ममता ने सुझाई नई तरकीब, लोकसभा चुनाव में भाजपा के सामने होगा एकजुट विपक्ष

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कोलकाता। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के वरिष्ठ नेता उमर अब्दुल्ला के साथ मुलाकात की और कहा कि अगले लोकसभा चुनावों के लिए संभावित विपक्षी मोर्चा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर किसी का भी नाम नहीं चुना जाना चाहिए।

ममता ने कहा कि पीएम उम्मीदवार का नाम नहीं चुनकर हम भाजपा का सामना ज्यादा मजबूती से कर सकते हैं। जबकि पीएम उम्मीदवार का नाम बताना भाजपा से लड़ने की क्षेत्रीय पार्टियों की एकजुटता को विभाजित कर देगा।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भाजपा विरोधी क्षेत्रीय पार्टियों को साथ आना चाहिए और उन्हें देश के फायदे के लिए बलिदान देना चाहिए।

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PM बनने के लिए इमरान को छोटे दलों और निर्दलीयों की जरूरत

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इस्लामाबाद। क्रिकेटर से राजनेता बने इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पी.टी.आई.) देश के संसदीय चुनाव में अकेली सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। कुल 270 सीटों के लिए चुनाव हुआ था जिनमें से इमरान की पार्टी पी.टी.आई. ने 114 सीटें जीती हैं, हालांकि वह बहुमत से दूर है और उसे सरकार बनाने के लिए छोटे दलों व निर्दलीयों के समर्थन की जरूरत पड़ेगी। चुनाव आयोग ने नैशनल असैंबली की 261 सीटों के परिणाम शुक्रवार को घोषित किए। दूसरे नंबर पर जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पी.एम.एल.-एन) है जिसने 62 सीटें जीती हैं।

वहीं पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पी.पी.पी.) ने 43 सीटें जीती हैं जबकि निर्दलीय उम्मीदवारों को 12 सीटें ही मिलीं। पाकिस्तान की नैशनल असैंबली में कुल 342 सदस्य होते हैं जिनमें से 272 सीधे चुने जाते हैं। कोई भी पार्टी कुल 172 सीटें प्राप्त करके सरकार बना सकती है। जमात-ए-इस्लामी जैसे धार्मिक दलों के गठबंधन मुत्ताहिदा मजलिस-ए-अमाल (एम.एम.ए.) ने 12 जबकि पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री परवेज इलाही की पाकिस्तान मुस्लिम लीग ने 5 सीटें जीती हैं। कराची की मुत्ताहिदा कौमी मूवमैंट (एम.क्यू.एम.) को सबसे कम सीटें मिली हैं। उसे कराची में 20 में से महज 6 सीटें मिली हैं।

प्रांतीय विधानसभाओं में पी.एम.एल.-एन पंजाब में आगे है जहां की 297 सीटों में से 127 सीटें जीतकर वह प्रांत की सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। हालांकि पार्टी बहुमत से दूर है। पी.टी.आई. को 123 सीटें मिली हैं और उसकी निर्दलीयों के साथ बातचीत चल रही है जिनमें से अधिकतर ने चुनाव से पहले पी.एम.एल.-एन. से अलग होकर निर्दलीय चुनाव लड़ा था। निर्दलीय उम्मीदवारों को 29 सीटें मिली हैं जो पंजाब में सरकार बनाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। इमरान की सहयोगी पी.एम.एल.-क्यू को प्रांत में 7 सीटें मिली हैं। 297 सदस्यीय सदन में सरकार बनाने के लिए 149 सीटें जीतने की जरूरत है। पी.टी.आई. ने पंजाब में भी सरकार बनाने की पहले ही घोषणा कर दी है। इस कदम से खरीद-फरोख्त के आरोप लग सकते हैं। सिंध प्रांत में पी.पी.पी. को स्पष्ट बहुमत मिला है। उसने सदन की 131 सीटों में से 74 पर जीत दर्ज की है। पी.टी.आई. 22 सीटें जीतकर दूसरे स्थान पर है।

वहीं एम.क्यू.एम. ने 16 सीटें जीती हैं। पी.टी.आई. ने 99 सदस्यीय खैबर पख्तूनख्वा विधानसभा में 66 सीटें जीतकर दो-तिहाई बहुमत हासिल किया है। वहीं एम.एम.ए. 10 सीटें जीतकर दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है। नवगठित बलूचिस्तान अवामी पार्टी (बी.ए.पी.) 13 सीटों के साथ बलूचिस्तान विधानसभा में शीर्ष पर है। हालांकि 51 सदस्यीय विधानसभा में बी.ए.पी. बहुमत नहीं प्राप्त कर पाई। एम.एम.ए. 9 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर है। बलूचिस्तान नैशनल पार्टी और निर्दलीयों को 5-5 सीटें मिली हैं। पी.टी.आई. ने 4 सीटें जीती हैं।

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छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने दिया बसपा को सीटों का ऑफर

नई दिल्ली। कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी के बीच लगातार खिंचती जा रही गठबंधन की चर्चा के बीच प्रदेश यूनिट ने बसपा को 5 सीटों का ऑफर दिया है. प्रदेश में कांग्रेस के चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष चरण दास महंत ने इस बारे में मीडिया को जानकारी दी है. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि आखिरी फैसला पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को करना है. कांग्रेस की ओर से यह बयान तब दिया गया है, जब बसपा प्रमुख मायावती ने गठबंधन पर साफ कहा है कि बसपा गठबंधन तभी करेगी जब उसे सम्मानजनक सीटें मिलेगी.

इस बीच 30 जुलाई को छत्तीसगढ़ में गठबंधन की चर्चा को लेकर बसपा और कांग्रेस के नेता आपस में बैठक करेंगे. इस बैठक में बसपा की ओर से पार्टी के प्रदेश प्रभारी एम.एल भारती शामिल होंगे. भारती कांग्रेस के प्रदेश स्तर के नेताओं के साथ सीटों को लेकर अपना दावा जताएंगे. इस बैठक के बाद बसपा के प्रभारी भारती बसपा प्रमुख को बैठक के बारे में सूचना देंगे, साथ ही प्रदेश में पार्टी के ग्राउंड रिपोर्ट के बारे में बताएंगे, जिसके बाद आखिरी फैसला बसपा प्रमुख करेंगी.

गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में बसपा का वोट प्रतिशत पांच फीसदी है. जिसके बूते पर प्रदेश में गेम चेंजर की भूमिका निभा सकती है. अब देखना है कि 30 जुलाई के बैठक के बाद क्या नतीजा निकलता है, क्योंकि अब दोनों दलों को गठबंधन पर आखिरी फैसला जल्द लेना होगा.

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09 अगस्त का भारत बन्द : कहीं ये राजनीतिक उपक्रम ही तो नहीं?

भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह व भारत के प्रधान सेवक अपनी किसी भी सभा में यह कहने से नहीं चूकते कि भाजपा दलितों के साथ है। किंतु वर्तमान भाजपा सरकार द्वारा बजरिए सुप्रीम कोर्ट अनुसूचित जाति (एससी)/अनुसूचित जनजाति (एसटी) अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 को कमजोर करा दिया गया। कहनेको ये सुप्रीम कोर्ट का फैसला कहा जा रहा है।  और जब 02 अप्रैल 2018 को भाजपा के इस पराक्रम के खिलाफ दलितों/ओबीसी/अल्पसंख्यकों  द्वारा सामूहिक आन्दोलन किया गया तो इसी भाजपा सरकार ने दलितों/ओबीसी/अल्पसंख्यकों के अनेक नौजवानों को झूटे मामले बनाकर जेलों में ठूंस दिया गया। बहुत से तो आज तक जेल की सलाखों के पीछे हैं।
भाजपा के दो ही कर्णधार हैं जो बारबार यह आश्वासन देने से नहीं चूकते कि केंद्र सरकार दलित समुदाय के प्रत्येक अधिकार की रक्षा करेगी। भाजपा प्रमुख ने एक साथ कई ट्वीट करते हुए कहा, ‘सरकार दलितों के प्रत्येक अधिकार की रक्षा करेगी और उनकी आकांक्षाओं को पूरा करना जारी रखेगी।….’ किंतु धरातल पर उनकी घोषणा के विपरित ही काम हो रहे हैं। काफी शोरशराबे के बाद माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एससी/एसटी एक्ट पर आदेश देने के दिन से ही केंद्र सरकार तत्काल और सजगता के साथ सक्रिय तो हो गई। और आनन-फानन में सुप्रीम कोर्ट में समीक्षा की गुहार कर डाली किंतु सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मसले को ठंडे बस्ते में ही डाल दिया गया। हुआ यूँ कि समाज में दलितों/ओबीसी/अल्पसंख्यकों के खिलाफ और भी भयावह घटनाएं घटने लगीं हैं।
अमित शाह का ये कहना कि सरकार द्वारा एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम  में संशोधन कर वास्तव में उसे और शक्ति प्रदान की है, किसी अत्यंत ही भद्दे मजाक से कम नहीं है। कमाल की बात तो ये भी है कि सुप्रीम कोर्ट के जिस जज आदर्श गोयल ने ‘उदय ललित’ के साथ मिलकर SC,ST एक्ट को बर्बाद कर दिया, उसे सेवा निवृत्त होते ही  नरेंद्र मोदी सरकार ने ‘नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल’ के चेयरमैन जैसे मालदार पद पर अगले पांच साल के लिए बैठा दिया। फिर ये कैसे मान लिया जाय कि एस सी/एस टी एक्ट को कमजोर करने में मोदी सरकार का हाथ नहीं है? क्या इसके बाद भी SC-ST को आगामी चुनावों अपनी भूमिका तय नहीं करनी चाहिए? कहने को तो भाजपा डॉ. भीमराव अंबेडकर के सपने को पूरा करने को भाजपा की प्रतिबद्धता बताती है पर करती कुछ नहीं।
आगे चलने से पूर्व हम जानने की कोशिश करते हैं कि आखिर अनुसूचित जाति (एससी)/अनुसूचित जनजाति (एसटी) अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 है क्या। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम को 11 सितम्बर 1989 में भारतीय संसद द्वारा पारित किया गया था, जिसे 30 जनवरी 1990 से सारे भारत (जम्मू-कश्मीर को छोड़कर) में लागू किया गया था। यह अधिनियम उस प्रत्येक व्यक्ति पर लागू होता है जो अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं है तथा वह व्यक्ति इस वर्ग के सदस्यों का उत्पीड़न करता है। इस अधिनियम में 5 अध्याय एवं 23 धाराएं हैं। यह कानून अनुसूचित जातियों और जनजातियों में शामिल व्यक्तियों के खिलाफ अपराधों को दंडित करता है। यह पीड़ितों को विशेष सुरक्षा और अधिकार देता है। इसके लिए विशेष अदालतों की भी व्यवस्था होती है। यह है संक्षिप्त हवाला अनुसूचित जाति (एससी)/अनुसूचित जनजाति (एसटी) अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 का।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के उपरांत भाजपा सरकार में मंत्री पद पर विराजमान दलित नेता पासवान ने यह कहकर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री करली कि सरकार अनुसूचित जाति (एससी)/अनुसूचित जनजाति (एसटी) अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 को पुन: अपने प्राथमिक रूप में बनाए रखने के लिए ‘अध्यादेश’ लाएगी। किंतु अभी तक तो ऐसा कुछ हुआ नहीं है। इतना ही नहीं पासवान ने जेलों में बन्द दलितों की रिहाई के लिए एक बयान तक भी जारी नहीं किया।
और अब जबकि लोकसभा के चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं तो पासवान अपने बेटे चिराग पासवान को आगे करके व अन्य दलित सांसदों को बैसाखी बनाकर अपनी राजनीतिक जमीन को पुख्ता करने का पैंतरा चलने पर उतर आए हैं। मुझे याद आ रहा है कि एक बार लालू प्रसाद यादव ने रामविलास पासवान के बारे में कहा था कि आज के राजनीतिक माहौल में बहुत से राजनेता मौसम वैज्ञानिक बनकर उभरे हैं जो जिस मौसम को अपने हक में समझते हैं, उसी की ओर हो लेते हैं। रामविलास पासवान उनमें सबसे शीर्ष पर हैं। वही पासवान फिलहाल अपने बेटे चिराग पासवान को आगे करके लालू यादव के मत की पुष्टी कर रहे हैं। उनकी चहेती खरपतवार संस्थाएं भी उनकी हाँ में हाँ मिलाने पर उतर आई हैं। 09.08.2018 को राजनीतिक “भारत बन्द” में भाग लेने को ललायित हैं।
दैनिक जागरण : 27.07.2018 के अनुसार, “एससी-एसटी एक्ट मामले में अध्यादेश लाने को लेकर विपक्ष के साथ-साथ राजग सहयोगी लोजपा की ओर से दबाव तो बढ़ रहा है, लेकिन सरकार कोर्ट का इंतजार करेगी। दरअसल, सरकार ऐसा कोई संकेत देना नहीं चाहती कि वह कोर्ट को खारिज कर रही है। चुनावी माहौल में अब सरकार पर दूसरी तरह से दबाव बनाया जा रहा है। दो दिन पहले लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) की ओर से एनजीटी अध्यक्ष के रूप में जस्टिस आदर्श कुमार गोयल की नियुक्ति का विरोध किया गया था। उसका कहना था कि उन्होंने ही एससी-एसटी एक्ट को कमजोर किया था और उनकी एनजीटी में नियुक्ति से गलत संदेश जाता है। गुरुवार को लोकसभा में भी विपक्ष की ओर से यह मुद्दा उठाकर सरकार को घेरने की कोशिश हुई।
कांग्रेस नेता मल्लिकाजरुन खड़गे और अन्य सदस्यों ने आरोप लगाया कि सरकार गोयल को पुरस्कृत कर रही है। सदन में मौजूद केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान भी कुछ बोलने की कोशिश करते दिखे। हालांकि उन्होंने ऐसा किया नहीं। बल्कि वह विपक्ष के एक सांसद और संसदीय कार्य राज्यमंत्री अजरुन राम मेघवाल से बातचीत करते देखे गए। खड़गे ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) का मुद्दा भी उठाया जिसके तहत नियुक्ति में विश्वविद्यालय के बजाय विभाग को यूनिट माना जा रहा है। उन्होंने इसे भी दलित विरोधी बताया। वहीं, संसदीय कार्यमंत्री अनंत कुमार की ओर से साफ किया गया कि सरकार ने पहले ही यूजीसी के निर्देश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दे दी है क्योंकि यह कोर्ट के आदेश पर ही हुआ था। उन्होंने आरक्षण को लेकर भी सरकार के संकल्प को दोहराया। वहीं, सूत्रों की मानें तो सरकार कोर्ट को एक मौका देना चाहती है। वैसे भी इस मामले पर सुनवाई के लिए अब नई पीठ बननी है। ऐसे में थोड़ा विलंब हो सकता है।”
“ऐसे में थोड़ा विलम्ब हो सकता है।” से सिद्ध होता है कि रामविलास पासवान और उनके सहयोगियों की 09.08.2018 को भारत बन्द की घोषणा नितांत राजनीति से प्रेरित है। यह भी कि 09.08.2018 का भारत बन्द यदि होता है तो 02.04.2018 को आयोजित बन्द से निम्नतर ही होगा क्योंकि वह आन्दोलन पूरी तरह से एक सामाजिक आन्दोलन था और 09.07.2018 को बुलाया गया भारत बन्द का आयोजन न केवल पूरी तरह राजनीतिक है अपितु इसके वाहक दलित सांसद और दलित संस्थाएं भाजपा को अपनी शक्ति दिखाकर अपनी-अपनी सीटें पक्की करने का उपक्रम कर रहे हैं। अन्यथा 02.04.2018 के भारत बन्द पर इस सांसदों ने कोई टिप्पणी क्यों नहीं की थी? खेद की बात है कि जब ये सांसद 02.04.2018 के आन्दोलन को विपक्षी दलों की साजिश मानकर बैठे हुए थे। आज चिराग पासवान कहते है कि सरकार 09.08.2018 के भारत बन्द को विपक्ष की साजिश न समझे। और जिस जस्टिस गोयल ने एससी/एसटी एक्ट को लेकर फैसला दिया था, उसके खिलाफ दलितों में गोयल को एनजीटी चेयरमैन बनाए जाने को लेकर गुस्सा है और इसको लेकर 9 अगस्त को होने वाला दलितों का विरोध प्रदर्शन 2 अप्रैल से भी ज्यादा आक्रामक होगा।
अब माँग की गई है कि ए. के. गोयल को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के चेयरमैन पद से तुरंत बर्खास्त किया जाय तथा संसद के इसी मानसून सत्र में SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ संशोधित बिल लाया जाए, जिसमें अनुसूचित जाति और जनजातिय की सुरक्षा को फिर से बहाल किया जा सके। अगर इसमें किसी भी तरह की अड़चन आती है, तो संसद के सत्र को 10 अगस्त की जगह आठ अगस्त को समाप्त कर इस पर अध्यादेश लाया जाए। किंतु मेरी नजर में यह कतई भी संभव नहीं है क्योंकि सरकार पहले से ही कोर्ट को और समय देने का मन बना चुकी है।
हाँ! इतना जरूर है कि इस प्रकार की आवाज उठाने वाले ये मानने लग गए है कि लोकसभा चुनाव से पहले मोदी सरकार बीच मझधार में फंस गई है। इस मसले को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की चिंता बढ़ गई है। इसकी वजह यह है कि इस मुद्दे पर मोदी सरकार द्वारा किसी भी तरह का कदम ठीक नहीं है, क्योंकि यह मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।….. किंतु ऐसा लगता नहीं कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधान सेवक की समाज विरोधी सोच जगजाहिर है। इसलिए  इस प्रकार की चेतावनी का कोई प्रभाव पड़ेगा। इसके अलावा ए. के. गोयल को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के चेयरमैन पद से हटाने की मांग को मानना भी मोदी सरकार के लिए आसान नहीं है। वह इसलिए क्योंकि अगर सरकार ऐसा करती है, तो यह संदेश जाएगा कि सरकार ने अपने घटक दल के दबाव में आकर ऐसा फैसला लिया है।
सारांशत: मुझे तो लगता है कि मनुवादियों के गुलामों ने प्रेस कांफ्रेंस के जरिये फिर बहुजनों को क्षणिक लालच की जंजीरे पेश करके न केवल उन्हें मूर्ख बनाने की साजिश है, अपितु अपने राजनीतिक हितों को साधने का एक उपक्रम है। मनुवा गुलामो ने प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर फिर से बहुजनोक ो लालच की जंजीर में फंल नहीं होने देंगे । मनुवादियों के गुलामो ने प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर फिर से बहुजनोक ो लालच की जंजीर में फंसाने का षड्यंत् । इसे सफल नहीं होने देंगे ।
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कचरा बीनने वाले के बेटे का बड़ा कारनामा, जानें क्यों देशभर में है चर्चा

