शरीर मे बत्तीस कुरूपताओं की हमेशा स्मृति रखने का नाम कायगता-स्मृति है.
बुद्ध कहते हैं- अपने शरीर में इन विषयों की स्मृति रखें-केश, रोम, नख, दांत, त्वचा, मांस, स्नायु, अस्थि, अस्थिमज्जा, यकृत, क्लोमक, प्लीहा, फुस्फुस, आत, उदरस्थ मल-मूत्र, पित्त, कफ, रक्त, पसीना, चर्बी, लार आदि. यह शरीर इन सब चीजों से भरा हुआ है, भला इसमें सौंदर्य कैसे हो सकता है! सौंदर्य तो सिर्फ चेतना का होता है. देह तो मल-मूत्र का घर है. देह तो धोखा है. देह के धोखे में मत पड़ना.
बुद्ध कहते हैं- इस बात को स्मरण रखना कि इस पर तुम चाहे कितने ही इत्र से छिड़को, तो भी इसकी दुर्गंध नहीं जाती. चाहे इसे कितने ही महंगे सुंदर वस्त्रों में ढकों, तो भी इसका असौंदर्य नहीं छुपता है. और चाहे कितने ही सोने के आभूषण पहनो, हीरे जवाहरात सजाओ, तो भी तुम्हारे भीतर की मांस मज्जा वैसी की वैसी ही रहेगी. जिस दिन चेतना का पक्षी उड़ जाएगा, इस देह को कोई दो कौड़ी में खरीदने को राजी न होगा. जल्दी से लोग ले जाएंगे, मरघट पर जला, दफना आएंगे. जल्दी समाप्त करेंगे. घड़ी दो घड़ी रुक जाएगी देह तो बदबू आएगी. यह तो रोज नहाओ, धोओ, साफ करो, तब किसी तरह तुम बदबू को थोड़ी छिपा पाते हो. लेकिन बदबू तो लगातार बह रही है.
बुद्ध कहते हैं, शरीर तो कुरूप है. सौंदर्य तो सिर्फ चेतना का होता है. और सौंदर्य चेतना का जानना हो तो ध्यान मार्ग है. और शरीर का सौंदर्य मानना हो तो ध्यान को भूलने मार्ग है. ध्यान से ही पता चलेगा कि इस शरीर में यही सब कुरूपताएं ही तो भरी हुई है. इसमें तो और कुछ भी नहीं है. कभी जाकर अस्पताल में टंगे अस्थिपंजर को देख आना, कभी जाकर किसी मुर्दे का पोस्टमार्टम होता हो तो जरूर देख आना, देखने योग्य है, उससे तुम्हें थोड़ी अपनी स्मृति आएगी कि शरीर दशा क्या है. किसी मुर्दे का पेट कटा हुआ देख लेना, तब समझ में आएगा कि शरीर मे कितना मलमूत्र भरे हुए हम चल रहे हैं.
बुद्ध कहते हैं- इस स्थिति का बोध रखो. यह बोध रहे तो धीरे-धीरे शरीर से तादात्म्य, झूठा मोह टूट जाता है और तुम उसकी तलाश में लग जाते हो जो शरीर के भीतर छिपा है, जो परमसुंदर है. उसे सुंदर करना नहीं होता, वह तो स्वयं ही सुंदर है. उसे जानते ही सौंदर्य की वर्षा हो जाती है जबकि शरीर को नहला कर इत्र, वस्त्रों, गहनो से सजाकर सुंदर करने की कोशिश करते हो क्योंकि शरीर सुंदर नहीं है यह तो बनाने से भी सुंदर नहीं होता है. कभी नहीं हुआ है और कभी हो भी नहीं सकेगा.
इसलिए शरीर व मन को सुंदर व निर्मल करने एक मात्र उपाय है ध्यान, ध्यान और सिर्फ ध्यान …विपश्यना, यह तो जीवन जीने की कला है. कुरूपताओं से भरा शरीर इत्र छिड़कने से नहीं होता सुंदरः बुद्ध
शरीर मे बत्तीस कुरूपताओं की हमेशा स्मृति रखने का नाम कायगता-स्मृति है.
बुद्ध कहते हैं- अपने शरीर में इन विषयों की स्मृति रखें-केश, रोम, नख, दांत, त्वचा, मांस, स्नायु, अस्थि, अस्थिमज्जा, यकृत, क्लोमक, प्लीहा, फुस्फुस, आत, उदरस्थ मल-मूत्र, पित्त, कफ, रक्त, पसीना, चर्बी, लार आदि. यह शरीर इन सब चीजों से भरा हुआ है, भला इसमें सौंदर्य कैसे हो सकता है! सौंदर्य तो सिर्फ चेतना का होता है. देह तो मल-मूत्र का घर है. देह तो धोखा है. देह के धोखे में मत पड़ना.
बुद्ध कहते हैं- इस बात को स्मरण रखना कि इस पर तुम चाहे कितने ही इत्र से छिड़को, तो भी इसकी दुर्गंध नहीं जाती. चाहे इसे कितने ही महंगे सुंदर वस्त्रों में ढकों, तो भी इसका असौंदर्य नहीं छुपता है. और चाहे कितने ही सोने के आभूषण पहनो, हीरे जवाहरात सजाओ, तो भी तुम्हारे भीतर की मांस मज्जा वैसी की वैसी ही रहेगी. जिस दिन चेतना का पक्षी उड़ जाएगा, इस देह को कोई दो कौड़ी में खरीदने को राजी न होगा. जल्दी से लोग ले जाएंगे, मरघट पर जला, दफना आएंगे. जल्दी समाप्त करेंगे. घड़ी दो घड़ी रुक जाएगी देह तो बदबू आएगी. यह तो रोज नहाओ, धोओ, साफ करो, तब किसी तरह तुम बदबू को थोड़ी छिपा पाते हो. लेकिन बदबू तो लगातार बह रही है.
बुद्ध कहते हैं, शरीर तो कुरूप है. सौंदर्य तो सिर्फ चेतना का होता है. और सौंदर्य चेतना का जानना हो तो ध्यान मार्ग है. और शरीर का सौंदर्य मानना हो तो ध्यान को भूलने मार्ग है. ध्यान से ही पता चलेगा कि इस शरीर में यही सब कुरूपताएं ही तो भरी हुई है. इसमें तो और कुछ भी नहीं है. कभी जाकर अस्पताल में टंगे अस्थिपंजर को देख आना, कभी जाकर किसी मुर्दे का पोस्टमार्टम होता हो तो जरूर देख आना, देखने योग्य है, उससे तुम्हें थोड़ी अपनी स्मृति आएगी कि शरीर दशा क्या है. किसी मुर्दे का पेट कटा हुआ देख लेना, तब समझ में आएगा कि शरीर मे कितना मलमूत्र भरे हुए हम चल रहे हैं.
बुद्ध कहते हैं- इस स्थिति का बोध रखो. यह बोध रहे तो धीरे-धीरे शरीर से तादात्म्य, झूठा मोह टूट जाता है और तुम उसकी तलाश में लग जाते हो जो शरीर के भीतर छिपा है, जो परमसुंदर है. उसे सुंदर करना नहीं होता, वह तो स्वयं ही सुंदर है. उसे जानते ही सौंदर्य की वर्षा हो जाती है जबकि शरीर को नहला कर इत्र, वस्त्रों, गहनो से सजाकर सुंदर करने की कोशिश करते हो क्योंकि शरीर सुंदर नहीं है यह तो बनाने से भी सुंदर नहीं होता है. कभी नहीं हुआ है और कभी हो भी नहीं सकेगा.
इसलिए शरीर व मन को सुंदर व निर्मल करने एक मात्र उपाय है ध्यान, ध्यान और सिर्फ ध्यान …विपश्यना, यह तो जीवन जीने की कला है. उत्तराखंड सरकार का स्पेशल ब्रेक एक सांप्रदायिक फैसला
उत्तराखंड की सरकार ने एक अजीब और विवादित निर्णय लिया है. उसने प्रदेश के सभी कार्यालयों में मुस्लिम कर्मचारियों के लिए शुक्रवार के दिन दोपहर में जुमा की नमाज अदा करने के लिए कुछ समय का ब्रेक देने का फैसला किया है. शुक्रवार को दोपहर में जुमा की नमाज पढ़ी जाती है और इसे सामूहिक रूप से जिन मस्जिदों में पढ़ी जाती है उसे जामा मस्ज़िद कहते हैं. हर व्यक्ति को उपासना की स्वतंत्रता देश का संविधान देता है. लेकिन यह स्वतंत्रता भी अबाध नहीं है. सरकारी दफ्तरों का एक अनुशासन है और हर सरकारी कर्मचारी जो किसी भी जाति या धर्म का हो, वह उन नियमों और व्यवस्थाओं से बंधा होता है. कर्मचारी को जिसने भी संविधान की शपथ ली है उसे उन नियमों और व्यवस्था के अंतर्गत काम करना पड़ता है. उत्तराखंड के संदर्भ में यह तर्क दिया जा सकता है कि, वहां मुस्लिम आबादी कम हैं और कर्मचारी भी कम हैं और इनमें से कुछ अगर दोपहर के समय घंटे डेढ़ घंटे के लिए नमाज़ के लिए कार्यालय से चले भी जाते हैं तो, क्या फर्क पड़ता है? यह मान भी लिया जाय कि कोई फर्क नहीं पड़ता है तो भी यह निर्णय अनेक समस्याओं को जन्म देगा और विवाद भी बढ़ाएगा.
1. इस निर्णय का सबसे पहला दुष्परिणाम यह होगा कि, कार्यालय में सीधे तौर पर धर्म के आधार पर कर्मचारियों में मानसिक बंटवारा होगा.
2. कार्यालय के अन्य कर्मचारी भी धर्म के आधार पर ही अपनी अपनी उपासना पद्धति के अनुसार अपने अपने लिए पूजा पाठ हेतु ब्रेक मांगने लगेंगे.
जैसे किसी को शिव मंदिर जाना है तो सोमवार को, किसी को बजरंग बली का दर्शन करना है तो मंगलवार या शनिवार को या दोनों दिन ही, या किसी को गणपति का दर्शन करता है तो बुधवार को, आदि आदि, सभी अपनी सुविधा के अनुसार घंटा दो घंटा का ब्रेक मांगने लगेंगे और न मिलने पर विवाद होगा जिसका प्रभाव कार्यालय के सद्भाव और अनुशासन पर पड़ेगा.
3. अचानक धार्मिक कर्मचारियों की संख्या बढ़ जायेगी. जिसने कभी भी नियमित जुमा की नमाज भी न पढ़ी हो, और जिसने कभी शिव, हनुमान, और गणपति का दर्शन भी सोम, मंगल, शनि और बुध को न किया हो, वह भी परम आस्तिक भाव से उन घंटे दो घण्टों के लिए कार्यालय से बाहर रहेगा, जिसका असर कार्यालय की गुणवत्ता और काम काज पर पड़ेगा.
4. यह फैसला भी संविधान के समानता के अधिकार की भावना के सर्वथा विपरीत है. धर्म और जाति के आधार पर कोई भी भेदभाव नहीं किया जा सकता है.
5. अगर सेवा, आवश्यक हुई तो इसका और भी विचित्र हाल होगा. चिकित्सा, बिजली, पुलिस आदि सेवाओं में पता लगा कि कोई जरूरी काम हो रहा है तभी किसी के नमाज़ का वक्त हो गया तो, उस काम का क्या होगा? यह सम्भावना भी अकल्पनीय नहीं है. यह तर्क दिया जा सकता है कि अगर कोई आपात स्थिति है तो कार्यालयाध्यक्ष ब्रेक रद्द कर सकता है. पर जहां अनुशासन का बुरा हाल होगा वहां तो लोगों की धार्मिक भावनाएं बहुत ही जल्दी आहत होने लगेंगी! इसके अतिरिक्त हो सकता है, अन्य समस्याएं भी उत्पन्न हो जाएं जिसका अनुमान मैं अभी नहीं लगा पा रहा हूं.
1947 में धर्म के आधार पर भारत बंटा जरूर था, पर हमने धर्म के आधार पर देश के शासन की पद्धति नहीं चुनी थी. पाकिस्तान ने इस्लामी गणराज्य का मार्ग चुना था, हमने नहीं. हमने एक धर्म निरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य का मार्ग चुना था. तमाम विरोधों के बावज़ूद भी हम उन्हीं मूल्यों पर टिके हुए हैं. मूल संविधान की प्रस्तावना में धर्म निरपेक्ष शब्द का समावेश न होने पर भी संविधान पूरी तरह धर्म निरपेक्ष मूल्यों पर ही आधारित है. यह आदेश इस मूल भावना के विपरीत ही नहीं बल्कि प्रत्यक्षतः सांप्रदायिक है और तुष्टिकरण की ओर स्पष्ट संकेत करता है. इस आदेश से चुनाव की प्रतिध्वनि भी आप सुन सकते हैं. यह आदेश वापस होना चाहिए और उत्तराखंड के वरिष्ठ अधिकारियों को इस आदेश के संभावित खतरे और परिणामों की ओर भी सरकार का ध्यान आकर्षित करना चाहिए. धर्म निरपेक्ष अगर हैं तो धर्म निरपेक्ष दिखना भी चाहिए. यह फैसला निंदनीय है. दलित छात्र को प्रोफेसर ने कहा जातिसूचक शब्द, छात्रों ने ‘बाबासाहेब’ के सामने कान पकड़कर मंगवाई माफी
महू। दलितों के हक और समाज में समानता के लिए पूरी जिंदगी लडऩे वाले बाबासाहेब अम्बेडकर की जन्मस्थली पर एक दलित छात्र को प्रोफेसर द्वारा जातिसूचक शब्द कहने का मामला सामने आया है. मामले के मुताबिक महू के एडवांस टेक्निकल कॉलेज में प्रोफेसर विक्रम सिंह ठाकुर ने एक दलित छात्र के लिए जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल किया.
प्रोफेसर द्वारा जातिसूचक शब्द के इस्तेमाल का छात्रों ने विरोध किया और पुलिस में शिकायत दर्ज कराई. लेकिन बाद में छात्र नेता प्रोफेसर ठाकुर के खिलाफ शिकायत इस शर्त पर वापस लेने के तैयार हो गए कि वो बाबासाहेब अम्बेडकर की जन्मस्थली पर जाकर उनकी प्रतिमा के सामने कान पकड़कर माफी मांगेंगे. छात्रों ने प्रोफेसर ठाकुर से बाबसाहेब अम्बेडकर की प्रतिमा के सामने भविष्य में ऐसी हरकत न करने की शपथ भी दिलवाई.
भारतीय संविधान के अनुसार अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लोगों के लिए जाति सूचक शब्द का प्रयोग दंडनीय अपराध है. द शेड्यूल कास्ट्स एंड ट्राइब्स (प्रिवेंशन ऑफ एट्रोसिटीज) एक्ट के तहत छुआछूत दूर करने के लिए एससी/एसटी के तहत आने वाली जातियों के लिए जाति सूचक शब्दों के प्रयोग पर प्रतिबंध है. नोटबंदी से आम जनता त्रस्त
जनसंख्या की दृष्टि से विश्व के सबसे बड़े लोकतन्त्र की राजधानी दिल्ली के आसमानों में मानव जीवन के लिए हानिकारक कणों की धुंध जमी हुई थी. पर्यावरण विशेषज्ञ और सरकारी प्राधिकरण के अधिकारी जनता को घर से न निकलने की सलाह दे रहे थे. बच्चे घर से बाहर न निकलें इसलिए स्कूल बन्द कर दिये गये थे, लोगों को मास्क पहनकर बाहर निकलने की हिदायत दी जा रही थी, इसी बीच लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री के 08 नवम्बर 2016 रात्रि 08 बजे के एक ऐलान ने न केवल दिल्ली की जनता को बल्कि पूरे देश की जनता को अचानक घर से बाहर निकलने पर मजबूर कर दिया.
यह ऐलान था 500 और 1000 रुपये मूल्य के नोटों के चलन पर पूर्णतः रोक लगाना. यह ऐलान काला धन, भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के उद्देश्य से किया गया. जैसा कि प्रधानमंत्री व भाजपा सरकार की तरफ से यह बताया गया है कि कालाधन व भ्रष्टाचार ही भारत की आम जनता की बदहाली का मुख्य कारण है. प्रधानमंत्री ने तो 2014 के लोकसभा चुनाव में यहां तक कहा है कि विदेशों में हमारे देश का इतना कालाधान जमा है कि यदि उसे वापस लाकर भारत की 125 करोड़ जनता में बराबर-बराबर बांटा जाय तो प्रत्येक व्यक्ति के हिस्से में 15-15 लाख रूपये आयेंगे. इसे वापस लाने का उन्होंने वादा भी किया है. हालांकि इस पर उन्होंने अभी तक कोई कदम नहीं उठाया है. यह कदम तो केवल देश के अन्दर नोटों के रूप में रखे गये कालेधन को बाहर निकालने के लिए उठाया गया है जो विशेषज्ञों के अनुसार कुल कालाधन का केवल 8-10 प्रतिशत है. 90 प्रतिशत कालाधन तो देश के अन्दर भी सोना, हीरा, रियल एस्टेट आदि के रूप में छुपाया गया है. अर्थात् प्रधानमंत्री द्वारा उठाया गया यह कदम कालेधन के 10 प्रतिशत हिस्से को बाहर लाने के लिए उठाया गया है जो अपने ही देश में 500 व 1000 रूपये के नोटों के रूप में लोगों ने अपने घरों में छुपाकर रखा हुआ है.
देश में रखे गये 90 प्रतिशत और विदेशों में रखे गये कुल कालेधन से इस नोटबंदी की कार्यवाही का कुछ भी लेना-देना नहीं है. यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जब कुल काले धन के एक छोटे से हिस्से, जो देश के अन्दर ही है, को निकालने के लिए की गयी कार्यवाही से बाजार बन्द हो गये, आम जनजीवन ठप सा हो गया, बुआई के समय में किसान बीज, खाद व डीजल नहीं खरीद पा रहे हैं. मरीज का इलाज मुश्किल से हो पा रहा है, लोगों के खर्च को नियंत्रित कर दिया गया है, दिहाड़ी मजदूरों को काम नहीं मिल रहा है. जिनके पास रूपये हैं, वे बैंको की लाइन में खड़े हैं, शादी विवाह स्थगित हो गये हैं, तो कुल कालेधन के लिए यदि यही तरीका अपनाया गया तो जनता को आपातकाल जैसी स्थिति झेलनी पड़ सकती है, जिसका संकेत भी प्रधानमंत्री 13 नवम्बर को गोवा में दे चुके हैं.
