लाल बहादुर शास्त्री : स्वस्थ्य राजनीति का अंतिम पड़ाव

अक्सर लोग अपने और अपने परिवार के बारे में सोचते हैं. परिवार के दु:ख-सुख की सीमा ही उनका कार्य-क्षेत्र होता है. कुछ जाति और वर्ग तक सोचते हैं. जहाँ हित सध जाए ठीक. और कुछ लोग राष्ट्र तक ही सोचते हैं – वह भी सत्ता की राजनीति तक. उन्हें समाज के दु:ख-सुख से कुछ लेना-देना नहीं होता. इस परिप्रेक्ष्य में लाल बहादुर शास्त्री कहीं भी नहीं ठहर पाते. उनका सम्पूर्ण जीवन अपने-पराए की भावना से मुक्त रहा. एक आदमी का चरित्र ही जिया उन्होंने. बिना लाग-लपेट की राजनीति (स्वस्थ्य राजनीति), समाज के दु:ख-सुख का अहसास और उसका निवारण ही उनकी राजनीति का हिस्सा बनी रही.

लाल बहादुर शास्त्री के प्रधान मंत्री बनने के बाद, यह चर्चा अवश्य उभरी के जनवरी 1964 में जब शास्त्री जी को, हज़रत मुहम्म्द के बाल की चोरी की आड़ में हज़रत बल दरगाह काण्ड के तहत भड़के उपद्रवों को शांत कराने के लिए, कश्मीर जाना था तो नेहरू जी ने शास्त्री जी को अपना कोट और जूते देकर अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था. फलत: 27 मई 1964 को नेहरू जी के निधन के उपरांत सर्वसम्मति से शास्त्री जी को प्रधान मंत्री बनाया गया था. किंतु यह एक मिथक भर लगता है. उस समय के राजनीतिक भूगोल पर शास्त्री जी जैसा बेदाग न कोई चाँद था और न ही तारा. इन्दिरा गान्धी अभी अपरिपक्व थीं. परिणामत: काँग्रेस के सामने शास्त्री जी को प्रधान मंत्री बनाने के अलावा कोई विकल्प ही न था. नेहरू जी के कोट और जूते की ओट में शास्त्री जी के उन्नत, निर्मल, गरिमामय और त्यागमय व्यक्तित्व को छिपाया नहीं जा सकता. आज कितने राजनेता हैं जो शास्त्री जी की तरह आए दिन घट रही दुर्घटनाओं की जिम्मेदारी अपने सिर पर उठाकर कुर्सी का मोह छोड़ने को तैयार हैं. वे शास्त्री जी ही थे कि जिन्होंने दक्षिण-भारत में अरियालूर रेल-दुर्घटना का दायित्व अपने ऊपर लेकर मंत्री पद को त्याग दिया.

अगस्त 1962 में ‘कामराज योजना’ के तहत जब केंद्र के मंत्रियों को स्वेच्छा से अपने पद छोड़ने थे तो लाल बहादुर शास्त्री उनमें सबसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने तत्काल अपने पद से त्याग-पत्र दे दिया था. इस त्यागमूर्ति को पदलोलुपता तनिक भी न छू सकी. फिर भी शास्त्री जी का प्रधान मंत्री बनाया जाना आश्चर्यजनक जरूर था. क्योंकि गाँधी ने नेहरू परिवार के राजकुल का पौधा बड़ी कुशलता से रोपा था. उस पौधे को किस तरह की खाद गाँधी जी ने दी, इसका अन्दाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि यह वकील परिवार कुछ वर्षों में ही राजकुल में परिवर्तित हो गया. गाँधी जी ने लगभग वंशवाद की परम्परा को ध्यान में रखा था जिसका उदाहरण शास्त्री जी की मृत्यु के बाद का राजनीतिक काल है. राजीव गाँधी के निधन के बाद का समय भी नेहरू-कुल से ही कोई प्रतिनिधि ढूँढने में ही गुजर रहा था. यह वंश परम्परा का ही परिणाम है कि आए दिन काँग्रेस के वरिष्ठ नेता अलग-अलग झुंड बनाकर सोनिया गाँधी से भेंट-वार्ता के लिए जाते रहे. जबकि वो न तो काँग्रेस से कोई सीधा सम्बन्ध रखती हैं और न ही किसी मंत्री जैसे पद पर हैं. फिर वंश-परम्परा के चलते प्रधान मंत्री से लेकर काँगेस के सभी राजनेता उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के काफी व्याकुल हैं. क्या ऐसे में शास्त्री जी का प्रधान मंत्री बनना एक अजूबा नहीं था.

आज जबकि स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व के जो राष्ट्रीय लक्ष्य व आदर्श जो भारतीयों को सामुहिक रूप से स्फूरित करते थे, जैसे बिखर गए हैं. राष्ट्रीय स्वाभिमान जैसे विलुप्त हो गया है. भारतीय राजनीति का शील भंग हो गया है. आस्थाएं दगमगा रही हैं. सामाजिक न्याय का लक्ष्य मात्र भाषणों और कागजों में सिमट कर रह गया है. नीति और नीयत सब डगमगा रहे हैं. भारतीयता जैसे नैपथ्य में चली गई है. धर्मान्धता , पदलोलुपता और विलासता राजनीतिक मंच पर निर्वसन थिरक रही है. समाज में हिंसा और भ्रष्टाचार निरंतर निर्बाध गति से बढ़ता जा रहा है. लोगों की मानसिकता हिंसक होती जा रही है. राजनैतिक नारे दिशाहीनता ही पैदा कर रहे हैं. जाति-प्रथा के पोषक ही जातियता बढ़ने का शोर अलापने लगे हैं. इस सबका कारण यह कतई नहीं है कि हमारे नेता अज्ञानी हैं. उनकी दुर्बलता महज इतनी है कि वो केवल सत्ता की भाषा को ज्यादा अहमियत देते हैं. जनता के दुख-सुख से उन्हें कोई सरोकार नहीं है. वस्तुत: गाँधी ने अपने नेतृत्व में काँग्रेस को जिस ढाँचे मे ढाला, उससे जनता से सीधे सम्पर्क का दायित्व सर्वोच्च नेता के हाथ में चला गया जो जनता से अपनी बात तो करते हैं, उनकी सुनते भी हैं. आज मंत्री तो क्या उनके चमचों की संतानें/साथी/सहयोगी स्वयं को ही मंत्री जानकर व्यवहार करते हैं. ऐसे में शास्त्री जी के विचारों की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है. शास्त्री जी जमीन से जुड़े व्यक्ति थे. जमीन के दुख-दर्द को समझते थे. उनके जीवन की अनेक घटनाएं ऐसी हैं जो उनके व्यक्तित्व की गरिमा को न केवल व्यक्त करती हैं अपितु आज की राजनीति के गिरते आचरण का खुलासा करती हैं.

उत्तर प्रदेश में जब वे गृह मंत्री थे तब उनके घर में कूलर तक भी नहीं था, उन्होंने अपने परिवार जनों को समझाते हुए कहा था – “देखो! तुम देश के अति साधारण नागरिक हो. फिर यह भी संभव है कि मैं आज मंत्री हूँ, शायद कल न रहूँ. तब तुम लोगों को कूलर का अभाव और भी कष्टदायक होगा. फिर यह भी बताओ कि क्या मैं देश के सभी गरीबों के घर कूलर लगवा सकूँगा.”

उनके प्रधानमंत्री काल में उनके परिवार के एक बच्चे द्वारा फार्म प्राप्त करने के लिए सामान्य परिवार के बच्चों की पंक्ति में खड़े होना, अपने आप में एक अजब सी दास्तान है. किंतु है सत्य. अध्यापक के पूछने पर उस बच्चे का जवाब भी उदाहरणीय है. बालक ने कहा था – मैंने तो नियम का ही पालन किया है. जब सब जने पंक्ति में खड़े हैं तो मुझे भी पंक्ति में ही खड़ा होना चाहिए. इसी प्रकार की एक और घटना है कि शास्त्री जी मंत्री रहते हुए महीने के अंत में उनके नाती ने उनसे नई स्लेट लाने के लिए कहा. शास्त्री जी का उत्तर था कि दो-चार दिन की और प्रतीक्षा करो, महीने के आखरी दिन हैं, तनख्वाह मिलने पर स्लेट दिला दूँगा.

इन संदर्भों में, एक गरीब का बेटा अंत तक गरीब ही बना रहा. शास्त्री जी कहा करते थे कि जब तक देश उन्नति नहीं कर लेता, तब तक अपनी गरीबी का भी परित्याग नहीं करूँगा. वे भगवान बुद्ध से अति प्रभावित थे. वे कहते थे कि भगवान बुद्ध ने भी कहा था कि जब तक सम्पूर्ण मानवता को मुक्ति नहीं मिल जाती, तब तक मैं इस रसहीन मुक्ति को लेकर क्या करूँगा. शास्त्री जी के संदेश में सबके मन की बात का संप्रेषण होता था, तब ही उनका ‘जय किसान’, ‘जय जवान’ का नारा इतना फला-फूला कि जनता, किसान और भारतीय जवानों के सामने वर्ष 1965 के युद्ध में पाकिस्तान को पराजय का मुँह देखना पड़ा. शांति-वार्ता के दौरान उनका यह कहना कि देश का साधारण व्यक्ति युद्ध नहीं करना चाहता, वह शांति चाहता है. ताशकन्द समझौते का कारण बना. समझौता सम्मानपूर्वक सम्पन्न हो गया. किंतु दुख तो इस बात का है कि जब शांति-वार्ता के बाद उन्हें दिल का दौरा पड़ा और सदैव के चिरनिद्रा में चले गए.

आज जबकि देश के छोटे-बड़े नेता भ्रष्टाचार की लपेट में हैं – चाहे बोफोर्स तोप का मामला हो या हर्षद मेहता को शेयर काण्ड, चाहे चीनी घोटाले का मामला हो या मुलायम सिंह यादव द्वारा बन्दरबाँट, धार्मिक उन्माद का मामला हो , या मंदिर-मस्जिद का मामला, या फिर सामाजिक न्याय के मार्ग में विवाद हो, पुरातन संस्कृति का विध्न हो या फिर सत्ता-प्राप्ति के लिए मुखौटा राजनीति, श्रृषिकेश के शंकराचार्य द्वारा यौन-शोषण का मामला हो या चन्द्रा स्वामी की राजनीतिक दलाली का किस्सा हो, सबके सब में सत्ताधीशों के होने का जग-जाहिर संकेत हैं. मान-मर्यादा चली जाए, पर सत्ता पर कब्जा बना रहे, यह है आज की राजनीति का चरित्र. दिन को रात कहना पड़े या रात को दिन कोई परहेज नहीं, किंतु सत्ता बनी रहे. इसे राजनीति कहने में जीभ अटकती है क्योंकि राजनीति तो किसी भी राज्य/देश की वह नीति होती है जिसके अनुसार प्रजा का शासन तथा पालन और अन्य राज्यों से व्यवहार होता है. इसे कूटनीति (किटिल नीति) कहना ज्यादा उचित होगा.

