तिरुवनंतपुरम। केरल में एक बार फिर निपाह वायरस ने दस्तक दी है. राज्य की स्वास्थ्य मंत्री केके शैलजा ने एक मरीज के मिलने की बात कही है. एर्नाकुलम का रहने वाला 23 साल का एक व्यक्ति पुणे वायरोलॉजी इंस्टीट्यूट के टेस्ट में पॉजिटिव पाया गया. शैलजा ने बताया कि दूसरे मरीज का सैंपल टेस्ट के लिए पुणे भेजा गया है. दो संदिग्ध मरीजों को बुखार और गले में परेशानी के कारण भर्ती कराया गया है. दो नर्स उनका इलाज कर रही हैं.
राज्य के 86 संदिग्ध मरीजों पर निगरानी रखी जा रही है. इनमें अभी निपाह वायरस की पुष्टि नहीं हुई है. एर्नाकुलम मेडिकल कॉलेज में बीमारी के इलाज के लिए अलग से स्पेशल वार्ड बनाया गया है. 2018 में केरल में निपाह वायरस से करीब 16 लोगों की मौत हुई थी. 750 से ज्यादा मरीजों को निगरानी में रखा गया था.
हमारे पास जरूरत की सभी दवाइयां
स्वास्थ्य मंत्री ने सोशल मीडिया के जरिए लोगों से कहा कि घबराने की कोई जरूरत नहीं है. स्वास्थ्य विभाग हर तरह की परिस्थिति को संभालने के लिए तैयार है. हमारे पास जरूरत की सभी दवाइयां हैं. इस बीमारी से निपटने के लिए एर्नाकुलम मेडिकल कॉलेज में अलग से वार्ड बनाया गया है. स्वास्थ्य मंत्री ने लोगों से बीमारी को लेकर दहशत नहीं फैलाने की अपील भी की. वहीं, मुख्यमंत्री पी विजयन ने कहा कि हालात पर नजर रखी जा रही है और ऐहतियातन उपाए किए जा रहे हैं.
ऐसे फैलता है वायरस
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह वायरस चमगादड़ से फैलता है. इन्हें फ्रूट बैट कहते हैं. चमगादड़ किसी फल को खा लेते हैं और उसी फल या सब्जी को कोई इंसान या जानवर खाता है तो संक्रमित हो जाता है. निपाह वायरस इंसानों के अलावा जानवरों को भी प्रभावित करता है. इसकी शुरुआत तेज सिरदर्द और बुखार से होती है. इससे संक्रमित व्यक्ति की मृत्युदर 74.5% होती है.
वायरस का 21 साल पहले पता चला था
डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, 1998 में मलेशिया में पहली बार निपाह वायरस का पता लगाया गया था. यहां सुंगई निपाह गांव के लोग सबसे पहले इस वायरस से संक्रमित हुए. इस गांव के नाम पर ही इसका नाम निपाह पड़ा. उस दौरान ऐसे किसान इससे संक्रमित हुए थे, जो सुअर पालन करते थे. मलेशिया मामले की रिपोर्ट के मुताबिक पालतू जानवरों जैसे कुत्ते, बिल्ली, बकरी, घोड़े से भी इंफेक्शन फैलने के मामले सामने आए थे.
नई दिल्ली। समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन टूटने की चर्चाओं के बीच मायावती ने खुद आकर स्थिति साफ की है और फिलहाल गठबंधन पर ब्रेक लगाने की पुष्टि की है. मायावती ने मीडिया से बात करते हुए एक तरफ अखिलेश और डिंपल के साथ हमेशा के लिए रिश्ते बने रहने की बात कही तो दूसरी तरफ फिलहाल चुनावी राजनीति में अकेले ही आगे बढ़ने की भी पुष्टि की. मायावती ने लोकसभा चुनाव में करारी हार का ठीकरा समाजवादी पार्टी पर फोड़ते हुए कहा कि उन्हें यादव वोट ही नहीं मिले.
मायावती ने कहा, ‘कन्नौज में डिंपल, बदायूं में धर्मेंद यादव और फिरोजाबाद में अक्षय यादव की हार हमें सोचने पर मजबूर करती है. इनकी हार का हमें भी बहुत दुख है. साफ है कि इन यादव बाहुल्य सीटों पर भी यादव समाज का वोट एसपी को नहीं मिला. ऐसे में यह सोचने की बात है कि एसपी का बेस वोट बैंक यदि उससे छिटक गया है तो फिर उनका वोट बीएसपी को कैसे गया होगा.’
मायावती ने कहा, ‘अखिलेश और डिंपल मुझे बहुत इज्जत देते हैं. हमारे रिश्ते हमेशा के लिए हैं. लेकिन राजनीतिक विवशताएं हैं. लोकसभा चुनाव के नतीजे यूपी में जो उभरकर सामने आए हैं, उसमें यह दुख के साथ कहना पड़ा है कि यादव बाहुल्य सीटों पर भी एसपी को उनका वोट नहीं मिला. यादव समाज के वोट न मिलने के चलते कई महत्वपूर्ण सीटों पर भी एसपी के मजबूत उम्मीदवार हार गए. यह हमें बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करता है.’
हार का ठीकरा एसपी पर, कहा- अखिलेश ने पार्टी सुधारी तो आएंगे साथ
हमारी समीक्षा में यह पाया गया कि बीएसपी जिस तरह से कैडर बेस पार्टी है. हमने बड़े लक्ष्य के साथ एसपी के साथ मिलकर काम किया है, लेकिन हमें बड़ी सफलता नहीं मिल पाई है. एसपी ने अच्छा मौका गंवा दिया है. ऐसी स्थिति में एसपी को सुधार लाने की जरूरत है. एसपी को भी बीजेपी के जातिवादी और सांप्रदायिक अभियान के खिलाफ मजबूती से लड़ने की जरूरत है. यदि मुझे लगेगा कि एसपी प्रमुख राजनीतिक कार्यों के साथ ही अपने लोगों को मिशनरी बनाने में कामयाब हो जाते हैं तो फिर हम साथ चलेंगे. यदि वह इस काम में सफल नहीं हो पाते हैं तो हमारा अकेले चलना ही बेहतर होगा.
माया बोलीं, यादव मतदाताओं ने किया भीतरघात
मायावती ने समाजवादी पार्टी का बेस वोट कहे जाने वाले यादव मतदाताओं को लेकर कहा कि उन्होंने न जाने किन कारणों से एसपी को वोट नहीं दिया. यही वजह है कि कन्नौज, फिरोजाबाद और बदायूं में भी एसपी हार गई. मायावती ने कहा कि यादव मतदाताओं ने भीतरघात किया है.
नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी की समीक्षा बैठक आज दिल्ली में संपन्न हुई. इस बैठक से सबसे बड़ी खबर यह है कि बसपा ने उत्तर प्रदेश की खाली हुई 12 सीटों पर होने वाले उपचुनाव में उतरने का फैसला किया है. चौंकाने वाली खबर यह है कि उपचुनाव में बसपा अकेले दम पर चुनाव लड़ेगी. पार्टी की समीक्षा बैठक सुबह 11 बजे के करीब शुरू हुई और दोपहर 1.30 बजे तक चली. ढाई घंटे तक चली इस बैठक को बसपा प्रमुख मायावती ने करीब डेढ़ घंटे तक संबोधित किया.
इस बैठक में बसपा प्रमुख ने पार्टी नेताओं से लोगों के बीच अपना जनाधार बढ़ाने का निर्देश दिया. दलित दस्तक के सूत्रों के मुताबिक बैठक में हार की एक वजह बसपा प्रमुख ने सपा के बागी नेता शिवपाल यादव द्वारा यादव वोटों के बंटवारे को भी बताया, हालांकि उन्होंने अखिलेश यादव की तारीफ की. विश्वस्त सूत्रों से मिली खबर के मुताबिक बामसेफ और जिला कमेटियों के ढांचे में बदलाव की भी खबर है. इसमें बदलाव करते हुए बसपा प्रमुख ने पूर्व में मंडल स्तर और जोन स्तर पर काम करने वाले भाईचारा कमेटी को अब विधानसभा स्तर पर करने का आदेश दिया है. तो वहीं बामसेफ में अब जिला स्तर के अलावा विधानसभा स्तर, मंडल स्तर और सेक्टर स्थल पर अब दो-दो लोगों को रखने का आदेश दिया है. बैठक के दौरान बहनजी ने भाईचारा कमेटियों को मजबूत करने की बात कही और इसके जरिए 50 फीसदी वोटों को अपने पक्ष में करने का निर्देश दिया.
