तेज प्रताप ने नीतीश को ट्विटर पर दी ‘नागपंचमी’ की बधाई

पटना। जदयू के भाजपा की गोद में जाते ही बिहार की राजनीति पूरे रोमांच पर है. विपक्ष की ओर से नीतीश का जबर्दस्त विरोध हो रहा है जो दिल्ली से लेकर केरल तक जारी है. बिहार में अभी दो दिन पहले तक JDU और RJD साथ थे और अब ये एक दूसरे के आमने सामने हैं. अब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राजद का साथ छोड़ बीजेपी का दामन थाम लिया है. इसी बीच आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव के बेड़े तेज प्रताप ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर तंज कसते हुए कल सोशल मीडिया पर नाग पंचमी की शुभकामनाएं दीं.

तेज प्रताप ने अपने ट्वीट में नाग की इमोजी का भी इस्तेमाल किया और ट्विटर पर लिखा, ‘माननीय नीतीश कुमार जी को नाग पंचमी की बहुत-बहुत शुभकामनाएं..’

वहीं पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने कहा कि मैं इस प्रस्ताव के विरोध में खड़ा हूं. हमें बीजेपी के खिलाफ वोट मिला था, ये सब पहले से प्लान था साथ ही तेज प्रताप ने कहा कि ये एक तरह से लोकतंत्र की हत्या है जो हो रहा है यह लोकतंत्र के लिये बहुत नुकसानदायक है.

 

चीनी राष्ट्रपति से मिले अजित डोभाल, फिर भी दे रहा है धमकी

बीजिंग। सिक्किम में डोकलाम पर जारी विवाद के बीच ब्रिक्स देशों के सम्मेलन में हिस्सा लेने बीजिंग गए एनएस अजीत डोभाल ने शुक्रवार को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग मुलाकात की. इससे पहले डोभाल ने चीन के अपने प्रतिपक्षी यांग जेयची से मुलाकात की.

इस दौरान दोनों पक्षों के बीच द्विपक्षीय मुद्दों की ‘बड़ी समस्याओं’ पर भी चर्चा हुई. विदेश मंत्रालय के अनुसार सिक्किम क्षेत्र में विगत 16 जून को शुरू हुए सैन्य विवाद के बाद से दोनों देशों के बीच यह पहली उच्च स्तरीय बैठक है.

चीनी विदेश मंत्रालय ने गुरुवार को डोभाल और यांग की बैठक के संबंध में कहा कि इस दौरान यांग ने द्विपक्षीय मुद्दों पर और प्रमुख समस्याओं पर विस्तार से चीन की स्थिति बयान की. समझा जाता है कि चीन ने डोकलाम क्षेत्र में गतिरोध पर अपना पक्ष रखा है. हालांकि चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने यह भी बताया कि यांग ने डोभाल और दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील के उनके प्रतिपक्षी अधिकारियों से उन्होंने अलग-अलग बातचीत की.

हालांकि शिन्हुआ की रिपोर्ट में सिक्कम में हुए टकराव पर प्रत्यक्ष रूप से कुछ नहीं है. दोनों उच्च अधिकारियों के बीच द्विपक्षीय के अलावा, अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों पर भी विचार-विमर्श हुआ. हालांकि चीन के सरकारी मीडिया ने लगातार यही धमकी दी है कि अगर भारत उस विवादित जगह से अपनी सेनाएं पीछे नहीं हटायेगा तब तक इस मुद्दे पर कोई बात नहीं होगी.

गौरतलब है कि अजीत डोभाल की इस बैठक का कोई ब्योरा भारतीय मीडिया को चीन ने नहीं दिया है. हालांकि मीडिया कल यानी शुक्रवार को पांच देशों के ब्रिक्स सदस्य देशों की संयुक्त बैठक को कवर करेगी.

भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर से जेल में मारपीट

सहारनपुर। करीब डेढ़ महीने पहले भाजपा सरकार ने जातीय हिंसा का आरोप लगाते हुए भीम आर्मी के संस्थापक को जेल में बंद कर दिया था जिसके बाद से उनके बारे में कोई भी खबर बाहरी लोगों को नहीं मिल रही थी पर कल खबर मिली की चन्द्रशेखर के साथ जेल में मारपीट की जा रही है. इसका पता लगने के बाद उनके समर्थक जेल में हुए जानलेवा हमले के विरोध में कलक्ट्रेट पर एकत्रित हुए. कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि चन्द्रशेखर पर अन्य बंदियों ने जेल में दो बार जानलेवा हमला किया है.

जेल में चन्द्रशेखर की जान को खतरा है. उन्होंने इस मामले की जांच और जेल प्रशासन के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर कलक्ट्रेट में प्रदर्शन किया और चेतावनी दी कि इस मामले में कार्रवाई न होने पर उन्हें सड़कों पर उतरकर आंदोलन के लिए विवश होना पड़ेगा.

बता दें की गुरुवार को कलक्ट्रेट में भीम आर्मी के कार्यकर्ता एकत्रित हुए. कार्यकर्ताओं ने बताया कि भीम आर्मी के जिलाध्यक्ष कमल वालिया की मां 26 जुलाई को जेल में कमल से मुलाकात करने पहुंची थीं. मुलाकात के दौरान कमल ने बताया कि 25 जुलाई को चंद्रशेखर पर दो बार जानलेवा हमला किया गया है. चंद्रशेखर की बैरक से आवाजें आने के बाद जेल में बंद अन्य कार्यकर्ताओं को घटना की जानकारी हुई. उन्होंने बताया कि हमलावरों ने बैरक में रखी किताबें और कपड़े भी इधर-उधर फेंक दिए.

इसी को लेकर गुरुवार को कार्यकर्ता जिलाधिकारी से मिलने पहुंचे. कार्यकर्ताओं का आरोप है कि जिला जेल में हाल ही में तैनात किए गए अधिकारी भी अत्याचार कर रहे हैं. उन्होंने जिलाधिकारी व एसएसपी के नाम ज्ञापन सौंपकर कारागार के अधिकारियों को तत्काल हटाने, इस घटना की निष्पक्ष जांच कराने और कार्यकर्ताओं को सुरक्षा उपलब्ध कराने की मांग की है. मांग पूरी न होने पर कार्यकर्ताओं ने सड़कों पर उतरकर आंदोलन करने की चेतावनी दी है और कहा है कि अगर भीम आर्मी संस्थापक को कुछ भी हुआ तो परिणाम बहुत गंभीर होंगे.

इमरजेंसी के दौर की कहानी को बयां करती है ‘ इंदु सरकार’

मुंबई। नेशनल अवार्ड विनिंग डायरेक्टर मधुर भंडारकर की फिल्म ‘इंदु सरकार’ पर पिछले काफी समय से हो हल्ला मचा हुआ था. आखिरकार इस फिल्म ने सिनेमाघरों में दस्तक दे दी है. फिल्म की शुरुआत भले ही डिस्क्लेमर से होती है कि यह फिल्म काल्पनिक घटनाओं पर आधारित है, लेकिन हकीकत में यह फिल्म देश के काले अध्याय इमरजेंसी की बात करती है. फिल्म में1975 से 1977 के उस अध्याय का जिक्र किया गया है. जो लोकतंत्र पर धब्बे के रूप में याद किया जाता है.

फिल्म की कहानी मुबीपुरा गांव में पुलिस के पहुंचने से शुरू होती है. पुलिस वहां से सभी पुरुष निवासियों को हिरासत में लेते हैं, फिर घोषणा करते हैं नसबंदी का साथ दो. जिसके बाद लोग भागने लगते हैं. सब खुद को अलग -अलग जगह छिपाने की कोशिश करते हैं. लोग विरोध करते हैं जिसके बाद पुलिस लाठी चार्ज करती है. मेरी नसबंदी क्यों कर रहे हो? एक 70 वर्षीय बूढ़ा पूछता है तो 13 वर्षीय लड़का भी. यह दृश्य फिल्म की शुरुआत को पर्दे पर बहुत सशक्त तरीके से सामने लाती है, उसके बाद कहानी अनाथ इंदु सरकार पर चली जाती है.

जो कवयित्री बनना चाहती है लेकिन इंदु (कीर्ति कुल्हाड़ी) की शादी सरकारी अफसर नवीन सरकार (तोता रॉय चौधरी) के साथ हो जाती है. इमरजेंसी में सरकार का रवैया इंदु को अच्छा नहीं लगता. दूसरी तरफ इंदु के पति अपने फायदे के लिए सरकार का साथ देने लगते हैं , इस वजह से इंदु और नवीन में अलगाव हो जाता है. इंदु सरकार की योजनाओं का विरोध करने लगती है और सरकार के खिलाफ मोर्चा शुरू कर देती है. कहानी में कई मोड़ आते हैं, फिल्म का रिसर्च वर्क अच्छा है.

इमरजेंसी के दौरान नसबंदी और मीडियाबंदी के साथ-साथ बाकी कई तरह के मुद्दों पर प्रकाश डालने की कोशिश की गयी है. संजय गांधी के लिए गाने से इनकार करने के बाद रेडियो और टेलीविजन से किशोर कुमार पर अनौपचारिक प्रतिबंध का भी फिल्म में उल्लेख किया गया है. फिल्म में इंदिरा गांधी के किरदार को मम्मीजी के तौर पर और संजय गांधी को चीफ के तौर पर दिखाया गया है. फिल्म में इंदिरा गांधी और संजय गांधी पर फोकस न कर इमरजेंसी के दौरान जो राजनीतिक कदम उठाये गए हैं उस पर है. राजनीतिक विरोधियों को कैद में डालने की घटना का भी जिक्र है.. फिल्म में इसका भी जिक्र है कि लोगों का भरोसा जीतने के लिए जब संजय गांधी इमरजेंसी खत्म कर चुनाव करवाते हैं लेकिन वह मुंह की खाते हैं. कहानी को थोड़ा और निखारने की ज़रूरत थी खासकर इंदु सरकार की शादीशुदा ज़िंदगी के बजाय इमरजेंसी के किस्सों और जोड़ने की जरुरत महसूस होती है.

आदिवासी महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए लगा दी जिदंगी

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चाईबासा। कुछ लोग समाज में अनोखी अलख जगाने के लिए ही पैदा होते हैं. भूदेव भक्त पर यह बात सटीक बैठती है. करीब बीस वर्ष पहले जेएनयू दिल्ली में पढ़ाई करते समय उनका सपना सिविल सेवा में शामिल होना था, लेकिन उन्होंने अपने आसपास कुछ ऐसा देखा कि अपनी जिंदगी की धारा ही बदल ली. झारखंड के पूर्वी सिंहभूमी जिले के जादूगोड़ा निवासी भूदेव भक्त बेहद साधारण परिवार में जन्मे हैं. पढ़ाई के दौरान समाजशास्त्र की कक्षाओं ने उनके जीवन का लक्ष्य ही बदल दिया. दिल्ली की झुग्गियों में रहने वाली महिलाओं पर एक प्रोजेक्ट पूरा करते-करते उन्होंने अपने भविष्य का लक्ष्य तय कर लिया. रसोई में धुएं से जूझती महिलाओं की स्थिति को देख वह विचलित हो गए. अब वह 11 साल से नक्सली इलाके में धुआं रहित चूल्हे से आदिवासी महिलाओं की सेहत को सहेजने में जुटे हैं.

केंद्र सरकार की उज्ज्वला योजना जिस बुनियादी उद्देश्य के साथ महिलाओं के लिए चलाई जा रही है, लगभग उसी के लिए भूदेव ने काफी पहले अपना अभियान छेड़ दिया था. अंतर इतना है कि केंद्र सरकार उज्ज्वला के तहत गरीब परिवारों को मुफ्त रसोई गैस कनेक्शन उपलब्ध करा रही है और भूदेव लकड़ी जलाकर ही खाना बनाने की क्षेत्रीय मजबूरियों में घिरीं महिलाओं को एक विशेष चूल्हे के जरिये धुएं से आजादी दिलाने में कामयाब हुए हैं. नक्सल प्रभावित वन क्षेत्रों में फिलहाल उज्ज्वला योजना पूरी तरह धरातल पर नहीं उतर सकी है. जिन्हें गैस सिलेंडर मिला भी है, वे भी लकड़ी की आसान उपलब्धता के कारण उसे ही प्राथमिकता देते हैं.

