वैसे तो पूरे भारत देश में ही सामंतों का शासन है, मगर विहार (बिहार) राज्य इसमें दो कदम आगे है. पूरे देश में भूमिहीन परिवारों की संख्या सबसे ज्यादा विहार में है. विहार राज्य में भूमिहीनों को जमीन देने के चार कार्यक्रम चलाये गये...
नोटबंदी के बाद से भाजपा-नीत सरकार और संघ-परिवार के तमाम नेता, प्रवक्ता या समर्थक सुबह से शाम तक इस बात का प्रचार कर रहे हैं कि नोटबंदी गरीबों और आम लोगों के हक में की गई है. इसका नुकसान सिर्फ बड़े लोगों या पूंजीपति...
भारतीय राजनीति में विभिन्न क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का जन्म यूं ही नहीं हुआ, इसका कारण केवल और केवल यह है कि ब्राह्मणवाद के चलते पहले से ही वर्चस्वशाली राजनीतिक पार्टियां अलोकतांत्रिक होती जा रही हैं. इन वर्चस्वशाली राजनीतिक पार्टियों के गिरते राजनीतिक आचरण के...
देशवाशियों को “बंदी” को सहन करना जैसे उनकी आदत में सुमार हो चुका है. नसबंदी, नशाबंदी, नकलबंदी, भारतबंदी और आजकल नोटबंदी, जिसने देश के अब तक के सारे बंदियों और बंदों को पीछे धकेल दिया है. देश का दुर्गभाग्य कहा जाये या अक्लमंदी, जब...
कल क्रिस्टोफर हिचन्स की विदाई तिथि गुजरी है. रेशनल और वैज्ञानिक सोच का झंडा बुलंद करने के लिए उनका संघर्ष यादगार रहा है. दुर्भाग्य से भारतीय समाज में ऐसे लोग बहुत कम हुए हैं और हुए भी हैं तो उनका आम जन से रिश्ता...
तब मायावती यूपी की मुख्यमंत्री थीं और इलाहाबाद के बाहुबली सांसद अतीक अहमद जेल में बंद थे. कहानियों के मुताबिक जेलर को ऊपर से आदेश मिले थे कि अतीक अहमद को उनकी तशरीफ पर रोज सुबह-शाम चार डंडे लगाए जाएं. कहानी के मुताबिक जेलर...
देश का इतिहास गवाह है कि आज के दलित, आदिवासी, अतिपिछड़े, स्त्रियां और अन्य वंचित समुदाय का सदियों से व्यवस्था निर्माणकर्ताओं द्वारा शोषण किया गया. उन्हें अपना गुलाम बनाकर रखा गया. हमारे यहां एक वर्ग विशेष का वर्चस्व रहा जिसे सामंतवाद कहा गया. इसका...
पिछले कई महीनों से किसी न किसी बहाने ट्रिपल तलाक का मुद्दा सुर्खियों में है. कभी इस मुद्दे को किसी मंत्री के द्वारा उठाया जाता तो कभी किसी कट्टरवादी संगठन के नेता द्वारा. हाल ही में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बाकायदा यह टिप्पणी की...
आज सुबह घरों में काम करने वाली एक महिला ने बताया की 500 और 1000 रूपए के नोट बंद हो गये है. वो काफी परेशान लग रही थी, उसने आगे बताया की इस रविवार उसकी बी सी खुली थी जिसके 12000 रूपए (500 और...
मोदी सरकार 9 नवंबर से पहले छपे 500 और 1,000 के नोटों की वैधता को समाप्त करने के लिए संभवत: भारतीय रिजर्व बैंक कानून में संशोधन करेगी. आगामी बजट में इसका उल्लेख किया जाएगा. सूत्रों ने कहा कि नोटबंदी की प्रक्रिया के तहत 500...
भारत में सामाजिक राजनीतिक बदलाव को रोकने के लिये सबसे कारगर हथियार की तरह जिस उपकरण को सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया गया है वो है भारत का धर्म और अध्यात्म. भारत का धर्म और इसका पलायनवादी अध्यात्म भारत की सबसे बड़ी कमजोरी रहा है...
बनने को तो ये कहानी हजारों सालों से हाशिए पर पड़े दलित समाज के उत्थान का पैमाना बन सकती थी लेकिन एक कोशिश भर बन कर रह गई. और ये कोशिश भी ऐसी है जो बेइंतहा दिखावटी है.
क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि...
यह समाज के लिए ही नहीं बल्कि राष्ट्र के लिए भी गर्व की बात है कि बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर एक प्रबुद्ध विचारक, न्याय के पक्षधर और स्पष्टवादी व्यक्ति थे. प्रत्येक व्यक्ति का कोई न कोई प्रेरणा-सूत्र होता है. बाबासाहेब ने कबीर, फुले और...
जिन लोगों ने नवभारत की तकदीर लिखी, उन लोगों में डॉ. अम्बेडकर खास सख्शियत हैं. उन्होंने अपने कार्य से समाज, अर्थ और राजनीति ही नहीं बल्कि धर्म के क्षेत्र में भी अद्वितीय स्थापनाएं दी. आज बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर एक प्रमुख प्रेरक शक्ति हैं, जिनसे...
उत्तर प्रदेश में 2017 में होने वाला विधानसभा का आम चुनाव श्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के लिए कितना महत्वपूर्ण है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने 8 नवम्बर-2016 को सम्पूर्ण देश को आर्थिक आपातकाल के दावानल में झोंक दिया....
डॉ. भीमराव अम्बेडकर आज इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनको मानने और जानने वालों की तादाद बहुत तेजी से बढ़ रही है. आज हालात ये है कि लोग गांधी और अम्बेडकर की तुलना ही नहीं करते बल्कि यह जानने की कोशिश भी करते...
हम सब जानते है कि 6 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक का 21 महीने की अवधि में भारत में आपातकाल जारी रहा था. वह आपातकाल तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कहने पर उस समय के राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने भारतीय...
क्या आप जानते है? इक्कीसवीं सदी आपके लिए दासता की बेड़ियां निर्मित कर रही हैं. क्योंकि...
राजतन्त्रः किसी भी समाज को गुलाम अर्थात दास बनाता है. और पूंजीवाद राजतन्त्र का पोषाक होता है.
गणतन्त्रः समाज को स्वतन्त्र रखता है और पूंजीवाद गणतन्त्र का शोषक होता है.
बीसवीं सदी...
डॉ. अम्बेडकर को प्रायः दलितों के उद्धारक के रूप में पहचाना जाता है जबकि वे सभी पददलित वर्गों दलितों और पिछड़ों के अधिकारों के लिए लड़े थे. परन्तु वर्ण व्यवस्था के कारण पिछड़ी जातियां जो कि शूद्र हैं अपने आप को अछूतों (दलितों) से...
भारत का संविधान 26 नवंबर 1949 में स्वीकार किया गया. संविधान के मायने क्या होते हैं, शायद उस समय भारत के लोगों को यह पता नहीं था. लेकिन दुनिया में संविधान का महत्व स्थापित हो चुका था. अमेरिका में 1779 में संविधान बन चुका...