सावधान! निजी चैट, व्हाट्सऐप पर है सेबी की निगाह

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भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने अपनी व्हिसलब्लोअर व्यवस्था को मजबूत करने का कदम उठाया है. सेबी ने व्हाट्सऐप और टेलीग्राम जैसे ऑनलाइन ऐप और प्राइवेट चैट ग्रुप्स आदि के जरिए निवेश के परामर्श और संवेदनशील सूचनाओं का आदान प्रदान करते हैं, ऐसे लोगों का भेद बताने के लिए निवेशकों और बाजार की बिचौलिया इकाइयों में काम करने वाले लोगों को प्रोत्साहित करने का फैसला किया है.

बाजार को चढ़ाने उतारने में लगे ऐसे व्यक्ति और समूह इंटरनेट पर ऐसी साइटों का इस्तेमाल करते हैं, जिनको गूगल जैसे सामान्यत: इस्तेमाल किए जाने वाले सर्च इंजनों के जरिए मुश्किल से पकड़ा जा सकता है. बता दें कि सेबी ने एसएमएस, व्हाट्सऐप, ट्विटर और फेसबुक और अन्य सोशल नेटवर्क, खेल और प्रतिस्पर्धा आदि के जरिए निवेश की अनाधिकृत रूप से सलाह देने पर रोक के लिए एक परिचर्चा पत्र पिछले साल जारी किया था, लेकिन अभी इस बारे में कोई पक्का नियम लागू नहीं किया है.

दो प्रमुख एक्सचेंज बीएसई और एनएसई ऐसे सिस्टम हैं जिनमें कोई भी एक टोल-फ्री फोन नंबर, ईमेल या सीधे अपनी वेबसाइट पर टिप-ऑफ सबमिट कर सकता है. गौरतलब है कि डार्क वेब प्लेटफार्मों और कई नए सुरक्षित मैसेजिंग ऐप को ट्रैक करना मुश्किल है क्योंकि नियामक और एक्सचेंज किसी भी छेड़छाड़ की गतिविधियों की जांच के लिए अपने निगरानी प्रणाली पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं.

शूटआउट से हफ्ते में दूसरी बार दहली दिल्ली

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नई दिल्ली। एक सप्ताह के भीतर दूसरे एन्काउंटर से देश की राजधानी दिल्ली एक बार फिर दहल गई. दक्षिणी दिल्ली में मूलचंद फ्लाईओवर के पास रविवार रात दिल्ली पुलिस और बदमाशों के बीच मुठभेड़ हुई है. दोनों तरफ से गोलीबारी के बाद पुलिस ने एक इनामी बदमाश को धर दबोचा है. रविवार रात ये मुठभेड़ उस वक्त हुई जब पुलिस को एक शख्स संदिग्ध हालात में दिखा. वह बाइक पर था.

पुलिस ने जब उसे रुकने को बोला तो उसने बाइक की रफ्तार बढ़ा दी. इसके बाद उसने पुलिस पर फायरिंग शुरू कर दी. जवाबी कार्रवाई में पुलिस ने भी उस पर फायरिंग की. घायल होने पर पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. पुलिस गिरफ्त में आए ईनामी बदमाश का नाम अब्दुल मुन्नार है. इसे सुपारी किलर बताया जा रहा है. सूत्रों की मानें तो अब्दुल मुन्नार पर पिछले कुछ दिनों से दिल्ली पुलिस की नजर थी. अब्दुल मुन्नार उर्फ खिलाफ नाम के इस सुपारी किलर के पास से पुलिस ने एक पिस्टल और 3 कारतूस बरामद किए हैं.

जानकारी के मुताबिक, पुलिस को रविवार रात अब्दलु मुन्नार के दिल्ली के मूलचन्द इलाके में होने की जानकारी मिली थी. इसके बाद पुलिस ने जाल बिछा दिया. वहीं, शातिर अब्दुल ने अपने साथी के साथ मोटर साइकिल पर सवार होकर भागने की कोशिश की. पुलिस के मुताबिक, पीछा करने के दौरान बाइक पर सवार बदमाशों ने बैरिकेट के पास पुलिस पर फायरिंग शुरू कर दी. इसके बाद मुठभेड़ में अब्दुल को धर दबोचा. पुलिस का दावा है कि मुठभेड़ के दौरान सुपारी किलर ने पुलिस पर फायरिंग करने की भी कोशिश की थी.

अब्दुल मुन्नार उर्फ खलीफा नाम के इस सुपारी किलर पर करीब दो दर्जन मुकदमे दर्ज हैं. यूपी पुलिस ने इसके सिर पर 12 हजार रुपये का इनाम भी रखा हुआ था. पुलिस के मुताबिक, अब्दुल मुन्नार उर्फ खलीफा लखनऊ के जयेश हत्याकांड का मुख्यारोपी है. एक विधायक के भांजे जयेश को मारने की सुपारी मुन्नार ने ही ली थी. इसके अलावा अब्दुल मुन्नार उर्फ खलीफा हरियाणा कैडर के एक आईएएस संजीव कुमार को मारने के सुपारी भी ले चुका था.

बताया जा रहा है कि अब्दुल ने कुछ दिन पहले ही ओखला मंडी में एक शख्स पर उसकी पत्नी से सुपारी लेकर गोली चलाई थी. मुन्नार ने उस शख्स के सिर्फ पैर पर गोली मारी थी, इसके पीछे वजह सुपारी के लिए सिर्फ आधी पेमेंट मिलना था. इससे पहले पिछले सप्ताह द्वारका मोड़ के पास मंगलवार को एक शूटआउट हुआ था. द्वारका मोड़ मेट्रो पिलर 768 के पास हुए इस शूट आउट में दिल्ली और पंजाब पुलिस शामिल थी. पुलिस ने 5 लोगों को गिरफ्तार किया था. इनसे 12 पिस्टल और 100 गोलियां बरामद की गई थीं.

पाकिस्तान के कानून मंत्री ने दिया इस्तीफा

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इस्लामाबाद। इस्लामिक कट्टरपंथियों के विरोध प्रदर्शनों के दबाव में आकर पाकिस्तान के कानून मंत्री जाहिद हामिद ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. पाकिस्तानी मीडिया के मुताबिक कट्टरपंथियों की ओर से लगातार कई दिनों से जारी विरोध प्रदर्शनों के दबाव में जाहिद ने रविवार देर रात इस्तीफा दिया. कट्टरपंथी संगठन जाहिद पर ‘ईशनिंदा’ का आरोप लगा रहे थे. इसके साथ ही प्रदर्शनकारियों ने 11 दिन से जारी अपने आंदोलन को समाप्त कर दिया. इससे पहले पाकिस्तानी सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच इस बात पर सहमति बनी थी कि जाहिद इस्तीफा देते हैं तो आंदोलन वापस ले लिया जाएगा.

प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे इस्लामिक समूह तहरीक-ए-लबैक के प्रवक्ता एजाज अशरफी ने कहा, ‘हमारी मुख्य मांग को स्वीकार कर लिया गया है.’ एजाज ने कहा कि सरकार कानून मंत्री के इस्तीफे का ऐलान करेगी और उसे बाद अपने आंदोलन को वापस ले लेंगे. पाकिस्तान में संवैधानिक पदों पर बैठने वाले लोगों की शपथ में बदलाव के जाहिद के प्रस्ताव के विरोध में कट्टरपंथी सड़कों पर उतर आए थे. राजधानी इस्लामाबाद में हिंसक प्रदर्शन करते हुए इन लोगों का कहना था कि शपथ में बदलाव किया जाना ईशनिंदा के जैसा है.

सरकार के मुताबिक यह गलती मौलवी की खामी के चलते हुई थी, जिसे कट्टरपंथी मुस्लिमों के विरोध के बाद वापस ले लिया गया था. डॉन की रिपोर्ट के मुताबिक हामिद ने कहा कि मैं अपनी इच्छा से पद से इस्तीफा दे रहा हूं. गौरतलब है कि इस्लामिक कट्टरपंथियों ने इस्लामाबाद में हिंसक प्रदर्शन किए थे. इस पर सुरक्षा बलों ने जवाबी कार्रवाई की थी, जिसमें 200 से ज्यादा लोग घायल हो गए थे और करीब 6 लोगों की मौत हो गई थी.

