(लेखक- अविनास दास) जनवरी, 2021 में रवि मुंबई आये थे। रांची में डॉक्टरों को कुछ शक़ हुआ, तो उन्हें टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल रेफ़र किया था। जब मालूम पड़ा कि रवि को आख़िरी स्टेज का लंग कैंसर है, उस वक़्त मैं उनके साथ था। ज़ाहिर है, हमारे पैरों के नीचे की ज़मीन ग़ायब हो चुकी थी। रवि रोने लगे। लेकिन उसके बाद से मैंने कभी रवि को रोते नहीं देखा। उसी दिन उन्होंने तय कर लिया था कि अगर उनके पास कम से कम छह महीने हैं, तो इन छह महीनों में क्या क्या करना है और अधिकतम साल भर है, तो साल भर में क्या क्या करना है। वह बचे हुए जीवन को जीने के लिए इस रफ़्तार में दौड़े कि मौत को उन तक पहुंचने में लगभग चार साल लग गये। डॉक्टरों की दी हुई समय सीमा से बहुत ज़्यादा जी कर गये। इसकी वजह उनकी जिजीविषा के अलावा और कुछ नहीं थी।
हम नब्बे के दशक के आख़िरी सालों में एक दूसरे से जुड़े। प्रभात ख़बर में काम करते हुए जब हरिवंश जी ने मुझे चंद्रशेखर रचनावली के संपादन के लिए दिल्ली भेजा और इस काम के लिए मुझे कोई सहयोगी साथ रखने को कहा, तो मैं रवि को अपने साथ ले गया। उसके बाद रवि ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। प्रभात ख़बर के देवघर संस्करण का पहला संपादक मैं था और मेरे बाद रवि को हरिवंश जी ने मेरी जगह भेजा। रवि जागरण और भास्कर समूह का अहम हिस्सा रहे। आख़िरी वर्षों में बीबीसी से जुड़े और इस मीडिया ग्रुप ने उनकी बीमारी ज़ाहिर होने के बाद जिस तरह से उनका साथ दिया, वह अद्भुत है, अनुकरणीय है।
रवि कीमो के लिए थोड़े थोड़े महीनों पर जब भी मुंबई आते, हमारी मुलाक़ात होती थी। वह हमेशा मुस्कुराते हुए और उत्साह से भरे हुए नज़र आते थे। जैसे कैंसर ने उन्हें कोई अलौकिक ऊर्जा दे दी हो। बचे हुए जीवन को वह बादशाह की तरह जीना चाहते थे और जी रहे थे। उन्होंने इस दरम्यान के हर पल को अपने कैमरे में क़ैद किया। “कैंसर वाला कैमरा” की प्रदर्शनी शृंखलाएं आयोजित की और उससे होने वाली आमदनी का बड़ा हिस्सा दूसरे कैंसर पीड़ितों की मदद के लिए दान में दिया।
यह देखना भी कमाल था कि इस बीच उनकी पत्नी संगीता एक बेहद घरेलू महिला से किस तरह जुझारू महिला के रूप में सामने आयीं। यह जो तस्वीर है, संगीता जी ने ही ली थी – जब मैं दो साल पहले परेल के पास तारदेव में उनसे मिलने गया था।
मुझे परसों उनके बेटे प्रतीक ने कॉल किया और कहा कि पापा की तबीयत बिगड़ रही है और अब शायद ही संभले। उसने मुझसे साफ़-साफ़ शब्दों में कहा कि सच बताऊं अंकल तो अब कुछ घंटे ही हैं। उसकी आवाज़ में ज़रा सी भी थरथराहट नहीं थी। आज भी जब मैं हॉस्पिटल पहुंचा, तो उससे पूछा कि सब ठीक है न – उसने बड़े ही संयत स्वर में कहा, “ही पास्ड अवे!” कब? दस मिनट पहले। प्रतीक अभी अभी आईआईटी दिल्ली से पढ़ कर निकला है और जीवन संघर्ष के नये दौर से मुख़ातिब है। उसे देख कर लगता है कि अब कोई भी झंझावात उसके आगे मामूली चीज़ होगी। वह अचानक से बहुत बड़ा हो गया है। हम सबसे भी बड़ा।
कल रवि का पार्थिव शरीर रांची पहुंचेगा। मैं भी साथ जा रहा हूं। वहां प्रेस क्लब में उन्हें दर्शनार्थ रखा जाएगा। मैंने रवि के साथ बहुत सारी यात्राएं की हैं। यह आख़िरी यात्रा भी मेरे हिस्से में लिखी थी।
फिल्म निर्देशक अविनाश दास के सोशल मीडिया एकाउंट एक्स से साभार।
लखनऊ। भदन्ताचार्य बुद्धत्त पालि संवर्धन प्रतिष्ठान (बालाघाट, मध्यप्रदेश) की ओर से देश के विभिन्न शैक्षणिक व सामाजिक संस्थाओं के साथ मिलकर पालि पखवाड़ा महोत्सव के तहत विविध कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे है। इसीक्रम में लखनऊ स्थित अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान परिसर में शनिवार को विचार संगोष्ठी आयोजित हुई।
इस दौरान वक्ताओं ने पालि भाषा-साहित्य एवं बौद्ध पर्यटन के विकास की सम्भावनाएं विषय पर अपने विचार साझा किए। संगोष्ठी के मुख्य वक्ता भंते सुभीत ने कहा-बौद्ध धम्म के प्रचार-प्रसार के लिए सरकारों से ज्यादा समाज की जिम्मेदारी है। समाज जब तक जागरूक नहीं होगा। धम्म का प्रचार-प्रसार कर पाना मुश्किल है।
वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी डॉ. राजेश चंद्रा ने कहा कि बौद्ध धम्म का प्रचार-प्रसार तब शुरू होगा, जब हम अपने बच्चों को पाली भाषा एवं साहित्य की शिक्षा देंगे। केंद्रीय संस्कृति विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर डॉ. प्रफुल्ल गणपाल ने कहा कि भगवान बुद्ध की शिक्षा मानव कल्याण पर केंद्रित थी। विश्व शांति व कल्याण को प्राप्त करने का मार्ग विपश्यना है।
अध्यक्षीय भाषण में केंद्रीय संस्कृति विश्वविद्यालय के सहायक निदेशक प्रो. गुरुचरण नेगी ने कहा कि जब भारत में बौद्ध धम्म का प्रभाव घटने लगा तो श्रीलंका और तिब्बत में इसका प्रभाव बढने लगा। धीरे-धीरे बौद्ध धम्म विश्व के दूसरे देशों में फैल गया। अब भारत के लोग फिर से बौद्ध धम्म की ओर लौट रहे है।
पाली भाषा के शोध छात्र भीमराव अम्बेडकर ने कहा-हमारे देश के नेता विदेश जाते हैं तो वहां बोलते हैं कि हम बुद्ध के देश से आए है, लेकिन जब वापस आते है तो देश में बौद्ध धम्म के विकास के लिए कुछ नहीं करते। हमारे समाज को इसके लिए जागरूक होना होगा।
डॉ. आर.के. सिंह ने कहा कि अब वक्त आ गया है कि हम पाली भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करवाने व राष्ट्रीय भाषा का दर्जा देने के अभियान को फिर से शुरू करें। संगोष्ठी में सुजाता अम्बेडकर, सिद्धार्थ कुमार, तथागत कुमार ने भी विचार व्यक्त किए। इस दौरान चेतना कुमारी, नेहा बौद्ध, सुमन कुमार सहित बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे।
नई दिल्ली। नवादा जिले के कृष्णा नगर गांव की सरकारी जमीन पर बसे अनुसूचित जाति के मजदूर, मुसहर व मोची परिवारों के 80 से ज्यादा घर जलाने की घटना को लेकर दलित नेताओं ने बिहार सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। बसपा अध्यक्ष मायावती सहित तमाम दलित नेताओं ने प्रदेश सरकार की जमकर आलोचना की है। वहीं आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।
उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने ट्वीट में कहा-“बिहार के नवादा में दबंगों द्वारा गरीब दलितों के काफी घरों को जलाकर राख करके उनका जीवन उजाड़ देने की घटना अति-दुखद व गंभीर। सरकार दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करने के साथ ही पीड़ितों को पुनः बसाने की व्यवस्था के लिए पूरी आर्थिक मदद भी करें।”
वहीं आजाद समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर ने इस घटना को जंगलराज का जीता-जागता उदाहरण कहा है। इसके साथ ही उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से पीड़ितों की आर्थिक मदद और मामले की न्यायिक जांच की मांग की है।
नवादा में हुई इस घटना के बाद सियासत भी तेज हो गई है। पूर्व उपमुख्यमंत्री और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने नीतीश सरकार पर निशाना साधा।
उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, ‘महा जंगलराज! महा दानवराज! महा राक्षसराज!’ नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार के राज में बिहार में आग ही आग। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बेफिक्र है। सहयोगी दल बेखबर! गरीब जले, मरे-इन्हें क्या? दलितों पर अत्याचार बर्दाश्त नहीं होगा।”
इधर, केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने घटना की निंदा करते हुए मुख्यमत्री नीतीश कुमार से पीड़ितों को आर्थिक मदद देने व मामले की न्यायिक जांच की मांग की है. उन्होंने एक्स पर लिखा, “मामले की न्यायिक जांच की भी मांग करता हूं ताकि भविष्य में कोई भी ऐसी घटना करने की हिमाकत भी न करे। पीड़ित परिजनों के प्रति मेरी और मेरे पार्टी की गहरी संवेदना है, मैं जल्द ही घटनास्थल का दौरा कर परिजनों से मुलाकात करूंगा।”
18 सितंबर की रात में बिहार में नवादा जिले के कृष्णा नगर गांव में बिहार सरकारी जमीन पर बसे हुए अनुसूचित जाति के मजदूर एवं गरीब मुसहर और मोची (चमार) जाति के लगभग 80 -100 परिवार के घरों में आग लगा दी गई और मारपीट करते हुए फायरिंग की गईं। इस दुखद, अपराधिक और निंदनीय घटना में सरगना नंदू पासवान सहित 50-60 लोग शामिल होने की बातें सामने आई हैं जिसमें अन्य भूमि माफियाओं एवं गुंडों के द्वारा रचे गए षडयंत्र शामिल हैं।
