सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय बसपा का नारा नहीं, नीति है- आजमगढ़ में मायावती

पूर्वांचल के प्रमुख हिस्सों को ध्यान में रखकर आजमगढ़ में आयोजित की गई बसपा की महारैली में पार्टी अध्यक्ष मायावती आगरा से बदले अंदाज में दिखीं. अपने भाषण के दौरान उन्होंने विपक्ष पर जमकर निशाना साधा तो यह भी साफ कर दिया कि अगर बसपा सरकार में नहीं आई तो उत्तर प्रदेश अपराध प्रदेश ही बना रहेगा. अपने भाषण में बसपा मुखिया ने पूर्वांचल के लोगों को भरोसा दिलाया कि प्रदेश में बसपा की सरकार आने पर पूर्वांचल के विकास पर पूरा ध्यान दिया जाएगा. सपा मुखिया मुलायम सिंह के क्षेत्र में उन्हें ललकारते हुए पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि आजमगढ़ के लोगों ने सपा मुखिया को इसलिए यहां से जीताया था क्योंकि उनको भरोसा था कि आजमगढ़ भी सैफई और इटावा की तरह चमकने लगेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ. उन्होंने आजमगढ़ के लोगों का आवाहन करते हुए कहा कि इसका बदला आजमगढ़ और पूर्वांचल के सभी विधानसभा सीटों पर यूपी चुनाव में हरा कर लेना है. रविवार 28 अगस्त की यह रैली आजमगढ़, बलिया, और अम्बेडकर नगर क्षेत्रों की संयुक्त रैली थी. सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय नारा नहीं, बसपा का सिद्धांत आजमगढ़ की रैली में बसपा प्रमुख ने साफ किया कि सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय बसपा का सिर्फ नारा नहीं है बल्कि हमारी पार्टी इसी सिद्धांत पर चलती है. उन्होंने भरोसा दिलाया कि बसपा में सिर्फ बहुजन नहीं बल्कि सर्व समाज का हित सुरक्षित है. सवर्ण वोटरों को भड़काने के लिए विपक्ष द्वारा तिलक-तराजू … वाले नारे का प्रचार किए जाने पर मायावती ने कहा कि इसमें कोई सच्चाई नहीं है, क्योंकि अगर ऐसा होता तो हम ऊंची जाति के लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर नहीं रखते. उन्हें एमएलसी और अन्य पदों पर नहीं बिठाते. अच्छे दिन लाने के वायदे बुरे दिन में तब्दील हो गए हैं केंद्र पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि भाजपा की केंद्र सरकार के अच्छे दिन के नारे अब बुरे दिन में तब्दील हो गए हैं. देश का अल्पसंख्यक और दलित खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है. भाजपा पर प्रहार करते हुए उन्होंने कहा कि केंद्र से दिल्ली की कानून व्यवस्था तो संभल नहीं रही है, यूपी की क्या संभालेगी. कांग्रेस कितनी भी पदयात्रा कर ले यूपी में सरकार नहीं बना सकती पूर्वांचल के लोगों को कांग्रेस की असलियत बताते हुए पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि बसपा सरकार के दौरान मैं पूर्वांचल को अलग राज्य का दर्जा देना चाहती थी लेकिन केंद्र की कांग्रेस सरकार ने इस मुद्दे को दबा दिया. उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने जिस शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया है, वह दिल्ली को गंदा होने के लिए पूर्वांचल के लोगों को जिम्मेदार ठहरा चुकी हैं. पहले सोनिया गांधी के रोड शो और अब राहुल गांधी का रोड शो और पदयात्रा का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि कांग्रेस जितनी भी पदयात्रा कर ले, यूपी में सरकार नहीं बना सकती. यूपी में महिलाएं सुरक्षित नहीं रैली में महिलाओं की उपस्थिति भी अच्छी खासी थी. उन्हें भावनात्मक सहारा देते हुए मायावती ने कहा कि यूपी में महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं. हर दिन आबरु लूट रही है. प्रदेश में 75 जिलों हैं,  हर दिन किसी न किसी जिले में बहनों-बेटियों की आबरु लूट रही है. भाजपा की हालत खऱाब, कैंडिडेंट नहीं मिल रहे बसपा द्वारा निकाले गए नेताओं पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि प्रदेश में भाजपा की हालत खराब है. भाजपा को यूपी में कैंडिडेट तक नहीं मिल रहे हैं. यही वजह है कि वह दूसरी पार्टी के नेताओं को तोड़कर और बसपा द्वारा निकाले गए नेताओं को टिकट दे रही है और उन्हें साथ लेकर घूम रही है. स्वार्थी बागी नेताओं पर निशाना बसपा छोड़कर दूसरी पार्टियों में गए स्वार्थी नेताओं पर वार करते हुए बसपा प्रमुख ने उनका आभार जताया. उन्होंने कहा कि पार्टी से अलग होने के लिए मैं उनका आभार जताती हूं. यह हमारे पार्टी और आंदोलन के हित में अच्छा हुआ. उन्होंने कहा कि अच्छा हुआ कि यह गंदगी बीजेपी में चली गई है. विपक्षियों की साजिश से रहें सावधान कुछ महीने पहले सर्वे में बसपा को नंबर वन बताए जाने और फिर हाल ही में उसे नीचे दिखाए जाने को साजिश करार देते हुए उन्होंने कहा कि यह भाजपा को समर्थन देने वाले मीडिया वालों की साजिश है. उन्होंने ऐसा इसलिए किया ताकि बसपा के समर्थक ढीले पर जाए और भाजपा को इसका फायदा मिले. दलितों को जमीन के पट्टे दिलाए जाएंगे, दोषियों के खिलाफ दर्ज होगी एफआईआर सपा सरकार में जिन लोगों की एफआईआर दर्ज नहीं होती है, बसपा सरकार आने पर उन्हें न्याय दिलाया जाएगा. जिन पीड़ित लोगों की शिकायत के बावजूद पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं कराई है ऐसे पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई की जाएगी. दलितों को जमीन के पट्टे दिलवाए जाएंगे. जिन जिलों और पार्कों आदि के जो नाम बदले गए हैं, उनको फिर बहाल कराया जाएगा.

रमणिका गुप्ता और अंतरंगता का उत्सव

मैं रमणिका गुप्ता (जी) को नहीं जानता. मतलब बहुत अच्छे से नहीं जानता. उन्होंने जो किताबें लिखी हैं, उनके बारे में जानता हूं. उनकी मैग्जीन, उनके प्रकाशन और आदिवासियों के लिए किए गए उनके काम के बारे में जानता हूं. उनकी व्यक्तिगत जिंदगी के बारे में बहुत ज्यादा नहीं जानने का कारण यह भी हो सकता है कि उनके और मेरे उम्र का अंतर काफी ज्यादा है. 2016 के विश्व पुस्तक मेले में पहली बार उनको देखा था. बमुश्किल एक 18-19 साल के नवयुवा का सहारा लिए वह पुस्तक मेले में घूम रही थीं. पीछे कुछ और लोग भी थे. सोशल मीडिया और कुछ किताबों में उनकी तस्वीर देखी थी सो उन्हें पहचान गया. हां, बात और मुलाकात नहीं हो पाई थी, क्योंकि किसी से भी एकदम से जाकर मिल लेने में मैं हमेशा से सकुचाता रहा हूं. 31 अगस्त वाले इंडिया टुडे के अंक में उनकी एक किताब की चर्चा ने इतने दिनों बाद मुझे उनका जिक्र करने पर मजबूर किया है. उनकी आत्मकथा आई है, ‘आपहुदरी… एक जिद्दी लड़की की आत्मकथा’ के नाम से. इससे पहले उनकी आत्मकथा का पहला खंड ‘हादसे’ के नाम से आ चुका है. फिलहाल चर्चा दूसरे खंड आपहुदरी की. इंडिया टुडे में इसी का जिक्र है. पत्रिका ने इसे अपना एक शीर्षक दिया है, ‘अंतरंगता का उत्सव.’ और इसी ‘उत्सव’ की झांकी ने मुझे यह लेख लिखने पर मजबूर कर दिया. क्योंकि बहुत संक्षिप्त में दिए गए पुस्तक के कुछ अंश मेरे मन में सवाल छोड़ गए. यहां गुप्ता जी के आत्मकथा के अंश का जिक्र करते हुए लिखा है, “मैं अब सब परिधियां बांध सकती थी, सीमाएं तोड़ सकती थी. सीमाओं में रहना मुझे हमेशा कचोटता रहा है, सीमा तोड़ने का आभाष ही मुझे अत्यधिक सुखकारी लगता है. मैं वर्जनाएं तोड़ सकती हूं… अपनी देह की मैं खुद मालिक हूं. मैं संचालक हूं. संचालित नहीं.” उनकी आत्मकथा के एक अन्य अंश को भी देखिए, “यौन के बारे में भक्ष्य-अभक्ष्य क्या है, समाज इसका फैसला तो करता रहा है, पर उसने समझ के साथ अपने मानदंड नहीं बदले… व्यक्ति बदलता रहा, प्यार की परिभाषाएं, सुख की व्याख्या, यौन का दायरा सब तो देशकाल के अनुरूप बदलता है. रिश्ते भी सापेक्ष होते हैं. दुर्भाग्यवश समाज ने अपना दृष्टिकोण नहीं बदला खासकर भारतीय समाज ने.” कुछ लाइनें इस किताब को पढ़ने (शायद) के बाद समीक्षक मनोज मोहन ने लिखी है. मनोज लिखते हैं, “इस भारतीय समाज के जिन पुरुषों से रमणिका गुप्ता का साबका पड़ता है उनमें उनका पति, पति के दोस्त, नेता, नेता के साथ चलने वाले छुटभैये, ओहदेदार पुरुषों की भी लंबी फेहरिस्त है.” इतनी लंबी फेहरिस्त को लांघने के बाद इस शिखर पर पहुंची रमणिका गुप्ता अपनी उम्र के 86वें वर्ष में हैं. मुझे नहीं पता कि आज वो अपने जीवन के तीसरे और चौथे दशक को किस तरह देखती हैं. मेरे मन में बस इतना सा सवाल भर है कि जिन परिस्थितियों को लांघ कर वह इस मुकाम तक पहुंची हैं और उन्होंने जो सफलता अर्जित की है, वह सफलता उनकी अपनी कितनी है? अपनी आगे बढ़ने की अकांक्षाओं और सीमाओं को तोड़ने को तैयार एक मनुष्य के लिए क्या सफलता आसान नहीं हो जाती है? जब वो औरत हो तो तब तो कई मामलों में सफलता चल कर आती है. ऐसे में क्या उसकी सफलता में उन लोगों का भी हिस्सा नहीं हो जाता जिनको लांघ कर उसने वह सफलता पाई होती है. मैं यहां साफ कर देना चाहता हूं कि मैं कोई स्त्री विमर्श नहीं कर रहा हूं, और न ही स्त्री के देह और वर्जनाओं पर सवाल उठा रहा हूं. मैं रमणिका गुप्ता जी की इन लाइनों का विरोध नहीं करता कि स्त्री अपनी देह की मालिक खुद है. निस्संदेह यह उसकी अपनी ‘स्वतंत्रता’ हो सकती है. मैं तो बस उस सफलता की बात कर रहा हूं जो उसे तमाम रास्तों से गुजरने के बाद मिलती है, क्योंकि जब कोई सीढ़ियां चढ़कर छत पर पहुंचता है तो जाहिर है कि उसके ऊपर पहुंचने में सीढ़ियों का भी योगदान होता है. मेरी समझ से ऐसी सफलता अकेले की सफलता नहीं है. और जहां तक व्यक्तिगत जीवन और देह की स्वतंत्रता का उत्सव मनाने की बात है तो आत्मकथा के बहाने जीवन के निजी पलों और संबंधों को बेचना कुछ साहित्यकारों का शगल बनता जा रहा है.

