कानपुर। कूड़ा बीनकर दो वक्त की रोटी के जुगाड़ में जो बच्चे दिनभर सड़कों पर मारे-मारे फिरते थे, आज वे हिंदी, अंग्रेजी और गणित की पढ़ाई कर रहे हैं. कभी अक्षर ज्ञान इन बच्चों के लिए एक सपना था. उत्तर प्रदेश वस्त्र प्रौधोगिकी संस्थान (यूपीटीटीआई) के दलित छात्रों ने कानपुर की गली-गली बनी झुग्गी झोपड़ियों में जाकर इन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित किया. ईदगाह के समीप कूड़े की बोरियों से भरी एक गली में ये छात्र स्कूल चला रहे हैं. इस स्कूल में सौ से अधिक बच्चे यहां शिक्षा ग्रहण कर अपना भविष्य संवार रहे हैं.
यूपीटीटीआई के दलित छात्रों ने लगभग दो साल पहले इन बच्चों को पढ़ाने का सिलसिला शुरू किया था. तब उनके पास न तो कमरा था और न ही संसाधन. जब वे झुग्गी झोपड़ी में जाकर इन बच्चों के माता-पिता से मिलकर उन्हें पढ़ाने के लिए कहते तो उनका जवाब ना होता था. धीरे-धीरे छह बच्चों के साथ इंस्टीट्यूट के उन्मूलन समूह के छात्रों ने इस स्कूल की शुरूआत की. इसके बाद दूसरे बच्चों के माता-पिता भी अपने बच्चों को भेजने लगे.
बच्चों को पढ़ाने के लिए जगह का इंतजाम एएनडी डिग्री कॉलेज की काजल के सहयोग से हुआ. यूपीटीटीआई के टेक्सटाइल केमिस्ट्री के छात्र आशीष कुमार ने बताया कि वर्तमान समय में यहां पर 15 छात्र, छात्राएं इन बच्चों को अपना समय निकालकर पढ़ा रहे हैं. रोजाना दोपहर में दो से साढ़े चार बजे तक उन्हें पढ़ाया जाता है.
यूपीटीटीआई के छात्र निर्भय सिंह खरवार ने बताया कि लगभग दो साल पहले इस स्कूल की नींव पड़ी थी. शुरूआत में बहुत परेशानी हुई. कई माता-पिता अपने बच्चों को यहां नहीं भेजते थे. घर-घर जाकर उन्हें जब शिक्षा का महत्व बताया गया तब उन्होंने अपने बच्चों को भेजना शुरू किया. कूड़ा बीनने वाले बच्चों का भविष्य संवार रहे हैं दलित छात्र
कानपुर। कूड़ा बीनकर दो वक्त की रोटी के जुगाड़ में जो बच्चे दिनभर सड़कों पर मारे-मारे फिरते थे, आज वे हिंदी, अंग्रेजी और गणित की पढ़ाई कर रहे हैं. कभी अक्षर ज्ञान इन बच्चों के लिए एक सपना था. उत्तर प्रदेश वस्त्र प्रौधोगिकी संस्थान (यूपीटीटीआई) के दलित छात्रों ने कानपुर की गली-गली बनी झुग्गी झोपड़ियों में जाकर इन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित किया. ईदगाह के समीप कूड़े की बोरियों से भरी एक गली में ये छात्र स्कूल चला रहे हैं. इस स्कूल में सौ से अधिक बच्चे यहां शिक्षा ग्रहण कर अपना भविष्य संवार रहे हैं.
यूपीटीटीआई के दलित छात्रों ने लगभग दो साल पहले इन बच्चों को पढ़ाने का सिलसिला शुरू किया था. तब उनके पास न तो कमरा था और न ही संसाधन. जब वे झुग्गी झोपड़ी में जाकर इन बच्चों के माता-पिता से मिलकर उन्हें पढ़ाने के लिए कहते तो उनका जवाब ना होता था. धीरे-धीरे छह बच्चों के साथ इंस्टीट्यूट के उन्मूलन समूह के छात्रों ने इस स्कूल की शुरूआत की. इसके बाद दूसरे बच्चों के माता-पिता भी अपने बच्चों को भेजने लगे.
बच्चों को पढ़ाने के लिए जगह का इंतजाम एएनडी डिग्री कॉलेज की काजल के सहयोग से हुआ. यूपीटीटीआई के टेक्सटाइल केमिस्ट्री के छात्र आशीष कुमार ने बताया कि वर्तमान समय में यहां पर 15 छात्र, छात्राएं इन बच्चों को अपना समय निकालकर पढ़ा रहे हैं. रोजाना दोपहर में दो से साढ़े चार बजे तक उन्हें पढ़ाया जाता है.
यूपीटीटीआई के छात्र निर्भय सिंह खरवार ने बताया कि लगभग दो साल पहले इस स्कूल की नींव पड़ी थी. शुरूआत में बहुत परेशानी हुई. कई माता-पिता अपने बच्चों को यहां नहीं भेजते थे. घर-घर जाकर उन्हें जब शिक्षा का महत्व बताया गया तब उन्होंने अपने बच्चों को भेजना शुरू किया. सरकार ने कानून में बदलाव किए बिना की नोटबंदी, अब करेगी संशोधन
मोदी सरकार 9 नवंबर से पहले छपे 500 और 1,000 के नोटों की वैधता को समाप्त करने के लिए संभवत: भारतीय रिजर्व बैंक कानून में संशोधन करेगी. आगामी बजट में इसका उल्लेख किया जाएगा. सूत्रों ने कहा कि नोटबंदी की प्रक्रिया के तहत 500 और 1000 के नोट को अवैध करार देने के लिए कानून की जरूरत होगी. इसे 31 मार्च से पहले प्रभावी किया जाएगा. सूत्रों ने बताया कि 1978 में करेंसी का प्रतिबंधित किया गया था. उस समय नोटों को अवैध करने का कानून पहले आ गया था.
इस बार सरकार ने रिजर्व बैंक कानून की धारा- 26 (2) के तहत कार्रवाई की है. रिजर्व बैंक कानून की धारा 26:2: के तहत केंद्र सरकार रिजर्व बैंक के केंद्रीय बोर्ड की सिफारिश पर भारत के राजपत्र में अधिसूचना के जरिये अधिसूचित में वर्णित तारीख से किसी भी श्रृंखला और मूल्य के बैंक नोटों को कानूनी तौर पर बंद कर सकती है. बैंकिंग प्रणाली में जो राशि नहीं आएगी उसके बारे में पूछे जाने पर सूत्रों ने कहा कि इससे रिजर्व बैंक के मुनाफे में इजाफा होगा और ऐसे में केंद्रीय बैंक सरकार को ऊंचे लाभांश या विशेष लाभांश के रूप में अतिरिक्त भुगतान करने की स्थिति में होगा.
बैंकों को अभी तक 15.5 लाख करोड़ रुपए के बंद नोटों की तुलना में 12 लाख करोड़ रुपए की जमा मिली है. सरकार का अनुमान है कि बैंकिंग प्रणाली में करीब 13 लाख करोड़ रुपए वापस लौटेंगे. रिजर्व बैंक द्वारा 500, 1000 के नोट को बंद करने की वजह से ऊंचा लाभांश रिजर्व बैंक कानून में संशोधन के बिना मान्य नहीं होगा. रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल ने पिछले सप्ताह कहा था कि इससे केंद्रीय बैंक के खाते पर मौजूदा कानून के तहत किसी तरह का स्वत: प्रभाव नहीं होगा. रिजर्व बैंक ने नोटबंदी के बाद बैंक शाखाओं तथा एटीएम के जरिये जनता को 4.27 लाख करोड़ रूपए के नए नोट जारी किए हैं. बता दें, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 500 और 1000 रुपए के पुराने नोट बंद करने का ऐलान आठ नवंबर को किया था.
-लेखक पत्रकार हैं.
भारतीय धर्मगुरूओं का खतरनाक मिशन!
भारत में सामाजिक राजनीतिक बदलाव को रोकने के लिये सबसे कारगर हथियार की तरह जिस उपकरण को सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया गया है वो है भारत का धर्म और अध्यात्म. भारत का धर्म और इसका पलायनवादी अध्यात्म भारत की सबसे बड़ी कमजोरी रहा है लेकिन दुर्भाग्य ये कि इसे ही भारत की केंद्रीय संपदा के रूप में प्रचारित किया जाता है. ये हजारों साल से चला आ रहा षड्यंत्र है और जब तक भारत अकेला था, तब तक ये षड्यंत्र सफल भी होता रहा. लेकिन जैसे ही व्यापार, राजनीति और सामरिक समीकरणों में अन्य सभ्यताओं और मुल्कों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई वैसे ही इस षड्यंत्र की पोल खुल गयी और भारत हर सदी में किसी न किसी का गुलाम होता गया.
पौराणिक कहानियों में हम जिस भारत या समाज को पाते हैं वो कभी जमीन पर रहा ही नहीं. असल में भारत का पुराण और मिथकशास्त्र भारतीय आध्यात्मिक षड्यंत्र का स्वाभाविक परिणाम हैं, जिसने इतिहास बोध, न्याय बोध और सभ्यता बोध को पनपने ही नहीं दिया. अध्यात्म पढ़े लिखे वर्ग को बांझ बनाता है और मिथक या पुराण गरीब अनपढ़ वर्ग की गर्दन कसता है, और इस खेल का नियंत्रण ब्राह्मणवाद के हाथ में उनके शास्त्रों के और व्याख्याओं के जरिये होता है. ये तरीका हर दौर में आजमाया गया है और कामयाब रहा है. क्षत्रियों को परशुराम के द्वारा से और वैश्यों को सत्यनारायण के द्वारा काबू किया गया और शूद्रों को पुनर्जन्म से कसा गया. ऐसे हर दौर में भारत के भीतर ही भीतर चार वर्णों की व्यवस्था में एक वर्ण का आधिपत्य बनाये रखने में ये सबसे सफल रणनीति रही है.
जब क्षत्रियों, वैश्यों, शूद्रों और जनजातीय समाजों को काबू में रखना था तब तक ये आध्यात्मिक पौराणिक षड्यंत्र बहुत सफल रहा. जब तक “काबू किये जाने योग्य” जनसंख्या भारतीय ढंग के आत्मा परमात्मा पुनर्जन्म में भरोसा करती रही और इन चीजों से डरती रही तब तक ये व्यवस्था बेहतरीन ढंग से चलती रही. यहां तक सफल रही कि धर्म की रक्षा को ही जीवन और विकास की गारंटी मान लिया गया. वर्ण और आश्रम का पालन ही धर्म बन गया। और धर्मो रक्षति रक्षते जैसी उक्तियां और अहम ब्राह्मणवाद जैसे निहायती षड्यंत्रपूर्ण और तर्कविरोधी वक्तव्य इसी दौर में उभरे और छा गए, इनका प्रकोप अभी भी बना हुआ है.
भारतीय धर्मभीरु जनसंख्या को काबू करने में मिली यह सफलता ज्यादा देर टिक न सकी. जब यवनों, अफग़ानों, तुर्कों, मुगलों, ब्रिटिशों का प्रवेश हुआ तो उन्हें भारतीय ढंग के धार्मिक भयों की कोई चिंता नहीं थी वे एक तुलनात्मक रूप से सभ्य और संगठित समाज से आये थे और इसी कारण उन्होंने भारत को तुरंत गुलाम बना लिया और भारत के धर्मभीरु और उनके वेदांती आका समझ ही न सके कि ये क्या हो गया? वेदांती आका तो फिर भी इस गुलामी में अपनी सत्ता बहुत ढंग से बचाकर रख सके लेकिन क्षत्रियों, राजपूतों, वैश्यों, शूद्रों को बहुत अपमान और पीड़ा से गुजरना पड़ा. इस एक हजार साल से लंबी गुलामी में वेदांती पुरोहित वर्ग ने गुलाम बनाने वाली कौमों से भी समझौते कर लिए और गुलाम हुई भारतीय धर्मभीरु जनता पर धार्मिक अंधविश्वासों, मिथकों, पुराणों और जाति व्यवस्था का शिकंजा और अधिक कस दिया ये आजकल और तेज हो गया है.
मुसलमानों की हुकूमत में ब्राह्मणी आधिपत्य को बहुत व्यवस्थित चुनौती नहीं मिली लेकिन ब्रिटिश आधिपत्य में ब्रिटशों ने शिक्षा, भाषा, धर्म आदि में सीधा हस्तक्षेप शुरू कर दिया इससे ब्राह्मणवाद तिलमिला उठा और यूरोपीय पुनर्जागरण के ही तत्वों से प्रभावित होकर छुटपुट सुधार और बदलाव भी करने लगा. तब तक चूंकि आधुनिकता, विज्ञानवाद और औद्योगीकरण की हवा बन चुकी थी जिसका अंग्रेजी शिक्षा द्वारा लाभ उठाकर भारतीय मध्यमवर्ग समाज बदलाव के लिए तैयार होने लगा.
लेकिन आजादी के काफी पहले विश्वयुद्धों और आर्थिकमन्दियों के परिणाम में ये तय हो चुका था कि ब्रिटिश सत्ता ज्यादा देर भारत को गुलाम नहीं रख सकेगी तब भारतीय वेदान्तियों ने अपनी सनातन कला को फिर से चमकाना शुरू किया. जिन शास्त्रों कर्मकांडों रहस्यवादी शिक्षाओं ने इस मुल्क को गरीब गुलाम और बुजदिल बनाया था उन्ही शास्त्रों, धर्म और पुनर्जन्म के सिद्धांत को फिर से प्रचारित करने का काम शुरू हो गया. यूरोपीय सभ्यता में रचे बसे थियोसोफिकल सोसाइटी, अरबिंदो घोष, विवेकानन्द, राममोहन रॉय, केशब चन्द्र, देबेन्द्रनाथ और अन्य अनेक लोगों ने ईसाई धर्म की नकल में एक नया धर्म बुना जो सामाजिक सुधार और ईसाई मिशनरी सेवा से प्रेरित था. यह नियो वेदांत या नियो हिंदूइस्म है जिसे हम आज देख रहे हैं. विवेकानन्द ने तो आयरलैंड की एक प्रशिक्षित कैथोलिक नन को बाकायदा ऐसा धर्म और मिशनरी काम सिखाने के लिए भारत बुलाया था. उन्हें भगिनी निवेदिता कहा जाता है.
आजादी के बाद, देश के विभाजन के बाद वेदांती हिंदूवादी सत्ता को अपनी सुरक्षा की चिंता बराबर बनी रही. इसी दौर में धीरे धीरे ग्लोबलाइजेशन और उदारीकरण उभरा और बाद में शिखर पर पहुंचा. 50, 60, से लेकर 90 के दशक तक भारतीय पोंगा पंडितों ने इस नियों हिंदुइज्म को पश्चिमी मापदण्डों के अनुरूप और विज्ञान के अनुरूप ढालने का व्यवस्थित ढंग से काम किया लेकिन इस जाति व्यवस्था ने उनकी फांसी लगा दी. वे जितना ही महान बनने की कोशिश करते उतना ही भारत की गरीबी गंदगी और सामाजिक छुआछूत के सवाल उनसे टकराने लगते. ऐसे में हिन्दू धर्म को ईसाई मिशनरी समाजसेवा प्रधान धर्म की फोटोकॉपी में बदल देने का जो प्रोजेक्ट हाथ में लिया वह असफल होने लगा.
हालांकि तब तक स्वतंत्र भारत में वर्ण व्यवस्था के शिखर पर बैठे लोगों ने फिर से सत्ता कायम कर ली और वे देख सके कि ईसाई धर्म की सभ्यता और समाज सेवा भारत में फैल गयी तो उनकी सत्ता को शुद्र, आदिवासियों, दलितों और स्त्रियों की टक्कर मिलने लगेगी. अंबेडकर, फुले, पेरियार ने तब तक यह हकीकत में करके दिखा भी दिया था.
ऐसे में बड़ा संकट पैदा हुआ, नेहरू के सुधारों ने जिस समता और सबलीकरण की इबारत लिखी वह कुछ हद तक ही लेकिन सही दिशा में सफल रही और पिछड़ी जातियों और स्त्रियों में विराट शक्ति पैदा हुई. इन “पापयोनियों” की शक्ति बढ़ते देख पोंगा पंडितों को बड़ी चिंता हुई. अब ऐसे धर्म की जरूरत थी जो आभासी जगत में शुद्ध बुद्ध होने और सबके समान होने की बात करे और सामाजिक बदलाव को भी एकदम असंभव कर दे. मतलब आश्रम की दीवार के अंदर भाईचारा, प्रेम, सहभोज और फ्री सेक्स तक दे सके लेकिन आश्रम की दीवार के ठीक बाहर जाति और लिंग का विभाजन तुरन्त शुरू हो जाए.
अब यह काम कैसे हो और कौन करे?
यह काम अरबिंदो, विवेकानन्द, ओशो, आसाराम बापू जैसे लोगों ने किया. अध्यात्म और परलोक का ऐसा जाल बुना गया जिसमें कहा गया कि समाज कैसा भी सड़ता रहे तुम ज्ञान ध्यान और मोक्ष में लगे रहो. अद्वैत का प्रचार हुआ कि कण कण में ब्रह्म है, “तत्वमसि” तुम वही ब्रह्म हो, सब पंचतत्व के पुतले हैं कोई भेद नहीं. साथ ही जाति, वर्ण और लिंग के भेद और दान इत्यादी भी चलता रहा.
बाद में शहरी जीवन में जाति और लिंग के भेदभाव ने शहरी मध्यम वर्ग को और अधिक डरा दिया. पहले ही भारतीयों में आपस में सहयोग, संबंध और प्रेम नहीं था ऊपर से शहरी जीवन की असुरक्षाओं ने मध्यम वर्ग को और डरा दिया. युवा वर्ग यूरोपीय सभ्यता, मुक्त मित्रता और मुक्त प्रेम के वातावरण से मोहित हो ही चुका था और भारतीय बाबाओं ने इसी सम्मोहन और प्यास को आटा बनाकर धर्म के कांटे पर लगाकर तीन पीढ़ियों का शिकार किया. जो मैत्री, प्रेम, सहकार, सहभोज, सुरक्षा और अपनापन समाज में युवाओं को नहीं मिलता वह आश्रमों में परोसा जाने लगा. कामकाजी वर्ग भी इस “आसान और आभासी” इंसानियत से प्रभावित होने लगा और इन बाबाओं योगियों ने बड़ी कुशलता से आध्यात्मिक पलायनवाद में शहरी कामकाजी युवावर्ग को फंसा लिया, इसी युवावर्ग में सामाजिक बदलाव की ललक उठती है, उसे नियों वेदान्तिक अध्यात्म में फंसाकर बांझ बना दिया.
अब मजा ये कि उस धर्म और अध्यात्म के ठीक समानांतर धर्म और कॉरपोरेट का नया समीकरण बन गया जिसने राजनीति को अपने ढंग से चलाना शुरू किया. अद्वैत और छुआछूत की समानांतर पटरियों पर ब्राह्मणवाद की ट्रेन फिर चलने लगे और राजनीति और कॉरपोरेट का ईंधन उन्हें तेजी से धार्मिक राष्ट्रवाद की तरफ खींचने लगा. भारतीय बाबा कारपोरेट और राजनेता अपने काम में सफल रहे. इस काम में उन्हें सबसे बड़ी चुनौती कबीर, गोरख और बुद्ध से मिली. लेकिन उसका इलाज भी ढूंढ लिया गया. बुद्ध को विष्णु, कबीर को वैष्णव और गोरख को शिवअवतार बनाकर खत्म कर दिया और उनकी शिक्षाओं को वेदान्तिक शिक्षा की तरह पुनर्जन्म और सनातन आत्मा में लपेटकर पेश कर दिया गया. अब कोई समस्या नहीं रही.
अब इसके बाद का भारत आपके सामने है. अभी जितने बाबा योगी और गुरु हैं उन्हें और उनकी शिक्षाओं को कॉर्पोरेट और राजनीति के साथ मिलाकर इस नजर से देखिये, तब आप समझ सकेंगे कि भारतीय धर्मगुरु कितने खतरनाक मिशन में किस योजना से लगे हुए हैं. और इन गुरुओं में सबसे प्रभावशाली गुरु रहे हैं ओशो उन्होंने इस पतन में चार चांद लगा दिया. आज के पोंगा पंडितों की पूरी फौज के भीष्म पितामह वे ही हैं. आज (11 दिसंबर) ओशो रजनीश का जन्मदिन है. आज उन पर गहराई से विचार करें और सोचें कि इन बाबाओं, नेताओं और उद्योगपतियों के षड्यंत्रों से भारत की जनता को कैसे बाहर निकाला जाए. मोदी का जयापुर गांवः चिराग तले अंधेरा
बनने को तो ये कहानी हजारों सालों से हाशिए पर पड़े दलित समाज के उत्थान का पैमाना बन सकती थी लेकिन एक कोशिश भर बन कर रह गई. और ये कोशिश भी ऐसी है जो बेइंतहा दिखावटी है.
क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि इक्कीसवीं शताब्दी के सोलहवें साल में जिस जयापुर गांव की चर्चा दिल्ली की मीडिया में एक आदर्श गांव की तरह हुई, उसी गांव में रहने वाले मुसहर समाज का एक भी बच्चा पढ़ाई के लिए स्कूल नहीं जाता? 14 परिवार वाले उसी मुसहर समाज के लोगों के पास सालाना कुछ महीनों के लिए ईंट पाथने के अलावा कोई काम नहीं है? लेबर ब्यूरो की रिपोर्ट ने पिछले पांच साल में देश में बेरोजगारी के उच्चतम स्तर तक पहुंचने का जिक्र किया है लेकिन क्या आप जानना चाहेंगे कि जयापुर गांव के मुसहर परिवारों की बेरोजगारी दशकों पुरानी है ? दुर्भाग्य ये है कि इसका कोई अंत होता नहीं दिखता.
ये कहानी उसी जयापुर गांव की है जिसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दो साल पहले ‘सांसद आदर्श ग्राम योजना’ के तहत गोद लिया था. प्रधानमंत्री के गोद लेने के बाद गांव में 2 बैंक खुले, एटीएम लगे, सोलर प्लांट लगा, बस स्टैंड पर लोगों को बैठने के लिए शेड बनवाया गया. सफलता के इन सूचकांकों का जिक्र हर जगह हुआ. होना भी चाहिए. जिस एक काम का जिक्र मीडिया में कम हुआ है वो है मुसहर परिवारों के रहने के लिए एक कमरे वाले पक्के मकानों का निर्माण.
बरसात में जिन लोगों को रिसती हुई झोपड़ियों में रहने की मजबूरी हो उनके लिए ये मकान किसी जन्नत से कम नहीं. पर ठहरिए, इस जन्नत की हकीकत जितनी खूबसूरत मालूम होती है, उतनी है नहीं. इस जन्नत के दूसरे हिस्से में अंधेरा है. जयापुर गांव से थोड़ा हटकर के एक कोने में बसे इस नए-नवेले सोसाइटी नुमा टोले में आप जैसे ही दाखिल होते हैं, आपका सामना पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर बनी एक स्मारिका से होता है. इस पर लिखा गया है – मोदी जी का अटल नगर. धान के खेतों के बीच बसाए गए ‘मोदी जी के अटल नगर’ में कांग्रेस से बीजेपी में आए राव बिरेन्द्र चौधरी का नाम भी खुदा हुआ है.
गेट के अंदर बाएं हाथ पर करीने से गमले रखे गए हैं. कुछ गमलों में फूल भी खिले हैं. रात को छोड़कर आप किसी भी वक्त जाइए यहां पेड़ पर बच्चों को खेलते हुए पाएंगे. दीवार पर स्वच्छता अभियान समेत पढ़ाई के लिए प्रेरित करने वाला एक नारा भी टीपा गया है – स्वच्छ भारत, सुंदर भारत. बेटी हो या बेटा दोनों को पढ़ाना है. इस नारे की मंशा कितनी भी अच्छी हो लेकिन इसकी हकीकत ठीक नहीं. 14 मुसहर परिवारों का कोई भी बच्चा पढ़ने न जाए और सरकार अपने काम का ढोल पीटने में लगी रहे. यह किसी त्रासदी से कम है क्या?