नई दिल्ली। राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (आरबीएसई) 10वीं क्लास का रिजल्ट आज यानी 3 जून, 2019 को जारी करेगा. दिन के 11 बजे आरबीएसई की ऑफिशल वेबसाइट rajresults.nic.inपर रिजल्ट की घोषणा की जाएगी.
बता दें कि इससे पहले राजस्थान बोर्ड 12वीं कक्षा के नतीजों की घोषणा कर चुका है. बोर्ड ने साइंस और कॉमर्स स्ट्रीम के रिजल्ट की घोषणा 15 मई को की थी जबकि आर्ट्स स्ट्रीम का रिजल्ट 22 मई को जारी किया गया था. अब छात्रों को दसवीं और आठवीं कक्षा के नतीजों का इंतजार है.
बोर्ड अधिकारी ने बताया कि आठवीं कक्षा के नतीजों की घोषणा दसवीं के रिजल्ट जारी करने के बाद होगी. इस रिजल्ट को आप राजस्थान बोर्ड की ऑफिशल वेबसाइटrajeduboard.rajasthan.gov.in पर जाकर देख पाएंगे. पिछले साल राजस्थान बोर्ड की दसवीं कक्षा में 79.86% छात्र पास हुए थे. रेगुलर छात्रों का पास प्रतिशत सबसे ज्यादा रहा था. 2018 में दसवीं कक्षा में 80.13% छात्र पास हुए थे. वहीं केवल 14.55% प्राइवेट छात्र पास हुए थे.
RBSE 10th Class Result 2019 ऐसे देखें
राजस्थान बोर्ड की ऑफिशल वेबसाइट rajeduboard.rajasthan.gov.in पर जाएं
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नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव के बाद समीक्षा हेतु बहुजन समाज पार्टी 3 जुन को दिल्ली में बैठक करने जा रही है. इस बैठक में नवनिर्वाचित सांसद, लोकसभा प्रत्याशी, जोन इंचार्जों के साथ जिलाध्यक्षों को भी बुलाया गया है. बैठक के लिए सभी को दिल्ली स्थित केंद्रीय पार्टी कार्यालय 11 गुरुद्वारा रकाबगंज रोड पर 10 बजे तक पहुंचने को कहा गया है. इस बैठक में मायावती ने सीटवार ब्यौरा भी मांगा है. मायावती 23 मई को मतगणना वाले दिन ही रात में दिल्ली चली गई थीं. तब से वह दिल्ली में ही हैं.
इस बीच बसपा के मध्य प्रदेश के नेताओं की बैठक आज दिल्ली में हैं. बहुजन समाज पार्टी ने इस बार लोकसभा चुनाव में मध्य प्रदेश की 29 में से 27 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे. लेकिन पार्टी का परफॉरमेंस इतना ख़राब रहा कि सभी प्रत्याशियों की ज़मानत ज़ब्त हो गयी. अब आज हो रही इस बैठक में अनुमान है कि मायावती एमपी में बीएसपी की हार पर मंथन करेंगी. गौरतलब है कि बसपा को लोकसभा चुनाव में 10 सीटें मिली हैं और उसका कुल वोटिंग प्रतिशत 19.26 रहा है.
कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में सोनिया गांधी एवं अन्य
नई दिल्ली। संसद के सेंट्रल हॉल में कांग्रेस संसदीय दल (सीपीपी) की बैठक हुई जिसमें सोनिया गांधी एक बार फिर संसदीय दल की नेता चुनी गईं. इस बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी व पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह समेत पार्टी के वरिष्ठ नेता मौजूद रहे. फिर से नेता चुने जाने पर सोनिया गांधी ने कांग्रेस को वोट करने वालों का धन्यवाद किया.
कांग्रेस के मीडिया प्रभारी रणदीप सिंह सुरजेवाला ने ट्वीट कर यह जानकारी दी. उन्होंने बताया कि सोनिया गांधी को कांग्रेस संसदीय दल का नेता चुना गया है. सोनिया गांधी की तरफ से उन्होंने बताया कि हम उन 12.13 करोड़ वोटरों का धन्यवाद करते हैं जिन्होंने कांग्रेस पार्टी पर विश्वास जताया.
संसद सत्र शुरू होने से पहले राहुल गांधी ने भी अपने तेवर साफ कर दिए. उन्होंने बैठक में कहा, हम 52 सांसद हैं. मैं गारंटी देता हूं कि ये 52 सांसद बीजेपी से हर इंच पर लड़ेंगे. हम बीजेपी को हर दिन नचाने के लिए काफी हैं. वे हमसे लड़ाई लड़ने के लिए गालियां देंगे, नफरत करेंगे, गुस्सा दिखाएंगे. आप इसका लुत्फ लीजिए. आपको भी आक्रामक होना होगा. वक्त आत्मनिरीक्षण और कायाकल्प करने का है.
पिछले हफ्ते कांग्रेस वर्किंग कमिटी की बैठक के बाद यह मीटिंग हुई है, जिसमें राहुल गांधी ने पार्टी की शर्मनाक हार के बाद इस्तीफे की पेशकश की थी, जिसे ठुकरा दिया गया था. कांग्रेस के लिए मुश्किल यह है कि लोकसभा में उसके सिर्फ 52 सांसद हैं. विपक्ष का दर्जा पाने के लिए एक पार्टी के पास कम से कम 55 सांसद होने जरूरी हैं. 2014 लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस के सिर्फ 44 संसद पहुंचे थे.