जाति का एशियाई संदर्भ

एक पत्रिका के लेख में प्रसिद्ध उद्योगपति वॉरेन बफेट ने एक सवाल उठाया था कि “एक ही मां के गर्भ से जन्में जुड़वों का समान रुप से चुस्ती, शक्ति-सामर्थ्य है. उनमें से एक का जन्म बांग्लादेश में और दूसरे का अमेरिका में होगा तो क्या होगा? उनका नसीब कैसा रहेगा? व्यक्तियों के सामाजिक स्तर के अनुसार उसके भविष्य का निर्माण कैसा होगा?” उन्होंने विनम्रता के साथ गहरे और गंभीर विषय को सामने रखते हुए कहा है कि अमेरिका में जन्म के स्तर पर व्यक्ति के साथ कोई भेदभाव नहीं होता है. इसका प्रत्यक्ष उदाहरण स्वयं मेरा जीवन है. मुझे किसी भी व्यवसाय को चुनने की आजादी इस धरती और देश ने प्रदान की है. अगर मैं कहीं दूसरी जगह जन्म लेता तो कभी भी इस स्थान तक नहीं पहुंच सकता था. लेकिन एक बात तो विचारणीय है कि अमेरिका जैसे प्रजातांत्रिक देश में भी नस्लगत भेद-भाव उस देश की छवि को धूल-धूसरित करता है. कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि व्यक्तियों के भविष्य निर्माण में देशगत, प्रांतीय, धार्मिक और जातीय आधारों की विशिष्ट भूमिका रहती है. भारतीय समाज व्यवस्था की स्थिति बहुस्तरीय है. भारतीय समाज व्यवस्था के ऊपरी पायदान पर ‘सवर्ण’ केंद्रित है तो दूसरी और निचले पायदान पर ‘अंत्यज’ या ‘दलित’. क्या दलितों को इस समाज-व्यवस्था ने मानवीय दर्जा दिया है? भारत जैसे देश की संस्कृति की गाथा हजारों वर्षों से गायी जा रही है. जबकि इस देश की समाज-व्यवस्था ने क्रूरता, बर्बरता एवं अमानवीयता का परिचय कर्म और व्यवहार के स्तर पर दलितों के संदर्भ में दिया है. श्रमशील तबकों को हाशिये पर रखा गया है. मेहनतकश लोगों के श्रम की बुनियाद पर ही यह समाज-व्यवस्था टिकी हुई है. जबकि जातीय अहंकार और दंभ के कारण निर्दोष भारतीय नागरिक समुदाय का एक हिस्सा निरंतर उपेक्षा, अपमान और नागरिक अधिकारों से वंचित किया जा रहा है. क्या सभ्य संस्कृति का यह अर्थ लगाया जाए कि मनुष्य का मनुष्य पर अत्याचार एक श्रेष्ठ सभ्यता का विशेष गुण है? भारत सरकार के एक अध्ययन के अनुसार भारत में दलित तबकों के बच्चे जीवन की आधारभूत सुविधाओं विशेषकर पोषण की कमी की वजह से जन्म लेने के बावजूद भी अन्य तबकों के बच्चों की तुलना में औसत आयु के स्तर पर चार साल कम जीवित रह पाते हैं. जन्म लेने वालों में से आधे से ज्यादा बच्चे पौष्टिक आहार की कमी से जूझ रहे हैं. भारत की औसत बाल जन्म दर में हर सौ बच्चों के आंकड़े को देखा जाय तो उनमें से 12 बच्चे पांच वर्ष की अवस्था से पूर्व ही अकाल काल के ग्रास बन रहे हैं. दलित तबकों के हर पांच बच्चों में से एक ही ठीक से स्कूल जा पाता है. हर 3 बच्चों में से एक बर्बर गरीबी का शिकार हो रहा है. दलित तबकों की 31% महिलाएं रक्त की कमी से परेशान हैं. भारत देश में छः हजार जातियां हैं. उसमें भी अस्सी फीसदी से अधिक दबी-कुचली जा रही जातियां हैं. हजारों वर्षों से तड़पते हुए वर्ण-व्यवस्था के लोहे के शिकंजे के पिंजरे में फंसकर, अवसरों से वंचित होकर निचले पायदान पर ही जीते जा रहे जन-समुदायों की स्थिति कैसी होगी? भारत के संविधान निर्माताओं ने जो स्वप्न देखने की आकांक्षा चाही थी उसे जाति-प्रथा से युक्त समाज-व्यवस्था ने साकार नहीं होने दिया. जाति-प्रथा से पीड़ित तबकों के सुधार में असफलताओं की गणना संभव ही नहीं है. आज भी सरकारी, गैर-सरकारी शौचालयों में अमानुषिक कृत्य करने वाले ‘मेहतर’ (भंगी) या ‘सफाईकर्मियों’ की संख्या दस लाख से अधिक होने की संभावना की सूचना सरकारी गणना के स्तर पर सामने आयी है. आंध्रप्रदेश के साथ-साथ देश के अनेक राज्यों में आज भी भेद-भाव पूर्ण ‘दो गिलास’ की पद्धति व्यवहार में है. दलितों का मंदिरों में प्रवेश न होने देना और सवर्णों द्वारा उपयोग में लाये जा रहे कुंओं से पानी पीने की सुविधा नहीं देना जैसे अमानवीय कार्य केवल जन्मगत आधार पर ही तो हो रहे हैं. जाति-व्यवस्था के कारण ही वैश्विक स्तर पर 26 करोड़ आबादी कष्ट सह रही है. दृढ़ कानूनी प्रावधानों के बावजूद भी वे सामाजिक न्याय से मोहताज हैं. विशेष रुप से दक्षिण एशिया के देशों में यह प्रथा व्यवस्थीकृत होकर जड़ें जमा चुकी हैं. संयुक्त राष्ट्र संघ की मानवाधिकार समिति की स्वतंत्र समिति ने चिंता व्यक्त की है कि आज भी दक्षिण एशिया के देशों में दलितों के साथ अछूत व्यवहार किया जा रहा है. यह विचारणीय और सोचनीय बिंदु है कि कैसे भारत विश्व की चौथी अर्थ-व्यवस्था होने पर गुमान कर रहा है और उसी के देश में मानव समुदायों के साथ इस तरह का अन्याय हो रहा है. पाकिस्तान जैसे देश में भी जाति-व्यवस्था का एक रुप दिखाई दिया है. पाकिस्तान में कानूनन शेड्यूल्ड कॉस्ट के नाम से घोषित किये गये हिंदुओं में निम्न जातियों को ‘कहूट्स’(अस्पृश्य) कहा जाता है. ‘कहूट्स’ एक सामाजिक वर्ग है. इस वर्ग के लोग मछली, सफाई एवं ईट के भट्टों पर काम करने वाले किसानों की जमीन पर भूमिहीन मजदूर के रुप में काम करते हैं. यह वर्ग पाकिस्तान के समाज में बिल्कुल सम्मानहीन होकर रह गया है. हिंदुओं की निम्न जातियों में से 93% लोग पाकिस्तान के ग्रामीण प्रांतों से ही हैं. पाकिस्तान के थरपर्कर जिले में निम्न जाति की जनसंख्या 45 फीसदी है. इस आबादी के सात व्यक्तियों में से केवल एक ही पढ़ पा रहा है. विभिन्न प्रकार के अध्ययनों की रिपोर्टों के अनुसार, पाक में लगभग बीस लाख लोग दलित बनकर तरह-तरह की यातनाओं के शिकार होने लगे हैं. बांग्लादेश और श्रीलंका में पिछड़ी हुई जातियों के लिए कोई अलग प्रावधान नहीं है. मगर पाकिस्तान में शिक्षा और सरकारी नौकरियों में इन्हें 6% आरक्षण का प्रावधान किया गया है. लेकिन यह प्रावधान कागजों तक ही सीमित होकर रह गया है. पाकिस्तान के सिंध और पंजाब प्रांतों में अत्यधिक संख्या में दलित बंधुआ मज़दूर बनकर नारकीय जीवन जी रहे हैं. हिंदुओं की निम्न जाति के 83.6% जनता के पास एक गज जमीन भी नहीं है. धर्म के रुप में इस्लाम समानता की बात तो करता है, लेकिन हिंदुओं की निम्न जातियों के लोगों को आज भी वहां के हज्जाम की दुकानों में प्रवेश नहीं मिला है. अगर किसी होटल में जायें तो नीचे बैठकर खाने के साथ, थाली, गिलास भी धोने को मजबूर होना पड़ता है. मुसलमानों में भी सल्ला, सच्चि, मोच्चि, पथेर, भंगी वर्गों को निम्न से निम्न जाति कहकर हीनता के भाव से देखने की स्थिति भी बदस्तूर जारी है. छूआछूत के मामले में नेपाल भी पीछे नहीं है. नेपाल में लगभग 45 लाख दलित आबादी आज भी अग्रवर्णों के दमन को मौन रुप से सह रही है. निम्न जाति के द्वारा छुए गए पानी को भी फेंके जाने की अमानवीय प्रथा नेपाल में आज भी जारी है. मंदिर में प्रवेश करना, दूसरे वर्ग के शादियों में जाना और अंतर्जातीय विवाह जैसी बातें नेपाल दलित सपने में भी नहीं सोच सकता. वहां के शासन द्वारा 1963 में जातिगत अस्पृश्यता का निषेध किया जा चुका है. बावजूद इसके व्यवहार में आज तक जारी है. 1990 के संविधान में उसे दंड दिया जाने वाला अपराध माना गया है. 2007 तक के (तात्कालिक) संविधान में उसमें और कुछ जोड़कर जाति व्यवस्था को रोकने का प्रयास किया गया था. लेकिन वे सारे नियम आचरण में व्यर्थ ही सिद्ध हुए हैं. गरीबी दलितों को कहीं का नहीं छोड़ रही है. नेपाल में 53% साक्षरता होने पर भी वहां के दलितों की साक्षरता दर 33.8 फीसदी ही है. नेपाल की जनता में 3.4% के पास डिग्री है तो, दलितों में वह संख्या केवल 0.4%ही है. राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं की औसत आयु 58.9 वर्ष है, वहीं दलित महिलाओं का औसत स्तर 50.8 वर्ष ही है. उस देश के दलितों में आधे से ज्यादा गरीबी रेखा के नीचे ही गिड़गिडा रहे हैं. नेपाल की राज्य सभा में दलितों का प्रतिनिधित्व कभी भी 10% से ज्यादा नहीं हो पाया है. जाति-व्यवस्था के खिलाफ बांग्लादेश के संविधान में स्पष्ट रुप से प्रावधान होने के बावजूद भी वह कागजों पर ही दिखाई दे रहा है. बांग्लादेश में लगभग आधे करोड़ से भी ज्यादा दलितों के होने का अनुमान है. कहां जीना है? किन जगहों पर खेलना है? किन होटलों में खाना है? कहां चाय पीनी है? कैसे पीना है? कौन से श्मशान घाटों का उपयोग करना है? ऐसे नियमों से भरी लंबी तालिका होने पर भी बांग्लादेश में दशकों से जाति-प्रथा का आचरण में व्यवहार हो रहा है. यह सब कुछ किसी लिखित अधिनियम के अनुसार नहीं चल रहा है. घृणा भरी नज़रों से, खुलेआम ही यह सब चल रहा है. हिंदू दलितों में 64 फीसदी अनपढ़ हैं. हिंदू-मुस्लिम धर्मों से जुड़े पिछड़ी जातियों के लोग बर्बर प्रथा का सामना करने का मुख्य कारण आवश्यक सुविधाओं का उपलब्ध न होना ही है. वहां के दलितों का आर्थिक स्तर का एक आंकड़ा निम्न वस्तुओं के उपयोग के स्तर पर देखा जा सकता है. टेलिफोन, रेडियो का 9% और सायकिल का 14.5% उपयोग वहां की दलित आबादी करती है. बांग्लादेश के स्वतंत्र होने पर (1971) 1974 में वेस्टेड प्रापर्टी एक्ट बना. इसके अनुसार, राज्य के लिए दुश्मन बनकर रहने वाले व्यक्तियों के ज़मीन को बिना किसी पूर्व सूचना के आधार पर ही सरकार अपने क्षेत्र/ वश में कर सकती है. इसके चलते हिंदुओं के जमीन को उनमें भी विशेष रुप से निस्सहाय दलितों के ज़मीन को बड़े पैमाने पर सरकार द्वारा हड़प लिया गया है. इस कारण से गरीबी के शिकंजे में फंस कर वहां के दलितों के जीवन और अस्तित्व को इस कानून ने सड़क पर ला दिया है. एक अन्य एशियाई देश श्रीलंका में बहुसंख्यक सिंहलियों का प्रभुत्व है. देश के उत्तर-पूरब प्रांत के तमिल चाय के बागानों (खेतों) में 150 वर्षों से काम कर रहे भारतीय तमिलों में तीन प्रकार की जाति व्यवस्थाएं चल रही है. दक्षिण एशिया में जातिगत असमानताएं थोड़ी बहुत कम दिखाई देने वाला देश श्रीलंका ही है. जातियों के बीच चले तीव्र संघर्ष के बावजूद कहना होगा कि इस देश में जाति-प्रथा का क्रूर रूप उतना अधिक नहीं हो पाया है. प्रतिदिन युद्ध के माहौल से जूझते हुए जाफ़ना समाज में जाति आधारित व्यवस्था पर टॉयगर्स के द्वारा प्रतिबंध लगाया गया था. श्रीलंका के चाय के बागानों में काम करने वाले तमिल श्रमिकों पर वहां की व्यवस्था ने निम्न वर्ग के होने का चस्पा लगा दिया है. बहुत से अध्ययनों के अनुसार अवगत होता है कि श्रीलंका की आबादी में लगभग 30% (पचास लाख) लोग किसी न किसी रुप में एक ही स्थान पर जातिगत विषमता का सामना कर रहे हैं. ‘वेलक्लॉर’ नाम की अग्रवर्ण के वर्चस्व वाली जाति के प्रार्थनालयों में ‘पंचमार’ नाम की निम्न जाति के लिए आज भी प्रवेश वर्जित है. तमाम आंकलन को देखने के बाद कहा जा सकता है कि पूरे दक्षिण एशिया में जाति प्रथा का जहर इस स्तर तक फैलने का कारण भारत की समाजिक व्यवस्था ही है. जाति और उसके साथ जुड़कर विभाजित हुए पेशों ने भारत की अधिसंख्यक जनता के जीवन में अंधकार भरने का कार्य किया है. यह न मिटा देने वाला एक सामाजिक सच है. भारतीय राष्ट्रीय नवजागरण के अग्रदूत और आधुनिक युग के महत्वपूर्ण सामाजिक चिंतक डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने इस कड़वे सच को बखूबी देखा था. शायद यही वजह थी कि उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा था कि भारत में ‘स्वतंत्रता-आंदोलन से भी ज्यादा कठिन जाति-उन्मूलन का कार्य है.’ – लेखक हैदराबाद विवि हैदराबाद में दलित-आदिवासी अध्ययन एवं अनुवाद केंद्र में अतिथि अध्यापक हैं. संपर्कः- 09059379268

