दलित के घर खाने पर भाजपा की दलित सांसद ने ही उठाया सवाल

लखनऊ। दलितों के घर खाने और उसे प्रचारित करना राजनीतिक दलों का फैशन बनता जा रहा है. फिलहाल भाजपा के नेता इस कवायद में जुटे हुए हैं. लेकिन भाजपा की ही एक दलित सांसद ने अपनी ही पार्टी के नेताओं को आड़े-हाथों लिया है. बीजेपी सांसद सावित्री बाई फुले ने इसे दिखावा और बहुजन समाज का ‘अपमान‘ करार दिया है.

बहराइच लोकसभा सीट से सांसद सावित्री बाई फुले ने कहा, “बाबा साहब भीमराव आंबेडकर ने भारत के संविधान में जाति व्यवस्था को खत्म करते हुए सबको बराबर की जिंदगी जीने का अधिकार दिया है, लेकिन आज भी अनुसूचित जाति के प्रति लोगों की मानसिकता साफ नहीं है. इसीलिये लोग उनके घर में खाना खाने तो जाते हैं, लेकिन उनका बनाया हुआ खाना नहीं खाते. उनके लिये बाहर से बर्तन आते हैं, बाहर से खाना बनाने वाले आते हैं, वे ही परोसते भी हैं. दिखावे के लिये दलित के दरवाजे पर खाना खाकर फोटो खिंचवायी जा रही है और उन्हें व्हाट्सअप, फेसबुक पर वायरल किये जाने के साथ-साथ टीवी चैनलों पर चलवाकर वाहवाही लूटी जा रही है. इससे पूरे देश के बहुजन समाज का अपमान हो रहा है.’’

सावित्री ने कहा कि बात तो तब हो जब दलित के हाथ का बनाया हुआ खाना खाएं और खुद उसके बर्तनों को धोएं. उन्होंने कहा कि अगर अनुसूचित जाति के लोगों का सम्मान बढ़ाना है तो उनके घर पर खाना खाने के बजाय उनके लिये रोटी, कपड़े, मकान और रोजगार का इंतजाम किया जाए. हम सरकार से मांग करते हैं कि वह अनुसूचित जाति के लोगों के लिये नौकरियां सृजित करे. केवल खाना खाने से अनुसूचित जाति के लोग आपसे नहीं जुड़ेंगे.

करन कुमार

22 लाख कर्मचारियों ने दी सीएम योगी को धमकी

​लखनऊ। ​उत्तर प्रदेश के 22 लाख राज्य कर्मचारियों ने 8 जून को हड़ताल पर जाने का ऐलान किया है. ये कर्मचारी वेतन विसंगति, सेवानिवृति की सीमा बढ़ाने, मेडिकल कैशलेस सेवा का लाभ सभी कर्मचारियों को देने की मांग को लेकर नाराज हैं. कर्मचारियों के संगठन ने ऐलान किया है कि 16 मई को सभी जनपद मुख्यालय पर मोटरसाइकिल रैली निकाली जाएगी. इस दौरान मांगों को लेकर मुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंपा जाएगा. वहीं 7 और 8 जून को दो दिवसीय कामबंदी रहेगी.

कर्मचारी शिक्षक संयुक्त मोर्चा के अध्यक्ष वीपी मिश्र ने इस दौरान मुख्यमंत्री को अंतिम विनम्र चेतावनी दी कि 8 जून के पहले 19 सितम्बर 2016 के सहमतियों के अनुपालन शासनादेश निर्गत नहीं किया गया तो दो दिवसीय कार्य बहिष्कार को आगे बढ़ाने के लिए बाध्य होना पड़ेगा. दरअसल कर्मचारी शिक्षक संयुक्त मोर्चा उत्तर प्रदेश की प्रदेशीय कार्यकारिणी की बैठक गुरुवार को वीपी मिश्र की अध्यक्षता में जवाहर भवन, इंदिरा भवन प्रांगण में हुई. इस दौरान राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद उप्र, राज्य कर्मचारी महासंघ, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी महासंघ, निगम कर्मचारी महासंघ, स्थानीय निकाय कर्मचारी महासंघ, जवाहर भवन इन्द्रा भवन कर्मचारी महासंघ, माध्यमिक शिक्षक संघ, शिक्षणेत्तर कर्मचारी महासंघ, फेडरेशन ऑफ फॉरेस्ट, विकास प्राधिकरण कर्मचारी महासंघ, मिनिस्टीरियल फेडरेशन आदि सम्बद्ध संगठनों के पदाधिकारियों ने हिस्सा लिया.

गौरतलब है कि संयुक्त मोर्चा के नेताओं का कहना है कि 19 सितम्बर 2016 को तत्कालीन मुख्यसचिव राहुल भटनागर द्वारा बैठक करके कर्माचारियों की मांगो पर जो निर्णय लिया गया था, उस पर सार्थक निर्णय लेकर शासनादेश जारी किया जाए. सीएम योगी पर आरोप लगाते हुए संगठन के पदाधिकारियों ने कहा कि प्रदेश के मुखिया द्वारा पिछले एक साल से प्रदेश के लाखों कर्मचारियों एवं शिक्षकों की उपेक्षा की जा रही है, उससे कर्मचारी आहत हैं.

हिन्दू थे जिन्ना के पिता, जानिए क्यों बन गए मुस्लिम

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पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना के पिता हिन्दू परिवार में पैदा हुए थे. लेकिन एक घटना से वह इतने नाराज हो गए कि उन्होंने अपना धर्म ही बदल लिया और हिन्दू से मुस्लिम बन गए. एक बार मुस्लिम बनने के बाद जिन्ना के पिता जिंदगी भर इस धर्म के साथ रहें और उनके बाद जिन्ना और उनके बच्चे भी इसी धर्म का पालन कर रहे हैं.

अकबर एस अहमद की किताब जिन्ना, पाकिस्तान एंड इस्लामिक आइडेंटीटी में विस्तार से उनकी जड़ों की जानकारी दी गई है. इसके मुताबिक जिन्ना परिवार गुजरात के काठियावाड़ का रहने वाला था. जिन्ना के दादा का नाम प्रेमजीभाई मेघजी ठक्कर था. जाहिर है कि वो हिन्दू थे. वो काठियावाड़ के गांव पनेली के रहने वाले थे. लोहाना मूल तौर पर वैश्य होते हैं, जो गुजरात, सिंध और कच्छ में होते हैं. कुछ लोहाना राजपूत जाति से भी ताल्लुक रखते हैं. प्रेमजी भाई मछली के कारोबार में थे. उनका मछली का कारोबार देश-विदेश में फैला हुआ था. इससे उन्होंने बहुत पैसा भी कमाया. जिन्ना का खानदान लोहना जाति से ताल्लुक रखता था. इस जाति के अन्य लोगों को उनका मछली का कारोबार पसंद नहीं था. लोहना कट्टर तौर शाकाहारी थे और धार्मिक तौर पर मांसाहार से सख्त परहेज करते थे.

ऐसे में जब प्रेमजी भाई ने मछली का कारोबार शुरू किया तो उनकी जाति के लोग इसका विरोध करने लगें. उनसे कहा गया कि अगर उन्होंने इस बिजनेस से हाथ नहीं खींचे तो उन्हें जाति से बहिष्कृत कर दिया जाएगा. प्रेमजी ने बिजनेस जारी रखने के साथ जाति समुदाय में लौटने का प्रयास किया लेकिन बात नहीं बनी. उनका बहिष्कार जारी रहा. इस बहिष्कार के बाद भी प्रेमजी तो लगातार हिन्दू बने रहे लेकिन उनके बेटे पुंजालाल ठक्कर को पिता और परिवार का बहिष्कार इतना अपमानजनक लगा कि उन्होंने गुस्से में पत्नी और बच्चों के साथ धर्म ही बदल डाला और मुस्लिम बन गए.

हालांकि प्रेमजी के बाकी बेटे हिन्दू धर्म में ही रहे. इसके बाद जिन्ना के पिता पुंजालाल के रास्ते अपने भाइयों और रिश्तेदारों तक से अलग हो गए. वो काठियावाड़ से कराची चले गए. वहां उनका बिजनेस और फला-फूला. वो इतने समृद्ध व्यापारी बन गए कि उनकी कंपनी का आफिस लंदन तक में खुल गया. कहा जाता है कि जिन्ना के बहुत से रिश्तेदार अब भी हिन्दू हैं और गुजरात में रहते हैं.