उत्तराखंड के जौनपुर में एक 9 साल की दलित नागबिल से बलात्कार। हवस का शिकार बनाने वाला आरोपी दरिंदा 24 साल का गाँव का ही विपिन पंवार है जो कि दो बच्चों का पिता भी है। आरोपी फिलहाल फरार है। यह उसी नैनबाग तहसील, जौनपुर, टिहरी गढ़वाल का मामला है जहां कुछ दिन पूर्व ही शादी में कुर्सी पर बैठने भर से एक दलित युवक की हत्या कर दी गई थी घटना 30 मई दोपहर की है।
कुछ दिन पूर्व ही कुर्सी पर बैठकर खाना खाने पर दलित जितेंद्र दास की हत्या की गई थी अब उम्मीद की जा रही थी कि ऐसी घटनाओं से ये लोग कुछ सीख लेंगे मगर संस्कार और डीएनए कभी नहीं बदल सकता है। अफसोस यह है कि 9 साल की बच्ची पर भी इनका सभ्य समाज जरूर जातिवाद फलाने और झूठा आरोप लगाने जैसे कुतर्क दे सकता है क्योंकि ये इंसाफ के लिए कभी नहीं लड़ेंगे यह भी एक कारण है कि अपराधियों के हौसले बुलंद रहते हैं क्योंकि उन्हें मालूम है सब सवर्ण समाज एक होकर चंदा एकत्रित करके अपराधियों को छुड़ा लेंगे फिर फुर्सत से दलित परिवार को सबक सीखाएंगे।
पुरोला, उत्तरकाशी में भी एक दलित युवती इसी तरह पीड़ित है। उसके गांव का एक सवर्ण युवक कई सालों से शादी का झांसा देकर युवती का शोषण कर रहा है। युवती का कहना है कि हमने शादी की है जबकि युवक इससे इनकार कर रहा है। फिर एक दिन गांववालों ने बैठक की और लड़की के शोषण की कीमत 5 लाख रुपये लगाई गई। पैसे तो दिए नहीं ऊपर से लड़की का शोषण कई तरह से होता गया। मामला पुलिस तक भी गया मगर कोई भी पत्रकार या पुलिस इसे प्रकाश में लाने को राजी नहीं क्योंकि वे लोग रसूख वाले हैं और लड़का लड़की से प्रेम भी करता है मगर समाज मे स्वीकार भी नही कर रहा। यह हालत है समाज की।
हमारे जन प्रतिनिधि तो फिर से कह देंगे कि हमारे यहां न जातिवाद है और न रेप की घटनाएं होती है क्यूंकि उन्होंने वोट लेने हैं और सवर्ण समाज की बात ही क्या करूँ? 9 साल की बच्ची का रेप होने के बाद भी पूरा गांव पीड़ित परिवार पर फैसले का भारी दबाव। उनका कहना है कि ऐसे में गांव की बदनामी होगी इसलिए पैसे लेकर मामला रफा दफा किया जाय। उनमे से कुछ लोगों ने पीड़ित परिवार का पीछा तक किया मगर परिवार के साथ समाज दलित समाज तबतक खड़ा हो चुका था। अभी बच्ची बेहोशी की हालत में दून हॉस्पिटल देहरादून में हैं भर्ती है। हम सब पीड़ित के साथ ही हैं, एफआईआर दर्ज हो चुकी है मगर आरोपी को फरार कर दिया गया है पुलिस तलाश में जुटी हुई है।
आपको बता दूं इसी परिवार के साथ 4 साल पहले इससे भी खतरनाक दरिंदगी हो चुकी है। गांव के कुछ राजपूत लड़कों ने इसी परिवार की जवान लड़की को अगवा कर नाले में पूरी रात बलात्कार किया फिर सुबह जान से मार दिया। शव को बुरी तरह रौंदा गया। मामला बनता इससे पहले ही गांव में बैठक की गई और 5 लाख रुपये में समझौता करवाया गया। उस वक्त दलित समाज आवाज उठाने का दम नहीं कर सका हालांकि पैसा तो नहीं मिला मगर न्याय भी नहीं मिल सका। यदि उसी समय सभी को जेल हो चुकी होती तो आज अजीसी घटना की पुनरावृत्ति नहीं होती। अब उसकी भी जांच होनी चाहिए और इस 9 साल की बच्ची को भी इंसाफ मिलना चाहिए।
नयी दिल्ली। नयी सरकार के शपथ लेने के बाद तमाम लोग इसे मोदी सरकार और भाजपा सरकार कह रहे हैं. लेकिन यह सबको पता होना चाहिए कि यह मोदी या भाजपा नहीं बल्कि भारत सरकार है. भारत सरकार जिसका निशान तीन शेरों का मुंह वाला चित्र है, जो अशोक स्तंभ के साथ होता है. देखिए भारत देश की इस नयी सरकार में किसे कौन सा मंत्रालय मिला है.
1. नरेंद्र मोदी (प्रधानमंत्री)- प्रधानमंत्री के पद के साथ कार्मिक, जन शिकायत और पेंशन, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष मंत्रालय. इसके अलाव वो सभी मंत्रालय जो किसी भी मंत्री को अलॉट न हुए हो.
2. राजनाथ सिंह (कैबिनेट मंत्री)- रक्षा मंत्रालय
3. अमित शाह (कैबिनेट मंत्री)- गृह मंत्रालय
4. नितिन गडकरी (कैबिनेट मंत्री)- सड़क परिवहन एवं राजमार्ग और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय
5. सदानंद गौड़ा (कैबिनेट मंत्री)- रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय
6. निर्मला सीतारमण (कैबिनेट मंत्री)- वित्त एवं कॉरपोरेट मामलों का मंत्रालय
7. राम विलास पासवान (कैबिनेट मंत्री)- उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय
8. नरेंद्र सिंह तोमर (कैबिनेट मंत्री)-कृषि एवं किसान कल्याण, ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्रालय
9. रविशंकर प्रसाद (कैबिनेट मंत्री)-कानून एवं न्याय, संचार और इलेक्ट्रानिक एवं सूचना मंत्रालय
10. हरसिमरत कौर बादल (कैबिनेट मंत्री)- खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय
11. एस. जयशंकर (कैबिनेट मंत्री)- विदेश मंत्रालय
12. रमेश पोखरियाल निशंक (कैबिनेट मंत्री)- मानव संसाधन विकास मंत्रालय
13. थावर चंद गहलोत (कैबिनेट मंत्री)- सामाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण मंत्रालय
14. अर्जुन मुंडा (कैबिनेट मंत्री)- आदिवासी मामलों का मंत्रालय
15. स्मृति ईरानी (कैबिनेट मंत्री)- महिला एवं बाल विकास और कपड़ा मंत्रालय
16. हर्षवर्धन (कैबिनेट मंत्री)- स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, विज्ञान और प्रोद्योगिकी, भूविज्ञान मंत्रालय
17. प्रकाश जावड़ेकर (कैबिनेट मंत्री)- पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय
18. पीयूष गोयल (कैबिनेट मंत्री)- रेलवे और वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय
19. धर्मेंद्र प्रधान (कैबिनेट मंत्री)- पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस और इस्पात मंत्रालय
20. मुख्तार अब्बास नकवी (कैबिनेट मंत्री)- अल्पसंख्यक मामलों का मंत्रालय
21. प्रह्लाद जोशी (कैबिनेट मंत्री)- संसदीय मामले, कोयला और खान मंत्रालय
22. महेंद्र नाथ पांडेय (कैबिनेट मंत्री)- कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय
23. अरविंद सावंत (कैबिनेट मंत्री)- भारी उद्योग एवं सार्वजनिक उद्यम मंत्रालय
24. गिरिराज सिंह (कैबिनेट मंत्री)- पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन मंत्रालय
25. गजेंद्र सिंह शेखावत (कैबिनेट मंत्री)- जल शक्ति मंत्रालय
26. संतोष गंगवार (राज्य मंत्री-स्वतंत्र प्रभार)- श्रम एवं रोजगार मंत्रालय
27. राव इंद्रजीत सिंह (राज्य मंत्री-स्वतंत्र प्रभार)- सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन और नियोजन मंत्रालय
28. श्रीपद नाईक (राज्य मंत्री-स्वतंत्र प्रभार)- आयुष मंत्रालय (स्वतंत्र प्रभार), रक्षा मंत्रालय (राज्य मंत्री)
29. जितेंद्र सिंह (राज्य मंत्री-स्वतंत्र प्रभार)- पूर्वोत्तर विकास (स्वतंत्र प्रभार), पीएमओ, कार्मिक, जनशिकायत और पेंशन, परमाणु उर्जा, अंतरिक्ष मंत्रालय (राज्य मंत्री)
30. किरण रिजिजू (राज्य मंत्री-स्वतंत्र प्रभार)- युवा मामले एवं खेल (स्वतंत्र प्रभार), अल्पसंख्यक मामले (राज्य मंत्री)
31. प्रह्लाद सिंह पटेल (राज्य मंत्री-स्वतंत्र प्रभार)- संस्कृति और पर्यटन (स्वतंत्र प्रभार)