बाबा साहेब के ब्राह्मणीकरण की साजिश

भारत में जो भी ज्ञानी-ध्यानी लोग पैदा होते हैं…. वो किसी भी जाति में पैदा हों….. ये ब्राह्मण उन्हें अपनी संतान कहने का कोई न कोई कारण ढूंढ ही लेते हैं…. इस जन्म की बात घोषित करें या पूर्वजन्म की….. यानि कि चित भी मेरी….पट भी मेरी……ये हिन्दू को मुसलमान और मुसलमान को हिन्दू बनाने में तनिक भी देर नहीं करते…… साईं बाबा मुसलमान थे….. उन्हें अपना ईष्ट बना लिया और ……. हो गई पौबारा…. वर्ष भर में इतना दान किसी और देवता के नाम पर नहीं आता जितना साईं बाबा के मन्दिर पर आता है……और ये अधम अपने आपको उनकी कृपा पर ही छोड़ देते हैं……. यही कारण है कि भारत से कभी भी दास प्रथा जाने वाली नहीं लगती…एक कारण और भी है कि अधम समाज में पैदा हुए तथाकथित समाज सुधारक अपना पेट भरने में ही जुटे रहे और आज भी वैसा ही हो रहा है. उल्लिखित है कि साईंबाबा जिन्हें शिरडी साईंबाबा भी कहा जाता है और जिन्हें मुसलमान जाति का बताया जाता है….. पिछले महीनों हिन्दू मठाधीशों ने साईंबाबा की जाति को लेकर काफी हौ-हल्ला भी किया था. कहा गया था वो एक फकीर थे जिन्हें उनके भक्तों द्वारा संत कहा जाता है. उन्हें भगवान कैसे माना जा सकता है किंतु हिन्दुओं के बड़े तबके ने शोर मचाने वालों की एक नहीं सुनी और साईंबाबा भगवान ही बने हुए है. कारण यह नहीं कि हिन्दू मुसलमनों के प्रति सम्मान का भाव रखते हैं, कारण ये है कि साईंबाबा बाबा के शिरडी स्थित मन्दिर में इतना चढ़ावा आता है जो कई हिन्दू देवताओं के नाम पर बने मन्दिरों में आने वाले चढ़ावे से भी कई गुना होता है. ब्राह्मण जो कभी राम-कृष्ण का भक्त हुआ करता था, अब अब साईं बाबा का पक्का भक्त बन गया है क्यूं की वो साईं के बड़ते हुए भक्तो की संख्या और उसपे चढ़ने वाले चढ़ावे के लालच को कैसे छोड़ सकता है …इसलिए अब हर मंदिर में उनकी मूर्ति स्थापित करता है, पर ये वही ब्रह्माण वर्ग है जिसने साईं को जीते-जी कभी मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया …और अब उनकी मूर्ति मंदिर में स्थापित करता है और दिन रात साईं के गुण गाने में मग्न है. बड़े-बड़े तथाकथित दलित राजनेता पालतू कुत्ता बने रहकर कुर्सी पाने के लालच में वर्चस्वशाली राजनैतिक दलों के नेताओं न केवल तलुए चाटने पर लगे होते हैं… सत्ता में कुर्सी पाने के बाद “ब्राह्मण” हो जाते हैं. कमजोर और निरीह जनता को तो केवल मोहरा बनाए रखने का काम करते हैं. कहना न अतिश्योक्ति न होगा कि समाज के कमजोर और निरीह समाज में पैदा हुए बुद्धिजीवी ब्राह्मणवाद के शिकार होने से नहीं बच पाते. और जो बच जाते हैं, उनको ब्राह्मण घोषित करने के प्रयास बार-बार किया जाता रहा है. 21 अगस्त को ही उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में ब्राहमण चेतना मंच के कार्यक्रम में भाजपा के राज्यसभा सांसद शिव प्रताप शुक्ल ने अपने संबोधन में कहा, “बाबा साहेब अंबेडकर दलित नहीं थे, वो सनाड्य ब्राह्मण थे. वो पंडित दीनदयाल उपाध्याय से प्रेरित थे, उन्होंने लोगों को ऊपर उठाने का काम किया, इसलिए उन्होंने संविधान लिखा. उनका नाम अंबेडकर नहीं था उनका नाम था भीमराव, लेकिन अब उन्हें बाबा साहेब अंबेडकर कहा जाता है.” भाजपा के राज्यसभा सांसद शिव प्रताप शुक्ल का यह बयान यूं ही नहीं आया होगा अपितु इस बयान के पीछे बाबा साहेब के ब्राह्मणीकरण की बू आती है. उन्होंने बसपा का नाम लिए बिना निशाना साधते हुए आगे कहा कि इस देश में ब्राह्मणों ने इतिहास रचा था, लेकिन आज यहां अम्बेडकर के नाम पर राजनीति होती है. जरा भी कुछ हो जाता है तो दंगे शुरू हो जाते हैं. लेकिन अंबेडकर का नाम भीमराव न कहकर बाबा साहब अंबेडकर कहने वाले लोगों से पूछना चाहता हूं कि भीमराव को उनकी प्राथमिक शिक्षा दिलाने का काम किसने किया था, उन्हें यूरोप में शिक्षा दिलाने का काम किसने किया था. भीमराव अपने नाम के आगे अंबेडकर की उपाधि लगाए थे, यह उनका नाम नहीं था… सांसद शिव प्रताप शुक्ल के इस बयान से स्पष्ट हो जाता है कि उनको बाबा साहेब के जीवन के बारे में कुछ भी पता नहीं है. जब उन्हें इतना ही पता नहीं है कि बाबा साहेब की प्राथमिक और उच्च शिक्षा दिलाने के पीछे कौन-कौन लोग रहे तो उन्हें और क्या पता होगा. उनका यह बयान हवा में पत्थर उछालने जैसा ही है. बिना सिरपैर की बयानबाजी करना ही ब्राह्मण की सबसे बड़ी खूबी है जिसके जाल में अज्ञानी लोग आराम से फंस जाते हैं. आरएसएस और अब उसके द्वारा पोषित भाजपा का यह कोई पहला अवसर नहीं है कि जब उसने किसी न किसी के जरिए बाबा साहेब को अपने पाले में करने और अनुसूचित जातियों में फूट डालने का प्रयास किया है. इससे पूर्व भी ‘राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ’ पहले भी ऐसे कार्य कर चुकी है. संघ के झंडेवालान द्वारा प्रकाशित डा. कृष्ण गोपाल द्वारा लिखित पुस्तक “ राष्ट्र पुरूष: बाबा साहब डा. भीमराव अम्बेडकर” में अनेक ऐसे झूठे प्रसंग है. जिनके कोई हाथ-पैर तो क्या कोई जमीन तक भी नहीं है. इन प्रसंगों के जरिए बाबा साहब को पूरा-का-पूरा सनातनी नेता, गीता का संरक्षक, यज्ञोपवीत कर्ता, महारों को जनेऊ धारण कराने वाले के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो बाबा साहब के प्रारंम्भिक जीवन काल के हैं. दुख तो ये है कि संदर्भित पुस्तक के रचियता ने 1929 और 1949 के बीच के वर्षों पर कोई चर्चा नहीं की है जबकि बाबा साहब का मुख्य कार्यकारी दौर वही था. पुस्तक के लेखक ने सबसे ज्यादा जोर बाबा साहब को मुस्लिम विरोधी सिद्ध करने पर लगाया है जो दुराग्रह पूर्ण कार्य है. इतना ही नहीं, डा. कृष्ण गोपाल के मन का मैल पुस्तक के पेज 5 पर उल्लिखित इन शब्दों में स्पष्ट झलकता है– “एक अपृश्य परिवार में जन्मा बालक सम्पूर्ण भारतीय समाज का विधि-विधाता बन गया. धरती की धूल उड़कर आकाश और मस्तक तक जा पहुंची”.  इस पंक्ति का लिखना-भर ही सीधे-सीधे बाबा साहेब का अपमान करना है, और कुछ नहीं. इन पंक्तियों में पूरा का पूरा मनुवाद भरा पड़ा है. लेखक तेजपाल सिंह तेज  एक लेखक हैं.  तेजपाल सिंह तेज को (हिन्दी अकादमी (दिल्ली) ने बाल साहित्य पुरस्कार और साहित्यकार सम्मान  से सम्मानित किया जा चुका है. इनका संपर्क सूत्र tejpaltej@gmail.com है.

बिहारः अम्बेडकर छात्रावास में सवर्ण छात्र!

