जानिए, संतों में क्यों सर्वश्रेष्ठ थे संत रविदास

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गुरु रविदास का जन्म बनारस के नजदीक मांडुर गढ़ (महुआडीह) नामक स्थान पर हुआ था. मध्यकालीन संतों, जिसमें तुकाराम, नरसी-दादू, मेहता, गुरूनानक, कबीर, चोखा मेला,पीपादास आदि शामिल है, इन सन्तों में सदगुरू रैदास का स्थान श्रेष्ठ है. इसी कारण उनको संत शिरोमणि भी कहा जाता है. ये चमार जाति में पैदा हुए. गुरुग्रंथ साहिब में संकलित रविदास के पदों में उनकी जाति चमार होने का उल्लेख बार-बार आया है. गुरु रविदास जी के पिता का नाम संतोख दास और करमा देवी था.

चेतना, जन आन्दोलन, समतामूलक समाज की परिकल्पना, मानव सेवा आदि क्रान्तिकारी परिवर्तन के लिए सन्त शिरोमणि रैदास का नाम बड़े आदर तथा सम्मान के साथ लिया जाता है. रैदास सामाजिक सुधार के लिए जीवन पर्यन्त जूझते तथा रचनात्मक प्रयत्न करते रहे. सामाजिक समानता, समरसता लाने के लिए वो अपनी वाणियों के माध्यम से तत्कालीन शासकों को भी सचेत करते रहे. घृणा और सामाजिक प्रताड़नाओं के बीच सन्त रैदास ने टकराहट और भेदभाव मिटाकर प्रेम तथा एकता का संदेश दिया. उन्होंने जो उपदेश दिये दूसरों के कल्याण व भलाई के लिए दिये और उनकी चाहत एक ऐसा समाज की थी जिसमें राग, द्वेष, ईर्ष्या, दुख, कुटिलता का समावेश न हो.

संत शिरोमणि रैदास कहते हैं:-

ऐसा चाहूं राज्य मैं, जहां मिलै सबन को अन्न। छोट, बड़ों सभ सम बसै, रैदास रहे प्रसन्न।।

वैचारिक क्रान्ति के प्रणेता सदगुरू रैदास की एक वैज्ञानिक सोच हैं, जो सभी की प्रसन्नता में अपनी प्रसन्नता देखते हैं. स्वराज ऐसा होना चाहिए कि किसी को किसी भी प्रकार का कोई कष्ट न हो, एक साम्यवादी, समाजवादी व्यवस्था का निर्धारण हो इसके प्रबल समर्थक संत रैदास जी माने जाते हैं. उनका मानना था कि देश, समाज और व्यक्ति की पराधीनता से उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है. पराधीनता से व्यक्ति की सोच संकुचित हो जाती है. संकुचित विजन रखने वाला व्यक्ति बहुजन हिताय- बहुजन सुखाय की यथार्थ को व्यवहारिक रूप प्रदान नहीं कर सकता है. वह पराधीनता को हेय दृष्टि से देखते थे और उनका मानना था कि तत्कालीन समाज व लोगों को पराधीनता से मुक्ति का प्रयास करना चाहिए.

सन्त रैदास के मन में समाज में व्याप्त कुरीतियों के प्रति आक्रोश था. वह सामाजिक कुरीतियों, वाह्य आडम्बर एवं रूढ़ियों के खिलाफ एक क्रान्तिकारी परिवर्तन की मांग करते थे. उनका स्पष्ट मानना था कि जब तक समाज में वैज्ञानिक सोच पैदा नहीं होगी, वैचारिक विमर्श नहीं होगा. और जब तक यथार्थ की व्यवहारिक पहल नहीं होगी, तब तक इंसान पराधीनता से मुक्ति नहीं पा सकता है.

उन्होंने कर्म प्रधान संविधान को अपने जीवन में सार्थक किया. सन्त रैदास ने सामाजिक परम्परागत ढांचे को ध्वस्त करने का प्रयास किया. रैदास कहते हैं:-

रविदास ब्राह्मण मत पूजिए, जेऊ होवे गुणहीन। पूजहिं चरण चंडाल के जेऊ होवें गुण परवीन।।

इस वैज्ञानिक विचारधारा से तत्कालीन प्रभाव से समाज को मुक्ति मिली और आज भी इस विचारधारा का लाभ समाज को मिलता दिखाई दे रहा है. बल्कि 21वीं सदी में इसकी सार्थकता और भी बढ़ गयी है. समाज सुधार की आधारशिला व्यक्ति का सुधार है. सबसे पहले व्यक्ति को नैतिक दृष्टि से सीमाओं से ऊपर उठकर विवेक, बुद्धि आदि इस्तेमाल करना चाहिए, तभी समाज उन्नत हो सकेगा. व्यक्तिगत सद्चरित्रता, स्वच्छता तथा सरलता पर ध्यान देना चाहिए.

अपनी क्रान्तिकारी वैचारिक अवधारणा, सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना तथा युग बोध की मार्मिक अभिव्यक्ति के कारण उनका धम्म दर्शन लगभग 600 वर्ष बाद आज भी प्रासंगिक है. सन्त रैदास अपने समय से बहुत आगे थे. वह समतामूलक समाज की कल्पना करते थे और मानते थे कि यह तभी संभव है जब सभी के सुख-दुःख का ख्याल रखा जाए. अज्ञानता के कारण प्रभाव स्थापित करने में लोग विभेद करते हैं. रैदास कहते हैं कि सभी जन एक ही मिट्टी के बने हैं और सभी के लिए ज्ञान का मार्ग खुला हुआ है.

संत रविदास जी को मीरा बाई के आध्यात्मिक गुरु के रुप में भी जाना जाता है जो कि राजस्थान के राजा की पुत्री और चित्तौड़ की रानी थी. वो संत रविदास के अध्यापन से बेहद प्रभावित थी और उनकी बहुत बड़ी अनुयायी बनी. सिक्ख धर्मग्रंथ में उनके पद, भक्ति गीत और दूसरे लेखन (41 पद) आदि दिये गये थे. गुरु ग्रंथ साहिब जो कि पांचवें सिक्ख गुरु अर्जन देव द्वारा संकलित की गयी. सामान्यत: रविदास जी के अध्यापन के अनुयायी को रविदासिया कहा जाता है और रविदासिया के समूह को अध्यापन को रविदासीया पंथ कहा जाता है.

 

“साहित्य साहित्यकारों की नहीं, जनता की कमाई है”

जयपुर। में तीन साहित्यिक आयोजन हुए.जयपुर लिट् फेस्ट, पैरेलल लिट् फेस्ट और जन साहित्य पर्व यानी जनसा. इस तीसरे में शामिल होने का मौका मिला.वहां एक अजीबोग़रीब घटना हुई.

एक सत्र सिनेमा पर था. संजय जोशी और हिमांशु पांड्या इसे संचालित कर रहे थे. इसमें इकतारा कलेक्टिव की एक अद्भुत फ़िल्म तुरुप दिखाई गई.यह एक कथा फिल्म है, जिसमें अधिकतर कलाकार ग़ैरपेशेवर थे. लव ज़िहाद के झगड़े को छूती हुई गज़ब की ग्रिपिंग फ़िल्म है. कहीं रिलीज़ नहीं होगी. खोज कर देखिएगा.

फ़िल्म देखकर वहां मौज़ूद सैकड़ो लोग स्तब्ध थे. लेकिन इसके बाद जो हुआ वो कम सिनेमैटिक नहीं था. संजय जोशी ने हमारे ऑडियो विज़ुअल जमाने में प्रतिरोध और और प्रगति के माध्यम के रूप में सिनेमा के बढ़ते महत्व के बारे में बताया. लेकिन यह नया सिनेमा बॉलीवुड से नहीं, एकतारा कलेक्टिव और प्रतिरोध के सिनेमा जैसे जनसिनेमा आंदोलनों से ही आ सकता है. इनके पास नए विषय हैं, नई आग है, लेकिन पैसा नहीं है.

पैसेवाले पैसा देंगे तो पैसा पैसा वसूलेंगे भी. जनता का सिनेमा और जनता के साहित्यिक पर्व तो जनता के पैसे ही चलेंगे. फिर उन्होंने दर्शकों से पूछा, क्या आप अपनी खस्ता जेबों से इसके लिए पैसा निकालेंगे. फिर लोगों के सामने अपना गमछा फैला दिया. पांच मिनट के भीतर तीन हज़ार रुपए इकट्ठे हो गए.

पता चला कि जनसा का पूरा आयोजन ऐसे ही चंदे के बल पर हुआ. दो दिन के इस आयोजन में जसम और जलेस समेत 24 संगठन शामिल थे, लेकिन सारे आंदोलनकारी संगठन, जिनके पास कोई स्थायी फंड नहीं होता. न वे किसी फण्डदाता से पैसे लेते हैं.

जनसहयोग से आयोजन करने की जिद का लाभ यह हुआ कि किसी छीन्यूज़ के अहसान नहीं उठाने पड़े. किसी सेठ के नाम सत्र नीलाम करने नहीं पड़े. अपठनीय किताबों पर चर्चा नहीं करनी पड़ी.

हर समय दो से तीन सौ प्रतिभागियों की मौजूदगी रही.लेखकों,पाठकों,रंगकर्मियों, सिनेकर्मियों और चित्रकारों के अलावा हिमांशु कुमार, अरुणा राय, अमर राम, भंवर मेघवंशी , कविता कृष्णपल्लवी और कविता कृष्णन जैसे कर्मकर्ताओं और गांव गांव तक जन साहित्य पहुंचाने की कसम खाए जमीनी प्रकाशकों की सक्रिय भागीदारी रही. युवाओं की उत्सुक फौज़ जिस तिस को पकड़ कर अपने सवालों से उलझाती रही.