भूदेव ने 2006 से 2016 तक करीब 500 महिलाओं को रोजगार के लिए प्रशिक्षित कर उनसे धुआं-रहित चूल्हे का निर्माण कराया. इसके बाद बेहद व्यवस्थित तरीके से शिक्षित बेरोजगार महिला समिति नामक संगठन का गठन कर इन चूल्हों को तीन जिलों के सात ब्लॉक में रहने वाली 2500 महिलाओं तक पहुंचा दिया. पश्चिमी सिंहभूमी में 300 महिलाओं को वह धुआं-रहित चूल्हा बनाने का स्थायी रोजगार मुहैया करा चुके हैं. इस चूल्हे की निर्माण लागत हजार रुपये के करीब है. भूदेव ने स्वरोजगार से जुड़ीं इन महिलाओं को हस्तकला का प्रशिक्षिण भी दिला दिया है. नतीजा यह है कि महिलाएं बांस से घरेलू सामग्री बनाने में भी माहिर हो गईं.

इस चूल्हे में खाना बनाने के दौरान लकड़ी जलने पर भी निकलने वाला धुआं महिलाओं के श्वांस तंत्र तक नहीं पहुंचता है. सीमेंट के इस चूल्हे में पाइप लगाए जाते हैं, जिससे धुआं आसपास नहीं फैलकर ऊपर की ओर निकल जाता है. इस धुआं-रहित चूल्हा बनाने के लिए क्रेशर डस्ट या पत्थर चूर्ण, छड़ की जाली, ईंट, सीमेंट, मिट्टी की बनीं पांच चिमनी और एक लकड़ी के फ्रेम की जरूरत पड़ती है.

जानकारी देते हुए भूदेव भक्त बताते हैं मुझे खुशी है कि इस पहल को आत्मनिर्भर होने के साथ-साथ धुंआ रहित चुल्हों की शौगात भी मिल गयी.

अंधविश्वास: डायन बताकर मार दी गयी हजारों महिलाऐँ

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रांची। बदलते भारत में इस तरह की घटनाऐं दहलाती हैं एक तरफ डिजीटल इंडिया पर जोर दिया जा रहा है तो दूसरी तरफ भूत पिशाच जैसे अंधविश्वास के नाम पर महिलाओं को मार दिया जाता है. अंधविश्वास में हत्याएं और प्रताडऩा झारखंड के लिए कोई नई घटना नहीं हैं. पहले भी राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में शर्मसार कर देने वाली ऐसी घटनाएं घट चुकी हैं. कभी अलौकिक शक्ति हासिल करने की चाह में मासूमों की बलि दे दी गई, तो कभी विधवा, वृद्ध और अधेड़ महिलाओं को मौत के घाट उतार दिया गया. इन सभी घटनाओं की जड़ में कहीं न कहीं अंधविश्वास ही रहा है.

झारखंड गठन के बीते 17 वर्षों की बात करें तो डायन करार देकर अच्छी-भली 1600 से अधिक महिलाएं मार डाली गईं. दर्जनों महिलाएं सपरिवार गांव से बहिष्कृत कर दी गईं. इतना ही नहीं डायन करार देकर निर्वस्त्र घुमाने, गंदगी खिलाने-पिलाने, शव के साथ कमरे में बंद कर देने जैसी असंख्य घटनाओं का गवाह रहा है झारखंड. शनिवार की घटना तो अंधविश्वास की सारी हदें ही पार कर गई.

जानकारी मिली है की तथाकथित तंत्र विद्या की सिद्धि के लिए गुमला में छह वर्ष के मासूम की बलि दे दी गई. हद तो यह कि खुद थाने में सरेंडर करने वाले हत्यारे ने पूर्व में अपने बेटे की बलि देने का खुलासा किया. ऐसे में हम डिजिटलाइजेशन की दुहाई दें, विकास दर में लंबी छलांग लगाने का दंभ भरें, बेइमानी ही होगी. तथाकथित डायन-बिसाही कुप्रथा के खिलाफ झारखंड में जंग लड़ रहे शोधकर्ताओं की मानें तो इस अंधविश्वास की जड़ में अशिक्षा तो है ही, तथाकथित ओझा-गुणी भी ऐसी घटनाओं के लिए जिम्मेदार हैं. उनके इशारे मात्र पर महिलाएं डायन करार कर दी जा रही हैं.

कुछ अपराधी प्रवृत्ति के लोग जमीन-जायदाद के लालच में ओझा-गुणी को आगे कर ऐसी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं. ऐसी बात भी नहीं है कि सरकार इस मामले में बिल्कुल ही चुप है. अपराधियों के खिलाफ जहां विभिन्न धाराओं के तहत कार्रवाई हो रही है, वहीं अलग से डायन प्रतिषेध अधिनियम भी प्रभावी है. लोगों को जागरुक करने के लिए सुदूर क्षेत्रों में प्रचार वाहन के अलावा नुक्कड़ नाटक आदि आयोजित किए जा रहे हैं. सरकार की कोशिश के बावजूद लोगों की आंखों पर पड़ी अंधविश्वास की यह पट्टी हटती नहीं दिख रही. आवश्यकता है अंधविश्वास के खिलाफ इस जंग में हर तबके की सहभागिता की. यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि जबतक समाज जाग्रत नहीं होगा, शिक्षा की ज्योति सुदूर क्षेत्रों में नहीं जलेगी तब तक इस तरह से हत्याऐँ होती रहेंगी.

नीतीश कुमार ने साबित किया बहुमत, बन गई जदयू-भाजपा की सरकार

Nitish Kumar

पटना। बिहार विधानसभा में हंगामे के बीच आज नीतीश कुमार ने अपना विश्वास मत हासिल कर लिया है. विपक्ष ने आज जमकर हंगामा किया लेकिन आखिरकार नीतीश ने अपना विश्वासमत हासिल किया और 131 के वोट पक्ष को मिले तो वहीं 108 वोट विपक्ष को मिले. नीतीश के विश्वास मत हासिल करते ही राजद ने सदन से वॉकआउट किया और सदन की कार्यवाही स्थगित कर दी गई है.

आज सुबह 11 बजे से विधानसभा का विशेष सत्र शुरू हुई और तीखी बहस के बाद नीतीश के विश्वास मत पेश करने के बाद सदस्यों ने पहले सदन में सभी सदस्यों की हां और ना के बाद लॉबी डिवीजन से फ्लोर टेस्ट हुआ और ध्वनिमत से सदन में फैसला नहीं होने के बाद वोटिंग कराई गई.

विधानसभा में वोटिंग शुरू होने के बाद रजिस्टर पर एक-एक कर सदस्य अपने हस्ताक्षर किए. नीतीश ने तो विश्वासमत हासिल कर लिया है लेकिन राजद के तेवर को देखकर एेसा लगता है कि सरकार को पहली बार मजबूत विपक्ष का सामना करना पडे़गा.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आज सुबह बहुमत साबित करने के लिए सुबह 10.30 बजे ही विधानसभा पहुंचे, उनके पहुंचने के थोड़ी देर बाद उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी भी सदन पहुंचे. आज विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया गया था. नीतीश कुमार ने विधानसभा में विश्वासमत पेश किया उसके बाद तेजस्वी ने नीतीश पर तीखा हमला किया और कई गंभीर आरोप लगाए.

पक्ष-विपक्ष के विवाद के बीच सदन में नीतीश कुमार ने विश्वासमत पर बोलते हुए कहा कि सदन की मर्यादा का पालन करना चाहिए. हम एक-एक बात का सबको जवाब देंगे. सत्ता सेवा के लिए होता है, मेवा के लिए नहीं. नीतीश ने कहा कि मैंने महागठबंधन धर्म का हमेशा पालन किया, लेकिन जब मेरे लिए मुश्किल आई तो इस्तीफा दे दिया.

पनामा पेपर्स मामले में आरोपी साबित हुए प्रधानमंत्री, SC ने दिया पद से हटाने का आदेश

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लाहौर। पनामा केस मामले में पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने नवाज शरीफ को दोषी करार दिया है. इस फैसले के बाद नवाज शरीफ पाकिस्तान के पद से हटाए जाएंगे. सुप्रीम कोर्ट में 5 जजों की बेंच ने नवाज शरीफ के खिलाफ फैसला सुनाया. पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने एनएबी को आदेश दिया है कि वे दो हफ्तों के अंदर नवाज शरीफ और उनके परिवार के खिलाफ केस दायर करें. सुप्रीम कोर्ट ने नवाज शरीफ को पद से तुरंत इस्तीफा देने का आदेश दिया है.

बता दें कि शरीफ के परिवार के विदेश में संपत्ति अर्जित करने के आरोपों की जांच के लिए संयुक्त जांच दल का गठन किया गया था और जेआईटी ने 10 जुलाई को अपनी रिपोर्ट अदालत को सौंप दी थी. रिपोर्ट में कहा गया था कि शरीफ और उनके बच्चों का रहन सहन उनके आय के ज्ञात स्रोत के मुताबिक नहीं है. रिपोर्ट में उनके खिलाफ भ्रष्टाचार का नया मामला दर्ज करने का सुझाव दिया गया था.

नवाज शरीफ को अब कुर्सी छोड़नी पड़ेगी. उम्मीद की जा रही है कि उनके छोटे भाई शहबाज शरीफ की प्रधानमंत्री पद पर ताजपोशी तय है. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को अगर सुप्रीम कोर्ट संवेदनशील पनामा पेपर्स मामले में कथित भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग के लिए अयोग्य ठहराने के बाद उनके छोटे भाई एवं पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री शहबाज उनकी जगह ले सकते हैं.

शहबाज पाकिस्तानी संसद के निचले सदन नेशनल असेम्बली के सदस्य नहीं हैं, जिसके चलते वह फौरन उनका स्थान नहीं ले सकते और उन्हें चुनाव लड़ना होगा. पाकिस्तानी चैनल जियो न्यूज ने सूत्रों के हवाले से बताया कि शहबाज के उपचुनाव में चुने जाने तक रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के 45 दिनों तक अंतरिम प्रधानमंत्री के तौर पर कार्यभार संभालने की संभावना है. यह निर्णय सत्तारूढ़ पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज (पीएमएल-एन) की उच्च स्तरीय बैठक में लिया गया.

क्या भाजपा का दलित प्रेम खोखला है?

