ट्विटर पर आईं बहनजी, समर्थकों ने किया स्वागत

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नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी अब खुद को नए कलेवर में ढालने को तैयार है. इसका सबसे बड़ा सबूत पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती का सोशल मीडिया ट्विटर पर आना है. अब तक सोशल मीडिया से दूर रहने वाली बसपा और उसकी प्रमुख मायावती के ट्विटर पर आने के कदम का बसपा समर्थकों और कार्यकर्ताओं ने स्वागत किया है. बसपा प्रमुख का ट्विटर हैंडल @Sushrimayawati है. उनके ट्विटर हैंडल पर ट्विटर पर आने से संबंधित जारी की गई प्रेस रिलिज भी अपलोड है, इससे आप उनके वास्तविक ट्विटर हैंडल को पहचान सकते हैं.

हालांकि ट्विटर पर दिख रहा है कि बहनजी का अकाउंट अक्टूबर 2018 में ही बन गया था, लेकिन आधिकारिक तौर पर वह अब सामने आई हैं. बसपा प्रमुख के ट्विटर पर आने से बसपा समर्थकों में खासा उत्साह भी है. इस संबंध में जानकारी मिलते ही लोग उन्हें फॉलो करने लगे हैं. एक घंटे में उनके 15 हजार से ज्यादा फॉलोअर हो गए थे, जिनका बढ़ना जारी था. बसपा प्रमुख के ट्विटर पर आने को लेकर कई तरह की प्रतिक्रियाएं भी आ रही है.

बहुजन लेखक एच.एल दुसाध ने लिखा है- 21वीं सदी में कदम रखने के लिए उनका अभिनंदन होना चाहिए. तो योगेश कुमार ने लिखा है- Late but right step … यानि देरी से उठाया गया सही कदम. अजय गजभिये का कहना है- ये तो पहले ही हो जाना चाहिए था. वक्त के साथ बदलाव जरूरी है, ये बहनजी को सीखना होगा. तो वहीं इस खबर से उत्साहित मनीष कुमार का कहना है कि ये ऐतिहासिक कदम साबित होगा.

दरअसल जहां सभी राजनैतिक दल सोशल मीडिया के जरिए पिछले काफी लंबे वक्त से एक्टिव हैं और हर मुद्दे पर अपनी राय रखते हैं तो वहीं बसपा इससे अब तक दूर थी. पार्टी की न तो कोई आधिकारिक वेबसाइट की पुष्टि की जाती है और न ही सोशल मीडिया पर उसका कोई अकाउंट था. पिछले दिनों तो एक मुद्दे पर हुए विवाद में बसपा की ओर से प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा गया था कि बसपा सोशल मीडिया पर नहीं है. जबकि बसपा के समर्थक लगातार इस बात की मांग कर रहे थे कि पार्टी को अन्य राजनैतिक दलों की तरह सोशल मीडिया पर एक्टिव होना चाहिए. आज जब सभी दलों की रणनीति में सोशल मीडिया एक बड़ा फैक्टर है, बसपा के वहां नहीं होने से पार्टी को नुकसान भी हो रहा था.

ऐसे में बसपा प्रमुख मायावती के ट्विटर पर आने से वह अपने प्रशंसकों और समर्थकों से सीधे जुड़ गई हैं. पार्टी द्वारा इस संबंध में जारी विज्ञप्ति में कहा गया है कि सुश्री मायावती अब ट्विटर के जरिए भी विभिन्न मुद्दों पर अपने विचार रखेंगी.

सीबीआई के बहाने मोदी और ममता की लड़ाई पर सुप्रीम कोर्ट ने दिया फैसला

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नई दिल्ली। केंद्र और पश्चिम बंगाल सरकार या यूं कहें की ममता बनर्जी और पीएम नरेन्द्र मोदी के बीच पिछले दो दिनों से जारी वर्चस्व की लड़ाई पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला दे दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने कोलकाता पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार को जांच के लिए सीबीआई के सामने पेश होने का आदेश दिया है. हालांकि शीर्ष अदालत ने राजीव कुमार की गिरफ्तारी पर रोक लगा दिया है. अदालत के इस फैसले को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी नैतिक जीत बताकर स्वागत किया है.

कोर्ट का फैसला आने के बाद कोलकाता में धरने पर बैठीं ममता बनर्जी ने कहा कि हम कोर्ट के इस फैसले का सम्मान और स्वागत करते हैं. उन्होंने कहा कि हम यही चाहते हैं और यह हमारी नैतिक जीत है. ममता ने कहा कि राजीव कुमार ने कभी नहीं कहा कि वह जांच में सहयोग नहीं करेंगे. राजीव कुमार ने खुद लिखा है कि आपस में बैठकर बातचीत करते हैं. लेकिन वह उन्हें बिना किसी नोटिस के गिरफ्तार करना चाहते थे. मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि ‘केंद्र और राज्य सरकार के अपने अपने दायरे हैं. हम एक- दूसरे के अधिकार क्षेत्र में दखल नहीं देते. हम यही चाहते थे. राजीव कुमार पहले ही पांच पत्र लिख चुके हैं कि मिलकर इस पर बात करते हैं. इस देश का बिग बॉस कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि संविधान है.’

कांग्रेस दफ्तर पहुंची प्रियंका गांधी, संभाला पद

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नई दिल्ली। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा महासचिव घोषित किए जाने के बाद प्रियंका गांधी ने मंगलवार को अपना पदभार संभाल लिया है. सोमवार को अमेरिका से लौटी प्रियंका गांधी ने आते ही अपना काम शुरू कर दिया है. कांग्रेस दफ्तर में भी प्रियंका गांधी के नाम की प्लेट लग गई है. खबर यह भी है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी प्रियंका गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ यूपी के कांग्रेस नेताओं के साथ बैठक करेंगे. खास बात ये है कि प्रियंका गांधी के इस कमरे से ही राहुल गांधी के पॉलिटिकल करियर की शुरुआत हुई थी. ये कमरा कभी राहुल गांधी का हुआ करता था. प्रियंका गांधी का ये कमरा कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के बिलकुल बगल में हैं. प्रियंका गांधी को 23 जनवरी को कांग्रेस महासचिव बनाए जाने का ऐलान हुआ था.

बताते चलें कि प्रियंका गांधी वाड्रा को राहुल गांधी ने लोकसभा चुनाव के लिए पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी दी है. उनके साथ ज्योतिरादित्य सिंधिया को पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी दी है. कांग्रेस पार्टी ने उत्तर प्रदेश की सभी 80 लोकसभा सीट पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है. बता दें कि मंगलवार को ही एक अखबार को दिए इंटरव्यू में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रियंका गांधी के रोल पर बात की. उन्होंने कहा कि क्योंकि प्रियंका गांधी को महासचिव बनाया गया है, ऐसे में उनका रोल सिर्फ उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं रहता है बल्कि पूरे देश में उनका रोल होगा. प्रियंका गांधी बेटी के इलाज के सिलसिले में अमेरिका में थीं.

मोदी VS ममताः सड़क से संसद तक शह-मात का खेल

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कोलकाता। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच शह-मात का खेल जारी है. कोलकाता में रविवार शाम को शुरू हुआ 2019 का सबसे बड़ा सियासी ड्रामा पहले कोलकाता से लेकर दिल्ली की सड़कों पर चला और फिर संसद की चौखट तक पहुंच गया. आलम यह रहा कि इस मुद्दे पर भारी हंगामे के बीच लोकसभा और राज्यसभा दोनों की कार्यवाही दिन भर के लिए स्थगित करनी पड़ी. मामला चुनाव आयोग तक भी पहुंच गया है.

लोकसभा चुनाव के लिहाज से इस बार पश्चिम बंगाल आर-पार की लड़ाई का अखाड़ा बना है, भारतीय जनता पार्टी अपनी ताकत बढ़ाने के लिए पूरी ताकत लगा रही है तो जवाब में ममता बनर्जी भी उन्हें रोकने के लिए मुस्तैद हैं. रविवार रात को सीबीआई के अधिकारियों के खिलाफ कोलकाता की पुलिस की कार्रवाई के खिलाफ सोमवार को सीबीआई सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई. सीबीआई ने ममता सरकार के खिलाफ काम में बाधा डालने का आरोप लगाया, हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने उल्टा सीबीआई से कहा कि कमिश्नर के खिलाफ कोई सबूत हैं तो पेश करिए, जिसके बाद सीबीआई फिलहाल सकते में है.

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि जबतक कोई सबूत नहीं होंगे, तबतक कार्रवाई नहीं होगी. अब इस मसले की सुनवाई मंगलवार को होगी. दूसरी ओर कोलकाता के पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार भी कलकत्ता हाई कोर्ट पहुंचे हैं. उन्होंने हाई कोर्ट से अपील की है कि उनके खिलाफ जारी सभी नोटिस पर स्टे लगाया जाए. इस पर भी मंगलवार को सुनवाई होगी.

दूसरी ओर सोमवार को संसद की कार्यवाही शुरू होते ही विपक्ष ने आक्रामक रूप से सीबीआई विवाद का मुद्दा उठाया. कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी समेत अन्य विपक्षी पार्टियों ने कोलकाता के मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेरा और सीबीआई के दुरुपयोग का आरोप लगाया. भाजपा की ओर से इसका जवाब गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने दिया. उनका तर्क था कि सीबीआई के अधिकारी सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जांच करने पहुंचे थे, लेकिन उन्हें काम नहीं करने दिया. जिस दौरान राजनाथ सिंह लोकसभा में जवाब दे रहे थे, तब लोकसभा में टीएमसी के सांसदों ने ‘’सीबीआई तोता है, तोता है…तोता है’ के नारे लगाए. दूसरी ओर उधर कोलकाता में ममता बनर्जी रविवार रात से ही केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं और धरने पर बैठी हैं. ममता धरना स्थल से ही सरकार चला रही हैं. सोमवार दोपहर को उन्होंने धरना स्थल पर ही कैबिनेट बैठक भी की.

पूर्वांचल में भाजपा के खिलाफ भोजपुरी में नए नारे

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लखनऊ। 2019 लोकसभा चुनाव को लेकर सरगर्मी तेज होती जा रही है. सारे दल जहां प्रत्याशियों के नाम फाइनल करने में लग गए हैं तो वहीं चुनाव को लेकर नए-नए नारे भी गढ़े जाने लगे हैं. पूर्वांचल में तो भोजपुरी में नए नारे तैयार किए गए हैं. सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर तो अपने कार्यक्रमों में लगातार वो नारे भी लगा रहे हैं. भाजपा के खिलाफ उन्होंने भोजपुरी में कई नए नारे निकाले हैं.