तब समझ में आया कि आयोजकों ने इसे लिट् फेस्ट का नाम क्यों नहीं दिया. यह फेस्ट नहीं पर्व था. पर्व साधना का निमित्त होता है, जश्न और मार्केटिंग का नहीं. जनसा पर्व वाले जोर देकर कहते थे कि वे किसी अन्य आयोजन के न विरोधी हैं, न समानांतर हैं.

वे तो बस इतना रेखांकित करना चाहते हैं कि साहित्य साहित्यकारों, प्रकाशकों और मार्केटमानुषों की नहीं, जनता की कमाई है.

आशुतोष कुमार    

पाकिस्तान को करारी शिकस्त दे कर, भारतीय टीम ने फाइनल में जगह बनाई

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नई दिल्ली। आईसीसी अंडर-19 वर्ल्ड कप के दूसरे सेमीफइनल में भारत ने पाकिस्तान पर धमाकेदार जीत दर्ज करते हुए अंडर-19 वर्ल्ड कप के फाइनल में जगह बना ली है और इसके साथ ही अब भारत का मुकाबला ऑस्ट्रेलिया से होगा आपको बता दें कि उस मुकाबले में भारत ने अपने आईसीसी अंडर-19 वर्ल्ड कप के विजय अभियान की शुरुआत अपने पहले ही मैच में आस्ट्रेलिया को हरा कर की थी इस मुकाबले में ऑस्ट्रेलिया को धुल चटाते हुए 100 रनो की करारी शिकस्त  दी थी ऐसे में फाइनल मुकाबले के लिए अब भारतीय टीम का मनोबल और ज़्यादा बढ़ गया है.

भारतीय गेंदबाज़ो ने पाकिस्‍तान की कमर तोड़ कर रख दी. खास तौर से ईशान ने, चार विकेट लेकर उन्होंने पाकिस्तान तो संभलने तक का मौका ही नहीं दिया. शिवा सिंह, रियान की जोड़ी ने भी कमाला दिखाया. दोनों ने दो-दो विकेट अपने नाम किए. वहीं अंकुर और अभिषेक को भी एक-एक विकेट मिला. पाकिस्तान की टीम कुल 69 रन पर सिमट गई. पाकिस्तान का कोई भी बल्लेबाज 20 रन के आंकड़े तक भी नहीं पहुंच पाया और आने-जाने का सिलसिला चलता रहा.पाकिस्तान की पूरी टीम सिर्फ 29.3 ओवर में ही 69 रन पर ऑल आउट हो गई. इस से पहले भारतीय टीम ने बल्लेबाजी करते हुए पाकिस्तान को 273 रनों का लक्ष्य दिया था. टीम इंडिया ने 9 विकेट खो कर 272 रन बनाए. भारत की तरफ से शुभमन गिल ने नाबाद रहते हुए शानदार 102 रनों की पारी खेली इसके अलावा पृथ्वी शॉ ने 41 रन बनाए. जबकि मनजोत कालरा ने 47 रन बनाए.

टीम इंडिया इससे पहले ये खिताब 3 बार अपने नाम कर चुकी है. आपको बता दें कि ये छठी बार है, जब भारतीय टीम अंडर-19 वर्ल्ड कप के फाइनल मुकाबले में पहुंची है. पिछले साल भी भारतीय टीम फाइनल में पहुंची थी. भारत अब फाइनल में ऑस्ट्रेलिया से 3 फरवरी (शनिवार) को भिड़ेगा. भारतीय समयानुसार यह मैच सुबह 6.30 शुरू होगा.

   

बजट के पहले आम आदमी के मतलब से जुड़ी ये 12 बातें जानिए

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नई दिल्ली। एक फरवरी को सरकार देश का आम बजट पेश करेगी. आमतौर पर देश के मतदाताओं को बजट के मायने समझ नहीं आते. आम भाषा में कहें तो ‘सर के उपर से’ गुजर जाते हैं. बजट में सरकार ने क्या कहा, यह सिर्फ चुनिंदा बड़े लोगों, अर्थशास्त्र के जानकारों और चार्टर्ड एकाउंटेंट के ही समझ में आता है. लेकिन कुछ बातें ऐसी भी होती हैं, जिनका आम आदमी का समझना काफी जरूरी है. हम यहां आपको कुछ ऐसी ही चीजों को बारे में बताएंगे ताकि यह बजट आपके लिए सर के उपर से गुजरने वाली एक घटना बनकर न रह जाए.

फाइनेंसियल इयर: इसका मतलब वित्तीय साल होता है, जो कि 1 अप्रैल से शुरू होकर 31 मार्च तक चलता है.

Assessee: ऐसा व्यक्ति जो इनकम टैक्स एक्ट के तहत टैक्स भरने के लिए उत्तरदायी होता है. डायरेक्ट टैक्स: यह वह टैक्स होता है, जो किसी भी व्यक्ति व संस्थान की कमाई और उसके स्रोत पर लगता है. इनकम टैक्स, कॉरपोरेट टैक्स, कैपिटल गेन टैक्स और इनहेरिटेंस टैक्स इस कैटेगरी में आते हैं.

इन डायरेक्ट टैक्स: यह टैक्स उत्पादित वस्तुओं पर लगने वाला टैक्स होता है. इसके अलावा यह टैक्स आयात-निर्यात वाले सामान पर उत्पाद शुल्क, सीमा शुल्क और सेवा शुल्कट के रूप में भी लगाया जाता है.

कैपिटल असेट्स: जब कोई व्यक्ति किसी चीज में निवेश करता है या फिर खरीदारी करता है तो इस रकम से खरीदी गई प्रॉपर्टी कैपिटल एसेट कहलाती है. यह बॉन्ड, शेयर मार्केट और रॉ मैटेरियल में से कुछ भी हो सकता है.

एकजेंप्शन (Exemption): टैक्स देने वाले देश के आम लोगों की वह आमदनी जो टैक्स के दायरे में नहीं आती. यानी जिस पर कोई टैक्स नहीं लगता.

Assessment Year: यह कर निर्धारण का साल होता है, जो किसी वित्तीय साल का अगला साल होता है. जैसे 1 अप्रैल 2015 से 31 मार्च 2016 अगर वित्तीय वर्ष है तो कर निर्धारण वर्ष 1 अप्रैल 2016 से 31 मार्च 2017 तक होगा.

Finance Bill: इस विधेयक के माध्यम से ही आम बजट पेश करते हुए वित्तमंत्री सरकारी आमदनी बढ़ाने के विचार से नए करों आदि का प्रस्ताव करते हैं. इसके साथ ही वित्त विधेयक में मौजूदा कर प्रणाली में किसी तरह का संशोधन आदि को प्रस्तावित किया जाता है. संसद की मंजूरी मिलने के बाद ही इसे लागू किया जाता है.

जीटीपी (GDP): इसी को सकल घरेलू उत्पाद कहते हैं. यह एक वित्त वर्ष के दौरान देश के भीतर कुल वस्तुओं के उत्पादन और देश में दी जाने वाली सेवाओं का टोटल होता है.

बजट डेफिसिट (Budget deficit): जब खर्चा सरकार के राजस्व से ज्यादा हो जाता है, उस स्थि‍ति को बजट घाटा कहते हैं.

एक्साइज ड्यूटी: एक्साइज ड्यूटी अथवा उत्पाद शुल्क वह शुल्क होता है, जो देश के भीतर बनने वाले उत्पादों पर लगाया जाता है. यह कस्टम ड्यूटी से अलग होता है.

कस्टम ड्यूटी: कस्टम ड्यूटी देश के बाहर से आने वाले उत्पादों पर लगाया जाता है. यह उत्पाद के प्रोडक्शन और खरीद पर लगता है.

बैलैंस बजट: जब सरकार का राजस्व मौजूदा खर्च के बराबर होता है, तो उसे बैलेंस बजट का नाम दिया जाता है. डिस इनवेसमेंट (Disinvestment): जब सरकार द्वारा संचालित किसी कंपनी या संस्थान की हिस्सेदारी बेची जाती है, तो उसे विनिवेश कहा जाता है. इसका मतलब ये है कि सरकार अपने अधिकार वाली कंपनी में से हिस्सेदारी निजी कंपनियों या व्यक्ति को बेच देती है.

गोली लगने के बाद क्या ‘हे राम’ बोले थे गांधी

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नई दिल्ली। राजघाट स्थित गांधी की समाधी पर एक शब्द लिखा हुआ है ‘हे राम’. मान जाता है कि गांधीजी ने दम तोड़ने से पहले आखिरी शब्द यही कहा था. लेकिन अब इस किवदंती को लेकर सवाल उठने लगे हैं. आज 30 जनवरी को गांधीजी की 70वीं पुण्यतिथि के दौरान भी यह बात फिर से चर्चा में आई है कि आखिर गांधीजी ने आखिरी शब्द के रूप में ‘हे राम’ बोला था या नहीं?

कहा जाता है कि गोली लगने के बाद जब बापू गिरे तो यह शब्द उनके पास चल रही उनकी पोती आभा ने सुने थे. लेकिन बापू के निजी सचिव वेंकिता कल्याणम की राय अलग है. उनका कहना है, ‘मरते वक्त गांधी ने ‘हे राम’ नहीं कहा था. वास्तव में जब नाथूराम गोडसे ने उनके सीने में गोली दागी तो उन्होंने कोई भी शब्द नहीं कहा था.’ कल्याणम का दावा है कि 30 जनवरी 1948 को नई दिल्ली के तीन मूर्ति इलाके में महात्मा गांधी को गोली मारी गई तो उस वक्त वह उनके ठीक पीछे मौजूद थे.