ऩई दिल्ली। रामनाथ कोविंद के रूप में भारत के इतिहास में दूसरी बार एक दलित भारत का राष्ट्रपति बना है. इसके पहले केवल के. आर. नारायणन ही भारत के राष्ट्रपति थे जो कि दलित थे. लेकिन उत्तर भारत से राष्ट्रपति बनने वाले देश के पहले दलित रामनाथ कोविंद ही हैं. भाजपा के नेताओं द्वारा इसको दलित सम्मान के रूप में देखा जा रहा है. भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह हों या उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, सब के सब यह बताने में लगे हुए हैं कि कैसे यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दलितों के प्रति सम्मान और उनके प्रेम का प्रतीक है. यह भी कहा जा रहा है यह प्रधानमंत्री के द्वारा किया गया दलित सशक्तिकरण का अद्भुत नमूना है और इससे उन राजनेताओं और राजनीतिक दलों में खलबली मच गई है जो दलितों के नाम पर अपनी राजनीतिक दुकान चलाते हैं. पर क्या यह सही है कि नरेंद्र मोदी के अधीन भाजपा सरकार बनने के बाद दलितों का सशक्तिकरण हो रहा है? उन्हें उन पदों पर बैठाया जा रहा है जहां वह कभी नहीं पहुंच पाए? क्या उनको उस तरह के पद भी दिए जा रहे हैं जो उनको समाज में प्रभावी बदलाव करने में मदद देंगे? यह सही है की भाजपा ने कोविंद को राष्ट्रपति बनाकर पहली बार उत्तर भारत के किसी दलित को यह सम्मान दिया है. पर कांग्रेस पार्टी, जो अभी भी इसकी प्रमुख प्रतिद्वंदी है, यह पहले ही कर चुकी है. हालांकि कांग्रेस ने दक्षिण भारत के एक दलित को यह सम्मान दिया था. पर भारत के राष्ट्रपति का पद मूल रूप से रबड़ स्टैम्प का है. यही कारण है कि आजतक कोई भी सशक्त नेता, जिसका बहुत जनाधार हो, कभी राष्ट्रपति बनने की दौड़ में नहीं आया. इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आज देश के दो सबसे प्रभावशाली व्यक्ति हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह. नरेंद्र मोदी गुजरात की मोढ घांची जाति से हैं, जो कि उत्तर भारत के तेली जाति के समकक्ष है. यह जाति OBC केटेगरी में आती है. अमित शाह जैन बनिया जाति से आते हैं जो कि सामान्य श्रेणी में आती है. यानी कि भाजपा के दोनों सबसे बड़े व्यक्तियों में से कोई भी दलित नहीं है. भारत सरकार की सबसे प्रभावी कमेटी होता है कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी. इस कमेटी के सदस्य हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री राजनाथ सिंह, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज एवं वित्त मंत्री एवं रक्षा मंत्री अरुण जेटली. जहां राजनाथ सिंह उत्तर प्रदेश के ठाकुर हैं वहीं अरुण जेटली एवं सुषमा स्वराज ब्राह्मण हैं. यानी कि इस समिति में कोई भी दलित समुदाय से नहीं हैं. किसी भी राज्य में सबसे प्रभावी पद होता है मुख्यमंत्री का. आज भाजपा के नेतृत्व वाले नेशनल डेमोक्रेटिक अलायन्स के कुल 17 मुख्यमंत्री हैं. नार्थ ईस्ट के राज्यों को छोड़कर, जहां के अधिकतर मुख्यमंत्री अनुसूचित जनजाति के हैं, भाजपा या NDA का कोई भी मुख्यमंत्री दलित नहीं है. पार्टी में अध्यक्ष के बाद सबसे प्रभावशाली पद महासचिव का होता है. वर्तमान में भाजपा के 8 महासचिव है एवं उनमें से कोई भी दलित नहीं है. 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर कुल 40 दलित सांसद निर्वाचित हुए थे. उनमें से एक भी नरेंद्र मोदी के मंत्री परिषद् में कैबिनेट दर्जे का मंत्री नहीं हैं. उनके मंत्री परिषद् में कुल 24 कैबिनेट स्तर के मंत्री है जिनमें से 2 दलित हैं. ये हैं रामविलास पासवान, जो भाजपा के सहयोगी दल लोक जनशक्ति पार्टी से आते हैं. वहीं भाजपा के एकमात्र दलित कैबिनेट मंत्री थावरचंद गहलोत राज्य सभा के सदस्य है. गहलोत केंद्रीय सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री हैं, जो अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण विभाग माना जाता है. 2011 के जनगणना के मुताबिक, भारत की कुल 16.6 प्रतिशत आबादी दलितों की है. यानी कि करीब 20.14 करोड़ लोग इस श्रेणी के हैं. भाजपा संघटन के विभिन्न पदाधिकारियों एवं पार्टी के द्वारा सरकारी पदों पर बैठे हुए लोगों का आकलन करने पर यह प्रतीत होता है कि या तो दलितों को समुचित प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया, और अगर हैं भी तो केवल सांकेतिक हैं. रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनाना भी उसी श्रेणी का विस्तार माना जाएगा. ऐसा नहीं है कि अतीत की किसी सरकार ने दलितों के सशक्तिकरण के लिए कोई क्रान्तिकारी कदम उठाया है. कमोवेश भाजपा भी उन्हीं के पदचिन्हों पर चल रही है. फिर भी, अगर इन्हें लगता है कि कोविंद को राष्ट्रपति बनाने से दलित वोट बैंक में सेंध लगाने में सफल हो जाएंगे, तो शायद शासक दल को निराशा ही हाथ लगेगी.   (लेखक अशोक उपाध्याय का यह लेख आईचौक इन या इंडिया टुडे ग्रुप हिंदी से साभार लिया गया है. लेख में कोई बदलाव नहीं किया गया है) 

महान दलित विभूतियों का तिरस्कार?

हमारा देश सदियों पुराना देश है जहां ना जाने कितने बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं ने राज किया और देश के इतिहास के पन्नों पर अपने कार्यों के माध्यम से अमिट छाप छोड़ दी. जितना पुराना इस देश का इतिहास है, लगभग उतना ही पुरानी इसकी जातिप्रथा का भी कलंक इसके हिस्से में आता है. कम से कम दस हज़ार वर्षों से तो जातिप्रथा का घुन इस देश के गौरव को एक दीमक की तरह चाट रहा है. इतिहास के पन्नों की परतें फिरोलें तो पता चलता है कि आज से लगभग 5250 वर्ष पहले महाभारत का युद्ध कुरुक्षेत्र की धरती पर हुआ था और उस वक़्त इस युद्ध के महानायक, श्रीकृष्ण की आयु 83 वर्ष की थी! श्री कृष्ण से लगभग 2100 वर्ष पूर्व भगवान राम हुए थे और राम से तकरीबन दो-ढ़ाई हज़ार वर्ष पहले मनु महाराज नाम का एक ऋषि हुआ था. इस मनु महाराज से पहले समाज में होने वाले सभी कार्यों में तरलता थी, अर्थात कोई जातिपाति नहीं थी. समाज में अमीर-गरीब का भेदभाव तो था, लेकिन समाज में रहने वाले सभी लोगों को अपनी हैसियत और शारीरिक बल और बुद्धि के हिसाब से कोई भी काम धंधा करने की सबको आज़ादी थी.

लेकिन फिर मनु महाराज जैसे बड़े ही शातिर दिमाग वाले लोगों ने राज घरानों के साथ अपने असर रसूख के बलबूते पर इस एकदम सरल वर्गीकरण व्यवस्था में ऐसी तब्दिलियां लानी प्रारंभ कर दी (तकरीबन दस हज़ार वर्ष पहले) जिसने कि समाज को एक बहुत बड़े और भयानक बदलाव की दिशा की ओर धकेल दिया. इस मनु महाराज ने समाज में ऐसा बंटवारा करवा दिया कि उस वक़्त के जो ग़रीब लोग और उनकी आने वाली अनेकों पीढ़ियों कि दशा ही बदल डाली. क्योंकि राजे महाराजों के लिए यह व्यवस्था ज़्यादा फ़ायदेमंद साबित हो रही थी, उन्होंने इस व्यवस्था पर अपनी स्वीकृति की मोहर लगा दी. मैं तो इस मनु महाराज को एक बहुत बड़ा षडयंत्रकारी और चालबाज ही कहूंगा, क्योंकि उसने अपने जैसे लाखों अमीरजादों के मुनाफ़े के मद्देनज़र हमेशा के लिए अच्छी आर्थिक सुविधाजनक परिस्थितियां बना डाली और समाज को चार वर्णो में विभाजित कर दिया – ब्राह्मण, क्षत्रिया वैश्य और शूद्र. किसी भी मनुष्य को उसकी अपनी बुद्धि, बल और क्षमता के आधार पर समाज में बढ़ने, फैलने-फ़ूलने के सभी दरवाजे बंद कर दिए. पहले जो समाज में व्यवसायों के लिए तरलता थी, वह अब समाप्त हो चुकी थी, क्योंकि इस व्यवस्था के अनुसार, ब्राह्मणों के बच्चे हमेशा ब्राह्मण ही रहेंगे, क्षत्रियों के बच्चे हमेशा क्षत्रिय ही रहेंगे, और इसी तरह वैश्य हमेशा वैश्य ही और शूद्र हमेशा के लिए शूद्र ही रहेंगे. ब्राह्मणों के लिए पढ़ना-पढ़ाना ही अनिवार्य कर दिया, क्षत्रिय बस देश का शासन और राजपाठ ही संभालेंगे, वैश्य समाज के सभी व्यापार/कारोबार इत्यादि ही करते रहेंगे और अंत में शूद्रों को बोल दिया कि आप लोग केवल ऊपर की तीनों जातियों की सेवा ही करोगे. इनके बाकी सभी सामाजिक-आर्थिक अधिकार समाप्त.

तो ऐसे इस षडयंत्रकारी मनु महाराज ने उस वक़्त के गरीबों को तमाम उम्र बाकिओं के दास बना दिया. उनको समाज में रहने वाली अन्य तीनों जातियों को उपलब्ध अधिकार- जैसे कि पढ़-लिख कर अपना जीवन संवारना, जमीन जायदाद का अधिकार, और न जाने कितने फलने फूलने के अवसर, वह सब बंद कर दिए. ऐसी ही शर्मनाक व्यवस्थाओं के चलते सदियां बीत गई, युग बदल गए, मगर शूद्रों का शोषण और उनपे होने वाले अत्याचार बंद नहीं हुए. बल्कि, उन पर अपवित्र और अस्पृश्य होने का कलंक और मढ़ दिया. यदाकदा इस व्यवस्था को बदलने के लिए कुच्छ क्रांतिकारियों ने यत्न भी किये, मग़र उनकी अवाज़ को बुरी तरह कुचल दिया गया.

डॉ. बी.आर. अम्बेडकर: उन्नीसवीं सदी के आख़िर में एक एक बड़े ही जुझारू योद्धा ने 14 अप्रैल, 1891 को मध्य प्रदेश के महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में एक गरीब परिवार में जन्म लिया. भीम राव अम्बेडकर नाम के इस युवक ने बड़ी मुश्किल हालातों में शिक्षा प्राप्त की. उस वक़्त समाज में छुआछूत पूरे जोरों पर थी, दलितों पर खूब अत्याचार भी हुआ करते थे, इनके पढ़ने-लिखने के रास्ते में बहुत सी बाधाएं डाली जाती थी, ताकि यह लोग तमाम उम्र अनपढ़ रहकर, ग़ुलाम ही बने रहें और बाकी तीनों जातियों के लोग उन पर अपनी मन माफ़िक जुल्म, अत्याचार और शोषण कर सकें. डॉ. अम्बेडकर ने भी ऐसे ही शोषण और अत्याचारों की बीच रहते हुए अपनी शिक्षा पूरी ही नहीं की, बल्कि उस जमाने में भी ऐसी और इतनी बड़ी-बड़ी डिग्रियां हासिल की, कि उनके ज़माने के अपने आप को तथाकथित ऊंची जाति वाले भी उनके सामने फ़ीके पड़ने लगे.

देश में अंग्रेज हुकूमत का राज था और चारों तरफ़ गुलामी की जंजीरें काटने और इसको तोड़ने के लिए खूब जी-जान से यतन किये जा रहे थे. देश प्रेमी अपने देश के लिए आज़ादी हासिल करने ख़ातिर जान की बाजियां लगा रहे थे, मग़र इसी देश में रहने वाले करोड़ों दलितों को तथाकथित तीनों ऊंची जातियों के लोगों के चुंगल से छुड़वाने के लिए, किसी को कोई चिन्ता-फ़िक्र नहीं थी. बल्कि वह लोग तो चाहते थे कि यह दलित लोग हमेशा के लिए ऐसे ही दबे-कुचले ही रहें ताकि इनपर अपनी मनमर्जी के मुताबिक इनसे काम लिया जाये और इन में से किसी में भी इतनी हिम्मत न आए कि कोई उफ़ तक न कर सकें! वह तो सभी यही मानकर बैठे हुए थे कि यह लोग तो अंग्रेजों से आज़ादी हासिल होने के बाद भी हमारे ग़ुलाम ही बने रहेंगे.

25 दिसम्बर, 1927 को महाड़, महाराष्ट्र में अपने एक सत्याग्रह के दौरान डॉ. अम्बेडकर ने दलितों के साथ भेदभाव सिखाने वाली, रूढ़िवादी विचारों वाली और अवैज्ञानिक सोच पर आधारित ब्राह्मणवादी पुस्तक मनुसमृति एक भव्य जन समूह के सामने जला डाली और कड़े शब्दों में इस पुस्तक में बताई गई वर्णव्यवस्था सिरे से ही ठुकराते हुए अपने अनुयाईओं को भी इसे बिलकुल न मानने का निर्देश दे दिया. यही नहीं, उन्होंने सार्वजनिक स्थानों पर दलितों को पानी लेने का भी ऐलान किया क्योंकि भगवान ने सभी कुदरती साधन और व्यवस्थाएं सभी इन्सानों के लिए ही की हुई हैं. कुछ मनुवादियों को डॉ. अम्बेडकर द्वारा दी गई चुनौतियां पसन्द नहीं आई और उन्होंने डॉ. अम्बेडकर की इन हरकतों को समाज विरोधी बताया और ऐसा करने वालों में महात्मा गांधी समेत कांग्रेस के बहुत से बड़े-बड़े नेतागण भी शामिल थे. लेकिन डॉ. अम्बेडकर उनकी परवाह न करते हुए अपने मिशन में आगे बढ़ते ही जा रहे थे. दूसरी तरफ़, डॉ. अम्बेडकर ने अंग्रेजी हुकूमत को बार-बार पत्र लिखकर दलित शोषित वर्ग की स्थिति से अवगत करवाया और उन्हें अधिकार दिलवाने के लिए मांगपत्र भी भेजे. बाबासाहेब के पत्रों में वर्णित छुआछूत व भेदभाव के बारे में पढ़कर अंग्रेज़ दंग रह गए कि क्या एक मानव दूसरे मानव के साथ ऐसे भी पेश आ सकता है.

