300वां वनडे मैच खेल रहे हैं धोनी, रचेंगे कई इतिहास

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कोलंबो। महेंद्रसिंह धोनी गुरुवार को कोलंबो में श्रीलंका के खिलाफ अपना 300वां अंतरराष्ट्रीय वनडे खेल रहे हैं. ऐसे में पूरी संभावना है कि भारत के पूर्व कप्तान धोनी कोई इतिहास रचें. धोनी दुनिया के ऐसे एकमात्र कप्तान है जिनके नेतृत्व में टीम इंडिया ने आईसीसी के तीनों खिताब जीते. उनकी अगुआई में टीम इंडिया ने 2007 टी20 विश्व कप, 2013 चैंपियंस ट्रॉफी और 2011 वनडे विश्व कप खिताब अपने नाम किए.

यदि सफल रन चेज में सबसे ज्यादा औसत की बात की जाए तो धोनी ने इसमें विराट कोहली और एबी डी’विलियर्स जैसे दिग्गजों को पीछे छोड़ा है. इस मामले में धोनी का औसत आश्चर्यजनक रूप से 101.84 है.

सुरेश रैना ट्वीट कर धोनी को 300वें मैच के लिए शुभकामनाएं दी.

धोनी वनडे में छक्के लगाने के मामले में भारत के वीरेंद्र सहवाग, तेंडुलकर और विराट जैसे बल्लेबाजों से भी आगे हैं. 300वां वनडे मैच खेल रहे धोनी अभी तक 209 छक्के लगा चुके हैं, वे भारत की तरफ से 200 से ज्यादा छक्के लगाने वाले एकमात्र बल्लेबाज हैं.

धोनी के नाम छठे या उससे निचले क्रम में बल्लेबाजी कर सबसे ज्यादा रन बनाने का रिकॉर्ड दर्ज है. वे वनडे में छह या निचले क्रम में बल्लेबाजी कर अभी तक 4601 रन बना चुके हैं. धोनी के नाम वनडे में सबसे ज्यादा रनों की पारी खेलने वाले विकेटकीपर का रिकॉर्ड भी दर्ज है. यह कारनामा उन्होंने 31 अक्टूबर 2005 को जयपुर में श्रीलंका के खिलाफ किया था ‍जब उन्होंने नाबाद 183 रनों की पारी खेली थी.

इसके अलावा बीसीसीआई ने एक वीडियो शेयर करते हुए लिखा, हम धोनी मील का पत्थर साबित होने वाले 300वें मैच के लिए तैयार हैं, क्या आप हैं.

इतिहास रच सकते हैं धोनी धोनी ने अपने वनडे करियर के इतिहास में आज कई कीर्तिमान बना सकते हैं. आज वे अपना 300 वां वनडे मैच खेलेंगे. साथ ही वें 100 स्टंप आउट करने के जादुई आंकड़े को छूने से महज एक स्टंप दूर हैं. गौरतलब है कि धोनी ने श्रीलंका के खिलाफ पल्लेकेल वनडे में 99वीं बार स्टंपिंग की थी. धोनी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के तीनों प्रारूपों में भारत की तरफ से सबसे ज्यादा शिकार करने वाले विकेटकीपर है. उनके नाम 299 मैचों में 737 शिकार दर्ज है. धोनी के नाम वनडे में श्रीलंका के कुमार संगकारा के साथ सबसे ज्यादा स्टम्पिंग का रिकॉर्ड दर्ज है। दोनों 99-99 स्टम्पिंग कर चुके हैं. धोनी के पास इस रिकॉर्ड को तोड़ने का मौका है.

नोटबंदी को लेकर सामने आया सरकार का झूठ

नई दिल्ली। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की ओर से जारी किए गए नोटबंदी से जुड़े आंकड़ों ने एक बार फिर हड़कंप मचा दिया है. RBI की आंकड़ों की मानें तो नोटबंदी एक तरह का फ्लॉप शो रहा, और इसको लेकर जितने बड़े दावे किए जा रहे थे, वैसा कुछ भी नहीं हुआ.

आंकड़ों के सामने आने से नोटबंदी के बाद बैंकों में वापस जमा हुई रकम यह बता रही है कि देश के करेंसी मार्केट में ब्लैक मनी उस अनुपात में मौजूद नहीं थी, जितना सरकार दावा कर रही थी. पिछले साल 8 नवंबर की आंधी रात को नोटबंदी की घोषणा को ऐतिहासिक फैसला बताते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने दावा किया था कि उनका यह फैसला आतंकवाद और नक्सलवाद की कमर तोड़ कर रख देगा, लेकिन ऐसा कुछ भी होता नजर नहीं आ रहा है. अमेरिकी विदेश मंत्रालय की तरफ से जारी आंकड़े बताते हैं कि 2015 के मुकाबले 2016 में भारत में आतंकी हमलों में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई. नोटबंदी की घोषणा को बड़ा फैसला बताते हुए प्रधानमंत्री ने कहा था कि इससे सरकार को ‘काला धन, आतंकी फंडिंग और नकली करेंसी’ को रोकने में मदद मिलेगी. लेकिन आरबीआई के आंकड़ों ने सरकार के दावे पर ही सवाल उठा दिया है. मोदी ने कहा था कि ये कदम भ्रष्टाचार, कालेधन और नकली नोटों के खिलाफ लड़ाई को तेज करेगा. मैं सभी देशवासियों से इस महायज्ञ में मदद करने की अपील करता हूं. इसके अलावा नोटबंदी को लेकर सरकार में भी विरोधाभासी बयान आ रहे हैं. प्रधानमंत्री मोदी ने जहां नोटबंदी की घोषणा करते हुए इसका उद्देश्य काले धन, भ्रष्टाचार औऱ आतंकवाद को रोकना बताया था तो वहीं वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इससे बिल्कुल उलट बयान दिया है. वित्त मंत्री अरुण जेटली का कहना है कि नोटबंदी का लक्ष्य पैसे को जब्त करना नहीं था बल्कि इसे आधिकारिक प्रणाली में लाना और फिर उस पर कर लगाना था. साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि सरकार का अगला कदम चुनावों में कालेधन पर लगाम कसना होगा. हालिया आकड़ों के सामने आने के बाद कांग्रेस ने भी भाजपा पर निशाना साधा है. कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट किया कि यह कदम ‘‘भारी आपदा’’ है जिससे ‘‘निर्दोष लोगों की मौत हुई’’ और अर्थव्यवस्था को ‘‘तबाह’’ कर दिया. ‘‘क्या प्रधानमंत्री अपराध स्वीकार करेंगे’’.

तो वहीं नोटबंदी को लेकर पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदंबरम द्वारा दिया आंकड़ा सरकार को सवालों के घेरे में खड़ा करता है. चिदंबरम ने ट्विट कर दावा किया कि नोटबंदी के दौरान नोटों की छपाई में 21 हजार करोड़ रुपये खर्च हुए जबकि आरबीआई के पास सिर्फ 16 हजार करोड़ रुपये वापस आए. चिदंबरम की मानें तो नोटबंदी से सरकार को सीधे तौर पर 5 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है.