इन दिलचस्प नारों के बारे में आप खुद सुनिए. ‘पिछड़ों के आरक्षण में बंटवारा ना भईल त भाजपा गईल, शिक्षा में सुधार ना भईल त भाजपा गईल और शराब बंद ना भईल त भाजपा गईल’. ओमप्रकाश राजभर ये नारे अपनी सभी सभाओं में लगवा रहे हैं.

दरअसल चुनावों के दौरान नए नारों का खूब महत्व होता है. नारे अगर जुबान पर चढ़ जाए तो यह किसी दल को सियासी बढ़त दिलाने का काम करती हैं. एक वक्त में मान्यवर कांशीराम ने खूब नए नारे निकाले, जिनकी बदौलत बहुजन समाज पार्टी को खूब प्रसिद्धी मिली और वो बहुजन समाज के बीच तेजी से लोकप्रिय भी हुई. ‘जिसकी जितनी संख्या भारी उतनी उसकी हिस्सेदारी’ जैसे नारे खूब प्रसिद्ध हुए थे.

यूपी में बसपा-सपा गठबंधन में शामिल हो सकता है ये नया दल

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नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश में बसपा और सपा गठबंधन में एक और सहयोगी की इंट्री हो सकती है. मोदी सरकार पर लगातार हमलावर बने एनडीए के सहयोगी और यूपी सरकार में मंत्री सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी प्रदेश के बसपा-सपा गठबंधन में शामिल हो सकती है. भाजपा पर लगातार हमलावर पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर का कहना है कि उन्हें आगामी लोकसभा चुनाव में बसपा-सपा गठबंधन का हिस्सा बनने से भी परहेज नहीं है. गठबंधन का हिस्सा बनने की दिशा में कोशिशें भी शुरू कर दी हैं.
फाइल फोटोः सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर

राजभर लगातार पिछड़े वर्ग को आरक्षण को लेकर मुखर हैं. उनका कहना है कि भाजपा नेताओं ने आश्वासन के बाद भी उनकी किसी बात पर ध्यान नहीं दिया. पिछड़ा वर्ग के 27 फीसदी आरक्षण में बंटवारे से कम पर वह भाजपा की कोई बात नहीं मानने वाले हैं. राजभर का कहना है कि 24 फरवरी से पहले ही वह तय कर लेंगे कि लोकसभा चुनाव में उन्हें भाजपा के साथ रहना है या नहीं. उनका कहना है कि लोकसभा चुनाव में गठबंधन को लेकर भाजपा के किसी नेता ने अभी तक उनसे कोई बात नहीं की है.

दिल्ली में 3-4 फरवरी को दलित साहित्य महोत्सव, लगेगा दिग्गज साहित्यकारों का जमावड़ा

नई दिल्ली। दिल्ली यूनिवर्सिटी के किरोड़ीमल कॉलेज में ‘दलित साहित्य महोत्सव’ का आयोजन किया जा रहा है. यह महोत्सव 3 और चार जनवरी को दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज में आयोजित होगा. कार्यक्रम का समय सुबह 9.30 से शाम 6.30 तक होगा. इस तरह का यह पहला महोत्सव है. इस महोत्सव में देश के विभिन्न हिस्सों से दलित साहित्यकार जुटेंगे. इस महोत्सव का आयोजन “अम्बडेकरवादी लेखक संघ” द्वारा किया जा रहा है.

आयोजकों के मुताबिक इसका उद्देश्य भारत में दलित-आदिवासी और वंचित अस्मिताओं के लेखन, साहित्य, और संस्कृति को समाज के सामने लाना है. आयोजकों का कहना है कि ऐसे आयोजनों के माध्यम से ही भारत के वंचित समुदाय की समस्याओं को सामने लाया जा सकता है. इसीलिए इस बार के महोत्सव का मूल थीम ‘दलित’ शब्द रखा है. यह महोत्सव दो दिन तक चलेगा.

महोत्सव के आयोजकों में डॉ़ नामदेव, संस्थापक सूरज बडत्या, सचिव संजीव डांडा आदि शामिल हैं. इन्होंने कार्यक्रम की जानकारी देते हुए कहा कि इस महोत्सव के लिए भारत की विभिन्न भाषाओं के दलित-आदिवासी, महिला, घुमंतू आदिवासी, अल्पसंख्यक और हिजड़ा समुदाय के साहित्यकारों से संपर्क किया गया है. जिनमें से करीबन 15 भाषाओं के लेखक, संस्कृतिकर्मी, गायक, नाटककार, कलाकार शामिल होंगे. नेपाल की प्रमुख दलित लेखक आहुति, नर्मदा बचाओ आन्दोलन की नेत्री मेधा पाटकर, आदिवासी लेखक लक्ष्मण गायकवाड, दलित लेखक शरणकुमार लिम्बाले, गुजरात से हरीश मंगलम और आदिवासी कवि-गायक गोवर्धन बंजारा, कलाकार मनमोहन बावा, कन्नड़ भाषा के आदिवासी लेखक शान्था नाइक के शामिल होने की बात कही जा रही है.

तो वहीं हैदराबाद से वी कृष्णा, त्रिवेंद्रम से जयाश्री, शामल मुस्तफा खान, पंजाब के लेखक बलबीर माधोपुरी, क्रान्तिपाल, मदन वीरा, मोहन त्यागी और कई अन्य इस महोत्सव में शामिल हो रहे हैं. हिंदी लेखकों में मोहनदास नैमिशराय, जयप्रकाश कर्दम, ममता कालिया, चौथीराम यादव, हरिराम मीणा, श्योराज सिंह बेचैन, निर्मला पुतुल, बल्ली सिंह चीमा व कई अन्य हैं. भोजपुरी भाषा से मुसाफिर बैठा, प्रहलादचांद दास आदि शामिल होंगे.

दिल्ली यूनिवर्सिटी के अकादमिक समिति के सदस्य प्रो. हंसराज सुमन ने बताया कि इस लिटरेचर फेस्टिवल की मुख्य बात इसमें महाराष्ट्र, राजस्थान, तमिलनाडु और गुजरात से आने वाले लोकगायक रहेंगे जो दलित-आदिवासी परम्परा और संस्कृति से लोगों को रूबरू कराएंगे. आंबेडकरवादी लेखक संघ (अलेस) के अध्यक्ष बलराज सिंहमार, इग्नू के प्रोफेसर प्रमोद मेहरा ने कहा कि महोत्सव में छह सत्र समानांतर रूप से चलेंगे. इसमें एक सत्र अंग्रेजी भाषा का और एक सत्र विभिन्न भारतीय भाषाओं का भी होगा. दिल्ली यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर और स्त्रीवादी चिन्तक डॉ़ हेमलता कुमार ने कहा कि आज कोर्पोरेट घरानों ने साहित्य को कब्जाने की मुहीम चला रखी है. पुरुषवादी संस्कार, समाज और साहित्य में हावी हों रहें हैं. ऐसे पुरुषवादी समाज में स्त्रियाँ भी दलित की श्रेणी में ही आती हैं. इसलिए ये महोत्सव एक ऐतिहासिक भूमिका निभाएगा. इस महोत्सव के आयोजक संगठनों में अम्बेडकरवादी लेखक संघ, हिंदी विभाग, किरोड़ीमल कॉलेज, रश्मि प्रकाशन, लखनऊ, रिदम पत्रिका, जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (एनएपीएम), दिल्ली समर्थक समूह, अलग दुनिया, मंतव्य पत्रिका, अक्षर प्रकाशन और वितरक, दिल्ली, फोरम फॉर डेमोक्रेसी, मगध फाउंडेशन, कहानी पंजाब, अम्बेडकर वर्ल्ड शामिल हैं.

कुशवाहा पर लाठी चार्ज के विरोध में आंदोलन की तैयारी में रालोसपा कार्यकर्ता

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पटना। राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा पर पुलिस के लाठी चार्ज के बाद बवाल बढ़ता जा रहा है. इस घटना के बाद रालोसपा कार्यकर्ताओं को नीतीश कुमार को घेरने के एक और मौका मिल गया है. खबर है कि अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष पर लाठी चार्ज से नाराज रालोसपा कार्यकर्ता आंदोलन की तैयारी में हैं. शिक्षा में सुधार की मांग को लेकर शनिवार को निकाले गए आक्रोश मार्च के दौरान कुशवाहा पुलिस की लाठीचार्ज से घालय हो गए थे.

इसके बाद कुशवाहा को पटना कॉलेज मेडिकल हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया. कुशवाहा पर यह हमला तब हुआ जब वो अपने कार्यकर्ताओं के साथ जनाक्रोश मार्च निकाल रहे थे. पटना के डाकबंगला चौराहे पर जब पुलिसवालों ने मार्च को रोका तो समर्थकों और पुलिस वालों में झड़प हुई जिसके बाद पुलिस ने लाठीचार्ज किया. इस दौरान कुशवाहा को भी चोट लगी और उसके बाद उन्हें पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा.

पटना मेडिकल कॉलेज में घायल उपेंद्र कुशवाहा और अन्य रालोसपा कार्यकर्ता

कुशवाहा पर हमले के बाद विपक्षी दलों के नेताओं ने इस घटना की निंदा की है. बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव, पूर्व मुख्यमंत्री जीतन मांझी के अलावा कांग्रेस नेताओं ने भी लाठीचार्ज की निंदा की है. आने वाले दिनों में यह मामला और तूल पकड़ सकता है.

रिपोर्ट- बिहार प्रतिनिधि

अदालत ने आनंद तेलतुंबड़े की गिरफ्तारी को बताया गैर कानूनी, रिहा करने का आदेश

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नई दिल्ली। दलित स्कॉलर और सामाजिक कार्यकर्ता आनंद तेलतुंबड़े की गिरफ्तारी और रिहाई को लेकर दिन भर नाटक चलता रहा. पहले उन्हें तड़के चार बजे मुंबई एयरपोर्ट से गिरफ्तार किया गया, फिर उन्हें रिहा भी कर दिया गया. पुणे की एक अदालत ने भीमा कोरेगांव हिंसा के मामले में गिरफ्तार आनंद तेलतुंबड़े (Anand Teltumbde) को रिहा करने का आदेश दिया. कोर्ट ने गिरफ्तारी को गैर-कानूनी करार देते हुए यह आदेश दिया है.

इससे पहले पुणे पुलिस ने शुक्रवार को पुणे सेशन कोर्ट ने आनंद की अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने के बाद उनको शनिवार की सुबह मुंबई एयरपोर्ट से गिरफ्तार किया था. पुणे सत्र न्यायालय ने शुक्रवार को तेलतुंबडे के खिलाफ पर्याप्त सामग्री का हवाला देते हुए गिरफ्तारी से पहले जमानत अर्जी देने से इनकार कर दिया था. एडिशनल सेशन जज किशोर वडाने ने फैसला सुनाने के दौरान कहा था कि ‘मेरे विचार में जांच अधिकारी द्वारा अपराध के कथित मामले में वर्तमान अभियुक्त की संलिप्तता दर्शाने के लिए पर्याप्त सामग्री एकत्र की गई है. इसके अलावा वर्तमान आरोपी के संबंध में जांच बहुत महत्वपूर्ण चरण में है.’ लेकिन इसके बाद अदालत ने ही उन्हें रिहा करने के भी आदेश दिए.