बाबा साहेब के तथ्यों से परिपूर्ण तर्कयुक्त पत्रों से अंग्रेज़ी हुकूमत अवाक रहगई और उसने 1927 में दलित शोषित वर्ग की स्थिति के अध्ययन के लिए और डॉ. अम्बेडकर के आरोपों की जांच के लिए अंग्रेज़ हुकूमत ने एक विख्यात वकील, सर जॉन साईमन की अध्यक्षता में एक कमीशन का गठन किया. कांग्रेस ने इस आयोग का खूब विरोध किया मग़र 1930 में आयोग ने भारत आकर अपनी कार्यवाही शुरू कर दी. मई 1930 को उनके साथ एक मीटिंग में डॉ. अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म में फ़ैली बेशुमार कुरीतियों, अवैज्ञानिक जातिप्रथा की ग़लत धारणाओं पर आधारित, बड़ी तीन जातियों द्वारा अपनी कौम के साथ हो रही बेशुमार ज़्यादतियों का काला कच्चा चिट्ठा उसके सामने रखा और उनसे इस वर्णव्यवस्था को जड़ से समाप्त करने की अपील की. साइमन कमीशन को यह जानकर बड़ा दुख और हैरानी हुई की हिन्दुस्तान में समाज एक चैथाई तबके के साथ सदियों से ऐसा होता आ रहा है और देश सभी बड़े-बड़े नेता इस पर ख़ामोशी साधे हुए हैं?

ऐसे ही चलते-चलते जब आज़ादी का अन्दोलन अपने पड़ाव में आगे ही आगे बढ़ता जा रहा था और कांग्रेस बड़े नेता महात्मा गांधी ने दलितों के ऊपर हज़ारों वर्षों से चले आ रहे शोषण, व अत्याचार के प्रति अपनी अन्तिम राय दे दी की– “मैं तो एक कट्टर हिन्दू हूं, और हिन्दू धर्म में सदियों से चली आ रही वर्णव्यवस्था सही है, और मैं इसको बदलने के पक्ष में बिलकुल भी नहीं हूं”, तब डॉ. अम्बेडकर ने अंग्रेज़ हुकूमत के सामने अपनी एक और बड़ी मांग रख दी कि देश की आज़ादी के बाद हमें इन तथाकथित झूठे/पाखण्डी/अत्याचारी सवर्णों के साथ रहने में कोई दिलचस्पी नहीं है और हमें भी अपनी आबादी के अनुपात से एक अलग देश बनाने की अनुमति दी जाये और इसके लिए देश के पूरे क्षेत्रफ़ल में से अपने हिस्से की ज़मीन भी दी जाये. डॉ. अम्बेडकर की इस मांग को सुनकर कांग्रेस के सभी बड़े-बड़े नेताओं में तो हड़कंप मच गया (ख़ास तौर पे जब साईमन आयोग के साथ हुई 3-4 बैठकों के बाद कांग्रेसी नेताओं को इस बात का एहसास होने लग गया कि आयोग तो डॉ. अम्बेडकर के ज़्यादातर मामलों से सहमत होता नज़र आ रहा है) और महात्मा गांधी ने जलभुन के पुणे में आमरण अनशन रख दिया. जब अन्य कांग्रेस के नेताओं के समझाने के बावजूद भी डॉ. अम्बेडकर अपनी अलग देश की मांग को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुए, तो इन नेताओं ने डॉ. अम्बेडकर को मनाने के लिए एक साज़िश रची. इस षडयन्त्र के तहत गांधी की पत्नी, कस्तूरबा गांधी कुछ अन्य महिलाओं के साथ डॉ. अम्बेडकर से मिलने गई और उनसे अपनी अलग देश की मांग त्यागने की बिनती की और हाथ जोड़कर प्रार्थना की – “मेरे पति की जान अब केवल आप ही बचा सकते हो. अगर आप अपनी यह मांग त्यागने के लिए सहमत हो जाते हैं तो कांग्रेस आपकी बहुत सी मांगों पर सकारात्मक रूप में विचार कर सकती हैं.” डॉ.अम्बेडकर ने कस्तूरबा गाँधी को समझाते हुए स्पष्ट लफ़्ज़ों में कहा कि “यदि गाँधी भारत की स्वतंत्रता के लिए मरण व्रत रखते, तो वह न्यायोचित हैं.

परन्तु यह एक पीड़ादायक आश्चर्य तो यह है कि गांधी ने केवल अछूतों के विरोध का रास्ता चुना है, जबकि भारतीय ईसाइयों, मुसलमानों और सिखों को मिले इस अधिकार के बारे में गांधी ने कोई आपत्ति नहीं की. उन्होंने आगे कहा की महात्मा गांधी कोई अमर व्यक्ति नहीं हैं. भारत में ऐसे अनेकों महात्मा आए और चले गए, लेकिन हमारे समाज में छुआछूत समाप्त नहीं हुई, हज़ारों वर्षों से अछूत, आज भी अछूत ही हैं. मग़र अब हम गांधी के प्राण बचाने के लिए करोड़ों अछूतों के हितों की बलि नहीं दे सकते.” लेकिन फिर धीरे-धीरे दोनों पक्षों के बीच बैठकों का सिलसिला बढ़ने लगा और डॉ. अम्बेडकर ने कस्तूरबा गांधी के आश्वासन पर और दलितों की सम्पूर्ण स्तिथि पर बड़ा गहन सोच विचार किया, और इस तरह 24 दिसम्बर, 1932 को पूना समझौते के अन्तर्गत दलितों के लिए उनकी आबादी के अनुपात में चुनाव में, शिक्षा के लिए कॉलजों में दाखिले हेतु और सरकारी नौकरियों में और पद्दोन्तियों में सीटें आरक्षित रखने के मुद्दे पर सहमति बन पाई. ऐसे ही एक और मीटिंग में डॉ. अम्बेडकर ने महात्मा गांधी को उस वक़्त अच्छी तरह लताड़ दिया जब उसने कहा कि आप ऐसे ही इतने ख़फ़ा होते रहते हो, मैंने आपके लोगों के लिए एक नया शब्द “हरिजन” दे तो दिया है. डॉ. अम्बेडकर ने सभा में उपस्थित सभी को सम्बोधन करते हुए कहा, “मैं इतने वर्षो से जातिपाति के भेदभाव को समाप्त करने के लिए जी-जान से दिन रात संघर्ष कर रहा हूं, पूरे समाज को, पूरी मानवता को, इन्सानियत को एक ही पायदान पर लाकर खड़ा करने के प्रयासों में जुटा रहता हूं, और यह आदमी दलितों की एक अलग ही पहचान बनाने के लिए एक नई खिड़की खोल रहा है.” नेहरू से यह बर्दाश्त नहीं हुआ और उन्होंने बाबासाहेब से कहा, “अम्बेडकर जी! आप गांधीजी से इस लहजे में बात नहीं कर सकते!” इस पर डॉ. अम्बेडकर ने उन्हें भी तल्खी से लताड़ते हुए उत्तर दिया, “मेरी एक बात का जवाब दो – हरिजन का शाब्दिक अर्थ होता है- भगवान के बन्दे, अगर केवल मेरे दलित शोषित वर्ग के लोग ही हरिजन हैं, जैसा कि आपके महात्मा गांधी कह रहे हैं, तो क्या आप बाकी सब राक्षसों की औलाद हैं?” डॉ. अम्बेडकर का यह तर्क सुनकर सभा में बैठे सब लोग थोड़ा झेंपकर इधर-उधर देखने लग गए और सभा में थोड़ी देर के लिए सन्नाटा सा छा गया.

अगस्त 1947 में देश की आज़ादी के बाद उन्होंने देश का संविधान बनाने की ज़िम्मेदारी बखूबी निभाई और यह संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू किया गया. तमाम उम्र डॉ अम्बेडकर कड़ा संघर्ष ही करते रहे, पूरे देश की ख़ातिर और अपने समाज की ख़ातिर, मग़र वक़्त-वक्त पर कांग्रेस के नेताओं ने उनका तिरस्कार व निरादर ही किया. देश का संविधान लिखा, उनकी लिखी हुई एक पुस्तक (The Problem of the Rupee – Its Origin and Its Solution) के आधार पर रिज़र्व बैंक ऑफ़ इण्डिया की स्थापना 1 अप्रैल,1935 को की गई. न जाने और कितने उन्होंने समाज सुधार के कार्य किए. कानूनी तौर पर देश से छुआछूत मिटाई, सारी उम्र उन्होंने दलितों और समाज के दब्बे कुचले / बहिष्कृत और तिरस्कृत लोगों को न्याय दिलाने में लगा दी, देश के सभी नागरिकों को एक समान वोट देने का अधिकार दिलाया, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए चुनाव लड़ने के लिए अलग से निर्वाचिन सीटें दिलाईं, मगर उनके खुद के साथ पूरी उम्र ज्यादतियां ही होती रहीं. जब वे अपनी पढ़ाई पूरी करके देश लौटे और महाराजा गायकवाड़ के यहां अपने समझौते के मुताबिक नौकरी करने पहुंचे, तो वहां के लोगों ने उनकी नीची जाति के कारण उन्हें किराये पर कोई घर नहीं दिया. उनके ही दफ़्तर में काम करने वाला चपरासी जोकि पढ़ाई-लिखाई में बिलकुल ही निम्न स्तर का था, वह भी उनको पानी नहीं पिलाता था. जब अम्बेडकर पाठशाला में ही पढ़ते थे, क्लास में रखे हुए पानी के घड़े में से उनको पानी पीने की इजाजत नहीं थी, और वह क्लास से बाहर, अपने बाकी सहपाठियों से अलग, अपने ही घर से लाये गए टाट पर बैठते थे. इतना पढ़ने-लिखने के बाद भी जब उन्होंने ढेर सारी किताबें लिख चुके थे, अख़बार के एडिटर भी बन चुके थे, कॉलेज में प्रिंसिपल भी रह चुके थे, इसके बावजूद भी जुलाई 1945 में उनको पुरी में जगन्नाथ मन्दिर में जाने से वहां के पुजारियों ने रोक दिया था, क्योंकि अम्बेडकर एक शूद्र/महार परिवार से आए थे. केवल इतना ही नहीं, अपने आपको बड़े पढ़े-लिखे और आधुनिक कहलवाने वाले महात्मा गांधी ने भी एक बार यह बात कबूल की कि जब भी किसी मीटिंग में उनको डॉ. अम्बेडकर के साथ हाथ मिलाना पड़ता था, उस दिन घर जाने बाद जबतक वह साबुन से अच्छी तरह हाथ नहीं धो लेते थे, वह खाने पीने की किसी भी वस्तु को छूते तक नहीं थे. बाद में ऐसा ही रवैया कुछ और कांग्रेसी नेताओं ने स्वीकार किया.

वैसे तो डॉ. अम्बेडकर बहुत पहले अपने मन की बात कह चुके थे कि उनका जन्म ही हिन्दू धर्म में हुआ है, लेकिन वह हिन्दु मरेंगे नहीं, और अन्तत: 14 अक्टूबर, 1956 को डॉ. अम्बेडकर ने अपनी पत्नी सविता अम्बेडकर, अपने निजी सचिव- नानक चन्द रत्तु और दो लाख से भी ज्यादा अनुयाईयों के साथ नागपुर में हिन्दु धर्म त्यागने की घोषणा कर दी और बुद्ध धर्म (जोकि मानवता की बराबरी, ज्ञान, सच्चाई के रास्ते और करुणा/दया के सिद्धांतों पर आधारित है), को अपना लिया. आज़ादी के बाद भी वह देश के पहले कानून मंत्री बन गए थे, इतनी ज़्यादा विभिन्नताओं से भरे देश के लिए संविधान भी लिखा, मग़र इतना कुछ करने के बाद भी उनको देश का सर्वोच्च पुरस्कार भारत रत्न से नहीं नवाज़ा गया था, आख़िर यह तो तब सम्भव हो पाया जब 1990 में वीपी सिंह देश के प्रधानमंत्री बने, जबकि कोलंबिया विश्वविद्यालय, अमरीका, यहाँ से उन्होंने अपनी पी.एचडी की थी, उन्होंने डॉ. अम्बेडकर द्वारा लिखे गए संविधान को जब भारत ने 26 जनवरी, 1950 को लागू कर दिया था, तब ही अपने विश्वविद्यालय के प्रांगण में डॉ. अम्बेडकर को यथासम्भव सम्मान देते हुए उनकी प्रतिमा स्थापित कर दी थी. डॉ. अम्बेडकर का परिनिर्वाण तो दिल्ली में 6 दिसम्बर 1956 को हुआ था, लेकिन उनके अन्तिम संस्कार के लिए नेहरू ने दिल्ली में कोई जगह नहीं दी. इतना ही नहीं, नेहरू जानते थे कि पूरे देश में डॉ. अम्बेडकर को मानने और सम्मान देने वालों की संख्या करोड़ों में है, और अगर इनका अन्तिम संस्कार दिल्ली में हो गया तो प्रत्येक वर्ष अम्बेडकर के जन्म दिवस और परिनिर्वाण दिवस पर यहां तो मेले लगते रहेंगे. इस लिहाज़ से मरा हुआ अम्बेडकर जिन्दा अम्बेडकर से भी ज़्यादा ख़तरनाक सिद्ध हो सकता है. यही सब ध्यान में रखते हुए नेहरू ने उन्हें (उनके घर वालों की इच्छा के ख़िलाफ़) दिल्ली से दूर उनके शव को एक विशेष विमान से मुम्बई भेज दिया. तो इस तरह देश के संविधान निर्माता और एक बड़े तबके के रहनुमा के साथ परिनिर्वाण के बाद भी नाइन्साफ़ी ही हुई. देश के संविधान निर्माता को देश की राजधानी में जगह नहीं मिली. इतना ही नहीं, उनके परलोक सुधारने के बाद भी उनके साथ अत्याचार होने बंद नहीं हुए हैं, बहुत बार ऐसा हो चुका है कि देश में विभिन्न स्थानों पर स्थापित की गई उनकी प्रतिमाएं अक्सर या तो तोड़ दी जाती हैं या फिर उनके चेहरे पर कालिख़ पोत दी जाती है. कुछ भी हो, दलित समाज के करोड़ों लोगों के दिलों में डॉ अम्बेडकर का मान सम्मान और दर्जा किसी देवता से कम नहीं है और वह उन्हें 14वीं सदी के महान गुरू, क्रन्तिकारी समाज सुधारक, गुरू रविदास जी का ही अवतार मानते है.

