कोरोना संकट और आंबेडकरवाद

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आज 14 अप्रैल है। इस दिन भारत समेत पूरे विश्व में आंबेडकर जयंती हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है। किन्तु इस बार हर्षोल्लास सिरे से गायब रहेगा। वजह कोरोना है! कोरोना से पूरा विश्व आतंकित है और इससे बचने के लिए ‘सोशल डिस्टेन्सिग’ का पालन कर रहा है, जिसका अपवाद भारत भी नहीं है। सोशल डिस्टेन्सिंग को कामयाब बनाने के भारत में लॉकडाउन चल रहा है, जिसको 03 मई तक जारी रखने की घोषणा की गयी है। किन्तु इसके प्रकोप को देखते हुये कई राज्य सरकारें इसे 30 अप्रैल तक जारी रखने का निर्णय ले चुकी है। ऐसे में विभिन्न आंबेडकरवादी शख्सियतें आंबेडकर जयंती के दिन हर्षोल्लास से विरत रहने की अपील करने के लिए पिछले कई दिनों से सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं।
इस मामले में इनकी भावना का सही प्रतिबिम्बन प्राख्यात आंबेडकरवादी डॉ. एम.एल. परिहार के इन शब्दों में हो रहा है। ‘कोरोना क्राइसिस के कारण मानवता संकट में है। सभी वॉरियर्स अपनी जान जोखिम में डालकर मानवता की महान सेवा कर रहे हैं। गरीब, किसान, मजदूर , बेरोजगार मुश्किलों की दोहरी मार झेल रहे हैं। ऐसे दुख की घड़ी में कुछ लोग जिद पर अड़े हुए हैं कि वे अंबेडकर जयंती घर में धूमधाम से मनाएंगे, घर को दियों से चमकाएंगे। पिछले दिनों जब दूसरे लोगों ने ताली-थाली बजाई, फिर दिये जलाए तो इन्होंने जोरदार विरोध किया, अंधभक्त कहा। लेकिन अंबेडकर जयंती की बात आई तो कहते हैं, हम तो दिये जलाएंगे, खुशी मनाने में क्या हर्ज है? लेकिन इनका तो कुछ नहीं बिगड़ना है, गालियों के वार तो बाबासाहेब पर ही होंगे। सिर्फ एक दिन दो दिये जलाने, गले में नीला दुपट्टा लटकाने या ‘जय भीम’ चिल्लाने से कोई अंबेडकरी नहीं हो जाता, अंबेडकर को तो आचरण में उतारना पड़ता है.

भाइयों! निवेदन है कि जिद ना करो। हालात को समझो। मुश्किलों से जूझ रहे लोगों की पीड़ाओं का एहसास करो। यह उमंग व उत्सव का समय नहीं है। अध्ययन व संकट से उबरने के चिंतन का समय है। गवर्नमेंट व मेडिकल साइंस की गाइडलाइन पर चलने का समय है। गरीब व दुखी लोगों की मदद करने का समय है। यदि मनाना ही है तो धन, भोजन व शिक्षा का दान कर मनाओ। घर की मुंडेर पर दो दिये जला कर कौन सा किला फतह कर लोंगे। याद रखो, किसी भी धर्म, कौम व मान्यताओं में अंधभक्ति व कट्टरता उसके पतन का कारण होती हैं। इसलिए इस बार अंबेडकर जयंती पर खुशियां मना कर मानवता के मसीहा का अपमान मत करो। दूसरों के लिए उन्हें घृणा का पात्र मत बनाओ। बाबासाहेब तो हमेशा कहते रहे कि मेरा जन्मदिन मत बनाओ, बल्कि समाज व देश हित में मेरे बताए मार्ग पर चलो। इस विपदा में दिये जलाकर जन्मदिन मनाने की बात करने वाले अधिकतर वही लोग हैं जो सिर्फ एक दिन की औपचारिकताएं पूरी कर साल भर पै बैक टू सोसाइटी के तहत कुछ नहीं करते हैं। उलटा बारह महीने दूसरों को कोसते रहते हैं।

यह भी सभी जानते हैं कि ये लोग अंबेडकर जयंती के दिन दिये जलाने की बात उनके प्रति सम्मान या कोई वैचारिक प्रतिबद्धता की वजह से नहीं कर रहे हैं बल्कि इनका असली मकसद तो दूसरों को चिढ़ाना है। इन्हें भी दूसरों की तरह ही अंधभक्त बनना है, होड़ करनी है। सामाजिक, वैचारिक व आर्थिक प्रगति की बजाय नेगेटिविटी व नासमझियों में होड़ करनी हैं। विडंबना यह है कि बाबासाहेब को पढ़े, जाने और माने बिना बहुजन समाज में हर जगह ऐसे लोग है जो अपनी नासमझियों के कारण पूरे समाज को बदनाम करते हैं और अंबेडकर को घृणा का पात्र बना रहे हैं। अब तो बुद्ध को भी इन्होंने अपने लपेटे में ले लिया है। आज जरूरत इस बात की है कि बाबासाहेब की देश को खुशहाल करने वाली मानवतावादी विचारधारा को शांति, भाईचारा व सौहार्द भाव से समाज में फैलाई जाए ताकि उनके प्रति लोगों में व्याप्त गलत धारणाएं व घृणा का भाव खत्म हो और समाज व देश के लिए किए गए महान योगदान को जानकर देश का हर नागरिक उस सच्चे राष्ट्रप्रेमी भारतरत्न को नमन करें।’

