मोबाइल चोरी या गुम हो तो इस नंबर पर करें शिकायत, ढूंढ कर देगी पुलिस

नई दिल्ली। मोबाइल चोरी होने पर अक्सर लोग मायूस हो जाते हैं और शिकायत दर्ज कराने के लिए उन्हें धक्के खाने पड़ते हैं, लेकिन सरकार ने एक हेल्पलाइन नंबर 14422 जारी किया है. इससे पूरे देश में लोगों को अब शिकायत दर्ज कराने के लिए भटकना नहीं पड़ेगा. इस नंबर पर डायल करने या संदेश भेजने पर शिकायत दर्ज हो जाएगी और पुलिस व सेवा प्रदाता कंपनी मोबाइल की खोज में जुट जाएगी. दूरसंचार मंत्रालय मई के अंत में महाराष्ट्र सर्किल में इसकी शुरुआत करेगा. देश के 21 अन्य दूरसंचार सर्कल में कई चरणों में इसे दिसंबर तक लागू किया जाएगा.

दूरसंचार विभाग द्वारा तैयार सीईआईआर में हर नागरिक का मोबाइल ब्योरा होगा

दूरसंचार प्रौद्योगिकी केंद्र (सी-डॉट) ने चोरी या गुम मोबाइल का पता लगाने के लिए सेंट्रल इक्विपमेंट आईडेंटिटी रजिस्टर (सीईआईआर) तैयार कर लिया है. सीईआईआर में देश के हर नागरिक का मोबाइल मॉडल, सिम नंबर और आईएमईआई नंबर है. मोबाइल मॉडल पर निर्माता कंपनी द्वारा जारी आईएमईआई नंबर के मिलान का तंत्र सी-डॉट ने ही विकसित किया है. इस तंत्र को चरणबद्ध तरीके से राज्यों की पुलिस को सौंपा जाएगा. मोबाइल के खोने पर शिकायत दर्ज होते ही पुलिस और सेवा प्रदाता मोबाइल मॉडल और आईएमईआई का मिलान करेंगी. अगर आईएमईआई नंबर बदला जा चुका होगा, तो सेवा प्रदाता उसे बंद कर देंगी, हालांकि सेवा बंद होने पर भी पुलिस मोबाइल ट्रैक कर सकेगी.

शिकायत के बाद कोई सिम काम नहीं करेगी

सी-डॉट के मुताबिक शिकायत मिलने पर मोबाइल में कोई भी सिम लगाए जाने पर नेटवर्क नहीं आएगा, लेकिन उसकी ट्रैकिंग होती रहेगी. पिछले कुछ सालों से रोजाना हजारों मोबाइल की चोरी और लूट की घटनाओं को देखते हुए सी-डॉट को दूरसंचार मंत्रालय ने यह तंत्र विकसित करने को कहा था. मंत्रालय के एक सर्वे में सामने आया था कि देश में एक ही आईएमईआई नंबर पर 18 हजार हैंडसेट चल रहे हैं.

आईएमईआई बदलने पर होगी जेल

आईएमईआई बदलने पर तीन साल की सजा और जुर्माने का प्रावधान है. गत वर्ष दूरसंचार मंत्रालय ने मोबाइल चोरी, झपटमारी और गुम होने की बढ़ती शिकायतों के मद्देनजर टेलीग्राफ एक्ट में संशोधन किया था. इसके तहत आईएमईआई से छेड़छाड़ करने वालों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी.

साभार अमर उजाला इसे भी पढ़ें–अगले हफ्ते होगी मायावती और अखिलेश की मुलाकात दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये दिए गए लिंक पर क्लिक करें https://yt.orcsnet.com/#dalit-dastak

अगले हफ्ते होगी मायावती और अखिलेश की मुलाकात

लखनऊ। कर्नाटक से लौटने के बाद अगले हफ्ते बीएसपी प्रमुख मायावती से एसपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश की अहम बैठक होगी. इसमें कैरान-नूरपुर उपचुनाव और लोकसभा चुनाव 2019 की रणनीति और सीटों पर भी मंथन होगा. सूत्रों के अनुसार एसपी और बीएसपी के अलावा कांग्रेस, आरएलडी और अन्य दलों की भूमिका पर भी इस बैठक में चर्चा होगी. यह बैठक दिल्ली में होने की संभावना है. एसपी और बीएसपी 2019 का लोकसभा चुनाव मिलकर लड़ेंगी. यह बात दोनों पार्टियां साफ कर चुकी हैं. फूलपुर और गोरखपुर उपचुनाव के बाद मायावती ने यह कहा था कि अब पार्टी को लोकसभा चुनाव की तैयारी करनी है. ऐसे में उनके कार्यकर्ता किसी उपचुनाव में प्रचार नहीं करेंगे. आरएलडी विधायक ने उनके प्रत्याशी को राज्यसभा चुनाव में वोट नहीं दिया था. इससे मायावती नाराज थीं. इसके बाद आरएलडी ने तुरंत अपने विधायक को पार्टी से निकाल दिया था. अब आरएलडी एसपी नेता को अपना प्रत्याशी बना रही है तो माना जा रहा है कि बदली हुई परिस्थितियों में मायावती साथ दे सकती हैं. वह अघोषित तौर पर ही कार्यकर्ताओं को एसपी और आरएलडी का साथ देने का निर्देश दे सकती हैं. इसे भी पढ़ें–92 वर्षीय महातिर दूसरी बार बने मलयेशिया के प्रधानमंत्री, लोगों ने सड़कों पर मनाया जश्न दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये दिए गए लिंक पर क्लिक करें https://yt.orcsnet.com/#dalit-dastak

92 साल के नेता को आखिर राजनीति में क्यों उतरना पड़ा

लयेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद ने देश के आम चुनावों में ऐतिहासिक जीत हासिल की है. 92 साल के महातिर ने बारिसन नेशनल (बीएन) गठबंधन को चुनाव में करारी शिकस्त दी है. उन्होंने पिछले छह दशकों में पहली बार चुनावी जीत के लिए विपक्षी दलों का नेतृत्व किया. बृहस्पतिवार को महातिर ने देश के राजा से मुलाकात भी की.

चुनाव आयोग ने घोषणा की कि महातिर के विपक्षी गठबंधन ने चुनाव में 115 सीटों पर जीत हासिल की है जो सरकार बनाने के आवश्यक 112 सीटों की सीमा से अधिक है. चुनावों में जीत के बाद उन्होंने पत्रकारों से कहा कि हमें किसी तरह का बदला नहीं लेना चाहिए, हम सिर्फ कानून का शासन लाना चाहते हैं.

महातिर मोहम्मद इससे पहले बीएन गठबंधन का नेतृत्व करते हुए 1981 से 2003 तक मलयेशिया के प्रधानमंत्री रह चुके हैं. हालांकि तब वे भ्रष्टाचार का समर्थन करने वाली पार्टी का हिस्सा नहीं रहने की घोषणा करते हुए खुद ही पार्टी से अलग हो गए थे. इस बीच मौजूदा पीएम नजीब रजाक ने अपनी हार स्वीकार कर ली है.

नेशनल फ्रंट गठबंधन की शिकस्त के बाद रजाक ने कहा कि मैं जनादेश को स्वीकार करता हूं. उन्होंने कहा कि एक दल को संसद में बहुमत मिला है, ऐसे में राजा ही फैसला लेंगे कि अगला पीएम कौन होगा.

22 साल तक मुस्लिम बहुल देश की बागडोर संभाल चुके महातिर के बाद सत्ता संभालने वाले नजीब पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं. लेकिन चौंकाने वाले चुनाव परिणामों के बावजूद मलयेशिया में कहीं से कोई अप्रिय समाचार नहीं है, बल्कि सड़कों पर रात भर जश्न मनाया गया.

मलयेशिया में साठ वर्षों से सत्ता पर काबिज गठबंधन को चुनाव में हराने वाले नेता महातिर मोहम्मद पीएम पद की शपथ लेने के साथ ही दुनिया के सबसे बुजुर्ग निवाचित नेता बन जाएंगे. उन्होंने उम्मीद जताई कि शपथ ग्रहण समारोह आगामी बृहस्पतिवार को रखा जाए. इससे पहले दुनिया की सबसे उम्रदराज नेता होने का रिकॉर्ड क्वीन एलिजाबेथ द्वितीय के नाम रह चुका है जो 92 साल 19 दिन की थीं. जबकि महातिर की उम्र 92 साल 304 दिन है.

नजीब रजाक के नेतृत्व वाला बीएन गठबंधन सिर्फ 79 सीटों पर समेटने वाले महातिर मोहम्मद मूल रूप से नजीब के राजनीतिक गुरु रह चुके हैं. बीएम गठबंधन के वरिष्ठ नेता होने के नाते महातिर ने ही नजीब रजाक को राजनीति की बारीकियां समझाई थीं. लेकिन बाद में एमबीडी रिश्वत घोटाले के बाद उन्होंने खुद को नजीब से अलग कर लिया. इस घोटाले की जांच छह देशों में चल रही है. मौजूदा चुनाव में महातिर ने इस घोटाले की निष्पक्ष जांच का वादा किया है.