तहरीक-ए-खत्म-ए-नबूवत, तहरीक-ए-लबैक या रसूल अल्लाह (टीएलवाईआर) और सुन्नी तहरीक पाकिस्तान (एसटी) के करीब 2,000 कार्यकर्ताओं ने दो सप्ताह से अधिक समय से इस्लामाबाद एक्सप्रेसवे और मुरी की घेराबंदी कर रखी थी. यह सड़क इस्लामाबाद को इसके एकमात्र हवाईअड्डे और सेना के गढ़ रावलपिंडी को जोड़ती है.

जिग्नेश मेवाणी ने की निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा

गुजरात। जिग्नेश मेवाणी चुनाव गुजरात विधानसभा का चुनाव लड़ेंगे. सोमवार को उन्होंने सोशल साइट पर यह घोषणा कर दी. मेवाणी ने घोषणा की है कि वह निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में गुजरात के बनासकांठा जिले की वडगांव-11 सीट से चुनाव लड़ेंगे. जिग्नेश ने अपने फेसबुक वॉल पर लिखा, ‘निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में वह वड़गांव 11 चुनावक्षेत्र से गुजरात विधानसभा का चुनाव लड़ेंगे. आज 12 बजे वडगांव पर्चा भरने जाएंगे. भाजपा को शत्रु बताते हुए मेवाणी ने अन्य राजनीतिक दलों से अनुरोध किया है कि वो उनके खिलाफ प्रत्याशी खड़ा न करें. उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशियों से भी यही अपील की है. बकौल मेवाणी, “लड़ाई सीधी हमारे और भाजपा के बीच में होने दें. पिछले 22 साल से गुजरात में जो तानाशाही चल रही है, उसके सामने ऊना से लेकर अब तक हमने जो संघर्ष किया है , जो माहौल बनाया है, उससे न केवल गुजरात लेकिन पूरे देश की जनता वाकिफ है.”जिग्नेश ने कहा है कि वो जिन मुद्दों को लेकर संघर्ष करते आए हैं, उन्हीं मुद्दों की बात करने के लिए और इसी आवाज़ को बुलंद करते हुए गुजरात विधानसभा में भी जाएंगे. जिग्नेश की इस घोषणा के बाद राजनीति और गरमा गई है.

इंडोनेशिया के बाली द्वीप पर फूटा ज्वालामुखी, उड़ान बाधित

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देनपसार (इंडोनेशिया)। पर्यटन के लिए मशहूर इंडोनेशिया के बाली द्वीप के माउंट अगुंग ज्वालामुखी में लगातार विस्फोट हो रहा है. इससे राख और धुएं का गुबार करीब छह हजार मीटर ऊपर तक उठ रहा है. ज्वालामुखी के आसपास वाले स्थान राख व धुएं से भर गए हैं. भवनों, सड़कों और कारों पर राख की मोटी परत जम गई है. दर्जनों उड़ानें रद कर दी गई हैं. बाली पहुंचे हजारों यात्री फंसे हुए हैं. इनमें अधिकतर ऑस्ट्रेलिया के हैं. इंडोनेशियाई सरकार ने ज्वालामुखी विस्फोट को देखते हुए सभी हवाई उड़ानों के लिए लाल चेतावनी जारी कर रखी है. इंडोनेशिया में आपदा प्रबंधन विभाग के अनुसार आने वाले कुछ दिनों में ज्वालामुखी में और भयंकर विस्फोट हो सकता है. माउंट अगुंग ज्वालामुखी पिछली बार 1963 में फटा था जिसमें करीब 1600 लोग मारे गए थे. हाल ही में ज्वालामुखी की सक्रियता के चलते उसके दायरे में आने वाले 7.5 किलोमीटर के रिहाइशी इलाके को प्रशासन ने पहले ही खाली करा लिया है. समुद्री तटों व मंदिरों के लिए प्रसिद्ध बाली में हर साल लगभग 50 लाख पर्यटक आते हैं. माउंट अगुंग ज्वालामुखी के सितंबर महीने से ही सक्रिय रहने के कारण पर्यटकों की तादाद काफी घट गई है.

पद्मवाती और खिल्जी से जुड़े सवाल

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पद्मावती फिल्म पर बहस अभी भी मुर्खता के दायरे में घूम रही है.

पहली बात की खिल्जी मुगल नहीं था.

दूसरी, कोई बेवकूफ ही कह सकता है कि ‘अगर राजपूत न होते तो भारत मुगलिस्तान होता’. मुगलों के पहले और मुगलों के बाद, भारत में जो भी मुस्लिम शासक आये, राजपूतों, जाटों, खत्त्रियों, ब्राह्माणो, यादव, कुर्मी, दलित सब के साथ मिलकर काम किया. हर मुस्लिम शासक के साथ, हमेशा हिन्दू खड़ा रहा है. खिल्जी प्रगतिशील शासक था. इतिहास में रानी पद्मिनी जैसा कोई पात्र है ही नही. जायसी की लिखी ‘पद्मावत’ सहित्य है इतिहास नही. पर उस साहित्यिक कृति में भी खिल्जी को क्रूर बादशाह नही दिखाया गया है. भंसाली की फिल्म इतिहास और सहित्य दोनो का विकृत रूप पेश करती है.

तीसरी, 1857 की लड़ाई में राजस्थान के बड़े राजपूत घरानो ने अन्ग्रेज़ों का साथ दिया. कई मुस्लिम और अन्य बिरादरियों के बड़े शासकों ने अन्ग्रेज़ों का साथ दिया. पर उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश के कई छोटे-बड़े राजपूत ज़मिन्दार और किसान, जाटों तथा अन्य किसान बिरादरियों की तरह अन्ग्रेज़ों से लड़ते हुए शहीद हुए.

ऐतिहासिक तथ्यों एवं मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित महाकाव्य ‘पद्मावती’ के अध्ययन से ज्ञात होता है कि 14वीं सदी के दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी और ‘राजपूत सम्मान’ के प्रश्न पर कोई टकराव जैसी स्थिति नहीं रही है. महान सूफी कलमकार, इतिहासकार, भारतीय संगीत एवं खड़ी बोली के पितामाह अमीर खुसरो खिलजी के साथ चित्तौड़ अभियान में शामिल थे. अपनी फारसी भाषा में लिखी किताब ‘खज़ई-उल-फ़ुतूह’ में खुसरो अलाउद्दीन खिलजी के सैनिक अभियानों, प्रशासनिक कार्यों और जन-संसाधनों के क्षेत्र में किए गए उसके कामों का उल्लेख करते हैं. खुसरो के हिसाब से 1303 ईस्वी में चित्तौड़ के राजा ने खिलजी के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था और खिलजी ने उसे माफ भी कर दिया था. खुसरो के तकरीबन 50 सालों बाद, इतिहासकार ज़ियाउद्दीन बरनी भी इन्ही तथ्यों की पुष्टि करते हैं.

बीसवीं सदी के इतिहासकार और उनकी पुस्तकें जैसे श्री किशोरी लाल सरन (‘खिलजियों का इतिहास’), इरफान हबीब (‘Northern India under the Sultanate’), बनारसी प्रसाद सक्सेना (‘The Delhi Sultanate’), भी खुसरो और बरनी द्वारा लिखे गये तथ्यों की पुष्टि करतें हैं. आश्चर्य की बात यह है की अलाउद्दीन खिलजी से जुड़ा ‘जौहर’ वाला प्रसंग दिल्ली सम्राट के रणथंभौर हमले के समय सामने आता है. रणथंभौर पर खिलजी ने हमला 1301 में किया था. चित्तौड़ की चढ़ाई 1303 में की गयी.