अम्बेडकरवादी पत्रकार का आरोप, धमका रहे हैं बाबा के गुंडे

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विश्व कबीर मंच के अंतरराष्ट्रीय बाल ब्रह्मचारी बाबा संत मनमोहन साहेब फिलहाल दो सगी बहनों को डरा-धमका कर दुष्कर्म करने के मामले में जेल में बंद है. इस बाबा की सच्चाई सामने लाने वाले पत्रकार राजीव कुमार हैं. राजीव दिल्ली में रहते हैं और फ्रीलांस पत्रकारिता करते हैं. राजीव का आरोप है कि बाबा की गिरफ्तारी के बाद उनके समर्थक या यूं कहें कि गुंडे लगातार राजीव को परेशान कर रहे हैं और उन्हें जान से मार देने की धमकी दे रहे हैं. राजीव ने 01 फरवरी, 2019 को अपनी आपबीती लिख भेजी है. आप खुद पढ़िए-

बलात्कारी बाबा मनमोहन के 5-6 अज्ञात समर्थकों ने आज शाम 7:20 पर मुझे दिल्ली में धमकी दी तथा कहा कि आप इस मैटर से पीछे हट जाइए और लड़की के परिवार वालों और लड़की पर दबाव बनाइए कि वह कैसे भी करके केस वापस ले. नहीं तो लड़की के परिवार वालों का बुरा हाल तो होगा ही, आपका भी बुरा हाल हो जाएगा. हम लोगों की बात मानिए. हम लोग आपके पास इसीलिए आए हैं कि कल से ही हम लोग आपको खोज रहे थे लेकिन आज आप मिले हैं.

मैंने इस पर जवाब दिया कि आप लोग क्यों परेशान हो रहे हैं. बलात्कारी बाबा ने बलात्कार किया है और पीड़ितों ने न्याय के लिए प्रशासन के समक्ष गुहार लगाई है और बाबा गिरफ्तार हुआ है तो आपको दिक्कत क्यों हो रहा है?

बाबा समर्थकों ने मुझसे कहा कि ज्यादा पत्रकारिता मत करो नहीं तो अपना जीता मुंह नहीं देख पाओगे. इसके बाद मैंने तुरंत उन लोगों को कहा कि मैं पुलिस को फोन कर रहा हूं आप लोग यही पर रुको. इसके बाद तत्काल बाबा समर्थक गुंडे वहां से भाग खड़े हुए और भीड़ से अलग हटकर अपने बाइक को लेकर भाग गए.

इसके बाद हमने इस संबंध में एक कंप्लेन नजदीकी थाना में दिया तथा अपने सुरक्षा की चिंता थानाध्यक्ष के समक्ष जाहिर की. जिसके बाद थाना अध्यक्ष राज पार्क जिला बाहरी दिल्ली ने मेरा कंप्लेंट लेते हुए उसका रिसिप्ट मुझे दिया, जिसका नंबर DD no. 23B date 31/01/2019 है.

गौरतलब है कि बिहार की मूल निवासी तथा लुधियाना पंजाब में निवास करने वाली दो साध्वी बहनों के साथ कथित बाबा मनमोहन ने बलात्कार करके और उसका वीडियो वायरल करने के धमकी देकर तथा उनके माता-पिता और भाई की हत्या की धमकी देकर लगातार छोटी बहन के साथ पिछले 8 साल तथा बड़ी बहन के साथ पिछले 2 साल से यौन शोषण कर रहा था.

मैं सत्संग का कवरेज करने के लिए नवम्बर 2018 लुधियाना पंजाब गया हुआ था, जहां यह दोनों साध्वी बहन मुझे मिलीं. मैंने उन दोनों को अपना कार्ड दिया और अपना परिचय दिया. इन दोनों बहनों ने उसके लगभग 25 दिन बाद मुझे फोन से संपर्क किया तथा अपनी आपबीती बताई और अपने अमानवीय शोषण की वारदात की पूरी कहानी मुझे बताई.

मैंने उन दोनों बहनों को इसकी शिकायत प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और राष्ट्रीय महिला आयोग तथा बिहार के मुख्यमंत्री को भेजने की सलाह दी और उसकी एक प्रति मुझे भी भेजने को कहा.

पीड़ित दोनों साध्वी बहनों ने ऐसा ही किया और तमाम गणमान्य व्यक्तियों और संस्थाओं को पत्र भेजने के बाद एक प्रति मुझे भी दिया. मैंने उस लेटर को ट्रैक किया तथा संबंधित अधिकारियों से बात करके उचित कार्रवाई की बात की. मैंने इस मामले में दिल्ली महिला आयोग का भी सहयोग लिया. इस बीच दिल्ली महिला आयोग की हेल्पलाइन कि टीम ने फोन पर दोनों पीड़ित साध्वी बहनों की काउंसलिंग की और उनको पुलिस स्टेशन में मुकदमा दर्ज करने के लिए कहा.

इस पर बड़ी बहन ममता बिहार में जाकर बाबा के खिलाफ मुकदमा करने पर तैयार हुई. फिर ममता 25 जनवरी को लुधियाना से दिल्ली आई. तब हमने दिल्ली महिला आयोग और बिहार महिला हेल्पलाइन को सूचित करते हुए उसे दिल्ली से बिहार भेज दिया. वहां के स्थानीय साथियों ने उनकी मदद की और उसने 28 जनवरी को सुपौल पुलिस अधीक्षक के पास पहुंचकर अपना बयान देकर एफ आई आर दर्ज करवाई. जिसके आधार पर बलात्कारी ढोंगी बाबा मनमोहन को पुलिस ने फुलपरास मधुबनी स्थित उसके आश्रम से गिरफ्तार कर लिया.

गिरफ्तारी के बाद बाबा के गुंडे समर्थक लोग बौखला गए हैं. चूंकी बलात्कारी ढोंगी पाखंडी बाबा मनमोहन को यह मालूम हो चुका है कि इस मामले को सामने लाने में पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता राजीव कुमार यानि मेरा हाथ है इसलिए वह और उसके गुंडे लगातार मेरे पीछे पड़े हैं और मुझे जान से मारने की धमकी दे रहे हैं. मेरी कभी भी हत्या करा सकता है.

अतः साथियों मैं आप सभी को सूचित करता हूं कि भविष्य में यदि मेरी हत्या होती है अथवा मुझ पर जानलेवा हमला या फिर कोई अप्रिय घटना मेरे साथ घटित होती है तो इसका जिम्मेदार बलात्कारी बाबा मनमोहन साहेब होगा.

आपका साथी राजीव कुमार फ्री लांसर पत्रकार तथा सामाजिक कार्यकर्ता नई दिल्ली email- rajeevkppusa@gmail.com 

मीडिया में बाबा से संबंधित खबर   

भीमा कोरेगांव मामले में दलित स्कॉलर आनंद तेलतुंबड़े गिरफ्तार

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पुणे। पुणे पुलिस ने सामाजिक कार्यकर्ता और दलित स्कॉलर आनंद तेलतुंबड़े को गिरफ्तार कर लिया है. तेलतुंबड़े को शनिवार को पुणे पुलिस ने मुंबई एयरपोर्ट से गिरफ्तार किया. उन्हें 1 जनवरी 2018 को भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा को लेकर गिरफ्तार किया गया है. तेलतुंबड़े को नक्सलियों के साथ संबंध होने के आरोप के तहत गिरफ्तार किया गया है.

आनंद तेलतुंबड़े को गिरफ्तारी के बाद पुणे ले जाया गया है जहां उनके मेडिकल चेकअप करवा लिए गए हैं और फिलहाल उन्हें लाश्कर पुलिस स्टेशन में रखा गया है. जहां से आज दोपहर 2 बजे उन्हें कोर्ट में पेश किया जाएगा. इससे पहले शुक्रवार को पुणे सेशन कोर्ट ने तेलतुंबड़े की अग्रिम जमानत की याचिका रद्द कर दी गई थी जिसके बाद उनकी गिरफ्तारी की गई है. उनकी अग्रिम जमानत रद्द करते हुए कोर्ट ने कहा था कि जांच अधिकारियों के पास तेलतुंबड़े के खिलाफ पर्याप्‍त सबूत हैं. बता दें कि कुछ समय पहले पुणे पुलिस ने तेलतुंबड़े के गोवा स्थित आवास पर भी छापेमारी की थी, जिसमें पुलिस को कई महत्वपूर्ण सबूत भी मिले थे. इस मामले में पुणे पुलिस पहले ही वरवरा राव, अरुण फरेरा, सुधा भारद्वाज, गौतम नौलखा और वेरनोन गोंजाल्विज जैसे कुछ वामपंथी विचारकों को पहले ही गिरफ्तार कर चुकी है.

गौरतलब है कि 31 दिसंबर, 2017 को भीमा कोरेगांव में पेशवाओं पर महार रेजिमेंट की जीत के 200 साल पूरे हुए थे जिसके उपलक्ष्य में पुणे के शनिवारवाड़ा में यल्गार परिषद ने जश्न मनाने के लिए कार्यक्रम का आयोजन किया गया था. इसमें सुधीर धावले, पूर्व जस्टिस बीजी कोल्से पाटिल के अलावा कई अन्य संगठन दलितों और अल्पसंख्यकों पर मौजूदा सरकार के अत्याचारों का दावा करते हुए एकजुट हुए थे. इस जश्न के अगले ही दिन भीमा कोरेगांव में हिंसा हुई थी.

क्या जनबुद्धिजीवी प्रोफेसर आनन्द तेलतुम्बड़े सलाखों के पीछे भेज दिए जाएंगे?

एक आसन्न गिरफ़्तारी देश के ज़मीर पर शूल की तरह चुभती दिख रही है. पुणे पुलिस द्वारा भीमा कोरेगांव मामले में प्रोफेसर आनन्द तेलतुम्बड़े के ख़िलाफ़ दायर एफ आई आर को खारिज करने की मांग को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ठुकरा दिए जाने के बाद यह स्थिति बनी है. अदालत ने उन्हें चार सप्ताह तक गिरफ़्तारी से सुरक्षा प्रदान की है और कहा है कि इस अन्तराल में वह निचली अदालत से जमानत लेने की कोशिश कर सकते हैं. इसका मतलब है कि उनके पास फरवरी के मध्य तक का समय है.