इस तथाकथित महान आदमी, महात्मा गांधी का दोगलापन तो देखिए-जब 1893 में डरबन, साऊथ अफ्रीका में एक गाड़ी के प्रथम श्रेणी के डिब्बे में सफ़र करते समय एक टिकट चैकर ने उसे से गाड़ी से इसलिए उतार फेंका थाकि उसका काला रंग है और काले रंगवाले लोगों को ऐसे सहूलतों वाले रेल के डिब्बे में सफ़र करने की इजाजत नहीं है, तब उसने सारी दुनियां को चीख-चीख कर बताया था के मेरे साथ रंग/नसल के आधार पर भेदभाव करते हुए नाइंसाफी हुई है, उसी महात्मा गांधी को अपने ही देश हज़ारों वर्षों से शूद्रों के साथ जातिपाति के आधार पर हो रहे भेदभाव, शोषण और अत्याचार कभी नज़र नहीं आये और जब डॉ. अम्बेडकर ने इसके ख़िलाफ़ बुलन्द आवाज में विरोध किया तो वह हमेशा यही कहता रहा कि हिन्दुओं में प्रचलित यह वर्णव्यवस्था हज़ारों वर्ष पुरानी है और इसमें सुधार या बदलाव लाने की ज़रा भी गुंजाइश नहीं है. लेकिन इसके साथ ही यह बात भी सोलह आने सच है कि इस देश में अंग्रेज आए और उसी दौरान बाबासाहेब अम्बेडकर जैसी महान विभूति ने अवतार लिया और अंग्रेजों के दिलो-दिमाग़ में यह बात बैठाने में बाबासाहेब कामयाब हो गए कि इन तथाकथित ऊंची जाति वाले लोगों ने देश की एक चैथाई आबादी को हज़ारों वर्षो से ग़ुलाम बनाकर रखा हुआ है, झूठ, फ़रेब, अनपढ़ता और अंधविश्वाशों में उलझाकर उनका हजारों वर्षों से उनका शोषण व अत्याचार कर रहे हैं, उनकी उन्नति, विकास और प्रगत्ति के रास्ते में एक ज़हरीले साँप की तरह कुण्डली मारकर बैठे हुए हैं, और इन मनुवादी ब्राह्मणों से तो कहीं ज़्यादा तर्कशील और विवेकशील वह अंग्रेज शासिक थे, जिन्होंने बाबा साहेब द्वारा व्याख्यान की गई दलितों की व्यथा को ढंग से सुना और समझा और तब देश के साथ 2 दलितों को भी ग़ुलामी की जंजीरों से काफ़ी हद तक आज़ादी मिल गई, वार्ना इस से पहले वाले हजारों राजे महाराजे तो इन ब्राह्मणों की बनाई गई वर्णव्यवस्था के अन्तर्गत ही अपना राजपाठ व प्रसाशन चलाते रहते और उनके राजपाठ के चलते दलितों के कल्याण व उत्थान की कल्पना करना भी नामुमकिन सा ही था.

सावित्रीबाई फुले: डॉ अम्बेडकर की तरह ही एक महिला विद्वान, सावित्रीबाई फुले (पत्नी ज्योतिबा फुले) एक महान दलित विद्वान, समाज सुधारक और देश की पहली महिला शिक्षिका, समाज सेविका, कवि और वंचितों की आवाज उठाने वाली सावित्रीबाई फूले का जन्‍म 3 जनवरी, 1831 में एक दलित परिवार में हुआ था. 1840 में 9 साल की उम्र में उनकी शादी 13 साल के ज्‍योतिराव फुले से हुई. सावित्रीबाई फूले ने अपने पति क्रांतिकारी नेता ज्योतिबा फूले के साथ मिलकर लड़कियों के लिए 18 स्कूल खोले. सावित्रीबाई फुले देश की पहली महिला अध्यापक-नारी मुक्ति अन्दोलन की पहली नेता थीं. उन्‍होंने 28 जनवरी,1853 को गर्भवती बलात्‍कार पीडि़तों के लिए बाल हत्‍या प्रतिबंधक गृह की स्‍थापना की. सावित्रीबाई ने उन्नीसवीं सदी में छुआ-छूत, सतिप्रथा, बाल-विवाह और विधवा विवाह निषेध जैसी कुरीतियां के विरुद्ध बुलन्द आवाज़ उठाई और अपने पति के साथ मिलकर उसपर काम किया. सावित्रीबाई ने आत्महत्या करने जा रही एक विधवा ब्राह्मण महिला काशीबाई की अपने घर में पैदाइश करवाई और उसके बच्चे यशंवत को अपने दत्तक पुत्र के रूप में गोद लिया. दत्तक पुत्र यशवंत राव को पाल-पोसकर इन्होंने बड़ा किया और उसे डॉक्टर बनाया. ज्योतिबा फुले की मृत्यु सन 1890 में हुई. तब सावित्रीबाई ने उनके अधूरे कार्यों को पूरा करने का संकल्प लिया. सावित्रीबाई की मृत्यु 10 मार्च,1897 को प्लेग के मरीजों की देखभाल करने के दौरान ही हो गयी थी. उनका पूरा जीवन समाज में वंचित तबके, ख़ासकर महिलाओं और दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष में ही बीता. उनकी एक बहुत ही प्रसिद्ध कविता है जिसमें वह सबको पढ़ने लिखने की प्रेरणा देकर जाति व्यवस्था तोड़ने और ब्राह्मण ग्रंथों को फैंकने की बात करती हैं, क्योंकि यह पुस्तक हमेशा से ही दलितों को नीचा दिखाते आये हैं और इनकी प्रगति और विकास के मार्ग में बहुत बड़ी वाधा बनते आए हैं. बड़ी हैरानी की बात है कि उनके इतने बड़े संघर्ष और बलिदान को भूलकर जब अध्यापक दिवस मनाने की घोषणा की गई, तब सरकार में किसी को यह ध्यान क्यों नहीं आया की यह तो सावित्रीबाई के जन्म दिवस- अर्थात 3 जनवरी को ही मनाया जाना चाहिए था, ना कि 5 सितंबर को.

उस वक़्त जब औरतों को आदमियों की पैर की जूती बराबर ही समझा जाता था, सावित्री जी के प्रसिद्ध विचार पूरे समाज को एक नई दिशा और चेतना देने वाले इस प्रकार थे- जागो, उठो, पढ़ो-लिखो, बनो आत्मनिर्भर, मेहनती बनो, काम करो, ज्ञान और धन इकट्ठा करो, ज्ञान के बिना सब कुछ खो जाता है, ज्ञान के बिना आदमी पशु समान ही रह जाते हैं. उन्होंने हमेशा इस बात पर ज़ोर दिया कि दलित और शोषित समाज के दुखों का अंत केवल पढ़-लिख कर शिक्षित बनने, धन कमाने और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने से ही होगा. उस वक़्त के हिसाब से एक दलित परिवार से और बिलकुल ही निम्न स्तर से उठकर इस महान महिला के समाज सुधार को ध्यान में रखते हुए सभी दबे कुचले परिवारों के शोषित लोग सावित्रीबाई के जन्म दिवस (तीन जनवरी) को ही शिक्षक दिवस के रूप में मानते और मनाते हैं, नाकि 5 सितम्बर को, क्योंकि श्री राधाकृष्णन का पूरे समाज के लिए योगदान सावित्रीबाई के योगदान और बलिदान के सामने बिलकुल फ़ीका पड़ता ही नज़र आता है.

मेजर ध्यानचन्द: जब दलितों के साथ निरन्तर हो रहे अत्याचार, शोषण और तिरस्कार की बात चलती है तो हम हॉकी के महान जादूगर मेजर ध्यान चन्द को कैसे भूल सकते हैं. ध्यानचन्द का जन्म 29 अगस्त, 1905 को इलाहाबाद में हुआ था. वह भारतीय फ़ौज में नौकरी करते थे और हॉकी के बहुत ही बढ़िया खिलाड़ी थे. उनको तीन बार ओलिंपिक खेलों में भाग लेने का अवसर मिला– 1928, 1932 और 1936 में. अपने पूरे ख़ेल जीवन के दौरान उन्होंने 400 से ज़्यादा गोल किये और हमेशा अपनी टीम को जीत दिलाई. ख़ेल के दौरान ध्यानचन्द इतनी चुस्ती फुर्ती, स्फ़ूर्ति और कुशलता के साथ खेलते थे और उनके इतने ज्यादा गोल करने के क्षमता की वजह से ऐसा कहा जाने लग गया कि – हॉकी एक खेल नहीं है, बल्कि एक जादू है और ध्यान चन्द इसके महान जादूगर. 1936 ओलंपिक खेलों में भारत का फाइनल मैच जर्मनी के साथ होना था और यह मैच देखने के लिए उस वक़्त के जर्मनी के चांसलर अडोल्फ़ हिटलर भी स्टेडियम में मौजूद थे और वह चाहते थे कि किसी भी तरह जर्मनी यह फाइनल मैच जीत जाए. मगर ध्यान चन्द के होते हुए यह कहां सम्भव था, और अंतत: भारत ने जर्मनी को 8-1 के मार्जिन से हरा दिया. इस मैच में अकेले ध्यानचन्द ने 6 गोल दागे और जर्मनी के चांसलर हिटलर ध्यान चन्द की खेल कुशलता और शैली से इतना प्रभावित हुआ कि उसने ध्यानचन्द को अपने घर खाने पर बुलाया. खाने के दौरान हिटलर ने ध्यान चन्द से पूछा कि वह हॉकी खेलने के इलावा क्या करते है? ध्यानचन्द ने जवाब दिया कि वह आर्मी में लान्सनायक हैं. फिर हिटलर ने ध्यानचन्द को इंडिया छोड़कर जर्मनी में आकर बसने का निमंत्रण दिया और यह भी लालच दिया कि वह ध्यान चन्द को जर्मनी की सेना में जनरल बना देगा, एक बहुत बड़ी कोठी भी उसे दी जाएगी, बस वह आकर वहीं बस जाये और जर्मनी की टीम को हॉकी खेलना सिखाये. मगर ध्यानचन्द ने हिटलर का प्रस्ताव यह कहकर ठुकरा दिया कि वह अपने देश को बहुत प्यार करता है और अपना देश छोड़ने के बारे में सोच भी नहीं सकता.