दरअसल पीड़ित गरीब मजदूर मुसहर और चमार लोग गत 25-30 से वर्षों से अधिक उस जमीन पर बसे हुए हैं। वहां उन्हें सरकारी सुविधाओं का भी लाभ मिलता रहा है।
अब वह जमीन काफी महंगी कई करोड़ हो चुकी है और उस पर स्थानीय भूमि माफिया एवं गुंडों द्वारा जबरन कब्जा करने की साज़िश लगभग 10 वर्षों से की जा रही हैं। यह कहा जा रहा है कि उन लोगों ने उस इलाके के एक अनुपस्थित किसी जमींदार से कुछ कागजात बनवाकर अपना दावा सरकारी आफिस में दायर किया है जिसमें नंदू पासवान सहित कई यादव और अन्य लोग शामिल हैं। कहा जा रहा है कि अधिकारियों की उदासीनता और भ्रष्टाचार के कारण स्थानीय सरकारी आफिस में यह विवाद अभी भी लंबित है।
इससे प्रतीत होता है कि यह मामला जाति विद्वेष, जाति संघर्ष और हिंसा का नहीं है , बल्कि भूमि माफियाओं और गुंडों द्वारा उस जमीन पर कब्जा करने का है। इस उद्देश्य के लिए ही कल शाम उन घरों आग लगा दी गई जिससे बड़ी संख्या में पालतू जानवर जल कर मर गए हैं और चल अचल संपत्ति का जलने से भारी नुकसान हुआ है।
दरअसल मुख्य मामला उस जमीन पर से वर्षों से बसे पीड़ित लोगों को भगाना है और जमीन पर कब्जा करना है। इसलिए ही वे गुंडे लोग करीब 50-60 की संख्या में लाठी, ठंडे, गोली–बंदूक और पेट्रोल के गैलन से लैस लोग थे, जिन्होंने गोली भी चलाकर दहशत फैलाई और घरों में आग लगाने में पेट्रोल का दुरुपयोग किया गया है।
अब यह मामला पूरा राजनीतिक रंग ले चुका है और प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए 15 लोगों को गिरफ्तार किया है। किन्तु स्थानीय प्रशासन एवं पुलिस प्रशासन की निष्क्रियता स्पष्ट दिखाई दे रही है और उनका भूमि माफिया एवं गुंडों के साथ गठजोड़ साफ़ साफ़ दिखाई दे रहा है है ।
इस अमानवीय और अपराधिक घटना पर राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं। विपक्ष के लोग बिहार में असली जगल-राज आ जाने की बात कर रहे हैं। प्रतिपक्ष के माननीय नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने वर्तमान शासन को महाजंगल राज कहा है। उनकी ही पार्टी के प्रवक्ता प्रो मनोज झा ने बिहार के एनडीए शासन को दैत्य और राक्षस राज कहा है।
माननीय केन्द्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने आरोप लगाया है कि हमलावर पासवानों (दुसाधों) को कुछ स्थानीय यादवों ने कांड करने के लिए भड़काया। मांझी जी ने जांच से पहले ही यह मान लिया है कि सभी हमलावर पासवान जाति के थे और उन्हें यादव जाति के लोगों ने भड़काया था। मांझी जी के इस बयान पर लालू यादव ने नाराजगी जताई है। दरअसल ये श्रीमान मांझी जी इस घटना के लिए जाति आधारित विद्वेष, हिंसा और दबंगई को मुख्य कारण मान रहे हैं जो बिल्कुल गलत है। हम जानते हैं कि सभी अपराधी किसी न किसी जाति से ही आते हैं, इसलिए किसी अपराधिक घटना के लिए किसी जाति विशेष को टारगेट करना सही नहीं है।
पुलिस और सिविल प्रशासन द्वारा इस दुखद अमानवीय एवं अपराधिक घटना की जांच की जा रही है। हमें आशा करनी चाहिए जल्दी ही अन्य सभी तथ्यों की जानकारी अवश्य मिलेगी।
हमारी मांगें हैं –
इस घटना शामिल सभी अपराधियों, षड्यंत्रकारी भूमि माफियाओं एवं गुंडों को जल्द से गिरफ्तार कर फास्ट ट्रैक कोर्ट से जल्द से जल्द सजा दिलाई जाए।
सभी पीड़ित परिवारों के लिए सरकार यथाशीघ्र जमीन का कागजात एवं पर्चा देते हुए उस पर 10-10 लाख रुपए की राशि के पक्के घरों का निर्माण करवाए।
सरकार सभी पीड़ित परिवारों को अविलंब 1-1 लाख रुपए और राहत सामग्री मुहैया कराएं।
झारखंड राज्य चुनाव की दहलीज पर खड़ा है। यहां नवम्बर में विधानसभा के चुनाव है। ऐसे में भाजपा ने चुनाव जीतने के लिए तमाम हथकंडे अपनाना शुरू कर दिया है। इसके लिए अपने बयानों से तमाम दिग्गज नेता जमकर प्रोपेगेंडा फैलाने में जुटे हैं। इसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत निशिकांत दुबे, बाबूलाल मरांडी व अमित शाह शामिल हैं। कहीं न कहीं यह केंद्रीय सत्ता द्वारा धार्मिक उन्माद फैलाकर सत्ता हथियाने की रणनीति है। हालांकि प्रदेश में अब तक बीजेपी सरना धर्म-क्रिस्तान, आदिवासी पुरुष बनाम आदिवासी महिला व सरना को सनातन बताने में नाकाम रही। भाजपा आदिवासियों को हिन्दू बताने में जब फेल हो गई तो अब आदिवासी बनाम मुसलमान करने में लगी है ताकि चुनावों में इसका फायदा उठाया सके।
लेकिन सवाल है कि आदिवासियों को जनगणना में आदिवासी चिन्हित करने से घबराने वाली, फूट डालो-शासन करो वाली सरकार आदिवासियों का क्या भला सोच पाएगी। बांग्लादेश के मुसलमानों के संबंध में आदिवासियों के बीच ‘अफवाह’ फैला कर भाजपा इसका राजनैतिक लाभ लेने की मुहिम में जुट गई है।
भाजपा और उसके नेताओं का कहना है कि बांग्लादेशी संथाल परगना में घुसकर आदिवासी महिलाओं के साथ शादी कर प्रदेश में रच-बस रहे हैं। भाजपा वाले कह रहे हैं कि बांग्लादेशी आदिवासी आबादी को खतरा पहुंचा रहे है, जोकि सरासर झूठ है। भाजपा स्टेट बॉर्डर के पास की जगहों के एक दो मामलों को लेकर यह जो किस्से गढ़कर झूठ फैला रहे हैं। यह गलत और निराधार है। ये मूलवासी मुस्लिम आबादी है। उसे ही जबरन बांग्लादेशी बताया जा रहा है।
अगर झारखंड की भागौलिक सीमा को देखें तो साफ है कि भाजपा नेता गलतबयानी कर रहे हैं। क्योंकि झारखंड प्रदेश कहीं से भी वह बांग्लादेश के साथ बॉर्डर शेयर नहीं करती है। झारखंड पूरी तरह से बिहार, उत्तरप्रदेश, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल के साथ बॉर्डर शेयर करता है। ऐसे तो बीजेपी के लोग नेपाल की आबादी को भी घुसपैठिए कहकर हल्ला मचा सकते थे। लेकिन इससे उनको कोई चुनावी फायदा नहीं होता। इसलिए उन्होंने तर्क दिया कि पश्चिम बंगाल पार करके बांग्लादेशी मुसलमान संथाली महिलाओं से शादी करने आ रहे हैं। यह तर्क असत्य है। हम आदिवासी महिलाएं भाजपा व आरएसएस की आदिवासी विरोधी, मानवता विरोधी इन बातों का पुरजोर खंडन वा विरोध दर्ज करती हैं।
झारखंड की डेमोग्राफी का हल्ला
सवाल उठता है कि बीजेपी और दूसरी पार्टियों के लोग कहां थे जब देश के सबसे बड़े कल कारखाने और खदानें यहां खोल कर आदिवासी को उजाड़ा गया और उन्हें विकास की ‘बलि’ चढ़ाया गया। स्थानीय जनता को नॉन स्किल बता कर पूरे देश भर से स्किल जनता को यहां लाकर बसाया गया। उस समय सरकारों का डेमोग्राफी शब्द से परिचय था या नहीं। बंगाल, बिहार, उत्तरप्रदेश, ओडिशा की जनता जब यहां बस रही थी। उस समय ‘डेमोग्राफी चेंज थ्योरी’ का ध्यान क्यों नहीं रखा गया।
सच तो यह है कि 5जी शेड्यूल एरिया के तहत यह आदिवासी बहुल प्रदेश, गैर आदिवासी बहुल प्रदेश में वर्षों पहले बदला जा चुका है। बृहत झारखंड की मांग वा उसके क्षेत्र विस्तार को भी देखें तो यह क्षेत्र 2000 में झारखंड निर्माण के समय से ही छला गया है। राष्ट्रीय जनता दल की राजनीति को कमतर करने के लिए झारखंड को बिहार से अलग कर दिया गया। इसमें बंगाल, मध्यप्रदेश, बिहार, ओडिशा, उत्तरप्रदेश के आदिवासी बहुल इलाके शामिल नहीं किए गए। सीएनटी-एसपीटी एक्ट को हर बार भाजपाइयों ने कमजोर करने की कोशिश की। विलकिंसन रूल की अनदेखी की गई।
पेसा एक्ट (पंचायत एक्सटेंशन टू शेड्यूल एरिया) की अनदेखी की गई। आदिवासी जमीन पर मालिकाना हक आदिवासी समाज के पास सामूहिक तौर से रहा है। बाद में यह कमोबेश आदिवासी पुरुष के ही पास रहा है। फिर ऐसे में आदिवासी महिला के साथ शादी कर जमीन हड़पने का जो मनगढंत किस्सा भाजपाई गढ़ रहे हैं वो पूरी तरह बेबुनियाद है। आदिवासी पुरुषों के मन में भी आदिवासी महिला को अपनी संपत्ति समझने का चश्मा भी पुरुषवादी, पितृसतात्मक ब्रह्मणवादियों ने आदिवासी पुरुषों को दिया है। भाजपा अतार्किक बहस लाकर झारखंडी जनता के जायज सवाल गायब कर रही है। मानव तस्करी के सवाल, संसाधनों में बराबरी के बंटवारे का सवाल आदि गायब कर आदिवासी बनाम मुस्लिम की लड़ाई को तेज किया जा रहा।
आदिवासी महिलाओं के प्रति भी जो टिप्पणियां आ रही हैं। वह नकाबिले बर्दाश्त हैं। बांग्लादेशी मुस्लिम आदिवासी महिला से शादी कर, महिला और जमीन दोनों आदिवासियों से छीन रहे हैं। कुछ लोग अपनी इस बहसबाजी में महिलाओं के नामों की लिस्ट जारी कर बातें कर रहे हैं। यह बिल्कुल बेतुकी और नाजायज बात है। वहीं आदिवासी महिला की निजता और उसकी अस्मिता पर हमला है। आदिवासी महिला की कोई एजेंसी ही नहीं। ऐसी भी बात प्रस्तुत की जा रही है। हम विभिन्न आदिवासी संगठन इस बात पर कड़ा ऐतराज जाहिर करते हैं और इनपर कार्यवाही करने की मांग करते हैं। आदिवासी महिलाएं आपके लिए मोहरे नहीं बनेंगी। हम पूरे आदिवासी समाज की ओर से भाजपा और उनके नेताओं के बयानों के लिए सार्वजनिक लिखित माफी मांगने की अपील करते हैं।