पटना। अम्बेडकर छात्रावास अनुसूचित जाति/जनजाति के विद्यार्थियों के लिए एक सहारे की तरह रहा है. गरीब वर्ग के दलित छात्र यहीं अपने जीवन के सपने बुनते हैं. अपने समाज के अन्य छात्रों के बीच रहकर उनका विकास होता है. लेकिन बिहार सरकार इसमें सेंधमारी करने जा रही है. बिहार सरकार ने अम्बेडकर छात्रावास में सवर्ण छात्रों को रहने की इजाजत दे दी है. सरकार ने इसके लिए कागजी फरमान भी जारी कर दिया है, जिसमें साफ लिखा है कि अनुसूचित जाति/ जनजाति के छात्रावास में एससी/एसटी छात्रों की सीटें खाली रहने पर ओबीसी (पिछड़ा) और फिर जनरल (सामान्य) छात्र अम्बेडकर हॉस्टल में रह सकते हैं. बिहार सरकार के अनुसूचित जाति/जनजाति कल्याण विभाग के प्रधान सचिव प्रेम सिंह मीणा के द्वारा इस आशय का आदेश 15-07-2016 पत्रांक- 4680 को जारी किया जा चुका है. बिहार सरकार के इस फैसले ने दलितों को एक और झटका दिया है. पूर्व में प्रशासनिक अधिकारी रहे एवं वर्तमान में लेखन और पत्रकारिता में सक्रिय बुद्ध शरण हंस ने सरकार की इस मंशा पर सवाल खड़ा किया है. उन्होंने कहा कि सरकार अगर ऐसा कर रही है तो यह पूरी तरह से दलित विरोधी षड्यंत्र है. अम्बेडकर छात्रावास स्पेशल कंपोनेंट प्रोग्राम के तहत एससी/एसटी वेलफेयर के लिए जारी पैसे से बनता है. यह छात्रावास सिर्फ एससी/एसटी छात्रों के लिए होता है. इसमें दूसरे वर्ग के छात्र कैसे रह सकते हैं. बुद्ध शरण हंस ने सवाल उठाते हुए कहा कि अम्बेडकर हॉस्टल में सीटें खाली रहने का तो सवाल ही नहीं है, क्योंकि अब तो ज्यादा बच्चे आ रहे हैं. मुझे शक है कि कहीं सरकार बाद में यह न कहने लगे कि छात्रावास सिर्फ योग्य एससी छात्रों को ही दिया जाएगा. इसी सरकार ने हाल ही में एससी वर्ग के कर्मचारियों का आरक्षण में प्रोमोशन हटाया है वह भी सबके सामने हैं. नीतीश असल में भाजपा के आदमी हैं और उसी तरह से काम कर रहे हैं. नीतीश और लालू की यह सरकार दलितों का काफी नुकसान कर रही है. गौरतलब है कि हाल ही में बिहार में दलित छात्रों द्वारा शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान भी पुलिस ने उन्हें जमकर पीटा था. हकीकत यह भी है कि विधानसभा चुनाव में दलितों के वोट से ही चुनाव में पिछड़ रहे नीतीश-लालू गठबंधन को जीत मिल पाई थी. लेकिन सरकार आने के बाद से लेकर अब तक सरकार ने ऐसे कई फैसले लिए हैं, जिससे दलित समाज के छात्रों और कर्मचारियों के हित की अनदेखी हुई है. ​इससे पहले ​टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज में दलितों की सीट सवर्णों को ​दिया जा चुका है. इस पूरे मामले पर अनुसूचित जाति/जनजाति कल्याण मंत्री संतोष कुमार निराला से उनका पक्ष जानने के लिए उनके नंबर पर बात करने की कोशिश की गई, लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया. दलित दस्तक द्वारा उन्हें मैसेज भी किया गया लेकिन उनका कोई जवाब नहीं मिला.

झारखण्डः 15 आदिवासी संगठनों ने किया सरकार का विरोध, कहा-जान दे देंगे लेकिन जमीन नहीं देंगे

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रांची। झारखण्ड राज्य जिन उद्देश्यों को लेकर बना, वे तमाम उद्देश्य झारखण्ड वासियों के लिए सपने बन कर रह गए हैं. सरकार विकास के नाम पर सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन का अध्यादेश ले आयी है. जमीन लूट की नीति के लिए सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन का विरोध करते हुए 15 आदिवासी संगठनों ने आदिवासी अस्तित्व और भूमि कानून के मुद्दे पर सम्मेलन का आयोजन किया. मुंडारी खूंटकटी परिषद, एभन मांझी वैसी पाकुड़, जनाधिकार मंच बोकारो, आदिवासी-मूलवासी अस्तित्व मंच, सोनात संताल समाज, एआईपीएफ इंसाफ और अन्य आदिवासी संगठन भी इस सम्मेलन में शामिल हुए. इस सम्मेलन में काश्तकारी कानून में संशोधन, अधिवास नीति एवं आदिवासी और मूल निवासी समुदायों के बीच संसाधनों का असमान वितरण आदि मुद्दों पर बात की गई. सम्मेलन में दयामनी बारला ने कहा कि सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन कर सरकार आखिर किसको बेवकूफ बनाना चाहती है. झारखंड का आदिवासी समुदाय अब जाग चुका है. अब उनका एक ही नारा है, जान दे देंगे, जमीन नहीं देंगे. लड़ेंगे और जीतेंगे. सीएनटी और एसपीटी एक्ट में संशोधन को आदिवासियों की जमीन पूंजीपतियों और कॉर्पोरेट घरानों के हाथों देने का जरिया बताया. उन्होंने कहा कि एक्ट में संशोधन से झारखण्ड के आदिवासियों का विकास नहीं, विनाश होगा. उन्होंने इसे आदिवासी समुदाय का अस्तित्व खत्म करने की साजिश बताया. सरकार को याद रखना चाहिए कि झारखंड के किसान खेती और जमीन के बिना नहीं रह सकते हैं. एक आदिवासी संगठन के सदस्य ओनिल ने कहा कि गांव-गांव में संगठन बना कर लोगों को जागरूक करने की जरूरत है. बिरसाइत समाज के मंगरा ने कहा कि पुरखों ने हमारे अस्तित्व पहचान की विरासत जल, जंगल, जमीन के रूप में दी है, जिसे बेचने नहीं, बल्कि बचाने की जरूरत है. वामपंथी नेता केडी सिंह ने भाजपा सरकार को हाईफाई सरकार बताते हुए कहा कि सिंगल विंडो सिस्टम, स्मार्ट सिटी, स्टार्ट अप और बुलेट ट्रेन जैसी घोषणाएं यहां के भोले-भाले आदिवासी-मूलवासियों को भुलावे में डालने वाली हैं. यह सरकार लोगों को आपस में लड़ा कर राज करने और किसानों की जमीन लूटने की साजिश रच रही है.

डॉ. अम्बेडकर और मातृत्व अवकाश

मातृत्व लाभ बिल 2016 को राज्यसभा ने मंजूरी दे दी. लोकसभा की मंजूरी अभी बाकी है. बिल से सरकारी और निजी क्षेत्रा में काम करने वाली महिलाओं को 26 हफ्ते का मातृत्व अवकाश मिलने का रास्ता साफ हो गया. हालांकि तमिलनाडू में 26 हफ्ते के मातृत्व अवकाश का प्रावधान पहले से ही है. नये विधेयक के अनुसार मातृत्व अवकाश के दौरान महिलाओं को वेतन भी मिलेगा और तीन हजार रुपये का मातृत्व बोनस भी. 26 हफ्ते का मातृत्व अवकाश सिर्फ दो बच्चों के जन्म तक ही मिलेगा. दो से अधिक बच्चे होने पर अवकाश सिर्फ 12 हफ्ते का ही रहेगा. बच्चे को गोद लेने वाली महिला को भी 12 हफ्ते का मातृत्व अवकाश मिलेगा. महिलाओं को सार्वजनिक मातृत्व अवकाश देने वाला भारत दुनिया का तीसरे नंबर का देश होगा. मातृत्व अवकाश के मामले में भारतीय महिलाओं की स्थिति अमेरिका से काफी बेहतर कही जा सकती है. अमेरिका दुनिया का एक मात्रा ऐसा देश है जहां महिलाओं को मातृत्व के दौरान वेतन नहीं मिलता. यदि अन्य देशों की बात करें तो अमेरिका, पाकिस्तान, श्रीलंका एवं म्यांमार में 12 हफ्ते, अफगानिस्तान व इंडोनेशिया में 13 हफ्ते, चीन में 14 हफ्ते, बांग्लादेश व सिंगापुर में 16 हफ्ते, ईरान में 17 हफ्ते और वियतनाम में 26 हफ्ते का मातृत्व अवकाश मिलता है. सरकार के साथ-साथ निजी क्षेत्रों में काम करने वाली महिला कर्मचारियों को भी मिलेगा. राज्यसभा में पारित हो चुके इस विधेयक का दायरा उन सभी कंपनियों तक फैला हुआ है जहां 10 से ज्यादा महिलाएं काम करती हैं. अनुमान है कि 18 लाख महिलाएं उक्त सुविधा का लाभ उठा सकेंगी. यह उन सामाजिक संगठनों की जीत है जो लम्बे अर्से से संघर्ष कर रहे थे. क्या निजी संस्थान महिलाओं को मातृत्व अवकाश दे पायेंगे? सच तो यह है कि आरोप-प्रत्यारोप लगा कर ऐसी महिलाओं को पहले ही संस्थान से निकाल देते हैं या फिर नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर कर देते हैं. जहां नीयत में खोट हो वहां नियम क्या करेगा? 19 जुलाई 1937 में बाबा साहेब डॉ. आम्बेडकर ने बंबई विधानसभा के सदस्य की शपथ लेने के बाद कहा था कि महोदय! प्रेसिडेंसी की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए प्रेसिडेंसी में निरक्षरता, मलेरिया, गनोरिया, सिफलिस तथा अन्य बीमारियों की व्यापकता को ध्यान में रखते हुए मुझे यह पूछने का तनिक भी संकोच नहीं है कि क्या सरकार अपना उत्तरदायित्व ठीक प्रकार से निभा रही है? उसने मात्र सैंतीस लाख ग्यारह हजार रुपये का बजट पेश किया है. कामकाजी महिलाओं की कवायद करते हुए बाबा साहेब डॉ.आंबेडकर ने कहा कि ‘कृषि तथा अन्य व्यवसायों में महिलाओं को उन खतरों का सामना नहीं करना पड़ता है. यानी वहां वे हालात नहीं हैं जो फैक्टरियों में हैं. जो हालात फैक्टरियों में काम करने वाली महिलाओं के स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं, ऐसी स्थिति में जच्चा का कुछ समय के लिए प्रसव से पूर्व तथा कुछ समय के लिए प्रसव के पश्चात विश्राम दिया जाए. ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत महिला प्रसूति लाभ अधिनियम 1941 पर चर्चा करते हुए बाबा साहेब डॉ.अम्बेडकर ने कहा था कि  वर्तमान खदान प्रसूति लाभ विधेयक के तहत खदान की एक महिला कर्मचारी 8 हफ्तों का लाभ आठ आना प्रतिदिन की दर से ले सकती है. यह आठ हफ्ते का समय चार-चार हफ्ते के दो भागों में बांटा गया है. पहला भाग प्रसव के पहले और दूसरा प्रसव के बाद. पहले भाग में महिला स्वैच्छिक आराम कर सकती है और चाहे तो निरंतर काम करके पूरा वेतन अर्जित कर सकती है. आराम के लिए काम से गैर हाजिर रहने पर वह प्रसूति लाभ पा सकती है. प्रसूति के बाद का चार हफ्ते का समय आवश्यक आराम का समय है, जिसमें किसी महिला को काम नहीं करना चाहिए. वास्तव में इस अवस्था में उसका काम करना गैर कानूनी और आपराधिक है. उसे केवल प्रसूति लाभ पर ही संतुष्ट होना है. प्रसूति लाभ विधेयक की धारा 5 में प्रसूति लाभ की आदायगी का प्रावधान किया गया है. यदि माननीय सदस्य इस प्रावधान की पंक्ति 9 में काम के संदर्भ में वर्णित शब्दों की ओर ध्यान दे तो पायेंगे कि शब्दावली काम से गैर हाजिर का प्रयोग या फिर काम से शब्द अस्पष्ट है. मैं संक्षेप में स्पष्ट करूंगा कि इनमें क्या अस्पष्टता है? मान लीजिए कि खदान के मालिक ने किसी विशेष दिन खदान बंद कर दी तो क्या उस दिन से महिला कर्मचारी को प्रसूति लाभ पाने का अधिकर है? कहा जाता है कि नहीं. क्योंकि काम से गैरहाजरी शब्दों की जटिलता का यह भी अर्थ निकलता है कि काम तो है किन्तु जब खदान बंद कर दी गई तो काम नहीं. प्रवर समिति द्वारा जो संशोधन हुआ उस विषय में बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर कहते हैं. प्रवर समिति ने जो पहला परिर्वतन किया है कि गर्भवती स्त्री को धरातल के नीचे कार्यों पर भेजे जाने की अवधि संबंधी प्रतिबंध है. मूल विधेयक में प्रसूति से 10 सप्ताह पूर्व ओर प्रसूति से चार सप्ताह बाद तक प्रतिबंध था. प्रवर समिति ने मूल से प्रसूति पूर्व की प्रस्तावित अवधि में परिवर्तन नहीं किया परन्तु प्रसूति उपरांत की अवधि में जो परिवर्तन किए गए हैं वे व्यापक हैं. यह प्रतिबंध अवधि चार सप्ताह से बढ़ा कर छत्तीस सप्ताह कर दी है. धरातल के नीचे कार्य कारने वाली स्त्रियों को प्रसूति लाभ के प्रवर समिति ने निम्नलिखित परिवर्तन किए हैं. मूल विधेयक में धरातल के नीचे कार्य करने वाली स्त्रियों की प्रसूति लाभ की पात्राता की दो शर्तें रखी गई थीं. वे शर्तें थीं प्रसूति से न्यूनतम छह महीने पहले खदान में कार्यरत होना और इन छह महीनों में 90 दिन तक धरातल के नीचे कार्य. प्रवर समिति ने पहली शर्त हटा दी है अर्थात खदान में न्यूनतम छह माह की सेवा ताकि संशोधित विधयेक में बस इतना ही पर्याप्त माना जाए कि स्त्री ने प्रसूति से पूर्व के छह महीना में नब्बे दिन तक तल के नीचे कार्य किया है. उस स्थिति में वह प्रसूति लाभ की पात्र होगी. प्रवर समिति ने लाभ की अवधि में भी संशोधन किए हैं. मूल विधेयक में प्रसूति लाभ की अवधि प्रसूति से दस सप्ताह पूर्व और प्रसूति उपरांत चार थी. प्रवर समिति ने प्रसूति उपरांत लाभ प्राप्त करने की अवधि चार से बढ़ा कर छह सप्ताह कर दी है. साथ ही लाभ राशि में भी परिवर्तन कर दिया गया है. मूल रूप से लाभ राशि आठ आना प्रतिदिन थी. प्रवर समिति ने इसे बढ़ा कर छह रुपये प्रति सप्ताह कर दिया है. जो चौदह आना प्रतिदिन से कुछ कम है. फिर दूसरी अवधि को अधिकृत छुट्टी घोषित कर दिया गया. ताकि इस काल के दौरान कोई मालिक इस विधेयक के अधीन आने वाली स्त्री को निकाल न सके. प्रवार समिति ने जो अन्य महत्वपूर्ण प्रावधान किया है वह लाभ की पात्र स्त्री की मांग पर उसकी डॉक्टरी जांच महिला डॉक्टर से कराई जाएगी. यह प्रावधान मूल विधेयक में नहीं था. मैं सदन का ध्यान आकर्षित कराना चाहता हूं कि नीचे कार्य छत्तीस प्रतिबंधित सप्ताहों के बीच कोई स्त्री बत्तीस सप्ताहों के दौरान धरातल के नीचे कार्य को छोड़कर अपनी आमदनी के लिए अन्य कार्य कर सकती है. यह व्यवस्था मूल विधेयक में नहीं थी. सरकारी या निजी स्तर की महिला कर्मचारियों ने मातृत्व अवकाश के लिए दावेदारी की पर किसी ने यह नहीं सोचा कि इस विधेयक को प्रस्तुति करने वाला कौन था? यह विधेयक किसी उच्चवर्णीय द्वारा प्रस्तुत किया होता तो वह इस देश में भगवान या देवी बना जाती है. गैर दलित की तो बात ही छोड़िए अधिकांश दलित भी नहीं जानते कि यह विधेयक बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने पहली बार प्रस्तुत किया था. बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर का मूल्यांकन सामाजिक, राजनीतिक एवं धार्मिक रूप में इतना किया कि सौ से अधिक शीर्षक से हिन्दी बाजार में पुस्तक देखी जा सकती हैं पर स्वास्थ्य के संबंध में बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर को लेकर कोई किताब नहीं लिखी गई. डॉ. जुगल किशोर ने डॉ. अम्बेडकर और स्वास्थ्य को लेकर आलेख सामाजिक न्याय संदेश पत्रिका में जरूर लिखा.
डॉ. रूपचंद गौत्तम  पत्रकार हैं.

