



भीमा कोरेगांव आज बहुजन समाज के लिए एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल बन चुका है. लेकिन क्याा आपको मालूम है इसे तीर्थ बनाने में लोगो ने अपने जान की बाजी लगा दी. यह समय था आज से लगभग 200 साल पहले 1818 का. जब कहने को तो शिवाजी के वंश मराठों का शासन था पर दरअसल हुक़ूमत पेशवाओं (चितपावन ब्राम्हपणों) की चलती थी. कहा जाता है कि पेशवाओं ने मनुस्मृ(ति के कानून को लागू कर रखा था. वहां पिछड़ी जाति के लोगों को संपत्ति, वस्त्रम, गहने आदि खरीदने के अधिकार नही था. दुकानदार नये वस्त्रे बेचते समय दलितों के बेचे गये वस्त्रृ बीच से फाड़ दिया करते थे. उनका कहना था ऐसा पेशवा का फरमान है. मनुस्मृेति में दिये गये आदेश के अनुसार अन्य्थे जों ( दलितों) के परछाई से भी परहेज करना था. पेशवओं ने दलितों को अपने पीठ में झाड़ू एवं गले में गड़गा बांधने के लिए मजबूर कर दिया था. मकसद था चलते समय उनके पद चिन्ह़ मिट जाये और उनकी थूक सड़क पर न गिरे. एक खास प्रकार का आवाज़ भी उन्हेन निकालना पड़ता था ताकि सवर्ण यह जान जाये की कोई दलित आ रहा है और वे उनकी परछाई से दूर हो जाये. वह अपवित्र हाने से बचे रहे. बड़ी ही जलालत भरी जिन्दलगी थी उस वक्तस दलितों की. जिससे मानवता भी शर्मशार हो जाये.
इस वक्त अंग्रेज शैने शैने अपने पांव जमा रहे थे. पूणे का कुछ हिस्सा उनके कब्जेत में आ चुका था. शनिवारवाड़ा समेत महत्वंपूर्ण हिस्साप अब भी पेशवाओ के हक में ही था. अंग्रेजो ने महार रेजिमेंट का गठन किया जिसमें अन्यत दलित जातियों के साथ साथ ज्याादातर महार जाति के भी लोग थे. दलितों को अपनी गुलामी से निजात पानी थी. लड़ाई में अंग्रेजो का मकसद तो जगजाहिर था लेकिन दलितो ने इस लड़ाई को अपनी अस्मिता का प्रश्नज बना दिया. 1 जनवरी 1818 को संशाधनो की कमी के बावजूद वे पूर दमखम के साथ लड़े. यह निर्णायक लड़ाई पूणे के पास स्थित कोरेगाव जो भीमा नदी से लगा हुआ था पर हुई. दस्ताावेजी तथ्यप के मुताबिक महार रेजिमेन्ट की ओर से करीब 900 सैनिक एवं पेशवाओं की 25000 फौज आपने सामने लड़ी. जिसमें पेशवाओं की बुरी तरह हार हुई. इस लड़ाई ने पेशवा राज को हमेशा हमेशा के लिए खत्मड कर दिया. जो एक इन्सातन की गुलामी का प्रतीक था. बाद में यहां पर एक स्मायरक बनाया गया है जिसमें महार रेजिमेंट के सैनिको के नाम लिखे है. 1927 में डॉं अंबेडकर के यहां आने के बाद इस स्थाहन को तीर्थ का दर्जा मिल गया.
कुछ सामंतवादी लोग इस घटना को देशद्रोह के नजरिये से देखने की कोशिश करते है. वे कहते है अंग्रेज पूंजीवादियों के साथ मिलकर देशी राजाओं से लड़ना देशद्रोह है. जबकि ये लड़ाई देश से भी ऊपर मानव स्तरर की जिन्द़गी पाने के लिए थी. यहां पर अंग्रेज जो उन्हेअ एक इन्साशन का दर्जा दे रहे थे और उन्हेर सैनिक के रूप में स्वी कार कर रहे थे दूसरी ओर भारतीय राज व्यीवस्थाज उन्हेर पालतू जानवर तक का दर्जा भी देने के लिए तैयार नही थी. क्योी महत्वयपूर्ण है यह लड़ाई?
इस लड़ाई को याद रखा जाना इसलिए जरूरी है, क्यो कि आज महार समुदाय के लोग बहुत तरक्की कर चुके है. ये घटना इस बात को दर्शाती है कि उन्होंजने इस मुकाम को पाने के लिए क्या क्याह नहीं किया. आज तमाम दलित पिछड़ी जातियां जिस मानव निहीत सुविधा के हकदार हैं वे उस महार रेजिमेंट के हमेशा ऋणी रहेगे. और सभी वंचित जातियों को प्रेरणा देते रहेगे. हालांकि बाद में अंग्रेजों ने इसी तर्ज पर चमार रेजिमेंट एवं मेहतर रेजिमेंट का भी गठन किया था. लेकिन जब अन्यि सवर्ण जाति के लड़ाके भर्ती किये जाने लगे तो इन रेजिमेंट को बंद कर दिया गया.
इस लड़ाई के बाद अंग्रेजी शासन ने दलितों के लिए शिक्षा, संपत्ति के द्वार खोल दिये गये. महात्माल फुले पढ़कर निकले, पहली महिला शिक्षिका सावित्र बाई फुले बनी. यानि इस लड़ाई ने पूरे वंचित जातियों को प्रभावित किया. जो समाजिक,आर्थिक,बौध्दिक दृष्टिकोण से मील का पत्थ र साबित हुआ.
संपर्क- sanjeevkhudshah@gmail.com
ऐसा कोई दिन नहीं जाता जिस दिन दलितों के साथ नाइंसाफी की घटना ना होती हो. देश में हर 15वें मिनट में दलित उत्पीड़न की एक वारदात होती है, यानी हर घंटे 4 और 24 घंटे में कुल 96 वारदातें. हर रोज 96 दलितों को मारपीट, गुंडागर्दी, रेप, हिंसा और अपमान का शिकार होना पड़ता है. हर रोज 6 दलित महिलाओं के साथ रेप या गैंगरेप की वारदात को अंजाम दिया जाता है. अगर साल 2017 में दलित उत्पीड़न और हिंसा की घटनाओं की टाइमलाइन बनाई जाए तो 35 हज़ार से ज्यादा वारदातें होंगी जिन्हें शायद आपके लिए पढ़ पाना भी मुश्किल होगा. इसलिए हम हर महीने हुई कुछ प्रमुख वारदातों का जिक्र कर रहे हैं, आप पढ़िये और खुद ही अंदाजा लगा लीजिए कि साल 2017 दलितों के लिए कैसा रहा? अच्छा या बुरा?
जनवरी (2017)
2 जनवरी- यूपी के महाराजगंज में 14 साल की लड़की से घर में घुसकर रेप.
3 जनवरी- राजस्थान के मेड़ता सिटी के टेहला गांव में नवल किशोर खटीक को नीम के पेड़ से बांधकर पीटा गया.
4 जनवरी- लखनऊ में दलित छात्रा की रेप के बाद हत्या, चेहरा जलाकर लाश फेंकी.
5 जनवरी- यूपी के शामली इलाके के हुरमुजपुर गांव में मूली चुराने के आरोप में दलित को गोली मार दी गई.
12 जनवरी- राजस्थान के बूंदी में दलित छात्रा से गैंगरेप हुआ.
13 जनवरी- राजस्थान के झुंझुनूं के झटावा खुर्द गांव में दलित महिला को अगवा कर गैंगरेप की घटना.
14 जनवरी– बिहार के मुजफ्फरपुर में दलित महिला को खाट से बांधकर ज़िंदा जला दिया गया.
30 जनवरी- हरियाणा के मिर्चपुर गांव में दलितों पर फिर से हुए हमले में 9 घायल, 40 दलित परिवारों ने गांव छोड़ा.
फरवरी (2017)
22 फरवरी- झारखंड के पलामू जिले के बिनेका गांव में दलितों के घर जलाए, 2 दलित महिला ज़िंदा जल गई.
27 फरवरी- एमपी के मुरैना में राशन लेने गई दलित महिला को बंधक बनाकर गैंगरेप किया.
मार्च (2017)
3 मार्च- हरियाणा के करनाल के सग्गा गांव में दलित युवक को घुड़चढ़ी से रोका, मारपीट की.
5 मार्च- यूपी के महोबा में छेड़खानी से तंग आकर दलित युवती ने ज़हर खाकर जान दी, पुलिस पर मदद नहीं करने का आरोप.