चौपाल लगाकर भाजपा के दलित प्रेम की पोल खोलेगी बसपा

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भाजपा के झूठे दलित प्रेम की पोल खोलने के लिए बहुजन समाज पार्टी ने अपनी कमर कस ली है. इसके लिए बसपा ने दलित बाहुल्य गांवों में चौपाल लगाने का फैसला किया है. इस चौपाल में बसपा नेता भाजपा सरकार द्वारा किए जाने वाले दलित विरोधी कामों की पोल खोलेंगे. इस चौपाल में जिला कोऑर्डिनेटर के साथ क्षेत्रीय बसपा नेता भी शामिल होंगे. चौपाल कार्यक्रम की शुरुआत अगले महीने से होगी.

दरअसल भाजपा उत्तर प्रदेश में दलितों को अपने पाले में लाने के लिए ग्राम स्वराज अभियान चला रही है, जिसके तहत मुख्यमंत्री से लेकर डिप्टी सीएम, मंत्री, सांसद और विधायक गांवों में चौपाल लगाने से लेकर दलित के घर खाना खा रहे हैं. इस दौरान भाजपा नेताओं द्वारा दलित समाज के घर होटल से खाना मंगवा कर खाने सहित अपने ही महिला मंत्री से खाना बनवा कर खाने की खबर सामने आ चुकी है. बहुजन समाज पार्टी ने इस सच्चाई को दलित समाज तक पहुंचाने का फैसला किया है. बसपा नेताओं द्वारा लगाया जाने वाला चौपाल इसी पोल-खोल की कड़ी का हिस्सा है. इसमें बसपा नेता दलित समाज के लोगों को सरकार और भाजपा नेताओं की सच्चाई से अवगत करवाएंगे.

2019 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए चौपाल के जरिए बसपा बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करने की कवायद में भी जुट गई है. बसपा प्रमुख मायावती ने भी पार्टी पदाधिकारियों को बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करने के निर्देश दिए हैं. इसके अलावा उन्होंने पार्टी से युवाओं को जोड़ने का भी निर्देश दिया है. दरअसल, बसपा लोकसभा चुनाव से पहले बूथ स्तर तक संगठन को खड़ा करना चाहती है. इसके लिए जोनल प्रभारियों को काम पर लगाया गया है.

बसपा के चौपालों में एक ओर जहां बीजेपी सरकार द्वारा किए गए दलित विरोधी कार्यों की जानकारी दी जाएगी. दूसरी ओर बसपा सरकार में हुए दलित हितों के लिए किए गए कार्यों को बताया जाएगा. बसपा का मानना है कि चौपाल के माध्यम से वह बीजेपी के झूठे दलित प्रेम का पर्दाफाश कर सकेगी. भाजपा के ग्राम स्वराज अभियान के जवाब में बसपा की इस चौपाल ने जहां उत्तर प्रदेश की राजनीति को दिलचस्प बना दिया है. तो वहीं इससे बहुजन समाज पार्टी अपने कार्यकर्ताओं को भी यह संदेश दे दिया है कि वह 2019 के लिए अपनी कमर कस लें.

SSC CGL 2018: 5 मई को जारी होगा 4 हजार नौकरियों के लिए नोटिफिकेशन

नई दिल्ली। स्टाफ सिलेक्शन कमीशन (SSC) SSC कंबाइन ग्रेजुएट लेवल (SSC CGL) 2018 एग्जाम के लिए शनिवार यानी 5 मई को नोटिफिकेशन जारी करेगा. इस साल CGL के एग्जाम से करीब 4 हजार नौकरियां मिलने की उम्मीद है. हर साल की तरह इस साल भी कैंडिडेट्स को नौकरी पाने के लिए 4 टेस्ट पास करने होंगे.

5 मई से CGL 2018 के लिए रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया शुरू होने जा रही है. एग्जाम देने के लिए कैंडिडेट्स को ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन करना होगा.

SSC CGL एग्जाम के लिए योग्यता: CGL का एग्जाम देने के लिए किसी भी विषय में ग्रेजुएट होना जरूरी है. जो स्टूडेंट्स ग्रेजुएशन के फाइनल ईयर में पढ़ाई कर रहे हैं वो भी इस एग्जाम के लिए अप्लाई कर सकते हैं.

आयु सीमा: SSC ने इस साल आयु सीमा में बदलाव करते हुए इसे 27 साल की बजाए 30 साल करने का फैसला किया है. इस एग्जाम को देने के लिए न्यूनतम उम्र 20 साल होनी चाहिए.

सैलरी: अलग-अलग पोस्ट के लिए सैलरी अलग होगी. पोस्ट के अनुसार ग्रेड को 5 हिस्सों में बांटा गया है. सैलरी की पूरी जानकारी ऑफिशिलय वेबसाइट पर उपलब्ध करवाई गई है.

ऐसे करें अप्लाई: स्टूडेंट्स को ऑफिशियल वेबसाइट पर ऑनलाइन एप्लिकेशन अप्लाई करना होगा. पेमेंट के बारे में जानकारी ऑफिशियल नोटिफिकेशन आने के बाद ही पता चलेगी.

महत्वपूर्ण तिथियां:-
Activity Dates
SSC CGL 2018 Online Application 5th May to 25th May 2018
SSC CGL 2018 Tier-I 25th July to 20th Aug 2018(CBE)
SSC CGL Tier-II 27.11.2018 to 30.11.2018(P-II CBE)
SSC CGL Tier-III (Des) To be notified later
SSC CGL Tier-IV Exam To be notified later