काबिलियत किस तरह गरीबी को पछाड़ कर सफलता हासिल करती है। इसकी जीवंत मिसाल हैं मध्यप्रदेश के देवास जिले के आशाराम चौधरी। आशाराम चौधरी एक कचरा बीनने वाले कामगार के बेटे हैं। और उन्होंने भयंकर गरीबी से जूझते हुए अपने पहले ही प्रयास में एम्स की परीक्षा पास की है। इस परीक्षा में उनकी ओबीसी वर्ग में 141वीं रैंक आई थी। अब उनका चयन जोधपुर के एम्स में हो गया है। यहां वह एमबीबीएस की पढ़ाई करेंगे। आसाराम की सफलता की कहानी सुनने के पहले उनके संघर्ष को जानने की कोशिश करते हैं। देवास जिले के विजयागंज मंडी गांव में आशाराम के पिता की घास-फूस की एक झोपड़ी है, जिसमें न तो शौचालय है और न ही बिजली का कनेक्शन। उनकी मां ममता बाई गृहिणी हैं। छोटा भाई सीताराम नवोदय विद्यालय में 12 वीं की पढ़ाई कर रहा है। और उनकी बहन नर्मदा भी नौवीं कक्षा में पढ़ रही है। घर में कमाई का श्रोत सिर्फ आशाराम के पिता है। ऐसे में गरीबी के इस दबाव का सामना करते हुए आशाराम की सफलता कई लोगों के लिए प्रेरणा का केंद्र बन गई है। उन्होंने अपनी सफलता पर खुशी जाहिर करते हुए कहा, ‘एमबीबीएस की पढ़ाई के लिए एम्स में चयनित होने पर मैं इतना खुश हूं कि मैं अपनी खुशी को शब्दों में प्रकट नहीं कर सकता हूं। मेरा अगला सपना है कि मैं न्यूरोसर्जन बनूं।’ 4/ 6 आशाराम ने अपनी इच्छा जाहिर करते हुए कहा, ‘मेरी इच्छा है कि एमबीबीएस के बाद मैं न्यूरोलॉजी में मास्टर ऑफ सर्जरी करूं।’ आशाराम ने कहा, ‘मैं पढ़ाई करने के लिए विदेश नहीं जाऊंगा और न ही वहां जाकर बसूंगा। मैं अपनी पढ़ाई खत्म होने के बाद अपने गांव आकर अपना पूरा जीवन व्यतीत करूंगा।’ उनका कहना है, ‘अपनी पढ़ाई खत्म होने के बाद मैं देवास जिले के अपने गांव विजयागंज मंडी वापस आऊंगा और वहां एक अस्पताल खोलूंगा। ताकि वहां कोई भी व्यक्ति स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित न रहे।’  आशाराम ने अपनी इच्छा जाहिर करते हुए कहा, ‘मेरी इच्छा है कि एमबीबीएस के बाद मैं न्यूरोलॉजी में मास्टर ऑफ सर्जरी करूं।’ आशाराम ने कहा, ‘मैं पढ़ाई करने के लिए विदेश नहीं जाऊंगा और न ही वहां जाकर बसूंगा। मैं अपनी पढ़ाई खत्म होने के बाद अपने गांव आकर अपना पूरा जीवन व्यतीत करूंगा।’ उनका कहना है, ‘अपनी पढ़ाई खत्म होने के बाद मैं देवास जिले के अपने गांव विजयागंज मंडी वापस आऊंगा और वहां एक अस्पताल खोलूंगा। ताकि वहां कोई भी व्यक्ति स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित न रहे।’ आशाराम ने अपनी इच्छा जाहिर करते हुए कहा, ‘मेरी इच्छा है कि एमबीबीएस के बाद मैं न्यूरोलॉजी में मास्टर ऑफ सर्जरी करूं।’ आशाराम ने कहा, ‘मैं पढ़ाई करने के लिए विदेश नहीं जाऊंगा और न ही वहां जाकर बसूंगा। मैं अपनी पढ़ाई खत्म होने के बाद अपने गांव आकर अपना पूरा जीवन व्यतीत करूंगा।’ उनका कहना है, ‘अपनी पढ़ाई खत्म होने के बाद मैं देवास जिले के अपने गांव विजयागंज मंडी वापस आऊंगा और वहां एक अस्पताल खोलूंगा। ताकि वहां कोई भी व्यक्ति स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित न रहे।’ आशाराम ने अपनी प्राथमिक शिक्षा अपने गांव के एक सरकारी स्कूल में हासिल की है। इसके आगे की पढाई उन्होंने देवास जिले के एक स्कूल से की। गरीबी से जूझने के बावजूद एम्स की परीक्षा पास करने वाले आशाराम ने अपने गरीबी के दिनों से जुड़ी भयावह यादें साझा की। उन्होंने कहा, ‘मेरे परिवार की आर्थिक स्थिति बिल्कुल भी अच्छी नहीं है। मेरे पिताजी (रणजीत चौधरी) ने पन्नियां, खाली बोतलें और कचरा बीनकर घर का खर्च चलाया और मुझे और मेरे भाई-बहन को पढ़ाया। लेकिन जब मेरा चयन एम्स के लिए हो गया, तो मैंने उनसे कहा कि अब कचरा बीनने का काम मत करो। हम उनके लिए एक छोटी सी सब्जी की दुकान खोलने की योजना बना रहे हैं।’ आशाराम की इस सफलता पर शासन और प्रशासन भी उनकी सहायता कर रहा है। आशाराम का कहना है कि जोधपुर जाने के लिए टिकट का इंतजाम देवास के कलेक्टर ने किया है। उन्होंने एक अधिकारी भी भेजा है जो आशाराम को जोधपुर तक ले जाएगा। आशाराम ने उनका आभार जताया है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने भी आशाराम को बधाई दी है। (साभार-न्यूज18)
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झारखंड में आदिवासी की मौत, पत्नी ने भूख से मरने का दावा किया

रामगढ़ (झारखंड)। झारखंड के रामगढ़ जिले में 40 वर्षीय आदिवासी व्यक्ति की मौत के बाद उनकी पत्नी ने दावा किया कि भूख के चलते उनकी मौत हुई. पत्नी के अनुसार उसके पास राशन कार्ड नहीं था.

आदिम बिरहोर आदिवासी से ताल्लुक रखने वाले राजेंद्र बिरहोर की बीते 24 जुलाई को मांडू खंड के नवाडीह गांव में मौत हो गई. नवाडीह गांव रामगढ़ से 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है.

बहरहाल, जिला प्रशासन के अधिकारियों ने भूख से मौत होने की बात से इनकार किया है और कहा कि बिरहोर की मौत बीमारी के चलते हुई है.

बिरहोर की पत्नी शांति देवी (35) ने बताया कि उसके पति को पीलिया था और उसके परिवार के पास इतना पैसा नहीं था कि वे उसके लिये डॉक्टर द्वारा बताया गया खाद्य पदार्थ और दवाई खरीद सकें.

शांति ने बताया कि उसके परिवार के पास राशन कार्ड नहीं था जिससे वे राज्य सरकार की सार्वजनिक वितरण योजना के तहत सब्सिडी वाले अनाज प्राप्त कर पाते.

छह बच्चों के पिता बिरहोर परिवार में एकमात्र कमाने वाले सदस्य थे. उन्हें हाल में यहां के राजेंद्र इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में भर्ती कराया गया था. इलाज के बाद उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई थी.

मांडू के खंड विकास अधिकारी (बीडीओ) मनोज कुमार गुप्ता ने आदिवासी व्यक्ति की भूख से मौत की बात से इनकार किया है.

उन्होंने 26 जुलाई को बिरहोर के घर का दौरा किया और दावा किया कि बिरहोर की मौत बीमारी के चलते हुई.

बीडीओ ने स्वीकार किया कि परिवार के पास राशन कार्ड नहीं था.

उन्होंने शांति देवी को अनाज और परिवार के लिए 10,000 रुपये दिए. उन्होंने कहा, ‘हम इस बात की जांच कर रहे हैं कि उनके परिवार का नाम सरकार की ओर से दी जाने वाली सब्सिडी युक्त राशन पाने वालों की सूची में क्यों नहीं दर्ज था.’

भोजन का अधिकार अभियान की ओर से जारी एक विज्ञप्ति में कहा गया है कि एक वर्ष पहले कमज़ोरी के कारण राजेंद्र बिरहोर काम करना छोड़ दिए थे. उनकी पत्नी को सप्ताह में 2-3 दिनों का ही काम मिल पाता था. पिछले एक साल में परिवार की आमदनी में गिरावट के कारण राजेंद्र बिरहोर, उनकी पत्नी और छह बच्चे पर्याप्त पोषण से वंचित थे. परिवार को मनरेगा में आखरी बार 2010-11 में काम मिला था. उन्हें आदिम जनजातियों को मिलने वाली सामाजिक सुरक्षा पेंशन की 600 रुपये प्रति माह की राशि भी नहीं मिलती है. प्रखंड विकास पदाधिकारी इस योजना के विषय में अवगत भी नहीं थे.

विज्ञप्ति के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट आदेश दिया है कि ‘आदिम जनजाति’ समुदाय- जिसका हिस्सा बिरहोर समुदाय है- को अन्त्योदय अन्न योजना अंतर्गत प्रति माह 35 किलो राशन का हक़ है. साथ ही, झारखंड के आदिम जनजाति समुदाय के परिवारों को उनके घर पर नि:शुल्क राशन मिलना है.

साभार-द वायर

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लोकसभा चुनावः सियासी गठजोड़ की कवायद शुरू, शरद पवार ने की मायावती से मुलाकात

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) प्रमुख शरद पवार और बसपा सुप्रीमो मायावती के बीच यहां ” रिश्तों की तल्खी खत्म करने के लिए हुई बैठक से दोनों दलों के बीच गठबंधन होने की संभावना जताई जाने लगी है। पवार ने कल मायावती और उनके निकट सहयोगी सतीश चंद्र मिश्रा से मुलाकात की थी।

बसपा ने हालांकि इस पर चुप्पी साध रखी है लेकिन पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि करीब एक घंटे चली बैठक का उद्देश्य ” रिश्तों की तल्खी खत्म करना था। इससे पहले मायावती ने महाराष्ट्र में राकांपा के साथ गठबंधन के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। इस बार चीजें अलग थीं और बैठक सकारात्मक रही क्योंकि दोनों दल भाजपा का मुकाबला करने के लिए 2019 चुनावों की तैयारियां कर रहे हैं। रामदास अठावले नीत रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई) का कांग्रेस – राकांपा के साथ काफी समय तक गठबंधन रहा था और महाराष्ट्र के दलित समुदाय के बीच उनकी अच्छी पहुंच है। आरपीआई अब भाजपा के साथ गठबंधन में है। सूत्रों ने बताया कि बसपा के साथ गठबंधन से राकांपा को महाराष्ट्र और खासकर विदर्भ क्षेत्र में फायदा मिल सकता है।

सभार-हिन्दुस्तान

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भीड़ की सियासत! किस ओर जा रहा है विश्व गुरु।

जब एपीजे अब्दुल कलाम देश के राष्ट्रपति थे जो स्वयं एक प्रख्यात वैज्ञानिक भी रहे हैं और जो मिसाइल मैन के नाम से विख्यात थे,उन्होंने विजन 2020 किताब के माध्यम से भारत को सन् 2020 तक एक महा शक्ति बनाने का सपना देखा था।महाशक्ति केवल परमाणु अस्त्रों या मिसाइल बनाकर,या शैन्य शक्ति को मजबूत बनाकर ही नहीं वरन भारत की उन तमाम समस्याओं से पार पाकर देश को आत्मनिर्भर बनाने की ,विकाशसील भारत नहीं वरन विकसित भारत बनाने की कल्पना की थी।जिन विकट समस्याओं से देश आजादी से पूर्व तथा आजादी के 70 सालों तक जूझ रहा है।“भ ”से भजन और भगवान का पाठ पढने वाले देश में आज भ से भीड हिसा़ पर व्यापक चिंता हो रही है और चर्चा भी हो रही है।इस भीड़ तंत्र के शोर-शराबे में भूख से मरने वाले इंसानों की कोई चीत्कार सुनाई नहीं देती है।

भीड़ भी देश की है और मरने वाले भी देश के ये अजीब किस्म का नजारा देश में अशांति फैलाने का काम कर रहा है।गॉंधी जी ने कहा है कि पाप से घृणा करो पापी से नहीं।हमको मॉंब लिचिंग पर शक्त कानून तो अवश्य ही बनाना चाहिएं मगर किसी भी घटना के घटित होने के पीछे कुछ न कुछ कारण और कारक जरुर होते हैं उनको भी जानान आवश्यक हो जाता है।जिस प्रकार अलग-अलग वायरस कंप्यूटरों पर अटैक कर उनको खराब कर देता है उसी प्रकार हिंदूस्तान में भी तीन प्रकार के वायरस सक्रिय हैं-पहला अंधविश्वास का वायरस,दूसरा धर्म तथा जातिवाद का वायरस और तीसरा राजनीति का वायरस। जिस प्रकार देश में भीड़ द्धारा या अन्य कारणों से हिंसा होती है उन हिंसाओं के पीछे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से ये कारण छुपे होते हैं।और ये सभ्य और सुशिक्षित समाज के आंखों में पटटी बांध देते है।सिर्फ कानून बनाकर ही बुराइयों और समस्याओं का समाधान नहीं हो जाता इसके कई उदाहरण हमारे पास है