32. आरके सिंह (राज्य मंत्री-स्वतंत्र प्रभार)- बिजली, नवीन एवं नवीकरणीय उर्जा (स्वतंत्र प्रभार), कौशल विकास एवं उद्यमिता (राज्य मंत्री)
33. हरदीप सिंह पुरी (राज्य मंत्री-स्वतंत्र प्रभार) शहरी विकास और नागरिक उड्डयन मंत्रालय (स्वतंत्र प्रभार), वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय (राज्य मंत्री)
34. मनसुख मंडाविया (राज्य मंत्री-स्वतंत्र प्रभार) जहाजरानी (स्वतंत्र प्रभार), रसायन एवं उर्वरक (राज्य मंत्री)
35. फग्गन सिंह कुलस्ते (राज्य मंत्री) इस्पात राज्य मंत्री
36. अश्विनी चौबे (राज्य मंत्री) स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री
37. जनरल (रिटायर) वीके सिंह (राज्य मंत्री) सड़क, परिवहन और राजमार्ग राज्य मंत्री
38. कृष्ण पाल गुज्जर (राज्य मंत्री) सामाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण राज्य मंत्री
39. दानवे रावसाहेब दादाराव (राज्य मंत्री) उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण राज्य मंत्री
40. जी. किशन रेड्डी (राज्य मंत्री) गृह राज्य मंत्री
41. पुरुषोत्तम रुपाला (राज्य मंत्री) कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री
42. रामदास अठावले (राज्य मंत्री) सामाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण राज्य मंत्री
43. साध्वी निरंजन ज्योति (राज्य मंत्री) ग्रामीण विकास राज्य मंत्री
44. बाबुल सुप्रियो (राज्य मंत्री) पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री
45. संजीव कुमार बलियान (राज्य मंत्री) पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन राज्य मंत्री
46. धोत्रे संजय शमराव (राज्य मंत्री) मानव संसाधन विकास, संचार और इलेक्ट्रानिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री
47. अनुराग सिंह ठाकुर (राज्य मंत्री) वित्त और कॉरपोरेट मामलों के राज्य मंत्री
48. सुरेश अंगादि (राज्य मंत्री) रेल राज्य मंत्री
49. नित्यानंद राय (राज्य मंत्री) गृह राज्य मंत्री
50. वी मुरलीधरन (राज्य मंत्री) विदेश, संसदीय कार्य राज्य मंत्री
51. रेणुका सिंह (राज्य मंत्री) आदिवासी मामलों की राज्य मंत्री
52. सोम प्रकाश (राज्य मंत्री) वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री
53. रामेश्वर तेली (राज्य मंत्री) खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्य मंत्री
54. प्रताप चंद्र सारंगी (राज्य मंत्री) सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम और पशुपालन, डेयरी एवं मत्स्य पालन राज्य मंत्री
55. कैलाश चौधरी (राज्य मंत्री) कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री
56. देबाश्री चौधरी (राज्य मंत्री) महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री
57. अर्जुन राम मेघवाल (राज्य मंत्री) संसदीय कार्य, भारी उद्योग एवं सार्वजनिक उद्यम राज्य मंत्री
58. रतन लाल कटारिया (राज्य मंत्री) जलशक्ति और सामाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण राज्य मंत्री
दिल्ली में बसपा अध्यक्ष मायावती की अध्यक्षता में हुई संसदीय दल की बैठक में सांसदों को जिम्मेदारी सौंपी गई. नगीना संसदीय क्षेत्र से जीते सांसद गिरीश चंद्र को बहुजन समाज पार्टी संसदीय दल का नेता चुना गया है जबकि जौनपुर के सांसद श्याम सिंह यादव उपनेता होंगे. बसपा के दस सांसद विजयी हुए थे. जनता दल (सेक्युलर) से आए और अमरोहा सीट से सांसद निर्वाचित हुए कुंवर दानिश अली को मुख्य सचेतक का दायित्व सौंप मायावती ने जातीय समीकरण साधने की कोशिश की है. संसदीय दल के नवनियुक्त नेता गिरीश वर्ष 2007-12 में विधायक भी रहे हैं. मायावती के भरोसेमंद रहे गिरीश चंद मुरादाबाद, बरेली, सहारनपुर व मेरठ मंडल में संगठन की विभिन्न जिम्मेदारी भी संभाल चुके है.
वर्ष 2014 में लोक सभा का चुनाव हार चुके गिरीश ने इस बार नगीना सुरक्षित सीट से भाजपा के डा. यशवंत सिंह को 1.67 लाख वोटों से हराया है. इस सीट पर मायावती के चुनाव लडऩे की चर्चा भी चली लेकिन बसपा प्रमुख ने ऐन वक्त पर गिरीश को उम्मीदवार घोषित करके सबको चौंका दिया था. वहीं उपनेता बने श्याम सिंह यादव सेवानिवृत्त पीसीएस अधिकारी व यूपी रायफल एसोसिएशन के चेयरमैन भी हैं. मुख्य सचेतक बने दानिश अली के दादा कुंवर महमूद अली वर्ष 1962 में विधायक और वर्ष 1977 में हापुड़ लोकसभा क्षेत्र से सांसद चुने गए थे.
मायावती ने शुरू की नतीजों की समीक्षा
संसदीय दल के गठन के साथ ही बसपा प्रमुख मायावती ने लोकसभा चुनाव के नतीजों की राज्यवार समीक्षा भी शुरू कर दी. सूत्रों के मुताबिक सोमवार को दिल्ली में बसपा प्रमुख ने दिल्ली व उत्तराखंड राज्य में पार्टी के प्रदर्शन की समीक्षा की. मंगलवार को मायावती महाराष्ट्र व कर्नाटक में पार्टी की स्थिति की समीक्षा करेंगी. गौरतलब है कि बसपा ने ज्यादातर राज्यों में प्रत्याशी उतारे थे लेकिन उसे उत्तर प्रदेश की मात्र 10 सीटों पर ही सफलता मिली है.
पायल अपने परिवार की पहली डाक्टर थी. वो जिंदा रहती तो अपने खानदार और रिश्तेदारों में न जाने कितनों को डाक्टर बनने के लिए प्रेरित करती. और अपनी पायल दीदी, पायल बुआ और पायल मौसी को डाक्टर बने देख तमाम बच्चे उसके जैसा बनना चाहते. पायल की मौत अकेले उसकी नहीं है. पायल की मौत दलित-आदिवासी परिवार के सैकड़ों बच्चों के सपनों की मौत है.
पायल की मौत का कारण बनी शैतान लड़कियों, तुमने अकेले हमारी पायल को रस्सी पर लटकने को मजबूर नहीं किया, बल्कि हमारे समाज के सैकड़ों बच्चों के सपनों को लटका डाला है. पायल, तुम्हें भी गले में रस्सी डालकर लटकने से पहले सोचना चाहिए था. तुम अकेले नहीं मरी हो. तुम्हें लड़ना चाहिए था. एक के बदले तीन कहना चाहिए था.
पायल की मौत दलित-आदिवासी समाज को एक बड़ा संदेश भी दे गई है. ठीक है कि आप अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलवा रहे हैं. उन्हें डाक्टर, इंजीनियर और बड़े-बड़े पदों पर पहुंचने के लिए प्रेरित कर रहे हैं. लेकिन आप इन तमाम बातों के बीच अपने बच्चों को जातिवाद से लड़ना भी जरूर सिखाएं. जब आपका बच्चा 9वीं में पहुंच जाए, उसको बैठा कर एक बार कास्ट सिस्टम के बारे में जरूर बताएं. आने वाले दिनों में उसके सामने जाति से जुड़े कैसे सवाल आएंगे, इसके बारे में भी जरूर बताएं. उन्हें यह भी बताएं कि वो इन सवालों से कैसे लड़ें. उन्हें यह भी भरोसा दीजिए कि वह इस सवाल के सामने आने पर तुरंत आपसे बात करें. यह बहुत जरूरी है. क्योंकि अगर आप ऐसा नहीं करते हैं तो हो सकता है कि आपका बच्चा भी पायल और रोहित वेमुला बन जाए.
अब बहुत हो चुका. हमें और रोहित वेमुला और पायल नहीं चाहिए. अपने बच्चों को मजबूत बनाइए. तभी वो आपके सपनों को पूरा करेंगे. जातिवाद को नकारा नहीं जा सकता. वह कब आपके बच्चों के सामने आ जाए और उन्हें लील जाए, कहा नहीं जा सकता. इसलिए अपने बच्चों को मजबूत बनाइए, उन्हें लड़ना सिखाइए. जाति को छुपाने से काम नहीं चलेगा, उससे लड़ना होगा. इसीलिए मैं बहुजनों के अलग शैक्षिक संस्थानों की वकालत करता हूं. ताकि हमारे बच्चे जातीय दुराग्रहों को लेकर इतने मजबूत बन जाएं कि ब्राह्मणवाद और मनुवाद के हर सवाल से टकरा सके.