चिदंबरम में ट्विट में लिखा ‘‘99 फीसदी नोट कानूनी रूप से बदले गए. क्या नोटबंदी कालेधन को सफेद करने के लिये तैयार की गयी योजना थी?’’ उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि नोटबंदी के कदम के पीछे जो अर्थशास्त्री था वह ‘‘नोबल पुरस्कार का हकदार’’ है क्योंकि आरबीआई के पास 16,000 करोड़ रुपये आए लेकिन नए नोटों की छपाई में 21,000 करोड़ रुपए खर्च हो गए.

मायावती ने अपनी रैली के कार्यक्रम में किया बदलाव

मेरठ। सहारनपुर के शब्बीरपुर मामले पर राज्यसभा से इस्तीफा देने और उसके बाद 18 सितंबर से प्रदेश भर में कार्यकर्ता सम्मेलन का ऐलान करने वाली बसपा प्रमुख मायावती ने अपने कार्यक्रम में बदलाव कर दिया है. पहले दो मंडलों को मिलाकर एक रैली की घोषणा करने वाली बसपा ने इसे बदलते हुए अब तीन मंडल पर एक रैली कर दिया है. इसी के साथ अब 18 सितंबर को मेरठ में होने वाली रैली में मेरठ, सहारनुपर और मुरादाबाद के कार्यकर्ता शामिल होंगे. पार्टी का मानना है कि कुल नौ रैली में नौ महीने लगते, जो काफी लंबा वक्त हो जाता. इस बदलाव से अब नौ की जगह कुल छह रैली होगी. दो रैलियों के बीच महीने भर के अंतर को भी घटाया जा सकता है. हालांकि मेरठ की रैली के बाद आगे की रैलियों का कार्यक्रम तय होने की खबर है.

असल में बसपा प्रमुख मायावती द्वारा ऐसा करने के पीछे शक्ति प्रदर्शन भी माना जा रहा है. बीएसपी सूत्रों की मानें तो रणनीति में बदलाव कर बसपा… गैर बीजेपी दलों को अपनी ताकत दिखाना चाहती है. लालू यादव द्वारा पटना में बुलाई गई रैली के पहले मायावती ने साफ किया था कि गठबंधन बनने से पहले सीटों का बंटवारा जरूरी है. ऐसे में माना जा रहा है कि बीएसपी का प्लान अपना जनाधार दिखाकर दूसरे दलों से ज्यादा सीट हासिल करने का है. इस सम्मेलन से जुड़ी एक खबर यह भी आ रही है कि इसमें बसपा प्रमुख मायावती का निशाना केंद्र और यूपी सरकार दोनों पर रहेगा. और इसके जरिए चुनावी समीकरण साधे जाएंगे. खबर है कि सम्मेलन में दलित, मुस्लिम और किसानों से जुड़े मुद्दे के अलावा मायावती तमाम केंद्रीय मुद्दों को भी उठाएंगी. मेरठ में होने वाले कार्यकर्ता सम्मेलन के प्रभारी मुनकाद अली तीनों मंडलों के पार्टी पदाधिकारियों और प्रमुख लोगों के साथ रैली की तैयारियों में जुट गए हैं. पहले सम्मेलन में ढाई से तीन लाख कार्यकर्ताओं के शामिल होने की उम्मीद जताई जा रही थी, लेकिन अब रैली के दो मंडलों की बजाए तीन मंडलों के कार्यकर्ताओं के शामिल होने पर इस टारगेट को 5 लाख कर दिया गया है. देखना होगा कि इस बदली रणनीति के साथ बसपा अपनी इन रैलियों के जरिए केंद्र और अन्य विपक्षी पार्टियों को क्या संदेश दे पाती है.

विकास की कीमत चुकाते आदिवासी

पिछली एक शताब्दी में ‘विकास’ की सबसे ज्यादा कीमत किसी ने चुकाई है तो वे हैं आदिवासी. उनकी अमीरी ही उनके लिए अभिशाप बन गई. जिस वनभूमि पर उनका आवास है, वह अपने गर्भ में कोयला, लोहा, बॉक्साइट, हीरा, यूरेनियम आदि बहुमूल्य खनिज छिपाए हुए है. बिना इन वनों के विनाश के इस संपदा का दोहन मुमकिन नहीं है. आदिवासियों के शत्रु और भी हैं, जैसे उनकी सरलता-निष्कपटता और भोलापन! कभी उनकी वनोपज और वन से संग्रहीत उत्पादों को नमक के मोल पर खरीदा जाता था और कभी समाप्त न होने वाले ऋणों के बदले उनसे आजीवन और पीढ़ी दर पीढ़ी बंधुआ मजदूरी कराई जाती थी और उनकी स्त्रियों का अंतहीन शोषण किया जाता था.

आदिवासियों को छला जा सकता है क्योंकि वे भोले हैं, लेकिन वे कायर नहीं हैं. उन्हें दबाया नहीं जा सकता. भारत के स्वाधीनता संग्राम का एक अचर्चित पाठ आदिवासियों के प्रखर संघर्ष का भी है. स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास में ऐसे सैकड़ों उदाहरण बिखरे पड़े हैं जो एक नए विमर्श की शुरुआत कर सकते हैं. इनमें आदिवासियों की वीरगाथाएं भरी पड़ी हैं. विचारधारा और संगठनात्मक कौशल की दृष्टि से अनगढ़ आदिवासी आंदोलनों का बर्बरता से दमन किया गया, जिनमें अपार जनहानि हुई. आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिए संवैधानिक प्रावधानों में पांचवीं और छठी अनुसूची प्रमुख है. पांचवीं अनुसूची में देश के दस राज्यों के वे क्षेत्र शामिल हैं, जहां आदिवासियों की जनसंख्या पचास प्रतिशत से अधिक है. इन क्षेत्रों में आदिवासी जीवन शैली और जीवन दर्शन की रक्षा करते हुए आदिवासियों की रूढ़ियों, परंपराओं और मान्यताओं के अनुरूप शासन चलाने और विकास योजनाओं का निर्माण तथा संचालन करने का प्रावधान है.

ठी अनुसूची में उत्तर-पूर्व के वे राज्य रखे गए हैं जहां आदिवासियों की जनसंख्या अस्सी प्रतिशत तक है. इन क्षेत्रों में आदिवासियों की पारंपरिक कानून व्यवस्था लागू है और भूमि का क्रय-विक्रय प्रतिबंधित है. पांचवीं और छठी अनुसूचियां राज्यपालों को विशेष शक्तियां और अधिकार देती हैं. लेकिन इन प्रावधानों का कितना पालन हो रहा है यह जगजाहिर है. पंचायत एक्सटेंशन इन शेड्यूल एरिया कानून यानी पेसा 1996 में पारित किया गया जो आदिवासियों की भूमि के अधिग्रहण के लिए ग्राम सभा की अनुमति को आवश्यक बनाता है. दिसंबर 2006 में संसद द्वारा पारित और सरकार द्वारा 1 जनवरी 2008 से अधिसूचित वन अधिकार कानून, 13 दिसंबर 2005 से पूर्व वन भूमि पर काबिज अनुसूचित जनजाति के सदस्यों को वनों में निवास करने और इनसे आजीविका अर्जित करने का अधिकार देता है.