इस मामले में बाकी विद्वानों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को जमानत देने से इन्कार करनेवाली निचली अदालत इस मामले में अपवाद करेगी, इसकी संभावना बहुत कम बतायी जा रही है. सुधा भारद्वाज, वर्नन गोंसाल्विस, वरवर राव, गौतम नवलखा, अरुण फरेरा जैसे अनेक लेखक और मानवाधिकार कार्यकर्ता सरकार के निशाने पर आ चुके हैं और इनमें से ज़्यादातर को गिरफ़्तार किया जा चुका है.

दलित खेत मज़दूर माता-पिता के घर जनमे और अपनी प्रतिभा, लगन, समर्पण और प्रतिबद्धता के ज़रिए विद्वतजगत में ही नहीं बल्कि देश के ग़रीबों-मजलूमों के हक़ों की आवाज़ बुलन्द करते हुए नयी उंचाइयों तक पहुंचे प्रोफेसर आनन्द तेलतुम्बड़े की यह आपबीती देश-दुनिया के प्रबुद्ध जनों में चिन्ता एवं क्षोभ का विषय बनी हुई है.

विश्वविख्यात विद्वानों नोम चोमस्की, प्रोफेसर कार्नेल वेस्ट, जां द्रेज से लेकर देश दुनिया के अग्रणी विश्वविद्यालयों, संस्थानों से सम्बद्ध छात्र, कर्मचारियों एवं अध्यापकों ने और दुनिया भर में फैले अम्बेडकरी संगठनों ने एक सुर में यह मांग की है कि ‘पुणे पुलिस द्वारा डा आनन्द तेलतुम्बड़े, जो वरिष्ठ प्रोफेसर एवं गोवा इन्स्टिटयूट ऑफ़ मैनेजमेण्ट में बिग डाटा एनालिटिक्स के विभागाध्यक्ष हैं, के ख़िलाफ़ जो मनगढंत आरोप लगाए गए हैं, उन्हें तत्काल वापस लिया जाए.’ जानीमानी लेखिका अरूंधती रॉय ने कहा है कि ‘उनकी आसन्न गिरफ़्तारी एक राजनीतिक कार्रवाई होगी. यह हमारे इतिहास का एक बेहद शर्मनाक और खौफ़नाक अवसर होगा.’

मालूम हो कि इस मामले में प्रोफेसर आनन्द तेलतुम्बड़े के ख़िलाफ़ प्रथम सूचना रिपोर्ट पुणे पुलिस ने पिछले साल दायर की थी और उन पर आरोप लगाए गए थे कि वह भीमा कोरेगांव संघर्ष के दो सौ साल पूरे होने पर आयोजित जनसभा के बाद हुई हिंसा के लिए जिम्मेदार हैं (जनवरी 2018). यह वही मामला है जिसमें सरकार ने देश के चन्द अग्रणी बुद्धिजीवियों को ही निशाना बनाया है, जबकि इस प्रायोजित हिंसा को लेकर हिन्दुत्ववादी संगठनों पर एवं उनके मास्टरर्माइंडों पर हिंसा के पीड़ितों द्वारा दायर रिपोर्टों को लगभग ठंडे बस्ते में डाल दिया है.

इस मामले में दर्ज पहली प्रथम सूचना रिपोर्ट (8 जनवरी 2018) में प्रोफेसर आनन्द का नाम भी नहीं था, जिसे बिना कोई कारण स्पष्ट किए 21 अगस्त 2018 को शामिल किया गया और इसके बाद उनकी गैरमौजूदगी में उनके घर पर छापा भी डाला गया, जिसकी चारों ओर भर्त्सना हुई थी.

गौरतलब है कि जिस जनसभा के बाद हुई हिंसा के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, उसका आयोजन सेवानिवृत्त न्यायाधीश पी बी सावंत और न्यायमूर्ति बी जी कोलसे पाटील ने किया था, जिसमें खुद डा आनन्द शामिल भी नहीं हुए थे बल्कि अपने एक लेख में उन्होंने ऐसे प्रयासों की सीमाओं की बात की थी. उन्होंने स्पष्ट लिखा था कि ‘भीमा कोरेगांव का मिथक उन्हीं पहचानों को मजबूत करता है, जिन्हें लांघने का वह दावा करता है. हिन्दुत्ववादी शक्तियों से लड़ने का संकल्प निश्चित ही काबिलेतारीफ है, मगर इसके लिए जिस मिथक का प्रयोग किया जा रहा है वह कुल मिला कर अनुत्पादक होगा.’

मालूम हो कि पिछले साल इस गिरफ़्तारी को औचित्य प्रदान करने के ‘सबूत’ के तौर पर पुणे पुलिस ने ‘‘कामरेड आनंद’’ को सम्बोधित कई फर्जी पत्र जारी किए. पुणे पुलिस द्वारा लगाए गए उन सभी आरोपों को डा तेलतुम्बड़े ने सप्रमाण, दस्तावेजी सबूतों के साथ खारिज किया है. इसके बावजूद ये झूठे आरोप डा तेलतुम्बड़े को आतंकित करने एवं खामोश करने के लिए लगाए जाते रहे हैं. जैसा कि स्पष्ट है यूएपीए (अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेन्शन एक्ट) की धाराओं के तहत महज़ इन आरोपों के बलबूते डा तेलतुम्बड़े को सालों तक सलाखों के पीछे रखा जा सकता है.

डा आनन्द तेलतुम्बड़े की संभावित गिरफ़्तारी कई ज़रूरी मसलों को उठाती है.

दरअसल रफ़्ता-रफ़्ता दमनकारी भारतीय राज्य ने अपने-आप को निर्दोष साबित करने की बात खुद पीड़ित पर ही डाल दी है: ‘हम सभी दोषी है जब तक हम प्रमाणित न करें कि हम निर्दोष हैं. हमारी जुबां हमसे छीन ली गयी है.’

प्रोफेसर आनन्द की संभावित गिरफतारी को लेकर देश की एक जानीमानी वकील ने एक विदुषी के साथ निजी बातचीत में (scroll.in) जो सवाल रखे हैं, वह इस मौके पर रेखांकित करनेवाले हैं. उन्होंने पूछा है, ‘आख़िर आपराधिक दंडप्रणाली के प्राथमिक सिद्धांतों का क्या हुआ? आखिर क्यों अदालतें सबूतों के आकलन में बेहद एकांतिक, लगभग दुराग्रही रूख अख्तियार कर रही हैं? आखिर अदालतें क्यों कह रही हैं कि अभियुक्तों को उन मामलों में भी अदालती कार्रवाइयों से गुज़रना पड़ेगा जहां वह खुद देख सकती हैं कि सबूत बहुत कमज़ोर हैं, गढ़े गए हैं और झूठे हैं ? आखिर वे इस बात पर क्यों ज़ोर दे रही हैं कि एक लम्बी, थकाउ, खर्चीली अदालती कार्रवाई का सामना करके ही अभियुक्त अपना निर्दोष होना साबित कर सकते हैं, जबकि जुटाए गए सबूत प्रारंभिक अवस्था में ही खारिज किए जा सकते हैं ? ’

‘आज हम उस विरोधाभासपूर्ण स्थिति से गुजर रहे हैं कि आला अदालत को राफेल डील में कोई आपराधिकता नज़र नहीं आती जबकि उसके सामने तमाम सबूत पेश किए जा चुके हैं, वहीं दूसरी तरफ वह तेलतुम्बड़े के मामले में गढ़ी हुई आपराधिकता पर मुहर लगा रही हैं. न्याय का पलड़ा फिलवक्त़ दूसरी तरफ झुकता दिखता है. इस बात को मददेनज़र रखते हुए कि अदालत ने जनतंत्र में असहमति की भूमिका को रेखांकित किया है, आखिर वह मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों के लिए दूसरा पैमाना अपनाने की बात कैसे कर सकती है.’

लेखकों, संस्कृतिकर्मियों, प्रबुद्ध जनों की यह सभा इस समूचे घटनाक्रम पर गहरी चिन्ता प्रकट करती है और सरकार से यह मांग करती है कि उनके ख़िलाफ़ लगाए गए सभी फ़र्जी आरोपों को तत्काल खारिज किया जाए.

हम देश के हर संवेदनशील, प्रबुद्ध एवं इन्साफ़पसंद व्यक्ति के साथ, कलम के सिपाहियों एवं सृजन के क्षेत्र में तरह तरह से सक्रिय लोगों एवं समूहों के साथ इस चिन्ता को साझा भी करना चाहते हैं कि प्रोफेसर आनन्द तेलतुम्बड़े, जो जाति-वर्ग के अग्रणी विद्वान हैं, जिन्होंने अपनी छब्बीस किताबों के ज़रिये – जो देश- दुनिया के अग्रणी प्रकाशनों से छपी हैं, अन्य भाषाओं में अनूदित हुई हैं और सराही गयी हैं – अकादमिक जगत में ही नहीं सामाजिक-राजनीतिक हल्कों में नयी बहसों का आगाज़ किया है, जो कमेटी फ़ॉर प्रोटेक्शन आफ डेमोक्रेटिक राइट्स – जो मानवाधिकारों की हिफाजत के लिए बनी संस्था है – के सक्रिय कार्यकर्ता रहे है, जिन्होंने जनबुद्धिजीवी के तौर पर सत्ताधारियों को असहज करनेवाले सवाल पूछने से कभी गुरेज नहीं किया है, और जो फ़िलवक्त गोवा इन्स्टिटयूट ऑफ़ मैनेजमेण्ट में ‘बिग डाटा एनालिटिक्स’ के विभागप्रमुख हैं और उसके पहले आई आई टी में प्रोफेसर, भारत पेटोलियम कार्पोरेशन लिमिटेड के कार्यकारी निदेशक और पेट्रोनेट इंडिया के सीईओ जैसे पदों पर रहे चुके हैं, क्या हम उनकी इस आसन्न गिरफतारी पर हम मौन रहेंगे!

आईए, अपने मौन को तोड़ें और डा अम्बेडकर के विचारों को जन जन तक पहुंचाने में मुब्तिला, उनके विचारों को नए सिरे से व्याख्यायित करने में लगे इस जनबुद्धिजीवी के साथ खड़े हों!

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यह जुमलेबाजी वाला बजट है – मायावती

नई दिल्ली। केन्द्र में वर्तमान बीजेपी सरकार के आज लोकसभा में पेश अन्तिम व चुनाव पूर्व के अन्तरिम बजट को एक बार फिर जमीनी हकीकत व कड़वी वास्तविकता के सही समाधान से दूर ज्यादातर जुमलेबाजी वाला ही बजट बताते हुये बी.एस.पी. की राष्ट्रीय अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री व पूर्व सांसद सुश्री मायावती जी ने कहा कि पिछले पाँच वर्षों के इनके कार्यकाल में देश में आर्थिक समानता की खाई और ज्यादा बढ़ी है अर्थात् भारत में धन व विकास केवल कुछ मुट्ठीभर धन्नासेठों के हाथों में सिमट गया है जो इस सरकार की विफलता व घोर गरीब व किसान विरोधी व धन्नासेठ समर्थन नीति व गलत कार्यप्रणाली के साथ-साथ इनके अहंकारी होने को भी प्रमाणित करता है.