एक किताब ‘महात्मा गांधी: ब्रह्मचर्य के प्रयोग’ में भी बापू के अंतिम शब्द ‘हे राम’ पर बहस की गई है. इस किताब में दावा किया कि 30 जनवरी, 1948 को जब नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी को गोली मारी थी तो बापू के सबसे करीब मनु गांधी थीं. उन्होंने बापू का अंतिम शब्द’हे रा…’ सुनाई दिया था. इसी आधार पर यह मान लिया गया कि उनके आखिरी शब्द ‘हे राम’ ही थे.

जबकि उस दिन घटना स्थल पर मौजूद रहने वाले ऑल इंडिया रेडियो के रिपोर्टर केडी मदान की राय अलग है. गांधीजी की प्रार्थना सभा को’कवर’ करने मदान बिड़ला भवन रोज जाते थे. मदान ने कुछ साल पहले बताया था कि मैंने तो ‘हे राम’ कहते नहीं सुना था. साथ ही मदान ने यह भी कहा कि ‘पर यह एक किवदंती है और इसे किवदंती ही रहने देना चाहिए.

   

भाजपा का रास्ता रोकने अब कर्नाटक चलें मेवाणी

गुजरात चुनाव में भाजपा के खिलाफ दलित वोटरों को एकजुट करने के बाद जिग्नेश मेवाणी का अगला निशाना अब कर्नाटक चुनाव है. कांग्रेस के सहयोग से निर्दलीय विधायक चुने गए मेवाणी ने कहा है कि अब वह कर्नाटक जाएंगे जहां वह भाजपा को हराने के लिए दलित वोटरों को इकट्ठा करेंगे. कर्नाटक में 20 प्रतिशत दलित वोटर हैं.

जिग्नेश मेवाणी ने कहा है कि वह यह बात को सुनिश्चित करेंगे कि कर्नाटक में बीजेपी को 20 वोट भी न मिलें. मेवाणी का अप्रैल में दो हफ्तों के लिए कर्नाटक का दौरा करने का कार्यक्रम है. मेवाणी ने यह भ कहा कि सभी प्रमुख दलों को साथ आना चाहिए ताकि चड्ढीधारी न जीत पाएं.

हालांकि जिग्नेश मेवाणी के एक के बाद एक दौरों को लेकर सवाल उठने लगे हैं. असल में मेवाणी किसी भी पार्टी के सदस्य नहीं हैं. ऐसे में यह सवाल आम है कि आखिर एक निर्दलीय विधायक के पास इतने संसाधन कहां से आ रहे हैं कि वह एक के बाद देश भर में दौरा कर रहे हैं. मेवाणी की इस सक्रियता के पीछे कांग्रेस का हाथ माना जा रहा है. माना जा रहा है कि कांग्रेस पार्टी मेवाणी को आगे कर के दलित वोटों को अपने पक्ष में एकजुट करने में जुटी है.

   

बजट सत्र शुरू, जानिए राष्ट्रपति कोविंद ने क्या कहा

नई दिल्ली। राष्ट्रिपति रामनाथ कोविंद के अभिभाषण के साथ ही संसद का बजट सत्र आज से शुरू हो गया. इस दौरान राष्ट्रपति ने सरकार की बातों को संसद सदस्यों औऱ देश के सामने रखा. उन्होंजने कहा कि मेरी सरकार (मोदी सरकार) कमजोर वर्गों के लिए समर्पित है. मेरी सरकार संविधान में निहित मूलभावना पर चलते हुए देश में सामाजिक न्याय तथा आर्थिक लोकतंत्र को सशक्त करने और आम नागरिक के जीवन को आसान बनाने के लिए कार्य कर रही है.

इस दौरान राष्ट्रपति ने तीन तलाक को पास करने पर विशेष बल दिया. साथ ही सरकारी योजनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि बेटियों के साथ भेदभाव खत्म करने के लिए मेरी सरकार ने ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ योजना शुरू की थी. इस योजना के सकारात्मक परिणाम को देखते हुए अब इसका दायरा 161 जिलों से बढ़ाकर 640 जिलों तक कर दिया गया है. इसके अलावा राष्ट्रपति ने ‘जनधन योजना’, सरकार की नीतियों और किसानों की कड़ी मेहनत का ही परिणाम है कि देश में 275 मिलियन टन से ज्यादा खाद्यान्न और लगभग 300 मिलियन टन फलों-सब्जियों का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ है.

कुल मिलाकर राष्ट्रपति ने सरकार के अब तक के दावों को देश के सामने रखा. साथ ही सरकार की आगामी योजनाओं का भी जिक्र किया. हालांकि नेता विपक्ष और कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने इसे नई बोतल में पुरानी शराब जैसा कहा.

 

जब संसद में मनमोहन और सोनिया के बीच में आ बैठे आडवाणी

नई दिल्ली। संसद के बजट सत्र में राष्ट्रपति के अभिभाषण के समय एक घटना ने सबका ध्यान अपनी ओर खिंच लिया. अभिभाषण सुनने के लिए सभी नेता हॉल में थे. लेकिन इस बीच एक जगह सबकी नजर ठहर गई. हुआ यूं कि सबसे आगे की पंक्ति में कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बीच में बीजेपी दिग्गज और पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी बैठे थे.

इस तस्वीर के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोग मोदी पर चुटकी लेने लगे हैं. हालांकि राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान पक्ष और विपक्ष की राजनीति के बीच सदन में एक साथ नेताओं का बैठना कोई नई बात नहीं है. इससे पहले भी कई दफा ऐसी तस्वीरें सामने आई हुई हैं, लेकिन यह तस्वीर इसलिए अहम हो गई क्योंकि आडवाणी औऱ मोदी के बीच मनमुटाव की बात सभी जानते हैं इसलिए यह तस्वीर रोचक हो गई.

 

ख़त्म हुई आईपीएल की नीलामी, जानिये कौन सा खिलाड़ी किस टीम का हिस्सा बना…..

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नई दिल्ली। इंडियन प्रीमियर लीग (आइपीएल) 28 तारीख को दूसरे दिन की नीलामी में भी युवा खिलाड़ियों का दबदबा रहा. इनमें बाजी मारी भारत के बायें हाथ के तेज गेंदबाज जयदेव उनादकट ने, जिन्हें राजस्थान रॉयल्स ने 11 करोड़ रुपये में खरीदकर सभी को चौंका दिया. वह दो दिवसीय इस नीलामी में बेन स्टोक्स के बाद दूसरे सबसे महंगे खिलाड़ी बने. स्टोक्स को शनिवार को राजस्थान ने ही 12.5 करोड़ रुपये में खरीदा था. इस तरह इस नीलामी में दो सबसे महंगे खिलाड़ी राजस्थान का हिस्सा बने.

पहले दिन खाली हाथ लौटे वेस्टइंडीज के विस्फोटक बल्लेबाज क्रिस गेल को भी आखिरकार दूसरे दिन खरीदार मिल गया. उन्हें पंजाब ने बेस प्राइज दो करोड़ में खरीदा. आइपीएल में पहली बार नेपाल के क्रिकेटर को भी चुना गया है. नेपाल के 17 वर्षीय संदीप लेमीछान को दिल्ली की टीम ने 20 लाख रुपये में खरीदा.

आइये आपको बताते है की इन 8 टीमों में कौन – कौन किस की टीम का हिस्सा बना है-

चेन्नई सुपर किंग्स (CSK) महेंद्र सिंह धौनी, रवींद्र जडेजा, सुरेश रैना, हरभजन सिंह, मुरली विजय, सैम बिलिंग्स, मार्क वुड, फाफ डु प्लेसिस, ड्वेन ब्रावो, शेन वाटसन, केदार जाधव, अंबाती रायडू, इमरान ताहिर, लुंगी नगिदी, कर्ण शर्मा, मिशेल सेंटनर, शार्दुल ठाकुर, जगदीशन नारायण, दीपक चहर, आसिफ, कनिष्क सेठ, ध्रुव शौरी, क्षितिज शर्मा, मोनू सिंह, चेतन्य बिश्नोई.

सनराइजर्स हैदराबाद (SRH) डेविड वार्नर, भुवनेश्वर कुमार, शाकिब अल हसन, केन विलियमसन, शिखर धवन, मनीष पांडे, कार्लोस ब्रेथवेट, यूसुफ पठान, ऋद्धिमान साहा, राशिद खान, रिकी भुई, दीपक हुड्डा, सिद्धार्थ कौल, टी नटराजन, बासिल थंपी, सैयद खलील अहमद, संदीप शर्मा, सचिन बेबी, क्रिस जॉर्डन, बिली स्टैनलेक, तन्मय अग्रवाल, श्रीवत्स गोस्वामी, बिपुल शर्मा, मेहंदी हसन.

दिल्ली डेयरडेविल्स (DD) गौतम गंभीर, श्रेयस अय्यर, ऋषभ पंत, ग्लेन मैक्सवेल, जेसन रॉय, क्रिस मौरिस, कोलिन मुनरो, शमी, रबादा, अमित मिश्रा, पृथ्वी शॉ, राहुल तेवतिया, विजय शंकर, हर्षल पटेल, आवेश खान, शाहबाज नदीम, डेनियल क्रिश्चियन, जयंत यादव, गुरकीरत मान, ट्रेंट बोल्ट, मनजोत कालरा, अंकित शर्मा, अभिषेक शर्मा, संदीम लेमीछान, नमन ओझा, सयन घोष.