देश में कुल कितना कालाधन है, देश के बाहर कितना कालाधन है, कालाधन कितना आयेगा, भ्रष्टाचार रूकेगा या नहीं, इन मुद्दों पर बहस हो सकती है लेकिन जिस तरीके व तेवर के साथ प्रधानमंत्री ने नोटबंदी का निर्णय लिया उससे यह स्पष्ट है कि लोकतांत्रिक ढंग से चुने गये प्रधानमंत्री ने लोकतंत्र का गला घोंट दिया. लोकतांत्रिक मूल्यों की ऐसी-तैसी कर दी. लोकतंत्र की सर्वाधिक लोकप्रिय परिभाषा है ‘जनता का, जनता के लिए, जनता के द्वारा शासन’. इस परिभाषा में स्पष्ट किया गया है कि ऐसी शासन व्यवस्था जिसके केन्द्र में ‘जनता’ रहती है या जनता के हित के लिए चलाये जाने वाली शासन व्यवस्था. इस परिभाषा की कसौटी पर यदि नोट बंदी के निर्णय को कसा जाय तो यह निर्णय पूर्णतः गैर लोकतांत्रिक सिद्ध हेागा, न केवल तौर तरीके में बल्कि जनहित की दृष्टि से भी. जिस आम जनता, मजदूर और किसान के जीवन को बेहतर बनाने के नाम पर यह निर्णय लिया गया है, उन्हीं के लिए सबसे अहितकर साबित हुआ. सभी को पता है कि किसानों के लिये यह समय खरीफ की फसल की कटाई एवं रबी की फसल की बुआई का है. खरीफ की फसल बेचकर जो रूपये किसान अपने घरों में रखे हुए हैं, नोटबंदी के कारण उनके अपने रूपये बेकार हो गये हैं. यदि प्रधानमंत्री के शब्दो में कहे तो ‘अवैध मुद्रा’ हो गये हैं. उससे वे रबी की फसल के लिए खाद, बीज व डीजल नहीं खरीद सकते हैं. यदि बैंको से 15 दिन के अन्दर नई नोट नहीं मिली तो वे रबी की फसल की बुआई समय से नहीं कर पायेंगे जिसका नकारात्मक प्रभाव अन्न उत्पादन पर पड़ेगा. और जिस तरह से बैंकों में भीड़ जुट रही है और लोग खाली हाथ लौट कर आ रहे हैं ऐसे में किसानों का एक-एक दिन भारी बीत रहा है.
सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री ने यह सोचा कि खेती की दृष्टि से महत्वपूर्ण इस समय में नोटबंदी के निर्णय से किसान और खेती तबाह हो सकती है? निश्चित रूप से नहीं सोचा. यदि सोचते तो वे देश की इन्हीं आम जनता से 50 दिन और नहीं मांगते. मोदी जी जिन मजदूरों के हितों के नाम पर अपनी कार्यवाही को उचित ठहराने में लगे हुए हैं उनकी हालत तो और बद्तर हो गयी है. भारत में मजदूरी करने वाले का 80-85 प्रतिशत हिस्सा असंगठित क्षेत्र में है जिनमें से ज्यादातर दिहाड़ी मजदूर हैं, जो निर्माण क्षेत्र में गिट्टी-बालू का काम, बाजारों में सामान उतरवाने-चढ़वाने व सामान ढुलाई का काम करते हैं. ये रोज कमाते और खाते हैं. नोट बंदी की घोषणा के बाद से इनको काम मिलना बन्द हो गया है. दुकानों में काम करने वाले मजदूरों को भी काम नहीं मिल रहा है. ये लोग व इनका परिवार सीधे भुखमरी की चपेट में आ गये है. समाज के निचले पायदान पर स्थित जनता का एक बड़ा हिस्सा रेहड़ी व पटरी व्यवसायी के रूप में स्वरोजगार में लगा हुआ है. इनका ग्राहक निम्नवर्ग तथा निम्न मध्यम वर्ग हैं. निम्न मध्यम वर्ग दिन भर बैंक की कतार में हैं तथा निम्न वर्ग भुखमरी के कगार पर, इसलिए पटरी व रेहड़ी व्यवसायी भी नोटबंदी के कारण मक्खी मार रहे हैं. स्पष्ट है कि अर्थव्यवस्था में निचले पायदान पर स्थित किसान, मजदूर की हालत नोटबंदी के पश्चात् बद से बदतर हो गयी है. प्रधानमंत्री की तरफ से इनको प्रत्यक्ष सहयोग का कोई आश्वासन भी नहीं मिला है. निश्चित रूप से नोट बंदी का निर्णय लेते समय प्रधानमंत्री ने देश की 90 प्रतिशत आबादी के समक्ष आने वाली समस्याओं पर थोड़ा सा भी विचार नहीं किया.
एक सप्ताह के अन्दर लगभग 30 से अधिक लोग रूपये निकालने के लिए लाइन में तबियत खराब होने और नोटबंदी के कारण अन्य नुकसान के कारण अपनी जान गंवा चुके हैं. न जाने कितने लोग समय से पैसा न मिलने के कारण अस्पताल नहीं जा सके या अस्पताल में भी दवा न मिलने के कारण दम तोड़ दिये. क्या इस निर्णय से जीवन का मौलिक अधिकार प्रभावित नहीं हुआ है. उत्तर होगा बिल्कुल हुआ है. एक व्यक्ति मोदी जी व उनके भक्तों के लिए केवल एक नम्बर हो सकता है, एक वोट हो सकता है लेकिन अपने परिवार के लिए वह पूरी दुनिया है. क्या मोदी जी ऐसे मृतकों के परिजनों के लिए किसी भी तरह की कोई सहायता देंगे?
80 प्रतिशत आबादी के सामने प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित हुए आपातकालीन व अमानवीय परिस्थितियों पर दृष्टिपात करने के पश्चात् कालेधन से संबंधित कुछ तथ्यों का उल्लेख आवश्यक प्रतीत हो रहा है. अनुमानों के अनुसार देश में कुल कालाधन 30 लाख कराड़ रूपये मूल्य का है जिसमें से 8-10 प्रतिशत नकदी के रूप में है. शेष सोना, हीरे व रियल एस्टेट के रूप में है. अर्थात् मात्र 3 लाख करोड़ रूपये को बैंक में जमा कराने के नाम पर देश में आर्थिक अराजकता पैदा कर दी गयी. यह रकम कितनी कम है इसका अंदाज सरकार के कुछ और फैसले से इसकी तुलना कर के लगाया जा सकता है. मोदी सरकार ने पूँजीपतियों पर लगने वाले उत्पाद शुल्क को 30 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत कर दिया है. सरकार के इस निर्णय से प्रत्येक वित्तीय वर्ष में उद्योगपतियों को 2 लाख करोड़ रूपये की छूट प्राप्त होगी. पिछले दो वित्तीय वर्षो में भारतीय उद्योगपतियों को 04 लाख करोड़ रूपये टैक्स में छूट दी गयी जो देश में नकदी के रूप में जमा कालेधन से एक लाख करोड़ रूपये अधिक है. मामला यहीं तक नहीं है सरकारी बैंको का उद्योगपतियों के ऊपर 6 लाख करोड़ रूपये से अधिक कर्ज बकाया है जिसे भारतीय देशप्रेमी उद्योगपति अपनी फैक्ट्री चलाने के लिए थे और अब लौटा नहीं रहे हैं. इस कर्ज को अर्थशास्त्र की भाषा में एन0पी0ए0 कहते हैं. देश प्रेमी उद्योगपति सरकारी बैंकों से लिए कर्ज का ब्याज कौन कहे मूलधन भी लौटाने को तैयार नहीं हैं, जबकि कर्ज देने वाले बैंक लगातार घाटे में चल रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट की फटकार लगाने के बावजूद भी मोदी जी की सरकार इन कर्जखोर उद्योगपतियों का नाम सार्वजनिक करने को तैयार नहीं है. कहने का अर्थ यह है कि जितनी रकम (कालेधन) 3 लाख करोड़ रूपये के लिए सरकार ने पूरे देश को वित्तीय अराजकता में ढकेल दिया, उससे दूनी रकम 6 लाख करोड़ रूपये पूंजीपतियों ने अपने पास दबाकर रखा है तथा उससे सवा गुनी रकम 4 लाख करोड़ रूपये मोदी सरकार पिछले दो वर्षों में पूंजीपतियों को टैक्स छूट के रूप में दे चुकी है. क्या यह 10 लाख करोड़ रूपया देश का नहीं है? क्या यह रकम देश के विकास में नहीं लगनी चाहिए? इस दिशा में तो सरकार कोई कदम नहीं उठा रही है न ही उठाने का कोई इरादा ही व्यक्त कर रही है.
आइये अब कालेधन की परिभाषा क्या है तथा यह धन किसके पास है इस पर थोड़ा विचार करें. सामान्यतया ऐसे धन को कालाधन कहा जाता है जिस पर सरकार को टैक्स नहीं मिलता है. इस प्रकार का धन सभी सरकारी कर्मचारियों अर्थात् चपरासी, बाबू, बड़े बाबू से लेकर सचिवों तक के पास है जो रिश्वत लेते हैं. छोटे से लेकर बड़े व्यापारियों के पास है जो अपनी वास्तविक आमदनी सरकार को नहीं बताते तथा कर की चोरी करते हैं. गांव, कस्बे व शहरों के दुकानदारों के पास है जो टैक्स रिटर्न नहीं भरते हैं. छोटे-बड़े ठेकेदारों के पास है तथा राजनेताओं के पास है. इनकी आबादी देश की कुल आबादी की 10 प्रतिशत है. इन्हीं के पास 3 लाख करोड़ रूपये का कालाधन नकदी के रूप में देश के अन्दर छुपाकर रखा गया है. यहां यह उल्लेख करना उचित होगा कि 10 प्रतिशत आबादी के पास देश की 76 प्रतिशत सम्पत्ति है. इस 10 प्रतिशत में देश के छोटे से लेकर बड़े उद्योगपति शामिल हैं. अकेले अंबानी के पास 1.56 लाख करोड़ की सम्पत्ति है. वे यदि एक करोड़ प्रतिदिन खर्च करें तो उनकी सम्पत्ति 427 वर्षों में खर्च होगी. दिलचस्प यह कि अंबानी के पास जो सम्पत्ति है उसमें एक प्रतिशत भी कालाधन नहीं है. विजय माल्या के पास जो सम्पत्ति है, उसमें एक रूपया भी कालाधन नहीं है, जबकि रिलायन्स नामक कंपनी ने 1996 तक सरकार को एक रूपये भी टैक्स नहीं दिया था.
आइये अब मोदी जी के ऐतिहासिक और साहसिक फैसलों की पड़ताल करते हैं. ऊपर के 20 प्रतिशत आबादी जिसमें उच्च वर्ग, उच्च मध्यम वर्ग आते हैं, के पास देश की 85-90 प्रतिशत सम्पत्ति है. देश की 80 प्रतिशत आबादी को पिछले पचीस वर्षों में अर्थव्यवस्था के हाशिये पर ढकेल दिया गया है. नई आर्थिक नीति ने इनसे सब कुछ छीन लिया है. इनके पास न शिक्षा है, न स्वास्थ्य है न ही कोई सपना है. ऊपर की 20 प्रतिशत आबादी जिसमें उद्योगपति तथा राजनेता सहित सरकार चलाने वाली मशीनरी के लोग शामिल हैं, ने मिलकर पिछले 25 वर्षों में 80 प्रतिशत देशवासियों का निर्मम शोषण किया. अब इन 80 प्रतिशत आबादी के पास कुछ भी बचा नहीं है, जिसके शोषण से इस पूँजीवादी आर्थिक व्यवस्था को चलाया जा सके. इस व्यवस्था को चलाने के लिए अब आवश्यक हो गया है कि नौकरशाहों, राजनेताओं, ठेकेदारों, व्यापारियों, ट्रांसपोर्टरों आदि के पास जो सम्पत्ति है, उसका मालिकाना हक उद्योगपतियों के हाथ में सौंपा जाय अर्थात् देश की अर्थव्यवस्था का निगमीकरण किया जाय. लेकिन यह कार्य इतना आसान नहीं था जितना आसान 80 प्रतिशत जनता की सम्पत्ति को पूंजीपतियों को सौंपना था. इसलिए इसकी लम्बे समय से तैयारी की जा रही थी. राजनेताओं, नौकरशाहों, ठेकेदारों, व्यापारियों, ट्रांसपोर्टरों आदि को सुनियोजित ढंग से भ्रष्टाचारी व 80 प्रतिशत जनता का असली दुश्मन घोषित किया गया. चूंकि इस तबके में दलितों, पिछड़ों, मुसलमानों के बीच के कुछ नेता, नौकरशाह व व्यापारी भी शामिल हैं जिनकी सम्पत्ति इन पच्चीस वर्षों में बढ़ी है, इसलिए आसानी से सवर्ण हिन्दुओं के अन्दर जातिगत व धार्मिक घृणा की भावना को भड़काया गया. आज सवर्ण हिन्दू इसलिए नहीं खुश है कि कालाधन जो सरकार के खजाने में जमा होगा, उसमें से उन्हें कुछ हिस्सा मिलेगा, बल्कि इसलिए खुश है कि नोट बंदी की कार्यवाही से मुलायम, मायावती कंगाल हो जायेंगे. सवर्ण हिन्दू लोकतंत्र, समानता, स्वतंत्रता, बन्धुत्व, न्याय जैसे आधुनिक मूल्यों में विश्वास नहीं करते हैं तथा इन मूल्यों को विदेशी मूल्य मानते हैं. इसलिए ये संविधान को भी हृदय से अंगीकार नहीं करते हैं. आर.एस.एस व भाजपा इस विचारधारा को संपोषित करते हैं. इन्हीं के बदौलत नरेन्द्र मोदी इतना साहसिक और ऐतिहासिक कदम उठाने की हिम्मत कर बैठे, जो न केवल लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्यों के विरूद्ध है बल्कि 90 प्रतिशत आबादी की आर्थिक नाकेबंदी भी है.
प्रधानमंत्री जी इस कदम को इस समय उठाने के लिए एक और कारण से भी उत्साहित हुए होंगे. वह महत्वपूर्ण कारण है छः राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव. नरेन्द्र मोदी किसी भी कीमत पर इन सभी राज्यों में विधानसभा का चुनाव जीतना चाहते हैं. इन राज्यों में सबसे महत्वपूर्ण राज्य है उत्तर प्रदेश. उत्तर प्रदेश में चुनाव जीतना भाजपा के लिए इसलिए आवश्यक है कि वह राज्यसभा में अपना बहुमत स्थापित कर सके. क्योंकि राज्यसभा में बहुमत के बगैर भारत में हिन्दु राज स्थापित नहीं हो सकता, जिसके लिए नरेन्द्र मोदी के अनुसार पांच पीढ़ियों से संघर्ष जारी है. उत्तर प्रदेश में मुलायम और मायावती, भाजपा के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा है. इन दोनों दलों का सामाजिक और आर्थिक आधार भी काफी मजबूत है. मोदी ने यह कदम मुलायम, मायावती को आर्थिक रूप से कमजोर करने के लिए उठाया, जिससे उ.प्र. चुनाव में भाजपा की जीत की राह आसान हो सके.
सामान्य जानकारी रखने वाला कोई भी व्यक्ति भली-भांति समझ सकता है कि मात्र नोटबंदी की सीमित कार्यवाही से कालाधन व भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं को हल नहीं किया जा सकता है. सरकार की दलीलें एकदम बचकाना हैं. यदि बचत खाते में ढाई लाख रूपये से ऊपर नकदी जमा करने वालों से पूछताछ होगी, तो कालाधन नकदी के रूप में अपने खाते में कोई महामूर्ख ही जमा करेगा. इससे अच्छा होगा कि वह रूपयों को नष्ट कर दे, एक दूसरा रास्ता भी है इस वित्तीय वर्ष का आयकर रिटर्न मार्च 2017 के बाद भरा जायेगा. नकदी के रूप में रखे काले धन को कोई भी व्यापारी इस वित्तीय वर्ष में अर्जित आय दिखाकर आसानी से बैंक में जमा कर सकता है. फिर सरकार के हाथ क्या आयेगा? स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री मोदी जी के नोट बंदी के निर्णय से कालेधन का दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है. वे 90 प्रतिशत जनता के पास नकदी के रूप में रखे धन को बैंक में जमा कराना चाहते हैं जिससे उद्योगपतियों को कर्ज के रूप में दिया जा सके तथा उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा को आर्थिक रूप से कमजोर करना चाहते हैं जिससे भाजपा की जीत आसान हो सके. अपने इन्हीं दोनों उद्देश्यों, जो पूर्णतयाः अमानवीय और जनविरोधी है, को पूरा करने के लिए मोदी जी ने संवैधानिक गरिमा को धता बताते हुए अपने पद का दुरूपयोग किया है. उनके इस कदम से देश में आर्थिक अराजकता का माहौल पैदा हो गया है. 50 से अधिक लोगों की जाने जा चुकी है. दिल्ली की जनता को जान हथेली पर रखकर घरों से बाहर निकलने पर बाध्य होना पड़ा. पता नहीं दिल्ली के आसमानों में जमी जहरीली धुंध से कितने लोगों का जीवन प्रभावित हुआ. प्रधानमंत्री के इस कदम को तानाशाही की शुरूआत के रूप में देखा जाना चाहिए. यदि इस खतरे का संज्ञान नहीं लिया गया तो न लोकतन्त्र बचेगा न ही संविधान. जालियाँवाला बाग जैसा था भागलपुर कांड
वैसे तो पूरे भारत देश में ही सामंतों का शासन है, मगर विहार (बिहार) राज्य इसमें दो कदम आगे है. पूरे देश में भूमिहीन परिवारों की संख्या सबसे ज्यादा विहार में है. विहार राज्य में भूमिहीनों को जमीन देने के चार कार्यक्रम चलाये गये हैं. एक, बासगीत जमीन का परचा देना इसका मतलब जिस जमीन पर भूमिहीन परिवार झोपड़ी बनाकर रह रहे हैं, उस जमीन का मालिकाना हक गरीबों को देना. भूमिहीन परिवार कहीं सरकारी जमीन पर तो कहीं किसी भूधारी की जमीन पर वर्षों से झोपड़ी बना कर रह रहे हैं. बासगीत जमीन के मालिकाना हक का परचा बेशुमार भूमिहीनों को आजतक नहीं मिला है. दूसरा कार्यक्रम है सरकारी जमीन का परचा. जिस जमीन पर वर्षों से भूमिहीन परिवार दखल कब्जा कर अपने जीने के लिए थोड़ा बहुत अन्न उपजा लिया करते हैं, उन्हें इस श्रेणी में रखा जाता है. इसी क्रम में तीसरे कार्यक्रम विहार भूहदबन्दी अधिनियम कानून के तहत अतिरिक्त घोषित जमीन जिसका वितरण बाजाप्ता ढोल पीटकर कैम्प लगाकर सूबे के मुख्यमन्त्री, राजस्व मंत्री, कमीश्नर, कलेक्टर किया करते हैं. और चौथा कार्यक्रम है भूदान कानून के तहत अर्जित और विधिवत वितरित की गयी जमीन.