मंगोल आतताइयों से भारत को बचाने में खिलजी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. बगदाद से लेकर यूरोप, रूस और चीन तक खूंखार मंगोलों ने लगभग पूरी दुनिया में कोहराम मचा कर कब्जा कर लिया था. बलबन दिल्ली का पहला बादशाह था जिसने मंगोलों को शिकस्त दी. उसके बाद खिलजी ने मंगोलों को परास्त कर उनके अजेय होने का मिथक तोड़ा.

खिल्जी ने एक के बाद एक लड़ाइयों में मंगोलों को हरा कर उनकी कमर तोड़ दी. जरन-मनजूर (1297-1298), सिविस्तान (1298), कीली (1299), दिल्ली (1303), अमरोहा (1305) के युद्धों में मंगोलों को मुंह की खानी पड़ी. 1306 ईस्वी में खिलजी की फौजों ने रावी नदी के तट पर मंगोलों पर निर्णायक जीत हासिल की. उसके बाद, खिलजी के सेनपतियों ने मंगोलों को अफगानिस्तान तक खदेड़ा. रणथंभौर की लड़ाई और घेरेबन्दी लम्बी चली. खून की नदियां बह निकलीं. राजा हम्मीरा का क़िला अभेद्य माना जाता था. खिलजी अपने युध्द कौशल और तकनीक की वजह से जीता. उसके पास बड़ी-बड़ी चट्टान नुमा मिसाइल फेंकने वाली मशीनें थीं. क़िले के चारों तरफ फैली खाई को खिलजी बुने हुए बोरों से भरने में कामयाब रहा. रणथंभौर की लड़ाई और घेरेबन्दी लम्बी चली. खून की नदियां बह निकलीं. राजा हम्मीरा का क़िला अभेद्य माना जाता था. खिलजी अपने युध्द कौशल और तकनीक की वजह से जीता. उसके पास बड़ी-बड़ी चट्टान नुमा मिसाइल फेंकने वाली मशीनें थीं. क़िले के चारों तरफ फैली खाई को खिलजी बुने हुए बोरों से भरने में कामयाब रहा.

दूसरी तरफ, राजपूत द्वारा रचित ‘हम्मीरा महाकाव्य’ इस बात की पुष्टि करते हैं कि हम्मीरा का सगा भाई भोज, उसका प्रमुख सेनापति रीतिपाल, खिलजी से जा कर मिल गये थे. सर्जन शाह नाम के एक बौद्ध व्यापारी का जिक्र आता है. हम्मीरा से खुन्नस के कारण, सर्जन शाह ने रणथंभौर क़िले के अन्दर खाने-पीने की सामग्री में ज़हर मिला दिया था. तो राजपूतों के पक्ष में मुस्लिम मंगोल लड़े और खिलजी के पक्ष में भोज, रितिपाल जैसे कई हिन्दू राजपूत. खिलजी का रणथंभौर और फिर चित्तौड़ पर हमला एक बड़े राजनीतिक अभियान का हिस्सा था. इस प्रक्रिया में दिल्ली के सुल्तान ने गुजरात (1304), रणथंभौर (1301), चित्तौड़ (1303), मालवा (1305), सिवाना (1308) और जालौर (1311) पर आधिपत्य जमाया.

मलिक मुहम्मद जायसी भक्ति-सूफी आन्दोलन के प्रमुख कवि थे. उनका परिवार रायबरेली, अवध के जैस क़स्बे में बसा था. 1540 ईस्वी के आस -पास जायसी ने अवधी भाषा में पद्मावत की रचना की. अनारकली और जोधा बाई की तरह, रानी पद्मिनी भी साहित्यक पात्र है. साहित्य के रूप में, जायसी की पद्मावत, तथ्य, कहानी, कल्पना का मिश्रण है. पद्मावती एक रोचक, भावनात्मक एवं प्रेम के प्रति समर्पण का अलग संसार पैदा करती है. इस संसार में प्रेम प्राथमिक है. हवस, लोलुपता, महत्वाकांक्षा अन्ततः मायाजाल का हिस्सा है. जायसी ने रणथंभौर और चित्तौड़ की अलग-अलग घटनाओं से श्रीलंका की रानी पद्मिनी के बारे में प्रचलित किन्वन्दितियों का मिश्रण कर दिया.

जायसी के महाकाव्य में खिलजी माया का प्रतिरूप है. राणा रतन सेन ‘मस्तिक्ष’ और रानी पद्मिनी हुस्न के अलावा ‘बुद्धि’ का प्रतीक हैं. जायसी लिखते हैं: राघव दूत सोई सैतानू . माया अलाउदीन सुलतानू .. प्रेम-कथा एहि भाँति बिचारहु. बूझि लेहु जौ बूझै पारहु. जायसी के संसार में माया या मस्तिष्क भी केवल बिम्ब हैं. असल में पद्मावती काव्य में जायसी दुनिया की निरन्तर बदलती हुई स्तिथियों, जहां किसी चीज़ में कोई ठहराव नहीं है, धन, वैभव, रूप, श्रृंगार, आते और जाते हैं, पर अपना सहित्यिक मत पेश करते हैं. कैसे माया और प्रेम में टकराव होता है; कैसे प्रेम सच है; पर कामना भ्रम पैदा करती है. कामना प्रेम का वस्तुकरण करती है. कामना प्रेम को आत्मगत विषय के रूप में देखने के बजाय उसे एक वस्तु बना देती है. कामना प्रेम को अपने विपरीत में बदल देती है. एक वस्तु के रूप प्रेम हाड़-मांस की चीज़ बन जाता है-एक ऐसी चीज़ जिसको सिर्फ ‘हासिल’ किया जा सकता है, ‘पाया’ नहीं जा सकता. इस प्रक्रिया में प्रेम का मानवीय पक्ष क़ुर्बान हो जाता है.

पद्मावती, क्षात्रधर्म और सामंतवाद

पद्मावती में जायसी अलाउद्दीन खिलजी को आक्रान्ता के रूप में प्रस्तुत नहीं करते. खिलजी एक आम इन्सान है, जो अपनी कामनाओं का दास है; और जो ‘भाग्य’ या प्रकृति या प्रेम जैसी भावना के नियमों से वाकिफ नहीं है. वो इस बात से भी वाकिफ नहीं है कि पद्मिनी का वस्तुकरण कैसे पद्मिनी को हक़ीक़त में उससे दूर ले जाता है! क्योंकि वस्तुकरण किसी भी आत्मगत विषय को ‘सम्पत्ति’ में तब्दील कर देता है!

खिलजी का रतन सेन से युध्द ही नहीं हुआ

फिल्म के विपरीत, जायसी की पद्मावती में खिलजी और पद्मिनी के पति रतन सेन में कभी युध्द होता ही नहीं है. खिलजी की कामना रानी पद्मिनी का वस्तुकरण करती है. इस वस्तुकरण की वजह से पद्मिनी एक ‘सामन्ती सम्पत्ति’ में तब्दील हो जाती है. सामन्ती सम्पत्ति के रूप में, पद्मिनी को कोई भी प्राप्त करने की कोशिश कर सकता है. जायसी इस बात को दिखाते हैं कि कैसे रतन सेन की मौत, खिलजी की तलवार से नहीं, बल्कि कुम्भल्नेर के हिन्दू राजा देवपाल से मल्ल युध्द के दौरान हुई.

यूरोपीय सहित्य में सामंती-मध्ययुगीन दौर के उत्तरार्ध में वीरता की एक नई धारा उभरी. यूरोपीय कवियों और वीर रस के लोक-गीतों में भी अचानक प्रेम के पहलू उभरने लगे. वीरों की प्रेम कथायें सामने आयीं. सामन्ती-मध्ययुग का उतरार्ध प्रगतिशील-पूंजीवाद के नये बीजों के फूटने का समय था. उस समय के सहित्य में chivarlous love poetry यानी वीरों की प्रेम कथायें समान्तवाद विरोधी मानी गयीं. क्योंकि इनमें नारी, ‘हासिल करने वाली सामन्ती सम्पत्ति’ नही रह गयी. बल्कि प्रेम का पात्र बनी. पहली बार, नारी की अपनी व्यक्त्तिगत पहचान, एक प्रेमिका के रूप में ही सही बनी.