मुसहर टोले की तहकीकात से एक बात साफ तौर से समझ में आती है. वो ये कि यहां एक कमरे वाले मकानों को ऐसे तैयार किया गया है जिसमें जगह कम लगे, खर्चा कम से कम हो और प्रचार ज्यादा से ज्यादा मिले. दो समानांतर दीवारों के बीच छोटी-छोटी प्लॉटिंग करके एक कमरा, किचेन और बाथरूम के 14 सेट निकाले गए हैं. हर फ्लैट के बाहर नीले रंग में पुता गेट लगाया गया है. गेट के बाहर दीवार पर मकान नंबर भी लिखा है. एक नजर में यहां मौजूद हर चीज ‘अच्छे दिनों ’ की याद दिलाती है.
पर, क्या सचमुच ऐसा है ? इसका जवाब मिलता है उन तस्वीरों में जो इन घरों के अंदर का हाल बयां करती हैं. बाकी जो कसर रह जाती है उसे सोनू की उदासीनता पूरी कर देती है. सोनू बताते हैं, ‘यहां करीब 14 परिवार हैं. और हर परिवार में औसतन तीन आदमी हैं.’ यानि कुल मिलाकर करीब 42 लोगों के लिए 10 x 12 के 14 कमरे प्रधानमंत्री मोदी की ओर से ‘सांसद ग्राम योजना’ के तहत बनाए गए हैं. जाहिर है एक खाली कमरा जिसमें खिड़की के अलावा कुछ भी नहीं है तीन लोगों की रिहाईश के लिए पर्याप्त नहीं है. इसलिए लोगों ने रसोईघर को अपना स्टोर रूम बना लिया है. लोगों का कहना है ‘खाना जैसे तैसे बनता है. गैस का कनेक्शन सरपंच रामनारायण पटेल के वादे के बावजूद अभी तक नहीं मिला है.’
मजे की बात ये है कि इन मकानों में कई के पास पंखा भी है लेकिन लाइट नहीं. क्यों? इसका जो जवाब हमें मिला वो भारत में सदियों से मौजूद उस सड़ी-गली जातिवादी व्यवस्था की ओर इशारा करता है जो समाज के हर तबके में मौजूद है. यहां ब्राहमण बनिया से, बनिया यादव से और यादव मुसहर से पूरी ईमानदारी से नफरत करता है. सोनू के मुताबिक, ‘परधानी के झगड़े में फंसकर मुसहर टोले में लाइट नहीं आ सकी. तार खींचा गया था लेकिन यादवों ने तोड़ दिया.’ शायद उन्हें शक था कि मुसहरों ने उन्हें वोट नहीं दिया. अंधेरा दूर करने के लिए सोनू समेत अन्य लोगों ने पीछे वाली मेनलाइन से तार जोड़कर अपने घर को रोशन किया है.
घर के अंदर बेशक लाइट नहीं है लेकिन घर के बाहरी हिस्से को जगमग करने की व्यवस्था पूरी है. घर के सामने का हिस्सा रोशन रहे इसके लिए ‘मोदी जी के अटल नगर’ में 8 सोलर पैनल लगाए गए हैं. 2 पैनल यूनियन बैंक की तरफ से लगाए गए हैं जबकि बाकी 6 एक दूसरी कंपनी की ओर से. ये शुभ काम कंपनियों ने कारपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलटी फंड के तहत किया है.
एक सवाल यहां जरूर बनता है कि कारपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी फंड के तहत कंपनियों ने काम कराने की दरियादिली सिर्फ पीएम मोदी के चुनाव क्षेत्र में ही क्यों दिखाई? जाहिर सी बात है इसका जवाब सोनू के पास नहीं है. ‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ जैसे अभियानों का असर दिल्ली में दिखता है. ये दावे सरकारी दफ्तरों से निकलकर तथाकथित अखबारों और चैनलों तक आसानी से पहुंच जाते हैं लेकिन जमीन पर हाल उतने खराब हैं जिसका अंदाजा न तो सरकार को है और न ही उनके कारिंदों को.
सोनू को ऐसे किसी भी सरकारी अभियान से आजतक प्रेरणा नहीं मिली है. पढ़ाई के नाम पर उनके चेहरे पर चस्पा उदासीनता का स्थायी भाव थोड़ा और गहरा हो जाता है. वो कहते हैं, ‘ पहले स्कूल दूर था इसलिए नहीं गए. अब तो टाइम निकल गया. कोई ध्यान ही नहीं देता. मेरी तो बेटी है जो अभी छोटी है.’ ऐसा कहकर मुमकिन है सोनू अपनी जिम्मेदारी से छुटकारा पाना चाहता हो लेकिन सवाल तो ये है कि क्या सोनू की बेटी को पढ़ाना ‘ सासंद आदर्श ग्राम योजना’ का हिस्सा नहीं ? सोनू जैसे इस देश के हजारों मुसहर परिवारों को शिक्षित करने का जिम्मा कौन उठाएगा ?
यूपीः बसपा निकालेगी दलित-मुस्लिम एकता रथ यात्रा
कानपुर। भाजपा के परिवर्तन रथ, सपा के समाजवादी विकास रथ के जवाब में अब बसपा का दलित-मुस्लिम एकता रथ विधानसभा क्षेत्रों में घूमेगा. जनवरी के पहले हफ्ते में आर्यनगर विधानसभा क्षेत्र में जनसभा का आयोजन किया जाएगा. पार्टी के कोआर्डिनेटर यहीं से रथ का शुभारंभ करेंगे. यह रथ सीसामऊ, कैंट, गोविंदनगर, कल्याणपुर विधानसभा क्षेत्र के साथ ही कानपुर मंडल की अन्य विधानसभा क्षेत्रों में भी घूमेगा. इसमें दलित और मुस्लिम साहित्य होगा, जो लोगों में वितरित किया जाएगा.
बहुजन समाज पार्टी जीत के लिए सोशल इंजीनियरिंग का सहारा तो ले रही है, वहीं पार्टी का पूरा फोकस दलित और मुस्लिम मतदाताओं पर है. तीन तलाक के मुद्दे पर पार्टी नेतृत्व केंद्र सरकार के विरुद्ध मुखर है. मुस्लिम मतदाताओं को पार्टी से जोड़ने के लिए बसपा की ओर से विशेष प्रयास किए जा रहे हैं. रथ पर पार्टी प्रमुख मायावती और संस्थापक कांशीराम, डॉ. भीमराव अंबेडकर के चित्र के साथ ही दलित और मुस्लिम समाज के महापुरुषों के चित्र भी होंगे.
मुस्लिम समाज के प्रतिष्ठित लोग रथ पर चलेंगे और मुस्लिम बस्तियों में जाकर सभाएं करेंगे. जबकि दलित समाज के नेता दलित बस्तियों में सम्मेलन करेंगे. आर्यनगर के प्रत्याशी अब्दुल हसीब को रथ के संचालन की जिम्मेदारी सौंपी गई है. 25 दिसंबर तक रथ बनकर तैयार हो जाएगा और जनवरी के पहले हफ्ते से इसका संचालन पूरे मंडल में होगा. बाबासाहेब अम्बेडकर: एक सच्चे राष्ट्रवादी
यह समाज के लिए ही नहीं बल्कि राष्ट्र के लिए भी गर्व की बात है कि बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर एक प्रबुद्ध विचारक, न्याय के पक्षधर और स्पष्टवादी व्यक्ति थे. प्रत्येक व्यक्ति का कोई न कोई प्रेरणा-सूत्र होता है. बाबासाहेब ने कबीर, फुले और महात्मा बुद्ध को अपना आदर्श माना था. बाबासाहेब को शोषण-उत्पीड़न व अन्याय के विरोध, समता, बन्धुता और भाई-चारे जैसे मानवीय मूल्यों की स्थापना की प्रेरणा कबीर, फुले और महात्मा बुद्ध के जीवन दर्शन से प्राप्त की थी.
बाबासाहेब वर्ण और जाति को भारतीय समाज का कोढ़ मानते थे क्योंकि गुलामी, पिछड़ेपन और गरीबी की खास वजह यही वर्ण और जाति-प्रथा ही है. दलित-शोषित लोगों की उन्नति के मार्ग में छूत-अछूत का भूत ही सबसे बड़ा रोड़ा रहा है. सो यह अति आवश्यक है कि समाज में व्याप्त जाति-पांति के भूत को भगाया जाए. इस बारे में बाबासाहेब स्पष्ट रूप से कहते हैं कि आप जिस भी रास्ते से बचकर निकलना चाहें तो जातियता का दानव आपका मार्ग रोक लेगा और उसका वध किए बिना आप आगे नहीं बढ़ सकते. जातिय समस्या का उन्मूलन किए बिना न तो राजनीतिक सुधार ही लाए जा सकते हैं और न ही आर्थिक क्रांति ही.
आपको जानकर हैरत होगी कि गांधीजी के विचार बाबासाहेब की इस सोच के बिल्कुल विपरीत थे. गांधीजी वर्ण व्यवस्था को बरकरार रखते हुए छुआछात के निवारण के पक्ष में थे, जो किसी भी तरह संभव ही नहीं है. इसलिए बाबासाहेब और गांधी के बीच गहरे वैचारिक मतभेद हो गए थे. इसके चलते पूना पैक्ट के दौरान बाबासाहेब ने यहां तक कह डाला कि यदि अछूतों के लिए अलग चुनाव की मांग करने से मुझे देशद्रोही कहा गया तो उस समाजिक व्यवस्था को ही देशद्रोही क्यों न माना जाए जिसने अछूतों को सदियों से स्वराज्य का कभी अनुभव ही नहीं होने दिया.
बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर ने अपने सामाजिक चिंतन के आधार पर हिन्दू-धर्म को जातिगत उत्पीड़न की जड़ पाया. अछूतोद्धार आंदोलन की निराशाजनक प्रगति के चलते बाबासाहेब ने जातिगत उन्मूलन के लिए धर्म बदलने को एक मजबूत विकल्प के रूप में स्वीकार किया और सन 1935 में येवला कांफ्रेंस में बाबासाहेब ने घोषणा कर दी कि मैं हिन्दू धर्म में पैदा हुआ, यह मेरे वश की बात नहीं थी किंतु मैं हिन्दू रहकर मरूंगा नहीं, यह मेरे वश की बात है. धर्म बदलने के निष्कर्ष पर बाबासाहेब अचानक नहीं बल्कि एक लम्बे विचार-मंथन, हालातों के गंभीर चिंतन और लम्बे अनुभव के आधार पर पहुंचे थे. बाबासाहेब मानते थे कि धर्म व्यक्ति के लिए है, व्यक्ति धर्म के लिए नहीं. वे मानते थे कि धर्म का आधार बुद्धि होना चाहिए और धर्म समता, स्वतंत्रता और बन्धुता का भाव मानव व मानवता के कल्याण का साधन होना चाहिए किंतु हिन्दू-धर्म इस कसौटी पर खरा उतरने में पूरी तरह असफल रहा है. इसलिए उन्होंने 14 अक्तूबर 1956 को अपने दस लाख से भी ज्यादा अनुयायियों के साथ बौद्ध धम्म को अपनाकर जाति व वर्ण की बेड़ियों को तोड़ने का क्रांतिकारी कदम उठाया. बाबासाहेब ने कहा था कि मैं बौद्ध धम्म को इसलिए पसंद करता हूं क्योंकि बौद्ध धम्म में प्रज्ञा अर्थात अन्धविश्वास तथा दुष्ट प्रवृति के स्थान पर बुद्धि का प्रयोग, दूसरे करुणा अर्थात प्रेम और तीसरे समता अर्थात समानता और स्वतंत्रता का भाव समाहित है. मनुष्य इन्ही तीन सिद्धांतों/बातों को ही एक शुभ आनंदित जीवन के लिए चाहता है. बाबासाहेब का मानना था कि बौद्ध धम्म भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है और इससे न तो समाज को और न ही देश को किसी प्रकार का नुकसान होगा. वर्ण और जाति से व्यक्ति की मुक्ति होगी.
बाबासाहेब लोकतंत्र के प्रबल समर्थक थे और मानते थे कि लोकतंत्र ऐसी शासन व्यवस्था और प्रणाली है जिससे समाज में सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव किया जा सकता है. लेकिन उनका यह भी मानना था कि यदि लोकतंत्र की बागडोर पूंजीपतियों के हाथों में जाती है तो गरीब और निरीह लोगों को गुलामी में जीना-मरना पड़ेगा. इसलिए बाबासाहेब एक ऐसी सरकार की जरूरत समझते थे जो एक समुदाय को दूसरे समुदाय के शोषण से बचाए और देश में आंतरिक दंगों, हिंसा तथा अव्यवस्था पर काबू रख सके. बाबासाहेब की इस मान्यता के चलते कुछ लोग बाबासाहेब को लोकतंत्र विरोधी होने का राग अलापते रहते हैं. ऐसे लोगों को ज्ञात होना चाहिए कि जब अंग्रेजों ने जाते समय बाबासाहेब के सामने भारत का “अछूतिस्तान” के नाम पर एक और विभाजन करने का प्रस्ताव रखा तो अम्बेडकर इसका जोरदार विरोध करके भारत के एक और विभाजन को रोक देते हैं.
कहना जरूरी है कि जहां बाबासाहेब एक तरफ सत्ता प्राप्ति को सब तालों की चाबी की संज्ञा दे रहे थे, वहीं निरंकुश सत्ता पर अंकुश लगाने के पक्षधर थे. उनका कहना था, “अपनी शक्ति को केवल राजनीतिक और सामाजिक सवालों को हल करने में मत लगाइए. आर्थिक सवालों की ओर भी ध्यान देना चाहिए, इसके बिना कोई दूरगामी परिणाम नहीं निकलने वाले.” इस प्रकार बाबासाहेब ने सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर ही गंभीरता से विचार करते हुए दलित समाज से साथ मजदूरो से जुड़े आर्थिक मुद्दो की अनदेखी नहीं की. आज की तारीख में कहा जा सकता है कि बाबा साहेब और मार्क्स की नीतियों में कोई खास अंतर नजर नहीं आता. किंतु यह सत्य है कि बाबा साहेव पूंजीपतियों के साथ-साथ ब्राह्मणवादियों को भी आर्थिक समानता का विरोधी मानते हैं.
प्रसंगवश …गांधी जी का चिंतन दलित-हित के उनके तमाम कदम एक दिखावा ही सिद्ध हुए. दरअसल, गांधी जी महज एक विचार थे, व्यवहार नहीं. गांधी जी का दलित-हित में देखा गया प्रत्येक सपना कभी पूरा न होने वाला सपना ही था. यद्यपि गांधी, अम्बेडकर और लोहिया अपने समय में तीनों ही वर्तमान भारत के राजनीतिक और सांस्कृतिक आन्दोलनों के लिए प्रासंगिक कहे जा सकते हैं. तीनों ही भारतीय सामाजिक इतिहास के बारे में सोचते थे और समाज को बदलना चाहते थे. लेकिन गांधी जी की दाल में काला था.
उल्लेखनीय है कि गांधी जी दलित वर्ग के पक्ष केवल और केवल इसलिए बयानबाजी करते रहे ताकि दलित वर्ग कांग्रेस का वोटर बना रहे. यह सत्य इसी बात से जाना जा सकता है कि जब अम्बेडकर ने दलित जातियों के पृथक निर्वाचन की मांग की थी, तब गांधीजी ने यह कहकर अम्बेडकर के प्रस्ताव को खारिज करा दिया था कि दलित जातियों के लिए पृथक निर्वाचन की मांग मेरे लिए अधिक निष्ठुर प्रहार सिद्ध होगा.
यहां यह जान लेना अति आवश्यक है कि किसी भी देश का संविधान किसी भी प्रजातंत्र देश का सबसे उपयुक्त दस्तावेज होता है. बाबासाहेब स्वयं संविधान के निर्माता रहे हैं. संविधान में तमाम मानव हितों के प्रावधानों के चलते यदि लोकतंत्र खतरे में पड़ता है तो बाबासाहेब इसे संविधान की नहीं, अपितु इसके लागू करने वालों की असफलता मानते हैं, न कि संविधान की. इसीलिए वे चाहते थे कि संविधान का कार्यांवयन सभी प्रकार के पूर्वाग्रहों और स्वार्थों से ऊपर उठकर किया जाना चाहिए.
बाबासाहेब मानते थे कि नारी के पतन का असली कारण हिन्दू-धर्म है. मनु जो ब्राह्मणवादी व्यवस्था के कर्णधार रहे हैं, उसने ही ऐसे नियमों का प्रतिपादन किया, जिससे नारी की स्वतंत्रता तथा उसके सामाजिक और आर्थिक अधिकारों की अनदेखी हुई है. नारी को पुरुष की दासी बनाकर रख दिया गया. बाबा साहेब का मानना था कि भारतीय समाज में नारी की भी वही अवस्था है तो गरीब निरीह दलितो की. इसलिए उन्होनें कहा कि मैं समाज में नारी की प्रगति की हालत पर दलित समाज की प्रगति के जैसा ही पैमाना रखता हूं. इतना ही उन्होंने महिला संगठनों की आवश्यकता भी जाहिर की. इसके लिए उन्होंने महिलाओं की शिक्षा व उनमें भविष्य के प्रति जागरुकता जगाने के साथ-साथ बाल-विवाह का जमकर विरोध किया. बाबासाहेब का हिन्दू-कोड बिल को लेकर मंत्रीमंडल से त्यागपत्र भी नारियों के विषय में नारियों की प्रगति के प्रति उनका संकल्प ही झलकता है. और आज जो संसद् में महिला आरक्षण की आग धधक रही है, वो बाबासाहेब की आवाज की ही गूंज है.
बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर शिक्षा व ज्ञान को खास मानते हुए जब ये कहते हैं कि आदमी महज रोटी पर ही जीवित नहीं रह सकता. उसे विचारों की खुराक भी चाहिए क्योंकि उसके पास दिमाग भी है. बाबासाहेब दलित नौजवानों को अपने स्वाभिमान और अस्मिता की रक्षा के लिए बार-बार याद दिलाते थे कि जब कभी अवसर मिले तो यह सिद्ध करने का प्रयास करें कि वे बुद्धिमानी और योग्यता में किसी से रत्ती भी कम नहीं हैं. हमको चाहिए कि निजी लाभ की ओर ध्यान न देकर अपने समाज को प्रत्येक प्रकार से लाभ ही नहीं, स्वतंत्र, बलशाली और ख्यातिप्राप्त बनाने का प्रयास करें कि वे बुद्धिमानी और योग्यता में किसी से कम नहीं हैं. मनुष्य को चाहिए कि वह हर पल समाज की प्रगति का मार्ग तलाशे. इस बात के लिए बाबासाहेब इतिहास और साहित्य को जरूरी समझते थे. वह इसलिए कि इतिहास लम्बे समय तक जिन्दा रहता है और ऊर्जा प्रदान करता है. इसलिए बाबासाहेब कहते थे कि लोगों को इतिहास भूलने का आग्रह करना गलत है. जो लोग इतिहास भूल जाते है, वे नए इतिहास का निर्माण ही नहीं कर सकते.
आज का साहित्य इसी बात को आगे बढ़ाने का काम कर रहा है. हां! कल का दलित साहित्य, अब अम्बेडकरवादी साहित्य हो गया है जो मानवतावादी साहित्य के रूप में बाबासाहेब की विचारधारा को आगे बढ़ाने मे एक अहम भूमिका अदा कर रहा है. इसने तमाम दीवारें तोड़ दी हैं. दलित साहित्य जाति संबोधक है किंतु अम्बेडकरवादी साहित्य एक विचार को उद्घाटित करता है. यही होना भी चाहिए क्योंकि बाबासाहेब किसी एक वर्ग के नहीं. अपितु समग्र समाज के अगुआ थे.
कुछ कुबुद्धि राजनीतिज्ञ बाबासाहेब को देशद्रोह का आवरण पहनाने में पीछे नहीं हैं. ये वे लोग हैं जो भारत में व्याप्त जाति-प्रथा के समर्थक हैं. जबकि बाबासाहेब में राष्ट्र-प्रेम कूट-क़ूट कर भरा था. चाहे अछूतों के पक्ष में मंदिर प्रवेश का मामला हो, या तालाब के पानी का, धर्म परिवर्तन का या पूना पैक्ट से जुड़ा कम्युमनल एवार्ड का, बाबासाहेब ने कभी भी राष्ट्रहित की अनदेखी नहीं की.यह अलग बात है कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बाबासाहेब ने अछूत समस्या पर गुमराह करने वालों से तर्क-वितर्क करने में कठोर रुख अपनाया. बाबासाहेब के राष्ट्रप्रेम को कुछ ऐसे समझा जा सकता है. बाबासाहेब कहते हैं कि मुझे अच्छा नहीं लगता कि जब कुछ लोग कहते हैं कि हम पहले भारतीय हैं और बाद में हिन्दू या मुसलमान. किंतु मुझे यह मंजूर नहीं. धर्म, संस्कृति, भाषा आदि की होड़ में यकीन के रहते हुए आदमी के प्रति निष्ठा पनप ही नहीं सकती. मैं चाहता हूं कि लोग पहले भी भारतीय हों और अंत में भी भारतीय रहें. भारतीय के अलावा और कुछ नहीं. भारत के मामले में बाबासाहेब का मानना था कि भारत जैसा देश जहां सत्ता, साधन और संपत्ति एक छोटी कौम की बपोती है, जिसने कपट नीति से अधिकार हथियाएं, ऐसे देश में राजनीतिक क्रांति से पहले सामाजिक क्रांति का होना जरूरी है. यह जानना जरूरी है कि बाबा साहेब के जमाने में संचार-तंत्र इतना व्यापक नहीं था जितना आज है. सो बाबासाहेब हाथ के लिखे खतों से ही ज्यदातर काम चलाते थे.
उनके पत्रों से पता चलता है कि वे अपने परिवार, समाज और उसके विभिन्न समुदायों तथा देश की छोटी-बड़ी सभी प्रकार की समस्याओं को लेकर कितने चिंतित रहते थे. इसलिए वे अपनी व्यक्तिगत समस्याओं से ज्यादा अपने समाज और समुदाय को लेकर ज्यादा गंभीर रहते थे. यह जानकर हैरत होगी कि लोकमान्य तिलक डॉ. अम्बेडकर के जितने विरोधी थे, तिलक के बेटे श्रीधर पंत बलवंत तिलक उतने ही डॉ. अम्बेडकर के पक्के प्रशंसक थे.
खेद की बात ये है कि आज तक भारत में किसी भी विद्यालय में बाबासाहेब अम्बेडकर के नाम से कोई Chair स्थापित नहीं की गई है, जबकि कोलंबिया यूनिवर्सिटी में , जहाँ बाबासाहेब अम्बेडकर ने शिक्षा प्राप्त की थी, अम्बेडकर Chair की स्थापना की जा चुकी है. भारत में किसी भी विद्यालय में बाबासाहेब अम्बेडकर के नाम से कोई Chair स्थापित न करना दुर्भावना नहीं तो और क्या है? क्या ऐसी भावनाएं अन्ना हजारे को नहीं सालती? क्या जाति-वाद अन्ना को नजर नहीं आता? नजर तो आता होगा किंतु चर्चा में बने रहने के लिए बेशक एक अलग मार्ग ही चाहिए, सो अन्ना ने किया. जीत भी गए. अच्छा हुआ. अन्ना हजारे भुखमरी के खिलाफ मुहीम छेड़ें तो जानें. इतना ही नहीं निचले स्तर पर हो रहे भ्रटाचार जैसे पुलिसिया तंत्र और जिला स्तर पर हो रहे भ्रटाचार को रोकने के लिए कौन सा अन्ना आएगा? सड़क ऊंची हो गई. दरवाजा ऊंचा करना है तो पुलिस को दक्षिणा दो. क्या जन लोकपाल बिल इसे रोक पाएगा? ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला, जैसा चल रहा है, वैसा ही चलता रहेगा. बस! आत्म-संतुष्टि की बात है, सो सरकार को भी मिल गई और अन्ना को भी. अब आपस में छींटा-कसी के दौर की बहुत संभावना है. वो होना ही है. कांग्रेस भाजपा पर और भाजपा कांग्रेस पर पत्थर उछालेगी ही. सत्ता की लड़ाई जो ठहरी.