13 मार्च- जेएनयू के दलित छात्र कृष्णन ने कथित तौर पर खुदकुशी कर ली.
15 मार्च- पंजाब स्थित अंबाला के शहजादपुर गांव में दलितों के भजन गाने पर कंवरपाल नाम के शख्स की हत्या.
20 मार्च- गुजरात विधानसभा के पैनल ने दलितों के लिए अलग श्मशान स्थल बनाने का सुझाव दिया.
अप्रैल (2017)
22 अप्रैल- यूपी में दलितों का फर्जी गांव बसाकर किए गए 100 करोड़ के घोटाले का खुलासा हुआ.
28 अप्रैल- राजस्थान के उदयपुर ज़िले के झालो का ढाणा गांव में दूल्हे कैलाश मेघवाल को अपनी बारात में घोड़ी चढ़ने पर पीटा गया.
मई (2017)
1 मई- एमपी के आगर मालवा में दलितों के इकलौते कुएं में मिट्टी का तेल डाला, क्योंकि चंदर मेघवाल ने बेटी की शादी में बैंड बुलाया था.
5 मई- सहारनपुर के शब्बीरपुर में दलितों पर हमला, 1 की मौत, कई घायल हुए.
7 मई- एमपी के छतरपुर में फूलों से सजी गाड़ी में आने पर दलित दूल्हे की पिटाई.
9 मई- सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस सी एस कर्णन को अवमानना केस में 6 महीने की सज़ा सुनाई.
24 मई- शब्बीरपुर में मायावती के कार्यक्रम से लौट रहे दलितों पर हमला, एक की मौत.
25 मई- कुशीनगर में योगी आदित्यनाथ के दौरे से पहले दलितों को नहाने के लिए साबुन-शैम्पू बांटे गए.
29 मई- सीकर के अजीतगढ़ में दलित युवती को अगवा कर 8 लोगों ने गैंगरेप किया.
जून (2017)
3 जून- हिमाचल के मंडी में नेत्रहीन दलित लड़की से गैंगरेप.
8 जून- भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर रावण को गिरफ्तार किया गया.
11 जून- गुरुग्राम के सरहौल गांव में वॉलिबॉल मैच के दौरान दलितों की टीम पर हमला.
12 जून- यूपी के गोंडा में दलित युवती को दुकान में बंधक बनाकर रेप.
20 जून– कोयंबटूर से जस्टिस कर्णन को गिरफ्तार किया गया.
28 जून- बलिया में 14 साल की दलित लड़की को अगवा कर गैंगरेप.
जुलाई (2017)
3 जुलाई- हरियाणा के जींद जिले के डूमरखां खुर्द गांव में दलितों को हवन में शामिल होने से रोका गया.
18 जुलाई- तमिलनाडु के त्रिची में कथीरसन को सवर्ण लड़की से शादी करने की वजह से मार डाला गया.
18 जुलाई- मायावती ने राज्यसभा से दिया इस्तीफा, उन्हें सदन में बोलने नहीं दिया गया.
अगस्त (2017)
12 अगस्त- गुजरात के आणंद जिले के कासोर गांव में दलित मां-बेटे की पिटाई, नंगा कर गांव में घुमाया.
18 अगस्त- एमपी के सागर जिले के रेंवझा गांव में मजदूरी से मना करने पर दलित महिला की नाक काटी.
21 अगस्त- एमपी के छतरपुर में 6 साल की दलित बच्ची को मैला उठाने के लिए मजबूर किया गया.
22 अगस्त- यूपी के हमीरपुर ज़िले के गदाहा गांव में रामायण पाठ के दौरान दलितों को दूर रहने का नोटिस चिपकाया गया.
सितंबर (2017)
1 सितंबर- सुप्रीम कोर्ट में NEET को चुनौती देने वाली तमिलनाडु की छात्रा अनीता ने फांसी लगाकर जान दे दी.
2 सितंबर- यूपी के बांदा में मवेशी चराने गए 16 साल के कुलदीप को लाठी से पीट-पीटकर मार डाला.
25 सितंबर- गांधीनगर के लिंबोदरा गांव में स्टाइलिश मूंछ रखने पर दलित युवकों की पिटाई की गई.
26 सितंबर- केरल के पहले दलित पुजारी बीजू नारायण को चाकू मारकर घायल किया गया.
अक्टूबर (2017)
1 अक्टूबर- आणंद में गरबा देखने गए जयेश सोलंकी की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई.
2 अक्टूबर- गांधीनगर के पास दलित छात्र की चाकू मारकर हत्या.
14 अक्टूबर- मुरैना जिले के गांव पीपरीपुरा में दलित महिला के शव को श्मशान ले जाने से रोका गया.
16 अक्टूबर- ओडिशा के गंजाम जिले में मंगेतर के साथ मंदिर गई दलित लड़की से गैंगरेप.
17 अक्टूबर- यूपी के शाहजहांपुर में दलित नाबालिग की गैंगरेप के बाद गला रेतकर हत्या कर दी गई.
18 अक्टूबर- बिहार के खगड़िया में महादलितों के 50 से ज़्यादा घरों में लगाई आग लगाई.
20 अक्टूबर- लखनऊ के पास खेतलपुर भंसोली गांव में कूड़े की टोकरी छू जाने पर गर्भवती दलित महिला को पीट-पीटकर मार डाला.
28 अक्टूबर- दलित लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता कांचा इलैया को हैदराबाद में घर में नजरबंद किया.
28 अक्टूबर- एमपी के सतना में बेकसूर दलित को पुलिस ने थाने में 6 दिनों तक थर्ड डिग्री टॉर्चर दिया, ईलाज के दौरान मौत.
नवंबर (2017)
3 नवंबर- चंद्रशेखर को ज़मानत मिलते ही यूपी सरकार ने रासुका लगा दिया.
5 नवंबर- एमपी के भिंड में अपनी मर्जी से वोट डालने पर दलित टीचर को बेरहमी से पीटा.
11 नवंबर- हरियाणा के पलवल में दो दलित युवकों के साथ गुंडागर्दी और मारपीट की.
12 नवंबर- तेलंगाना के अभानगापतनम गांव में दो दलितों की पिटाई, तालाब में ज़बरदस्ती डुबकी लगवाई.
25 नवंबर- मुजफ्फरनगर में ब्याज नहीं देने पर साहूकार ने दलित को लात-घूसों से जमकर पीटा, बंधक बनाकर बनाया वीडियो.
26 नवंबर- AAP नेता कुमार विश्वास ने कहा, एक व्यक्ति आया था जो आरक्षण के नाम पर जातिवाद का बीज बो गया.
दिसंबर (2017)
13 दिसंबर- यूपी के चंदौली में घर में घुसकर 15 साल की दलित लड़की से रेप.
13 दिसंबर- यूपी के सुल्तानपुर में दलित महिला के साथ पड़ोसी युवक ने रेप किया.
15 दिसंबर- केरल में दलित छात्रा से रेप और हत्या के दोषी अमीरुल को मौत की सजा.
20 दिसंबर- मुजफ्फरनगर के लुहारी खुर्द गांव में दलित लड़की और उसके 5 साल के भतीजे की हत्या.
20 दिसंबर- अमेठी के पूरे वर्दहा गांव में पुलिस वालों के सामने दलित का घर तोड़ा, लाठियों से पीटा.
21 दिसंबर- हैदराबाद में दलित युवती को ज़िंदा जलाया, 50 प्रतिशत तक जली लड़की अस्पताल में भर्ती है.
ये तो वो वारदातें हैं जो सामने आ गई, ना जाने कितने अनगिनत मामले हैं जो रिपोर्ट ही नहीं होते. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक 2016 में भारत में दलित उत्पीड़न के 40,801 मामले दर्ज हुए. 2015 में ऐसे कुल 38,670 मामले दर्ज किये गए थे. 2007-2017 यानी 10 सालों में दलित उत्पीड़न के मामलों में 66 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. सबसे ज्यादा वारदातें यूपी, बिहार, राजस्थान, मध्यप्रदेश और गुजरात जैसे बीजेपी शासित प्रदेशों में होती हैं.
मैं उम्मीद करता हूं साल 2018 दलितों और वंचित तबके के लिए मंगलमय होगा.