इश्क़ में मारा गया बड़ा राजन, तब आया छोटा राजन

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हर नई कहानी तब शुरू होती है, जब एक कहानी ख़त्म हो जाए. छोटा राजन की कहानी भी वहां से शुरू होती है, जहां पर बड़ा राजन यानी राजन नायर की कहानी ख़त्म होती है.
मुंबई के अपराध की दुनिया को जानने वाले जानते हैं कि राजन नायर दर्जी की नौकरी करता था. 25 से 30 रुपए कमा पाता था. उसकी गर्लफ्रेंड का बर्थडे आया. पैसों की ज़रूरत हुई तो उसने एक टाइपराइटर चुराकर बेच दिया.इन पैसों से राजन नायर गर्लफ्रेंड की ज़रूरतें पूरी करने लगा, जल्द ही पुलिस ने गिरफ्तार कर राजन नायर को तीन साल के लिए जेल भेज दिया. जेल से निकलकर राजन ने गुस्से में अपनी गैंग बना ली. नाम ‘गोल्डन गैंग’, जो आगे जाकर ‘बड़ा राजन गैंग’ कहलाया. बताया जाता है कि 1991 में एक मलयाली फ़िल्म आई थी ‘अभिमन्यु’ जो बड़ा राजन की ज़िंदगी पर आधारित थी उसमें इन घटनाओं को दिखाया गया है, बड़ा राजन की भूमिका इस फ़िल्म में मोहनलाल ने की थी.
राजन ने एक गुर्गे अब्दुल कुंजू को गैंग में जोड़ा. कुछ दिनों बाद इसी अब्दुल कुंजू ने राजन नायर की गर्लफ्रेंड से शादी कर ली. दोनों की दोस्ती दुश्मनी में बदल गई. अख़बार बताते हैं कि 1982 में पठान भाइयों ने कुंजू की मदद से अदालत के बाहर बड़ा राजन यानी राजन महादेव नायर की हत्या करा दी. राजन नायर अंडरवर्ल्ड की दुनिया का बड़ा राजन था. बड़ा राजन के ख़त्म होने के बाद शुरू होती है छोटा राजन के आने की कहानी, वही छोटा राजन जिसके बारे में भारत की जाँच एजेंसियाँ पता लगा चुकी थीं कि वो काफ़ी समय तक दाऊद इब्राहिम का ख़ास आदमी था.
1993 के मुंबई बम धमाकों के मुख्य अभियुक्त दाऊद और छोटा राजन की ये क़रीबी जिस एक शख्स की आंख में सबसे ज़्यादा चुभ रही थी, वो था छोटा शकील. जिसने छोटा राजन की जान लेने की कई कोशिशें की. 1993 के बम धमाकों के बाद छोटा राजन और दाऊद की साझीदारी ख़त्म हो गई.
मुंबई के चेंबूर के तिलक नगर में 1960 में एक मराठी परिवार में बेटे ने जन्म लिया. नाम रखा गया राजेंद्र सदाशिव निखल्जे. पिता सदाशिव थाणे में नौकरी करते थे. राजन के तीन भाई और दो बहनें थीं. राजन का पढ़ाई में कम ही मन लगता था. पांचवीं तक पढ़ाई के बाद राजेंद्र ने स्कूल छोड़ दिया. राजेंद्र जल्द ही बुरी संगत में आ गया. राजन जगदीश शर्मा उर्फ गूंगा की गैंग में शामिल हो गया.राजेंद्र की सुजाता नाम की लड़की से शादी हुई. तीन बेटियां हुईं.
1979 में इमरजेंसी के बाद पुलिस कालाबाज़ारी करने वालों पर शिकंजा कस रही थी. इस वक्त राजेंद्र मुंबई के सहकार सिनेमा के बाहर टिकटें ब्लैक करने लगा था. लोग बताते हैं कि एक दिन पुलिस ने इसी सिनेमा हॉल के बाहर लाठीचार्ज किया. लाठियों से गुस्साए 20 साल से कम उम्र के राजन ने पुलिस की लाठी छीनी और पुलिसवालों को पीटना शुरू कर दिया. पुलिसवालों से राजेंद्र की ये पहली मुठभेड़ थी. कई पुलिसवाले घायल हुए. इसका एक नतीजा ये रहा कि मुंबई की ज़्यादातर गिरोह क़रीब पांच फुट तीन इंच के राजेंद्र को अपने साथ जोड़ना चाहते थे. राजेंद्र ने बड़ा राजन गैंग ज्वाइन करने का फ़ैसला किया.
दाऊद से छोटा राजन की पहली मुलाक़ात
1982 में बड़ा राजन के मरने के बाद गैंग को संभालने वाला राजेंद्र छोटा राजन बन गया. छोटा राजन ने तय किया कि वो अपने बड़ा राजन भाई की मौत का बदला लेगा. कुंजू के भीतर छोटा राजन का डर इस क़दर बैठा कि 9 अक्तूबर 1983 को कुंजू ने क्राइम ब्रांच में जाकर सरेंडर कर दिया. कुंजू को ये लगा कि ज़िंदगी बचाने का यही तरीका है.लेकिन छोटा राजन हार मानने वालों में से नहीं था. जनवरी 1984 में छोटा राजन ने कुंजू को मारने की कोशिश की लेकिन कुंजू इस हमले में बस घायल हुआ.
25 अप्रैल 1984 को जब पुलिस कुंजू को इलाज के लिए अस्पताल ले गई. अस्पताल में एक ‘मरीज’ हाथ में प्लास्टर बांधे बैठा हुआ था. जैसे ही कुंजू करीब आया, प्लास्टर को हटाकर शख्स ने फायरिंग शुरू कर दी. किस्मत ने कुंजू का फिर साथ दिया लेकिन हमले के इस तरीके से भविष्य में दो लोग सबसे ज्यादा प्रभावित हुए. पहला दाऊद इब्राहिम. दूसरा बॉलीवुड, जहां आज भी कई फ़िल्मों में इस सीन को फिल्माया जाता है.
मुंबई अंडरवर्ल्ड की कहानी सुनाने वाले बहुचर्चित किताब ‘डोंगरी टू दुबई’ में एस हुसैन ज़ैदी लिखते हैं, ”इस ख़बर को सुनने के बाद दाऊद ने छोटा राजन को मिलने के लिए बुलाया. इस मुलाक़ात के बाद छोटा राजन दाऊद की गैंग में शामिल हो गया और छोटा राजन की कुंजू को मारने की अगली कोशिश सफल हुई.”
ज़ैदी ने अपनी किताब में लिखा है, “कुंजू क्रिकेट के मैदान में था. क्रिकेट की सफेद पोशाक पहनकर मैदान में कई लोग थे. तभी कुछ नए खिलाड़ियों ने मैदान में शामिल होकर कुंजू और उसके साथियों पर फायरिंग शुरू कर दी”.
इस तरह छोटा राजन ने अपने अंडरवर्ल्ड भाई, बड़ा राजन की मौत का बदला लेने का मिशन पूरा कर लिया था.
कहां से शुरू हुई दाऊद से छोटा राजन की नाराज़गी?
दाऊद और छोटा राजन दोनों एक दूसरे का भरोसा जीत चुके थे, अगले कुछ सालों में छोटा राजन दाऊद भाई के इशारों पर काम करता रहा. अब दाऊद की गैंग में दो छोटा थे, जो ‘भाई’ के लिए बड़े से बड़ा काम कर सकते थे.
1987 में छोटा राजन दाऊद का काम संभालने के लिए दुबई चला गया. इसके ठीक एक साल दुबई छोटा शकील ने दुबई का रुख़ किया लेकिन दाऊद का करीबी छोटा राजन रहा न कि छोटा शकील. ऐसे कई मौके रहे, जब छोटा शकील को ये बात चुभी कि दाऊद उससे ज्यादा छोटा राजन पर यकीन करता है. छोटा राजन को गैंग में नाना भी कहा जाता था.
राजन दाऊद के लिए बिल्डर्स और रईस लोगों से वसूली करने लगा. किसी भी कॉन्ट्रेक्टर को अगर कोई ठेका लेना होता तो इसकी तीन से चार फीसदी फीस छोटा राजन को चुकानी होती. पुलिस आंकड़ों के मुताबिक, छोटा राजन हर महीने 90 के दशक में क़रीब 80 लाख रुपए जुटा लिया करता था. कहा ये भी गया कि छोटा राजन के नाम 122 बेनामी होटल और पब सिर्फ मुंबई में थे. इस कमाई का एक हिस्सा गैंग के गुर्गों के कोर्ट केस लड़ने में भी खर्च किया जाता था.
कभी दाऊद के वफ़ादार फिर जानी दुश्मन राजन
गैंग में छोटा राजन की बढ़ती अहमियत को खत्म करने की छोटा शकील, शरद शेट्टी, सुनील रावत सोचते हैं.
एस हुसैन ज़ैदी अपनी किताब ‘डोंगरी टू दुबई’ में ये वाकया शेयर करते हैं.
“दाऊद भाई छोटा राजन सारी ताकत खुद के पास रखता जा रहा है. कल को वो तख्तापलट कर गैंग पर कब्ज़ा कर सकता है.”
किताब में लिखा है कि दाऊद जवाब देता है- “तुम लोग कब से ऐसी अफवाहों पर यकीन करने लगे. वो बस अपनी गैंग का मैनेजर है”. लेकिन दाऊद के इस जवाब के बाद भी वहाँ मौजूद लोगों के दिल से छोटा राजन के लिए कड़वाहट कम नहीं हुई. कुछ वक्त की ख़ामोशी के बाद दाऊद छोटा शकील से कहता है- “छोटा राजन को फोन लगाओ”.
यहां एक बात का ज़िक्र ज़रूरी है कि ये वो वक्त था, जब दाऊद ने छोटा राजन को अपने भाई साबिर इब्राहिम कासकर की हत्या करने वाले करीम लाला और अमीरज़ादा को मारने का काम दे रखा था. छोटा राजन के फोन उठाते ही दाऊद कहता है, “इब्राहिम की मौत के लिए ज़िम्मेदार लोगों को तू अब तक नहीं पकड़ पाया न?” छोटा राजन जवाब देता है, “हां भाई, मेरे लड़के लगे हुए हैं. हमले के लिए ज़िम्मेदार गवली के लड़के अभी जेजे अस्पताल में भर्ती हैं. सिक्योरिटी बहुत टाइट है. मैं जल्दी कुछ करेगा भाई.”
वहां कमरे में बैठा सौत्या दाऊद से कहता है- “मेरे को बस एक मौका और दो भाई और आप देखोगे कि मैं कैसे सिक्योरिटी तोड़कर बदला लेता हूँ”. सौत्या दाऊद के पैर छूकर निकलता है. अब छोटा शकील और सौत्या के लिए यही मौका था कि छोटा राजन को दाऊद की नज़र से गिराया जाए.
‘डी’ गैंग में छोटा राजन के अंत की शुरुआत
12 सितंबर 1992 को अस्पताल में छोटा शकील और सौत्या के गुर्गे घुसने की साजिश रचते हैं. अस्पताल पर हमले के लिए एके-47 का इस्तेमाल किया गया. पुलिस पंचनामे के मुताबिक, 500 राउंड फायरिंग हुई. ज़ैदी के मुताबिक़, दाऊद का बदला पूरा हो चुका था और ‘डी’ गैंग में छोटा राजन के अंत की शुरुआत भी.
अपनी ख़ास बैठकों में दाऊद अब छोटा शकील को ले जाने लगा. छोटा राजन को किनारे कर दिया गया. 1993 में मुंबई में बम धमाके हुए. कई लोगों की जान गई. धमाकों के बाद मुंबई के लोगों के मन में दाऊद और उसके सहयोगी छोटा राजन के लिए नफरत भर गई.
एस हुसैन ज़ैदी अपनी किताब में लिखते हैं, “छोटा राजन ने अख़बारों को फैक्स के ज़रिए अपना पक्ष रखने की कोशिश की. राजन ने दाऊद का बचाव भी किया.”
ऐसा नहीं है कि गैंग में छोटा राजन और छोटा शकील से मतभेद कम करने की कोशिश दाऊद ने नहीं की. ज़ैदी ने लिखा है कि दाऊद ने ऐसी ही एक मुलाकात में चिल्लाकर कहा था- “नाना मेरे बुरे वक्त का दोस्त है. मैं उसकी बुराई नहीं सुनना चाहता. आपस में झगड़ा धंधे की मौत होता है.” दाऊद की बात से छोटा शकील टुकड़ी के लोग भले ही खुश न हों लेकिन छोटा राजन के दिल में महीनों बाद कुछ तसल्ली ने घर किया था लेकिन ये तसल्ली ज़्यादा दिन तक नहीं रही. छोटा शकील की ओर से राजन को काफिर कहा जाने लगा और ज़रूरी बैठकों में शामिल नहीं किया गया. 1993-94 आते-आते दोनों धड़े एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए थे. राजन ने दाऊद गैंग का काम करना बंद कर दिया. राजन अब भारत लौटना चाहता था. लेकिन छोटा राजन का पासपोर्ट उन शेखों के पास था, जिनकी मदद से वो दुबई में रहने गया था. राजन के पास मुल्क वापसी का कोई रास्ता नहीं बचा था लेकिन ये ज़रूर जानता था कि अगर वो वहां और रुका तो अपनी जान खो बैठेगा.
ज़ैदी ने अपनी चर्चित किताब में लिखा है–तभी दाऊद एक बड़ी पार्टी करता है. इस पार्टी में शहर के बड़े लोगों को बुलाया गया. छोटा राजन भी पार्टी में जाने के लिए तैयार हो रहा था. तभी एक फोन आता है. राजन फोन उठाता है तो एक अनजान आवाज़ आती है- “नाना वो तुमको टपकाने का प्लानिंग किए ला है.”
‘डोंगरी टू दुबई’ किताब बताती है कि “छोटा राजन फोन रखने के बाद इंडियन एम्बेसी का रुख करता है. वहां एक रॉ अफसर से राजन की बात होती है. दिल्ली फोन लगाए जाते हैं. कुछ घंटों बाद राजन काठमांडू की फ्लाइट में बैठा था. काठमांडू से राजन मलेशिया चला गया.” दुबई में छोटा राजन के गायब होने के बाद छोटा शकील धड़े के तेवर और हौसले बुलंद हो गए. यहीं से जो छोटा राजन कभी दाऊद का दायां हाथ था, अब उस जगह को छोटा शकील ने भर दिया. अगले कुछ साल छोटा राजन ने छिपकर बिताए. अगले कुछ साल छोटा राजन ने कुआलालम्पुर, कंबोडिया और इंडोनेशिया में छिपते हुए बिताए. लेकिन राजन को अपने लिए सुरक्षित ठिकाना बैंकॉक लगा. राजन ने मोबाइल नंबर से लेकर घर के पते तक, अपनी लोकेशन छिपाए रखने की हर कोशिश की.
इधर छोटा शकील भी छोटा राजन के सीने में गोली उतारने का सपना लिए हुए था. काफी कोशिशों के बाद साल 2000 में छोटा राजन का पता छोटा शकील को लग चुका था. 14 सितंबर 2000 को चार हथियार बंद लोग राजन के अपार्टमेंट पर हमला करते हैं. लेकिन राजन भागने में कामयाब होता है. राजन पुलिस की मदद से अस्पताल में भर्ती होता है. ये खबर भारत भी पहुंचती है. ये भी पता चला कि राजन अब तक बैंकॉक में छिपा हुआ था. कुछ दिनों बाद राजन अचानक अस्पताल से भी गायब हो जाता है. राजन को ये खबर मिली थी कि कोई अस्पताल को उड़ा सकता है इसलिए वो अस्पताल की चौथी मंजिल से कूदकर भाग जाता है. साल 2001 में राजन इस हमले का बदला लेता है. राजन छोटा शकील गैंग के दो गुर्गों को मरवा देता है.
2001 के बाद छोटा राजन कहां रहा, इस बात की ख़बर दुनिया को नहीं रही. अगली बार छोटा राजन का दुनिया ने नाम सुना जून 2011 में . जब मिड डे न्यूज़ पेपर में वरिष्ठ क्राइम रिपोर्टर ज्योतिर्मय डे की मंबई के पवई में गोली मारकर हत्या कर दी गई. इस हत्या में छोटा राजन को नाम आया. इसी दौरान साल 2013 में मुंबई के बिल्डर अजय गोसालिया और अरशद शेख की हत्या केस में भी छोटा राजन गैंग के लोगों का ही नाम आया.
इंटरपोल ने छोटा राजन को पकड़वाने के लिए रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया. फिर 2015 में ख़बरें आईं कि छोटा राजन पर ऑस्ट्रेलिया में हमला हुआ. राजन जान बचाकर बाली चला गया.
भारत का इंतज़ार अक्टूबर 2015 में खत्म होता है. इंडोनेशिया के बाली में छोटा राजन को गिरफ्तार कर लिया गया. नवंबर 2015 में ऐसी तस्वीरें सामने आईं, जिसको लोगों ने कभी उम्मीद नहीं की थी. जो छोटा राजन बंदूक थामे हमलावर के आगे बैठकर लोगों को धमकाता नज़र आता था, वो हथकड़ियों में जकड़ा नारंगी रंग के कपड़ों में पुलिस से घिरा नज़र आया, बेबस और लाचार.
ड्रग्स, हथियार, वसूली तस्करी और हत्या के क़रीब 70 मामलों में अभियुक्त छोटा राजन को पत्रकार जे डे की हत्या केस में दोषी माना गया और आजीवन कैद की सज़ा सुनाई गई.
जिस मुंबई में कभी छोटा राजन टिकटें ब्लैक करता था. उसी मुंबई की एक अदालत ने छोटा राजन को पत्रकार जे डे की हत्या के केस में उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई, उसका शो ख़त्म हो चुका है.
साभार बीबीसी