यूँ तो भारत के कई नेता आजादी से पूर्व ही राजनीति त्याग कर कूटनीति में लिप्त हो गए थे किंतु भारत को आजाद करवाकर सत्ताधीश बनाने की ललक में संगठित थे. वैसे भी उनके सामने मसला मात्र भारत की आजादी का था, सत्ता-सुख भोगने का नहीं. फिर भी राजनीतिक गलियारों में तत्कालीन राजनीति की स्थिति अन्धों में काणें सरदार जैसी थी. उस समय कुछ तो ठीक था ही, किंतु आज बाप-रे-बाप, किसी को कुर्सी के अलावा कुछ नजर ही नहीं आता. ऐसे में यह कहना अतिश्योक्ति नहीं कि लाल बहादुर शास्त्री के निधन के साथ ही स्वस्थ्य राजनीति का पटाक्षेप हो गया. लगता है उनका दौर स्वस्थ्य राजनीति का अंतिम पड़ाव था. Read it also-सियासत / सीट बंटवारे के बाद बसपा ने बदली रणनीति

  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 
 

कल 3 अक्टूबर को EVM पर बड़ी बहस 

नई दिल्ली। ईवीएम सही या गलत, इसको लेकर छिड़ी बहस अब राजनीतिक गलियारे से निकल कर आम जनता और देश के बुद्धिजीवी और चिंतकों तक आ गई है. इसी मुद्दे पर 3 अक्टूबर को देश की राजधानी दिल्ली में एक परिचर्चा आयोजित की गई है. परिचर्चा का विषय है-“मतदान के लिए EVM कितना लोकतांत्रिक- कितना पारदर्शी?”

यह परिचर्चा कंस्टीट्यूशन क्लब के डिप्टी स्पीकर हॉल में दोपहर 2 बजे से होगा. इस कार्यक्रम में वक्ता के रूप में मीडिया जगत के दिग्गज पत्रकार उर्मिलेश, कुरबान अली, जेएनयू के प्रोफेसर आनंद कुमार, वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल, NRMU के प्रेसिडेंट कामरेड हरभजन सिंह सिद्धू और सुप्रीम कोर्ट के वकील मौजूद रहेंगे.

Read it also-दलितों का विरोध राष्ट्रव्यापी मुद्दा क्यों नहीं बन पाता?
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 

मध्य प्रदेश से बीजेपी को हटाने के लिए साथ आईं आठ पार्टियां, कांग्रेस की नो-एंट्री

भोपाल। इस साल के अंत में मध्यप्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ गठबंधन बनाने के लिए आठ राजनीतिक दलों की रविवार को भोपाल में बैठक हुई. इसमें शामिल आठों पार्टियों ने बीजेपी को सत्ता से हटाने का संकल्प लिया लेकिन कांग्रेस को भी इस गठबंधन में शामिल कर महागठबंधन बनाने के मुद्दे पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) ने विरोध किया. इस कारण कांग्रेस को इस गठबंधन में मौका नहीं मिल सका.

लोकतांत्रिक जनता दल के सलाहकार गोविन्द यादव ने बताया, ‘संवैधानिक लोकतंत्र बचाने एवं वैकल्पिक राजनीति की खातिर मध्यप्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव के लिए गैर-बीजेपी राजनैतिक दलों के गठबंधन निर्माण के लिए आठ विभिन्न राजनैतिक दलों की बैठक भोपाल में हुई. इस बैठक में लोकतांत्रिक जनता दल, सीपीआई, सीपीएम, बहुजन संघर्ष दल, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय समानता दल और प्रजातांत्रिक समाधान पार्टी शामिल हुई.’

सीपीआई और सीपीएम ने किया कांग्रेस का विरोध

यादव ने बताया कि सीपीआई और सीपीएम ने संपूर्ण विपक्षी एकता के लिए गैर बीजेपी गठबंधन निर्माण पर सैद्धांतिक सहमति व्यक्त की लेकिन कांग्रेस के साथ चुनाव पूर्व पूर्ण गठबंधन नहीं करने का फैसला लिया. शेष अन्य दलों ने संपूर्ण विपक्षी एकता के लिए कांग्रेस के साथ चुनाव पूर्व पूर्ण गठबंधन का समर्थन किया. उन्होंने कहा कि इन आठों दलों की अगली बैठक 7 अक्टूबर को आयोजित की गई है.

बता दें कि यादव वर्तमान में लोक क्रांति अभियान के संयोजक हैं. वह मध्यप्रदेश जनता दल (यूनाइटेड) के अध्यक्ष भी रह चुके हैं. उन्होंने कहा कि बीएसपी द्वारा मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए 22 प्रत्याशियों की 20 सितंबर को की गई घोषणा के बाद यह कदम उठाया जा रहा है, ताकि विपक्षी दलों के वोटों का विखराव न हो और बीजेपी को लगातार चौथी बार सत्ता में आने से रोका जा सके.

गैर-बीजेपी वोटों के बिखराव को रोकने की कोशिश

यादव ने बताया कि बीएसपी ने मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव अकेले लड़ने का ऐलान गुरुवार को कर दिया और वह सभी 230 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारेगी इसलिए हम गैर बीजेपी वोटों के बिखराव को रोकने के लिए गठबंधन करेंगे, ताकि बीजेपी को हराया जा सके. उन्होंने कहा कि विधानसभा के चुनाव के लिए अब बहुत कम समय बचा है. लंबे समय से महागठबंधन के लिए प्रयास कर रही कांग्रेस अब तक सफल नहीं हो पाई है इसलिए हम इस महागठबंधन के लिए प्रयास कर रहे हैं.

Read it also-मायावती ने फेरा कांग्रेस की उम्मीदों पर पानी
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 

SBI ने ATM से कैश निकालने की दैनिक सीमा में की बड़ी कटौती

0

नई दिल्ली। देश के सबसे बड़े बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) ने एटीएम से कैश निकालने के नियमों में कुछ बड़े बदलाव किए हैं. SBI ने कैश निकालने की दैनिक सीमा में बड़ी करने का फैसला किया है. SBI के ग्राहक 31 अक्टूबर से एक दिन में अधिकतम 20 हजार रुपये कैश ही एटीएम से निकाल सकेंगे, अभी तक यह सीमा 40 हजार रुपये थी.

SBI ने ब्रान्चों में भेजे आदेश दिया है कि एटीएम ट्रांजेक्शन में धोखाधड़ी की बढ़ती शिकायतों को देखते हुए और डिजिटल-कैशलेस ट्रांजेक्शन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से कैश निकासी सीमा को घटाने का फैसला किया गया है. ‘Classic’ और ‘Maestro’ प्लेटफॉर्म पर जारी डेबिट कार्ड से निकासी सीमा को घटाया गया है.

कैश निकासी सीमा में कटौती फेस्टिवल सीजन से ठीक पहले हुई है. सरकार द्वारा डिजिटल ट्रांजेक्शन पर जोर दिए जाने के बावजूद कैश की डिमांड अधिक बनी हुई है. कुछ अनुमानों के मुताबिक बाजार में कैश फ्लो नोटबंदी से पहले के स्तर तक पहुंच गया है.

पिछले कुछ वर्षों में कई मामलों में पाया गया है कि कार्ड का क्लोन बनाने वाले धोखेबाज आम बैंक कस्टमर्स के डेबिट कार्ड का PIN चोरी से लगाए गए कैमरों और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेज से पता कर लेते हैं.

Read it aslo-मायावती ने फेरा कांग्रेस की उम्मीदों पर पानी
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 

विवेक तिवारी हत्याकांड पर बहनजी का बड़ा बयान

लखनऊ। विवेक तिवारी हत्याकांड को लेकर बसपा सुप्रीमो मायावती ने प्रदेश की योगी सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं. उन्होंने कहा कि योगी सरकार में प्रदेश के ब्राह्मणों का शोषण हो रहा है. पूरे प्रदेश में भय का माहौल व्याप्त है. उन्होंने हत्याकांड की उच्चस्तरीय जांच करने की मांग करते हुए आरोप लगाया कि सरकार सिर्फ खानापूर्ति कर रही है. बसपा प्रमुख ने लखनऊ में मीडिया से ये बातें कही.

बसपा प्रमुख ने सीएम योगी को निशाने पर लेते हुए कहा कि सरकार इस मामले पर सिर्फ खानापूर्ति कर रही है. अब तक अफसरों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई है. अगर मैं मुख्यमंत्री योगी की जगह होती तो अब तक अफसरों के खिलाफ एक्शन ले लेती. योगी ने पीड़ित परिवार से मुलाकात की और मदद का आश्वासन दिया. ऐसा करके सरकार किसी तरह मामले को दबाना चाहती है. सिर्फ इतना करने से ही काम नहीं चलेगा. जब प्रदेश की राजधानी में ये हाल है तो पूरे प्रदेश की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है.

यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि ऐसा लगता है कि प्रदेश में अब कानून-व्यवस्था नाम की चीज नहीं है. चुनाव में भाजपा ने सपने दिखाए थे कि कानून का राज स्थापित होगा लेकिन हर वादे की तरह ये भी हवा-हवाई साबित हुआ. मायावती ने कहा कि हमने सतीश चंद्र मिश्रा जी को पीड़ित परिवार से मिलने भेजा है. सतीश वकील हैं. अगर परिवार चाहे तो वह (सतीश) मामले की पैरवी करने के लिए भी तैयार हैं.

