SC-ST उपजातियों को मिल सकेगा अलग से कोटा, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

एससी-एसटी आरक्षण में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने 7 जजों की पीठ ने 2004 में ईवी चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश मामले में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों के उस फैसले को पलट दिया है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि एसी/एसटी जनजातियों में सब कैटेगरी नहीं बनाई जा सकती है।

इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की बेंच ने 6-1 के बहुमत से फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अंदर भी कई वर्ग बनाए जा सकेंगे। ऐसे में राज्य सरकारें अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के अंदर आने वाले किसी एक वर्ग को ज्यादा आरक्षण का लाभ दे सकेंगी।

जस्टिस बीआर गवई ने फैसला लिखते हुए कहा कि ईवी चिन्नैया फैसले मामले में कुछ खामियां थीं। यहां आर्टिकल 341 को समझने की जरूरत है जो सीटों पर आरक्षण की बात करता है। उन्होंने कहा कि मैं कहना चाहता हूं कि आर्टिकल 341 और 342 आरक्षण के मामले को डील नहीं करता है। फैसला सुनाने वाले सात सदस्यीय पीठ में चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस मनोज मिश्रा, जस्टिस बेला एम त्रिवेदी, जस्टिस बी आर गवई, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस एससी शर्मा शामिल रहे। पीठ ने 6-1 के बहुमत से फैसला सुनाया है।

पीठ ने कहा कि राज्यों के पास आरक्षण के लिए अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति में उप-वर्गीकरण यानी Sub Classification करने की शक्तियां हैं। कोर्ट ने कहा कि कोटा के लिए एससी, एसटी में उप-वर्गीकरण का आधार राज्यों द्वारा मानकों एवं आंकड़ों के आधार पर उचित ठहराया जाना चाहिए।

जस्टिस बी आर गवई ने सामाजिक लोकतंत्र की आवश्यकता पर दिए गए बीआर अंबेडकर के भाषण का हवाला दिया। जस्टिस गवई ने कहा कि पिछड़े समुदायों को प्राथमिकता देना राज्य का कर्तव्य है, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति वर्ग के केवल कुछ लोग ही आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं। जमीनी हकीकत से इनकार नहीं किया जा सकता कि एससी/एसटी के भीतर ऐसी श्रेणियां हैं, जिन्हें सदियों से उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। उप-वर्गीकरण का आधार यह है कि एक बड़े समूह में से एक ग्रुप को अधिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है।

हालांकि इस बारे में बहुमत से अगर राय रखने वाली जस्टिस बेला त्रिवेदी ने अपने फैसले में लिखा कि मैं बहुमत के फैसले से अलग राय रखती हूं। उन्होंने कहा कि मैं इस बात से सहमत नहीं हूं जिस तरीके से तीन जजों की बेंच ने इस मामले को बड़ी बेंच को भेजा था। तीन जजों की पीठ ने बिना कोई कारण बताए ऐसा किया था।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कई बातों का जिक्र किया है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब आरक्षण को लेकर नई बहस छिड़ सकती है। इस मामले में यह भी आशंका है कि राज्य सरकारें अपने चुनावी फायदे के लिए इसका अपने तरीके से इस्तेमाल कर सकती हैं।

Mr. BD Virdi and Ujjal Dosanjh awarded in Canada by Chetna Association and other Groups

Mr. BD Virdi and Ujjal Dosanjh awarded in Canada by Chetna Association and other Groups

After the “Sandookadi Kholh Narainia, a play by Dr. Sahib Singh staged at the White Rock Players’ Club on July 20 and 21, the former premier of BC Ujjal Dosanjh was bestowed with the Dr. Ambedkar Arts and Literature Award for his debut novel, ” The Past is Never Dead.”

The retired IES, Mr. BD Virdi, was awarded with the Dr. Ambedkar Social Justice Award for his contributions to policy and program development that helped reducing poverty in the rural areas. The organizers also recognized Dr. Sahib Singh with the “Excellence in Punjabi Theater Award”.

Honoring Dosanjh was a joint community effort led by the Chetna Association of Canada and Dynamic Creative Horizons, with the support Shri Guru Ravidass Sabha of Vancouver, AICS Canada, AISRO Canada, and Dynamic Creative Horizons.

Lamber Rao represented the Shri Guru Ravidass Sabha (Vancouver), Param Kainth represented AICS Canada, and Rashpaul Bharadqaj represented AISRO. Jai Birdi and Surinder Sandhu represented Chetna Association of Canada while Navjot Dhillon and Inderjit represented Dynamic Creative Horizons.

Dr. Sahib Singh, a prominent dramatist from Punjab is on a tour playing his plays in different cities across Canada. Locally, Chetna Association of Canada and Dynamic Creative Horizons, partnered and together arranged with Singh to perform his play, “Sandookadi Kholh Narainia” at a theatre in White Rock on July 20 and 21.

The organizers were very pleased to see the house filled both days and the theatre lovers enjoying the theatre with a needle drop silence with applause at key moments. Sandiokadi Kholh Narainia (SDK) is a story of three youth of Punjab. All three characters are played by Dr. Sahib Singh who is also credited with writing and directing his plays.

Singh, a mastermind, a highly talented, and a creative artist, skillfully projects these characters and challenges the audience to open their minds, using Sandokadi as a symbol. Throughout the play, many in the audience were able to relate to their own experiences validated through applauses, tears, laughter, and sighs.The members of Chetna Association and other Groups

Chetna’s next event is a screening of a short film on women empowerment, “Whistle”. This is a part of celebrating the Gender Equality Week. The screening will be on September 14, 1:30 pm, Dr. Ambedkar Room, Surrey Center Library on the University Drive.

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NCERT की किताबों में बहुजनों का इतिहास मिटाने की कोशिश, हड़प्पा सभ्यता की जगह सिंधु सरस्वती सभ्यता

लगता है सरकार और NCERT भारतीय इतिहास से हड़प्पा सभ्यता, जाति के सवाल, डॉ. आबंडकर के साथ हुए जातीय भेदभाव, सम्राट अशोक, सांची स्तूप, अजंता की गुफाओं आदि को मिटा देना चाहती है। और उसकी जगह अपना एजेंडा थोपना चाहती है। NCERT ने छठवीं क्लास के लिए सामाजिक विज्ञान की जो किताब छापी है, उसे देख कर तो यही लगता है। इस किताब में कई बदलाव किए गए हैं, जो सरकार और NCERT की मंशा पर सवाल उठाने वाले हैं।

दरअसल, अब स्कूलों में छठवीं क्लास के विद्यार्थी हड़प्पा सभ्यता की जगह सिंधु सरस्वती सभ्यता को पढ़ेंगे। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद यानी NCERT ने छठवीं क्लास के सामाजिक विज्ञान की किताब को कुछ बदलावों के साथ तैयार किया है। इस पाठ्यक्रम के सामने आने के बाद सवाल उठने लगे हैं।

नई किताब में हड़प्पा सभ्यता की जगह सिंधु सरस्वती सभ्यता शब्द का जिक्र किया गया है। वहीं नई किताब में जाति शब्द का सिर्फ एक बार जिक्र है। जाति आधारित भेदभाव और असमानता का भी जिक्र नहीं है। यहां तक की भारत रत्न संविधान निर्माता बाबासाहेब आंबेडकर से जुड़े जाति आधारित भेदभाव के सेक्शन को भी हटा दिया गया है।

यह पुस्तक राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2023 के तहत तैयार की गई पहली सामाजिक विज्ञान की पुस्तक है, जिसे मौजूदा शैक्षणिक सत्र से स्कूलों में पढ़ाया जाएगा। बता दें कि पहले सामाजिक विज्ञान के लिए इतिहास, भूगोल और राजनीतिक विज्ञान की अलग-अलग पाठ्य पुस्तकें थीं। लेकिन अब सामाजिक विज्ञान के लिए एक ही पाठ्य पुस्तक है, जिसे पांच खंडों में बांट दिया गया है।

लेकिन इस पुस्तक में जिस तरह भारतीय इतिहास में कई दशकों से दर्ज घटनाओं, व्यक्तियों और स्थानों को बदलने को लेकर जो फैसले किए गए हैं, वो गंभीर सवाल खड़ा करता है। जैसे कि नई पुस्तक में अशोक, चंद्रगुप्त मौर्य के राज्यों से संबंधित पाठों और चाणक्य और उनके अर्थशास्त्र को भी जगह नहीं दी गई है। लौह स्तंभ, सांची स्तूप और अजंता की गुफाओं के चित्रों का जिक्र भी पुस्तक में नहीं है। फिलहाल संसद का सत्र चल रहा है, देखना है कि इस मामले को लेकर कोई सांसद संसद में आवाज उठाता है या फिर देश शोषित वर्ग से संबंधित इतिहास को बदलते हुए देखता रहेगा? और नेताओं से इतर यह मामला समाज का है, देखना होगा अंबेडकरी समाज इसको लेकर क्या खामोश रहता है, या फिर विरोध की आवाज उठाता है।