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पार्टी के खिलाफ जाकर इस भाजपा सांसद ने की जिन्ना की तरीफ

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लखनऊ. बीजेपी सांसद सावित्री बाई फूले ने विवादित बयान देते हुए मोहम्मद अली जिन्ना को महापुरुष बताया है. उन्होंने कहा कि ऐसे महापुरुष की तस्वीर जहां जरूरत हो उस जगह पर लगाई जानी चाहिए. जिन्ना इस देश के महापुरुष थे, हैं और रहेंगे. वे किसी जाति या धर्म के नहीं हैं. बता दें कि सावित्री बाई फूले गुरुवार को दलित बस्ती सलारपुर गांव में एक चौपाल को संबोधित कर रहीं थी.

सांसद ने कहा कि देश को आजाद कराने के लिए तमाम महापुरुषों ने बलिदान दिया है. मोहम्मद अली जिन्ना महापुरुष हैं. भाजपा सांसद ने कहा कि आज जब बहुजन समाज अपने अधिकारों के लिए मुखर है तो असल मुद्दों, गरीबी भुखमरी से ध्यान हटाने के लिए इस मामले को उठाया जा रहा है. मैं इससे सहमत नहीं हूं.

योगी कैबिनेट के मंत्री ओमप्रकाश राजभर के पिछड़ों की उपेक्षा के बयान को सांसद ने सही बताया है. उन्होंने कहा कि दलितों को वाजिब मान-सम्मान नहीं मिला है. दलित सांसदों को भारत का सांसद न कह कर दलित सांसद कहा जाता है. देश के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को भारत का राष्ट्रपति न कहकर दलित राष्ट्रपति कहा जाता है.

15 मई को सांसद ने बहराइच के कलेक्ट्रेट में वृहद स्तर पर आंदोलन की घोषणा की है. इसी सिलिसले में सांसद दलित बस्तियों में चौपाल आयोजित कर रही हैं.

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सचिन वालिया की हत्या के खिलाफ लखनऊ में प्रदर्शन

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लखनऊ। सहारनपुर में हुए भीम आर्मी के जिलाध्यक्ष कमल वालिया के भाई सचिन वालिया की हत्या के खिलाफ देश भर में विरोध शुरू हो गया है. बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय, लखनऊ में बहुजन छात्र संगठन अम्बेडकर यूनिवर्सिटी दलित स्टूडेंट्स यूनियन (AUDSU) ने 10 मई को पुतला दहन कर जोरदार विरोध प्रर्दशन किया. प्रदर्शन कर रहे छात्रों ने सचिन वालिया के लिए न्याय मांगा.

हत्या के विरोध में बाहरी सदस्यों ने समर्थन देते हुए सचिन वालिया के न्याय के लिए आवाज बुलंद की. AUDSU के सदस्यों ने कहा का कहना था कि 2 अप्रैल के भारत बंद के दिन से सामन्तवादी और जातिवादी ताकतों के द्वारा बहुजन एकता को डराने और भयभीत करने का जो सिलसिला सरकार के संरक्षण में किया जा रहा है, वह बहुत निंदनीय कृत्य है. सरकार के इशारे पर बहुजनों पर हो रहे अत्याचार को वर्तमान केंद्र और राज्य सरकार के बहुजनों के प्रति हीन भावना और घृणा को उजागर करने वाला चेहरा है.

देश के समस्त बहुजनों को शांति के साथ साथ कलम, तलवार, बन्दूक आदि अस्त्र शस्त्र को संग्रह करने और उनको चलाने की ट्रेनिंग भी दी जानी चाहिए. उपरोक्त वक्ताओं ने कहा है कि वर्तमान सरकार जातिवाद के दम्भ में चूर होकर लगातार प्रगतिशील बहुजनों को नोटिस करके उनके नाम की लिस्ट बनाकर उनको प्रताड़ित या उनकी हत्या की जा रही है.

2 अप्रैल के भारत बंद को देखकर सामन्तवादी मानसिकता के लोगों में बौखलाहट पैदा हो गई है कि कैसे बहुजन समाज संविधान की बदौलत आज इतने संगठित और प्रगतिशील हो गए हैं. क्योंकि भारत बन्द आंदोलन में भाग लेने वाला कोई राजनैतिक पृष्ठभूमि से नहीं था बल्कि यह देश भर के वह बहुजन लोग थे जो इंजीनियर हैं, डॉक्टर है, प्रोफेसर हैं, प्रथम द्वितीय व चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी व अधिजारियों ने अपनी अंतरात्मा की आवाज पर आंदोलन में भाग लिया था. जिससे जातिवादी लोगों की मूंछों की ऐंठन में और ज्यादा मरोड़ पड़ गई.

इसे भी पढ़ेंसहारनपुर से ताजा रिपोर्ट
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सहारनपुर से ताजा रिपोर्ट

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सहारनपुर। 9 मई को सहारनपुर में भीम आर्मी के जिलाध्यक्ष के भाई सचिन वालिया की हत्या के बाद वहां सबकुछ ठीक नहीं है. सचिन का अंतिम संस्कार हो चुका है. लेकिन उसके बावजूद सहारनपुर में तनाव कायम है. जगह-जगह पुलिस बल और आम जनता का जमघट साफ दिख जाता है. लोगों के गुस्से और दबाव के बाद सचिन की हत्या के बाद चार अभियुक्तों पर एफआईआर भी दर्ज कर ली गई है. एफआईआर में उस शेर सिंह राणा का नाम भी दर्ज है, जिसमें फूलन देवी की हत्या की थी.

इससे पहले पोस्टमार्टम के बाद सचिन का शव गांव में आते ही जैसे मातम फूट पड़ा था. अंतिम संस्कार के समय हाथों में नीले और पंचशील झंडों के साथ सचिन के हत्यारों को फांसी देने की मांग करने वाले युवाओं की मुट्ठियां गुस्से में लहरा रही थी. सचिन को अंतिम विदाई देने के लिए जैसे सहारनपुर का पूरा बहुजन समाज उमड़ गया था, तो जिले के आस-पास के अम्बेकरवादी भी पहुंचे थे.

सचिन की हत्या उस जगह से थोड़ी दूरी पर हुई जहां महाराणा प्रताप की जयंती का कार्यक्रम चल रहा था. भीम आर्मी के लोग महाराणा प्रताप की जयंती का कार्यक्रम मनाने का विरोध कर रहे थे. क्योंकि पिछले महीने ही 14 अप्रैल को शहर में अम्बेडकर जयंती का कार्यक्रम मनाने की अनुमति नहीं दी गई थी. घटना के बाद अब स्थानीय प्रशासन में मौजूद लोग सरकार के दबाव में आकर महाराणा प्रताप की जयंती मनाने की अनुमति देने की बात को स्वीकार कर रहे हैं.

सचिन की हत्या को लेकर भीम आर्मी के समर्थक पुलिस कप्तान के उस बयान से बेहद नाराज हैं, जिसमें तमंचा साफ करते हुए गोली चल जाने की संभावना जताई जा रही है. मृतक के भाई कमल वालिया ने पुलिस के इन नजरिये पर सवाल उठाया है कि क्या कोई गोली भर कर अपनी बंदूक साफ करता है?

फिलहाल पुलिस ने घटना के बाद से लेकर अब तक शहर का इंटरनेट बंद कर रखा है. शहर में एक अजीब सी खामोशी पसरी हुई है, हालांकि सहारनपुर की घटना सिर्फ सहारनपुर तक ही नहीं सिमटी है. इससे देश भर के अम्बेडकरवादी युवाओं में जबरदस्त गुस्सा है. सोशल मीडिया पर सचिन की हत्या के खिलाफ 20 मई को जंतर- मंतर पर पहुंचने का कैंपेन चल रहा है.

इसमें देश भर से युवाओं को दिल्ली के जंतर मंतर पहुंचने का आवाहन किया जा रहा है. युवाओं को बुलाने वाला कोई संगठन नहीं है. 2 अप्रैल के बाद दलितों को अपनी ताकत का अहसास हुआ है. अगर 20 मई को दलित समाज के युवाओं का हुजूम जंतर मंतर पहुंच गया तो कहीं यह घटना अत्याचार के खिलाफ दलितों के एक नए आंदोलन का आगाज न बन जाए

इसे भी पढ़ेंसहारनपुरः कमल वालिया की हत्या के मामले में फूलनदेवी के हत्यारे पर मुकदमा दर्ज
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सहारनपुरः कमल वालिया की हत्या के मामले में फूलनदेवी के हत्यारे पर मुकदमा दर्ज

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सहारनपुर। सहारनपुर में भीम आर्मी के जिलाध्यक्ष कमल वालिया के भाई सचिन वालिया की हत्या के मामले में पुलिस ने शेर सिंह राणा पर केस दर्ज किया है. इस मामले में शेर सिंह राणा, सचिन राणा, कान्हा राणा, नरेंद्र राणा और उपदेश राणा के खिलाफ हत्या और एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया है. फूलन देवी की हत्या का दोषी शेर सिंह राणा फिलहाल जमानत पर रिहा है.

मृतक के जिलाध्यक्ष भाई कमल वालिया का दावा है कि शेर सिंह राणा ने इलाके में एक वीडियो भी सर्कुलेट किया था, जिसमें महाराणा प्रताप जयंती मनाने से रोकने पर भीम आर्मी और सभी दलितों को खराब अंजाम भुगतने की चेतावनी दी गई थी. हालांकि पुलिस प्रशासन ऐसे किसी वीडियो से इंकार कर रहे हैं. शेर सिंह राणा खुद के महाराणा प्रताप जयंती कार्यक्रम में झारखंड के टाटा नगर में होने की बात कर रहे हैं. गौरतलब है कि शेर सिंह राणा को अगस्त 2014 में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी. हालांकि, 2016 में दिल्ली हाईकोर्ट से उसे जमानत मिल गई.