विहार राज्य के भागलपुर जिला में भूमिहीनों के बीच उपरोक्त चारों तरह के भूमि वितरण और उसपर दखल कब्जा को लेकर भीषण समस्या है. भागलपुर के भूमिहीन वर्षों से बासगीत और परती सरकारी भूमि का परचा देने तथा भूहदबन्दी कानून, भूदान कानून के तहत अतिरिक्त घोषित भूमि का परचा भूमिहीनों को देने के लिए कलक्टर के यहां आवेदन देकर उनके दफ्तर से लेकर कैम्प कोर्ट तक लगातार दौङ लगा रहे थे. जिला कलेक्टर भागलपुर अतिरिक्त भूमि का भूमिहीनों के बीच सरकारी जमीन को वितरण करने तथा पहले से वितरित जमीन पर दखल कब्जा देने का झूठा भरोसा देते रहे. निराश होकर भूमिहीनों ने दिसम्बर 2016 के प्रथम सप्ताह में भागलपुर कलेक्टरी में सरकारी जमीन का परचा देने तथा पहले से बांटी गयी जमीन पर दखल कब्जा देने के लिए धरना दे दिया.
विहार में सरकारी जमीन का हस्र यह है कि बड़े-बड़े भू-धारी सरकारी जमीन पर जबरदस्ती कब्जा किये हुए हैं. और अनुमण्डल के एस.डी.ओ सहित जिला के एडिशनल कलक्टर और कलक्टर तक इस सरकारी जमीन पर से बड़े भू-धारियों को बेदखल कर जरूरतमंद भूमिहीनों के बीच जमीन का वितरण करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं. कारण सभी बड़े भू-धारी किसी न किसी राजनीतिक दल के अगुआ या पिछुआ बने हुए रहते हैं. राजनीतिक दल चाहे वे सत्ताधारी पक्ष हो या विपक्ष हो सरकारी जमीन वितरण के सबसे बाधक तत्व बने हुए हैं. हां यही लोग मंचों पर राजनीतिज्ञ बेशर्मी से सरकारी जमीनों का भूमिहीनों के बीच वितरण करने और दखल कब्जा देने का भाषण गला फाड़-फाड़ कर करते रहते हैं.
दिसम्बर 2016 के पहले सप्ताह में मौसम इतना सर्द हो गया कि पारा 12 डिग्री सेल्सियस पर आ गया था. भागलपुर कलेक्टरी में सरकारी जमीन का परचा देने, भूहदबन्दी और भूदान कानून के तहत वितरित जमीन पर दखल कब्जा देने के लिए जीर्ण-शीर्ण कपड़ों में धरणा-प्रदर्शन कर रहे गरीबों की फरियाद सुनने कोई मनहूस पदाधिकारी तक नहीं आया, कलक्टर के खुद आकर उनसे मिलने और उन्हें भरोसा देना तो दूर की बात है. आलम यह है कि विहार में बिना भारी दान दक्षिणा दिये किसी शख्स की एस.पी. या कलक्टर के पद पर पोस्टिंग नहीं होती है. ऐसे धरना प्रदर्शन के मामले में एस.पी.,कलेक्टर सूबे के आका से कार्रवाई का सिग्नल मांगते हैं. भागलपुर के प्रदर्शनकारियों के विरूद्ध नकारात्मक सिग्नल मिलते ही भागलपुर के कलक्टर और एस.डी.ओ. ने 8 दिसम्बर 2016 को बर्बर लाठीचार्ज करवाकर दर्जनों औरतों, वृद्धों और बच्चों को लहू लूहान करवा दिया. सरकारी महकमों के द्वारा सर्द भरे दिन में लाठी चार्ज करके लहू लुहान करवाना जालियाँवाला बाग को दुहरा गया.
भागलपुर जिला सामंतों का गढ़ है. सबके सब सामंत बड़े भू-धारी हैं. इन भू-धारियों की अतिरिक्त भूमि को राजस्व अधिकारियों ने जान पर जोखिम डालकर अतिरिक्त घोषित करके भूमिहीनों के बीच वितरित कर दिया है. जिन गरीबों को भूहदबन्दी कानून के तहत पर्चा मिला है, वे वितरित जमीन पर दखल कब्जा नहीं कर पाये. इसके कई कारण रहे. पहला पर्चाधारियों को जमीन पर विधिवत दखल कब्जा अंचल अधिकारियों ने दिलाया ही नहीं. दूसरा भूहदबन्दी कानून के तहत जमीन सरकारी रेकर्ड में अतिरिक्त घोषित तो हुई, मगर दबंग भूधारियों ने उस जमीन पर से अपना कब्जा छोड़ा ही नहीं. तीसरा भूधारियों ने भूहदबन्दी कानून के तहत अपनी अतिरिक्त घोषित जमीन के आदेश के विरूद्ध उच्च न्यायालय में मनगढंत दावा दिखलाकर रिट दायर कर दिया. उच्च न्यायालय के न्यायाधीश भूहदबन्दी कानून के तहत अतिरिक्त घोषित जमीन के वितरण के सबसे बाधक तत्व होते रहे हैं. वे ऐसे हर रिट में आँख मून्दकर स्टे देकर अपना न्यायिक टैलेन्ट दिखला देते हैं. सरकार सामंतों की और न्यायालय भी सामंतों की. गरीब भूमिहीनों के जिम्में सिर्फ उद्दंड पुलिस की बेगिनती की लाठियां. भूदान आन्दोलन तो साफ तौर पर ठग आन्दोलन साबित हुआ. बड़े भूधारियों ने भूदान आन्दोलन में अपनी जमीन दान देने का नाटक भर किया. तब की बेशर्म कांग्रेस सरकार ने भूदान में भूधारियों से जमीन का दान लिया कागज में, उन जमीनों की सम्पुष्टि भी किया कागज में और उन जमीनों का वितरण भी गरीबों के बीच कर दिया सिर्फ कागज में. कहा जाय तो भूदान आन्दोल शत प्रतिशत बेशर्मों का सरकारी आन्दोलन साबित हुआ.
8 दिसम्बर को भागलपुर कलेक्टरी में यही हुआ. सरकार द्वारा वितरित भूमि पर दखल कब्जा मांगने के लिए सरकार ने गरीबों के सर और शरीर पर लाठियां बरसा दी. भूखे-प्यासे गरीबों पर लाठियां. औरतों, वृद्धों, बच्चों पर लाठियां. हक मांगने पर लाठियां, हिस्सा मांगने पर लाठियां. बेशर्म सरकार, बेदर्द कार्रवाई. घोषणाओं में लगातार सुशासन का ढोल पीटने वाली इस सामंती सरकार को हक मांगते गरीबों पर लाठियां बरसाते जरा भी शर्म नहीं आई. अगर विहार सरकार के आका के दिल में जरा भी दर्द हो और मन में ईमान हो तो भागलपुर के कलक्टर को तत्काल सस्पेन्ड करके उसके विरूद्ध आरोप तय कर उसे दण्डित करने की कार्रवाई करे. चुनाव के वक्त यही बेशर्म सरकार उन गरीबों के दरवाजे पर चुनाव के समय वोट मागने जायगी. जैसे हक मांगने पर सरकारी पुलिस ने उनपर लाठियां बरसायी है, वैसे ही ये लोग इस सरकार के दल के लोगों के सर पर वोट मांगते समय जूते बरसाएं तब जाकर उनके दुख और अपमान का हिसाब चुकता होगा. तब हिसाब बराबर होगा.
– लेखक अम्बेडकर मिशन पत्रिका के संपादक हैं। नोटबंदी पर वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश का खुलासा
नोटबंदी के बाद से भाजपा-नीत सरकार और संघ-परिवार के तमाम नेता, प्रवक्ता या समर्थक सुबह से शाम तक इस बात का प्रचार कर रहे हैं कि नोटबंदी गरीबों और आम लोगों के हक में की गई है. इसका नुकसान सिर्फ बड़े लोगों या पूंजीपति वर्ग को ही उठाना पड़ेगा. कुछेक स्थानों पर कुछ इंजीनियरों-डाक्टरों या अफसरों को अपनी रिश्वत की कमाई बचाने की कोशिश में परेशान देखकर आम आदमी, दलित-उत्पीड़ित समुदाय के व्यक्ति को यह भ्रम भी हो सकता है कि नोटबंदी से असल परेशानी अमीरों को हो सकती है, गरीबों को नहीं! पर यह सच नहीं है. अब तक किस बड़े उद्योगपति या कारपोरेट घराने को सरकार के इस फैसले से परेशानी में देखा गया? परेशान अगर है तो आम आदमी, मजदूर, किसान, दलित-उत्पीड़ित और निम्न मध्यवर्ग! कुछ ही दिनों बाद हालात और खराब होंगे.
सरकार और संघ-परिवारी संगठनों का दावा है कि मोदी सरकार ने नोटबंदी के फैसले से कालेधन और भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग छेड़ दी है. अगर ऐसा है तो हाल ही में एनपीए के तहत विवादास्पद उद्योगपति विजय माल्या सहित देश के 63 बड़े उद्योगपतियों को इतनी बड़ी रियायत क्यों दी गई? एक तरफ 8 नवम्बर को नोटबंदी का ऐलान हुआ तो दूसरी तरफ बड़े सरकारी बैंक ने इन उद्योगपतियों के लगभग 7000 करोड़ के बैंक-कर्ज को बट्टा-खाते(राइट-आॉफ) डालने का फैसला किया. विभिन्न सरकारी बैंकों ने बीते कुछ सालों में साढ़े छह लाख करोड़ से अधिक के कारपोरेट-कर्ज को बट्टा-खाते डाला है. इधर, नोटबंदी के बाद देश में अब तक तीन दर्जन से ज्यादा लोगों की रूपया-निकासी की बैंक-लाइन में लगे-लगे मौत हो गई.
कई लोग घर या अस्पताल में मर गये क्योंकि उनके पास इलाज के पैसे नहीं थे. बाजार-कारोबार ठप्प पड़े हैं. दिल्ली-एनसीआर के जिस इलाके में मैं रहता हूं, वहां मध्यवर्गीय और निम्न मध्यवर्गीय परिवारों में पूर्वनिर्धारित कई शादियां नगदी के अभाव में स्थगित हो रही हैं पर कर्नाटक की पूर्व भाजपा सरकार में मंत्री रहे एक विवादास्पद कारोबारी के घर में सैकड़ों करोड़ के खर्च से शाही-अंदाज में शादी हुई. देश के कुछ हिस्सों में 8 नवम्बर के ऐन पहले सत्ताधारी पार्टी के नेता करोड़ों की रकम बैंकों में जमा कराते पाये गये. आम लोगों के पास इस वक्त आने-जाने के लिये पर्याप्त पैसे नहीं हैं पर कई दलों की बड़ी बड़ी रैलियां हो रही हैं. लोगों को लाने और छोड़ने के लिये बड़े-बड़े वाहनों का इस्तेमाल हो रहा है. करोड़ों के खर्च वाले क्रिकेट के मैच हो रहे हैं. ये घटनाक्रम सरकार के महत्वाकांक्षी फैसले को संदिग्ध बनाते हैं.
सरकार की अपनी विशेषज्ञ टीमों और बड़े अर्थशास्त्रियों का आंकलन है कि देश में जितना भी कालाधन है, उसका महज 6 फीसदी ही नगदी रूप में है. शेष यानी 94 फीसदी कालाधन सोना, रियल एस्टेट, बेनामी खातों, हवाला कारोबार या विदेशी बैंकों के जरिये संचालित है. ऐसे में नोटबंदी के फैसले से कालाधन पर निर्णायक अंकुश लगाने की बात गले नहीं उतरती. अब तक सरकारी योजनाकारों ने देश को बताया भी नहीं कि किस शोध और ऱणनीतिक कार्ययोजना के तहत नोटबंदी का फैसला हुआ. लोकतांत्रिक कामकाज का तकाजा था कि कम से कम 8 नवम्बर के बाद सरकार की तरफ से एक मुकम्मल कार्ययोजना का खाका देश के समक्ष पेश किया जाता. पर सत्ताधारी नेताओं-मंत्रियों की तरफ से तो अब तक सिर्फ जुमले उछाले जा रहे हैं कि ‘देश के लिये जनता को कुछ दिन कष्ट उठाना चाहिये’ या कि ‘50 दिन बाद जनता के सपनों का भारत तैयार मिलेगा!’ मीडिया के बड़े हिस्से, खासकर चैनलों ने शुरूआती दिनों में इसे ‘बड़ी क्रांति’ के रूप में प्रचारित किया. पर अब भ्रांति मिटने लगी है. देश-दुनिया की बड़ी आर्थिक न्यूज एजेंसियां, प्रमुख अखबार और बड़े अर्थशास्त्री अब सवाल उठाने लगे हैं.
भारत सरकार के वित्त सलाहकार रह चुके प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री डा.अशोक देसाई, प्रो. रवि श्रीवास्तव, अभिजीत सेन, प्रो. जयति घोष, प्रो. प्रभात पटनायक, प्रो.सीपी चंद्रेशेखर और प्रो.इला पटनायक सहित अनेक अर्थशास्त्री नोटबंदी के नकारात्मक असर पर बोल चुके हैं. दिलचस्प है कि सरकार के अपने अर्थशास्त्री इनके सवालों पर खामोश हैं. रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे रघुराम राजन विमुद्रीकरण-नोटबंदी को कालेधन पर अंकुश की रणनीति के तौर पर पहले से खारिज करते रहे हैं. एनपीए में पिचकती बैंकिंग-व्यवस्था को नोटबंदी से कुछ मदद जरूर मिल सकती है. कुछ काला धन पर पकड़ में आ सकता है. लेकिन उस पर निर्णायक अंकुश तो बिल्कुल ही संभव नहीं.
सन् 1978 में 1000, 5000 और 10000 के नोट चंद लोगों के पास हुआ करते थे, जिन्हें मोरारजी की सरकार ने बंद किया था. उससे बिल्कुल अलग आज 500 और 1000 रूपये के नोट ही सर्वाधिक लोक-प्रचलित नोट हैं, जिन्हें आज बंद किया गया है. इससे कुल 15 लाख करोड़ रूपये के नोट चलन से बाहर हुए. कुल मौद्रिक नोटों में ये 86 फीसद हैं. इनके बदले बैंकों से इस वक्त रोजाना बामुश्किल 10-12 हजार करोड़ के नोटों का ही हस्तानांतरण हो रहा है. नोट तो ठीक-ठाक संख्या में छपे हैं पर एटीएम मशीनों का पुनर्संयोजन नहीं किया गया. निकासी मुद्रा की सीमा बहुत कम रखी गयी है. इससे भारी मौद्रिक तंगी पिछले कई दिनों से कायम है. अर्थतंत्र और आम जनजीवन को इससे करारा धक्का लगना लाजिमी है.
हिन्दी के कुछ ‘चीखू( टीवी) चैनलों’ और ‘भक्तजनों’ को छोड़कर सभी प्रमुख आर्थिक विशेषज्ञ मान रहे हैं कि सरकार ने जनता को बुरी तरह निराश और परेशान किया है. इससे न तो कालेधन पर अंकुश लगेगा न तो अर्थव्यवस्था को उछाल मिलेगी, उल्टे समस्या बढ़ेगी. जहां तक विपक्ष का सवाल है, उसने भी देश की आम जनता को निराश किया है. इस तरह के अभूतपूर्व संकट पर जिस तरह का राजनीतिक विवेक और साहस उसे साझा तौर पर दिखाना चाहिये था, वह न तो संसद में दिख रहा है, न सड़क पर.
-लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और राज्यसभा टीवी (RSTV) के कार्यकारी संपादक रह चुके हैं. संपर्क- urmilesh218@gmail.com नेतृत्व में आस्था जारी रखिए पासवान जी, शुभकामनाएं
हाजीपुर वाया पटना होते हुए एक खबर दिल्ली पहुंची है. खबर यह है कि ‘हिन्दु ह्रदय सम्राट’ नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में आस्था रखने वाले और उनके मंत्रीमंडल में शामिल केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने कैशलेस को बढ़ावा देने के लिए अपने कार्ड से हाजीपुर में रविवार को खरीददारी की. उन्होंने एक दुकान से मिठाई खरीदी (जाहिर है अच्छी दुकान में गए होंगे), एक गारमेंट के दुकान से कपड़े खरीदे और एक जगह चाय भी पी. यह सारा कार्यक्रम उन्होंने हाजीपुर के शहरी क्षेत्र में किया. ऐसा कर उन्होंने कैशलेस सिस्टम को बढ़ावा दिया.