कोलकाता नाइट राइडर्स (KKR) सुनील नरेन, आंद्रे रसल, मिशेल स्टार्क, क्रिस लिन, दिनेश कार्तिक, रोबिन उथप्पा, पीयूष चावला, कुलदीप यादव, शुभमन गिल, इशांक जग्गी, कमलेश नागरकोटी, नीतिश राणा, विनय कुमार, अपूर्व वानखेड़े, रिंकू सिंह, शिवम मावी, कैमरोन डेलपोर्ट, मिशेल जॉनसन, जैवोन सिरलेस.

किंग्स इलेवन पंजाब (KXIP) आर अश्विन, युवराज सिंह, क्रिस गेल, केएल राहुल, डेविड मिलर, आरोन फिंच, मार्कस स्टोइनिस, अक्षर पटेल, करुण नायर, मयंक अग्रवाल, अंकित सिंह राजपूत, मनोज तिवारी, मोहित शर्मा, मुजीब जादरान, बरिंदर सरां, एंड्रयू टाई, अक्षदीप नाथ, बेन दवारशुइस, प्रदीप साहू, मयंक डागर, मंजूर दार.

राजस्थान रॉयल्स (RR) स्टीव स्मिथ, अजिंक्य रहाणे, बेन स्टोक्स, स्टुअर्ट बिन्नी, संजू सैमसन, बटलर, राहुल त्रिपाठी, डर्सी शार्ट, जोफ्रा आर्चर, गौतम कृष्णाप्पा, धवल कुलकर्णी, जयदेव उनादकट, अनुरीत सिंह, जहीर खान पकतीन, श्रेयस गोपाल, एमएस मिदहम, प्रशांत चोपड़ा, बेन लाफलिन, महिपाल लोमरोर, जतिन सक्सेना, आर्यमन विक्रम बिरला, दुष्मंता चमीरा.

रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर (RCB) विराट कोहली, एबी डिविलियर्स, ब्रेंडन मैक्कुलम, वाशिंगटन सुंदर, पार्थिव पटेल, टीम साउथी, डि कॉक, उमेश यादव, यजुवेंद्र चहल, क्रिस वोक्स, कुल्टर नाइल, डि ग्रैंडहोम, मोइन अली, सरफराज खान, मनन वोहरा, कुलवंत खेजरोलिया, अनिकेत चौधरी, नवदीप सैनी, मुरुगन अश्विन, मंदीप सिंह, पवन नेगी, मुहम्मद सिराज, अनिरुद्ध जोशी, पवन देशपांडे.

मुंबई इंडियंस (MI) रोहित शर्मा, हार्दिक पांड्या, जसप्रीत बुमराह, किरोन पोलार्ड, मुस्ताफिजुर रहमान, पैट कमिंस, सूर्यकुमार यादव, क्रुणाल पांड्या, इशान किशन, राहुल चाहर, इविन लुइस, बेन कटिंग, प्रदीप सांगवान, जेपी डुमिनी, जेसन बेहरनडोर्फ, सौरभ तिवारी, तेजिंदर ढिल्लन, शरद लांबा, सिद्धेश लाड, आदित्य तारे, मयंक मारकंडे, अकिला धनंजय, अनुकूल रॉय, मोहसिन खान, निधिश एमडी दिनेशन.

 

नेशनल छात्रवृत्ति पोर्टल से परेशान हैं आरक्षित वर्ग के छात्र

देहरादून। विगत वर्ष उत्तराखण्ड में छात्रवृत्ति घोटाले के कारण हजारों अनुसूचित जाति जनजाति के छात्र छात्रवृत्ति पाने से वंचित रह गये. ऑनलाइन आवेदन की व्यवस्था उत्तराखण्ड समाज कल्याण विभाग द्धारा विगत दो वर्षों से किया जा रहा था, जिसमें छात्र/छात्राओं का पंजीकरण करने में कोई परेशानी नहीं आ रही थी. स़त्र 2017-18 के लिये नेशनल पोर्टल बनाया गया है जिसमें ऑनलाइन पंजीकरण करने में कई दिक्कतें सामने आ रही हैं. नेशनल स्कॉलरशिप पोर्टल दिन भर में केवल 2या 3 घंटे सुचारु रुप से कार्य करता है इस बीच दुर्गम क्षेत्र के विद्यालयों में बिजली कटौती की समस्या भी रहती है जिस कारण गरीब बच्चों के छात्रवृत्ति आवेदन पत्र पोर्टल में पंजीकृत नहीं हो पा रहे हैं. पोर्टल के संबंध में राज्य नोडल अधिकारी देहरादून से संपर्क करने पर ज्ञात हुआ कि जो टेलीफोन नंबर हेल्प लाइन के लिये दिया गया है, वह नंबर बंद है क्योंकि उस नंबर का बिल भुगतान ही नहीं किया गया है. नेशनल पोर्टल पर छात्रवृत्ति आवेदन की अंतिम तिथि 31 जनवरी 2018 है अगर पोर्टल 24 घंटे सुचारु रुप से नहीं चला तो उत्तराखण्ड के हजारों छात्र/छात्राएं इस वर्ष भी छात्रवृत्ति से वंचित रह जाएंगे. इसी संबंध में अनुसूचित जाति जनजाति शिक्षक एसोसिएशन ने उत्तराखण्ड शासन से अपील की है कि पहाड़ की विषम भौगौलिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए छात्रवृत्ति आवेदन की ऑनलाइन तिथि को आगे बढ़ाया जाये तथा पोर्टल में आ रहे बार- बार के व्यवधान को दूर किया जाये. अनुसूचित जाति जनजाति शिक्षक एसोसिएशन के प्रांतीय प्रवक्ता आई0 पी0 ह्यूमन द्वारा यह ज्ञापन दिया गया है जो खुद अपने विद्यालय के नोडल अधिकार हैं और छात्रवृत्ति प्रभार का कार्य विगत 4 वर्षों से देख रहे हैं.

आई0 पी0 हृयूमन प्रांतीय प्रवक्ता एससी/एसटी0 टीचर्स एसोसिएशन, उत्तराखण्ड  

पद्मावत और पीरियड फिल्मों से जुड़े सवाल

फिल्म पद्मावत ने मुझे पूरी तरह से निराश किया..एक्टिंग की बात करूँ तो सबकी एक्टिंग ठीक है, फ़िल्म देखकर एक बात तो तय है कि संजय लीला भंसाली बचपन के दिनों मे इतिहास जैसे विषय मे फेल होते रहेंगे.

इससे पहले रणबीर सिंह ने ” बाजीराव मस्तानी” में पेशवा बाजीराव का किरदार अदा किया था.वो उसमे जल्दी जल्दी बोलता है और उचककर सिंहासन पे ऐसे बैठता है जैसे कोई बच्चा. मुझे मराठा इतिहास पता है लेकिन उनके रहन सहन तौर तरीके नही पता.’इसलिए मैंने सोचा कि मराठो का ये कल्चर होगा जिसे डायरेक्टर ने बाखूबी दिखाया इसलिए मन ही मन प्रशंसा की.

दरअसल भरतीय मातृत्वादी है, जो हज़ारो साल पहले खुले मैदानों के बजाय, जंगल झाड़ियों, गुफाओं और बंद महलों के रहते आए है इसलिए उनकी आंख की पुतलियां जल्दी घूमती है, जहां आड़ पट होता है वहां आपमें हिरन की तरह चौकना, कान लगाकर सुनना और फुर्ती जैसी आदते आ जाती है. जंगल मे झुक कर चलना तो कभी पत्थर पे अचानक चढ़ के बैठ जाना. आवाज़ को दबाकर बोलना, तो कभी तेज़ बोलना, फुसफुसाना.

जबकि अरब के रहने वालों में ये गुण नही होते उन्हें दूर तक खुला मैदान दिखता है इसलिए उन्हें आहट पे चौकना या फौरन घूमने की ज़रूरत नही होती. उन्हें एक ही आवाज़ वो भी तेज़, और किसी पेड़ की झाड़ी डाल न होने की वजह से तन के चलने की आदत होती है

फ़िल्म में अलाउदीन जल्दी जल्दी बोलता है, मुस्लिम राजा कभी जल्दी नही बोलते, ठहरकर बोलना और सुस्ती से चलना उनकी आदत होती है.दूसरी बात फ़िल्म में अलाउददीन का किरदर बहुत बुरा दिखाया गया है, ये सच है उसने अपने चाचा का क़त्ल करके तख़्त हासिल किया लेकिन इतिहास ऐसे किस्सों से भरा बड़ा है.

फ़िल्म में गे एडिक्ट दिखाया है जबकि इसका एक भी जगह प्रमाण नही, कई सदी बाद बाबर ने बाबरनामा में होमोसेक्सुअलिटी पर लिखा है, उसने अपनी अज़ादपसन्द सोच को दिखाते हुए इसमें पॉजिटिविटी दिखाई है लेकिन किसी का नाम नही लिखा हैशुरू में दिखाते है कि अलाउददीन मंगोलों को हरा देता है, मंगोल का इतिहास आप जानते है इनसे खूखार कोई नही हुआ है.