दूसरी ओर मृतक की मां कांति वालिया ने सहारनपुर के एसपी (सिटी) प्रबल प्रताप सिंह से उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है जो तनाव के बावजूद महाराणा प्रताप जयंती मनाना चाहते हैं. कांति उन लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई चाहती हैं जिन्होंने कार्यक्रम की इजाज़त मांगी है. उन्होंने कहा कि महाराणा प्रताप भवन को सील करने की मांग की, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों.

इसे भी पढ़ेंमायावती पीएम, अखिलेश सीएम, कांग्रेस का गृहमंत्री और रालोद का केंद्रीय मंत्री
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मायावती पीएम, अखिलेश सीएम, कांग्रेस का गृहमंत्री और रालोद का केंद्रीय मंत्री

नई दिल्ली। सपा और बसपा में ऐतिहासिक गठबंधन को लेकर प्लॉन तैयार है और बस इसकी घोषणा होनी बाकी है. कर्नाटक में चुनावी दौरे के दौरान बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने भी एनडीटीवी से बातचीत में इस बात को कहा था. अब चैनल न्यूज 18 में प्रकाशित एक खबर के मुताबिक सपा-बसपा- कांग्रेस और रालोद के बीच एक गठबंधन पर सहमति बनी है.

इस खबर के मुताबिक 2019 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए इन दलों के बीच न केवल सीट शेयरिंग बल्कि पद को लेकर भी महागठबंधन पर सहमति बनने लगी है.इसके मुताबिक मायावती को पीएम पद का उम्मीदवार घोषित किया जाएगा और गठबंधन को बहुमत मिलने पर मायावती प्रधानमंत्री बनेंगी. जबकि उत्तर प्रदेश की कमान अखिलेश यादव को मिलेगी. कांग्रेस को गृह मंत्रालय देने की बात है जबकि रालोद को सरकार में एक मंत्री पद दिया जाएगा. सपा की ओर से प्रो. रामगोपाल यादव और धर्मेन्द्र यादव मंत्री बनेंगे. खबर है कि अखिलेश यादव इस गठबंधन में अन्य दलों को शामिल करने के लिए भी जुटे हुए हैं.

इसे भी पढ़ेंशत्रुध्न सिन्हा ने मोदी की समझदारी को लेकर दिया विवादित बयान
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शत्रुध्न सिन्हा ने मोदी की समझदारी को लेकर दिया विवादित बयान

नई दिल्ली। अपनी ही पार्टी भाजपा को लेकर हमेशा तल्ख बयान देने वाले फिल्म स्टार और भाजपा नेता शत्रुध्न सिन्हा ने इस बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर बड़ा हमला बोला है. सिन्हा ने सीधे-सीधे मोदी की बुद्धिपर सवाल उठाते हुए ट्विट किया कि “प्रधानमंत्री बनने से कोई बुद्धिमान नहीं बन जाता.” इतना ही उन्होंने प्रचार के दौरान पीएम मोदी की भाषा पर भी सवाल उठाए. सिन्हा ने अपने ट्विट को पीएम मोदी और अमित शाह दोनों को टैग भी किया.

शत्रुघ्न ने ट्वीट किया कि कर्नाटक में आज चुनाव प्रचार थम गया है, लेकिन बिहार-यूपी की तरह मुझे यहां पर भी प्रचार के लिए नहीं बुलाया गया था, कारण हम सभी को पता है. लेकिन एक पुराने दोस्त की तरह मैं इतना कहना चाहूंगा कि आपको प्रधानमंत्री पद की गरिमा रखनी चाहिए. शत्रुघ्न ने कहा कि हम कांग्रेस पर PPP तरह के कमेंट क्यों कर रहे हैं, जबकि नतीजा तो 15 मई को आना है. प्रधानमंत्री बनने से कोई बुद्धिमान नहीं बन जाता है. कर्नाटक में जनता को तय करने दीजिए. शत्रुघ्न सिन्हा ने इन सभी ट्वीट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ-साथ बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को भी टैग किया है.

आपको बता दें कि शत्रुघ्न सिन्हा पिछले काफी समय से पार्टी और सरकार के खिलाफ बयानबाजी करते रहे हैं. अभी हाल ही में अन्य सीनियर नेता यशवंत सिन्हा ने बीजेपी छोड़ दी थी, जिसके बाद बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी ने शत्रुघ्न सिन्हा को भी पार्टी छोड़ने की सलाह दी थी.

करन कुमार इसे भी पढ़ें-महाराष्ट्र में हुआ शिवसेना-कांग्रेस गठबंधन
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महाराष्ट्र में हुआ शिवसेना-कांग्रेस गठबंधन

मुंबई। महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना और भाजपा के रिश्ते दिनों-दिन तल्ख होते जा रहे हैं. दोनों के बीच बढ़ती दूरी से प्रदेश में एक नया सियासी गणित तैयार होता दिख रहा है. महाराष्ट्र के सांगली में होने वाले उपचुनाव पर कांग्रेस को समर्थन का ऐलान कर शिवसेना ने भाजपा को बड़ा झटका दिया है.

सांगली जिले के पलूस कडेगांव विधानसभा सीट पर होने जा रहे उपचुनाव में शिवसेना ने कांग्रेस उम्मीदवार के समर्थन की घोषणा कर दिया है. कांग्रेस प्रत्याशी विश्वजीत कदम को समर्थन देने के लिए शिवसेना इस सीट पर अपना प्रत्याशी नहीं उतारा है. पलूस कडेगांव विधानसभा सीट पर उपचुनाव 28 मई को होना है. वहीं, मतगणना 31 मई को होगी.

कांग्रेस प्रत्याशी विश्वजीत कदम दिवंगत पूर्व मंत्री पतंगराव कदम के बेटे हैं. उनके निधन के बाद इस सीट पर उपचुनाव की जरूरत पड़ी. कांग्रेस ने पतंगराव के बेटे विश्वजीत पर भरोसा जताते हुए उन्हें ही टिकट दिया है. हालांकि वर्ष 2014 में विश्वजीत पुणे लोकसभा सीट से चुनाव लड़े थे लेकिन हार गए थे.

इसे भी पढ़ें-मोदी की सवर्णपरस्त नीतियों ने छीनी बहुजन भारत की खुशियां
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मोदी की सवर्णपरस्त नीतियों ने छीनी बहुजन भारत की खुशियां

वर्ल्ड हैपिनेस रिपोर्ट -2018 में भारत की करुणतर स्थिति

सबका साथ-सबका विकास का ढोल पीटने वाली मोदी सरकार की नीतियों के चलते खुशियों के मामले में बहुसंख्य लोगों की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है, यह बात वर्ल्ड हैपिनेस की ताज़ी रिपोर्ट से एक बार फिर स्पष्ट हो गया है. पिछले दिनों जारी वर्ल्ड हैपिनेस रिपोर्ट -2018 में यह तथ्य उभरकर आया है कि खुशहाली के मानकों पर आज भी फिनलैंड जैसा छोटा देश पहले तथा नार्वे और डेनमार्क क्रमशः दूसरे और तीसरे स्थान पर काबिज हैं जबकि अमेरिका के बाद ब्रिटेन 19 वें स्थान पर है. रिपोर्ट में यह भी उभर कर आया है कि खुशहाली के मानकों पर शीर्ष दस देशों में आठ देश यूरोप से हैं. शीर्ष 20 में एशिया का एक भी देश शामिल नहीं है. जहाँ तक भारत का सवाल है खुशहाली के मानकों पर भारत 156 देशों में 133 वें पायदान पर है और यह पिछले साल के 122वें स्थान के मुकाबले 11 स्थान नीचे आ गया है. काबिले गौर है कि वर्ल्ड हैपिनेस की रिपोर्ट -2017 में भारत 122 वें पायदान पर रहा. ताज़ी रिपोर्ट में चीन 86 वें और पकिस्तान 75 वें स्थान पर है. खुशहाली के मामले में हमारे पडोसी देश पाकिस्तान,बांग्लादेश, नेपाल और भूटान हमसे बहुत बेहतर स्थिति में, यह बात संयुक्त राष्ट्र की संस्था सस्टेनेबल डेवलपमेंट साफ़ल्यूशंस नेटवर्क द्वारा हर वर्ष तैयार की जाने वाली वर्ल्ड हैपिनेस की नयी रिपोर्ट ने एक बार फिर साबित कर दिया है.