अयोध्या। पूर्वांचल के सबसे बड़े महाविद्यालय और भाजपा एवं संघ की रामनगरी अयोध्या में बहुजन समाज पार्टी समर्थित बहुजन छात्र दल ने अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद पर कब्जा कर प्रदेश की राजनीति में सबको चौंका दिया है. के. एस साकेत पीजी कॉलेज, अयोध्या में हुए छात्र संघ चुनाव में बहुजन छात्र दल ने प्रमुख दोनों पद जीत लिए. अध्यक्ष पद पर राजेश वर्मा ने जीत हासिल की है. उन्होंने समाजवादी छात्र सभा की नेहा कुमारी को हराया, जबकि मनोज कुमार ने उपाध्यक्ष पद जीता.
बहुजन समाज के इस छात्र संगठन की इस जीत और संघ और भाजपा के छात्र संगठन की हार को उत्तर प्रदेश की राजनीति में बसपा के बढ़ते प्रभाव और भाजपा के गिरते ग्राफ के रूप में भी देखा जा रहा है. इस चुनाव में मजेदार बात यह रही की चुनाव परिणाम घोषित होने के वक्त भाजपा के नेता जीत की उम्मीद लिए कॉलेज में पहुंच गए थे, लेकिन हार के बाद उन्हें बड़ा झटका लगा और वो निराश हो बैरंग लौट गए. इस जीत में बसपा के फैजाबाद के जोन कोर्डिनेटर मोहम्मद असद ने काफी मेहनत की थी. वो लगातार छात्रों के संपर्क में रहे और उन्हें बेहतर तरीके से चुनाव लड़ने की रणनीति बनाने में भी मदद की.
इस चुनाव की खास बात यह भी रही कि बहुजन छात्र दल ने यह सीट एबीवीपी के कब्जे से छीन ली है. गौरतलब है कि इस साल तमाम विश्वविद्यालयों के छात्र संघ चुनाव में आरएसएस-भाजपा के छात्र संगठन एबीवीपी को लगातार हार मिली है. इलाहाबाद विश्वविद्यालय, काशी विद्यापीठ, वाराणसी और मेरठ के कॉलेजों में हुए छात्रसंघ चुनाव में एबीवीपी को हार का सामना करना पड़ा है. तो वहीं जेएनयू, दिल्ली विश्वविद्यालय और यहां तक की गुजरात सेंट्रल युनिवर्सिटी में भी एबीवीपी को पराजय झेलना पड़ा था.
चेन्नई। भारतीय फिल्म जगत के शानदार सितारे और तमिल सुपरस्टार रजनीकांत ने राजनीति में आने की घोषणा कर दी है. साल के आखिरी दिन अपने प्रशंसकों औऱ समर्थकों से मुलाकात के बाद उन्होंने श्री राघवेंद्र कल्याण मंडपम में इसकी घोषणा की. सुपरस्टार ने कहा, ‘मेरा राजनीति में आना तय है. मैं अब राजनीति में आ रहा हूं. यह आज की सबसे बड़ी जरूरत है.’ साल 2017 के आखिरी दिन रजनीकांत द्वारा की गई घोषणा इस साल की सबसे बड़ी राजनीतिक हलचल है.
उन्होंने कहा है कि वह राजनीति में एंट्री कर रहे हैं. उन्होंने अपनी नई पार्टी बनाने की घोषणा के साथ चुनाव लड़ने की भी जानकारी दी. उन्होंने घोषणा की कि अगले विधानसभा चुनावों में वह राज्य की सभी विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करेंगे. रजनीकांत ने कहा, ‘मेरी पार्टी के तीन मंत्र होंगे, सच्चाई, मेहनत और विकास’.
उन्होंने कहा, ‘राजनीति की दशा काफी खराब हो गई है. सारे राज्य हमारा मजाक बना रहे हैं. अगर मैं राजनीति में नहीं आता हूं तो यह लोगों के साथ धोखा होगा.’ रजनीकांत ने आगे कहा कि आज राजनीति के नाम पर नेता हमसे हमारा पैसा लूट रहे हैं और अब इस राजनीति को जड़ से बदलने की जरूरत है. दक्षिण भारत के जाने-माने फिल्म अभिनेता ने कहा, ‘जहां भी सत्ता का दुरुपोयग होगा, मैं उसके खिलाफ खड़ा रहूंगा. उन्होंने कहा कि आज चारों ओर भ्रष्टाचार है और राजनीति का सिर्फ नाटक हो रहा है.
गुजरात। गुजरात चुनाव में मुश्किल से मिली जीत के बाद भाजपा की सरकार तो बन गई है, लेकिन मंत्रालयों को लेकर खिंचतान ने मुश्किल बढ़ा दी है. पाटीदारों को अपने पाले में रखने के लिए पार्टी ने कद्दावर नेता नितिन पटेल को उपमुख्यमंत्री तो बना दिया है, लेकिन उन्हें ढंग का मंत्रालय नहीं दे रहे हैं. इससे नाराज नितिन पटेल ने अभी तक अपना कार्यभार ग्रहण नहीं किया है.
पटेल की नाराजगी की खबरों के बीच पाटीदार आंदोलन के प्रमुख नेता हार्दिक पटेल ने नितिन पटेल को एक बड़ा ऑफर दे दिया है. हार्दिक ने कहा है कि अगर नितिन पटेल 10 विधायकों के साथ बीजेपी छोड़ने के लिए तैयार हैं तो वो कांग्रेस से उनके लिए बात कर सकते हैं. हार्दिक पटेल ने यह भी कहा कि अगर बीजेपी उनकी इज्जत नहीं करती है तो उन्हें तुरंत पार्टी छोड़ देना चाहिए, वो कांग्रेस में नितिन पटेल को सम्मानजनक जगह दिलवाएंगे.
खबर है कि नितिन पटेल वित्त मंत्रालय न मिलने से नाराज हैं. पटेल इतने ज्यादा नाराज हैं कि वह गुरुवार को हुए कैबिनेट की पहली बैठक में भी शामिल नहीं हुए. बाद में मुख्यमंत्री विजय रुपाणी उनको मनाने के लिए घर गए. फिलहाल दोनों पक्षों के बीच अभी दबाव का खेल जारी है. तो वहीं नितिन पटेल के घर पर उनके समर्थकों की भीड़ लगी है. पटेल के समर्थक विधायक भी उनके घर पहुंच कर अपना समर्थन जता चुके हैं. अगर भाजपा ने इस लड़ाई को जल्दी नहीं सुलझाया तो पटेल ने इस्तीफे की धमकी दे डाली है. ऐसे में कहीं उन्होंने हार्दिक पटेल के प्रस्ताव पर विचार कर लिया तो गुजरात में भाजपा की सत्ता उलट सकती है. हालांकि फिलहाल इसकी संभावना नहीं दिख रही है लेकिन राजनीति में कब क्या हो जाए कोई नहीं कह सकता.
बॉलीवुड के सुपरस्टार सलमान खान की फिल्म’ टाइगर जिंदा है बॉक्सो ऑफिस पर शानदार कमाई कर रही है. फिल्म् ने 200 करोड़ से ज्यािदा कमाई कर चुकी हैं. वहीं इस फिल्म का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से एक खास कनेक्शन है. इस बात का खुलासा खुद फिल्मह के डायरेक्ट र अली अब्बा स जफर ने किया है. दरअसल फिल्मे की कहानी 2014 के बंधक बचाव अभियान से प्रेरित है जिसमें भारत ने इराक में इस्ला मिक स्टेफट के कब्जे से 46 नर्सों को बचाया था. उस समय केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार आ गई थी.
इस मामले में सरकार ने काफी तेजी दिखाई थी और भारत सभी नर्सों को सेफली वापस लाने में सफल रहा था. हाल ही एक इंटरव्यूर के दरान अली अब्बा स जफर ने बताया, हम प्रधानमंत्री के इस फैसले से काफी प्रभावित हुए थे. फिल्मा के बचाव अभियान के दौरान परेश रावल का किरदार, टाइगर (सलमान खान) से सवाल करता है, क्या पीएम साहब को इस मिशन की खबर है? जबकि फिल्मं में पहले रीयल डायलॉग था क्यास मोदी जा को पता है?
जफर के अनुसार, ये मोदी जी और इस मिशन का सम्मायन देने के लिए रखा गया था, लेकिन फिल्मल पूरी तरह से काल्प निक है, इसलिए सेंसर बोर्ड ने हमें मोदी जी का नाम बदलकर पीएम साहब करने को कहा गया. हमने भी उनके फैसले पर सहमोति दी क्यों कि हम बचाव अभियान की वास्त्विक जानकारी नहीं दे रहे थे. सलमान ने 27 दिसंबर को अपना जन्मादिन पनवेल फार्महाउस में सेलीब्रेट किया. वहीं सलमान ने टाइगर जिंदा है कि सक्सेिस की वजह कैटरीना कैफ को बताया. जब सलमान से पूछा गया कि उन्हेंस कैटरीना ने क्यास गिफ्ट किया. सलमान ने इसका जवाब देते हुए कहा, उन्हों ने मुझे सबसे बड़ा गिफ्ट दिया है टाइगर जिंदा है की सक्सेकस.