भारत और चीन की 1965 की लड़ाई हुई उस वक़्त चीनी सैनिक भारत के सैनिकों पर गोलयां चलाते और जब भारत के सैनिक दम तोड़ देते तो वो पास आकर चाकू से बड़ी बेरहमी से उनका पेट मुँह और गला फाड़ देते. जब उनसे इस बारे में सवाल किया गया तो उन्होंने जवाब दिया हाँ मुझे ये पता है कि सैनिक मर चुके है लेकिन ये तरीका हमने मंगोलों से सीखा है कि जब दुश्मन अपने सैनिकों की लाशों की ऐसी हालत देखे तो सहम जाए, उन्हें ये पता लगना चाहिए की हम कितने खूंखार है.

मंगोलो ने एक धनुष ईजाद किया था जो जानवर की दो पसलियों को जोड़कर बनता था, इस छोटे से धनुष की खासियत ये थी कि दुनियाभरके बेहतरीन धनुष से भी तीन गुना दूर उनका तीर जाता था.वो युद्ध मे कभी ऊंचे घोड़े इस्तेमाल नही करते थे, हमेशा टट्टू जिसकी गर्दन बहुत छोटी होती है, उनका मानना था ऐसा करने के पीछे कारण ये है कि बड़ी गर्दन वाले घोड़े के दोनों ओर एक बार मे तलवार चलाया नही जा सकता, आपको बार बार पोजीशन बदलना पड़ता है.

ऐसे मंगोलों को अलाउददीन बुरी तरह हराता है, मेरे ये नही समझ आता कि दुनिया भर के राजा जब कई देशों को जीतते है तो वीर पराक्रमी महान कहलाते है, फिर वो सिकंदर हो या अशोक लेकिन मुस्लिम राजा जब जीतता है तो धनलोलुप, क्रूर चरित्रहीन कहलाया जाता है. उसकी जींत में कभी उसके साहस की बात नही होती बस यही दिखाया जाता है की वो छल धोखे मक्कारी से जीता.

बाक़ी दुनिया नैतिकता से लड़ती रही.

अंग्रेज़ो के लिए भी यही कहा जाता है ख़ासकर क्लाइव के बारे में की फूट डालो राज करो कि नीति पर जीता अब क्या बताये इस देश मे फूट कब नही थी हक़ीक़त तो ये है कि जीत हिम्मत और उन्नत हथियारों से होती है, आंग्रेज़ों के पास अच्छी बंदूकें थी. बाबर भी तोप और बारूद की वजह से जीता. आज अमेरिका रूस इज़राइल मज़बूत अपने शौर्य और साहस से नही बल्कि हथियारों से है.

हमारी फ़िल्मे इस्लामोफोबिक स्टीरियोटाइप होती है. ख़िलजी मांस नोच रहा है, हद है पागलपन की. पिछले कई सालों से जितनी फ़िल्मे देखी है उसमें यही सब दिखाया गया है. बाहुबली के पहले पार्ट में कटप्पा के सामने एक मुस्लिम दिखाया और कटप्पा ने एकबार में ही उसकी तलवार काट दी. फ़िल्म मगधीरा में हरे कपड़े पहने मुस्लिमो की हज़ारो की तायदाद में फौज खड़ी होती है और हीरो अकेले सबको मार देता है. बाजीराव के सामने निज़ाम बौने हो जाते है और पूरी फ़िल्म में वो मुग़लो को चुनौती देता रहता है जबकि अपनी 27 जीतो में एक भी दिल्ली सल्तनत के करीब आकर नही जीती.

पद्मावती फ़िल्म में रतन सिंह का बार बार डायलॉग है जो ख़िलजी से बोलता है, इतिहास पन्नो पे नही लिखा जाता, सच तो ये है इतिहास पन्नो पे तो कुछ सही होता है लेकिन फ़िल्मो से इतिहास नही होता.

मेरे समझ नही आता कि करणी सेना क्यो इस फ़िल्म के विरुद्ध थी. जबकि फ़िल्म में राजपूतो का इतना महिमांडन किया गया है कि शायद ही किसी फिल्म में हो. धड़ कटे और लड़ता रहे वो है राजपूत, नाव टूट जाये और तैरकर समुदंर पर करे वो है राजपूत, मूछें नीची न हो वगैरह वगैरह, दरअसल ये चारणो भाटो की पंक्तियां है. राजपूत राजा भी आम इंसान थे. इसमे भी वीर पराक्रमी के साथ साथ डरपोक धोखेबाज़ हुए है. सभी जाति सभी धर्मो में ऐसा होता है.

याद रखिये महानता पराक्रम किसी एक जाति धर्म या लिंग की जागीर नही है, हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई, दलित आदिवासी ब्राह्मण, स्त्री सबमे महान पराक्रमी भी हुए है और डरपोक गद्दार भी. कोई इंसान अगर चोरी करता है तो उसे चोर लिखिए, डकैत तब तक न लिखिए जब तक उसने डकैती न कि हो. कहने का अर्थ है किसी भी बुरे इंसान की बुराई उतनी ही करो जितने उसने बुरे काम किये हो.

ख़िलजी छल से जीता, बाबर छल से जीता, हुमायूँ, अकबर, जहांगीर, शाहजहाँ औरंगज़ेब छल से जीते. फ़िल्म बनाओ तो कैरक्टर के साथ थोड़ा तो न्याय करो, संजय जी कम से कम इतिहास को एक बार ढंग से पढ़ तो लेते,

एक साल पहले फ़िल्म आई थी मोहनजोदाड़ो मुझे इस फ़िल्म को देखने की बड़ी दिलचस्पी थी. दरअसल मैं देखना चाहता था कि इस फ़िल्म में आर्यो का द्रविड़ो पर हमला दिखाएंगे, कैसे उन्होंने इस सभ्यता को तहस नहस कर दिया. कैसे उन्होंने लिखना सीखा, कौन से हथियार के साथ वो आये, लेकिन पूरी फिल्म में कहीं भी ये नही दिखा, डायरेक्टर भी सच नही दिखा सके और मनघडंत कहानी बनाकर पेश कर दी.

अंत मे एक बात कहूँगा, पीरियड फ़िल्मे बनाना है तो एनसीआरटी की किताबें और थोड़े विदेशी इतिहासकारो की लिखी किताबो को पढ़कर बना दे, अपने मन से जो कूड़ा परोसते है उसे अभिव्यक्ति की आज़ादी नही बल्कि मूर्खता का नमूना कहते है

लेखक- फैक अतीक किदवई

यूपी भाजपा में जंग, योगी और मौर्या के बीच लड़ाई तेज

उत्तर प्रदेश। में बीजेपी की सरकार को दस महीने हो गए हैं. पिछले साल 19 मार्च को योगी आदित्यनाथ ने देश के सबसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी. उस दिन उत्तर प्रदेश में जातिय समीकरण को साधने के लिए योगी के साथ दो उप-मुख्यमंत्री भी बनाए गए थे. लेकिन दस महीने बाद ही यह संतुलन डगमगाने लगा है. जिस केशव प्रसाद मौर्य के मेहनत और शानदार नेतृत्व में भाजपा ने यूपी में अपना 15 साल का वनवास खत्म किया था, भाजपा और योगी ने उन्हें ही किनारे कर दिया है.

खासकर सीएम योगी और डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या के बीच खटपट की खबरें मीडिया और पार्टी में आम हो गई है. पिछले दस महीनों में कई बार दोनों के बीच मतभेद साफ दिखे हैं. हाल ही में यूपी दिवस के मौके पर तो यह मतभेद तब खुलकर सामने आ गए जब मौर्या 24 जनवरी को लखनऊ में आयोजित उत्तर प्रदेश दिवस के पहले समारोह में नहीं आए थे. हालांकि भाजपा नेताओं ने यह कह कर इस मामले को ढकने की कोशिश कि कि मौर्या का मुंबई में कार्यक्रम तय था लेकिन यूपी दिवस जैसे महत्वपूर्ण दिन प्रदेश के उप मुख्यमंत्री की गैर मौजूदगी सवाल खड़े करती है.

मौर्या की गैर मौजूदगी पर भाजपा नेतृत्व से नाराज उनके समर्थकों का कहना था कि यूपी दिवस के विज्ञापन में मौर्या का नाम नहीं था, जबकि उनसे जूनियर मंत्रियों के नाम मौजूद थे, इस वजह से वह शामिल नहीं हुए. उनकी बात में दम भी लगता है क्योंकि मामले के तूल पकड़ने के बाद समापन समारोह के विज्ञापन में उनका नाम डाला गया तो मौर्या पहुंचे भी. हालांकि इस दौरान मौर्या और योगी के बीच का खिंचाव साफ महसूस किया गया.

इससे पहले 20 जनवरी को वाराणसी में हुए युवा उद्घोष कार्यक्रम में भी मौर्या को नहीं बुलाया गया था. फिर 23 जनवरी को योगी की ओर से बुलाई गई मंत्रियों की मीटिंग में भी मौर्या नहीं पहुंचे थे.

तो वहीं इस महीने की शुरुआत में 4 जनवरी को भाटपार रानी और फिर 25 को देवरिया के राजकीय इण्टर कॉलेज में आयोजित सभाओं में केशव प्रसाद मौर्य ने मंच से मोदी का नाम तो लिया लेकिन योगी का एक बार भी जिक्र नहीं किया. इसी तरह गुजरात और हिमाचल प्रदेश में हुए शपथग्रहण समारोह में योगी के साथ दूसरे उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा गए, लेकिन केशव मौर्या दूसरे विमान से अलग से पहुंचे. इससे साफ पता चल गया कि मौर्या योगी के साथ दो-दो हाथ करने को तैयार हैं.