सवा सौ वर्ष पुराने ब्रिटिशकालीन भूमि अधिग्रहण कानून का स्थान लेने वाला 2013 का नया भूमि अधिग्रहण अधिनियम जमीन के उचित मुआवजे, पुनर्वास और पुनर्स्थापन का दावा करता है और बिना किसानों की सहमति के निजी उद्योगपतियों द्वारा उनकी भूमि के अधिग्रहण पर रोक लगाता है तथा सामाजिक प्रभाव के आकलन को अनिवार्य बनाता है. इन क्रांतिकारी आदिवासी हितैषी कानूनी प्रावधानों के बावजूद आंकड़े बताते हैं कि स्वतंत्रता के बाद करीब पांच करोड़ एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया जा चुका है या उसके उपयोग में परिवर्तन किया जा चुका है. इस अधिग्रहण से प्रभावित पांच करोड़ लोगों में बहुसंख्य आदिवासी हैं. आदिवासियों की आजीविका और जीवन शैली का आधार परंपरागत कृषि रही है जिसे धीरे-धीरे हाशिए पर धकेला गया है.

आदिवासियों की स्थिति समाज के अन्य समुदायों की तुलना में अब भी बहुत पिछड़ी है. विकास के हर पैमाने पर- शिक्षा, स्वास्थ्य, आयु, आय, रोजगार, शिशु मृत्यु दर, मातृ सुरक्षा आदि- सभी में वे राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे हैं. व्यापक भ्रष्टाचार ने आदिवासी विकास के लिए जारी की गई विपुल धनराशि की जमकर बंदरबांट की है. आधुनिक आर्थिक विकास का तूफानी प्रवाह आदिवासियों तक पहुंचा और उनकी संपन्नता को बहा ले गया. आदिवासी नई आर्थिक गतिविधियों और वित्तीय संस्थाओं का लाभ उठाने के लिए परिपक्व नहीं थे.

नतीजतन, दूसरे तबकों के साथ प्रतिस्पर्धा में वे टिक न पाए और विकास संपन्नता के स्थान पर गरीबी लाने का माध्यम बन गया. छठी अनुसूची में आने वाले उत्तर-पूर्व के आदिवासी इलाकों में उग्रवाद और पांचवीं अनुसूची में आने वाले कुछ राज्यों के कतिपय क्षेत्रों में नक्सलवाद पनपा.शासन इसे विकास में सबसे बड़े अवरोध के तौर पर देखता है. बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि स्थिति ठीक विपरीत है- विकास के अभाव में उग्रवाद और नक्सलवाद ने अपनी जड़ें जमाई हैं.

इसी से जुड़ा यह विमर्श भी है कि क्या उग्रवाद और नक्सलवाद की समस्या को कानून व्यवस्था की समस्या माना जाए या इसे एक सामाजिक-आर्थिक समस्या मानकर हल करने की चेष्टा की जाए और यह भी कि राह से भटके आदिवासियों के साथ क्या उग्रवादी और नक्सली जैसा व्यवहार किया जाए या इन्हें उग्रवाद और नक्सलवाद के पीड़ित के रूप में आकलित किया जाए. हाल के वर्षों में पलायन आदिवासियों की सर्वप्रमुख समस्या रही है. कृषि ही जब मुनाफे का धंधा न रही हो तब परंपरागत कृषि के लाभप्रद होने की तो आशा ही व्यर्थ है और इसी पारंपरिक कृषि और वनोपजों के संग्रहण पर आदिवासियों की अर्थव्यवस्था आधारित रही है.

आदिवासी अर्थव्यवस्था सूदखोरों और वन माफियाओं के द्वारा आक्रांत रही है. तमाम कागजी कानूनों और जमीनी जन प्रतिरोधों के बावजूद पिछले डेढ़ दशक में कोयला और खनिज उत्खनन की मात्रा तथा इन पर आधारित पावर एवं स्टील उद्योगों की संख्या बढ़ी है. आदिवासियों को आधा-तीहा मुआवजा देकर उनकी जमीन से उन्हें बेदखल किया गया है. मुआवजे की राशि का संचय या सदुपयोग करने के लिए आवश्यक कौशल के अभाव में आदिवासियों ने पैसा भी खर्च कर दिया. मालिक से नौकर बने आदिवासियों को या तो अपनी जमीन पर बने कारखानों में अकुशल श्रमिक बनना पड़ता है या रोजगार की तलाश में पलायन करना पड़ता है. इसी पलायन से जुड़े हैं मानव तस्करी, देह व्यापार और बंधुआ मजदूरी. कमाने खाने के लिए लंबे समय तक बाहर रहने वाले आदिवासी बिल्कुल अपने घुमंतू आदिवासी साथियों की भांति कई बार जनगणना आदि में सम्मिलित नहीं किए जाते और अनेक लाभों से वंचित रह जाते हैं.

आदिवासियों की अधिकांश समस्याओं का समाधान ऐसी शिक्षा हो सकती है जो उनकी मातृभाषा में दी जाए और जिसका पाठ्यक्रम कृषि, वानिकी, वनौषधि, लोकगीत, संगीत, नृत्य, खेल, युद्ध कौशल आदि को समाहित करता हो. लेकिन प्रचलित शिक्षा का माध्यम और पाठ्यक्रम दोनों आदिवासियों की सभ्यता और संस्कृति की उपेक्षा पर आधारित है. राजनीति में प्रवेश कर शीर्ष स्थान पर पहुंचने वाले आदिवासी नेताओं में भी अपनी सर्वश्रेष्ठता का अहंकार देखने में आता है.

अंतर केवल इतना होता है कि वे चुनावी राजनीति के लिए आदिवासियों से जुड़कर भी पिछड़ेपन को बरकरार रखना चाहते हैं ताकि उन्हें मुद्दों का अभाव भी न हो और पिछड़े आदिवासी समाज में उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी भी उभर न सकें. वास्तव में अगर आदिवासियों की भलाई कोई सरकार चाहती है तो उसे नेहरूजी के उन विचारों पर अमल करना होगा, जो उन्होंने ‘आदिवासी पंचशील’ में कहे थे. नेहरू ने कहा था, ‘आदिवासियों को अपनी प्रतिभा और विशेषता के आधार पर विकास के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए. हमें उन पर कुछ भी थोपने से बचना चाहिए. उनकी पारंपरिक कलाओं और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए हर संभव प्रयत्न करना चाहिए.’

राजू पांडेय का यह लेख जनसत्ता से साभार

बीमा, बैंकिंग और PSU के अधिकारियों को नहीं मिलेगा आरक्षण का लाभ

नई दिल्ली। पीएसयू और बैंकिंग सेक्टर में आरक्षण को लेकर मोदी सरकार ने बड़ा फैसला किया है. अब पब्लिक सेक्टर कंपनियों (PSU) और सरकारी वित्तीय संस्थानाओं (सरकारी बैंक और बीमा कंपनियां) में काम करने वाले ओबीसी अधिकारियों को आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकेगा. अबतक ये लाभ उनके बच्चों को मिलता रहा है. मोदी सरकार ने आज ये अहम फ़ैसला लिया है. फ़ैसले का मक़सद आरक्षण का लाभ इन संस्थानों में छोटे पदों पर काम कर रहे ओबीसी कर्मचारियों तक पहुंचाना है.