लेखिका नीतिशा खलखो झारखंड के धनबाद में बी.एस.के कॉलेज, मैथन में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।
बिहार के नवादा जिले के एक गांव में महा दलित परिवार के 80 घरों को जला कर राख कर दिया गया। घटना बुधवार देर रात की है। जब जातिवादी गुंडे फायरिंग करते हुए महा दलित टोले में पहुंचे और घरों को आग लगाना शुरू कर दिया। घटना नवादा जिले के मुफस्सिल थाना क्षेत्र के ननौरा के पास स्थित कृष्णा नगर दलित बस्ती की है।
घटना के पीछे भूमि विवाद बताया जा रहा है। दरअसल कृष्णा नगर दलित बस्ती में दलित परिवार का कब्जा था। दूसरा पक्ष इस पर कब्जा करना चाहता था। इसको लेकर दोनों पक्षों में विवाद चल रहा था। यह मामला डीएम कोर्ट में चल रहा था। इसी झड़प में बुधवार की शाम दूसरे पक्ष ने अचानक हमला कर दिया। कृष्णा नगर के लोगों ने मीडिया को जो बताया, उसके मुताबिक हमला करने वाले करीब 100 लोग थे। उन्होंने पहले फायरिंग कर डर का माहौल बनाया गया, लोगों को घरों से निकल कर भाग जाने को कहा और फिर पेट्रोल छिड़क कर घरों को आग लगा दिया गया। पीड़ितों का कहना है कि पुलिस को घटना की सूचना देने पर पुलिस एक से डेढ़ घंटे बाद पहुंची। मौके पर एसपी और डीएम भी पहुंचे।
हालांकि इस मामले में जो सूचना सामने आ रही है, उसके मुताबिक जिन लोगों के घर जले वो रविदास समाज और मुसहर समाज के लोग थे, जबकि आग लगाने वाले आरोपियों में पासवान समाज और यादव समाज के लोग भी शामिल थे। आरोपियों को लेकर आरोप है कि उनको सत्ता से संरक्षण प्राप्त है।
घटना सामने आने के बाद विपक्ष ने नीतीश सरकार पर जमकर निशाना साधा है। तेजस्वी यादव से लेकर केंद्र में नेता विपक्ष और कांग्रेस नेता राहुल गाँधी सहित तमाम नेताओं ने जदयू-भाजपा सरकार पर जमकर निशाना साधा है। तो वहीं बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष ने इस मामले में सरकार को घेरते हुए पीड़ितों के लिए इंसाफ की मांग की है।
देश में एक देश एक चुनाव को आज 18 सितंबर को मोदी कैबिनेट से मंजूरी मिल गई। वन नेशन वन इलेक्शन के लिए एक कमेटी बनाई गई थी जिसके चेयरमैन पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद थे। इस समिति ने 191 दिनों के रिसर्च और तमाम बैठकों के बाद 14 मार्च 2024 को 18,626 पेज वाली अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंप दी थी।
इस रिपोर्ट में जो सुझाव दिये गए हैं उसके मुताबिक लोकसभा और राज्यों के विधानसभा चुनाव एक साथ कराने का जिक्र है। साथ ही लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनाव को एक साथ होने के बाद 100 दिन के भीतर स्थानीय निकाय चुनाव भी हो जाने चाहिए। इससे निश्चित टाइम फ्रेम में सभी स्तर के चुनाव संपन्न कराए जा सकेंगे। खबर है कि केंद्र सरकार इसे शीतकालीन सत्र में संसद में लाएगी। हालांकि, ये संविधान संशोधन वाला बिल है और इसके लिए राज्यों की सहमति भी जरूरी है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा लगातार वन नेशन – वन इलेक्शन की वकालत करती रही है। अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान सरकार ने समिति का गठन 2 सितंबर 2023 को हुआ था। इस पर फैसला लेने से पहले स्वीडन, बेल्जियम, जर्मनी, जापान, फिलीपींस, इंडोनेशिया और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों की स्टडी की गई। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में बनी समिति में 8 सदस्य थे। इसमें पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, एक वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे, तीन नेता जिसमें भाजपा नेता और गृहमंत्री अमित शाह, कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी, डीपीए पार्टी गुलाम नबी आजाद, 15वें वित्त आयोग के पूर्व अध्यक्ष एनके सिंह, लोकसभा के पूर्व महासचिव डॉ. सुभाष कश्यप और पूर्व मुख्य सतर्कता आयुक्त संजय कोठारी शामिल हैं।
तीसरी बार शपथ लेने के बाद स्वतंत्रता दिवस के संबोधन में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ का जिक्र किया था। उन्होंने जोर देकर कहा था कि लगातार चुनाव देश के विकास को धीमा कर रहे थे।
कमिटी की सिफारिशें-
पहले चरण में लोकसभा के साथ सभी राज्यों के विधानसभा चुनाव हों।
दूसरे फेज में 100 दिनों के भीतर लोकल बॉडी के इलेक्शन कराए जा सकते हैं
पूरे देश मे सभी चुनावों के लिए एक ही मतदाता सूची होनी चाहि
सभी के लिए वोटर आई कार्ड भी एक ही जैसा होना चाहिए।
सभी राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल अगले लोकसभा चुनाव यानी 2029 तक बढ़ाया जाए।
हंग असेंबली (किसी को बहुमत नहीं), नो कॉन्फिडेंस मोशन होने पर बाकी 5 साल के कार्यकाल के लिए नए सिरे से चुनाव कराए जा सकते हैं।
पैनल ने एक साथ चुनाव कराने के लिए उपकरणों, जनशक्ति और सुरक्षा बलों की एडवांस प्लानिंग की सिफारिश की है।
नई दिल्ली। भाजपा नित केन्द्र सरकार और देश के न्यायिक संस्थान ‘आरक्षण व्यवस्था’ पर चौतरफा हमला कर शिक्षा व रोजगार में पिछड़े दलित और आदिवासियों का प्रतिनिधित्व खत्म करने पर आमादा है। इन सब के बीच एक ताजा रिपोर्ट में यह सामने आया है कि भारत सरकार के केन्द्रीय मंत्रालयों व विभागों में पिछड़े दलित और आदिवासियों के 1 लाख 51 हजार से ज्यादा पद खाली है। बैकलॉग के इन पदों को भरा नहीं जा रहा है। रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के बाद बहुजन नेताओं और एक्टिविस्ट ने सरकार के खिलाफा मोर्चा खोल दिया है।
बैकलॉग के लिए सड़क से संसद तक लड़ाई
सांसद चंद्रशेखर आजाद ने कहा कि पिछड़ा वर्ग के कल्याण के लिए बनी संसदीय समिति (2023-24) द्वारा लोकसभा में पेश रिपोर्ट में भारत सरकार के द्वारा 72 विभागों में पोस्टेड अधिकारी और कर्मचारियों के विवरण से ये खुलासा हुआ है कि केवल केंद्र सरकार के विभागों में ही वर्ग के 1,51,000 ( एक लाख 51 हजार) से ज्यादा पदों का बैकलॉग खाली पड़ा है। सरकार से मांग करता हूं कि तत्काल “विशेष भर्ती” अभियान द्वारा पद निकालकर बैकलॉग पूरा किया जाए। बैकलॉग भर्ती के लिए संसद से लेकर सड़क तक आवाज बुलंद करके इसको पूरा कराके ही दम लूंगा।
समिति ने फरवरी में संसद में पेश की थी रिपोर्ट
पिछड़े वर्ग कल्याण संसदीय समिति अध्यक्ष सांसद टीआर बालू ने गत 8 फरवरी 2024 को संसद के दोनों सदनों में रिपोर्ट पेश की थी। इस रिपोर्ट में बताया गया था कि केंद्र सरकार के अधीन पदों और सेवाओं में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े समुदायों को अखिल भारतीय स्तर पर खुली प्रतियोगिता के माध्यम से सीधी भर्ती पर क्रमशः 15, 7.5 और 27 प्रतिशत आरक्षण प्रदान किया जाता है। इसके अनुसार 72 केन्द्रीय मंत्रालयों व विभागों में पिछड़े, दलित व आदिवासियों के लिए आरक्षित पदों में ओबीसी के 1 लाख 30 हजार 215, एसटी के 14 हजार 62 व दलितों के 6 हजार 960 पद रिक्त है। यह बैकलॉग रिक्तियां अभी तक भरी नहीं गई हैं।
बैक लॉग भरे केन्द्र सरकार
दलित दस्तक से नैकडोर संस्थापक सदस्य अशोक भारती ने कहा- “भारत बंद के दौरान हमारी संस्था ने ओबीसी, एससी व एसटी के केन्द्र व राज्यों में खाली पड़े बैकलॉग पदों को भरने की मांग की थी। हालांकि केन्द्र सरकार ने इस मामले में अब तक कोई पुख्ता कार्रवाई नहीं की है।”
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विक्रम हरिजन ने कहा- “सरकार को बैकलॉग रिक्त पदों पर प्राथमिकता से भर्ती करनी चाहिए। देखा गया है कि ‘नॉट फाउंड सुइटेबल’ बताकर जानबूझकर आरक्षित पदों को खाली रखा जाता है, जिन्हें बाद में सामान्य पदों में बदल दिया जाता है।
कार्मिक मंत्री का संसद में जवाब
तात्कालिक कार्मिक राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने गत 24 जुलाई 2024 को संसद में एक लिखित उत्तर में कहा था कि रिक्तियों का होना और उनका भरा जाना तथा बैकलॉग आरक्षित रिक्तियां एक सतत प्रक्रिया है। सभी केन्द्रीय सरकारी मंत्रालयों और विभागों को बैकलॉग आरक्षित रिक्तियों की पहचान करने और उन्हें विशेष भर्ती अभियान के माध्यम से भरने के लिए एक आंतरिक समिति बनाने के निर्देश दिए गए है।
10 लाख पद खाली!