बहुजन नेताओं ने खोली बजट की पोल, सुनिये बहन मायावती, चंद्रशेखर आजाद और अखिलेश यादव ने क्या कहा

जब भी बजट पेश होता है सरकार उसके कसीदे पढ़ती है तो विपक्ष खामियां निकालता है। लेकिन पक्ष -विपक्ष से इतर बजट को बहुजन समाज के नेता भी अपनी नजर से देखते हैं कि आखिर बजट में देश के बहुजन समाज के लिए क्या है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बजट पेश करने के बाद बसपा सुप्रीमों मायावती, आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने बजट में सरकारी चालाकियों की पोल खोलकर रख दी है।

 

काँवड़ यात्रा में दुकानों पर नाम, कहीं उपचुनाव को लेकर सीएम योगी का दांव तो नहीं?

घनश्याम हो या इमरान अब हर किसी को अपने फलों की दुकान पर अपना नाम लिखना होगा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पूरे उत्तर प्रदेश में कांवड़ मार्गों पर खाने पीने की दुकानों पर ‘नेमप्लेट’ लगाने का सख्त आदेश जारी कर दिया है। आदेश में साफ कहा गया है कि हर हाल में दुकानों पर संचालक और मालिक का नाम लिखा होना चाहिए, इसके साथ ही उसे अपनी पहचान के बारे में बताना होगा। कहा जा रहा है कि कांवड़ यात्रियों की आस्था की शुचिता बनाए रखने के लिए ये फैसला लिया गया है।

हालांकि योगी आदित्यनाथ के इस बयान के बाद सूबे में सियासत तेज हो गई है। इस बारे में जब पहली बार मुजफ्फरनगर जिले में फैसला लिया गया था, तभी समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने योगी सरकार पर हमला बोलते हुए न्यायालय से इस बारे में स्वतः संज्ञान लेने की अपील की थी। अखिलेश का कहना था कि-

… और जिसका नाम गुड्डू, मुन्ना, छोटू या फत्ते है, उसके नाम से क्या पता चलेगा? माननीय न्यायालय स्वत: संज्ञान ले और ऐसे प्रशासन के पीछे के शासन तक की मंशा की जाँच करवाकर, उचित दंडात्मक कार्रवाई करे। ऐसे आदेश सामाजिक अपराध हैं, जो सौहार्द के शांतिपूर्ण वातावरण को बिगाड़ना चाहते हैं।

तो वहीं बसपा सुप्रीमो सुश्री मायावती ने भी न सिर्फ योगी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, बल्कि सीएम योगी की राजनीतिक चाल को भी बेनकाब कर दिया है। बहनजी ने एक्स पर एक बयान जारी कर कहा है कि-

 

यूपी व उत्तराखण्ड सरकार द्वारा कावंड़ मार्ग के व्यापारियों को अपनी-अपनी दुकानों पर मालिक व स्टॉफ का पूरा नाम प्रमुखता से लिखने व मांस बिक्री पर भी रोक का यह चुनावी लाभ हेतु आदेश पूर्णतः असंवैधानिक। धर्म विशेष के लोगों का इस प्रकार से आर्थिक बायकाट करने का प्रयास अति-निन्दनीय है। यह एक गलत परम्परा है जो सौहार्दपूर्ण वातावरण को बिगाड़ सकता है। जनहित में सरकार इसे तुरन्त वापस ले।

अपने बयान में बहनजी ने इसे चुनावी लाभ लेने के लिए उठाया गया कदम बताया है। तो क्या यही सच है? क्योंकि लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में भाजपा सिर्फ 33 सीटें जीत सकी थी, जो उसके लिए एक बड़ा झटका था। यूपी में मिली हार के कारण ही मोदी सरकार अपने तीसरे कार्यकाल में अल्पमत में आ गई थी। जिससे मोदी और अमित शाह योगी से नाराज थे।

उसके बाद से ही भाजपा के भीतर सीएम योगी के खिलाफ आवाज उठने लगी है। केशव प्रसाद मौर्य ने तो जमकर मोर्चा खोल दिया है। बताया जा रहा है कि वह ऐसा दिल्ली के इशारे में पर कर रहे हैं। ऐसे में सीएम योगी उपचुनाव वाली 10 सीटों पर बेहतर प्रदर्शन कर विरोधियों को करारा जवाब देने के मूड में हैं। खबर है कि उपचुनाव में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी मिलकर चुनाव लड़ेंगे। 7 सीटों पर सपा और 3 सीटों पर कांग्रेस के चुनाव लड़ने की खबर सामने आ रही है। ऐसे में अगर योगी आदित्यनाथ मैदान मार लेते हैं तो वह दिल्ली को यह मैसेज देने में कामयाब होंगे कि उनमें अखिलेश और राहुल गाँधी दोनों को रोकने की क्षमता है।

यूपी में जिन 10 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होना है उसमें से 5 सीटों पर समाजवादी पार्टी, 3 पर भाजपा और 1-1 सीट पर आरएलडी और निषाद पार्टी का कब्जा था। नियम के मुताबिक छह महीने के भीतर इस पर चुनाव कराने होंगे। हालांकि माना जा रहा है कि इस पर जल्दी ही चुनाव हो सकते हैं। ऐसे में काँवड़ यात्रा के बहाने उग्र हिन्दुत्व का चेहरा सामने रखकर योगी आदित्यनाथ सवर्णों के साथ दलितों और पिछड़ों को भी अपने पाले में लाने की तैयारी में हैं। देखना होगा कि उनका यह दांव कितना सटीक बैठता है।

अमेरिका की अंबेडकरवादी संस्था AIC मनाएगी अपना 12वां स्थापना दिवस

12 साल पहले अमेरिका में एक संस्था बनी। नाम था अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर, जिसे दुनिया अब AIC के नाम से जानती है। यह संस्था 20 जुलाई 2024 को अपनी स्थापना के 12 वर्ष का जश्न मना रहा है। लेकिन इस बार का जश्न खास है। भारत से अमेरिका गए अंबेडकरवादियों ने मिलकर जब अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर बनाया तब शायद ही किसी को यह अहसास होगा कि यह संस्था एक दिन इतिहास रच देगी। इस संस्था ने महज 12 सालों में भारत के बाहर अमेरिका के वाशिंगटन डीसी के पास मैरीलैंड में बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर के सबसे ऊंचे स्टैच्यू को बनाकर इतिहास रच दिया।

 14 अक्टूबर 2023 को जब AIC की अपनी जमीन पर बाबासाहेब की 12 फुट ऊंची आदमकद प्रतिमा स्थापित हुई थी, तब अमेरिका और कनाडा के तकरीबन दो दर्जन शहरों से 500 अंबेडकरवादी परिवार सहित पहुंचे थे। कार्यक्रम अमेरिका में हो रहा था, लेकिन उसके साक्षी दुनिया भर के अंबेडकरवादी बने। दुनिया भर की मीडिया में इसकी पुरजोर चर्चा हुई, क्योंकि इस स्टैच्यू के अपने मायने थे। इसे स्टैच्यू ऑफ इक्वालिटी का नाम दिया गया है।

दलित दस्तक के संपादक के तौर पर भारत के बाहर इस इतिहास को बनते हुए मैंने भी देखा था और लोगों के उत्साह, भावुकता और इस संस्था के जरिये अंबेडरवाद को अमेरिका में फैलाने के सपने को करीब से महसूस भी किया था।

कर्नाटक सरकार ने किया SC-ST फंड में घपला, अनुसूचित जाति आयोग ने भेजा नोटिस

लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करने के बाद कांग्रेस पार्टी अपनी छवि को दुरुस्त करने में लगी है। लेकिन सब ठीक हो पाता उससे पहले ही कांग्रेस पर दाग लग गया है। जो राहुल गाँधी लोकसभा चुनाव के दौरान संविधान बचाने की दुहाई देते हुए देश भर में घूमते रहे और दलित और आदिवासी समाज का समर्थन मांगते रहे, कर्नाटक में उन्हीं की सरकार ने एससी-एसटी के लिए आवंटित फंड में हेर-फेर कर दी है।