Read it also-प्रमोशन में आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के फैंसले का मायावती ने किया स्वागत
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 

8वीं पास के लिए 16 हजार की नौकरी यहां है

नई दिल्ली। कोलकाता हाईकोर्ट ने ग्रुप डी के पदों के लिए आवेदन मंगाए हैं. ये भर्तियां फराश, पियोन, अर्दली, बरकंदज़, दरवान, नाइट गार्ड व क्लीनर के 221 पदों के लिए होनी हैं. इच्छुक और योग्य उम्मीदवार कोलकाता हाईकोर्ट की ऑफिशियल वेबसाइट calcuttahighcourt.gov.in पर जाकर ऑनलाइन अप्लाई कर सकते हैं. योग्यता इन पदों पर आवेदन करने के लिए उम्मीदवारों को किसी भी मान्यता प्राप्त संस्थान से 8वीं कक्षा पास करना जरूरी है. इसके अलावा उसे बंगाली और इंग्लिश भाषा पढ़नी आती हो. उम्र सीमा उम्मीदवार की उम्र 18 साल से 40 साल के बीच होनी जरूरी है. आवेदन शुल्क- सामान्य वर्ग- 400 रुपए एससी/एसटी वर्ग- 150 रुपए सैलरी 4,900 से 16,200 रुपये महीना अंतिम तारीख- 29 अक्टूबर चयन प्रक्रिया- सफल उम्मीदवारों का चयन लिखित परीक्षा के आधार पर किया जाएगा. कैसे करें आवेदन उम्मीदवारों को ऑनलाइन माध्यम से ही अप्लाई करना होगा. इच्छुक और योग्य उम्मीदवार आधिकारिक वेबसाइट calcuttahighcourt.gov.in पर जाकर ऑनलाइन आवेदन करें. Read it also-राज्य दे सकते हैं प्रमोशन में आरक्षण: सुप्रीम कोर्ट
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 

योगी से मिलीं विवेक तिवारी की पत्नी, 40 लाख मिला

लखनऊ। यूपी की राजधानी लखनऊ में पुलिस की गोली से विवेक तिवारी की मौत के मामले में मृतक की पत्नी कल्पना तिवारी ने सीएम योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की. सोमवार सुबह हुई इस मुलाकात में कल्पना के साथ उनके भाई भी मौजूद थे. इस दौरान मुख्यमंत्री ने उन्हें 25 लाख रुपये का मुआवजा के अलावा दोनों बेटियों और विवेक की मां के लिए 5-5 लाख रुपये का फिक्स डिपोजिट देने का ऐलान किया. इससे पहले रविवार को विवेक तिवारी का अंतिम संस्कार कर दिया गया. उनकी पत्नी ने पति की मौत की जांच SIT से करने की मांग की. Read it also-हत्या के इस मामले से मुश्किल में सीएम योगी
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 
   

हिंदी दलित साहित्य का धारावी केन्द्र शाहदरा-दिल्ली

गए दिनों जामिया मिलिया विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग की विभागाध्यक्ष डा. हेमलता माहेश्वर अपने शोधकर्ता छात्र के साथ मेरे घर आई थीं. तब उनके साथ दलित साहित्य आंदोलन के इतिहास पर बातों-बातों में एक गंभीर चर्चा हुई। पहली पीढी के रचनाकारों के संघर्ष को सुन/जानकर वो इतनी अचंभित हुईं कि यकायक  उनके मुख से निकल पड़ा कि पूर्वी दिल्ली का शाहदरा क्षेत्र तो दलित साहित्य के विकास, प्रचार और प्रसार के लिहाज से जैसे मुम्बई ‘धारावी’ है. उसी दिन दैनिक जागरण में छपी खबर के जरिए यह भी जानने को मिला कि विश्व विख्यात मुक्केबाज माइक टायसन ने कहा कि झुग्गियों से आते हैं स्टार.  टायसन ने यह भी इच्छा जाहिर की कि उनकी इच्छा ताजमहल व मुंबई की “धारावी” को देखने की चाहत है. उल्लेखनीय है कि  पिछले दिनों रजनीकांत की पिक्चर “काला” देखी तो झोपड़ पट्टी से उठी ज्वालामुखी को काले, लाल रंग मे फटते देखा और देखते ही देखते समता व स्वतंत्रता की विजय चाहत से पूरा ‘धारावी’ जनसमूह धरती आसमान सहित नीला-नीला दिखने लगा.
मराठी दलित साहित्य मुंबई की झोपड़ पट्टी से ही उभरा था. दलित पैंथर के कारण ही दलित साहित्य अपनी अस्मिताओं के प्रखर सवालों को केंद्र मे रख आंदोलनात्मक स्वरुप ले सका और सन् 60 के दशक में परम्परावादी साहित्य के सामने गंभीर चुनौती खडी कर दी. यहाँ यह बताना मैं जरूरी समझता हूँ कि यथोक्त प्रकरण ने ही इस लेख को लिखने के लिए मुझे प्रेरित किया है. यह भी कि  मुंबई का ‘धारावी’ क्षेत्र एशिया का सबसे बडा झोपड़ पट्टी का स्लम एरिया था जंहा से शोषण के खिलाफ मोर्चा लगा आवाज उठाने वालो में विश्व विख्यात लोककवि/ शायर अन्नाभाऊ साठे, बाबूराव बाबुल, अर्जुन डांगले, पदमश्री दया पंवार प्रमुख कवि/लेखक रहे हैं, जिन्होनें दलित पैंथर की नींव रखी. बाद में  मुंबई,  नागपुर, नासिक, औरंगाबाद आदि केंन्द्र इनके कार्यक्षेत्र बनें। यह वह दौर था जब दलित साहित्य ने व्यवस्था के विरूद्ध परम्परावादी साहित्यकारों को एक खुली चुनौती दी और लोकशाही में अपने बुनियादी हकूक के सवालो को उठाया था. इसी प्रकार हिन्दी पट्टी में पूर्वी दिल्ली का शाहदरा क्षेत्र दलित साहित्य आंदोलन का केन्द्र ही नही रहा बल्कि भारत की राजनीतिक राजधानी को नानाप्रकार से प्रभावित करता रहा है. जनांदोलन में इस क्षेत्र की सबसे अधिक भागीदारी आज भी होती है. सच मायने में पूर्वी दिल्ली का शाहदरा क्षेत्र उत्तर भारत में हिंदी दलित साहित्य आंदोलन के लिहाज से मुम्बई  का यह ‘धारावी” है. आज यंहा एक ‘ साहित्यकार चौक’  भी है जंहा दैनिक रुप से क्षेत्रीय साहित्यकारों की बैठकी होती है.
उपेक्षित बहुसंख्यकों की आवाज ही दलित साहित्य आंदोलन है जो बुध्द, कबीर, फूले, डा.अम्बेडकर की विचारधारा को केन्द्र में रखकर दुनिया में सामाजिक न्याय हेतु दस्तक दे रहा है. बात सत्तर के दशक की है जब दिल्ली का शाहदरा क्षेत्र खेतिहर क्षेत्र हुआ करता था. जिसमें नयी-नयी रिहायशी कालोनियां बस् रही थीं. उत्तर भारत के लोग दिल्ली मे सरकारी नौकरियों के लिए आए तो कुछ देवनगर/बापा नगर किराए पर रहने लगे तो कुछ सरकारी नौकरियों के कारण अपनी स्थाई छत के लिए रिहायशी जगह ढूढने लगे और शाहदरा में आकर उ.प्र. व अन्य प्रदेशों के लोग जमीन खरीद कर बसने लगे तो कुछ सरकारी क्वार्टरों मे रहने लगे.
शाहदरा क्षेत्र मे ‘ गोवर्धन बिहारी ‘एक विख्यात नाम था. जो दो व्यक्ति और एक शरीर (आत्मा) के नाम से जाने जाते थे. जो दलित समाज के समाज सुधारक जनकवि थे. जिनका लोहा समकालीन साहित्यकार मसलन, संस्कृत के उद्भट विद्वान भरत राम भट्ट, पदमश्री क्षेम चंद सुमन, कैलाश चंद तरुण, हंसराज रहबर,पं त्रिलोक चंद “आजम”, आचार्य चतुरसैन शास्त्री, फतेहचंद शर्मा ‘आराधक’,  डा.विजेन्द्र स्नातक, पदमश्री डा.श्याम सिंह ‘शशी’ , डा.बृजपाल सिहं संत, डा. जगन्नाथ हंस, डा.शंकर देव अवतरे, मदन विरक्त, डा.धर्मवीर शर्मा आदि मानते थे. आचार्य जनकवि बिहारी लाल हरित जंहा समाज सुधारक कवि थे तो उनके संपर्क  बाबा साहब डा.अम्बेडकर व बाबू जगजीवन राम से भी घनिष्ठ संबध रहे थे. जिनके नाम से गोवर्धन बिहारी कालोनी शाहदरा में बसी है. बाद में यमुनापार, शाहदरा में सादतपुर कालोनी, दयाल पुर में बसीं. यंहा बाबा नागार्जुन आकर बसे और उनसे प्रभावित लोगों/साहित्यकारों ने आकर जमीन खरीदकर अपने निजी मकान बनाये जिनमें हरिपाल त्यागी, रामकुमार कृषक, महेश दर्पण, माहेश्वर, रुपसिंह चंदेल आदि जनवादी विचारधारा के लेखकों /पत्रकारों ने अपने-अपने निवास बनाए. इसका एक कारण एशिया का प्रिंटिंग प्रकाशन का उधोग नवीन शाहदरा में होना भी था. आज भी यमुनापार में प्रकाशको की भरमार है. उत्तर भारत का हिन्दी साहित्य ज्यादातर यही छपता है.
एक तरफ परम्परागत साहित्यकार थे तो दूसरी तरफ प्रगतिशील जनवादी साहित्यकार, इसी में एक तीसरी धारा के दलित साहित्यकार अपना साहित्यिक दबदबा बनाए हुए थे. इस त्रिवेणी धारा में आपसी साहित्यिक तालमेल हमेशा बना रहा और साहित्यिक विमर्श /चर्चा परिचर्चा/कवि-सम्मेलन आदि चलते रहते थे. यंहा अनेकों साहित्यिक संगठनों द्वारा आयोजन समय-समय पर आयोजित किए जाते रहते थे जो परम्परा अब कम होती जा रही है.
आचार्य जनकवि बिहारी लाल हरित के सानिध्य में अनेकों दलित साहित्यकारों ने आज अपने लेखन से राष्ट्रीय एवं अंतराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है. जिनमें एल.एन.सुधाकर, एन.आर.सागर, डा.राजपाल सिंह ‘राज’, डा.सोहनपाल सुमनाक्षर, यादकरण याद, डा.कुसुम वियोगी, कवि/पत्रकार व ख्यात आलोचक तेजपाल सिंह ‘तेज’  इंजि.श्याम सिंह,  प्रख्यात आलोचक कंवल भारती, बुध्द संघ प्रेमी, नत्थू सिंह ‘पथिक’ , जसराम हरनोटिया, मंशा राम विद्रोही, रामदास शास्त्री,  आर.डी.निमेष, मोतीलाल संत, कर्मशील अधूरा, बी.डी.सुजात, अनुसूईया ‘अनु’ ,धनदेवी, आनंद स्वरुप, के.पी.सिंह आदित्य, जालिम सिंह ‘ निराला’ , मान सिंह ‘मान’, लख्मी चंद सुमन आदि प्रमुख हैं. वर्तमान में डा. जयप्रकाश कर्दम, ईश कुमार गंगानिया, शीलबोधी, राजेश कुमार हरित, रुप चंद गौतम पत्रकार आदि इसी क्षेत्र से दलित साहित्य का प्रतिनिधित्व करते हैं.
1984 में भारतीय साहित्य मंच (पंजि.) भारतीय दलित साहित्य अकादमी का गठन किया गया तो  15,अगस्त 1997 को दलित लेखक संघ का गठन भी यमुनापार शाहदरा, रामनगर विस्तार अवस्थित मेरे ही निवास व प्रयास पर अनेक सहयोगी साहितकारों के सहयोग से ही हुआ था. वर्ष 2001 में मेरे चंडीगढ़ नियुक्ति के दौरान डा.अम्बेडकर स्टडी सर्कल चंडीगढ़ के माध्यम से 21 वीं शताब्दी का प्रथम दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय दलित साहित्यकार सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें देश विदेश से लगभग 450 अकादमिक व नान-अकादमिक सामाजिक कार्यकर्ता कवि लेखक साहित्यकारों ने भाग लिया था. जिसमें मुकेश मानस द्वारा ख्यातिनाम दलित कवियों की कविताओं की पोस्टर प्रदर्शनी भी लगायी थी. जिसका कोर्डिनेटर मैं स्वयं रहा, रजनी तिलक व अश्वनी कुमार ने इस आयोजन मे महती भुमिका निभाई.
उल्लेखनीय है इस दो दिवसीय कार्यक्रम का संचालन तेजपाल सिंह ‘तेज’ द्वारा ही किया गया। इस प्रकार  दलित साहित्य पूरी शिद्दत के साथ पूरे भारत मे छा गया. इस आयोजन मे विशेष रुप पंजाब के क्रांति चेता कवि लाल सिंह ‘दिल ‘ को आमंत्रित किया गया था. बाद के  दिनों में दलित लेखक संघ के बैनर तले डा. तेज सिंह के अध्यक्ष रहते उनके नेतृत्व में दो-तीन सेमिनार भी आयोजित किए गये। डा. तेज सिंह के संपादन में दलित लेखक संघ की केन्द्रीय पत्रिका ‘ अपेक्षा ‘ भी निकली. दलित साहित्य के मूल मे डा. अम्बेडकर की वैचारिकी ही सर्व स्वीकार्य है, जो विषमता मूलक समाज में सदैव केंद्र मे रहेगी. बकौल डा. विमलकीर्ती – प्रगतिशील लेखक आधुनिक काल के बाद को उत्तर आधुनिक काल /उत्तर सती कह कर अपने लेखन को आगे बढते हैं तो अम्बेडकरवादी दलित साहित्यकार आधुनिक काल के बाद के काल को अर्थात 1947 से ” प्रश्नोत्तर काल का साहित्य ( सन् 1947 से आज तक ) मानते है. दलित साहित्यकारों ने समाज की जड़ता व विद्रूपताओ पर करारा प्रहार किया है. जो दलित उत्पीडित समाज के सामाजिक/सांस्कृतिक/आर्थिक,शैक्षणिक /धार्मिक व राजनीतिक प्रश्नों को लेकर व्यवस्था के सामने बेबाक हो, अपनी अस्मिताओं के संरक्षण के सवालों को लेकर खडे हुए हैं और सतत लिख रहे हैं. दलित साहित्य सही अर्थो मे व्यवस्था परिवर्तन के साथ जातिविहीन, वर्गविहीन समाज की स्थापना को संघर्षरत साहित्य ही है.
राजनीतिक आंदोलन की जमीन तैयार करने मे अम्बेडकरवादी साहित्यकारों की महती भूमिका को कभी भुलाया व नकारा नहीं जा सकता. आज दलित साहित्य पुरे देश व दुनिया में अपनी दस्तक ही नही दे रहा है बल्कि शैक्षिक पाठ्यक्रमों मे शामिल कर देश-विदेशों मे पढाया भी जा रहा है. आज पुस्तकों के बाजार में तीसरी धारा के दलित साहित्य को पढने वालो का एक व्यापक पाठक वर्ग उभर कर सामने आया है जो अपनी अस्मिता के सवालों को इस साहित्य मे खोजता  है और पढ लिखकर सामाजिक न्याय आंदोलन का सूत्रधार भी बनता है. आज दूसरी पीढी के अनेक कवि/ कवियत्री व लेखक/पत्रकार साहित्यकारों ने अपनी मजबूत दस्तक देनी शुरू कर दी है जो एक समतामूलक समाज के निर्माण हेतु अच्छा संकेत है.