पायल और रोहित वेमुला जैसे अन्य बिटिया रानी, बहनों और बच्चों, हम तुम्हे पहली तस्वीर जैसा देखना चाहते हैं. ठसक के साथ गले में आला लगाए बड़ी कुर्सी पर बैठे हुए, या फिर विज्ञान पर लिखने वाला कार्ल सगान जैसा बनते हुए. हम तुम्हें तस्वीरों में नहीं देखना चाहते, खासतौर पर ऐसी तस्वीरों में जिस पर माला चढ़ी हो, और सामने मोमबत्तियां जल रही हो.
मुंबई में पायल तडवी आत्महत्या मामले में तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया है. गिरफ्तार आरोपियों का नाम अंकिता लोखंडवाला, हेमा आहुजा और भक्ति मेहर है. हेमा आहुजा को मंगलवार रात को गिरफ्तार किया गया वहीं भक्ति मेहर को भी मुंबई सेशन कोर्ट से मंगलवार की शाम में गिरफ्तार किया गया. एक अन्य आरोपी अंकिता खंडेलवाल को मुंबई पुलिस ने बुधवार सुबह गिरफ्तार कर लिया है.
पायल अपने परिवार की पहली डॉक्टर थी
पायल तडवी ने कथित तौर पर अपनी वरिष्ठ सहकर्मियों द्वारा रैगिंग और जातीय टिप्पणी किए जाने से परेशान होकर 22 मई को खुदकुशी कर ली थी. डॉक्टर पायल तडवी की आत्महत्या के बाद से ही आरोपी फरार चल रही थीं. पायल ने एक सुसाइड नोट छोड़ा था, जिसके सामने आने के बाद घटना की वजह पता चली. पायल तडवी के परिवार वालों का भी आरोप है कि तीनों महिला डॉक्टरों ने उनके अनुसूचित जनजाति का होने को लेकर ताने कसते थे और मानसिक रूप से प्रताणित करते थे. यहां तक की उसे ‘आदिवासी’ कह कर सवाल उठाते थे. पायल तडवी मुंबई के बीवाईएल नायर हॉस्पिटल में एमडी सेंकड ईयर की छात्रा थीं.
डॉक्टर पायल का एडमिशन आरक्षित कोटे से हुआ था. इसी बात का जिक्र कर पायल के सीनियर उन्हें प्रताड़ित करते थे. छात्रा के परिवार वालों ने इस बात की शिकायत हॉस्टल वार्डन से भी की थी. वॉर्डन ने तीनों को बुलाकर समझाया भी था कि इस तरह की मानसिक प्रताड़ना से बाज आएं लेकिन सीनियर माने नहीं.
अंकिता लोखंडवाला, हेमा आहुजा और भक्ति मेहर, यही वो तीन शैतान लड़कियां हैं, जिसकी वजह से पायल ने खुदकुशी कर ली
राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी इस मामले में संज्ञान लिया है और अस्पताल को नोटिस जारी किया है. गिरफ्तारी से पहले डॉ. तडवी के के माता-पिता ने मंगलवार को मुंबई में उस सरकारी अस्पताल के बाहर प्रदर्शन किया जहां वह काम करती थीं. अन्य प्रदर्शनकारी भी तडवी की मां आबिदा और पति सलमान के साथ प्रदर्शन में शामिल हुए और तीन वरिष्ठों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की जिन्होंने कथित तौर पर रैगिंग और जातीय टिप्पणियां कर उन्हें प्रताड़ित किया और यह कदम उठाने के लिए बाध्य किया.
नई दिल्ली। कांग्रेस पार्टी की हार से परेशान चल रहे राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद छोड़ने का मन बना लिया है. खबर है कि पार्टी और परिवार के तमाम लोगों के समझाने के बावजूद भी राहुल गांधी मानने को तैयार नहीं हैं. हां, उन्होंने यह जरूर कह दिया है कि जब तक विकल्प नहीं मिलता वो पद पर बने रहेंगे. हालांकि शशि थरूर सहित तमाम कांग्रेस नेताओं ने उन्हें पद पर बने रहने को कहा है और साथ ही यह भी कहा है कि राहुल गांधी का विकल्प मिलना मुश्किल है.
इस बीच राहुल गांधी ने कांग्रेस पार्टी के ही तमाम नेताओं से दूरी बना ली है. उनसे मिलने के लिए उनके आवास पर तमाम नेता पहुंच रहे हैं लेकिन राहुल गांधी किसी से नहीं मिल रहे हैं. यहां तक कि राहुल गांधी ने मंगलवार को राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट से भी मुलाकात नहीं की, वो भी सिर्फ प्रियंका गांधी से ही मिल पाए.
चुनाव के बाद से ही कांग्रेस में नेतृत्व का संकट पैदा हुआ है. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में सरकार होने के बावजूद खराब प्रदर्शन से राहुल खासा नाराज थे. उन्होंने कई सीनियर लीडर पर ये कहकर निशाना साधा था कि कुछ नेताओं ने सिर्फ अपने बेटों को तवज्जो दी. दरअसल राहुल गांधी का इशारा राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ की ओर था.
विगत 27 मई को हिन्दी सिनेमा के जाने-माने एक्शन हीरो (एक्शन कोरियोग्राफर) और अजय देवगन के पिता वीरू देवगन का निधन हो गया. वीरू देवगण के निधन पर तमाम फिल्मी हस्तियों ने अजय देवगण के घर पहुंच कर उन्हें श्रद्धांजलि दी. वीरू देवगन के अंतिम संस्कार में ऐश्वर्या राय, अभिषेक बच्चन, शाहरुख खान, सनी देओल समेत तमाम सितारे पहुंचे. इस दौरान बॉलीवुड के जीवित कवदंती बन चुके अमिताभ बच्चन भी पहुंचे. अमिताभ वीरू देवगण के काफी करीब रहे हैं.
उनकी मौत की खबर सुनकर अमिताभ बच्चन को जबरदस्त झटका लगा. अपने दोस्त को खो देने का गम बिग बी ने एक ब्लॉग में लिखा है.अमिताभ बच्चन, वीरू देवगन के अंतिम संस्कार में अपनी फिल्म की शूटिंग छोड़कर पहुंचे थे. अपने दोस्त वीरू देवगन की मौत से दुखी अमिताभ ने बेहद इमोशनल नोट लिखा है.
अमिताभ ने आगे वीरू देवगन संग अपनी पहली मुलाकात और काम के अनुभव के बारे में बताया. अमिताभ ने लिखा, “मैं उनसे पहली बार राजस्थान के एक छोटे से गांव पोशीना में मिला था. मुझे याद है मेरी फिल्म रेशमा और शेरा की. जब खन्ना साहेब (वीरू देवगन) डमी के साथ एक्शन सीन का रिहर्सल कर रहे थे. सीन में सुनील दत्त साहब फिल्म के लीड हीरो थे, जिन्हें गांव के निगेटिव किरदार से पिटना था. वो लीडिंग मैन की तरह सीन को कर रहे थे. “
फूल और कांटे के दौरान अपने पिता वीरू देवगण के साथ अजय देवगण (फाइल फोटो)
सीन के बारे में डिटेल जानकारी देते हुए अमिताभ ने लिखा, “मुझे अच्छी तरह याद है. रेत में शूटिंग के दौरान खन्ना साहब कितने दर्द में शूटिंग कर रहे थे. उनके चेहरे का वो दर्द याद है, लेकिन वो लगातर डमी के साथ सीन रिहर्सल पूरे परफेक्शन के साथ कर रहे थे.”