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार पर विवाद, 68 कलाकारों ने अवॉर्ड लेने से किया इनकार

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नई दिल्ली। नेशनल अवॉर्ड सेरेमनी आज 3 मई को दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित है. इसके लिए सभी विजेता एक दिन पहले ही दिल्ली पहुंच चुके हैं. लेकिन दिल्ली पहुंचने के बाद मिली एक खबर ने इन विजेताओं को परेशान कर दिया है, जिसके बाद आधे से ज्यादा कलाकारों ने अवार्ड लेने से इंकार कर दिया.

असल में सभी कई विजेता इस बात से नाराज हैं कि इवेंट में 140 विजेताओं में से सिर्फ 11 को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हाथों सम्मान मिलेगा. बाकी को केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी के हाथों अवॉर्ड दिया जाएगा. नाराज विजाताओं ने इवेंट के बहिष्कार की धमकी दी है. उनका कहना है कि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है. इस साल किया गया बदलाव उन्हें मंजूर नहीं है. कलाकारों का कहना था कि, “हमें बताया गया था कि हमेशा कि तरह इस बार भी राष्ट्रपति के हाथों सम्मान‍ मिलेगा. लेकिन रिहर्सल में पता चला कि इस बार ऐसा नहीं होगा. यह हमारे लिए अपमान जैसा है. हमने इसके खिलाफ आवाज उठाई है.”

इस बारे में सरकार का अपना तर्क है. प्रेसिडेंट के प्रेस सेक्रेटरी अशोक मलिक का कहना है कि जब सौ से ज्यादा विजेता हों तो ऐसे में राष्ट्रपति का सभी को पर्सनली अवॉर्ड दे पाना संभव नहीं है. हालांकि यह भी खबर है कि विजेताओं की नाराजगी के बाद केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने विजेताओं से मुलाकात की और बताया कि राष्ट्रपति ने इवेंट के लिए उन्हें मात्र एक घंटे का वक्त दिया है. ऐसे में वक्त की पाबंदी के चलते वो सभी को अवॉर्ड नहीं दे सकते हैं. इसी के चलते अवॉर्ड वितरण के लिए अन्य मंत्रियों की मदद ली जा रही है. स्मृति ईरानी ने मीटिंग में सभी को भरोसा दिया कि उन्होंने राष्ट्रपति के दफ्तर को सूचना भेजी है.

अभी तक तो कार्यक्रम तय है, उसके मुताबिक समारोह के लिए राष्ट्रपति करीब 5.30 बजे विज्ञान भवन पहुंचेंगे. तब तक स्मृति ईरानी और राज्यवर्धन सिंह राठौर कई सारे अवॉर्ड्स दे चुके होंगे. अंत में सभी अवॉर्ड्स के वितरण के बाद राष्ट्रपति इन 45 लोगों के विजेताओं के ग्रुप के साथ फोटो खिंचवाएंगे. हालांकि कलाकारों के बहिष्कार की धमकी के बाद देखना है कि कार्यक्रम में कोई फेरबदल होता है या नहीं.