दरअसल दोनों नेताओं में खींचतान 2017 के विधानसभा चुनाव के समय से ही चल रहा है. भाजपा को सत्ता में लाने के लिए केशव प्रसाद मौर्या ने खूब मेहनत की. ओबीसी वोटों के बिना भाजपा का जितना संभव नहीं था सो मौर्या ने मौर्या समाज के अलावा कुशवाहा, शाक्य और सैनी समाज को बीजेपी के पक्ष में लाने के लिए खूब मेहनत की और सफल भी हुए. पार्टी के यूपी विधानसभा चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री के तौर पर सबसे पहले केशव प्रसाद मौर्या का नाम ही उछला. लगा कि मौर्या बस यूपी के नए सीएम बनने ही वाले हैं, लेकिन केशव मौर्या को मेहनत का लाभ नहीं मिला और जब सीएम बनाने की बारी आई तो पार्टी ने आनन-फानन में योगी आदित्यनाथ को विशेष विमान से दिल्ली बुलाकर सीएम बना दिया. मौर्या विरोध न करें इसलिए उन्हें डिप्टी सीएम तो बनाया गया लेकिन मौर्या इससे खुश नहीं थे.

सरकार गठन के बाद केशव प्रसाद मौर्या के पास सिर्फ चार जबकि योगी के पास 36 विभाग हैं. उसमें भी योगी मौर्या के विभाग पर लगातार नजर बनाए रखते हैं. मौर्या को सीएम की अपने विभाग को लेकर टोका-टोकी भी पसंद नहीं है.

यूपी सरकार के गठन के बाद एक दो तस्वीरों को लेकर भी बवाल मच चुका है. कुछ महीने पहले एक कार्यक्रम की वो तस्वीर काफी वायरल हुई थी, जिसमें मुख्यमंत्री योगी और उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा कुर्सी पर बैठे हैं जबकि वहीं केशव प्रसाद मौर्या स्टूल पर बैठे थे. तो वहीं एक दूसरी तस्वीर में कालराज मिश्र मंच पर ही मौर्या का हाथ झटकते नजर आए थे. इन दोनों तस्वीरों को जातीय असमानता से जोड़ कर देखा गया. मुख्यमंत्री योगी ठाकुर जाति के हैं और उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा और कालराज मिश्र ब्राह्मण. जबकि मौर्या पिछड़ी जाति में आते हैं. यूपी के पिछड़े समाज के मतदाताओं ने इसे पिछड़ी जाति के अपमान के तौर पर देखा.

फिलहाल मौर्या और योगी के बीच का शीत युद्ध बढ़ता जा रहा है. साफ है कि सीएम योगी और भाजपा केशव प्रसाद मौर्या को उतनी तव्वजो देने को तैयार नहीं है, जितने के मौर्या हकदार हैं.

 

हिन्दुवादी संगठनों को छूट, चंद्रशेखर रावण को क्यों नहीं

एक फिल्म के विरोध को लेकर करणी सेना को आतंक मचाने की खुली छूट के बाद भाजपा शासित केंद्र और राज्य सरकारों पर सवाल उठने लगे हैं। सड़कों पर तलवार लहराते एक जाति विशेष के कुछ लोगों की तस्वीरें सामने आने के बाद बड़ा सवाल यह उठ खड़ा हुआ है कि आखिर भाजपा की सरकार उनके आतंक की अनदेखी क्यों कर रही है और सरकार के साथ उस संगठन का क्या संबंध है.

असल में केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद से केंद्र और भाजपा शासित राज्य सरकार ने कुछ ख़ास तरह के गुटों और उनकी गतिविधियों को संरक्षण दिया है, जबकि दूसरे संगठनों के विरोध को कुचलने पर अमादा है. अपने विरोधी विचारधारा के लोगों के साथ भाजपा का रवैया जितना कठोर बना हुआ है, सहयोगी विचारधारा वालों को उतनी ही छूट हासिल है. करणी सेना के लोगों ने सिनेमाघरों पर हमले किए, गाड़ियों में आग लगाई, तोड़-फोड़ किया. संजय लीला भंसाली और दीपिका पादुकोण को लेकर आपत्तिजनक बयान दिए गए, लेकिन उनमें से किसी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई. किसी पर राजद्रोह का मुकदमा दर्ज नहीं हुआ.

इसके उलट चंद्रशेखर रावण, जिग्नेश मेवाणी, कन्हैया कुमार और हार्दिक पटेल जैसे युवाओं को कभी न कभी जेल की हवा खानी पड़ी है. चंद्रशेखर रावण पर तो रासुका तक लगा कर उनके करियर को बर्बाद करने की कोशिश की गई है. चंद्रशेखर आज़ाद रावण की भीम आर्मी ने दलितों के उत्पीड़न के ख़िलाफ़ ज़रूर आवाज़ उठाई थी, आज वे कोर्ट से ज़मानत मिलने के बावजूद रासुका के कारण जेल में पड़े हैं. लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने यही कदम उन सवर्णों के ख़िलाफ़ नहीं उठाया, जिनकी वजह से चंद्रेशेखर रावण उर्फ शेखर कुमार को भीम आर्मी जैसे संगठन का गठन करना पड़ा. तमाम बातों के बीच सबसे निराशाजनक बात यह है कि देश के बुद्धिजीवियों के लगातार सवाल उठाए जाने के बाद भाजपा सरकार कुछ भी सुनने को तैयार नहीं है.

जानिए कौन है पद्मश्री सम्मान लौटाने वाले गुरु सिद्धेश्वर

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नई दिल्ली। प्रसिद्ध अध्यात्मिक गुरू सिद्धेश्वर स्वामी ने पद्मश्री सम्मान लेने से मना कर दिया. उनका कहना यह था कि वह संत हैं और संतों को इन सब की जरुरत नहीं है. जाहिर सी बात है कि यह संत परंपरा और अध्यात्म का एक बढ़िया उदाहरण है.

पदमश्री सम्मान को लेकर अध्यात्मिक गुरू ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को एक चिट्ठी लिखी. चिट्ठी में पीएम मोदी का आभार व्यक्त करते हुए आध्यात्मिक गुरू ने लिखा, ‘प्रतिष्ठित पद्मश्री सम्मान मुझे देने के लिए मैं भारत सरकार का आभार व्यक्त करता हूं. लेकिन मैं आपको अवगत कराना चाहता हूं कि मैं यह अवार्ड लेने का इच्छुक नहीं. संन्यासी होने के नाते मेरी इन अवार्ड्स में कोई रुचि नहीं. मुझे आशा है कि आप मेरे इस फैसले की सराहना करेंगे.’

असल में प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु सिद्धेश्वर स्वामी कर्नाटक के एक जाने-माने संत हैं. वह खासकर कर्नाटक के विजयपुर में सक्रिय हैं. बता दें कि हर साल की तरह इस बार भी गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्याव पर पद्मश्री पुरस्काकरों की घोषणा की गई थी. इस बार 85 हस्तिधयों को पद्म पुरस्का रों से सम्मारनित किया गया. इसमें 3 को पद्म विभूषण, 9 को पद्मभूषण और 73 को पद्मश्री सम्मारन दिया गया.

दलित आई.ए.एस होंगे राहुल की कोर टीम के प्रमुख

नई दिल्ली। कांग्रेस के अनुसूचित जाति मोर्चा के प्रमुख के तौर पर काम करने वाले कोपुल्ला राजू अब राहुल गांधी की कोर टीम का भी हिस्सा होंगे. खबर है कि राजू राहुल गांधी की कोर टीम के प्रमुख होंगे.  कोपुल्ला राजू पूर्व आई.ए.एस अधिकारी हैं. राजू आंध्र प्रदेश से संबंध रखते हैं और आंध्र प्रदेश कैडर से ही आई.ए.एस हैं. 2013 में उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृति ले ली थी. उसके बाद से राजू कांग्रेस के अनुसूचित जाति के प्रमुख के रूप में काम कर रहे थे.

कोर टीम के प्रमुख की जिम्मेदारी मिलने के बाद राजू अब कांग्रेस अध्यक्ष के 12 तुगलक लेन स्थित आवास से अपना काम करेंगे. राजू की भूमिका काफी महत्वपूर्ण होगी और वो राहुल गांधी के आधिकारिक कार्यों को देखा करेंगे. खबर है कि राजू के आगे आने के बाद संगठन में भी आने वाले दिनों में फेरबदल किए जाएंगे. राजू के उपर भविष्य के लिए राहुल गांधी की टीम को उभारने की जिम्मेदारी रहेगी. कांग्रेस के हलकों में 2019 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए राजू की नियुक्ति को महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

2019 के चुनाव के लिए भाजपा भी अपनी टीम को और बेहतर बनाने में जुटी हुई है. 2014 के चुनाव में भी भाजपा ने दो स्तरों पर काम किया था. एक ओर जहां नेता जमीनी स्तर पर जनता से संपर्क कर रहे थे तो वहीं दूसरी ओर भाजपा के दफ्तरों में बैठे उसकी टीम के लोगों के निशाने पर खासकर युवा थे. प्रचार माध्यमों के लिए भी भाजपा ने विशेष रणनीति बनाई थी. चुनाव में उसे इसका फायदा भी मिला था. अब राहुल गांधी भी अपनी कोर टीम को ज्यादा सक्रिय और ज्यादा महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपने को तैयार हैं. ऐसे में राजू के सामने अहम चुनौती भी है.