अंत में, मैं कहना चाहूंगा कि बाबासाहेब ने कहा था कि किसी भी संविधान की सफलता या असफलता संविधान की अपनी नहीं होती अपितु उसे लागू करने वालों की नीयत पर निर्भर होती है. बाबासाहेब का मानना था कि बुद्धिमान व्यक्ति भला हो सकता है, लेकिन साथ ही वह दुष्ट भी हो सकता है. बाबासाहेब का यह भी मानना था कि सभी समता, स्वतंत्रता व भ्रातत्व के भाव के आधार पर प्रगति व खुशहाली के अवसर प्राप्त कर सकें, यही बाबासाहेब का मानवतावाद है जिसके लिए वे जीवन भर संघर्षरत रहे. यहां यह कहना अतिश्योक्ति न होगा कि बाबासाहेब अम्बेडकर एक सच्चे राष्ट्रवादी थे. उन्होंने जो भी मुद्दे छुए वो सब ऐसे रहे थे कि यदि उनका सही मायने में अनुपालन हो जाता तो आज का भारत खून के आंसू न बहाता.
डॉ. अम्बेडकर का जीवन दर्शन
जिन लोगों ने नवभारत की तकदीर लिखी, उन लोगों में डॉ. अम्बेडकर खास सख्शियत हैं. उन्होंने अपने कार्य से समाज, अर्थ और राजनीति ही नहीं बल्कि धर्म के क्षेत्र में भी अद्वितीय स्थापनाएं दी. आज बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर एक प्रमुख प्रेरक शक्ति हैं, जिनसे ऊर्जा लेकर लाखों लोगों के जीवन में क्रांति आई है और उनका जीवन सुखमय हो गया है. स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व (भाईचारा) को उनके आंदोलन का केन्द्रीय तत्व माना जाता है. यही वे तत्व हैं जिन्होंने फ्रांस में क्रांति को जन्म दिया था, कतिपय अमेरिका की क्रांति में भी यदि प्रमुख नहीं तो एक महत्वपूर्ण भूमिका इन तत्त्वों की रही थी. डॉ. अम्बेडकर अपने भाषणों और लेखों में फ्रांस की क्रांति का खूब उदाहरण देते थे. इसलिए यह मान लिया गया है कि ये तीन प्रेरक तत्व डॉ. अम्बेडकर ने फ्रांस की क्रांति से लिये हैं. लेकिन ऐसी सूचना को मान लेना गलत होगा. क्योंकि 3 अक्तूबर 1954 को बाबासाहेब ने आकाशवाणी दिल्ली से जारी अपने पांच मिनट्स के वक्तव्य में कहा था, ‘मेरा जीवन सम्बन्धी दर्शन तीन शब्दों में समाहित है- स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व (भाईचारा) लेकिन किसी को यह नहीं समझना चाहिए कि मैंने अपने जीवन-दर्शन को फ्रांस की क्रांति से लिया है. मैंने वैसा नहीं किया है, इस बात को मैं बड़े यकीन के साथ कहता हूं. मेरे दर्शन की बुनियाद राजनीति में नहीं है, बल्कि धर्म में है. मैंने अपने आदर्श तथागत बुद्ध की शिक्षा से इस दर्शन को अपनाया है.”
बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर अपने जीवन दर्शन में स्वतंत्रता को कट्टरता के साथ नहीं अपनाते हैं, वे मानते हैं कि असीमित स्वतंत्रता समानता को नुकसान पहुंचाती है. इसलिए वे स्वतंत्रता का बेहद व्यावहारिक पक्ष ही मान्य करते हैं. समानता के मूल्य को भी उन्होंने कट्टरता से मुक्त करके स्वीकार किया है. जब हम सभी लोगों को एक समान समानता प्रदान करते हैं, तब हमारी आंखें खुली होनी चाहिए. अनेक अवसरों पर समानता स्वतंत्रता को भारी हानि पहुंचाती है. हमें देखना यह है कि एक पेड़ पर चढ़ने के लिए यदि बंदर, घोड़ा, हाथी, कच्छुआ आदि को समानता का अधिकार देते हुए प्रतियोगिता में शामिल किया जाता है तो यह वास्तविक समानता नहीं होगी.
स्वतंत्रता से समानता के अतिक्रमण के खतरे को वे समझते थे, इसलिए डॉ. अम्बेडकर इन्हें कानूनी रूप से स्वीकार करते थे. इतना होने पर भी उन्होंने नहीं माना कि स्वतंत्रता के द्वारा समानता के अतिक्रमण और समानता के द्वारा स्वतंत्रता के अतिक्रमण से कोई कानून बचाव कर पाएगा. इसलिए समाज को बंधुत्व ही बचा पाएगा, ऐसा उनका मानना था. बिना बंधुभाव के (भाईचारा) समाज अतिक्रमण के खतरों से मुक्त नहीं हो सकता. इसलिए उनके दर्शन में इन तीन मूल्यों को विशेष योगदान था.
इन तीन मूल्यों के अतिरिक्त डॉ. अम्बेडकर ने अपने जीवन पर तीन बातों को विशेष रूप से अपनाया था. अम्बेडकरवादियों को इन्हें जानना जरूरी है. ये तीन बातें बाबासाहेब ने 28 अक्तूबर 1954 को मुम्बई के पुरन्दरे स्टेडियम में कही थी जो 6 नवम्बर 1954 को साप्ताहिक ‘जनता’ में प्रकाशित हुई थी. ये तीन मूल्यवान चीजें हैं, पहली- शिक्षा, दूसरी- आत्मसम्मान और तीसरी- शील.
डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि ‘ब्राह्मणों ने आज तक हम लोगों को पढ़ने नहीं दिया. धर्म के कानून हमारे रास्ते में पत्थर की तरह आड़े आ गए और हमें ज्ञान से, पढ़ने-लिखने से दूर रखा गया. हमारे लोग पत्थर को ही शिक्षा मानते थे. इसलिए हमारी धार्मिक मान्यताएं अपवित्र हुई है. बाबासाहेब को पढ़ने का इतना शौक था कि दिल्ली निवास पर उनकी निजी लाईब्रेरी में 20 हजार से अधिक पुस्तकें थी. जब वे दिल्ली में थे तब वे अक्सर ठाकूर एण्ड कंपनी से किताबें खरीदते थे, जिनके हजार रुपये के बिल बाबासाहेब की ओर रुके रहते थे. एक दो बार ऐसा भी हुआ कि पुस्तकों के उधार को वे चुकता नहीं कर पाए. लेकिन पुस्तकें लेने के लिए वे अपनी गाड़ी तक दुकान के सामने लगा देते थे. शिक्षा के प्रति उनके प्रेम को उनकी इस बात से भी जाना जा सकता है, वे कहते हैं- जिस प्रकार मनुष्य को जीने के लिए भोजन की जरूरत होती है, उसी प्रकार ज्ञान की भी जरूरत होती है. शिक्षा के बिना कोई भी आदमी कुछ नहीं कर सकता है.
डॉ. अम्बेडकर ने दूसरी महत्वपूर्ण चीज़ ‘आत्म-सम्मान को माना है. उनका आत्म-सम्मान, किसी के आगे हाथ फैलाने से रोकता है. लेकिन उनके आत्म-सम्मान के भाव में निजित्व नहीं है, उसमें गहरी सामाजिकता है. वे अपने समय में अर्थशास्त्र की उतनी ऊंची डिग्री लिये हुए थे. उतनी ऊंची डिग्री उस समय पूरे भारत में किसी के पास नहीं थी. जब वे भारत आये तो डॉ. परांजये ने एक महाविद्यालय में अर्थशास्त्र का प्रोफेसर नियुक्त करना चाहा. डॉ. अम्बेडकर से तेरह लेक्चर देने के लिए कहा गया लेकिन उन्होंने केवल चार लेक्चर देना ही स्वीकार किया. ऐसा क्यों किया गया? ऐसा इसलिए किया गया कि वास्तव में वे नौकरी नहीं करना चाहते थे. वे अपने लोगों के लिए काम करना चाहते थे. असल कारण था कि आजीविका के लिए वे किसी पर निर्भर नहीं होना चाहते थे. इसलिए आत्म-सम्मान के साथ समाज के लिए काम के लिए उन्होंने नौकरी करनी पड़ी थी. बाबासाहेब कहते हैं- ””मैंने किसी के भी सामने हाथ नहीं फैलाया कि आप मुझे कोई पद दीजिए. हां, दूसरों के लिए कुछ किया होगा, लेकिन स्वयं के लिए मैंने एक अंगुल भर चिट्ठी भी लिखी हो तो कोई बताए.”” डॉ. अम्बेडकर को कई बार जज की नौकरी का ऑफर मिला. वे एक बार कौंसिलर बने, वे मंत्री भी रहे लेकिन अपने आत्म-सम्मान को छोड़ वे अवसरवादी नहीं बने. वे किसी भी रूप में दीनता के भाव को स्वीकार नहीं करते हैं. एक बार उन्होंने कहा- ””मेरा स्वाभिमान इतना गहरा है कि मैं ईश्वर को भी अपने से छोटा मानता हूं.””
तीसरी महत्वपूर्ण चीज डॉ. अम्बेडकर के जीवन में ”शील” था. बाबासाहेब ने किसी के साथ दगाबाजी नहीं की और न ही कभी धोखा दिया. वे अपने विचार और आचरण में ईमानदार बने रहे. वे कई बार यूरोप गए, यूरोप में शराब और सिगरेट का आम प्रचलन है, लेकिन उन्होंने कभी भी इन निरर्थक चीज़ों का सेवन नहीं किया. डॉ. अम्बेडकर का जीवन दर्शन तीन मूल्य स्वतंत्रता, समानता और सहभाव तथा तीन बातें शिक्षा, स्वाभिमान और शील में देखा जा सकता है जो उन्होंने अपने जीवन में अपनाया.
यहां एक और अति महत्वपूर्ण बात पर ध्यान देना जरूरी है, जिसपर ध्यान दिये बिना बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के जीवन दर्शन की बात अधूरी रह जायेगी. बाबासाहेब कहते हैं- ””आज भारत का आदमी दो अलग-अलग ध्येयवाद से नियन्त्रित है. संविधान की प्रस्तावना में समाया ध्येयवाद और धर्म में समाया ध्येयवाद. …अपने जीवन दर्शन पर मेरा पूरा भरोसा है, इसलिए आज जो बहुसंख्य भारतीय लोगों का जो राजकीय ध्येयवाद है, वह सभी का सामाजिक ध्येयवाद हो, इस बात की मुझे उम्मीद है.””
ध्येयवाद किसी व्यक्ति के जीवन का चरम लक्ष्य होता है, जिससे किसी व्यक्ति के जीवन की दिशा तय होती है. अम्बेडकरवादी होने का मतलब डा. अम्बेडकर के ध्येयवाद को अपनाना और उसे हासिल करना है. इसलिए आज के दलित आंदोलन के सामने संविधान की प्रस्तावना में दिए सामाजिक ध्येयवाद के लिए काम करने के सिवाय कोई दूसरा काम नहीं है. इसलिए अब ब्राह्मणों को कोसना छोड़कर बाबासाहेब के इशारे पर संविधान में दिये ध्येयवाद को प्राप्त करने के लिए एक-निष्ठ संघर्ष करना जरूरी है. उच्च जाति के व्यक्ति ने किया दलित महिला से रेप, पति को भी किया घायल
बांदा। यूपी के बांदा जिले में एक दलित महिला के साथ हैवानियत का मामला सामने आया है. पानी भरने गई इस महिला को घर में खींच उच्च जाति के व्यक्ति ने रेप किया. विरोध कर रही महिला के प्राइवेट पार्ट में कील डाल दी. इससे वह बेहोश हो गई. वहां छुड़ाने पहुंचे महिला के पति और उसके जेठ को फरसे से घायल कर दिया. महिला को मेडिकल चेकअप के बाद जिला अस्पताल ले जाया गया है.
बांदा जिले में बीते सोमवार को दलित महिला अपने 8 साल के बेटे के साथ गांव के ही हैंडपंप पर पानी भरने गई थी. आरोप है कि हैंडपंप से सटे घर में रहने वाले उच्च जाति के एक व्यक्ति ने महिला को जबरन अपने घर में खींच लिया. इसके बाद उससे रेप किया. महिला ने जब विरोध किया तो उसके प्राइवेट पार्ट में लोहे की कील डाल दी. साथ ही उसके सिर पर हमला किया. इससे वह बेहोश हो गई.
महिला के साथ पानी भरने आया उसका बेटा भागकर घर पहुंचा. उसने घरवालों को घटना की जानकारी दी. घर से महिला के पति और जेठ जब घटनास्थल पर पहुंचे तो आरोपी ने उन पर फरसे से हमला कर दिया. इससे दोनों लहूलुहान हो गए. घटना के बाद पीड़ित परिवार गांव वालों की मदद से थाने पहुंची और घटना की सूचना दी.
आरोप है कि पुलिस ने कार्रवाई की बजाय सादे कागजों में उनसे दस्तखत करा लिया और उन्हें अस्पताल भेज दिया. बांदा के एसपी श्रीपति मिश्रा का कहना है कि मामला उनकी संज्ञान में आया है. आरोपी के खिलाफ मारपीट का मुकदमा बबेरू थाने में दर्ज किया गया है. पीड़ित महिला की तहरीर बबेरू थाना भेज दी गई है जिस पर धाराओं में तब्दीली करने और पीड़िता का मेडिकल चेकअप के निर्देश दिए गए हैं. नोटबंदी बनाम वोटों की गोलबंदी
उत्तर प्रदेश में 2017 में होने वाला विधानसभा का आम चुनाव श्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के लिए कितना महत्वपूर्ण है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने 8 नवम्बर-2016 को सम्पूर्ण देश को आर्थिक आपातकाल के दावानल में झोंक दिया. जिसमें बैंक के बाहर अपना ही पैसा प्राप्त करने के लिए लाइनों में लगे लगभग 74 लोगों की जान जा चुकी है. जो उरी में हुए आतंकी हमले में शहीद हुए जवानों से चार गुणा से भी ज्यादा हैं. जिन्हें सम्पूर्ण विपक्ष की पूरजोर मांग के बावजूद शहीद मानकर सरकार ने श्रद्धांजलि देने से साफ मना कर दिया. इससे समझा जा सकता है कि देश की आम जनता के दु:ख दर्द से मोदी सरकार का कोई सरोकार नहीं, वह मरती हो तो मरने दो.
मायावती जो उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री रह चुकी है तथा राज्यसभा की सदस्य हैं, इस समय देश में विपक्ष की सबसे कद्दावर नेता होकर उभरी है. उन्होंने राज्यसभा में कहा कि मोदी सरकार ने देश पर आर्थिक आपात काल थोप दिया है …देश की जनता पर ही सर्जिकल स्ट्राइक कर दिया है. बाद में सभी पार्टियों के नेताओं ने उनके ही बयान को दोहराया.
मोदी सरकार की पूरी कोशिश है कि वह यह साबित कर पाए कि समूचा विपक्ष उनका विरोध इसलिए कर रहा है कि उसके पास काला धन है? उनके नोटबंदी कार्यक्रम से सपा, बसपा का यह काला धन बेकार हो जाएगा और उनके पास चुनाव लड़ने के लिए पैसा ही नहीं होगा. सारा विपक्ष यह कह रहा है कि देश की जनता जानती है कि सबसे ज्यादा काला धन देश में किस दल के पास है. लेकिन उसने उसे पहले ही ठिकाने लगा दिया है. इसके लिए विपक्षी दल पश्चिमी बंगाल भाजपा द्वारा 7 नवंबर को बैंक में जमा कराए गए एक करोड़ रूपए को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं
जब भी किसी देश में नोटबंदी होती है, तो कभी भी पूरी मुद्रा वापस नहीं आती है. उसका बीस से पच्चीस प्रतिशत हिस्सा वापस नहीं आता है. 500-1000 के जो नोट चलन में हैं, उनका 20 प्रतिशत 8 लाख करोड़ बैठता है. जिसका घोटाला करके सरकार अपने कुछ सहयोगी पूंजीपतियों के ऋण माफ़ कर देना चाहती है. जिसे वे 2017 के यूपी के चुनाव तथा 2019 के लोकसभा चुनाव में पुनः निवेश कर देंगे. सरकार द्वारा अपने चहेते उधोगपतियों के बड़े-बड़े ऋण माफ करने के कारण बैंकों के खजाने खाली हो गए थे, उन्हें भरने के लिए नोटबंदी का उपक्रम किया गया, जिसके कारण बैंकों के पास इतनी मुद्रा इक्कट्ठी हो जाएगी, जिससे बड़े-बड़े उधोगपतियों को सरकार ब्याज रहित या बहुत ही कम ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध करवा देगी
इस पूरे घटनाक्रम से साबित होता है कि भाजपा की कथनी और करनी में भारी अंतर है. जैसा कि कहा जाता है कि भाजपा में सामूहिक नेतृत्व है और निर्णय सामूहिक रूप से लिए जाते हैं. यह निर्णय प्रधानमंत्री ने अकेले ही लिया है और उसकी घोषणा भी उन्होंने अकेले ही की है. जो देश को अधिनायकवाद (तानाशाही) की ओर ले जाने वाला कदम है. लोग कह रहे हैं कि उन्होंने सरकार और पार्टी दोनों को हाइजैक कर लिया है.
आपातकाल की तारीफ जिस तरह आम जनता कर रही थी, नोटबंदी की तारीफ भी लोग उसी तरह कर रहे हैं. आपातकाल में जनता जिस तरह परेशान थी, नोटबंदी से भी आम जनता उसी तरह परेशान है. जिस तरह भारत की जनता ने आपातकाल के विरोध में वोट दिया था और कांग्रेस हार गई थी. क्या नोटबंदी के विरोध में भी जनता उसी तरह वोट देगी? यह कहना अभी जल्दबाजी होगी. इसके लिए फरवरी 2017 तक प्रतीक्षा करनी होगी और 2019 तो अभी दूर है.
लेखक से इस पर drnsingh27@gmail.com संपर्क किया जा सकता है. परिनिर्वाण दिवस विशेषः आज भी अधूरे हैं बाबासाहेब की मृत्यु से जुड़े सवाल
डॉ. भीमराव अम्बेडकर आज इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनको मानने और जानने वालों की तादाद बहुत तेजी से बढ़ रही है. आज हालात ये है कि लोग गांधी और अम्बेडकर की तुलना ही नहीं करते बल्कि यह जानने की कोशिश भी करते हैं कि अपने वक्त में किसने देश के बड़े तबके को ज्यादा प्रभावित किया. लेकिन यह सामने आते-आते काफी वक्त लग गया. अम्बेडकर से जुड़े तथ्य तब सामने आने शुरू हुए जब बहुजन समाज ने अपने महान उद्धारकर्ता के जीवन को खंगालना शुरू किया. वहीं गांधी के बारे में किताबों से लेकर पत्र- पत्रिकाओं तक में उनके बचपन से लेकर जवानी, आंदोलन से लेकर देश की आजादी और फिर आखिरी सांस तक के हर पहलू पर द्विज कलमकारों ने खूब कलम भांजा. लेकिन डॉ. अम्बेडकर के बारे में सरकार को ही बहुत कम जानकारी है तो भला आम आदमी इसे क्या समझेगा और जानेगा. क्योंकि हकीकत यह है कि आजादी के बाद से अब तक (जनता दल की सरकार को छोड़ दें तो) इस देश की सरकारों ने डॉ. अम्बेडकर के बारे में न तो खुद जानना चाहा और न ही लोगों को बताने की कोशिश की. बल्कि इस महान हस्ती को लेकर सरकारों ने एक चुप्पी साध रखी है जो अब तक कायम है. जब सरकार गांधी और नेहरू को ही महापुरुष मानकर शोध करवाती रही है तो यह समझा जा सकता है कि देश का इतिहास कैसा होगा. कई मौकों पर डॉ. अम्बेडकर को लेकर सरकार का दोहरा रवैया सामने आता रहा है.
डॉ. भीमराव अम्बेडकर का परिनिर्वाण दिल्ली में हुआ था. दिल्ली तब भी देश की राजधानी थी और आज भी है. इसके बाद भी अम्बेडकर के परिनिर्वाण पर उन्हें दिल्ली में नहीं दिल्ली से दूर मुम्बई में अंतिम संस्कार के लिए भेजा गया. नेहरू से बड़ा चेहरा उस समय कोई नहीं था. नेहरू ही प्रधानमंत्री थे. कहा जाता है कि जो कुछ हुआ वो नेहरू के निर्देशों पर ही हुआ. कहा जाता है कि डॉ. अम्बेडकर के परिनिर्वाण के बाद नेहरू तब तक 26 अलीपुर रोड पर मौजूद रहें; जब तक उनके शव को विशेष विमान से मुंबई नहीं भेज दिया गया. ये वो दौर था जब नेहरू की इजाजत के बिना पत्ता भी नहीं डोलता था. लेकिन किसी भी साहित्यकार, पत्रकार या कहानीकार ने इस मुद्दे पर रोशनी डालने की जहमत नहीं उठाई कि देश के संविधान को लिखने वाले और एक बड़े तबके के रहनुमा के साथ परिनिर्वाण के बाद हुए नाइंसाफी पर चार लाइनें हक़ीक़त की भी लिख दी जाए. सरकार के पास तो कोई आंकड़ा है ही नहीं.
ऐसा माना जाता है कि गांधी और कथित तौर पर गांधी परिवार यानी नेहरू परिवार के लोगों की समाधि दिल्ली में होने की वजह से प्रधानमंत्री और कांग्रेस के ही बड़े नेताओं ने अम्बेडकर के परिनिर्वाण के बाद उनके शव को अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली की बजाय मुम्बई रवाना कर दिया गया. बाबासाहेब को लेकर उनके अनुयायियों में जो पागलपन है, अम्बेडकरवादियो का कारवां जिस गति से बढ़ रहा है, उसको सामने रख कर फर्ज करिए कि डॉ. अम्बेडकर का अंतिम संस्कार दिल्ली में हुआ होता तो देश की राजधानी में 6 दिसंबर का नजारा कैसा होता? आज के वक्त में नागपुर की दीक्षा भूमि और मुंबई में बाबासाहेब के अंतिम संस्कार की जगह उठा ‘जय भीम’ का घोष दबकर रह जाता है. लेकिन जय भीम करते देश भर के लोग जब राजनीतिक सत्ता के केंद्र राजधानी दिल्ली में इसकी हुंकार भरते तो सत्ता के शिखर के डगमगाने का खतरा था. कांग्रेस के रणनीतिकारों को इसका अंदेशा पहले से ही था. कांग्रेस को उस समय डर था कि दिल्ली में संविधान निर्माता की समाधि बनने से गांधी और नेहरू परिवार के स्मारकों की रौनक और चमक फीकी पड़ जाएगी. अम्बेडकर दिल्ली में मौजूद रहकर देश की सत्ता को हमेशा चुनौती देते रहेंगे. बहुजन समाज अपने इस पुरोधा को पूजेगा, न किसी अन्य नायक को. अम्बेडकर के व्यक्तित्व और उनके योगदान को लेकर डरी कांग्रेस सरकार (केंद्र सरकार) को यह फैसला करना पड़ा कि डॉ. अम्बेडकर को राजधानी से दूर रखा जाए. ये कम दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है कि जिस डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने लोगों के अधिकार और कर्तव्य को सरकारी दस्तावेजों में दर्ज किया उसी अम्बेडकर के अधिकार के लिए समाज के लोगों ने हाथ खड़े कर दिए.