गुजरात। गुजरात के नव निर्वाचित मुख्यमंत्री विजय रूपाणी और उपमुख्यमंत्री नितिन पटेल के बीच अनबन की खबरों को देखते हुए पाटीदार नेता हार्दिक पटेल ने नितिन पटेल को अपने साथ शामिल होने का न्योता दिया है. उन्होंने ने कहा है कि अगर बीजेपी में नितिन पटेल का सम्मान नहीं हो रहा है, तो वे बीजेपी को छोड़ कर कांग्रेस को ज्वाइन कर सकते हैं.
हार्दिक पटेल कहा है कि वे नितिन पटेल के लिए कांग्रेस पार्टी से बात करेंगे ताकि उन्हें सही जगह मिले और उनके साख पर कोई सवाल ना उठे. हार्दिक ने बताया, ‘अगर नितिन भाई 10 विधायकों के संग बीजेपी छोड़ने को तैयार हो जाते हैं, तो हम कांग्रेस में उन्हें उपयुक्त पद देने की बात करेंगे.
आपको बता दें कि गुजरात में सरकार बनने के महज तीन दिन बाद ही मुख्यमंत्री विजय रूपाणी और उपमुख्यमंत्री नितिन पटेल के बीच अनबन की खबर आने लगी. साथ ही वहां के विधायक भी अपनी नाराजगी जताने लगे हैं. लगातार छठी बार गुजरात में सरकार बनाने वाली भारतीय जनता पार्टी की इस सरकार में शीर्ष दो नेताओं के बीच अनबन का सबसे अहम कारण विभागों के बंटवारे को लेकर माना जा रहा है.
वहीं नितिन पटेल की नाराजगी पर सीएम विजय रूपाणी ने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया है. अहमदाबाद नगर निगम द्वारा आयोजित फूलों की प्रदर्शनी के उद्घाटन के दौरान जब उनसे विभागों के बंटवारों को लेकर नितिन पटेल की नाराजगी के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने जबाव नहीं दिया और मुस्कुराते हुए बोले कि उनसे फिलहाल फूलों की प्रदर्शनी से जुड़ा सवाल पूछा जाना चाहिए.

नई दिल्ली। संसद में गुरुवार 28 दिसंबर को तीन तलाक बिल पास होने के साथ ही इस मुद्दे पर लोगों की प्रतिक्रियाओं की बाढ़ सी आ गई. इस मुद्दे पर आम और खास सबने अपनी राय रखी. कुछ लोगों ने इस फैसले का जोरदार स्वागत किया तो कईयों का नजरिया सरकार से अलग रहा. इसी तरह तीन तलाक के मुद्दे पर जानी-मानी लेखिका तस्लीमा नसरीन के कमेंट से बवाल हो गया. तस्लीमा के ट्विट के बाद ट्विटर पर बहस चल पड़ी.
असल में तीन तलाक बिल के पास होने पर तस्लीमा नसरीन ने अलग ही प्रतिक्रिया दी जो लोगों को हजम नहीं हो रही है. तस्लीमा ने ट्वीट कर भारत सरकार पर ताना मारा है. तस्लीमा ने ट्वीट में लिखा “अगर भारत में तीन तलाक खत्म करने में 80 वर्षों का समय लगता है तो मुझे अंदाजा नहीं कि देश में स्त्री विरोधी तमाम रीति रिवाजों को खत्म करने के लिए कितने हजार वर्ष और लगेंगे. इस पर भारत सरकार की तरफ से तो नहीं, लेकिन ट्विटर पर बैठे लोगों ने तस्लीमा को घेरना शुरू कर दिया. एक जनाब ने तो यहां तक लिखा कि यह बात केवल इस्लाम पर ही लागू होती है, क्योंकि अन्य धर्मों में सुधार कार्य समय पर हो रहे हैं.

वैसे तो बामसेफ के कई धड़े सक्रिय हैं, लेकिन वामन मेश्राम और बी.डी बोरकर ग्रुप की चर्चा ज्यादा होती है. मेश्राम धड़े के बामसेफ से जहां दूसरे और तीसरे दर्जे के सरकारी नौकरीपेशा बड़ी संख्या में जुड़े हैं तो बी. डी बोरकर के बारे में माना जाता है कि इस ग्रुप के सदस्यों में अधिकारी और प्रोफेसर एवं वकील जैसे बुद्धिजीवियों की संख्या अधिक है. हालांकि दोनों पक्षों के राजनैतिक दल बनाने के बाद अब बामसेफ को लेकर कई तरह के सवाल उठने लगे हैं.

इसकी जायज वजह भी है. बामसेफ के एक धड़े वामन मेश्राम द्वारा तकरीबन दो वर्ष पहले ही भारत मुक्ति मोर्चा नाम से राजनीतिक पार्टी बनाने के बाद अब बामसेफ के बोरकर ग्रुप के पूर्व अध्यक्ष बी.डी. बोरकर ने भी राजनीति में उतरने का ऐलान कर दिया है. बोरकर ने 27 दिसंबर को नागपुर में अपने करीबियों के साथ आयोजित बैठक के बाद राजनीतिक दल की घोषणा कर दी. पार्टी का नाम पीपल्स पार्टी ऑफ इंडिया होगा.
पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बी.डी. बोरकर होंगे, जबकि उपाध्यक्ष मनीषा बांगर और सुप्रीम कोर्ट के वकील के. एस. चौहान होंगे. इसके अलावा 15 लोगों की एग्जीक्यूटिव कमेटी भी बनाई गई है. बोरकर की तरह ही मनीषा बांगर और के.एस चौहान दोनों लंबे समय से बामसेफ से जुड़े रहे हैं. तो वहीं पार्टी के अन्य प्रमुख सदस्य भी बामसेफ के सदस्य हैं. बावजूद इसके बी.डी. बोरकर इसे बामसेफ द्वारा बनाई गई राजनीतिक पार्टी कहने से इंकार कर रहे हैं. लेकिन बामसेफ के राष्ट्रीय अधिवेशन में बामसेफ के मंच से इस पार्टी की घोषणा करने से बोरकर के दावे झूठे साबित हो रहे हैं.

पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बी.डी. बोरकर ने भी वामन मेश्राम की तरह फुले-अम्बेडकराईट मूवमेंट की राजनीति करने की बात कही. वामन मेश्राम और उनकी राजनीतिक पार्टी का जिक्र करने पर बोरकर का कहना था कि मेश्राम की पार्टी एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमती है. राजनीतिक दल बनाने की जरूरत पर बोरकर कहते हैं कि यूपी को छोड़कर देश के मूलनिवासी ब्राह्मणवादी पार्टियों को वोट कर रहे हैं, इसलिए हमें राजनीति में आना पड़ा. फिलहाल राजनीतिक अखाड़े में उतरने से इंकार करते हुए उनका कहना है कि वो पार्टी के संगठन को मजबूत करेंगे. बोरकर की रणनीति शुरुआती दौर में लोगों को पार्टी से जोड़ने की है. शुरुआती दौर में वह यूपी. एमपी, बिहार और महाराष्ट्र में पार्टी का विस्तार करेंगे.
हालांकि बोरकर के राजनीतिक दल बनाने से बामसेफ से जुड़े तमाम बौद्धिक लोगों में हचलच मच गई है. ऐसे तमाम लोग जो बामसेफ को सामाजिक आंदोलन की आवाज मानते थे उन्हें झटका लगा है. देश के प्रख्यात चिंतक प्रो. विवेक कुमार कहते हैं कि पीपुल्स पार्टी ऑफ इंडिया के बनने से ऐसा प्रतीत होता है कि बहुजन समाज आत्मनिर्भर सामाजिक आंदोलन से अनाथ हो गया है. देखना होगा कि यह नया राजनैतिक दल सच में काम करता है या फिर अम्बेडकरवाद का दंभ भरने वाले कुछ अन्य राजनैतिक दलों की तरह गुमनामी में खो जाएगा.
एक संभावना यह भी है कि जिस तरह कांशीराम के सक्रिय राजनीति में आने के बाद उनको समर्थन देने वाले सरकारी कर्मचारी और अधिकारी सैडो बामसेफ के रूप में काम करने लगे, उसी तरह कहीं ये दोनों ग्रुप भी अब अपने राजनीतिक दल के साथ सैडो रूप में काम न करने लगें. यह सवाल इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि दोनों धड़ों का आधार वही लोग हैं, जो बामसेफ में उनके साथ काफी समय से सक्रिय हैं. तो क्या अब बामसेफ का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा?