केन्द्र में काम-चलाऊ वित्त मंत्री श्री पियूष गोयल द्वारा पेश अन्तरिम बजट पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुये सुश्री मायावती जी ने कहा कि बीजेपी के लम्बे-चौड़े बयानों, बखानों व जुमलेबाजी आदि से देश की तकदीर नहीं बदल सकती है, और ना ही देश में लम्बे समय से जारी जर्बदस्त मंहगाई, गरीबी, अशिक्षा व बेरोजगारी आदि को गम्भीर व देशव्यापी समस्या समाप्त हो सकती है बल्कि इसके लिये सही नियत व समर्पित दृढ़ इच्छाशक्ति की जरुरत होती है जिसका केन्द्र में आसीन सरकारों में अब तक अभाव रहा है. कुल मिलाकर बीजेपी सरकार की अनेकों प्रकार की चुनावी वादाखिलाफी की तरह ही इनका पाँच वर्षों का कार्यकाल खासकर नोटबन्दी, जी.एस.टी. और उसके कारण उत्पन्न बेरोजगारी की गम्भीर समस्या के साथ-साथ इनका अन्तरिम बजट भी देश की आमजनता के लिये मायूस व बेचैन करने वाला ही है.

इतना ही नहीं बल्कि केन्द्र सरकार ने खासकर गरीबों, मजदूरों व किसानों आदि के नाम पर अभी तक जो भी योजनाएं घोषित की हैं उन सभी से इसके असली जरुरतमन्दों व हकदारों को कम तथा बड़े-बड़े पूँजीपतियों व धन्नासेठों को ही ज्यादा लाभ पहुँचा है. यही कारण है कि वे लोग बिना किसी खास मेहनत व उपलब्धि के और ज्यादा धनवान बनते चले जा रहे हैं. इससे आर्थिक विषमता व गैर-बराबरी काफी ज्यादा बढ़ी है जो कतई देशहित की बात नहीं हैं.

सुश्री मायावती जी ने देश की आमजनता से अपील की कि वे बीजेपी की सरकार की गलत नीतियों व अहंकारी कार्यकलापों को उसकी वास्तविकता के आधार पर परखें तथा खासकर अब चुनाव पूर्व की इनकी हवा-हवाई बातों, लोक-लुभावन वायदों के साथ-साथ इनके द्वारा धार्मिक उन्माद को भड़काकर अपनी विफलताओं पर से ध्यान बांटने के हथकण्डे में ना आयें बल्कि अपना भविष्य संवारने के लिये आने वाले समय में काफी गहन सोच-विचार के बाद ही ऐसा फैसला करें जिसमें उनका अपना वास्तविक हित व देशहित एवं समाजहित निहित हो.

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हुसैनाबाद के बसपा विधायक से फोन पर मांगी रंगदारी

रांची-झारखंड के हुसैनाबाद के बसपा विधायक कुषवाहा षिवपूजन मेहता से रंगदारी मांगी गई है. उन्होंने इसकी जानकारी विधानसंभा अध्यक्ष दिनेष उरांव और रांची पुलिस से लिखित रूप में दी है. विधायक ने बताया कि माफिया डान के नाम से सोमवार की दोपहर लगभग 1;15 बजे उनके मोबाईल पर फोन आया था. फोन करने वाले ने खुद को माफिया डान बताया और 20 पेटी देने की बात कही. साथ ही यह कहा कि अगर रंगदारी नहीं मिली तो जान से मार देंगे.

विधायक ने विधानसभा अध्यक्ष और पुलिस में लिखित षिकायत में अपने दो माबाईल फोन नंबर भी दिया है. विधायक ने अपने और अपने परिवार की सुरक्षा की मांग की है.

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Budget 2019: मध्यवर्ग को टैक्स में राहत, किसानों की मदद के लिए विशेष कदम उठाने का होगा ऐलान?

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नई दिल्ली। आम चुनाव बेहद नजदीक होने के कारण मोदी सरकार पर कृषि संकट और मध्यवर्ग की मुश्किलों को दूर करने का बड़ा दबाव है. इसका असर अंतरिम बजट में देखा जा सकता है. अंतरिम वित्त मंत्री पीयूष गोयल पहले बजट भाषण में किसानों के साथ-साथ मध्यवर्ग को खुशखबरी दे सकते हैं. अंतरिम बजट में कई दिलचस्प घोषणाएं हो सकती हैं. इनमें संभवतः कृषि क्षेत्र के संकट को दूर करने के साथ-साथ मध्यवर्ग को टैक्स में राहत देने के प्रयास शामिल होंगे. दरअसल सरकार के सामने अगले आम चुनाव की चुनौती है जिसे किसानों एवं मध्यवर्ग की विशाल आबादी का दिल जीतकर आसान बनाया जा सकता है.

टैक्स पर छूट, लेकिन किस तरह?

टैक्स पर छूट की रूपरेखा क्या होगी, यह तो अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन सूत्रों ने संकेत दिया है कि 1 फरवरी को पेश होने जा रहे बजट में वित्त वर्ष 2019-20 के पहले कुछ महीनों के दौरान टैक्स छूट का ऐलान संभव है. बजट में यह वादा किया जा सकता है कि अगर मोदी सरकार दोबारा सत्ता में आई तो इस राहत की अवधि बढ़ाई जाएगी.

कौन सा विकल्प अपनाएगी सरकार? अभी वित्त मंत्रालय का कामकाज देख रहे केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल अपने पहले बजट भाषण के बड़े हिस्से में सरकार की विभिन्न पहलों एवं भविष्य के अजेंडे का बखान कर सकते हैं. अटकलें लग रही हैं कि गोयल टैक्स पर राहत देने के लिए स्लैब में बदलाव करेंगे या फिर स्टैंडर्ड डिडक्शन की सीमा 40 हजार रुपये से बढ़ाने का ऐलान होगा. चर्चा इस बात की भी है कि वह मेडिकल इंश्योरेंस लेने पर छूट के ऐलान तक ही सीमित रह सकते हैं.

जेटली का संकेत

बहरहाल, मोदी सरकार से इस बजट में बड़े-बड़े ऐलान की उम्मीद की जा रही है, लेकिन आशंका यह भी है कि अंतरिम बजट की बाध्याताओं के कारण ऐसा संभव नहीं हो. हालांकि, अमेरिका में इलाज करा रहे निवर्तमान वित्त मंत्री अरुण जेटली ने हाल ही में संकेत दिया था कि सरकार अर्थव्यवस्था की तात्कालिक चुनौतियों से निपटने के लिए कदम उठा सकती है. इसलिए, उम्मीद की जा रही है कि इस बार के कृषि संकट और इसका अर्थव्यवस्था पर असर जैसे मुद्दे बजट की प्राथमिकता में शामिल रह सकते हैं.

सरकार की मुश्किल

पिछले बजट में भी टैक्स दरों में बदलाव की बड़ी उम्मीद जताई गई थी, लेकिन वित्तीय अनुशासन में बंधे होने के कारण सरकार ने ऐसा कोई ऐलान नहीं किया था. हालांकि, सरकार लगातार कहती रही है कि टैक्सपेयर के पॉकेट में ज्यादा पैसे रहने से अर्थव्यवस्था में मांग बढ़ती है. सरकार के सामने मुश्किल यह है कि आयुष्मान भारत जैसी विशाल योजना को सुचारू तरीके से चलाने के लिए मोटी रकम की जरूरत है जबकि जीएसटी के तहत टैक्स कलेक्शन अब भी लक्ष्य से कम हो रहा है.

बिहार महागठबंधन में चल रही वर्चस्व की लड़ाई

पटना। सीट बंटवारे से पहले महागठबंधन के बड़े नेताओं के बीच बौद्धिक और राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई भी शुरू हो गई है. हैसियत बचाने-बढ़ाने के लिए राजद-कांग्रेस में जारी दांव-पेंच से अलग लालू प्रसाद यादव और शरद यादव भी अपनी-अपनी चालें चल रहे हैं.

मधेपुरा को लेकर ठन गया है मामला

बिहार की सियासत में तीन दशकों से दोस्ती-दुश्मनी का सिलसिला निभाते आ रहे दोनों दिग्गजों के बीच अबकी फिर मधेपुरा को लेकर ही ठन गई है. राजनीति में तेजी से उभर रहे तेजस्वी यादव की राह में शरद का सियासी कद रोड़े अटका सकता है. इसलिए लालू की कोशिश है कि जदयू से अलग होने के बाद शरद की मद्धिम होती सियासी शक्ति को दोबारा नहीं पनपने दिया जाए, जिनसे वह खुद एक बार पराजित हो चुके हैं.

शरद के सामने अस्तित्व बचाने का संकट

बेबाक और समाजवादी चरित्र के शरद यादव की अतीत की गतिविधियों की गणना करते हुए लालू प्रसाद यादव की नजर भविष्य पर है. अपने सियासी उत्तराधिकारी की हिफाजत के लिए उन्होंने शरद के सामने स्पष्ट कर दिया है कि उन्हें मधेपुरा के मैदान में राजद के सिंबल पर ही उतरना होगा. लालू की चाल से जहां कांग्रेस की कृपा के आकांक्षी पप्पू यादव के लिए दिल्ली दूर नजर आने लगी है, वहीं शरद के सामने भी अस्तित्व बचाने का संकट खड़ा हो गया है.

पप्पू यादव ने भी खोल रखे हैं सारे घोड़े

रांची के रिम्स में भर्ती लालू से तीन-तीन बार मिलने के बाद भी अगली पारी को लेकर वह आश्वस्त नहीं हैं. कांग्रेस पप्पू यादव के लिए राजद से मधेपुरा मांग रही है. सिटिंग के नाम पर पप्पू यादव ने भी सारे घोड़े खोल रखे हैं. जाप के राष्ट्रीय प्रधान महासचिव एजाज अहमद के मुताबिक मधेपुरा से कोई समझौता नहीं होगा. एक सीट के लिए शरद को संघर्ष करते हुए देखकर पूर्व विधानसभा अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी ने लालटेन थामने में देर नहीं की. चौधरी जमुई से टिकट के दावेदार हैं.

शरद यादव ने ही की थी शुरुआत

अबकी दांव-पेच की शुरुआत शरद ने ही की थी. पाला बदलकर राजग से आए रालोसपा प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा को साथ लेकर महागठबंधन में वह खुद को मजबूत करने की कोशिश में थे. इसके लिए रालोसपा में अपनी नई पार्टी के विलय की तैयारी में थे. वहीं हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) प्रमुख जीतनराम मांझी पर भी डोरे डाले जा रहे थे.

मुकेश सहनी को ज्वाइन कराकर संतुलन बनाने की कोशिश

इसकी भनक मिलते ही लालू ने आनन-फानन में तेजस्वी ने मुकेश सहनी को ज्वाइन कराकर संतुलन बनाने की कोशिश की. सहनी को साथ लाने के पहले तेजस्वी ने अन्य सहयोगी दलों से सहमति नहीं ली थी. लालू के दबाव पर शरद को प्रेस कॉन्फ्रेंस करके रालोसपा में अपने दल के विलय की बात का खंडन करना पड़ा.

विभागवार आरक्षण : वर्ग संघर्ष के इतिहास में वंचितों वर्गों पर एक और प्रहार!

7 जनवरी को मंत्रिमंडल में पारित प्रस्ताव को मोदी सरकार द्वारा संविधान की धज्जियां विखेरते हुए महज दो दिनों में लोकसभा एवं राज्यसभा में पास कराकर सवर्णों को आरक्षण दिलाने के बाद, जिस तरह सुप्रीम कोर्ट ने 22 जनवरी ,2019 को समग्र विश्विद्यालय को आरक्षण की इकाई मानने की जगह विभाग को इकाई मानने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय पर मुहर लगाई है, उससे हजारों साल से शक्ति के स्रोतों से वंचित विश्व की विपुलतम आबादी हतप्रभ है. हतप्रभ हो भी क्यों नहीं, क्योंकि विभागवार आरक्षण लागू होने के बाद हजारों साल से शिक्षालयों से बहिष्कृत दलित, आदिवासी और पिछड़ों का उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षक बनना एक सपना बन जायेगा. विपरीत इसके भारत के उच्च शिक्षा केंद्रों के शिक्षक पदों पर सवर्णों का एकाधिकार और पुष्ट हो जायेगा. कारण ,13 पॉइंट रोस्टर प्रणाली में किसी खास विषय के लिए निकलने वाले प्रथम तीन पद सामान्य के लिए और चौथा पद ओबीसी के लिए होगा. इसके बाद का पांचवां और छठा पद भी सामान्य वर्ग के लिए रहेगा तथा सातवां पद अनुसूचित जाति एवं 14 वां पद अनुसूचित जनजाति के कोटे में जायेगा.

चूंकि एक विषय की सामान्यतया दो या तीन रिक्तियां ही निकली हैं, इस हिसाब से आरक्षित वर्गों(एसटी/एससी और ओबीसी) के लिए कॉलेज/विश्वविद्यालयों में शिक्षक बनना सचमुच एक सपना बन जायेगा.बहरहाल सिर्फ भारत के जन्मजात वंचित ही नहीं, दुनिया भर के विवेकवान लोग इस बात से हतप्रभ हैं कि जिस देश में भीषणतम असमानता से राष्ट्र की एकता और अखंडता पहले से ही खतरे के सम्मुखीन है, उस देश में सवर्ण आरक्षण के बमुश्किल दो सप्ताह बाद ही उच्च शिक्षा में सवर्णों के एकाधिकार को और मजबूत करने जैसा फैसला कैसे ले लिए गया! ऐसा फैसला लेते हुए क्यों यह भय नहीं हुआ कि इससे देश में विस्फोटक हालात पैदा हो सकते हैं.दरअसल ऐसा नहीं है कि इस देश का शासक वर्ग इन खतरों से अनजान है, किन्तु वह विस्फोटक स्थिति से भलीभांति अवगत होने के बावजूद ऐसे खतरे इसलिए उठा रहे है क्योंकि उसे पता है कि अपने वर्ग-शत्रुओं को नेस्तनाबूद करने लायक, उसे इससे बेहतर अवसर मिल ही नहीं सकते. इसलिए वह अपने स्व-वर्गीय हित में अँधा होकर ऐसे-ऐसे फैसले ले रहा है, जिसकी अन्यत्र कल्पना ही नहीं की जा सकती. इसे समझने के लिए एक बार फिर महान समाज विज्ञानी कार्ल मार्क्स के नजरिये से मानव जाति के इतिहास का,जिसकी हम अनदेखी करने के अभ्यस्त रहे हैं, सिंहावलोकन कर लेना पड़ेगा.

मार्क्स ने कहा है ‘अब तक का विद्यमान समाजों का लिखित इतिहास वर्ग-संघर्ष का इतिहास है. एक वर्ग वह है जिसके पास उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व है और दूसरा वह है, जो शारीरिक श्रम पर निर्भर है. पहला वर्ग सदैव ही दूसरे का शोषण करता रहा है. मार्क्स के अनुसार समाज के शोषक और शोषित : ये दो वर्ग सदा ही आपस में संघर्षरत रहे और इनमें कभी भी समझौता नहीं हो सकता. मार्क्स के वर्ग-संघर्ष के इतिहास की यह व्याख्या मानव जाति के सम्पूर्ण इतिहास की निर्भूल व अकाट्य सचाई है, जिसकी भारत में बुरी तरह अनदेखी होती रही है, जोकि हमारी ऐतिहासिक भूल रही. ऐसा इसलिए कि विश्व इतिहास में वर्ग-संघर्ष का सर्वाधिक बलिष्ठ चरित्र हिन्दू धर्म का प्राणाधार उस वर्ण-व्यवस्था में क्रियाशील रहा है, जो मूलतः शक्ति के स्रोतों अर्थात उत्पादन के साधनों के बंटवारे की व्यवस्था रही है एवं जिसके द्वारा ही भारत समाज सदियों से परिचालित होता रहा है. जी हाँ, वर्ण-व्यवस्था मूलतः संपदा-संसाधनों, मार्क्स की भाषा में कहा जाय तो उत्पादन के साधनों के बटवारे की व्यवस्था रही. चूँकि वर्ण-व्यवस्था में विविध वर्णों(सामाजिक समूहों) के पेशे/कर्म तय रहे तथा इन पेशे/कर्मों की विचलनशीलता धर्मशास्त्रों द्वारा पूरी तरह निषिद्ध रही, इसलिए वर्ण-व्यवस्था एक आरक्षण व्यवस्था का रूप ले ली,जिसे हिन्दू आरक्षण कहा जा सकता है. वर्ण-व्यवस्था के प्रवर्तकों द्वारा हिन्दू आरक्षण में शक्ति के समस्त स्रोत सुपरिकल्पित रूप से तीन अल्पजन विशेषाधिकारयुक्त तबकों के मध्य आरक्षित कर दिए गए. इस आरक्षण में बहुजनों के हिस्से में संपदा-संसाधन नहीं, मात्र तीन उच्च वर्णों की सेवा आई, वह भी पारिश्रमिक-रहित. वर्ण-व्यवस्था के इस आरक्षणवादी चरित्र के कारण दो वर्गों का निर्माण हुआ: एक विशेषाधिकारयुक्त व सुविधासंपन्न अल्पजन और दूसरा वंचित बहुजन.ऐसे में दावे के साथ कहा जा सकता है कि सदियों से भारत में वर्ग संघर्ष आरक्षण में क्रियाशील रहा है. हजारों साल से भारत के विशेषाधिकारयुक्त जन्मजात सुविधाभोगी और वंचित बहुजन समाज : दो वर्गों के मध्य आरक्षण पर जो अनवरत संघर्ष जारी रहा, उसमें 7 अगस्त, 1990 को मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद एक नया मोड़ आ गया. इसके बाद शुरू हुआ आरक्षण पर संघर्ष का एक नया दौर.

वर्ग संघर्ष का नया दौर शुरू होते ही आधुनिक भारतीय राजनीति में चाणक्य के नाम से मशहूर नरसिंह राव ने 24 जुलाई ,1991 को गृहित किया ट्रिकल डाउन थ्योरी पर केन्द्रित नवउदारवादी अर्थनीति. राव का मानना था, इससे विकास झरने की भांति ऊपर से नीचे आयेगा, जो शासको की कुत्सित नीति के चलते मुमकिन ही नहीं हो पाया. बहरहाल नवउदारवादी अर्थनीति को अपनाने के पीछे राव के दो हिडेन अजेंडा थे: पहला, आरक्षण को कागजों की शोभा बनाना और दूसरा परम्परागत विशेषाधिकारयुक्त सुविधाभोगी वर्ग के आर्थिक और शैक्षिणक वर्चस्व को और मजबूत करना . चूंकि कांग्रेस और भाजपा दोनों ही सवर्णवादी पार्टियां हैं और दोनों का ही वर्गीय हित एक है, इसलिए अपने वर्गीय हित में दोनों ही दलों के प्रधानमंत्रियों ने राव के बनाये ट्रैक का अनुसरण करने में होड़ लगाया, जिसमे सबको पीछे छोड़ गए वह मोदी, जिन्होंने महज दो दिनों में सवर्ण अरक्षण बिल पास कराने का चमत्कार घटित कर दिया. राव की नीतियों के कारण आज की तारीख में हिन्दू आरक्षण के सुविधाभोगी वर्ग का अर्थ-सत्ता, राज-सत्ता और धर्म-सत्ता की भांति ज्ञान-सत्ता पर 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा हो चुका है. बहरहाल मॉडर्न चाणक्य ने वर्ग शत्रु के सफाए के लिए निजीकरण ,उदारीकरण, भूमंडलीकारण, विनिवेशीकरण का जो जाल बिछाया, उससे शिक्षा का क्षेत्र भी अछूता न रहा. उन्होंने सुपरिकल्पित रुप से निजीकरण को जो बढ़ावा दिया उससे देखते ही देखते कार्पोरेट घरानों और सवर्ण नेताओं को महंगे-महंगे स्कूल/कॉलेजों की श्रृंखला खड़ा करने का अवसर मिल गया. इनमें शिक्षा अत्यंत महंगी होने के कारण बहुजन यहाँ स्वतः बहिष्कृत होते गए. गुणवत्ती-शिक्षा पर सवर्णों का एकाधिकार कायम करने के लिए एक ओर जहां राव ने निजी स्कूल/कॉलेजों को बढ़ावा दिया, वहीं जिन सरकारी स्कूलों में बहुजनों को शिक्षा सुलभ होती थी, उन्हें बदहाल बनाने की परिकल्पना की .इसके तहत उन्होंने 15 अगस्त,1995 को सरकारी प्राइमरी स्कूलों में मुफ्त भोजन मुहैया कराने का जो निर्णय लिया, वह बहुत मारक साबित हुआ.बहरहाल गुणवत्ती शिक्षा पर सुविधाभोगी वर्ग का एकाधिकार कायम कराने का जो रास्ता राव ने तैयार किया, उसमें उनके बाद के प्रधानमंत्रियों ने कोई छेड़छाड़ नहीं की: यदि कुछ किया तो यही किया कि जिस गुणवत्ती शिक्षा से आज के प्रतिस्पर्धी युग में अवसरों का सद्व्यवहार किया जा सकता है, उससे बहुजन और दूर छिटकते गए. अब जहां तक शिक्षा का सवाल है, अन्यान्य क्षेत्रों की भांति इस क्षेत्र में भी सवर्णों का वर्चस्व स्थापित करने में प्रधानमंत्री मोदी अपने पूर्ववर्तियों को बौना दिए.