कर्नाटक सरकार पर एससी/एसटी कल्याण योजनाओं के लिए आवंटित 39,121.46 करोड़ रुपये में से 14,730.53 करोड़ रुपये कांग्रेस की गारंटी योजनाओं के लिए उपयोग किये जाने का गंभीर आरोप लगा है। यह रकम एससी/एसटी कल्याण के लिए आवंटित कुल राशि का 37 प्रतिशत है, जो कि एक बड़ा हिस्सा है। अनुसूचित जाति आयोग ने इस मामले में कर्नाटक सरकार को नोटिस जारी कर दिया है। और इसके बाद भाजपा सहित तमाम दलों ने सिद्धारमैया की सरकार पर हमला बोल दिया है।

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष विजय मकवाना ने 11 जुलाई को इस बारे में एक बयान जारी कर कर्नाटक सरकार को नोटिस जारी करने और जवाब मांगने की बात भी कही है।

 

इस खबर के सामने आने के बाद कांग्रेस पार्टी और उसके नेताओं ने चुप्पी साध रखी है। तो बाकी दल, खासतौर पर भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस पर हमलावर है। इस मुद्दे पर आजाद समाज पार्टी के प्रमुख और नगीना से सांसद चंद्रशेखर ने भी कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को पत्र लिख कर अपनी आपत्ति दर्ज कराई है। चंद्रशेखर ने चिट्ठी में लिखा है कि, मुख्यमंत्री को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि एससी/एसटी समुदायों के कल्याण के लिए आवंटित फंड्स का उपयोग कानून के अनुसार केवल उनके विकास के लिए किया जाना चाहिए। फंड्स के डायवर्जन की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

इस मामले में बड़ा सवाल यह है कि जो कांग्रेस पार्टी विधानसभा और लोकसभा के चुनावों में देश की जनता को तमाम गारंटी देकर उनसे वोट मांग रही थी, क्या उसके शासन काल में ये गारंटी दलितों और आदिवासियों की बेहतरी के लिए आवंटित पैसे से पूरी की जाएगी? न्याय यात्रा के जरिये देश के वंचितों को न्याय दिलाने और हर जगह वंचितों की भागेदारी की बात करने वाले कांग्रेस नेता राहुल गांधी को इसका जवाब देना होगा।

हरियाणा में बसपा और इनेला मिलकर लड़ेंगे चुनाव, जानिये हर डिटेल

हरियाणा के विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी और इंडियन नेशनल लोकदल मिलकर चुनाव लड़ेंगे। दोनों दलों के नेताओं ने आज 11 जुलाई को गठबंधन की घोषणा कर दी, जिस पर बसपा सुप्रीमों मायावती ने भी मुहर लगा दी है। खबर है कि गठबंधन में प्रदेश की 90 सीटों में से बीएसपी 37 सीटों पर जबकि इनेलो 53 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। अभय चौटाला गठबंधन के नेता होंगे और सत्ता में आने पर मुख्यमंत्री बनेंगे। चंडीगढ़ में इनेलो नेता अभय चौटाला, बसपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आनंद कुमार और नेशनल कोऑर्डिनेटर आकाश आनंद की मौजूदगी में गठबंधन की घोषणा हुई।

इस पर मुहर लगाते हुए बसपा सुप्रीमों मायावती ने सोशल मीडिया X पर लिखा-

बहुजन समाज पार्टी व इण्डियन नेशनल लोकदल मिलकर हरियाणा में होने वाले विधानसभा आमचुनाव में वहाँ की जनविरोधी पार्टियों को हराकर अपने नये गठबंधन की सरकार बनाने के संकल्प के साथ लड़ेंगे, जिसकी घोषणा मेरे पूरे आशीर्वाद के साथ आज चंडीगढ़ में संयुक्त प्रेसवार्ता में की गयी।

हरियाणा में सर्वसमाज-हितैषी जनकल्याणकारी सरकार बनाने के संकल्प के कारण इस गठबंधन में एक-दूसरे को पूरा आदर-सम्मान देकर सीटों आदि के बंटवारे में पूरी एकता व सहमति बन गई है। मुझे पूरी उम्मीद है कि यह आपसी एकजुटता जन आशीर्वाद से विरोधियों को हरा कर नई सरकार बनाएगी।

बता दें कि 6 जुलाई को दिल्ली में अभय सिंह चौटाला ने बसपा सुप्रीमों मायावती से मुलाकात की थी। इस दौरान बहनजी और अभय चौटाला के बीच गठबंधन को लेकर लंबी बातचीत हुई थी। जिसके बाद आज गठबंधन का आधिकारिक ऐलान कर दिया गया। चंडीगढ़ में गठबंधन की घोषणा के बाद आकाश आनंद ने कहा कि चुनाव में जीत हासिल होने पर अभय चौटाला जी मुख्यमंत्री होंगे। वहीं दूसरी ओर अभय चौटाला में इस दौरान मुफ्त बिजली और पानी का वादा किया। उन्होंने कहा कि हम ऐसे मीटर लगाएंगे कि बिजली बिल 500 रुपये से कम होगा।

उच्च शिक्षा में भेदभाव को लेकर हंगामा, बहुजनों का सरकार पर गंभीर आरोप

उच्च शिक्षा में भेदभाव को लेकर अक्सर खबरें सामने आती रहती हैं। इसमें दिल्ली और जेएनयू जैसे विश्वविद्यालयों के साथ-साथ IIT और IIM जैसे संस्थानों का भी जिक्र होता है। यहां की फैकल्टी में एससी/एसटी की गैरमौजूदगी को लेकर भी सवाल उठते हैं। हाल ही में आईआईटी मद्रास में वंचित समाज के प्रतिनिधित्व को लेकर एक आंकड़ा सामने आया है, जिसके बाद अंबेडकरी आंदोलन के लोग तमाम सवाल उठा रहे हैं।

दरअसल IIT मद्रास को लेकर जो आंकड़े सामने आए हैं, उसके मुताबिक वंचित समाज से सिर्फ 9 फैकल्टी हैं, जबकि अगड़ी जातियों के 43 फैकल्टी मेंबर हैं। यानी कि आईआईटी मद्रास में देश की 85 फीसदी आबादी के सिर्फ 9 शिक्षक ही फैकल्टी के रूप में पढ़ा रहे हैं, जबकि 15 फीसदी आबादी वाले अगड़े समाज के 43 फैकल्टी मेंबर हैं। वंचित समाज के वर्गों के अलग-अलग हिस्सेदारी की बात करें तो 9 फैक्ल्टी में एससी समाज के 3, एसटी समाज का एक और ओबीसी समाज के 5 फैकल्टी मेंबर हैं। यह आंकड़ा सूचना के अधिकार के तहत सामने आया है।

इसी तरह दिल्ली विवि में बहुजन समाज के पूर्व एवं वर्तमान शिक्षकों ने एक आईआईएम को लेकर एक आंकड़ा साझा किया है। इसमें देश के चार आईआईएम में भी फैकल्टी का आंकड़ा सामने आया है। इसमें अहमदाबाद में 104, कोलकाता में 86, इंदौर में 104 और शिलांग में 20 मेंबर हैं। इन सभी चारों जगहों पर दलित, आदिवासी और पिछड़े समाज के एक भी सदस्य नहीं हैं। यानी सारे के सारे पदों पर सवर्णों का कब्जा है।

इस आंकड़े के सामने आने के बाद तमाम लोग इसके लिए भाजपा के 10 साल के शासनकाल को जिम्मेदार ठहरा हैं तो भाजपा समर्थक इसके लिए कांग्रेस को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि सरकार चाहे कांग्रेस की रही हो, चाहे भाजपा की या फिर जनता दल सहित अन्य गठबंधनों की, उच्च शिक्षा में हमेशा से अगड़ी जातियों का दबदबा रहा है। ऐसा लगातार देखने में आता है कि अगड़ी जातियों के लिए मौजूद पदों पर भर्तियां हो जाती है, जबकि एससी, एसटी और ओबीसी के लिए मौजूद पदों को नॉट फाउंड सुटेबल यानी कि उपर्युक्त उम्मीदवार मौजूद नहीं है कह कर खाली छोड़ दिया जाता है। इस तरह अगड़ी जातियों का दखल उच्च शिक्षा में लगातार बढ़ता गया जबकि दलित, पिछड़े और आदिवासी समाज के युवा हाशिये पर रहे।