यूपीः पुलिस के डर से जंगलों में रात बिता रहे हैं दलित!

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सहारनपुर। पंद्रह अगस्त के बाद से सहारनपुर के उसंद गांव के दलित लोग पास के जंगल में रात गुजार रहे हैं. गांव की दलित महिलाएं रात भर देखा करती हैं कि कहीं पुलिस की जीप तो नहीं आ रही है. पिछले एक हफ्ते में तीन दलितों की पुलिस की ज्यादती की वजह से मौत हो गई. हालांकि पुलिस इस बात से इनकार करती है. गांव वालों का आरोप है कि पुलिस और पीएसी के लोगों ने उनपर लाठियां बरसाईं. तनाव की स्थिति तब शुरू हुई जब किसी और जाति के एक शख्स ने दलित से कर्ज के बदले इसकी बेटी को अपने घर रखने के लिए कहा. इस बात पर दो समूह जब आमने-सामने आए तो पुलिस को बुलाया गया. पुलिस के अनुसार दंगे जैसी स्थिति को काबू करने के लिए बल प्रयोग किया गया. लेकिन लोगों का कहना है कि पुलिस ने केवल दलितों को ही टारगेट किया. एक ग्रामीण रवि कुमार ने बताया कि पुलिस ने उन्हें जानवरों की तरह पीटा. उन्होंने कहा, हमें बुरी तरह से पीटा गया. गांव के किसी भी दलित का ऐसा घर नहीं बचा जहां पुलिस ने घुसकर तोड़ फोड़ न की हो. कम से कम सौ पुलिस और पीएसी के लोगों ने उपद्रव किया और यह घटना स्वतंत्रता दिवस पर हुई. सरिता देवी, राकेश कुमार और चमन सिंह को बहुत बुरी तरह पीटा गया और उसी रात उन तीनों ने दम तोड़ दिया. वे सभी दलित थे. इन हालात में हम लोगों ने अब जंगल में रात बितानी शुरू कर दी है जबकि घर की महिलाएं रात भर पुलिस को आहट देखती रहती हैं. यहां तक की एंबुलेंस की आवाज सुन कर भी हम डर जाते हैं. सहारनपुर के एसएसपी मनोज तिवारी ने कहा,”मुझे पता चला है कि दो समूह के लोगों में अनबन हो गई थी. कुछ लोगों ने पुलिस पर भी हमला किया इसलिए हमें बल प्रयोग करना पड़ा. हमने 20 अज्ञात लोगों के खिलाफ पुलिस पर हमला करने के लिए केस दर्ज किया है. हो सकता है कि गिरफ्तारी से बचने के लिए ये लोग जंगल में सो रहे हैं. जहां तक लोगों के डर का मामला है तो हम गांव जाकर उन्हें आश्वासन देंगे कि डरने की कोई जरूरत नहीं है.”

ओडिशाः पत्नी के शव को कंधे पर लादकर 10 किमी तक पैदल चला दाना माझी

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कालाहांडी। ओडिशा के कालाहांडी से मानवता को शर्मसार कर देने वाली खबर है. यहां के एक आदिवासी शख्‍स को अपनी पत्नी की लाश कंधे पर रखकर 10 किलोमीटर इसलिए पैदल चलना पड़ा क्‍योंकि अस्‍पताल प्रशासन ने उसे एंबुलेंस देने से मना कर दिया था और उसके पास गाड़ी करने को रुपए नहीं था. आंसुओं में डूबी बेटी को साथ लेकर, दाना माझी ने अपनी पत्नी अमंगदेई की लाश को भवानीपटना के अस्‍पताल से चादर में लपेटा, उसे कंधे पर टिकाया और वहां से 60 किलोमीटर दूर स्थित थुआमूल रामपुर ब्‍लॉक के मेलघर गांव की ओर बढ़ चला. बुधवार तड़के टीबी से जूझ रही माझी की पत्‍नी की मौत हो गई थी. बहुत कम पैसा बचा था, इसलिए माझी ने अस्‍पताल के अधिकारियों से लाश को ले जाने के लिए एक एंबुलेंस  देने को कहा. लेकिन अस्पताल प्रशासन ने मना कर दिया. माझी लाश कंधे पर लिए करीब 10 किलोमीटर तक चलता रहा, तब कुछ युवाओं ने उसे देखा और स्‍थानीय अधिकारियों को खबर की. जल्‍द ही, एक एंबुलेंस भेजी गई जो लाश को मेलघर गांव लेकर गई. मांझी ने कहा, “मैंने सबके हाथ जोड़े, मगर किसी ने नहीं सुनी. उसे लाद कर ले जाने के सिवा मेरे पास और क्‍या चारा था.” ऐसी स्थिति के लिए ही नवीन पटनायक की सरकार ने फरवरी में ‘महापरायण’ योजना की शुरुआत की थी. इसके तहत शव को सरकारी अस्तपताल से मृतक के घर तक पहुंचाने के लिए मुफ्त परिवहन की सुविधा दी जाती है. जबकि माझी ने बताया कि बहुत कोशिशों के बावजूद भी उसे अस्पताल के अधिकारियों से किसी तरह की मदद नहीं मिली.

बिहारः महादलित युवक को गंजाकर रातभर गांव में घुमाया

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मुजफ्फरपुर। रामपुर जयपाल गांव के ग्रामीणों ने एक महादलित युवक की बेरहमी से पिटाई कर उसके बाल मुंडवाकर और गले में जूतों की माला पहनाकर रात भर गांव में घुमाया. पीड़ित राजू ऑटो चलाता है. कुछ दिन पहले उसे एक मोबाइल लवारिश हालत में पड़ा मिला, जिसे उसने गांव के ही एक व्यक्ति को बेच दिया. मोबाइल के मालिक को जब इस बात का पता चला तो उसने ऑटो चालक राजू को उठाकर एक कमरे में बंद किया और उसकी पिटाई की. बाद में उसे पंचायत में ले जाया गया. पंचायत ने उसके बाल काटकर पूरे गांव में घुमाने का तालिबानी फरमान जारी कर दिया. गांव के ही कुछ लोगों को यह कृत्य पसंद नहीं आया और उन्होंने ग्रामीणों को इस तरह से राजू को प्रताड़ित करने से रोका. बाद में घायल अवस्था में राजू को एसकेएमसीएच में भरती कराया गया. इतना कुछ होने के बाद भी स्थानीय थाने को इस घटना की खबर नहीं मिली. मामला मीडिया में आने के बाद मुजफ्फरपुर के एसएसपी ने पूरी घटना को गंभीरता से लेते हुए मामले की जांच के आदेश दिये हैं. एसएसपी ने कहा है कि इस मामले में जो भी दोषी होंगे उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जायेगी. गौरतलब हो कि आये दिन मुजफ्फरपुर में पंचायत द्वारा अजीबो-गरीब फैसले लिये जाते रहते हैं.

आप कितने दलित क्रिकेटरों को जानते हैं?