जाहिर है कि ऐसा कर उन्होंने अपनी सरकार के नेतृत्व में जो कि मोदी जी हैं, आस्था रखते हुए अपना फर्ज निभाया. खबर भी लग गई, फोटो भी छप गया. देखिए मैं भी खबर लिख रहा हूं. लेकिन अगर मैं पटना में होता तो पासवान जी से यह सवाल जरूर पूछता कि क्या वो अपने संसदीय क्षेत्र के, जो कि काफी लंबा-चौड़ा है; किसी ग्रामीण इलाके में गए? क्या उन्होंने गांव के बाजारों का दौरा किया और यह समझने की कोशिश की कि वहां के लोग और दुकानदार किस मुश्किल से जूझ रहे हैं? पासवान द्वारा कैशलेस को बढ़ावा देने का अभियान सफल तब होता जब वो यह खरीददारी ग्रामीण क्षेत्र में करते. वह किसी गांव के बाजार से मिठाई खरीदते, किसी गांव के बाजार से कपड़े खरीदते और किसी हाट पर अचानक रुक कर चाय पीते. वरना केंद्रीय मंत्री को जब किसी मुद्दे को प्रचारित करना हो तो वह सब कैसे होता है, ये सबको पता है.
केंद्रीय मंत्री को पता होता है कि किस मिठाई की दुकान पर कार्ड स्वैप होता है औऱ कौन सा चाय वाला पेटीएम से पैसे लेता है. आखिर उनके पीछे चापलूसों की फौज इसीलिए तो घूमती है, जो जाकर पहले ही अपने ‘पसंदीदा’ दुकान वाले को ताकीद कर देता है कि वो तैयार रहे, मशीन-वशीन मंगवा ले, दुकान की सफाई करवा दें, आज उसके ‘भाग्य’ खुलने वाले हैं, आज उनके यहां केंद्रीय मंत्री का आगमन होने वाला है. पासवान उसी वर्ग से ताल्लुक रखते हैं जिसको इस कैशलेस से सबसे ज्यादा दिक्कत है. अच्छा होता कि वह उसकी सही आवाज बनते. लेकिन अब पासवान से इस समाज को भी कोई उम्मीद नहीं रह गई है. नेतृत्व में आस्था जारी रखिए पासवान जी. शुभकामनाएं। भारतीय लोकतंत्र: एक राजनीति कारोबार
भारतीय राजनीति में विभिन्न क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का जन्म यूं ही नहीं हुआ, इसका कारण केवल और केवल यह है कि ब्राह्मणवाद के चलते पहले से ही वर्चस्वशाली राजनीतिक पार्टियां अलोकतांत्रिक होती जा रही हैं. इन वर्चस्वशाली राजनीतिक पार्टियों के गिरते राजनीतिक आचरण के कारण विभिन्न क्षेत्रीय दलों का न केवल जन्म हुआ अपितु उनमें से कई पार्टियां सत्ता तक भी पहुंचीं. वर्तमान राजनीतिक फलक इस बात का साक्षी है.
किंतु पिछले छह/सात दशक में पहली बार राजनीतिक अस्मिता खतरे से बाहर नजर नहीं आ रही. राजनीतिक अस्मिता ही नहीं, जातीय अस्मिता, क्षेत्रीय अस्मिता, परिवार की या कोई और… कुछ भी तो सुरक्षित नहीं है. आज के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रीय राजनीति के पटल पर न केवल अस्मिता की राजनीति को धता बता “आकांक्षा” की राजनीति को खड़ा करने का सफल प्रयास किया है, अपितु राजनीतिक अस्मिता/राज-धर्म को रसातल में पहुंचा दिया है. इसका अफसोस आज तो नहीं, आगे आने वाले दिनों में मोदी के चहेतों को जरूर होगा, इसमें दो राय नहीं. भाजपा के सत्ता में आने के लगभग दो साल से ज्यादा के शासन में हुए राज्यों के चुनावों में भाजपा की जो फजीहत हुई है, इसके चलते भाजपा और इसके पैत्रिक समर्थक दलों और आर आर एस को यह तो सोचना ही होगा कि लोकसभा के चुनावों में भाजपा के हक में हुआ बदलाव महज एक बार की बात है या फिर स्थाई.
असल में सबसे बड़ी चिंता यह जताई जा रही है कि पिछ्ले कुछ दशकों से भारतीय राजनीति एक रोजगार का हिस्सा बनती जा रही है. इसका जीता जागता प्रमाण है… भारतीय राजनीति में जड़ जमाता परिवारवाद/वंशवाद. दरअसल वंशवाद अथवा परिवारवाद शासन की वह प्रणाली है जिसमें एक ही परिवार, वंश या समूह से एक के बाद एक कई शासक बनते चले जाते हैं. यह भाई-भतीजावाद की परिपाटी लोकतंत्र के लिए खतरनाक तो है ही, अधिनायकवाद को जन्म देने वाली हो सकती है. सच तो ये है कि लोकतन्त्र में वंशवाद के लिये कोई स्थान नहीं है किन्तु भारत में लोकतंत्र की शुरुआत से ही परिवारवाद की राजनीति हावी रही. प्रतिक्रियात्मक दृष्टिकोण से देखा जाए तो वंशवाद/परिवारवाद निम्न स्तर का असंवैधानिक आरक्षण है. इसे राजतंत्र/एकतंत्र का एक सुधरा हुआ रूप कहा जा सकता है. वंशवाद, आधुनिक राजनैतिक सिद्धांतों एवं प्रगतिशीलता के विरुद्ध है.
कहना न होगा कि आकांक्षा हो या फिर जातीय/क्षेत्रीय अस्मिता, दोनों ही भावनात्मक छोर की ओर ले जाती हैं. यद्यपि अस्मिता की राजनीति लोगों को ज्यादा गुणकारी लगती हैं, तथापि भारत में जातिवाद और क्षेत्रवाद का भाव लोगों को लामबन्द कर देते हैं. और वोटिंग के समय मतदाता देश तो क्या, यहां तक कि अपने निजी और सामाजिक हितों को भी ताक पर उठाकर रख देते हैं. इसीलिए जैसे-जैसे कांग्रेस राष्ट्रीय दल के रूप में कमजोर होती गई, क्षेत्रीय और जातीय दलों का उभार होने लगा. राज्य से निकलकर क्षेत्रीय दल राजनीतिक गठबंधन के चलते केंद्र की सत्ता में तक पहुंच गए. इस प्रकार कई जातीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का सशक्तीकरण हुआ… यह कोई बुरी बात भी नहीं है क्योंकि राजनीतिक समाज के निचले तबके को रास आने लगी… किंतु दुख की बात तो ये है कि समाज के निचले वर्ग की समस्याएं जहां की तहां हैं… क्योंकि यह राष्ट्रीय दलों की नाकामी रही वे क्षेत्र और जाति की अस्मिता को उचित प्रतिनिधित्व देने में नाकाम रहे. दलित और पिछड़े वर्ग से आए नेता अपने ऐशो-आराम की जिन्दगी जीने के जुगाड़ में मशगूल हैं. कहा जा सकता है कि क्षेत्रीय और जातीय दलों के उभार का सामाजिक स्तर पर इतना तो फायदा तो हुआ कि अब निचली माने वाली जातियां बिना राजनीतिक संरक्षण के भी सरकार के खिलाफ अपने अधिकारों के लिए लामबन्द होने लगी हैं. लेकिन शासन के स्तर पर इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि निचली माने वाली जातियों के राजनेता सत्ता के विमर्श और सामाजिक विकास से जैसे बाहर हो गए… कारण कि वे अपने वर्चस्वशाली राजनीतिक आकाओं के सामने मुंह न खोलने को बाध्य हैं. उसकी कीमत पूरे दलित और पिछड़े समाज को चुकानी पड़ रही है. यहां तक कि उन लोगों को भी जिनके भले के लिए इस राजनीति का दावा किया जा रहा था.
हैरत की बात है कि आम मतदाता सत्तारूढ़ दलों और गठबंधन की सरकारों से छुटकारा चाहती है. किंतु धर्म और असामाजिक गतिविधियों से जुड़े लोग अपने मंतव्य को साधने के लिए सामाजिक हितों को सूली पर चढ़ा देते हैं. आज आम मतदाता केवल इस बात से संतुष्ट होने को तैयार नहीं है कि वोट मांगने वाला उसकी जाति, धर्म या क्षेत्र का है. लेकिन राजनीतिक गुंडातत्व जाति, धर्म या क्षेत्र को ज्यादा महत्त्व देता है. आम मतदाता को लगता है कि अस्मिता की राजनीति भूमिगत हो गई है.
मतदाता अस्मिता की राजनीति की अपील करता है. वह परिवर्तन के लिए प्रयोग करने को तैयार है. शायद इसलिए कि अस्मिता की राजनीति दिन प्रति दिन खत्म होती जा रही है. आज ये कहना गलत नहीं होगा कि अस्मिता की राजनीति खतरे में है. राजनीति का चक्र अब विकास के नाम पर घूमता हुआ लग रहा है. अस्मिता की राजनीति के साथ ही गठबंधन की राजनीति के दिन भी लदते दिख रहे हैं. उत्तर प्रदेश, पंजाब और अन्य प्रदेशों में होने वाले चुनावों के परिणामों से शायद इसके संकेत देखने को भी मिल जाए.
कहना अतिशयोक्ति न होगा कि भारतीय लोकतंत्र में राजनीति ने एक कारोबार का रूप ले लिया है. राजनीति के गलियारों में परिवारवाद के खिलाफ कितनी ही भी हाय तौबा की जाती हो लेकिन भारतीय राजनीति के व्यवहार/आचरण से परिवारवाद दिन पर दिन बढ़ता ही जा रहा है. परिवारवाद की राजनीति से कोई भी राजनीतिक दल अछूता हो, ऐसा नहीं है.
नेहरू परिवार की बेशक आज जड़े उखड़ती दिख रही हैं, किंतु दूसरे राजनीतिक दल जो आज तक नेहरू परिवार पर परिवारवाद की राजनीति का आरोप लगाते आ रहे थे, परिवारवाद की राजनीति का खुला खेल रहे हैं. अब चुनाव लोकसभा के हों अथवा राज्यों की विधानसभाओं के धरती-पकड़ नेता अपने परिवार के किसी न किसी सदस्य को आगे लाने में लगे रहते हैं. 2014 के आम चुनावों में कम से कम 15/16 राजनीतिक परिवारों के एक या उससे अधिक सदस्य मैदान में थे. इससे साफ है कि राजनीतिक घरानों के युवा/युवतियां उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी गैर राजनीतिक प्रशासनिक और अन्य क्षेत्रों में विशेषज्ञ बनने के चेष्टा न करके समृद्ध इलाके की राजनीति में अपने परिवार का वर्चस्व बनाये रखने के लिए राजनीतिक व्यवस्था का अंग बनने/बनाए जाने की राह पर देखे जा सकते हैं. इसी कारण के चलते दशकों से कोई जनप्रिय राजनेता जमीन पर नहीं उभर सका.
सच तो ये है आज कोई लाल बहादुर शास्त्री और विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसे नेता राजनीतिक मैदान में जोर अजमाइश करें भी तो उनकी जमानत जब्त होना इसलिए लाजिम है क्योंकि भारतीय राजनीति में धर्म और धर्म के नाम पर गुण्डागर्दी ने अपने पांव जमा लिए है. हालाँकि सुप्रीम कोर्ट के अनुसार धर्म एक व्यक्तिगत मान्यता का विषय है किंतु धर्म के नाम पर वोट मांगना एक अपराध है. किंतु फिर भी राजनीतिक पार्टियां किसी न किसी बहाने धर्म को चुनाव मुद्दा बना ही लेती हैं. चुनाव आयोग भी इस बारे में कोई खास कदम नहीं उठा पाता. कारण है कि आयोग में भी विभिन्न मत-मतांतरों के लोग ही नियुक्त होते हैं.
नई बात जो हुई है वो है कि नेहरू परिवार से समाज के अनुसूचित/जनजातियों और तथाकथित पिछड़े वर्ग से आए राजनेताओं ने भी परिवारवाद की राजनीति में सुचारू रूप से भागेदारी निभाने का हुनर सीख लिया है. उदाहरण के लिए लालू प्रसाद यादव, सिंधिया परिवार, मुलायम सिंह यादव, रामविलास पासवान, देवगौडा, महाराष्ट्र के पंवार, पंजाब के अमरिन्दर सिंह, पंजाब के ही प्रकाश सिंह बादल, छत्तीसगढ़ से अजित सिंह जोगी, मध्य प्रदेश से दिग्विजय सिंह, हरियाणा से ओम प्रकाश चौटाला, हरियाणा से ही हुड्डा परिवार, उत्तराखण्ड से हेमवती नन्दन बहुगुणा, रावत परिवार और करूणानिधि आदि नेताओं की परिवारवादी राजनीति दशकों से चल रही है. कुछ परिवार में तो राजनीति करने लायक जितने भी सदस्य हैं वे सभी किसी न किसी पद पर हैं. कुछ परिवारों ने तो 2-2 दलों में अपनी पैठ बना रखी है और हवा के रूख के हिसाब से अपने भविष्य की राजनीति को तय करते हैं. नेहरू परिवार की बहू और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी कांग्रेस मे उनके ही परिवार की बहू मेनका गांधी (और उसका बेटा) अपनी जेठानी से अलग भाजपा की राजनीति करती हैं. यह और कुछ नहीं सत्ता में बने रहने का एक नायाब तरीका है. इधर रहो या उधर, रहो सत्ता में. इससे अच्छा और कोई कारोबार कम से कम भारत में तो और कुछ हो ही नहीं सकता.
मुलायम परिवार और लालू प्रसाद के परिवार के रिश्तेदार तक किसी न किसी राजनीतिक पद पर हैं. इस बार रामविलास पासवान ने भी अपने बेटे को मैदान में उतारा. उत्तर प्रदेश के गत विधानसभा चुनाव में सपा के सत्तारूढ़ होने पर मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश मुख्यमंत्री बनाए गये. लालू खुद लड़ न सके तो पत्नी को उतारा क्योंकि बिहार के बहुचर्चित चारा घोटाले में सजा के कारण राजद के प्रमुख लालू प्रसाद यादव की लोकसभा की सदस्यता समाप्त हो गयी थी. बिहार में इस बार नितीश कुमार की सरकार बनी तो लालू प्रसाद के बेटे के लिए उप-मुख्यमंत्री का पद इजाद किया गया.
शरद पवार राज्यसभा में पहुंचे तो उनकी पुत्री सुप्रिया सुले बारामती से पार्टी की उम्मीदवार रहीं. उनके भतीजे अजीत पंवार पहले से ही मंत्री हैं. इसी तरह पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिन्दर सिंह अमृतसर में कांग्रेस के उम्मीदवार थे तो उनकी पत्नी परनीत कौर पटियाला से पार्टी की प्रत्याशी थीं. एक ईमानदार राजनेता चौधरी चरण सिंह के बेटे चौधरी अजीत सिंह….अब अजीत सिंह के बेटे जयंत सिंह… न जाने कितने ही ऐसे उदाहरण हैं, जो राजनीति का हिस्सा न होकर कारोबार का हिस्सा हो गया है. हाँ! बसपा की मायवती अभी तक इस आरोप से बरी ही मानी जाएंगी…. उन्होंने अपने परिवार के किसी भी सदस्य को राजनीतिक मैदान में नहीं उतारा.
भाजपा की राजनीतिक ताकत बढ़ी तो उसने भी परिवारवाद का खेल खेलना शुरू कर दिया. अब भाजपा के शीर्ष नेता भी अपने चहेते और बेटा-बेटियों को राजनीति के मैदान में उतारने में पीछे नहीं हैं. वैसे तो समूची भाजपा और आर एस एस जैसे बड़े परिवार का कोई घटक आर एस एस मुखिया के खिलाफ किसी तर्कसंगत बात को भी नहीं पूछ सकते ……मोदी जी तक भी नहीं.
और तो और जिस महाराष्ट्र में अस्मिता की राजनीति का एक लम्बा दौर चला किंतु बाल ठाकरे और शरद पवार परिवारवाद की राजनीति के अगुआ बन गए हैं. नतीजा यह हुआ कि परिवार और दल दोनों टूट गए. उद्धव ठाकरे हों या राज ठाकरे राजनीति में उनका अपना अर्जित किया हुआ कुछ नहीं है. दोनों बाल ठाकरे की राजनीतिक विरासत पर दावा कर रहे हैं.
हरियाणा तो न जाने कब से अपने राजनीति ‘लालों’ के लिए जाना जाता है. तीनों लाल, यद्यपि देवीलाल, बंसीलाल और भजनलाल अब इस दुनिया में नहीं हैं, तथापि इनकी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए इनके परिवार मौजूद हैं.
देवीलाल की तो चौथी पीढ़ी राजनीति से जुड़ी है. देवीलाल और बंसी लाल की पहचान जाट नेता के रूप में रही तो भजनलाल गैर जाट नेता के रूप में स्थापित रहे. सिद्धांत और विचारधारा जैसी चीजों का राजनीति में प्रवेश नितांत वर्जित है. इसलिए राजनीतिक कारोबार को इस बात में शर्मिंदा होने जैसी कोई वजह नजर नहीं आती. जनता के रुझान को ध्यान में रखते हुए कोई भी राजनेता किसी भी पार्टी में जा सकता है. आजके जनसेवकों/राजनेताओं का यह आचरण किसी से छुपा तो नहीं है? ऐसे हालातों को देखते हुए अब कौन कह सकता है कि आज की राजनीति किसी “कारोबार” से कम है… यदि कोई कहता है कि नहीं… तो सत्ता पाने की इतनी मारामारी क्यों? तमाम के तमाम बड़े राजनीतिक दल राजनीति और धंधा एक साथ करते हैं. माननीय मुलायम सिंह के घर में मचा घमासान इस सच का सटीक प्रमाण है कि लोकतंत्र की राजनीति एक रोजगार बन गई है.