  करन कुमार

अमित शाह और मोदी को खुली चुनौती देने के मूड में वसुंधरा राजे

विधानसभा चुनाव के मुहाने पर खड़े राजस्थान में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के बीच जारी रस्साकशी सबके लिए कौतुहल का विषय बन गई है. भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व प्रदेशअध्यक्ष के खाली पड़े पद पर अपना उम्मीदवार बैठाना चाहता है, जबकि सीएम वसुंधरा राजे इस पद पर अपना करीबी चाहती हैं.

हाल तक यह रस्सा-कस्सी प्रदेशाध्यक्ष के पद तक सीमित दिखाई दे रहा था, लेकिन केंद्र सरकार का प्रदेश के मुख्य सचिव एनसी गोयल को सेवा विस्तार देने से इंकार करने के बाद मामला गंभीर हो गया है. विगत 16 अप्रैल को अशोक परनामी के इस्तीफे के बाद से ही भाजपा प्रदेश अध्यक्ष का पद खाली है. लोकसभा की दो और विधानसभा की एक सीट के लिए जनवरी में हुए उपचुनावों में पार्टी की करारी हार के बाद परनामी की छुट्टी कर दी गई थी.

18 अप्रैल को अशोक परनामी के इस्तीफे के बाद केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत का नाम तय माना जा रहा था. पार्टी के कई नेताओं ने तो सोशल मीडिया पर शेखावत को प्रदेश अध्यक्ष बनने की बधाई तक दे डाली. लेकिन इस घटनाक्रम के बाद वसुंधरा खेमे की ओर से आई प्रतिक्रियाओं ने पार्टी को मुश्लिम में डाल दिया. जाहिर है इस खेमे के लोग वही बोल रहे थे जो तो वसुंधरा चाहती थीं.

ऐसे समय में जब भाजपा में मोदी-शाह की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता है तब प्रदेश अध्यक्ष पद पर हो रही कशमकश अप्रत्याशित है. दरअसल, वसुंधरा की राजनीति करने की अपनी शैली है. एकदम रजवाड़ों की मानिंद. ना-नुकुर करने और ऑर्डर देने वालों को वे पसंद नहीं करतीं. वर्तमान में वसुंधरा सत्ता में तो हैं ही, लेकिन संगठन पर भी वे अपनी पकड़ रखना चाहती हैं.

यह बात सबको पता है कि अशोक परनामी वसुंधरा राजे की मर्जी से प्रदेश के अध्यक्ष बने थे. चूंकि अब चुनाव नजदीक हैं इसलिए वसुंधरा ऐसा प्रदेशाध्यक्ष नहीं चाहतीं जो उनके वर्चस्व में बंटवारा कर ले. वे कोई ऐसे नेता को भी इस पद पर नहीं चाहती हैं कि जो उन्हें भविष्य में चुनौती दे सके.

मामला तब और पेंचिदा हो गया जब पार्टी महासचिव रामलाल और वी. सतीश की मौजूदगी में अमित शाह और वसुंधरा राजे की 26 अप्रैल को हुई मैराथन बैठक में भी कोई नतीजा नहीं निकल पाया. वसुंधरा राजस्थान में अपनी पसंद का अध्यक्ष चाहती हैं जिसके पार्टी नेतृत्व फिलहाल तैयार नहीं है. लेकिन यही केंद्रीय नेतृत्व वसुंधरा राजे की बात नहीं मानता तो वो खुल कर विरोध में उतर सकती हैं. इस बीच, केंद्र सरकार का वसुंधरा की इच्छा के बावजूद तत्कालीन मुख्य सचिव एनसी गोयल को सेवा विस्तार देने से इंकार करना इस ओर संकेत है कि पार्टी नेतृत्व फिलहाल आत्मसमर्पण के मूड में नहीं है.

102 नॉट आउट देखने का मूड है तो यह रिव्यू पढ़कर जाएं

भारतीय सिनेमा एक बेहतरीन दौर से गुजर रहा है। आज के वक्त में ऐसी फिल्में बन रही है, जैसा एक दशक पहले किसी ने सोचा भी नहीं था. परंपरागत फिल्मों से दूर अक्टूबर और हिचकी जैसी फिल्में झंडा गाड़ रही है तो न्यूटन को ऑस्कर तक में नामांकन मिल चुका है.

निर्देशक उमेश शुक्ला की ‘102 नॉट आउट’ उसी तरह की फिल्म है. सौम्य जोशी के लिखे गुजराती लोकप्रिय नाटक पर आधारित यह फिल्म बुजुर्गों के एकाकीपन की त्रासदी को दर्शाती है. फिल्म में ऋषि कपूर ने 75 साल के बाबूलाल वखारिया का किरदार निभाया है. यह किरदार घड़ी की सुइयों के हिसाब से चलने वाला सनकी बूढ़ा है. उसकी नीरस जिंदगी में डॉक्टर से मिलने के अलावा अगर कोई खुशी और उत्तेजना का कारण है तो वह है उसका एनआरआई बेटा और उसका परिवार. हालांकि, अपने बेटे और उसके परिवार से वह पिछले 17 वर्षों से नहीं मिला है. बेटा हर साल मिलने का वादा करके ऐन वक्त में उसे गच्चा दे जाता है. वहीं, दूसरी ओर बाबूलाल का 102 वर्षीय पिता दत्तात्रेय वखारिया (अमिताभ बच्चन) उसके विपरीत जिंदगी से भरपूर ऐसा वृद्ध है जिसे आप 102 साल का जवान भी कह सकते हैं.

एक दिन अचानक दत्तात्रेय अपने झक्की बेटे बाबूलाल के सामने शर्तों का पिटारा रखते हुए कहता है कि अगर उसने ये शर्तें पूरी नहीं कीं तो वह उसे वृद्धाश्रम भेज देगा. असल में दत्तात्रेय, धमकी देकर और शर्तों को पूरा करवाकर बाबूलाल की जीवनशैली और सोच को बदलना चाहता है. अब 102 साल की उम्र में वह अपने 75 वर्षीय बेटे को क्यों बदलना चाहता है, इसके पीछे एक बहुत बड़ा राज है. इस राज का पता लगाने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी.

कर्नाटक में देवगौड़ा के पीछे क्यों पड़े हैं मोदी

कर्नाटक चुनाव को लेकर प्रधानमंत्री मोदी हफ्ते भर के लिए कर्नाटक में हैं. इस दौरान मोदी जितनी चर्चा भाजपा के एजेंडे की कर रहे हैं, उतना ही ध्यान जनता दल सेक्युलर के नेता और पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा को खुश करने में भी लगा रहे हैं. पीएम मोदी के निशाने पर लगातार देवेगौड़ा हैं. ऐसे में सवाल उठने लगा है कि क्या कर्नाटक में भाजपा मुश्किल में है और मोदी पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा को इसलिए खुश करने में जुटे हैं ताकि भाजपा की गाड़ी फंसने पर जेडीएस से समर्थन हासिल किया जा सके.

चुनाव पूर्व कर्नाटक को लेकर आ रहे सर्वेक्षण में भी यह साफ हो गया है कि वहां गठबंधन की सरकार बनेगी. इस सर्वेक्षण ने भाजपा और कांग्रेस दोनों की बेचैनी बढ़ा दी है. हालांकि भाजपा ज्यादा बेचैन दिख रही है. यही वजह है कि मोदी और अमित शाह की जोड़ी कर्नाटक में संभावित नतीजों को देखते हुए अपनी रणनीति बना रहे हैं.

हालांकि मोदी द्वारा देवेगौड़ा की तारीफ की रणनीति का जवाब देवेगौड़ा ने खुद दे दिया है. पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा का कहना है कि मोदी स्मार्ट पीएम हैं. वह कर्नाटक की राजनीति में हो रहे बदलाव और संकेत को अच्छी तरह से समझते हैं. लेकिन देवेगौड़ा ने साफ कर दिया है कि तारीफ अपनी जगह है लेकिन वह भाजपा और मोदी के साथ कोई गठबंधन नहीं करने वाले हैं.

 

एससी/एसटी कानून को लेकर पुनर्विचार याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई आज

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नई दिल्ली। एससी-एसटी एक्ट को लेकर सरकार द्वारा दायर की गई पुनर्विचार याचिका पर सुप्रीम कोर्ट आज सुनवाई करेगा. केंद्र के अलावा इस संबंध में 4 राज्यों ने भी पुनर्विचार याचिका दायर की है. एससी/एसटी कानून के तहत तत्काल गिरफ्तारी के प्रावधान पर रोक लगाने के आदेश पर पुनर्विचार की मांग करते हुए केंद्र ने 2 अप्रैल को कोर्ट का रुख किया था. जज एके गोयल और दीपक गुप्ता की संवैधानिक पीठ मामले की सुनवाई करेगी. एससी-एसटी कानून के तहत तत्काल गिरफ्तारी के प्रावधान पर रोक लगाने के आदेश पर पुनर्विचार की मांग करते हुए केंद्र ने दो अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था. गौरतलब है कि 20 मार्च को अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति-जनजाति उत्पीड़न निरोधक कानून के तहत आरोपी की तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी. सरकार ने भी हर पहलू पर विचार के बाद दो अप्रैल को इस फैसले पर पुनर्विचार के लिए शीर्ष अदालत में याचिका दाखिल की थी. सरकार की ओर से यह भी संकेत दिया जा चुका है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपना रुख नहीं बदला तो फिर अध्यादेश लाकर भी पुराने कानून को स्थापित किया जा सकता है.  