डा.कुसुम वियोगी

Read it also-कार में गाना बजाने पर दलित युवक की पिटाई, मां पर भी हमला

  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 

बिहारः नीतीश की योजना को पूरा करने में गई दलित वार्ड सदस्य की जान, राजपूत मुखिया ने पीट कर मार डाला

 

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की महत्वकांक्षी योजना सात निश्चय योजना को ईमानदारी से जमीन पर उतारने की जिद ने एक दलित युवक की जान ले ली. प्रदेश के छपरा में एक गुंडे मुखिया मुन्ना सिंह और उसके समर्थकों ने दिव्यांग दलित वार्ड सदस्य को पीट-पीट कर मार डाला. घटना सारण जिले के डेरनी थाना क्षेत्र के डीह पिरारी पंचायत में 22 सितंबर को घटी.

दरअसल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने चुनाव के दौरान सात निश्चय योजना का जिक्र किया था. इस योजना को नीतीश हर हाल में पूरा करना चाहते थे. इन सात निश्चय में शिक्षा, सड़क, बिजली, शौचालय, पानी, रोजगार, महिलाओं को रोजगार जैसे मुद्दे शामिल किए गए थे. बड़ा बदलाव करते हुए सरकार ने पंचायत के हर वार्ड सदस्य को विकास कार्यों में सहयोगी बनाने का निर्णय लिया था, जिसमें राज्य के एक लाख 14 हजार 733 वार्ड सदस्यों को भागीदार बनाया गया. यही बात मुखिया के पद पर कब्जा जमाए कथित ऊंचे तबके के लोगों को चुभने लगी, क्योंकि कुछ भुगतान में वार्ड सदस्य की सहमति जरूरी थी.

आरोपी मुखिया मुन्ना सिंह

जानकारी के अनुसार 22 सितंबर की रात को वार्ड सदस्य नंद कुमार राम से चेक पर साइन लेने के लिए मुखिया मुन्ना सिंह अपने समर्थकों के साथ उसके घर पहुंच गया. लेकिन योजना में गड़बड़ी के कारण वार्ड सदस्य नंद कुमार राम ने चेक पर साइन करने से मना कर दिया. इंकार सुनने के बाद मुखिया और उनके समर्थकों ने वार्ड सदस्य को बेरहमी से पीटा. गंभीर रूप से घायल वार्ड सदस्य को पीएमसीएच में भर्ती कराया गया, जहां 26 सितंबर को देर रात उनकी मौत हो गई. डीह पिरारी पंचायत के मुखिया मुन्ना सिंह समेत 10 लोगों को नामजद अभियुक्त बनाया है.

मृतक वार्ड सदस्य ने अपने नजदीकियों को बताया था कि सात निश्चय योजना की राशि को मुखिया बंदरबांट करना चाह रहा है. इसलिए जबरन चेक पर हस्ताक्षर कराना चाह रहा था. इसको लेकर वार्ड सदस्य बराबर विरोध करता था. वह राशि गलत तरीके से निकासी होने से रोक रहा था. घरवालों का कहना है कि इसको लेकर मुखिया से महीनों से विवाद चल रहा था. जिसके बाद आखिरकार वार्ड सदस्य नंद कुमार राम को इसकी कीमत जान देकर चुकानी पड़ी. अब देखना यह है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जिस महत्वकांक्षी योजना को सच्चाई से जमीन पर लागू करने के कारण एक दलित विक्लांग वार्ड सदस्य को अपनी जान देनी पड़ी, मुख्यमंत्री और स्थानीय प्रशासन उसे न्याय दिला पाते हैं या नहीं.

Read it also: दलितों का विरोध राष्ट्रव्यापी मुद्दा क्यों नहीं बन पाता?
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 

दलितों का विरोध राष्ट्रव्यापी मुद्दा क्यों नहीं बन पाता?

भारत देश में पद्मावती विवाद जैसे फ़िज़ूल मुद्दे आंदोलन का रूख अख्तियार कर लेते हैं, परंतु दलितों का विरोध प्रदर्शन कभी राष्ट्रव्यापी आंदोलन नहीं बन पाता. जबकि भारत में दलितों की जनसंख्या, पद्मावती विवाद को लेकर तोड़-फोड़ करके राष्ट्र का नुकसान करने वाले जाति वर्ग की जनसंख्या से कई गुना अधिक है. कारण क्या है? आइए समझते हैं…

{मीडिया की भूमिका}

आंदोलन अचानक नहीं खड़ा होता है…आंदोलन को खड़ा करना पड़ता है… पहली क्रिया को देखकर ही दूसरी प्रतिक्रिया होती है. पहले चिंगारी निकलती है, फिर धीरे-धीरे वह आग बनती है. पहले एक आवाज़ उठती है, फ़िर उस आवाज़ को सुनकर ही उसके समर्थन में दूसरी आवाज़ उठती है.

पद्मावती मामले में मीडिया की भूमिका को आपको ठीक से समझना चाहिए. मीडिया ने शुरू से ही इस विवाद में काफ़ी दिलचस्पी दिखाई है, और पद्मावती का विरोध कर रहे जाति समुदाय को खूब प्रचार दिया है. पद्मावती के विरोध की हर घटना को टी०वी० ने सभी जगह दिखाया है. और यही सब देख-देखकर ही यह विरोध प्रदर्शन अपने पैर पसारता गया. धीरे-धीरे इस विरोध में हर राज्य से संबंधित जाति समुदाय के लोग जुड़ते गए. और यह बड़ा बनता गया. हम यह कह सकते हैं कि मीडिया ने ही इस विरोध प्रदर्शन को अपने कैमरे के जरिए घर-घर तक पहुँचा दिया.