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पिछले सप्ताह क्रीमी लेयर की सीमा 6 लाख रुपए से बढाकर 8 लाख रुपए की दी थी। उन्होंने बताया कि क्रीमी लेयर की सीमा तय करने का आधार महंगाई को बनाया जाता है। जेटली ने कहा कि क्रीमी लेयर के लिए सालाना आदमनी और सामाजिक स्थिति को आधार बनाया जाता है।

देशभर में क़रीब 300 पब्लिक सेक्टर की कंपनियां हैं जिनमें एनटीपीसी (NTPC), ओएनजीसी (ONGC), सेल (SAIL), भेल (BHEL), आईओसी (IOC) और कोल इंडिया (COAL INDIA) जैसी कंपनियां शामिल हैं. वहीं सरकारी वित्तीय संस्थानों में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ बड़ौदा और पंजाब नेशनल बैंक जैसे सरकारी बैंक और एलआईसी जैसी सरकारी बीमा कंपनियां शामिल हैं.

पीएसयू, बीमा कंपनियों और सरकारी बैंकों के अधिकारियों के बच्चे अब ओबीसी आरक्षण का लाभ नहीं ले सकेंगे. ऐसी कंपनियों-संस्थाओं में अब नीचे के स्तर पर कार्यरत कर्मचारियों के बच्चों को ही ओबीसी आरक्षण का लाभ मिलेगा. इससे पहले सरकार ओबीसी आयोग को संवैधानिक दर्जा देने का निर्णय ले चुकी है. हालांकि अभी इस फैसले के लागू होने में संसद की बाधा बरकरार है.

क्यों हुआ ये फ़ैसला? दरअसल मंडल कमीशन की सिफ़ारिशें लागू होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 1992 में इंदिरा साहनी केस में फ़ैसला सुनाते हुए सरकार को निर्देश दिया था कि ओबीसी के अंदर सामाजिक और आर्थिक रूप से संपन्न लोगों को आरक्षण की परिधि से बाहर का एक फॉर्मूला बनाया जाए. इसके बाद सरकार की एक विशेषज्ञ कमिटी ने क्रीमी लेयर का फॉर्मूला तैयार किया था. इस फॉर्मूला के तहत क्रीमी लेयर के छह पैमाने बनाए गए जिनमें आय के अलावा पद को भी शामिल किया गया.

केंद्र और राज्य सरकारों के तहत आने वाले ग्रुप ‘ए’ और ग्रुप ‘बी’ अधिकारियों को क्रीमी लेयर के तहत माना गया जिन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलता है. लेकिन 24 साल बीतने के बाद भी पब्लिक सेक्टर कंपनियों और सरकारी वित्तीय संस्थानों में सरकारी सेवा के ग्रुप ए और बी का समकक्ष अभी तक निर्धारित नहीं किया गया था. जिसके चलते इन संस्थानों में काम कर रहे अधिकारियों के बच्चों को आरक्षण का लाभ मिल रहा था. आज मोदी सरकार ने इस विसंगति को दूर कर दिया है.

मुंबई में पांच मंजिला इमारत गिरने से 10 लोगों की मौत, 15 घायल

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मुंबई। मुंबई में बारिश और जलभराव की समस्याओं के बीच डोंगरी के जेजे फ्लाईओवर के पास पांच मंजिला इमारत गिर गई है. इमारत गिरने से 7 लोगों की मृत्यु हो गई है जबकि 10 लोग घायल बताए जा रहे हैं. इनमें से पांच की हालत गंभीर है. यह भी आशंका जताई जा रही है कि अब भी 35 लोग मलबे में फंसे हो सकते हैं.

भिंडी बाजार के पास स्थित यह पांच मंजिला इमारत सुबह करीब 8:30 बजे अचानक गिर गई. बताया जा रहा है कि यह इमारत पहले से ही जर्जर अवस्था में थी. स्थानीय लोगों के मुताबिक इसे पांचवाला बिल्डिंग कहते हैं. हादसे के तुरंत बाद राहत और बचाव का काम शुरू कर दिया गया. फायर ब्रिगेड की 12 गाड़ियां घटनास्थल पर पहुंच गईं. NDRF की टीम भी घटनास्थल के लिए रवाना हो गई. स्थानीय लोग भी राहत और बचाव के काम में जुटे हैं. शुरुआती मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इमारत करीब 50 साल पुरानी है. इसमें 10 से 12 परिवार रह रहे थे.

भारी बारिश के बाद मुंबई में जर्जर इमारतों पर खतरा मंडरा रहा है. बता दें कि मंगलवार को मुंबई में भारी बारिश हुई. 1997 के बाद मुंबई में एक दिन में यह सबसे ज्यादा होने वाली बारिश थी. एक दिन की बारिश में ही मुंबई का बुरा हाल हो गया और कई लोगों की मौत हो गई. मुंबई में ऐसी सैकड़ों इमारतें हैं जिन्हें बीएमसी ने खतरनाक घोषित किया है.

बता दें कि 26 जुलाई को घाटकोपर में 4 मंजिला इमारत गिरने से 17 लोगों की मौत हो गई थी. इस इमारत मे करीब 12 परिवार रहते थे. इसके भूतल में अस्पताल चल रहा था. यह इमारत बीएमसी के खतरनाक इमारतों की सूची में शामिल थी.

‘गोरखपुर में सबसे ज्यादा पिछड़े, दलित और मुसलमान बच्चों की जान गई है’

आजमगढ़। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बुधवार को आजमगढ़ पहुंचे. इस दौरान उन्होंने मंच से एक जनसभा को संबोधित किया. अखिलेश यादव ने योगी सरकार को घेरते हुए कहा कि ‘गोरखपुर में सबसे ज्यादा पिछड़े, दलित और मुसलमान बच्चों की जान गई है.’

पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव आज आजमगढ़ पहुंचे थे. यहां उन्होंने थाना जियनपुर कोतवाली के ग्राम नत्थूपुर में अमर शहीद रामसमुझ यादव की प्रतिमा का अनावरण किया. इस दौरान अखिलेश यादव ने एक जनसभा को संबोधित किया. उन्होंने गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में बच्चों की मौत को लेकर सरकार को घेरा.

अखिलेश यादव ने मंच से कहा कि ‘बगल में ही बच्चों की जान चली गई. अभी और बच्चों की जानें जा रही हैं. गोरखपुर में सबसे ज्यादा पिछड़े, दलित और मुसलमान बच्चों की जान गई है. कितनों को इंसाफ दिए. मैं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से पूछना चाहता हूं कि उन्होंने गोरखपुर में क्या किया.’ अखिलेश यादव ने मंच से ही भाजपा की प्रदेश सरकार को घेरने का प्रयास किया. उन्होंने कहा कि ‘भाजपा सरकार सबसे अधिक भेदभाव करती है.’

उन्होंने भ्रष्टाचार के मामले पर बोलते हुए कहा कि ‘प्रदेश से भ्रष्टाचार कहां समाप्त हुआ है. कौन सा प्रसाद देकर हमारे एमएलसी तोड़ दिए. बीजेपी सरकार हमें भी बताए कि आख़िर कौन सा प्रसाद बांट रही है, जिससे बुक्कल नबाब जैसे एमएलसी बीजेपी में चले गए.’ अखिलेश यादव ने कहा कि ‘एक दिन झाडू लगाने से देश साफ होने वाला नहीं है. अधिकारियों से भी झाडू लगवा दिया.’