डेरा में साधुओं को नपुंसक बनाने वाले डॉक्टर को कोर्ट का झटका

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चंडीगढ़। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने बुधवार को डेरा सच्चा सौदा नपुंसक मामले की सुनवाई की. इस दौरान अदालत ने आरोपी डॉक्टर पंकज गर्ग की जमानत याचिका पर 16 मई तक अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है.27 फरवरी 2018 को अंतरिम जमानत हासिल करने वाले डॉक्टर पंकज गर्ग ने कोर्ट से जमानत की गुहार लगाई थी.

आरोपी डॉक्टर पंकज गर्ग की जमानत याचिका का विरोध करते हुए सीबीआई के वकीलों ने कोर्ट को बताया कि आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप अत्यंत गंभीर है. आरोपी ने डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम के कहने पर कई निर्दोष भक्तों को सर्जरी के जरिए नपुंसक बनाया था, जो न केवल एक अमानवीय कृत्य है, बल्कि गहरी साजिश भी है. आरोपी डॉक्टर के खिलाफ मौजूद सबूत ने भी वकीलों का काम आसान कर दिया.

बताते चलें कि आरोपी डॉ. पंकज गर्ग और डॉ. एमपी सिंह ने मिलकर डेरा के दर्जनों अनुयायियों को नपुंसक बनाया था. इस मामले के एक आरोपी डॉ. एमपी सिंह को 7 जनवरी को गिरफ्तार करके अंबाला जेल भेजा गया था. हाईकोर्ट ने 23 दिसंबर 2014 को एक पीड़ित हंसराज चौहान द्वारा दाखिल याचिका की जांच सीबीआई को सौंपी थी.

सीबीआई ने 7 जनवरी 2015 को मामला दर्ज करके राम रहीम के खिलाफ याची हंसराज चौहान को धमकाने,धोखाधड़ी और शारीरिक रूप से चोट पहुंचाने के आरोप में केस दर्ज किया था. चार्जशीट में 160 से अधिक नपुंसक बनाए गए अनुयायियों की सूची सौंपी थी. राम रहीम पर 400 से अधिक अनुयायियों को नपुंसक बनाने का आरोप है.

दिल्ली की लुटियन जोन में है सोनम के होने वाले पति का 173 करोड़ का बंगला

सोनम कपूर 8 मई को अपने बॉयफ्रेंड आनंद आहूजा के साथ शादी के बंधन में बंधेंगी. कपूर परिवार ने इसकी आधिकारिक घोषणा कर दी है. ये शादी मुंबई में होगी. सोनम के होने वाले पति आनंद आहूजा दिल्ली बेस्ड फैशन और लाइफस्टाइल एंटरप्नयोर हैं. आनंद दिल्ली बेस्ड बिजनेसमैन हरीश अहूजा के पोते हैं. उनकी गिनती देश के टॉप एक्पोर्ट हाउस मालिकों में होती है.

सोनम कपूर के होने वाले पत‍ि आनंद के दादा जी हरीश अहूजा ने 2015 में पृथ्वीराज रोड पर बंगला खरीदा था. 3170 स्वायर यार्ड में बना यह बंगले की कीमत 173 करोड़ के करीब है.

हरीश अहूजा के एक्सपोर्ट हाउस के क्लाइंट में जानी-मानी कंपनियों का नाम जुड़ा हुआ है. इनमें GAP, टॉमी जैसे ब्रांड शामिल हैं.आनंद अहूजा अपने फैमिली बिजनेस को संभालते हैं. आनंद अपनी फैमिली बेस्ड बिजनेस ‘शाही एक्सपोर्ट्स’ नाम की कंपनी के एमडी भी हैं.

आनंद आहूजा बास्केटबॉल लवर माने जाते हैं. वे इस खेल को और इसके खिलाड़ियों को काफी पसंद करते हैं. उनके इंस्टाग्राम अकाउंट पर पोस्ट तमाम तस्वीरों के जरिए आनंद के इस क्रेज को समझा जा सकता है. वे Los Angeles Lakers टीम के सपोर्टर रहे हैं.

आनंद ने नई दिल्ली के अमेरिकी एंबेसी स्कूल से पढ़ाई की. इसके अलावा उन्हानें यूएस की पेंसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी के व्हार्टन स्कूल, से एमबीए की डिग्री हासिल की. आनंद ने यूएस में Amazon.com में एक प्रोडक्ट मैनेजर के रूप में अपनी इंटर्नशिप की.

आनंद आहूजा ट्रैवलिंग के बहुत बड़े शौकीन हैं. यही वजह है कि सोनम के संग उन्हें अक्सर यूरोप, न्यूयॉर्क जैसे कई जगह साथ में छुट्टियां मनाते देखा गया है. आनंद आहूजा ने सोनम के साथ न्यू ईयर पेरिस में सेलिब्रेट किया था.

दलित आदिवासी आंदोलन के लिए जिम्मेदार कौन?

सियासी गलियारों में बड़े ज़ोरशोर से आवाज उठ रही है कि दलित आदिवासी आंदोलन के लिए जिम्मेदार कौन है? और इस प्रकार दलितों आदिवासीयों के स्वयं प्रेरित शोषण के खिलाफ शांतिपूर्ण आंदोलन की आड़ में राजनीतिक पार्टियाँ अपने-अपने ढंग से रोटियाँ सेकने में लगी हैं. वे पार्टी जिसका परंपरागत दलित वोट बैंक रहा है वे दलित हिमायती बनकर तथा वह पार्टी जिसनें सबका साथ सबका विकास करने का प्रोपेगैंडा खड़ा किया था. जमीनी स्तर पर कार्य न कर पाने की स्थिति में एक-दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप की राजनीति, सियासी गलियारों में चल पड़ी है. जिस पार्टी ने सबके विकास के नाम पर वोट मांगे थे, आज उसके पास गिनाने के लिए कुछ भी 2019 का चुनाव लड़ने के लिए नहीं हैं. उल्टे दलितों के प्रति अत्याचारों में इजाफा ही हुआ है. जिन पार्टियों का दलित परंपरागत वोट बैंक रहा हैं उन पार्टियों के द्वारा सामाजिक रूप से दलितों का उत्थान न कर पाने की स्थित में ही दलितों ने विकास के नाम पर वोट दिया वहाँ पर भी दलितों को निराशा ही हाथ लगी है.

शिक्षा के प्रति आकर्षण और सोशल मीडिया के सहयोग से दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों, को समझ में आने लगा है. पार्टियों के अदला-बदली से कुछ नहीं होने वाला दोनों तरफ ज्यादातर जातिवादी मानसिकता से पोषित लोग ही बैठे हैं. इसी कारण 2 अप्रैल 2018 को देश व्यापी स्वयं प्रेरित जन आंदोलन हुआ. इस आंदोलन में कुछ दुःखद घटनाएँ भी हुईं. शांति से चल रहे आंदोलन को वर्चस्ववादीयों ने घटते वर्चस्व से देखा और उपद्रवी तांडव मचाया एवं निहत्ते लोगों पर गोलियाँ चलाई ज्यादातर मारे गए लोगों में दलित ही थे. आज भी दलितों आदिवासियों को चिन्हित कर उनके साथ ज्यादती जारी है. इससे ये जाहिर है जातिवादी मानसिकता आज भी अपने चरम पर है.

विशेष पार्टी के समर्थित लोग कहते है. ये एक दम कैसे हो गया इसमें इस पार्टी की चाल हैं? ज़्यादातर पार्टियाँ आंदोलन को आपने-अपने तरीके से व्याख्यायित कर वोटों की खेती करने में जुटीं हैं. वहीँ दलित आदिवासी मुद्दे सियासी गलियारे में नदारद हैं. वह एक-दूसरे पर आक्षेप लगाकर बच निकलते हैं जबकि दलितों आदिवासियों को सामाजिक रूप से न्याय, सम्मान, अधिकार की जरूरत है. जिसे कोई भी सत्ताधारी पार्टी प्रभावी रूप से क्रियान्वयन कर, कर सकती है लेकिन जातिवादी मानसिकता उनके आड़े आती है. सिर्फ बाबासाहब डॉ. भीमराव आंबेडकर के नारे लगाना और सार्वजनिक जगहों पर सम्मान करने का काम करते हैं. जिससे जमीनी हकीकत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता.