भाजपा पर भड़के भाजपा के कद्दावर दलित सांसद, कह दिया दलित विरोधी

भारतीय जनता पार्टी के एक दलित सांसद के बयान से केंद्र सरकार बैकफुट पर है और पीएम मोदी मुश्किल में। कर्नाटक के विजयपुरा सीट से सांसद रमेश जिगाजिनागी ने आरोप लगाया है कि भाजपा एक दलित विरोधी पार्टी है और यहां दलितो को दरकिनार कर दिया जाता है। रमेश जिगाजिनागी सात बार सांसद रहे हैं और इस बार वह विजयपुरा सीट से चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे हैं। दरअसल रमेश जिगाजिनागी का आरोप है कि ज्यादातर केंद्रीय मंत्री ऊंची जातियों से हैं और दलितों को दरकिनार किया गया है। उन्होंने भाजपा में शामिल होने को लेकर भी अफसोस जताया। उन्होंने मीडिया से बातचीत में कहा कि कई लोगों ने मुझे बीजेपी में ना जाने की सलाह दी थी, क्योंकि यह पार्टी ‘दलित विरोधी’ है।

सांसद का तर्क है कि दक्षिण भारत में सात बार चुनाव जीतने वाले वो अकेले दलित समाज के नेता हैं। मुझे मंत्री पद की मांग करने की कोई जरूरत नहीं है। दरअसल 72 साल के रमेश जिगाजिनागी पहली बार 1998 में लोकसभा चुनाव जीते थे। तब से लेकर अब तक वह लगातार जीतते आए हैं। वह दो बार मंत्री भी रह चुके हैं। यानी कि प्रदेश में वह एक कद्दावर दलित चेहरा हैं। बावजूद इसके उन्हें मंत्रिमंडल में जगह नहीं दी गई, जिसको लेकर उन्होंने खुलकर नाराजगी जाहिर कर दी है।

बता दें कि कर्नाटक में कुल 28 सीटें हैं और बीजेपी ने इस बार आधे से ज्यादा 17 सीटों पर जीत हासिल की है। जबकि एनडीए की सहयोगी जेडीएस ने दो और कांग्रेस पार्टी ने 9 सीटों पर जीत दर्ज की। कर्नाटक से मोदी मंत्रिमंडल में चार लोगों को जगह दी गई है। इसमें प्रह्लाद जोशी, शोभा करांदलाजे, वी सोमन्ना और जेडीएस के एचडी कुमारस्वामी का नाम शामिल है। मोदी मंत्रिमंडल में विभिन्न समाजों के प्रतिनिधित्व की बात करें तो इस बार मंत्रिमंडल में 29 ओबीसी, 28 जनरल, 10 एससी और 5 एसटी शामिल हैं। ऐसे में जब कर्नाटक से चार लोगों को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है, रमेश जिगाजानागी का दर्द जायज लगता है।

के. आर्मस्ट्रांग को श्रद्धांजलि देने के बाद बहनजी ने स्टॉलिन सरकार के खिलाफ खोला मोर्चा

तमिलनाडु बसपा स्टेट प्रेसिडेंट के. आर्मस्ट्रांग को श्रद्धांजलि देने चेन्नई पहुंची बसपा सुप्रीमों मायावती

तमिलनाडु बसपा के स्टेट प्रेसिडेंट के. आर्मस्ट्रांग की हत्या के बाद बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने जैसे ही तामिलनाडु जाने का ऐलान किया, राजनीतिक हड़कंप मच गया। और फिर जब रविवार 7 जुलाई को वह चेन्नई पहुंची तो स्टॉलिन सरकार के हाथ-पांव फूल गए। बहनजी ने अपनी पार्टी के नेता को श्रद्धांजलि देने के बाद राज्य सरकार से सीबीआई जांच की मांग कर डाली। स्टॉलीन सरकार पर हमला बोलते हुए उन्होंने राज्य की कानून व्यवस्था पर निशाना साधा। उन्होंने सरकार को घेरते हुए कहा कि- “मुझे ये भी मालूम हुआ कि जिन्होंने हत्या की है, वो अपराधी अभी तक पकड़े नहीं गए हैं। केवल खाना पूर्ति के लिए कुछ गिरफ्तारियां हुई हैं। हम राज्य सरकार से सीबीआई जांच की मांग करते हैं ताकि असली अपराधी पकड़े जा सकें।”

बसपा सुप्रीमों ने तमिलनाडु सरकार पर जोरदार हमला बोलते हुए कहा कि “यह किसी एक दलित नेता की हत्या का मामला नहीं है, बल्कि पूरा दलित समुदाय खतरे में है और कई दलित नेता डरे हुए हैं कि उनकी जान सुरक्षित नहीं है। राज्य सरकार इस हत्या को लेकर गंभीर नहीं है अन्यथा मुख्य दोषी सलाखों के पीछे होते। अगर राज्य सरकार ये मामला सीबीआई को नहीं सौंपती है तो इसका मतलब है कि इसमें उसकी भी मिलीभगत है।”

इस दौरान बसपा के नेशनल को-आर्डिनेटर और मायावती के उत्तराधिकारी आकाश आनंद भी चेन्नई में मौजूद रहें और के. आर्मस्ट्रांग को श्रद्धांजलि दी। दरअसल 5 जुलाई को बसपा के तमिलनाडु प्रदेश अध्यक्ष के. आर्मस्ट्रांग की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। हत्या तब की गई, जब वो अपने आवास के बाहर अपने समर्थकों से मिल रहे थे। तभी से बहुजन समाज में रोष है। आर्मस्ट्रांग पेशे से वकील थे और अंबेडकरवादी विचारधारा से जुड़े थे। साल 2006 में निकाय चुनाव में निर्दलीय पार्षद बनने के बाद वह बहुजन समाज पार्टी में शामिल हो गए थे। माना जाता है कि वह बसपा सुप्रीमो मायावती के भी काफी करीब थे। यही वजह रही कि बहनजी अपने वफादार पार्टी कार्यकर्ता को श्रद्धांजलि देने चेन्नई पहुंची।

ऐसे वक्त में जब लोकसभा चुनाव में बसपा एक भी सीट हासिल नहीं कर सकी है और उसके वोट शेयर 3 प्रतिशत से भी कम हो गए हैं, बहनजी का कार्यकर्ताओं के दुख में शामिल होना, पार्टी में नई ऊर्जा भर सकता है।

तामिलनाडु में जातिवाद को खत्म करने की शुरुआत, स्टॉलिन सरकार का बड़ा फैसला

पेरियार को आदर्श मानने वाली एम.के. स्टॉलिन सरकार ने तमिलनाडु में जातिवाद को जड़ से खत्म करने के लिए नया फार्मूला तैयार किया है। इसके तहत राज्य में स्कूल परिसर में धार्मिक कलाई बैंड, अंगूठियां और माथे पर तिलक जैसे चिन्हों पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। सरकार ने मद्रास हाई कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस के. चंदू की अध्यक्षता में जातिवाद को रोकने के लिए एक कमेटी बनाई थी। कमेटी ने मुख्यमंत्री स्टालिन को 610 पन्नों की रिपोर्ट सौंपी है, जिसने कई सिफारिश की गई है।

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि स्कूल के नाम से जाति संबंधी नाम हटाए जाएं। शिक्षकों का समय-समय पर ट्रांसफर हो ताकि वे उन इलाकों में ज्यादा नहीं रहे, जहां उनकी जाति का प्रभाव है। इसके अलावा जातिवाद को रोकने के लिए जो अन्य सिफारिश की गई है, उसमें,
  • सरकारी और निजी दोनों स्कूलों से जाति को संबोधित करने वाले उपनाम हटाए जाने की सिफारिश की गई है।
  • साथ ही यह भी कहा गया है कि,अटेंडेंस रजिस्टर में भी विद्यार्थियों की जाति नहीं लिखी जाए।
  • क्लास रूम में बैठने की व्यवस्था वर्णमाला के आधार पर हो।
  • क्लास 6 से 12 तक के विद्यार्थियों के लिए जातिगत भेदभाव, हिंसा, यौन उत्पीड़न तथा एससी-एसटी एक्ट जैसे कानूनों पर अनिवार्य रूप से कार्यक्रम हो।

रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की गई है कि 500 से ज्यादा छात्रों वाले हर माध्यमिक विद्यालय में एक स्कूल कल्याण अधिकारी होना चाहिए। निश्चित तौर पर एम.के. स्टॉलिन सरकार की जातिवाद को रोकने के लिए की गई यह कोशिश शानदार है। हालांकि तमिलनाडु के भाजपा अध्यक्ष धार्मिक प्रतीकों के उपयोग को बैन किये जाने का विरोध कर रहे हैं। लेकिन विरोध करने वाले यही लोग जातिवाद की घटनाओं पर चुप्पी साध लेते हैं। दरअसल पिछले साल तमिलनाडु के तिरुनेलवेली में कथित तौर पर दो दलित भाई-बहनों से ऊंची जाति के कुछ छात्रों ने मारपीट की थी। इस मामले ने काफी तूल पकड़ा था।

साल 2023 में आई नेशनल क्राईम रिकार्ड ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक साल 2018 से 2023 के चार सालों के दौरान दलित उत्पीड़न की एक लाख 90 हजार घटनाएं दर्ज की गई थी। इन चार सालों में तमिलनाडु में दलित उत्पीड़न के 5208 मामले दर्ज किए गए। जातिवाद के ऐसे मामले रोकने के लिए स्टॉलिन सरकार जिस तरह के कदम उठाने की तैयारी में है, उससे जातिवाद पर करारी चोट लगेगी। ऐसे उपाय अपनाने के लिए दूसरे राज्यों को भी सोचना चाहिए, ताकि देश भर में जातिवाद खत्म हो सके।

मोदी सरकार में हुए दो दर्जन पेपर लीक, जानिये, कब, कौन सा पेपर हुआ लीक

मोदी सरकार पेपर लीक सरकार है। यह आरोप है कांग्रेस पार्टी का। दरअसल पेपर लीक मामले में मोदी सरकार बुरी तरह घिर गई है। कांग्रेस पार्टी ने इसको बड़ा मुद्दा बनाते हुए अपने ट्विटर हैंडल से 2014 में केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद से अभी तक हुए पेपर लीक की सूची जारी कर सरकार पर करारा हमला बोला है। जानिये मोदी सरकार के अब तक के कार्यकाल में कितने पेपर लीक हुए हैं-

अगस्त 2014- आर्मी रिक्रूटमेंट एग्जाम जून 2015- AIPMT परीक्षा मार्च 2016- SSC CPO (SI/ASI) लिखित परीक्षा जून 2016- BA फर्स्ट इयर इंग्लिश का पेपर (दिल्ली युनिवर्सिटी) जुलाई 2016- NEET 2 पेपर लीक फरवरी 2017- आर्मी रिक्रूमटमेंट पेपर लीक मई 2017- SSC MTS पेपर लीक मई 2017- NEET पेपर लीक

2018- कंबाइंड ग्रेजुएशन लेवल एग्जाम मार्च 2018- क्लास 10th का गणित और 12th का इकोनॉमिक्स पेपर लीक दिसंबर 2018- गुजरात पुलिस कॉन्स्टेबल रिक्रूटमेंट पेपर लीक

मार्च 2019- इग्नू का MCA और BCA के थर्ड सेमेस्टर का पेपर मार्च 2019- महाराष्ट्र बोर्ड 10वीं कक्षा के दो पेपर लीक

फरवरी 2020- यूपी बोर्ड का 12वीं का इंग्लिश का पेपर सितंबर 2020- नेशनल लॉ एडमिशन टेस्ट का पेपर लीक फरवरी 2020- मणिपुर का 11th बोर्ड का पेपर लीक

नवंबर 2021- UPTET पेपर लीक दिसंबर 2021- GSSSB का पेपर लीक

मई 2022- BPSC कंबाइंड प्रिलिम्स पेपर लीक मार्च 2023- तेलंगाना SPSC असिस्टेंट इंजीनियर पेपर लीक मार्च 2023- असम में HSLC पेपर लीक

फरवरी 2024- यूपी पुलिस कॉन्सटेबल भर्ती परीक्षा फरवरी 2024- RO/ARO पेपर लीक मई 2024- NEET पेपर लीक जून 2024- UGC NET पेपर लीक

इन 25 पेपर लीक में जिन परीक्षाओं का जिक्र किया गया है वह बेहद महत्वपूर्ण परीक्षाएं हैं। साफ है कि बीते 10 सालों में केंद्र में बैठी मोदी सरकार और तमाम राज्य सरकारों के नाक के नीचे, एक के बाद एक 25 परीक्षाओं में पेपर लीक हुए। इसने हजारों युवाओं की जिंदगी खराब कर दी। कहां तो सरकार को ऐसी घटनाओं पर नकेल कसनी चाहिए थी, लेकिन इन दस सालों में इस पर गंभीर चर्चा तक नहीं हो सकी। हालांकि अब विपक्ष ने साफ कर दिया है कि वह देश के करोड़ों युवाओं से जुड़े इस मुद्दे पर चुप नहीं बैठेगी। विपक्ष के इस तेवर से प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार बैकफुट पर है।

आदिवासी समाज के कितने होंगे ओडिशा के आदिवासी मुख्यमंत्री मोहन माझी

ओडिशा के नए मुख्यमंत्री मोहन चरण माझीनवीन पटनायक के 24 साल की बादशाहत को खत्म कर मोहन चरण माझी ओडिसा के मुख्यमंत्री बन गए हैं। बुधवार को भुवनेश्वर के जनता मैदान में शाम पांच बजे उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। भाजपा ने दो उपमुख्यमंत्री भी बनाया हैं। इसमें लगातार छठी बार विधायक बने बलांगीर के राज परिवार से ताल्लुक रखने वाले कनक वर्धन सिंहदेव हैं। तो दूसरी डिप्टी सीएम पहली बार विधायक बनी प्रभाती परिड़ा बनाई गई हैं। परिड़ा राज्य भाजपा के महिला मोर्चा की अध्यक्ष रह चुकी हैं। 12 जून को मोहन चरण माझी के शपथ ग्रहण के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृहमंत्री अमित शाह सहित तमाम दिग्गज नेता मौजूद थे।

लेकिन सवाल है कि भाजपा ने आखिर आदिवासी समाज के मोहन माझी को ही क्यों चुना? क्या इसके पीछे लोकसभा के चुनावी नतीजे हैं, जिसमें भाजपा को 2019 के मुकाबले 26 रिजर्व सीटों पर मात खानी पड़ी है। और इसी बेचैनी में भाजपा आदिवासी बहुलता के हिसाब से तीसरे नंबर के राज्य ओडिसा में आदिवासी समाज के नेता को मुख्यमंत्री की कमान सौंप दी है।

पहले बात करते हैं नए सीएम मोहन चरण माझी की। माझी लंबे समय से भाजपा से जुड़े रहे हैं और उत्तरी ओडिशा के केऊंझर जो कि अनुसूचित जनजाति के लिए सुरक्षित सीट है, वहां से चौथी बार विधायक बने हैं। माझी के नाम पर मुहर लगा कर भाजपा ने छत्तीसगढ़ और राजस्थान की तरह ही एक बार फिर से सबको चौंका दिया है। ओडिसा में आदिवासी समाज की आबादी करीब 23 प्रतिशत है। ओडिसा की कुल आबादी 4 करोड़ है, जिसमें आदिवासी समाज की आबादी एक करोड़ है। जबकि देश की कुल आदिवासी आबादी की 9.20 फीसदी आबादी ओडिशा में है। यानी ओडिसा के जरिये भाजपा देश भर के आदिवासी समाज को एक मैसेज दिया है।

ओडिशा के मुख्यमंत्री के तौर पर मोहन चरण माझी के नाम पर मुहर लगाते राजनाथ सिंहदरअसल लोकसभा चुनाव में आरक्षित सीटों पर करारी हार के बाद भाजपा में बेचैनी है। साथ ही जिस तरह से 400 पार का नारा देने के बावजूद भाजपा खुद अपने बूते सरकार भी नहीं बना सकी, और एनडीए गठबंधन पर निर्भर हो गई है, उसने भाजपा को डरा दिया है। ऐसे में भाजपा ने जिस तरह छत्तीसगढ़ के बाद ओडिसा में आदिवासी समाज के नेतृत्व दिया है, वह वंचित समाज के बीच यह संदेश देना चाहती है कि सिर्फ भाजपा की दलितों और आदिवासियों को प्रतिनिधित्व दे सकती है। यही वजह है कि भाजपा ने छत्तीसगढ़ में आदिवासी समाज के विष्णु देव साय के बाद ओडिसा में मोहन माझी को सत्ता की कमान दे दी है।