अमिताभ बच्चन ने लिखा, “फिर एक दिन हमने उन्हें (वीरू देवगन) खो दिया… वीरू देवगन बहुत ही शानदार एक्शन डायरेक्टर रहे. जिन्होंने एक्शन में नए नए तरह का इनोवेशन किया. सिर्फ नए तरीके से करने के साथ उसे परफेक्शन के साथ पूरा किया.”
अमिताभ के मुताबिक, वीरू देवगन ने दूसरे स्टंटमैन के लिए नौकरी के रास्ते खोले. कितने ऐसे स्टंटमैन है जो आज डायरेक्टर प्रोड्यूसर बन गए हैं. वीरू जी खुद भी प्रोड्यूसर और डायरेक्टर बने.अमिताभ के मुताबिक वीरू जी ने इंडस्ट्री को ग्रूम किया, नया परफेक्शन दिया. उनका सबसे फाइन टैलेंट है- अजय देवगन. हमने कई फिल्मों में साथ काम किया. मेरी ज्यादातर फिल्मों में उन्होंने एक्शन सीन किए. वीरू पंजाब से थे, सेट पर मेरा वेलकम भी वो उसी अंदाज में करते थे. मुझे अमिताभ सिंघया कहकर बुलाते थे. अमिताभ ने लिखा, “वीरू की मौत मेरे लिए एक सदमे की तरह है. जब मुझे ये खबर मिली, उस वक्त चेहरे की शूटिंग कर रहा था. मैंने काम रोक दिया. पूरी टीम ने उनके सम्मान के लिए दो मिनट का मौन रखा. काम खत्म होने के बाद उनके अंतिम संस्कार में गया. वहां पहुंचकर सारी चीजें घूमने लगीं, कैसे वो काम करते थे. वक्त कैसे बीत जाता है… जो कभी वापस नहीं आता. बस रह जाती हैं यादें.
2019 के लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद जो लोग उत्तर प्रदेश और बिहार में बहुजन राजनीति के सफल नहीं होने से परेशान हैं, उनके लिए जोतिबा फुले, बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर, शाहूजी महाराज और गाडगे महाराज जैसे महान समाज सुधारकों की धरती से अच्छी खबर है। यह खबर आई है बाबासाहेब के पौत्र एडवोकेट प्रकाश आम्बेडकर के जरिए। दरअसल महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव के दौरान प्रकाश आम्बेडकर और एमआईएम के नेता असुद्दीन ओवैसी ने मिलकर चुनाव लड़ा और लोकसभा चुनाव के जो नतीजे आए हैं वो बहुजन राजनीति के समर्थकों के लिए चौंकाने वाले हैं। दरअसल प्रकाश आम्बेडकर की भरिप बहुजन महासंघ और ओवैसी की पार्टी AIMIM के अलावा JDS जैसे छोटे दलों को मिलाकर वंचित बहुजन अघाड़ी बनाया गया। प्रकाश आंबेडकर ने एमआईएम के असुद्दीन ओवैसी से हाथ मिला कर दलित और मुस्लिम मतदाताओं को एकजुट करने की कोशिश की और नतीजे बता रहे हैं कि ऐसा हुआ है।
वंचित बहुजन अघाड़ी ने सभी 48 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ा। उसे 42 लाख से अधिक वोट मिले हैं, जबकि वोट प्रतिशत 6.5 रहा। लोकसभा चुनाव परिणामों में अघाड़ी तीसरे मजबूत विकल्प के रूप में उभरा है। इस अघाड़ी को प्रकाश आम्बेडकर ने ओवैसी के साथ मिलकर एक साल पहले बनाया था। इन्होंने मिलकर महाराष्ट्र में दलितों में मुख्यतः बौद्ध समाज के साथ ही मातंग, चमार, पिछड़ी जातियां जैसे धनगर, माली, वडार, कैकाली, बंजारी, धुमंतू जातिया, धीवर, वंजारी और मुसलिम समाज को प्रकाश आम्बेडकर ने एकता के सूत्र में बांधा है।
प्रकाश आम्बेडकर और ओवैसी (फाइल फोटो)
इस गठबंधन ने लोकसभा चुनाव में सबसे पिछड़े जाति- समूहों को मैदान में उतारकर सामाजिक इंजीनियरिंग का आगाज किया। इस अघाड़ी ने जिन 48 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा, उनमें धनगर समाज के सात, माली समाज के दो, वंजारी समाज के एक, मुस्लिम समाज से पांच, बौद्ध समाज से 9 उम्मीदवार को उतारा. इसके अलावा मातंग, चमार, वडार, कैकाडी, तैलिक, विश्वकर्मा, धीवर जातियों को भी मौका दिया। इसके अलावा सामाजिक समीकरण बनाए रखने के लिए आघाड़ी ने मराठा, कुणबी और भूमिहार जाति के उम्मीदवारों को भी मौका दिया।
अघाड़ी का प्रदर्शन भी शानदार रहा। इस अघाड़ी ने कई दिग्गज नताओं को धूल चटाया। इसमें पूर्व गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे, पूर्व गृह राज्य मंत्री हंसराज अहिर, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण का नाम शामिल है। प्रकाश आम्बडेकर ने खुद अकोला और सोलापुर दो जगहों से चुनाव लड़ा। सोलापुर में आंबेडकर सुशील कुमार शिंदे के सामने थे। यहां प्रकाश आम्बेडकर को 1,70,007 वोट मिला। दोनों की लड़ाई में यहां से भाजपा उम्मीदवार ने चुनाव जीता। तो अकोला सीट पर भी प्रकाश आम्बेडकर को 2,78,848 वोट मिले। हालांकि यहां से भी वो जीत नहीं सके और भाजपा उम्मीदवार संजय धोत्रे एक बार फिर जीतने में सफल रहें।
नांदेड़ में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण की हार में भी वंचित बहुजन आघाड़ी की भूमिका महत्वपूर्ण रही। नांदेड़ में अशोक चव्हाण 40 हजार से ज्यादा मतों से भाजपा से हारे, यहां पर बहुजन वंचित आघाड़ी के प्रत्याशी यशपाल भिंगे को एक लाख 66 हजार वोट मिले। वंचित बहुजन आघाड़ी के उम्मीदवारों के कारण भाजपा-शिवसेना गठबंधन के उम्मीदवार केंद्रीय गृह राज्यमंत्री हंसराज अहीर चंद्रपूर में कांग्रेस उम्मीदवार से हार गये। जीत की बात करें तो वंचित बहुजन आघाड़ी के उम्मीदवार इम्तियाज जलील ने औरंगाबाद में शिवसेना के दिग्गज नेता और पांच बार के सांसद चंद्रकांत खैरे को करीबी मुकाबले में तकरीबन 4500 वोटों से हराकर हलचल मचा दी। खैरे को 3,84,550 वोट मिले, जबकि अघाड़ी के बैनर पर चुनाव लड़ रहे AIMIM के उम्मीदवार जलील ने 3,89,042 वोट हासिल कर शिवसेना को बड़ा झटका दे दिया।
महाराष्ट्र के तकरीबन दर्जन भर लोकसभा चुनाव क्षेत्रों में वंचित बहुजन आघाड़ी के उम्मीदवार एक लाख से तीन लाख तक वोट हासिल करने में कामयाब रहें। अगाड़ी के उम्मीदवारों को सांगली में तीन लाख से ज्यादा, अकोला में पौने तीन लाख, इसके अलावा हिंगोली और बुलडाणा में पौने दो लाख, हातकणंगले, चंद्रपूर, लातूर और गढ़चिरौली में सवा लाख, नांदेड़, सोलापुर और परभणी में डेढ़ लाख से ज्यादा जबकि नासिक में एक लाख से ज्यादा वोट मिले। तो वंचित बहुजन आघाड़ी लोकसभा के दस क्षेत्रों में तीसरे स्थान पर रहा।