अब सवाल ये भी कुछ लोग उठाते हैं. 70 साल देश को आजाद हो गए दलित आदिवासी पिछड़े मुख्यधारा में क्यों नहीं शामिल होना चाहते. तब मुझे आरक्षण फिल्म का वो डायलॉग याद आता है “आपके अंदर प्रतिभा नहीं है आप डरते हैं प्रतियोगिता से, तब शेफली खाँन बोलते हैं, सबकी स्टाटिंग लाइन एक होना चाहिए. आओं सुख-सुविधाओं और संपत्ति का बटवारा कारों और हमारी तरह जी के देखों तब प्रतियोगिता कारों कौन हराम की खाता है? आपने अपनी जैवे भर ली है और कहते हो प्रतियोगिता करों.”

क्या सामाजिक राजनीतिक और आर्थिक रूप से कमज़ोर व्यक्ति जहाँ सब कुछ पैसे से बिकता हो अपने आप को सारी सुविधाओं से संपन्न व्यक्तियों के सामने खड़ा कर पायेगा? कुछेक हो भी जाएंगे वह भी मजबूरी में सिस्टम के हिस्सा हो जाएंगे जबतक कोई बड़े स्तर पर प्रयास न किया जाए.

अब सवाल ये खड़ा होता है. क्या किसी जति, समुदाय के सामाजिक राजनीतिक आर्थिक विकास से सशक्त राष्ट्र का निर्माण हो सकता है? क्या सभी जति समुदाय के लोगों की सहभागिता ज़रूरी नहीं? अगर इन सब को देखते हुए दलितों आदिवासियों पिछड़ों के उत्थान के लिए कोई क़ानून बनता है. क्या ये शसक्त राष्ट्र निर्माण के लिए उचित नहीं?

अशोक कुमार सखवार पी-एच.डी. शोधार्थी, हिंदी विभाग, साँची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय,

चंद्रशेखर रावण पर रासुका तीन महीने और बढ़ी

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सहारनपुर। भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर रावण की रासुका की अवधि तीन महीने और बढ़ गई है. एक मई को चंद्रशेखर के वकील की ओर से अदालत में जमानत की याचिका डाली गई थी, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया. इसके साथ ही अदालत ने चंद्रशेखर रावण की रासुका की अवधि को तीन महीने और के लिए बढ़ा दिया. अदालत के इस फैसले से चंद्रशेखर रावण की रिहाई की कोशिश में लगे संगठनों और भीम आर्मी को तगड़ा झटका लगा है.

मई 2017 में सहारनपुर में भड़के जातीय हिंसा के बाद भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर रावण पर 4 नवंबर को रासुका लगा दी गई थी. 12 जनवरी को रासुका पर सुनवाई हुई थी. इस दौरान रासुका की अवधि को तीन महीने के लिए बढ़ा दिया था. अब एक बार फिर से अदालत ने रावण पर रासुका की अवधि को बढ़ा दिया है.

  संदीप कुमार  

संपादकीय: दलित दास्तान

कहने को हमारे संविधान में सबको बराबरी का दर्जा हासिल है, लेकिन ऐसी घटनाएं रोज होती हैं जो बताती हैं कि संवैधानिक प्रावधानों और कड़वे सामाजिक यथार्थ के बीच कितना लंबा फासला है. उदाहरण के लिए दो ताजा खबरों को लें. एक खबर उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले से आई कि अगड़ी जाति के कुछ दबंगों ने एक दलित को इसलिए मारा-पीटा, क्योंकि उसने उनके कहने पर उनकी फसल काटने से इनकार कर दिया. उस दलित का आरोप यह भी है कि उसकी मूंछ खींची गई और जबर्दस्ती उसका मुंह खोल कर पेशाब डालने की कोशिश की गई. जिले के पुलिस अधीक्षक ने प्राथमिक जांच में मारने-पीटने के आरोप को सही पाया है, बाकी आरोपों की जांच चल रही है. पुलिस अधीक्षक ने एफआइआर लिखने में टालमटोल और देरी की बिना पर थाना प्रभारी को निलंबित कर दिया है. दूसरी खबर राजस्थान के भीलवाड़ा जिले की है, जहां विवाह की एक रस्म पूरी करने के दौरान दलित दूल्हे का घोड़ी पर सवार होना कुछ लोगों को रास नहीं आया, और उन लोगों ने उस परिवार पर हमला बोल दिया. नतीजतन तीन-चार व्यक्ति घायल हो गए. पीड़ित परिवार का यह भी आरोप है कि उन्होंने पुलिस की मदद लेनी चाही, पर पुलिस हाथ पर हाथ धरे रही. अलबत्ता पुलिस ने मूकदर्शक बने रहने के आरोप को गलत बताया है.

बहरहाल, ऐसी घटनाओं को कानून-व्यवस्था का सामान्य मामला नहीं माना जा सकता. ऐसी घटनाएं बताती हैं कि कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत और समाज में जो चल रहा है उसके बीच कितनी गहरी खाई है. सदियों से हमारे समाज में कुछ तबके जैसा भेदभाव, अपमान और उत्पीड़न झेलते आए हैं उसे देखते हुए ऐसी घटनाएं कोई आश्चर्य की बात भले न हों, पर कई कारणों से बेहद चिंताजनक जरूर हैं. जिस पैमाने पर ये घटनाएं हो रही हैं, उन्हें सिर्फ अतीत के भग्नावशेष कह कर उनसे पिंड नहीं छुड़ाया जा सकता. सच तो यह है कि पिछले कुछ बरसों में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों पर हिंसा की घटनाएं बढ़ी हैं और सरकारी आंकड़े भी इसकी गवाही देते हैं. दूसरी तरफ, आरोपियों को सजा मिलने की दर घटी है. राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक 2010 से 2016 के सात वर्षों के दौरान, साल के अंत में दलितों के खिलाफ लंबित मामले 78 फीसद से बढ़ कर 91 फीसद, और आदिवासियों के खिलाफ लंबित मामले 83 फीसद से बढ़ कर 90 फीसद पर पहुंच गए. यही नहीं, इनमें से ज्यादातर मामलों में आरोपी छूट गए.

दलितों के खिलाफ अपराधों के मामलों में दोषसिद्धि की दर 2010 में अड़तीस फीसद थी, जो कि घट कर 2016 में सिर्फ सोलह फीसद रह गई. आदिवासियों के खिलाफ अपराधों के मामलों में दोषसिद्धि की दर में गिरावट छब्बीस फीसद से आठ फीसद की रही. इसलिए ऐसी घटनाओं और ऐसे मामलों को अतीत की निशानियां कह कर टाला नहीं जा सकता. विडंबना यह है कि दलितों पर अत्याचार की घटनाओं में बढ़ोतरी उन राज्यों में भी दिखती है जो आधुनिक विकास और औद्योगिक प्रगति में आगे हैं. मसलन, गुजरात में. उना कांड से लेकर हाल में भावनगर जिले में घुड़सवारी के शौक के कारण इक्कीस वर्षीय एक दलित नवयुवक की हत्या तक, ऐसी अनेक घटनाएं हुई हैं जो विकास के गुजरात मॉडल पर सवालिया निशान लगाती हैं. क्या विकास का मतलब सिर्फ बड़े बांध, फ्लाइओवर और विदेशी निवेश ही होता है, या सामाजिक बराबरी और सामाजिक सौहार्द भी कोई पैमाना है?

  – साभार: जनसत्ता 

अपने बच्चों का भला चाहते हैं तो इन बड़े शहरों में न पालें

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नई दिल्ली। विश्व स्वास्थ संगठन (WHO) द्वारा हाल ही में प्रदूषण को लेकर जारी रिपोर्ट डराने वाली है. डब्ल्यू एच ओ की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के 15 सबसे प्रदूषित शहरों में 14 भारत में हैं. इन शहरों में रहना किसी भी हालत में बीमारियों के लिहाज से सुरक्षित नहीं है.

डब्ल्यूएचओ ने देश के 122 शहरों में हवा की शुद्धता आंकी है. अब अगर वायु शुद्धता के मानकों की बात करें तो देश का कोई भी शहर इस मानक के आस-पास नहीं ठहरता. बल्कि वायु प्रदूषण की स्थिति खतरनाक स्तर से भी 10-12 गुना ज्यादा है. ये स्थिति हमें थोक के भावों में बीमारियां सौगात में देती है.

डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट कहती है कि वर्ष 2016 में वायु प्रदूषण से पैदा हुई बीमारियों से दुनियाभर में 42 लाख लोगों की मौत हुई है, इसमें से 90 फीसदी भारत के शहर हैं. हालात इतने खराब है कि पर्यावरणविदों का कहना है कि, अगर आपके पास कहीं और रहने का विकल्प हो तो आपको अपने बच्चों दिल्ली और बड़े शहरों में मत पालें.