काबिलेगौर है कि खुशहाली के इस सूचकांक को मापने के लिए कई कसौटियां रखी गयी हैं, जिनमे जीडीपी, सामाजिक सहयोग, उदारता, भ्रष्टाचार का स्तर, सामाजिक स्वतंत्रता, सामाजिक सुरक्षा तथा जीवन स्तर के बदलाव जैसे मुद्दों को इसके पैमाने का आधार बनाया गया है. इन मोर्चों पर बदतर परिणाम देने के कारण ही भारत जहां अपने पड़ोसियों से बहुत पीछे रह गया है, वहीं पिछले वर्ष के मुकाबले इस बार 11 स्थान नीचे भी फिसल गया है. खुशियों के मामले में भारत की करुण स्थिति के लिए प्रधानतः जिम्मेवार है मोदी सरकार . मोदी-राज में इस मामले में भारत पहुत तेजी से नीचे की और फिसलते गया है. इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस सरकार के चार सालों के कार्यकाल में चार बार खुशहाली वाली रिपोर्ट प्रकाशित हुई. इनमे मार्च 2015 में जारी रिपोर्ट में भारत 117 वें, 2016 में 118 वें जबकि 2017 में फिसल कर 122 वें स्थान पर आ गया और आज 122 से फिसल कर 133 पर आ गया है. रुझान साफ़ बता रहे है कि मोदी सरकार का कार्यकाल बढ़ने के साथ-साथ स्थिति बदतर हुए जा रही है.

बहरहाल भारत के विश्व आर्थिक महाशक्ति बनाने के दावों के बीच अगर यह अपने से कमजोर पडोसी देशों से भी लगातार पिछड़ते जा रहा है : अगर खुशियों की जगह दुखों के दलदल में फंसते जा रहा है तो उसका ठीकरा अधिकांश बुद्धिजीवी 24 जुलाई ,1991 से लागू नवउदारवादी नीतियों पर फोड़ रहे हैं. उनका मानना है कि देश में उदारीकरण के बाद से अमीरी और गरीबी के बीच फासला बहुत बढ़ा है. सरकारी स्तर पर आम आदमी के लिए न तो अच्छी शिक्षा और न ही स्वास्थ्य सेवाएँ सुलभ हो पा रही हैं. तथा विनिर्माण क्षेत्र से जुड़ीं चीजों की लगातार बढती कीमतों ने आम आदमी सामान्य जीवन स्तर तक को प्रभावित करना शुरू कर दिया है. लिहाजा लोग अपनी अपनी रोजाना तक की न्यूनतम जरूरतों तक को पूरी करने में खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं. इसका दुष्परिणाम यह हो रहा है कि परिवार आज सामाजिक , आर्थिक और सांस्कृतिक खुशहाली से वंचित होते जा रहे हैं. परिवारों में बढती हताशा और निराशा का माहौल लोगों को शारीरिक के साथ-साथ मानसिक खुशहाली से भी दूर करते जा रहा है.

खैर ! इसमें कोई शक नहीं कि आज भारत खुशहाली के मामले में दुनिया के दरिद्रतम देशों में शामिल हो चुका है, तो इसके लिए जिम्मेवार नव उदारवादी अर्थनीति ही है . किन्तु यदि हम यह जानने का प्रयास करें कि इस नीति से सर्वाधिक प्रभावित होने वाला तबका कौन है तो उसका उत्तर होगा सिर्फ और दलित,आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यक, खासकर मुसलमान! दरअसल 7 अगत, 1990 को मंडल की रिपोर्ट के बाद आरक्षण का जो विस्तार हुआ, उससे कुपित होकर ही आरक्षण को बेअसर करने की परिकल्पना के तहत ही 24 जुलाई, 1991 को सवर्ण वर्ग के पंडित नरसिंह राव ने नव उदारवादी अर्थनीति ग्रहण की. जिसका चरम लक्ष्य था भारत के जन्मजात विशेषाधिकारयुक्त तबकों अर्थात सवर्णों को पूरी तरह खुशहाल और गैर-सवर्णों दलित, आदिवासी, पिछड़े और मुस्लिम समुदाय को बदहाल बनाकर खुशियों से महरूम करना. मंडलवादी आरक्षण लागू होते ही सवर्णों के नेता, बुद्धिजीवी, साधू-संत, मीडिया और पूंजीपति वर्ग शत्रुतापूर्ण मनोभाव लिए आरक्षित वर्गों के खिलाफ मुस्तैद हो गया.मंडलवादी आरक्षण के विरोध के घोड़े पर सवार होकर भाजपा एकाधिक बार सत्ता में आई और देखते ही देखते अप्रतिरोध्य बन गयी.

बहरहाल मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद शासकों द्वारा बहुजनों को नए सिरे से गुलाम बनाने के लिए निजीकरण,उदारीकरण,विनिवेशीकरण इत्यादि का उपक्रम चलाने के साथ जो तरह-तरह की साजिशें की गयीं, उसके फलस्वरूप आज भारत का बहुजन समाज एक ऐसे बदहाल व वंचित समुदाय में तब्दील होते जा रहा है,जिसकी मिसाल वर्तमान विश्व में दुर्लभ है.मंडल के बाद बहुजनों को गुलाम बनाने के लिए जो विभिन्न साजिशें हुईं,उसका परिणाम इस रूप में आया है कि आज भी हजारों साल पूर्व की भांति उद्योग—व्यापार पर 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा वर्ण-व्यवस्था के विशेषाधिकारयुक्त तबकों का ही है.पूरे देश में आज जो असंख्य गगनचुम्बी भवन खड़े हुए हैं,उनमें 80-90 प्रतिशत फ्लैट्स उन्ही के हैं.पॉश कालोनियों में आज भी किसी दलित-आदिवासी-पिछड़े –मुस्लिम को वास करते देखना अचम्भे जैसा लगता है.

मेट्रोपोलिटन शहरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों तक में छोटी-छोटी दुकानों से लेकर बड़े-बड़े शॉपिंग माल्स में 80-90 प्रतिशत से ज्यादा दुकानें इन्ही की हैं.चार से लेकर आठ-आठ लेन की सड़कों पर चमचमाती गाड़ियों का जो सैलाब नजर आता है ,उनमें प्रायः 90 प्रतिशत से ज्यादा गाड़ियाँ उन्हीं की ही होती हैं.देश के जनमत निर्माण में लगे छोटे-बड़े अख़बारों से लेकर तमाम चैनल उन्हीं के हैं.फिल्म और मनोरंजन उद्योग पर 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा उन्हीं का है .संसद-विधानसभाओं में बहुजनों के जन प्रतिनिधियों की संख्या भले ही ठीक-ठाक हो,पर मत्रिमंडलों में दबदबा उन्हीं का है.मंत्रिमंडलों के लिए गए फैसलों को अमलीजामा पहनाने वाले प्रायः 80-90 प्रतिशत अधिकारी इन्हीं वर्गों से हैं.

शासन-प्रशासन,उद्योग-व्यापार,फिल्म-मीडिया इत्यादि में जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग के बेहिसाब वर्चस्व के फलस्वरूप आज दलित, आदिवासी,पिछड़ों और मुस्लिम समुदाय में निराशा और हताशा की कोई सीमा नहीं रह गयी है. और जब किसी देश की प्रायः 80-90 प्रतिशत आबादी हताशा और निराशा में घिरी हो तो वैसा देश खुशहाली की रैंकिंग में निम्नतर पायदान पर आयेगा ही आएगा, जो आज भारत के साथ हो रहा है. लेकिन 24जुलाई ,1991 से नरसिंह राव ने बहुजनों की खुशिया छीनने की निर्भूल परिकल्पना के तहत भूमंडलीकरण की जिस अर्थनीति का आगाज किया उसे उनके बाद सत्ता में आये कांग्रेस और भाजपा के सभी प्रधानमंत्रियों ने योगदान किया. चूँकि संघ सबसे बड़ा सवर्णवादी दल है इसलिए संघ प्रशिक्षित वाजपेयी और विशेषकर नरेंद्र मोदी ने इस मामले में अतिरिक्त योगदान दिया. लेकिन इस मामले में किसी व्यक्ति विशेष को खासतौर से चिन्हित करना हो तो नरेंद्र मोदी से भिन्न और कोई नहीं हो सकता .

24 जुलाई ,1991 के बाद नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ.मनमोहन सिंह ने सवर्णों को खुशहाल और बहुजनों को बदहाल बनाने के लिए दो दशक से ज्यादा समय तक काम किया. किन्तु मोदी ने अपने सिर्फ चार साल के कार्यकाल में इन तीनों को पूरी तरह बौना बना दिया . मोदी की नीतियों के फलस्वरूप सवर्णों का जहाँ धनार्जन के स्रोतों पर बहुत तेजी से एकाधिकार कायम हुआ, उसी अनुपात में बहुजनों की गुलामी भी बढ़ी. मोदी की अतिसवर्णपरस्त नीतियों, जिसे प्रग्रतिशील बुद्धिजीवी कार्पोरेटपरस्त नीतियां कहकर भ्रमित करते रहते हैं, के करण 2016-17के मध्य 1 प्रतिशत टॉप की आबादी अर्थात सवा करोड़ से अधिक सवर्णों की दौलत में एक साल में 15 प्रतिशत की वृद्धि हो गयी. स्मरण रहे सन 2000 में टॉप की एक प्रतिशत आबादी के हाथ में 37 प्रतिशत दौलत थी, जो 2016 में 58.5 प्रतिशत हो गयी. लेकिन मोदी की नीतियों के फलस्वरूप 2016 की उनकी 58.5प्रतिशत दौलत साल भर में 73 प्रतिशत तक पहुँच गयी. मोदी की नीतियों के फलस्वरूप 2017में अरबपतियों, जो प्रायः सवर्ण ही है, की संख्या में 13 प्रतिशत वृद्धि हो गयी.