डॉ. अम्बेडकर की मृत्यु को लेकर एक कयास यह भी लगाया जाता रहा है कि उनकी मौत स्वभाविक नहीं थी, बल्कि उनकी हत्या की साजिश रची गई थी. साल 2012 में इसी संदर्भ में एक आरटीआई डाली गई थी. इसमें डॉ. अम्बेडकर की मृत्यु का कारण पूछा गया था. लेकिन इस सवाल पर सरकार द्वारा दिया गया जवाब आश्चर्य में डालने वाला था. इस संबंध में केंद्र सरकार द्वारा दिए गए जवाब में कहा गया कि सरकार के पास संविधान निर्माता डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर की मौत से जुड़ी कोई जानकारी नहीं है. आरटीआई एक्ट के तहत दायर आवेदन के जवाब में केंद्र के दो मंत्रालयों और अम्बेडकर प्रतिष्ठान ने अपने पास डॉ. अम्बेडकर की मौत से जुड़ी कोई भी जानकारी होने से इनकार किया. एक मंत्रालय के जन सूचना अधिकारी ने यह भी कहा कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं है कि मांगी गई सूचना किस विभाग से संबद्ध है.
आरटीआई कार्यकर्ता आरएच बंसल ने राष्ट्रपति सचिवालय में आवेदन कर पूछा था कि डॉ. भीमराव अम्बेडकर की मौत कैसे और किस स्थान पर हुई थी? उन्होंने यह भी पूछा था कि क्या मृत्यु उपरांत उनका पोस्टमॉर्टम कराया गया था? पोस्टमॉर्टम कराए जाने की स्थिति में उन्होंने रिपोर्ट की एक प्रति मांगी थी. आवेदन में यह भी पूछा गया था कि संविधान निर्माता की मृत्यु प्राकृतिक थी या फिर हत्या? उनकी मौत किस तारीख को हुई थी? क्या किसी आयोग या समिति ने उनकी मौत की जांच की थी? राष्ट्रपति सचिवालय ने यह आवेदन गृह मंत्रालय के पास भेज दिया जिस पर गृह मंत्रालय द्वारा आवेदक को दी गई सूचना में कहा गया कि डॉ. अम्बेडकर की मृत्यु और संबंधित पहलुओं के बारे में मांगी गई जानकारियां मंत्रालय के किसी भी विभाग, प्रभाग और इकाई में उपलब्ध नहीं हैं. यहां तक की सरकार को यह भी पता नहीं है कि डॉ. अम्बेडकर की मौत कैसे हुई और किस बीमारी की वजह से हुई? क्या उनकी हत्या की साजिश की गई, इसके बारे में भी सरकार कोई ठोस जवाब नहीं दे सकी है.
महिला लेखिकाओं में अग्रणी, मराठी और हिन्दी दलित साहित्य की वरिष्ठ साहित्यकार एवं अनुपम कृति ‘जीवन हमारा’ की लेखिका दिवंगत बेबी ताई कांबले ने एक जगह लिखा था कि जब वो बच्ची थी तब डॉ. अम्बेडकर उनके गांव फलटण आए थे. तब उन्होंने उनके भाषणों को सुना था. अपने आखिरी वक्त तक उनको बाबासाहेब द्वारा बोले गए एक-एक शब्द याद रहे. बेबी ताई कांबले ने लिखा था, ‘मैंने उनके भाषण को सुना था, वो कह रहे थे “शिक्षित बनो!! अगर तुम्हारे पास पैसे नहीं हैं तो तुम खाना कम खाओ पर पढ़ाई को किसी भी कीमत पर मत छोडो. जब तक तुम शिक्षित नहीं होते तुम प्रगति नहीं कर सकते. हिन्दू धर्म ने दलितों को अज्ञानता के अंधेरे में धकेल रखा है जहां चार वर्णों का भेद है, लेकिन शिक्षा के माध्यम से तुम उन्नति कर सकते हो.’ इसी भाषण ने बेबी ताई कांबले का जीवन बदल दिया था और तमाम कष्टों को झेलते हुए भी उन्होंने डॉ. अम्बेडकर द्वारा कही बातों का अनुसरण करते हुए अपने जीवन में एक मकाम हासिल किया.
शुरुआती अनदेखी के बाद डॉ. अम्बेडकर के बढ़ते प्रभाव के बीच बाद के वक्त में द्विज साहित्यकार डॉ. अम्बेडकर को नजरअंदाज नहीं कर सकें. हिन्दी के जाने माने लेखक और वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. जगदीश्वर चतुर्वेदी ने लिखा हैं कि अम्बेडकर ने भारत को सभ्यता की मीनारों पर चढ़कर नहीं देखा, बल्कि शूद्र के आधार पर देखा. शूद्र के नज़रिए से भारत के इतिहास को देखा, शूद्र की संस्कृतिहीन अवस्था के आधार पर खड़े होकर देखा. इसी अर्थ में डॉ. अम्बेडकर की अछूत की खोज आधुनिक भारत की सबसे मूल्यवान खोज है. अम्बेडकर के नजरिए की पहली विशेषता है कि वे वर्णव्यवस्था को नस्लभेद के पैमाने से नहीं देखते. दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि अम्बेडकर की चिंतन-प्रक्रिया स्थिर या जड़ नहीं थी, वे लगातार अपने विचारों का विकास करते रहे. विचारों की विकासशील प्रक्रिया के दौरान ही हमें उस विकासशील सत्य के भी दर्शन होंगे जो वे बताना चाहते थे. डॉ. अम्बेडकर के विचारों को निरंतरता या गतिशीलता के आधार पर पढ़ना चाहिए.
बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर ने जिस 26 अलीपुर रोड पर स्थित अपने आवास पर आखिरी सांस ली, उसकी याद को भी सरकारें मिटाने पर तुली है. तमाम वादों और दावों के बावजूद इसे विकसित नहीं किया गया है. यहां तक की वहां से गुजरने वाले तमाम लोगों तक को नहीं पता कि वह भारत देश के जिस लोकतंत्र पर गुमान करते हैं, उसे अमलीजामा पहनाने वाले शख्स ने इसी घर में दम तोड़ा था. भाजपा की केंद्र सरकार ने तो पिछले दिनों उस पूरी इमारत को ही यह कहते हुए मिट्टी में मिला दिया कि इस पर एक भव्य इमारत बनाई जाएगी और बाबासाहेब की यादों को संजोया जाएगा. लेकिन सवाल यह है कि क्या उस बनावटी इमारत में लोगों को बाबासाहेब के कदमों की अनुभूति मिल पाएगी? शायद नहीं, हालांकि इसमें भी एक साजिश देखी जा रही है और जब तक यह इमारत बन नहीं जाती संघ समर्थित सरकार की मंशा पर सबको संदेह रहेगा.
ऐसा नहीं है कि बाबासाहेब के नाम और पार्टी के झंडे को लेकर राजनीति कर रहे नेताओं को इसकी जानकारी नहीं है. बावजूद इसके अब तक वो बाबासाहेब के ‘मान’ को बढ़ाने के लिए कुछ नहीं कर पाए हैं. हर कोई बाबासाहेब को उनके परिनिर्वाण दिवस 6 दिसंबर और जयंती 14 अप्रैल पर याद करता है और अपनी जिम्मेदारी निभा लेता है, लेकिन अब वक्त बाबासाहेब के सम्मान के लिए लड़ने का है.
– लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. नोटबंदीः बिना एनेस्थीसिया ही कर दिया ऑपरेशन
हम सब जानते है कि 6 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक का 21 महीने की अवधि में भारत में आपातकाल जारी रहा था. वह आपातकाल तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कहने पर उस समय के राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने भारतीय संविधान की धारा 352 के अधीन आपातकाल की घोषणा की थी. वह स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह सबसे विवादास्पद और अलोकतांत्रिक काल कहा जाता है. आपातकाल में चुनाव स्थगित हो गए तथा नागरिक अधिकारों को समाप्त करके मनमानी की गई. इंदिरा गांधी के राजनीतिक विरोधियों को कैद कर लिया गया और प्रेस पर प्रतिबंध लगा दिया गया. प्रधानमंत्री के बेटे संजय गांधी के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर नसबंदी अभियान चलाया गया. विपक्षी नेताओं और तथाकथित भ्रष्ट अधिकारियों को जेल में डाल दिया गया.
उस समय के विपक्षी राजनीतिक दलों के अग्रणीय जयप्रकाश नारायण ने इसे ”भारतीय इतिहास की सर्वाधिक काली अवधि” कहा था. उस समय आकाशवाणी से प्रसारित अपने संदेश में इंदिरा गांधी ने कहा था कि जब से मैंने आम आदमी और देश की महिलाओं के फायदे के लिए कुछ प्रगतिशील क़दम उठाए हैं, तभी से मेरे खिलाफ गहरी साजिश रची जा रही थी. आपातकाल के इस दौर में देखा ये गया था कि कांग्रेस के अलावा सारे के सारे राजनीतिक दल ही नहीं, कांग्रेस के अन्दर के राजनेता भी इंदिरा गांधी के खिलाफ हो गए ( कुछ पहले से भी थे) किंतु आम जनता की जीवनचर्या पर उस आपातकाल का कोई दुस्प्रभाव नहीं पड़ा था. हां, प्रशासन में जो कामचोर और भ्रष्ट अधिकारी थे, वो उस आपातकाल के खिलाफ जरूर हो गए थे. मेहनतकशों और ईमानदार जनता को उस आपातकाल से ज्यादातर कोई आपत्ति नहीं थी. क्योंकि उस आपातकाल में जनता की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के तमाम सरकारी/गैरसरकारी रास्ते खुले हुए थे. इस सत्य का यहां उल्लेख करना इसलिए जरूरी जान पड़ा क्योंकि भाजपा बार-बार उस आपातकाल का मसला उठाकर जनता के हितों साधने की आड़ में राजनीतिक षड़यंत्र गढ़ने में अग्रणीय रही है… आज भी है.
इंदिरा गांधी के द्वारा आपातकाल का याद आना बेशक स्वभाविक है. क्योंकि 9 नवम्बर 2016 वह दिन था जिस दिन मोदी सरकार के आदेश पर एनडीटीवी इण्डिया चैनल को एक दिन के लिए बंद किया जाना था ताकि मीडिया को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा‘ और ‘जिम्मेदार पत्रकारिता‘ का पाठ पढ़ाया जा सके. लेकिन इस अघोषित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबन्ध लगाने जैसा ही निर्णय थी. यह निर्णय मीडिया पर आपातकाल जैसा ही सीधा प्रहार था. इस पर भाजपा सरकार को समूचे देश के विरोध का सामना करना पड़ा और इस विरोध के चलते सरकार को एनडीटीवी इण्डिया चैनल को एक दिन के लिए बंद किए जाने के निर्णय से पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा. इसके पहले कि जनता इस प्रकरण के बाद राहत की सांसें ले पाती, मोदी जी द्वारा इंदिरा गांधी की तर्ज पर गरीबी मिटाने, आर्थिक भ्रष्टचार मिटाने, काले धन पर अंकुश लगाने के बहाने 8 नवम्बर की मध्य रात्रि से 500 और 1000 के नोट गैरकानूनी घोषित कर दिये गये. एक ही झटके में सरकार ने 14 लाख करोड़ रुपये यानि प्रचलन में मौजूद कुल भारतीय मुद्रा के 86 प्रतिशत को रद्दी कागज में बदल दिया. क्या इसे अघोषित ‘आर्थिक आपातकाल” की संज्ञा से नहीं नवाजा जाना चाहिए?
इस घोषणा के बाद, देश के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने स्पष्ट किया है कि नए नोट छापने की प्रक्रिया बीते छह माह से चल रही थी. मैसूर के टकसाल में नये नोट छप रहे थे और इस ऐलान से पहले ही नई करेंसी बैंकों में पहुंचा दी गई थी. यहां यह सवाल उठता कि यदि जेटली के इस बयान को सही मान लिया जाए तो वित्त मंत्री/ भारत सरकार यह स्पष्ट करे कि नए नोटों पर रिजर्व बैंक के वर्तमान गवर्नर अर्जित पटेल के हस्ताक्षर कैसे और क्यों प्रिंटिड हैं जबकि उन्होंने तो सितंबर 2016 के प्रथम सप्ताह में रिजर्व बैंक के गवर्नर का कार्यभार संभाला था.
इस नोटबंदी का फरमान जारी करते समय कहा गया कि इस नोटबन्दी से कालाधन ही नष्ट होगा. किंतु जैसे-जैसे दिन बीतते जा रहे हैं, उससे ऐसा लगने लगा है कि मोदी सरकार ने यह फैसले काला धन बाहर आ पाएगा कि नहीं यह तो अभी कहा नहीं जा सकता किंतु इस आदेश से देश के किसानों, मजदूरों और आम गृहिणियों की जो दुर्दशा हो रही है, वैसी आर्थिक मामलों को लेकर शायद ही आजाद भारत में कभी हुई हो. किसान ने हाल ही में धान की फसल बेची है. उसका भुगतान नकदी में ही होता है, ताकि घर का अन्य खर्च चलाया जा सके. यही हाल आम गृहिणी का होगा, जिसे उसके पति ने 500 या 1000 रुपए के नोटों के तौर पर घर खर्च दिया है. एकदम बैंक भी बंद और एटीएम भी. गृहिणियों को घर भी चलाना है, घर में राशन लाना है, तो वह ऐसी स्थिति में क्या करे? मजदूर की दिहाड़ी का भुगतान भी ठेकेदार ने पुरानी मुद्रा में किया है. वह नोट बदलवाने बैंक जाएगा या रोटी के लिए दिहाड़ी पर…? इन बुनियादी सवालों पर मोदी सरकार ने विमर्श किया होगा, ऐसा नहीं लगता… लेकिन जो फैसला सामने आया है, उससे इन वर्गों की चिन्ता ही बढ़ी है. छोटे बाजार, कारोबार. व्यापारी, खुदरा दुकानदार और उनके ग्राहक भी नकदी में लेन-देन करते आए हैं. ऐसे कारोबारी अपनी आमदनी कितनी घोषित करते हैं या कितना कर-चोरी करते हैं, इसकी जांच तो सरकारी एजेंसियों से भी कराई जा सकती थी, किंतु ऐसा क्या हुआ कि सरकार ने अमीर और गरीब यानी कि दोनों को एक ही तराजू से तोलने का फैसला ले डाला. लगता है इस पर सरकार द्वारा कोई विचार ही नहीं किया गया.
दुकानदार न तो क्रेडिट और डेबिट कार्ड स्वीकार करते हैं और न ही चेक, यदि ये मान भी लिया जाए कि दुकानदार क्रेडिट और डेबिट कार्ड आदि स्वीकार करते हैं तो शहरी इलाकों की सारी जनता तक के पास क्रेडिट और डेबिट कार्ड आदि नहीं है, ऐसे में देश की दूरस्त ग्रामीण इलाकों की साधारण जनता, दैनिक मजदूरी करने वाले लोगों और किसानों के बारे में क्रेडिट और डेबिट कार्ड की उपलब्धता के बारे में सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है. ग्राहक के हाथ में नकदी है नहीं… न बैंक नकदी मुहैया कराने की हालत में आ पाए हैं, तब इस ग्रामीण जनता का क्या होगा?
खबर है बैंकों की लम्बी-लम्बी कतारों में खड़े होने वाले लोगों में से कम से कम 60/70 लोगों की मौत हो चुकी है… इसका जिम्मेदार कौन होगा? जिन घरों में लड़के-लड़कियों की शादियां होने वाली थीं/हैं… उनको खून के आंसू बहाने पड़ रहे हैं. आरबीआई ने अपने नोटीफिकेसन में शादी वाले घरों द्वारा अपना पैसा ही निकालने के लिए इतनी अव्यावहारिक शर्तें लगा दी है कि जो 7 फेरों से भी ज्यादा हैं. यदि यहां सरकार से ये पूछ लिया जाय कि क्या राजनीतिक दलों द्वार चुनाव-खर्च का भुगतान चैक के द्वारा ही किया जाता है, को क्या यह जायज न होगा?
मोदी जी की नोटबन्दी की घोषणा के पीछे की सच्चाई स्पष्ट है कि उन्होंने अपने इस मास्टर स्ट्रॉक से देश में बढ़ रही मंहगाई, सामाजिक और धार्मिक अराजकता, विदेशों से कालाधन न ला पाना और ऐसे ही अन्य वायदे जिनको मोदी सरकार पूरा करने में असमर्थ ही रही है, उन मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने के लिया गया एक अमानवीय निर्णय है. यानी अब, मोदी राज के दो साल बीतने के बाद विदेशी बैंकों में जमा धन की चर्चा को घरेलू जमाखोरी की ओर मोड़ दिया गया है. कहने की जरूरत नहीं कि नोटबंदी के निर्णय लेने से पूर्व कोई गृहकार्य किया ही नहीं गया. नोट बन्द ही करने थे… तो ठीक किंतु उनके साइज में परिवर्तन के पीछे कौन सी तुगलकी सोच रही होगी कि देश में लगे तमाम एटीएम बेकार हो गए. क्या इसे एटीएम घोटाले के रूप में भी नहीं देखा जाना चाहिए?… अब देश में लगे तमाम एटीएम नए सिरे से मरम्मत की जद में आ गए हैं. इनकी मरम्मत में कितने धन का अपव्यय होगा, क्या वह किसी पूर्वनियोजित घोटाले का हिस्सा नहीं? कमाल तो ये है कि अब सरकार देश की आम जनता और राजनीतिक विरोधियों के सवालों के उत्तर न देकर, प्रश्नों के उत्तर नए-नए सवाल ही उछाल रही है… उत्तर नहीं दे पा रही है. समझ से परे है कि यदि देश का प्रधानमंत्री ही राज्यसभा या लोकसभा की बैठकों में भाग लेने से बचेगा तो बाकी को क्या कहें?
ज्ञात हो कि प्रधानमंत्री नोटबंदी के अपने फैसले पर अडिग हैं. फिर जनता की राय जानने का क्या औचित्य है? मोदी जी ने 22 नवंबर को केवल अपनी ही पार्टी के सांसदों को इस मामले के मद्देनजर सक्रिय होने को कहा. क्या यह लोकतंत्र की अवमानना नहीं? क्यूं न सर्वदलीय बैठक बुलाई जानी चाहिए थी? मोदी जी को याद रखना चाहिए था कि नोटबन्दी का मामला किसी एक विशेष राजनीतिक दल का कार्यक्रम या चुनावी घोषणा नहीं है.
नोटबन्दी की घोषणा के बाद सरकार दिल्ली में बैठकर दिन प्रति दिन कुछ न कुछ नई सुविधाओं और आयकर के तहत डराने वाली अनेक घोषणाएं तो कर रही है किन्तु जमीन पर सुविधाओं के जमीनी असार होता दिखाई नहीं दे रहा. हां! आयकर विभाग द्वारा की जाने वाली प्रस्तावित जांचों से जरूर घबरा रही है. मोदी जी के इस निर्णय पर जब विपक्ष ने हल्ला बोला तो सरकार द्वारा उनकी आवाज को दबाने के प्रयास में जुट गए. अब यह भी संभव है कि भाजपा के समर्थक नोटबंदी के समर्थन में ट्वीटर पर मोदी की प्रशंसा के लम्बे-लम्बे कसीदे गढ़ दे… लेकिन मोदी को सोचना चाहिए कि इस प्रकार की जादूगरी से क्या होने वाला है. मुझे तो आभास होता है कि इंदिरा गांधी के आपातकालीन समय में हुई जबरन “नसबन्दी” ने उनका तख्ता हिला दिया था. कहीं मोदी का अचानक “नोटबन्दी” का निर्णय उनके लिए भी भारी न पड़ जाय. ऐसा इसलिए कि भाजपा के भ्रामक दावों की असलियत पूरी तरह खुलती जा रही है. दूसरे, आम लोगों पर थोपी गई आर्थिक अराजकता और मुश्किलों में डालने वाली असंवेदनशीलनता सरकार के खिलाफ जनता को गोलबन्द करने का काम करेगी.
लेखक तेजपाल सिंह तेज को हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार और साहित्यकार सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है. इनका संपर्क सूत्र tejpaltej@gmail.com है. प्रबुद्ध भारत बनाने के लिए करना होगा जाति का नाश
क्या आप जानते है? इक्कीसवीं सदी आपके लिए दासता की बेड़ियां निर्मित कर रही हैं. क्योंकि…
राजतन्त्रः किसी भी समाज को गुलाम अर्थात दास बनाता है. और पूंजीवाद राजतन्त्र का पोषाक होता है.
गणतन्त्रः समाज को स्वतन्त्र रखता है और पूंजीवाद गणतन्त्र का शोषक होता है.
बीसवीं सदी के मध्य में ही बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने बहुजन समाज को, हजारों साल से चली आ रही मानवता विनाशक नीति ‘‘राजतन्त्र’’ के दल-दल से दलितों को निकाल कर, तथागतबुद्ध की सरण में ले जाकर ‘‘जियो और जीने दो’’ की नीति के तहत स्वतन्त्रत जीने का अवसर दिया. बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर ने दलितों और वंचितों के उत्थान के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया. बाबासाहेब ने विदेशों में शिक्षा ग्रहण करके बड़ी लगन मेहनत से दुनिया का सर्वश्रेष्ठ संविधान देकर भारत को गौरवान्वित किया. भारत का संविधान बनना 10,000 साल की सभ्यता में सबसे बड़ी ऐतिहासिक घटना है.
बाबासाहेब ने देश दुनिया के साथ-साथ अपना सारा जीवन उन लोगों को उठाने के लिए लगाया जो इस देश में गरीब, मजबूर, सर्वहारा, शोषित, गुलाम तथा दलित थे. जिनका समाज में मान-सम्मान नहीं होता था. जिन्होंने अपने ही देश में अपना अस्तित्व खो दिया, अपनी पहचान खो दी और अपने ही देश में गुलाम हो गए. लेकिन बहुजन समाज के दिखावटी बौद्ध, बौद्धाचार्य, नेता, अधिकारी, कर्मचारी तथा समाजिक संस्थायें गणतन्त्र (बुद्ध-अम्बेडकर) की चादर ओड़कर पूंजीवादियों की चमचागिरी करने में लगे हुए है. क्योंकि राजतन्त्र अर्थात ‘‘ब्राह्मणवाद’’ और गणतन्त्र अर्थात बुद्ध-अम्बेडकरवाद के माध्यम से यही नेता-धर्म-गुरू अर्थात अधिकारीगण तथा यह समाजसुधार के ठेकेदार व सामाजिक संस्थाएं, मंचों पर ब्रह्मणवाद का विरोध और बुद्ध-अम्बेडकर वाद के प्रशंसक बन कर हमको धोखा दे रहे हैं. परन्तु स्वयं ब्राह्मणवाद व्यवस्था को छोड़ते नहीं है. राजतन्त्र के चार मूल स्तम्भ-साम, दाम, दण्ड, भेद किसी को भी समझाकर, लालच देकर, दण्डित कर, विभाजित कर कायिक-वाचिक-मानसिक स्तर पर भ्रमित करना. उर्पयुक्त चारों नीतियों से सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, न्यायिक स्तर पर गुलामी का जीवन जीने को मजबूर कर देना.
गणतन्त्र के चार मूल स्तम्भ-
समता- किसी (जाति-वर्ग-स्त्री-पुरूष-रंग-भेद) से भी कायिक वाचिक मानसिक स्तर पर समानता का व्यवहार करना.
स्वतन्त्रता- किसी को भी कायिक-वाचिक-मानसिक तौर पर आजादी से जीवन यापन करने देना. किसी प्रकार बंधन, भेदभाव, अन्याय, अत्याचार से मुक्त होकर जीने देना.
बन्धुता- किसी को भी कायिक-वाचिक-मानसिक स्तर पर भाई-चारे का व्यवहार करना, क्योंकि देश के अन्दर हर धर्म, हर जाति के अन्दर भाई चारा ही समता मूलक आदर्श समाज बनाएगा. और देश समृद्धिशाली एवं प्रबुद्ध भारत बनेगा.
