महाराष्ट्रः बहुजन राजनीति का नया केंद्र

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2019 के लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद जो लोग उत्तर प्रदेश और बिहार में बहुजन राजनीति के सफल नहीं होने से परेशान हैं, उनके लिए जोतिबा फुले, बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर, शाहूजी महाराज और गाडगे महाराज जैसे महान समाज सुधारकों की धरती से अच्छी खबर है। यह खबर आई है बाबासाहेब के पौत्र एडवोकेट प्रकाश आम्बेडकर के जरिए। दरअसल महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव के दौरान प्रकाश आम्बेडकर और एमआईएम के नेता असुद्दीन ओवैसी ने मिलकर चुनाव लड़ा और लोकसभा चुनाव के जो नतीजे आए हैं वो बहुजन राजनीति के समर्थकों के लिए चौंकाने वाले हैं। दरअसल प्रकाश आम्बेडकर की भरिप बहुजन महासंघ और ओवैसी की पार्टी AIMIM के अलावा JDS जैसे छोटे दलों को मिलाकर वंचित बहुजन अघाड़ी बनाया गया। प्रकाश आंबेडकर ने एमआईएम के असुद्दीन ओवैसी से हाथ मिला कर दलित और मुस्लिम मतदाताओं को एकजुट करने की कोशिश की और नतीजे बता रहे हैं कि ऐसा हुआ है।

वंचित बहुजन अघाड़ी ने सभी 48 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ा। उसे 42 लाख से अधिक वोट मिले हैं, जबकि वोट प्रतिशत 6.5 रहा। लोकसभा चुनाव परिणामों में अघाड़ी तीसरे मजबूत विकल्प के रूप में उभरा है। इस अघाड़ी को प्रकाश आम्बेडकर ने ओवैसी के साथ मिलकर एक साल पहले बनाया था। इन्होंने मिलकर महाराष्ट्र में दलितों में मुख्यतः बौद्ध समाज के साथ ही मातंग, चमार, पिछड़ी जातियां जैसे धनगर, माली, वडार, कैकाली, बंजारी, धुमंतू जातिया, धीवर, वंजारी और मुसलिम समाज को प्रकाश आम्बेडकर ने एकता के सूत्र में बांधा है।

प्रकाश आम्बेडकर और ओवैसी (फाइल फोटो)

इस गठबंधन ने लोकसभा चुनाव में सबसे पिछड़े जाति- समूहों को मैदान में उतारकर सामाजिक इंजीनियरिंग का आगाज किया। इस अघाड़ी ने जिन 48 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा, उनमें धनगर समाज के सात, माली समाज के दो, वंजारी समाज के एक, मुस्लिम समाज से पांच, बौद्ध समाज से 9 उम्मीदवार को उतारा. इसके अलावा मातंग, चमार, वडार, कैकाडी, तैलिक, विश्वकर्मा, धीवर जातियों को भी मौका दिया। इसके अलावा सामाजिक समीकरण बनाए रखने के लिए आघाड़ी ने मराठा, कुणबी और भूमिहार जाति के उम्मीदवारों को भी मौका दिया।

अघाड़ी का प्रदर्शन भी शानदार रहा। इस अघाड़ी ने कई दिग्गज नताओं को धूल चटाया। इसमें पूर्व गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे, पूर्व गृह राज्य मंत्री हंसराज अहिर, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण का नाम शामिल है। प्रकाश आम्बडेकर ने खुद अकोला और सोलापुर दो जगहों से चुनाव लड़ा। सोलापुर में आंबेडकर सुशील कुमार शिंदे के सामने थे। यहां प्रकाश आम्बेडकर को 1,70,007 वोट मिला। दोनों की लड़ाई में यहां से भाजपा उम्मीदवार ने चुनाव जीता। तो अकोला सीट पर भी प्रकाश आम्बेडकर को 2,78,848 वोट मिले। हालांकि यहां से भी वो जीत नहीं सके और भाजपा उम्मीदवार संजय धोत्रे एक बार फिर जीतने में सफल रहें।

