कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने के मायने

15 जनवरी 1978, समाचार पत्र ‘अमर उजाला’ में एक तस्वीर छपी थी। तस्वीर बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर के पिता गोकुल ठाकुर की थी। वह किसी की हजामत बना रहे थे। उनका अपने मुख्यमंत्री बेटे के बारे में कहना था कि मेरे लिए वह बेरोजगार है। पैसा नहीं भेजता। और मुझे अपना पुराना रोजगार करने में कोई संकोच नहीं है। जो व्यक्ति दो बार बिहार का मुख्यमंत्री रहा हो, उसके पिता के बारे में क्या आप ऐसी कल्पना कर सकते हैं। शायद नहीं, लेकिन यह सच था। दरअसल कर्पूरी ठाकुर परिवार के नहीं, बल्कि समाज के नेता थे। वंचितों और शोषितों के नेता थे। मुख्यमंत्री रहते रिक्शा पर चढ़कर चल देने वाले नेता थे। इसीलिए वो जननायक थे। 24 फऱवरी को कर्पूरी ठाकुर की 100वीं जयंती मनाई जा रही है। और भारत सरकार द्वारा कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने की घोषणा ने इस मौके को और खास बना दिया है। हालांकि भारत रत्न की मर्यादा पिछले दिनों में गिरी है, लेकिन मोदी सरकार की इस घोषणा के बाद वंचित समाज में खुशी है। वह भारत के इस सर्वोच्च सम्मान को निश्चित तौर पर काफी पहले डिजर्व करते थे। लेकिन जब देश लोकसभा चुनाव के मुहाने पर खड़ा है, और पीएम मोदी 4 फरवरी को बिहार से चुनावी मुहिम शुरू करने वाले है, ऐसे में इस सम्मान के राजनीतिक मायने भी तलाशे जाने लगे हैं। लेकिन पहले बात जननायक कर्पूरी ठाकुर की। वह बिहार में आरक्षण के जनक रहे हैं। 1977 में दूसरी बार बिहार का सीएम बनने के बाद उन्होंने ओबीसी को सरकारी नौकरी में 26 फीसदी का आरक्षण दिया। जिसके बाद बिहार की सामंती जातियों ने उन्हें सार्वजनिक तौर पर गालियां दी और उनके खिलाफ निम्न स्तर के जातीय नारे गढ़े गए। संभवतः वह भारत के किसी प्रदेश के इकलौते मुख्यमंत्री रहे, जिन्हें पद पर रहते हुए जातीय गालियां दी गई। हालांकि कर्पूरी डिगे नहीं। उन्होंने मुंगेरीलाल आयोग की सिफारिशों को लागू किया, जिसके बाद 90 के दशक में पिछड़ों को देश भर में 27 फीसदी आरक्षण मिला। इससे पहले शिक्षा मंत्री रहते हुए उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा में अंग्रेजी की अनिवार्यता को खत्म कर दिया ताकि वंचित समाज के बच्चे मैट्रिक की परीक्षा को पास कर सकें। एक बार का दिलचस्प वाकया है कि जब कर्पूरी ठाकुर मुख्यमंत्री थे, तब केंद्र और बिहार दोनों जगह जनता पार्टी की सरकार थी। तमाम नेता जनता पार्टी के नेता जयप्रकाश नारायण के जन्मदिन के मौके पर इकट्ठा हुए। मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर भी आए। तब लोगों ने देखा कि उनका कुर्ता फटा है। चंद्रशेखर अपने अंदाज में दूसरे नेताओं से पैसे इकट्ठा करने लगे ताकि कर्पूरी बाबू नया कुर्ता खरीद सके। लेकिन कर्पूरी भी आखिर जननायक कर्पूरी थे, उन्होंने वह पैसा तो स्वीकार कर लिया लेकिन उसका कुर्ता खरीदने की बजाय उसे मुख्यमंत्री राहत कोष में दान कर दिया। इससे झूठी शान गढ़ने वालों को जोरदार तमाचा लगा। हालांकि भारत में सरकार के हर कदम को राजनीति के रूप में देखने की परंपरा रही है। ऐसे में बिहार के दो बार मुख्यमंत्री रहे कर्पूरी ठाकुर को 2024 लोकसभा चुनाव के पहले भारत रत्न देने की घोषणा के मायने तलाशे जा रहे हैं। इसलिए भी क्योंकि हाल ही में बिहार ने जातीय जनगणना कर वंचित जातियों की सत्ता में भागेदारी के सवाल को बड़ा बना दिया है। समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर बिहार के नाई जाति से ताल्लुक रखते हैं। बिहार में नाई जाति अति पिछड़ी जाति में आती है। बिहार में ओबीसी 63 प्रतिशत हैं। इसमें अति पिछड़ी जातियां 36 फीसदी हैं। साफ है कि बिहार जो कि अब तक भाजपा के लिए इकलौता अजेय हिन्दीभाषी प्रदेश बना हुआ है, उसने भाजपा और संघ की नींद हराम कर रखी है। यह फैसला तब हुआ है जब पीएम मोदी 4 फरवरी को बिहार से चुनावी अभियान शुरु करने वाले हैं। और देश के तमाम अखबारों में संपादकीय पन्ने पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक लेख प्रकाशित हुआ है, जिसमें उन्होंने कर्पूरी ठाकुर को याद करते हुए उनके कसीदे पढ़े हैं। खुद को पिछड़े वर्ग का व्यक्ति बताते हुए देश के तकरीबन 52 फीसदी पिछड़ों से फिर से खुद को जोड़ने की कोशिश की है। जननायक कर्पूरी ठाकुर निश्चित तौर पर काफी पहले भारत रत्न सम्मान डिजर्व करते थे। हालांकि उन्हें अब यह सम्मान मिल चुका है, लेकिन इसे देने की टाइमिंग को देखते हुए इसके पीछे राजनीतिक लाभ लेने की मंशा को झुठलाया नहीं जा सकता

जानिये कर्पूरी ठाकुर को, जिनको 100वीं जयंती पर भारत रत्न देने का हुआ ऐलान

 बिहार के झोपड़ी के लाल, सामाजिक न्याय के महानायक, महान समाजवादी, गरीबों के रहनुमा, पूर्व मुख्यमंत्री, जननायक कर्पूरी ठाकुर जी की आज 100 वीं जयंती है। जयंती की पूर्व संध्या पर भारत सरकार की ओर से उन्हें सर्वश्रेष्ठ नागरिक सम्मान भारत रत्न देने की घोषणा की गई है। ऐसे में इस दिन की महता और बढ़ जाती है। कर्पूरी ठाकुर को जननायक कहा जाता है। 24 जनवरी, 1924 ई. में उनका जन्म बहुजन समाज के एक गरीब पिछड़े नाई परिवार में हुआ था। बहुत ही आर्थिक मुश्किलों के बीच उनकी पढ़ाई हुई और फिर पढ़ाई छोड़कर वे स्वाधीनता आंदोलन में कूद पड़े। उस समय बिहार स्वाधीनता आंदोलन के साथ अन्य कई तरह के आंदोलनों का केंद्र था। एक तरफ स्वामी सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व में किसानों का मुक्ति संघर्ष चल रहा था, तो दूसरी तरफ सदियों पूर्व खो गई सत्ता और सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए पिछड़े वर्गों का त्रिवेणी संघ निर्माण का अभियान भी चल रहा था। 1934 ई. में पटना में ही जयप्रकाश नारायण के प्रयासों से कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की गई थी और 1939 में इस सूबे में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का भी जन्म हो गया था। मान्यवर कर्पूरी जी ने कांग्रेस के स्वाधीनता आंदोलन से न जुड़कर समाजवादी समझ वाली आज़ादी की लड़ाई से अपने को जोड़ लिया। उनके राजनैतिक संघर्ष का लक्ष्य समाजवादी समाज की स्थापना था।