न्याय- भारत के दार्शनिक एवं विचारक बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि दुनियां में न्याय कैसा होना चाहिए? जो न्याय अदालत, सुप्रीम व हाईकोर्ट में होता है वो न्याय नहीं है. ऐसी सामाजिक व्यवस्था, आर्थिक व्यवस्था और राजकीय व्यवस्था का निर्माण करना जहां पर असमानता और भेदभाव न हो, ऐसा न्याय होना चाहिए.
बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर ने लोकतान्त्रिक भारत का संविधान बनाया. बाबासाहेब ने 25 नवंबर 1949 को कहा कि जाति देश विरोधी भी है. जब तक भारत में जाति रहेगी तब तक भारत एक राष्ट्र नहीं बन सकता है जबकि लोग गांधी को राष्ट्र पिता कहते हैं. इसलिए बाबासाहेब ने संदेश दिया अगर भारत को सही मायने में राष्ट्र बनाना है तो भारत को बन्धुता की जरूरत है. बाबासाहेब ने प्रखरता से बोला कि हमारा संविधान समता, स्वतन्त्रता, बन्धुता, न्याय की बात करता है लेकिन हमारा समाज इन सिद्धांतों को नकारता है. उन्होंने कहा कि हमारा संविधान इस देश के लिए सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक समानता की बात करता है लेकिन वास्तविकता में भारतीय समाज उसका पालन नहीं कर रहा है. हमारी सामाजिक व्यवस्था इन सिद्धान्तों को नकारती है क्यों? जाति के वजह से.
भारत को मजबूत राष्ट्र और प्रबुद्ध भारत बनाना है तो भारत में जाति बीज का समूल नाश करने के लिए बुद्ध धम्म दीक्षा लेकर अपने पूर्वजों के धम्म में वापस आना पड़ेगा. तभी जाति, धर्म और मानसिक गुलामी से मुक्त होकर दलित भारत में मान-सम्मान, सुख-शांति का जीवनयापन कर सकेंगे और बाबासाहेब के बौद्धमय भारत बनाने का सपना साकार होगा. बुद्ध दुनिया के पहले महामानव दार्शनिक एवं धम्म आविष्कारक हैं, जिन्होंने महिलाओं को पुरूषों के बराबर दर्जा दिया. ऐसी मानवतावादी, वैज्ञानिक, शील, समाधि, प्रज्ञा, मैत्री, शान्ति का बुद्ध धम्म दुनिया के लगभग 130 देशों मे फैल चुका है. जबकि भारत तथागत बुद्ध-डॉ.अम्बेडकर की जन्मभूमि होने के बावजूद भी और बुद्ध-अम्बेडकर वाद से कोसों दूर है.
लेखक रिटायर्ड अधिशासी अभियन्ता हैं. बहुजन नायकों को पढ़ने से मिलेगी लड़ने की शक्ति
क्या आपने महात्मा ज्योतिबा फुले को पढ़ा है? तथागत ने दुनिया को जो संदेश दिया, क्या आप उसके बारे में जानते हैं? बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर ने जो लिखा क्या आप उससे वाकिफ हैं? मान्यवर कांशीराम सहित तमाम बहुजन नायकों ने बहुजन समाज को जो समझाने की कोशिश की क्या आप उसे समझ पाए हैं? अगर नहीं तो इनलोगों को पढ़ना और समझना शुरू करिए, क्योंकि अगर आप सच में अन्याय, अत्याचार और भेदभाव का प्रतिकार करना चाहते हैं तो इनको पढ़ना और समझना बहुत जरूरी है.
आज अचानक से बहुजन नायकों को पढ़ने-समझने की बात करने की भी एक वजह है. वजह बिहार के मुज्जफरपुर जिले के केंद्रीय विद्यालय का वह बच्चा है, जिसको पीटे जाने का विडियो पिछले दिनों वायरल हुआ था. फिर उस छात्र ने यह बताया कि एक कुख्यात बाप की बिगड़ी संतानें उस बच्चे को इसलिए मार रहे थे क्योंकि वह दलित था और पढ़ने में अव्वल था. उस बच्चे का विडियो गुजरात के उना पीड़ितों से किसी भी मायने में कम विभत्स नहीं था. उस बच्चे को जिस बेरहमी से मारा जा रहा था वह कई सवाल खड़ा करता है. मार खाने वाला और मारने वाला दोनों हमउम्र थे. फिर हमारे समाज का बच्चा उसका प्रतिकार क्यों नहीं कर पा रहा था. आखिरकार हमारे बच्चे इतने कमजोर क्यों नजर आते हैं?
मेरा मानना है कि सबकुछ आत्मविश्वास की बात है. हमें लगता है कि वो हमें मार सकते हैं और हमारी नियति में बस मार खाना है. आए दिन दलितों पर होने वाले उत्पीड़न इसी बात को बयां करते हैं. और हर बार दलित समाज हाथ जोड़े, हाथ बांधे न्याय की गुहार लगाता दिखता है. आखिर हमारा समाज पलट कर जवाब देना कब सिखेगा? हम बस मंचों से गरजते रहते हैं कि हम 85 फीसदी हैं और वो 15 फीसदी हैं. फिर 85 फीसदी वाले आखिर पंद्रह फीसदी वालों के शोषण के शिकार क्यों हो रहे हैं? राजनैतिक तौर पर तो यह नारा ठीक लगता है लेकिन जमीन पर यह सच्चाई से कोसो दूर दिखने लगा है. वर्तमान समय में एक बात यह भी समझने की है कि क्या हम सचमुच 85 फीसदी हैं? क्योंकि सरकारी आंकड़ों में 22 फीसदी (दलित-आदिवासी) समुदाय के साथ ज्यादातर अत्याचार इसी 85 फीसदी के भीतर के लोग भी कर रहे हैं.
अपवाद को छोड़ दिया जाए तो अब इस बात को स्वीकार करने का समय आ गया है कि 85 फीसदी के भीतर की कई कथित दबंग जातियां दलितों और आदिवासियों से कोई सहानुभूति नहीं रखती, बल्कि वो 15 फीसदी के साथ मिलकर दलितों की शोषक बनने की राह पर है. पिछले दिनों ऐसी कई घटनाएं हुई हैं जब ये जातियां ब्राह्मणों से ज्यादा ब्राह्मणवादी और ठाकुरों से ज्यादा शोषणकारी साबित हुई हैं. इनका जातीय अहम दलितों और आदिवासियों को देखकर फुंफकार मारता रहता है. हम बहुजन की बात करते रहते हैं लेकिन सामने वाला न खुद को बहुजन समझता है और न ही बहुजन महापुरुषों से कोई नाता रखना चाहता है. वह तो खुद को उस ‘श्रेष्ठ’ श्रेणी का मानने लगा है जिन्होंने गणेश की सर्जरी की थी और जो मां की पेट के बजाए किसी पुरुष के मुंह और भुजाओं से पैदा हुए थे. हालांकि उस व्यवस्था में भी उन्हें पैरों में ही जगह मिली है लेकिन वो शायद पैरों में ही खुश हैं.
सोचने का विषय यह है कि आखिर दलितों का अत्याचार कब थमेगा? अन्य जातियां दलितों पर हावी क्यों हो जाती हैं और इससे निपटा कैसे जा सकता है? तो इन ज्यादतियों से निपटने का हथियार सिर्फ और सिर्फ बहुजन नायकों को जानने और समझने में छुपा है. क्योंकि मेरा साफ मानना है कि बाबासाहेब को पढ़ने, ज्योतिबा फुले को जानने और मान्यवर कांशीराम सहित तमाम बहुजन नायकों को समझने के बाद आप इस अन्याय से लड़ने के लिए खड़े हो जाते हैं. आपमें अत्याचार का प्रतिकार करने की ताकत आ जाती है. आपको धम्म की राह के बारे में पता चलता है. बहुजन नायकों के बारे में जानना आपके अंदर आत्मविश्वास जगाता है और यही आत्मविश्वास आपको जीवन में आगे ले जाता है. आज जरूरत इस बात की है कि हम अपने बच्चों को बचपन से ही बहुजन नायकों के बारे में बताएं और जब वो सातवीं-आठवीं में चले जाएं तो उन्हें बहुजन नायकों के जीवन के बारे में पढ़ने की प्रेरणा दें. दलित समाज के लोग अगर गुलामी की बेड़ियों को तोड़ कर फेंक देना चाहते हैं तो उनके लिए डॉ. अम्बेडकर, ज्योतिबा फुले और कबीर की विचारधारा को अपनाना होगा. उन्हें धम्म की राह पर चलना होगा. दो पत्ते तोड़ने पर खेत-मालिक ने काटी दलित लड़की की दो उंगुली
कौशाम्बी। यूपी के कौशाम्बी जिले में खेत से एक पौधे की दो पत्तियां तोड़ने पर खेत मालिक ने तेरह साल की दलित लड़की को ऐसी सजा दी, जिसे सुनकर आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे. आरोप है कि खेत-मालिक ने दो पत्तियां तोड़ने के बदले दलित लड़की के दाहिने हाथ की दो उंगलियां काट डालीं. हालांकि पीड़ित लड़की की हालत देखने के बाद गांव के लोगों ने उंगलियां काटने के आरोपी मालिक की जमकर पिटाई की.
पीड़ित लड़की की शिकायत पर कौशाम्बी पुलिस ने इस मामले में केस दर्ज कर तफ्तीश शुरू कर दी है. आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए तीन टीमें भी बनाई गई हैं. मामूली सी गलती पर तेरह साल की दलित लड़की सुशीला के साथ हैवानियत करने का यह मामला यूपी के कौशाम्बी जिले के सराय आकिल इलाके के पुरखास गांव का है.
जानकारी के मुताबिक़ मजदूरी कर अपने परिवार का पेट पालने वाले दलित समुदाय के संगम लाल की तेरह साल की बेटी सुशीला बीते मंगलवार को दिन में अपने जानवरों के लिए घास काटने गई थी. सुशीला जिस जगह घास काट रही थी, उसी से सटी हुई जगह पर गांव के ही फारूक का खेत है.
आरोप है कि घास काटने के दौरान सुशीला ने फारूक के खेत में लगे शकरकंद के पौधे की दो पत्तियां भी काट दीं. इस पर वहां मौजूद फारूक और उसके बेटों ने सुशीला से उसकी हसिया छीनकर दो पत्तियों के बदले उसके दाहिने हाथ की दो उंगलियां काट दी. तेरह साल की दलित सुशीला की उंगलियों से खून बहने लगा तो आरोपी घबरा गए और उन्होंने उसकी कटी हुई उंगलियों पर पट्टी बांधकर उसे वहां से भगा दिया.
सुशीला के साथ हुई हैवानियत की खबर जब गांव के लोगों को हुई तो वह गुस्से में उबल पड़े. गांव वाले जब तक मौके पर पहुंचते तब तक उंगलियां काटने के आरोपी फारूक के बेटे भाग चुके थे. फारूक ने लाख सफाई देने की कोशिश की, लेकिन भीड़ ने उसकी पिटाई कर दी. पीड़ित सुशीला और उसके परिवार वालों की शिकायत पर कौशाम्बी पुलिस ने केस दर्ज कर मामले की तफ्तीश शुरू कर दी है. फिलहाल किसी भी आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया जा सका है. अफसरों के मुताबिक़ आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए तीन टीमें बनाई गई हैं. परिनिर्वाण दिवस विशेषः बहुजन पुर्नजागरण के सूत्रधार बने थे फुले
महात्मा ज्योतिबा फुले भारत के इतिहास में एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने भारतीय के शूदों और स्त्रियों की स्वतंत्रता और समानता की पुरजोर वकालत की थी. फुले ने अपना सार्वजनिक जीवन 1848 में शुरु किया और 28 नवंबर 1890 को अपने जीवन के आखिरी दिन तक वह बहुजन (दलित-पिछड़े-स्त्रियां) समाज के कल्याण में लगे रहे. फुले आधुनिक भारत के निर्माताओं में से एक थे. फुले की कथनी-करनी में कोई फर्क नहीं था. फुले अपने समय की राष्ट्रव्यापी समस्याओं से भिड़े. उन्होंने धर्म, जाति तथा जेंडर के सवाल पर, कर्मकाण्ड, किसानों की समस्या और ब्रिटिश शासन आदि पर चिंतन किया.
वे एक दार्शनिक, नेता और महान संगठनकर्ता थे. यही वजह थी कि उन्होंने अपने जीवन में शिक्षा और दलित मुक्ति के लिए काफी काम किया. सामाजिक ब्राह्मणवादी मान्यताओं का फुले ने हमेशा विरोध किया. यही वजह रही कि जब उस दौर में सामंतियों ने दलितों के पानी पर प्रतिबंध लगाया तो उन्होंने व्यवस्था का विरोध करते हुए उनके लिए अपने घर का जलाशय खोल दिया.
फुले अमेरिकन लोकतंत्र और फ्रांसीसी क्रांति के मूल सूत्र- समानता, स्वतंत्रता और बंधुता से बहुत प्रभावित थे. वे टामस पेन की कृति ‘राइट्स ऑफ़ मैन’ से बहुत प्रभावित थे. स्त्रियों और पिछड़े वर्ग का शोषण और मानव अधिकार की समस्याओं पर फुले ने गंभीर चिंतन किया और उसका मानवीय स्तर पर समाधान करने के लिये ताउम्र प्रतिबद्ध रहे. फुले ने बुद्ध के सामाजिक न्याय और बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय के दर्शन को आगे बढाया. फुले अपनी मुक्तगामी दर्शन के आधार पर 19वीं सदी के महान चिन्तक जे. एस मिल और फ्रेडरिक एंगल्स की कतार में खड़े होते हैं. फुले मानते थे कि क्रांतिकारी विचार क्रांतिकारी कार्यों से ही आंके जाते हैं. फुले ने देश के अद्विज लोगों (दलित एवं पिछड़े) को शूद्र-अति शूद्र माना. उन्होंने इन्ही वर्गों को क्रांति का पहरुआ कहा और इसी समुदाय को गुलामी से मुक्त करने के लिये काम करना शुरू किया.
फुले आधुनिक दर्शनशास्त्र के पिता समझे जाने वाले देकार्ते के समकक्ष माने जाते थे. देकार्ते ने सभी मान्यताओं को तर्क की कसौटी पर कसा. वैसे ही फुले ने भारतीय समाज का अध्ययन तार्किक आधार पर ही किया. उन्होंने भारतीय दर्शन का आधुनिकीकरण किया. फुले ने पहली बार धर्म, योग, वेदांत और बुद्ध दर्शन के इतर शोषण और असमानता का चिंतन किया. योग में व्यक्ति के मानस के सुधार की बात की गयी है जबकि फुले का चिंतन सार्वजानिक कल्याण के लिए था.
वेदान्त में माया और यथार्थ का चिंतन किया गया. फुले ने इस दर्शन को ख़ारिज कर दिया और अविद्या को ही सभी दुखों का कारण बताया और सच्चे ज्ञान को ही समता और बंधुता का आधार बताया. फुले दुःख का कारण ऐतिहासिक या मानसिक नहीं मानते थे, बल्कि वे गैर-बराबरी पर आधारित भारतीय सामाजिक ढांचे को दुख का कारण मानते थे. उनका मानना था कि जिस दिन ये सामजिक ढांचा ख़त्म हो जाएगा व्यक्ति स्वतंत्र तथा आधुनिक हो जायेगा.
फुले 1858 में शैक्षणिक संस्थानों से अलग होकर सामाजिक सुधारों की तरफ अग्रसर हुये. वह 1876 में पुणे नगर निगम के पार्षद बने. ज्योतिबा व उनके संगठन के संघर्ष के कारण सरकार ने ‘एग्रीकल्चर एक्ट’ पास किया. उनके योगदान के चलते बाम्बे में 1888 में उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि दी गयी. उन्होंने साहित्य के जरिए जहां द्विज व्यवस्था पर धावा बोला तो बहुजन समाज को जगाने का भी काम किया. फुले ने अपनी रचनाओं में धार्मिक-सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ लिखा और खुली सभाओं में संवाद किया. फुले ने कई गीतों और पावडों की रचना की जिनका आधार सामाजिक-धार्मिक समस्याएं थी.
फुले ने मूर्ति-पूजा और परम ब्रह्म की अवधारणा को ख़ारिज किया और पाखंडी धर्म, मूर्ति पूजा और जाति-व्यवस्था को समृद्ध भारत के पतन का कारण माना. फुले ने अपनी पुस्तक ‘सार्वजानिक धर्म सभा’ में इन समस्याओं का विकल्प दिया. प्रसिद्ध समाजशास्त्री गेल ओम्वेट ने अपनी रचना ‘औनिवेशिक समाज में सांस्कृतिक विद्रोह’ में फुले को भारतीय पुनर्जागरण का सूत्रधार माना है. फुले के जीवन के कई पहलू थे. वह भिन्न-भिन्न समय पर शिक्षा के लिए आंदोलन करने वाले, सामाजिक आंदोलनकर्ता और भेदभावपूर्ण भारतीय व्यवस्था के विरोधी रहें.
जन्म
आधुनिक भारत के निर्माता और ‘सामाजिक क्रांति के पिता’ महात्मा ज्योतिराव फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को पुणे (महाराष्ट्र) में माली समाज में गोविंदराव जी के घर पर हुआ था. ज्योतिबा फुले के पिता का नाम गोविन्द राव और माता का नाम चिमणा बाई था. फुले के बड़े भाई का नाम राजाराम था. फुले जब मात्र एक वर्ष के थे तभी उनकी माता का निधन हो गया था. फुले का लालन-पालन सगुनाबाई नामक एक विधवा जिसे ज्योतिबा के पिता मुंहबोली बहन मानते थे, ने किया.
शिक्षा के प्रति लगाव
फुले को सात वर्ष की आयु में स्कूल में पढ़ने भेजा गया उन्हीं दिनों ऐसा हुआ कि \””बम्बई नैटिव एजुकेशन सोसाइटी\”” के संकेत पर सोसाइटी के विद्यालय से छोटी जाति के छात्रों को निकाल दिया गया. जाति व्यवस्था में फुले माली जाति के थे, सो बालक ज्योति फावड़ा और खुरपी लेकर खेतों में लग गए तथा पेशेगत कार्य को आगे बढ़ाने लगे. बचे हुए समय में वह किताबें पढ़ते थे. इनकी इस लगन को देखकर आधुनिक शिक्षा प्राप्त करने में उनके दो पड़ोसियों गफ्फार बेग मुंशी एवं फ़ादर लिजीट ने उन्हें काफी सहयोग किया. उन्होंने बालक फुले की प्रतिभा एवं शिक्षा के प्रति रुचि देखकर उन्हें पुनः विद्यालय भेजने का प्रयास किया. फुले फिर से स्कूल जाने लगे. वह स्कूल में सदा प्रथम आते रहे. ज्योतिराव ने 1841 में पुणे के स्काटिश मिशन हाई स्कूल में दाखिला लिया. स्कॉटलैंड के मिशन द्वारा संचालित स्कूल में फुले ने अधिकतर शिक्षा ग्रहण की.
फुले जार्ज वाशिंगटन और छत्रपति शिवाजी की जीवन कथाएं पढ़ते थे. इस दौरान वे गुलामी की जकड़न को समझने लगे थे. फुले अपने अन्य मित्रों के साथ मिलकर अंधविश्वास तथा मिथ्या कुरीतियों में फंसे लोगों को इससे मुक्त होने के लिए प्रेरित करते रहते थे. ज्योतिराव 13 वर्ष के थे तभी उनका विवाह सावित्रीबाई से हो गया था. सावित्रीबाई को ज्योतिराव फुले ने घर में ही पढ़ाया और उन्हें आधुनिक शिक्षा दी. बाद में सावित्रीबाई भारत की प्रथम महिला शिक्षक बनी.
जाति व्यवस्था का सामना
1848 में हुयी घटना ने ज्योतिराव को झकझोर दिया. एक ब्राह्मण साथी ने बरात में ज्योतिराव फुले को आमंत्रित किया था. बारात में जब उनकी जाति का पता लगा तो उन्हें अलग बैठाया गया. लोगों ने उनका अपमान किया. इससे बालक ज्योतिराव के मन को गहरी चोट लगी. इस घटना के बाद ज्योतिराव ने प्रण किया वे अपनी जिंदगी पिछड़े और महिलाओं के उत्थान में लगा देंगे.
शिक्षा के क्षेत्र में योगदान
19वीं सदी में जाति-व्यवस्था ने मानव अधिकारों को कुंद कर दिया था. जाति-व्यवस्था के चलते एक मनुष्य दुसरे के साथ खाने-पीने, चलने-बोलने पर समानता का व्यवहार नहीं कर सकता था. समाज के निचले वर्ग को उच्च शिक्षा प्राप्त करना व्यवस्था खिलाफत माना जाता था. फुले ने इस व्यवस्था के खिलाफ जेहाद कर दिया. ज्योतिराव फुले इस बात को अच्छी तरह समझ चुके थे कि शूद्र-अतिशूद्रों की स्थिति सिर्फ शिक्षा के जरिए ही सुधर सकती है. फुले साहब का प्रथम उद्देश्य था- एक समान प्राथमिक शिक्षा. उन्होंने प्राथमिक शिक्षा के लिए शिक्षक की योग्यता और पाठ्यक्रम पर ध्यान दिया.
21 वर्ष की आयु में ज्योतिबा फुले ने महाराष्ट्र को एक नये ढंग का नेतृत्व दिया. जनवरी, 1848 में ज्योतिराव ने पुणे में पहला बालिका विद्यालय खोला. तब पिछड़े वर्ग की लड़कियों के लिए स्कूल खोलना अपने आप में एक क्रांतिकारी कदम था क्योंकि इसके 9 साल बाद बंबई विश्वविद्यालय की स्थापना हुई. 1848 में यह स्कूल खोलकर महात्मा फुले ने उस वक्त के समाज के ठेकेदारों को नाराज़ कर दिया था. उनके अपने पिता गोविंदराव जी भी समाज के महत्वपूर्ण व्यक्ति थे. पिछड़े समाज की लड़कियों के स्कूल के मुद्दे पर बहुत झगड़ा हुआ लेकिन ज्योतिराव फुले ने किसी की न सुनी. नतीजतन उन्हें 1849 में घर से निकाल दिया गया.
गृह त्याग के बाद पति-पत्नी को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. परन्तु वह अपने लक्ष्य से डिगे नहीं. यहां तक की उन्हें जान से मारने की कोशिश भी की गई. उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया. लेकिन फुले ठहरे जिद्दी. वह इससे डिगे नहीं बल्कि सामाजिक बहिष्कार का जवाब उन्होंने 1851 में दो और स्कूल खोलकर दिया. दो वर्षों तक शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने के बाद फुले ने 3 जुलाई 1953 को एक दूसरा विद्यालय पूना के अन्नासाहेब चिपलूणकर भवन में खोला. उन्होंने महाराष्ट्र भर में कुल 18 विद्यालय शुरू किए. उनके विद्यालय को जब कोई अध्यापक नहीं मिल रहे थे तो उन्होंने इस कार्य के लिए अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले को शिक्षित किया जिसके बाद वह स्कूल में पढ़ाने लगीं.