कहा जाता है कि क्रिकेट अमीरों का खेल है. शायद इसीलिए भारतीय क्रिकेट में जो गिने चुने दलित खिलाड़ी रहे, वे भी गुमनाम ही रहे. इतिहासकार और लेखक रामचंद्र गुहा की नई क़िताब ”विदेशी खेल अपने मैदान पर” में उन्होंने क्रिकेट का एक समाजशास्त्रीय विश्लेषण करने की कोशिश की है. इस क़िताब में, बकौल लेखक, भारतीय क्रिकेट के इतिहास के गुमनाम क्रिकेटरों के बारे में पड़ताल की गई है. आज़ादी के बाद शायद तीन यार चार दलितों ने क्रिकेट खेला, लेकिन उन्हें वो शोहरत हासिल नहीं हुई जिसके वे हक़दार थे. सवाल उठता है कि क्या भारतीय क्रिकेट में भी ऊंची जातियों और उच्च वर्गों का ही दबदबा है? जवाब में इस किताब में रामचंद्र गुहा लिखते हैं, एक बार मैं मुंबई में, दलित गेंदबाज रहे पालवंकर बालू के भतीजे से मिला, जिन्होंने कुछ अनमोल पारिवारिक दस्तावेज मुझे सौंपे. इसमें मराठी में छपा एक संस्मरण भी शामिल था. उन्होंने अपने चाचा और अपने पिता विट्ठल (बालू के छोटे भाई और एक प्रतिभाशाली बल्लेबाज) की यादें भी साझा कीं. इसके बाद तब के एक अग्रणी राष्ट्रवादी अखबार ”बॉम्बे क्रॉनिकल” की माइक्रो फ़िल्में देखते हुए मैंने दोनों भाइयों के निजी संघर्षों पर दिलचस्प सामग्री पाई. ये दोनों भाई अपने समय के अच्छे क्रिकेटर थे, लेकिन दलित पृष्ठभूमि से होने के कारण उन्हें पर्याप्त स्वीकृति नहीं मिली. इसके बाद मैंने बीआर अंबेडकर के साथ बालू के क़रीबी और जटिल संबंध के बारे में नई और अब तक अनदेखी रिपोर्टें भी पाईं. आख़िरकार बालू इस किताब के केंद्रीय विषय बन गए. वे एक शानदार क्रिकेटर और एक उल्लेखनीय इंसान के रूप में प्रतीक बन जाने वाले भारत के पहले खिलाड़ी थे और 1910 से 1930 के बीच पश्चिमी भारत में सर्वाधिक महत्वपूर्ण दलित हस्ती भी थे. वंचित तबकों से कुछ बेहतरीन क्रिकेटर आए थे. 1947 के बाद शायद तीन या चार दलितों ने भारत के लिए टेस्ट क्रिकेट खेला, लेकिन कोई भी ख्याति नहीं हासिल कर सका. मुझे यकीन है कि अब तक कोई आदिवासी या उत्तर-पूर्व से कोई भारत के लिए नहीं खेला है. भारतीय टीम में खेल प्रशंसकों में सभी वर्गों और धर्मों के लोग हैं, लेकिन शीर्ष खिलाड़ी व्यापक रूप से शहरों और ऊंची जातियों से आते हैं. किताब में गुहा कहते हैं, मैंने 1912 से 1945 के बीच बंबई पंचकोणीय प्रतियोगिता (जो पहले चतुष्कोणीय थी) पर एक किताब लिखने की योजना बनाई थी. तब यह रणजी ट्रॉफी से भी अधिक महत्वपूर्ण थी. पहले महान भारतीय टेस्ट क्रिकेटरों– सी.के. नायडू, विजय मर्चेंट, मुश्ताक़ अली, मुहम्मद निसार, अमर सिंह, विजय हजारे, वीनू मांकड़ ने इसमें अपनी निशानियां छोड़ी थीं. मेरी किताब का उद्देश्य एक क्रिकेटीय इतिहास को समग्र रूप में पेश करना था. लेकिन मैं जितना अधिक शोध करता गया, उतना ही मैंने देखा कि चतुष्कोणीय तथा पंचकोणीय प्रतियोगिताएं राजनीति और समाज के साथ आपस में गुंथी हुई थी. इसलिए आखिर में मैंने एक ऐसी किताब लिखी, जिसमें नस्ल, धर्म, जाति और राष्ट्रवाद खुद क्रिकेट जितने ही महत्वपूर्ण थे. कपिल देव से भी महान वीनू मांकड़ थे. गुहा ने जो क़िताब लिखी है वह भारतीय क्रिकेट का सामाजिक और राजनीतिक इतिहास है, जिसे नस्ल, जाति, धर्म और राष्ट्र की ”प्रधान श्रेणियों” के ज़रिए लिखा गया है. मुझे अच्छा लगेगा अगर कोई बालू और विट्ठल की अवधि के बीतने के बाद खेल पर राज करने वाली चौकड़ी की एक जीवनी लिखे: सीके नायडू, विजय मर्चेंट, विजय हजारे और वीनू मांकड़. ये सभी बेमिसाल क्रिकेटर थे, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय मंच पर बहुत कम अवसर हासिल हुए. नायडू, वीरेंदर सहवाग जैसी महारथ से गेंदबाजों की धुलाई कर सकते थे. मर्चेंट और हजारे, राहुल द्रविड़ के सांचे के श्रेष्ठतम बल्लेबाज थे और वीनू मांकड़ तर्कसंगत रूप से कपिल देव से भी महान हरफनमौला थे. ये प्रथम महान भारतीय क्रिकेटर थे और इस महानता का समुचित आकलन अभी बाकी है. पेंग्विन से साभार

संगरूरः दलितों की जमीन छीन रहे हैं अमीर किसान, पुलिस भी कर रही है भेदभाव

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संगरूर। कलौदी गांव में अमीर किसान गरीब दलित किसानों पर अत्याचार कर रहा है. इतना ही नहीं प्रशासन भी उनके साथ भेदभाव कर रहा है. कुछ दिन पहले किसानों ने दलितों की जमीन पर कब्जा करने की कोशिश की. जब दलितों ने इसका विरोध किया तो उन पर फायरिंग की और उन्हें जातिसूचक गाली भी दी. जब दलित इस घटना की शिकायत संगरूर के सदर थाने में करवाने गए तो पुलिस ने उल्टा उन पर ही मामला दर्ज कर लिया. दलितों ने संगरूर के एसएसपी और जिला प्रशासन को अवगत करवाकर उनके खिलाफ दर्ज केस को रद्द करने की मांग की, लेकिन पुलिस या सिविल प्रशासन ने उनकी कोई बात नहीं सुनी. इसके बाद गांव के दलित भगवान वाल्मीकि दलित चेतना मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष विक्की परोचा और जिला अध्यक्ष रविंदर राजन से मिलें. उन्होंने परोचा और राजन को पूरे मामले से अवगत कराया. दलितों की समस्या सुनने के बाद विक्की परोचा ने कहा कि यदि कलौदी के दलित भाईयों को इंसाफ नहीं मिला तो दलित सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर होंगे. भगवान वाल्मीकि दलित चेतना मंच और भारत स्वीपर यूनियन ने दलितों के लिए संघर्ष करने का प्रण लिया है. उन्होंने कहा कि सिर्फ कलौदी में नहीं बल्कि पूरे जिले के प्रत्येक गांव में ऐसे मामले सामने आ रहे हैं. यदि इन्हें इंसाफ मिला तो दो दिनों के बाद सड़कों पर धरने दिए जाएंगे.

मुंबईः स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी से भी ऊंची बनेगी बाबा साहेब की प्रतिमा

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मुंबई। इंदूमिल की जमीन पर बनने वाले डॉ. बाबा साहेब अंतरराष्ट्रीय स्मारक के नए प्रारूप को मंजूरी मिल गई है. इस नए प्रारूप के अनुसार स्मारक पर बाबा साहेब की 350 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित की जाएगी. राज्य के सामाजिक न्याय मंत्री राजकुमार बडोले ने बताया कि आगामी अक्टूबर से स्मारक का कार्य शुरू करने का फैसला लिया गया है. पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों स्मारक के लिए भूमिपूजन किया गया था. लेकिन कुछ संगठनों ने स्मारक के प्रारूप को लेकर ऐतराज जताया था. रिपब्लिकन सेना के आनंदराज आंबेडकर सहित कुछ संगठनों ने मांग की थी कि बाबा साहेब का स्मारक अमेरिका के स्टेच्यू आफ लिबर्टी से ऊंचा हो. इस संदर्भ में फैसला लेने के लिए बडोले की अध्यक्षता में कमेटी बनाई गई थी. इंदू मिल समुद्र किनारे स्थित है. इसलिए स्मारक के सामने स्थित समुद्री किनारों को भी खूबसूरत बनाया जाएगा. इस स्मारक का प्रस्तावित खर्च भी अब 425 करोड़ 16 लाख से बढ़ कर 550 करोड़ रुपए हो गया है. स्मारक के निर्माण की जिम्मेदारी एमएमआरडीए को सौंपी गई है. निर्माण कार्य शुरू करने के लिए जल्द ही टेंडर आमंत्रित किए जाएंगे. स्मारक का प्रारूप आर्किटेक्ट शशि प्रभू ने तैयार किया है. स्मारक के मध्य भाग में बाबा साहेब की 350 फीट ऊंची कांस्य प्रतिमा होगी. प्रतिमा के चबूतरे की ऊंचाई 100 फीट होगी. यहां आर्ट गैलरी के साथ ही पुस्तकालय और सभागृह बनाया जाएगा. प्रतिमा जिस चबूतरे पर स्थापित की जाएगी, उसकी डिजायन कमल के फूल जैसी होगी. यहां पर एक म्यूजियम भी बनाया जाएगा. इस संग्रहालय में बाबा साहेब के जीवन से जुड़े तैलचित्र लगाए जाएंगे. स्मारक के पास 450 वाहनों के पार्किंग की सुविधा होगी. यहां ”लाइट एंड साउंड सिस्टम” के जरिए बाबा साहेब के महाड सत्याग्रह को भी प्रदर्शित किया जाएगा. (साभार दैनिक भास्कर)