आजादी के बाद सोशलिस्ट लोग कांग्रेस से अलग हो गए और कर्पूरी जी धीरे -धीरे समाजवादी पार्टी और आंदोलन के प्रमुख नेता बने। 1967 की संयुक्त विधायक दल की सरकार में वह उपमुख्यमंत्री थे। शिक्षा विभाग उनके पास था। उस वक़्त स्कूलों में छात्रों को हर महीने शुल्क देना होता था। इसके कारण गरीब छात्रों को अर्थाभाव में विवश होकर पढ़ाई छोड़ देना होता था। कर्पूरीजी ने फीस ख़त्म कर दी। मैट्रिक की परीक्षा में अंग्रेजी की अनिवार्यता के कारण किसान व मजदूर परिवार के हजारों बच्चों और लड़कियों की बीच में ही पढ़ाई छूट जाती थी और मैट्रिक फेल होने का उपहास वे सारी जिंदगी झेलते रहते थे। कर्पूरीजी का मानना था अंग्रेजी के बिना भी कुछ क्षेत्रों में अच्छा किया जा सकता है। उन्होंने अंग्रेजी की अनिवार्यता ख़त्म कर दी। इसे बेईमान एवं धूर्त ब्राह्मणवादी लोगों ने इस तरह प्रचारित किया मानो उन्होंने अंग्रेजी की पढ़ाई ही बंद करवा दीं हो। अंग्रेजी की अनिवार्यता ख़त्म होने से शिक्षा का ज्यादा प्रसार हुआ और बहुजन समाज के बच्चे- बच्चियां भारी संख्या में मैट्रिक की परीक्षा पास करने लगे। मान्यवर कर्पूरी जी 1971 ई में कुछ समय के लिए मुख्यमंत्री बने तो सीमांत किसानों की जमीन जोतों से मालगुजारी खत्म कर दीं। 1977 में भी जब दूसरी बार वे मुख्यमंत्री हुए तो 1978 ई में पिछड़े वर्गों को सरकारी सेवाओं में आरक्षण देने संंबंधी मुंगेरीलाल कमीशन की सिफारिशें लागू कर दीं। पूरे उत्तर भारत में इसी के साथ सामाजिक न्याय की राजनीति की शुरुआत हुई। इसके कारण उन्हें मुख्यमंत्री पद तक छोड़ना पड़ा, किन्तु उन्होंने मंडल कमीशन के गठन और शिफारिशों की पृष्ठभूमि तैयार कर दीं।

 

वे कभी भी सामाजिक न्याय की अपनी लड़ाई से पीछे नहीं हटे और न उन्होंने इसके लिए कोई पश्चाताप किया। उन्होंने कभी भी अपने या अपने परिवार या किसी जाति विशेष के लाभ के लिए काम नहीं किया। अपने कर्तव्य पर अडिग रह कर गरीबों, मजदूर-किसानों, महिलाओं और हाशिये के लोगों को मुख्यधारा में लाना ही उनकी राजनीति का मक़सद था। उनके आरक्षण के फैसले के खिलाफ सवर्ण जातियों के छात्र-युवाओं ने पूरे बिहार में आतंक फैलाना शुरू कर दिया और कालेज -विश्वविद्यालयों को जबरन बंद करने का ऐलान कर दिया। सवर्णों ने एक अपमानजनक नारा दिया – “पिछड़ी जाति कहां से आई,कर्पूरिया की माय बियाई।” “कर्पूरी कर पूरा, गद्दी छोड़कर धर उस्तुरा”।

सवर्णों द्वारा जगह जगह उन्हें अपमानित किया गया, किन्तु गुदड़ी के लाल कर्पूरी जी ने कभी भी प्रतिहिंसा में कोई असंसदीय जबाव नहीं दिया। लोकतांत्रिक व्यवस्था में उनकी पूर्ण आस्था थी, इसलिए वे पूरी जिंदगी वंचित एवं शोषित समाज के हितों के लिए संघर्ष करते रहे। उनका आकस्मिक निधन 17 फरवरी 1988 ई. में हुआ और बिहार ने अपने अद्वितीय लाल को खो दिया। लाखों लोगों ने उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित की। बिहार में भूमि सुधार आयोग और कॉमन स्कूल सिस्टम के लिए कर्पूरी जी द्वारा गठित आयोग की सिफारिशें ठन्डे बस्ते में धरी-पड़ी हैं। बिहार में अबतक पिछड़े एवं दलित समाज से कई मुख्यमंत्री बने हैं और बने हुए हैं पर किसी ने भी उसे लागू नहीं किया। आजतक किसी भी सरकार द्वारा न उसे लागू करने का प्रयास कर रही है या न उसे लागू करने के लिए कोई पिछड़े वर्ग की पार्टी आंदोलन कर रही है।

50 बहुजन नायक

तो आइए,हम इन विषम परिस्थितियों में उनके सामाजिक न्याय के आन्दोलन को आगे बढ़ाए, उनके संकल्प को पूरा करें और समतामूलक लोकतांत्रिक-समाजवादी समाज बनाने के लिए संघर्ष करें। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। जगदेव प्रसाद के इस पैगाम को हमें भूलना नहीं है – “सौ में नब्बे शोषित है, शोषितों ने ललकारा है धन धरती और राजपाट में नब्बे भाग हमारा है” जय कर्पूरी! जय भीम!! जय संविधान!!!


लेखक प्रो. विलक्षण बौद्ध, सामाजिक न्याय आंदोलन बिहार, बिहार फुले अम्बेडकर युवा मंच एवं बहुजन स्टूडेंट्स यूनियन, बिहार से जुड़े हैं।

राम मंदिर और दलित समाज

22 जनवरी को अयोध्या में हुए राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा की चर्चा दुनिया भर में है। लेकिन सोशल मीडिया पर जिस तरह अंबेडकरी समाज के एक समूह द्वारा विरोध स्वरूप #22जनवरी_22प्रतिज्ञा की बात कही गई, उसमें सवाल उठता है कि क्या यह टकराव सही है। इस बारे में दलित दस्तक के संपादक अशोक दास ने सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और अंबेडकरवादी नितिन मेश्राम से चर्चा की। लिंक पर जाकर देखिए पूरा वीडियो।

ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट में मोदी सरकार पर गंभीर आरोप

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मानवाधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच की ताजा वर्ल्ड रिपोर्ट 2024 में भारत के लिए बुरी खबर है। इस रिपोर्ट में मानवाधिकार के मोर्चे पर भारत की नीतियों को लेकर कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इस रिपोर्ट में भारत सरकार पर धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभाव का आरोप लगाया गया है। 740 पन्नों की अपनी ताज़ा रिपोर्ट में संगठन ने मणिपुर में हुए नस्लीय टकराव से लेकर दिल्ली के जंतर मंतर में महिला पहलवानों के विरोध प्रदर्शन और जम्मू-कश्मीर के हालात का ज़िक्र किया है। ह्यूमन राइट्स वॉच क़रीब 100 देशों में मानवाधिकारों से जुड़ी नीतियों और कार्रवाई पर नज़र रखता है। इसी के आधार पर वो अपनी सालाना विश्व रिपोर्ट तैयार करता है। ताजा रिपोर्ट 11 जनवरी 2024 को जारी की गई है, जिसमें ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि पिछले साल भारत में मानवाधिकारों के दमन और उत्पीड़न की कई घटनाएं हुई हैं। मोदी सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए संगठन ने कहा है कि- बीते साल सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, विपक्षी नेताओं और सरकार के आलोचकों को गिरफ़्तार किया। इन लोगों पर आतंकवाद समेत राजनीति से प्रेरित आपराधिक आरोप लगाए गए।