बहुजन समाज पार्टी की बात करें तो 2019 चुनाव में बसपा ने 44 स्थानों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। उन्हें कुल मतों का एक प्रतिशत भी हासिल नहीं हुआ है। इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी को मात्र 0.86 प्रतिशत वोट ही मिल पाए हैं। यह प्रदेश में नोटा के तहत पड़े 0.90 प्रतिशत से भी कम है। साफ है कि बसपा की यह स्थिति दलित-बहुजन मतदाता वर्ग के वंचित बहुजन आघाड़ी की तरफ खिसक जाने से हुयी है। महाराष्ट्र में वंचित समाज के तमाम राजनीतिक दल चुनाव मैदान में उतरते हैं। हालांकि इस चुनाव में सबके सब वंचित बहुजन अघाड़ी के सामने धाराशायी हो गए।
महाराष्ट्र में वंचित तबके के तमाम राजनैतिक दल चुनाव मैदान में उतरते हैं। चुनाव लड़ने वालों में बहुजन रिपब्लिकन सोशलिस्ट पार्टी के अध्यक्ष सुरेश माने को नागपुर लोकसभा क्षेत्र में मात्र 3412 वोट मिले। इसके अलावा आरपीआई का अठावले गुट हो या फिर गवई एवं अन्य गुट कोई भाजपा-शिवसेना के साथ लगा रहा तो कोई कांग्रेस-राष्ट्रवादी गठबंधन के साथ लेकिन किसी ने इनकी पार्टी को चुनाव में कोई सीट नहीं दी।
महाराष्ट्र में वंचित, बहुजन, दलित, अति पिछड़े, घुमंतू जाति के साथ मुस्लिमों का गठजोड़ बहुजन वंचित आघाड़ी के रूप में आकार ले रहा है। लोकसभा चुनाव में मिले जनसमर्थन से उत्साहित वंचित बहुजन अघाड़ी के नेता प्रकाश आम्बेडकर और ओवैसी अक्टूबर महीने में होने वाले विधान सभा चुनाव की तैयारियों में जुट गए हैं। इससे राज्य के दोनों प्रमुख गठबंधनों में खलबली मची हुई है। माना जा रहा है कि जिस तरह प्रदेश में वंचित बहुजन अघाड़ी का उभार हुआ है, विधानसभा चुनाव तक वह एक सशक्त विकल्प के रूप में सामने आएगा। बशर्त, यह गठजोड़ अधिक संगठित होकर तथा एकता कायम रखकर मैदान में उतरे, अगर ऐसा होता है तो महाराष्ट्र में वंचित बहुजनों का राजनैतिक भविष्य आने वाले दिनों में उज्जवल हो सकता है। और अगर वंचित तबके के सभी दल वंचित बहुजन अघाड़ी के बैनर तले इकट्ठे हो गए तो बहुजन नायकों की धरती पर बहुजनों के जीत की पताका फहराने में देर नहीं लगेगी।
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी चाहते थे कि महाराष्ट्र में उनकी पार्टी का गठबंधन दलित नेता प्रकाश आंबेडकर की पार्टी के साथ हो जाए, लेकिन कांग्रेस की लेटलतीफी और आंबेडकर की बड़ी मांगों के सामने न झुकने की नीति ने उसे काफी नुकसान पहुंचाया. आंबेडकर और असदुद्दीन ओवैसी के गठबंधन ने राज्य में कांग्रेस-राकांपा गठबंधन को करीब 15 सीटों पर भारी नुकसान पहुंचाया.
प्रकाश आंबेडकर ने हैदराबाद के नेता असदुद्दीन ओवैसी के साथ मिलकर वंचित बहुजन आघाड़ी का गठन किया और राज्य की सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए. यह गठबंधन पूरी मजबूती से लड़ा और 40 लाख से ज्यादा वोट खींच ले गया जिसके कारण कांग्रेस को करीब छह, राकांपा को दो और उनके सहयोगी दल स्वाभिमानी शेतकरी संगठन को दो सीटों पर हार का मुंह देखना पड़ा.
वंचित बहुजन आघाड़ी का नुकसान औरंगाबाद में शिवसेना को भी उठाना पड़ा, जहां उसके दिग्गज नेता चंद्रकांत खैरे चुनाव हार गए और वंचित बहुजन आघाड़ी के उम्मीदवार एमआइएम विधायक इम्तियाज जलील 3,89,042 मत पाकर जीत गए. इस सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार चौथे स्थान पर जा पहुंचा. आंबेडकर की वंचित बहुजन आघाड़ी को करीब आधा दर्जन सीटों पर डेढ़ लाख से ज्यादा और लगभग इतनी सीटों पर एक लाख से ज्यादा वोट मिले. 50 हजार से अधिक मत तो उसे कई सीटों पर हासिल हुए. आंबेडकर खुद सोलापुर और अकोला दो सीटों से चुनाव लड़े थे.
सोलापुर में कांग्रेस उम्मीदवार पूर्व गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे की हार का कारण आंबेडकर को 1,70,007 वोट मिलना रहा . यहां जीत हुई भाजपा उम्मीदवार डॉ. जय सिद्धेश्र्वर महास्वामी की. अकोला सीट पर भी प्रकाश को 2,78,848 वोट मिले. यहां वह भाजपा उम्मीदवार संजय धोत्रे की जीत में मददगार साबित हुए. नांदेड़ में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण की हार में भी वंचित बहुजन आघाड़ी की भूमिका महत्वपूर्ण रही.
माना जा रहा है कि आंबेडकर ने लोकसभा चुनाव में अपनी ताकत दिखाकर कुछ ही महीनों बाद होने जा रहे विधानसभा चुनावों के लिए अपनी जमीन तैयार कर ली है. अब कांग्रेस-राकांपा को विधानसभा चुनाव के लिए अपना नया गठबंधन बनाते समय कई बार सोचना पड़ेगा. हालांकि आंबेडकर की मांग बड़ी होती है.
लोकसभा चुनाव में भी उन्होंने कांग्रेस से जितनी सीटों की मांग की थी, उतनी देकर तो कांग्रेस-राकांपा के लिए भी कुछ नहीं बचता, लेकिन आंबेडकर को गठबंधन से बाहर रखकर विधानसभा चुनाव लड़ना इन दलों को और भारी पड़ सकता है. माना जा रहा है कि कांग्रेस-राकांपा इस बार आंबेडकर के सारे नखरे उठाने को तैयार रहेगी.
प्रचंड बहुमत के साथ जीतकर दुबारा देश की सत्ता पर कब्जा जमाने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अब अपना कैबिनेट बनाने की तैयारियों में जुट गए हैं. इस कैबिनेट में जहां भाजपा के प्रमुख चेहरे बने रहेंगे तो वहीं सहयोगियों को भी जगह मिेलेगी. इन दलों में जनता दल (यूनाइटेड), अन्नाद्रमुक को भी जगह मिल सकती है. सूत्रों के मुताबिक पश्चिम बंगाल और तेलंगाना में बीजेपी के बेहतर प्रदर्शन के कारण इन दोनों राज्यों के पार्टी नेताओं को भी मंत्रिपरिषद में जगह मिल सकती है. पीएम मोदी 30 मई को नए कार्यकाल के लिए शपथ लेंगे. इसके बाद मंत्रिमंडल का खाका भी लोगों के सामने आ सकता है.
नए मंत्रिमंडल में राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, निर्मला सीतारमण, रविशंकर प्रसाद, पीयूष गोयल, नरेंद्र सिंह तोमर और प्रकाश जावड़ेकर जैसे पुराने चेहरे बने रह सकते हैं. ऐसी अटकलें हैं कि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह भी नई सरकार में मंत्री पद संभाल सकते हैं. हालांकि, शाह ने इस मुद्दे पर अब तक कोई टिप्पणी नहीं की है.भाजपा की सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी(लोजपा) के प्रमुख राम विलास पासवान ने अपने सांसद पुत्र चिराग पासवान को मंत्री बनाने की वकालत की है. लोजपा ने 6 लोकसभा सीटें जीती हैं. पासवान पिछली सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं.