अगर आप केंद्रीय विद्यालय में अपने बच्चे के लिए आरक्षण चाहते हैं तो इसे पढ़िए

सरकार द्वारा संचालित केंद्रीय विद्यालय और नवोदय विद्यालय में सरकारी हेर-फेर का खेल जारी है. देश की जनता के पैसे से संचालित इन स्कूलों में दलितों एवं गरीबों के लिए आरक्षण की व्यवस्था है. लेकिन इन स्कूलों ने जरुरतमंदों को कागजों में ऐसा उलझा रखा है कि इन्हें इन स्कूलों में अपने बच्चों को दाखिले में मिलने वाला लाभ नहीं मिल पाता है. हकीकत यह है कि एससी/एसटी समाज के हर बच्चे को किसी भी पब्लिक स्कूल चाहे वो दिल्ली पब्लिक स्कूल (DPS) हो, मार्डन स्कूल हो या फिर क्रिश्चियन स्कूल; उसमें एससी/एसटी छात्र 25 फीसदी आरक्षण का दावा कर सकते हैं. राष्ट्रीय शोषित परिषद के अध्यक्ष जय भगवान जाटव शिक्षा में दलित समाज को हक दिलाने के लिए काम कर रहे हैं. अगर आप अपने बच्चों का दाखिला केंद्रीय विद्यालय सहित सरकार द्वारा संचालित अन्य स्कूलों में करवाने की सोच रहे हैं तो इन बातों पर जरूर ध्यान दें. केंद्रीय विद्यालय में दाखिले के लिए जारी आवेदन फार्म में आरक्षण चाहने वाले आवेदकों के लिए दो ऑप्शन होते हैं. (1)    EWS – Economic Weaker Section (2)    Disadvantage Group केंद्रीय विद्यालयों में जब भी दाखिला होता है तो इसमें कमजोर वर्गों के लोगों के लिए सीटें आरक्षित होने का ढिंढ़ोरा पीटा जाता है, लेकिन हकीकत कुछ और है. सरकार से लेकर स्कूल तक दाखिले के समय EWS के तहत आरक्षण देने का खूब प्रचार करती है. अखबारी विज्ञापनों में भी इसे ही प्रचारित किया जाता है. इस कैटेगरी में समाज के हर वर्ग के लोग आवेदन कर सकते हैं, जिनकी आमदनी सलाना एक लाख तक हो. लेकिन यहां दिक्कत यह होती है कि 1 लाख सलाना से ज्यादा कमाने वाले लोग इस श्रेणी में आवेदन नहीं कर सकते हैं. स्कूल वाले आपसे इसी श्रेणी में आवेदन देने का दबाव डालते हैं जबकि एससी/एसटी के आवेदक दूसरी (Disadvantage Group) श्रेणी में आवेदन देकर आरक्षण का ज्यादा लाभ उठा सकते है. दलित समाज के लोगों को इस आवेदन पत्र को भरते समय दूसरे ऑप्शन (Disadvantage Group) पर निशान लगाना चाहिए. इस ग्रुप में वार्षिक आय की कोई सीमा नहीं है. इस ग्रुप में आपको सिर्फ अपना जाति प्रमाण पत्र देना होता है, जिसके बाद आप इस ग्रुप के तहत मिलने वाले आरक्षण का लाभ लेने के हकदार हो जाते हैं. The Right of Children to free and Compulsory Education Act, 2009 बिल 2008 में आया जबकि 2009 में यह पास हुआ. इसके सेक्शन 1 (2) में दूसरे प्वाइंट में साफ लिखा है कि अगर Disadvantage Group में आवेदन करने वालों से कोई स्कूल इंकम सर्टिफिकेट मांगता है तो सरासर गलत है और शिकायत मिलने पर उस स्कूल पर कार्रवाई हो सकती है. इस कैटेगरी में आवेदन करने वालों को सिर्फ जाति प्रमाण पत्र (Caste Certificate) देना पड़ता है. भारत में केंद्रीय विद्यालयों में 1125 Senior Secondary School  हैं. इनमें पहले दाखिले के लिए अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए 22.50 फीसदी आरक्षण था. लेकिन सन् 2009 में EWS System आने के बाद केंद्रीय विद्यालय ने इसे देना बंद कर दिया, जबकि ऐसा कोई सरकारी नियम नहीं था. केंद्रीय विद्यालय ने आवेदकों से कहा कि लाभ केवल EWS के तहत ही मिलेगा. केंद्रीय विद्यालय ने तीन साल (2009-2011) तक रिजर्वेशन नहीं दिया. इसके बाद राष्ट्रीय शोषित परिषद के अध्यक्ष जय भगवान जाटव ने सूचना के अधिकार के तहत मिनिस्ट्री ऑफ एचआरडी और केंद्रीय विद्यालय से पूछा कि आरक्षण किस आधार पर बंद किया गया. उन्होंने उस आदेश की कॉपी भी मांगी, जिसके तहत आरक्षण बंद किया गया. पहले तो दोनों ने आनाकानी की लेकिन आखिरकार उन्होंने माना कि गलती हुई है और ऐसा कोई आदेश जारी नहीं हुआ है. लेकिन उन्होंने ट्रांसफर वालों को इस कोटे में दिखा दिया. जय भगवान जाटव फिलहाल इसके लिए लड़ रहे हैं, उनका कहना है कि ट्रांसफर हुए लोगों को इस श्रेणी में नहीं रखा जा सकता.

यूपीः बाबा साहेब की प्रतिमा का चबूतरा तोड़ने पर विरोध प्रदर्शन, छात्र करेंगे आमरण अनशन

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गोरखपुर। नगर निगम द्वारा रविवार को अम्बेडकर चौराहे का चबूतरा तोड़ने का अम्बेडकर छात्र सभा और पूर्वांचल सेना के कार्यकर्ताओं ने विरोध किया. छात्रसभा और सेना के कार्यकर्ताओं ने प्रशासन पर आरोप लगाया है कि नगर निगम जानबूझ कर बाबा साहेब की प्रतिमा का चबूतरा तोड़ना चाहता है. चबूतरा तोड़ने से आक्रोशित अम्बेडकरवादी छात्रों ने कचहरी चौराहे पर विरोध प्रदर्शन किया. इस दौरान नगर निगम और गोरखपुर विकास प्राधिकरण प्रशासन के विरुद्ध जमकर नारेबाजी हुई. कैंट के मुख्य अधिकारी अम्बेडकर चौराहे पहुंचे और कहा कि ट्रैफिक की वजह से चबूतरा तोड़ना है. लेकिन जब उनसे पूछा गया की बिना पार्किंग वाले बड़े बड़े मार्ट, टाउनहॉल वाले होटल का सड़क पर बना अवैध निर्माण, विश्वविद्यालय परिसर के आस-पास धर्मस्थलों के नाम पर किये गए कब्जे के कारण शहर में असली जाम लगता है, तो आप उसे कब तोड़ रहे हैं? तो उनको जवाब देते नहीं बना. इस टूटे चबूतरे के तत्काल निर्माण की मांग को लेकर कल से छात्रों द्वारा आमरण अनशन किया जयेगा, जिसको समस्त अम्बेडकरवादी छात्रों, कर्मचारियों, शिक्षकों, अधिवक्ताओं द्वारा समर्थन किया जायेगा.

बसपा की रैली से विपक्ष में बैचेनी

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आगरा। बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने रविवार को आगरा से अपनी पार्टी के मिशन 2017 के अभियान का आगाज किया. ताजनगरी आगरा के कोठी मीना बाजार मैदान से चुनावी शंखनाद करने पहुंची बसपा अध्यक्ष मायावती मैदान में उमड़े समर्थकों के सैलाब को देखकर बेहद उत्साहित हो गई. इस दौरान उनके निशाने पर भारतीय जनता पार्टी के साथ ही समाजवादी पार्टी और कांग्रेस थीं. मायावती की चुनावी रैली से विपक्षी दलों में बैचेनी बढ़ गई है. रैली में उमड़ी लाखों की भीड़ देखकर विभिन्न राजनीतिक दल सकते में है. बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने दलितों के मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी के साथ ही नरेंद्र मोदी सरकार पर हमला बोला. मायावती ने कहा कि भाजपा के सत्ता में आने से देश में दलितों पर हिंसा की घटनाएं बढ़ी हैं. इसके साथ ही उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तिरंगे पर राजनीति करने का आरोप भी जड़ा. बसपा प्रमुख ने कहा कि सिर्फ पीएम मोदी के शब्द दलित पर हो रहे अत्याचारों पर रोक लगाने के लिए काफी नहीं हैं. हम अपराधियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग करते हैं. उन्होंने कहा कि सिर्फ दलित ही नहीं भाजपा शासन में अल्पसंख्यकों पर भी अत्याचार के मामले बढ़े हैं. मायावती ने नरेंद्र मोदी सरकार के साथ ही आरएसएस को भी अपने निशाने पर रखा. मायावती ने कहा कि मोदी सरकार के कार्यकाल में देश में गरीबी बढ़ी है. सरकार इसको रोकने में नाकाम है. उन्होंने कहा कि एक ओर देश में गरीबी बढ़ रही है और दूसरी ओर भाजपा के सरपरस्त आरएसएस प्रमुख चाहते हैं कि हिंदू अधिक बच्चों को जन्म दें. मायावती ने कहा कि समाजवादी पार्टी की बात करना तो समय बर्बाद करना है. इसके बाद भी इनकी बात करना सबसे जरूरी है. प्रदेश की सत्ता में काबिज समाजवादी पार्टी के साथ भारतीय जनता पार्टी की साठगांठ हैं. यह दोनों ही मिलकर प्रदेश को दंगे की आग में झोंकना चाहते हैं. प्रदेश में सिर्फ बसपा के शासन में ही सर्वजन सुखाए सर्वजन हिताए का सपना साकार होगा. मायावती ने सत्ता पर काबिज समाजवादी पार्टी पर भी जमकर प्रहार किया. मायावती ने कहा कि उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद से गुंडों-बदमाशों के हौसले बढ़ गए हैं. प्रदेश में दिन में हत्या व डकैती जैसी घटनाएं हो रही हैं. यहां की जनता का अमन-चैन छिन गया है. कानून के राज की जगह यहां पर जंगलराज है. सूबे में रोज एक दर्जन से अधिक बलात्कार की घटनाएं हो रही है. बुलंदशहर की घटना लोग नहीं भूल सकते हैं. मायावती ने कहा कि हमारी सरकार के समय के कार्यों को अब पूरा कर अखिलेश सरकार विकास के काम का ढिंढोरा पीट रही है. सपा की ड्रामेबाजी से हम लोगों को सावधान रहना है. मायावती ने कहा कि उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की सरकार आने के बाद से ही कानून का राज एक बार फिर स्थापित होगा. जनहित की यानी बसपा की सर्वजन हिताय, सवर्जन सुखाय की सरकार बनानी होगी. हमने अपने कार्यकाल में किसानों, मजदूरों, कर्मचारियों, गरीबों का ध्यान रखा है, लेकिन ये विरोधियों को अच्छा नहीं लगता है. मायावती ने कहा कि विपक्षी हमारे खिलाफ हथकंडे अपना रहे हैं. टिकट बेचने का झूठा आरोप लगाते हैं. मीडिया का भी बसपा के लिए रवैया दोहरा है. मीडिया दलित विरोधी मानसिकता वाले भ्रामक खबरें दिखाता हैं. इसके बाद भी बसपा बाकी पार्टियों को काफी पीछे छोड़कर आगे बढ़ चुकी है. बसपा के लोग संयम रखें, कोई जबाव न दें. बसपा पर आरोप लगाना आसमान में थूकने जैसा है.

गुजरातः जातिवादी गुंडों को हजम नहीं हुई मरा जानवर उठाने की मनाही, पिता को छोड़ बच्चे को पीटा

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अहमदाबाद।  दलितों द्वारा मरे हुए जानवरों को उठाए जाने से इनकार करने की बात जातिवादियों से हजम नहीं हो पा रही हैं. दलितों के बार-बार मना करने पर भी जातिवादी लोग उन पर जबरन मरे जानवर उठाने का दबाव बना रहे हैं. अगर दलित मरे जानवर उठाने से मना कर रहे हैं तो वे उनसे मारपीट कर रहे हैं और जब दलित पुलिस के पास शिकायत करने जाती है तो वे लोग भी उनकी शिकायत नहीं लिखतें. ऐसी घटनाएं गुजरात में आए दिन हो रही हैं. इस तरह की घटनाओं से साफ पता चलता है कि गुजरात सरकार दलितों के प्रति कितनी सतर्कता से काम कर रही हैं. मामला है अहमदाबाद के भावड़ा गांव का जहां एक 15 वर्षीय दलित बच्चे को सिर्फ इसलिए पीट दिया गया क्योंकि उसके पिता ने गांव में पड़े मरे जानवर उठाने से इनकार कर दिया था. कक्षा 10 में पढ़ने वाले इस बच्चे को पीटे जाने की घटना गुरूवार की बताई जा रही है, जब दो युवकों सहिल ठाकुर और सरवर खान पठान ने मिलकर उसकी पिटाई कर दी. हमलावरों का कहना था कि उसका परिवार गांव से लाश उठाने से इनकार कैसे कर सकता है. बताया जा रहा है कि बच्चे के पिता ने उना में हुई दलितों की पिटाई मामले के बाद प्रतिक्रिया स्वरूप मरे जानवरों को उठाने से इनकार किया था. गौरतलब है कि गुजरात के उना में दलितों की पिटाई के बाद कई दलित नेताओं ने विरोध स्वरूप जानवरों की लाशों को न उठाने की सभी दलितों से अपील की थी और शपथ भी दिलवाई थी. बच्चे के पिता दिनेश परमार ने बताया की जानवरों की लाश हटाना हमारा पारंपरिक पेशा है, लेकिन उना घटना के बाद से मैंने सैकड़ों दलित भाइयों के साथ लाश न उठाने की शपथ ली थी. अब मैं दिहाड़ी मजदूरी का काम करता हूं. बेटे को पीटे जाने की घटना का जिक्र करते हुए वह कहते हैं कि गुरूवार को मेरा बेटा अपने दोस्तों के साथ बैठा था, तभी वहा दो युवक आए उन्होंने उसे गाली देनी शुरू कर दी. इसके बाद उन्होंने बुरी तरह से पीटा भी. इसके बाद से ही वह इतना डरा हुआ था कि वह गांव में रहना ही नहीं चाहता था, इसलिए हमने उसे उसकी बुआ के पास भेज दिया है. बहरहाल बच्चे की पिटाई की रिपोर्ट उसके पिता ने पुलिस स्टेशन में दर्ज करा दी है, जिसके बाद इस मामले में दो लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है.