अगर इसको प्रतिनिधित्व के लिहाज से देखें तो आदिवासी बहुल राज्यों के लिए एक बड़ा कदम है। क्योंकि आदिवासियों की बहुलता वाले प्रदेश में इसी समाज का मुख्यमंत्री इस समाज की असली भलाई सोच और कर कर सकता है। जैसा कि झारखंड के मामले में वकालत की जाती है। लेकिन बात बस इतनी सी नहीं है, बल्कि इसके कई और भी फैक्टर है।

ओडिशा के उत्तर में झारखंड और पश्चिम बंगाल, पश्चिम में छत्तीसगढ़ और दक्षिण में आंध्र प्रदेश राज्य है। इसमें झारखंड और पश्चिम बंगाल दोनों राज्यों में भाजपा सत्ता से दूर है। बिहार के अलावा पश्चिम बंगाल की सत्ता को हासिल करना भाजपा का एक बड़ा सपना है। तो झारखंड में भी भाजपा दुबारा सत्ता में वापसी नहीं कर पाई है। साल के आखिर में झारखंड में विधानसभा चुनाव भी है। ऐसे में भाजपा झारखंड के आदिवासी समाज को संदेश देना चाहती है कि वह उन्हें सत्ता के शीर्ष पर बैठाएगा, जैसा कि उसने पिछली बार नहीं किया था।

मंदिर परिसर में ओडिशा के नए मुख्यमंत्री मोहन चरण माझीहालांकि इन सबके बावजूद छत्तीसगढ़ में विष्णु देव साय और अब ओडिशा में मोहन चरण माझी के रूप में भाजपा ने उन्हीं नेताओं को मौका दिया है, जो भाजपा और संघ की विचारधारा से निकले और उसमें रचे-बसे हुए हैं। मोहन माझी ने 90 के दशक में सरस्वती शिशु मंदिर में शिक्षक के रूप में अपने करियर की शुरुआत की थी। 1997 में वो सरपंच बने और 2000 में भाजपा के टिकट पर केऊंझर से पहली बार विधायक बने। 24 साल तक नवीन पटनायक ने जिस तरह ओडिशा में अजेय राज किया, माझी उनके खिलाफ मुखर रहे। इसने उन्हें आदिवासी समाज के साथ-साथ भाजपा के भीतर भी लोकप्रिय किया। और इन सबके बाद जिस तरह मुख्यमंत्री बनते ही अपने पहले फैसले में उन्होंने जगन्नाथ पुरी मंदिर के सभी चारों दरवाजे खोलने और मंदिर के रखरखाव के लिए 500 करोड़ का कोष स्थापित करने का आदेश दिया है, वह उसे भाजपा के सबसे बड़े एजेंडे ‘धर्म’ से भी जोड़ता है। देखना होगा कि भाजपा ने जिस तरह छत्तीसगढ़ के बाद अब ओडिशा में आदिवासी समाज का मुख्यमंत्री दिया है, वो भाजपा के एजेंडे को पूरा करने के अलावा आदिवासी समाज का कितना भला करते हैं।

AANA announce annual award, Mr. J.V Pawar get Dr. Ambedkar International Award

The Ambedkar Association of North America (AANA) is happy to share that our annual retreat was a big success. We had over 150 participants from all over USA attend the retreat. The retreat was held from May 24, 2024 until May 27, 2024 in Keezeltown, VA, USA. Dr. Rajratna Ambedkar was the chief guest who joined us all the way from India. We also distributed our annual awards for this year as follows:

Dr. Ambedkar International Award for Mr. J.V Pawar Savitrimai Phule International Award for Ms. Nirmala Grace Mooknayak Excellency in Journalism Award to The News Beak Social Media Channel

We had several community building events, games and activities for children and adults. We had several close discussions with Dr. Rajratna Ambedkar and other members on how to take Babasaheb’s caravan forward. Additionally, we also had a ceremony to honor and remember Mata Ramabai Ambedkar on her death anniversary with a member of her family, Dr. Rajratna Ambedkar present, which made this ceremony special.

With our goal to bring our community together holistically, our annual retreat has become an event that our members look forward to, throughout the year.

Press Release by AANA

मध्यप्रदेश के सागर में मनुवाद का नंगा नाच, दस महीने में एक दलित परिवार में तीन हत्याएं

पहले उसके साथ यौन उत्पीड़न किया गया, जब भाई ने आवाज उठाई तो उसकी हत्या कर दी गई। मामले में चाचा राजेन्द्र गवाह थे, तो 25 मई को उनकी भी हत्या कर दी गई और जब चाचा का शव लेने के लिए पीड़िता अंजना एंबुलेंस से गई तो एंबुलेंस से संदिग्ध हालात में गिरने पर उसकी भी मौत हो गई है। इस घटना को लेकर दुनिया भर के दलितों में रोष है। कुछ लोग इसे हत्या बता रहे हैं तो पुलिस जांच की बात कह रही है। मध्य प्रदेश के सागर में घटी इस घटना ने समाज का घिनौना चेहरा एक बार फिर उजागर कर दिया है। यह सारा घटनाक्रम अगस्त 2023 में शुरू हुआ, जब 18 वर्षीय युवक नितिन अहिरवार की जातिवादी गुंडो ने पीट-पीट कर हत्या कर दी। क्योंकि उसने बहन के साथ हुई यौन उत्पीड़न का विरोध किया था। इस मामले में ऊंची जाति के जातिवादी गुंडे उस पर समझौते के लिए दबाव डाल रहे थे। भाई की हत्या के बाद पीड़िता अंजना ने इस मामले में एफआईआर दर्ज कराई। लालू की हत्या के तीन गवाह थे। चाचा राजेन्द्र, दूसरी खुद अंजना और तीसरी उसकी माँ। तब से ऊंची जाति के जातिवादी गुंडे लगातार परिवार पर बयान बदलने के लिए दबाव बना रहे थे, लेकिन परिवार न्याय के लिए लड़ रहा था। इस मामले में अब एक के बाद तीन मौत हो चुकी है।

 पिछले साल अगस्त महीने में जब यह घटना घटी, उसी दौरान सागर में सतगुरु रविदास जी का मंदिर बनाने के लिए 101 करोड़ की लागत से 11.21 एकड़ भूमि में रविदास मंदिर बनाने की आधारशिला प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रखी थी। दलितों को लुभाने के लिए नेता ऐसा ही करते हैं। लेकिन जमीन पर दलितों के साथ हो रहे अत्याचार पर खामोश हो जाते हैं। जब यह घटना घटी उस समय भी मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार थी और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान थे। इस मामले में शुरू से ही पीड़िता द्वारा अंकित ठाकुर का नाम लिया जा रहा था, लेकिन उसकी गिरफ्तारी नहीं हुई। आरोप है कि उसे राजनीतिक संरक्षण मिला हुआ है। अंजना इस मामले में ज्यादा मुखर थी। वह एक पढ़ी-लिखी लड़की थी जो अपने अधिकारों को लेकर जागरूक थी।

घटना के बाद जब हंगामा मचा है तो मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव बुधवार 29 मई को पीड़ित परिवार से मिलने उसके गांव बड़ोदिया नोनागिर पहुंचे और पुलिस चौकी खोलने का आश्वासन दिया। साथ ही मृतक राजेन्द्र अहिरवार के परिवार को 8 लाख 25 हजार रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की। हालांकि अब मुख्यमंत्री मोहन यादव चाहे तो वादे करें, भाजपा सरकार और स्थानीय प्रशासन की भूमिका इस पूरे मामले में शुरू से ही संदिग्ध रही है। ‘दलित दस्तक’ को कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह के हवाले से यह खबर मिली है कि परिवार के सदस्यों का आरोप है कि उन्हें प्रशासन ने जो सुरक्षा दी थी और जो कैमरे लगाए गए थे, उसे हाल ही में हटा दिया गया। इस पूरे मामले में एक ही परिवार के दो सदस्यों की हत्या और अंजना की संदिग्ध हालत में हुई मौत तमाम सवाल खड़े करते हैं।

अभिजात वर्गीय चरित्र से आज़ाद होता हिंदी सिनेमा

सिनेमा परिभाषित रूप से समाज का आईना है, पर साथ ही साथ ये मनोरंजन का साधन और एक व्यवसाय भी है। भारतीय सिनेमा इन तीनो अवधारणाओं के बीच कहीं झूलता रहा है। एक तरफ जब सिनेमा समाज को प्रस्तुत करता है तब वह कई बार मनोरंजक नहीं रह जाता। साथ में व्यवसायिक रूप से सफल भी नहीं होता। इसी पसोपेश में भारतीय सिनेमा लंबे समय तक आर्थिक लाभ को ज्यादा महत्व देता रहा है। इसके चलते करण जौहर, सूरज बड़जात्या की अलग आलीशान अभिजात वर्ग की दुनिया की कहानी सिनेमा के माध्यम से परोसी जाती रही।