इस बीच धनार्जन के एकमात्र स्रोत नौकरियों पर निर्भर आरक्षित वर्गों, विशेषकर दलितों के विशुद्ध गुलाम में तब्दील करने का काम मोदी राज में अंजाम दे दिया गया. मोदीराज में शिक्षा के क्षेत्र में ऐसी चाकचौबंद व्यवस्था कर दी गयी है कि एक ओर जहाँ बहुजन समाज के युवाओं के लिए उच्च शिक्षा का द्वार रुद्ध हो गया है, वहीँ इस वर्ग के किसी व्यक्ति को यूनिवर्सिटियों में प्रोफ़ेसर बनते देखना अब दुष्कर हो जायेगा. मोदीराज में शक्ति के स्रोतों पर सवर्णों का इतना जबरदस्त दबदबा कायम हो गया है कि दलित और मुस्लिम समुदाय के लोग अभूतपूर्व असुरक्षाबोध से घिर गए हैं. यदि देश की 80-85 प्रतिशत आबादी धनार्जन के स्रोतों से कट जाय ; यदि देश की 30-35 प्रतिशत आबादी अपनी सुरक्षा को लेकर दुश्चिंता से घिर जाय, तो खुशहाली की रैंकिंग में अभागे भारत को निम्नतर पायदान पर आने के लिए अभिशप्त होना ही पड़ेगा. इस स्थिति में तबतक कोई बदलाव नहीं आएगा , जबतक धनार्जन के समस्त स्रोतों का सवर्ण, ओबीसी, एससी/एसटी और धार्मिक अल्पसंख्यकों के संख्यानुपात में पुनर्वितरण नहीं हो जाता. और मोदी सर्कार के रहते इसकी कोई सम्भावना नहीं दिखती .

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मुंबई के आजाद मैदान में ओबीसी समाज करेगा भुजबल का सम्मान

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मुंबई। जमानत मिलने के बाद महाराष्ट्र के दिग्गज नेता छगन भुजबल 11 मई से एक बार फिर जनता के सामने आएंगे. मुंबई के आजाद मैदान में शुक्रवार को ओबीसी जनगणना महापरिषद के एक कार्यक्रम में भुजबल अध्यक्ष के तौर पर शामिल होंगे. इस दौरान महापरिषद द्वारा भुजबल को ओबीसी योद्धा का सम्मान दिया जाएगा.

ओबीसी जनगणना महापरिषद द्वारा ओबीसी जनगणना अभियान के तहत कार्यक्रम में महाराष्ट्र के तमाम दिग्गज नेता शामिल रहेंगे. कार्यक्रम का उद्घाटन एड. प्रकाश आंबेडकर करेंगे. जबकि प्रमुख मार्गदर्शक हरिभाऊ राठौड़ करेंगे. श्रवण देवरे कार्यक्रम में बतौर मुख्य वक्ता सभा को संबोधित करेंगे. इसी कार्यक्रम का अध्यक्ष छगनराव भुजबल को बनाया गया है.

तकरीबन दो साल तक जेल में रहने के बाद जमानत पर बाहर आए भुजबल पहली बार लोगों के बीच होंगे. सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि आखिर वो इतने लंबे समय बाद जनता को क्या संदेश देते हैं. महाराष्ट्र की राजनीति में भुजबल के कार्यक्रम में शामिल होने को लेकर तमाम हलचल है.

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सुप्रीम कोर्ट ने दिखाया पीएम मोदी को आईना

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नई दिल्ली। आम जनता की सुविधा से जुड़े एक मामले में देश की सर्वोच्च न्यायालय ने प्रधानमंत्री मोदी को आईना दिखाया है. पलवल से कुंडली के बीच ईस्टन एक्सप्रेस वे के शुरू ना होने पर नाराज सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसकी शुरुआत के लिए PMO की हरी झंडी का इंतजार क्यों? सुप्रीम कोर्ट ने NHAI को कहा कि इस महीने के अंत तक यानी 31 मई तक शुभारंभ नहीं भी होता तो 1 जून से जनता के लिए इसे खोला जाए.

असल में प्रधानमंत्री मोदी को इस एक्सप्रेस वे का उदघाटन 29 अप्रैल को करना था लेकिन पीएम के पास समय न होने के कारण इस कार्यक्रम को स्थगित कर दिया था. तब से लगातार इसके उदघाटन का मामला अटका हुआ है. इस पर संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने कहा कि ईस्टन एक्सप्रेस वे को शुरू करने के लिए PM से शुभारंभ करने का इंतजार क्यों हो रहा है? इसे जनता के लिए शुरू किया जाए. जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस दीपक गुप्ता की बेंच ने कहा कि हमें भरोसा दिलाया गया था कि अप्रैल में PM इसका शुभारंभ करेंगे, लेकिन मीडिया रिपोर्ट कहती है कि PM आज या कल में यहां उपलब्ध नहीं है.

इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मेघलाय कोर्ट पांच साल से काम कर रहा है जबकि अभी तक उसका शुभारंभ नहीं हुआ. NHAI ने कहा कि हमनें PMO को इसके लिए कहा है. तब कोर्ट ने कहा कि अगर वो नहीं करते तो आप ही क्यों नहीं कर देते आप लोगों ने इस पर मेहनत की है. बताते चलें कि ईस्टन एक्सप्रेस वे 135 किलोमीटर का है.

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सेनाध्यक्ष ने चेताया, कश्मीर की ‘आज़ादी’ संभव नहीं, आप सेना से लड़ नहीं सकते

नई दिल्ली। सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत ने कश्मीर में आजादी के नारे लगाने वाले कश्मीरी युवाओं को चेतावनी दी है. उन्होंने कहा है कि कश्मीर के जो युवा कश्मीर की आजादी के नारे लगते हैं उनका यह सपना कभी पूरा नहीं होने वाला. उनके मुताबिक कश्मीरी युवाओं को यह समझने की जरूरत है कि उन्हें ‘आजादी’ कभी नहीं मिलेगी और वे सेना से नहीं लड़ सकते.

इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में बिपिन रावत ने कश्मीरी युवाओं के आतंक की राह पर चलने को लेकर चिंता जताई. उन्होंने कहा कि जो लोग युवाओं को बताते हैं कि ऐसा करके उन्हें आजादी मिल जाएगी वे उन्हें बहका रहे हैं. सेनाध्यक्ष ने कहा, ‘मैं कश्मीरी युवाओं से कहना चाहता हूं कि उन्हें जो आजादी चाहिए वह संभव नहीं है. ऐसा नहीं होगा. आप हथियार क्यों उठा रहे हैं? हम उनसे हमेशा लड़ते रहेंगे जिन्हें (भारत से) आजादी चाहिए और जो अलग होना चाहते हैं.’

जनरल बिपिन रावत ने यह भी कहा कि वे इस बात को ज्यादा महत्व नहीं देते कि सेना द्वारा कितने आतंकी मार गिराए गए. उन्होंने कहा, ‘मैं आंकड़ों के खेल में नहीं उलझता. मुझे पता है कि आतंक का भी एक चक्र है और नए आतंकियों की भी भर्ती का काम चल ही रहा है. मैं सिर्फ लोगों को यह बताना चाहता हूं कि आप सेना से नहीं लड़ सकते हैं. सेना से लड़कर तो आप कभी भी जीत नहीं सकते.’

सेनाध्यक्ष ने यह भी कहा कि आतंकी बने युवाओं की मौत से वे बेचैन होते हैं. उन्होंने कहा, ‘हमें किसी को मारकर खुशी नहीं मिलती है. आप आर्मी के साथ संघर्ष करेंगे तो सुरक्षा बल भी बदले में वार करेंगे. सुरक्षा बल बंदूक उठाने वाले लड़ाकों की तरह क्रूर नहीं हैं. आप सीरिया और पाकिस्तान के हालात देखिए… मानता हूं कि युवाओं में गुस्सा है, लेकिन सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकना कोई रास्ता नहीं है…’

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इंग्लैंड में भी दलितों से छूआछूत

(फोटो साभार : फेसबुक/Dalit Solidarity Network UK)

दलितों के अधिकारों की लड़ाई सिर्फ भारत में ही नहीं चल रही है, सात समुंदर पार ब्रिटेन में रह रहे दलित भी वहां फैले छुआछूत और जातिवाद के खिलाफ आर-पार की लड़ाई लड़ रहे हैं. दरअसल ब्रिटेन में दक्षिण एशियाई मूल के करीब 30 लाख लोग रहते हैं. ब्रिटेन की एजेंसियों का अनुमान है कि इनमें से 50,000 से 2 लाख के बीच आबादी दलितों की है. भारत की तरह ब्रिटेन में दलित उत्पीड़न रोकने के लिए कोई कानून नहीं है. हालांकि वहां नस्लीय उत्पीड़न रोकने के लिए समानता कानून है.

भारतीय मूल के दलितों का दावा है कि अगर अश्वेत व्यक्ति नस्लीय भेदभाव का शिकार होता है, तो वह इस कानून के तहत मामला दर्ज कराकर न्याय की गुहार लगा सकता है, लेकिन किसी दक्षिण एशियाई मूल के व्यक्ति को जातिसूचक शब्द या छुआछूत का शिकार होना पड़ता है तो न्याय पाना तो दूर वह अधिकारियों को यह समझा भी नहीं पाता है कि वह नस्लीय भेदभाव जितने ही खतरनाक जातीय भेदभाव या छुआछूत का शिकार हो रहा है.