अब ज़रा दलितों के विरोध प्रदर्शन पर आइए…

जो मीडिया का कैमरा अन्य जगह बहुत तीव्र गति से घूमता है, वही कैमरा दलित आंदोलन पर न जाने कहाँ खो जाता है. उदाहरण-

गुजरात के उना में दलितों को महिन्द्रा ज़ायलो गाड़ी से बाँधकर निर्ममता से लोहे की बेंते मारी गई. जिसके बाद गुजरात भर में दलितों ने संवैधानिक व शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन किया जिसमें उन्होने मरी हुई गायों को उठाकर उसकी खाल उतारने की जगह उन मरी हुई गायों को हर जिले के कलेक्ट्रेट कार्यालय में फेंक आए और कहा ‘तुम्हारी माँ, तुम ही सँभालो’. काफ़ी दिनों तक यह विरोध प्रदर्शन चला…परंतु किसी न्यूज़ चैनल नें इस विरोध प्रदर्शन में तनिक भी दिलचस्पी नहीं ली. समाचार पत्रों में भी यह विरोध प्रदर्शन जगह नहीं बना पाया. जिसके कारण यह बड़ा आंदोलन बनने से पहले ही दब गया. अगर इसे मीडिया ने दिखाया होता, तो निश्चित रूप से गुजरात के विरोध प्रदर्शन का असर इतर राज्यों में भी दिखाई पड़ता, परंतु गुजरात के दलित आंदोलन कि सवर्ण आधिपात्य वाली गोदी मीडिया ने कोख में ही भ्रूण हत्या कर दी.

दूसरा उदाहरण लीजिए-

कुछ दिनो पूर्व भीमा कोरेगाँव में दलित समुदाय अपने महार सैनिकों की जीत का जश्न मनाने एकत्रित हुए. जिन पर अचानक भगवा झंडा लिए हथियारबंद हिंदूवादियों ने हमला कर दिया, व दलितों को दौड़ा दौड़ा कर पीटा व उनकी गाड़ियों के शीशे तोड़ दिए. इस हमले के विरोध में महाराष्ट्र में दलित समुदाय के लोगों ने बहुत भारी विरोध प्रदर्शन किया. परंतु भीमा कोरेगाँव में हुए दलित उत्पीड़न की खबर किसी चैनल (सिवाय एन०डी०टी०वी० के) ने नहीं दिखाई. इसलिए वह विरोध प्रदर्शन भी महाराष्ट्र में ही दबकर रह गया.

यह तो रही मीडिया की भूमिका जो बहुत ज़रूरी होती है. परंतु मीडिया में हद से ज्यादा सवर्ण वर्ग के आधिपात्य के चलते मीडिया बहुजनों के मुद्दों को निगल जाता है, और डकार भी नहीं लेता. (अमेरिका में मीडिया हाउसेज़ अपने न्यूज़ चैनल में अश्वेतों की नियुक्तियों पर खासा ध्यान रखते हैं)

{समाज की भूमिका}

जब जब दलित अपने हक के लिए खड़ा होगा ! तुरंत ही कुछ ऐंटीना धारियों को डर लगने लगता है कि जिस फर्जी हिंदुत्व के नाम पर उन्होने विराट हिंदू एकता स्थापित कर अपना राज स्थापित किया है, वह विराट हिंदू एकता टूट रही है. अब वह आपको वापस अपने फर्जी विराट हिंदू एकता में शामिल करने के लिए जुगत भिड़ाने लगते हैं. इसके तहत तुरंत ही वो किसी एक मुसलमान को उन दलितों के विरूद्ध खड़ा कर देते हैं… ताकि दलितों के सवर्णों के खिलाफ़ उबल रहे गुस्से को हिंदू-मुसलमान ऐंगल देकर अपनी रोटी सेंकी जाए. और दुर्भाग्यवश ऐसा हो भी जाता है. दलित आंदोलन अपने मूल मुद्दे से भटककर हिंदू-मुसलमान विवाद बन जाता है. जिसमें लाठियाँ तो दलित खाता है, परंतु बाद में राज सवर्ण करते हैं. (वे आप पर राज इसलिए नहीं कर रहे हैं, क्योंकी वे बुद्धिमान है! बल्कि इसलिए कर रहें हैं क्योंकी आप बेवकूफ़ है)

{राजनीति की भूमिका}

दलितों को हमेशा कोर वोट बैंक माना गया है, क्योंकी दलित केवल झंडा और निशान देखकर वोट करता है. जिसका फ़ायदा सभी पार्टियाँ उठाती हैं. जिस पार्टी को दलितों का वोट मिलता आया है, वे इसलिए कुछ नहीं बोलती क्योंकी उन्हे तो दलितों का समर्थन है ही! और जिस पार्टी को दलितों का वोट नहीं मिलता है, वे खुलकर दलितों के मुद्दों को दरकिनार कर दूसरी जातियों को अपनी ओर खींचती है. परंतु सवर्ण वोटर बहुत चालाकी से हर चुनाव में अपना पाला बदलते रहते हैं. वे कभी कांग्रेस में रहे…फिर एक वर्ग सतीश मिश्रा के कारण बसपा में गया, और दूसरा वर्ग रघुराज प्रताप सिंह के कारण सपा में आया ! आजकल वे सभी भाजपा में हैं. वे कभी किसी एक के नहीं रहे, और इस बात का उन्हे लाभ भी खूब मिला. वे किसी के कोर वोटर नहीं बनते, जिसके कारण हर पार्टी उन्हे अपनी तरफ़ खींचने की जुगत में रहती है. इसी कारण पार्टियाँ दलित मुद्दों पर ध्यान नहीं देती क्योंकी उन्हे पता है कि दलितों का वोट तो वहीं जाएगा, जहाँ हमेशा से जाता रहा है. इसी कारण दलितों के आंदोलनों को राजनैतिक साथ भी नहीं मिल पाता.

इन्ही सब सम्मिलित कारणों से दलितों का आंदोलन कभी राष्ट्रव्यापी नहीं बन पाता.

बहुत लंबा झोल-झाल है… हर किसी को समझना चाहिए.

प्रतीक सत्यार्थ

Read it also-मायावती ने फेरा कांग्रेस की उम्मीदों पर पानी

  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 
 

हत्या के इस मामले से मुश्किल में सीएम योगी

0

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को महराजगंज की सत्र अदालत ने 19 साल पुराने एक मामले में नोटिस भेजा है और एक हफ़्ते के भीतर नोटिस का जवाब देने को कहा है. मामले की अगली सुनवाई 27 अक्टूबर को होगी. हालांकि, इस मामले को महराजगंज की ही सीजेएम कोर्ट ने पिछले दिनों ख़ारिज कर दिया था लेकिन हाईकोर्ट ने इसे दोबारा शुरू करने का आदेश दिया है.

मामला 1999 का है. जब महराजगंज के पचरुखिया में क़ब्रिस्तान और श्मशान की ज़मीन को लेकर हुए विवाद के मामले में गोरखपुर के तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ समेत कुछ लोगों के ख़िलाफ़ महराजगंज कोतवाली में केस दर्ज किया था. इस विवाद में समाजवादी पार्टी की नेता तलत अजीज़ के सुरक्षा गार्ड और पुलिस कांस्टेबल सत्यप्रकाश यादव की गोली लगने से मौत हो गई थी. इस मामले में तलत अजीज़ ने योगी और उनके साथियों के ख़िलाफ़ 302, 307 समेत आईपीसी की कई धाराओं में एफ़आईआर दर्ज कराई थी जबकि बाद में महराजगंज कोतवाली के तत्कालीन एसओ बीके श्रीवास्तव ने भी योगी और 21 अन्य लोगों के ख़िलाफ़ आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया था.

वहीं, इस मामले में तीसरी एफ़आईआर तत्कालीन सांसद और मौजूदा सीएम योगी आदित्यनाथ की ओर से तलत अजीज़ और उनके साथियों के ख़िलाफ़ दर्ज कराई गई थी जिसमें तलत अजीज़ और उनके साथियों पर योगी के काफ़िले पर हमला करने का आरोप लगाया गया था. राज्य की तत्कालीन कल्याण सिंह सरकार ने मामले की जांच सीबीसीआईडी से कराई थी जिसने अंतिम रिपोर्ट लगाकर बाद में मामले को बंद कर दिया था.

Read it also-सपा-बसपा समर्थकों को अपने पाले में लाने के लिए भाजपा का नया दांव
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 

जान लिजिए, अब आधार कहां जरूरी और कहां नहीं

0

नई दिल्ली। आपको अपना आधार नंबर कहां शेयर करना है और कहां नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कन्फ्यूजन खत्म कर दिया है. देश की सर्वोच्च अदालत ने बुधवार को आधार पर फैसला सुनाते हुए इसे संवैधानिक रूप से वैध तो माना, लेकिन साथ ही यह भी साफ कर दिया है कि इसे हर किसी से शेयर करना जरूरी नहीं है. कोर्ट ने अपने फैसले में साफ किया कि आधार नंबर कहां देना जरूरी है और कहां नहीं. आइए जानते हैं अब कहां जरूरी होगा आधार और कहां नहीं…

जहां आधार जरूरी होगा-

1-पैन कार्ड बनाने के लिए आधार कार्ड जरूरी होगा 2-आयकर रिटर्न दाखिल करने के लिए भी आधार नंबर जरूरी होगा. 3-सरकार की लाभकारी योजनाओं और सब्सिडी का लाभ पाने के लिए भी आधार कार्ड अनिवार्य होगा.

यहां आधार जरूरी नहीं 1– मोबाइल सिम के लिए कंपनी आपसे आधार नहीं मांग सकती. 2– अकाउंट खोलने के लिए भी बैंक में आधार जरूरी नहीं. 3– स्कूल ऐडमिशन के वक्त स्कूल बच्चे का आधार नंबर नहीं मांग सकता है. 4– सीबीएसई, नीट और यूजीसी की परीक्षाओं के लिए भी आधार जरूरी नहीं. 5– सीबीएसई, बोर्ड एग्जाम में शामिल होने के लिए छात्रों से आधार की मांग नहीं की जा सकती है. 6- 14 साल से कम उम्र के बच्चों के पास आधार नहीं होने पर भी उसे केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा दी जाने वाली जरूरी सेवाओं से वंचित नही किया जा सकता है. 7– ई-कॉमर्स फर्म, प्राइवेट बैंक और इस तरह के अन्य संस्थान आधार की मांग नहीं कर सकते हैं.