यश भारती सम्मान पर बोलते हुए सीएम ने कहा कि ‘यश भारती सम्मान की जांच होने जा रही है. हमने यश भारती वैसे लोगों को दिया जिन्होंने देश का नाम रौशन किया. हम पर आरोप लग रहे हैं कि हमने अपने खास लोगों को यश भारती प्रदान किया. हम तो कहते हैं आपकी सरकार है आप भी अपने खास लोगों को दो, हम कहां रोक रहे हैं.’

ईनाडु इंडिया से साभार

न्यायालय को निशाना बनाने पर मायावती की भाजपा को खरी-खरी

लखनऊ। बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) की सुप्रीमो मायावती ने भाजपा शासित केंद्र और राज्य सरकारों पर निशाना साधा है. मायावती ने आरोप लगाया है कि सत्ताधारी बीजेपी न्यायपालिका पर लगातार हमले और टिप्पणियां कर रही है जो गंभीर चिंता का विषय हैं.

मायावती ने एक बयान जारी कर कहा कि बीजेपी सरकारें, इसके नेता और सांसदों द्वारा जजों के लिए अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया जाता है. साथ ही अदालतों के खिलाफ हाल के दिनों में जो रवैया देखने को मिला है उससे देश के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गई हैं.

मायावती ने डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह मामले का जिक्र करते हुए कहा कि बड़े पैमाने पर हुई हिंसा और आगजनी के बाद पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट की फटकार पर बीजेपी के अनेक नेताओं ने सार्वजनिक तौर पर जो टिप्पणियां की हैं, उसको देश ने नापसंद किया है.

महाराष्ट्र के मामले का जिक्र करते हुए मायावती ने कहा कि एक मामले में देवेंद्र फडणवीस सरकार को लिखित हलफनामा दाखिल कर अदालत से बिना शर्त माफी मांगनी पड़ी है. असल में मायावती उस मामले का जिक्र कर रही थी जिसमें केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण कानून के तहत ‘शान्ति क्षेत्र’ घोषित करने संबंधी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मामले में सुनवाई थी. इसके दौरान महाराष्ट्र सरकार द्वारा अदालत पर द्वेष के साथ काम करने का आरोप लगाकर जजों को बदलने की मांग की गई थी. बॉम्बे हाईकोर्ट ने गंभीर मामला मानकर इस पर कड़ा रूख अपनाया था, जिसके बाद फडणवीस सरकार को अदालत से मांफी मांगनी पड़ी थी.

छेड़छाड़ और यौन उत्पीड़न में मिली 105 साल की सजा

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लॉस एंजेलिस। अमेरिका में एक स्कूल कोच को सात नाबालिग छात्राओं के यौन उत्पीड़न के जुर्म में 105 साल जेल की सजा सुनाई गई है. लॉस एंजिलिस काउंटी सुपीरियर कोर्ट ने मंगलवार को कैलिफोर्निया के दो जूनियर स्कूल में कोच रहे रोनी ली रोमन (44) को इस अपराध के लिए तय अधिकतम सजा सुनाई.

डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी ऑफिस के अनुसार, सात जून को रोमन को सात नाबालिग लड़कियों के यौन उत्पीड़न का दोषी करार दिया था. उसने छह अपराधों को स्कूल के मैदान पर अंजाम दिया था, जबकि सातवें अपराध को एक पीड़ित के घर पर अंजाम दिया था. साल 2002 में कोरियाटाउन के काएंगा एलीमेन्ट्री स्कूल और हॉलीवुड के वाइन एलीमेंट्री में काम करने के दौरान उसने आठ से 11 साल की लड़कियों के साथ छेड़छाड़ की थी.

पीड़ित लड़कियों की उम्र आठ से ग्यारह वर्ष थी. सरकारी वकील के अनुसार रोनी वर्ष 2002 से ही इस घृणित कृत्य में लिप्त था.

उसने कोरियाटाउन के काहेंगा एलिमेंट्री स्कूल और हॉलीवुड के वाइन एलिमेंट्री स्कूल में कोच रहते ये अपराध किए थे. उसने छह छात्राओं का स्कूल के मैदान पर जबकि एक का उसके घर पर यौन उत्पीड़न किया था.

अमेरिका के कैलिफोर्निया में एक पूर्व स्कूल कोच को स्कूल में हुए कार्यक्रम के बाद 7 बच्चियों के साथ छेड़छाड़ के जुर्म में 105 साल की सजा सुनाई गई है.

अन्ना हजारे फिर करेंगे आंदोलन, मोदी को लिखा खुला पत्र

नई दिल्ली। समाजसेवी अन्ना हजारे एक बार फिर से आंदोलन करेंगे. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर सरकार के प्रति अपनी नाराजगी व्यक्त की है. उन्होंने कहा है कि मोदी सरकार तीन सालों से सत्ता में है, लेकिन अभी तक लोकपाल बिल नहीं लाई. अन्ना हजारे मे लोकपाल बिल ना लाने पर मोदी सरकार के खिलाफ बड़े आंदोलन की धमकी दी है. समाजसेवी अन्ना हजारे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेटर लिखकर भ्रष्टाचार और किसानों की समस्‍याओं पर अपनी नाराजगी जाहिर की थी. हालांकि लेटर का जवाब नहीं मिलने पर अब अन्‍ना ने आंदोलन करने का फैसला लिया है. अन्‍ना ने लेटर में लिखा था कि छह साल बाद भी भ्रष्टाचार को रोकने वाले एक भी कानून पर अमल नहीं हो पाया. लोकपाल, लोकायुक्त की नियुक्ति करने वाले और भ्रष्टाचार को रोकनेवाले सभी सशक्त बिलों पर सरकार सुस्ती दिखा रही है. किसानों की समस्याओं को लेकर स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट पर भी अमल नहीं किया जा रहा है. सरकार के इस रवैए से नाराज अन्ना हजारे ने लेटर में तमाम मसलों के बारे में लिखा था और अब कोई जवाब नहीं मिलने पर दिल्ली में आंदोलन करने का फैसला लिया है. अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार मुक्त भारत को बनाने के लिए 2011 में रामलीला मैदान में आंदोलन किया था. इसके बाद 27 अगस्त 2011 के दिन भारतीय संसद में ‘Sense of the House’ से रिज्युलेशन पास किया गया था. इसमें केंद्र में लोकपाल, हर राज्यों में लोकायुक्त और सिटिजन चार्टर ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर जल्द से जल्द कानून बनाने का निर्णय किया गया था. इसके बाद अन्ना हजारे ने अपना आंदोलन स्थगित कर दिया था. इसे लेकर 6 साल गुजर चुके हैं. अन्ना हजारे ने मोदी को लिखे गए लेटर में कहा कि लोकपाल और लोकायुक्त कानून बनते समय संसद के दोनो सदनों में विपक्ष की भूमिका निभा रही बीजेपी ने भी इस कानून को पुरा समर्थन दिया था. इसके बाद हुए 2014 के लोकसभा चुनाव में आपकी पार्टी सरकार बनी. लोकपाल आंदोलन के बाद देश की जनता ने बड़ी उम्मीद से आपके नेतृत्व में नई सरकार को चुना था. वहीं नई सरकार को मुद्दों पर अमल करने के लिए पर्याप्त समय देना जरुरी था. अन्ना हजारे ने पिछले तीन सालों में कई बार पत्र लिखने का जिक्र भी किया, लेकिन पीएमओ से कोई जवाब नहीं मिला. इतना ही नहीं ना कभी मन की बात में लोकपाल और लोकायुक्त का जिक्र किया गया. उन्होंने लिखा है कि सत्ता में आने से पहले आपने आश्वासन दिया था कि भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाएंगे. हालांकि आप 3 साल से लोकपाल और लोकायुक्त की नियुक्ती नहीं कर सके. सुप्रीम कोर्ट ने भी आपकी सरकार को बार-बार फटकार लगाई है. मोदी ने कहा कि जिन राज्यों में बीजेपी की सरकारें हैं, वहां भी नये कानून के तहत लोकायुक्त नियुक्त नहीं किए गये हैं. इससे ये साफ है कि आप लोकपाल, लोकायुक्त कानून पर अमल करने के लिए इच्छाशक्ति नहीं दिखा रहे हैं. अन्ना हजारे ने देश में लगातार किसानों की आत्महत्या का भी जिक्र किया है. अन्‍ना के अनुसार, मौजूदा वक्त में खेती पैदावारी में किसानों को लागत पर आधारित दाम मिले इसलिए मैंने कई बार पत्र लिखा था. हालांकि न आपकी तरफ से कोई जवाब आया और न ही स्वामीनाथन कमिटी की रिपोर्ट पर कार्रवाई हुई. इसी वजह से पिछले कई दिनों से महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, तमिलनाडू, आंध्रप्रदेश, तेलंगना, हरियाणा, राजस्थान में किसान आंदोलन कर रहे हैं. साथ ही लेटर में अन्‍ना ने राजनैतिक पार्टियों को सूचना के अधिकार के दायरे में लाने की मांग भी की. अन्ना हजारे ने पत्र के जरिए कहा कि पिछले 3 साल में आपकी सरकार ने किसी पत्र का जवाब नहीं दिया. इसके लिए अब मैने दिल्ली में आंदोलन करने का निर्णय लिया है. जब तक लेटर में लिखें मुद्दों पर जनहित में सही निर्णय और अमल नहीं होता तब तक मैं आंदोलन दिल्ली में जारी रखुंगा. अन्ना हजारे ने अगले पत्र में आंदोलन की तारीख की घोषणा करने की बात कही है.