जायसी ने पद्मावती 16वीं शताब्दी में लिखी. जब भारत में भी प्रोटो-स्वस्थ पूंजीवादी पृवृत्तियां दाखिल हो कर सामन्ती ढांचे और संस्कृति से टकरा रही थीं. जायसी के समय शेरशाह सूरी दिल्ली का बादशाह था. एक दशक बाद अकबर का दिल्ली पर कब्ज़ा हुआ. शेरशाह सूरी और अकबर दोनों ने, अलग-अलग राजघराने के होते हुए भी, भारत को छोटे-छोटे राज्यों में बिखरे हुए सामन्ती समाज को बदल कर रख दिया.

राम चरित मानस की भूमिका

तुलसीदास भी 16वीं सदी के भक्ति-रस के कवि थे. उन्होंने भगवान राम की लीलायें संस्कृत के बजाय अवधी भाषा में लिख कर, भगवान को भक्ति, प्रेम और मानवीय आस्था का प्रतीक बनाया. सामन्ती प्रलापों में जकड़े काशी के पण्डित इसीलिए तुलसीदास से नफरत करते थे. बाद में 17वीं शताब्दी में, रीतिकाल के दौरान, कविता पूरी तरह सामंतवाद से परे, मानवीय, एन्द्रियवादी रंग में ढल गयी.

भरतीय इतिहास में 14वीं सदी

यूरोप की तरह, भारत में भी, 14वीं सदी से बदलाव आने शुरू हो गये थे. 1296-1316 का अलाउद्दीन खिलजी का काल अभूतपूर्व था. इलाहबाद के पास कड़ा-मानिकपुर से लेकर पंजाब में दीपलपुर तक, खिलजी ने सिंचाई और सड़क इत्यादि बनवायी. शेरशाह सूरी और अकबर से पहले, खिलजी ने बिखरे सामन्ती सैन्य बल के स्थान पर, एकीकृत सेना की नींव रखी. खिलजी ने ज़मीन का व्यापक सर्वेक्षण करवाया और राज्य का सीधे किसान से सम्बन्ध बनाने की कोशिश की.

कैम्ब्रिज इकोनॉमिक हिस्ट्री आफ इण्डिया के अनुसार, “अलाउद्दीन खिलजी की कर प्रणाली सबसे लम्बे समय तक, एक संस्था के रूप में जीवित रही. बीसवीं सदी तक भी. खिलजी ने ही तय किया था ज़मीन का कर ही किसानों से लिया जाये. बाकी सारे कर, जिनकी उत्पादकता से कोई लेना-देना नहीं है, और जो सामंत जबरन वसूलते हैं, फिजूल हैं.

खिलजी के सुधार कार्य और उसकी ‘हिन्दू-परस्ती’

खिलजी ने मंडियां बनवाईं, चीज़ों के दाम तय किए और गांव-शहर के बीच आदान-प्रदान की प्रक्रिया को तेज किया. अकबर के दो सौ साल पहले, खिलजी ने हिन्दू रानियों से शादी करने की परम्परा की नींव डाली. इस क्रम में खिलजी ने गुजरात के वाघेलों की राजकुमारी कमलदेवी और देवगिरी के राजघराने की राजकुमारी झाट्यपाली से शादी रचाई. इन रानियों को इस्लाम नहीं क़ुबूल करवाया गया. उस समय के इतिहासकारों ने इन शादियों को ‘राजनीतिक गठबंधनों’ की संज्ञा दी. पहले-पहल, खिलजी ने विरोधियों के मन्दिर और मस्जिद तुड़वाए. फिर, हिन्दू राजाओं के साथ मेल हुआ और समझौते के बिंदु निकाले गये. खिलजी ने कई मन्दिर बनवाये. 1305 में लिखे दस्तावेज़ में अमीर खुसरो लिखते हैं की खिलजी ने हिन्दू ज़मींदारों के प्रति इतनी नरमी बरती जितनी उन लोगों को भी उम्मीद नहीं थी. कुछ मुस्लिम अतिवादियों ने बादशाह के इस सौहार्दपूर्ण रूप की आलोचना की.

अलाउद्दीन खिलजी एक नया मज़हब शुरू करना चाहता था

अकबर पहला बादशाह नहीं था जिसने ‘दीन-ए-इलाही’ के बारे में सोचा. हिन्दुस्तान की धरती पर खिलजी को सबसे पहले लगा की एक नया मज़हब जो सारे विभेद मिटा दे, शुरू करना चाहिये. 14वीं सदी के अन्य मुस्लिम लेखक और उलेमा जैसे ज़ियाउद्दीन बरनी खिलजी पर कटाक्ष करते हुए लिखते हैं कि, “खिलजी को इस्लाम में आस्था उतनी ही थी जितनी एक अनपढ़-जाहिल को होती है”. बरनी खुद ही खिलजी के नये मज़हब बनाने के प्रयासों की आलोचना करता है. बरनी खिलजी पर ‘हिन्दू-परस्त’ होने का भी आरोप लगाता है. यह महत्वपूर्ण है कि 1316 में खिलजी कि मौत के बाद, उसकी हिन्दू रानी से पैदा हुई औलाद क़ुतुबुद्दीन शाह को सबसे पहले उसके अज़ीज़ सेना नायक मलिक कफूर ने गद्दी पर बैठाया.

जायसी के बाद पद्मावती के कम से कम दो और रूप सामने आये. पर कहानी में निर्णायक मोड़ ब्रिटिश लेखक जेंम्स टॉड ने अपनी मशहूर पुस्तक Annals and Antiquities of Rajasthan ने दिया. टॉड ही था जिसने पद्मावती से प्रेम प्रसंग गायब करके, पूरी दास्तान को एक वहशी मुस्लिम राजा के हवस के रूप में पेश किया. टॉड उस समय राजपूतों के इतिहास की अलग श्रृंखला बना रहा था. जिसके तहत राजपूतों का मुसलमानों से और अन्य हिन्दू जातियों से सम्बन्धों को दूर ले जाया गया. राजपूतों को कृषक समाज से अलग कर, एक शुद्ध लड़ाकू क़ौम के बतौर पेश किया जा रहा था. इसके पीछे राजस्थान के वो घराने थे जो अंग्रेजों की स्वामी भक्ति में लगे थे.

उपनिवेशवाद, फासीवाद और भंसाली की पद्मावती

फासीवाद आधुनिक समाज पर सामन्ती मूल्य थोपता है. फासीवाद की ज़मीन उपनिवेशवाद तैयार करता है. सबसे पहले अंग्रेजों ने मुगलों के समय से विकसित हो रहे आन्तरिक पूंजीवाद की भ्रूण हत्या की, उद्योग नष्ट किये. और मुगल-राजपूत-मराठा-अवध काल में पनप रही देसी आधुनिकता एवं प्रारम्भिक पूंजीवाद का गला घोंट दिया. बंगाल से लेकर पूरे भारत में समान्त्वाद को पुन: स्थापित किया. भंसाली की पद्मावती खिलजी को वैसे ही पेश करती है, जैसे जेम्स टॉड ने किया. एक बर्बर, मुस्लिम आक्रांता के रूप में. और यही आरएसएस भी चाहता है. ऐसे में भंसाली संघ का ही काम कर रहे हैं.

पद्मावती फिल्म के माध्यम से संघी राजपूतों को उकसा रहें हैं

बीजेपी गुजरात में बुरी तरह हार रही है. गुजरात में संघ परिवार की हार, लोकतन्त्र के माध्यम से सत्ता हासिल करने की उसकी कोशिश की हार है. अब इसके बाद संघ सत्ता हथियाने का गैर-लोकतान्त्रिक तरीका अपनाएगा. राजस्थान के बड़े राजपूत घराने कहतें हैं की अंग्रेज तो भारत उनको दे कर 1947 में गये थे. ये तो नेहरू बीच में लोकतन्त्र ले आया और सारा खेल खराब कर दिया. अब राजस्थान के बड़े राजपूत घराने करणी सेना का समर्थन कर रहे हैं. उसे फंडिंग कर रहे हैं. संघ तो पहले से ही माहौल को खराब करने की फिराक में था. और अब बड़े राजपूत घराने और संघ के हित फिलहाल मिल गये हैं. लेकिन राजस्थान के बाहर आम राजपूत इस आन्दोलन का समर्थन नहीं कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य-प्रदेश के राजपूत राजस्थान के बड़े राजघरानों को गद्दार मानते हैं. 1857 की पहली जंग-ए-अज़ादी में कुछ अपवादों को छोड़, राजस्थान के सभी राज घरानों ने अंग्रेजों का साथ दिया था.