स्मरण रहे कि एक समय हुआ करता था कि जब देश की लोकसभा में 75% सांसद ब्राह्मण और बनिया वर्ग के हुआ करते थे, आज लगभग 60% सांसद अनुसूचित /जन जाति और पिछड़े वर्ग से चुनकर लोकसभा की शोभा बढ़ा रहे हैं. किंतु सांसद या मंत्री बनते ही वो ये भूल जाते हैं कि भारतीय समाज के दलित/दमित वर्ग के लिए उनका कोई दायित्व भी है. भारतीय समाज के दलित/दमित वर्ग की कमोबेश आज भी वो ही हालत है जो विगत में थी…..कुछ मोडरेट जरूर हो गई है. भेदभाव के नए तौर-तरीके… अत्याचार के तौर-तरीकों में आया नयापन राजनेताओं को “विकास” नजर आता है. आज के भारत में भाजपा सरकार के चलते जितना हिंसक अत्याचार दलितों और अल्पसंख्यकों पर हो रहा है, शायद ही कभी पहले इस दर्जे की क्रूर क्रियाएं हुई हों. किंतु सत्ता पक्ष में बैठे इस वर्ग से आए सांसदों और मंत्रियों की जुबान को जैसे लकवा मार गया हो, किसी का भी मुंह नहीं खुला. बाबा साहेब अम्बेडकर ने ठीक ही कहा था कि पालतू कुत्ता मालिक की सोटी खाकर भी केवल पूंछ ही हिलाता है… भौंक सकने की ताकत वह खो चुका होता है.
संविधान सभा में दिए गए अपने भाषण में डा. अम्बेडकर ने जिस सामाजिक लोकतंत्र की कल्पना की थी, उसे आज पूरी तरह से भुला दिया गया है. कहना अतिशयोक्ति न होगा कि आज देश की राजनीति पर भाजपा की पैत्रिक संस्था आर एस एस जैसी जड़ यानी परम्परागत संस्कृतिवादी संस्थाओं का कब्जा है. तर्क इनकी समझ से परे है और आस्था इनके खून में. संस्कृति और धर्म की आड़ में समाज विरोधी राजनीति करना इनकी आदत में सुमार है. यद्यपि समाज का बहुसंख्यक वर्ग इनकी विचारधारा को पसंद नहीं करता किंतु आज का टी आर पी पसंद मीडिया और प्रचार के दूसरे माध्यम इनकी राजनीति को शिखर पर ही रखते हैं जिसके चलते धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक मसले प्राय: इनके पक्ष में ही खड़े हो जाते हैं. धर्म और जाति केन्द्रित राजनीति भारतीय समाज के लिए एक कलंक ही है.
लेकिन लोकतंत्र में संख्याबल के जो मायने है… उसका जायजा इस बात से लिया जा सकता है कि यदि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक ओर 51 गधे और दूसरी ओर 49 घोड़े जीतकर लोकसभा में पहुँचते हैं तो सरकार 51 गधों की ही बनेगी. इस तर्क के मद्देनजर समाज का दलित/दमित वर्ग अपने आप को वर्चस्वशाली वर्गों जिनपर सवर्णों का कब्जा है और जिनका न्याय, समानता, वर्गहीन समाज और समग्र विकास में साझेदारी जैसे कामों में कोई विश्वास नहीं होता, के साथ स्वार्थपूर्ण गठबन्धन कर उनके हवाले कर देता है. और दलित और दमित समाज के तथाकथित नेता जीतने के बाद उस दलित/दमित समाज की अनदेखी कर देता है जिसके भले की दुहाई देकर वो सत्ताशीन होता है. ऐसे में विचार और सामाजिक परिवर्तन की राजनीति केवल एक सवाल बनकर रह जाती है.
लोकतंत्र में जनता को निर्णायक शक्ति माना जाता है, किंतु लोकतंत्र में जनता को अपना अधिकार दिखाने का हक पांच साल में केवल एक दिन मिलता है और राजनेताओं को जनता को लूटने का अधिकार पूरे पाँच साल के लिए मिल जाता है. अब कोई तो बताए कि लोकतंत्र में राजनीति की अस्मिता जनसेवक की नहीं….एक कारोबारी की है. यहाँ यह कहना भी तर्कसंगत ही होगा कि एक बार सत्ता में आने के बाद राजनेता जिस प्रकार जनता के धन का दुरुपयोग करते हैं…. किसी से छुपे नहीं हैं. कोई नेता अपनी औलाद को नोटों के बिस्तर पर सुलाता है, कोई अपने बेटे के द्वारा गलत पार्किंग कराने से रोकने पर पुलिस के कांस्टेबिलों को सस्पेंड करा देता है तो राजसत्ता टी. वी. चेनल पर सचाई दिखाने के लिए किसी चेनल के प्रसारण पर एक दिन के लिए रोक लगा देता है. मेरी समझ से परे है कि एनडीटीवी का प्रसारण नौ नवम्बर को ही बन्द करने के पीछे सरकार का क्या मकसद रहा है. क्या संघ परिवार के किसी महापुरुष का जन्म दिन है उस दिन? क्या बात है कि जो टीवी चैनल सरकारी हिसाब से कुछ सच्ची… कुछ झूंठी खबरें दिखाए, उसकी वाह-वाह और जो मरने मारने की खबरों का सच उजागर करे… उसका प्रसारण बन्द. क्या खूब है लोकतंत्र की कारोबारी राजनीति. आज के इस राजनीतिक आचरण को आप क्या कहेंगे? क्या इसे अघोषित आपातकाल की संज्ञा देना गलत होगा?
दलित महिला की जलती चिता को उच्च जाति के लोगों ने मिट्टी डालकर बुझाया
झुंझुनू। राजस्थान के झुंझुनू स्थित सौती गांव में एक दलित परिवार को अपनी मृत मां के शव का दाह संस्कार तक नहीं करने दिया. इतना ही नहीं दाह संस्कार करने से रोकने के लिए गांव के ही कुछ लोगों ने महिला की चिता पर मिट्टी डालकर बुझा दिया. वहीं मृतक महिला के परिजनों के साथ मारपीट तक कर डाली, जिससे गांव में तनाव का माहौल हो गया.
गांव के उच्च जाति के लोगों की गुंडई का शिकार हुए दलित परिवार के लोगों ने जिला कलेक्टर और एसपी के पास पहुंचकर गुहार लगाई. इसके बाद प्रशासन और पुलिस की मौजूदगी में दलित वृद्धा का दाह संस्कार हो पाया. गांव के महेंद्र और लीलाधर मेघवाल की मां का देहांत हो गया था. परिजन शव को लेकर गांव के ही जोहड़ में पहुंचे और यहां पर चिता को मुखाग्नि दी.
इसके तुरंत बाद गांव के जाट समाज के लोग जोहड़ में पहुंच गए और उन्होंने दाह संस्कार करने से मना कर दिया. गुंडई दिखाते हुए दलित समाज के लोगों से मारपीट करने लगे. फावड़ों से मिट्टी डालकर जलती हुई चिता को बुझा दिया. इसके बाद गांव में माहौल काफी तनावपूर्ण हो गया.
इसके बाद दलित समाज के लोग झुंझनू मुख्यालय स्थित कलेक्ट्रेट पर पहुंचे और प्रदर्शन कर जिला कलेक्टर को पूरे प्रकरण से अवगत कराया. कलेक्टर के निर्देश पर पुलिस को घटना स्थल पर भेजा गया, जिसके बाद पुलिस की मौजूदगी में वृद्धा का दाह संस्कार किया गया. गांव के महिपाल, राजेंद्र, जुगलाल, वीरेंद्र, प्रकाश सहित ग्रामीणों व महिलाओं पर आरोप लगाया गया है.
सौती गांव में दलित परिवारों की संख्या काफी है. दलितों के पास गांव श्मशान भूमि नहीं है. पहले तो गांव के दलित परिवार बीहड़ में दाह संस्कार किया करते थे. इसके बाद गांव के जोहड़ में दाह संस्कार करना शुरू कर दिया. नसबंदी से लेकर नोटबंदी तक- वोट बैंक की प्रयोगशाला बन चुकी है देश की जनता
देशवाशियों को “बंदी” को सहन करना जैसे उनकी आदत में सुमार हो चुका है. नसबंदी, नशाबंदी, नकलबंदी, भारतबंदी और आजकल नोटबंदी, जिसने देश के अब तक के सारे बंदियों और बंदों को पीछे धकेल दिया है. देश का दुर्गभाग्य कहा जाये या अक्लमंदी, जब भी देश में किसी भी प्रकार की बंदी हुई है, उसी का सबसे ज्यादा उल्लंघन या दुरूपयोग हुआ है. जैसे आजकल नोटबंदी के बाद भारी मात्रा में नये नोटों की काला बाजारी हो रही है. जिस मकसद से नोटबंदी की गयी थी, कि काला धन बाहर आयेगा और लोगों के खातों में 15 लाख न सही15 हजार तो जमा हो ही जायेंगे. मगर अब भी प्रधानमंत्री जी के 50 दिन का वायदा पूरा भी नहीं हुआ है. गुलाबी नोटों को काला करने का धंधा युद्ध स्तर पर पूरे देश में शुरू हो गया है. एक मछली पूरे तालाब को गंदा करती है कहावत आज सार्थक प्रतीत होती है.
काली कमाई के चंद गुनाहगारों के फेर में आज पूरा देश जैसे खड़े होने की सजा काट रहा है. चाहे बीमार हो या बूढ़ा, महिला हो या मजदूर बैंकों या एटीएम के सामने घंटों योगा करने को मजबूर नहीं तो क्या शौक से खड़ा है? भारत की जनता ने सिकंदर से लेकर गजनवी, हूणों से लेकर मुगलों, गोरखाओं से लेकर पुर्तगालियों और अंत में अंग्रेजों के जुल्मों को सहा है. भुखमरी को सहा है, अकाल को सहा है, सुनामी तथा भूकंप की त्रासदी को सहा है. इतना ही नहीं लोकतांत्रिक देश ने 1975 में आपातकाल के जख्मों को भी सह-सह कर देश के आन-मान और सम्मान को बचाया है. मगर ये कुर्बानी सिर्फ वोटों में तब्दील होकर दफन होती रही है.
अगर हम तीन-चार सौ सालों की गुलामी की जंजीरों को सहन कर सकते हैं तो मोदी जी के 50 दिनों की वचनबद्धता को निभाने में क्यों पीछे रहें! अगर 50 दिनों के बाद खुशनुमा अहसास और अच्छे दिनों की बहार आने वाली है तो ये कढ़वी घूंट हर देशवाशी को पीनी ही चाहिए. परिवर्तन प्रकृति का नियम है.
प्राचीनकाल में भी शासकों ने कई क्रांतिकारी परिवर्तन के फैसले लिए हैं, कुछ सफल तो कुछ विफल भी रहे है. मुद्रा परिवर्तन का जब भी जिक्र आयेगा इतिहास में मुहम्मद बिन तुगलक का नाम भी जरूर आयेगा. गुलाम भारत में कुछ “बंद” तो भारत की तस्वीर और संस्कृति(मान्यतायें) ही बदल गये. जिनमें सति प्रथा का अंत, बालविवाह का अंत, विधवा विवाह को मान्यता, बलिप्रथा का अंत, साथ ही ठगी प्रथा आदि का अंत. तब देश में लोकतंत्र भी नहीं था और वोटों की चिंता भी नहीं थी. आजादी के बाद संवैधानिक भारत में इन 70 वर्षों में हम पूर्ण रूप से एक भी ऐसी चीज का अंत नहीं कर पाये जो समाज और देश की प्रगति में बाधा हो! संपत्ति का मूल अधिकार समाप्त होने के बाद भी काला धन किस प्रकार जमा हुआ क्या सरकारें अनजान थी? इन 70 सालों में क्या सिर्फ वोट बैंक ही नजर आया नोट बैंक की ओर नजरें फेर दी? अभी भी नोट बंदी देश हित या गरीब हित में होगी तभी पता चलेगा जब इसका चुनावीकरण होगा. भारत अहिंसा परमो धर्मः और वसुधैव कुटम्बकम का राष्ट्र है. इसलिए चाहे आतंकी देश पाकिस्तान हो या काला बाजारी, रिश्वतखोरी, बलात्कारी, शोषणकारी, और भ्रष्टाचार के देशी नायक जिनमें 2 जी, राष्ट्रमंडल खेल,कोल ब्लाक,स्टांप घोटाला,बैंक घोटाला, आईपीएल घोटाला और वर्तमान में 9 हजार करोड़ की बैंक राशि को हजम कर विजय माल्या ने आज देश की जनता को जैसे फुटपाथ पर लाकर खडा़ कर दिया है.फिर भी सभी हमारे कुटंब के मेहमान बने हुए हैं और आगे भी ऐसे कितने सदस्य इस कुटंब में जुड़ते जायेंगे हैरानी की कोई बात नहीं.
लगता है देश भक्ति 15 अगस्त 1947 को आजादी के बाद लगभग खत्म हो गयी. आजादी के बाद पार्टी भक्ति, व्यक्ति भक्ति और सत्ता भक्ति ही राजनीति की प्रमुखता बन चुकी है. बड़ी योजनाओं और क्रांतिकारी परिवर्तन की ओर जरूर विधेयक और कानून पारित हुए हैं मगर वो सिर्फ और सिर्फ वोट की राजनीति का सहारा बनकर रह गयी हैं. शिक्षा समाज के विकास का अहम अंग है मगर आज हम शतप्रतिशत देश को साक्षर नहीं बना सके हैं. रोजगार गारंटी के रूप में मनरेगा लाये वह भी मन का रोग बन कर ही रह गया. शिक्षा का अधिकार अधिनियम का लक्ष्य अभी भी अधूरा ही है. खाद्य सुरक्षा अधिनियम भी लाये हैं मगर देश में भूख से मरने वालों की कमी नहीं है. लू से मरने वालों, ठंड से मरने वालों की कोई गिनती नहीं है. इनको हमने सायद गर्मी और ठंड के पैमाने मान लिए है. अर्थात जिस वर्ष लू से ज्यादा लोग मरें कहें उस साल गर्मी भयानक थी और जिस वर्ष ठंड से ज्यादा जानें जायें कहें कि अमुक वर्ष तापमान सबसे नीचले स्तर पर था. वही इस वक्त भी नोटबंदी के कारण हो रहा है. 1975 के इमरजेंसी में भी गरीब ही ज्यादातर जबरदस्ती नसबंदी के शिकार हुए थे.
इस मापदण्ड को अगर हम बंद कर सकें तो तब हम गर्व से वयां कर सकते हैं कि देश अब मंत्रों से यत्रों की ओर अर्थात एनालॉग से डिजिटल की ओर बड़ रहा है. कहने को तो आसान है मेरा देश बदल रहा है मगर इस बदलाव में हमेशा बलि का बकरा गरीब ही बना है. आजादी के बाद के सब नीतियों का विश्लेषण किया जाय तो यही निष्कर्ष निकलता है कि गरीबी मिटी नहीं, गरीब जरूर मिट रहे हैं, कृषि क्षेत्र में बेहतर बदलाव नहीं हुआ इसलिए किसान आत्महत्या करते रहे. गरीबों की हालत गुलामी के दौर जैसी है. भिखारी तब भी थे और आज भी हैं, कुछ लोगों के पास छत तब भी नहीं थी आज भी नहीं है, कुपोषण तब भी था और आज भी है. कुरीतियां तब भी थीं और आज भी है, भेदभाव असमानता आजादी से पहले भी थी और आज भी है, तो क्या बदला है इन 70 वर्षों में? सिर्फ तकनीक जरूर बदली है, मगर गरीबों, दलितों की तकदीर नहीं बदली. लोग नशबंदी के दौर में मरे थे और आज नोट बंदी के दौर में मर रहे हैं. ये तस्वीर अवश्य ही बदलनी चाहिए. पक्ष तथा विपक्ष के सत्ता के शतरंज के खेल में मात हमेशा देश की जनता को ही मिलती है.
अंधविश्वासों और कर्मकांडों में सिमटे रहना भारतीयों की विशेषता
कल क्रिस्टोफर हिचन्स की विदाई तिथि गुजरी है. रेशनल और वैज्ञानिक सोच का झंडा बुलंद करने के लिए उनका संघर्ष यादगार रहा है. दुर्भाग्य से भारतीय समाज में ऐसे लोग बहुत कम हुए हैं और हुए भी हैं तो उनका आम जन से रिश्ता ही नहीं बनने दिया गया है. भारतीय समाज इतना अंधविश्वासी, कुपढ़ और आत्मघाती है कि उसे बुद्धि ज्ञान और नयेपन से डर लगता है. पुराने अंधविश्वासों और कर्मकांडों की खोल में सिमटे रहना और भविष्य को अतीत की राख में दबाते रहना भारत की विशेषता है.
इस मुल्क में परसाई जैसे आलोचक, दाभोलकर जैसे रेशनलिस्ट या प्राचीन चार्वाकों जैसे तार्किकों नास्तिकों की परंपरा ही नहीं बन पाती. हर पीढ़ी में आसाराम, निर्मल बाबा और ओशो जैसे पोंगा पंडित खड़े हो जाते हैं और बुद्ध, चार्वाक, लोकायतों की क्रांति पर मिट्टी डालकर चले जाते हैं. यूरोप इस मामले में भाग्यशाली रहा है. वहां आरम्भ से ही भौतिकवादियों और नास्तिकों तार्किकों की लंबी और समृद्ध परम्परा रही हैं. उसी के परिणाम में वहां पुनर्जागरण और विज्ञानवाद सहित आधुनिकता आई है, जिसका लाभ भारत भी लेता है लेकिन उसे स्वीकार करने में झिझकता है. विज्ञान, तकनीक, शिक्षा, चिकित्सा, शासन-प्रशासन, लोकतंत्र, सभ्यता, भाषा-वूषा और नैतिकता सब यूरोप ने भारत को सिखाई है. उसके बिना ये मुल्क एक मिनट खड़ा नहीं रह सकता लेकिन इसके बावजूद इतना नैतिक साहस नहीं कि इन तथ्यों को स्वीकार कर लें.
इसे स्वीकार करना तो दूर उल्टा इन विज्ञान और तकनीक का इस्तेमाल करके इसी विज्ञान और सभ्यता का विरोध किया जाता है. बच्चों को जिस चिकित्सा, शिक्षा और सुविधा की सुरक्षा में पैदा किया जाता है और पाला जाता है, उसका विरोध करते हुये इन्हीं बच्चों को विज्ञान के विरुद्ध खड़ा किया जाता है. बचपन से ही पूजा पाठ यज्ञ कथाएं उनके दिमाग में ठूंस दी जाती हैं. ये सामूहिक आत्मघात है. इसीलिये एशियाई समाज कुछ भी मौलिक नहीं खोज पाते. वे यूरोप के आज्ञापालक ही बने रहते हैं.