 

रिपोर्ट के अनुसार,- “छापे मारकर, कथित वित्तीय अनियमितता के आरोप और ग़ैर-सरकारी संगठनों को मिल रही आर्थिक मदद के लिए बने फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन रेगुलेशन क़ानून का इस्तेमाल कर पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, आलोचकों को परेशान किया गया।” संगठन की एशिया उप निदेशक मीनाक्षी गांगुली ने कहा, “भाजपा सरकार की भेदभावपूर्ण और विभाजनकारी नीतियों के कारण अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हिंसा बढ़ी है। इससे डर का माहौल बना है, सरकार की आलोचना करने वालों में डर पैदा हुआ है।” संगठन ने अपने बयान में भारत में बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार को हिंदू राष्ट्रवादी सरकार कहा है। बता दें कि वर्तमान मोदी सरकार पर लगातार मानवाधिकारों के हनन का आरोप लगता रहा है। हालांकि मोदी सरकार ऐसी रिपोर्टों को खारिज करती रही है, लेकिन आंखें मूंद लेने से आरोप गलत नहीं हो जाते। ऐसे रिपोर्ट विश्व गुरु का दावा करने वाले भारत की छवि को दुनिया में कमतर तो करते ही हैं।

चमार कहने वाले संत राम भद्राचार्य को दलित प्रोफेसर का करारा जवाब

हाल ही में जगद्गुरु राम भद्राचार्य ने चमार जाति विशेष के खिलाफ विवादास्पद बयान दिया था। उनके मुताबिक राम को नहीं मानने वाला व्यक्ति चमार है। उनके इस बयान पर दलित समाज के लोगों में जमकर विरोध किया था, जिसके बाद राम भद्राचार्य को खेद जताना पड़ा। इस मुद्दे पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. विक्रम ने दलित दस्तक के संपादक अशोक दास के साथ चर्चा करते हुे राम भद्राचार्य को जमकर घेरा और कई सवाल उठाए।  देखिए वीडियो-

तिलका मांझी शहादत दिवसः 29 की उम्र में हूल विद्रोह करने वाला योद्धा

13 जनवरी 2024 को भारत और भागलपुर-संथाल परगना प्रक्षेत्र के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी, महान क्रान्तिकारी किसान नेता एवं महान मूलनिवासी बहुजन नायक, अमर शहीद तिलकामांझी की 239वां शहादत दिवस है। इस पुनीत अवसर पर हम अपने 35 वर्षीय अमर युवा शहीद के प्रति भारत के सभी नागरिकों एवं विशेष कर मूलनिवासी बहुजन समाज के लोगों की ओर से हार्दिक श्रद्धांजलि और शत-शत नमन अर्पित करते हैं।

 यह सर्वविदित है कि उनका जन्म 11 फरवरी 1750 ई में मूलनिवासी संथाल जनजाति में राजमहल के एक गांव में हुआ था। उनके पिता सुन्दर मांझी एवं माता सोमी थे। उन्होंने मात्र 29 वर्ष की आयु में 1779 में अंग्रेज ईस्ट इंडिया कम्पनी की 10 वर्षीय कृषि ठेकेदारी की आर्थिक लूट की व्यवस्था लागू करने, फूट डालो- राज करो की नीतियों, आदिवासियों एवं किसानों का किए जा रहे सूदखोरी-महाजनी शोषण और पहाड़िया एवं संथाल जनजातियों के विद्रोहों- आन्दोलनों को कुचलने की दमनकारी नीतियों और कार्यों के खिलाफ मूलनिवासी किसानों को संगठित कर हुल विद्रोह का बिगुल बजा दिया था। उनके द्वारा शाल पेड़ के छाल में गांठ बांध कर सभी संथाल एवं पहाड़िया के गांवों में भेजा गया था और विद्रोह करने का निमंत्रण दिया गया था। उनके नेतृत्व में आदिवासियों और किसानों में एकता बनीं और संघर्षों का दौर शुरू हुआ था। 1779 ई. से 1784 ई. तक रुक-रुक कर जगह -जगह राजमहल से लेकर खड़गपुर- मुंगेर तक अंग्रेजों की सेना के साथ गुरिल्ला युद्ध का कुशल नेतृत्व तिलकामांझी ने किया था।

 1779 ई में ही भागलपुर के प्रथम कलक्टर क्लीबलैंड नियुक्त हुए थे। उनके द्वारा जनजातियों में फूट डालने की नीति के तहत पैसे, अनाज और कपड़े बांटने के कार्य किए जा रहे थे। पहाड़िया जनजाति के लोगों की 1300 सैनिकों की भर्ती 1781ई में की गई थी। उस सैनिक बल का सेनापति जबरा या जोराह (Jowrah)नामक कुख्यात पहाड़िया लूटेरे को बनाया गया था, जो जीवन भर अंग्रेज़ो के वफादार सेनापति बना रहा। ये सैनिक बल तिलकामांझी के जनजाति एवं किसान विद्रोह को कुचलने और दमन करने के लिए लगातार लड़ाई कर रहे थे। तीतापानी के समीप 1782और 1783 में हुए दो युद्धों में अंग्रेजी सेना की बुरी तरह पराजित हुईं।

 उस पराजय के बाद कलक्टर आगस्ट्स क्लीवलैंड के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना के साथ 1783 के 30 नवम्बर को पुनः उसी स्थान पर तिलकामांझी के साथ भीषण युद्ध हुआ। इस युद्ध में क्लीवलैंड विषाक्त तीर और गुलेल के पत्थर से बुरी तरह घायल हो गए और उसे भागलपुर लाया गया। उन्होंने अपना प्रभार अपने सहायक कलेक्टर चार्ल्स काॅकरेल को सौंप दिया और वे अपनी चिकित्सा के लिए इंग्लैंड वापस लौट गए। किन्तु रास्ते में ही समुद्री जहाज पर 13 जनवरी, 1784 ई. को उनकी मौत हो गई।

उसके बाद सी कैपमैन भागलपुर के कलक्टर नियुक्त हुए, जिन्होंने तिलकामांझी की सेना और जनजाति समाज के विरुद्ध भागलपुर राजमहल के पूरे क्षेत्र में पुलिस आतंक का राज बना दिया। दर्जनों गांवों में आग लगा दी गई, सैकड़ों निर्दोष आदिवासियों को मौत के घाट उतार दिए गए और पागलों की तरह अंग्रेजी सेना तिलकामांझी की तलाश करने लगीं। तिलकामांझी राजमहल क्षेत्र से निकल कर भागलपुर क्षेत्र में आ गये और अब छापा मारकर युद्ध करने लगे। सुल्तानगंज के समीप के जंगल में 13 जनवरी, 1785 ई. में हुए युद्ध में तिलका मांझी घायल हो गए और उन्हें पकड़ कर भागलपुर लाया गया। यहां कानून और न्याय के तथाकथित सभ्य अंग्रेजी अफसरों ने घोड़े के पैरों में लम्बी रस्सी से बांध कर सड़कों पर घसीटते हुए अधमरा कर तिलकामांझी चौंक पर स्थित बरगद पेड़ पर टांग दिया और मौत की सज़ा दी।