यहॉं तक की संपत्ति रखने का अधिकार भी मूल अधिकार की श्रेणी से 42वें संविधान संशोधन द्धारा हटाया गया है मगर आज देश में पूॅंजी पतियों तथा पूॅंजीरहित लोगों के बीच में कितना लंबा फासला है किसी से छुपा नहीं है।अस्पृश्यता निवारण के लिए भी शख्त कानून है,दहेज उत्पीड़न के लिए भी शख्त कानून है,मगर इन कानूनों के बावजूद भी घटनायें लगातार घट रही है।यहॉं तक की हमारे पास शिक्षा का अधिकार कानून भी है मगर शत-प्रतिशत शिक्षित भारत अभी तक नहीं बन पाया है।विजन 2020 के बाद सन् 2025 तक भारत को विश्व गुरु बनाने का भी सपना हमने देखा है।इस कडी़ में प्रधानमंत्री मोदी जी ने मोर्चा संभाला है और इलेक्टा्रनिक समाज और डिजिटल भारत के निर्माण की ओर पहल की है।जिसमें डिजिटल इंडिया को प्रमुखता दी है।लड़खडाते गरीब के कदमों ,दम तोड़ रहे किसानों और करोडों़ बेरोजगारों की फौज के बावजूद भी देश स्मार्ट सिटि में तब्दील होने को है।

बुलेट ट्रेन देर सबेर देश में दौडने वाली है और मेकइन इंडिया से से भारत यांत्रिकी में अग्रसर होगा ऐसी उम्मीद की जा सकती है।ये सभी कदम और योजनायें वास्तव में भारत को विश्व गुरु बनाने में अवश्य ही मील का पत्थर साबित हो सकते थे।मगर आजकल देश में कुछ और ही नजारा दिख रहा है।जहॉं हमको न्यूइंडिया की नींव को मजबूत करना था वहॉं हिंदू और मुसलमान की नींव को और गहरा किया जा रहा है।जहॉं हमको समतामूलक समाज की नींव को मजबूत करना था जातियों को मजबूत किया जा रहा हैं।पहले ही भ्रमित और अंधविश्वास से लोग जकडे़ हुए हैं।कभी किसी को डायन का रुप बताकर मार दिया जाता है।,हाल ही दिल्ली में एक ही परिवार के 11 लोगों का अंधविश्वास के कारण आत्म हत्या कर लेना ताजा उदाहरण है।लगता है देश के लोग मृग मरीचिका का शिकार होने लगे हैं।जिस प्रकार रेगिस्तान के जानवर रेत के ढेर को पानी का तालाब समझ बैठते हैं और उसकी ओर तेजी से भागने लगते हैं।

भीड़ की इस मरीचिका को सिर्फ कानून बनाकर खत्म नहीं किया जा सकता है हॉं कुछ कमी जरुर लायी जा सकती है। आज जरुरत है अंधविश्वास पर चोट करने की,वैज्ञानिक सोच पैदा करने की,जाति,संप्रदाय से उठ कर सत्यम् शिवम सुन्दरम् और बशुधैव कुटंबकम् की भावना को विकसित करना होगा।हमको स्मरण करना होगा कि हिन्दुस्तान हमेशा इतिहास का केन्द्र विन्दु रहा है।तथा प्रसिद्ध विद्धान और प्राचीन इतिहासकार मैक्समूलर के इन शब्दों को स्मरण करना चाहिए-मैक्समूलर ने 1882 में कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में व्याखान दिया जिसमें उन्होंने भारत की इन शब्दों में प्रशंसा की है-”अगर हम सारी दुनियॉं की खोज करें ऐसे मुल्क का पता लगाने के लिए कि जिसे प्रकृति ने सबसे संपन्न,शक्तिवाला और सुन्दर बनाया है-जो कुछ हिस्सों में धरती पर स्वर्ग की तरह है-तो मैं हिन्दुस्तान की तरफ इसारा करुंगा“। आई0 पी0 हृयूमन

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‘सैराट’ जैसी सफल क्यों नहीं हो पाई ‘धड़क’

नई दिल्ली। पिछले शुक्रवार को फिल्म धड़क रिलिज हुई थी. यह फिल्म मराठी फिल्म सैराट का हिन्दी रि-मेक थी. जाह्नवी कपूर और ईशान खट्टर की फिल्म ‘धड़क’ का कलेक्शन देखकर इतना जरूर कह सकते हैं कि ‘धड़क’ कमाई के मामले में फेल हो गई. ऐसे कयास लगाए जा रहे थे कि फिल्म ‘सैराट’ की तरह बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी के झंडे गाड़ेगी लेकिन इस फिल्म का बजट निकालना भी मुश्किल हो गया है.

‘धड़क’ ने बॉक्स ऑफिस पर पहले दिन धमाकेदार ओपनिंग की थी लेकिन वीकेंड के बाद से इस फिल्म के कलेक्शन में जबरदस्त गिरावट हुई. शुक्रवार को रिलिज होने के दिन से बुधवार तक का कलेक्शन देखा जाए तो ‘धड़क’ अब तक सिर्फ 47.35 करोड़ का बिजनेस कर पाई है, जबकि फिल्म का बजट 50 करोड़ है. तो वहीं ‘सैराट’ फिल्म का बजट महज 4 करोड़ था लेकिन फिल्म ने 100 करोड़ का बिजनेस किया था. इसके बाद यह साफ हो गया है कि जाह्नवी की ‘धड़क’ सैराट की तरह जादू चलाने में सफल नहीं हो पाई है.

सैराट 2016 में आई मराठी फिल्म थी. मराठी फिल्म इतिहास की अब तक की सबसे सफल फिल्म होने का खिताब इस फिल्म को हासिल है. मराठी में पहली बार किसी फिल्म ने 100 करोड़ रुपए से अधिक का बिजनेस किया. फिल्म के दोनों किरदार और गाने लोगों की जबान पर चढ़ गए. इस फिल्म के लिए निर्देशक नागराज मुंजाले को कई अवार्ड भी मिले.

इस कामयाबी को भुनाने के लिए हिन्दी में धड़क बनाई गई. संगीत का जिम्मा अजय-अतुल की उसी जोड़ी ने संभाला, जिन्होंने सैराट की धुनों से पूरे महाराष्ट्र को भिगो दिया था. दो बड़े स्टार परिवारों से इस फिल्म के कैरेक्टर उठाए गए. दोनों फिल्मों की कहानी और कैरेक्टर कमोबेश एक सा रहा. सवाल है कि आखिर इन सब के बावजूद धड़क, फिल्म सैराट जैसा जादू क्यों नहीं पैदा कर पाई?

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने इसके कारण गिनाते हुए क्विंट हिन्दी के लिए एक आर्टिकल लिखा है, जिससे यह साफ होता है कि फिल्म सैराट का हिन्दी रिमेक क्यों उतना सफल नहीं हो पाया, जितनी की उम्मीद की जा रही थी. आइए डालते हैं एक नजर आखिर दोनों फिल्मों में क्या फर्क है.

1. सबसे पहला फर्क निर्देश को लेकर है. असल में धड़क फिल्म के निर्देशक शशांक खेतान और सैराट के नागराज मंजुले दोनों के फिल्म की कहानी को देखने का नजरिया अलग है.

नागराज मंजुले महाराष्ट्र के एक दलित परिवार में जन्मे फिल्मकार हैं. जाति उनके लिए कोई किताबी चीज नहीं है. जाति को उन्होंने अपने आसपास देखा और झेला है. इसलिए जाति भेद के कारण होने वाली ऑनर किलिंग को वे वहां से देख पाए हैं, जो किसी और लोकेशन से देख पाना संभव नहीं है.

शशांक कोलकाता के एक मारवाड़ी परिवार में पले-बढ़े फिल्मकार हैं. उन्होंने फिल्म में ईमानदार रहने की कोशिश की है. नागराज मंजुले को ऐसी कोई कोशिश नहीं करनी पड़ी.

2. दोनों फिल्मों में जो दूसरा अंतर है, वो दोनों फिल्मों के बीच बड़ा गैप पैदा कर देता है. फिल्म धड़क से जाति का सवाल गायब, जबकि सैराट इस सवाल से टकराती है.

अगर धड़क में हीरो के पिता यह एक डायलॉग न बोलते कि “वे लोग ऊंची जाति वाले हैं, उस लड़की से दूर रहो” तो पता भी न चलता कि हीरो नीची जाति का है या कि यह ऑनर किलिंग पर बनी फिल्म है. इस डायलॉग को छोड़ दें तो फिल्म अमीर लड़की और मिडिल क्लास लड़के की प्रेम कहानी है. पूरी फिल्म जाति से मुंह चुराकर चलती है.

दूसरी ओर सैराट में हीरो अपने पिता के साथ मछलियां पकड़ता है. गांव के बाहर की दलित बस्ती में उसका मकान है. उसके माता-पिता उसकी दलित जाति का उसे एहसास कराते हैं. हीरोइन उसके घर आकर पानी पी लेती है, तो यह एक दर्ज करने लायक बात बन जाती है.

यहां तक कि गांव की पंचायत में भी हीरो का पिता अपनी दलित होने की बेचारगी को जताता है. हीरो और हीरोइन जब गांव छोड़कर भागते हैं तो शहर में एक दलित बस्ती में वे ठहरते हैं. वहां बौद्ध पंचशील का झंडा बैकग्राउंड में है, जो यह बताता है कि वे कहां हैं. हीरोइन का मराठा होना भी साफ नजर आता है.

3. सैराट बारीकियों में चलती है, कमजोरों के साथ खड़ी होती है

सैराट में हीरो के दो दोस्त हैं. एक मुसलमान है और दूसरा शारीरिक रूप से कमजोर. एक चूड़ी बेचने वाले का बेटा है तो एक मोटर मैकेनिक. यहां फिल्म के लेखक और डायरेक्टर नागराज मंजुले की सामाजिक दृष्टि साफ नजर आती है. ये दोस्त हास्य पैदा करते हैं, लेकिन समाज के विस्तार और उसकी पीड़ाओं को भी दिखाते हैं. धड़क इन बारीकियों में जाने से कतरा जाती है.

4. क्लासरूम सीन में भी सैराट ने धड़क से बाजी मार ली है

सैराट में जब हीरोइन का दबंग भाई क्लास में आता है और मास्टर को थप्पड़ मारता है तो डॉयरेक्टर इशारों में बता देता है कि मास्टर दलित है. वह क्लास में इंग्लिश साहित्य पढ़ाते हुए दलित पैंथर आंदोलन के कवि के बारे में बताता है. धड़क का डायरेक्टर ऐसी कोई जहमत नहीं उठाता, बल्कि शिक्षक का नाम अग्निहोत्री बताकर वह पूरे सीन को कमजोर कर देता है. अग्निहोत्री की एक ठाकुर लड़कों के हाथ से पिटाई में वह ताप नहीं है जो एक मराठा दबंग द्वारा एक दलित शिक्षक पर हाथ उठाने में है, वह भी तब जब वह शिक्षक दलित चेतना के कवि को पढ़ा रहा हो.

5. अंतिम सीन में धड़क, सैराट से काफी कमजोर पड़ जाती है

सैराट के अंत में हीरोइन के परिवार वाले लड़का-लड़की दोनों को मार देते हैं. धड़क में डायरेक्टर हीरोइन को बचा लेता है. यह ऑनर किलिंग का तरीका नहीं है. ऑनर किलिंग में अक्सर देखा गया है कि परिवार वाले लड़की को नहीं छोड़ते. खासकर तब जब उसने अपने से नीच जाति के लड़के के साथ प्रेम या शादी की है.