भंसाली की पद्मावती राजपूत घरानों और आरएसएस को एक अस्थायी गठ बंधन में बांधती है. जैसे-जैसे फिल्म की रिलीज़ डेट नज़दीक आयेगी, हिंसा को बढ़ावा दिया जायेगा. भाजपा राज सत्ता का एक हिस्सा भंसाली का समर्थन देगा. दूसरा हिस्सा करणी सेना का समर्थन करेगा. गुजरात में क्षत्रियों का एक बड़ा समूह है जो ओबीसी श्रेणी में आता है. इन गुजराती क्षत्रियों में अपनी जाति को लेकर ‘हीन भावना’ है. अभी तक यह तबका कांग्रेस की तरफ झुका था. फिल्म पद्मावती पर उन्माद इस हिस्से को भाजपा के पक्ष में गोलबंद कर सकता है. उत्तर प्रदेश में भी नगर निकाय के चुनाव हैं. भाजपा की स्थिति अच्छी नहीं है. यहां योगी खुद ठाकुर हैं. वो भी चाह रहे हैं की फिल्म को लेकर बवाल हो. और उत्तर प्रदेश का ठाकुर-राजपूत भाजपा के पक्ष में गोलबंद हो. मुस्लिम बारावफात त्योहार भी 1 दिसंबर के आस-पास पड़ रहा है. ऐसे में बड़े दंगे भी हो सकते हैं. कम से कम आरएसएस तो कुछ इसी तरह से सोच रहा है.

– अमरेश मिश्रा, इतिहासकार, लखन

केंद्र सरकार ने लालू और शरद की सिक्‍युरिटी घटाई

पटना। केंद्र सरकार ने राजद अध्यक्ष लालू यादव व राज्यसभा सांसद शरद यादव की सुरक्षा में कटौती कर दी है, लालू यादव को मिली जेड प्लस सुरक्षा को कम करते हुए जेड श्रेणी कर दी गई है. इसके तहत एनएसजी की 30 सदस्यीय टीम के सिक्योरिटी कवर को हटाते हुए सीआरपीएफ (करीब डेढ़ दर्जन जवान व अफसर) की सुरक्षा दी गई है. वहीं दूसरी ओर शरद यादव को मिली जेड श्रेणी की सुरक्षा को कम करते हुए ‘वाई प्लस’ कैटेगरी की सिक्योरिटी दी गई है.

गृह मंत्रालय के ताजा निर्देश के बाद अब राज्य के किसी वीआईपी को जेड प्लस का सिक्योरिटी कवर नहीं मिलेगा. अब 16 की जगह 15 वीआईपी के साथ ही एक्स, वाई से लेकर जेड श्रेणी तक का सुरक्षा घेरा रहेगा. इनमें सबसे अधिक वाई प्लस श्रेणी के तहत 8 वीआईपी को सीआरपीएफ के सिक्योरिटी कवर दिए गए हैं. गृह मंत्रालय के स्तर पर समीक्षा के बाद बिहार समेत देश के 8 वीआईपी की सुरक्षा में कटौती की गई है. 4 वीआईपी की जेड श्रेणी की सुरक्षा को वाई श्रेणी कर दी गई है. इनमें दिल्ली के पूर्व एलजी नजीब जंग, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम जैदी व जामा मस्जिद के शाही इमाम शामिल हैं.

किसे कैसी सुरक्षा

जेड श्रेणी (05) : लालू प्रसाद, रामविलास पासवान, राधामोहन सिंह, राजीव प्रताप रूडी व शाहनवाज हुसैन. वाई प्लस (08): पप्पू यादव, चिराग पासवान, शरद यादव, जनार्दन सिंह सिग्रीवाल व अन्य. एक्स श्रेणी (02) : सांसद वीणा देवी व उदय सिंह.

टीचर की शर्मनाक करतूत, छात्राओं से करवाया खेत में काम

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मयूरभंज। ओडिशा के एक सरकारी स्कूल का अजीब मामला सामने आया है. वहां के एक टीचर ने कथित रूप से तीन छात्राओं को अपने खेतों में काम पर लगा दिया था.

बताया जा रहा है कि मयूरभंज के ठाकुरमुंड इलाके में मौजूद एक सरकारी स्कूल की टीचर संगीता सरिता मुंडा ने तीन लड़कियों से अपने खेतों में काम करवाया, इसके बदले में उन्हें प्रतिदिन के 100 रुपए भी दिए . अब मामले की जांच की जा रही है.

तीनों लड़कियां आदिवासी समाज की हैं, वे स्कूल के हॉस्टल में रहकर पढ़ाई करती हैं. मामले का खुलासा उस समय हुआ जब बच्चियों के माता-पिता स्कूल में उनसे मिलने आए और बच्चियां स्कूल से गायब थी. अभिभावकों ने इसकी जानकारी स्कूल प्रबंधन को दी और विरोध-प्रदर्शन किया. मामला बढ़ता देखकर शिक्षा विभाग ने मामले में जांच के आदेश दिए.

ओडिशा का यह कोई पहला मामला नहीं है. इससे पहले जुलाई में एक ऐसा ही मामला सामने आया था. तब एक प्राइमरी स्कूल की महिला टीचर ने अपने छात्रा से स्कूटी साफ करवाई थी. बाद में पता लगा था कि स्कूल प्रशासन की तरफ से कई बार उसे चेतावनी दी गई है, जिसके बाद भी वो बाज नहीं आ रही थी.

पाकिस्तान में सेना और प्रदर्शनकारियों के झड़प, न्यूज चैनलों का प्रसारण बंद

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इस्लामाबाद। पाकिस्तान में तहरीके-ए-लब्बैक (टीएलपी) या रसूल अल्लाह नाम के इस्लामिक संगठन का 20 दिन से धरना-प्रदर्शन जारी है. धरने को खत्म कराने के लिए शनिवार सुबह पाकिस्तानी सुरक्षाबलों ने प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई की. प्रदर्शनकारियों से सख्ती से पेश आने पर वे भडक़ गए और पत्थरबाजी का दौर शुरू हो गया.

प्रदर्शनकारियों की तादाद ज्यादा नहीं है, लेकिन पत्थर-डंडों से छिप-छिपकर किए जा रहे हमलों ने पाकिस्तान के सुरक्षाबलों की नाक में दम कर दिया है. इस्लामाबाद में जमकर हंगामा हुआ और प्रदर्शनकारी पुलिस से भिड़ गए. दरअसल,शनिवार सुबह पाकिस्तान सुरक्षाबलों ने फैजाबाद इंटरचेंज पर धरने पर बैठे प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए बल प्रयोग किया था.

इसके बाद से बवाल खड़ा हो गया. वहीं, पाक सरकार मीडिया को लाइव कवरेज रोकने के आदेश दिए है, क्योंकि लोग इस पुलिस कार्रवाई से आक्रोशित हो सकते है और प्रदर्शन उग्र रूप ले सकता है. हालांकि, जियो न्यूज समेत पाकिस्तान के कई न्यूज चैनलों ने प्रसारण बंद नहीं किया है.

शनिवार सुबह पुलिस और अर्धसैनिक बलों के साढ़े 8 हजार जवानों ने राजधानी इस्लामाबाद के फैजाबाद इंटरचेंज में धरने पर बैठे करीब 2000 प्रदर्शनकारियों को खदेडऩा शुरू किया. इसके बाद चारों तरफ अफरा-तफरी मच गई. प्रदर्शनकारियों ने सडक़ों और बाजारों को बंद कर दिया है. यह धरना 6 नवंबर को टीएलपी नाम के छोटे से इस्लामिक संगठन ने शुरू किया था.