अंग्रेजों ने उन्हें आतंकवादी और राजद्रोही माना, किन्तु भागलपुर -राजमहल क्षेत्र सहित बिहार के लोगों ने उन्हें अपना महान नेता, महान् क्रान्तिकारी योद्धा और शहीद मानकर श्रद्धांजलि अर्पित कीं। उनके सम्मान में शहादत स्थान का नाम तिलकामांझी चौंक रखा गया, उनके नाम पर तिलकामांझी हाट लगाया गया और जहां से वे पकड़े गए थे उस स्थान को तिलकपुर गांव बसा।

उसके लगभग 195 वर्षों के बाद तिलका मांझी चौक पर उनकी मूर्ति 1980 ई में लगाई गई। फिर उसके बाद भागलपुर विश्वविद्यालय तिलकामांझी विश्वविद्यालय बना। उसके बाद 14 अप्रैल, 2002 ई. में तिलका मांझी विश्वविद्यालय के प्रशासनिक भवन के सामने उनकी मूर्ति लगाई गई।

किन्तु यह काफी दुखद है कि बिहार और भारत के कुछ इतिहासकारों ने उन्हें ऐतिहासिक पुरुष नहीं मानते हुए इतिहास के पन्नों में ही जगह देने से इंकार कर दिया। भागलपुर में भी एक तीसमार खां इतिहासकार इस पर विवाद पैदा करते रहते हैं। संभवतः इतिहास दृष्टि के अभाव में वे ऐसा करते हैं। तो आइए ,हम अपने प्रथम स्वतंत्रता सेनानी और महानायक अमर शहीद तिलकामांझी की शहादत दिवस के अवसर पर उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि और शत शत नमन अर्पित करें। जय तिलका मांझी। जय भीम। जय भारत।


लेखक प्रो. विलक्षण बौद्ध बहुजन स्टूडेंट्स यूनियन एवं  बिहार फुले अम्बेडकर युवा मंच और सामाजिक न्याय आंदोलन, बिहार के संरक्षक हैं।

मेरठ में 10 जनवरी को दलितों की महापंचायत, जानिये पूरा मामला

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25 अक्टूबर को मेरठ में दलित समाज के इंद्र शेखर की हत्या का मामला सुर्खियों में रहा था। इंद्र शेखर को जिस तरह पहले हाथ-पैर में कील ठोककर, फिर गोली मारकर पेड़ पर लटका दिया गया था, उससे सनसनी फैल गई थी। खासतौर पर आरोपी विजयपाल गुर्जर ने खुद पुलिस को फोन कर हत्या की सूचना दी थी, जिससे समझा जा सकता है कि खास समाज के लोगों मे जातीय दंभ और दलितों के प्रति नफरत कितनी ज्यादा है।

इस हत्याकांड में हुई एफआईआर में विजयपाल के साथ उसके बेटे हर्ष और भाई विजयपाल का भी नाम है। साथ ही हत्या के चश्मदीद इंद्र शेखर के बेटों ने उस दोनों के भी शामिल होने की बात कही थी। बावजूद इसके पुलिस उन्हें बचा रही है और अब तक इन दोनों की गिरफ्तारी नहीं हुई है। इसके खिलाफ मेरठ में 10 जनवरी को दलितों ने महा पंचायत बुलाई है, जिसमें हजारों लोगों के शामिल होने की खबर है। यह महा पंचायत कमिश्नरी चौक मेरठ पर होगा। इद्र शेखर मेरठ के नंगली साधारणपुर गांव का निवासी है। उनकी हत्या 25 अक्टूबर को हुई थी, जबकि 26 अक्टूबर को एफआईआर लिखी गई।
 

जेल में जातिवाद पर आई चौंकाने वाली रिपोर्ट

जेल में जातिवाद को लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। आरोप है कि जेल में कुछ खास जातियों से झाड़ू लगाने और सफाई जैसे छोटे काम करवाए जाते हैं। अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। मामले का संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सहित 11 राज्यों को नोटिस भेज कर जवाब मांगा है। जिन राज्यों को नोटिस भेजा गया है, उसमें उत्तर प्रदेश, पंजाब, महाराष्ट्र, ओडिशा, झारखंड, केरल, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना शामिल हैं।

महाराष्ट्र के कल्याण में रहने वाली सुकन्या शांता ने इस बारे में एक याचिका दायर की है, जिसमें उन्होंने कैदियों से जातिवाद करने वाली जेल नियमावलियों को रद्द करने की मांग की है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि बंदियों को काम के बंटवारे और उन्हें रखने की जगह में जातिवाद होता है। याचिका दायर करने वाली सुकन्या शांता के वकील एस मुरलीधर ने सुप्रीम कोर्ट में बताया कि कई राज्यों की जेल नियमावलियों में काम का बंटवारा भेदभाव पूर्ण ढंग से होता है। यहां जाति से तय होता है कि किस बंदी को कहां रखा जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट में यह मामला चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच के सामने आया है। हालांकि कोर्ट के सामने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने ऐसी बातों से इंकार किया। लेकिन याचिका कर्ता ने बंगाल, मध्यप्रदेश और केरल का उदाहरण देते हुए अपनी बात साबित की।

याचिकाकर्ता का कहना है कि बंगाल की नियमावली में जाति के अनुसार काम का बंटवारा किया जाता है। यहां खाना बनाने का काम प्रभावशाली जातियां करती है, जबकि झाड़ू लगाने का काम कुछ खास जातियों को दिया जाता है। जाहिर है याचिकाकर्ता का इशारा कमजोर जातियों से है।

बंगाल के नियम 793 का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता का कहना था कि नाई ए श्रेणी के होने चाहिए और झाड़ू लगाने का काम मेहतर, हरि, चंडाल जैसी जातियों को देना चाहिए। वहीं मध्य प्रदेश में नियम 36 कहता है कि मेहतर की छोटे पात्र को बड़े ड्रम में खाली करे और उसे साफ करे।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को सुनने के बाद 11 राज्यों सहित केंद्र से चार हफ्ते में जवाब मांगा है। हालांकि इस तरह के आरोप कोई नए नहीं है। और अक्सर जेलों से जातिवाद की खबरें आती रहती है। हाल ही में उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जेल में दलित समाज के दो विचाराधीन कैदियों को मार कर लटका दिया गया था। इस संदेहास्पद मामले में जांच होने के बाद जांच अधिकारी ने उन्हें जबरन फांसी पर लटकाए जाने की रिपोर्ट दी, बावजूद इसके इस मामले में कोई ठोस कार्रवाई की खबर नहीं है। इसी बीच जेलों में जातिवाद की खबर ने एक बार फिर से जेल के अंदर जातिवाद की परत खोल कर रख दी है। देखना होगा सुप्रीम कोर्ट इस मामले को कितनी गंभीरता से लेता है।

चीफ जस्टिस ने किया एडवोकेट अनिरुद्ध कुमार को सम्मानित  

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भारत का संविधान काव्य लिखने वाले एडवोकेट अनिरुद्ध कुमार को सम्मानित करते चीफ जस्टिस डॉ. डी. वाई चंद्रचूड़

तीन वर्षों के निरंतर मेहनत से भारत के संविधान को काव्य रूप में लिखने वाले एडवोकेट अनिरुद्ध कुमार को बीते दिनों संविधान दिवस (26 नवंबर) के मौके पर सम्मानित किया गया। भारत सरकार के कानून मंत्री अर्जुन मेघवाल की उपस्थिति में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस डॉ. जस्टिस डी.वाई चंद्रचूड़ ने सम्मानित कर अनिरुद्ध कुमार का हौंसला बढ़ाया।