ऑनर किलिंग करने के पीछे परिवार और जाति की इज्जत जाने का एक भाव होता है और जाति गौरव दोबारा हासिल करने के लिए और दोबारा ऐसी घटना न हो, ऐसा सबक बाकी लड़कियों को देने के लिए, लड़कियों की हत्या की जाती है. इस बात को वो लोग नहीं समझ पाते, जिन्होंने जाति को सिर्फ किताबों में पढ़ा है.

एक और बात दोनों फिल्मों को काफी अलग करती है. धड़क दो फिल्मी परिवारों की अगली पीढ़ी का लॉन्च पैड है, वहीं सैराट के हीरो और हीरोइन दोनों दलित परिवारों से हैं. उनका कोई फिल्मी अतीत नहीं है. उनका इस फिल्म में होना सिर्फ नागराज मंजुले की दृष्टि की वजह से है.

इसके अलावा फिल्म के लिए शहरों का चुनाव, सेट और लोकेशन भी दोनों फिल्मों को अलग बनाती है. सैराट के शहर, सेट और लोकेशन फिल्म को सपोर्ट करते हैं, धड़क में ऐसा नहीं होता. दिलीप मंडल के शब्दों में, धड़क लगातार इस बात का ध्यान रखती है कि दर्शकों को कोई गंदी या आंखों को चुभने वाली चीज न दिखाई जाए. सैराट एक ईमानदार फिल्म है. धड़क के बारे में यही बात नहीं कही जा सकती.

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दलित दस्तक का असर: अम्बेडकरवादियों ने कोमल की पढ़ाई के लिए की आर्थिक मदद

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नई दिल्ली। बिहार के भागलपुर स्थित घोघा गांव की कोमल की पिछले दिनों दलित दस्तक में खूब चर्चा हुई. दलित दस्तक ने कोमल को लेकर खबर प्रकाशित की तो वहीं यू-ट्यूब चैनल के लिए इंटरव्यू भी चलाया. असल में इसकी एक जायज वजह भी थी. कोमल मुसहर जाति से ताल्लुक रखती हैं. और अपने गांव की मुसहर टोली से मैट्रिक की परीक्षा पास कर कोमल ने एक नया आगाज किया था. इससे पहले इस मुसहर टोली से कोई भी दसवीं पास नहीं कर पाया था.

दलित दस्तक द्वारा कोमल की कहानी को दुनिया के सामने लाने के बाद कई लोगों ने कोमल की मदद की है. दलित दस्तक में प्रकाशित अपने इंटरव्यू में कोमल ने आगे शिक्षा जारी रखने की इच्छा जाहिर की थी और शिक्षक बनने का सपना बताया था. हालांकि कोमल के दिहारी मजदूर पिता और ईट-भट्टे पर काम करने वाली उसकी मां की गरीबी कई मौके पर उसकी पढ़ाई में आड़े आती है. लेकिन अधिकारियों के समूह द्वारा कोमल की मदद के बाद उसके लिए आगे की राह थोड़ी आसान हो गई है.

इस समूह ने कोमल के लिए उसके परिवार के खाते में 27 हजार रुपये की मदद की है. मदद करने वाले अधिकारियों के नाम हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं.

(1) आर. ए. सेठ ज्वाइंट कमिश्नर (2) धम्मप्रिय आदित्य भारती जी (DC गाजियाबाद) (3) धम्मप्रिय शरत चंद्रा जी (DC मुज्जफरनगर) (4) धम्मप्रिय सुदीप श्रीवास (AC आगरा) (5) धम्मप्रिय विनोद मित्रा (AC आगरा) (6) धम्मप्रिय अभिषेक कुमार सेठ (AC) (7) धम्मप्रिय सुरेंद्र कैथल (DC बाँदा) (8) धम्मप्रिय संतोष कुमार (AC आगरा) (9) श्रीमती दीप्ति गुप्ता (AC आगरा) (10) धम्मप्रिय रंजय कुमार सिंह (CTO अमरोहा) (11) सुश्री सांत्वना गौतम (DC प्रशासन, इटावा) (12) धम्मप्रिय अजय कुमार वर्मा (DC चांदपुर) (13) धम्मप्रिय गंधर्व सिंह (AC आगरा) (14) धम्मप्रिय रंजीत कुमार (DC टैक्स ऑडिट कानपुर) (15) धम्मप्रिय अनिल कुमार जी (DC SIB मुरादाबाद) (16) धम्मप्रिय जय प्रकाश जी (AC झांसी) (17) धम्मप्रिय संजीव कुमार आर्य जी (DC) (18) धम्मप्रिय प्रवेश तोमर (DC मुजफरनगर) इस सहयोग पर इस समूह का कहना है कि हम लोगों ने समाज के उस तबके तक पहुँचने का प्रयास किया है जहाँ पर सूरज ने भी रोशनी देने से इनकार कर दिया था. उम्मीद है कि इन अधिकारियों का यह कदम कोमल के सपनों को नए पंख देगा.

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दलित लड़के से बाबासाहेब को गाली दिलवाने की हकीकत

नई दिल्ली।  पिछले दिनों सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो ने दलित समाज और बाबासाहेब आम्बेडकर को लेकर दूसरी जातियों के लोगों के मन में भरी नफरत फिर सामने ले आई है. दलित समाज के एक लड़के को पहले किडनैप करने और फिर उससे जबरन दलित समाज और बाबासाहेब को गाली दिलवाने के इस मामले से दलित समाज के लोग आक्रोशित हैं.

घटना 18 जुलाई को मेरठ की है. पीड़ित लवली दफ्तर से लौटे ही थे कि एक फोन आया और वो घर से निकल गया. इसके बाद लवली करीब 50 घंटे तक गायब रहा. पोस्ट ऑफिस में नौकरी करने वाले लवली के पिता सुरेन्द्र कुमार और मां ओंकारी देवी बेटे को ढूंढ़ने के लिए परेशान थे. बेटा तो नहीं आया, लेकिन इस बीच वायरल एक वीडियो ने लवली के माता-पिता को और परेशान कर दिया.

वीडियो में कुछ लोग लवली को मार-मारकर बाबासाहब आंबेडकर को भद्दी गालियां देने पर मजबूर कर रहे थे. साथ ही लवली को उसकी उपजाति का नाम लेकर गालियां देने को मजबूर कर रहे थे और जट्ट जिंदाबाद के नारे लगवा रहे थे.

बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, लवली ने बताया कि उसको इस बीच का कुछ याद नहीं है, सिवाए इसके कि कुछ लोगों ने उन्हें रिवॉल्वर की नोक पर नशे की हालत में उनके दलित समाज के सबसे बड़े आइकन भीमराव आंबेडकर को गाली देने पर मजूबर किया. लवली के लिए यह काफी पीड़ा दायक था. क्योंकि लवली का पूरा परिवार बाबासाहेब को मानने वाला अम्बेडकरवादी है. घर में मौजूद बाबासाहेब की कई तस्वीरें यह बताती भी है.

इस मामले में स्थानीय थाने में तीन लोगों के ख़िलाफ़ नामजद रिपोर्ट दर्ज करवाई है. लेकिन एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले से मामला लटका हुआ है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले को आधार बनाते हुए थाने ने मामला उच्चअधिकारियों को भेज दिया है. एससी-एसटी एक्ट में आए बदलाव के बाद अनुसूचित जाति और जनजाति क़ानून के भीतर कोई भी केस दर्ज किए जाने से पहले सर्किल ऑफ़िसर स्तर के एक अधिकारी को उसकी जांच करना जरूरी है.

लवली से जुड़े लोगों का कहन है कि लवली बाबा साहब को मानने वाला लड़का है, वह लोगों को बाबासाहब से जोड़ता रहा है, उसे इसी की सज़ा दी गई है. चिंता की बात यह है कि अभी तक मामले में किसी की गिरफ़्तारी नहीं हुई है.

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इमरान खान बनाएंगे पाकिस्तान में सरकार, लेकिन गठबंधन की दरकार

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नई दिल्ली। पाकिस्तान में हुए आम चुनाव के नतीजे आ गए हैं. नतीजों के मुताबिक आधिकारिक तौर पर पूर्व क्रिकेटर इमरान खान की जीत हो गई है. 20 सीटों पर जारी मतगणना को छोड़ चुनाव के नतीजों पर बात करें तो इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी नेशनल एसेंबली की 269 सीटों में से 109 सीटों पर शानदार जीत दर्ज है.

इस चुनाव में उनके विरोधी शाहबाज शरीफ के पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) को 63 सीटें मिली है. इस चुनाव में तीसरे स्थान पर बिलावल भुट्टो को पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी रही, जिसे 39 सीटों पर जीत हासिल हुई है. हालांकि नतीजे आने के बाद विपक्षियों ने चुनाव में धांधली का मुद्दा उठाया है. पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के जेल जाने के बाद पार्टी को संभालनेवाले शाहबाज ने इसमें व्यापक फर्जीवाड़ा और धांधली का आरोप लगाकर चुनाव नतीजे को खारिज कर दिया. जबकि इमरान खान ने गुरुवार को अपनी जीत की घोषणा करते हुए फर्जीवाड़े के आरोपों से इनकार किया. उन्होंने इस चुनाव को पाकिस्तान के इतिहास का सबसे ज्यादा पारदर्शी चुनाव कहा.

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दिग्गज नेता करुणानिधि की तबियत बिगड़ी, मिलने के लिए दिग्गजों का जमावड़ा

चेन्नई। तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री और द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (DMK) प्रमुख एम. करुणानिधि की तबीयत बिगड़ गई है. इस खबर के आने के बाद द्रविड़ नेता के आवास पर नेताओं और समर्थकों का तांता लग गया है. राज्य भर के तमाम दिग्गज नेता करुणानिधि से मिलने पहुंच रहे हैं. 94 वर्षीय करुणानिधि का इलाज चेन्नई स्थित उनके आवास पर ही चल रहा है.

वरिष्ठ नेता से मिलने पहुचंने वाले दिग्गज नेताओं में तमिलनाडु के उपमुख्यंत्री ओ. पन्नीरसेल्वम, कई मंत्री और AIADMK के वरिष्ठ नेताओं के साथ करुणानिधि का हालचाल जानने पहुंचे. इस दौरान उन्होंने डीएमके के कार्यकारी अध्यक्ष एमके स्टालिन से भी मुलाकात की. ऐसा पहली बार है कि जब AIADMK के नेता करुणानिधि के गोपालापुरम आवास पर पहुंचे हों. तो वहीं हाल ही में राजनीति में उतर चुके अभिनेता कमल हासन भी दिग्गज नेता से मिलने पहुंचे.