हाल में उत्तर प्रदेश की योगी सरकार द्वारा यूपीकोका अर्थात उत्तर प्रदेश संगठित अपराध नियंत्रण विधेयक- 2017 लाया गया है जो कि आतंकवाद विरोधी कानून (विधि विरुद्ध क्रिया-कलाप निवारण अधिनियम-1967) से भी कठोर है. इसमें पुलिस को इस प्रकार की शक्तियां दी गयी हैं जो कि आज तक किसी भी कानून में नहीं दी गयी हैं. योगी सरकार ने इसे बड़ी चालाकी से विधान सभा के पटल पर रखा और अगले दिन ही इसे ध्वनी मत से पारित भी करा दिया.
अधिकतर विधायकों तथा विरोधी पक्ष के सदस्यों तक को इसे उपलब्ध नहीं कराया गया. इस कारण अधिकतर विधायक इसके लोकतंत्र तथा मानवाधिकार विरोधी प्राविधानों के बारे में जान तक नहीं सके और वे उस पर कोई चर्चा तथा आपत्ति भी नहीं उठा पाएं. इसके अभाव में विपक्ष केवल इसके विपक्षीगण तथा दलितों एवं मुसलामानों के विरुद्ध दुरूपयोग की बात करता रहा और इसके कठोर प्रावधानों और पुलिस को बहुत शक्तियां दिए जाने की बात नहीं उठा सका. यही स्थिति प्रेस की भी रही. वह केवल सरकार के संगठित अपराध पर नियंत्रण पाने के दावे तथा विपक्ष द्वारा अपने विरुद्ध दुरूपयोग के आरोप की ही बात करता रहा. किसी ने भी इस कानून के कठोर प्रावधानों तथा पुलिस को दी जा रही असीमित शक्तियों पर कोई चर्चा नहीं की तथा आपत्ति नहीं उठाई.
फिलहाल यह बिल विधान सभा से पास हो कर विधान परिषद् को भेजा गया है जिसे सलेक्ट कमेटी को संदर्भित कर दिया गया है. यदि यह किसी तरह वहां से भी पास हो जाता है तो फिर यह राष्ट्रपति को स्वीकृति के लिए भेजा जायेगा जहाँ पर इसे स्वीकृति मिल जाने की पूरी सम्भावना है. यह ज्ञातव्य है कि जो मायावती इस समय इसका विरोध कर रही हैं उसी मायावती ने अपने शासनकाल में 2008 में इसे विधान सभा और विधान परिषद् से पास कराकर कर राष्ट्रपति के पास भेजा था परन्तु वहां पर इसे स्वीकृति नहीं मिल पायी थी. वर्तमान में विपक्ष द्वारा इस बिल का सही और जोरदार ढंग से विरोध नहीं किया गया जिस कारण यह विधान सभा में बड़ी आसानी से पास हो गया. विपक्ष केवल इसके विपक्षीगण, दलितों और मुसलामानों के विरुद्ध दुरूपयोग की बात करता रहा परन्तु बिल के अति कठोर प्राविधानों और पुलिस को दी जा रही असीमित शक्तियों की बात नहीं उठा सका जिस कारण भाजपा के लिए उनका प्रतिकार करना बहुत आसान रहा.
वास्तव में इस कानून के कठोर प्रावधान जिनका दुरूपयोग होने की पूरी सम्भावना है; हमारी चिंता का मुख्य विषय होना चाहिए. इस कानून के अंतर्गत सबसे कड़ा प्रावधान यह है कि इसकी धारा 28 (2) में सीआरपीसी की धारा 167 जिसमें न्यायालय को गिरफ्तार व्यक्ति को अपराध की प्रकृति के अनुसार 15 दिन, 60 दिन तथा 90 दिन तक जेल (न्यायिक हिरासत) में रखने के अधिकार को बढ़ा कर 60, 180 तथा 365 दिन कर दिया गया है. इसका अर्थ यह है कि यदि कोई व्यक्ति इस कानून के अंतर्गत गिरफ्तार किया जाता है तो उसे एक वर्ष तक अदालत में मुकदमा शुरू होने से पहले जेल में रहना पड़ सकता है, जबकि सामान्य कानून के अंतर्गत यह अवधि अधिकतम 90 दिन ही थी. इसके मुकाबले में आतंकवाद विरोधी कानून के अंतर्गत यह अवधि क्रमशः 30, 60 तथा 90 दिन ही है.
इस प्रकार गिरफ्तार व्यक्ति को जेल में रखने के मामले में यूपीकोका के प्रावधान अधिक कठोर हैं. यह अवधि मकोका (महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम-1999 ) से भी अधिक है क्योंकि उसमे जेल कस्टडी की अधितम अवधि 90 दिन ही है. अब अगर यूपीकोका के अंतर्गत आरोपी व्यक्ति मुकदमे में छूट भी जाता है तो उसे विवेचना के दौरान 365 दिन तक जेल में रहना पड़ सकता है. यह सर्वविदित है कि पुलिस बहुत से मामलों में निर्दोष व्यक्तियों को गिरफ्तार करके जेल में डाल देती है जहाँ उन्हें इस कानून के अंतर्गत लम्बे समय तक जेल में रहना पड़ सकता है.
इस कानून का ऐसा ही दूसरा कड़ा प्रावधान पुलिस रिमांड को लेकर है. वर्तमान में सामान्य अपराधों में पुलिस को अधिकतम रिमांड 15 दिन तक ही मिल सकता है जबकि इस कानून की धारा 28(3)(क) में इसे बढ़ा कर 60 दिन कर दिया गया है. इसके विपरीत आतंकवाद विरोधी कानून में पुलिस रिमांड की अधिकतम अवधि 15 दिन की ही है. पुलिस रिमांड की यह अवधि मकोका की 15 दिन की अवधि के मुकाबले में काफी अधिक है. यह सर्वविदित है कि पुलिस रिमांड के दौरान पुलिस हिरासत में गिरफ्तारशुदा व्यक्तियों का उत्पीड़न (टार्चर) किया जाता है जिस कारण कई बार उस व्यक्ति की मौत तक हो जाती है.
हमारे देश में पुलिस हिरासत में टार्चर की शिकायतें बहुत अधिक होती हैं तथा पुलिस कस्टडी में मौतों की संख्या भी बहुत अधिक है. वैसे भी उत्तर प्रदेश पुलिस मानवाधिकार हनन के मामलों में देश में अव्वल है जैसा कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आंकड़ों से स्पष्ट है. इसके अनुसार 2013-14 से 2015-16 के दौरान पूरे देश में से 44% शिकायतें अकेले उत्तरप्रदेश से थीं. इसी माह 10 दिसंबर को अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस के अवसर पर उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग ने भी कहा है कि मानवाधिकार हनन की 67% शिकायतें पुलिस के विरुद्ध हैं. अब यूपीकोका के अंतर्गत पुलिस रिमांड की अवधि को 15 दिन से बढ़ा कर 60 दिन करना पुलिस को टार्चर के लिए खुली छूट देना है.
इतना ही नहीं इस कानून की धारा 33 (तीन) में जेल में निरुद्ध व्यक्ति से मुलाकात की प्रक्रिया को भी कठिन कर दिया गया है. इसके अनुसार जेल बंदी से मुलाकात जिलाधिकारी की पूर्वानुमति से ही हो सकेगी और वह भी हफ्ते में अधिकतम दो बार ही. इसी प्रकार इस कानून की धारा 28(4) के अंतर्गत आरोपी को किसी भी न्यायालय से अग्रिम जमानत नहीं मिल सकेगी. इस कानून की धारा 3 (ख) और 5 में यह प्रावधान किया गया है कि न्यायालय इस कानून के अंतर्गत किसी मामले में अदालती कार्रवाही प्रकाशित करने पर प्रतिबंध लगा सकता है जिसका उलंघन करने पर सम्बंधित व्यक्ति को 1 माह की सजा तथा 1 हज़ार रूपये का जुर्माना तक हो सकता है. इस प्रकार यह कानून प्रेस की अभिव्यक्ति की आज़ादी को भी प्रतिबंधित करता है. इसी प्रकार इस कानून में किसी व्यक्ति के एक मामले में दण्डित होने के बाद दूसरे मामले में बढ़ी हुयी सजा दिए जाने का भी प्राविधान है.
उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि यद्यपि यूपीकोका संगठित अपराध को कम करने में कुछ हद तक उपयोगी हो सकता है परन्तु इसमें विवेचना के दौरान आरोपी को सामान्य अपराध में अधिकतम 90 दिन की बजाये एक साल तक जेल में रखने तथा पुलिस रिमांड की अवधि 15 दिन से बढ़ा कर 60 दिन किया जाना मानवाधिकारों के हनन और टार्चर को बढ़ावा देना है. इस कानून के कई प्रावधान आतंकवाद विरोधी कानून तथा मकोका से भी कड़े हैं जिनके दुरूपयोग की पूरी सम्भावना है.
नई दिल्ली। 29 दिसंबर 1942 को अमृतसर में पैदा हुए बॉलीवुड के पहले सुपर स्टार और सबके दिलों में राज करने वाले राजेश खन्ना का आज 75वां जन्मदिन मनाया जा रहा है. हिंदी सिनेमा का एक ऐसा कलाकार जिसने बताया की सुपरस्टार क्या होता है, उसका अंदाज़ क्या होता है. इस सुपर स्टॉर ने बॉलीवुड को समझाया कि डांस और डाइलॉग डिलीवरी क्या होती है. लडकियां उनके लिए इस कदर दीवानी थीं कि वो अपने खून से उनको लव लेटर भेजा करती थीं. कहीं लडकियां तो इनकी तस्वीर अपनी तकिये के नीचे रख कर सोती थी, ताकि राजेश खन्ना उनके सपनो में आएं. आलम ये था कि उनकी गाड़ी अगर रेड लाइट पे रूकती थी तो लड़कियां उनकी गाडी को चुम-चुम कर लिपस्टिकों से उसका रंग बदल देती थीं. प्यार से सब उन्हें ‘काका’ बुलाते थे.
राजेश खन्ना ने अपने करियर की शुरुआत फिल्म आखिरी खत से की और इस फिल्म की गोल्डन जुबली कामयाबी ने उन्हें स्टार बना दिया था. इसके बाद आयी उनकी फिल्म आराधना से उनका सुपर स्टार का सफर शुरू हुआ. फिर क्या था, इसके बाद तो उन्होंने एक के बाद एक आनंद, अमर प्रेम, दो रास्ते , आप की कसम जैसी 15 सुपरहिट फिल्मों की झड़ी लगा दी. आज भी ये रिकॉर्ड इन्ही के नाम दर्ज है. राजेश खन्ना के लिए कहा जाता था “ऊपर आका और नीचे काका”. कोई स्टार इनके स्टारडम के आसपास भी नहीं था.

इनका इन्तेकाल जुलाई 2012 को मुंबई में हुआ था. दुनिया से अलविदा होने से पहले उन्होंने कहा था- “हवा बदल सकती है… मगर फैंस हमेशा मेरे रहेंगे”. हमारे दिलों पर वो ऐसी छाप छोड़ गए हैं जिससे हम कभी नहीं मिटा सकते.
गाजियाबाद। भाजपा नेता द्वारा संविधान के खिलाफ दिए बयान से गुस्साए दलित समाज के युवकों ने आज शुक्रवार को एक कार्यक्रम से केंद्रीय रामदास अठावले को वापस लौटने पर मजबूर कर दिया. अठावले को गाजियाबाद के इंदिरापुरम शक्तिखंड 2 में एक कार्यक्रम में भाग लेने आए थे, जहां से विरोध के कारण उन्हें वापस लौटना पड़ा.
गाजियाबाद के इंदिरापुरम इलाके में दलित समाज का एक प्रोग्राम हो रहा था. इस कार्यक्रम में केन्द्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास आठवले भी भाग लेने पहुंचे थे. वहीं कार्यक्रम के बीच में जमकर हंगामा हुआ. युवा शक्ति दल के युवाओं ने अठावले का जमकर विरोध किया. युवा शक्ति दल बीजेपी नेताओं द्वारा संविधान को बदलने की बात पर अठावले का विरोध कर रहे थे. साथ ही प्रदर्शन कर रहे युवाओं ने कार्यक्रम करा रहे आयोजकों को भी दलित विरोधी बताया. कार्यक्रम में राखी सावंत को भी आना था लेकिन वह नहीं आईं.
नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी के नेता और केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े के संविधान बदलने संबंधी बयान के बाद उठा तूफान शांत होता नहीं दिख रहा है. इसको लेकर राजनीतिक हलकों में जमकर हंगामा मचा है. इस बयान को लेकर मचे बवाल में अब बसपा प्रमुख मायावती भी उतर गई हैं. हालांकि मायावती ने भाजपा के साथ-साथ कांग्रेस को भी कठघरे में खड़ा किया है.
अपने बयान में बसपा अध्यक्ष मायावती ने कहा कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली बी.जे.पी./आर.एस.एस. की सरकार संविधान की मंशा के खिलाफ काम करके इसको फेल साबित करने का षड्यन्त्र लगातार कर रही है और संविधान को बदलने की नीयत रखती है. लेकिन कांग्रेस पार्टी को इस पर सवाल उठाने का नैतिक अधिकार नहीं है.
मायावती ने आरोप लगाया कि संविधान के पवित्र उद्देश्यों को फेल करने के मामले में कांग्रेस व बी.जे.पी. चोर-चोर मौसेरे भाई हैं? कांग्रेस पर निशाना साधते हुए मायावती ने कहा कि कांग्रेस पार्टी को जवाब देना चाहिए कि बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर को सन् 1951 में देश के प्रथम कानून मंत्री के पद से क्यों इस्तीफा देना पड़ा था? कांग्रेस यह भी बताये कि उसने डॉ. अम्बेडकर को ‘‘भारत रत्न‘‘ से क्यों नहीं सम्मानित किया था?
भाजपा पर सवाल खड़ा करते हुए मायावती ने कहा कि बी.जे.पी. एण्ड कम्पनी भी बताये कि दलितों व ओ.बी.सी. वर्ग के शिक्षा व नौकरी के क्षेत्र में आरक्षण की व्यवस्था को निष्क्रिय व निष्प्रभावी बनाकर इन वर्गों के लोगों को बड़ी संख्या में वंचित व बेरोजगार बनाकर क्यों रखा है? संविधान के प्रति प्रतिबद्धता दिखाते हुए मायावती ने दावा किया कि बहुजन समाज पार्टी बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के मानवतावादी संविधान की रक्षा व उसकी पवित्रता को बनाये रखने के लिए जी-जान लगा देंगे, संविधान की रक्षा के लिए बसपा अपना सब कुछ कुर्बान करने को तैयार हैं.

मुंबई। मुंबई के लोअर परेल के कमला मिल कंपाउंड के ‘मोजोस लाउंज’ में भीषण आग की वजह से 14 लोगों की मौत हो गई है. आशंका जताई जा रही है कि रेस्टोरेंट में आग शॉर्ट सर्किट की वज़ह से लगी. घायलों को KEM अस्पताल और ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया है. मृतकों का पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर राजेश डेरे ने बताया कि सभी मृतकों की मौत दम घुटने से हुई है.
घटना देर रात 12:30 बजे के क़रीब की है. सबसे पहले कंपाउंड के 2 रेस्टोरेंट में लगी. देखते ही देखते आग ने भीषण रूप ले लिया. आग इतनी भीषण थी कि दमकल की 8 गाड़ियों और 6 वाटर टैंक को आग पर क़ाबू पाने में 2 घंटे से ज़्यादा का समय लग गया. जिस समय आग लगी, उस समय लगभग 50 लोग रेस्टोरेंट में मौजूद थे. कमला मिल कंपाउंड में कई कॉरपोरेट दफ़्तरों के अलावा कई न्यूज़ चैनलों के दफ़्तर भी हैं. आग की वजह से उनका प्रसारण भी रोक दिया गया है.

वहीं, इस हादसे के दौरान पब में मौजूद सुलभा अरोरा ने बताया कि, “आग लगते ही पब में भगदड़ मच गई. लोगों ने मुझे धक्का दिया और मुझे कुचल कर बाहर निकल गए. कई लोगों की लाशें पब के फ्लोर पर पड़ी थीं. लोग बस बाहर निकलना चाहते थे. इस हादसे पे राष्ट्रपति कोविंद और प्रधानमंत्री मोदी सहित तमाम मंत्रियों और नेताओं ने भी दुख जताया है.