इससे सवर्णों के क्रोध की कोई सीमा न रही. सावित्रीबाई फुले जब स्कूल जाती थी तो लोग उन पर ढेले चलाना शुरू कर देते थे, उन पर कीचड़, कंकड़-पत्थर फेकते थे. साड़ी गन्दी हो जाया करती थी इसलिए वो एक साड़ी हमेशा साथ ले कर चलती थी जिसे वह स्कूल में पहुंच कर बदल लेती थी. इसी संघर्ष के कारण माता सावित्रीबाई फुले को भारत की महिला शिक्षक होने का गौरव प्राप्त है. उनके लिए शिक्षा सामाजिक बदलाव का एक माध्यम थी. उनके इसी योगदान के कारण बाबासाहेब अम्बेडकर फुले को अपना गुरु मानते हैं. उनका मानना था सामाजिक बदलाव की निरंतरता तभी बनी रह सकती है जब प्रत्येक व्यक्ति को पूरी शिक्षा प्राप्त करने के समान अवसर प्राप्त हो. विद्या की महता को फुले ने अपने शब्दों में रोचक तरीके से बताया. बकौल फुले-
विद्या बिना मति गयी
मति बिना गति गयी
गति बिना नीति गयी
नीति बिना संपत्ति गयी
इतना घोर अनर्थ मात्र
अविद्या के ही कारण हुआ।
ब्रिटिश सरकार ने किया था सम्मानित
फुले शूदों और स्त्रियों की शिक्षा के लिए जो कार्य कर रहे थे, सवर्ण समाज के लोग उससे खासे नाराज थे. हालांकि तत्कालीन ब्रिटिश शासन ने फुले जी के शिक्षा सम्बन्धी कार्यों की प्रशंसा की. 19 नवंबर, 1852 को ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन ने पुणे महाविद्यालय के प्राचार्य मेजर कंठी के द्वारा आयोजित एक भव्य समारोह में 200 रुपए का महावस्त्र और श्रीफल प्रदान कर फुले का सम्मान किया. साथ ही उन्होंने महात्मा फुले को एक महान समाज सेवी के रूप में मान्यता दी.
फुले के कार्यों की सर्वसमाज में सराहना
सन् 1852 में ही फुले ने पिछड़ों के लिये एक वाचनालय की स्थापना भी की. तब कुछ समाज सेवी ब्राह्मणों ने भी फुले की नीतियों से प्रभावित होकर उनका सहयोग करना प्रारम्भ कर दिया. इससे रूढ़िवादी और समाज सेवी ब्राह्मणों में संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो गयी. 19 फरवरी 1852 के \””टेलीग्राफ एंड कोरियर\”” पत्र में एक पर्यवेक्षक ने लिखा था कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि \”ब्राह्मण छोटी जातियों के भयानक शत्रु थे किन्तु कुछ ब्राह्मणों ने यह भी अनुभव करना प्रारम्भ कर दिया है कि उनके पूर्वजों ने इन जातियों के लोगों को अनगिनत अघात पहुचाएं है.\”
रचनाकार के रूप में फुले
महात्मा फुले एक समतामूलक और न्याय पर आधारित समाज की बात कर रहे थे इसलिए उन्होंने अपनी रचनाओं में किसानों और खेतिहर मजदूरों के लिए विस्तृत योजना का उल्लेख किया है. उनकी किताब ‘किसान का कोड़ा’ उस समय के किसानों, जिन्हें फुले ने कुंडबी (कुर्मी) लिखा; उनकी बदहाली का चित्रण किया है. फुले ने छत्रपति शिवाजी को किसानों का प्रेरणास्रोत बताया.
फुले महाराष्ट्र के पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने शिवाजी के पराक्रम, साहस और कुशलता पर गीत लिखे. उन्होंने शिवाजी के महान आदर्शों का वर्णन किया. शिवाजी के राज्यकाल में किसान ही उनकी सेना में सिपाही होते थे. शिवाजी स्वयं एक कुर्मी-किसान परिवार से थे इसलिये वे किसानों को अपने परिवार का अंग मानते थे. फुले जी छत्रपति शिवाजी को ‘लोकराजा’ बोलते थे. फुले ने अपनी रचनाओं में पशुपालन, खेती, सिंचाई व्यवस्था सबके बारे में उन्होंने विस्तार से लिखा है. गरीब किसानों के बच्चों की शिक्षा पर उन्होंने बहुत ज़ोर दिया.
उन्होंने आज से 150 साल पहले कृषि शिक्षा के लिए विद्यालयों की स्थापना की बात की. जानकार बताते हैं कि 1875 में पुणे और अहमदनगर जिलों का जो किसानों का आंदोलन था, वह महात्मा फुले की प्रेरणा से ही हुआ था. धर्म, समाज और परम्पराओं के सत्य को सामने लाने हेतु उन्होंने अनेक पुस्तकें भी लिखी. इसमें तृतीय रत्न, छत्रपति शिवाजी, राजा भोसला का पखड़ा, ब्राह्मणों का चातुर्य, किसान का कोड़ा, अछूतों की कैफियत आदि है. 1873 में उनकी महान रचना ‘गुलामगिरी’ प्रकाशित हुयी.
स्त्री अधिकार के लिए फुले का आंदोलन
स्त्रियों के बारे में महात्मा फुले के विचार क्रांतिकारी थे. मनु की व्यवस्था में सभी वर्णों की औरतें शूद्र वाली श्रेणी में गिनी गयी थीं. लेकिन फुले ने स्त्री पुरुष को बराबर समझा. उन्होंने विवाह प्रथा में बड़े सुधार की बात की और ब्राह्मण-पुरोहित के बिना ही विवाह-संस्कार आरंभ कराया. इसे मुंबई हाईकोर्ट से भी मान्यता मिली. वे बाल-विवाह विरोधी और विधवा-विवाह के समर्थक थे. प्रचलित विवाह प्रथा के कर्मकांड में स्त्री को पुरुष के अधीन माना जाता था, लेकिन महात्मा फुले का दर्शन हर स्तर पर गैरबराबरी का विरोध करता था. इसीलिए उन्होंने पंडिता रमाबाई के समर्थन में लोगों को लामबंद किया, जब उन्होंने धर्म परिवर्तन किया और ईसाई बन गयीं. हालांकि तब वो धर्म परिवर्तन के समर्थक नहीं थे लेकिन उन्होंने एक महिला द्वारा अपने फ़ैसले खुद लेने का समर्थन किया.
फुले को विधवा पुनर्विवाह के आन्दोलन का जनक माना जाता है. उन्होंने विधवाओं के लिए अपने आश्रम खोले और बाल विवाह प्रथा को बंद करवाने के लिए आन्दोलन किया. फुले दम्पति ने विधवाओं के पुनर्वास और अनाथ बच्चों के लिए कई अनाथालय खोले. यहां तक कि 1873 में एक विधवा ब्राह्मणी के बच्चे को उन्होंने गोद लिया और उसका नाम यशवंत फुले रखा. उन्होंने विधवा नारी के उद्धार का कार्यक्रम बनाया. उनकी देखरेख में 8 मार्च 1860 में एक विधवा युवती का विवाह कराया गया. फुले के इस प्रयास से एक नयी क्रांति का उदय हुआ. उनके समय में महिलाओं और पिछड़ी जातियों के लिए पढ़ाई करना दिन में सपने देखने जैसा था. लेकिन फुले महिला मुक्ति के बंद दरवाजे पर जोर की ठोकर मारने में सफल रहे.
फुले का स्त्रीवादी चिंतन
फुले का स्त्रीवादी चिंतन उन्हें महान चिंतकों मिल और फ्रेडरिक एंगल्स की बराबरी पर खड़ा करता है. फुले अपने समय के पुरुष समाज सुधारकों से ज्यादा प्रगतिशील साबित होते हैं. फुले ने स्त्री के शोषण का आधार धार्मिक के साथ सामाजिक तथा आर्थिक माना और धर्म के इतर स्त्री विमर्श को स्वतंत्र चिंतन के रूप में स्वीकारा. जहां मिल ने व्यक्तिवाद को आधार बनाकर स्त्री-पुरुष असमानता पर चिंतन किया और पुरुष की भांति स्त्री को भी एक इकाई माना. एक सभ्य समाज के लिये स्त्री-पुरुष की बराबरी को आवश्यक बताया. फ्रेडरिक एंगल्स ने अपनी कृति ‘परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति’ में स्त्री की शोषण की ऐतिहासिक दास्ता का वर्णन किया है.
एंगल्स ने धर्म की जगह आर्थिक कारणों को स्त्री के शोषण के लिये जिम्मेदार माना और उसे वर्गीय शोषण के रूप चिन्हित किया. फुले ने भी एंगल्स की भाति स्त्री के शोषण का आधार आर्थिक माना यद्यपि फुले ने वर्गीय आधार की जगह जाति को आधार माना जो भारतीय ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था की रीढ़ है.
फुले ने मिल की भांति स्त्री को पुरुष के जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और मानव अधिकारों लिये योग्य पाया. इसके लिये फुले ने पहली बार केवल छात्राओं के लिये विद्यालय खोले. विधवाओं के पुनर्वास के लिये आश्रम खोले गए. तब ब्राह्मणवादी व्यवस्था में शोषण की शिकार विधवाएं अपनी पहचान गुप्त रखकर वहां अपने बच्चो को दे सकती थी. फुले की संस्था विधवाओं और उनके बच्चो की देखभाल करती थी. फुले एक ब्राह्मण महिला को सबसे ज्यादा शोषित मानते थे. फुले दम्पति ने खुद एक विधवा ब्राह्मणी के बच्चे को गोद लिया था. फुले वास्तव में भारतीय स्त्रियों के मुक्तिदाता थे. फुले के स्त्री-चिंतन का प्रभाव बाबासाहेब आंबेडकर, राना डे और महात्मा गांधी पर पड़ा.
सत्यशोधक समाज की स्थापना
24 सितम्बर 1873 को फुले ने अपने सभी हितैषियों, प्रशंसकों तथा अनुयायियों की एक सभा बुलाई. उनसे विचार-विमर्श के बाद तथा फुले के विचारों से सहमत होते हुए संस्था का गठन कर दिया गया. महात्मा फुले ने संस्था को नाम दिया ‘“सत्य शोधक समाज”’. उनके तीन ब्राह्मण मित्रों ने भी सत्यशोधक समाज को हर प्रकार का सहयोग देने का वचन दिया. सत्य शोधक समाज का प्रमुख उद्देश था- पिछड़े, दलित और महिलाओं को शोषणकरी व्यवस्था से छुड़ाना और उन्हें शिक्षित कर आत्मनिर्भर बनाना.
सत्य शोधक समाज उस समय के अन्य संगठनों से अपने सिद्धांतों व कार्यक्रमों के कारण भिन्न था. सत्य शोधक समाज पूरे महाराष्ट्र में शीघ्र ही फ़ैल गया. संगठन के लोगों ने जगह-जगह दलित-पिछड़ों और लड़कियों की शिक्षा के लिए स्कूल खोले. छूआ-छूत का विरोध किया. किसानों के हितों की रक्षा के लिए आन्दोलन चलाया.
समाजसेवा के क्रम में हुआ जीवन का अंत
फुले साहब ताउम्र शोषितों के पक्ष में अन्यायकारी व्यवस्था के खिलाफ लड़ते रहे. 19वीं सदी के अंतिम दशक में पूना प्लेग महामारी से ग्रस्त हुआ था. फुले दम्पति ने प्लेग रोगियों की अथक सेवा की. इसी दौरान ज्योतिराव फुले भी प्लेग की चपेट में आ गए और 28 नवम्बर 1890 को उनका परिनिर्वाण हो गया.
आधुनिक भारत के निर्माण में योगदान
वैसे भारतीय संविधान को आधुनिक विधि-संहिता माना जाता है जो स्वतंत्रता, समानता, बंधुता, सामाजिक न्याय और समाजवाद की प्रस्तावना करती है लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि आज भी एक ‘गुप्त वर्ण-भेद’ व्याप्त है. इसके बावजूद महात्मा फुले ने अपने जीवन में जो आंदोलन किया और जिसे बाद में बाबासाहेब अम्बेडकर ने संवैधानिक जामा पहनाया, उसके फलस्वरूप ही आजादी के बाद के. आर. नारायणन पहले दलित राष्ट्रपति बनते हैं, प्रतिभा देवी पाटिल पहली महिला राष्ट्रपति बनती हैं, इंदिरा गांधी पहली महिला प्रधानमंत्री बनती हैं. एच. डी. देवेगौड़ा पहले पिछड़े वर्ग के प्रधानमंत्री बनते हैं. कल्पना चावला के रूप में पहली भारतीय महिला अंतरिक्ष पहुंचती है. देश के शासन-प्रशासन में दलित एवं पिछड़े वर्ग के लोगों और महिलाओं की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है. इसमें महात्मा ज्योतिराव फुले के समता-तर्क और मानव अधिकारों पर आधारित दार्शनिक चिंतन का बड़ा योदगान है.
वह भारत में एक समान शिक्षा प्रणाली और देश के किसानों के आंदोलनों के सूत्रधार बने. वे भारत में सामाजिक न्याय के प्रवर्तक के रूप में जाने जाते हैं जिन्होंने दलित-पिछड़ों और महिलाओं के हित और अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी. यही वजह थी कि डॉ. अम्बेडकर ने बुद्ध और कबीर के बाद महात्मा फुले को अपना तीसरा गुरु माना था. बाबा साहेब ने फुले के बारे में कहा था- “महात्मा फुले मॉडर्न इंडिया के सबसे महान शूद्र थे, जिन्होंने यह शिक्षा दी कि भारत के लिए विदेशी हुकूमत से स्वतंत्रता की तुलना में सामाजिक लोकतंत्र कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है.” डॉ. अम्बेडकर और पिछड़ी जातियां
डॉ. अम्बेडकर को प्रायः दलितों के उद्धारक के रूप में पहचाना जाता है जबकि वे सभी पददलित वर्गों दलितों और पिछड़ों के अधिकारों के लिए लड़े थे. परन्तु वर्ण व्यवस्था के कारण पिछड़ी जातियां जो कि शूद्र हैं अपने आप को अछूतों (दलितों) से सामाजिक सोपान पर ऊँचा मानती हैं. एक परिभाषा के अनुसार पिछड़ी जातियां शूद्र हैं तो दलित जातियां अति शूद्र हैं. अंतर केवल इतना है कि पिछड़ी जातियां सछूत और दलित जातियां अछूत मानी जाती हैं. यह भी एक ऐतहासिक सच्चाई है कि सछूत होने के कारण पिछड़ी जातियों का कुछ क्षेत्रों में अछूतों से अधिक शोषण हुआ है. यह भी उल्लेखनीय है कि पिछड़ी जातियां कट्टर हिन्दुवाद के चंगुल में फंसी रही हैं जबकि दलित हिन्दू धर्म के खिलाफ निरंतर विद्रोह करते रहे हैं. सामाजिक श्रेष्ठता के भ्रम के कारण पिछड़ी जातियां डॉ. अम्बेडकर को अपना नेता न मान कर दलितों का नेता ही मानती आई हैं. यह इसलिए भी है क्योंकि अधिकतर पिछड़ी जातियां सवर्ण हिन्दुओं के प्रभाव में रही हैं और उन्हें डॉ. अंबेडकर के बारे में बराबर भ्रमित किया जाता रहा है ताकि वे डॉ. अम्बेडकर की विचार धारा से प्रभावित होकर दलितों के साथ एकता स्थापित न कर लें और सवर्णों के लिए बड़ी चुनौती पैदा न कर दें. पिछड़ों और दलितों में इस दूरी के लिए दलित और पिछड़ों के नेता भी काफी हद तक जिम्मेवार हैं जो कि जाति की राजनीति करके अपनी रोटी सेंकते रहे हैं.
अब अगर ऐतहासिक परिपेक्ष्य में देखा जाये तो डॉ. अम्बेडकर ने जहां पददलित जातियों के अधिकारों के लिए जीवन भर संघर्ष किया वहीँ उन्होंने पिछड़ी जातियों के अधिकारों के लिए भी निरंतर संघर्ष किया. इसकी पुष्टि के लिए कई तथ्य मौजूद हैं. जैसे, डॉ. अम्बेडकर की उच्च शिक्षा में बड़ौदा के महाराजा सायाजी राव गायकवाड जो कि पिछड़ी जाति के थे और जिन्होंने अम्बेडकर को अमेरिका में पढ़ने के लिए छात्रवृति दी थी, का बहुत बड़ा योगदान था. डॉ. अम्बेडकर को सहायता और योगदान देने वाले पिछड़ी जाति के दूसरे व्यक्ति छत्रपति साहू जी महाराज थे. डॉ. अम्बेडकर के रामास्वामी नायकर जो दक्षिण भारत के गैर ब्राह्मण आन्दोलन के अगुया थे, से सम्बन्ध बहुत अच्छे थे. डॉ. अम्बेडकर पिछड़ी जाति के समाज सुधारक ज्योति राव फुले की सामाजिक विचारधारा से भी बहुत प्रभावित थे. बाद में उन्होंने इसकी कई बातों को लागू करने की दिशा में कदम उठाया. डॉ. अंबेडकर ने ट्रावनकोर (केरल) में इज़ावा जो कि पिछड़ी जाति है, के समानता के आन्दोलन का समर्थन किया था. इससे उस क्षेत्र में उक्त आंदोलन को काफी बल मिला.
डॉ. अम्बेडकर ने संविधान निर्मात्री सभा के अध्यक्ष के रूप में सरकारी नौकरियों में आरक्षण के संबंध में संविधान की धारा 15 (4) में “बैकवर्ड” शब्द को शामिल करवाया था जो बाद में सामाजिक और शैक्षिक तौर से पिछड़ी जातियों के लिया आरक्षण का आधार बना. डॉ. अंबेडकर के प्रयास से ही संविधान की धारा 340 में पिछड़ी जातियों की पहचान करने के लिए आयोग की स्थापना किये जाने का प्रावधान किया गया. दलित-पिछड़ा एका के लिए उनका प्रयास उनके राजनीतिक जीवन में भी साफ दिखा. डॉ. अंबेडकर ने 1942 में शैडयूल्ड कास्ट्स फेडरशन नाम से जो राजनैतिक पार्टी बनायीं थी उस की नीति में यह उल्लिखित था कि पार्टी पिछड़ी जातियों और जन जातियों का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियों के साथ गठजोड़ को प्राथमिकता देगी और अगर ज़रुरत पड़ी तो पार्टी अन्य पिछड़ा वर्ग का प्रतिनिधित्व करने के लिए अपना नाम बदल कर “बैकवर्ड क्लासेज़ फेडरशन” कर लेगी. अतः पार्टी ने उस समय सोशलिस्ट पार्टी से ही चुनावी गठजोड़ किया था. इसी तरह सन् 1951 में जब डॉ. अम्बेडकर ने हिन्दू कोड बिल को लेकर कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दिया था तो उसमें उन्होंने कहा था, “मैं एक दूसरा मामला संदर्भित करना चाहूंगा जो मेरे इस सरकार से असंतोष का कारण है. यह पिछड़ी जातियों और अनुसूचित जातियों के साथ इस सरकार द्वारा किये गए बर्ताव के बारे में है. मुझे इस बात का दुःख है कि संविधान में पिछड़ी जातियों के लिए कोई भी संरक्षण नहीं किया गया है. इसे राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किये जाने वाले आयोग की संस्तुतियों के आधार पर सरकारी आदेश पर छोड़ दिया गया है. हमें संविधान पारित किये एक वर्ष से अधिक हो गया है परन्तु सरकार ने अभी तक आयोग नियुक्त करने का सोचा भी नहीं है.” इस से आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि डॉ. अंबेडकर पिछड़े वर्गों के हित के बारे में कितने चिंतित थे.
कानून मंत्री के पद से इस्तीफा देने के बाद लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्रों को संबोधित करते हुए पिछड़ी जातियों की उपेक्षा के बारे में चेतावनी देते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा था, ‘अगर वे अपने समानता का दर्जा पाने के प्रयासों में मायूस हुए तो ‘शैडयूल्ड कास्ट्स फेडरशन’ कम्युनिस्ट व्यवस्था को तरजीह देगी और देश का भाग्य डूब जायेगा.’ इस से भी अंदाज़ा लगाया जा सकता है की डॉ. अम्बेडकर पिछड़े वर्गों के हित के बारे में कितने प्रयत्नशील थे. पिछड़े वर्गों के हितों की उपेक्षा की बात उन्होंने बम्बई के नारे पार्क में एक बड़ी जन सभा में भी दोहराई थी. डॉ. अंबेडकर द्वारा दलित-पिछड़ा एका की कोशिशों से वर्तमान नेहरू सरकार की पेशानी पर बल पर गया था. डॉ. अंबेडकर द्वारा पिछड़ी जातियों के मुद्दे को लेकर पैदा किये गए दबाव के कारण ही नेहरु सरकार को 1951 में काका कालेलकर की अध्यक्षता में प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग नियुक्त करना पड़ा. यह बात अलग है कि सरकार ने इस आयोग की संस्तुतियों को नहीं माना बल्कि आयोग के अध्यक्ष को ही आयोग की संस्तुतियों (आरक्षण का जातिगत आधार) के विपरीत मंतव्य देने के लिए बाध्य कर दिया गया.डॉ. छेदी लाल साथी जो कि सत्तर के दशक में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया, उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष थे ने मुझे बताया था कि 1954 का चुनाव हारने के बाद बाबा साहेब बहुत मायूस थे. उस समय पिछड़े वर्ग के नेता चंदापुरी जी, एस.डी.सिंह चौरसिया और अन्य लोगों ने उन्हें कहा कि आप घबराईये नहीं हम सब आप के साथ हैं. इसी ध्येय से उन्होंने पटना में पिछड़ा वर्ग की एक रैली का आयोजन किया था जिसमें बहुत बड़ी भीड़ जुटी थी. इस से बाबासाहेब बहुत प्रभावित हुए थे और वे फिर दलितों और पिछड़ों की राजनीति में सक्रिय हुए. इस सम्बन्ध में डॉ. छेदी लाल साथी ने अपनी पुस्तक ‘दलितों व पिछड़ी जातियों की स्थिति’ के पृष्ठ 113 पर लिखा है, ‘पटना से वापस आने के बाद बाबासाहेब ने अपने साथियों से विचार विमर्श करके शैड्युल्ड कास्ट्स फेडरेशन ऑफ़ इंडिया को भंग करके उसके स्थान पर रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया के गठन का फैसला लिया क्योंकि सन 1952 और 1954 में दो बार चुनाव हारने के बाद बाबासाहेब ने महसूस किया कि अनुसूचित जातियों की आबादी तो केवल 20%ही है और जब तक उनको 52% पिछड़े वर्ग का समर्थन नहीं मिलेगा, वह चुनाव में नहीं जीत पाएंगे. अतः बाबासाहेब ने पिछड़े वर्ग के नेताओं, विशेष करके शिवदयाल सिंह चौरसिया आदि से मशवरा करके रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया में 20% दलित वर्ग के आलावा 52% पिछड़े वर्ग के लोगों तथा 12% आबादी वाले मुसलमान, ईसाई और सिखों को भी सम्मिलित करने का निर्णय लिया. एक साल से अधिक समय रिपब्लिकन पार्टी का संविधान बनाने और सलाह मशविरा में निकल गया. इस दृष्टि से पटना की यह रैली ऐतहासिक थी क्योंकि इसने दलितों और पिछड़ों की एकता की नींव डाली थी. बाबासाहेब ने नागपुर में 15 अक्तूबर, 1956 को शैड्युल्ड कास्ट्स फेडरेशन ऑफ़ इंडिया को भंग करके उसके स्थान पर रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया की स्थापना करने की घोषणा की थी. 1957 से 1967 तक इन वर्गों की एकता पर आधारित रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया एक बड़ी राजनैतिक ताकत के रूप में उभरी थी परन्तु बाद में कांग्रेस जिस के लिए यह पार्टी सब से बड़ा खतरा बन गयी थी, ने दलित नेताओं की कमजोरियों का फायदा उठा कर उन्हें खरीद लिया और यह पार्टी कई टुकड़ों में बंट गयी.