कावेरी अस्पताल की मेडिकल बुलेटिन के अनुसार, बढ़ती उम्र के कारण ही करुणानिधि की तबीयत बिगड़ी है. उन्हें बार-बार बुखार आ रहा है. बताया जा रहा है कि उन्हें यूरिन इन्फेक्शन हुआ था. आपको बता दें कि करुणानिधि ने हाल ही में अपना 94वां जन्मदिन भी मनाया है. ठीक 50 साल पहले 26 जुलाई को ही उन्होंने डीएमके की कमान अपने हाथ में ली थी.

गौरतलब है कि करुणानिधि पांच बार राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं. आज के समय में उनकी गिनती देश के दिग्गज नेताओं में होती है. अभी तक वह जिस भी सीट पर चुनाव लड़े हैं, उन्होंने हमेशा जीत दर्ज की है. करुणानिधि ने 1969 में पहली बार राज्य के सीएम का पद संभाला था, इसके बाद 2003 में आखिरी बार मुख्यमंत्री बने थे.

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जानिए क्या है आषाढ़ी पूर्णिमा यानि गुरु पूर्णिमा का महत्व

नई दिल्ली। आज (27 जुलाई) को धम्मचक्र प्रवर्तन दि‍न है. आषाढ़ पूर्णिमा को गुरू पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है. राजकुमार सिद्धार्थ गौतम ने आषाढ़ पूर्णिमा के दिन 29 वर्ष की आयु में सांसारिक जीवन का त्याग किया था. आषाढ़ पूर्णिमा को धम्म चक्र प्रवर्तन दिवस भी कहा जाता है, क्योंकि सन् 528 इसवी पूर्व इसी दिन सारनाथ में सम्यक संबोधि प्राप्त करने के बाद बुद्ध ने पंचवर्गीय भिक्खुओं को प्रथम धम्म प्रवचन दे कर धम्म चक्र प्रवर्तन सूत्र की देशना की थी.

धम्म चक्र प्रवर्तन दि‍वस को बहुत महत्व पूर्ण माना जाता है क्योंकि‍ यदि‍ सम्यक संबोधि प्राप्त करने के बाद गौतम बुद्ध धम्म देशना नहीं करते तो आने वाली पीढि‍यों को धम्म लाभ नहीं मि‍लता और हम लोग इस से वंचि‍त रह जाते. बुद्ध ने पांच परिव्राजकों को संबोधित करते हुए कहा-भिक्खुओं, जो परिव्रजित हैं उन्हें दो अतियों से बचना चाहिए, पहली अति है कामभोगों में लिप्त रहने वाले जीवन की, यह कमजोर बनाने वाला है, गंवारु है, तुच्छ है और किसी काम का नहीं है, दूसरी अति है आत्मपीङाप्रधान जीवन जो कि दुःखद होता है, व्यर्थ होता है और बेकार होता है.

इन दोनों अतियों से बचे रहकर ही तथागत ने मध्यम मार्ग का अविष्कार किया है, यह मध्यम मार्ग साधक को अंतर्दृष्टि प्रदान करने वाला है, बुद्धि देने वाला है, ज्ञान देने वाला है, शांति देने वाला है, संबोधि देने वाला है और पूर्ण मुक्ति अर्थात निर्वाण तक पहुंचा देने वाला है, यह मध्यम मार्ग श्रेष्ठ आष्टांगिक मार्ग है.

इस आर्य आष्टांगिक मार्ग के अंग हैं, सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वचन, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीविका, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति, सम्यक् समाधि.

बुद्ध ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा- भिक्खुओं, पहला आर्यसत्य यह है कि दुःख है. जन्म लेना दुःख है, बुढ़ापा आना दुःख है, बीमारी दुःख है, मुत्यु दुःख है, अप्रिय चीजों से संयोग दुःख है, प्रिय चीजों से वियोग दुःख है, मनचाहा न होना दुःख है, अनचाहा होना दुःख है, संक्षेप में पांच स्कंधों से उपादान (अतिशय तृष्णा का होना) दुःख है.

अब हे भिक्खुओं, दूसरा आर्यसत्य यह है कि इस दुःख का कारण हैः राग के कारण पुनर्भव अर्थात पुनर्जन्म होता है, जिससे इस और उस जन्म के प्रति अतिशय लगाव पैदा होता है, यह लगाव काम-तृष्णा के प्रति होता है, भव-तृष्णा के प्रति होता है और विभव तृष्णा के प्रति होता है.

अब हे भिक्खुओं, तीसरा आर्यसत्य है दुःख निरोध आर्यसत्य, इस तृष्णा को जङ से पूर्णतः उखाङ देने से इस दुःख का, जीवन-मरण का जङ से निरोध हो जाता है,

और अब हे भिक्खुओं चौथा आर्यसत्य है दुःख निरोधगामिनी प्रतिपदा (दुःख से मुक्ति का मार्ग), इस दुःख को जङ से समाप्त किया जा सकता है और जिसके लिए तथागत ने आठ अंगों वाला आर्य आष्टांगिक मार्ग खोज निकाला है जो सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वचन, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीविका, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति, सम्यक् समाधि हैं.

आर्य आष्टांगि‍क मार्ग

आर्य आष्टांगि‍क मार्ग भगवान बुद्ध की अद्भुत खोज थी. सभी दु:खों से वर्तमान जीवन में ही मुक्ति पाने के लि‍ए तथा इसी जीवन में वास्तिवक सुख-शांति‍ को प्राप्त करने के लि‍ए भगवान बुद्ध ने आर्य आष्टांगि‍क मार्ग बताया है यह आष्टांंगि‍क मार्ग कि‍सी एक संप्रदाय का न होकर सार्वजनीन मार्ग है क्योंकि‍ यह प्रकृति‍ के नि‍यमों पर आधारि‍त है. जो भी व्याक्ति इस मार्ग पर चलेगा दु:खों से मुक्ति होगी ही. इसे स्वयं अनुभव कर जानना आवश्यक है. इसके आठ अंग इस प्रकार है:

(1) सम्यक् दृष्टि: सम्यक् दृष्टि्‍ अर्थात सम्यक् दर्शन. यहां दर्शन शब्द का सही और वास्तवि‍क अर्थ है – जो बात, जो वस्तु जैसी है, उसे वैसे ही उसके गुण-धर्म –स्वभाव में देखना अर्थात अनुभव से जानना. अत: सम्यक् दृष्टि अर्थात शुद्ध दर्शन, वास्तवि‍क दर्शन, प्रत्येक वस्तु , व्यक्तिृ‍ तथा स्थिति‍ का यथाभूत दर्शन, सत्य दर्शन, यथाभूत ज्ञान दर्शन ही सम्य्क् दृष्टि कहलाती है. इसका अनुभव वि‍पस्सना साधना द्वारा कि‍या जा सकता है.

(2) सम्यक संकल्प- संकल्प अर्थात चिंतन, मनन. हमारा संकल्प हमारी सोच्‍ सही व सकारातमक होनी चाहि‍ए. अर्थात बुरे, दुषि‍त वि‍चारों से मुक्त , रागरहि‍त, द्वेश रहि‍त, व मोह –रहि‍त चिंतन –मनन सम्यक् संकल्प् कहलाता है. सम्यक् स्मृ,ति‍ का अभ्यास करते-करते वि‍पस्सना साधना द्वारा सम्य‍क् संकल्प का अभ्या्स कि‍या जा सकता है.

(3) सम्य‍क वचन: हमारी वाणी सम्यक् हो अर्थात हम झुठ न बोलें, कड़वी (कटु) भाषा बोलकर कि‍सी का मन न दुखाएं, कि‍सी की निंदा न करें, कि‍सी की चुगली न करें, व्यर्थ बयान न करें, गाली-गलौच न करें. मधुर बोलें, सत्यवादी हों. वाणी मृदु और संयमति‍ हो. वाणी ऐसी हो जो दो पक्षों को जोड़ने का मार करे, प्रेम भाव, मैत्री भाव, बंधुभाव बढ़ाने का काम करे, ऐसी वाणी को सम्यक् वाणी कहते है.

(4) सम्यक कर्म: मन, वचन और शरीर द्वारा कि‍ये जाने वाले कार्य-सम्यक् रहें अर्थात ठीक रहें. मि‍थ्या‍चार, परस्त्री गमन, व्यभि‍चार असम्यक् कर्म है. कि‍सी दूसरे की वस्तु चुराना, चोरी करना असम्यक् कर्म है, नशा करना, गांजा, अफीम आदि‍ लेना असम्यक् कर्म है. शरीर, वचन और मन से इन दुष्कर्मों से वि‍रत रहें तो ही सम्यक् कर्म होगा. (5) सम्यक आजीवि‍का: हर व्याक्ति को अपने व परि‍वार के भरण-पोष्ण के लि‍ए कोई न कोई कार्य करना आवश्यक हे. हमारी आजीवि‍का का रास्ता सम्यक अर्थात सही होना चाहि‍ए. आजीवि‍का के साधन में कि‍सी व्यक्ति को हानि‍ नहीं होनी चाहि‍ए. कि‍सी को धोखा नहीं देना चाहि‍ए. दूसरों को हानि‍ पहुंचाकर, लूट कर, चोरी कर, ठगकर या धोखा देकर यदि‍ जीवि‍का चलाई जाती है तो वह असम्यक् आजीवि‍का है. केवल पैसा कमाने के लि‍ए ऐसे व्यापार-धंधे या कार्य क करें जो अन्य लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नुकसान पहूंचाते हैं. नशीले व मादक पदार्थों का व्यापार जहरीलें पदार्थों का व्या‍पार असम्यक् है. मांस- मदि‍रा का व्याापार, प्राणि‍यों का व्यांपार, अस्त्र-शस्त्र का व्याकपा असम्यक है. (6) सम्यक व्यायाम: मन की कमजोरी दूर करने के लि‍ए, उसके वि‍कार दूर करने के लि‍ए मन का व्यायाम आवश्यक है. मन का स्वयं परीक्षण करें. यदि‍ इस तथ्य का अनुभव हो कि‍ मन में कुछ बुराई या दुर्गुण हैं तो उन्हें नि‍कालने का प्रयास करें. कि‍सी भी तरह के दुगुर्ण हममें न आने पाएं इस बात से स्वयं सजग रहें. मन में अच्छाइयों- सद्गुणों को घर करने दें. सद्गुणोंपार्जन के लि‍ए हमेंशा तत्पर रहें, अपने सद्गुणों में हमेशा वृद्धि‍ करने का प्रयास करें. दूसरों में कुछ अच्छे गुण नजर आए तो उसे ग्रहण करने का प्रयास करें. अपने चि‍त्त को सद्गुणों की ओर अग्रसरि‍त करने वाले इस मानसि‍क प्रयास को सम्यक् व्या‍याम कहते हैं.