मगर अपने देश में अन्य दलित लोगों की तरह, ध्यानचन्द के साथ भी जाति आधारित भेदभाव अक्सर होते रहते थे. जैसे कि खिलाडियों को जीतने के बाद जो इनाम में दी जाने वाली धन राशि को घोषणा होती है, वह भी उस खिलाड़ी की जाति जानकर ही होती है. सारी उम्र ध्यानचन्द का हॉकी के प्रति समर्पण, उसकी अपने देश को जीत दिलाने की लगन व कार्य-कुशलता को देखते हुए उसको बहुत पहले खेलों में भारत रतन मिल जाना चाहिए था. मगर ऐसा हरगिज़ नहीं हो सका, क्योंकि किस-किस खिलाड़ी को क्या-क्या इनाम और मान सम्मान देना है, इसका निर्णय तो सत्ता में शिखर पर बैठे बड़े अधिकारी और नेतागण ही करते हैं और यह निर्णय लेते समय वह खिलाड़ी की जाति देखना कभी नहीं भूलते. अंत में जब 2014 में यह निर्णय लिया गया कि भारत रत्न के लिए खेलों को भी शामिल किया जाना चाहिए, उस वक़्त भी ध्यानचन्द के साथ चार-पांच दशकों से होते रहे अन्याय को समाप्त करने की बजाय, एक बड़े दलित उम्मीदवार को छोड़कर एक ब्राह्मण (सचिन तेंदुलकर) को यह सम्मान दे दिया गया. और इस तरह ध्यानचन्द के साथ हो रहा तिरस्कार का सिलसिला उसके मरणोप्रांत अब भी जारी है. अपने ही गांव झाँसी में 3 दिसंबर, 1979 को उनकी मृत्यु हो गई.

मोहम्मद अली: ऐसा नहीं है ऐसे जातिपाति आधारित भेदभाव, तिरस्कार और उनकी प्रतिभा की अवेहलना हमारे देश में ही होती है. विश्वप्रसिद्ध अमरीकी बॉक्सिंग चैंपियन मोहम्मद अली (17 जनवरी, 1942 से 3 जून, 2016) को भी अपने पूरे जीवनकाल में बहुत बार रंगभेद का सामना करना पड़ा था. मोहम्मद अली, जोकि जन्म से एक ईसाई था और उसका नाम कैसियस मार्केलॉस क्ले था, को स्कूल के दिनों में अपने काले रंग की वजह से अनेकों बार पीड़ा, भेदभाव, तिरस्कार और भद्दी-भद्दी टिप्णियां सुननी पड़ती थी. फिर एक दिन ऐसा आया कि उसने अपना धर्म परिवर्तन करके इस्लाम धर्म अपना लिया और कैसियस क्ले से मोहम्मद अली बन गया. 25 फरवरी, 1964 को अपने से पहले बड़े मुक्केबाज़ चार्ल्स सोनी को, फ्लोरिडा में हराकर मोहम्मद अली बॉक्सिंग चैंपियन बन गया. विश्व चैंपियन बनने के बाद उनके पास पैसा, शोहरत, बड़ी कोठी इत्यादि तो सब आ गए थे, मगर उसके काले रंग की वजह होने वाले निरंतर तिरस्कार से उनका पीछा नहीं छूटा.

एक बार की बात है कि मोहमद अली की शादी की सालगिरह का अवसर था और उसके बच्चों की जिद्द थी उनके पिता बच्चों को शहर के सबसे बड़े और महंगे होटल में खाना खिलाएं. मोहम्मद अली ने बच्चों को बहुत समझाया कि जो खाने की उनकी इच्छा है, वह बता दें और इसका प्रबंध वह घर में ही कर देंगे. मगर बच्चे अभी इतने बड़े नहीं हुए थे कि वह समझ सकें कि उनके पिता उनको बड़े होटल में क्यों नहीं लेजा रहे. खैर, बच्चों की जिद्द के आगे नतमस्तक होकर मोहम्मद अली और उसकी पत्नी बच्चों को शहर के सबसे महंगे होटल में ले गए. वहां पहुंचकर एक ख़ाली मेज देखकर उसके इर्दगिर्द बैठ गए और मोहम्मद अली ने एक बैरे को खाने का मेनू लाने के लिए कहा. वह बैरा तो क्या, वहां पर उपस्थित सभी लोग मोहम्मद अली और उसके परिवार को ऐसे देखने लग गए जैसे कि वह कोई चोर हों. जब मोहम्मद अली ने अपने मेज के पास से गुजरते हुए एक बैरे को रोका और पूछा कि आप लोग हमारे लिए खाने का मेनू कार्ड क्यों नहीं दिखा रहे, तब उस बैरे ने बड़े नफ़रत भरे अंदाज से उत्तर दिया, “हमारे होटल में काले रंग के लोग और कुत्तों को अन्दर आने की इजाजत नहीं है, मुझे तो ताज्जुब हो रहा है कि आप लोग यहां आ कैसे गए?” इतना सुनते ही मोहम्मद अली का भी ख़ून खौल गया, आख़िर वह भी बॉक्सिंग का विश्व चैंपियन था, दोनों तरफ़ ख़ूब हाथापाई-मारपीट शुरू हो गई और मोहम्मद अली ने उस होटल के चार-पांच लोगों की अच्छी धुनाई कर दी. होटल के मैनेजर ने झट से फ़ोन करके पुलिस बुलवा ली और मोहम्मद अली पर होटल में जबरदस्ती घुसने और मारपीट करने और फर्नीचर की तोड़फोड़ का आरोप लगा दिया. पुलिस उस वक़्त तो मोहम्मद अली को पकड़कर ले गई, मग़र उसके ऊपर कोई कानूनी कार्यवाही नहीं कर सकी. और ऐसे इस घटना के बाद मोहमद अली के बच्चों को भी जिन्दगी भर का एक सबक मिल गया कि मां-बाप की बात मान लेने में ही भलाई होती है.

दशरथ मांझी: दशरथ मांझी नाम की इस महान विभूति को कौन भूल सकता है, जिन्हें आजकल ”माउन्टेन मैन” के नाम से भी जाना जाता है. वह बिहार में गया जिले के करीब गहलौर गांव में रहने वाला एक गरीब खेत मजदूर था, और उन्होनें केवल एक हथौड़ा और छेनी लेकर अकेले अपनी हिम्मत के सहारे ही 360 फुट लम्बी, 30 फुट चौड़ी और 25 फुट ऊंचे पहाड़ को काटकर एक सड़क बना डाली. 22 वर्षों के अत्यंत ही कठिन परिश्रम के बाद, दशरथ मांझी द्वारा बनाई सड़क ने अतरी और वजीरगंज ब्लाक की दूरी को 55 किलोमीटर से घटाकर मात्र 15 किलोमीटर ही कर दिया.

गहलौर गांव में 1934 में जन्मे इस सज्जन ने ये साबित किया है कि अगर इंसान ठान ले तो कोई भी काम असंभव नहीं है. एक इंसान जिसके पास पैसा नहीं, कोई ताकत नहीं, मगर उसने इतना बड़ा पहाड़ खोदकर उस में से सड़क बनानी, उनकी जिन्दगी से हमें एक सीख मिलती है कि अगर इंसान दृढ़ निश्चय करले तो हम किसी भी कठिनाई को पार कर सकते है, बस उस काम को करने की दिल में जिद्द और जनून होना चाहिए. उनकी 22 वर्षो की कठिन मेहनत से उन्होंने अकेले ही अपने गांव को शहर से जोड़ने वाली एक ऐसी सड़क बनाई जिसका उपयोग आज आसपास के सभी गांव वाले करते है.

दशरथ मांझी की शादी कम उम्र में ही फाल्गुनी देवी से हो गई थी. एक दिन जब दशरथ मांझी खेत में काम कर रहा था और उसकी पत्नी, नित प्रतिदिन की भांति अपने पति के लिए खाना ले जाते समय पहाड़ से फ़िसलकर गिर गई और गम्भीर रूप में घायल हो गई, और उस वक़्त वह गर्भवती भी थी. दशरथ मांझी उसे उठाकर घर ले आया मगर उसे इलाज़ के लिए शहर ले जाना था, जिसके लिए उसके पास कोई साधन नहीं था. गांव के अमीर ठाकुर लोग जिनके पास गाड़ियां थी, दशरथ मांझी उन सब के पास बारी-बारी से गए और मदद के लिए बिनती की कि उसकी पत्नी को गाड़ी में डालकर अस्पताल पहुंचा दें, मगर पूरे गांव में किसी ने उसकी मदद नहीं की. आख़िर में उसने पत्नी को बैलगाड़ी पर लेटाया और शहर की और चल दिया. देर शाम को जब वह अस्पताल पहुंचा, तब तक बहुत देर हो चुकी थी और डॉक्टरों ने उसकी जांच पड़ताल करके बताया कि उसने पत्नी को अस्पताल लाने में बहुत देर कर दी, खून ज़्यादा बहने से फाल्गुनी का निधन हो गया. अगर फाल्गुनी देवी को समय रहते अस्पताल ले जाया गया होता, तो शायद वो बच जाती. यह बात उसके अन्दर तक इतनी बुरी तरह चुभ गई कि दशरथ मांझी ने संकल्प कर लिया कि, भले ही सरकार या और कोई संस्था उसकी सहायता करें या ना, वह अकेले ही पहाड़ के बीचों बीच से रास्ता निकालेंगे, ताकि देर से डॉक्टरी सहायता ना मिलने की वजह से गांव के किसी और व्यक्ति को मौत न देखनी पड़े. तो ऐसे संकल्प में बंधे हुए उसने गहलौर की पहाड़ियों में से रास्ता बनाना शुरू किया. इन्होंने बताया, “जब मैंने पहाड़ी तोड़ना शुरू किया तो लोगों ने मुझे पागल कहा- कि ऐसे कभी हुआ है कि एक अकेला आदमी इतनी ऊंची पहाड़ी को काटकर, वह भी बिना मशीनों और विस्फोटक पदार्थों के, सड़क बना दे. लेकिन मैंने अपने पक्के निश्चय और भी मजबूत इरादे के चलते हुए यह सब सम्भव कर दिखाया.”

इतने बड़ी परियोजना को पूरा करने के लिए उसे 22 वर्ष (1960-1982) लगे और अतरी और वज़ीरगंज सेक्टर्स की दूरी 55 किमी से घटकर 15 किमी तक रह गई. दशरथ मांझी का यह पहाड़ से भी ज्यादा मजबूत प्रयास एक बहुत बड़ा सराहनीय कार्य है. उसके इतने बड़े कार्य के लिए अख़बारों/मैगज़ीनों/टीवी इत्यादि में चर्चा तो हुई ,मग़र इनाम के नाम पर एक मेहनतकश इंसान को मिला कुछ भी नहीं. बिहार की सरकार ने उसे पांच लाख रूपये देने की घोषणा भी की, मग़र यह धनराशि उसे कभी वितरण नहीं की गई. बिहार की राज्य सरकार ने उनकी इस उपलब्धि के लिए सामाजिक सेवा के क्षेत्र में 2006 में पद्मश्री हेतु उनके नाम का प्रस्ताव भी केन्द्रीय सरकार को भेजा, मग़र उसे यह भी मिला कभी नहीं. कारण- दशरथ मांझी भी एक दलित परिवार से सम्बन्ध रखने वाला इंसान था और यह तो हमारे समाज की एक बहुत बड़ी कुरीति और कुचाल ही कहेंगे, कि दलित लोग जितना मर्जी बड़ा असम्भव कार्य करके दिखा दें, समाज को उसे जितना मर्जी फ़ायदा पहुंचा हो, मगर तथाकथित बड़े लोग कभी सम्मानजनक धनराशि, इनाम और पद प्रदिष्ठा देने में हमेशा से अवेहलना करते ही आये हैं. दशरथ मांझी के साथ भी यही कुछ हुआ. मशहूर फ़िल्म अभिनेता आमिर खान ने अपने एक टीवी सीरियल “सत्यमेव जयते” में उसके इस महान कार्य पर एक एपिसोड भी बनाया, उसे दो-ढाई करोड़ की कमाई भी की मग़र, उसके परिवार को घर बनाने के लिए वादा की हुई धनराशि 15 लाख रूपये कभी नहीं मिले. अगर यही असम्भव सा कार्य दशरथ मांझी की जगह किसी ब्राह्मण या क्षत्रिय ने किया होता तो सरकार ने उसे कब से भारत रत्न प्रदान कर दिया होता और न जाने देश कितनी बड़ी-बड़ी कम्पनियों ने उसे दिल खोलकर कितनी बड़ी-बड़ी धनराशि भी इनाम में दे दी होती. दशरथ माँझी की 17 अगस्त, 2007 को दिल्ली में मृत्यु हो गई थी.