अपने जीवन के अंतिम वर्षों में बाबासाहेब ने दलितों और पिछड़ों की एकता स्थापित करने के लिए पिछड़े वर्गों के नेता राम मनोहर लोहिया आदि से भी संपर्क स्थापित किया और उनके बीच पत्राचार भी हुआ था. परन्तु दुर्भाग्य से जल्दी ही बाबासाहेब का परिनिर्वाण हो गया और वह गठबंधन नहीं हो सका. उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि डॉ. अंबेडकर ने न केवल दलितों हितों के लिए ही संघर्ष किया बल्कि वे जीवन भर पिछड़े वर्ग के हितों के लिए भी प्रयासरत रहे. उनके प्रयास से ही संविधान में पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण का प्रावधान हो सका और उनके द्वारा पैदा किये गए दबाव के कारण ही प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग गठित हुआ और बाद में मंडल आयोग गठित हुआ और पिछड़े वर्ग को सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण मिला जिसके लिए पिछड़े वर्ग को बाबा साहेब का अहसानमंद होना चाहिए और पिछड़े वर्ग को अपने उत्थान के लिए बाबा साहेब के योगदान को स्वीकार करना चाहिए. वर्तमान की नयी चुनौतियों के परिपेक्ष्य में इन वर्गों की एकता को पुनःस्थापित करने की ज़रूरत है. हालांकि यह बात भी सही है कि दलितों और पिछड़ों में कुछ वर्गीय अन्तर्विरोध हैं जिन्हें हल किये बिना आगे नहीं बढ़ा जा सकता. यह सर्वविदित है कि दलित, अति पिछड़े (हिदू, ईसाई और मुसलमान) कुदरती दोस्त हैं. यह समीकरण जातिगत न होकर सांझे मुद्दों पर ही आधारित हो सकता है जो कि देश में बहुसंख्यकवाद और हिन्दुत्ववादी फासीवादी राजनीति का सामना कर सकता है.
संविधान दिवस विशेषः भारत का भविष्य बना था संविधान
भारत का संविधान 26 नवंबर 1949 में स्वीकार किया गया. संविधान के मायने क्या होते हैं, शायद उस समय भारत के लोगों को यह पता नहीं था. लेकिन दुनिया में संविधान का महत्व स्थापित हो चुका था. अमेरिका में 1779 में संविधान बन चुका था. हालांकि यूनाइटेड किंगडम (यूके) में उस तरह का संविधान नहीं है लेकिन वहां MAGNA CARTA जैसी संवैधानिक अधिकारों की व्यवस्था कायम हो चुकी थी जिसके तहत राजा ने अपनी जनता के साथ अपने अधिकारों को बांट लिया था. वहां अब तक इसी तरह के कई सेटेलमेंट से बनी व्यवस्था कायम है और 15 जून 2015 में उसके MAGNA CARTA को 800 साल होने वाले हैं. संविधान असल में समूह में बंटे लोग जो राष्ट्र बनना चाहते हैं, को मानवीय अधिकार दिलाता है. इसके तहत लोगों के लिए स्वतंत्रता, बंधुता, न्याय और समानता की व्यवस्था कि निर्माण किया जाता है. यह सभी मनुष्यों को एक समान अधिकार देता है और मनुष्यों के बीच भेदभाव को अपराध भी घोषित करता है. 1950 के बाद विश्व के लगभग 50 देशों ने अपना संविधान बनाया. भारत उनमें सबसे पहले है. हालांकि यहां यह भी साफ करना जरूरी है कि आजादी का आंदोलन और भारत के संविधान का आपस में कोई संबंध नहीं है. दोनों अलग-अलग घटनाएं हैं. जब सन् 1928 में साइमन कमीशन का भारत में आगमन हुआ तो उस समय कंस्टीट्यूशनल सेलेटमेंट की बात उठी, क्योंकि भारत एक विभाजित देश है और यह कई जातियों, धर्मों, रीति-रिवाजों, समुदायों और क्षेत्रों में बंटा हुआ है. ब्रिटिश लोग और भारत के लोग दोनों इस बात को जानते थे. संविधान निर्माण के जरिए इस बिखरे हुए लोगों के समुदाय को एक राष्ट्र करने की कोशिश की गई. हालांकि भारत इसमें कितना सफल हो पाया है, यह एक गंभीर बहस का मुद्दा है.
जब अंग्रेज भारत छोड़ कर जाने को तैयार हुए औकी प्रक्रिया शुरू हुई तो इससे पहले कंस्टीटयूशनल सेटेलमेंट की बात उठी. अंग्रेजों ने यह तय करना जरूरी समझा कि भारत को सत्ता के हस्तानांतरण के बाद भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था ही लागू हो. इस पूरी प्रक्रिया में बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर की प्रमुख भूमिका रही. अगर हम बाबासाहेब के संपूर्ण जीवन को देखें तो यह साफ होता है कि कंस्टीट्यूशन सेटेलमेंट को लेकर वह कितने गंभीर थे. बाबासाहेब इस बात को लेकर हमेशा सक्रिय रहें कि भारत में कंस्टीट्यूशनल सेटेलमेंट कैसे हो. उनका मानना था कि देश में सामाजिक क्रांति तभी स्थायी होगी जब उसे संवैधानिक गारंटी होगी. क्योंकि वह संविधान के जरिए देश में समानता स्थापित करना चाहते थे. वह चाहते थे कि जाति और जन्म के आधार पर किसी काम को करने की बाध्यता या फिर न करने की मनाही न हो. डॉ. आंबेडकर संविधान के जरिए इन चीजों को खत्म करना चाहते थे. वह चाहते थे कि संविधान के जरिए भारत से असमानता खत्म हो और समानता आए. लोगों को उनके मूलभूत अधिकार (फंडामेंटल राइट्स) को लेकर गारंटी मिले.
के.सी वैरी (Kenneth Wheare) नाम के एक संवैधानिक विशेषज्ञ ने मार्डन कांस्टीट्यूशन नाम से एक किताब लिखी है. उन्होंने यह किताब 1950 के बाद बने कई देशों के संविधान का अध्ययन करने के बाद लिखी है. किताब में उसने बताया है कि आखिर किसी देश को संविधान की जरूरत क्यों पड़ती है? उन्होंने तीन परिस्थितियों में संविधान की जरूरत बताया. पहली स्थिति के तौर पर उनका कहना है कि किसी देश में सामाजिक क्रांति के बाद जब आजादी मिलती है और सत्ता किसी एक के हाथ से निकल कर दूसरे के पास जाती है तो इस क्रम में कई बदलाव आते हैं. तब आप पहले के नियम-कानून को मानते नहीं है और आपके पास नए नियम-कानून होते नहीं है. ऐसी स्थिति में जिन चीजों को आप चाहते हैं उन्हें संवैधानिक वैद्यता (Sanctity) की जरूरत होती है. संविधान को लेकर दूसरी स्थिति तब होती है कि जब किसी देश को दूसरे देश की गुलामी से मुक्ति मिलती है. इसी क्रम में तीसरी स्थिति यह होती है कि अगर किसी देश में पहले से ही संवैधानिक लोकतंत्र था पर उसमें कोई संकट आ गया और उसने काम करना बंद कर दिया. इन तीनो पस्थितियों में संविधान की जरूरत होती है. भारत के संदर्भ में बात करें तो यहां दो स्थितियां एक साथ थी. भारत में सामाजिक क्रांति कामयाब हो रही थी, वहीं दूसरी ओर देश अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हो रहा था. संवैधानिक तौर पर भारत में जाति और वर्ण जैसी व्यस्था और मनुस्मृति के तहत बनाए गए कानून के खत्म होने का वक्त आ गया था. शाहूजी महाराज, जोतिबा फुले, नारायणा गुरु और बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर के माध्यम से देश में जो सामाजिक क्रांति आई थी, उसे अपनी एक पहचान चाहिए थी. इन दोनों स्थितियों में भारत में भी संविधान की जरूरत थी. हालांकि यहां यह कहना ज्यादा सही होगा कि भारत में राजनीतिक क्रांति की बजाय सामाजिक क्रांति की वजह से संविधान बना है. क्योंकि जो लोग राजनीतिक क्रांति में सक्रिय थे वो नहीं चाहते थे कि भारत में संविधान हो. वह बिना संविधान के ही भारत देश को चलाना चाहते थे. लेकिन भारत में सामाजिक क्रांति के कारण इतने ज्यादा मजबूत थे कि राजनीतिक लोग चाह कर भी संविधान निर्माण को रोक नहीं पाएं. डॉ. आंबेडकर के लगातार सक्रिय रहने के कारण ब्रिटिशर्स भी भारत में मौजूद सामाजिक असमानताओं को समझ चुके थे और संविधान के पक्ष में थे. इस तरह से भारत का संविधान बनने की प्रक्रिया पर मुहर लगी.
इन सारी चीजों की वजह से 9 अगस्त 1946 को 296 सदस्यों की संविधान सभा बनी. देश का विभाजन होने के कारण इसमें से 89 सदस्य चले गए. इस तरह भारतीय संविधान सभा में 207 सदस्य बचे और इसकी पहली बैठक में सिर्फ 207 सदस्य ही उपस्थित थे.
इसमें बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर पहली बार 9 दिसंबर 1946 को बंगाल से चुनकर आए. इसके तुरंत बाद भारत का विभाजन हो गया, जिसके बाद बाबासाहेब जिस संविधान परिषद की सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे थे उसे पाकिस्तान को दे दिया गया. इस तरह बाबासाहेब का निर्वाचन रद्द हो गया. यहां ध्यान देने वाली बात यह भी है कि विभाजन के वक्त जिस तरह डॉ. आंबेडकर के प्रतिनिधित्व वाले हिस्से को पाकिस्तान को दे दिया गया, उसे भी तमाम जानकारों ने कांग्रेस की साजिश करार दिया है. यह इसलिए किया गया ताकि डॉ. आंबेकर संविधान सभा में नहीं रह पाएं. हालांकि इन साजिशों को दरकिनार करते हुए बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर दुबारा 14 जुलाई 1947 को चुन कर आएं. यहां बाबासाहेब के दुबारा संविधान सभा में चुने जाने को लेकर लोगों में यह भ्रम है कि कांग्रेस ने उन्हें सपोर्ट किया. जबकि हकीकत कुछ और है और ऐसा कह कर सालों से लोगों को गुमराह किया जा रहा है. इतिहास और सच्चाई यह है कि अगर बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर संविधान सभा (Constituent Assembly) में नहीं होते तो भारत का संविधान नहीं बन पाता. मान्यवर कांशी राम साहब ने भी इस बात को कहा है. दूसरी बात, डॉ. आंबेडकर जब 14 जुलाई 1947 को दुबारा चुन कर के आएं, उसके बाद ही यह घोषणा हुई कि 15 अगस्त को अंग्रेज भारत को सत्ता का हस्तानांतरण करेंगे. असल में डॉ. आंबेडकर जब पहली बार संविधान सभा में चुन कर आएं और विभाजन के बाद अपने निर्वाचन क्षेत्र के पाकिस्तान में चले जाने के कारण संविधान सभा का हिस्सा नहीं रहे, उस वक्त यूनाइटेड किंगडम (यूके) की पार्लियामेंट में इंडियन कांस्टीटूएंट असेंबली का बहुत कड़ा विरोध हुआ. और विरोध को दबाने के लिए नेहरू को यूके के नेताओं को समझाने के लिए ब्रिटेन जाना पड़ा था. इस विरोध की गंभीरता को इससे भी समझा जा सकता है कि कद्दावर नेता चर्चिल ने यहां तक कह दिया कि भारतीय लोग संविधान बनाने के लायक नहीं हैं. इन लोगों को आजादी देना ठीक नहीं होगा. दूसरी बात, ब्रिटिशर्स अल्पसंख्यकों के हितों को लेकर काफी गंभीर थे. तात्कालिक स्थिति में यूके पार्लियामेंट का कहना था कि अगर भारत में कंस्टीट्यूशनल सेटेलमेंट होता है तो इसमें अल्पसंख्यकों के हितों की गारंटी नहीं होगी. क्योंकि बाबासाहेब का कहना था कि शेड्यूल कॉस्ट और शेड्यूल ट्राइब नहीं हैं. खासतौर पर अछूत हिन्दू नहीं है. बाबासाहेब ने इसको साबित करते हुए अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए सेपरेट सेफगार्ड ( अलग विशेषाधिकार) की बात कही थी. बाबासाहेब की इस बात पर यूके के पार्लियामेंट में बहुत लंबी बहस हुई थी. इस बहस से यह स्थिति पैदा हो गई थी कि अगर भारत में अधिकार के आधार पर, बराबरी के अधिकार पर अल्पसंख्यकों (इसमें एससी, एसटी भी थे) के अधिकारों का सेटेलमेंट नहीं होगा तो भारत का संविधान नहीं बन पाएगा और इसे वैद्यता नहीं मिलेगी. और अगर संविधान नहीं बनेगा तो फिर भारत को आजादी (तथाकथित) नहीं मिलेगी. ऐसी स्थिति में बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर को बाम्बे से चुनकर लाना कांग्रेस और पूरे देश की मजबूरी हो गई थी. यहां एक तथ्य यह भी कहा जाता है कि बैरिस्टर जयकर ने डॉ. आंबेडकर के लिए अपना त्यागपत्र दिया था. जबकि ऐसा नहीं है, बल्कि कांग्रेस के कुछ अगड़े नेताओं के साथ मतभेद होने के कारण जयकर ने इन सारी बातों से पहले ही अपना इस्तीफा दे दिया था.
यानि बाबासाहेब को दुबारा चुनकर लाना पूरे देश की मजबूरी हो गई थी. क्योंकि अगर बाबासाहेब को चुनकर नहीं लाया जाता तो देश का संविधान नहीं बन पाता और ऐसी स्थिति में भारत को आजादी मिलने में और वक्त लग सकता था. हालांकि ऐसा नहीं है कि कांग्रेस के पास संविधान लिखने वाला कोई दूसरा नहीं था. बल्कि इसमें तथ्य यह है कि अगर बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर कांस्टीट्यूशनल असेंबली में नहीं होते तो भारत के अछूतों के अधिकारों का संवैधानिक सेटेलमेंट होने की बात नहीं मानी जाती और इससे भारत के संविधान को मान्यता नहीं मिलती. भारत को बड़े लोकतंत्र के तौर पर भी दर्जा नहीं मिल पाता. क्योंकि तब यह माना जाता कि संविधान में भारत के बड़े वर्ग (एससी/एसटी) के अधिकारों और स्वतंत्रता की बात संविधान में नहीं है. यह बात इससे भी साबित होती है क्योंकि एच. एल ट्राइव नाम के एक अमेरिकी संवैधानिक विशेषज्ञ ने कंस्टीट्यूशनल च्वाइसेस नाम की किताब लिखी है. उसमें उसका यह कहना है कि जब संविधान बनता है और उसमें बराबरी की बात होती है तो यह बराबरी दो तरह की होती है. एक कानूनी बराबरी होती है और दूसरी असली बराबरी होती है. जो कानूनी बराबरी होती है वो लोगों को समानता का अधिकार देती है.
भारतीय संविधान के तीन लक्ष्य माने जाते हैं. साथ ही इसकी तीन चुनौतियां भी हैं. संविधान का पहला लक्ष्य और चुनौती सामाजिक क्रांति है. दूसरा लक्ष्य एवं चुनौती राजनैतिक क्रांति है. इसी संदर्भ में तीसरा सबसे महत्वपूर्ण कारक अल्पसंख्यक अधिकारों का सेटलमेंट है. जिस सामाजिक क्रांति की बदौलत भारत के संविधान का निर्माण हुआ, उसमें शाहूजी महाराज, जोतिबा फुले, नारायणा गुरु, बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर का बहुत बड़ा योगदान था. इन तमाम महापुरुषों के संघर्षों के बाद बाबासाहेब आंबेडकर के जरिए भारत में जो सामाजिक क्रांति आई, वह एकमात्र कारण है जिससे भारत के संविधान का निर्माण हुआ. यह नहीं होता तो भारत का संविधान नहीं होता. और अगर संविधान नहीं होता तो लोगों के मूलभूत अधिकारों की गारंटी भी नहीं होती. यानि बोलने की, लिखने की, अपनी मर्जी से पेशा चुनने की, संगठन खड़ा करने की, मीडिया चलाने की आजादी नहीं होती. जातिगत भेदभाव को गलत नहीं माना जाता, छूआछूत को कानून में अपराध घोषित नहीं किया जाता.
भारतीय लोगों को संविधान की जरूरत थी. संविधान की जरूरत इसलिए थी क्योंकि उनको एक राष्ट्र बनना था. संविधान के निर्माण के लिए कई समितियां बनी थी. इसमें से बाबासाहेब ड्राफ्टिंग कमेटी के चेयरमैन और एडवाइजरी कमेटी, फंडामेंटल राइट सबकमेटी, माइनारिटी कमेटी और यूनियन कंस्टीट्यूशन कमेटी के सदस्य थे. भारतीय संविधान का इतिहकार Granville Austin ने एक किताब लिखी है, जिसमें उसने डॉ. अंबेडकर को भारतीय संविधान सभा का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति माना है. भारतीय संविधान एक बहुत लंबी प्रक्रिया के बाद बना. 30 अगस्त 1947 को इसकी पहली बैठक हुई. संविधान बनाने के लिए कंस्टीटूएंट असेंबली को 141 दिन का काम करना पड़ा. शुरुआती दौर में इसमें 315 आर्टिकल पर विचार किया गया था. 8 शेड्यूल डिस्कस किए गए थे. ड्राफ्टिंग कमेटी ने 343 आर्टिकल पर विचार किया, 13 आर्टिकल शेड्यूल किया. इसमें 7635 संशोधनों का प्रस्ताव किया गया था, जिसमें 2473 संशोधन संविधान सभा में लाए (मूव किए) गए. 395 आर्टिकल और 8 शेड्यूल के साथ भारत के लोगों ने भारत के संविधान को अपने प्रिय मुक्तिदाता बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर के जरिए 26 नवंबर 1949 को भारत को सुपुर्द किया. आज भारत के संविधान में 448 आर्टिकल हैं. असल में नंबरों के हिसाब से यह आज भी 395 ही है लेकिन बीच-बीच में यह (1) (2) या फिर (a) और (b) के जरिए बढ़ता रहा है. यह 22 हिस्सों में विभाजित है और इसके 12 शेड्यूल हैं. संविधान बनने के बाद अब तक संसद के सामने 120 संशोधन लाए गए लेकिन इसमें से 98 संशोधन ही स्वीकार किए गए.
इस पूरी प्रक्रिया में विशेष यह है कि भारत ने जो संविधान बनाया उससे भारत के नागरिकों को मूलभूत अधिकार मिले. लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस समता, बंधुता, भेदभाव मुक्त भारत के उद्देश्यों को लेकर भारत का संविधान बना क्या वह हमें हासिल हो पाया है? इस प्रश्न के आलोक में देखें तो यह हमें सौ फीसदी तो हासिल नहीं हो पाया है लेकिन यह कहा जा सकता है कि भारत के संविधान ने देश में चमत्कार (Miracle) कर के दिखाया है. दुनिया में जितना बड़ा चमत्कार पहले कभी नहीं हुआ, वह भारत में हुआ. देश का संविधान इसकी वजह बना. अगर विभिन्न देशों से तुलना कर के देखें तो इंग्लैंड के लोगों को भी अधिकार टुकड़ों में मिले. इंग्लैंड की महिलाओं को सबसे पहले 1920 में वोटिंग का अधिकार मिला. इसी तरह अमेरिका का संविधान 1779 में ही बन गया था लेकिन वहां के संविधान में ब्लैक लोगों को नागरिकता नहीं थी. 1865 में जब अमेरिकी संविधान में 13वां संशोधन लाया गया तब अमेरिका के काले लोगों को नागरिकता मिली. यहां यह बताना जरूरी है कि अमरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 1857 में काले लोगों को ड्रेड स्टॉक ( Dred Scott) केस में अमरिकी नागरिक मानने से इंकार कर दिया था. इस परिपेक्ष्य में अब्राहम लिंकन 1863 में 13वें संशोधन का प्रारूप लेकर आएं, जिससे काले लोगों को अमरिकी नागरिकता हासिल हुई. भारत का संविधान बनने तक अमेरिकी संविधान में वहां के ब्लैक का मामला पूरी तरह सुलझा नहीं था. 1965 में जाकर अमेरिका में ब्लैक का मामला कुछ हद तक सुलझ पाया. जबकि दूसरी ओर भारत के संविधान में सबसे पहले यह घोषित किया गया कि सभी मनुष्य समान हैं. जाति, धर्म, जन्म, वर्ण, वर्ग, स्थान आदि से परे देश के सभी मनुष्यों को बराबर माना गया. संविधान में साफ तौर पर लिखा गया कि भारत भूमि पर सर्व मनुष्य मात्र समान है. संविधान ने सबको एक सूत्र में पिरोते हुए सभी को ‘भारतीय’ माना और ‘हिन्दुस्तान’ नाम को मिटा दिया. (हिन्दुस्तान पेट्रोलियम जैसे नाम भी असंवैधानिक हैं.)
संविधान बनने के पूर्व भारत के दो-ढ़ाई हजार साल के इतिहास को देखने पर यह बात असंभव मालूम पड़ती है. लेकिन डॉ. आंबेडकर और भारत के संविधान के कारण यह संभव हो पाया. यह इसकी पहली देन है. संविधान की जो दूसरी देन है, वह यह कि जाति, धर्म, वर्ग, वर्ण, भाषा, स्थान, लिंग आदि जो-जो चीजें भारत के लोगों को बांटती थी, संविधान ने इस आधार पर भेदभाव को गैरकानूनी और असंवैधानिक घोषित कर दिया. साथ ही मनु द्वारा बनाए हिन्दू धर्म के सारे नियमों को अपराध घोषित कर दिया. संविधान के निर्माण के बाद जो तीसरी खास बात हुई, वह यह थी कि जिन लोगों ने इस देश पर शासन करने का सपना तक नहीं देखा था, संविधान के अधिकार मिलने के बाद इसे हकीकत में पूरा कर दिखाया. जिस देश में रानी के पेट से ‘राजा’ पैदा होता था, उस देश में ‘संविधान’ से राजा पैदा होने लगा. इस तरह से संविधान ने भारत के भविष्य का निर्माण किया है.
हालांकि भारत के पास इतना सुंदर संविधान होने के बावजूद भी वह एक बड़े संकट से गुजर रहा है. क्योंकि संविधान के जरिए सामाजिक क्रांति का जो लक्ष्य रखा गया था, वह उद्देश्य अब तक हासिल नहीं हो पाया है. दूसरा, संविधान के जरिए जिस राजनीतिक लोकतंत्र को हासिल करने का भरोसा जताया गया था, वह भी अभी अधर में ही है. तीसरा जो सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य है वह यह है कि भारत में जो वंचित तबका (डिस्क्रीमिनेटेड कम्यूनिटी) है, उसका सेटेलमेंट नहीं हो पाया है. क्योंकि जो गरीब हैं वह उसी वर्ग से ताल्लुक रखते हैं (अपवाद छोड़कर) जो वंचित हैं. जो अशिक्षित हैं वह उसी वर्ग से ताल्लुक रखते हैं जो वंचित हैं. 99 फीसदी मामलों में जिन महिलाओं का जबरन शोषण होता है, वह भी इसी डिस्क्रीमिनेटेड कम्यूनिटी से ताल्लुक रखती हैं. यह अपने आप में बहुत बड़ी समस्या है. हाल ही में संविधान के जरिए शिक्षा का, काम का और भोजन का अधिकार दिया गया है लेकिन इस तरह की योजनाएं इसलिए कारगर नहीं हैं क्योंकि इसे लागू करने वाले लोग ईमानदार नहीं हैं. 25 नवंबर 1949 को बाबासाहेब ने संविधान सभा में भाषण देते हुए कहा था कि संविधान कितना भी अच्छा हो वह अपने आप लागू नहीं होता है, उसे लागू करना पड़ता है. ऐसे में जिन लोगों के ऊपर संविधान लागू करने की जिम्मेदारी होती है, यह उन पर निर्भर करता है कि वो संविधान को कितनी ईमानदारी और प्रभावी ढ़ंग से लागू करते हैं. असल में भारतीय संविधान के सही ढ़ंग से लागू न हो पाने की वजह से सौ करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले भारत के लोगों का विकास प्रभावित होने लगा है. यह तकरीबन रूक सा गया है. आज दुनिया में 7 बिलियन लोग हैं. ऐसे में संयुक्त राष्ट्र ने एक बेहतर विश्व बनाने का सपना देखा है. हालांकि वह ऐसा करने में तब तक कामयाब नहीं हो सकता जब तक वो भारत के 120 करोड़ (एक बिलियन से ज्यादा) की आबादी की समस्याओं को हल नहीं कर देते. ऐसे में संयुक्त राष्ट्र का जो सपना है कि दुनिया में समता हो, बंधुत्व हो, एकता तो, महिलाओं और दलितों की समस्या खत्म हो जाए तो इसमें वह तब तक सफल नहीं हो सकते जब तक की भारत की समस्या खत्म नहीं हो जाती. यदि दुनिया को समता, बंधुत्व, गरीबी मुक्त, अशिक्षा मुक्त करना है, दुनिया को अगर मानवतावादी जगह बनानी है तो भारत में भारत के संविधान को सही तरीके से लागू करना होगा. दुनिया के लोगों ने जो सपना देखा है वह तब तक पूरा नहीं हो सकता जब तक भारत का संविधान कामयाब नहीं होता. यानि भारत के संविधान की कामयाबी ही दुनिया को कामयाबी के रास्ते पर ले जाने में सक्षम है. इसे उस रूप में लागू करना होगा, जिस रूप में इसे लागू करने का सपना बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने देखा था.