इस मौके पर एडवोकेट अनिरुद्ध ने सुप्रीम कोर्ट के बार एसोसिएशन के प्रेसिडेंट डॉ. आदिश सी अग्रवाल और सेक्रेट्री एडवोकेट रोहित पांडे का आभार जताया। साथ ही अपनी दादी परिणिब्बुत हुब्बा देवी और बड़ी बहन परिणिब्बुत चंद्रकला को याद किया। उन्होंने कहा कि करता हूं मैं अपने गुरुजनों, माता-पिता, परिवार के सभी सदस्यों, अपने टीम के सभी सदस्यों एवं अपने सभी शुभचिंतक परिजनों के प्रेम, आशीर्वाद और सहयोग के प्रति आभारी हूं जिनके कारण आज मुझे यह सम्मान प्राप्त हुआ। बता दें कि संविधान को काव्य के रूप में लिख कर एडवोकेट अनिरुद्ध की कोशिश इसे सरल भाषा में भारत के हर एक नागरिक तक पहुंचाने की है।

इस्तीफा देकर राजनीति में उतरे ‘जज साहब’, कर दिया बड़ा ऐलान

 लगता है राजनीति समाज को बदलने का आखिरी रास्ता बनती जा रही है। शायद यही वजह है कि समाज बदलने की चाहत लिये अलग-अलग क्षेत्रों के लोग अपनी अच्छी खासी नौकरी छोड़कर राजनीति में उतर रहे हैं। नई जानकारी उत्तर प्रदेश से आ रही है, जहां बहुजन समाज से ताल्लुक रखने वाले मनोज कुमार ने जज की प्रतिष्ठित नौकरी छोड़ कर राजनीति में आने का अपना इरादा जाहिर कर दिया है।

नोएडा सहित तमाम सिविल कोर्ट और एक वक्त में सीबीई के जज रहे मनोज कुमार फिलहाल बिजनौर में पूर्व अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश थे। यहीं से इस्तीफा देकर वह अब राजनीतिक पारी शुरू करने जा रहे हैं। मनोज कुमार ने 17 दिसंबर को एक बड़े कार्यक्रम का ऐलान किया है, जहां बहुजन समाज के तमाम बुद्धिजीवि और दिग्गज मनोज कुमार को समर्थन देने बिजनौर पहुंच रहे हैं।

इसमें पूर्व न्यायाधीश के.जी. बाला कृष्णन सहित पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक, किसान नेता राकेश टिकैत, राजरत्न अंबेडकर, पूर्व सांसद राजकुमार सैनी और दिल्ली सरकार के पूर्व मंत्री और एक्टिविस्ट राजेन्द्र पाल गौतम विशेष तौर पर मौजूद रहेंगे। इस कार्यक्रम को बहुजन मैत्री एवं संविधान जागरूकता महासम्मेलन का नाम दिया गया है। कार्यक्रम बिजनौर जिले के धामपुर के के.एम. इंटर कॉलेज में होगा। कार्यक्रम को 50 से ज्यादा बहुजन समाज के संगठनों ने भी अपना समर्थन दिया है।

दरअसल एक जज का राजनीति में आना एक बड़ा संकेत है। बहुजन समाज से होने के कारण मनोज कुमार के राजनीति में आने को लेकर समाज के लोग काफी उत्साहित हैं। फिलहाल जज साहब ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं, लेकिन चर्चा है कि वह आगामी लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी से चुनाव लड़ सकते हैं। 17 दिसंबर को जब पूर्व जज मनोज कुमार राजनीति की अपनी पारी का ऐलान करेंगे, देखना होगा कि वह क्या ऐलान करते हैं। नजर इस पर भी रहेगी कि आखिर न्यायपालिका जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में जज की नौकरी छोड़कर आखिर वह राजनीति में क्यो आए?

सारनाथ से लुम्बिनी की धम्म यात्रा पर निकले भंते चंदिमा सहित सैकड़ों बौद्ध भिक्खु, हजारों गांवों में करेंगे धम्म प्रचार

तथागत बुद्ध ने कहा था, चरथ भिक्खवे चारिकं बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय लोकानुकम्पाय। यानी, हे भिक्खुओं। बहुजनों के हित के लिए, बहुजनों के सुख के लिए तथा संसार पर अनुकम्पा करने के लिए चारिका यानी विचरण करो।

तथागत के इसी संदेश को चरितार्थ करते हुए  अंतराष्ट्रीय शोध संस्थान के पूर्व अध्यक्ष एवं सारनाथ स्थित धम्मा लर्निंग सेंटर के संस्थापक भंते चंदिमा थेरो ने एक बार फिर से धम्म यात्रा शुरू कर दी है।

सारनाथ से लुम्बिनी की यह यात्रा 29 नवंबर को सारनाथ स्थित धम्मा लर्निंग सेंटर से शुरू हुई। 19 दिनों की यह धम्म यात्रा 17 दिसंबर को तथागत बुद्ध की जन्मभूमि लुम्बिनी पहुंच कर समाप्त होगी। इस बीच यह यात्रा 30 नवंबर को वाराणसी के धौरहरा से सिधौना तक चलेगी। इसके बाद यह यात्रा एक और दो दिसंबर को गाजीपुर, 3 दिसंबर से 6 दिसंबर तक मऊ के अलग-अलग हिस्सों, 7-8 और 9 दिसंबर को गोरखपुर के विभिन्न क्षेत्रों से गुजरेगी।

इसके बाद 10, 11, 12 और 13 दिसंबर को संत कबीर नगर के तमाम गांवों से गुजरते हुए 14 दिसंबर को यह यात्रा सिद्धार्थ नगर पहुंचेगी। 15 दिसंबर को भी यात्रा सिद्धार्थ नगर के अलग-अगल हिस्सों से गुजरते 16 दिसंबर को सिद्धार्थ नगर के कपिलवस्तु पहुंचेगी। इसके बाद 17 दिसंबर को यात्रा तथागत बुद्ध के जन्मस्थान नेपाल के लुम्बिनी पहुंचेगी, जहां इसका समापन होगा।

धम्म चारिका का नेतृत्व कर रहे भंते चंदिमा थेरो ने बताया कि यह यात्रा 350 किलोमीटर लंबी होगी। इस यात्रा में 100 के करीब भंते चल रहे हैं। यह यात्रा हजारों गांवों से गुजरेगी। 19 दिनों की इस यात्रा के बीच 40 स्थानों पर बड़े-बड़े धम्म सभा होगी। बता दें कि साल 2022 में भी भंते चंदिमा के नेतृत्व में सारनाथ से श्रावस्ती तक धम्म चारिका हुई थी।

 इससे पहले 26 नवंबर को संविधान दिवस के मौके पर धम्मा लर्निंग सेंटर सारनाथ में महाराजा अशोक एवं बोधिसत्व बाबा साहब डॉ.भीमराव अंबेडकर के प्रतिमा का लोकार्पण किया गया। धम्म विजयी सम्राट अशोक के हाथ में जहां धम्म का चारों दिशाओं में सिंहनाद के प्रतीक चतुर्दिक मुख किये सिंह आकृतियों के साथ धम्म चक्क युक्त दंड है वहीं बाबा साहब के हाथ में दुनिया का सर्वोत्तम संविधान प्रदर्शित है।

शिक्षक भर्ती घोटाला में सामने आई नई जानकारी, हाई कोर्ट में योगी सरकार को फटकार

दलित और पिछड़े युवाओं के साथ उत्तर प्रदेश में किस तरह अन्याय हो रहा है, यह बुधवार को राजधानी लखनऊ की सड़कों पर साफ दिखा। जब योगी आदित्यनाथ की पुलिस ने दलितों और पिछड़े वर्ग के युवाओं पर जमकर लाठियां भाजी। दरअसल शिक्षक भर्ती घोटाला मामले में बुधवार 29 नवंबर को एक बार फिर से सरकार के खिलाफ हमला बोलते हुए हजारों प्रदर्शनकारियों ने सड़क पर उतर कर प्रदर्शन किया। पिछले 530 दिनों से ज्यादा समय से यह अभ्यर्थी लखनऊ के ईको गार्डेन में अपनी नियुक्ति की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं।