फ्रांस के एक बहुत बड़े विद्वान, राजनैतिक विश्लेषक और दार्शनिक- रूसो ने बहुत वर्ष पहले कहा था कि अगर आप सच्चे दिल से चाहते हो कि आपका देश खूब उन्नति, विकास करे, प्रगति की बुलंदियां छुए और इस पथ पर हमेशा आगे बढ़ता ही रहे तो इसके लिए यह अत्यंत ही आवश्यक है कि समाज में रहने वाले सभी धर्मों और जातियों के लोगों को पढ़ाई-लिखाई के बराबर अवसर दिए जाए. किसी भी क्षेत्र में अच्छा कार्य करने वालों का समय-समय पर यथासम्भव मान-सम्मान व सराहना भी होनी चाहिए, ताकि समाज के अन्य लोगों के लिए यह एक प्रेरणा स्रोत बनते रहें. मगर हमारे देश का एक बहुत बड़ा दुर्भाग्य ही कहेंगे कि यहां पर जातिपाति आधारित अनेकों मतभेद, शोषण और तिरस्कार हज़ारों वर्षों से होते आए हैं, यही कारण है कि हमारा देश अन्य देशों के मुकाबले वैज्ञानिक उन्नति, विकास और प्रगति की श्रेणी में विकासशील देशों से बहुत पिछड़ा हुआ है, हालांकि आबादी की दृष्टि से हम पूरी दुनियां में दूसरे नंबर पर हैं. जितनी जल्दी से जल्दी यह सिलसिला बदला जाएगा/विसंगतियां दूर की जाएंगी, पूरे देश और समाज के लिए उतना ही बेहतर, लाभकारी और हितकारी होगा.

R D Bhardwaj ‘Noorpuri’
यह लेख आरडी भारद्वाज ‘नूरपुरी’ ने लिखा है.

हे राम से जय श्रीराम जपने लगे नीतीश कुमार: तेजस्‍वी यादव

पटना। नीतीश कुमार की धोखेबाजी से आहत तेजेस्वी ने कड़े शब्दों में हमला बोला है. गौरतलब है की मीडिया से लेकर वर्तमान सरकार तक लालू यादव और उनके बेटे के पीछे पड़ी है जिसके बाद उनका परिवार मुश्किलों से घिरा नजर आ रहा है पर तेजस्वी न हार न मानने की कसम खा रखी है.

आज नीतीश कुमार के बहुमत परीक्षण के दौरान विधानसभा के अंदर राजद नेता तेजस्‍वी यादव ने मुख्‍यमंत्री पर बोलते हुए कहा कि आपने पूरे बिहार को धोखा दिया है. उन्‍होंने कहा कि आज बिहार का युवा उदास हो गया है. मुझे बहाना बनाकर फंसाया गया. आरजेडी ने जेडीयू का वजूद बचाया था पर अब आप अपनी छवि बचाने के लिए ये सब कर रहे हैं. हम लोग इतने मूर्ख नहीं हैं कि समझ न सकें कि आप लोग क्या कर रहे हैं. उन्होंने कहा की नीतीश ने पूरे बिहार को धोखा दिया है. हिम्मत थी तो मुझे बर्खास्त करते. उन्‍होंने कहा कि नीतीश कुमार हे राम से जय श्रीराम तक पहुंच गए हैं.

उन्‍होंने कहा कि नीतीश ने केवल अपनी छवि बचाने के लिए ढकोसला किया. सवालिया लहजे में पूछा कि यदि बीजेपी के साथ ही आपको जाना था तो चार साल क्‍यों बरबाद किए. इस बीच राजद नेता शिवानंद तिवारी ने कहा कि नीतीश कुमार अवसरवादी राजनीति कर रहे हैं. हमने नीतीश कुमार को पहचानने में भूल की.

इस बीच बिहार में एनडीए की नई सरकार को शुक्रवार को विधानसभा में बहुमत साबित करना है. इसके लिए जैसे ही नीतीश ने विश्वासमत प्रस्ताव पेश किया विधानसभा में हंगामा शुरू हो गया. वहीं विधानसभा के बाहर RJD और कांग्रेस का प्रदर्शन जारी है. वे नीतीश कुमार के खिलाफ नारेबाजी कर रहे हैं. केसी त्यागी का कहना है कि हम विश्वासमत हासिल करके सबको चकित कर देंगे और सुशासन सरकार के नारो को बरकरार रखेंगे.

बॉम्बे हाईकोर्ट ने प्रमोशन में आरक्षण को बताया असंवैधानिक

मुंबई। आरक्षण में धीरे धीरे कटौती कई प्रदेशों में जारी है पर अब ताजा फैसला महाराष्ट्र से आया है. बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सरकार के विभिन्न विभागों व सार्वजनिक निकायों बीएमसी व बेस्ट जैसे संस्थानों के भीतर पदोन्नति में 33 प्रतिशत आरक्षण को अवैध व असंवैधानिक बताया है.

गौरतलब है की सरकार ने 2004 में पदोन्नति में आरक्षित वर्ग को 33  प्रतिशत आरक्षण देने का निर्णय लिया था. जिसके खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी. शुरुआत में यह मामला न्यायमूर्ति अनूप मोहता व न्यायमूर्ति एए सैयद की खंडपीठ के सामने सुनवाई के लिए आया था. सुनवाई के बाद आए फैसले में न्यायाधीश मोहता ने पदोन्नति में आरक्षण को सही ठहराया था, जबकि न्यायमूर्ति सैयद ने आरक्षण को अवैध व असंवैधानिक बताते हुए उसे रद्द कर दिया था. दो न्यायाधीशों के एकमत ने होने से मामला सुनवाई के लिए न्यायमूर्ति एमएस सोनक के पास भेजा गया था.

न्यायमूर्ति सोनक ने मामले की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए पदोन्नति में आरक्षण के फैसले को गलत बताया है. सरकार की ओर से 2004 में जारी किए गए परिपत्र के तहत पदोन्नति में 13 प्रतिशत अनुसूचित जाति, 7 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति, 13% एनटी, वीजेडीटी व एसबीसी के लिए आरक्षण रखा गया था.

इस तरह से सरकार ने पदोन्नति में 33 प्रतिशत आरक्षण तय किया था. इससे पहले महाराष्ट्र प्रशासनिक पंचाट न्यायाधिकरण (मैट) ने भी पदोन्नति में आरक्षण को गलत बताया था तो इस तरह से दलितों को पदोन्नति में आरक्षण न देने के फैसले पर मुहर लग गयी है जोकि दलितों के लिए दुखद फैसला है.

 

हत्या में गवाह दलित युवक की पीट- पीटकर हत्या

आगरा। योगी के उत्तर प्रदेश में हत्या के गवाह युवक को बुरी तरह मार पीटकर हत्या कर दी गयी. यह घटना आगरा की है जहां के सिकंदरा के गांव जऊपुरा में बुधवार रात दबंगों का कहर दलित परिवार पर टूटा. राह चलते चाचा-भतीजे को चोर बताते हुए उन पर हमला बोल दिया गया जिसके बाद लाठियों से पीट-पीटकर चाचा नवाब सिंह (52) की हत्या कर दी, जबकि भतीजा गंभीर रूप से घायल है. नवाब सिंह को पांच अगस्त को आरोपियों के खिलाफ एक मुकदमे में गवाही देनी थी. हत्या के बाद भड़के दलित समुदाय के लोगों ने गुरुवार सुबह थाना घेर लिया. जातीय तनाव के मद्देनजर एसएसपी ने फोर्स के साथ गांव में फ्लैग मार्च किया.

जानकारी के अनुसार जऊपुरा निवासी नवाब सिंह और जग्गो यादव में रंजिश चल रही है उन्होंने एक-दूसरे के खिलाफ कई मुकदमे दर्ज करा रखे हैं. नवाब सिंह के भतीजे राकेश की पत्नी महावली के बेटी हुई है और वह बिचपुरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती है. बुधवार रात साढ़े सात बजे राकेश चाचा नवाब सिंह के साथ अस्पताल से खाना देकर घर लौट रहा था. गांव में अपने घर के सामने जग्गो यादव, भोला यादव, अशोक, लच्छो, राहुल आदि ने चोर-चोर का शोर मचाते हुए दोनों को घेर लिया. उन्हें पीट-पीटकर अधमरा करने के बाद 100 नंबर पर चोरों को पकड़ने की झूठी सूचना दी. पुलिस आ गई इस बीच नवाब सिंह पक्ष के लोग भी मौके पर पहुंच गए. पुलिस और ग्रामीणों को देख जग्गो पक्ष के लोग भाग निकले.

गंभीर घायल नवाब सिंह और राकेश को परिजन अस्पताल लेकर गए, जहां कुछ घंटे बाद नवाब सिंह की मौत हो गई. इससे भड़के दलित बस्ती के दर्जनों लोगों ने गुरुवार सुबह सिकंदरा थाने को घेर लिया. वह हमलावरों की गिरफ्तारी की मांग कर रहे थे. मृतक के भाई भीमसेन ने बताया कि जग्गो और भोला पक्ष के खिलाफ पांच अगस्त को नवाब सिंह की गवाही होनी थी. आरोपी पक्ष गवाही न देने का दबाव बना रहा था. नवाब के इन्कार करने पर हत्या कर दी.

उधर, नवाब की मौत के बाद गांव में जातीय तनाव के हालात बन गए. दोपहर में एसएसपी दिनेश चंद्र दूबे ने स्वाट टीम के साथ जऊपुरा पहुंच फ्लैग मार्च किया. साथ ही मृतक के परिजनों को आरोपियों की गिरफ्तारी और उनके खिलाफ रासुका के तहत कार्रवाई का आश्वासन दिया. एसएसपी ने बताया कि हत्या के आरोप में 22 लोगों को नामजद कराया गया है. सतर्कता के चलते गांव में फोर्स तैनात की गई है, दलितों ने कार्यवाही न होने पर आंदोलन की चेतावनी दी है.

 

नीतीश कुमार ने विधानसभा में पेश किया बहुमत प्रस्ताव

पटना। पटना। बिहार विधानसभा में नीतीश कुमार ने अपना बहुमत प्रस्ताव पेश कर दिया है. सुबह 11 बजे पेश होने वाला यह प्रस्ताव राजद के हंगामे के चलते 12 बजे के बाद पेश हो सका. शपथग्रहण से पहले बुधवार देर रात को नीतीश कुमार ने बीजेपी नेताओं के साथ राज्यपाल को 132 विधायकों के समर्थन का पत्र सौंपा था, जिसमें जेडीयू के 71, बीजेपी के 53, उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के 2, एलजेपी के 2, जीतनराम मांझी की पार्टी ‘हम’ के 1 और 3 निर्दलीय विधायक शामिल हैं.

243 सदस्यों वाली बिहार विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 122 है, ऐसे में नीतीश कुमार की अगुवाई वाली एनडीए सरकार आसानी से विश्वासमत हासिल करती दिख रही है, हालांकि सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद सरकार बनाने का न्योता नहीं मिलने से नाराज़ आरजेडी सदन में नीतीश कुमार के विश्वासमत में रोड़ा अटकाने की तैयारी में है. लालू ने दावा किया है कि जेडीयू के कई विधायक उनके संपर्क में हैं. ऐसे में विश्वासमत के दौरान हंगामे के पूरे आसार हैं.

आरजेडी के नेता रघुवंश प्रसाद सिंह ने कहा कि नीतीश को हमने एक मत से अपना नेता चुना था. लेकिन अंतरात्मा की पुकार पर बिना परामर्श किए उन्होंने गठबंधन तोड़ दिया और बाद में परमात्मा की पुकार पर बीजेपी की गोद में बैठ गए. नीतीश ने जो किया वह जनादेश का अपमान, लोगों ने इसका बुरा माना. हम विश्वास प्रस्ताव का घोर विरोध करेंगे, हम गुप्त मतदान की मांग करते हैं.

उल्‍लेखनीय है कि नीतीश कुमार ने बुधवार की शाम मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था, जिसके साथ ही 20 महीने पुरानी महागठबंधन सरकार अचानक गिर गई. भाजपा के समर्थन से गुरुवार को नीतीश कुमार ने एक बार फिर बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. वह छठी बार राज्य के मुख्यमंत्री बने हैं. वहीं, भाजपा के सुशील कुमार मोदी ने उप मुख्‍यमंत्री शपथ ली.

नीतीश के इस्तीफे का कारण राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद के बेटे तेजस्वी के साथ नीतीश की तनातनी को माना जा रहा है. जदयू का कहना है कि तेजस्वी पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं, लेकिन नीतीश के कहने के बावजूद उन्होंने इन आरोपों का तथ्यात्मक जवाब नहीं दिया. वहीं, लालू का कहना है कि आरोप निराधार है, तेजस्वी सीबीआई को जवाब देंगे, नीतीश सीबीआई के निदेशक नहीं हैं. जबकि नीतीश का कहना है कि उन्होंने अपनी अंतरात्मा की आवाज पर इस्तीफा दिया.