केंद्रीय मंत्री सिंह ने बताया कि केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों में 9.79 लाख से अधिक पद खाली हैं। इसमें सबसे ज्यादा 2.93 लाख पद रेलवे में खाली हैं। विभिन्न विभागों में खाली पड़े इन पदों को भरने की योजना पर काम किया जा रहा है।
लेखकः मुस्ताक अली बोहरा| आजाद हिन्दुस्तान के संविधान के निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे। बाबा साहब को चाहे राजनीतिज्ञ के रूप देखा जाए या फिर समाजसेवी के रूप में या वकील के रूप में, हर किसी क्षेत्र में उनका योगदान इतना है, जिसे शब्दों में नहीं बांधा जा सकता। वे एक जाने-माने वकील भी थे। बाबा साहब की वकालत न केवल अदालतों में बल्कि देश-दुनिया भर में शोषित.पीड़ित, मजदूर, जरूरतमंदों की आवाज बन गई है।
अगर बाबा साहब ने वकालत नहीं की होती तो भारतीय संविधान का यह स्वरूप नहीं होता जो आज दिख रहा है। उन्हें संविधान लिखने वाली कमेटी का अध्यक्ष भी इसलिए बनाया गया था क्योंकि वह पेशेवर वकील भी थे। डॉ. आम्बेडकर उत्कृष्ट बुद्धिजीवी, प्रकाण्ड विद्वान, सफल राजनीतिज्ञ, कानूनविद्, अर्थशास्त्री, लेखक, समाजसेवी और लोकप्रिय जननायक थे। वे शोषितों, महिलाओं और गरीबों के मुक्तिदाता और समाज सुधारक थे।
बाबा साहब आंबेडकर सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष के प्रतीक है। बाबा साहब ने सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सभी क्षेत्रों में लोकतंत्र की वकालत की। बाबा साहब ने जिस समाज का सपना देखा था वो समता, बंधुता और न्याय पर आधारित था। यूं तो बाबा साहब के बचपन से लेकर भारत और विलायत में उच्च शिक्षा हासिल करने तक उन्होंने कितना संघर्ष किया, कितना अपमान सहा इसकी जानकारी ज्यादातर लोगों को हैं, लेकिन ये कम ही लोग जानते हैं कि वो जितने कामयाब राजनीतिज्ञ थे उतने ही कामयाब वकील भी थे। उन्होंने कई देशों के संविधान की पढ़ाई करने में काफी समय व्यतीत किया।
डॉ. अंबेडकर को कानून के साथ ही कई विषयों में महारत हासिल थी। उन्होंने भारत और दुनिया के प्राचीन और आधुनिक कानूनों को रूचि के साथ पढ़ा। इसके बाद वो वक्त आया जब बाबा साहब कानून के तमाम पहलुओं के विशेषज्ञ बन गए। बाबा साहब की नजर से देखें तो अच्छा वकील बनने के लिए कुछ आधारभूत चीजें होना जरूरी है। अच्छे वकील को कानून के मौलिक सिद्धांतों की समझ होनी चाहिए। किसी विषय को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करने की कला आनी चाहिए। संवाद और तर्कों में सत्यता होनी चाहिए। अपनी बात कहने या अभिव्यक्ति की क्षमता होनी चाहिए। अच्छे वकील को हाजिरजवाब होना चाहिए। साथ ही सोचने.समझने और तर्क करने की क्षमता होनी चाहिए।
कमजोर, शोषित वर्ग के साथ ही दलित समाज के हक के लिए संघर्ष करते हुए बाबा साहब को ये अहसास हुआ कि दलितों को उनका हक इतनी आसानी से नहीं मिलने वाला। उनसे जुड़े मसले गंभीर और जटिल हैं। इसलिए बाबा साहब ने ये फैसला किया कि उन्हें वकालत करना होगा। इसके बाद बाबा साहब कानून की डिग्री हासिल करने के लिए दोबारा लंदन गए।
वे सिंतबर 1920 में लंदन पहुंचे, लेकिन तब तक हिन्दुस्तान में बाबा साहब दलितों के सुधारक के तौर पर अपनी अलग और मजबूत पहचान बना चुके थे। लंदन में पहुंचकर बाबा साहब ने अपना पूरा ध्यान पढ़ाई में लगा दिया। वकालत की पढ़ाई उन्होंने लंदन के ग्रेज इन फॉर लॉ से की। हालांकि, तब लंदन में ड्रामा, ओपेरा व थिएटर आदि आम था और लोग मंनोरंजन के लिए यहां जाया करते थे। लेकिन बाबा साहब का अधिकतर समय पुस्तकालय में बीतता था वो सुबह से लेकर देर शाम तक पढ़ते रहते थे। पैसे बचाने के लिए बाबा साहब लंदन में भी पैदल चलते थे। खाने में ज्यादा पैसे खर्च ना हो ये सोचकर तो कई बार वे भूखे ही रह जाते थे।
लंदन में बाबा साहब के रूममेट असनाडेकर उनसे कहते थे कि अरे आंबेडकर रात बहुत हो गई, कितनी देर तक पढ़ते रहोगे। कब तक जागते रहोगे अब सो जाओ। असनाडेकर की इस बात पर बाबा साहब का जबाव होता था कि मेरे पास खाने के लिए पैसे और सोने के लिए समय नहीं है। मुझे अपना कोर्स जल्द से जल्द पूरा करना है, और कोई दूसरा रास्ता नहीं है। बाबा साहब की इस बात से पता चलता है कि उन्हें अपनी भूख-प्यास, नींद-आराम से ज्यादा इस बात की फ्रिक थी कि वे वकालत का कोर्स पूरा कर भारत आकर दलित और कमजोर वर्ग के लिए कानूनी तौर पर लड़ाई लड़ सकें।
वकालत की वजह से ही डॉ. आंबेडकर को पूरे महाराष्ट्र का दौरा करने का मौका मिला था। इस दौरान उन्होंने लोगों की बुनियादी समस्याओं और उनकी जरूरतों को करीब से समझा। लिहाजा जब वे संविधान सभा के प्रारूप समिति के प्रमुख बने तो उन्होंने संविधान में जरूरी चीजों का समावेश किया। सन 1936 में डॉ. आंबेडकर ने तत्कालीन बंबई के सरकारी लॉ कॉलेज में ब्रिटिश संविधान पर व्याख्यान दिया था। आज भी ये व्याख्यान हमारे देश के कानून को समझने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। कुछ साल बाद जब देश आजाद हुआ तो उन्होंने इस देश का संविधान लिखा।
एक साल में बन गए बैरिस्टर और डॉक्टर
वर्ष 1922 में कानून का कोर्स पूरा करने के बाद उन्हें ग्रेज इन में ही बार का सदस्य बनने के लिए न्यौता दिया गया और इस तरह से बाबा साहब बैरिस्टर बन गए। यहां ये बताना लाजमी होगा कि बाबा साहब ने एक ही समय में दो कोर्स पूरे किए थे। ग्रेज इन में कानून की पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में उच्च अर्थशास्त्र की डिग्री भी हासिल की थी। इसके बाद सन 1923 में लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स ने उनकी थीसिस को मान्यता दी और उन्हें डॉक्टर ऑफ साइंस की उपाधि से सम्मानित किया। एक ही वर्ष में वे डॉक्टर और बैरिस्टर बन गए थे।
सर्वोच्च न्यायालय ने मनाई थी सौंवी वर्षगांठ
यूं तो देश भर में लाखों वकील हैं, लेकिन ये जानकर आश्चर्य हो सकता है कि सर्वोच्च न्यायालय ने बाबा साहब के वकील बनने पर सौंवी वर्षगांठ मनाई थी। बाबा साहब को शिक्षा हासिल करने के लिए खासा संघर्ष करना पड़ा था। शीर्ष अदालत ने बाबा साहब के वकील बनने पर सौंवी वर्षगांठ मनाते हुए उनके संघर्ष और बलिदान का स्मरण किया और श्रद्धांजलि दी। वकालत पास करने के बाद भी उन्हें काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। बहुमुखी प्रतिभा का धनी होने के बावजूद उन्होंने ही सबसे ज्यादा जातीय प्रताड़ना झेली।
रजिस्ट्रेशन फीस तक के नहीं थे पैसे
डॉक्टर आंबेडकर ने इंग्लैंड में 1916 में ही लॉ में नामांकन ले लिया था, लेकिन उनकी वकालत का कोर्स तब तक पूरा नहीं हुआ था क्योंकि बड़ौदा महाराज से मिले वजीफे की मियाद पूरी हो गयी थी। इस वजह से वे भारत लौट आए। यहां आने के बाद डॉ. आंबेडकर को सिडेनहम कॉलेज में अर्थशास्त्र के प्राध्यापक की नौकरी भी मिल गई। चूंकि बाबा साहब वकालत करना चाहते थे, इसलिए वहां उन्होंने नौकरी के अलावा निजी रूप से पढ़ाना शुरू किया, जिससे कि पैसा बचाकर अपनी अधूरी पड़ी डिग्री को पूरा कर सकें। डॉ. आंबेडकर फिर से इंग्लैंड पहुंचे। 28 जून 1922 को डॉ. आंबेडकर बार.एट.लॉ बने। वर्ष 1923 में डॉ आंबेडकर ने लॉ की डिग्री हासिल की।
लंदन से लौटने के बाद उनके सामने अपने परिवार का भरण-पोषण करने की चुनौती थी। पत्नी, बच्चे, उनकी भाभी और भतीजे के भरे पूरे परिवार के भरण पोषण के लिए वो वकालत करना चाहते थे। इसके लिए उन्हें बॉम्बे उच्च न्यायालय में पंजीकृत होने की जरूरत थी। तब उनके पास रजिस्ट्रेशन फीस देने के पैसे तक नहीं थे। तब उनके दोस्त नवल भथेना ने ये 500 रुपये दिए। इसके बाद उन्होंने बार काउंसिल की सदस्यता के लिए आवेदन किया था। 4 जुलाई 1923 को उन्हें सदस्यता मिली और अगले ही दिन 5 जुलाई से उन्होंने बॉम्बे बार काउंसिल में वकालत शुरू कर दी। उन्होंने बंबई उच्च न्यायालय के साथ.साथ ठाणे, नागपुर और औरंगाबाद की जिला अदालतों में वकालत की।
ठुकरा दी मुख्य न्यायाधीश की नौकरी