इसी मुद्दे पर इंसाफ मांग रहे हजारों युवाओं ने बुधवार को सुबह चारबाग से विधानसभा तक प्रदर्शन किया। पिछड़े दलितों को न्याय दो के नारे लगाते अभ्यर्थी लगातार विधानसभा की तरफ बढ़ रहे थे। लेकिन इंसाफ देने की बजाय उत्तर प्रदेश के योगी आदित्यनाथ की पुलिस ने हुसैनगंज चौराहे के पास बैरिकेटिंग करके अभ्यर्थियों को रोक दिया। इस दौरान पुलिस की बर्बरता में कई अभ्यर्थी घायल हो गए।

अभ्यर्थियों का कहना था कि 5 जनवरी 2022 को ही मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद आरक्षित वर्ग के 6800 अभ्यर्थियों की नियुक्ति के लिए सूची जारी कर दी गयी लेकिन नियुक्ति आजतक नहीं मिल पायी। हमलोग सिर्फ एक माँग कर रहे हैं कि हमारी मुलाकात माननीय मुख्यमंत्री जी से कराई जाए ताकि हमें नियुक्ति मिल सके। माँगें न मानी गयी तो कल सुबह दोबारा विधानसभा का घेराव करने को मजबूर होंगे।

दूसरी ओर हाल ही में इस मामले में उत्तर प्रदेश के हाईकोर्ट में बहस हुई। इस दौरान ओबीसी समाज के वकील सुदीप सेठ ने मामले की सुनवाई करने वाले जस्टिस भाटिया से कहा कि इस भर्ती में ओबीसी वर्ग को 27 प्रतिशत नहीं, बल्कि 3.80 प्रतिशत ही आरक्षण दिया गया है। जबकि अनुसूचित जाति के 21 प्रतिशत की जगह 16.2 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है। एडवोकेट सुदीप सेठ ने दावा किया कि शिक्षक भर्ती में 6800 सीटों का नहीं बल्कि 19 हजार सीटों का घोटाला हुआ है। इस पर हाई कोर्ट जज ने सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि पीड़ितों को नौकरी दीजिए वरना हम फैसला करेंगे।

सर्वोच्च न्यायालय में संविधान दिवस पर लगी डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा के मायने

26 नवंबर को संविधान दिवस के मौके पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय में बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा का अनावरण किया गया। दिल्ली स्थित सुप्रीम कोर्ट के मुख्य गुंबद के ठीक सामने संविधान निर्माता डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा का अनावरण राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने किया। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डॉ. डी. वाई चंद्रचूड़ भी मौजूद थे। जस्टिस चंद्रचूड़ ने ही इसकी पहल की थी, जिसके बाद एक समिति बनी, जिसने सर्वोच्च न्यायालय में बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा लगाने को लेकर काफी काम किया। खास बात यह है कि डॉ. आंबेडकर की यह प्रतिमा एक वकील के रूप में लगाई गई है। बाबासाहेब की यह पहली और इकलौती प्रतिमा है जो वकील के रूप में लगाई गई है। देखें वीडियो- 

इस दौरान सुप्रीम कोर्ट में हुए कार्यक्रम में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संभा को संबोधित करते हुए सुप्रीम कोर्ट में जजों की भर्ती के लिए आईएएस और आईपीएस की सिविल सेवा परीक्षा की तरह ही परीक्षा आयोजित करने का सुझाव चीफ जस्टिस डी. वाई चंद्रचूड़ को दिया।
मुख्य न्यायधीश जस्टिस डी. वाई चंद्रचूड ने बीते एक साल में सुप्रीम कोर्ट में हुए काम काज के बारे में बताया। इस दौरान एक पोर्टल को भी लांच किया गया। अब शीर्ष न्यायलयों में जजों द्वारा दिये गए फैसले को तमाम अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद किया जाएगा।
कार्यक्रम में अतिथि के तौर पर कानून मंत्री अर्जुन मेघवाल भी पहुंचे थे। उन्होंने बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर द्वारा संविधान निर्माण में दिये गए योगदान की चर्चा की।
इस दौरान हालांकि डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा को आम लोगों के लिए नहीं खोला गया था, लेकिन इसके बावजूद तमाम लोग सुप्रीम कोर्ट के प्रांगण में इस प्रतिमा को देखने पहुंचे। लेकिन उन्हें दूर से ही प्रतिमा को देख कर संतोष करना पड़ा। दलित दस्तक ने जब उनलोगों से सुप्रीम कोर्ट में बाबासाहेब की प्रतिमा के महत्व को लेकर बात की तो तमाम लोगों ने इसे जरूरी कदम बताया।
सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट डॉ. के. एस चौहान से जब सुप्रीम कोर्ट में बाबासाहेब की प्रतिमा, यूपीएससी की तर्ज पर जजों की नियुक्ति के लिए कदम उठाने के राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के बयान और मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डी.वाई चंद्रचूड़ के काम को लेकर बात की गई तो उन्होंने इसके बारे में विस्तार से बताया। यह पूछने पर की क्या संविधान पर खतरा है? सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट ने इससे साफ इंकार किया।
हालांकि दूसरी ओर अब इसी बीच राजस्थान हाई कोर्ट परिसर में स्थापित मनु की मूर्ति के हटाने की मांग भी जोर पकड़ने लगी है। बहुजन समाज के तमाम लोगों का कहना है कि एक ओर तो सुप्रीम कोर्ट में बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा लगाई जाती है लेकिन वहीं दूसरी ओर राजस्थान हाई कोर्ट में मनु की प्रतिमा लगी है। इसको जल्द से जल्द हटा देना चाहिए।

गुजरात में दलित युवक से हैवानियत, मुंह में चप्पल डाला, पट्टे से पीटा

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Vibhuti Patel and dalit Youth Nileshमोरबी, गुजरात। सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही एक तस्वीर ने दलितों के गुस्से को बढ़ा दिया है। इस तस्वीर में एक युवक जो दलित समाज का है, उसकी पीठ पर मौजूद हैवानियत के निशान उस पर ज्यादती की कहानी कह रही है। मामला गुजरात के मोरबी जिले का है। यहां की एक इंटरप्रेन्योर विभूति पटेल उर्फ रानी बा पर दलित युवक ने मारपीट का आरोप लगाया है। युवक का कहना है कि वह रानीबा इंडस्ट्रीज में बकाया अपना पैसा लेने गया था, इस दौरान उसको बेरहमी से पीटा गया। युवक ने यह भी आरोप लगाया कि उसके मुंह में जूता डाल दिया गया और 12 लोगों ने उसे बेल्ट के पट्टे से पीटा। पीड़ित युवक का नाम नीलेश किशोरभाई दलसानिया है। युवक के बयान के बाद यह घटना सामने आई जिसके बाद आरोपी रानी बा फरार है। इससे साफ पता चलता है कि युवक का आरोप सही है। घटना सामने आने के बाद स्थानीय मोरबी पुलिस ने युवक की शिकायत पर विभूति पटेल समेत छह लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है। मामला ए डिवीजन थान में दर्ज किया गया है। पीड़ित युवक 2 अक्टूबर तक रानीबा इंडस्ट्रीज के निर्यात विभाग में काम कर रहा था।