गुजरात चुनाव में JDU के लिए प्रचार नहीं करेंगे नीतीश कुमार

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पटना। जनता दल यूनाइटेड गुजरात के चुनावी मैदान में है लेकिन इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार अपनी पार्टी के प्रत्याशियों के समर्थन में प्रचार नहीं करेंगे.

हालांकि जनता दल वहां पिछले कुछ विधानसभा चुनावों में हर बार प्रत्याशी उतारती रही है लेकिन एक आदिवासी बहुल इलाके में छोटू भाई वसवा के अलावा कोई और विधायक नहीं बना. वसावा अब शरद गुट के कार्यकारी अध्यक्ष हैं. राज्यसभा चुनावों के दौरान वासवा का वोट निर्णायक कांग्रेस प्रत्याशी अहमद पटेल की जीत में निर्णायक रहा था.

जदयू के राष्ट्रीय सचिव एए खान ने स्टार प्रचारकों की सूची जारी की है. इस लिस्ट में पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) एवं राज्यसभा सांसद आरसीपी सिंह, महासचिव केसी त्यागी, बिहार सरकार के मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह, सांसद हरिवंश, संजय झा. अनिल सहनी, रविंद्र सिंह, विद्यासागर निषाद सहित कई बड़े नेताओं के नाम शामिल हैं.

जनता दल यूनाइटेड के राष्ट्रीय महासचिव केसी त्यागी का कहना है कि पार्टी करीब 100 सीटों पर प्रत्याशी उतारेगी जो अधिकांश आदिवासी बहुल और पटेल लोगों के परम्परागत गढ़ में होंगे. त्यागी हाल में चुनाव आयोग के नीतीश कुमार के पक्ष में आए फैसले से उत्साहित हैं और इसके बाद उन्हें उम्मीद है कि पार्टी चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करेगी.

गुजरात चुनाव के लिए केजरीवाल ने अपनाई जनसंपर्क अभियान की रणनीति

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नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी (आप) के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल गुजरात विधानसभा चुनाव में पार्टी उम्मीदवारों के लिये चुनाव प्रचार में हिस्सा नहीं लेंगे.

आम आदमी पार्टी के गुजरात इकाई के प्रभारी गोपाल राय ने आज बताया कि केजरीवाल गुजरात में चुनाव प्रचार के लिये नहीं जायेंगे. उन्होंने बताया कि पार्टी ने गुजरात विधानसभा चुनाव में आप कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं द्वारा घर-घर जाकर वोट मांगने की रणनीति अपनायी है. इसलिये राष्ट्रीय नेताओं को स्टार प्रचारक के तौर पर गुजरात जाने की कोई जरूरत नहीं है. पार्टी ने अपने कार्यकर्ताओं द्वारा जनसंपर्क अभियान को ही प्रचार का मुख्य आधार बनाया है.

आप ने गुजरात विधानसभा चुनाव में सभी 182 सीटों पर चुनाव लड़ने के बजाय उन चुनिंदा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की रणनीति बनायी है, जहां सामाजिक एवं अन्य चुनावी समीकरणों के लिहाज से आप का संगठनात्मक ढांचा मजबूत है. इसके तहत आप ने अब तक 33 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किये हैं. इसके लिये पार्टी प्रत्याशियों की तीन सूची जारी कर चुकी है.

सूत्रों के मुताबिक आप के शीर्ष नेतृत्व ने पार्टी की केन्द्रीय इकाई के नेता कुमार विश्वास सहित कुछ अन्य असंतुष्ट नेताओं की नाराजगी से बचने के लिये गुजरात में स्टार प्रचारकों के इस्तेमाल के बजाय जनसंपर्क अभियान पर ही जोर दिया है. राय ने कहा कि गुजरात में सभी सीटों पर चुनाव लड़ने के बजाय महज 33 सीटों पर ध्यान केन्द्रित करने की रणनीति को ही आप ने अपनाया है.

दयाल सिंह कॉलेज का नाम बदलने पर एनडीए में फूट!

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नई दिल्ली। दिल्ली के दयाल सिंह इनविंग कॉलेज का नाम बदलने पर एनडीए में फूट के बादल मंडराने लगे हैं! केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने धमकी भरे लहजे में कहा है जो व्यक्ति कॉलेज का नाम बदलने में ज्यादा इच्छुक है खुद उसका नाम बदला जाना चाहिए. उन्होंने आगे कहा कि आप किसी और की विरासत को कैसे हटा सकते हैं? ये अस्वीकार्य और चौंकाने वाली बात है क्योंकि पाकिस्तान में उनके योगदान के लिए सरदार दीन दयाल कॉलेजों को चलाया जा रहा है. दरअसल अकाली सांसद कौर का ये बयान ऐसे समय में आया है जब 17 नंवबर को दयाल सिंह इवनिंग कॉलेज की गवर्निंग बॉडी (जीबी) ने महत्वपूर्ण फैसला लेते हुए कॉलेज का नाम बदलने का फैसला लिया. प्रस्ताव में कॉलेज को नया नाम वंदे मारतम महाविद्यालय दिया गया.

तब गवर्निंग बॉडी के चेयरमैन अमिताभ सिन्हा ने कहा कि इसके बाद इवनिंग और मॉर्निंग कॉलेज के अलग-अलग नाम होंगे. साल 1958 से ही दयाल सिंह मॉर्निंग और दयाल सिंह इवनिंग कॉलेज का अपना अस्तित्व रहा है. इसलिए हमें इवनिंग कॉलेज का नाम बदलना ही होगा. दयाल सिंह कॉलेज दिल्ली यूनिवर्सिटी का पहला इवनिंग कॉलेज है. इसपर एक भाजपा नेता और एक वकील ने कॉलेज का नाम बदलने पर कहा है, ‘मां को सम्मान दे रहे हैं.’ सिन्हा ने आगे कहा था कि जीबी ने कॉलेज के नए नाम पर मोहर लगा दी है और डीयू के वाइंस चांसलर को मामले में जानकारी दे दी गई है. वही इसपर अंतिम निर्णय लेंगे और औपचारिक अनुमति देंगे.

गौरतलब है कि इवनिंग कॉलेज के प्रिंसिपल पवन शर्मा को 21 सितंबर को मामले में जानकारी दी गई। इसमें आधिकारिक परिषद की मीटिंग में कॉलेज को पूर्ण कॉलेज बनानी की अनुमति दी गई। कॉलेज को सुबह के वक्त शिफ्ट कर दिया गया है। जहां दोनों की क्लास और आधिकारिक कामकाज अलग-अलग होगा। दूसरी तरफ मामले में दिल्ली यूनिवर्सिटी ने एक कमेटी का गठन किया है जो कॉलेज को दो हिस्सों में बांटने का काम करेगी। हालांकि जीबी के इस फैसले पर कुछ छात्रों और शिक्षकों ने अपना विरोध जताया और प्रशासन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया।

सहारनपुर के दलितों से भेदभाव कर रही है यूपी सरकार

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सहारनपुर के दलित दोहरे अत्याचार का शिकार हो रहे हैं. सभी भलीभांति अवगत हैं कि 5 मई 2017 को सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव के दलितों के घरों पर उस क्षेत्र के सामंतों ने हमला किया था. इसमें लगभग दो दर्जन दलित बुरी तरह से घायल हुए थे और 50 से अधिक घर बुरी तरह से जला दिए गए थे. उक्त हमले में रविदास मंदिर की मूर्ती तोड़ी गई थी और मंदिर को बुरी तरह से जलाया तथा क्षतिग्रस्त किया गया था. उस हमले में एक लड़के की मौत हो गई थी, जिसने रविदास मंदिर के अंदर कोई ज्वलनशील पदार्थ छिड़क कर मंदिर को जलाया था तथा मूर्ती तोड़ी थी. दम घुटने के कारण मंदिर से बाहर निकलते ही वो बेहोश हो गया था. इसके बाद हजारों की संख्या में लोगों ने दलित बस्ती पर हमला किया था. हमले में दो दर्जन के करीब दलित बुरी तरह से घायल हुए थे. कुछ महिलाओं के साथ बदसलूकी भी हुई और ज्वलनशील पदार्थ छिड़क कर घरों को जलाया गया. पालतू पशुओं को भी नुकसान पहुंचा था.