क्या भूमंडलीकरण से दलित सशक्त हुए?

हाल में एक समाचार पत्र में छपे लेख में चंद्रभान प्रसाद जी ने एक गांव का उदाहरण देकर दिखाया है कि भूमंडलीकरण के बाद दलित बहुत खुशहाल हो गए हैं क्योंकि रोज़गार के करोड़ों अवसर पैदा हो गए हैं. हमें इस कहावत को ध्यान में रखना चाहिए कि “हवा के एक झोंके से बहार नहीं आ जाती.” मुट्ठी भर दलितों के खुशहाल हो जाने से सारे दलितों की बदहाली दूर नहीं हो जाती. दलितों की वर्तमान दुर्दशा का अंदाजा सामाजिक-आर्थिक जनगणना-2011 के आंकड़ों से लगाया जा सकता है. इसके अनुसार ग्रामीण भारत में दलितों के 3.86 करोड़ अर्थात 21.53 प्रतिशत परिवार रहते हैं. भारत के कुल ग्रामीण परिवारों में से 60 प्रतिशत परिवार गरीब हैं जिन में दलितों का प्रतिशत इससे काफी अधिक है. इसी प्रकार ग्रामीण भारत में 56 प्रतिशत परिवार भूमिहीन हैं, जिन में दलित परिवारों का प्रतिशत इससे अधिक होना स्वाभाविक है. इसी जनगणना में यह बात भी उभर कर आई है कि ग्रामीण भारत में 30 प्रतिशत परिवार केवल हाथ का श्रम ही कर सकते हैं जिस में दलितों का प्रतिशत इस से काफी अधिक है. इससे स्पष्ट है कि ग्रामीण क्षेत्र में अधिकतर दलित गरीब, भूमिहीन और अनियमित हाथ का श्रम करने वाले मजदूर हैं. जनगणना ने भूमिहीनता और केवल हाथ के श्रम को ग्रामीण परिवारों की सबसे बड़ी कमजोरी बताया है. इस कारण गांव में अधिकतर दलित परिवार जमींदारों पर आश्रित हैं और कृषि मजदूरों के रूप में मेहनत करने के लिए बाध्य हैं. इसी कमजोरी के कारण वे अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों का प्रभावी ढंग से प्रतिरोध भी नहीं कर पाते हैं. चंद्रभान जी ने भूमंडलीकरण के बाद करोड़ों रोज़गार पैदा होने की जो बात कही है वह भी हकीकत से परे है. इसके विपरीत रोज़गार बढ़ने की बजाये घटे हैं. जो रोजगार पैदा भी हुए हैं वे भी दलितों की पहुंच के बाहर हैं क्योंकि वे अधिकतर तकनीकी तथा व्यवसायिक प्रकृति के हैं जिन में दलित तकनीकी योग्यता के अभाव में प्रवेश नहीं पाते. सरकार द्वारा भारी मात्र में कृषि भूमि के अधिग्रहण के कारण कृषि मजदूरी के रोज़गार में भी भारी कमी आई है. सरकार ने श्रम कानूनों को ख़त्म करके दलित मजदूरों के शोषण के दरवाजे खोल दिए हैं. सरकार नियमित मजदूर रखने की बजाए ठेका मजदूर प्रथा को बढ़ावा दे रही हैं. इस प्रकार बेरोज़गारी दलित परिवारों की बहुत बड़ी समस्या है.अतः बेरोजगारी दूर करने के लिए ज़रूरी है कि सरकार की वर्तमान कार्पोरेटपरस्त नीतियों में मूलभूत परिवर्तन किये जाएं. कार्पोरेट सेक्टर पर रोज़गार के अवसर बढ़ने की शर्तें कड़ाई से लागू की जाएं. श्रम कानूनों को बहाल किया जाये. तेज़ी से लागू की जा रही ठेकेदारी प्रथा पर रोक लगाई जाये. सरकारी उपक्रमों के निजीकरण को बंद किया जाये. बेरोज़गारी से निजात पाने किये रोज़गार को मौलिक अधिकार बनाये जाने तथा बेरोज़गारी भत्ता दिए जाने की मांग उठाई जाये. इसी लिए चंद्रभान जी ने अपने लेख में भूमंडलीकरण के बाद दलितों की जिस खुशहाली का चित्रण किया है वह जमीनी सच्चाई के बिल्कुल विपरीत है. भूमंडलीकरण की नीति लागू होने के बाद केवल मुठ्ठी भर दलितों को आगे बढ़ने के अवसर मिले हैं. अधिकतर दलित आज भी भूमिहीनता, गरीबी और बेरोजगारी का शिकार हैं जैसा कि सामाजिक-आर्थिक जनगणना-2011 के आंकड़ों से भी स्पष्ट है. दलितों तथा समाज के अन्य कमजोर वर्गों के सशक्तिकरण के लिए ज़रूरी है कि वर्तमान कार्पोरेट परस्त नीतियों की बजाये जनपरस्त नीतियां अपनाई जाएं जिस के लिए सरकार पर भारी जन दबाव बनाये जाने की जरुरत है.
एस.आर.दारापुरी, राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट

अखिलेश-मुलायम की मिली भगत!

अखिलेश सरकार के मंत्रियों पर लूटपाट का आरोप लगाकर अपने ही मुख्यमंत्री बेटे की कान खिंचाई करना मुलायम सिंह यादव की अब आदत बन गई है. मुलायम सिंह यादव ने अपने गांव में रहने वाले सवर्णों से यह सब सीखा है. दरअसल, सवर्ण अपने बच्चों को कभी यह नहीं सिखाते कि बाहर निकलो तो अपने से बड़ों की इज्जत करो. खासकर दलितों के साथ तो बिल्कुल भी नहीं. जब भी कोई बात हो तो उस पर हावी हो जाना. इतना हावी होना कि सामने वाला डर जाए. अगर मारपीट की नौबत आये तो सबसे पहले हाथ उठाना. सवर्ण अपने बच्चों से कहते हैं कि कभी किसी से मार खाकर मत आना. जब भी आना तो मार कर आना. मार खाकर आये तो उससे दुगुनी मार घर पर पड़ेगी. आगे सवर्ण सिखाते हैं कि जब मारकर आओगे तो मार खाने वाला मेरे घर उलाहना (शिकायत) लेकर आएगा. मैं तुम्हे उसके सामने डाटूंगा और थप्पड़ भी मारूंगा. तुम चुप रहना और डांट और मेरी मार चुपचाप बर्दाश्त कर लेना. मार खाने वाले के परिजन मेरी डांट और मार देखकर सन्तुष्ट हो जायेंगे और समझेंगे कि मुझे तुम्हारे द्वारा उसकी पिटाई पर दुख और अफसोस है. मैं शर्मिंदा हूं. यह जानकर वह चला जायेगा और जिसकी तुमने पिटाई की है, वह तुमसे हमेशा डरता रहेगा. कभी तुमसे लड़ने की हिम्मत नही जुटा सकेगा. यह शिक्षा देते हुए सवर्ण अपने बच्चों को दूसरों को दबाकर रखने और हुकूमत करने का मंत्र बचपन में दे देता है. यही वजह होती है कि सवर्णों के बच्चों का हमेशा मनोबल ऊंचा रहता है और मां बाप से मिली खुली छूट की वजह से घर के बाहर कमजोर लोगों पर जुल्म ढाते हैं. सपा मुखिया मुलायम सिंह ने भी बचपन में अपने पड़ोस के सर्वणों से यह शिक्षा उधार ली है. इसलिए वह बार बार अपने बेटे अखिलेश यादव की सरेआम खिंचाई करने से हिचकते नहीं हैं. जब से अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने हैं, तब से अब तक कई बार उनकी खिंचाई कर चुके हैं. मुलायम सिंह भी सवर्णों की तरह ही बेटे अखिलेश को भी यही शिक्षा देते हैं कि बाहर खुल कर खेलो और जब हालात खराब होंगें तो मैं तुम्हें सार्वजानिक मंच से डाटूंगा. तुम चुपचाप सुन लेना. यही वजह है कि जब भी अखिलेश सरकार किसी मुद्दे पर घिरती है तो मुलायम सिंह कान खिंचाई करके लोगों को दिखाने की कोशिश करते हैं कि उन्हें बहुत अफसोस हो रहा है. बहुत दुख है. फिर कहते हैं कि यह सब अखिलेश सरकार के कुछ मंत्रियों की वजह से हो रहा है. सरकार को यही सब बदनाम कर रहे हैं. आगे कहते हैं कि सुधर जाओ, जनता सब देख रही है. ऐसे ही रहा तो फिर सरकार नहीं बनेगी. आगे पुचकारते हुए कहते हैं कि अखिलेश अच्छा काम कर रहा है, लेकिन कुछ स्वार्थी लोग सपा का नाम लेकर गुंडई कर रहे हैं. इनपर लगाम कसनी पड़ेगी और फिर चुप हो जाते हैं. कई महीने तक राज भवन में लेट कर आराम फरमाते हैं और जैसे ही अखिलेश सरकार कटघरे में आती है, फिर कान खिंचाई करते हैं. मुलायम सिंह की यह नई रणनीति हैं वोटरों को लुभाने और पार्टी से बांध कर रखने की. यह राजनीति है और इसमें सत्ता पाने के लिये ये नेता इसी तरह की ओछी हरकतें करते रहते हैं. इनसे बचकर रहने में ही भलाई है. पूरब में एक कहावत है कि ””””अहीर मितैया तब करें, जब सारे मीत मर जाएं.”””” लेखक पत्रकार है. संपर्क-9953746549

दलित छात्र की मदद करने पर आदिवासी प्रोफेसर को विश्वविद्यालय ने नौकरी से निकाला

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अजमेर। फेडरेशन ऑफ सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष और प्रोफेसर रामलखन मीणा ने आरोप लगाया है कि सेन्ट्रल यूनिवसिर्टी ऑफ राजस्थान में एक दलित छात्र की मदद करने पर उन्हें नौकरी से हटा दिया गया है. मीणा ने बताया कि पिछले तीन साल से वह यूनिवर्सिटी में हो रहे भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाते रहे हैं. हाल ही में उन्होंने एक दलित छात्र की मदद की है जिससे नाराज होकर उन्हें सेवाओं से हटा दिया गया जबकि तीन जून 2015 को उनकी सेवाएं पक्की करने के आदेश हो चुके हैं. उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय में अनियमितताओं के खिलाफ उन्होंने राष्ट्रपति को भी पत्र लिखा है. प्रोफेसर ने बताया कि हाल ही में उन्होंने एक दलित छात्र उमेश किशोर जोनवाल की मदद की थी जिसे विश्वविद्यालय ने प्रताड़ित किया और बाद में गैरकानूनी तरीके से निकाल दिया. इस मामले में अदालत का दरवाजा खटखटाने पर भी दलित छात्र को बकाया स्कॉलरशिप की राशि नहीं दी गई बल्कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने ढाई लाख रुपये की छात्रवृत्ति नहीं देने के लिए साढ़े तीन लाख रुपये वकील पर खर्च कर दिए. प्रोफेसर को निकालने के विरोध में विश्वविद्यालय के दलित छात्रों ने कुलपति का पुतला फूंका. छात्रों ने मीणा की बहाली को लेकर नारेबाजी की और साथ ही छात्रों को स्कॉलरशिप देने के लिए भी आवाज उठाई. छात्रों ने कहा कि अगर विश्वविद्यालय आदिवासी शिक्षक की बहाली नहीं करेगा तो राज्य व्यापी आंदोलन किया जाएगा.