लगता है परिहार जैसे लोगों ने जो संदेश देने का प्रयास किया है, वह रंग ला रहा है। इन पंक्तियों को लिखे जाने के दौरान मेरी नज़र प्रखर आंबेडकरवादी गिरीश अंजान के एक पोस्ट पड़ी,जिसे कईयों के साथ मैंने भी शेयर किया। अंजान ने लिखा है,’आज कोरोना कहर से देश में सैकड़ों, दुनियाँ में लाखों लोग जिंदगी गवां चुके हैं। देश में हज़ारों जिंदगी-मौत से लड़ रहे हैं, लाखों-करोड़ों लोग भूँखे, बेघर और बहुत तक़लीफ़ में हैं। अतः कोरोना त्रासदी के बीच हम सब ने करुँणा के सागर बाबा साहेब की जयंती के लिए फैसला लिया है कि इस वर्ष हम घरों में सजावट नहीं करेंगे.. मंगलगीत नहीं गायेंगे, खुशियां नहीं मनाएंगे, धूमधाम से सेलिब्रेट नहीं करेंगे,बल्कि मानवीय संवेदनाओं के साथ बहुत सादगी और संजीदगी से जयन्ती मनाएंगे।’ अंजान के पोस्ट को जिस पैमाने पर लाइक – शेयर किया गया है, उसके आधार पर आशावादी हुआ जा सकता है कि इस बार आंबेडकर जयंती सादगी और संजीदगी से मनेगी।बहरहाल परंपरा के विपरीत सादगी और संजीदगी से बाबा साहब की जयंती मनाने की मानसिक प्रस्तुति लेते समय यह ध्यान रखना होगा कि जिस कोरोना ने मक्का- मदीना, वैटिकन सिटी तथा भारत के चार धाम जैसे धार्मिक केन्द्रों को बंद करा दिया है, वह पहले से ही संकट में घिरे आंबेडकरवाद को और संकटग्रस्त करने जा रहा है। इस बात का आंकलन करने के लिए जरा आंबेडकरवाद को ठीक से समझ लेना होगा।

वैसे तो आंबेडकरवाद की कोई निर्दिष्ट परिभाषा नहीं है, किन्तु विभीन्न समाज विज्ञानियों के अध्ययन के आधार पर कहा जा सकता है कि जाति,नस्ल,लिंग,इत्यादि जन्मगत कारणों से शक्ति के स्रोतों(आर्थिक-राजनीतिक-शैक्षिक-धार्मिक इत्यादि) से जबरन बहिष्कृत कर सामाजिक अन्याय की खाई में धकेले गए मानव समुदायों को शक्ति के स्रोतों में कानूनन हिस्सेदारी दिलाने का प्रावधान करने वाला सिद्धांत ही आंबेडकरवाद है.इस वाद का औंजार है: आरक्षण, जो सबसे पहले दलित आदिवासियों के हित में प्रयुक्त हुआ: बाद में इसके दयरे में ओबीसी भी आ गए। उसके बाद ही आंबेडकरवाद नित नई ऊंचाइयां छूते चला गया तथा दूसरे वाद इसके समक्ष म्लान पड़ते गए. किन्तु यही इसके लिए काल भी बन गया। मंडलवादी आरक्षण लागू होते ही वर्ण-व्यवस्था का जो सुविधाभोगी तबका पूना-पैक्ट के जमाने से आरक्षण का विरोधी रहा, वह एक बार फिर शत्रुतापूर्ण मनोभाव लिए बहुजनों के खिलाफ मुस्तैद हो गया। यहीं से भारत में वर्ग संघर्ष की नए सिरे से शुरुआत हुई और 24 जुलाई,1991 को लागू हुई नव उदरवादी अर्थनीति को हथियार बनाकर जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग के तमाम दल अपने-अपने तरीके से अपने वर्ग- शत्रुओं(बहुजनों) को फिनिश करने में जुट गए। इस दिशा में जितना काम नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी ने और मनमोहन सिंह ने 20 सालों में किया, नरेंद्र मोदी ने उससे कहीं ज्यादा पिछले छः सालों में कर डाला है।