पिछले कई दशक से ब्रिटेन के दलित मांग उठा रहे हैं कि भारत की तरह इंग्लैंड में भी उन्हें जात-पांत का शिकार होना पड़ रहा है. ब्रिटेन में लंबे समय से जातिवाद को कानूनी अपराध घोषित करने की लड़ाई लड़ रहीं पूर्व अधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ता संतोष दास के मुताबिक, ‘पहले तो कोई मानता ही नहीं था कि ब्रिटेन में दलितों के साथ भेदभाव हो रहा है. और यह भेदभाव और कोई नहीं बल्कि ब्रिटेन में रह रहे भारतीय मूल के अगड़ी जातियों के लोग ही कर रहे हैं.’ ब्रिटेन में छुआछूत की रिपोर्ट तैयार करने का काम दिसंबर 2010 में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक एंड सोशल रिसर्च को सौंपा गया. संस्थान की ओर से हिलेरी मेटकॉफ और हीथर रोल्फ ने कास्ट डिसक्रिमनेशन एंड हैरासमेंट इन ग्रेट ब्रिटेन नाम की अपनी 114 पन्ने की रिपोर्ट 28 जुलाई 2011 को सौंप दी. रिपोर्ट में जो कहा गया वह चौंकाने वाला था.

रिपोर्ट में ब्रिटेन में रह रहे दलित समुदाय के लोगों और वहां काम कर रहे दो दर्जन से ज्यादा दलित संगठनों से बातचीत की गई. स्कूलों में किए गए अध्ययनों में पता चला कि भारतीय मूल के सवर्ण छात्र अपने सहपाठी दलित छात्रों को जातिसूचक शब्दों से जलील करते हैं. कुछ ऐसे मामले भी सामने आए जहां पहले तो छात्रों के बीच दोस्ताना था, लेकिन एक-दूसरे की जाति पता चलने के बाद उनका व्यवहार बदल गया. कई मामलों में जातिगत भेदभाव के कारण छात्रों ने स्कूल ही छोड़ दिया. एक मामले में तो एक छात्रा ने स्कूल आना ही छोड़ दिया और घर रहकर इयरफोन से क्लास अटेंड की.

कई मामलों में दलितों को अलग बैठकर खाना खाना पड़ता है, क्योंकि सवर्ण उनके साथ बैठना पसंद नहीं करते. ज्यादातर मामलों में पीड़ित अपने गोरे अफसरों को समझा ही नहीं पाए कि आखिर उनके साथ हो क्या रहा है. सबसे विचित्र मामला तो टैक्सी चलाने वाले एक दलित कारोबारी के साथ सामने आया. उसकी कंपनी में ज्यादातर सवर्ण टैक्सी ड्राइवर काम करते थे. ये आपसी बातचीत में जातिसूचक शब्द और जातिवादी भावनाओं का इजहार करते रहते थे. जब कारोबारी ने उन्हें ऐसा करने से रोका, तो उन्होंने कहा कि इसमें क्या हर्ज है. तब कारोबारी ने बताया कि वह दलित है और जातिसूचक शब्दों से उसे अपमान महसूस होता है. कारोबारी के दलित होने की बात पता चलने पर पांच ड्राइवरों ने यह कहते हुए नौकरी छोड़ दी कि वे नीची जाति के व्यक्ति के यहां नौकरी नहीं करेंगे.

इन हालात पर द फेडरेशन ऑफ अंबेडकर एंड बुद्धिस्ट ऑर्गनाइजेशन्स यूके के अरुण कुमार कहते हैं, ‘यह रिपोर्ट ब्रिटेन के लोगों के लिए नई चीज थी. उन्हें यकीन ही नहीं हुआ कि ब्रिटेन में इस कदर छुआछूत फैली हुई है. हालांकि मेरे जैसे लोग 40 साल से यह बात सरकार को समझाने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन साधन संपन्न हिंदुओं की लॉबी इसे दबाए हुए थी.’

इसके बाद यह तय किया गया कि ब्रिटेन के समानता अधिनियम 2010 में एक उपबंध जोड़कर ब्रिटेन में नस्ल की तरह जातिवादी भेदभाव को भी अपराध माना जाएगा. 2013 में ब्रिटिश सरकार ने कानून में संशोधन की घोषणा कर दी. लेकिन मई 2016 में अपने वादे से पलटते हुए प्रधानमंत्री थेरेसा मे ने इस विषय पर सर्वेक्षण कराने की बात कही. ब्रिटेन में बड़ी संख्या में रह रहे गैर-दलित दक्षिण एशियाई समुदाय ने अपनी दलील रखी कि 21वीं सदी के ब्रिटेन में जातिवाद की बात करना बकवास है. उन्होंने इसे हिंदू धर्म को अपमानित करने की साजिश बताया.

इस मामले में लगातार संघर्ष कर रहे ब्रिटेन के दलित एक्टिविस्ट अरुण कुमार ने कहा- ब्रिटेन में रह रहे दक्षिण एशियायी समुदाय में अगड़ी जातियों का वर्चस्व देखते हुए थेरेसा मे अपने फैसले से पलट गईं. लेकिन दलितों के लगातार विरोध प्रदर्शन के बाद उन्होंने अगस्त 2017 में एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण शुरू कराया, जिसमें ऑनलाइन मत देकर लोगों को बताना था कि ब्रिटेन में जातिवाद है या नहीं. सितंबर 2018 में यह सर्वेक्षण पूरा हो गया. फिलहाल इसका नतीजा सार्वजनिक नहीं किया गया है. लेकिन इस बीच ब्रिटेन के हिंदू समुदाय ने अपना विरोध बढ़ा दिया. उन्होंने ऐसी दलील दी जिसे समझना जातिवाद से भलीभांति वाकिफ भारतीयों तक के लिए कठिन है. जिस तरह सदियों से भारत में दलित अधिकारों की लड़ाई जारी है और अब तक अपने मकाम पर नहीं पहुंची है, उसी तरह ब्रिटेन में भी यह लड़ाई अभी लंबी चलेगी.

– पीयूष बबेले साभार जी न्यूज. इंडिया. कॉम

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नेहा धूपिया ने भी कर ली शादी, बड़े क्रिकेटर का बेटा है नेहा का पति

नेहा धुपिया और अंगद बेदी

जब मीडिया का सारा फोकस अनिल कपूर की बेटी सोनम कपूर की शादी पर टिका था, तभी एक और जानी-मानी अभिनेत्री नेहा धूपिया ने भी शादी कर ली. यह शादी इतने गुपचुप तरीके से हुई कि किसी को कानों-कान इसकी खबर भी नहीं लगी. ये शादी सिख रीति रिवाज से दिल्ली में हुई.

शादी के बाद नेहा धूपिया ने खुद सोशल मीडिया के जरिए इसकी जानकारी दी. नेहा ने अपने बेस्ट फ्रेंड अंगद बेदी से दिल्ली में शादी की. सीक्रेट वेडिंग के बाद दोनों ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर फैंस को ये खुशखबरी दी. नेहा ने शादी की फोटो शेयर करते हुए लिखा- मेरी जिंदगी का सबसे सही फैसला. आज मैंने अपने बेस्ट फ्रेंड से शादी की, हैलो हसबैंड! @angadbedi ❤.

वहीं अंगद बेदी ने भी अपने इंस्टा अकाउंट पर शादी की तस्वीर शेयर करते हुए लिखा- बेस्ट फ्रेंड..अब मेरी पत्नी!!! हैलो मिसेज बेदी.

यहां इस खबर में ट्विस्ट यह है कि नेहा के पति अंगद बेदी दिग्गज क्रिकेटर बिशन सिंह बेदी के बेटे हैं. नेहा फिल्म जगत में एक जाना माना नाम है. हाल ही में उन्होंने विद्या बालन के साथ ‘तुम्हारी सुलु’ में महत्वूर्ण किरदार निभाया था. मिस इंडिया बनने के बाद नेहा बॉलीवुड में काम करने आई थीं. तो वहीं अंगद बेदी का ताल्लुक भी फिल्मी जगत से है. वह कई फिल्मों में कैरेक्टर रोल कर चुके हैं. वे अमिताभ बच्चन-तापसी पन्नू स्टारर मूवी पिंक में नजर आए थे.

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कर्नाटक चुनाव में दलित-बसपा फैक्टर

कर्नाटक चुनाव प्रचार का आज (10 मई) आखिरी दिन रहा. कर्नाटक चुनाव की सरगर्मी का असर पूरा देश महसूस कर रहा है. देश के दो सबसे ताकतवर नेता प्रधानमंत्री मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कई दिनों तक कर्नाटक में जमें रहे. आलम यह है कि कर्नाटक की चुनावी गर्मी का असर दिल्ली तक में साफ दिखा. प्रदेश में भाजपा जहां अपने बूते चुनाव मैदान में है तो कांग्रेस भी बिना गठबंधन चुनाव लड़ रही है. प्रदेश की तीसरी प्रमुख पार्टी पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा की जनता दल सेक्युलर यानि जेडीएस है. जेडीएस यहां बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन कर चुनाव मैदान में है.