सन 1923 में ब्रिटिश सरकार ने डॉ. आंबेडकर को ढाई हजार रुपये महीने की पगार पर जिला न्यायाधीश की नौकरी का प्रस्ताव दिया, उनसे यह भी कहा गया कि अगले तीन वर्षों में उन्हें बंबई हाईकोर्ट में जज बना दिया जाएगा, लेकिन उन्होंने वकालत का पेशा ही चुना। कुछ दिनों के बाद हैदराबाद के निजाम ने उन्हें राज्य के मुख्य न्यायाधीश बनने की पेशकश की थी, लेकिन डॉ. आंबेडकर ने इन सभी प्रस्तावों को यह कहते हुए ठुकरा दिया कि यह उनकी निजी आजादी को खत्म कर देगा। बाबा साहब ने बहिष्कृत भारत के अपने लेख और अपने भाषणों में जिक्र करते हुए कहा था कि वे दलितों के हितों के लिए काम करना चाहते थे इसलिए जिला न्यायाधीश सहित कोई सरकारी नौकरी स्वीकार नहीं की। वकालत करते हुए आजादी के साथ जो काम वो करना चाहते थे वो सरकारी नौकरी करते हुए नहीं कर सकते थे।
जातिगत भेदभाव का शिकार हुए बैरिस्टर आंबेडकर
डॉ. आंबेडकर अपना एक ऑफिस भी बनाना चाहते थे, लेकिन उनके पास पैसों की कमी थी लिहाजा दोस्तों की मदद से मुंबई में उन्होंने एक कमरा किराए पर लिया। लेकिन अछूत होने के कारण उनके पास केस नहीं आते थे। तब के दौर में वकालत के पेशे में ऊंची जातियों के लोग ही थे और ये बात जानते हुए भी बाबा साहब ने वकालत का रिस्क लिया। उस वक्त मोहनदास करमचंद गांधी, मोहम्मद अली जिन्ना, दादाभाई नौरोजी, बदरूद्दीन तैयबजी, फिरोजशाह मेहता, एन. जी. चन्द्रावरकर, चित्तरंजन दास, सैय्यद हसन इमाम, मियां मोहम्मद शफी जैसे लोग दिग्गज वकीलों में शुमार किए जाते थे। जातिगत भेदभाव, दलित समाज, वकालत के नये पेशे सहित अन्य चुनौतियों के बावजूद बाबा साहब ने हिम्मत नहीं हारी और अदालतों में काम करते रहे।
बाबा साहब के मुवक्किलों की माली हालत भी खस्ता हुआ करती थी। उनके मुवक्किल गरीब, खेतिहर या दिहाड़ी मजदूर हुआ करते थे। बाबा साहब इन लोगों को न्याय दिलाने की कोशिश करते थे। उन्होंने कभी भी न्याय की आस में आने वाले लोगों के साथ सामाजिक अथवा आर्थिक तौर पर भेदभाव नहीं किया। बाबा साहब को काम की तलाश में मुफस्सिल कोर्ट की तरफ भी जाने के लिए मजबूर होना पड़ता था। सामाजिक.आर्थिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि का वकालत में क्या महत्व होता है इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि जिस दिन मोहम्मद अली जिन्ना दो लाख 57 हजार रुपए के दिवालियापन का मुकदमा लड़ रहे थे उसी दिन डॉ. आंबेडकर उसी कोर्ट में एक सेवानिवृत्त मुसलमान शिक्षक का अविश्वास तोड़ने का 24 रुपए का मुकदमा लड़ रहे थे, जिसमें उन्हें जीत मिली थी।
गरीब मुवक्किलों से नहीं लेते थे फीस
वकालत के शुरूआती दिनों में बाबा साहब को किसी तरह एक महार समाज के ही व्यक्ति का केस मिला। लोकमान्य तिलक के भतीजे ने भी उनकी सहायता की। बाबा साहब के पास उच्च वर्ग के हिन्दु अपना केस लेकर नहीं आते थे। इसके अलावा सवर्ण लोग ब्रिटिश वकीलों को अपना केस देते थे। डॉ. बीआर आंबेडकर एक अनुशासित और प्रखर विद्वान होते हुए भी अपने मुवक्किलों के साथ बहुत सहज रहते थे। वे कई बार अपने मुवक्किलों के साथ अपना खाना तक साझा करते थे। गरीब, दलित लोग कानूनी मदद की आस में उनके पास आने लगे। वे गरीबों का केस मुफ्त में लड़ते थे। कई बार तो गरीब मुवक्किल बिना झिझक बाबा साहब के घर पहुंच जाया करते थे।
एक दिन उनकी पत्नी रमाबाई जब घर में नहीं थीं तो दो मुवक्किल आए। डॉ, आंबेडकर ने ना केवल उनकी परेशानी सुनी बल्कि उन्हें दिन का खाना खिलाया। इतना ही नहीं रात में उन्होंने खुद खाना बनाया और उन्हें परोसा। बाबा साहब ने कॉरपोरेट घरानों की वकालत करने को प्राथमिकता नहीं दी बल्कि मजदूरों के वकील के रूप में काम करना शुरू किया। एक वकील के रूप में उन्होंने राजनीतिक, समुदायों के बीच के आंतरिक मामले, मजदूरों-गरीबों से जुड़े हुए मामले और संविधान के मूल भावना से जुड़े मामलों को तरजीह दी। हालांकि, इसके अलावा वह और मामलों में भी वकालत करते थे।
जज भी बन गए थे उनके मुरीद
अपनी काबलियत के बूते बाबा साहब एक वकील के रूप में प्रसिद्ध हो गए। बाबा साहब की काबलियत, अदालत में उनके तर्क और कानून में उनकी पकड़ देखकर उन्हें केस मिलने लगे थे और जब बाबा साहब अदालत में पेश होने जाते थे। बहुत सारे लोग उन्हें देखने के लिए ही जमा हो जाते। वकालत के शुरूआती दौर में बंबई उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति जॉन न्यूमोंट उन्हें ब्रिटिश वकीलों की तरह काबिल नहीं मानते थे, लेकिन बाद वह उनके मुरीद बन गए। अटॉर्नी.एट.लॉ एनएच पांडिया और बीजी खेर, जो बॉम्बे लॉ जर्नल के संपादक थे, उन्होंने बाबा साहब को पत्रिका के संपादकीय बोर्ड का सदस्य बनने के लिए आमंत्रित किया। वर्ष 1927-28 में वे बॉम्बे लॉ जर्नल की सलाहकार और संपादकीय समिति के विशेष आमंत्रित सदस्य बनाए गए। हालांकि, अक्टूबर 1928 में उन्होंने समिति छोड़ दी क्योंकि वो दलित समाज के हित के लिए काम करते हुए व्यस्त हो गए थे।
बाबा साहब ने वकालत करते हुए ये महसूस किया कि वो बतौर वकील उतना पैसा नहीं अर्जित कर पा रहे हैं, जिससे उनके परिवार का भरण-पोषण हो सके तो उन्होंने अध्यापन की ओर रूख किया। जून 1925 से सन 1929 तक उन्होंने बाटलीबोई अकाउंटेंसी इंस्टीट्यूट में अंशकालिक व्याख्याता के रूप में वाणिज्यिक कानून पढ़ाया। जून 1928 से करीब एक साल गवर्नमेंट लॉ कॉलेज, बॉम्बे में पढ़ाया। फिर वह एक लॉ कॉलेज में प्रिसिंपल नियुक्त किए गए। मई 1938 में उन्होंने लॉ कॉलेज के प्रिंसिपल के पद से इस्तीफा दे दिया।
ये सिर्फ बाबा साहब की कर सकते थे
बैरिस्टर के रूप में बाबा साहब आंबेडकर की काबलियत और उनके रसूख का अंदाजा लगाया जाना खासा मुश्किल है। बात है सन 1928 की। तब समाज में दलित समुदाय की स्थिति के बारे में ब्रिटिश सरकार के सामने पक्ष रखा जाना था। साइमन कमीशन के सामने गवाही देने के लिए डॉ. आंबेडकर को चुना गया था। जिस दिन उन्हें ये गवाही देनी थी। ठीक उसी दिन उन्हें एक महत्वपूर्ण मामले में ठाणे के जिला एवं सत्र न्यायाधीश के समक्ष अपने मुवक्किल का पक्ष भी रखना था। यदि डॉ. आंबेडकर उस मुकदमे में उपस्थित नहीं होते तो शायद उनके कुछ मुवक्किलों को फांसी की सजा मिलती और इसका मलाल उन्हें जिन्दगी भर रहता।
दूसरी ओर डॉ, आंबेडकर यदि साइमन आयोग के सामने गवाही देने के लिए नहीं जाते तो देश के करोड़ों लोगों की पीड़ा को दुनिया के सामने रखने का मौका निकल जाता। बाबा साहब के सामने इस तरह की दुविधा थी वे क्या करें क्या ना करें। लेकिन ऐसे में उन्होंने न्यायाधीश से अनुरोध किया कि अभियुक्तों के बचाव को अभियोजन पक्ष के समक्ष प्रस्तुत करने की अनुमति पहले दी जाए। अमूमन होता यह है कि अभियोजन पक्ष अपना तर्क पहले रखता है, लेकिन डॉ, आंबेडकर की स्थिति को ध्यान में रखते हुए उन्हें अपना पक्ष पहले रखने की अनुमति दी गई। बचाव के लिए दिए गए तर्कों को देखते हुए उन मामलों में अधिकांश अभियुक्तों को बरी कर दिया गया था। हालांकि जब न्यायाधीश ये फैसला सुना रहे थे तब डॉ, आंबेडकर साइमन कमीशन के सामने देश के दलितों की स्थिति पर अपना पक्ष रख रहे थे।
हमेशा होता रहेगा उनके लड़े मुकदमों का जिक्र
डॉ, आंबेडकर ने सन 1923 से सन 1952 तक अपने लंबे करियर के दौरान कई मुकदमे लड़े। बतौर वकील बाबा साहब ने कई केस ऐसे लड़े जिनकी चर्चा बरसों तक होती रहेगी। मसलन, आरडी कर्वे और समाज स्वास्थ्य पत्रिका का मुकदमा। डॉ. आरडी कर्वे समाज सुधारक थे। वह महिलाओं के स्वास्थ्य और यौन शिक्षा के बारे में जागरूकता पैदा करने की कोशिश कर रहे थे। तब यौन शिक्षा के बारे में बात करना खासा मुश्किल था।
डॉ, कर्वे की इस काम के लिए आलोचना की जाती थी। समाज स्वास्थ्य पत्रिका में यौन शिक्षा पर लेख प्रकाशित हुआ करते थे। सन 1934 में डॉ. कर्वे पर एक मुकदमा दर्ज हुआ। उन पर आरोप था कि वे अपनी मासिक पत्रिका ‘समाज स्वास्थ्य’ के जरिए वे समाज में अश्लीलता फैला रहे हैं। डॉ. आंबेडकर ने उनकी तरफ से केस लड़ा। अदालत में डॉ. आंबेडकर ने कहा अगर कोई यौन समस्याओं के बारे में लिखता है तो उसे अश्लील नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने अपनी दलील देते हुए कि अगर लोग अपने मन के सवाल पूछते हैं और इसे विकृति मानते हैं तो केवल ज्ञान ही विकृति को दूर कर सकता है। इसलिए उन सवालों के जवाब डॉ. कर्वे को देना चाहिए।