जिस समय दलित बस्ती पर हमला किया गया, उस समय पुलिस मौके पर मौजूद थी लेकिन उसने भी रोकने के बजाय हमलावरों को तांडव करने का खुला मौका दिया. जन मंच और स्वराज अभियान समिति की साझा जांच में यह बात सामने आई थी कि पुलिस ने दंगाइयों को मौका दिया था. पुलिस की भूमिका दलितों के प्रति दुर्भावनापूर्ण रवैये का सबूत है. इतना ही नहीं पुलिस ने दलितों के विरुद्ध पांच मुकदमे भी दर्ज कर दिए, जिनमें 9 दलितों को नामज़द किया गया. लेकिन दलितों की तरफ से केवल एक मुकदमा दर्ज किया गया, जिसमे 9 लोगों को नामज़द तथा काफी अन्य को आरोपी बनाया गया था. इसके बाद पुलिस के द्वारा आठ दलितों और हमलावर पक्ष के 9 लोगों को गिरफ्तार किया गया. इसके बाद एक अन्य दलित को भी गिरफ्तार किया गया परन्तु दूसरे पक्ष से किसी अन्य की गिरफ्तारी नहीं की गई. जबकि तत्कालीन पुलिस अधीक्षक ने जांच टीम को बताया था कि उन्होंने लगभग 40 हमलावरों को चिन्हित कर लिया है और उनकी गिरफ्तारी जल्द ही की जाएगी. लेकिन उसके बाद आज तक कोई भी गिरफ्तारी नहीं हुई. इसके लगभग तीन हफ्ते बाद जब मायावती शब्बीरपुर गईं, तो उस दिन जिला प्रशासन की लापरवाही के कारण शब्बीरपुर से लौट रहे एक दलित लड़के की हत्या कर दी गई. इस मामले में केवल दो लड़कों की गिरफ्तारी हुई.

पुलिस के पक्षपाती रवैये का इससे बड़ा क्या सुबूत हो सकता है कि पुलिस ने पिटने वाले दलित और पीटने वाले सामंती दबंगों के साथ एक जैसा बर्ताव किया. बराबर की गिरफ्तारियां की गईं. दो दलितों तथा दो हमलावरों पर एनएसए लगा दिया गया. सभी जेल में हैं. परिस्थितियों से पूरी तरह स्पष्ट है कि दलितों ने अपने बचाव में जो भी पथराव किया, वह आत्मरक्षा में किया था. परन्तु दलितों द्वारा आत्मरक्षा में की गई कार्रवाई को भी हमले के ही रूप में लिया गया और उनकी गिरफ्तारियां की गईं, जबकि आईपीसी की धारा 100 में प्रत्येक नागरिक को आत्मरक्षा में कार्रवाई करने का अधिकार है. इस प्रकार एक तो दलितों पर अत्याचार किया गया और दूसरे पुलिस ने उन्हें आत्मरक्षा के अधिकार का लाभ न देकर गिरफ्तार किया. इस प्रकार दलित दोहरे अत्याचार का शिकार हुए हैं.

औरतों ने यह भी बताया था कि हमलावरों के पास गुब्बारे थे, जिसे फेंक कर आग लगाई गई थी. इससे स्पष्ट है कि दलितों पर हमला पूर्व नियोजित था. जांच समिति ने इसका उल्लेख जांच रिपोर्ट में भी किया, परन्तु पुलिस ने इस तथ्य को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया. प्रशासन द्वारा दलितों के घरों तथा सामान के नुकसान का आकलन कराया गया था, लेकिन अब तक जो मुआवजा दिया गया है, वह ऊंट के मुंह में जीरे के समान ही है. जो दलित नामज़द हैं और जेल में हैं उन्हें न तो सरकार की तरफ से नुकसान की भरपाई हेतु कोई मुआवजा मिला और न ही एससीएसटी एक्ट के अंतर्गत मिलने वाली अनुग्रह-राशि ही मिली. इसके इलावा गिरफ्तार हुए दलितों को निजी वकील रखने पर भी खर्च करना पड़ रहा है.

यह भी उल्लेखनीय है कि दलितों पर हुए हमले की घटना से एक दिन पहले ही आभास हो गया था कि महाराणा प्रताप जयंती पर दलितों पर हमला हो सकता है. ग्राम प्रधान ने इसकी सूचना पुलिस अधिकारियों तथा एसडीएम को दे दी थी, परन्तु दलितों की सुरक्षा के लिए पुलिस का कोई उचित प्रबंध नहीं किया गया. इसके साथ ही जब 9 मई को भीम आर्मी ने प्रशासन द्वारा शब्बीरपुर में हुए हमले के सम्बन्ध में वांछित कार्रवाई न करने पर विरोध जताने की कोशिश की, तो पुलिस द्वारा बलप्रयोग किया गया. इस पर भीम आर्मी के सदस्यों तथा पुलिस के बीच मुठभेड़ होने पर भीम आर्मी के संयोजक चन्द्रशेखर तथा उसके साथियों के विरुद्ध 21 मुक़दमे दर्ज कर लिए गए. इसके बाद चन्द्रशेखर सहित 40 लोगों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया. जिनमें से 2 लोग अभी तक जेल में हैं. चन्द्रशेखर और वालिया को छोड़ कर भीम आर्मी के अन्य गिरफ्तार सदस्यों की जमानत हो चुकी है. इन दोनों की जमानत जिला स्तर से रद्द हो चुकी है और अब यह इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित है. जेल में चन्द्रशेखर की सेहत बराबर गिर रही है और 28 अक्टूबर को उसे जिला अस्पताल के आईसीयू में भर्ती करवाना पड़ा था.

भीम आर्मी के दमन का ताज़ा उदहारण यह है कि कुछ दिन पहले जब भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर को इलाहाबाद हाईकोर्ट से जमानत मिली, तो उसके जेल से छूटने के पहले ही उस पर रासुका लगा दिया गया. दरअसल योगी सरकार नहीं चाहती कि चंद्रशेखर किसी भी हालत में जेल से बाहर आए, क्योंकि उसके बाहर आने पर दलितों के लामबंद होने का खतरा है. सरकार की यह कार्रवाई रासुका जैसे काले कानून का खुला दुरुपयोग है. इस कानून के अंतर्गत आरोपी को बिना किसी कारण के एक साल तक जेल में रखा जा सकता है. यह नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों का खुला उल्लंघन है.

साफ है कि सहारनपुर में शब्बीरपुर के दलित आत्मरक्षा में कार्रवाई करने पर भी गिरफ्तार किए गए और उनकी गिरफ्तारियां हमला करने वाले लोगों के समतुल्य ही की गईं. रासुका के मामले में भी उन्हें हमलावरों के समतुल्य रखा गया है. पीड़ित दलितों को बहुत कम मुआवजा दिया गया और जो दलित मुकदमों में नामज़द हैं, उन्हें कोई भी मुआवजा नहीं मिला. इस प्रकार शब्बीरपुर के दलित एक तरफ सामंतों के हमले का शिकार हुए हैं तो दूसरी ओर वे प्रशासन के पक्षपाती रवैये का भी शिकार हो रहे हैं. इसके अलावा भीम आर्मी के दो सदस्य अभी भी जेल में हैं और तीन दर्जन से अधिक नवयुवक पुलिस से भिड़ंत के मुकदमे झेल रहे हैं. पुलिस ने भीम आर्मी के एक पदाधिकारी की गिरफ्तारी के लिए 12000 का इनाम घोषित कर रखा है. सरकार द्वारा हमलावरों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई न करने के कारण उनके हौसले बुलंद हैं और वे अभी भी दलितों को धमका रहे हैं.