2001 में भारत पर परमाणु हमला करना चाहते थे परवेज मुशर्रफ

नई दिल्ली। पाकिस्तान के पूर्व तानाशाह परवेज मशर्रफ ने खुलासा किया है कि 16 साल पहले वो भारत पर न्युक्लियर अटैक का प्लान बना रहे थे. मुशर्रफ के मुताबिक- वो प्लान जरूर बना रहे थे कि लेकिन जब उन्हें डर था कि भारत भी जवाबी हमला करेगा तो उन्होंने ये इरादा टाल दिया. पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति ने बात जापान के एक अखबार को दिए इंटरव्यू में कही.

परवेज मुशर्रफ जो खुलासा कर रहे हैं वो 2001 के संसद हमले से जुड़ा हुआ है. उस वक्त मुशर्रफ पाकिस्तान के राष्ट्रपति थे. पूर्व पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने जापान के अखबार ‘मेनिची शिंबुन’ को एक इंटरव्यू दिया. इसी इंटरव्यू में उन्होंने भारतीय संसद पर हमले और उसके बाद के तनाव का जिक्र किया है. अखबार ने अपने जैपनीज और इंग्लिश दोनों वर्जन में ये इंटरव्यू पब्लिश किया है.

73 साल के मुशर्रफ के मुताबिक, भारतीय संसद पर हमले के बाद वो कई रातों तक सो नहीं पाए. मुशर्रफ ने कहा- मैं खुद से ये सवाल पूछता रहता था कि मुझे एटमी हथियार तैनात करने चाहिए या नहीं. परवेज ने खुलासा किया कि वो एटमी हथियार इस्तेमाल करने के बारे में उन्होंने काफी सोचा लेकिन भारत के जवाबी हमले के डर से इरादा बदल दिया.

अखबार के मुताबिक उस दौर में भी मुशर्रफ ने कभी इस बात से इनकार नहीं किया था कि वो भारत के खिलाफ एटमी हथियारों का इस्तेमाल कर सकते हैं. मशर्रफ ने इंटरव्यू में ये भी खुलासा किया कि 2001 में भारत और पाकिस्तान दोनों की मिसाइलों पर वॉरहेड्स (एटम बम) नहीं लगाए गए थे. मुशर्रफ ने कहा कि एटमी हमला करने के लिए एक से दो दिन लग सकते थे.

जब उनसे ये पूछा गया कि क्या उन्होंने मिसाइलों पर वॉरहेड्स लगाने का ऑर्डर दिया था? पूर्व तानाशाह ने कहा- हमने ऐसा नहीं किया और मुझे लगता है कि भारत ने भी न्युक्लियर वॉरहेड्स मिसाइलों पर नहीं लगाए होंगे. थैंक गॉड.

नवाज शरीफ लंबे वक्त से पाकिस्तान के बाहर रहे हैं. मुल्क की अदालत ने एक बार उन्हें भगोड़ा भी करार दिया था. 1999 में आर्मी चीफ रहते हुए उन्होंने नवाज शरीफ सरकार का तख्तापलट किया था. उस दौरान शरीफ को कुछ महीने जेल में काटने पड़े थे. इसके बाद मुशर्रफ ने उन्हें सऊदी अरब जाने की इजाजत दे दी थी. 2001 से 2008 तक वो राष्ट्रपति रहे. 2007 में उन पर बेनजीर भुट्टो की हत्या की साजिश रचने का भी आरोप लगा था.

‘इंदु सरकार’ ने कोर्ट में जीती जंग, कल होगी रिलीज

ऩई दिल्ली। लंबे विवाद के बाद फिल्म ‘इंदु सरकार’ के निर्माता और निर्देशक मधुर भंडारकर के लिए सुप्रीम कोर्ट से एक सुकून भरी खबर आई है. सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म पर रोक लगाने से संबधित याचिका को खारिज कर दिया है जिसके बाद फिल्म कल यानी 28 जुलाई को रिलीज होगी.

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि ये आर्टिस्टिक अभिव्यक्ति के पैमाने पर कानून के दायरे में है. इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी. कोर्ट ने ये भी कहा कि ये क्या कानून है कि फिल्म की रिलीज से पहले किसी व्यक्ति की रजामंदी होनी चाहिए. कोर्ट ने माना कि ये फिल्म कोई डॉक्यूमेंट्री नहीं है. कोर्ट ने कहा कि एक फिल्म की स्क्रिप्ट में ड्रामा होना चाहिए.

आपको बता दें कि खुद को संजय गांधी की जैविक संतान बताने वाली प्रिया पॉल नामक महिला ने इस फिल्म के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. ‘इंदु सरकार’ पहले सेंसर बोर्ड के पास अटकी हुई थी जिसे पिछले हफ्ते ही बोर्ड ने मंजूरी दी है. इसके अलावा इस फिल्म का विरोध कांग्रेस के कार्यकर्ता और नेता भी कर रहे हैं.

कांग्रेस ने सेंसर बोर्ड से मांग की थी कि फिल्म पहले उन्हें दिखाई जाए, कांग्रेस की इस मांग को मधुर भंडारकर ने सिरे से खारिज कर दिया था. असल में फिल्म इमरजेंसी के बैकग्राउंड पर बनाई गई है.

जियो को टक्कर देने के लिए एयरटेल ने निकाला शानदार प्लान

मुंबई। रिलायंस जियो की टक्कर में अब एयरटेल ने एक ओर आकर्षक ऑफर पेश किया है. एयरटेल रोजाना यूजर्स को 4G नेटवर्क का 3GB डाटा देगा. यह नया प्लान 28 दिनों की वैलिडिटी के साथ लॉन्च किया गया है.

जियो का धन धना धन ऑफर अब खत्म हो चुका है. इसके बाद कंपनी ने प्रीपेड और पोस्टपेड दोनों ही यूजर्स के लिए नए प्लान्स लॉन्च कर दिए हैं. रिलायंस जियो के प्लान 19 रुपये से शुरू होकर 9999 रुपये तक उपलब्ध है. वहीं, जियो पोस्टपेड प्लान्स 309 रुपये से शुरू होकर 999 रुपये तक उपलब्ध हैं.

एयरटेल का नया प्लान सिर्फ प्रीपेड यूजर्स के लिए है. एयरटेल खासतौर से वॉल्यूम डाटा यूजर्स को ध्यान में रखकर 799 रुपये का प्लान लेकर आया है. 799 रुपये के इस प्लान के अंतर्गत प्रति दिन 3GB 2G/3G/4G डाटा दिया जाएगा. इसी के साथ इसमें किसी भी नेटवर्क पर अनलिमिटेड लोकल और एसटीडी कॉलिंग भी शामिल है. इस पैक की वैलिडिटी 28 दिन की है.

एयरटेल का यह नया प्लान जियो यूजर्स पर अटैक करता हुआ नजर आ रहा है. क्योंकि जियो यूजर्स की 509 रुपये के पैक में डाटा यूसेज की प्रति दिन सीमा 2GB है. हाल में जियो ने अपना सस्ता 4G फीचर फोन भारत में लॉन्च किया है. इससे भारत में मौजूद अधिकतर 2G यूजर्स रिलायंस जियो 4G में स्विच कर लेंगे.

भारतीय महिला क्रिकेट टीम सम्मानित, खिलाड़ियोंं को मिले 50-50 लाख

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नई दिल्ली। ICC महिला वर्ल्ड कप में जोरदार प्रदर्शन करने वाली भारतीय महिला क्रिकेट टीम को सम्मानित किया गया. गुरुवार को नई दिल्ली में आयोजित सामारोह में रेलवे मंत्री सुरेश प्रभु की मौजूदगी में बीसीसीआई ने सम्मानित किया. महिला टीम को इससे पहले केंद्रीय खेल मंत्री विजय गोयल ने भी सम्मानित किया.

वर्ल्ड कप में खेली भारतीय महिला क्रिकेट टीम के 15 खिलाड़ियों में से 10 रेलवे कर्मचारी हैं, जिनमें कप्तान मिताली राज और उपकप्तान हरमनप्रीत कौर भी शामिल हैं. रेलवे मंत्री सुरेश प्रभु ने वर्ल्ड कप में शानदार प्रदर्शन करने वाली महिला खिलाड़ियों को रेलवे में समय से पहले प्रमोशन दिए जाने की घोषणा की थी. बीसीसीआई ने इंग्लैंड में हाल में संपन्न हुए आईसीसी महिला वर्ल्ड कप में उप विजेता रही भारतीय टीम की खिलाड़ियों को 50-50 लाख रुपये और सहयोगी स्टाफ को 25 -25 लाख रुपये देकर सम्मानित किया.

इस अवसर पर बीसीसीआई के कार्यवाहक अध्यक्ष सीके खन्ना ने खिलाड़ियों को इनामी राशि देकर सम्मानित किया. उन्होंने कहा कि बीसीसीआई हमेशा पुरुषों की तरह महिला क्रिकेट को भी बढ़ावा देता रहेगा. महिला टीम की 15 में से दस खिलाड़ी रेलवे में कार्यरत हैं और रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने आगे भी सहयोग बनाये रखने का वादा किया. उन्होंने कहा, ‘एक समय केवल पुरुष क्रिकेट की बात होती थी लेकिन अब समय बदल रहा है. महिलाओं की इस जीत से देश की आम महिलाओं का भी आत्मविश्वास बढ़ेगा और अन्य महिलायें का ध्यान भी खेल की तरफ मुड़ेगा.

SSC CGL: 5 अगस्त से शुरू होगी परीक्षा

नई दिल्ली। हजारो छात्रों को हर साल नौकरी देने वाली स्टाफ सलेक्शन कमिशन (SCC) ने कंबाइड ग्रैजुएट लेवल की प्रारंभिक परीक्षा 2017 की तारीखों में थोड़ा फेरबदल किया है. कमिशन की वेबसाइट पर नोटिस के जरिए जानकारी दी गई है कि अब यह परीक्षा 5 अगस्त से शुरू होगी जबकि पहले यह परीक्षा एक अगस्त से शुरू होनी थी. पहले 20 अगस्त को ही समाप्त होने वाली यह परीक्षा अब 24 अगस्त को समाप्त होगी. कमिशन ने यह भी बताया है कि 7, 13, 14 और 15 अगस्त को कोई परीक्षा नहीं होगी. आपको बता दें  कि स्टाफ सिलेक्शन कमिशन विभिन्न पदों पर भर्ती के लिए हर साल परीक्षाएं आयोजित करता है. परीक्षाओं में पारदर्शिता लाने के लिए पिछले साल से कमिशन ने इन परीक्षाओं को ऑनलाइन कराना शुरू कर दिया है. पहले ये परीक्षाएं एक या दो दिन में ही समाप्त हो जाती थीं लेकिन ऑनलाइन होने की वजह से इसमें थोड़ा ज्यादा वक्त लगता है. ऑनलाइन परीक्षा केंद्रों की कम उपब्धता के कारण ये परीक्षा लंबी चलती है. हालांकि, मुख्य परीक्षा अभी भी ऑफलाइन ही होगी.

बिहार की घटना लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहींः मायावती

लखनऊ। बिहार की सियासत में जिस तरह से उठापटक सामने आई और नीतीश कुमार ने एनडीए के साथ जाने का फैसला लिया है उसके बाद बसपा सुप्रीमो मायावती ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है. उन्होंने कहा कि बिहार में जो कुछ भी हुआ है वह आए दिन किसी ना किसी राज्य में हो रहा है और यह देश के लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है.

मायावती ने कहा कि देश का लोकतंत्र इन घटनाओं से कमजोर हो रहा है. उन्होंने आगे कहा कि अब देश की आम जनता को आगे आकर लोकतंत्र को कमजोर होने से बचाना होगा. लोगों को सचेत करते हुए मायावती ने कहा कि अगर लोग आगे आकर लोकतंत्र को नहीं बचाते हैं तो इससे आगे चलकर उनका ही नुकसान होगा नाकि राजनीतिक दलों व राजनेताओं का.

भारतीय जनता पार्टी पर हमला बोलते हुए मायावती ने आरोप लगाया कि पार्टी सरकार की मशीनरी का दुर्पयोग करके लोगों को डरा-धमका रही है. उन्होंने कहा कि पहले मणिपुर, गोवा और अब बिहार में भी भाजपा ने यही किया है. बिहार में जो कुछ भी कल हुआ है वह इस बात का सबूत है कि मोदी सरकार में लोकतंत्र का भविष्य खतरे में हैं. उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार ने गठबंधन से नाता तोड़कर भाजपा के साथ सरकार बनाकर सही नहीं किया है. इससे उन्होंने धर्मनिरपेक्ष ताकतों को और प्रचंड बहुमत दे दिया है. जनता ने उन्हें जो जनादेश दिया था उसका सम्मान होना चाहिए था.