(7) सम्यक समृति‍: स्मृति‍ का अर्थ है, जागरूकता, सजगता. वर्तमान क्षण में शरीर में होने वाली संदेवनाओं के प्रति‍ सजगता व जागरूकता. शरीर और चि‍त्त में स्वभावगत तौर पर होने वाली क्रि‍याओं-प्रति‍क्रि‍याओं के प्रति‍ सचेत रहकर, जागरूक रहकर उस वास्तवि‍कता को, उस वर्तमान सच्चा-ई को समता भाव से देखना-परखना, यही सम्यक् स्मृति‍ है , शरीर में जि‍स समय जो भी और जैसी भी संवेदना हो रही है, उसका यथाभूत ज्ञान दर्शन. वि‍पस्ससना के द्वारा ही इसका अभयास कि‍या जा सकता है.

(8) सम्य‍क समाधि‍: समाधि‍ अर्थात मन की एकाग्रता. चित्त की एकाग्रता लाभदायक होती है. मन कि‍सी भी आलंबन से एकाग्र हो सकता है. वि‍कारों से भरा मन भी एकाग्र हो सकता है. अत: मन की केवल एकाग्रता सम्यक् समाधि‍ नहीं है, अपि‍तु जि‍स आलंबन के द्वारा मन एकाग्र कि‍या जा रहा है. उसे लेकर यदि‍ हम राग पैदा करें, द्वेष पैदा करें, मोह पैदा करें, तो यह सम्यक समाधि‍ नहीं हुई. आलंबन रागवि‍हीन, द्वेषवि‍हीन और मोहवि‍हीन होना आवश्य क है. यही सम्यक समाधि‍ है. अत: कुशल चि‍त्त और नि‍र्मल चि‍त्त की एकाग्रता को ही सम्यक समाधि‍ कहते हैं. आनापान सति‍ के अभ्यास से सम्यक् समाधि‍ उपलब्ध हो सकती है. वि‍पस्सना साधना द्वारा सम्यक् समाधि‍ का योग्य‍ अभ्यास कि‍या जा सकता है. सम्यक का अर्थ है कि‍ सही, सम्य‍क् का अर्थ है सचमुच. यह आर्य आष्टांगि‍क मार्ग सभी दुखों से मुक्ति‍ पाने व वास्तवि‍क सुख:शांति‍ से जीवन जीने का अनमोल रास्ता है. यह वर्तमान जीवन में ही निर्वाण का साक्षात्कार करा सकता है. इसमें मन को वश में रखने और निर्मल रखने पर वि‍शेष जोर दि‍या गया है क्योंकि‍ सभी अवस्थाएं पहले मन में उत्पन्न होती हैं. मन ही प्रधान है. मलि‍न व दूषि‍त मन से बोलने पर या कार्य करने पर दुख पीछे-पीछे ऐसे ही हो लेता है जैसे बैलगाड़ी के पहि‍ए बैलगाड़ी के बैलों के पीछे. जब मनुष्य स्वच्छ नि‍र्मल मन से बोलता है या कर्म करता है तो सुख उसके पीछे ऐसे ही हो लेता है, जैसे आपका अपना साया.

इस प्रकार हे भिक्खुओं, इन चीजों के बारे में मैंने पहले कभी सुना नहीं था, मुझमें अंतदृष्टि जागी, ज्ञान जागा, प्रज्ञा जागी, अनुभूति जागी और प्रकाश जागा.

बुद्ध ने अपनी बात पूरी करते हुए आगे कहा, हे भिक्खुओं जब मैंने अपनी अनुभूति पर इन चारों आर्य सत्यों को इनके तीनों रूपों के साथ, और उनकी बारह कङियों के साथ, पूर्ण रूप से सत्य के साथ जान लिया, पूरी तरह समझ लिया और पूरी तरह अनुभव कर लिया, उसके बाद ही मैंने कहा कि मैंने सम्यक सम्बोधि प्राप्त कर ली है, इस तरह मुझमें ज्ञान की अंतर्दृष्टि जागी, मेरा चित्त सारे विकारों से मुक्त हो गया है, हे भिक्खुओं जब मैंने अपने स्वयं के प्रत्यक्ष अनुभवों से और पूर्ण ज्ञान और अंतर्दृष्टि के साथ इन चारों आर्यसत्यों को जान लिया, यह मेरा अंतिम जन्म है अब इसके बाद कोई नया जन्म नहीं होगा.

बुद्ध के इन चार आर्यसत्य और आर्यअष्टांगिक मार्ग को सुनकर कौंङन्न के धर्मचक्षु जागे और उन्हें यह प्रत्यक्ष अनुभव हो गया कि जो कुछ भी उत्पन्न होता है वह नष्ट होता है, जिसका उत्पाद होता है उसका व्यय होता है, कौंङन्न के चेहरे के भावों को देखकर बुद्ध ने कहा- कौंङन्न् ने जान लिया. कौंङन्न ने जान लिया. इसलिए कौंङन्न का नाम ज्ञानी कौंङन्न पङ गया. बुद्ध के इस उपदेश से कौंङन्न के अंदर भवसंसार चक्र, धम्म चक्र में परिवर्तित हो गया, इसलिए इस प्रथम उपदेश को धम्मचक्र प्रवर्तन सुत्त कहते हैं.

पांचों पंचवर्गीय भिक्खु बुद्ध के चरणों में नत मस्तक हो गए और उनसे अनुरोध कि‍या कि‍ वह इन पांचों भि‍क्खु्ओ को अपना शि‍ष्य स्वीकार करे. बुद्ध ने “भि‍क्खु आओ” कह कर उन्हें अपना शि‍ष्यु स्वीकार कि‍या. चूंकि‍ पांचो भि‍क्खुओं ने इसी दि‍न बुद्ध को अपना गुरू स्वीकार कि‍या था इसलि‍ए आषाढ़ी पूर्णिमा को गुरू पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है. बुद्ध ने यह उपदेश आषाढ़ी पूर्णिमा के दिन दिया था, इसलिए बौद्धों में आषाढ़ पूर्णिमा पवित्र दिन माना जाता है.

आषाढ़ पूर्णिमा से भिक्खुओं का वस्सावास (वर्षावास/ चातुर्मास अर्थात वर्षा ऋतु में एक ही स्थान पर वास करना) आरंभ होता है, इस दिन बौद्ध उपासक-उपासिकाओं द्वारा महाउपोसथ व्रत रखा जाता है. बौद्ध विहारों में धम्म देशना के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं. सबका मंगल हो!
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तीन दिन से नहीं जला था चूल्हा, भूख से बिरहोर की मौत

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रांची। केंद्र-राज्य सरकार व संबंधित महकमों के तमाम वादों व दावों को झुठलातें हुए क्षेत्र के कुंदरिया बस्ती आरा में भूख से दम तोड़ने वाले 40 साल के चिंतामण मल्हाह के बाद रांची से सटे रामगढ़ जिले के मांडू प्रखंड के अंतर्गत नावाडीह पंचायत के जरहैया टोला निवासी राजेंद्र बिरहोर लगभग 40 की बुधवार मौत हो गई। राजेंद्र की मौत ने चिंतामण की मौत के मोले में लीपापोती करने वाले प्रषासन की कलई एक बार फिर से खोलकर रख दी है।

राजेंद्र की पत्नी ने बताया कि उसे जांन्डिस था। षरीर में खून की कमी थी। घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। घर में तीन दिन से चूल्हा नहीं जला था। दवा खरीदने के लिए भी पैसे नहीं थे। बताया जाता है कि पूर्व में राजेंद्र का इलाज मुखिया के सहयोग से मांडू सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में कराया गया था। बाद में उसे रिम्स में भर्ती कराया गया था।

रिम्स के डाक्टरों ने दवा देकर उसे घर भेज दिया था। पत्नी नें बताया कि राजेंद्र टैक्टर चला कर परिवार चलाता था। उसकी बीमारी के बाद घर की स्थिति खराब हो गई किसी तरह पड़ोसियों से कुछ मांग कर छह बच्चों का पेट भरती थी। राजेंद्र की मौत की सूचना मिलने के बाद मांडू के बीडीओ व सीओ उसके घर पहुंच कर लीपापोती करते हुए राजेंद्र के परिजनों को मुआवजे के तौर पर 10 हजार रूपये नगद व दो क्विंटल चावल दिया।

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कलंकित बिहार!

मुजफ्फरपुर में समाज कल्याण विभाग, बिहार सरकार द्वारा संचालित बालिका गृह में रहने वाली उनतीस बालिकाओं के यौन शोषण का खुलासा पूरे बिहार के लिए शर्म का विषय है। यौन शोषण की शिकार सभी लड़कियों की उम्र अठारह साल से कम है। शर्म का विषय यह भी है कि सालों से चल रहे बच्चियों के साथ बलात्कार और प्रताड़ना का यह खुलासा इस बालिका गृह का समय-समय पर निरीक्षण करने वाले किसी दंडाधिकारी या सरकार के किसी अधिकारी ने नहीं किया। संस्थान के बारे में ऐसी शिकायतें मिलने के बाद जब बिहार सरकार ने मुंबई की संस्था ‘टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस’ से इसकी ऑडिट कराई तो पहली बार यह रहस्योद्घाटन हुआ कि यहां की लड़कियां संस्थान के लोगों द्वारा निरंतर यौन-शोषण का शिकार हुई हैं। इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के आधार पर जिला बाल कल्याण संरक्षण इकाई के सहायक निदेशक ने बालिका गृह का संचालन करने वाले स्वयंसेवी संस्था ‘सेवा संकल्प एवं विकास समिति’ के पदाधिकारियों पर केस दर्ज कराया है।

बालिका गृह की लड़कियों की मेडिकल जांच के बाद उनमें से उनतीस लड़कियों के साथ बलात्कार और शारीरिक हिंसा की पुष्टि हो चुकी है। पुलिस को लड़कियों ने यह भी बताया कि बलात्कार के दौरान एक लड़की की मौत भी हो गई थी जिसकी लाश शायद परिसर में ही कहीं गाड़ दी गई। पिछले पांच सालों में यहां से छह लड़कियों के गायब होने की भी सूचना है। इस घटना के संबंध में दस लोगों की गिरफ्तारियां भी हुई है और पुलिस इन घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार ग्यारह लोगों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल करने की तैयारी कर रही है। मीडिया और आमलोगों में यह चर्चा ज़ोरो पर है कि ‘सेवा संकल्प एवं विकास समिति’ के लोगों द्वारा कुछ अधिकारियों और दबंग नेताओं की अय्याशी के लिए लड़कियों को बाहर भी भेजा जाता था। अनुसंधान में इस संदेह की पुष्टि नहीं हुई।

मुजफ्फरपुर की एस.एस.पी हरप्रीत कौर के अनुसार इस मामले में किसी भी लड़की ने यह नहीं बताया कि उसे कभी हॉस्टल से बाहर ले जाया गया था। अब इस मामले का एक ही पक्ष उपेक्षित है कि सरकार द्वारा बालिका गृह का समय-समय पर निरीक्षण करते आ रहे दंडाधिकारियों और बिहार सरकार के बाल कल्याण विभाग के अधिकारियों पर बलात्कार के साक्ष्य छुपाने के आरोप में कोई कारवाई क्यों नहीं की जा रही है। ये अधिकारी यह कहकर नहीं बच सकते कि निरीक्षण के दौरान बलात्कार पीड़ित लड़कियों ने उन्हें इस बाबत कुछ नहीं बताया। किसी बालिका गृह के निरीक्षण के दौरान लड़कियों से यह सवाल सबसे पहले पूछा जाना चाहिए था। ‘टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस’ के लोगों ने जब यह सवाल पूछा तो लड़कियों ने अपने साथ घटी बर्बरता की तमाम कहानियां सुना दीं।

मेरी नज़र में मुजफ्फरपुर पुलिस के अनुसंधान की दिशा सही है। कुछ लोगों की मांग पर सरकार ने इसकी जांच सी.बी.आई को सौंपने का फैसला किया है। इस फैसले के पीछे की नीयत सियासत में गहरी पैठ रखने वाले रसूखदार अभियुक्तों के हित में अनुसंधान को लंबे अरसे तक लटकाकर और स्पीडी ट्रायल को विलंबित कर उन्हें पीड़ितों पर दबाव बनाने का अवसर मुहैय्या कराना भी हो सकता है। जो लोग ‘सरकारी तोते’ के नाम से कुख्यात सी.बी.आई से अब भी निष्पक्षता की उम्मीद रखते हैं, उनके भोलेपन को सलाम ही किया जा सकता है!