नई दिल्ली। लोकसभा में तकरीबन पांच घंटे तक चली लंबी बहस के बाद आखिरकार गुरुवार को ऐतिहासिक मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक-2017 पास हो गया. इसके बाद किसी भी स्वरूप में दिया गया तीन तलाक, वह चाहें मौखिक हो या लिखित हो और या फिर मैसेज के जरिए हो, अवैध होगा. आईए जानते हैं कि तीन तलाक देने वालों के साथ अब क्या सलूक होगा और प्रस्तावित बिल कैसा है?
ऐसा है प्रस्तावित बिल – एक साथ तीन बार तलाक (बोलकर, लिखकर या ईमेल, एसएमएस और व्हाट्सएप जैसे इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से) कहना गैरकानूनी होगा.
– ऐसा करने वाले पति को तीन साल के कारावास की सजा हो सकती है. यह गैर-जमानती और संज्ञेय अपराध माना जाएगा.
– यह कानून सिर्फ ‘तलाक ए बिद्दत’ यानी एक साथ तीन बार तलाक बोलने पर लागू होगा.
– तलाक की पीड़िता अपने और नाबालिग बच्चों के लिए गुजारा भत्ता मांगने के लिए मजिस्ट्रेट से अपील कर सकेगी.
– पीड़ित महिला मजिस्ट्रेट से नाबालिग बच्चों के संरक्षण का भी अनुरोध कर सकती है. मजिस्ट्रेट इस मुद्दे पर अंतिम फैसला करेंगे.
– यह प्रस्तावित कानून जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में लागू होगा है.
नई दिल्ली। लोकसभा में तकरीबन पांच घंटे तक चली लंबी बहस के बाद आखिरकार गुरुवार को ऐतिहासिक मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक-2017 पास हो गया. मोदी सरकार ‘मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक-2017’ नाम से इस विधेयक को लाई है. ये कानून सिर्फ तीन तलाक (INSTANT TALAQ, यानी तलाक-ए-बिद्दत) पर ही लागू होगा. इस कानून के बाद कोई भी मुस्लिम पुरुष अगर अपनी बीबी को तीन तलाक देगा, तो वो गैर-कानूनी होगा.
इसके बाद से किसी भी स्वरूप में दिया गया तीन तलाक, वह चाहें मौखिक हो या लिखित हो और या फिर मैसेज के जरिए हो, अवैध होगा. जो भी तीन तलाक देगा, उसको तीन साल की सजा और जुर्माना हो सकता है यानी तीन तलाक देना गैर-जमानती और संज्ञेय (Cognizable) अपराध होगा. इस बिल के पास होने से मुस्लिम महिलाओं को काफी सहूलियत मिलेगी. यह बिल देश की नौ करोड़ मुस्लिम महिलाओं की जिंदगी से जुड़ा हुआ बिल था. करीब चार महीने पहले सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच ने बहुमत से तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया था. साथ ही सरकार से मामले में कानून बनाने को कहा था, जिसके बाद आज कानून भी बन गया.
गुरुवार को सबसे पहले केंद्र सरकार ने लोकसभा में मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक-2017 पेश किया. कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने बिल पेश किया. उन्होंने कहा कि इस बिल का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है. और न ही सरकार शरीयत में दखल देने के लिए तीन तलाक बिल लाई हैं. इसका मकसद सिर्फ तीन तलाक को रोकना है. पाकिस्तान सहित कई मुस्लिम देशों में भी तीन तलाक पर रोक है.
लोकसभा में बहस के दौरान RJD, BJD और सपा समेत कई विपक्षी पार्टियों ने इस बिल का विरोध किया. इन पार्टियों ने बिल में सजा के प्रावधान को गलत बताते हुए इसका कड़ा विरोध किया. लोकसभा में बिल पर बहस का मुद्दा ही सजा का प्रावधान रहा. इसके बाद विपक्षी दलों की ओर से मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक-2017 पर पेश किए गए संशोधन प्रस्तावों पर वोटिंग हुई.
हालांकि वोटिंग के दौरान सभी संशोधन प्रस्ताव गिर गए और लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने इस बिल के पास होने की घोषणा कर दी. इस दौरान कांग्रेस ने कहा कि सिर्फ मोदी सरकार ही इस बिल को पास कराने का श्रेय नहीं ले सकती है. कांग्रेस समेत किसी भी विपक्षी दल ने इस बिल का विरोध नहीं किया. कांग्रेस ने बिल को सिर्फ स्थायी समिति के पास भेजने की बात कही थी.
ज्यादा मुसलमानों को जेल में डालने के लिए बनाया जा रहा कानूनः ओवैसी
लोकसभा में तीन तलाक बिल पर बहस के दौरान AIMIM प्रमुख असादुद्दीन ओवैसी ने मोदी सरकार पर कई आरोप लगाए. उन्होंने कहा कि मोदी सरकार इस बिल के जरिए न सिर्फ पर्सनल लॉ में दखल दे रही है, बल्कि ज्यादा से ज्यादा मुसलमानों को जेल में डालने का सपना देख रही. ओवैसी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ तीन तलाक ही नहीं, बल्कि सभी तरह के तलाक को खत्म करने की बात कही थी. उन्होंने कहा कि किसी भी मुस्लिम देश में तलाक को लेकर दंड संहिता नहीं है. इसके तहत सजा का प्रावधान नहीं किया जा सकता है. शौहर से बीबी की सभी जरूरतों को पूरा करने के लिए जबरदस्ती नहीं की जा सकती है.
गौरतलब है कि तलाक होने की स्थिति में मजिस्ट्रेट तय करेगा कि कितना जुर्माना होगा. पीएम नरेंद्र मोदी ने तीन तलाक पर कानून बनाने के लिए एक मंत्री समूह बनाया था, जिसमें राजनाथ सिंह, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, रविशंकर प्रसाद, पीपी चौधरी और जितेंद्र सिंह शामिल थे.
ऐसा है प्रस्तावित बिल
– एक साथ तीन बार तलाक (बोलकर, लिखकर या ईमेल, एसएमएस और व्हाट्सएप जैसे इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से) कहना गैरकानूनी होगा.
– ऐसा करने वाले पति को तीन साल के कारावास की सजा हो सकती है. यह गैर-जमानती और संज्ञेय अपराध माना जाएगा.
– यह कानून सिर्फ ‘तलाक ए बिद्दत’ यानी एक साथ तीन बार तलाक बोलने पर लागू होगा.
– तलाक की पीड़िता अपने और नाबालिग बच्चों के लिए गुजारा भत्ता मांगने के लिए मजिस्ट्रेट से अपील कर सकेगी.
– पीड़ित महिला मजिस्ट्रेट से नाबालिग बच्चों के संरक्षण का भी अनुरोध कर सकती है. मजिस्ट्रेट इस मुद्दे पर अंतिम फैसला करेंगे.
– यह प्रस्तावित कानून जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में लागू होगा है.
नई दिल्ली। शतरंज के चैंपियन विश्वनाथन आनंद ने 2013 वर्ल्ड चैंपियनशिप में हार का बदला ले लिया है. 48 साल के आनंद ने रियाद में जारी वर्ल्ड रैपिड चेस चैंपियनिशप में वर्ल्ड नंबर-1 मैग्नस कार्लसन को मात दी. चैंपियनशिप के 9वें राउंड में दोनों के बीच मुकाबला हुआ.
आनंद ने काले मुहरों के साथ आक्रामक शुरुआत की, जिसका उन्हें मानसिक तौर फायदा मिला. आनंद की चाल से 27 साल के कार्लसन दबाव में चले गए. मुकाबला 34 चालों तक चला. अच्छी बात यह है कि यहां खेले गए 9 मुकाबलों में आनंद अब तक अविजित रहे हैं. इनमें से उन्होंने 5 मुकाबले अपने नाम किए, जबकि 4 ड्रॉ रहे. गौरतलब है कि पूर्व वर्ल्ड नंबर-1 ने 2013 में कार्लसन के हाथों अपनी बादशाहत गंवा दी थी. हालांकि नॉर्वे के इस चैंपियन को आनंद ने 2014 में मात दी थी.
नई दिल्ली। अमिताभ फिल्म इंडस्ट्री के ऐसे इकलौते अभिनेता हैं, जो अपनी उम्र को मात देकर लगातार आज भी फिल्मों में व्यस्त हैं. वह उतनी ही फिल्में कर रहे हैं जितनी आज के सुपरस्टार कर रहे हैं. इन दिनों वो ‘ठग्स ऑफ हिन्दोस्तान’ और ‘102 नॉट आउट’ जैसी फिल्मों की शूटिंग में बिजी हैं. लेकिन उनके कंधे का पुराना जख्म एक बार फिर से हरा हो जाने के कारण वह ‘असहनीय पीड़ा’ से गुजर रहे हैं.