यूरोप का बुद्धिजीवी वर्ग बहुत पहले ही बाबाओं, गुरुओं और धार्मिक प्रवचनों के घनचक्कर से आजाद हो चूका है. आम जन में थोड़ी सी धर्मभीरुता बची है लेकिन वह उतनी बड़ी और जहरीली नहीं जैसी भारत में है. यहां तो उल्टी गंगा बहती है. यहां का तथाकथित क्रान्तिकारी और प्रगतिशील वर्ग सबसे ज्यादा अंधविश्वासी और धर्मभीरु है. दर्शन, काव्य या हिंदी साहित्य उठाकर देखिये मनु, शक्तिपूजा, महाभारत रामायण के बिंब और मिथकों की गप्पों पर खड़े कथानक पिछली सदी के आधे हिस्से तक मुख्यधारा के साहित्य पर छाये रहे. 1935 तक साहित्य में नायिका विमर्श और नख शिख वर्णन देख लीजिए. लगता ही नहीं कि ये भारत में जन्म लिए पले बढ़े लोगों का साहित्य है. इस साहित्य में देवी देवता, राजे महाराजे, अवतार इत्यादि भरे हुए हैं. आम आदमी, मजदूर किसान या स्त्री का कोई जिक्र ही नहीं.
अंग्रेजों के सत्संग में जब यूरोपीय साहित्य, सभ्यता, संस्कृति और दर्शन का दरवाजा भारतीयों के लिए खुला तब राममोहन, केशव, विवेकानन्द जैसों को बड़ी शर्म महसूस हुई कि भारत कैसा समाज है? इसी के परिणाम में सती प्रथा उन्मूलन जैसी सामाजिक सुधार हुए, ईसाई धर्म की सेवा भावना सीखकर धार्मिक सुधार किये गए. इसके बहुत बाद रवीन्द्रनाथ और प्रेमचन्द जैसे शूद्रों/ पिछड़ी जाति के लेखकों का साहित्य देखिये वे ब्राह्मणवाद और अंधविश्वासी शिल्प सौंदर्य को साहित्य और सौन्दर्यशास्त्र के मैदान में आकर ललकार रहे हैं. यूरोप के इसी ज्ञान का बीज फूले, गांधी और अंबेडकर की बुलन्द आवाज में भी पल्लवित हो रहा है. और आज जो कुछ भी थोड़ा सुधार हम देख रहे हैं उसका स्त्रोत सीधे सीधे यूरोप के पुनर्जागरण और सामाजिक क्रांति के दर्शन में है.
इस बीच भारतीय पोंगा पंडित क्या कर रहे थे? उन्होंने इस बदलाव पर मिट्टि डालने के लिए धर्म राजनीती और कॉरपोरेट की ज़हरीली त्रिमूर्ति खड़ी की. नई नई कथाएं, पुराण, मिथक, झूठ और अफवाहें खड़ी की. सांप्रदायिक दंगे और मंदिर मस्जिद के बेकार के मुद्दों को राजनीति की धुरी बना दिया. ध्यान, समाधि, अध्यात्म और पूरब पश्चिम के संश्लेषण के नाम पर धर्म और अंधविश्वास की अफीम को फिर से राष्ट्रवाद और देशप्रेम के साथ घोल दिया. नतीजा सामने है. पूरा मुल्क बैंको की कतारों में लगा चिल्लर गिन रहा है.
क्या यह अवश्यम्भावी था? ये रोका नहीं जा सकता था? क्या भविष्य को बदला जा सकता है?
जरूर बदला जा सकता है. हमारी स्त्रियां और बच्चे अगर इन धार्मिक, बाबाओं, योगियों, कथाकारों की बकवासों से बच सकें या बचाई जा सकें तो हम भी अगली दो पीढ़ियों में भारत में सभ्यता, संस्कृति, लोकतंत्र और नैतिकता सहित विज्ञान भी पैदा कर सकते हैं. लेकिन दुर्भाग्य ये कि इन नवाचारों की हत्या करने वाले बाबा, योगी और ओशो जैसे रजिस्टर्ड भगवान इतने धूर्त और होशियार हो गए हैं कि वे क्रान्ति के नाम पर ही अंधविश्वास सिखाने लगते हैं. जहर को दवाई बनाकर पिलाने लगते हैं. और ये अभागा मुल्क उनकी जहरीली खुराकों को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाने लगता है.
क्या भारतीय समाज नीत्शे, रसल, मार्क्स, कोपरनिकस, गेलिलियो, ह्यूम, डार्विन, आइंस्टीन, डॉकिन्स और हिचिन्स पैदा कर सकता है? या कम से कम निर्मल बाबा और ओशो जैसे पोंगा पंडितों को बीच से हटाकर इन तार्किकों को अपनी अगली पीढ़ियों के प्रति उपलब्ध करवा सकता है? इसी प्रश्न के उत्तर पर निर्भर करेगा कि भारत सभ्य होगा या नहीं होगा. जो बहन जी की निगाह पर चढ़ गया सो चढ़ गया
तब मायावती यूपी की मुख्यमंत्री थीं और इलाहाबाद के बाहुबली सांसद अतीक अहमद जेल में बंद थे. कहानियों के मुताबिक जेलर को ऊपर से आदेश मिले थे कि अतीक अहमद को उनकी तशरीफ पर रोज सुबह-शाम चार डंडे लगाए जाएं. कहानी के मुताबिक जेलर ये कहते हुए नियम से सुबह और शाम अतीक की तशरीफ पर लाठियां बरसाता था-”अतीक अमहद, उठा अपनी तहमद, क्योंकि मायावती हैं सहमत.” मैं फिर कह रहा हूं कि इस कहानी की सच्चाई का कोई सबूत नहीं है, लेकिन नेताओं, पत्रकारों और पुलिस वालों के बीच ये कहानी सुर्खियों में बनी रही.
कुछ ऐसा ही हुआ था राजा भइया के साथ. समाजवादी पार्टी के बाहुबली नेता राजा भइया फतेहगढ़ जेल में बंद थे, गरमी के दिन थे, नियमों के मुताबिक उन्हें कूलर और अखबार की सुविधा मिलनी थी, लेकिन उन्हें कूलर नहीं मिला था. जेलर से शिकायत की, कूलर नहीं मिला. हाईकोर्ट में गुहार लगाई. वहां से अखबार और कूलर की सुविधा देने का आदेश आ गया. अब जेल में राजा भइया को जो कमरा मिला था उसमें कूलर लगा, नीचे जेलर ने उपले सुलगवा दिए. कूलर चालू, भीतर राजा भइया का दम घुटने लगा, बाप-बाप चिल्लाने लगे. जेलर बोला-साहब हमको तो आदेश मिला है अदालत का. अब तो कूलर बंद नहीं होगा. कहते हैं कि जेल में राजा भइया को नानी याद आ गई. रोज कुछ इसी तरह उन्हें भरी दुपहरी और रात में उपलों के धुएं के साथ कूलर सुख मिलता रहा. और हां, अखबार भी उन्हें रोज मिलता था, लेकिन उनके पास जाने से पहले अखबार को पानी में डाला जाता था। अब ये कहने की जरूरत नहीं कि राजा भइया पर ऐसा ऐक्शन लेना कोई हंसी खेल नहीं था. किसी जेलर की इतनी हिम्मत तभी होगी, जब इसके लिए आदेश ऊपर से आए होंगे.
मायावती के राज में अपराध होते ही एक्शन होता था. जो मायावती की निगाह में चढ़ गया तो फिर चढ़ गया, उसकी खैर नहीं. विपक्षी तो विपक्षी उनकी अपनी पार्टी के बाहुबली भी मायावती के कोप से सहमे रहते थे. जिस भी विधायक या मंत्री पर आरोप लगा, मायावती ने न सिर्फ उसे बर्खास्त किया, बल्कि जेल में भी भेजा. मेरा एक मित्र शेखर तिवारी औरैया से पहली बार विधायक बना था, मायावती का पसंदीदा था, लेकिन इंजीनियर हत्याकांड के बाद मायावती ने उसे जेल में डलवा दिया, चार महीने से ज्यादा विधायकी का सुख भोग नहीं पायाय आठ बरस से ज्यादा हो गए, वो अभी भी जेल में है, उसे उम्र कैद की सजा हुई है. बीएसपी विधायक गुड्डू पंडित को भी ऐसे ही मायावती ने सीखचों के पीछे भेज दिया था. मायावती ने अपने जिन विधायकों और मंत्रियों को खुद जेल भेजा, उनमें से कई तो आज भी जेल में हैं.
ये पोस्ट लिखने का मतलब ये नहीं कि मायावती के शासन की शान में कसीदे काढ़ रहा हूं, लेकिन इलाहाबाद में अतीक अहमद और उनके गुर्गों की गुंडागर्दी की खबर आई तो बरबस ये बातें याद आ गईं. अखिलेश यादव निश्चित रूप से सबसे काबिल मुख्यमंत्री हैं, साढ़े चार साल के उनके कार्यकाल में उन पर एक भी दाग नहीं है, लेकिन उनके खानदान का अपराधियों से प्रेम कम होने का नाम नहीं लेता. मुलायम हों या शिवपाल यादव, अपराधियों से रिश्ते इन्हें सबसे ज्यादा रास आते हैं. डाकू छविराम, अरुण शंकर शुक्ला उर्फ ”अन्ना”, डीपी यादव से लेकर मुख्तार अंसारी तक लंबी फेहरिस्त है. समाजवादी पार्टी की सरकार में गुंडे हमेशा ही भयमुक्त रहे हैं. अखिलेश विकास की जितनी भी बातें कर लें, लेकिन गुंडागर्दी का दाग वे अपनी सरकार के दामन से धो नहीं पा रहे हैं. जब तक ये दाग उनकी पार्टी और सरकार पर हैं, अतीक अहमदों, मुख्तार अंसारियों, राजा भइयों की मनमानी पर कोई रोक नहीं लगा सकता.
– विकाश मिश्रा के फेसबुक वॉल से
लेखक आज तक में वरिष्ठ पत्रकार हैं. बाबासाहेब के संविधान सभा में बहस पर आधारित फिल्म ”भारत का संविधान” का ट्रेलर होगा लांच
नई दिल्ली। संविधान सभा में बाबासाहेब का ऐतिहासिक भाषण 17 दिसंबर को कॉन्सिटट्यूशन क्लब दिल्ली में हुआ था. इसी ऐतिहासिक दिन को याद करने के लिए हिंदी फिचर फिल्म “भारत का संविधान” का ट्रेलर लांच किया जाएगा. यह फिल्म बाबासाहेब के सभा में संविधान निर्माण की बहस पर आधारित है.
इस फिल्म में संविधान सभा में शामिल नेताओं की शंकाओं और सवालों का जबाव बाबासाहेब देते हुए दिखाई देंगे. संविधान सभा में कौन-कौन बाबासाहेब के खिलाफ थे और कौन उनसे सहमत थे, उन सब के बारे में भी बताया गया है. फिल्म में तत्तकालिक समय की ओरिजनल क्लिपों (बहस की वीडियो) को भी शामिल किया गया है.
यह फिल्म भारत सरकार द्वारा निकाली गई पुस्तक “संविधान सभा डिबेट” पर आधारित है. इस फिल्म में कई जाने मान कलाकारों ने काम किया है. इस फिल्म का निर्देशन नरेंद्र शिंदे ने किया है. लॉर्ड बुद्धा टीवी इसका प्रोड्यूसर है.
17 दिसंबर को फिल्म का ट्रेलर कॉन्सिटट्यूशन क्लब में दोपहर तीन बजे दिखाया जाएगा. इस दौरान भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश केजी बाला कृष्णऩ मुख्य अतिथि होंगे. विशिष्ट अतिथि के तौर पर बौद्ध विचारक और चिंतक शांति स्वरूप बौद्ध होंगे.
इस फिल्म के अलावा भारत का संविधान के नाम से एक सीरियल का भी निर्माण हो रहा है. यह सीरियल 150 एपिसोड का होगा और लॉर्ड बुद्धा टीवी पर प्रसारित होगा. शोषित वर्ग का नया उभार: नया नेतृत्व नये औजार
देश का इतिहास गवाह है कि आज के दलित, आदिवासी, अतिपिछड़े, स्त्रियां और अन्य वंचित समुदाय का सदियों से व्यवस्था निर्माणकर्ताओं द्वारा शोषण किया गया. उन्हें अपना गुलाम बनाकर रखा गया. हमारे यहां एक वर्ग विशेष का वर्चस्व रहा जिसे सामंतवाद कहा गया. इसका उद्देश्य यही था कि एक बड़े वर्ग को संशाधनों से वंचित रखा जाए. उन्हें सशक्त न बनने दिया जाए. वर्चस्वशाली वर्ग उनकी कमजोरी का लाभ उठाकर सत्ता में रहा और एक बड़े तबके का निरन्तर दमन, शोषण, उत्पीड़न करता रहा. उन्हें गुलाम बनाकर उनकी सेवाएं लेता रहा. यह वर्ग मनुस्मृति जैसे ग्रंथों से संचालित था. मनुवादी व्यवस्था की प्रणाली कुछ इस तरह रखी कि इसमें ब्राह्मण पथ प्रदर्शक रहा. राजपूत वर्ग शासन करता रहा और वैश्य व्यापार में लिप्त रहा. एक बड़ा वर्ग जिसे उन्होंने शूद्र और अछूत कहा, इन्हें अपना गुलाम बनाकर रखा. और अमानवीयता की हद तक उनका शोषण, उत्पीड़न करते रहे. उनकी महिलाओं से बलात्कार करते रहे और यह सब कुछ ब्राह्मण वर्ग की सुनियोजित साजिश के तहत होता रहा. उन्होंने इसे शिक्षा से दूर रखा. और उस पर पुनर्जन्म तथा भगवान का भय दिखाकर सदियों तक शासन करते रहे.
इतिहास बताता है कि शोषण, गुलामी और अन्याय की यह परंपरा सिर्फ भारत में हो ऐसा भी नहीं था. पूरे विश्व में वर्चस्वशाली वर्ग रंगभेद, नस्लवाद और जातिवाद के नाम पर बर्बरता करता रहा. समय बदलता रहा. इस अमानवीयता के विरूद्ध आवाजें उठती रहीं. साथ ही साथ इन आवाजों का दमन भी होता रहा. पर जैसे-जैसे लोगों को यह पता चलता गया कि आपसी एकता में शक्ति है. लोग संगठित होकर संघर्ष करने लगे और यथास्थिति के विेरूद्ध विद्रोह करने लगे. क्रान्ति होने लगी. फ्रांस की क्रांति. रूस की क्रांति. नस्लवाद के खिलाफ विश्व पटल पर मार्टिन लूथर किंग जैसे नेतृत्व उभरे तो जातिवाद के खिलाफ बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर.
इससे पहले मानवता के हित में अन्य अनेक सामाजिक लोगों ने अपने-अपने स्तर पर सामाजिक कार्य किए. वे चाहे गौतमबुद्ध हों. कबीर हों. रैदास हों. ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई फुले हों. ये नाम तो कुछ उदाहरण मात्र हैं. पर असल में सामाजिक परिवर्तन में संतों की बड़ी संख्या है जो इस अमानवीय व्यवस्था का अपने- अपने स्तर पर विरोध करते रहे.
अनेक संघर्षों के बाद, स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात बाबा साहेब द्वारा संविधान का निर्माण हुआ. देश के संविधान ने लोकतांत्रिक प्रणाली की व्यवस्था दी जिसके माध्यम से जिसे शोषित/पीड़ित/वंचित जनता कहा जाता था. उसके शासक का प्रादुर्भाव हुआ. लोकतंत्र की सब से सरल परिभाषा अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने अपने समय में दी. उन्होने कहा ‘जनता का शासन, जनता के द्वारा, जनता के लिए’ नाम दिया.
आज देश की आजादी के सत्तर साल बाद इन्हीं दलितों, आदिवासियों, अतिपिछड़ों, वंचितों का जो नया नेतृत्व उभरा है- वह काबिले गौर है. आज बदलाव की जो मानवतावादी बुलंद इमारत निर्माणाधीन है उसमें अपने-अपने समय के विभिन्न क्षेत्रों के अनेकानेक संतो, समाज सुधारकों, मानवतावादियों, क्रांतिकारियों ने नींव की ईंट बनाकर एक मजबूत बुनियाद दी है. उसी मजबूत नींव के आधार पर आज मानवतावादी ईमारत का निर्माण हो रहा है. बाबा साहेब ने जब मनुस्मृति जलाई तब से यह संदेश गया कि मनुवाद ही वंचित वर्ग के शोषण का आधार है. बाद में संविधान के निर्माण से इस वर्ग को ज्ञात हुआ कि यदि संविधान का क्रियान्वयन ईमानदारी से किया जाए तो यही उनके उद्धार का आधार है.
लोगों को चेतनाशील और जागरूक बनाने के लिए उनका शिक्षित होना जरूरी था. जिस मनुस्मृति ने शूद्रों और अछूतों को शिक्षा से वंचित रखा था. उन्हें अनपढ़ और अज्ञानी बनाए रखने की साजिश कर रखी थी. महात्मा फुले और ज्योतिबा फुले जैसे लोगों ने उनकी इस साजिश को नाकाम कर दिया और सबके लिए शिक्षा के द्वार खोल दिए. हालांकि उन्हें इसके लिए अनेक संघर्षों और यातनाओं से गुजरना पड़ा. उसके बाद बाबासाहेब ने भी लोगों को ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो’ के मूलमंत्र दिए. इसी का असर है कि सदियों से शिक्षा से वंचित दलित, आदिवासी, पिछड़े, वंचित, स्त्रियां शिक्षा ग्रहण करने लगे. जागरूक होने लगे और कहने लगे-‘हर जोर-जुर्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है.’
बाबासाहेब ने जब शिक्षा को शेरनी का दूध कहा और राजनीति को ‘मास्टर की’ तो इन समुदायों पर बहुत प्रभाव पड़ा. मान्यवर कांशीराम जी ने डीएस फोर, बामसेफ और बहुजन समाज पार्टी का गठन कर बाबा साहेब के संघर्ष को आगे बढ़ाया. इनसे प्रेरणा लेकर कई दलित नेतृत्व उभरे. उनमें से कुछ भाजपा की गोद में जा बैठे जैसे उदित राज, राम विलास पासवान, रामदास अठावले आदि. मायावती अभी भी बसपा का नेतृत्व कर रही हैं.