मोदी नें जिस निर्मम तरीके से वर्ग-शत्रुओं को फिनिश करने में अपनी तानाशाही सत्ता का इस्तेमाल किया है, उससे टॉप की 10 प्रतिशत जन्मजात सुविधाभोगी जातियों का देश की प्रायः 90% धन-दौलत दौलत पर कब्ज़ा हो गया । इनके साथ 90% वंचित आबादी जहां मात्र 10% धन पर वहीं आंबेडकर के लोग 1% धन-संपदा पर जीवन वसर करने के लिए विवश हो गए हैं। आंबेडकर के लोगों के लिए जो सरकारी नौकरियां धनार्जन का एकमात्र स्रोत थीं, वह काफी हद तक रुद्ध कर दिया गया है। यह स्रोत पूरी तरह रुद्ध हो जाय इसलिए मोदी लाभजनक सरकारी उपक्रमो सहित हास्पिटल, रेलवे, उड्डयन, इत्यादि वे ढेरों क्षेत्र निजी हाथों में देने का प्रयास कर रहे हैं, जहां आरक्षित वर्गों को जॉब मिलता है। इसी योजना के तहत ही गत फरवरी के उत्तरार्द्ध में जब कोरोना भारत में दस्तक देना शुरू किया था, मोदी मंत्रिमंडल ने दो दर्जन सरकारी उपक्रमो को निजी हाथों में देने के प्रस्ताव पर मोहर लगा दिया। अब आरक्षित वर्गों से किसी को डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफ़ेसर इत्यादि बनते देखना एक सपना बनने जा रहा है। यह सब हालात बतातें है कि मोदी राज में आंबेडकरवाद बुरी तरह संकटग्रस्त हुआ है, जिसमें कोरोना कोढ़ में खाज बनता नजर आ रहा है।

कोरोना से भारत विभाजन के दौरान हुये पलायन के जिस दुखद दृश्य की अवतारणा हुई, उसके पीछे वर्ग-शत्रुओं को फिनिश करने की मोदी की खतरनाक रणनीति की अनदेखी नहीं की जा सकती। लॉक डाउन की घोषणा के बाद यातायात की अनुपलब्धता के कारण हमने जो भूखे-प्यासे लाखों गरीब, युवा- बूढ़ों- बच्चों, अंधों-विकलांगो और स्त्री- पुरुषों को सौ-सौ, हजारों किलो मीटर दूर अवस्थित उनके गावों के लिए पैदल मार्च का जो दृश्य देखा, वह किसी को भी अप्रत्याशित नहीं लगा। कारण, इन लोगों के दुरावस्था की पूरी अनदेखी का जिस तरह प्रधानमंत्री मोदी ने अचानक लॉकडाउन की घोषणा किया, उसकी परिणतिस्वरूप भारत विभाजन के वर्षों पुराने दृश्य की अवतारणा होनी ही थी, जो हुई भी। इसका कारण यह रहा जिन लाखों लोगों को दिल्ली- मुंबई जैसे महानगरों से हजारों किलोमीटर दूर अवस्थित गावों के लिए पैदल मार्च करना पड़ा, उनमे 90 प्रतिशत से अधिक लोग उस बहुजन समाज से रहे, जिन्हें गुलामों की स्थिति में पहुंचाने का कोई भी अवसर मोदी गंवाना नहीं चाहते। जिस तरह कोरोना से उद्योग-धंधे बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं, उससे तय सा दिख रहा है कि कोरोना वायरस से कहीं ज्यादा लोग, आर्थिक कारणों से तबाह होंगे और तबाह होने वाले लोग बहुजन समाज से होंगे: इक्के-दुक्के ही सवर्ण समाज के लोग तबाह होने वालों के दायरे मे आएंगे। लॉकडाउन के बाद के हुये कुछ अध्ययन इसकी ओर ही संकेत कर रहे हैं।

हाल में 3196 प्रवासी मजदूरों पर हुये अध्ययन की जो रिपोर्ट जनसमक्ष आई है, उससे पता चलता है कि इनमें 31 प्रतिशत लोग कर्ज में हैं और कोरोना के कारण रोजगार खत्म होने के चलते वे इसकी भरपाई नहीं कर पाएंगे। सर्वे में यह भी सामने आया है कि 42 प्रतिशत घरों मे एक दिन का भी राशन नहीं है। यदि लॉकडाउन 21 दिन से आगे बढ़ता है तो 66 फीसद लोग अपना घर नहीं चला पाएंगे। अब जबकि यह तय सा दिख रहा है कि लॉक डाउन 21 दिन से काफी आगे बढ़ जाएगा, ऐसे में जिस विशाल पैमाने पर बहुजनों के घरों के चूल्हे ठंडे होंगे, उसकी कल्पना कर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति की नीदें हराम हो जाएंगी।इस बीच संयुक्त राष्ट्र संघ के श्रम निकाय ने चेतावनी दी है कि कोरोना के कारण भारत में अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले 40 करोड़ लोग गरीबी मे फँस सकते हैं। और गरीबी के दलदल में फँसने जा रहे इन 40 करोड़ लोगों में से कुछेक लाख को छोडकर बाकी उस अभागे बहुजन समाज से होंगे, जिसे वर्तमान सत्ताधारी वर्ग-शत्रु के रूप में ट्रीट करते हैं एवं जिनके लिए बाबा साहब डॉ. अंबेडकर ने अपना सर्वस्व झोंक दिया। अतः समय की मांग है कि हम आंबेडकर जयंती सादगी और संजीदगी से मनाएँ और यह दिन कोरोना संकट से सर्वाधिक प्रभावित होने जा रहे बहुजन समाज के दरिद्रतम लोगों की बेहतरी के चिंतन में लगाएँ।

लेखक एच.एल. दुसाध बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. संपर्क- 9654816191

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