ये मनोरंजक होने के साथ व्यवसायिक रूप से सफल भी थीं, पर भारत के किसी छोटे शहर- कस्बे में रहने वाला व्यक्ति इनसे खुद को जोड़ नहीं पाता था। उदाहरण के लिए करण जौहर की कभी खुशी कभी गम, कुछ कुछ होता है, कभी अलविदा ना कहना, ये सिनेमा मनोरंजक तो थे; पर हीरो का जीवन, उसका घर, स्कूल, कॉलेज का भारत के किसी भी स्कूल, कॉलेज या घर से दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं था। इससे भारत का बहुसंख्यक मध्यमवर्ग बॉस की डांट और आर्थिक मजबूरियों से उपजे अपने दिन भर की थकान को कुछ समय के लिए भूल कर एक आभासी दुनिया में खो जाता था। लेकिन वह खुद को उस सिनेमा और उसके हीरो से जोड़ नहीं पाता था।

दूसरा 90 के दशक में एक अलग ही सिनेमा चल रहा था जहां फ़िल्म में बहुत ज्यादा गाने होते थे, महिला को उसके शरीर से ऑब्जेक्टिफाई किया जाता था और यही चलन विकसित हो कर 2005 के बाद कि फिल्मों में ‘आइटम सोंग’ के रूप में सामने आता है। हीरो हीरोइन के संबंध में एक रटी रटाई स्क्रिप्ट लगभग हर फिल्म में फॉलो की जाती थी कि पहले हीरो हीरोइन को छेड़ेगा, उसका पीछा करेगा, उसके लिए कुछ गुंडों से लड़ेगा फिर एक गाना होगा अंत में हीरोइन को हीरो से प्यार हो जाएगा।

समान कहानी होने के बाद भी इस तरह का सिनेमा व्यवसायिक तौर पर भारत में बहुत सफल रहा। इस बीच कुछ गम्भीर सामाजिक विमर्श से जुड़ी फिल्में भी आईं पर वे इस चकाचौंध भरे सिनेमा के सामने नहीं टिक पाईं। जिसके कारण तिग्मांशु धूलिया, अनुराग कश्यप, शेखर कपूर, गुलज़ार जैसे गम्भीर सिनेमा बनाने वाले निर्देशक बॉलीवुड में कहीं नेपथ्य में रहे।

भारतीय सिनेमा का ये दौर गैंग्स ऑफ वासेपुर के आने तक चलता रहा पर जैसे ही ये फ़िल्म आई भारतीय सिनेमा हमेशा के लिए बदल गया। इस फ़िल्म में पात्रों की भाषा, कपड़े, घर, स्कूल, कॉलेज, जीवन की समस्याएं सब कुछ बहुसंख्यक मध्यमवर्गीय लोगों की तरह थे। इस मूवी में फैजल खान नाम का किरदार बदलते भारत की कहानी बयां करता है। इस फ़िल्म ने ना सिर्फ भारतीय सिनेमा को उसके ‘अभिजातवर्गीय चरित्र’ से आज़ाद कराया बल्कि सिनेमा में खूबसूरत गुलदस्ते की तरह उपयोग होने वाली हीरोइन को भी स्वतंत्रता दिलाई।

इस फ़िल्म की सफलता के बाद छोटे शहरों- कस्बों से निकलने वाली कहानियों की ओर भारतीय सिनेमा मुड़ गया जिसमें मशान, मांझी द माउंटेन मैन, नील वटे सन्नाटा प्रमुख हैं। जब सिनेमा में यह मध्यमवर्गीय क्रांति चल रही थी उसी समय ओटीटी प्लेटफार्म भी आते हैं जिसने भारतीय सिनेमा का सम्पूर्ण स्वरूप ही बदल दिया मिर्जापुर, गुल्लक, पंचायत, कोटा फैक्ट्री, ये मेरी फैमिली है जैसी वेब सीरीज के गुड्डू पंडित, बबलू पंडित, मुन्ना भैया, दीपक जैसे पात्र आम भारतीय से पहनावा, रहनसहन, सोच व भाषाई स्तर पर बहुत नजदीक थे। इन में से हर पात्र को हमने अपने छोटे शहर, कस्बे, गांव में देखा हुआ है ये पात्र 90 के दशक के राहुल और राज की तरह काल्पनिक नहीं लग रहे थे।

हाल ही में आई लापता लेडीज भारतीय सिनेमा के विकास का चरम है। एक सरल और सहज कहानी। घूंघट के कारण बदल गई दुल्हनों की कहानी के जरिये जिस तरह अलग-अलग किरदारों की कहानी कहती औरतों की दुनिया को नए तरीके से दिखाया गया है, वह लाजवाब है। एक औरत का आत्मनिर्भर होना कितना जरूरी है, यह फिल्म बड़ी सहजता से कह जाती है। फिल्म में हर पात्र का कहा गया एक-एक वाक्य गम्भीर सामाजिक विमर्श की गुंजाइश रखता है। एक सीन में दीपक की माँ अपनी सास से कहती है कि “अम्मा हम महिलाएं सास, बहु, देवरानी तो बन जाती हैं पर कभी सहेली क्यों नहीं बन पाती”। यह डायलाग भारत के संयुक्त परिवारों की ऐसी सच्चाई बताती है जिस पर कभी ध्यान ही नहीं दिया गया।

 कहानी में प्रेम भी है पर वो फिल्मी नहीं, पवित्र और मीठा है। इसमें इंतज़ार है, चिंता है, अनिष्ट का भय है और अटूट विश्वास है। फ़िल्म देखते समय कई बार हम कहानी को बिना संवाद के भी महसूस कर सकते हैं। आखिर में जब फूल और दीपक मिलते हैं तो दर्शकों की आंखों गिली कर जाते हैं।

 फ़िल्म में हर पात्र की वेशभूषा, भाषा, रहन-सहन एकदम साधारण है। किरण राव के निर्देशन में फिल्म ने हर फ्रेम में बिना विवाद के कई गम्भीर मुद्दों को छुआ है। ये फ़िल्म भारत में ना केवल महिलावादी आंदोलन को आगे ले जाएगा बल्कि भारतीय सिनेमा को भी नई दिशा देगी। अब कहानीकार, निर्देशक और फ़िल्म निर्माता फ़िल्म की व्यवसायिक सफलता, असफलता की चिंता के परे सिनेमा को उसके परिभाषित अवधारणा “सिनेमा समाज का आईना है” के तौर पर दिखा रहे हैं।


लेखक बुद्ध प्रिय सम्राट रिसर्च स्कॉलर हैं। अस्तित्वहीन आस्था एवं भगवान और उदुम्बरा नाम से दो किताबें भी लिख चुके हैं।

सोशल मीडिया में मोदी से आगे राहुल गांधी, देखिए चौंकाने वाला सर्वे

लोकसभा चुनाव में एक लड़ाई जमीन पर राजनीतिक सभाओं और रैलियों के रूप में चल रही थी तो एक लड़ाई सोशल मीडिया में भी लड़ी जा रही थी। चाहे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हों, या राहुल गांधी या फिर अखिलेश, तेजस्वी या फिर दक्षिण के नेता, हर कोई अपनी बात हर तरीके से जनता तक पहुंचाने की होड़ में शामिल था।

दैनिक भास्कर ने सोशल मीडिया की इस लड़ाई का 50 दिन का लेखा जोखा निकाला है। और भास्कर के मुताबिक सोशल मीडिया की लड़ाई जीती है, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने। सोशल मीडिया पर नरेन्द्र मोदी के मुकाबले जनता ने राहुल गांधी को ज्यादा पसंद किया है। और राहुल गांधी पीएम मोदी पर काफी भारी पड़े हैं। आंकड़ों की बात करें तो राहुल गांधी को पीएम मोदी के मुकाबले 21 करोड़ ज्यादा लोगों ने देखा है। साथ ही राहुल गांधी को मोदी के मुकाबले दोगुने लाइक्स मिले हैं। राहुल गांधी की पोस्ट मोदी के मुकाबले तीन गुना ज्यादा शेयर किए गए हैं।