ऐसा इसलिए कि मोदी जिस संघ से प्रशिक्षित होकर सर्वोच्च पद पर पहुंचे हैं, उस संघ और उसके राजनीतिक संगठन को हिन्दू धर्म और उन धर्मशास्त्रों में अपार आस्था रही जो, चीख-चीख कर कहते हैं कि शुद्रातिशूद्रों का जन्म सिर्फ तीन उच्च वर्णीय तबकों(सवर्णों) की निःशुल्क-सेवा के लिए हुआ है. शक्ति के स्रोतों (आर्थिक-राजनैतिक-धार्मिक-शैक्षिक) का भोग इनके लिए अधर्म है. अतः कभी जिन हिन्दू धर्म-शास्त्रों को मानवता-विरोधी मानते हुए डॉ. आंबेडकर ने डायनामाईट से उड़ाने का निदेश दिया था, उन धर्मशास्त्रों में अपार आस्था के कारण संघी मोदी के लिए आरक्षण का लाभ उठाने साक्षात् शत्रु थे. अतः आंबेडकरी रिजर्वेशन के सौजन्य से जिन जातियों के लोग आईएएस, आईपीएस,डॉक्टर,इंजीनियर, प्रोफ़ेसर बनकर हिन्दू धर्मशास्त्र-ईश्वर को भ्रान्त बना रहे थे, उन शत्रुओं को नेस्तनाबूद करने के लिए आंबेडकरी आरक्षण को व्यर्थ करने में अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में अतिरिक्त तत्परता दिखलाया, जिससे शिक्षा जगत का आरक्षण भी नहीं सलामत रह पाया. मोदी-राज में ही उच्च शिक्षा में सवर्णों का वर्चस्व दृढतर करने के लिए संस्कृत, ज्योतिष, पौरोहित्य, योग इत्यादि जैसी प्रगतिविरोधी विद्यायों को थोपने का सबलतम प्रयास हुआ. इन्ही के राज में शैक्षणिक परिसरों में भेदभाव को इतना शिखर पर पहुँचाया गया कि बहुजन समाज के भूरि –भूरि रोहित वेमुला आत्म-हत्या करने से लेकर यूनिवर्सिटीयों से भागने के लिए विवश हुए. इन्ही के राज में वंचित वर्गों के विद्यार्थियों को राजीव गांधी फेलोशिप से महरूम करने का कुत्सित प्रयास किया गया. अपने वर्ग शत्रुओं को उच्च शिक्षा से दूर धकेलने के लिए मोदी ने पांच दर्जन से अधिक शीर्ष विश्वविद्यालयों को स्वायतत्ता प्रदान किया.

अब उसी कड़ी में मोदी राज में विभागवार आरक्षण का निर्णय लेकर भारत के वर्ग संघर्ष के इतिहास में बहुजनों पर आजाद भारत का सबसे बड़ा प्रहार कर दिया गया है. इस प्रहार से बहुजन छात्र और गुरुजन उद्भ्रांत होकर इसे व्यर्थ करने के लिए किसी भी सीमा तक जाने का मन बनाते दिख रहे हैं. वे कक्षाओं का बहिष्कार कर रहे हैं, वे जगह – जगह सभा-सेमीनार आयोजित कर इसका प्रतिवाद कर रहे हैं. 13 पॉइंट रोस्टर के खात्मे व आरक्षण की पूर्व स्थिति बहाल करने के लिए जिला मुख्यालयों से लेकर प्रदेश और देश की राजधानीं में व्यापक पैमाने पर धरना प्रदर्शन की बड़ी तयारी में जुट गए हैं. उनकी तैयारी को को देखते हुए 2016 का सर्द मौसम याद आ रहा है,जब हैदराबाद विश्वविद्यालय के प्रतिभाशाली छात्र रोहित वेमुला की संस्थानिक हत्या के विरोध में उठी तरंगे विश्व विद्यालयों के कैम्पस और महानगरों को पार कर देश के छोटे-छोटे कस्बों तक फ़ैल गयी थीं. विभागवार आरक्षण के खिलाफ बहुजन छात्र और गुरुजनों में इतना तीव्र आक्रोश है, कि उनके दबाव में आकर सामाजिक न्यायवादी विभिन्न दलों के नेता भी उनके साथ कंधे-कंधा मिलाकर सडकों पर उतरने के लिए बाध्य हो गए हैं.

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अयोध्या पर भाजपा का हस्तक्षेप चुनावी हथकंडा- मायावती

नई दिल्ली। अयोध्या विवाद को लेकर केंद्र सरकार के हालिया कदम पर बसपा प्रमुख मायावती ने केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा किया है. एक बयान जारी कर बसपा प्रमुख मायावती ने कहा है कि अयोध्या में अधिगृहित भूमि का भाग रामजन्म भूमि न्यास को लौटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने की कार्रवाई जबर्दस्ती सरकारी हस्तक्षेप है. उन्होंने कहा कि ऐसा कर भाजपा लोकसभा आम चुनाव से पूर्व चुनाव को प्रभावित करना चाहती है, जो कि एक संकीर्ण सोच व विवादित कदम है. बसपा प्रमुख ने केंद्र के इस फैसले के खिलाफ देश की आम जनता से सावधान रहने की अपील की.

बसपा प्रमुख ने कहा कि माननीय सुप्रीम कोर्ट की मल्कियत वाली अयोध्या की 1991 में अधिगृहित भूमि में यथा-स्थिति को जबर्दस्ती बिगाड़ने का बीजेपी सरकार का प्रयास अनुचित व भड़काऊ भी है. यह बीजेपी का नया चुनावी हथकण्डा है. केन्द्र में बीजेपी की वर्तमान सरकार जातिवादी, साम्प्रदायिक व धार्मिक उन्माद, तनाव व हिंसा आदि के साथ-साथ संकीर्ण राष्ट्रवाद की नकारात्मक व घातक नीति व कार्यकलापों के आधार पर संविधान मंशा-विरोधी तरीके से सरकार चला रही है, जो अति-निन्दनीय है.

यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने बयान में आगे कहा है कि वैसे भी उत्तर प्रदेश में बी.एस.पी. व सपा के गठबंधन के बाद बीजेपी को लग गया है कि वह केन्द्र की सत्ता में अब दोबारा वापस आने वाली नहीं है. इससे भी बौखलायी केन्द्र व उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सरकार अब वह सभी अनुचित हथकण्डे अपना रही है जिसकी उम्मीद संविधान के आधार पर चलने वाली किसी भी सरकार से देश की आम जनता कतई नहीं करती है.

13 प्वाइंट रोस्टर के खिलाफ क्या सरकार अध्यादेश लाएगी?

20 अप्रैल 2018 को दिल्ली विश्वविद्यालय में आयोजित ‘सामाजिक न्याय युवा सम्मलेन’ में देश भर के दर्जनों विश्वविद्यालयों से छात्र प्रतिनिधियों और जनप्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया था. एक लोकतांत्रिक राज्य की कल्याणकारी अवधारणा में यह शामिल है कि वह अपने सभी नागरिकों को उच्च शिक्षा के सामान अवसर उपलब्ध कराये. जबकि आज़ादी के सात दशकों बाद भी उच्च शिक्षा की स्थिति बदहाल होती जा रही है. सरकार अपनी भूमिका को धीरे धीरे समाप्त करके सब कुछ निजी हाथों में सौंपने पर आमादा है. इसका सबसे गहरा असर देश के बहुसंख्यक वंचित-शोषित तबके पर पड़ेगा. साल 2018 के मार्च महीने में सरकार की दो घोषणाओं ने उच्च शिक्षा की बर्बादी पर मुहर लगा दी. इसमें पहला आरक्षण विरोधी विभागवार रोस्टर और दूसरा कई विश्वविद्यालयों को स्वायतता किये जाने का फैसला. सरकार के इन निर्णयों के खिलाफ़ देश भर में व्यापक पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. सर्व-सम्मति से यह अधोलिखित मांगपत्र तैयार किया गया है:-

– 5 मार्च 2018 को UGC द्वारा जारी आरक्षण विरोधी विभागवार रोस्टर को तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाए;

– देश के सभी विश्वविद्यालयों में स्वीकृत सभी रिक्त पदों पर संवैधानिक आरक्षण प्रक्रिया के तहत तत्काल स्थाई नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू की जाए.

– देश के सभी विश्वविद्यालयों में आरक्षित पदों के ‘शार्टफ़ॉल’ और ‘बैकलॉग’ पदों को विज्ञापित करके उन पर तत्काल स्थाई नियुक्ति की जाय.

– एम.फिल. व पीएच.डी. के प्रवेश में लिखित परीक्षा और साक्षात्कार के अंकों का प्रतिशत क्रमशः 70:30 किया जाए और संवैधानिक आरक्षण प्रक्रिया के पालन के साथ निष्पक्ष प्रवेश प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित किया जाए.

– सार्वजनिक वित्त-पोषित विश्वविद्यालयों पर ग्रेडेड स्वायतता जैसी निजीकरण की नीतियों को तत्काल वापस लिया जाये, तथा

– शिक्षा का बजट कुल बजट का छठवाँ हिस्सा किया जाये. उक्त मांगों से संबंधित सरकारी निकायों को चेतावनी दी गई कि यदि 15 दिन के भीतर इन सभी मसलों पर कोई ठोस कार्यवाही नहीं की गयी, तो सभी छात्र और शिक्षक एक देशव्यापी आन्दोलन खड़ा करके अपनी मांगें मनवाने के लिए बाध्य होंगे. इसके अलावा सम्मेलन में देश के प्रमुख विश्वविद्यालयों के छात्रसंघ अध्यक्ष, विधायक जिग्नेश मेवानी, विधायक पंकज पुष्कर, सांसद धर्मेंद्र यादव, पूर्व सांसद अली अनवर और मंडल मसीहा कहे जाने वाले शरद यादव ने 2019 में दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक और महिला विरोधी मोदी सरकार को उखाड़ फेंकने का आह्वान भी किया. यह भी दलित, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के लिए विश्वविद्यालयों की नियुक्ति में आरक्षण समाप्त किये जाने पर आखिर शरद यादव, जिग्नेश मेवानी और अली अनवर ने दिल्ली विश्वविद्यालय में अपना विरोध दर्ज करते हुए, नए रोस्टर व्यवस्था को तत्काल वापस लेने की मांग की.

