लेना होगा. इस लेटर पर व्यक्ति ए और व्यक्ति बी दोनों के हस्ताक्षर होंगे. इसके अलावा बैंक काउंटर पर नकदी के साथ दी जाने वाली जमा फॉर्म पर बैंक खाता धारक का हस्ताक्षर होना चाहिए.

एसबीआई ने इस नियम को लागू किया है, उसके पीछे सबसे बड़ी वजह नोटबंदी है. ऐसा इसलिए क्योंकि नोटबंदी के दौरान कई बैंक खातों में बड़ी संख्या में हजार और पांच सौ नोट जमा किए गए थे. जांच के बाद जब लोगों से इतने सारे नोटों के बारे में पूछा जा रहा है तो उनका कहना है कि किसी अनजान शख्स ने उनके बैंक खातों में पैसे जमा करा दिए हैं. लोगों ने बैंक अधिकारियों को जवाब दिया था कि उनका इस पैसे से कोई लेना देना नहीं है.

अन्य बैंक भी लागू कर सकते हैं नियम

एसबीआई ने जिस नियम को लागू किया है, वो अन्य बैंक भी जल्द लागू कर सकते हैं. नोटबंदी के बाद आयकर विभाग ने सभी सरकारी बैंकों से यह नियम लागू करने का अनुरोध किया था. आयकर विभाग ने कहा था कि बैंक ऐसे नियम बनाएं कि कोई दूसरा शख्स किसी के बैंक खाते में नकद रुपये नहीं जमा करा पाए, ताकि कोई व्यक्ति अपने बैंक खाते में जमा पैसे के बारे में अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही से बच न सके.

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