बीजेपी ने इन चुनावों में पश्चिम बंगाल में 18 और तेलंगाना में चार सीटें जीती हैं. इसके कारण पार्टी नई सरकार में दोनों राज्यों को ज्यादा प्रतिनिधित्व दे सकती है. इसके अलावा जिन राज्यों में आने वाले वक्त में चुनाव है जैसे हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड जैसे राज्यों के नेताओं को भी मंत्रिमंडल में प्रमुखता से जगह मिल सकती है.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक ऐसी अटकलें हैं कि पिछली सरकार में वित्त मंत्री रहे अरुण जेटली स्वास्थ्य कारणों से मंत्रिपरिषद में शामिल नहीं होंगे. लेकिन जेटली के करीबी लोगों का कहना है कि इलाज के बाद उनकी तबीयत ठीक है. सरकार ने रविवार को दखल देकर इस बात पर जोर दिया कि उनकी सेहत से जुड़ी खबरें गलत और बेबुनियाद हैं. भारत सरकार के प्रधान प्रवक्ता सितांशु रंजन कार ने ट्वीट किया, ‘केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली की स्वास्थ्य की स्थिति के बारे में मीडिया के एक हिस्से में आई खबरें गलत और बेबुनियाद है. मीडिया को सलाह दी जाती है कि अफवाह फैलाने से परहेज करें.’
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत भारतीय जनता पार्टी को मिले प्रचंड बहुमत से गदगद हैं. मोहन भागवत का कहना है कि ‘अब राम का काम हो कर रहेगा.’ राजस्थान के उदयपुर पहुंचे आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने सोमवार को बड़गांव इलाके में प्रताप गौरव केंद्र में नवनिर्मित भक्तिधाम प्राणप्रतिष्ठा और जन समर्पण कार्यक्रम में शिरकत की. इस दौरान उन्होंने यह बात कही.
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए आरएसएस प्रमुख भागवत ने कहा कि इतिहास कहता है कि जिस देश के लोग सजग, शीलवान, सक्रिय और बलवान हों, उस देश का भाग्य निरंतर आगे बढ़ता है. संघ प्रमुख ने कहा कि हमेश चर्चा होती है कि भारत विश्वशक्ति बनेगा लेकिन उससे पहले हमारे पास एक डर का एक डंडा अवश्य होना चाहिए, तभी दुनिया मानेगी. मोहन भागवत ने मोरारी बापू के संबोधन को याद दिलाते हुए कहा कि राम का काम सभी को करना है और राम का काम होकर रहेगा.
गौरतलब है कि मार्च महीने में ग्वालियर में आरएसएस की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की तीन विदसीय बैठक हुई थी जिसमें राम मंदिर निर्माण का मार्ग जल्द प्रशस्त किए जाने पर जोर दिया गया था. प्रतिनिधि सभा की बैठक के पहले दिन वक्ताओं ने राम मंदिर निर्माण की पैरवी करते हुए सभी बाधाओं को दूर किए जाने के लिए जरूरी कदम उठाने पर जोर दिया.
नई दिल्ली। चुनावों की गिनती के राउंड जैसे-जैसे बढ़ते जा रहे हैं, वैसे-वैसे तमाम दिग्गज नेताओं पर भी हार का खतरा मंडराने लगा है. जो स्थिति बन रही है, उसमें ऐसे तमाम दिग्गज इस बार लोकसभा में पहुंचते हुए दिखाई नहीं दे रहे हैं, जिनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है. ये दिग्गज पक्ष में रहें या विपक्ष में, इन्होंने संसद में होने वाली तमाम चर्चाओं में हिस्सा लेते हुए अपनी मजबूत स्थिति दर्ज कराई है. आइए नजर डालते हैं कि इस बार किस-किस नेता पर हार का संकट मंडराया है.
16वीं लोकसभा के बाद संसद में कांग्रेस की ओर से प्रमुख नेता के तौर पर मौजूद और दिग्गज कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे पर हार का संकट दिख रहा है. खड़गे कर्नाटक की गुलबर्गा सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार हैं. इसके अलावा पटनासाहिब से शत्रुध्न सिन्हा पीछे हैं. सिन्हा को रविशंकर प्रसाद काफी आगे चल रहे हैं. पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार बिहार के सासाराम से पीछे चल रहे हैं. मध्यप्रदेश के गुणा सीट से कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया पीछे चल रहे हैं. सिंधिया भाजपा के केपी यादव से पीछे हैं.
भोपाल से चुनाव लड़ रहे दिग्विजय सिंह भी इस बार संसद में पहुंचते नहीं दिख रहे हैं. उन्हें भाजपा की साध्वी प्रज्ञा से हार मिलती दिख रही है. मुजफ्फरनगर से राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष चौधरी अजीत सिंह भी पीछे चल रहे हैं. तो बागपत सीट से उनके बेटे जयंत चौधरी पीछे चल रहे हैं
कर्नाटक के तुमकुर सीट से पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा पीछे चल रहे हैं. तो बिहार की गया सीट से बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी हारते दिख रहे हैं. बिहार के मधेपुरा सीट से शरद यादव हार रहे हैं तो प्रदेश के उजियारपुर से रालोसपा अध्यक्ष उपेन्द्र कुशवाहा पीछे चल रहे हैं. महाराष्ट्र की बात करें तो यहां के नांदेड़ सीट से प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चौहान पीछे चल रहे हैं. झारखंड के दुमका सीट से झारखंड मुक्ति मोर्चा के सीबू सोरेन चुनाव में पीछे हैं.
सबसे खास बात यह है कि रुझानों में दर्जन भर पूर्व मुख्यमंत्री चुनाव हारते दिख रहे हैं. इनमें अकेले कांग्रेस के नौ मुख्यमंत्री शामिल हैं. कांग्रेस के जो पूर्व मुख्यमंत्री पीछे चल रहे हैं या हारने की स्थिति में हैं, उनमें मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री सुशील कुमार शिंदे और अशोक चव्हाण, दिल्ली की पूर्व सीएम शीला दीक्षित, उत्तराखंड के सीएम हरीश रावत, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा आदि का नाम शामिल है.
नई दिल्ली। 17वीं लोकसभा में भाजपा को प्रचंड जीत मिली है. भाजपा अकेले बूते सरकार बना रही है. मोदी के नेतृत्व, नाम और चेहरे पर चुनाव लड़ने वाली भाजपा इस बार के चुनाव में 2014 से भी बेहतर प्रदर्शन किया. भाजपा ने अकेले 302 सीटें जीती है. तो वहीं एनडीए साढ़े तीन सौ के पार पहुंच गया है. कांग्रेस पार्टी देश भर में धाराशायी हो गई है उसे सिर्फ 54 सीटें मिली है, जो 2014 से सिर्फ आठ सीटें ज्यादा है.
अन्य पार्टियों की बात करें तो सपा, बसपा, तृणमूल कांग्रेस, एआईडीएमके सहित तमाम राज्यों की क्षेत्रिय पार्टियां हैं तो उनके हिस्से में तकरीबन 100 सीटें आती दिख रही हैं.
सुबह रुझान आने के साथ ही भाजपा ने शुरुआत से ही बढ़त बनानी शुरू कर दी थी. दोपहर होते-होते यह साफ हो गया कि कांग्रेस और गठबंधन भाजपा को रोकने में कामयाब नहीं हो सका है. गुजरात, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, आंध्र प्रदेश आदि राज्यों में कांग्रेस या तो कोई सीट नहीं जीत सकी है या फिर महज दो से तीन सीटों पर ही लीड लेती दिखाई दे रही है.
उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहां गठबंधन के समर्थकों को 50 से 60 सीटें मिलने का अनुमान लगाया जा रहा था, लेकिन अभी तक के रुझान के मुताबिक गठबंधन 25 सीटों तक सिमटता दिख रहा है. बिहार में विपक्षी गठबंधन पूरी तरह फेल हो गया है. यहां विपक्ष को सिर्फ 2 सीटों पर बढ़त मिलती दिख रही है.