नांदेड़ में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण की हार में भी वंचित बहुजन आघाड़ी की भूमिका महत्वपूर्ण रही। नांदेड़ में अशोक चव्हाण 40 हजार से ज्यादा मतों से भाजपा से हारे, यहां पर बहुजन वंचित आघाड़ी के प्रत्याशी यशपाल भिंगे को एक लाख 66 हजार वोट मिले। वंचित बहुजन आघाड़ी के उम्मीदवारों के कारण भाजपा-शिवसेना गठबंधन के उम्मीदवार केंद्रीय गृह राज्यमंत्री हंसराज अहीर चंद्रपूर में कांग्रेस उम्मीदवार से हार गये। जीत की बात करें तो वंचित बहुजन आघाड़ी के उम्मीदवार इम्तियाज जलील ने औरंगाबाद में शिवसेना के दिग्गज नेता और पांच बार के सांसद चंद्रकांत खैरे को करीबी मुकाबले में तकरीबन 4500 वोटों से हराकर हलचल मचा दी। खैरे को 3,84,550 वोट मिले, जबकि अघाड़ी के बैनर पर चुनाव लड़ रहे AIMIM के उम्मीदवार जलील ने 3,89,042 वोट हासिल कर शिवसेना को बड़ा झटका दे दिया।

महाराष्ट्र के तकरीबन दर्जन भर लोकसभा चुनाव क्षेत्रों में वंचित बहुजन आघाड़ी के उम्मीदवार एक लाख से तीन लाख तक वोट हासिल करने में कामयाब रहें। अगाड़ी के उम्मीदवारों को सांगली में तीन लाख से ज्यादा, अकोला में पौने तीन लाख, इसके अलावा हिंगोली और बुलडाणा में पौने दो लाख, हातकणंगले, चंद्रपूर, लातूर और गढ़चिरौली में सवा लाख, नांदेड़, सोलापुर और परभणी में डेढ़ लाख से ज्यादा जबकि नासिक में एक लाख से ज्यादा वोट मिले। तो वंचित बहुजन आघाड़ी लोकसभा के दस क्षेत्रों में तीसरे स्थान पर रहा।

बहुजन समाज पार्टी की बात करें तो 2019 चुनाव में बसपा ने 44 स्थानों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। उन्हें कुल मतों का एक प्रतिशत भी हासिल नहीं हुआ है। इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी को मात्र 0.86 प्रतिशत वोट ही मिल पाए हैं। यह प्रदेश में नोटा के तहत पड़े 0.90 प्रतिशत से भी कम है। साफ है कि बसपा की यह स्थिति दलित-बहुजन मतदाता वर्ग के वंचित बहुजन आघाड़ी की तरफ खिसक जाने से हुयी है। महाराष्ट्र में वंचित समाज के तमाम राजनीतिक दल चुनाव मैदान में उतरते हैं। हालांकि इस चुनाव में सबके सब वंचित बहुजन अघाड़ी के सामने धाराशायी हो गए।

महाराष्ट्र में वंचित तबके के तमाम राजनैतिक दल चुनाव मैदान में उतरते हैं। चुनाव लड़ने वालों में बहुजन रिपब्लिकन सोशलिस्ट पार्टी के अध्यक्ष सुरेश माने को नागपुर लोकसभा क्षेत्र में मात्र 3412 वोट मिले। इसके अलावा आरपीआई का अठावले गुट हो या फिर गवई एवं अन्य गुट कोई भाजपा-शिवसेना के साथ लगा रहा तो कोई कांग्रेस-राष्ट्रवादी गठबंधन के साथ लेकिन किसी ने इनकी पार्टी को चुनाव में कोई सीट नहीं दी।

महाराष्ट्र में वंचित, बहुजन, दलित, अति पिछड़े, घुमंतू जाति के साथ मुस्लिमों का गठजोड़ बहुजन वंचित आघाड़ी के रूप में आकार ले रहा है। लोकसभा चुनाव में मिले जनसमर्थन से उत्साहित वंचित बहुजन अघाड़ी के नेता प्रकाश आम्बेडकर और ओवैसी अक्टूबर महीने में होने वाले विधान सभा चुनाव की तैयारियों में जुट गए हैं। इससे राज्य के दोनों प्रमुख गठबंधनों में खलबली मची हुई है। माना जा रहा है कि जिस तरह प्रदेश में वंचित बहुजन अघाड़ी का उभार हुआ है, विधानसभा चुनाव तक वह एक सशक्त विकल्प के रूप में सामने आएगा। बशर्त, यह गठजोड़ अधिक संगठित होकर तथा एकता कायम रखकर मैदान में उतरे, अगर ऐसा होता है तो महाराष्ट्र में वंचित बहुजनों का राजनैतिक भविष्य आने वाले दिनों में उज्जवल हो सकता है। और अगर वंचित तबके के सभी दल वंचित बहुजन अघाड़ी के बैनर तले इकट्ठे हो गए तो बहुजन नायकों की धरती पर बहुजनों के जीत की पताका फहराने में देर नहीं लगेगी।

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