हीरालाल सामरिया बनें मुख्य सूचना आयुक्त, दलित समाज से है संबंध

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मुख्य सूचना आयुक्त हीरालाल सांवरियादलित समाज से ताल्लुक रखने वाले 1985 बैच के IAS अधिकारी हीरालाल सामरिया भारत के नए सूचना आयुक्त बनाए गए हैं। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सोमवार 6 नवंबर को हीरालाल सामरिया को केंद्रीय सूचना आयोग के प्रमुख के रूप में शपथ दिलाई। पूर्व मुख्य आयुक्त वाई.के. सिन्हा का कार्यकाल तीन अक्टूबर को खत्म होने के बाद से यह पद खाली था। सामरिया राजस्थान के भरतपुर के रहने वाले हैं। शपथ ग्रहण के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राज्यसभा के सभापति भी मौजूद रहें।

   

फिर गरमाया जाति जनगणना का मुद्दा, अमित शाह पर भड़के लालू के लाल तेजस्वी

 केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने बिहार में हुए जाति जनगणना में मुस्लिम और यादवों की संख्या जानबूझ कर ज्यादा बताने का आरोप लगाया है। वहीं दूसरी ओर अमित शाह ने अति पिछड़ों की संख्या को कम कर के गिनने का आरोप लगाया। रविवार 5 नवंबर को बिहार के मुजफ्फरपुर पहुंचे शाह ने कहा कि ऐसा लालू यादव के दबाव में किया गया है। साथ ही उन्होंने यह भी याद दिलाया कि बिहार की जाति जनगणना का श्रेय भाजपा को भी जाता है क्योंकि इसका निर्णय तब हुआ था जब सरकार में नीतीश कुमार के साथ भाजपा थी। वहीं दूसरी ओर अमित शाह के इस आरोप पर बिहार के उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने पलटवार किया है। तेजस्वी यादव ने कहा कि अमित शाह झूठ व भ्रम फैला रहे हैं। तेजस्वी ने पांच बिन्दुओं को सामने रखकर अमित शाह को करारा जवाब दिया है। तेजस्वी ने गृहमंत्री अमित शाह को चुनौती देते हुए कहा-

1. अगर बिहार के जातीय सर्वे के आँकड़े गलत है तो केंद्र सरकार पूरे देश और सभी राज्यों में जातीय गणना करा अपने आँकड़े जारी क्यों नहीं करती?

2. BJP शासित राज्यों में BJP जातिगत गणना क्यों नहीं कराती?

3. केंद्र सरकार में कितने 𝐎𝐁𝐂/𝐒𝐂/𝐒𝐓 कैबिनेट मंत्री है और कितने गैर 𝐎𝐁𝐂/𝐒𝐂/𝐒𝐓? इसकी सूची जारी करें। खानापूर्ति के लिए इक्का-दुक्का मंत्री है भी तो उन्हें गैर-महत्त्वपूर्ण विभाग क्यों दिया हुआ है?

4. BJP के कितने मुख्यमंत्री 𝐎𝐁𝐂/𝐒𝐂/𝐒𝐓 है? पिछड़ा और गैर-पिछड़ा मुख्यमंत्री का तुलनात्मक प्रतिशत बताएँ?

5. BJP के बिहार से केंद्र में कितने पिछड़ा और अतिपिछड़ा 𝐂𝐀𝐁𝐈𝐍𝐄𝐓 मंत्री है? 𝐙𝐄𝐑𝐎 है 𝟎?

जवाब देंगे, तो आपके साथ-साथ हिंदुओं की 𝟖𝟓% पिछड़ा और दलित आबादी की भी आँखें खुल जायेंगी।

भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डी.वाई चंद्रचूड़ से दलित दस्तक के संपादक अशोक दास की Exclusive बातचीत

ब्रांडाइस युनिवर्सिटी। अमेरिका के बोस्टन से सटे वाल्थम में स्थित ब्रांडाइस युनिवर्सिटी में तीन दिनों तक चले सेेमिनार के आखिरी दिन भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डी. वाई चंद्रचूड़ पहुंचे। चीफ जस्टिस चंद्रचूड को की-नोट एड्रेस करना था। बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर अनफिनिस्ड लेगेसी के तहत होने वाले इस अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का विषय इस बार Law, Caste and the Pursuit of Justice था। इस दौरान चीफ जस्टिस ब्रांडाइस युनिवर्सिटी में लगी बाबासाहेब आंबेडकर की प्रतिमा को देखने भी पहुंचे। जहां दलित दस्तक के संपादक अशोक दास ने उनसे वंचितों को न्याय के मुद्दे पर सीधी बातचीत की। देखिए वीडियो

छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्यप्रदेश, तेलंगाना एवं मिजोरम विधानसभा चुनाव की घोषणा

छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्यप्रदेश और तेलंगाना एवं मिजोरम सहित पांच राज्यों में चुनाव के तारीखों की घोषणा हो गई है। चुनाव आयोग ने इन पांचों राज्यों में तारीखों का ऐलान कर दिया है। सबसे पहले मिजोरम में सात नवंबर, मध्यप्रदेश में 17 नवंबर, छत्तीसगढ़ में दो चरणों में 7 और 17 नवंबर, राजस्थान में 23 नवंबर और तेलंगाना में 30 नवंबर को चुनाव होंगे। नतीजे तीन दिसंबर को सामने आएंगे। मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने इसकी घोषणा की।

पांचों राज्यों में कुल 679 सीटों पर वोटिंग होगी। इसमें 16 करोड़ मतदाता हिस्सा लेंगे। इसमें 8 करोड़ पुरुष जबकि 7.8 करोड़ महिलाएं हैं। 60 लाख से ज्यादा वोटर नए होंगे, जो पहली बार वोटिंग करेंगे। इस घोषणा के साथ ही राजनीतिक सरगर्मी भी बढ़ गई है। टिकटों को लेकर घमासान बढ़ गया है तो अब मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशियों का नाम भी निकल कर सामने आने लगा है। फिलहाल राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार है। जबकि मध्यप्रदेश में कांग्रेस की चुनी हुई सरकार थी। इसको ज्योतिरादित्य सिंधिया को अपने पाले में मिलाकर और सरकार गिराकर भाजपा ने अपनी सरकार बना ली। और सिंधिया केंद्र में मंत्री बने। तेलंगाना में केसीआर की सरकार है, जबकि मिजोरम में मिजो नेशनल फ्रंट की सरकार है।

मुख्य चुनाव आयुक्त ने बताया कि 17 अक्टूबर को वोटर लिस्ट का प्रकाशन किया जाएगा। इसमें 23 तारीख तक संशोधन हो सकेगा। यानी मतदाताओं को ध्यान देना होगा कि 17 अक्टूबर को मतदाताओं की जो लिस्ट सामने आएगी, उसमें उनका नाम है या नहीं। अगर नहीं है तो वो 23 अक्टूबर तक उसे ठीक करवा सकते हैं। चुनाव आयोग ने चुनाव सुधार को लेकर एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। इसके मुताबिक अब आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को कम से कम तीन बार न्यूजपेपर में अपने बारे में बताना होगा। साथ ही, उनकी पार्टी को भी बताना होगा कि उन्होंने उम्मीदवार को टिकट क्यों दिया।

विधानसभा सीटों की बात करें तो, मिजोरम में- 40 सीटें, मध्यप्रदेश में- 230 सीटें, छत्तीसगढ़ में 90 सीटें, राजस्थान में 200 सीटें और तेलंगाना में 119 सीटें हैं। अब तीन दिसंबर को तय होगा कि सत्ता में किसकी वापसी होगी, कौन आउट होगा। यह चुनावी नतीजे 2024 में लोकसभा चुनाव के पहले राजनीतिक दलों के लिए एक सेमीफाइनल है।