प्रदेश में जो स्थिति बन रही है, उसमें जेडीएस-बसपा गठबंधन मजबूत बनकर उभरा है. कर्नाटक में सामाजिक संरचना को देखें तो जेडीएस और बसपा का यह गठबंधन काफी महत्वपूर्ण है. कर्नाटक में दलित और आदिवासी समुदाय के करीब 26% वोटर हैं, जो राज्य की 100 सीटों को प्रभावित करने का माद्दा रखते हैं. इस आंकड़े को और बेहतर तरीके से समझने की कोशिश करें तो राज्य की करीब 60 सीटों पर दलित समुदाय और 40 सीटों पर आदिवासी समुदाय के वोटर असर डालते हैं. जाहिर है इसके अलावा भी हर सीट पर दलित और आदिवासी वोटों की संख्या होगी ही.

यही आंकड़ा जेडीएस और बसपा के गठबंधन को मजबूत बना रहा है तो इसी आंकड़े से भाजपा और कांग्रेस पार्टी डरी हुई है. यही वजह है कि कांग्रेस देवेगौड़ा से यह पूछती दिखी कि वह कांग्रेस की ओर हैं या फिर भाजपा की ओर तो कर्नाटक में चुनाव प्रचार करने पहुंचे पीएम मोदी लगातार देवेगौड़ा पर डोरे डालते रहे.

कर्नाटक के विधानसभा की स्थिति की बात करें तो यहां 224 विधानसभा सीटे हैं. इसमें एससी यानि दलितों के लिए 36 जबकि एसटी यानि आदिवासियों के लिए 15 सीटें सुरक्षित हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव को आधार बनाकर देखें तो विधानसभा वार सीटों पर बढ़त के लिहाज से भाजपा आदिवासियों के लिए आरक्षित 36 सीटों में से 18 जबकि कांग्रेस 16 सीटों पर आगे थी. वहीं,आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों 15 सीटों में भाजपा 8 और कांग्रेस 7 सीटों पर आगे थी. यानि दोनों में कड़ी टक्कर थी.

हालांकि यहां एक और तथ्य पर ध्यान देना होगा. कांग्रेस के मुख्यमंत्री सिद्दारमैया भी खुद पिछड़े समुदाय से आते हैं और उन्होंने दलितों और आदिवासियों के लिए कई योजनाएं चला रखी है. सिद्दारमैया को इसका कितना लाभ मिलता है यह इस पर निर्भर है कि ये योजनाएं जमीन पर कितनी पहुंची है. जबकि भाजपा के मंत्री अनंत कुमार हेगड़े के संविधान बदलने को लेकर प्रदेश के दलित-आदिवासी भाजपा से खार खाए हुए हैं. पिछले दिनों एक बैठक के दौरान दलितों ने हेगड़े के बयान को लेकर अमित शाह का बहिष्कार कर अपनी मंशा जता दी है.

प्रदेश में नए समीकरण बनने के बाद अचानक इस सभी सीटों पर जेडीएस-बसपा गठबंधन का दावा भी मजबूत हो गया है. बसपा देश की इकलौती ऐसी पार्टी है, जिसे देश के हर हिस्से में दलितों का कमोबेश समर्थन हासिल है. जेडीएस के साथ मिलकर मजबूती से चुनाव लड़ने की स्थिति में दलित वोट बसपा के पक्ष में गोलबंद हो सकते हैं. यह स्थिति प्रदेश में सत्ता का गणित बदलने के लिए काफी है.

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महाराष्ट्र में वर्दी पहनकर भीख मांगना चाहता है एक पुलिसकर्मी

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मुंबई। विभाग की असंवेदनशीलता के कारण वेतन रुकने से आर्थिक दिक्कतों का सामना कर रहे पुलिसकर्मी ने वर्दी पहनकर भीख मांगने की मंजूरी मांगी है. मुंबई पुलिस के एक कांस्टेबल ने सीएम देवेन्द्र फडणवीस को चिट्ठी लिखकर यह मांग की है. सिपाही ने अपनी चिट्ठी में दो महीने से वेतन नहीं मिलने का हवाला दिया है. चिट्ठी में उसने लिखा है कि वह अपने परिवार का भरण-पोषण कर पाने में असमर्थ है.

आरक्षक ने इस चिट्ठी की कॉपी मुंबई पुलिस कमिश्नर दत्ता पदसालगिकर और अपने विभाग के अन्य सीनियर अधिकारियों को भी भेजी है. अहीरराव स्थानीय शस्त्र इकाई से जुड़े हैं. उनकी तैनाती उद्धव ठाकरे के घर ‘मातोश्री’ की सुरक्षा में लगे दल में है. उन्होंने पत्र में लिखा है कि 20 मार्च से 22 मार्च के बीच उन्होंने छुट्टी ली थी लेकिन पत्नी के पैर में फ्रैक्चर होने के कारण वह छुट्टी खत्म होने के बाद काम पर नहीं लौट सके. पत्र में उन्होंने दावा किया है कि उन्होंने अपनी इकाई के प्रभारी को पांच दिन की आपात छुट्टी लेने की जानकारी दी थी और पत्नी के इलाज के बाद वह 28 मार्च को काम पर लौट आए थे. लेकिन इसके बाद उसका वेतन रोक दिया गया और इस संबंध में ज्यादा जानकारी नहीं दी गयी.

कांस्टेबल ने पत्र में लिखा, ‘‘मुझे अपनी बीमार पत्नी की देखभाल करनी होती है , बुजुर्ग माता-पिता और एक बेटी का गुजर बसर करना होता है. इसके अलावा मुझे कर्ज की मासिक किश्त देनी होती है. लेकिन जब से वेतन रोका गया है , मैं इन खर्चों का वहन करने में असमर्थ हूं. इसलिए मैं आपसे वर्दी पहनकर भीख मांगने की मंजूरी चाहता हूं.’’

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सचिन वालिया की हत्या के बाद दलित संगठनों में रोष

लखनऊ। सहारनपुर में भीम आर्मी के जिलाध्यक्ष कमल वालिया के भाई सचिन वालिया की हत्या को लेकर दलित संगठन काफी रोष में हैं. घटना के बाद तमाम दलित संगठनों ने हत्यारों की गिरफ्तारी की मांग की है. पूर्व आईपीएस अधिकारी एस. आर. दारापुरी के संगठन जन मंच ने बयान जारी कर यह मांग उठाई है. अपने बयान में उन्होंने कहा है कि सचिन वालिया को शहर से सटे गाँव रामनगर में 4 लोगों ने उस समय सीने में गोली मार दी गयी जब वह दुकान पर सामन ले रहा था और महाराणा प्रताप जयंती का जुलूस पास से गुज़र रहा था. इस घटना से पहले भीम आर्मी के सदस्यों को देख लेने की लगातार धमकियाँ मिल रही थीं.

पिछले साल भी महराणा प्रताप जयंती के अवसर पर ही शब्बीरपुर के दलितों पर राजपूतों द्वारा हमला किया गया था जिसमें दलितों के 60 घर जला दिए गये थे तथा 20 दलित बुरी तरह से ज़ख़्मी हुए थे. इस मामले में भी पुलिस ने हमलावरों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाही न करके 7 राजपूतों सहित 7 दलितों को भी गिरफ्तार कर लिया था तथा दो दलितों पर रासुका भी लगा दिया था जो अभी तक जेल में हैं.

यह भी उल्लेखनीय है कि एक तरफ योगी तथा उसके मंत्री दलितों को लुभाने के लिए उनके घर जा कर भोजन करने का नाटक करते हैं और योगी आंबेडकर महासभा के स्वयम्भू अध्यक्ष लालजी निर्मल से “दलित मित्र” का सम्मान प्राप्त करते हैं, वहीं दूसरी ओर उनके समर्थक राजपूत दलितों को गोली मार कर हत्यायें कर रहे हैं. यह बड़े दुःख की बात है उत्तर प्रदेश में सामंती तत्वों का मनोबल चरम पर है क्योंकि मुख्यमंत्री स्वयं सामंती ताकतों के सरगना हैं. योगी आदित्यनाथ पहले हिन्दू युवा वाहिनी के सामंती गुंडों के सरगना थे और अब मुख्यमंत्री के तौर पर राजपूत सामंतों को संरक्षण दे रहे हैं. भीम आर्मी के नेताओं पर रासुका लगाकर जेल में बंद रखना और अब उनकी हत्या करवाना एक रणनीति है, ताकि अन्याय के विरुद्ध कोई आवाज़ न उठ सके. यही रणनीति 2 अप्रैल के बंद के बाद भी अपनाई गयी है.

अतः जनमंच मांग करता है कि सचिन के चारों हत्यारों को तुरंत गिरफ्तार किया जाये, सचिन के परिवार वालों को 20 लाख का मुयाव्ज़ा दिया जाये तथा सरकारी और गैर सरकारी तौर पर किये जा रहे दलित दमन पर रोक लगाई जाये.

एस.आर.दारापुरी, पूर्व आई.जी. एवं संयोजक जन मंच

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डॉलर के सामने क्यों थरथर कांप रहा है रुपया

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-डॉलर के मुक़ाबले रुपये में कमज़ोरी जारी -पिछले एक महीने में सवा दो रुपये से अधिक टूटा रुपया -रुपया 15 महीने के सबसे निचले स्तर पर -कच्चे तेल में उबाल ने बिगाड़ी रुपये की चाल

अगस्त 2013, जगह- लोकसभा, नेता- सुषमा स्वराज “इस करेंसी के साथ देश की प्रतिष्ठा जुड़ी होती है और जैसे-जैसे करेंसी गिरती है, तैसे-तैसे देश की प्रतिष्ठा गिरती है…..”

तब लोकसभा में भाजपा की नेता और अब विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने ये भाषण अगस्त 2013 में दिया था और वो रुपये का भाव डॉलर के मुक़ाबले लगातार गिरने और 68 के पार पहुँचने पर वित्त मंत्री पी चिदंबरम के स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं थी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से जवाब की मांग कर रहीं थीं.

अगस्त 2013, जगह- अहमदाबाद, नेता- नरेंद्र मोदी “आज देखिए, रुपये की कीमत जिस तेज़ी से गिर रही है और कभी-कभी तो लगता है कि दिल्ली सरकार और रुपये के बीच में कंपीटीशन चल रहा है, किसकी आबरू तेज़ी से गिरेगी. देश जब आज़ाद हुआ तब एक रुपया एक डॉलर के बराबर था. जब अटलजी ने पहली बार सरकार बनाई, तब तक मामला पहुँच गया था 42 रुपये तक, जब अटलजी ने छोड़ा तो 44 रुपये पर पहुँच गया था, लेकिन इस सरकार में और अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के कालखंड में ये 60 रुपये पर पहुँच गया है.”

नरेंद्र मोदी का ये भाषण पाँच साल पुराना था जब वो गुजरात के मुख्यमंत्री थे. लेकिन उसके बाद से हिंदुस्तान की सियासत में काफ़ी कुछ बदल चुका है, आर्थिक हालात में भी बहुत उठापटक हुई है, लेकिन कभी गिरते रुपये पर मनमोहन सरकार को घेरने वाले ये नेता इन दिनों रुपये में गिरावट को लेकर चुप्पी साधे हुए हैं.

जब मोदी सरकार मई 2014 में दिल्ली में सत्तारूढ़ हुई थी तब डॉलर के मुक़ाबले रुपया 60 के स्तर के आसपास था. लेकिन इसके बाद से कमोबेश दबाव में ही है. पिछले कुछ महीनों से ये दबाव और बढ़ा है और हाल ये है कि लुढ़कते हुए 15 महीने के निचले स्तर पर पहुँच गया है. पिछले एक महीने में डॉलर के मुक़ाबले इसमें 2 रुपये 29 पैसे की गिरावट आई है.

वैसे, रुपये ने अपना सबसे निचला स्तर भी मोदी सरकार के कार्यकाल में ही देखा है. नवंबर 2016 में रुपये ने डॉलर के मुकाबले 68.80 का निचला स्तर छुआ था.

हालांकि डॉलर सिर्फ़ रुपये पर ही भारी हो ऐसा नहीं है. इस साल मलेशियाई रिंगिट, थाई भाट समेत एशिया के कई देशों की करेंसी भी कमज़ोर हुई है.

रुपये की कहानी

एक जमाना था जब अपना रुपया डॉलर को ज़बरदस्त टक्कर दिया करता था. जब भारत 1947 में आज़ाद हुआ तो डॉलर और रुपये का दम बराबर का था. मतलब एक डॉलर बराबर एक रुपया. तब देश पर कोई कर्ज़ भी नहीं था. फिर जब 1951 में पहली पंचवर्षीय योजना लागू हुई तो सरकार ने विदेशों से कर्ज लेना शुरू किया और फिर रुपये की साख भी लगातार कम होने लगी.

1975 तक आते-आते तो एक डॉलर की कीमत 8 रुपये हो गई और 1985 में डॉलर का भाव हो गया 12 रुपये. 1991 में नरसिम्हा राव के शासनकाल में भारत ने उदारीकरण की राह पकड़ी और रुपया भी धड़ाम गिरने लगा. और अगले 10 साल में ही इसने 47-48 के भाव दिखा दिए.

रुपये का क्या है खेल?

रुपये और डॉलर के खेल को कुछ इस तरह समझा जा सकता है. मसलन अगर हम अमरीका के साथ कुछ कारोबार कर रहे हैं. अमरीका के पास 67,000 रुपए हैं और हमारे पास 1000 डॉलर. डॉलर का भाव 67 रुपये है तो दोनों के पास फिलहाल बराबर रकम है.

अब अगर हमें अमरीका से भारत में कोई ऐसी चीज मंगानी है, जिसका भाव हमारी करेंसी के हिसाब से 6,700 रुपये है तो हमें इसके लिए 100 डॉलर चुकाने होंगे.

अब हमारे विदेशी मुद्रा भंडार में बचे 900 डॉलर और अमरीका के पास हो गए 73,700 रुपये. इस हिसाब से अमेरिका के विदेशी मुद्रा भंडार में भारत के जो 67,000 रुपए थे, वो तो हैं ही, भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में जो 100 डॉलर थे वो भी उसके पास पहुंच गए.

इस मामले में भारत की स्थिति तभी ठीक हो सकती है अगर भारत अमरीका को 100 डॉलर का सामान बेचे….जो अभी नहीं हो रहा है. यानी हम इंपोर्ट ज़्यादा करते हैं और एक्सपोर्ट बहुत कम. करेंसी एक्सपर्ट एस सुब्रमण्यम बताते हैं कि इस तरह की स्थितियों में भारतीय रिज़र्व बैंक अपने भंडार और विदेश से डॉलर खरीदकर बाजार में इसकी पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करता है.

रुपये की चाल कैसे तय होती है? करेंसी एक्सपर्ट एस सुब्रमण्यम का कहना है कि रुपये की कीमत पूरी तरह इसकी डिमांड और सप्लाई पर निर्भर करती है. इंपोर्ट और एक्सपोर्ट का भी इस पर असर पड़ता है. हर देश के पास उस विदेशी मुद्रा का भंडार होता है, जिसमें वो लेन-देन करता है. विदेशी मुद्रा भंडार के घटने और बढ़ने से ही उस देश की मुद्रा की चाल तय होती है. अमरीकी डॉलर को वैश्विक करेंसी का रूतबा हासिल है और ज़्यादातर देश इंपोर्ट का बिल डॉलर में ही चुकाते हैं.

रुपया क्यों कमज़ोर?

डॉलर के सामने अभी के माहौल में रुपये की नहीं टिक पाने की वजहें समय के हिसाब से बदलती रहती हैं. कभी ये आर्थिक हालात का शिकार बनता है तो कभी सियासी हालात का और कभी दोनों का ही. दिल्ली स्थित एक ब्रोकरेज़ फर्म में रिसर्च हेड आसिफ़ इक़बाल का मानना है कि मौजूदा हालात में रुपये के कमज़ोर होने की कई वजहें हैं

पहली वजह है तेल के बढ़ते दाम- रुपये के लगातार कमजोर होने का सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल के बढ़ते दाम हैं. भारत कच्चे तेल के बड़े इंपोर्टर्स में एक है. कच्चे तेल के दाम साढ़े तीन साल के उच्चतम स्तर पर हैं और 75 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुँच गए हैं. भारत ज्यादा तेल इंपोर्ट करता है और इसका बिल भी उसे डॉलर में चुकाना पड़ता है.

विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली- विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाज़ारों में अप्रैल में ही रिकॉर्ड 15 हज़ार करोड़ रुपये के शेयर बेचे हैं और मुनाफ़ा डॉलर में बटोरकर अपने देश ले गए. अमरीका में बॉन्ड्स से होने वाली कमाई बढ़ी- अब अमरीकी निवेशक भारत से अपना निवेश निकालकर अपने देश ले जा रहे हैं और वहाँ बॉन्ड्स में निवेश कर रहे हैं.

रुपया गिरा तो क्या असर?

सवाल ये है कि डॉलर के मुक़ाबले रुपया इसी तरह गिरता रहा तो हमारी सेहत पर क्या असर होगा.

करेंसी एक्सपर्ट सुब्रमण्यम के मुताबिक सबसे बड़ा असर तो ये होगा कि महंगाई बढ़ सकती है. कच्चे तेल का इंपोर्ट होगा महंगा तो महंगाई भी बढ़ेगी. ढुलाई महंगी होगी तो सब्जियां और खाने-पीने की चीज़ें महंगी होंगी. इसके अलावा डॉलर में होने वाला भुगतान भी भारी पड़ेगा. इसके अलावा विदेश घूमना महंगा होगा और विदेशों में बच्चों की पढ़ाई भी महंगी होगी.

रुपये कि कमज़ोरी से किसे फ़ायदा?

तो क्या रुपये की कमज़ोरी से भारत में किसी को फायदा भी होता है? सुब्रमण्यम इसके जवाब में कहते हैं. “जी बिल्कुल. ये तो सीधा सा नियम है, जहाँ कुछ नुकसान है तो फ़ायदा भी है. एक्सपोर्टर्स की बल्ले-बल्ले हो जाएगी….उन्हें पेमेंट मिलेगी डॉलर में और फिर वो इसे रुपये में भुनाकर फ़ायदा उठाएंगे.” इसके अलावा जो आईटी और फार्मा कंपनियां अपना माल विदेशों में बेचती हैं उन्हें फ़ायदा मिलेगा.

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साभार बीबीसी