आधार पर अपने फैसले के दौरान कोर्ट ने कुछ और भी महत्वपूर्ण बातें कही, जिसे जानना जरूरी है. सर्वोच्च न्यायालय ने कहा-

  • आधार आम लोगों के हित के लिए काम करता है और इससे समाज में हाशिये पर बैठे लोगों को फायदा होगा.
  • आधार पर हमला संविधान के खिलाफ है. इसके डुप्लिकेट होने का कोई खतरा नहीं. आधार एकदम सुरक्षित है.
  • लोकसभा में आधार बिल को वित्त विधेयक के तौर पर पास करने को सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया.
  • सुप्रीम कोर्ट ने आधार ऐक्ट की धारा 57 को रद्द करते हुए कहा कि प्राइवेट कंपनियां आधार की मांग नहीं कर सकतीं.
  • आधार डेटा को 6 महीने से ज्यादा डेटा स्टोर नहीं किया जा सकता है. 5 साल तक डेटा रखना बैड इन लॉ है. Read
Read it also-महादलितों को लुभाने के लिए नीतीश करेंगे महासम्मेलन
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 

सियासत / सीट बंटवारे के बाद बसपा ने बदली रणनीति

रायपुर। 13 अक्टूबर को बिलासपुर में मायावती के मेगा शो के बाद बसपा अपने प्रत्याशियों का ऐलान करेगी. दो चरणों में प्रत्याशियों की सूची घोषित करने का संकेत है. दरअसल, बसपा के हिस्से में आई 35 सीटों के बाद एक बार फिर मंथन किया जा रहा है. पहले पार्टी ने अपने उम्मीदवारों को करीब करीब तय कर लिया था.

उम्मीदवारों की सीटें बदल सकती हैं

पहले पार्टी ने सभी 90 सीटों पर पैनल बना लिए थे. जिन्हें पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती को सौंपा जा चुका था. माना जा रहा है कि प्रत्याशियों की सूची घोषित करने से पहले उम्मीदवारों को बसपा सुप्रीमो से भी मिलवाया जा सकता है. इसके लिए कुछ उम्मीदवारों को तैयार रहने के लिए कहा गया है. पार्टी को कुछ सीटें ऐसी भी मिल गई है जिन पर पिछले चुनाव में उसका प्रदर्शन प्रभावी नहीं रहा है.

पार्टी सूत्रों के मुताबिक पहले बनाए गए 90 सीटों के पैनल में कुछ सीटों पर मजबूत उम्मीदवारों के नाम सामने आए थे. लेकिन सीट बंटवारे के बाद उनके क्षेत्र की सीट जोगी कांग्रेस के हिस्से में चली गई है. ऐसी स्थिति में बसपा कुछ एक सीटों पर मजबूत प्रत्याशियों को क्षेत्र बदल कर भी चुनावी रण में उतार सकती है. हिस्से में आई 35 सीटों में नए सिरे से उम्मीदवारों की स्थिति का आकलन भी किया जा रहा है.

टिकट बांटने के लिए पार्टी ने कुछ पैमाने तय कर रखे हैं. इसमें जातीय समीकरणों को भी देखा जा रहा है. ताकि ऐसे उम्मीदवार को सामने लाया जा सके जिसकी जीत की संभावनाएं ज्यादा हो. पिछले बार कम मार्जिन से चुनाव हारने वाले दावेदारों को पार्टी दोबारा या तीसरी बार भी टिकट दे सकती है. बशर्त है कि कार्यकर्ताओं का अप्रूवल भी उसके साथ हो.

35 सीटों पर प्रत्याशी फाइनल करने से पहले पार्टी एक आखिरी सर्वे भी करवा सकती है. जिसमें गठबंधन के बाद बदली हुई परिस्थिति में टिकट दावेदारों की जमीनी स्तर पर पकड़ देखी जाएगी. इसके बाद ही उन्हें फाइनल किया जाएगा. अब केवल रणनीतिक तौर पर समीकरणों को देखा जा रहा है. महिलाओं को भी चुनावी टिकट दिया जाएगा. पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष की मंजूरी मिलने के बाद फाइनल सूची का ऐलान होगा. हमारी तैयारी 15 अक्टूबर तक.

Read it also-सपा-बसपा समर्थकों को अपने पाले में लाने के लिए भाजपा का नया दांव
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 

सपा-बसपा समर्थकों को अपने पाले में लाने के लिए भाजपा का नया दांव

लखनऊ। यूपी में बीजेपी राज में बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम के नाम पर सड़कें होंगी. साथ ही समाजवादी पार्टी के गुरू कहे जाने राममनोहर लोहिया के नाम पर सड़कों के नाम रखे जायेंगे. लोकसभा चुनाव से पहले विपक्ष को मिर्ची लगाने का ये आयडिया डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य का है.

योगी सरकार ने 22 महापुरूषों के सम्मान में सड़कों के नाम रखने का मन बनाया है. ये सब कैसे और कब हो इस पर जल्द ही फ़ैसला हो जायेगा. लेकिन इसकी तैयारी के लिये डिप्टी सीएम केशव ने पीडब्ल्यूडी विभाग के सीनियर अफ़सरों के साथ बैठक की.

एसपी और बीएसपी के गठबंधन के ख़िलाफ़ यूपी में बीजेपी हर दांव आज़माने के मूड में है. हिंदी पट्टी की राजनीति जाति और प्रतीकों के सहारे की जाती रही है. लोकसभा चुनावों से पहले अलग अलग बिरादरी के लोगों को लुभाने के लिए सड़कों के नाम रखे जाने का फ़ैसला हुआ है.

एससी समाज के लोगों को जोड़ने के लिहाज से कांशीराम के सम्मान में सड़कों के नाम रखने पर सहमति बनी है. उन्होंने ही 1984 में बहुजन समाज पार्टी बनाई थी. मुलायम सिंह से लेकर अखिलेश यादव तक राम मनोहर लोहिया को अपना राजनैतिक गुरू बताते रहे हैं. लोहिया के नाम पर भी यूपी की कई सड़कों के नाम रखे जाने का फ़ैसला हो चुका है.

इसी तरह से झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई, संघ विचारक दीनदयाल उपाध्याय और पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर भी सड़कें होंगी. सुहेलदेव राजभर और बिहार के पूर्व सीएम क़र्पूर ठाकुर का नाम भी लिस्ट में है. 22 महापुरूषों की ये लिस्ट बनी है, जिनके सम्मान में सड़कों का नाम रखने का फ़ैसला हुआ है.

राज्य के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य बताते हैं कि हमारी सरकार को मौक़ा मिला है. सड़कें पहले से बनी हैं या फिर बन रही हैं. इनका नामकरण कर देने भर से समाज का मान बढ़ेगा. इसके साथ ही ये भी तय हुआ है कि कई पुलों के नाम भी महापुरूषों के नाम पर रखे जायेंगे. ख़बर है कि इसी महीने के आख़िर में या अगले महीने के पहले हफ़्ते में एक बड़ा कार्यक्रम होगा जिसमें सड़क और पुलों के नाम महापुरूषों के नाम पर हो जायेंगे.

इसे भी पढ़ें-भाजपा को 21 तो कांग्रेस को 13 सीटों पर त्रिकोणीय संघर्ष में उलझाएगी बसपा
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 

महादलितों को लुभाने के लिए नीतीश करेंगे महासम्मेलन

मोतिहारी। जदयू के जिलाध्यक्ष कपिलदेव प्रसाद उर्फ भुवन पटेल ने कहा है कि आगामी 5 अक्टूबर को आयोजित दलित एवं महादलित प्रकोष्ठ का जिला सम्मेलन ऐतिहासिक होगा. इस सम्मेलन में जिले के सभी प्रखंड एवं पंचायतों के दलित महादलित समाज के लोगों की भागीदारी होगी. श्री पटेल स्थानीय परिसदन में बुधवार को जिला सम्मेलन की तैयारी बैठक को संबोधित कर रहे थे. कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश द्वारा चलाए जा रहे कार्यक्रमों एवं जन कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी घर-घर पहुंचाया जाएगा.

साथ ही दलित एवं महादलित के विकास एवं हक के लिए जागरूक किया जाएगा. कार्यक्रम का संचालन दलित प्रकोष्ठ के जिलाध्यक्ष प्रमोद पासवान कर रहे थे. तैयारी बैठक में प्रदेश संगठन सचिव दीपक पटेल, पूर्व जिलाध्यक्ष प्रमोद सिन्हा, हेमराज राम, अवधेश राम, लक्ष्मण पासवान, राजकिशोर ठाकुर, प्रवक्ता शकील अंसारी, युवाध्यक्ष विशाल कुमार शाह, डा. तफ्फजूल हुसैन, तमन्ना, बृजबिहारी पटेल, कुणाल पटेल, सुनिल भूषण, जन्मेजय पटेल, लवकिशोर निषाद, कैप्टन हमीद, ब्रजेश श्रीवास्तव, प्रकाश चौधरी, ई. संजय ¨सह, वशील अहमद खां, कृष्णकांत मिश्र, योगेन्द्र बैठा, चुन्नू ¨सह, सगीर अहमद, नारायण राम, सत्यनारायण पासवान, मोती बैठा, शंभू पासवान, भोला रजक, किशोरी चौधरी, अभिषेक रंजन, सुरेश निराला, रविकांत रजक आदि मौजूद थे.

इसे भी पढ़ें-प्रमोशन में आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के फैंसले का मायावती ने किया स्वागत
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 

BSP के पक्ष में युवा नेताओं की जुगलबंदी

नई दिल्ली। सहारनपुर हिंसा के बाद सुर्खियों में आई भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर और दूसरे प्रदेशों से यूपी में सक्रिय जिग्नेश मेवानी सहित कई युवा नेताओं की बीएसपी सुप्रीमो मायावती के साथ जुगलबंदी अब बीजेपी के लिए चिंता का सबब बनने लगी है. दलित नेताओं का एक सुर में बोलना, दलित वोटबैंक की आस लगाई बीजेपी के लिए अब सियासी टेंशन का कारण बन गया है. वहीं राजनीति के जानकार यह मानते हैं कि युवा दलितों की यह एकजुटता बीएसपी के लिए संजीवनी और बीजेपी के लिए खतरा बन सकती है. इस बात को समझ रही बीजेपी भले ही अंदरखाने में मंथन कर रही हो, लेकिन संगठन की ओर से सार्वजनिक तौर पर अब तक इसपर कुछ भी कहने से बचा जा रहा है.

लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले से ही यूपी की दलित राजनीति में लगातार उलटफेर दिख रहा हैं. भीम आर्मी, विधायक जिग्नेश मेवाणी और बीएसपी एकजुट होते नजर आने लगे हैं. भीम आर्मी के चंद्रशेखर की मौजूदगी में जिग्नेश ने जिस तरह मंगलवार को बीएसपी सुप्रीमो मायावती को प्रधानमंत्री बनाने के लिए खुला ऐलान किया है, उसके कई सियासी मायने निकाले जाने लगे हैं. माना जा रहा है कि दलितों में मायावती को सियासी रहनुमा मानने का साफ संदेश मिलने के बाद चंद्रेशखर के रुख में बदलाव आया है.

बीएसपी को ही मजबूत करना चाहते हैं दलित नेता

सियासी जानकार मान रहे है कि दलितों के वोटबैंक को अपने साथ रखने के उद्देश्य से चंद्रशेखर लगातार बैकफुट पर हैं. इसके अलावा विधायक जिग्नेश मेवाणी भी चाहते है बीजेपी के दलित जोड़ अभियान में चंद्रशेखर शामिल ना हों. माना जा रहा है कि अगर दलित समुदाय का एक एक छोटा हिस्सा भी बीजेपी के साथ जाता है तब नुकसान संभावित गठंबधन को होगा. ऐसे में मेवाणी दलित कार्ड खेलकर इस वोटबैंक को मायावती के साथ ही रखना चाहते हैं. इसे लेकर मेवाणी के अलावा कभी मायावती के बेहद खास रहे जयप्रकाश समेत कई दलित नेता भी लगातार चंद्रशेखर से संपर्क में हैं.

सियासी गणित ने बढ़ाई बीजेपी की परेशानी

दलित नेताओं की जुगलबंदी और मायावती से नजदीकी होने को बीजेपी के लिए बड़ी चिंता बताया जा रहा है. बीजेपी के एक प्रदेश स्तरीय नेता का कहना है कि शब्बीरपुर और दो अप्रैल की हिंसा के बाद भले ही पार्टी दलितों को साधने की लाख कोशिश कर ले लेकिन जैसा साथ हमारी पार्टी उनका चाहती है, वह मिलना फिलहाल मुश्किल ही दिखता है. इस नेता की मानें तो पार्टी में कई लोगों ने हाईकमान को यह बताया है कि चंद्रशेखर लगातार दूसरे युवा नेता जिग्नेश मेवाणी, कन्हैया कुमार के संपर्क में हैं. यही वजह है कि जेल से निकलकर चंद्रशेखर ने बीजेपी को लगातार कोसना शुरू किया है, जिसके कारण दलितों में उनकी विश्ववसनीयता भी बढ़ी है.

वहींं बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता डॉक्टर चंद्रमोहन का कहना है कि चंद्रशेखर दिग्भ्रमित हो रहे हैं. चंद्रमोहन ने कहा, अभी चंद्रशेखर का कोई स्टैंड नहीं हैं. दलित पहले से बीजेपी के साथ हैं. किसी के साथ आने से बीजेपी से दलितों का साथ छूटने वाला नहीं हैं.’ उधर, गुजरात के दलित नेता जिग्नेश मेवाणी का कहना है कि वह पहले ही साफ कर चुके हैं कि मायावती के नेतृत्व में सभी मिलकर काम करेंगे और आने वाले चुनाव के लिए बीएसपी को मजबूत किया जाएगा. भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर ने कहा, ‘बीएसपी प्रमुख हमारी वरिष्ठ नेता हैं और हम दलित लोग उन्हें मजबूती देने का काम करते रहेंगे.’

इसे भी पढ़ें-मध्य प्रदेश की सभी 230 सीटों पर चुनाव लड़ेगी BSP, 22 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 

नवजात बच्चों की जान बचाने वाले हीरो महेन्द्र मेघवाल

0

श्रीगंगानगर। राजकीय जिला चिकित्सालय की शिशु नर्सरी में शनिवार अपराह्नन पौने तीन बजे रेडिएंट वार्मर में शॉर्ट सर्किट से आग लग गई. गनीमत रही कि नर्सिंग स्टाफ के मौके पर होने की वजह से नवजात की जान बच गई नहीं तो बड़ा हादसा हो सकता था. जिस रेडिएंट वार्मर में शॉर्ट सर्किट से आग लगी उसमें एक नवजात को रखा हुआ था. जबकि शिशु नर्सरी में नौ नवजात थे. वहीं नर्सरी में कुल 12 नवजात भर्ती थे इनमें से तीन को पीएनसी वार्ड में मां का दूध पिलाने के लिए परिजन लेकर गए हुए थे.

इस पूरे मामले में महेन्द्र कुमार मेघवाल हीरो बनकर उभरे हैं. जिला चिकित्सालय की शिशु नर्सरी में शनिवार शाम को ड्यूटी कर रहे जीएनएम महेन्द्र कुमार मेघवाल के साहस और हिम्मत के चलते नौ नवजात की जान सुरक्षित बचा ली गई. जैसे ही रेडिएंट वार्मर में आग लगी घड़साना क्षेत्र की बेबी भागवंती को वारमर से तुरंत उठाकर सहयोग नर्सिंग कार्मिक हरप्रीत कौर को दिया और खुद वार्मर को बोर्ड के प्लग से अलग कर बाहर निकाला. तब तक वार्मर पूरी तरह से आग पकड़ चुका था और नर्सरी में धुंआ ही धुआ हो चुका था. लेकिन इसने साहस और हिम्मत दिखाते हुए आपातकालीन कक्ष से जलते हुए रेडिएंट वार्मर को बाहर फेंक दिया. नर्सरी में उस वक्त नौ नवजात भर्ती थे. इनकी भी धुंआ से दम घुटने या सांस लेने में दिक्कत नहीं हो इसको लेकर इनको तुरंत प्रभाव से नर्सरी के दूसरे रूम में शिफ्ट किया. नर्सरी कार्मिक महेंद्र कुमार मेघवाल व हरप्रीत कौर की साहस चिकित्सालय प्रबंधन व नर्सरी में भर्ती नवजात के परिजनो ने तारीफ की. जब रेडिएंट वार्मर में आग लगी, तब नर्सिंग स्टाफ बाहर कुर्सी पर बैठा होता तो बड़ा हादसा हो सकता था.

इसे भी पढ़ें-छत्तीसगढ़ में क्या गुल खिलाएगा मायावती और अजीत जोगी का गठबंधन
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 

भाजपा को 21 तो कांग्रेस को 13 सीटों पर त्रिकोणीय संघर्ष में उलझाएगी बसपा

रायपुर। छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव के लिए जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जकांछ) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) में सीटों के बंटवारे के बाद जो स्थिति बनी है, उससे रोचक संघर्ष के आसार हैं. जिन 35 सीटों पर बसपा गठबंधन की ओर से चुनाव लड़ेगी, उनमें 21 पर भाजपा और 13 पर कांग्रेस का कब्जा है. अब इन सीटों पर दोनों दलों को बसपा त्रिकोणीय संघर्ष में उलझाएगी.

सर्वाधिक मेहनत भाजपा को उन आरक्षित सीटों पर करनी होगी, जहां उनके विधायक हैं. बसपा इस बार जिन दिग्गजों को चुनौती देगी उनमें विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल, मंत्री बृजमोहन अग्रवाल, मंत्री राजेश मूणत, मंत्री दयाल दास बघेल सहित नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंह देव व भाजपा विधायक युद्घवीर सिंह शामिल हैं.

बसपा को मिली भरतपुर सोनहत, लुंड्रा, जशपुर, कुनकुरी, सारंगढ़, सक्ती, पामगढ़, बिलाईगढ़, कसडोल, रायपुर पश्चिम, रायपुर दक्षिण, बिंद्रानवानढ़, कुरद, भिलाई नगर, अहिवारा, नवागढ़, डोगरगढ़, अंतागढ़, पंडरिया, सरायपाली, चंद्रपुर सीट पर वर्तमान में भाजपा का कब्जा है. आरक्षित कसडोल से विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल, नवागढ़ दयालदास बघेल निर्वाचित हैं, वहीं भिलाई नगर से प्रेमप्रकाश पांडेय, रायपुर दक्षिण से बृजमोहन अग्रवाल, रायपुर पश्चिम से राजेश मूणत निर्वाचित हैं.

अनारक्षित सीट चंद्रपुर से युद्घवीर सिंह जूदेव विधायक हैं. इसी प्रकार बसपा कोटे की सामरी, अंबिकापुर, खरसिया, पाली तानाखार, अकलतरा, जांजगीर चांपा, डोमरगांव, कांकेर, केशकाल, कोंडागांव, दंतेवाड़ा, कोंटा व मस्तूरी कांग्रेस के कब्जे में हैं. यहां अंबिकापुर से विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंह देव विधायक हैं. बसपा कोटे की एक सीट जैजेपुर बसपा के ही कब्जे में है. भाजपा व कांग्रेस की आरक्षित सीटों पर इस बार बसपा कड़ा मुकाबला देगी, क्योंकि बसपा की राजनीति शुरू से ही दलित मूवमेंट के इर्द-गिर्द रही है.

इसे भी पढ़ें-भाजपा को 21 तो कांग्रेस को 13 सीटों पर त्रिकोणीय संघर्ष में उलझाएगी बसपा
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 

मध्य प्रदेश में बसपा के बाद अब कांग्रेस को इस पार्टी से मिल सकता झटका

नई दल्ली। कांग्रेस मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में बसपा से हाथ मिलाकर बीजेपी को मात देने का सपना देख रही थी. लेकिन बसपा सुप्रीमो मायावती ने उसी समय राहुल गांधी को तगड़ा झटका देते हुए राज्य में अपने उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी कर दी है. बसपा के बाद अब कांग्रेस को दूसरा झटका जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) से लग सकता है.

2 अक्टूबर तक कांग्रेस को अल्टीमेटम

जयस अध्यक्ष डॉ. हीरालाल अलावा ने aajtak.in से बातचीत करते हुए गठबंधन के लिए कांग्रेस को 2 अक्टूबर तक का अल्टीमेटम दिया है. उन्होंने कहा कि वे कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ना चाहते हैं. हमारे साथ गठबंधन के लिए कांग्रेस को फैसला करना है.