ऐसा ही एक चर्चित मामला था देश के दुश्मन का। ये बात है सन 1926 की। तब दिनकर राव जावलकर और केशव राव जेधे गैर-ब्राह्मण आंदोलन की अगुआई करने वालों में थे। उस समय ब्राह्मण समुदाय के लोग सामाजिक सुधारों का विरोध कर रहे थे। इस विरोध के कारण महात्मा फुले की आलोचना भी की जा रही थी। महात्मा फुले को क्राइस्टसेवक भी कहा जाता था। इन बातों के विरोध में दिनकर राव जावलकर ने देश के दुश्मन नामक पुस्तक लिखी और केशवराव जेधे ने इसका प्रकाशन किया।
मराठी में लिखी इस पुस्तक में लोकमान्य तिलक और विष्णु शास्त्री चिपलूनकर का जिक्र करते हुए उनकी खासी आलोचना की गई। जिससे तिलक के समर्थक नाराज हो गए और उन लोगों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। इस किताब को प्रतिबंधित कर दिया गया था। ‘देश्चे दुश्मन’ (देश का दुश्मन) के लेखक केशव जेधे के खिलाफ ब्राह्मण वकील ने मुकदमा दायर कर दिया। केशव जेधे दलित थे। मुकदमा पुणे में चला और निचली अदालत ने जेधे.जावलकर को सजा सुनाई। जावलकर को एक साल की सजा सुनाई गई, जबकि जेधे को छह महीने जेल की सजा सुनाई गई। इस सजा को चुनौती दी गई और बाबा साहब आंबेडकर इस मामले में वकील बने। बाबा साहब भी देश के दुश्मन पुस्तक पढ़ चुके थे। इस मामले की सुनवाई पुणे सेशन कोर्ट में जज लॉरेंस की अदालत में हुई। डॉ आंबेडकर ने एक पुराने मानहानि केस का हवाला देकर यह केस लड़ा।
उन्होंने जज फ्लेमिंग के आदेश का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वहां भी मामला समान था क्योंकि शिकायत दर्ज करने वाला व्यक्ति, मानहानि का दावा करने वाले शख्स का दूर का रिश्तेदार है, इसलिए उसके पास कोई अधिकार नहीं है कि वह मुकदमा दर्ज कराए। आंबेडकर ने अपनी वाकपटुता में यहां तक कह दिया कि चूंकि यह किताब किसी खास ब्राह्मण के खिलाफ नहीं और वकील चूंकि पूरे समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करता है, इसलिए इस मुकदमे का कोई तुक नहीं बनता है। डॉ. आंबेडकर ने अदालत के सामने दलीलें पेश की और जेधे.जावलकर दोनों की ही सजा माफी हो गई।
महाड़ सत्याग्रह का मामला भी नजीर बन गया। आजादी के दशकों पहले से अछूतों को सार्वजनिक जलस्रोतों से पानी पीने का हक नहीं था। वहां मवेशी तो पानी पी सकते थे, लेकिन अछूत नहीं। इस अन्याय के खिलाफ डॉ, आंबेडकर ने मुहिम चलाई और इसके कारण ही महाड़ सत्याग्रह हुआ। यह महाड़ झील के पानी पर हक को लेकर लड़ाई थी। कुछ असामाजिक तत्वों ने अछूत समुदाय के लोगों पर भी हमला किया ताकि वे लोग महाड़ झील पर न आए। इसके अलावा डॉ. आंबेडकर और उनके साथियों पर कई मुकदमे भी दर्ज किए गए। इस मामले में तर्क दिया गया कि यह झील पूरी तरह से हिंदुओं की है। यह कोई सार्वजनिक जमीन पर नहीं बनी है। यह भी कहा गया कि इससे दूसरे समुदाय के लोग भी पानी लेते हैं। किसी को रोका नहीं गया है। तब डॉ. आंबेडकर ने अदालत को बताया कि यह झील महाड़ नगर निगम की जमीन पर बनी हुई है। यहां से केवल सवर्ण हिंदुओं को पानी लेने की अनुमति है।
खटीक मुस्लिमों को भी यहां से पानी नहीं लेने दिया जाता। मामले की सुनवाई के दौरान ये तथ्य सामने आया कि यह झील 250 सालों से है और यहां से केवल सवर्ण हिंदुओं को ही पानी मिलता है। डॉ, आंबेडकर ने अदालत में यह भी साबित किया कि झील नगर निगम की जमीन पर है, इसलिए इससे सभी को पानी लेने का हक है। हाईकोर्ट ने बैरिस्टर आंबेडकर की दलील को स्वीकार करते हुए इसे सभी के लिए खोलने का निर्देश दिया। अदालत ने भी माना कि यह आंदोलन किसी एक झील या जलस्रोत तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अदालत का आदेश सभी सार्वजनिक जल निकायों पर भी लागू होगा। अदालत ने कहा कि किसी की जाति और सामाजिक स्थिति को देखकर उसे पानी लेने से मना नहीं किया जा सकता।
अहम केसों में एक केस फिलिप स्प्राट का था जो इंगलैंड के रहने वाले थे और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में से एक थे। उन्होंने इंडिया और चाइना नाम से एक पर्चा लिखा था जिसके चलते उसे ब्रिटिश हुकूमत ने गिरफ्तार कर लिया था। कोर्ट में वह बरी हो गए। इसी तरह ट्रेड यूनियन और कम्युनिस्ट लीडर बीटी रणदिवे के राजद्रोह के मामले में डॉ, आंबेडकर ने ही वकालत की जिसमें रणविदे को भी बरी कर दिया गया। ट्रेड यूनियन से जुड़े अनेकों मामले में, जिसमें देश के प्रमुख कम्युनिस्ट नेता वीबी कार्णिक, मणिबेन कारा, अब्दुल मजीद, रणविदे जैसे लोग शामिल थे, का भी बचाव किया था। बाबा साहब ने मानवाधिकारों की रक्षा के लिए कई प्रकरणों में पैरवी की।
बहरहाल, 1946 में वे भारत की संविधान सभा के लिए चुने गये। 15 अगस्त 1947 को उन्होंने स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री के रूप में शपथ ली। इसके बाद उन्हें संविधान सभा की मसौदा समिति का अध्यक्ष चुना गया और उन्होंने भारत के संविधान का मसौदा तैयार करने की प्रक्रिया का नेतृत्व किया। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने डॉ, बीआर आंबेडकर को आजाद भारत का पहला कानून मंत्री बनाया था। कानून मंत्री के रूप में उन्होंने शोषित-पीडि़त और कमजोर वर्गों को अधिकार देने के लिए संविधान में प्रावधान किए और उन्हें पारित करवाया। जातिगत व्यवस्था को खत्म किया, सभी को समान दर्जा और समान अधिकार दिए। बाबा साहब ने ही महिलाओं को समान दर्जा और अधिकार देने वाले कानूनों की नींव रखी थी।
लेखक- मुस्ताक अली बोहरा पेशे से अधिवक्ता है और मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के निवासी है।
नेशनल ओवरसीज स्कॉलरशिपः सेकेंड राउण्ड के तहत गत 1 सितम्बर 2024 से आवेदन प्रक्रिया शुरू, 10 अक्टूबर 2024 आवेदन करने की अंतिम तिथि।
नई दिल्ली। यदि आप विदेश में पढ़ाई करना चाहते हैं, लेकिन पारिवारिक आर्थिक स्थिति के चलते अपने सपने को पूरा नहीं कर पा रहे हैं तो यह खबर आपके लिए है। भारत सरकार के सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्रालय के अधीन सामाजिक न्याय व अधिकारिता विभाग द्वारा राष्ट्रीय प्रवासी छात्रवृत्ति (National overseas scholarship) 2024 के लिए आवेदन का दूसरा राउंड 1 सितम्बर 2024 से शुरू हो चुका है। आवेदन करने की अंतिम तिथि 10 अक्टूबर 2024 है। आवेदन प्रक्रिया के माध्यम से स्टूडेंट्स अमेरिका और ब्रिटेन में अपनी मास्टर्स और पीएचडी की पढ़ाई करने के लिए फीस के साथ-साथ 14 लाख रुपये तक आर्थिक मदद प्राप्त कर सकते हैं।
नेशनल ओवरसीज स्कॉलरशिप के लिए निर्धारित योग्यता रखने वाले उम्मीदवार आवेदन कर सकते हैं और चयनित होने पर छात्र-छात्राओं को कोर्स की फीस के अतिरिक्त 11 ले 14 लाख रुपये की आर्थिक मदद केंद्र सरकार द्वारा दी जाती है। यह आर्थिक सहायता वार्षिक गुजारा भत्ता, वार्षिक आकस्मिक निधि और अन्य खर्चों के लिए दी जाती है। इसके अतिरिक्त ट्यूशन फीस, आने-जाने का हवाई यात्रा किराया व मेडिकल बीमा आदि स्टूडेंट्स को दी जाती है।
दलित दस्तक को विभागीय सचिव योगेश तनेजा ने बताया कि नेशनल ओवरसीज स्कॉलरशिप स्कीम के तहत फर्स्ट राउंड में 15 फरवरी से 31 मार्च 2024 तक आवेदन मांगे गए थे। इस दौरान कुल 125 स्कॉलरशिप के लिए पर्याप्त आवेदन प्राप्त नहीं हुए थे। ज्यादा छात्र-छात्राओं को स्कीम का लाभ प्राप्त हो सके। इसलिए दूसरे राउंड के तहत आवेदन मांगे गए है। आवेदक विभागीय वेबसाइट (nosmsje.gov.in) पर स्कीम की पूर्ण जानकारी व आवेदन प्रक्रिया जान सकते है।
कौन कर सकता है आवेदन?
सामाजिक न्याय व अधिकारिता विभाग द्वारा जारी राष्ट्रीय प्रवासी छात्रवृत्ति 2024 अधिसूचना के मुताबिक कुल 125 छात्र-छात्राओं को दी जाने वाली इस स्कॉलरशिप में से 115 अनुसूचित जातियों, 6 डिनोटिफाईड, नोमैडिक और सेमी-नोमैडिक जनजातियों, 4 भूमिहीन कृषि श्रमिकों व परंपरागत कारीगर परिवारों से आने वाले छात्र-छात्राओं की दी जाती है।
नेशनल ओवरसीज स्कॉलरशिप प्राप्त करने के लिए छात्र या छात्रा को यूके या यूएस के ऐसे संस्थान में मास्टर्स या पीएचडी एडमिशन का ऑफर लेटर प्राप्त हुआ होना चाहिए, जिन्हें क्यूएस यूनिवर्सिटी रैंकिंग्स 2024 में शीर्ष 500 में स्थान मिला है।
साथ ही, स्टूडेंट्स को क्वालिफाईंग एग्जाम को कम से कम 60 फीसदी अंकों के साथ उत्तीर्ण होना चाहिए। मास्टर्स डिग्री एडमिशन के लिए स्टूडेंट्स को बैचलर्स डिग्री तथा पीएचडी के लिए मास्टर्स डिग्री किसी मान्यता प्राप्त भारतीय विश्वविद्यालय से 60 फीसदी अंकों के साथ उत्तीर्ण होना चाहिए।
कहां करें आवेदन?
नेशनल ओवरसीज स्कॉलरशिप-2024 के लिए आवेदन के लिए स्टूडेंट्स को इस छात्रवृत्ति के लिए लॉन्च किए गए आधिकारिक पोर्टल, पर विजिट करना होगा। इस पोर्टल पर पहले रजिस्ट्रेशन और फिर पंजीकृत विवरणों से लॉग-इन करके स्टूडेंट्स अपना अप्लीकेशन सबमिट कर सकेंगे।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी इन दिनों अमेरिका की यात्रा पर हैं, जहां वह अलग-अलग यूनिवर्सिटी में युवाओं से संवाद कर रहे हैं। हालांकि राहुल गाँधी अमेरिका के जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी में आरक्षण को लेकर दिये अपने बयान पर घिर गए हैं। बसपा सुप्रीमों मायावती ने राहुल गांधी के बयान को आधार बनाकर उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
अमेरिकी दौरे पर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल से जब आरक्षण को लेकर यह पूछा गया कि आरक्षण कब तक जारी रहेगा, राहुल गाँधी ने कहा कि, कांग्रेस पार्टी आरक्षण खत्म करने के बारे में तब सोचेगी, जब देश में निष्पक्षता होगी। फिलहाल देश में ऐसी स्थिति नहीं है। वंचितों की स्थिति का जिक्र करते हुए राहुल गाँधी ने कहा कि, आदिवासियों को 100 रुपये में से 10 पैसे मिलते हैं। जबकि दलितों को 100 में से 5 रुपये मिलते हैं। ओबीसी समाज को भी कमोबेश इतनी ही राशि मिलती है। यानी देश में 90 फीसदी लोगों को समान अवसर नहीं मिल रहे हैं।
5. कुल मिलाकर, जब तक देश में जातिवाद जड़ से खत्म नहीं हो जाता है तब तक भारत की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर होने के बावजूद भी इन वर्गों की सामाजिक, आर्थिक व शैक्षणिक हालत बेहतर होने वाली नहीं है। अतः जातिवाद के समूल नष्ट होने तक आरक्षण की सही संवैधानिक व्यवस्था जारी रहना जरूरी।
साफ है कि राहुल गाँधी इस असमानता का जिक्र करते हुए आरक्षण को जस्टिफाई कर रहे थे और उनका कहना था कि जब तक ऐसी स्थिति रहेगी और समानता नहीं आएगी, आरक्षण खत्म नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि बहनजी ने नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी के असमानता वाली थ्योरी को खारिज करते हुए साफ कर दिया कि देश में जातिवाद के रहने तक आरक्षण खत्म नहीं किया जा सकता।
राहुल गाँधी के बयान के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए बसपा अध्यक्ष मायावती ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा,
कांग्रेस पार्टी के सर्वेसर्वा श्री राहुल गाँधी ने विदेश में यह कहा है कि भारत जब बेहतर स्थिति में होगा तो हम SC, ST, OBC का आरक्षण खत्म कर देंगे। इससे स्पष्ट है कि कांग्रेस वर्षों से इनके आरक्षण को खत्म करने के षडयंत्र में लगी है। एससी, एसटी, ओबीसी वर्गों के लोग कांग्रेसी नेता श्री राहुल गाँधी के दिए गए इस घातक बयान से सावधान रहें, क्योंकि यह पार्टी केन्द्र की सत्ता में आते ही, अपने इस बयान की आड़ में इनका आरक्षण जरूर खत्म कर देगी। एससी, एसटी और ओबीसी संविधान व आरक्षण बचाने का नाटक करने वाली इस पार्टी से जरूर सजग रहें।
बहनजी यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने राहुल गाँधी पर अपना हमला जारी रखते हुए कहा कि, कांग्रेस शुरू से ही आरक्षण-विरोधी सोच की रही है। केन्द्र में रही इनकी सरकार में जब इनका आरक्षण का कोटा पूरा नहीं किया गया, तब इस पार्टी से इनको इंसाफ ना मिलने की वजह से ही बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने कानून मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था।
राहुल गांधी के असमानता वाली थ्योरी के जवाब में बहनजी ने कहा कि, जब तक देश में जातिवाद जड़ से खत्म नहीं हो जाता है तब तक भारत की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर होने के बावजूद भी इन वर्गों की सामाजिक, आर्थिक व शैक्षणिक हालत बेहतर होने वाली नहीं है। अतः जातिवाद के समूल नष्ट होने तक आरक्षण की सही संवैधानिक व्यवस्था जारी रहना जरूरी।
साफ है कि राहुल गांधी जहां आर्थिक और संसाधनों में हिस्सेदारी की समानता आने तक आरक्षण रहने की वकालत कर रहे हैं, बहन मायावती ने जाति व्यवस्था रहने तक आरक्षण जारी रखने की वकालत की है।
उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में दलित समाज की दो युवतियों की मौत और मध्यप्रदेश में जीआरपी थाने में पुलिसकर्मियों द्वारा एक बुजुर्ग और एक नाबालिग दलित की पिटाई का मामला तूल पकड़ चुका है। इन दोनों घटनाओं को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। खास तौर पर ये दोनों घटनाएं भारत में दलितों पर होने वाले अत्याचार की इंतहा को बताती है। मामला इतना संदिग्ध है कि यू-ट्यूब इसको दिखाने के पहले तमाम बंदिशे लगा रहा है। लेकिन आप लिंक पर जाकर यह वीडियो देख सकते हैं।
उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले के मऊ तहसील क्षेत्र के घुरेटा गांव में एक घटना भारत की असल तस्वीर बताने को काफी है। यह घटना बताती है कि भारत जिस विकास का ढिंढ़ोरा पीटता है, उसकी झलक अभी भी देश के कई गांवों से और खासकर वंचित समाज की बस्तियों से कोसो दूर है। एक्टिविस्ट और ट्राइबल आर्मी के संस्थापक हंसराज मीणाइस घटना को सामने लेकर आए हैं और कई सवाल उठाया है। उन्होंने अपने एक्स अकाउंट पर घटना का पूरा विवरण देते हुए लिखा-
माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी, मैं आपके संज्ञान में चित्रकूट जिले के मऊ तहसील क्षेत्र के घुरेटा गांव की एक हृदयविदारक घटना सामने लाना चाहता हूं, जो न केवल प्रशासनिक असफलता बल्कि सरकार की ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की उपेक्षा का भी प्रतीक है। घुरेटा गांव के निवासियों को एक गंभीर मरीज को अस्पताल तक ले जाने के लिए चारपाई पर एक किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ा, क्योंकि गांव में एंबुलेंस नहीं पहुंच सकी। यह घटना सरकारी तंत्र की उस गंभीर विफलता को उजागर करती है, जो आज भी भारत के दूरदराज इलाकों में बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने में असमर्थ है।
इस गांव में न तो सड़क की कोई व्यवस्था है और न ही कोई नजदीकी अस्पताल। जिला मुख्यालय से मात्र 30 किमी की दूरी पर होने के बावजूद यहां के निवासियों को इस प्रकार की अमानवीय परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है। यह घटना केवल एक गांव की समस्या नहीं है, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए एक गंभीर चिंता का विषय है। क्या यह उन ग्रामीणों के अधिकारों का हनन नहीं है, जिन्हें आप स्वास्थ्य सुविधाएं देने का वादा करते हैं? सरकार ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में विकास के बड़े-बड़े दावे किए हैं, लेकिन जब ग्रामीणों को अपनी जीवनरक्षक सेवाओं के लिए चारपाई पर एक किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता है, तो यह उन सभी दावों की पोल खोलता है।
यह बेहद शर्मनाक और दुखद है कि 21वीं सदी के भारत में भी ऐसे दृश्य देखने को मिल रहे हैं। मैं आपसे निवेदन करता हूं कि इस घटना को गंभीरता से लेते हुए तुरंत कार्रवाई करें और घुरेटा गांव के साथ-साथ अन्य ग्रामीण क्षेत्रों में भी स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं को सुदृढ़ करने के लिए ठोस कदम उठाएं। यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह अपने नागरिकों को जीवन की बुनियादी आवश्यकताएं स्वास्थ्य, शिक्षा, और परिवहन उपलब्ध कराए। आशा है, आपकी सरकार इस मामले को प्राथमिकता देगी और इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए त्वरित कार्रवाई करेगी।
माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी, मैं आपके संज्ञान में चित्रकूट जिले के मऊ तहसील क्षेत्र के घुरेटा गांव की एक हृदयविदारक घटना लाना चाहता हूं, जो न केवल प्रशासनिक असफलता बल्कि सरकार की ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की उपेक्षा का भी प्रतीक है। इस गांव के निवासियों को… pic.twitter.com/hL8ToLpeMA
आरक्षण में वर्गीकरण के खिलाफ दलित समाज के दिग्गजों ने देश भर में मोर्चा खोल दिया है। 21 अगस्त 2024 को इसको लेकर देश भर में प्रदर्शन हुए। आम से लेकर खास तक, दलित-आदिवासी समाज के तमाम लोगों ने सड़कों पर उतर पर अपना विरोध जताया। इस दौरान दलित दस्तक ने अपने यू-ट्यूब चैनल के लिए तमाम लोगों से बातचीत की। इसमें आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद, दिल्ली सरकार के पूर्व मंत्री राजेन्द्र पाल गौतम, दिल्ली विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. जितेन्द्र मीणा जैसे दिग्गजों ने अपनी बात रखी।
नगीना से सांसद और आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद ने खुद जंतर-मंतर पहुंच कर धरना दिया।
तो वहीं दिल्ली सरकार के पूर्व मंत्री राजेन्द्र पाल गौतम ने इसे साजिश बताकर इसका पर्दाफाश किया। उन्होंने वाल्मीकि समाज से भी अपील की।
वहीं, दूसरी ओर दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर और आदिवासी समाज पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. जितेन्द्र मीणा ने सरकार और सुप्रीम कोर्ट की मंशा पर सवाल उठाया। उन्होंने जस्टिस आर.एस. गवई को भी निशाने पर लिया।
दलित एक्टिविस्ट डॉ. ओम सुधा भी दिल्ली के जंतर-मंतर पहुंचे और न्यायपालिका पर जमकर निशाना साधा।
वर्गीकरण के खिलाफ प्रदर्शन देश भर में हुए। देश के अलग-अलग हिस्सों में अंबेडकरवादी संगठनों ने सड़क पर उतर पर इसका विरोध किया और इसे समाज को तोड़ने की साजिश कहा।
जब वंचित समाज आरक्षण में वर्गीकरण के फैसले की समीक्षा करने में जुटा है, लैटरल एंट्री यानी बिना किसी परीक्षा के जॉइंट सेक्रेटरी, डायरेक्टर और डिप्टी सेक्रेटरी जैसे पदों को भरने का फरमान जारी हो गया है। 17 अगस्त को आए इस नोटिफिकेशन को लेकर बहुजनों में खासा गुस्सा है। सामाजिक न्याय की संस्थाओं के साथ-साथ बहुजन नेताओं ने भी इसके खिलाफ आवाज उठाई है।
बसपा सुप्रीमों मायावती ने इस मुद्दे पर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और इस भर्ती को गलत, असंवैधानिक और गैर कानूनी बताया है। बसपा सुप्रीमों ने कहा कि-
केन्द्र में संयुक्त सचिव, निदेशक एवं उपसचिव के 45 उच्च पदों पर सीधी भर्ती का निर्णय सही नहीं है, क्योंकि सीधी भर्ती के माध्यम से नीचे के पदों पर काम कर रहे कर्मचारियों को पदोन्नति के लाभ से वंचित रहना पड़ेगा। इन सरकारी नियुक्तियों में SC, ST व OBC वर्गों के लोगों को उनके कोटे के अनुपात में अगर नियुक्ति नहीं दी जाती है तो यह संविधान का सीधा उल्लंघन होगा। और इन उच्च पदों पर सीधी नियुक्तियों को बिना किसी नियम के बनाये हुए भरना बीजेपी सरकार की मनमानी होगी, जो कि गैर-कानूनी एवं असंवैधानिक होगा।
वहीं, दूसरी ओर आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर ने भी इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। प्रधानमंत्री मोदी को घेरते हुए उन्होंने कहा है कि परम् पूज्य बाबा साहब डॉo भीमराव अंबेडकर जी की प्रतिमा के सामने सिर झुकाकर, संविधान को माथे पर लगाने वाले प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार उसी संविधान की किस कदर हत्या करने पर तुली है लेटरल एंट्री का यह नोटिफिकेशन इसका जीता जागता उदाहरण है।
केंद्र सरकार द्वारा अपनी विचारधारा के 45 लोगों को बिना कोई परीक्षा पास किए बैकडोर से मंत्रालयों में बैठाने के लिए एक बार फिर से विज्ञापन निकाल दिया है। जिसमें किसी भी पद पर कोई आरक्षण नहीं है।
नगीना सांसद चंद्रशेखर का आरोप है कि इन पदों की अघोषित योग्यता ये है कि अभ्यर्थी संघ से जुड़ा हो और राजनैतिक तौर पर भाजपा की विचारधारा लिए काम करता हो। न्यायाधीशों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए चंद्रशेखर ने कहा कि OBC/SC/ST में जबरन क्रीमी लेयर खोजने वाले माननीय न्यायमूर्तियों और केंद्र सरकार से सवाल इन पदों पर इन वर्गों का तथाकथित क्रीमीलेयर कहां चला जाता है? चंद्रशेखर ने सड़क से लेकर संसद तक इसके खिलाफ आवाज उठाने की बात कही है।
गौरतलब है की ये पहला मौका नहीं है। इससे पहले मोदी सरकार लेटरल एंट्री के नाम पर 2017 से 2023 के बीच लगभग 52 नियुक्तियां कर चुकी है, जिनमें कोई आरक्षण नहीं दिया गया। यह नियुक्ति “राजनैतिक सरपरस्ती” के चलते मिल गई। लेटरल एंट्री के ज़रिए भरे जाने वाले इन पदों में 𝟒𝟓 जॉइंट सेक्रेटरी, डायरेक्टर और डिप्टी सेक्रेटरी हैं।
अगर 𝐔𝐏𝐒𝐂 परीक्षा के माध्यम से इन यह नियुक्ति करती तो 𝟒𝟓 में से तकरीबन 𝟐𝟑 अभ्यर्थी दलित, पिछड़ा और आदिवासी वर्गों से चयनित होकर आते लेकिन आरक्षण और संविधान विरोधी केन्द्र की भाजपा सरकार ने चोर दरवाजे यानि बैकडोर से खास जातियों और विचारधारा के चहेतों को मंत्रालयों में बैठाने का प्रबंध कर लिया है। हालांकि बहुजन समाज ने भी साफ कर दिया है कि अब वह इस मुद्दे पर चुप बैठने वाली नहीं है और सरकार से दो-दो हाथ करने को तैयार है।
अमूमन यह कम होता है कि बसपा प्रमुख मायावती बार-बार मीडिया के सामने आएं। लेकिन आरक्षण में वर्गीकरण को लेकर उठे बवाल के बीच बसपा सुप्रीमों फुल फार्म में हैं। 4 अगस्त को मीडिया को संबोधित करने और प्रधानमंत्री एवं सरकार से संसद सत्र के दौरान बिल को पास करने की मांग करने वाली बहनजी 10 अगस्त को फिर मीडिया के सामने आईं। तेवर सख्त थे तो सरकार और आवाम दोनों को साफ संदेश था।
लखनऊ में आयोजित प्रेस वार्ता में मायावती ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आश्वासन देने भर से काम नहीं चलेगा। केंद्र सरकार को संसद का सत्र बुलाकर अनुसूचित जाति/जनजाति और क्रीमीलेयर मामले में आरक्षण की स्थिति साफ करनी चाहिए। मायावती ने आरोप लगाया कि इस मामले में मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में ठीक से पैरवी नहीं की। प्रधानमंत्री की नीयत अगर साफ है तो संसद का सत्र समय से पहले स्थगित नहीं करना चाहिए। विशेष सत्र बुलाना चाहिए।
कांग्रेस और भाजपा पर एक साथ हमला बोलते हुए बहनजी ने कहा कि बीजेपी और कांग्रेस आरक्षण के खिलाफ हैं। क्रीमीलेयर के बहाने आरक्षण खत्म करने की कोशिश की जा रही है। इनकी सरकारों में नौकरियों को खत्म कर संविदा पर तैनाती आरक्षण खत्म करने की ही कोशिश है। प्रेस कांफ्रेस में बसपा सुप्रीमों ने सभी राजनीतिक दलों को कठघरे में खड़ा किया और कहा कि सभी राजनीतिक दलों को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
अपने समर्थकों और एससी-एसटी समाज से अपील करते हुए बसपा प्रमुख ने लोगों से आरक्षण के मुद्दे को लेकर एकजुट होने की अपील करते हुए कहा कि अगर अब आवाज नहीं उठाई तो हमेशा के लिए आरक्षण से वंचित रहना पड़ेगा। देश की दिग्गज नेता ने राष्ट्रीय स्तर पर जाति जनगणना की भी मांग उठाई।
साफ है कि आरक्षण के मुद्दे ने बहुजन समाज पार्टी और उसकी मुखिया मायावती को बड़ा मौका दे दिया है। वह इस मुद्दे के जरिये जहां सीधे अपने खोए हुए जनाधार से जुड़ने की कोशिश कर रही हैं तो वहीं, दलित समाज को एकजुट होने का संदेश देकर उन्होंने साफ कर दिया है कि बसपा इस मुददे का नेतृत्व करने और सरकार से लड़ने के लिए तैयार है।
25 जुलाई 2022 को द्रौपदी मूर्मू भारत की 15वीं राष्ट्रपति बनी थीं। जब वो राष्ट्रपति बनी तो उनकी आदिवासियत पहचान को लेकर भाजपा ने खूब ढिंढ़ोरा पीटा। कहा गया कि देश में पहली बार आदिवासी समाज का व्यक्ति और वो भी महिला शीर्ष पद पर पहुचेंगी। लेकिन वही राष्ट्रपति द्रौपदी मूर्मू 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस पर बधाई देना भूल गईं। इसको लेकर आदिवासी समाज के लोगों ने आपत्ति, अफसोस और विरोध जताया है।
सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर काफी सक्रिय रहने वाले हंसराज मीणा ने एक्स पर पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल का विश्व आदिवासी दिवस पर दिये गए संदेश का साझा करते हुए लिखा-
कभी देश में राष्ट्रपति हुआ करते थे। संयुक्त राष्ट्र संघ की गाइडलाइन के आधार पर प्रति वर्ष 9 अगस्त को बधाई संदेश दिया जाता था। एक वर्तमान राष्ट्रपति है जो आदिवासी होते हुए भी देश के 15 करोड़ लोगों को बधाई संदेश तक नहीं देती। किस बात का गर्व करें? शर्म आती हैं।#विश्व_आदिवासी_दिवसpic.twitter.com/1BpUw4yhJd
राष्ट्रपति द्रौपदी मूर्मू फिलहाल विदेश दौरे पर हैं। 4 अगस्त को वह फिजी, न्यूजीलैंड और तिमोर लेस्ते देशों की यात्रा पर निकली। प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया के आधिकारिक एक्स हैंडल पर इसकी जानकारी और तस्वीर दोनों है। अपनी इस यात्रा में राष्ट्रपति जहां भी जा रही हैं, और जिस राष्ट्राध्यक्ष या महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में शामिल हो रही हैं, उसकी तस्वीरें और जानकारी लगातार साझा की जा रही है।
9 अगस्त को इस आधिकारिक एक्स हैंडल से जो पोस्ट किये गए हैं। उसमें नीरज चोपड़ा को पेरिस ओलंपिक में रजत पदक जीतने की बधाई दी गई है, जबकि अन्य में वीडियो जारी किया गया है, जिसमें राष्ट्रपति मूर्मू न्यूजीलैंड के ऑकलैंड में इंडियन कम्यूनिटी रिसेप्शन को संबोधित कर रही हैं। इस दिन विश्व आदिवासी दिवस से जुड़ा कोई पोस्ट नहीं दिख रहा है। राष्ट्रपति द्रौपदी मूर्मू की ताजा पोस्ट तिमोर लेस्ते से 10 अगस्त को साढ़े 11 बजे की है, जिसमें वो पूर्व राष्ट्रपति वी.वी.गिरी की जयंती पर उनकी तस्वीर के सामने झुककर उनको श्रद्धांजलि दे रही हैं। यानी अभी भी वह अपने विदेशी दौरे पर ही हैं।
President Droupadi Murmu paid floral tributes to Shri V.V. Giri, former President of India, on his birth anniversary at Dili, Timor-Leste. pic.twitter.com/Y6DrXqR8GF
यहां सवाल यह उठता है कि जब राष्ट्रपति और उनके साथ चल रहे स्टॉफ को हर किसी की जयंती और पेरिस ओलंपिक में चल रही प्रतिस्तपर्धाओं की जानकारी है और वो लगातार राष्ट्रपति के जरिये इससे जुड़े संदेश भी दे रहे हैं तो आखिर वह विश्व आदिवासी दिवस की बधाई देना कैसे भूल गए। हो सकता है कि इसके लिए राष्ट्रपति भवन का स्टॉफ जिम्मेदार हो, लेकिन आदिवासी समाज का होने के नाते राष्ट्रपति द्रौपदी मूर्मू का भी विश्व आदिवासी दिवस को भूल जाने को दुर्भाग्यपूर्ण नहीं तो और क्या कहा जाए। संभवतः यह पहली बार है जब कोई राष्ट्रपति विश्व आदिवासी दिवस की बधाई देना भूल गया है। एक सवाल यह भी है कि क्या यह सरकार की आदिवासी समाज को लेकर किसी अलग तरह की राजनीति की शुरुआत तो नहीं?
सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की खंडपीठ के द्वारा एक अगस्त को आरक्षण में वर्गीकरण और क्रीमी लेयर को लेकर टिप्पणी की थी। इसके बाद दलित समाज के भीतर से विरोध उठना शुरू हो गया। इस बीच 9 अगस्त को इस बारे में केंद्र सरकार ने बयान जारी कर स्थिति को साफ किया है। केंद्र सरकार की ओर केद्रीय मंत्री अश्विनी वार्ष्णेय सामने आए। उन्होंने कहा कि एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर नहीं होगा। हालांकि एससी-एसटी आरक्षण में वर्गीकरण को लेकर केंद्र ने चुप्पी साध रखी है। ऐसे में यह आंदोलन आगे कैसे बढ़ेगा, इसको लेकर दलित दस्तक के संपादक अशोक दास ने सोशल एक्टिविस्ट और विचारक डॉ. सतीश प्रकाश से चर्चा की। देखिए चर्चा का वीडियो-
सुप्रीम कोर्ट के आरक्षण में वर्गीकरण के फैसले के बाद तेलंगाना सरकार ने इसके पक्ष में फैसला लेना शुरू कर दिया है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने यहां तक कहा कि आरक्षण में वर्गीकरण के फैसले को लागू करने वाला तेलंगाना पहला राज्य बनेगा। इसको लेकर अंबेडकरवादी समाज का एक तबका नाराज हो गया है। दलित एक्टिविस्ट और चिंतक सतीश प्रकाश ने इसको लेकर कांग्रेस पर जमकर निशाना साधा है। उनके निशाने पर कांग्रेस नेता राहुल गाँधी भी हैं, जो पूरे लोकसभा चुनाव के दौरान संविधान बचाने की बात करते हुए दिखे। सतीश प्रकाश ने कांग्रेस और राहुल गाँधी पर कई आरोप लगाए हैं।
दलित दस्तक के संपादक अशोक दास ने सतीश प्रकाश से इस संबंध में दलित दस्तक के यू-ट्यूब चैनल के लिए चर्चा की। देखिए क्या है उनके तर्क-
आरक्षण में वर्गीकरण को लेकर एक अगस्त को दिये गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर बहस तेज हो गई है। इस पर चर्चा चल रही है कि यह फैसला कितना सही और संविधान सम्मत है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील एडवोकेट के. एस चौहान ने दलित दस्तक के संपादक अशोक दास से विस्तृत बात की और बताया कि इस फैसले के संवैधानिक मायने क्या है। दलित दस्तक के यू-ट्यूब चैनल पर हुई इस चर्चा का वीडियो लिंक हम यहां दे रहे हैं। सुनिये कितना न्याय संगत है सुप्रीम कोर्ट का आरक्षण पर फैसला-