यह जानकारी 75 वर्षीय अभिनेता ने अपने ब्लॉग में दी है. उन्होंने कहा है कि एक फिल्म के सेट पर कुछ भारी वजन उठा लेने के बाद हाल ही में उनका पुराना जख्म फिर से उभर आए. बच्चन इस समय दवा ले रहे हैं और अपने जख्म पर बर्फ की सिकाई कर रहे हैं. 26 दिसंबर को अमिताभ अपने पूरे परिवार के साथ विराट कोहली और अनुष्का शर्मा की रिसेप्शन पार्टी में शामिल हुए थे. इस दौरान भी उनके हाथों पर बेल्ट लगा हुआ था.

जयपुर में 23 से 25 दिसम्बर 2017 तक तीन दिनों तक आयोजित हुए भीम बिजनेस एक्सपो ने बहुजन समाज के लोगों में आर्थिक स्वावलंबन तथा व्यावसायिक चेतना की एक नई उमंग पैदा कर दी है. अन्य व्यापार मेलों से यह बिजनेस एक्सपो काफ़ी अलग साबित हुआ. इसमें आये लोग सिर्फ आर्थिक आज़ादी की ही बात नहीं कर रहे थे, बल्कि सदाचार और नैतिकता पर आधारित सम्यक व्यापार की अवधारणा को भी हृदयंगम कर रहे थे.
इस आयोजन के संयोजक बहुजन चिंतक एवं लेखक डॉ. एम एल परिहार का मानना है कि गौतम बुद्ध और बाबा साहब अम्बेडकर के अर्थ चिंतन को साकार करने की दिशा में भीम बिजनेस एक्सपो एक महत्वपूर्ण कदम था. उनका कहना है कि- ‘गौतम बुद्ध ने भूख और दरिद्रता को सबसे बड़ा रोग कहा था, जो सब बुराइयों की जड़ है और इससे निजात पाने की पूरी कोशिश जरूरी है. इसी तरह बाबा साहेब अम्बेडकर का भी विचार था कि उपेक्षित वंचित समाज के लोग उद्यमी बनें और आर्थिक रूप से सम्पन्न हों, क्योंकि आर्थिक समृद्धि के बिना हमारा कोई उद्धार नहीं है. उनका सपना था कि वंचित तबके के लोग आर्थिक रूप से सक्षम बनें और देश में सामाजिक एवं आर्थिक गैर बराबरी खत्म हो.’
डॉ. परिहार मानते हैं कि भीम बिजनेस एक्सपो बुद्ध और बाबा साहेब के विचारों की दिशा में आगे बढ़ा है और बहुजन समाज के लोगों के मध्य व्यापार वाणिज्य की चेतना जगाने का प्रयास हुआ है. भीम बिजनेस एक्सपो में वैश्विक स्तर के उत्पादों की प्रदर्शनियां लगाई गईं, यहां आये उद्यमियों का लगभग सारा माल बिक गया, ज्वैलरी, गारमेंट्स, हैंडीक्राफ्ट, होम डेकॉर, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, डेयरी, खाद्य और एग्रीबिजनेस सहित कई तरह के उद्यमों की स्टॉल्स लगी. हर स्टॉल पर पूरे वक्त लोगों की मौजूदगी उत्साहित करने वाली थी. लोगों ने उम्मीद से बढ़कर इस तीन दिवसीय आर्थिक महोत्सव में भाग लिया.
दलित वंचित समाज के उधमियों के लिए देश में यह पहला मौका था, जिसमें उन्हें अपने बिजनेस को दिखाने तथा प्रमोट करने का मंच मिला. इस अवसर का सभी उद्यमियों ने भरपूर लाभ लिया और वे आपस में भी बिजनेस को आगे बढ़ाने के लिए चर्चा करते हुए दिखे. भीम बिजनेस एक्सपो राजस्थान की राजधानी जयपुर में अम्बेडकर सर्कल के पास ऐसे स्थान पर हुआ, जहां पर लगभग सारे ही बड़े बड़े कॉमर्शियल एक्सपो आयोजित होते हैं. इस दौरान भी चारों तरफ कई अन्य व्यापार मेले भी लगे हुए थे,मगर यह साफ तौर पर देखा गया कि उन एक्सपो से अधिक भीड़ भीम बिजनेस एक्सपो में थी. दूसरे व्यापार मेलों में लोग सिर्फ खरीददारी करके निकल रहे थे, जबकि भीम बिजनेस एक्सपो में बिजनेस के साथ-साथ सामाजिक चिंतन भी चलता रहा, लोगों ने भारी मात्रा में बहुजन साहित्य खरीदा, विभिन्न विषयों की सेमीनार में शिरकत की और सक्रिय भागीदारी निभाई.
हर दृष्टि से भीम बिजनेस एक्सपो स्वयं में अनूठा आयोजन था और अन्य व्यापार मेलों से अत्यंत अलग भी. इसका प्रारम्भ किसी स्थापित राजनेता या नौकर शाह ने नहीं किया, बल्कि समाज के लिए उद्यमिता के क्षेत्र में आदर्श बन चुके सफल उद्यमियों के हाथों हुआ. बुद्ध, बाबा साहेब और भारतीय संविधान की तस्वीर के सामने दीप प्रज्वलित कर इसकी शुरूआत की गई. कोई तामझाम नहीं, कोई माला साफा नहीं, कोई बड़ा नहीं, कोई छोटा नहीं. जो भी मेले में आये, सब लोग इस अनूठे आयोजन के मुख्य अतिथि थे. सबने सामूहिक रूप से भीम बिजनेस एक्सपो का उदघाटन किया.
भीम बिजनेस एक्सपो में कई महत्त्वपूर्ण लोगों की गरिमामय उपस्थिति भी उल्लेखनीय हैं. इनमें सूक्ष्म लघु मध्यम उद्योग मंत्रालय दिल्ली के निदेशक बी पी सिंह, डायवर्सिटी विशेषज्ञ बृजपाल भारती, दूरदर्शन अल्मोड़ा के निदेशक अशोक सचान, स्टील मोंट के संस्थापक भारत के पहले दलित अरबपति पदमश्री राजेश सरैया के पिता नथाराम सरैया, मार्शल कंपनी के मालिक आर के सिंह, सुप्रसिद्ध बहुजन चिंतक डॉ चंद्रभान प्रसाद तथा बजट विशेषज्ञ उमेश बाबू सहित राजस्थान के कईं प्रशासनिक अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और उद्यमी मौजूद रहे. इतना ही नहीं बल्कि स्विट्जरलैंड से आये रिसर्च स्कॉलर विनीत भी पूरे समय भीम बिज़नेस एक्सपो के भागीदार बने. इस दौरान देश के प्रतिष्ठित 7 नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज और जिंदल यूनिवर्सिटी सोनीपत के तकरीबन 40 स्टूडेंट्स भी आये. उन्होंने सारे बहुजन उद्योगपतियों से मुलाकात कर उनकी कहानियों को लिखा. ग़ौरतलब है कि ये स्टूडेंट्स मानव अधिकार संगठन पीयूसीएल में इंटर्नशिप कर रहे हैं.
इस एक्सपो की सबसे ख़ास बात यह रही कि सुबह से शाम तक सेमीनार हॉल खचाखच भरा रहता था, जिसमें उद्योग शुरू करने तथा उद्योग को फैलाने के लिए सरकार की योजनाओं, प्रक्योर मेन्ट पॉलिसी, जीएसटी, सेल्स टैक्स, बैंक लोन, बजट आदि से जुड़े विषयों पर व्याख्यान विशेषज्ञों द्वारा दिये गये, जिन्हें देश भर से आये सहभागियों ने मनोयोग से सुना और कई सवाल भी किए. इस दौरान युवाओं ने नौकरी की बजाय बिजनेस की ओर अपना रुझान बताया.
इस आयोजन के मुख्य संकल्पनाकार डॉ. एम. एल परिहार के सहयोगी के रूप में असीम के डॉक्टर्स की टीम का योगदान भी अविस्मरणीय कहा जा सकता है. भीम बिजनेस एक्सपो का समापन 25 दिसम्बर को था. 90 साल पहले इसी दिन 25 दिसम्बर 1927 को बाबा साहब ने महाड़ में मनुस्मृति को जलाया था. भीम बिजनेस एक्सपो का समापन “प्रबुद्ध बहुजन-समृद्ध बहुजन” के एक संकल्प प्रस्ताव के साथ हुआ कि हम आर्थिक रुप से मजबूत बनेंगे.