अंग्रेजी मतलब उच्च संस्कार और मार्डन युग?

कई बार व्यवहारिक जीवन के उतार-चढ़ाव से गुजरते हुए इस बात का एहसास हुआ कि फर्राटेदार अँग्रेजी ना बोल पाना पिछड़ापन है बरक्स हिन्दी बोलने के. बहुत बार तो इस बात की कसीस दोस्तों-रिश्तेदारों के साथ बिताए गए पलों में ज्यादातर समय देखने को मिले. बहुतेरे मित्र यह बात समझते हुए वाद-संवाद हिन्दी में ही करने की कोशिश करते हैं. कुछ लोगों के लिए अँग्रेजी ना बोल पाना तो उन्हें सीधे कॉलर पकड़ कर मूर्खों के कतार में ले जाकर खड़ा कर देना जैसा ही है. मतलब आप अंग्रेजी भाषा का बात-बात पर प्रयोग करते हुए दिख रहे हैं तो आप बहुत बड़े विद्वेषी हैं वरना मूर्ख. आज तक यह बात नहीं समझ पाया कि जो सहज होकर अंग्रेजी भाषा का प्रयोग नहीं कर पाते या फिर नहीं बोल पाते हैं वो वाकई ऐसे प्रबुद्धजनों के नजरिए में मूर्ख हैं या फिर उनके प्रति इस तरह की नजरिया रखने वाला ही तो मूर्ख नहीं. अंग्रेजी को लेकर खास तरह का टेबू बना हुआ है.

बहुत उधेड़बुन टाइप महसूस होने लग जाता है. जानने की जिज्ञासा बढ़ जाती है. कभी-कभार तो सोचने लग जाता हूं. प्रबुद्ध से पूछ ही लिया जाए क्या? फिर ठहरकर खुद को नकारात्मकता के तरफ से सकारात्मकता की तरफ ध्यान केंद्रित करने में समय खर्च कर देता हूं. किसी ऑफिस में प्रवेश करते ही प्रायः किसी बड़े पद पर विराजमान अधिकारी जब अंग्रेजी से ही अपनी बात की शुरुआत करते हैं तो थोड़ी देर के लिए अचंभित हो उठता हूं. मुझे महसूस होने लगता है आखिर साहेब के टेबल के सामने खड़ा इंसान उस अधिकारी के प्रति क्या सोच रहा होगा. जिसे अंग्रेजी के शब्दों से कभी भेंट ही नहीं हुई हो. अंग्रेजी ही क्यों व्यक्तितौर पर मुझे किसी भी भाषा से कोई कोफ्त नहीं है बल्कि आधा भारत जो गांवों में रहता है उनके बारे में चिंतित हो जाता हूं. उनको सोचने के बाद व्यथित हो उठता हूं.

गांव में रहने वाले मुझे वो बच्चे याद आने लगते हैं और कई बार तो जहन से चेहरा तक नहीं उतरता जो अपने गांव का सरकारी स्कूल के कमरे में नीचे बैठकर बार-बार छत को निहार रहा होता है. मुझे वो आदमी का चेहरा जहन से नहीं उतर पाता है जो कड़ाके व मुसलाधार बारिश के बीच अपने खेतों में काम कर रहा होता है और अचानक किसी दिन उसका कृषि पदाधिकारी से मुलाकात हो जाती है और वो अपने संबोधन में प्रणाम करता है और साहब प्रणाम का उत्तर गुड मार्निंग से देते हैं. अंग्रेजी ना बोल पाने या फिर किसी कारणवश ना समझने के वजह से कई बार हम उस शख्सियत का भरे महफिल या फिर सार्वजनिक स्थानों पर हंसी उड़ाते हैं. उस पर तरह-तरह का व्यंग बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं.

अंग्रेजी ना बोल पाने वालों का मजाक उड़ाते हैं. कोई अंग्रेजी नहीं बोल पाता है तो अंग्रेजी ना बोलने के लहजे में मजाक उड़ा कर खुश हो लेते हैं. यह हमारे दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा बन चुका है. अंग्रेजी ना बोल पाने वालों के इस कमी का फायदा उठाकर बड़े-बड़े अंग्रेजी इंस्टीच्यूट ने अपने विज्ञापन व प्रचार-प्रसार करने तक का हिस्सा तक बना लिया है. बाजार के दबाव के बीच ऐसे मासूम लोग फंस भी जाते हैं.चंद महीनों में ही फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने की गारंटी के साथ अंग्रेजी कोचिंग इंस्टीच्यूट अच्छी खासी रकम भी कमाती है. चंद महीने में अंग्रेजी सीखा देने वाला कोचिंग का बड़े-बड़े महानगरों से लेकर छोटे-छोटे शहरों तक बड़े-बड़े विज्ञापन-हार्डिंग यंत्र-तंत्र दिवारों पर, सार्वजनिक स्थानों पर चिपका मिलेगा.