उदित राज की जस्टिस पार्टी, तो रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी, वामन मेश्राम ‘बहुजन मुक्ति दल’ के माध्यम से तो फूल सिंह बरैया ‘बहुजन संघर्ष दल’ के नाम से इस कारवां को आगे बढ़ा रहे हैं. बाबासाहेब की विचारधारा को लेकर और उनके नाम से भी कई राजनीतिक दलों का गठन हुआ है और वे स्थानीय स्तर पर इस ‘मास्टर की’ को प्राप्त करने की जद्दोजहद में लगे हैं. हालांकि यह मास्टर की भी इतनी आसानी से नहीं मिलने वाली क्योंकि कारपोरेट जगत ने इसे हथियार लिया है. फिर भी यदि दलितों, आदिवासियों, वंचितों, पिछड़ों, स्त्रियों में जनजागरूकता है, चेतना है, एकता की भावना है तो वे अपने वोट के माध्यम से इसे प्राप्त कर सकते हैं. यह मुश्किल तो है पर नामुमकिन नहीं.
सुखद है कि इन शोषित/पीड़ित/वंचित लोगों में से कुछ शिक्षित होकर संगठन बनाकर अपने-अपने लोगों को जागरूक करने लगे हैं. यूं तो ऐसे छोटे-बड़े अनेक संगठन है. पर कुछ तो वास्तव में बहुत ही उल्लेखनीय भूमिका निभा रहे हैं. उदाहरण के लिए ‘भारतीय समाज निर्माण संघ’, ‘भारतीय समन्वय संगठन’ (लक्ष्य) आदि को लिया जा सकता है. ये संगठन जमीनी स्तर पर लोगों को जागरूक करने में अपनी अहम भूमिका निभा रहे हैं.
इसके अलावा दलित साहित्य और आदिवासी साहित्य, बहुजन साहित्य भी अपने-अपने समुदायों को जागरूक कर रहे हैं. क्योंकि वंचित वर्ग आज शिक्षित हो रहा है. साहित्य तक उनकी पहुंच हो गई है. इसलिए इन समुदायों के विद्वान लेखकों द्वारा लिखी गई पुस्तकें उन तक पहुंच रही है. उन्हें जागरूक कर रही हैं.
इसके अलावा दलित, आदिवासी, अतिपिछड़े, वंचित, स्त्रियों की अनेक पत्र-पत्रिकाओं का भी प्रकाशन हो रहा है जो अपने पाठकों को जागरूक कर रही हैं. इस तरह की अनेक पत्रिकाएं और कुछ समाचार पत्र हैं जो निरन्तर इन्हें जागरूक कर रहे हैं. कुछ पत्रिकाओं के नाम उदाहरण स्वरूप दिए जा सकते हैं जैसे ‘दलित दस्तक’, ‘सम्यक भारत’, ‘दलित अस्मिता’, ‘दलित आदिवासी संवाद’, ‘महिला अधिकार अभियान’, ‘युद्धरत आम आदमी’, ‘हाशिए की आवाज’, ‘स्त्रीकाल’ आदि. इसके अलावा ‘शिल्पकार टाइम्स’, ‘मूल निवासी टाइम्स’ जैसे अनेक समाचार पत्र भी जनजागरूकता में अपनी भूमिका निभा रहे हैं. वंचित वर्गों में अनेक ऐसे लेखक-लेखिकाएं हैं जो अपने पाठकों को जागरूक करने में महती भूमिका अदा कर रहे हैं.
आज दलितों, आदिवासियों, अतिपिछड़ों, वंचित और स्त्रियों को सामाजिक न्याय, राजनीतिक संदेश के साथ-साथ आर्थिक विकास की भी बहुत जरूरत है. ऐसे में इन लोगों के आंदोलन आर्थिक समानता के लिए संघर्ष कर रहे हैं. आज इन समुदायों को एक ओर जहां समानता, स्वतंत्रता और न्याय की जरूरत है वहीं आर्थिक विकास, आर्थिक समृद्धि भी अहम है. दलितों की डिक्की जैसी संस्थाओं ने यह साबित कर दिया है कि दलित भी करोड़पति बन सकते हैं. चन्द्रभान प्रसाद और एच.एल. दुसाध डाइवर्सिटी यानी विविधता की मांग कर रहे हैं, जिससे कि सरकारी संस्थानों में दलितों, आदिवासियो, अतिपिछड़ों, वंचितों और स्त्रियों को भी अपना हिस्सा मिल सके. डिक्की दलित उद्यमियों को भी प्रोत्साहित कर रहा है.
वंचित वर्ग का नया नेतृत्व इतना सशक्त हो चुका है कि यदि आपने बराबरी का दुर्ग-द्वार इनके लिए नहीं खोला तो वो इसे तोड़ देगा. इसलिए शोषित वर्ग के नये नेतृत्व को गंभीरता से लेने की जरूरत है. क्योंकि ये नया नेतृत्व उच्च शिक्षित है. जागरूक है. चेतना संपन्न है. परिपक्व है. तर्कशील व वैज्ञानिक सोच वाला है. अपने अधिकारों के प्रति सजग है. लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास करता है. संविधान का अनुयायी है. इसे मूर्ख नहीं बनाया जा सकता. इसे भगवान और पुनर्जन्म का भय दिखाकर डराया नहीं जा सकता है. ये आपके सारे शास्त्रों, धर्मग्रंथों, महाभारत, रामायण, पुराणों की बखिया उधेड़ सकता है. राजा महिषासुर, राजा बाली, शम्बूक, एकलव्य के साथ अन्याय, छल-कपट और साजिश करने वाले तुम्हारे देवी-देवताओं, द्रोणाचार्याें और मर्यादा पुरुषोत्तमों की पोल खोल सकता है.
‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ के क्रान्तिकारी आंदोलन को बढ़ते देखकर अंग्रेजों को ये बात दो सौ सालों के शासन में समझ आ गई थी कि भारतवासियों पर अब और शासन नहीं किया जा सकता. वो हमें यहां से भगाएं इससे पहले समझदारी इसी में है कि हम स्वयं ही उन्हें सत्ता सौंप कर चले जाएं. उन्होने ऐसा ही किया.
आज के बदलते माहौल में वर्चस्वशाली सामंतवादी ताकतों को चाहिए कि जातिवादी, भेदभावकारी भावनाओं को, गुलाम बनाए रखने वाली मानसिकता को त्याग कर मानवतावादी बनें. क्योंकि जिस तरह शोषित वर्ग के युवाओं का वर्चस्व बढ़ रहा है. उसे देखते हुए अब और इन्हें दबाकर नहीं रखा जा सकता. जो बात अंग्रेजों को दो सौ सालों में समझ आ गई थी. इन ताकतों को पांच हजार साल में भी समझ नहीं आ रही है. वर्तमान हालात ऐसे हैं कि शोषितों/वंचितों को उनके अधिकार देने में ही समझदारी है नहीं तो वे छीनने की स्थिति में आ चुके हैं. वे आपके दुर्ग-द्वारा पर दस्तक दे रहे हैं.
हमारी भी समझदारी इसी में है कि हम लोकतांत्रिक मूल्यों का आदर करें. सभी इन्सानों को समान समझें. समता को अपनाएं. सबको गरिमा के साथ जीने दें. मालिक और गुलाम वाली मानसिकता को त्याग दें. भाईचारे और बंधुत्व की भावना अपनाएं. हम शोषितों/वंचितों को अपने शोषण से मुक्त करें और उनके साथ इंसानियत से पेश आएं ताकि उन्हें सामाजिक न्याय मिले. वे आर्थिक प्रगति करें. जब सभी समुदाय आर्थिक रूप से समृद्ध होंगे. सशक्त होंगे. भेदभाव रहित होंगे. शोषण मुक्त होंगे. तभी देश मजबूत होगा. तरक्की करेगा और दुनिया में अपना मुकम्मल स्थान बनाएंगा.
ट्रिपल तलाक के निशाने पर हिन्दू कोड बिल
पिछले कई महीनों से किसी न किसी बहाने ट्रिपल तलाक का मुद्दा सुर्खियों में है. कभी इस मुद्दे को किसी मंत्री के द्वारा उठाया जाता तो कभी किसी कट्टरवादी संगठन के नेता द्वारा. हाल ही में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बाकायदा यह टिप्पणी की है कि ट्रिपल तलाक मुस्लिम महिलाओं के लिए क्रूरता है और असंवैधानिक है.
क्या है ट्रिपल तलाक?
मुस्लिम परिवार विधि में ये कानून है कि पति, पत्नी की रजामंदी के बिना कभी भी, तीन बार तलाक बोल कर अपनी पत्नी को तलाक दे सकता है.
आईये जाने की इलाहाबाद कोर्ट ने क्या कहा?
हाईकोर्ट ने कहा कि तीन तलाक क्रूरता है. यह मुस्लिम महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों का हनन है.
– कोई भी पर्सनल लॉ बोर्ड संविधान से ऊपर नहीं हो सकता. यहां तक कि कोर्ट भी संविधान से ऊपर नहीं हो सकता. कुरान में तीन तलाक को अच्छा नहीं माना गया है. उसमें कहा गया है कि जब सुलह के सभी रास्ते बंद हो जाएं, तभी तलाक दिया जा सकता है. ऐसे में, तीन तलाक को सही नहीं माना जा सकता. यह महिला के साथ भेदभाव है, जिसे रोकने की गारंटी संविधान में दी गई है. कोर्ट ने कहा, पंथ निरपेक्ष देश में संविधान के तहत सामाजिक बदलाव लाए जाते हैं. मुस्लिम औरतों को पुराने रीति-रिवाज़ों और सामाजिक निजी कानून के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता.
क्या था मामला
– इलाहाबाद हाईकोर्ट में तलाक के दो अलग-मामलों में याचिका लगाई गई थी. पहला केस बुलंदशहर का था. इसमें एक 53 साल के शख्स ने अपनी बीवी को तलाक देकर 23 साल की युवती से शादी कर ली थी. पहली बीवी से दो बच्चे थे. नवविवाहित जोड़े ने कोर्ट में याचिका लगाकर प्रोटेक्शन मांगा था. कोर्ट ने उनकी पिटीशन यह कहते हुए खारिज कर दी कि 23 साल की युवती से शादी करने के लिए 2 बच्चों की मां को तलाक देना सही नहीं माना जा सकता है.
– दूसरे मामले में उमर बी नाम की एक महिला ने अपने प्रेमी से शादी कर ली थी. उमर का दावा था कि दुबई में रहने वाले उसके पति ने फोन पर उसे तलाक दे दिया. हालांकि, कोर्ट में उमर के पहले पति ने तलाक देने की बाद से इनकार किया. उसका कहना था कि उमर ने अपने प्रेमी से निकाह करने के लिए यह झूठ बोला है.
संविधान का नजरिया
यह बात तो तय है की संविधान किसी धर्म या परंपरा की आड़ में भेदभाव या शोषण की इजाजत नही देता. इससे पहले भी कई ऐसे रीति-रिवाज में रोक लगाई गई जो गैरकानूनी थे जैसे सति प्रथा, कन्या वध प्रथा आदि.
पुरूषवादी दुनिया में ट्रिपल तलाक का असल या कहे छिपा मकसद है नई, जवान, मनपसंद औरत से जिस्मानी ताल्लुकात बनाने की समाजिक अजादी पाना. यह परेशानी किसी एक मजहब की नही है लगभग हर मजहब इस परेशानी से बावास्ता है. हिन्दुओ में शादी जन्म जन्मांतर का रिश्ता है इसलिए कई पत्नियां रखने का रिवाज है. पुराणों में बहु विवाह के हजारों प्रमाण मौजूद है.
आज के दौर में भी कई ऐसे मंत्री नेता अभिनेता उद्योगपति है जो एक अधिक महिलाओं से संबंध बनाये हुये है. तो आम लोगों की बात करना बेईमानी होगी. सब कुछ होते हुये ये पुरूषवादी समाज एक औरत को कोई छूट और सुविधा देने के लिए तैयार नहीं है. एक पति के होते हुये कई पति रखने की परंपरा पर, मर्दवादी समाज कभी सोच भी नहीं सकता.
भारत में हिन्दू कोड बिल पास होने के बाद बहु विवाह प्रथा में कमी आई. इसमें पत्नी को सम्पत्ति में अधिकार मिला. बराबरी का हक मिला. दूसरी ओर आईपीसी की धारा 125 के तहत भरण पोषण का अधिकार मिला. जिसका कड़ाई से पालन किये जाने की वजह से पुरूष पर तलाक देने से पहले हजार बार सोचने के लिए मजबूर होना पड़ता है. लेकिन मुस्लिम पारिवारिक कानून में भरण पोषण की सुविधा नहीं है. इस पर मशहूर शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला दिया.
क्या है शाह बानो केस ?
इंदौर की रहने वाली मुस्लिम महिला शाहबानो ने 1932 में मोहम्मद खान से शादी की. लेकिन 14 साल बाद मोहम्मद खान ने दूसरी शादी की और 43 साल बाद उसने शाह बानो को तलाक दे दिया था. पांच बच्चों की मां 62 वर्षीय शाहबानो ने गुजारा भत्ता पाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी और पति के खिलाफ गुजारे भत्ते का केस जीत भी लिया.
सुप्रीम कोर्ट में केस जीतने के बाद भी शाहबानो को पति से हर्जाना नहीं मिल सका. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पुरजोर विरोध किया. इस विरोध के बाद 1986 में राजीव गांधी की सरकार ने मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 1986 पारित किया. इस अधिनियम के तहत शाहबानो को तलाक देने वाला पति मोहम्मद गुजारा भत्ता के दायित्व से मुक्त हो गया था.
इसके बाद से ट्रिपल तलाक का सिलसिला और तेज हो गया. कई बार एसएमएस, ईमेल, फोन और चिट्ठी पर भी बीबीयों को तलाक देने के मामले सामने आये. कई महिलायें सड़क पर आ गई. क्योंकि ट्रिपल तलाक देने के बाद पति पर पत्नी का कोई दायित्व नहीं रह जाता. इसके विरोध में कई संगठनो ने मोर्चा खोला. ये सारे लोग और संगठन ट्रिपल तलाक का विरोध तो कर रहे है. लेकिन धारा 125 भरण पोषण मुस्लिम पत्नी को संपत्ति के अधिकार को फिर से लागू करवाने की बात कोई नहीं कर रहा है.
हिन्दू कट्टरवादी संगठनो द्वारा इस मुद्दे को बार-बार उठाया जाता है. इसका ये कारण नहीं है की वे मुस्लिम जमात या उनकी महिलाओं की पैरोकार है. इनके द्वारा तीन मुद्दे उठाये जाते है
1. मुस्लिम धर्म में ट्रिपल तलाक बंद हो
2. मुस्लिम धर्म में कई बीबियां रखने की प्रथा है बंद हो
3 .यूनिफाईड सिविल कोड की स्थापना हो
दरअसल इस मुद्दे को जोरो से उठाने का असल मकसद यह है की वे हिन्दू धर्म में प्रदत्त महिलाओं के संवैधानिक अधिकार को खत्म करना चाहते है. उनका असली निशाना हिन्दू कोड बिल है. क्योकि वे उक्त तीनों मुद्दो को उठाकर एक विवाद का माहोल बनाना चाहते हैं. ये विवाद इतना बढ़ेगा की अंत में नौबत यहां तक आयेगी की या तो यूनिफाईड सिविल कोड की स्थापना की जाय या फिर हिन्दू कोड बिल को खत्म किया जाय.
जाने हिन्दू कोड बिल में क्या है?
हिन्दू विधि में महिलाओं के क्या अधिकार हैं उसे इन बिन्दुओं में समझा जा सकता है-
1. संपत्ति का अधिकार- हिन्दू कोड बिल में हिन्दू मां, बहन, पत्नी एवं दादी को अचल संपत्ति में पुरूष रिश्तेदारों के बराबर अधिकार है.
2. पत्नी को भरण पोषण- हिन्दू पत्नी को तलाक या परित्यक्ता होने पर पति की अचल संपत्ति एवं आजीवन मासिक भरण पोषण का अधिकार है, उनके बच्चों को भी यह अधिकार है.
3. बहुविवाह पर रोक- हिन्दू विधि में एक पत्नी के जीवित रहते दूसरी शादी करना या रखैल रखना एक दंडनीय अपराध है.
आज सामंतवादी ताकातें महिलाओं के इन अधिकारो से परेशान हैं. वे अपनी महिलाओं को पैर की जूती समझते है, उन्हे कोई अधिकार नहीं देना चाहते है. इसलिए आज उनकी जागरूक महिलाऐं अपने इन अधिकारो के तहत उन्हें कोर्ट में घसीट रही है. बहने जमीन में हिस्सा मांग रही है, दहेज प्रताड़ना से त्रस्त पत्नी भरण पोषण और संपत्ति में अधिकार मांग रही है. पालन पोषण नहीं हाने पर मां भरण पोषण का अधिकार मांग रही है. एक से ज्यादा पत्नी रखने पर जेल जाना पड रहा है. इससे ये सामंतवादी लोग परेशान है. वे आज भी महिलाओं को ढोर गवांर शूद्र पशु नारी ये है ताड़न के अधिकारी समझते है.
यहां पर सावधानी इस बात की बरतनी है की मुस्लिम महिलओं के हितो की रक्षा हो साथ में हिन्दू महिलाओं को मिले अधिकारों का भी हनन न हो. क्योकि भविष्य में ये हो सकता है कि दोनो ओर के कट्टरपंथी लोग प्रगतिशलता का नकाब पहन कर एक हो जायेगे और भारत की महिलाओं को फिर से सातवीं शताब्दी की ओर ढकेल देंगे. अफगानिस्तान इसका नयाब उदारहण है.
बहर हाल इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की पहल स्वागत योग्य है.
बिहारः सवर्णों ने उजाड़ दिए दलितों के घर
दरभंगा। बिहार के दरभंगा जिले के कोर्थ गांव में सवर्णों ने दलितों पर अत्याचार किया. सरकार द्वारा दलितों को दी गई जमीन पर गांव के सवर्ण अपने सगे-संबंधी और गुर्गों के साथ दलितों के घर पर हमला कर दिया. पहले तो उनकी जमकर पिटाई की सामान लूट लिए और कुछ घरों को उजाड़ दिया, तो कुछ घरों को आग के हवाले कर दिया.