– लेखक सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं. भारतीय मीडिया और दलित-आदिवासी प्रश्न
जब हम मीडिया में दलित मुद्दों की बात करते हैं तोसबसे पहला सवाल यही आता है कि मीडिया में दलित समाज से जुड़ा हुआ मुद्दा सामाजिक मुद्दा और देश का मुद्दा क्यों नहीं बन पाता? जबकि वंचित तबके की संख्या देश में सबसे ज्यादा है. किसी कार्यक्रम, किसी धरना-प्रदर्शन का कोई भी बैनर, जिस पर बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर या बहुजन समाज से जुड़े हुए किसी भी महापुरुष की तस्वीर लगी हो, या फिर उस पर दलित शब्द लिखा हो, वह तुरंत दलित समाज का मुद्दा बन जाता है, फिर वह देश का, समाज का मुद्दा नहीं रह जाता. आज का मीडिया इस वर्ग को इंसान के तौर पर नहीं, एक अलग किस्म के समूह के तौर पर देखता है. जैसे यह समाज इस समाज के बीच का हिस्सा नहीं है बल्कि किसी दूसरे टापू पर बसा हो. यही मीडिया की सच्चाई है. यही मीडिया का चेहरा है.
मीडिया की भाषा
मीडिया की भाषा को लेकर भी बात होनी चाहिए. आज से तकरीबन 6-7 साल पहले की एक खबर मुझे आज भी याद है. खबर दैनिक जागरण में छपी थी और उसका शीर्षक था- आदिवासी युवक की करंट लगने से मौत.. एक ऐसी खबर, जिसमें एक व्यक्ति को करंट लग जाता है और उसकी मौत हो जाती है, उस खबर में उसकी जाति का उल्लेख करना कहां तक जायज है और उसकी कितनी जरूरत है, इसका फैसला आप खुद कर लिजिए. जिस रिपोर्टर ने उस खबर को लिखा होगा और जिस संपादक ने उस खबर को संपादित किया होगा, मुझे उनकी सोच पर तरस आता है.
दलित महिला का बलात्कार, दलित को मंदिर में नहीं घुसने दिया, अम्बेडकर की रिंग टोन बजने पर दलित युवक को पीटा, दलित सांसद ने कहा… दलित मंत्री ने कहा… जब मीडिया इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल करता है तो असल में वह एक खास वर्ग को यह भी संदेश दे रहा होता है कि तुम अपना काम करते रहो, तुम आराम से रहो, तुम्हें कोई दिक्कत नहीं है. तुम्हें फिक्र करने की जरूरत नहीं है. यह तुम्हारा मुद्दा नहीं है. यह देश का मुद्दा नहीं है.
इसी तरह, दबंगों ने दलित महिला से किया बलात्कार, दबंगों ने दलितों को मंदिर में घुसने से रोका, अम्बेडकर का रिंग टोन रखने पर दबंगों ने दलित युवक को पीटा.. ऐसा कह कर मनुवादी व्यवस्था की समर्थक मीडिया दलित समाज को डराने की कोशिश भी करता है. वह दलित समाज को आगाह करता है कि देख लो.. तुम विरोध करोगे तो मारे जाओगे, तुम्हारी बहन-बेटियों की इज्जत लूट ली जाएगी, इन मंदिरों में घुसने की हिमाकत मत करना… नहीं तो तुम पीटे जाओगे, ज्यादा अम्बेडकर-अम्बेडकर मत चिल्लाओ नहीं तो हम तुम्हारा भी वही अंजाम करेंगे.
मैं यह सवाल इसलिए उठा रहा हूं क्योंकि आज तक किसी मीडिया ने यह नहीं लिखा कि ब्राह्मण लड़की के साथ बलात्कार. जबकि बलात्कार की शिकार हर जाति और धर्म की महिलाएं होती हैं. ये है मीडिया का चेहरा और दलित मुद्दों को लेकर उसके काम करने का तरीका.
दलित मुद्दों को देखने का नजरिया
कुछ दिन पीछे जाइए, दिल्ली में अन्ना आंदोलन हुआ. जंतर मंतर पर दिन भर मीडिया का जमावड़ा लगा रहा. महीनों तक टीवी चैनलों और अखबारों में खबरें चलती रही. लगा जैसे बस देश सुधर गया. आंदोलन का अंजाम क्या हुआ सबके सामने है. अब बस दो महीने पीछे चलिए. ऊना की घटना के बाद गुजरात में दलितों का एक बहुत बड़ा आंदोलन हुआ. महीनों तक यह चला और आज भी चल रहा है, लेकिन मीडिया ने इस आंदोलन को कैसे दिखाया और कितना दिखाया यह आपके सामने है. मीडिया ने कभी भी जातिवाद जैसे बड़ी सामाजिक बुराई को खत्म करने के लिए मुहिम नहीं चलाई. अगर भ्रष्टाचार देश का नासूर बना हुआ है और उसको खतम करने को लेकर मीडिया ने दिन-रात एक कर दिया था तो क्या जातिवाद देश के लिए नासूर नहीं है और मीडिया को गुजरात और उना घटना के बहाने इस सामाजिक बुराई को खत्म करने के लिए आंदोलन नहीं छेड़ देना चाहिए?? जैसे उसने निर्भया मामले में और अन्ना आंदोलन के दौरान किया.
प्रतिनिधित्व
जिस विषय पर हमलोग बात कर रहे हैं, उससे जुड़ा हुआ एक और सवाल है, जिसको समझे बिना मीडिया के इस सारे खेल को समझा नहीं जा सकता है. वह सवाल है मीडिया में दलित/आदिवासी समाज के प्रतिनिधित्व का. आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि मीडिया में दलित/आदिवासी समाज का एक प्रतिशत प्रतिनिधित्व भी नहीं है. यानि इसमें पैसा एक खास वर्ग का लगा है और इसमें काम करने वाले 90 प्रतिशत लोग साधारण समाज (जिन्हें आप जनरल कैटेगरी कहते हैं) के लोग हैं. और इसमें भी 50 फीसदी से ज्यादा सिर्फ एक खास जाति के लोग हैं. यानि भारतीय मीडिया पूरी तरह से दो समुदायों का गठजोड़ है, जिसमें एक के पास अथाह पूंजी है तो दूसरा खुद को एकमात्र ज्ञानी होने का दावा करता है.
दलित/आदिवासी नायकों को देखने का नजरिया
अम्बेडकर जयंती वंचित तबके के लिए सबसे बड़ा त्यौहार है. असल में यह पूरे देश के लिए उल्लास का विषय होना चाहिए लेकिन पूरा देश नहीं मानता चलिए कोई बात नहीं. लेकिन देश का एक बड़ा हिस्सा बाबासाहेब को फॉलो करता हैऔर यह दिन उनके लिए बहुत अहम है. इसकी संख्या तकरीबन 30-40 करोड़ है. यह समाज भी टीवी देखता है. बावजूद इसके मीडिया में यह आज भी बैन है. मीडिया इसे सेलिब्रेट नहीं करती है. जो मीडिया करवा चौथ और भाई दूज तक की खबर पर पैकेज बनाता है, वही मीडिया बाबासाहेब की जयंती को नहीं दिखाता. आखिर क्यों?
बिरसा मुंडा की बात करते हैं. इस नायक के बारे में मीडिया क्यों चुप्पी साधे रहती है, जबकि देश का आदिवासी समाज उन्हें पूजता है. औऱ जिनकी विचारधारा पर झारखंड जैसा राज्य बनाया गया.
ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले का नाम आप लोग जानते होंगे, जिस दंपत्ति ने स्त्री शिक्षा को लेकर इतना बड़ा काम किया, मीडिया उन्हें क्यों नहीं याद करती है. दलित-आदिवासी और वंचित तबके के ऐसे सैकड़ों नायक हैं जिनका नाम लिया जा सकता है, लेकिन यह मीडिया उन्हें याद नहीं करता.
बिहार में दलितों का सामूहिक नरसंहार होता है. दर्जनों दलितों के घर जला दिए जाते हैं. मामला अदालत पहुंचता है, सालों तक इस पर बहस होती है, फैसला आता है औऱ सभी आरोपी बरी हो जाते हैं. किसी को कोई सजा नहीं मिलती. लेकिन कोई मीडिया यह सवाल नहीं उठाता कि आखिर दलितों का नरसंहार किसने किया?? अरे किसी ने तो मारा होगा उन्हें?? मीडिया इस पर बहस की जरूरत क्यों नहीं समझता??
स्वतंत्रता दिवस की बात करते हैं. हर साल अगस्त की 15 तारीख को देश भर में यह त्यौहार मनता है. आजादी की अनुभूति का अद्भुत नजारा होता है. टीवी चैनलों और अखबारों में अगस्त के पहले हफ्ते से ही तमाम स्पेशल रिपोर्ट की बाढ़ आ जाती है. लेकिन उस मौके पर भी इस देश का मीडिया दलित और आदिवासी समाज से जुड़े नामों को याद करने से परहेज करता है. भगत सिंह की बात होती है, गांधीजी की बात होती है, चंद्रशेखर आजाद, नेहरू तक की बात होती है, यहां तक की देश के जिन सैनिकों को परमवीर चक्र मिला होता है, उनकी भी बात होती है. होनी चाहिए, बिल्कुल होनी चाहिए.
लेकिन मेरा सवाल यह है कि तब बिरसा मुंडा की बात क्यों नहीं होती, तब 32 अंग्रजों को मार गिराने वाली ऊदा देवी पासी की बात क्यों नहीं होती, अंग्रेजों को नाकों चने चबवा देने वाला शहीद बुद्धु भगत की बात क्यों नहीं होती, वीरा पासी (50 हजार के इनामी) की बात क्यों नहीं होती, पलामू में अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले निलाम्बर और पीताम्बर बंधुओं की बात क्यों नहीं होती, जिन्होंने अंग्रेजों को इतना परेशान कर दिया कि उन पर अंग्रेजों को 50 हजार का इनाम रखना पड़ा, ऐसे वीर बांके चमार की बात क्यों नहीं होती, चौरी-चौरा के नायक रमापति चमार की बात क्यों नहीं होती? झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की बात तो की जाती है लेकिन झलकारी बाई के योगदान को उस गहराई से क्यों नहीं याद किया जाता??
बाबासाहेब मीडिया की ताकत और जरूरत दोनों को समझते थे. चूंकि उस समय जो पत्र-पत्रिकाएं निकल रही थी वह वंचित समाज के मुद्दों और समस्याओं की ओर से बिल्कुल आंखें मूंदे हुए थी. आज जब यह हाल है तो आप समझ सकते हैं कि तब क्या हालात होंगे. तो भारत के वंचित समाज के मुद्दों को उठाने के लिए बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर को एक अखबार शुरू करना था. अखबार का नाम था ‘मूकनायक’. अखबार के प्रचार प्रसार की बात आई. उसी समय बाल गंगाधर तिलक ‘केसरी’ नाम का अखबार निकाल रहे थे. डॉ. अम्बेडकर ने केसरी अखबार में मूकनायक के प्रकाशित होने का विज्ञापन छपवाने के लिए संपर्क किया, लेकिन तिलक ने बाबासाहेब अम्बेडकर द्वारा निकाले जाने वाले अखबार का विज्ञापन तक छापने से इंकार कर दिया. आप सोच सकते हैं कि केसरी जैसे अखबार जिन्होंने वंचित समाज के योग्य द्वारा दिए गए विज्ञापन को प्रकाशित नहीं किया वो दलितों के हितों से जुड़े मुद्दों को कितनी अहमियत देता होगा?
एक दूसरा उदाहरण मान्यवर कांशीराम जी से जुड़ा हुआ है. कांशीराम जी बामसेफ के बैनर तले सामाजिक तौर पर काफी सक्रिय हो चुके थे. देश भर में लोग बामसेफ से जुड़ रहे थे. बोट कल्ब पर बामसेफ का पहला अधिवेशन हुआ. देश भर से हजारों लोग इस कार्यक्रम में पहुंचे. भव्य आयोजन किया गया, लेकिन दूसरे दिन के अखबारों में इसकी एक लाइन खबर भी नहीं थी. बामसेफ से जुड़े लोगों को काफी बुरा लगा कि हमने इतना बड़ा सम्मेलन किया लेकिन इसकी कोई रिपोर्ट नहीं छपी. बामसेफ के साथियों ने कांशीराम जी से बामसेफ के आंदोलन की बात लोगों तक पहुंचाने के लिए प्रेस कांफ्रेंस करने को कहा. प्रेस क्लब बुक किया गया. तारीख और समय के साथ सभी अखबार के दफ्तरों में इसकी सूचना दे दी गई. नियत समय पर कांशीराम जी और उनके एक अन्य साथी प्रेस कल्ब पहुंच गए. एक घंटा बीता, दो घंटा बीता, तीन घंटा बीता लेकिन कोई भी मीडियाकर्मी प्रेस कांफ्रेंस में नहीं पहुंचा. गजब तो यह हुआ कि प्रेस क्लब में रोज शाम को खाने-पीने के लिए मीडियाकर्मियों की भीड़ लगी रहती है लेकिन उस दिन तमाम मीडिया वाले प्रेस क्लब आए ही नहीं.
तब कांशीराम जी ने अपने सहयोगी से कहा कि मीडिया हमारी खबरों को नहीं दिखाएगी क्योंकि मनुवादी मीडिया नहीं चाहता कि हमारा आंदोलन, हमारे नायकों की कहानियां और हमारी बात दूसरों तक पहुंचे. इसलिए पहले तो मीडिया हमारी खबरों को ब्लैक लिस्टेड करेगी और जब हमारा आंदोलन बड़ा होगा तो हमें ब्लैकमेल करेगी. स्थिति आज भी बहुत नहीं बदली है. दलित/आदिवासी/मूलनिवासी वंचित समाज से जुड़ी हुई खबरों को मीडिया आज भी इसी तरह से देखता है. और मेरा मानना है कि ब्लैक लिस्टेड और ब्लैकमेल से आगे मीडिया अब इस समाज से जुड़ी खबरों को इस तरह से परोस रहा है कि इस समाज को डराया और दबाया जा सके.
दिल्ली के जंतर-मंतर पर जाकर देखिए, इस समाज के लोग आए दिन अपनी मांगों और समस्याओं के लिए धरना प्रदर्शन करते हैं. जाहिर है कि सारी खबरों को दिखाना संभव नहीं है. लेकिन हरियाणा आपके बगल में है. वहां हिसार जगह है. उसी हिसार में भगाणा गांव है, वहां के दलित जातिवादी गुंडों के उत्पीड़न का शिकार होकर गांव से पलायन कर गए. उनकी बेटियों का बलात्कार किया गया. चार साल से वह इंसाफ के लिए आंदोलन कर रहे हैं. दो साल से जंतर-मंतर पर बैठे हैं. उन्हें इंसाफ दिलाने के लिए, उनका दर्द सुनने के लिए मुख्यधारा का कोई मीडिया नहीं पहुंचा. हां, जब उन्होंने उसी जंतर मंतर पर इस्लाम अपना लिया तो हलचल जरूर हुई थी. लेकिन उन्होंने वैसा क्यों किया, इस पर कितनी बहस हुई, आपको पता होगा.
हां, कुछ चैनल और कुछ पत्रकार हैं जो वंचित तबके की खबरों को लेकर कभी-कभी संजीदगी दिखाते हैं, ऐसे पत्रकारों को गालियां दी जा रही हैं और उनसे जुड़े चैनलों पर बैन लगाने की धमकियां मिल रही हैं.
इसी तरह मीडिया द्वारा दलित राजनीति को देखने का तरीका भी पक्षपाती है. जब दलित राजनीति का वाहक कोई नेता बहुजन महापुरुषों को सम्मान देने की बात करते हुए उनकी प्रतिमाएं बनवाता है और जिससे राज्य सरकार को हर दिन ठीक-ठाक आमदनी होती है, तो मीडिया इसे सामाजिक न्याय नहीं मानता बल्कि इसे पत्थर कह कर प्रचारित करता है. मीडिया सिर्फ इसी को केंद्र में रखकर प्रचारित करती है और उस सरकार द्वारा जनता के लिए किए गए अन्य कामों को नकारने की कोशिश करती है.
मेरा मानना है कि भारतीय मीडिया जातिवादी है. दलित मुद्दों के मामले में अंग्रेजी मीडिया हिन्दी मीडिया से ज्यादा उदार है. पिछले दिनों में सोशल मीडिया के दबाव के बीच मीडिया कुछ मुद्दों को दिखाने लगा है, लेकिन मीडिया मालिकों और संपादकों को अभी अपना दिल और ज्यादा बड़ा करना होगा.
लेखक दलित “दस्तक पत्रिका” के संपादक हैं. यह लेख ईग्नू में दिए गए व्याख्यान का लिखित रूप है.
यूपीः स्कूल में मिली दलित किशोरी की लाश, रेप के बाद शरीर पर डाल दिया तेजाब
फिरोजाबाद। यूपी के फिरोजाबाद में तीन दिन पहले गायब एक दलित नाबालिग की लाश गांव के ही प्राइमरी स्कूल के बाथरूम में मिली है. शव पर कपड़े नहीं थे. परिजनों को आशंका है कि किशोरी की रेप के बाद हत्या की गई है. शव की पहचान छिपाने के लिए उसके शरीर पर तेजाब डाला गया है.
पुलिस का कहना है कि 16 साल की दलित किशोरी 19 नवंबर (शनिवार) की शाम अचानक लापता हो गई. परिजनों ने उसकी काफी तलाश की, लेकिन कोई पता नही चल सका. मंगलवार सुबह गांव के बच्चे प्राइमरी स्कूल पहुंचे तो उन्होंने तेजाब से झुलसा एक अर्धनग्न शव बाथरूम में पड़ा देखा. शव देख बच्चों ने शोर मचाया तो शिक्षक व गांव के लोग मौके पर पहुंचे.
सूचना मिलते ही परिजन भी पहुंच गए. परिजनों ने कपडों से शव की पहचान की. भाई ने थाने में दी तहरीर में आरोप लगाया है कि रेप के बाद हत्या की गई है. पहचान छिपाने के लिए शव पर तेजाब डाला गया है. मामला पोक्सो सहित अन्य धाराओं में दर्ज कर पुलिस ने जांच शुरू कर दी है. थानाध्यक्ष प्रदीप यादव का कहना है पुलिस पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का इंतजार कर रही है. जयंती विशेषः खूब लड़ी मर्दानी वो तो झलकारी बाई थी
1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम और बाद के स्वतन्त्रता आन्दोलनों में देश के अनेक वीरों और वीरांगनाओं ने अपनी कुर्बानी दी. किन्तु बहुत से ऐसे वीर और वीरांगनाये है जिनका नाम इतिहास में दर्ज नहीं हो सका. किन्तु उन्हें लोक मान्यता इतनी अधिक मिली कि उनकी शहादत बहुत दिनों तक गुमनाम नहीं रह सकी. अपने शासक झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के प्राण बचाने के लिए स्वयं बलिदान हो जाने वाली वीरांगना झलकारी बाई ऐसी ही एक अमर शहीद वीरांगना हैं, जिनके योगदान को जानकार लोग बहुत दिन बाद रेखाकित कर पाये.
अपनी मातृभूमि झांसी और राष्ट्र की रक्षा के लिए झलकारी बाई के दिये गये बलिदान को तब के इतिहासकार भले ही अपने स्वार्णिम पृष्टों में न समेट सके हों किन्तु झांसी के लोक इतिहासकारों, कवियों एवं लेखकों ने वीरांगना झलकारी बाई के स्वतंत्रता संग्राम में दिये गये योगदान को श्रद्धा के साथ स्वीकार किया.
वीरांगना झलकारी बाई का जन्म 22 नवंबर 1820 ई० को झांसी के समीप भोजला नामक गांव में एक सामान्य कोरी परिवार में हुआ था. उनके पिता का नाम सदोवा था. सामान्य परिवार में पैदा होने के कारण झलकारी बाई को औपचारिक शिक्षा ग्रहण करने का अवसर तो नहीं मिला किन्तु वीरता और साहस झलकारी में बचपन से विद्यमान था. थोड़ी बड़ी होने पर झलकारी की शादी झांसी के पूरनलाल से हो गयी जो रानी लक्ष्मीबाई की सेना में तोपची था. प्रारम्भ में झलकारी बाई विशुद्ध घेरलू महिला थी किन्तु सैनिक पति का उस पर बड़ा प्रभाव पड़ा. धीरे–धीरे उसने अपने पति से सारी सैन्य विद्याएं सीख ली और एक कुशल सैनिक बन गयी.
इस बीच झलकारी बाई के जीवन में आई कठिनाइयों के दौरान उनकी वीरता और निखर कर सामने आई. इनकी भनक धीरे – धीरे रानी लक्ष्मीबाई को भी मालूम हुई जिसके फलस्वरूप रानी ने उन्हें महिला सेना में शामिल कर लिया और बाद से उसकी वीरता साहस को देखते हुए उसे महिला सेना का सेनापति बना दिया.
उन्हें सेनापति बनाने के पीछे वीरांगना झलकारी बाई की शक्ल थी, जो झांसी की रानी लक्ष्मीबाई से हू-ब-हू मिलती थी. झांसी के अनेक राजनैतिक घटनाक्रमों के बाद जब रानी लक्ष्मीबाई का अग्रेंजों के विरूद्ध निर्णायक युद्ध हुआ उस समय रानी की ही सेना का एक विश्वासघाती दूल्हा जी अग्रेंजी सेना से मिल गया था और झांसी के किले का ओरछा गेट का फाटक खोल दिया. उसी गेट से अंग्रेजी सेना झांसी के किले में कब्जा करने के लिए घुस पड़ी थी. उस समय रानी लक्ष्मीबाई को अंग्रेजों की सेना से घिरता हुआ देख महिला सेना की सेनापति वीरांगना झलकारी बाई ने बलिदान और राष्ट्रभक्ति की अदभुत मिशाल पेश की थी.
झलकारी बाई की शक्ल रानी लक्ष्मीबाई से मिलती थी ही उसी सूझ बुझ और रण कौशल का परिचय देते हुए वह स्वयं रानी लक्ष्मीबाई बन गयी और असली झांसी की रानी लक्ष्मीबाई को सकुशल बाहर निकाल दिया और अंग्रेजी सेना से स्वयं संघर्ष करती रही और शहीद हो गई. बाद में दूल्हा जी के बताने पर पता चला कि यह रानी लक्ष्मीबाई नहीं बल्कि महिला सेना की सेनापति झलकारी बाई है जो अंग्रेजी सेना को धोखा देने के लिए रानी लक्ष्मीबाई बन कर लड़ रही है. वीरांगना झलकारी बाई के इस बलिदान को बुन्देलखण्ड तो क्या भारत का स्वतन्त्रता संग्राम कभी भुला नहीं सकता. 