खैर,इस भेड़चाल में अंजाने में कुछ समझदार लोग भी शामिल हो जाते हैं. मतलब शहर से जब लोग गांव आते हैं तो धोती-कुर्ता या फिर अपने पूर्वजों के परंपरा का निर्वहन नहीं करने वालों पर यही समान्य बात लागू हो जाता है. गांव के बड़े-बुजुर्ग लोग भी इस परंपरा को निर्वाह ना करने पर मजाक बनाते हैं. उन्हें विलायती बाबू और ना जाने क्या-क्या उपमा देने लग जाते हैं. उनपर जहां-तहां तल्ख टिप्पणियां शुरू हो जाती है. मतलब जो धोती-कुर्ता या फिर पूर्वजों के संस्कृति का पालन नहीं कर रहा है तो वो इंसान बेअक्ल है. इस तरह की आदत तो अब राष्ट्रीय आदतों में बेशुमार हो चुका है. इसे तो अब तो पुरूस्कार मिल जाना चाहिए था. हम इसके आदी हो चुके हैं.

जो अंग्रेजी धाराप्रवाह बोलता है वही केवल विद्वान के श्रेणी में कैसे शामिल किया जा सकता है? क्या अंग्रेजी बोलना विद्वान होने का मापदंड हो सकता है? यह प्रवृत्ति बहुत तेजी के साथ निर्विघ्न होकर फल-फूल रहा है. यह भी एक तरह की मानसिकता है. क्या जो अंग्रेजी बोलेगा वही केवल समाज के गिने-चुने नामचीन लोगों के बीच स्थापित होगा? यह कुछ भी नहीं, बस अपने आप में श्रेष्ठताबोध की निशानी है. खुद पर अंग्रेजी बोलने का गुरूर सवार है. हिन्दीहीन भावना और अंग्रेजी मतलब उच्च संस्कार और मार्डन युग. मुझे ऐसे लोगों पर बस तरस आता है जो श्रेष्ठताबोध के बीच अगले को हीनताभाव से देखता है. खैर, भारत में हिन्दी पट्टी के लोगों के साथ संभावित यह दोष कह लीजिए या फिर कुछ भी लेकिन अधिक पाया जाता है. वे धाराप्रवाह अंग्रेजी नहीं बोल पाते हैं. ज्ञानार्जन का उपलब्धि अंग्रेजी तो कतई नहीं हो सकता.

नोट- मुझे देश के तमाम भाषाओं से सान्निध्य प्रेम है आप इस पोस्ट से अंग्रेजी को लेकर मेरे प्रति कोफ्त का नजरिया मत पाल लीजिएगा. मैं किसी भी भाषा का उतना ही सम्मान करता हूं जितना दूसरों से खुद का सम्मान चाहता हूं.

आशुतोष आर्यन की फेसबुक वॉल से

दिल्ली विश्वविद्यालय में एम.फिल में धांधली का पूरा सच

केंद्र सरकार वैसे तो उच्च शिक्षा में बढ़ावा देने का दावा करती है, लेकिन वास्तविकता कुछ ओर ही है. दिल्ली विश्वविद्यालय में एमफिल/पीएचडी में दाखिला प्रक्रिया में धांधली हुई है. यह धांधली पिछले कई सालों से ऐसी ही चली आ रही है. लेकिन इस बार बड़े पैमाने पर असंवैधानिक तरीके से दाखिला प्रक्रिया पूरी की गई, जिसका विरोध भी छात्रों ने 28 अगस्त को दिल्ली विश्वविद्यालय के आर्ट फैकल्टी में किया.

एमफिल/पीएचडी करने वाले दलित छात्रों के साथ भेदभाव किया गया है. आरक्षण के आधार मिलने वाले दाखिले को अलग-अलग विभाग के विभागाध्यक्षों ने ताक पर रखा. अनारक्षित वर्गों को अधिक सीटों पर दाखिला लिया है. इसका मतलब यह है कि आरक्षित वर्गों की सीटों पर सामान्य वर्ग के छात्रों को दिया गया जो कि असंवैधानिक है. सबसे ज्यादा असंवैधानिक तरीके से दाखिला प्रक्रिया हिंदी विभाग और अफ्रीकन विभाग में हुआ. इसके अलावा अन्य विभागों में इसी तरह असंवैधानिक प्रक्रिया के तहत दाखिला हुआ. आइए हम बताते है किस प्रकार से दिल्ली विश्वविद्यालय की एमफ़िल/पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया में धांधली हो रही है…

  •  एमफ़िल प्रवेश प्रक्रिया के पहले चरण में विभाग ने 875 अभ्यर्थियों की लिखित परीक्षा का क्रमवार परीक्षा परिणाम घोषित किया. अब इस मेरिट के हिसाब से कुल 25 सीटों पर प्रवेश के लिए तीन गुना यानी 75 अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिए बुलाया जाना था. इसमें क्रमवार सीटों का विवरण इस प्रकार होगा- UR- 12*3=36, OBC- 6*3=18, SC-4*3=12, ST-2*3=6, PWD- 1*3=3. यानि प्रवेश प्रक्रिया के पहले चरण लिखित परीक्षा परिणाम पर आरक्षण लागू है.
 
  • विभाग ने पहली धांधली यहीं की, कि लिखित परीक्षा के परिणाम की एकीकृत मेरिट लिस्ट को श्रेणीवार अलग अलग करके सूचीबद्ध किया. यानि यहाँ विभाग ने GEN, OBC, SC, ST, PWD की अलग अलग मेरिट लिस्ट बनाई. ध्यान दें, यहाँ UR की मेरिट लिस्ट बनाने की बजाय GEN की मेरिट लिस्ट अलग बनाई गई और बाकी सभी आरक्षित वर्ग की अलग मेरिट लिस्ट बनाई गई. यानी पहले चरण पर भी आरक्षण लागू है.
 
  • पहले चरण की लिखित परीक्षा की एकीकृत मेरिट लिस्ट को आरक्षण के मुताबिक़ पहले अलग अलग जाति समूहों में बांटा गया. अब उपरोक्त विभाजन के आधार पर अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिए बुलाया गया. यहीं सबसे बड़ी धांधली यह की गई कि UR की 12 सीटों के लिए जिन 36 अभ्यर्थियों को सफल घोषित करना था, उन्हें GEN श्रेणी की सूची में से सफल किया गया, इसी तरह अलग अलग जाति-समूहों में से मेरिट के आधार पर आवश्यक संख्या में अभ्यर्थी सफल किया गए. UR में GEN को ही “50% विशेष सवर्ण आरक्षण” देकर बुलाने वाले विभागाध्यक्ष का तर्क है कि हम लिखित परीक्षा में तो UR को GEN ही मानेंगे, लेकिन अंतिम परिणाम में UR मानेंगे.
 
  • प्रवेश प्रक्रिया के पहले चरण का UR हिंदी विभाग के अनुसार ‘अपर कास्ट श्रेणी’ है, चूँकि यहाँ 36 अभ्यर्थियों को लिया जाना था, तो UR की कटऑफ मेरिट 263 नंबर तक चली गई. OBC, SC, ST, PWD की अलग अलग मेरिट लिस्ट बना देने से टॉपर भी अपने ही श्रेणी में आ गया. OBC में 18 अभ्यर्थी चुने गए, जिनकी कटऑफ 290 नंबर तक ही रही. यानी 263 नंबर पाने वाला अपर कास्ट अभ्यर्थी लिखित परीक्षा में 50% सवर्ण आरक्षण पाकर साक्षात्कार के लिए बुला लिया गया, जबकि 289 नंबर पाने वाला OBC आरक्षण का कोटे से बाहर करके फ़ेल कर दिया गया.
 