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पाकिस्तान चुनाव: आतंकी हाफिज सईद की पार्टी का सूपड़ा साफ, बेटा और दामाद भी हारा

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साल 2008 मुंबई हमले का मास्टरमाइंड और जमात-उद-दावा चीफ हाफिज सईद को पाकिस्तान में हुए चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा है. आतंकी हाफिज सईद की पार्टी अल्लाह-ओ-अकबर तहरीक (एएटी) के सभी उम्मीदवार चुनाव हार गए हैं. हाफिज सईद ने 260 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे.

इस चुनाव में हाफिज का बेटा और दामाद भी किस्मत आजमा रहा था. लेकिन दोनों अपनी-अपनी सीट बुरी तरह हार गए. बेटा हाफिज तल्हा सईद लाहौर से 200 किलोमीटर दूर सरगोधा सीट से चुनाव लड़ रहा था. हाफिज सईद यही का रहने वाला है.

आतंकी हाफिज सईद का दावा था कि उसके सभी प्रत्‍याशी इन चुनावों में जीतेंगे. लेकिन पाकिस्‍तान की जनता ने उसके मंसूबों पर पानी फेर दिया. हाफिज सईद ने लोगों से अपील कि थी कि वो ‘पाकिस्तान की विचारधारा’ के लिए मतदान करे.

हाफिज सईद ने मिल्‍ली मुस्लिम लीग (एमएमएल) के बैनर तले अपने प्रत्‍याशियों को मैदन में उतारा था. लेकिन बाद में चुनाव आयोग की ओर से मान्‍यता देने से इनकार कर दिया गया था. इसके बाद हाफिज सईद ने अल्‍लाह-ओ-अकबर के बैनर तले अपने प्रत्‍याशियों को मैदान में उतारा.

आपको बता दें कि जमात-उद-दावा को अमेरिका ने जून 2014 में आतंकी संगठन घोषित किया था. ये संगठन लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ा था जिसने साल 2008 में मुंबई हमले को अंजाम दिया था. अमेरिका ने सईद पर एक करोड़ डॉलर का इनाम भी घोषित कर रखा है.

सभार-न्यूज18 Read it also-पाकिस्तान में आम चुनाव, 272 सीटों पर 100 दल मैदान में दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये दिए गए लिंक पर क्लिक करेंhttps://yt.orcsnet.com/#dalit-dast

मोदी की राह मुश्किल करने वाराणसी और अयोध्या जाएंगे उद्धव ठाकरे

नई दिल्ली। शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे कई मुद्दों पर भाजपा सरकार और उसके नेताओं पर सवाल उठाते रहते हैं. साथ होते हुए भी दोनों पार्टियों के बीच तल्खी जगजाहिर है. अब उद्धव ठाकरे ने हिन्दुत्व के सवाल पर भाजपा को घेरने का मन बना लिया है. इसके तहत शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी और हिन्दुत्व के केंद्र स्थल अयोध्या जाएंगे. उद्धव ठाकरे के इस दौरे को लेकर मुंबई में पोस्टर लगाए गए हैं, जिसमें अयोध्या और वाराणसी में उद्धव का साथ देने की अपील की गई है.

पिछले दिनों शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने कहा था कि पिछले 25 वर्षो से शिवसेना इसलिए बीजेपी के साथ खड़ी है क्योंकि दोनों दल हिंदुत्व की विचारधारा, हिंदुओं के दर्जे, राष्ट्रीय हित और देश की सुरक्षा समेत अन्य मुद्दों पर समान राय रखते हैं. लेकिन हिंदुत्व क्या है? उद्धव ठाकरे ने कहा कि “मैं मेरे पिता शिवसेना के संस्थापक दिवंगत बालासाहेब ठाकरे से अक्सर यह पूछता था. उनका जवाब होता था कि राष्ट्रीयता हमारा हिंदुत्व है. हम नहीं चाहते कि हिन्दू केवल मंदिर में जाकर घंटियां बजाएं, चोटी रखें और जनेऊ धारण करें. बालासाहेब के हिंदुत्व के विचारों को अब प्रचारित और लागू किया जाना चाहिए.”

शिवसेना के इस कदम से भाजपा मुश्किल में आ सकती है. दरअसल, राम मंदिर के मुद्दे शिवसेना लगातार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साध रही है. शिवसेना का कहना है कि सत्ता में आने के बाद बीजेपी राम मंदिर के वायदों को भूल गई.

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एससी/एसटी सांसदों ने मोदी सरकार के खिलाफ खोला मोर्चा

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नई दिल्ली। एससी/एसटी एक्ट पर फैसला देने वाले सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस एके गोयल को नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल (एनजीटी) का अध्यक्ष बनाए जाने पर एससी/एसटी सांसदों ने सवाल उठाया है. 23 जुलाई को मोदी सरकार में मंत्री रामविलास पासवान के घर पर एनडीए के दलित सांसदों की बैठक हुई जिसमें एससी/एसटी अत्याचार निरोधक कानून और सरकारी नौकरियों में प्रोमोशन में आरक्षण जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई. इसी बैठक में जस्टिस गोयल को हटाने के लिए दलित सांसदों ने सहमति दी थी. जस्टिस गोयल छह जुलाई को सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हुए थे और उसके बाद सरकार ने उन्हें एनजीटी अध्यक्ष नियुक्त किया था. एनडीए के सांसदों का कहना है कि जस्टिस गोयल की नियुक्ति से दलितों के बीच अच्छा संदेश नहीं गया है और इससे आगामी चुनावों में नुकसान हो सकता है.

इस बीच रामविलास पासवान के सांसद बेटे चिराग पासवान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर एनजीटी अध्यक्ष को पद से बर्खास्त करने की मांग की है. साथ ही सरकार से एससी/एसटी एक्ट पर अध्यादेश लाने की मांग की है. चिराग पासवान ने पीएम को पत्र लिखकर कहा है कि जल्द से जल्द जस्टिस (रिटायर्ड) एके गोयल को एनजीटी चेयरमैन पद से बर्खास्त किया जाए. चिराग ने पत्र में कहा- ”संसद के चालू सत्र में विधेयक लाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के प्रभाव से अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के कानूनी सुरक्षा की व्यवस्था को बहाल किया जाए. अगर इसमें कोई अड़चन है तो संसद के चालू सत्र को दो दिन पहले खत्म कर अध्यादेश लाया जाए.”

बताते चलें कि 20 मार्च को जस्टिस गोयल और जस्टिस उदय उमेश ललित की पीठ ने एससी/एसटी एक्ट में बड़े बदलाव का एक्ट पारित किया था. इस आदेश के बाद दलित समाज की ओर से 2 अप्रैल को देश भर में बड़ा आंदोलन हुआ था. विपक्षी दलों और दलित चिंतकों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने मजबूती से पक्ष नहीं रखा, जिसकी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने ये फैसला दिया और कानून कमजोर हुआ. विपक्ष का आरोप है कि मोदी सरकार धीरे-धीरे आरक्षण खत्म करना चाहती है. अब इसी मुद्दे को लेकर तमाम दलित सांसदों के साथ आने से सरकार मुश्किल में घिर गई है.

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बिहार एनडीए में घमासान

पटना। देश की राजनीति की दिशा तय करने में उत्तर प्रदेश के बाद बिहार का नाम आता है. फिलहाल बंगाल, ओडिसा और तामिलनाडु के अलावा बिहार ऐसा प्रदेश है, जहां भाजपा मुश्किल में है. ऐसे में बिहार में सभी गठबंधन दलों को साथ लाने के लिए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने पिछले दिनों बिहार का दौरा कर नीतीश कुमार से मुलाकात की थी. लेकिन बिहार एनडीए में घमासान की खबर ने भाजपा को मुश्किल में डाल दिया है.

असल में नीतीश कुमार के प्रतिद्वंदी उपेन्द्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी ने नीतीश कुमार को नेता मानने से इंकार कर दिया है. पिछले दिनों एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में कुशवाहा ने कहा था कि एनडीए की बैठक में अगले मुख्यमंत्री और नेता का नाम तय होना चाहिए. बतौर नेता कुशवाहा ने अपनी दावेदारी भी पेश की थी.

अपने नेता के बयान के बाद कुशवाहा की पार्टी ने नीतीश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. पार्टी के प्रवक्ता सत्येंद्र ने बिहार में फैली अव्यवस्था का मुद्दा उठाते हुए नीतीश सरकार को जमकर घेरा. उन्होंने कहा कि तब बिहार में जंगलराज, हत्या और अपहरण का माहौल था. उससे बिहार को बचाने के लिए नीतीश कुमार उस वक्त की मजबूरी थे. लेकिन अभी बिहार का जो हाल है, उसमें रालोसपा नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री नहीं मानेगी.

आरएलएसपी के प्रवक्ता ने आगे कहा, “नीतीश कुमार जी जनता दल यूनाइटेड के लीडर हो सकते हैं लेकिन एनडीए के लीडर नहीं हो सकते. बिहार में प्रदेश के अंदर बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी है. बिहार में सबसे ज्यादा सांसद बीजेपी के पास है, इसलिए बड़े भाई वो हो सकते हैं. नीतीश कुमार जी बड़े भाई कैसे बन सकते हैं. राष्ट्रीय समता पार्टी नीतीश कुमार को कभी बड़े भाई के रोल में नहीं मानेगी.

दरअसल रालोसपा भाजपा पर अपने नेता उपेन्द्र कुशवाहा को एनडीए का नेता चुनने के लिए दबाव बना रही है. रालोसपा के इस दावे का आधार बिहार का जातीय समीकरण है, जिसमें नीतीश कुमार की जाति का वोट मात्र डेढ़ फीसदी तो कुशवाहा जाति का वोट प्रतिशत 10 फीसदी है.

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