फ्रांसिसी लेखक का भारत की जाति व्यवस्था पर बड़ा बयान

जयपुर। जयपुर में इन दिनों साहित्य उत्सव चल रहा है. इसमें देश-विदेश से जाने-माने साहित्यकार शिरकत करते हैं. बीते शुक्रवार को इस साहित्य उत्सव में शामिल होने के लिए जाने-माने फ्रांसीसी राजनीतिज्ञ क्रिस्टोफ जैफ्रोलोट भी पहुंचे थे. वह ‘डॉक्टर अंबेडकर और उनकी विरासत’ विषय अपना विचार रखने आए थे. क्रिस्टोफ की चर्चा यहां इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने ‘डॉक्टर अंबेडकर एंड अनटचबिलिटी’ नामक किताब लिखी है.

इस दौरान फ्रांसिसी लेखक ने दलितों को लेकर अपने विचार रखते हुए कहा कि ‘मुस्लिम होना उतना बुरा नहीं है, जितना दलित होना.’ आरक्षण नहीं होने की स्थिति में दलित कहीं नहीं पहुंचे होते. जैफ्रोलोट ने मीडिया की मिसाल देते हुए सवाल उठाया किअगर किसी तरह का आरक्षण नहीं होता तो आज दलित कहां होते? अगर आप आरक्षण हटा देते हैं तो फिर वे कहां हैं? फिर कहीं भी कोई दलित नहीं होगा, क्योंकि दलित होना अब भी एक लांछन है.

भाजपा के दलित प्रेम को बेनकाब करते हुए फ्रांसिसी लेखक ने कहा कि भाजपा ने दलितों पर अब ध्यान देना शुरू कर दिया है. यह सद्भाव की वजह से नहीं है, बल्कि ऐसा इसलिए है क्योंकि वे उन्हें उभरते हुए वोट बैंक के तौर पर देखते हैं और ‘बांटो एवं राज करो’ की नीतियों का इस्तेमाल करते हैं.

कासगंज हिंसा पर गरजीं मायावती, भाजपा संघ को घेरा

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले में जारी हिंसा पर यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने सवाल खड़े किए हैं. मायावती ने कहा है कि जिस तरह भाजपा शासित राज्यों में कानून व्यवस्था का बुरा हाल है उससे यह साफ होता है कि सत्ताधारी भाजपा का हर स्तर पर घोर अपराधिकरण हो गया है.

उत्तर प्रदेश का खासतौर पर जिक्र करते हुए मायावती ने अपने बयान में कहा कि उत्तर प्रदेश में कानून का संवैधानिक राज ना होकर जंगलराज जैसा माहौल व्याप्त है. इसका उदाहरण गणतंत्र दिवस पर कासगंज में हुई हिंसा है, जहां राज्य सरकार शांति स्थापित करने में विफल हुई है. पूर्व मुख्यमंत्री ने घटना की निंदा करते हुए दोषियों को सजा दिलाने की मांग की.

भाजपा पर निशाना साधते हुए बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने कहा कि हिंसा और अपराध के कारण अव्यवस्था कायम हो गई है. भाजपा शासन में कोर्ट कचहरी भी दोषियों को सजा देने में अपने आपको अपंग महसूस कर रही है क्योंकि सरकार सरकारी गवाहों को सुरक्षा देने में नाकाम रही है. इस दौरान मायावती ने भाजपा के अलावा संघ को भी घेरा. बसपा प्रमुख ने कहा कि एक तरफ जहां सत्ताधारी बीजेपी का घोर अपराधिकरण व सरकार का भगवाकरण हो गया है, वहीं आर.एस.एस का व्यापक राजनीतिकरण भी हो गया है. जिससे देश भर में एक विचित्र नकारात्मक स्थिति पैदा हो गई है.

फिल्म पद्मावत को लेकर देश भर में हुए बवाल पर मायावती ने कहा “माननीय सर्वोच्च न्यायालय के बार-बार स्पष्ट निर्देश देने के बाद भी फिल्म पद्मावत पर बीजेपी सरकारों व आर.एस.एस का जो ढुलमुल रवैया रहा है, उससे साफ है कि भाजपा की सरकारें किसी न किसी रूप में जातिवादी व सांप्रदायिक हिंसा व हिंसक प्रवृति को बढ़ावा देते रहना चाहती हैं.” मायावती ने कहा कि ‘विकास’ व ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नाम पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व बीजेपी सरकारों का छलावा अब बेनकाब होकर लोगों के सामने आने लगा है.

असल में कासगंज में पिछले तीन दिनों से जारी हिंसा के बाद अब यूपी की जनता के बीच मायावती के शासन की चर्चा होने लगी है. उत्तर प्रदेश में जब भी बहुजन समाज पार्टी का शासन रहा है, इस तरह के हादसों पर अचानक ब्रेक लग जाता है. बसपा शासनकाल का रिकार्ड कहता है कि मायावती के मुख्यमंत्रित्व काल में प्रदेश में बड़ी-बड़ी घटनाओं के बाद भी दंगा और जातीय हिंसा नहीं भड़कने दिया गया.

अंकुर

अपराध ब्यूरो ने जारी किए आंकड़े, भाजपाशासित राज्यों में दलित उत्पीड़न सबसे ज्यादा

नई दिल्ली। राष्ट्रीय अपराध अनुसंधान ब्यूरो ने हाल ही में 2016 में देश में हुए अत्याचारों की रिपोर्ट जारी कर दी है. इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद एक चौंकाने वाली बात सामने आई है. पूरे साल के दौरान उन राज्यों में दलितों पर सबसे ज्यादा अत्याचार हुआ, जहां भाजपा का शासन है. वर्तमान में गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, हरियाणा, छत्तीसगढ़, गोवा तथा झारखण्ड में भाजपा का शासन हैं. इन सभी राज्यों में दलित उत्पीड़न के अपराध दूसरे राज्यों की अपेक्षा काफी अधिक दर्ज किए गए हैं. एक नजर डालते हैं पूरी रिपोर्ट पर-

साल 2016 में दलितों पर अत्याचार की कुल संख्या 40,801 दर्ज की गई, जो कि 2015 की संख्या 38,670 से 2,131 अधिक है. इस साल पिछले साल की अपेक्षा दलित उत्पीड़न के मामलों में 5.5 फीसदी की बढ़ोतरी हुयी है. इसी प्रकार उसी अवधि में जनजाति वर्ग के विरुद्ध 6,568 अपराध घटित हुए जो कि 2015 की अपेक्षा 4.7 प्रतिशत अधिक रही. यही हाल महिलाओं के साथ बलात्कार के भी रहे, जिससे स्पष्ट है कि भाजपा राज में दलित महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं. दलितों पर अत्याचार के मामले में मध्य प्रदेश पहले स्थान पर है. यहां 4,922 अपराध दर्ज किए गए. अपराध की दर 43.4 फीसदी रही जो कि राष्ट्रीय दर 20.3 से दोगुनी हैं. इसी प्रकार राजस्थान दलित अपराध में देश में दूसरे नंबर पर हैं, जहां 5,134 अपराध हुए हैं. उसकी दर 42.0 प्रतिशत रही जो कि राष्ट्रीय दर (20.3) से दोगुनी है. गोवा तीसरे स्थान पर है जहां अपराध दर 36.7 रही. गुजरात का स्थान 5वां है जहाँ अपराध दर 32.2 है जो कि राष्ट्रीय दर 20.3 से लगभग डेढ़ गुना है. इस अवधि में देश में दलितों की हत्या के 786 मामले दर्ज हुए. सबसे ज्यादा हत्याएं गुजरात में हुई. महिलाओं से जबरन बलात्कार की बात करें तो 2016 में पूरे देश में 2,540 यानि की ढाई हजार से ज्यादा दलित महिलाएं बलात्कार की शिकार हुयीं. बलात्कार की दर सबसे ज्यादा केरल में 4.7 रही. इसके बाद मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा और फिर गुजरात का जिक्र आता है. इन सभी राज्यों में भाजपा की सरकार है. जबकि दलित महिलाओं से बलात्कार के प्रयास के 3,172 मामले दर्ज किए गए. 2016 में कुल 1268 महिलाओं और लड़कियों के साथ छेड़खानी की रिपोर्ट दर्ज की गई. सामने आई इस सरकारी रिपोर्ट से स्पष्ट है कि अधिकतर भाजपा शासित राज्य दलित उत्पीड़न में दूसरे राज्यों से काफी आगे हैं. यह आंकड़े प्रधानमंत्री मोदी द्वारा दलित उत्पीड़न को लेकर दिखाई गयी हमदर्दी तथा उनके “सब का साथ, सब का विकास” के नारे की भी पोल खोलती है.

फिल्म पद्मावत के विरोध से जुड़ा यह सच जानकर हैरान हो जाएंगे आप

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नई दिल्ली। फिल्म पद्मावत के विरोध में करणी सेना का हिंसक प्रदर्शन देश भर में जारी है. लेकिन मानवीयता की तमाम बातों को अनदेखा कर उपद्रवियों के हंगामे ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि कथित तौर पर राजपूती शान के लिए लड़ी जाने वाली यह लड़ाई कायरता के हद तक चली आई है. बुधवार को यह तब देखने को मिला जब दिल्ली से सटे गुड़गांव में कुछ उपद्रवियों ने एक स्कूली बस पर हमला बोल दिया. जीडी गोयनका स्कूल की इस बस पर उपद्रवियों ने जब पथराव किया, तब उसमें बच्चे भी मौजूद थे.बच्चों पर हमले के इस वीडियो के सामने आने के बाद विरोध के तरीकों पर सवाल उठने लगे हैं.