  • यानि लिखित परीक्षा परिणाम में लागू ‘हिंदी विभाग’ का “50% विशेष सवर्ण आरक्षण” देकर UR की सभी सीटों को GEN में आरक्षित करके 263 नंबर तक पाने वाले सवर्णों को शामिल करने और 289 नंबर तक पाने वाले OBC को बाहर करने के लिए लागू किया गया है. यानि विभाग झूठ बोल रहा है कि पहले चरण की प्रवेश प्रक्रिया में हम आरक्षण नहीं देता. जबकि वह 50% अपर कास्ट को दे रहा है.
 
  • पहले चरण यानि इंट्री लेवल पर ही एक बड़ी संख्या में आरक्षित वर्ग के मेरिटधारी अभ्यर्थी को बाहर करके कम मेरिटधारी को शामिल करके विभाग पहले चरण में ही इंट्री नहीं करने दे रहा. विभागाध्यक्ष के अनुसार यह अंतिम परिणाम नहीं है, इसलिए हम “50% विशेष सवर्ण आरक्षण” देकर अपर कास्ट को सफल कर रहे हैं.
 
  • होना यह था कि एकीकृत मेरिट सूची में से शुरू के टॉपर 36 लोगों को UR में सफल कराते, जिसमें सभी श्रेणी के मेरिटधारी शामिल होते. इससे UR की कटऑफ़ 290 नंबर होती. यानि 290 नंबर के ऊपर पाने वाले सभी अभ्यर्थी UR में सफल होते. क्योंकि इनमें से किसी ने किसी भी स्तर पर आरक्षण की कोई छूट नहीं ली है. अर्थात सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार भी ये सभी मेरिटधारी अभ्यर्थी UR में ही सफल होंगे. उसके बाद OBC कोटे के 18 अभ्यर्थियों के लिए मेरिट कटऑफ़ नीचे 255 नंबर तक आएगी और 255 पाने वाला OBC आरक्षण का लाभ लेकर सफल होता. इसी तरह SC के 12 अभ्यर्थियों के लिए कटऑफ़ 238 नंबर तक आती, ST के 6 अभ्यर्थियों के लिए कटऑफ़ 190 नंबर आती और PWD की कटऑफ़ 220 नंबर तक आती.
 
  • अर्थात हिंदी विभाग आरक्षण का विशेष लाभ पाकर सफल होने वाले इन 24 आभ्यार्थियों को बाहर करके “50% विशेष सवर्ण आरक्षण” देकर 24 सवर्णों को साक्षात्कार के लिए बुला रहा है. विभागाध्यक्ष का कहना है कि हम पहले चरण में आरक्षण नहीं दे रहे, जबकि “50% विशेष सवर्ण आरक्षण” दे रहे हैं. यह संवैधानिक और सामाजिक न्याय दोनों के विरुद्ध है. यह न्यायालय की अवमानना है. यह अपराध है.

10 साल की मुस्कान अहिरवार को डायना प्रिंसेस अवार्ड

मध्य प्रदेश के शहर भोपाल में 10 साल की मुस्कान अहिरवार झुग्गी बस्ती में रहती है. दुर्गा नगर बस्ती में रहने वाली यह बच्ची 5वीं क्लास में पढ़ती है. आमतौर पर इस उम्र के बच्चे सहेलियों और गुड़ियों के साथ खेलने में मशगूल रहते हैं. लेकिन मुस्कान अपने उम्र के बच्चों से काफी अलग है. और उसने कुछ ऐसा काम किया है कि उसे अपने काम की बदौलत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है.

मुस्कान अहिरवार बचपन से ही बच्चों के लिए एक लाइब्रेरी शुरू करना चाहती थी. वह यह सब सोच ही रही थी कि उसके पिता का निधन हो गया. पिता की मौत के सदमे से उबरते ही उन्होंने बच्चों को पढ़ाई के प्रति प्रेरित करने का बीड़ा उठाया. एक साल पहले उसने अपने दम पर बच्चों के लिए लाइब्रेरी शुरू की. इस पहल के लिए उन्हें विश्व स्तरीय डायना प्रिंसेस अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है. अब मुस्कान की लाइब्रेरी में 1 हजार से अधिक पुस्तकें हैं. उनकी लाइब्रेरी में रोजाना बस्ती के कई बच्चे पढ़ने आते हैं. मुस्कान भी खुद उनके साथ पढ़ती है. मुस्कान की इस पहल के लिए नीति आयोग ने उन्हें पिछले साल वुमन ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया अवार्डस से सम्मानित किया था. इसके बाद गुजरात के मधीश पारिख ने मुस्कान का नाम डायना अवॉर्ड के लिए प्रस्तावित किया. इस अवॉर्ड के लिए दुनियाभर से करीब 50 हजार एंट्री आई थीं. यह अवॉर्ड समाज के लिए अनोखा काम करने वाले कम उम्र के बच्चों को दिया जाता है. इस अवॉर्ड के लिए दुनियाभर के 240 बच्चों का चयन हुआ है, इनमें भोपाल की मुस्कान का नाम भी शामिल है. द डायना प्रिंसेस अवॉर्ड प्रिंसेस डायना की याद में दिया जाता है. हालांकि इस नन्ही बालिका को इस अवॉर्ड के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है, लेकिन एक नया अवॉर्ड मिलने की खुशी में मुस्कान का चेहरा खिल उठा है.

जानिए, बर्मिंघम म्यूजियम में रखी तथागत बुद्ध की मूर्ति का राज

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बर्मिंघम। तथागत बुद्ध की यह साढ़े सात फुट ऊंची मूर्ति पिछले डेढ़ सौ साल से इंग्लैंड के बर्मिंघम म्यूजियम में सैलानियों और विशेषज्ञों के आकर्षण का केंद्र रही है.

यदि 1861 में बिहार के सुल्तानगंज से इस मूर्ति को अंग्रेज अपने साथ न ले गए होते तो आज यह बिहार के गौरवशाली इतिहास का हिस्सा होती.

इससे जुड़ी एक और विडंबना यह भी है कि अब इसे ‘बर्मिंघम बुद्धा’ के नाम से पुकारा जाना लगा है. यह मूर्ति गुप्त-पाल शासनकाल यानी 500 से 700 ईसवी के समय की है.

भागलपुर के पास रेलवे निर्माण कार्य की शुरुआत में खुदाई के दौरान यह मूर्ति मिली थी. आधे क्विंटल से ज्यादा वजनी यह मूर्ति अशुद्ध तांबे से बनी है.

इसमें तथागत बुद्ध खड़े हैं और उनका एक हाथ अभयमुद्रा में हैं. इसे बर्मिंघम के उद्योगपति सैम्यूएल थॉर्टन ने तब 200 पौंड में खरीदा था और फिर इसे बर्मिंघम म्यूजियम में रखवा दिया था.