आंकड़े कहते हैं कि भारत में तीस लाख से ज्यादा मौतें प्रदूषित हवा के संपर्क में आने से हो रही हैं. वर्ष 2012 के आंकड़ों के अनुसार हर एक लाख की आबादी पर 159 लोग उन बीमारियों से ग्रस्त होकर मौत के शिकार हो जाते हैं, जो हवा के जहरीले तत्वों के संपर्क में आते हैं. वर्ष 2010 की रिपोर्ट कहती है कि वायु प्रदूषण से जनित बीमारियां देश की पांचवीं बड़ी किलर बन गई हैं.

दिल्ली और देश के ज्यादातर बड़े शहरों में वर्ष 1991 की तुलना में अब तक प्रदूषण दोगुना से तिगुना हो चुका है. हवा में मौजूद सल्फेट, नाइट्रेट और ब्लैक कार्बन की ज्यादा मात्रा हवा को लगातार जहरीली बना रही है. इसका कारण कार और ट्रकों का ट्रैफिक, कारखाने, पावर प्लांट्स, भवन निर्माण और खेतों की आग है.

रिटायर्ड जज ने क्यों कहा भारत के दलित-आदिवासी और अल्पसंख्यक डरे हुए हैं

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मुंबई। जस्टिस लोया केस को लेकर बड़ा बयान देने वाले मुंबई हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस बीजी कोलसे पाटील ने सत्ता के सांप्रदायिकरण पर बड़ा बयान दिया है. उन्होंने कहा है कि भारत में अल्पसंख्यक, आदिवासी, दलित और गरीब बुरी तरह डरे हुए हैं. उनके मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है. सांप्रदायिक ताकतों ने लोकतंत्र के सभी केंद्रों पर कब्जा कर लिया है. जस्टिस कोलसे ‘अलायंस फॉर जस्टिस एंड पीस’ द्वारा कराए जा रहे ‘जज कन्वेंशन’ में बोल रहे थे. जिसका विषय ‘लोकतंत्र की सुरक्षा’ था.

इस दौरान पाटील ने कहा कि उन्हें लगातार डराने की कोशिश की जाती रही है. उनके साथ कभी भी कुछ भी हो सकता है. अपने भाषण में जस्टिस कोलसे ने एक बार फिर जस्टिस लोया की हत्या का मामला उठाया. जस्टिस कोलसे ने कहा कि सोहराबुद्दीन शेख फर्जी मुठभेड़ की सुनवाई करने वाले जज बीएस लोया की संदिग्ध हालातों में मौत हो गई. उन्होंने आरोप लगाया कि लोया के अलावा उनके दो राजदारों एडवोकेट श्रीकांत खंडालकर और रिटायर्ड जज प्रकाश थोम्बरे की भी हत्या की गई है. पाटील का दावा है कि वो कोई हादसा नहीं था. इसलिए अगला नंबर उनका है. इससे पहले इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को जस्टिस कोलसे ने काला दिन बताया था.

देश के शीर्ष सत्ता के सांप्रदायिकरण पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि भले ही देश के वंचित, पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक खतरे में हो, मुल्क का संविधान सभी को बराबर अधिकार देता है. कहीं भी अन्याय हो तो उसके खिलाफ लोग आवाज उठाएं. उसका विरोध करें. सच बोलने से बिल्कुल भी ना डरें.’ जस्टिस पाटील ने आगे कहा कि जब जनता ही अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर आ जाएगी तो जेल भी कम पड़ जाएंगी. लोग संवैधानिक दायरे में रहकर अपना अभियान चलाएं.

इस गांव में हर घर के सामने है क़ब्र

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SHYAM MOHAN BBC

आंध्र प्रदेश के कुरनूल ज़िले में अय्या कोंडा एक ऐसा गांव है, जहां हर घर के सामने एक क़ब्र है. इस गांव में पहुंचते ही लोगों के दिमाग़ में एक प्रश्न कौंधता है कि ‘क्या वो किसी क़ब्रिस्तान में आ गए हैं जहां कई घर हैं, या उस गांव में जो क्रबिस्तान से अटा पड़ा है.’

अय्या कोंडा कुरनूल ज़िला मुख्यालय से 66 किलोमीटर दूर गोनेगंदल मंडल में एक पहाड़ी पर बसा है. मालादासरी समुदाय के कुल 150 परिवारों वाले इस गांव के लोग अपने सगे संबंधियों की मौत के बाद उनके शव को घर के सामने दफ़न करते हैं क्योंकि यहां कोई क़ब्रिस्तान नहीं है. इस गांव के हर घर के सामने एक या दो क़ब्र देखने को मिलती हैं. गांव की महिलाओं और बच्चों को अपनी दिनचर्या के लिए भी इन्हीं क़ब्रों से होकर गुजरना पड़ता है.

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महिलाएं इन्हें पार कर पानी लेने जाती हैं तो बच्चे इनके इर्दगिर्द खेलते हैं. ग्रामीणों का कहना है कि ये क़ब्र उनके पूर्वजों की हैं जिनकी वो रोज पूजा करते हैं, प्रसाद चढ़ाते हैं और अपने रिवाज़ों का पालन करते हैं. घर में पकाया जाने वाला खाना परिवार के सदस्य तब तक नहीं छूते जब तक उसे मृतकों की क़ब्र पर चढ़ाया नहीं जाता है.

इस रिवाज के बारे में गांव के सरपंच श्रीनिवासुलु ने बीबीसी से कहा, “आध्यात्मिक गुरु नल्ला रेड्डी और उनके शिष्य माला दशारी चिंतला मुनिस्वामी ने गांव के विकास में अपनी पूरी शक्ति और धन लगा दिया था. उनकी किए कामों का आभार मानते हुए ग्रामीणों ने यहां उनके सम्मान में एक मंदिर स्थापित किया और उनकी पूजा करने लगे. ठीक उसी तरह अपने परिवार के बड़ों के सम्मान में ग्रामीण घर के बाहर उनकी क़ब्र बनाते हैं.”

 श्याम मोहन द्वारा बीबीसी तेलुगू के लिए लिखे लेख का अंश

उमा भारती ने दलितों के लिए दिया गजब बयान

छत्तरपुर। भाजपा की वरिष्‍ठ नेता और केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने दलितों के साथ भोजन करने को लेकर एक बयान दिया है. उन्‍होंने मध्‍य प्रदेश के नौगांव के ददरी गांव में लोगों को संबोधित करते हुए कहा, ‘मैं दलितों के घर में भोजन करने नहीं जाती. क्‍योंकि मैं अपने आप को भगवान राम नहीं मानती कि शबरी के घर जाकर भोजन किया तो दलित पवित्र हो जाएंगे. दलित जब मेरे घर में आकर भोजन करेंगे और मैं उन्‍हें अपने हाथों से खाना परोसूंगी तब मेरा घर धन्‍य हो जाएगा, मेरे बर्तन धन्‍य हो जाएंगे, मेरा पूजाघर धन्‍य हो जाएगा.

कार्यक्रम के दौरान सामूहिक भोज का भी कार्यक्रम था लेकिन उमा भारती ने खाने से यह कहते हुए मना कर दिया कि ‘मैं आज आपके साथ बैठकर भोजन नहीं कर पाऊंगी, क्‍योंकि मैंने भोजन कर लिया है.’ हालांकि इस बयान पर राजनीतिक विविद होने के बाद उमा भारती के कार्यालय की ओर एक बयान जारी कर सफाई दी गई है. केंद्रीय मंत्री ने बताया कि उन्‍हें नौगांव में समरसता भोज की जानकारी पहले से नहीं थी. बयान के मुताबिक, उन्‍हें छतरपुर से तकरीबन डेढ़ सौ किलोमीटर दूर पपोड़ा (टीकमगढ़ जिला) जाना था. इसके कारण वह वहां मौजूद लोगों से क्षमा-याचना कर पपोड़ा के लिए रवाना हो गईं. बयान में कहा गया, ‘वो जमाना चला गया जब दलितों के घर में बैठकर भोजन करना सामाजिक समरसता का सूत्र था. अब तो राजनीति में जो दलितों के साथ भेदभाव होता है, उसमें समरसता लानी पड़ेगी. आर्थिक उत्‍थान, सामाजिक सम्‍मान और शासन-प्रशासन में बराबरी की भागीदारी ही सामाजिक समरसता का मूलमंत्र है.’ उमा भारती का यह रवैया ऐसे समय सामने आया है, जब पिछले महीने दलितों के प्रदर्शन के बाद भाजपा आलाकमान के निर्देश के बाद पार्टी नेता और मंत्री दलित प्रेम दिखा रहे हैं.