ज्ञात हो कि शुक्रवार, 20 अप्रैल, 2018 को दिल्ली विश्वविद्यालय के आर्ट्स फैकल्टी के गेट नं 4 पर हो रहे “सामाजिक न्याय का युवा सम्मेलन” में दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ अध्यक्ष सहित जेएनयू, जामिया, एएमयू, इलाहबाद सहित 12 विश्वविद्यालय के छात्र संघ अध्यक्ष या अन्य पदाधिकारी / प्रतिनिधि शामिल हुए थे. उल्लेखनीय है कि 13 प्वाइंट रोस्टर पर लागू करने के साथ ही देश के तमाम विश्वविद्यालयों में फैकल्टी नियुक्ति में OBC, SC, ST आरक्षण को समाप्त कर दिया गया है.

यहाँ यह जानने की जरूरत है कि रोस्टर आखिर है क्या. रोस्टर पद की स्थिति (Position) बताने वाला सूत्र-क्रम है. यह रोस्टर अमूमन कम/क्रीम उच्च पदों की स्थिति (Position) को बताता है. उदाहरणार्थ यदि किसी विश्वविद्यालय/ विभाग में 2 पद ज्ञापित हुए तो इसमें Unreserved (Genaral), OBC, SC, ST किसका यह पद है, यह निर्धारण ‘रोस्टर’ से होता है. 13 प्वाइंट रोस्टर इसका विरोध करता है. 200 पद तक रोस्टर क्रमवार चलता है, इसके तहत आरक्षण प्रावधान के अनुपात में पद तय होते हैं; जैसे- Unreserved (Genaral)-49.5% OBC-27%, SC-15%, ST-7.5 % इसी अनुपात में पद भी तय होते हैं.

200 प्वाईंट्स में पद कैसे तय होता है इसमें सबसे पहले विश्वविद्यालय को यूनिट माना जाता है. उस विश्वविद्यालय के सभी विषयों को A से Z तक अल्फ़ा बेटिकट सभी पदों को एक साथ 200 तक जोड़ लिया जाता है. उसके बाद इन 200 पदों को रोस्टर के हिसाब से आवंटित किया जाता है; जैसे- 1. Unreserved (General); 2. UR ; 3. UR ; 4. OBC; 5. UR; 6. UR; 7. SC; 8. OBC; 9. UR; 10. UR ; 11. UR ;12. OBC; 13. UR; 14. ST; 15. UR; 16. UR; 17. UR; 18. OBC; 19. UR; 20. UR; 21. SC; 22. OBC; 23 UR; 24. UR; 25. UR; 26. OBC; 27. UR; 28. ST… इस प्रकार यह क्रम 200 पद तक चलता है. 200 प्वाईट के बाद पुनः 1 नंबर से पद क्रम शुरू होता है. इसमें विश्वविद्यालय को यूनिट माना जाता है. विश्वविद्यालय के सभी विषयों को एक साथ जोड़ लिया जाता है. किंतु 13 पोइंट रोस्टर इस व्यवस्था को सिरे से नकारता है.

13 प्वाइंट रोस्टर में क्या है? इस 13 प्वाइंट रोस्टर में विश्वविद्यालय के बजाय ‘विभाग’ को यूनिट माना जाता है. 14 पद के बाद पुनः 1 से पद को गिना जाने का प्रावधान है. इसके अनुसार …1. Unreserved (General); 2. UR; 3. UR; 4. OBC; 5. UR 6. UR ; 7. SC ; 8. OBC; 9. UR; 10. UR; 11. UR ;12. OBC; 13. UR ;14. ST…अब 14 के बाद 1 नम्बर से पुनः शुरू हो जायेगा.

इस तरह 13 प्वाईंट रोस्टर के खतरों को जानना जरूरी है. पहला, दरअसल विभाग को यूनिट मानने पर कभी भी एक साथ 14 पद नहीं आएंगे. ST/SC के लिए एक पद भी नहीं मिल पायेगा. आप सोचिये कि JNU, DU, AMU, BHU, HCU में कितने ऐसे विभाग हैं जिसमें मात्र एक या दो या अन्तिम तीन प्रोफेसर ही विभाग को संचालित करते हैं. वहाँ कभी भी ST/SC/OBC की न्युक्ति हो ही नहीं सकेगी. दूसरा, विभाग बहुत चालाकी से 1 या 2 या 3 पद निकालेगा. इस स्थिति में SC, ST, OBC को मिलने वाले आरक्षण की हत्या हो जाएगी. तीसरी बात, विभाग को यूनिट मानने के बाद कितने साल बाद ST का नम्बर आएगा, फिर SC का नंबर आएगा, फिर OBC का नंबर आएगा, इसका अन्दाज ही नहीं लगाया जा सकता. ज्ञात हो कि 200 प्वाइंट रोस्टर से पहले 13 प्वाईंट रोस्टर था. इसी कारण OBC, SC, ST प्रोफेसर खोजने से भी नहीं मिलते हैं. सिद्धार्थ विश्वविद्यालय, उत्तर प्रदेश में 2015 में यही 13 प्वाईंट रोस्टर लागू किया गया था जिस कारण 84 असिस्टेंट प्रोफेसर पद में ST-SC का एक भी पद नहीं आया था, OBC का एक मात्र पद आया था.

फिर सम्मेलन पर आते हैं. सम्मेलन में मांग की गई कि 200 पॉइंट रोस्टर को पुनः बहाल किया जाये. इसके लिए सरकार अध्यादेश लाये. यदि ऐसा हो पाता है तो दिल्ली विश्वविद्यालय के विभिन्न कॉलेजों में कार्यरत तमाम एडहॉक शिक्षकों की नौकरी बचेगी, जुलाई में उन्हें पुनः नियुक्ति पत्र प्राप्त होगी और स्थाई नियुक्ति की गुंजाईश बनी रहेगी, अन्यथा वे नौकरी से बाहर हो जायेंगे. 13 पोइंट रोस्टर के प्रावधान को समाप्त करने के दो ही तरीके हैं. पहला, जैसा की मांग की जा रही है सरकार इस पर अध्यादेश ला सकती है. और कानून बनाकर 13 प्वाइंट रोस्टर सिस्टम को रद्द कर सकती है. और दूसरा, सरकार सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच में जा सकती है. यहाँ सवाल उठता है क्या 13 प्वाइंट रोस्टर को वापस करने के मामले में केन्द्र सरकार अध्यादेश लाएगी?

(लेखक एक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं.)

31 जनवरी, 11 बजे, मंडी हाउस दिल्ली से होगा रोस्टर के खिलाफ बहुजनों का इंकलाब

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नई दिल्ली। 13 प्वाइंट रोस्टर को लेकर 31 जनवरी, गुरुवार को पूरा बहुजन समाज सड़क पर आने को तैयार है. विश्वविद्यालयों में एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के शोधार्थियों को नौकरी में आने से रोकने और इस वर्ग के शिक्षकों के प्रोमोशन से रोकने की साजिश के खिलाफ पूरे बहुजन समाज ने मोर्चा खोल दिया है. बहुजन समाज के तमाम संगठन एक साथ मिलकर रोस्टर का विरोध करेंगे. यह विरोध प्रदर्शन मंडी हाउस से सुबह 11 बजे शुरू होगा, जहां से संसद मार्ग तक मार्च किया जाएगा. इस विरोध प्रदर्शन को तमाम नेताओं का भी समर्थन मिला है.

इस बीच देश के प्रतिष्ठित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के सभी शिक्षक 31 जनवरी को छुट्टी लेकर 13 प्वाइंट रोस्टर के खिलाफ होने वाले आंदोलन में शामिल होंगे. जेएनयू के शिक्षक संघ के बैनर तले संसद मार्च में शामिल होंगे. जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में ‘जॉइंट फोरम फॉर एकेडेमिक एंड सोशल जस्टिस’ के तहत अनुसूचित जाति, जन जाति, एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के प्राध्यापकों एवं विद्यार्थियों की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई, जिसमे बड़ी संख्या में प्राध्यापकों एवं विद्यार्थियों ने भाग लिया.

सभी प्राध्यापकों ने यह निर्णय लिया कि वे जेएनयू शिक्षक संघ के बैनर तले आगामी 31 जनवरी को मंडी हॉउस से संसद तक होने वाले आक्रोश मार्च में शामिल होंगे. सभी विधार्थियों ने यह निर्णय लिया की वे जेएनयू स्टूडेंट यूनियन एवं अन्य छात्र संगठनों के बैनर तले इस मार्च में भाग लेंगे. सभी प्राध्यापकों ने इस बात पर चिंता व्यक्त कि की विभागवार रोस्टर लागु होने से भारतीय संविधान द्वारा प्रदत आरक्षण पूरी तरह खत्म हो जायेगा और सभी आरक्षित वर्गों हेतु उच्च शिक्षण संस्थानों के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे. उन्होंने लोक सभा एवं राज्य सभा के सभी सांसदों एवं सम्बन्धित मंत्रियों एवं संसदीय समिति के सदस्यों से मिलकर सरकार से इस सम्बन्ध में यथाशीघ्र बिल लाकर एवं उसे संसद में पास करवाने का अनुरोध करेंगे.

बैठक के बाद प्राध्यापको के अनुरोध पर प्रोफेसर अतुल सूद, अध्यक्ष जेएनयू शिक्षक संघ ने विश्वविद्यालय के पुरे शिक्षक समुदाय के साथ इस संसद मार्च में शामिल होने का आश्वासन दिया. सभी प्राध्यापकों ने यह भी निर्णय लिया की वे 31 जनवरी को सामूहिक रूप से आकस्मिक अवकाश (सी.एल.) लेंगे और इस मार्च में शामिल होंगे. विदित हो की यूजीसी द्वारा देश के सभी शैक्षणिक संस्थानों के शैक्षणिक पदों में आरक्षण हेतु विभागवार रोस्टर लागू करने के आदेश के खिलाफ पुरे देश के सैकड़ों संगठन ‘जॉइंट फोरम फॉर एकेडमिक एंड सोशल जस्टिस के बैनर तले आगामी 31 जनवरी को दिल्ली में आक्रोश मार्च कर रहे है. यह मार्च 11 बजे दिन में मंडी हॉउस से शुरू होकर संसद मार्ग तक जायेगा.

13 प्वाइंट रोस्टर के खिलाफ प्रदर्शन करते बनारस हिन्दू विवि के विद्यार्थी
13 प्वाइंट रोस्टर के खिलाफ प्रदर्शन करते बनारस हिन्दू विवि के विद्यार्थी
गौरतलब है कि देश भर में 13 प्वाइंट रोस्टर सिस्टम के खिलाफ आंदोलन हो रहा है. दिल्ली के अलावा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, इलाहाबाद युनिवर्सिटी, गोरखपुर युनिवर्सिटी सहित देश भर में बहुजन समाज के शिक्षक और शोधार्थी सड़कों पर हैं.