हीरालाल ने कहा कि गठबंधन को लेकर 2 अक्टूबर से पहले तक कांग्रेस किसी तरह का कोई निर्णय नहीं लेती है तो फिर हम भी मायावती की तरह इंतजार नहीं करेंगे. मध्य प्रदेश के धार जिले के कुक्षी में 2 अक्टूबर होने वाली रैली में अपने 80 उम्मीदवारों की घोषणा करेंगे. उन्होंने कहा कि एक बार जब हम उम्मीदवारों के नामों की घोषणा कर देंगे तो हमारे लिए निर्णय को वापस लेना असंभव होगा.

जयस ने कांग्रेस से मांगी 25 सीटें

जयस अध्यक्ष ने बताया कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस के साथ गठबंधन के लिए प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ, पार्टी के राज्य प्रभारी दीपक बाबरिया और दिग्विजय सिंह से मुलाकात की है. उनसे हमने अपनी शर्तें रख दी हैं और हमने 25 सीटें मांगी है, लेकिन अभी तक हमें कोई जवाब नहीं मिला है. हालांकि, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ डॉ. हीरालाल अलावा की न को बात हुई है और न ही कोई मुलाकात हुई है. जबकि उन्होंने राज्य के नेताओं से राहुल से मुलाकत के लिए कहा था. दिलचस्प बात ये है कि अलावा को 5 अगस्त को शिवराज सिंह चौहान ने आमंत्रित किया था, जहां उन्हें बीजेपी में शामिल होने का प्रस्ताव दिया गया था. हालांकि उन्होंने बीजेपी में शामिल होने से इंकार कर दिया.

मध्य प्रदेश में आदिवासी समुदाय और किसानों के मुद्दों को लेकर जयस 2013 से लगातार अंदोलन कर रही है. राज्य में आदिवासी समुदाय की आबादी 21 प्रतिशत से अधिक है. राज्य विधानसभा की कुल 230 सीटों में से 47 सीटें आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित हैं. इसके अलावा करीब 30 सीटें ऐसी मानी जाती हैं, जहां पर्याप्त संख्या में आदिवासी आबादी है. 2013 के विधानसभा चुनाव में आदिवासियों के लिए आरक्षित 47 सीटों में से बीजेपी को 32 और कांग्रेस को 15 सीटें मिली थीं. जयस का मध्य प्रदेश में सबसे मजबूत आधार मालवा और निमाड़ के कुछ जिलों में है. इनमें रतलाम, झबुआ, धार, खंडवा, बड़वानी और खरगोन क्षेत्र शामिल हैं. इन्हीं क्षेत्रों में डॉ. हीरालाल अलावा जयस के उम्मीदवार को मैदान में उतारना चाहते हैं.

इसे भी पढ़ें-मध्यप्रदेश चुनाव की बड़ी खबर, जायस ने की 80 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 

मायावती ने फेरा कांग्रेस की उम्मीदों पर पानी

नई दिल्ली। कौन कहता है कि बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो मायावती बड़े सपने नहीं देखतीं? उत्तर प्रदेश में एक के बाद एक 3 विधानसभा तथा लोकसभा चुनाव हारने, वर्तमान लोकसभा में एक भी सीट न मिलने के बाद उन्होंने अभी भी इस देश की पहली दलित प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा नहीं छोड़ी है. इस बारे बात करना अभी जल्दबाजी होगी लेकिन इस महत्वाकांक्षा को बड़े लम्बे समय से पाले हुए खुद मायावती ने 2012 में एक चुनावी रैली के दौरान दहाड़ लगाई थी कि ‘सत्ता की चाबी उनके हाथ में है.’

2014 में बसपा ने उन्हें अपना प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया था. इस वर्ष मई में बसपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने एक प्रस्ताव पारित करके यह घोषणा की थी कि 2019 के चुनावों में मायावती प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवार होंगी. वह यह किसी मकसद के बिना नहीं कर रहीं क्योंकि इस इरादे का मकसद पार्टी कार्यकत्र्ताओं को प्रेरित करना है ताकि वे ‘दलित की बेटी’ शीर्ष पर पहुंच रही है, का सपना बेच सकें. कम से कम इतना हो कि वह 2019 के बाद के चुनावी परिदृश्य में एक किंगमेकर के तौर पर उभरें.

मजे की बात यह है कि उनकी पार्टी के निरंतर पतन के बावजूद राजनीतिक दल बसपा के साथ एक साधारण कारण से गठबंधन करने के लिए एक-दूसरे के साथ होड़ में हैं, वह यह कि बसपा के वोट हस्तांतरणीय हैं. जहां यह एक बड़ा प्रश्र हो सकता है कि वह अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा कर पाएंगी, वहीं विपक्षी एकता के लिए बड़ी योजनाओं में उनकी प्रासंगिकता पर प्रश्र नहीं उठाया जा सकता. यहां तक कि भाजपा भी बसपा के साथ गठबंधन बनाने के खिलाफ नहीं है. बसपा की 18 राज्यों में उपस्थिति है. यदि मत हिस्सेदारी की बात करें तो कांग्रेस तथा भाजपा के बाद यह तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है. 2014 में एक भी सीट हासिल न होने के बावजूद इसने यू.पी. में 19.8 प्रतिशत वोट हासिल किए, जबकि मध्य प्रदेश तथा उत्तराखंड में 4.5 प्रतिशत से अधिक. इसके अतिरिक्त इसने कर्नाटक, पंजाब, दिल्ली, राजस्थान तथा छत्तीसगढ़ में सम्मानजनक मत हिस्सेदारी प्राप्त की.

गोरखपुर तथा फूलपुर में हुए हालिया लोकसभा उपचुनावों में सपा का समर्थन करने के बाद मायावती की ताकत बढ़ी है, जो यह दिखाता है कि संयुक्त विपक्ष भाजपा को आसानी से हरा सकता था. कर्नाटक में जद (एस.) के साथ ऐसा ही चुनाव पूर्व गठबंधन एक संयुक्त विपक्ष की सफलता को दर्शाता है. इस बात की सम्भावना थी कि इसे सम्भवत: वर्ष के अंत में होने वाले विधानसभा चुनावों के साथ-साथ 2019 के लोकसभा चुनावों तक खींचा जा सकता है. पहली परीक्षा राजस्थान, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ में होने वाले विधानसभा चुनाव होंगे, जहां इन सभी भाजपा शासित राज्यों में कड़ी सत्ता विरोधी लहर चल रही है.

भाजपा अथवा कांग्रेस के लिए पराजय या जीत के दूरगामी परिणाम होंगे. राजस्थान में दलितों की संख्या कुल जनसंख्या का 17 प्रतिशत से अधिक है, मध्य प्रदेश में 15 प्रतिशत तथा छत्तीसगढ़ में लगभग 12 प्रतिशत और तीनों राज्यों में 65 लोकसभा सीटें हैं. 2013 के विधानसभा चुनावों में बसपा को राजस्थान में 3.5 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 6.3 प्रतिशत तथा छत्तीसगढ़ में 4.25 प्रतिशत वोट मिले थे इसलिए मायावती लेन-देन की स्थिति में हैं. यद्यपि महागठबंधन, जिसके बनने की आशा कांग्रेस कर रही थी, के लिए जाने की बजाय मायावती ने पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के साथ गठजोड़ करके अपनी आशा छत्तीसगढ़ पर केन्द्रित कर दी है. जोगी ने कांग्रेस छोड़ कर अपनी जनता कांग्रेस का गठन किया था. मायावती ने दिखाया है कि वह अप्रत्याशित हैं और आंख मूंद कर भाजपा विरोधी मोर्चे में शामिल नहीं होंगी. यह कांग्रेस के लिए दोहरा अपमान है कि उन्होंने गठजोड़ के लिए अजीत जोगी को चुना.

दूसरे झटके के तौर पर मध्य प्रदेश में बसपा ने सभी सीटों पर चुनाव लडऩे का निर्णय किया है, जबकि कांग्रेस सीटों के बंटवारे के फार्मूले को लेकर टाल-मटोल कर रही थी. जहां बसपा ने मध्य प्रदेश में केवल 4 सीटें जीती थीं, दलित मतदाता सम्भवत: संतुलन को उनके पक्ष में झुका सकते हैं, विशेषकर चम्बल क्षेत्र में. कांग्रेस को तीसरा झटका देते हुए बसपा सम्भवत: राजस्थान में सपा तथा वामदलों द्वारा गठित तीसरे मोर्चे के साथ गठजोड़ कर सकती है, जहां कांग्रेस जीतने की स्थिति में है. यदि कांग्रेस सीटों के बंटवारे के मामले में बसपा के साथ अधिक उदार होती तो मामला इतना नहीं बिगड़ता. कांग्रेस अभी भी ‘बहुमत वाली पार्टी की मानसिकता’ में है और इस वास्तविकता का एहसास नहीं कर रही कि वह अपनी ताकत गंवा चुकी है. अत: विपक्षी वोटें विभाजित हो सकती हैं जिसका लाभ सम्भवत: भाजपा को होगा.

भाजपा की सत्ता में वापसी करने की आशा पूरी तरह से एक विभाजित विपक्ष पर टिकी है और केन्द्र में सत्ता में होने के नाते भाजपा मायावती तथा अन्य विपक्षी नेताओं पर दबाव बनाने की स्थिति में है, जो विभिन्न केसों का सामना कर रहे हैं. मायावती तथा अजीत जोगी दोनों ही छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार के सी.बी.आई. केसों का सामना कर रहे हैं. ये सब दिखाता है कि यदि चीजों के साथ सही तरीके से नहीं निपटा गया तो विपक्ष की महागठबंधन की योजना आसान नहीं होगी. यही मायावती ने उत्तर प्रदेश में किया जो अधिक मायने रखता है. उस समय तक विपक्ष को पता चल जाएगा कि वह कहां पर खड़ा है और इस बात की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि अपने राजनीतिक अस्तित्व के लिए वे सम्भवत: एक साथ आ जाएं मगर अधिकतर पाॢटयां चुनावों के बाद की स्थितियों को नजर में रखे हुए हैं. अब जो स्थिति है उसके अनुसार इस बात में कोई संदेह नहीं कि मायावती ने अपना रास्ता खुद चुन कर कांग्रेस की आशाओं पर पानी फेर दिया है.

Read it also-SC/ST एक्ट: सात साल की सजा से कम के मामलों में बिना नोटिस गिरफ्तारी नहीं
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं।