सहारनपुर। 9 मई को सहारनपुर में भीम आर्मी के जिलाध्यक्ष के भाई सचिन वालिया की हत्या के बाद वहां सबकुछ ठीक नहीं है. सचिन का अंतिम संस्कार हो चुका है. लेकिन उसके बावजूद सहारनपुर में तनाव कायम है. जगह-जगह पुलिस बल और आम जनता का जमघट साफ दिख जाता है. लोगों के गुस्से और दबाव के बाद सचिन की हत्या के बाद चार अभियुक्तों पर एफआईआर भी दर्ज कर ली गई है. एफआईआर में उस शेर सिंह राणा का नाम भी दर्ज है, जिसमें फूलन देवी की हत्या की थी.
इससे पहले पोस्टमार्टम के बाद सचिन का शव गांव में आते ही जैसे मातम फूट पड़ा था. अंतिम संस्कार के समय हाथों में नीले और पंचशील झंडों के साथ सचिन के हत्यारों को फांसी देने की मांग करने वाले युवाओं की मुट्ठियां गुस्से में लहरा रही थी. सचिन को अंतिम विदाई देने के लिए जैसे सहारनपुर का पूरा बहुजन समाज उमड़ गया था, तो जिले के आस-पास के अम्बेकरवादी भी पहुंचे थे.
सचिन की हत्या उस जगह से थोड़ी दूरी पर हुई जहां महाराणा प्रताप की जयंती का कार्यक्रम चल रहा था. भीम आर्मी के लोग महाराणा प्रताप की जयंती का कार्यक्रम मनाने का विरोध कर रहे थे. क्योंकि पिछले महीने ही 14 अप्रैल को शहर में अम्बेडकर जयंती का कार्यक्रम मनाने की अनुमति नहीं दी गई थी. घटना के बाद अब स्थानीय प्रशासन में मौजूद लोग सरकार के दबाव में आकर महाराणा प्रताप की जयंती मनाने की अनुमति देने की बात को स्वीकार कर रहे हैं.
सचिन की हत्या को लेकर भीम आर्मी के समर्थक पुलिस कप्तान के उस बयान से बेहद नाराज हैं, जिसमें तमंचा साफ करते हुए गोली चल जाने की संभावना जताई जा रही है. मृतक के भाई कमल वालिया ने पुलिस के इन नजरिये पर सवाल उठाया है कि क्या कोई गोली भर कर अपनी बंदूक साफ करता है?
फिलहाल पुलिस ने घटना के बाद से लेकर अब तक शहर का इंटरनेट बंद कर रखा है. शहर में एक अजीब सी खामोशी पसरी हुई है, हालांकि सहारनपुर की घटना सिर्फ सहारनपुर तक ही नहीं सिमटी है. इससे देश भर के अम्बेडकरवादी युवाओं में जबरदस्त गुस्सा है. सोशल मीडिया पर सचिन की हत्या के खिलाफ 20 मई को जंतर- मंतर पर पहुंचने का कैंपेन चल रहा है.
इसमें देश भर से युवाओं को दिल्ली के जंतर मंतर पहुंचने का आवाहन किया जा रहा है. युवाओं को बुलाने वाला कोई संगठन नहीं है. 2 अप्रैल के बाद दलितों को अपनी ताकत का अहसास हुआ है. अगर 20 मई को दलित समाज के युवाओं का हुजूम जंतर मंतर पहुंच गया तो कहीं यह घटना अत्याचार के खिलाफ दलितों के एक नए आंदोलन का आगाज न बन जाए
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