एक दलित वृद्ध दंपत्ति ने जब इसका विरोध किया तो सवर्णों ने दोनों पति-पत्नी को ना सिर्फ हाथ-पांव बांध कर घर को पूरी तरह उजाड़ दिया बल्कि मुंह में मल-मूत्र भी जबरन डाल दिया गया. सवर्णों का घंटों तक दलितों पर कहर चलता रहा. इसकी सूचना थाने को मिलते ही भारी संख्या में पुलिस पहुंच गयी. हलांकि पुलिस के आते ही सभी हमलावर फरार हो गए. तकरीबन एक दर्जन लोग घायल हो गये. चार दलितों की हालत गंभीर है जिसे दरभंगा अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कराया गया है. इलाके में तनाव जारी है.
मामला घनश्यामपुर थाना क्षेत्र के कोर्थ गांव का है, जहां सरकार के अधिकारी सीओ और थाना पुलिस गांव के ही कई दलित लोगों को भूदान के अंतर्गत मिली जमीन पर 19/11/2016 को अलग-अलग जगहों पर भू-दखल कराया गया था, जिसके बाद दलित परिवार वहां अपनी झोपड़ी बना कर रहने लगे. सवर्णों को यह बात नागवार गुजरी और दो दिन बाद ही सवर्णों ने कानून को ठेंगा दिखाते हुए दलितों के घरों पर एक साथ हमला कर ना सिर्फ लूट-पाट मचाई बल्कि जमकर मारपीट भी की.
बीते मंगलवार की सुबह 10 दलितों की झोपड़ी उजाड़ने व मारपीट कर जख्मी कर देने मामले में राजेन्द्र पासवान के बयान पर गांव के जटाशंकर झा, राम कुमार झा, नरेन्द्र झा, आदित्य कुमार झा, रामानंद झा, विजय कुमार झा, दिनेश झा सहित 23 लोगों के विरूद्ध प्राथमिकी संख्या 192/016 दर्ज की गई है.
ज्यादातर घरों को आग के हवाले कर दिया. घटना के बाद घायलों को दरभंगा अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती करवाया गया. वहीं आरोपी पुलिस की दबिश के कारण गांव छोड़ फरार है. बिरौल एसडीओ मो. शफीक व एसडीपीओ सुरेश कुमार ने गांव का जायजा लिया है. इस क्रम में थानाध्यक्ष को आरोपियों की जल्द गिरफ्तारी के लिए छापामारी तेज करने का आदेश दिया हैय एसडीओ ने बताया कि गांव के दलितों को पूरी सुरक्षा प्रदान की गई है. उन्होंने स्थिति को पूरी तरह सामान्य बताया है.
बताया जाता है कि पूरे फसाद की जड़ वो जमीन है, जिसपर भूदान यज्ञ कमेटी से पर्चाधारी दलित व पूर्व से जमीन पर काबिज भूस्वामी के बीच विवाद चल रहा है. बताया जाता है कि दलितों के बीच भूदान की जमीन बांट दी गई थी. लेकिन, जमीन पर पर्चाधारियों को कब्जा नहीं मिल पाया था. इस बीच दस दलित परिवारों को प्रशासन की ओर से जमीन पर कब्जा दिलाया गया था. इसके बाद से जमींदार कब्जाधारियों को सबक सिखाना चाहते थे. इसको लेकर मंगलवार को सवर्णों ने दलितों की झोपड़ियों पर हमला कर आग लगा दी. साथ ही विरोध करने आए दलितों की जमकर पिटाई कर दी. कालेधन पर लगाम के नाम पर मुद्रा परिवर्तन कितना सही?
आज सुबह घरों में काम करने वाली एक महिला ने बताया की 500 और 1000 रूपए के नोट बंद हो गये है. वो काफी परेशान लग रही थी, उसने आगे बताया की इस रविवार उसकी बी सी खुली थी जिसके 12000 रूपए (500 और 1000 नोट में) उसे मिले है. लेकिन आज ही मुहल्ले के किराना दुकान वाले ने 500 नोट के बदले किराना देने से इनकार कर दिया, वो बच्चे के दूध के लिए भटक रही थी. मैं इस खबर से हतप्रद हो गया सहसा मुझे यकीन नही हुआ लेकिन न्यूज़पेपर की हेड लाईन से उसके बातों पर यकीन हो गया.
मैने कहा की तुम बैंक में पैसे बदल सकती हो बहुत आसान है. तो उसने बताया की उसका बैंक में एकाउंट ही नहीं है. दरअसल यह समस्या लगभग हर मध्यम, निम्न मध्यम परिवार की है. 500 एवं 1000 रूपये के नोट 9 नवंबर 2016 की बीती रात से अवैध (बंद) कर दिये गये है. उनकी जगह 500 तथा 2000 के नये नोट जारी किये गये है. इसके पीछे आरबीआई का तर्क है जो आज के अधिकृत विज्ञापन में विस्तृत रूप से सामने आया है. वे इस प्रकार हैः-
1. काले धन पर लगाम, 2. भ्रष्टाचार पर लगाम 3. जाली नोट पर रोक 4. आतंकवाद का वित्तपोषण पर नकेल आदि.
सरकार के इस फैसले पर चारों ओर से प्रतिक्रिया आ रही है. कुछ इसे साहसी कदम बता रहे है तो कूछ लोग केवल सनसनी पैदा करने वाला कदम बता रहे है. कुछ लोग डॉ. अम्बेडकर के हवाले से भी इस तर्क का समर्थन कर रहे है.
डॉ. अम्बेडकर ने नहीं कहा की 10 वर्ष में नोट बदलने से भ्रष्टाचार में कमी आयेगी
हालांकि प्रख्यात अर्थशास्त्री एवं आरबीआई के जनक डॉं. अम्बेडकर के हवाले से ये खबर फैलाई जा रही है की वे प्रति 10 वर्ष में नोट बदले जाने के पक्ष में है. उनके निम्न उदाहरण जो उनकी प्रसिद्ध किताब (रूपए की समस्या) Problem of Rupee से लिया गया हैः-
“And as the Government chose to have legal-tender notes, the Legislature in its turn insisted on their being of higher denomination. At first it adhered to notes of Rs. 20 as the lowest denomination, though it later on yielded to bring it down to 10, which was the lowest limit it could tolerate in 1861. Not till ten years after that, did the legislature consent to the issue of Rs. 5 notes, and that, too, only when the Government had promised to give extra legal facilities for their encashment. ” यह उद्धहरण इस किताब में सर रिचर्ड टेम्पल के हवाले से लिया गया है इसका हिन्दी अनुवाद इस प्रकार है.
“सर्व प्रथम विधान मण्डल ने कम से कम मूल्य वर्ग के रूपए में 20 रूपए के नोट को जारी करने का बल दिया. परंतु बाद में वह इस मूल्य वर्ग को घटाकर दस रूपये के नोटों पर सहमत हो गए. इसके बाद भी विधानमण्डल ने 5 रूपये के नोटों के जारी किये जाने की अनुमति नही दी. यह अनुमति तभी दी गई जब सरकार ने उनके भुनाने के लिए अतिरिक्त सुविधाएं देने का वचन दिया.”
वाल्यूम 12, पृष्ठ 57, रूपये की समस्या उद्धव और समाधान. बाबासाहेब डां अंबेडकर सम्पूर्ण वाडमय
गौरतलब है कि इस संदर्भ को डॉं. अम्बेडकर के नाम पर समाचारपत्र-पत्रिकाओं सोशल मीडिया में प्रसारित किया जा रहा है. ऐसा करने के पीछे क्या मकसद है. ये एक षड्यंत्र है या अज्ञानता यह एक जांच का विषय है. जबकि उक्त उदाहरण को ध्यान से पढ़ेंगे तो आप पायेंगे की इसमें कुछ और बात लिखी गई, 10 वर्ष में मुद्रा बदले जाने संबंध में यहां कोई बात नहीं की गई है.
यहां यह बताना जरूरी है की सरकार ने एक अच्छे मकसद से मुद्रा परिवर्तन का कदम उठाया है लेकिन नाम न बताने की शर्त पर एक व्यवसायी बताते हे कि विगत 5-6 दिनों से भारी मात्रा में कुछ धनिको द्वारा बैंक में धन जमा कराया जा रहा था. आशंका है की सरकार के इस निर्णय की भनक कुछ धनकुबेरो को लग गई थी.
क्या काले धन पर लगाम लगेगा?
जैसा की आरबीआई ने कालाधन, जाली नोट, आतंकवाद पर रोक लगाने की बात कही है. चूंकि बड़े नोट बंद नहीं हुये हैं इसलिए इन समस्याओं पर क्षणिक असर तो पड़ेगा लेकिन बाद में समस्या जस की तस रहेगी. क्योंकि काले धन का कैश ट्रांजेक्सन आसान होता है.
आईये जाने की कालाधन कहां जमा है किन पर कार्यवाई की जरूरत हैः-
1) भूमि पति- कालाधन का सबसे आसान निवेश है जमीन खरीदी. भारत में भूमि सीलिंग एक्ट लागू है यानि कोई भी व्यकित 10 एकड़ से ज्यादा सिंचित भूमि नहीं रख सकता. लेकिन इस नियम को या तो सीथील कर दिया गया या इसकी धज्जीयां उड़ा दी गई. आज एक ओर एक व्यक्ति के पास सर छिपाने को न छत है न जमीन, तो दूसरी तरफ एक-एक व्यक्ति के पास 100 से 1000 एकड़ भूमि के मालिकों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. आजादी के बाद कालेधन का सबसे ज्यादा निवेश भूमि में हुआ है. अत: सीलिंग अधिनियम को और मजबूत बनाने की जरूरत है साथ ही जरूरत है उसे कड़ाई से लागू करवाने की.
2) स्वर्ण खरीदी- डॉं. अम्बेडकर अपनी किताब रूपये की समस्या में बताते है की सोवियत रूस समेत कुछ विकसित देश में स्वर्ण की खरीदी की सीमा बांधी गई है. भारत में काला धन निवेश की दूसरी सबसे पसंदीदा जगह स्वर्ण खरीदी है. अत: स्वर्ण खरीदी पर अंकुश लगाया जाना चाहिए और घरों में जमा सोना का घोषणा पत्र लिया जाना चाहिए.
3) राजनीतिक पार्टियों को चंदा- चूंकि राजनीति पार्टी को दिया जाने वाला चंदा आरटीआई के अंतर्गत नहीं आता इसलिए यहां निवेश अत्यंत अच्छा माना जाता है बड़े ओद्यौगिक घराने वे इसके सहारे संविधान में संशोधन अपने व्यवसायिक लाभ को बढ़ाने के लिए करते रहे हैं.
4) धार्मिक स्थल को दिया जाने वाला धन- भारत एक धार्मिक देश है लोग अपनी आत्म संतुष्टि के लिए चंदा देते है. वहीं दूसरी तरफ, गुप्त धन के रूप में काला धन भी खूब दिया जाता है. उसी प्रकार काला धन को सफेद बानने का गोरखधंधा भी किया जाता है. पिछले दिनों ऐसा ही मामला सामने आया. एक संत कालेधन को सफेद करने की कोशिश वाला मामला मीडिया की सुर्खियों में था.
5)शेयर एवं महंगी चल संपत्ति- इसके बाद कालाधन का निवेश शेयर बाजार तथा महंगी चल सम्पत्ति में किया जा रहा है.
यदि वास्तव में कालेधन, आतंकवाद जाली और नोट में अंकुश लगाना है तो इन 5 बिन्दुओ पर गौर करना आवश्यक है. क्योंकि कालाधन की खपत की गुंजाइश जिस देश में ज्यादा होगी वहां भ्रष्टाचार, आतंकवाद और जाली नोट का बजार फलेगा फूलेगा.
अत: सबसे पहले आज़ादी के बाद काला धन जमा कररने वाले लोगों पर कड़ी कार्यवाई की जानी चाहिए. मुद्रा बदलने की प्रक्रिया को काला धन पर प्रहार के रूप में देखा जाना उचित नहीं है क्योकि 1946 और 1978 में भी इस प्रकार मुद्रा की वापसी या परिवर्तन हुआ था. किन्तु कालाधन पर कितना अंकुश लगा ये बात किसी से छिपी नहीं है. बहरहाल सरकार के फैसले का स्वागत है. देखना है कि इन पांच बिन्दुओ पर कठोर कदम कब उठाया जायेगा या मुद्रा (वापसी) परिवर्तन ग़रीबों की परेशानी का सबब बनकर रह जायेगा.
For such extra facilities, and measures adopted to materialise them, Cf. the interesting speech of the Hon. Sir Richard Temple on the Paper Currency Bill dated January 13, 1871, S.L.C.P., Vol. X, pp. 22-25
संजीव खुदशाह बहुचर्चित दलित लेखक हैं. इनसे sanjeevkhudshah@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है. अम्बेडकर जुलूस के दौरान छात्रों में टकराव, पथराव और बमबाजी
इलाहाबाद। डॉ. भीमराव अम्बेडकर के परिनिर्वाण दिवस पर देर शाम कैंडल मार्च के दौरान छात्रों के दो गुट आपस में भिड़ गए. जुलूस में शामिल छात्र ईश्वर डिग्री कॉलेज से लल्ला चुंगी, छात्रसंघ भवन होते हुए पीसीबी हॉस्टल के सामने नारेबाजी करते जा रहे थे तभी दूसरे गुट के छात्रों ने हॉस्टल से बाहर आकर विरोध किया.
छात्रों में मारपीट के बाद पथराव होने लगा. भगदड़ मच गई. एक गुट भारी पड़ा तो दूसरे गुट को भागना पड़ा. जुलूस निकाल रहे छात्रों ने मारपीट के बाद लल्ला चुंगी पर पथराव और फायरिंग कर दुकानें बंद करा दीं. भारी झड़प की सूचना पर कई थानों की फोर्स के साथ एसएसपी और सिटी एसपी भी वहां पहुंच गए. विश्वविद्यालय के आसपास नाकेबंदी कर दी गई. झड़प में दो छात्र हो गए हैं.
डॉ. भीमराव अम्बेडकर के परिनिर्वाण दिवस की शाम को पंत और अंबेडकर छात्रावास समेत कई हॉस्टलों के छात्रों ने वॉयस ऑफ इंडिया के बैनर तले ईश्वर शरण डिग्री कॉलेज से कैंडल मार्च निकाला. छात्र ईश्वर शरण डिग्री कॉलेज, प्रयाग स्टेशन, लल्ला चुंगी, केपीयूसी हॉस्टल, इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ भवन होते हुए लक्ष्मी टॉकीज चौराहे की तरफ जा रहे थे. उन्हें विधि संकाय स्थित अंबेडकर प्रतिमा तक जाना था.
छात्रों का हुजूम नारेबाजी करते हुए पीसीबी हॉस्टल के सामने पहुंचा तो कुछ छात्रों ने हॉस्टल से बाहर आकर नारेबाजी का विरोध किया. इस पर छात्रों के बीच झड़प होने लगी. मारपीट होने लगी तो हॉस्टल से बड़ी संख्या में छात्र बाहर आ गए. मारपीट के साथ ही पथराव होने लगा. बम धमाके भी हुए. अफरातफरी मच गई. पथराव में कई गाड़ियों के शीशे टूट गए. सड़क पर भगदड़ मच गई. दुकानों के शटर गिर गए.
खबर पाकर कर्नलगंज थाने की फोर्स पहुंची तो हॉस्टल के छात्र अंदर घुस गए. कुछ देर में एसएसपी शलभ माथुर, एसपी सिटी विपिन टाडा, सीओ कर्नलगंज दुर्गा प्रसाद तिवारी, सीओ आलोक मिश्र, समेत कई थानों की फोर्स पहुंच गई. पुलिस फोर्स ने लाठियां पटक उपद्रवी छात्रों को खदेड़ा. छात्रों के दो गुटों के बीच तनाव को देखते हुए लल्ला चुंगी, बैंक रोड, केपीयूसी, जीएन झा, लक्ष्मी टॉकीज के पास भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया. पथराव में घायल विधि छात्र वीरेंद्र कुमार और मृत्युंजय कुमार अस्पताल भर्ती है. इसके अलावा छह छात्र मामूली रूप से जख्मी हुए. बाबासाहेब के परिनिर्वाण दिवस पर दलितों की बस्ती पर सैकड़ों लोगों ने किया हमला
सातारा। महाराष्ट्र के सातारा जिले के अंतर्गत आने वाले चिंचनेर गांव में लगभग 200 लोगों ने दलित बस्ती पर हमला कर दिया. इस हमले में लोगों ने दलितों के 40 घरों को तबाह कर दिया. लोगों ने घरों में तोड़-फोड़ की और बस्ती में खड़ी मोटर साइकिल-कारों पर भी पथराव किया.
दलित बस्ती पर ये हमला बाबासाहेब के परिनिर्वाण दिवस पर हुआ. लोगों ने दलितों के घरो में तोड़-फोड़ कर दी और 25 से 30 मोटर साइकिल-गाड़ियों को भी आग के हवाले कर दिया. गांव में अचानक हुए इस हमले से दंगे जैसे हालात है. पूरा माहौल तनावग्रस्त हो गया है. पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ पुलिस फोर्स तैनात की गयी. घटना को गंभीरता से लेते हुए पुलिस अधिक्षक संदीप पाटिल भी तैनात रहे. इस संदर्भ में 25 संदिग्ध गुनाहगारों को गिरफ्तार किया गया है.
गांव के दलित व्यक्ति ने बताया कि बाबासाहेब के महापरिनिर्वाण पर इस घटना का होना बहुत गंभीर है. बाबासाहेब ने दलितों के उत्थान के लिए जीवन समर्पित किया था. लेकिन उन्हीं के परिनिर्वाण दिवस पर इस तरह की घटना होना चिंता की बात है.
गौरतलब है कि लगभग एक महीने पहले नासिक में भी इसी तरीके से दलित बस्तियों पर हमले हुए थे. इस संबंध में हाइकोर्ट में एट्रोसिटी एक्ट के अंतर्गत केस लड़ा जा रहा है. एक महीने में यह दूसरी बड़ी घटना है. 