राहुल गांधी और नरेन्द्र मोदी से इतर हिन्दी पट्टी के नेताओं को देखें तो तेजस्वी यादव भी सोशल मीडिया पर खासे एक्टिव रहे हैं और उनके हर वीडियो को लाखों लोगों ने लगातार देखा है। कन्हैया कुमार के भाषण और वीडियो भी सोशल मीडिया पर खूब पसंद किये गए।

जहां तक भास्कर द्वारा नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी को लेकर जारी इस आंकड़े को लोगों की पसंद माना जाए तो साफ है कि नेता के तौर पर नरेन्द्र मोदी कहीं न कहीं अब युवा वर्ग को पहले जैसा इंप्रेस नहीं कर पा रहे हैं। तो वहीं जनता को राहुल गांधी की एनर्जी पसंद आ रही है। साफ है कि अगर सोशल मीडिया की यह पसंद वोटों के रूप में ईवीएम में बंद हुए होंगे तो लोकसभा चुनाव के नतीजे चौंकाने वाले होंगे।

सारनाथ और श्रावस्ती में धूमधाम से मनी बुद्ध पूर्णिमा, देखिए शानदार तस्वीरें

बौद्ध धर्म में श्रावस्ती का काफी महत्व है। श्रावस्ती का जेतवन वह स्थान है जहां तथागत बुद्ध ने अपने जीवन के 18 वर्षावास बिताया था। यहीं उन्होंने अंगुलीमाल डाकू से लोगों की रक्षा की थी और उसे धम्म के रास्ते पर लेकर आए थे। तो सारनाथ वह स्थान है, जहां तथागत बुद्ध ने पंचवर्गीय भिक्खुओं को ज्ञान प्राप्ति के बाद पहला उपदेश दिया था। इन दोनों प्रमुख बौद्ध स्थलों को लेकर लोगों का उत्साह बढ़ता जा रहा है। वैसे तो आए दिन यहां पर्यटकों का तांता लगा रहता है, लेकिन बुद्ध पूर्णिमा के मौके पर यहां खास आयोजन होता है।

इस साल भी 23 मई को 2568वीं त्रिविध पावनी बैशाख पूर्णिमा यानी बुद्ध पूर्णिमा के मौके पर यहां पूरे दिन बौद्ध धर्म के अनुयायियों का तांता लगा रहा। जेतवन में पूरे दिन भंडारा चलता रहा तो शाम को जेतवन को 2568 दीपक प्रज्वलित किया गया। महाविहार गंधकुटी, जहां तथागत बुद्ध वर्षावास के दौरान रहा करते थे, उसे गुलाब की पंखुड़ियों से सजाया गया। इस मौके पर हजारों बौद्ध अनुयायियों ने प्रसाद ग्रहण किया। श्रावस्ती स्थित जेतवन पर यह शानदार आयोजन भंते देवेन्द्र के निर्देशन में उपासक विजय बौद्ध के सहयोग से हुआ।

दूसरी ओर तथागत बुद्ध की प्रथम उपदेश स्थली सारनाथ में तथागत बुद्ध के अवशेष को दर्शन के लिए रखा गया। तथागत बुद्ध की पवित्र अस्थि धातु को प्रथम उपदेश स्थल पर मुलगंधकुटी विहार में उपासकों के दर्शन के लिए रखा गया। इस मौके पर देश-विदेश से 50 हजार से अधिक बौद्ध भिक्षु और अनुयायियों ने तथागत बुद्ध के पवित्र अस्थि के दर्शन किये। वैसे तो सारनाथ में अलग-अलग देशों के तमाम बुद्ध विहार हैं, लेकिन भारतीय बौद्धों का एकमात्र बुद्ध विहार धम्मा लर्निंग सेंटर हैं।

सारनाथ में आयोजित प्रमुख कार्यक्रम धम्मा लर्निंग सेंटर के प्रमुख भंते चंन्दिमा के निर्देशन में और सेंटर से जुड़े तमाम उपासकों के सहयोग से कार्यक्रम हुआ। इस मौके पर सुबह 10 बजे से रात को 10 बजे तक भिक्खु संघ एवं उपासकों को सामूहिक भोजन दान दिया गया। बता दें कि दिनों-दिनों बौद्ध धर्म का कारवां बढ़ता जा रहा है। बैसाख पूर्णिमा के मौके पर यह साफ तौर पर देखा गया।

बुद्ध पूर्णिमा पर भारत में बना इतिहास, पूरा हुआ 2300 साल पुराना सपना

श्रीलंका के बोमालुआ टेंपल अनुराधापुरा के प्रमुख 26 मार्च को भारतीय उपासक विजय बौद्ध को बोधि वृक्ष का प्रतिरूप सौंपते हुएबुद्ध पूर्णिमा के मौके पर दुनिया भर के बौद्ध समाज में जश्न का माहौल रहा। लेकिन भारत के लिए इस बार की बुद्ध पूर्णिमा खास रही। दरअसल इस बार श्रीलंका से उस बोधि वृक्ष के प्रतिरूप को भारत लाया गया, जिसे महान सम्राट अशोक की पुत्री संघमित्रा 2300 साल पहले प्रतिरूप के रूप में बोधगया से श्रीलंका लेकर गई थीं।

भारत के लार्ड बुद्ध वेलफेयर फाउंडेशन के सचिव दीवाकर पटेल की कोशिश और भंते देवेन्द्र की पहल पर यह हो पाया। इसे अमलीजामा पहनाया लखनऊ के व्यवसायी और विजय एनर्जी इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड के मालिक बौद्ध उपासक विजय बौद्ध ने। इसके लिए 2500 अमेरिकी डालर यानी तकरीबन दो लाख रुपये की फीस भी जमा की गई।

यह पहली बार था जब इस बोधि वृक्ष के प्रतिरूप को आधिकारिक तौर पर भारत लाया गया है। यह काम मार्च महीने में हुआ। बोधि वृक्ष के इस प्रतिरूप को भारत लाने के लिए उपासक विजय बौद्ध श्रीलंका गए थे, जहां बोमालुआ टेंपल अनुराधापुरा के प्रमुख ने बीते 26 मार्च को विजय बौद्ध को बोधि वृक्ष का प्रतिरूप सौंपा।

इस बोधि बृक्ष की कहानी बौद्ध परंपरा का इतिहास बताती है, साथ ही यह भी बताती है कि भारत के बाहर बौद्ध धर्म कैसे पहुंचा। करीब 2300 साल पहले महान सम्राट असोक के पुत्र महेन्द्र धम्म का प्रसार करने श्रीलंका पहुंचे थे। वहां के राजा और उपासको ने उनसे कहा कि आपके जाने बाद क्या होगा? तब भंते महेंद्र ने अपने पिता सम्राट असोक से आग्रह कर बहन संघमित्रा से बोध गया से महाबोधि वृक्ष का सपलिंग यानी प्रतिरूप श्रीलंका लाने को कहा। अब उसी विशाल बोधिवृक्ष के प्रतिरूप को वापस भारत लाया गया।

इस बोधि वृक्ष को उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती में, जहां तथागत बुद्ध घूम-घूम कर धम्म का उपदेश देते थे, वहां के बलरामपुर के लालनगर गांव में 31 मार्च को रोपित किया गया। दरअसल 31 मार्च को यहां बौद्ध भिक्खुओं का द्वितीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हुआ, जिसमें देश-विदेश के बौद्ध भिक्षुओं का जमावड़ा लगा था। इसी दौरान श्रीलंका से लाए बोधिवृक्ष को रोपित किया गया। इस मौके पर लाल नगर गांव में 84 फीट ऊंचे अशोक स्तंभ का निर्माण भी कराया जा रहा है।

निर्माण कार्य पूरा होने के बाद यह स्तंभ महान गौतम बुद्ध के 84 हजार उपदेशों का संदेश देगा। 31 मार्च को अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलन के दौरान धम्म स्थल पर पांच देशों के पौधे रोपित किये गए। इस दौरान सारनाथ की तरह चार मुख वाले शेरो की प्रतिमा के सामने पांच तीर्थ स्थलों का पौधा बोधि वृक्ष पीपल लगाया जाएगा। पहले मुख के सामने नेपाल, दूसरे मुख के सामने तथागत की जन्म स्थली लुम्बिनी, तीसरे मुख के सामने ज्ञान स्थली बोधगया और चौथे मुख के सामने महा परिनिर्वाण स्थली कुशीनगर से लाए गए पौधे रोपित होंगे। उपासक विजय बौद्ध द्वारा श्रीलंका से लाए गए पौधे को बीच में रोपित किया गया है।