-लेखक जन मंच के संयोजक और स्वराज अभियान समिति के सदस्य हैं. चौथी दुनिया से साभार

सुप्रीम कोर्ट को चुनौती है भागवत का बयानः मुस्लिम संगठन

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mohan bhagwat

उडुपी। कर्नाटक के उडुपी में चल रहे धर्म संसद में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत विवादित राम मंदिर पर जो बयान दिया उसके बाद मुस्लिम बोर्ड की प्रतिक्रिया आई है. बता दें कि संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि राम जन्मभूमि पर केवल राम मंदिर ही बनेगा और कुछ नहीं, और ये उन्हीं की अगुवाई में बनेगा जो 20-25 सालों में इसके लिए झंडा लेकर चल रहे हैं. अब बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के कन्वेनर और वकील जफरयाब जिलानी ने भागवत के इस बयान को सुप्रीम कोर्ट को चुनौती करार दिया है वहीं ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के औवेसी ने भी इसे कानून का उल्लंघन करार दिया है.

एक अंग्रेजी अखबार की खबर के अनुसार जिलानी ने कहा है कि संविधान के अनुसार सुप्रीम कोर्ट सर्वोच्च अथॉरिटी है और वो यह तय करेगी कि मंदिर कहां बनना है और कहां नहीं. देश कानून के हिसाब से चलता है और हम सब फैसले का इंतजार कर रहे हैं. भागवत का बयान संविधान और सुप्रीम कोर्ट को चुनौती है.

वहीं ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के असदुद्दीन औवेसी ने कहा कि यह माहौल खराब करने की सोची समझी कोशिश हैं. जब मामला सुप्रीम कोर्ट में है तो फिर ऐसे बयान कैसे दिए जा सकते हैं. बता दें कि आरएसएस प्रमुख ने उडुपी में कहा था कि राम मंदिर वहीं बनेगा. इसे लेकर कोई शक नहीं होना चाहिए, वहां वैसा ही भव्य मंदिर बनेगा जैसे पूर्व में बना था.

दिल्ली मेट्रो में रोजाना घटे 3 लाख यात्री

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नई दिल्ली। दिल्ली मेट्रो को किराया बढ़ाने का फैसला उल्टा पड़ता दिख रहा है. किराए में बढ़ोतरी के बाद से यात्रियों की संख्या में प्रतिदिन 3 लाख की कटौती आई है. आरटीआई से इस बात का खुलासा हुआ है. पिछले दिनों ही मेट्रो ने किराया बढ़ाया था, जिसका दिल्ली सरकार समेत कई हलकों से जोरदार विरोध किया गया था. प्रदूषण और स्मॉग की मार झेल रही दिल्ली में मेट्रो पब्लिक ट्रांसपोर्ट का एक अहम साधन है.

अक्टूबर माह में मेट्रो मुसाफिरों की संख्या 24.2 लाख पर आ गई है जो कि सिंतबर में 27.4 लाख थी. 10 अक्टूबर को ही किराया बढ़ाने का फैसला लागू किया गया था. डीएमआरसी की ओर से RTI के जवाब में बताया गया कि सबसे व्यस्त रहने वाली ब्लू लाइन में सफर करने वाले यात्रियों की संख्या में 30 लाख की कमी आई है. साथ ही येलो लाइन पर भी 19 लाख यात्री घटे हैं.

दिल्ली मेट्रो ने बीते 10 अक्टूबर को किराए में बढ़ोतरी का फैसला किया था. बढ़े हुए किराए के बाद अधिकतम किराया 60 रूपए और न्यूनतम किराया 10 रूपए किया गया था. अब मेट्रो में 2 किमी तक सफर करने के लिए 10 रूपए किराया देना होगा. वहीं 2 से 5 किमी तक 15 रुपए की जगह 20 रुपए और 5 से 12 किमी तक 20 रुपए की जगह 30 रुपए खर्च करने होंगे. यहीं नहीं, 12 से 21 किमी तक 30 रुपए की जगह 40 रुपए, 21 से 32 किमी तक 40 रुपए की जगह 50 रुपए का हो गया है. 32 किमी से अधिक सफर करने के लिए 50 रुपए की जगह 60 रूपए किराया देने पड़ रहे हैं.

डीटीसी में भारी कमी के चलती रोजमर्रा में यात्री मेट्रो से सफर करते हैं जिससे उन्हें सड़क जाम और बसों में आने वाली खराबी से भी नहीं जूझना पड़ता था. साथ ही पूरी तरह ऑटोमेटिक होने की वजह से मेट्रो में खराबी और देरी के मामले में कम ही दर्ज होते हैं.

अब किराए में बढ़ोतरी का फैसला मेट्रो के लिए संकट बन गया है. प्रतिदिन अगर इतनी बढ़ी संख्या में यात्री मेट्रो छोड़ अन्य संसाधनों से सफर कर रहे हैं तो इससे न सिर्फ मेट्रो को घाटा होगा बल्कि दिल्ली में प्रदूषण पर नियंत्रण करना भी मुश्किल हो सकता है.

मोहाली में श्रीलंका के खिलाफ अपना अन्तिम मैच खेलेंगे युवराज

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श्रीलंका और भारत के बीच तीन वनडे मैचों की सीरीज का दूसरा मैच मोहाली में खेला जाएगा. यह मुकाबला सिक्सर किंग युवराज सिंह का अन्तिम अन्तरराष्ट्रीय मुकाबला हो सकता है.

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, बीसीसीआई नेहरा के बाद अब युवराज सिंह को भी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से विदाई उनके घरेलू मैदान से देना चाहता है. हालांकि युवराज सिंह अभी संन्यास लेने के मूड में बिलकुल भी नहीं है. वह टीम में अपनी जगह पक्की करने के लिए बेंगलुरु स्थित राष्ट्रीय क्रिकेट अकादमी (एनसीए) में अभ्यास कर रहे हैं. ताकि वह यो-यो टेस्ट पास करके भारतीय टीम मेंं वापसी कर सके. इसके लिए वह रणजी ट्रॉफी के मैच भी नहीं खेल रहे हैं. बीसीसीआई के अधिकारियों के एक वर्ग को युवराज का रणजी ट्रॉफी मैच नहीं खेलकर राष्ट्रीय क्रिकेट अकादमी में फिटनेस ट्रेनिंग करने का फैसला पसंद नहीं आ रहा है.

युवराज अभी तक पंजाब के पांच में से चार रणजी मैचों में नहीं खेले हैं. वह विदर्भ के खिलाफ सिर्फ एक मैच में खेले हैं जिसमें उन्होंने 20 और 42 रन बनाए हैं. बीसीसीआई के कुछ अधिकारी अब राष्ट्रीय क्रिकेट अकादमी (एनसीए) में उनकी मौजूदगी पर सवाल उठा रहे हैं, क्योंकि उन्होंने अभी किसी तरह की चोट के बारे में नहीं बताया है. पता चला है कि युवराज यो यो फिटनेस टेस्ट को पास करने के लिए बेताब हैं जिसमें पहले वह असफल हो गए थे, लेकिन ऐसा प्रतिस्पर्धी मैचों में नहीं खेलकर हो रहा है.

भारतीय टीम में वापसी भी युवराज के लिए जरूरी है, क्योंकि उनके आईपीएल नीलामी पूल में वापसी की उम्मीद है और फे्रचाइजी टीमों के लिए भारतीय टीम से बाहर चल रहे खिलाड़ी को लेना पहला विकल्प नहीं होता. बीसीसीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा कि ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं है कि युवराज रिहैबिलिटेशन कर रहे हैं लेकिन हमें पता चला है कि वह यो यो टेस्ट पास करने के लिए विशेष फिटनेस ट्रेनिंग कर रहे हैं, लेकिन रणजी ट्रॉफी छोडऩा अच्छी चीज है या नहीं, इस पर युवराज को फैसला करना होगा.