जीडी गोयनका स्कूल की बस जब बच्चों को स्कूल से लेकर लौट रही थी तभी गांव घामदौज के पास कुछ उपद्रवियों ने बस पर पत्थर बरसा दिए. लेकिन बस चालक की सूझबूझ के चलते बच्चे और टीचर बाल-बाल बच गए. बस में 22 बच्चे सवार थे. सोशल मीडिया पर तमाम लोगों ने विरोध के तरीकों पर सवाल उठाया है. इसमें वो लोग भी शामिल हैं जो खुद इस समुदाय से ताल्लुक रखते हैं. भोपाल में करणी सेना हिंसा फैलाने के चक्कर में इस कदर मशगूल हुई कि उन्होंने अपने ही कार्यकर्ता की गाड़ी को आग लगा दी. भोपाल के ज्योति टॉकीज पर करणी सेना के कार्यकर्ता प्रदर्शन कर रहे थे. तभी वे हिंसक हो उठे.

उन्होंने कई गाड़ियों में तोड़फोड़ कर दी और एक मारुति स्विफ्ट कार में आग लगा दी. यह कार उनके ही एक कार्यकर्ता सुरेंद्र सिंह चौहान की थी. दूसरी ओर पद्मावत फिल्म को लेकर सियासी सरगर्मियां भी तेज हो गई हैं. बीजेपी के राष्ट्रीय नेता जहां इस मामले पर खामोश हैं तो वहीं बीजेपी शासित कई राज्य फिल्म को दिखाने के पक्ष में नहीं है. हिंसा की ज्यादातर खबरें उन्हीं राज्यों से आ रही है, जहां भाजपा का शासन है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पद्मावत के विरोध में हो रही हिंसा पर भाजपा को घेरा है.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट करके कहा- “हरियाणा में बच्चों के खिलाफ हिंसा को किसी तरह से जायज नहीं ठहराया जा सकता. हिंसा और नफरत कमजोर लोगों का हथियार है. बीजेपी नफरत और हिंसा का इस्तेमाल करके हमारे देश में आग लगा रही है.” तो आम आदमी पार्टी के मुखिया और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ट्वीट करते हुए लिखा, ‘अगर केंद्र सरकार, सारी राज्य सरकारें और सुप्रीम कोर्ट मिलकर एक फिल्म रिलीज नहीं करा सकते और सुरक्षित नहीं दिखा सकते हैं तो देश में कैसे आएगा निवेश?

ये निर्भया नहीं! आदिवासी रेप पीड़िता की कहानी है

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कोरापुत। एक खास वर्ग की नजर में शिक्षा देने वाली एक देवी की जयंती का जश्न जब पूरे राज्य भर में मनाया जा रहा था और ओडिसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को ‘आदर्श मुख्यमंत्री’ का सम्मान मिलने पर राजधानी में सत्ताधारी दल बीजेडी के कार्यकर्ता जश्न में डूबे हुए थे. इसी बीच ‘कुंदुली रेप’ पीङिता की खुदकुशी की खबर ने सारे राज्य को सन्न कर दिया.

10 अक्टूबर, 2017 की घटना है. भुवनेश्वर से करीब 500 किमी दूर आदिवासी बाहुल जिला कोरापुट के कुंदुली की नौवीं कक्षा की एक आदिवासी नाबालिग छात्रा के साथ सेना की वर्दी में कुछ जवानों ने दुष्कर्म किया. हालांकि जलालत में डूबी वह लड़की मर ना सकी लेकिन तकरीबन 100दिनों के बाद उसने अपने घर में दम तोड़ दिया. 22 जनवरी, 2018 को अचानक उसके आत्महत्या की खबर आई. घरवाले आनन-फानन में उसे अस्पताल लेकर गए लेकिन डॉक्टर ने उसे मृत घोषित कर दिया.

कहा जा रहा है कि उसने आत्महत्या कर लिया है. लेकिन उसके शव का पोस्टमार्टम करने से पुलिस प्रशासन जिस तरह लगातार बचता रहा और दबाव बढ़ने पर जिस तरह श्मशान में उसका पोस्टमार्टम किया गया, वह कई सवाल उठा रहा है. सबसे बड़ा सवाल यह है कि सामान्यतः कोई भी आत्महत्या करे तो तुरंत जगजाहिर हो जाता है कि पीड़ित/पीङिता ने फांसी लगाकर या जहर या आग लगा कर खुदकुशी की है. लेकिन पीड़िता के मामले में किसी को कोई जानकारी नहीं दी गई. दूसरी बात यह भी है कि जब वो बलात्कार के बाद तीन महीने तक जिंदा रही फिर अचानक उसने आत्महत्या क्यों किया होगा? पोस्टमार्टम रिपोर्ट में क्या आएगा, यह अलग बात है लेकिन आत्महत्या का कारण फौरन उजागर ना करने का क्या मतलब रहा होगा? सुनाबेङा अनुमंडलाधिकारी नरहरि नायक ने 22 जनवरी को शाम तक आत्महत्या की पुष्टि कर दी.

सेना जवानों पर आरोप पहले तो मीडिया में खबर चली कि सेना जवानों ने रेप किया है. फिर इस बात को खारिज करते हुए ओडिशा पुलिस महानिदेशक डॉ आरपी शर्मा ने बताया कि वे सेना जवान नहीं थे. मामले में एक नया मोड़ तब आया जब पीड़िता ने बताया कि वे लोग सेना जवान थे. इस बयान के बाद फिर पुलिस की ओर से बयान आया कि वे सेना की वर्दी में थे ना कि सेना के जवान.

हालांकि 10 नवंबर को पीड़िता ने यह भी कहा था कि उसे पचास हजार रुपये देकर बयान बदलने के लिए दबाव डाला जा रहा है. पुलिस ने 16नवंबर को चार लोगों को हिरासत में लिया लेकिन अगले दिन तीन को छोड़ दिया और बाकी एक को डिटेक्शन के बाद सबूत ना मिलने के कारण 21 नवंबर को छोड़ा.

रेप नहीं हुआ है- ओएचआरसी रिपोर्ट ओएचआरसी ने जब मेडिकल रिपोर्ट में कहा कि पीड़िता के साथ रेप नहीं हुआ है. इस रिपोर्ट ने कई सवाल खड़े कर दिए. शहीद लक्ष्मण नायक मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, कोरापुट और एमकेसीजी मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल ने भी रेप ना होने की पुष्टि की थी.

अब ऐसे में पहला सवाल है कि रेप नहीं हुआ तो पीड़िता गंभीर अवस्था में अस्पताल में भर्ती क्यों हुई थी? दुसरा, जिला अस्पताल से राज्य के सबसे बड़े अस्पताल एससीबी मेडिकल कॉलेज व अस्पताल, कटक में 19 नवंबर को क्यों लाया गया? तीसरा सवाल, जब रेप हुआ नहीं जैसा कि ओएचआरसी की रिपोर्ट में कही जा रही है तो पीड़िता को 27 नवंबर तक एससीबी मेडिकल कॉलेज में रखने की क्या जरूरत थी? चौथा सवाल, जब रेप नहीं हुआ तो मुख्यमंत्री ने जांच का आदेश क्यों दिया था?

इसी से मिलता-जुलता एक और घटना का उल्लेख करना जरूरी है. इसी जिले के टिकरी नामक जगह पर भी रेप की घटना हुई थी लेकिन इसमें उसके पीछे किसी का ध्यान नहीं गया. पर वहीं कुंदुली की अस्मिता (बदला हुआ नाम) के साथ रेप की घटना होने के बाद तमाम प्रकार से सबूतों को मिटाने, बयान बदलने व केस वापस लेने की कोशिशें की गई.

ऐसी कोशिश की आखिरकार पीड़िता ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया या फिर उसे मार डाला गया. ये दिल्ली की निर्भया नहीं, एक गरीब आदिवासी विधवा मां की लाडली थी जिसकी फिक्र किसी को नहीं थी. कोरापुट में कांग्रेस भले ही उसका शव लेकर एनएच-26 पर न्याय मांगती रही लेकिन किस लिए? 24 जनवरी को बीजेपी ने भी चक्का जाम किया लेकिन क्या इससे रेप का चक्का रूक जाएगा?

हालांकि इस मामले को भटकाने के लिए प्रेम प्रसंग से जोड़कर भी देखा जा रहा है. पुलिस ने कथित प्रेमी का वीडियो बयान रिकॉर्ड व पॉलीग्राफ टेस्ट भी की है लेकिन रिपोर्ट अभी खुलकर सामने नहीं आई है. हालांकि पॉलीग्राफ के दौरान 16 साल की उम्र के पीपुन नामक लङके से सत्तर सवाल किए गए हैं जिसके आधार पर कहा जा रहा है कि घटना के दिन पीङिता अपने प्रेमी के साथ मिली थी और बाद में शादी से मुकरने के कारण सामूहिक दुष्कर्म की कहानी बनाई. किसकी कहानी में कितना सच है रिपोर्ट बयां कर रही है. लेकिन ऐसी पुलिसिया कार्रवाई कोई नई नहीं है, जिसमें मामले की लिपापोती करने की कोशिश की जाती रही हो.

बड़ा सवाल यह है कि पीड़िता के जिंदा रहने पर न्याय ना दिला सके! उसे बचाया ना जा सका! यह उसकी नहीं समाज की हार है! उसका रेप सेना जवान ने किया हो या किसी अन्य ने क्या फर्क पड़ता है, रेप हुआ था ना! हमने तो इसे भी झूठला दिया.

रवि रनवीरा