स्वीडन में हुए ग्लोबल इंवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म कांफ्रेंस से इंवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म को मिली नई धार

 कांफ्रेंस दरअसल होता क्या है; इसकी शाब्दिक समझ तो थी, लेकिन कांफ्रेंस के दौरान दरअसल क्या होता है, और उसका मकसद क्या होता है, यह पहले कनाडा तो अब स्वीडन आकर पता चला। स्वीडन में इसको लेकर समझ ज्यादा बढ़ी। यह कांफ्रेंस एतिहासिकता लिए था। यह उस स्वीडन देश में था जहां से दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार शुरू हुआ। तो जिस गोथनबर्ग शहर को इसके लिए चुना गया वहां से शानदार गाड़ियां बनाने वाली दुनिया की प्रतिष्ठित कंपनी Volvo की शुरूआत हुई। ग्लोबल इंवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म नेटवर्क (GIJN) द्वारा आयोजित ग्लोबल इंवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म कांफ्रेंस 2023 (GIJC23) मेरे लिए इस मायने में खास रहा क्योंकि इसने मेरी पत्रकारिता की समझ के भी कई दरवाजे खोले। विदेशी पत्रकारों से मिलना और बातचीत करना कुछ मौकों पर हुआ है, लेकिन अपने 17 साल की पत्रकारिता में यह मेरा पहला मौका था, जब मैं दुनिया भर के पत्रकारों के बीच था। उनसे बात कर पा रहा था, उनके यहां की पत्रकारिता समझ रहा था। इस कांफ्रेंस में सिर्फ पत्रकार नहीं, बल्कि अमेरिका से लेकर यूके सहित दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से तमाम बड़े अखबारों के संपादकों के साथ-साथ पत्रकारिता पढ़ाने वाले प्रोफेसर्स भी मौजूद थे, तो पत्रकारों को कानूनी सपोर्ट करने वाले संगठन मीडिया डिफेंस के Carlos Gaio से भी मुलाकात हुई।

Dalit Dastak के Founder और Editor Ashok Das. अशोक दास को भारत से फेलोशिप मिली थीअमेरिका और यूरोप जैसे शहरों के पत्रकार तो कई मौकों पर टकराते रहे हैं, लेकिन पहली बार नाइजीरिया, फिजी, सिंगापुर, पड़ोसी नेपाल और बांग्लादेश के पत्रकारों से मिला। वहीं पर अमन अभिषेक भी मिल गए। अमन पत्रकारिता में तो नहीं हैं, लेकिन वह युनाईटेड स्टेट के University of Wisconsin Madison से पीएच.डी कर रहे हैं। मैं फिजी से प्रकाशित होने वाले फिजी टाइम्स अखबार के एडिटर Fred Wesley, ताईवान के Yian Lee से और बांग्लादेश के पत्रकार Jewel Gomes से मिला। मैं उन देशों का जिक्र कर रहा हूं, जो लगातार विकसित हो रहे हैं, वहां पत्रकारिता की चुनौतियां भी बहुत हैं। इन तमाम देशों के पत्रकारों को ग्लोबल इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म नेटवर्क जिस तरह एक मंच पर लेकर आया था, वह बेहद महत्वपूर्ण था। इन सबसे बात करना, उनके देश में पत्रकारिता की स्थिति के बारे में सुनना और समझना शानदार था। और बातचीत से एक बात तो समझ में आ गई कि किसी भी देश की मीडिया फ्री नहीं है। हां, भारत के कई मीडिया संस्थानों जैसे सत्ता के पैरों में लोटने का काम भी वो नहीं करते। उन्होंने बीच का एक रास्ता निकाल रखा है, और पत्रकारिता की मर्यादा को बचाए हुए हैं।

इस कांफ्रेंस में 125 देशों के करीब 2000 से ज्यादा मीडिया के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोग शामिल हुए। इसके लिए दुनिया भर से 300 पत्रकारों को फेलोशिप दी गई थी। यह कांफ्रेंस खासतौर पर इंवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म यानी खोजी पत्रकारिता को प्रोत्साहित करने के लिए, उन्हें ग्लोबल वर्ल्ड से जोड़ने और खोजी पत्रकारिता करने वाले लोगों को संरक्षण देने के लिए और उन्हें तमाम अन्य जानकारियां उपलब्ध कराने के लिए था, ताकि वो अपना काम बेहतर कर सकें। 19 से लेकर 22 सितंबर, 2023 तक चार दिनों तक लगातार कई सेशन हुए। सुबह नौ बजे से शाम को 7.30 तक सेशन चले। एक समय में कई अलग-अलग विषयों पर अलग-अलग एक्सपर्ट अपनी बात रख रहे थे। पत्रकारिता की नई तकनीक AI पर बात हुई तो वॉच डॉग जर्नलिज्म पर भी बात हुई। इलेक्शन, क्लाइमेट चेंज, अनकवर्ड इंवेस्टिगेशन, हेल्थ केयर इंवेस्टिगेशन, डिजिटल सिक्योरिटी जैसे विषयों पर इसके एक्सपर्ट ने बेहतर काम करने का रास्ता दिखाया। दक्षिण एशिया में पत्रकारिता की चुनौतियों पर बात हुई। ऑन लाइन हरासमेंट से कैसे डिल किया जाए।

GIJN के एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर Devid Kaplan, प्रोग्राम डायरेक्टर Anne Koch के साथ GIJN इंडिया के संपादक दीपक तिवारी (बीच में)

खास बात यह रही कि सिर्फ पत्रकारिता के विषयों को ही नहीं समझाया गया, बल्कि एक संस्थान कैसे मजबूत किया जा सकता है, किसी छोटे संस्थान को बढ़ाने की बिजनेस स्ट्रेटजी क्या होती है, फंड रेजिंग कैसे होती है और मोबाइल जर्नलिज्म को बेहतर तरीके से कैसे किया जा सकता है, यह भी बताया गया।

विदेशी संस्थानों की एक खासियत है। वो सीखाने के साथ-साथ संपर्क बनाने और फिर दिन का सेशन खत्म होने के बाद

Gijn New Executive Director Emilia Diaz Struck

शाम को म्यूजिक और मस्ती के जरिये दुनिया भर के लोगों को पास आने का मौका मुहैया करवाते हैं। वहां यह भी हुआ। अवार्ड नाइट जो ऐतिहासिक था। दुनिया भर में बेहतरीन इंवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म करने वाले पत्रकारों को यहां सम्मानित किया गया।

गाला रिसेप्शन के दौरान एक ही हाल में दुनिया भर के हजारों पत्रकारों की मौजूदगी एक अलग नजारा पेश कर रही थी। सभी बेहतर पत्रकारिता के लिए इकट्ठा हुए थे। सभी बेहतर पत्रकारिता करना चाहते थे। जो सबसे शानदार रहा वह डायरेक्टर डेविड कपल्न की बात रही, जिन्होंने साफ कर दिया कि दुनिया के किसी भी हिस्से में इंवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म करने वाला पत्रकार अकेला नहीं है, बल्कि GIJN उसके साथ है।

इस दौरान जीआईजेएन को अपना नया एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर भी मिल गया। पिछले दस सालों से एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर रहने वाले डेविड कपल्न (Devid Kaplan) ने अपना पद छोड़ दिया, जिसके बाद अवार्ड विनिंग जर्नलिस्ट Emilia Diaz Struck ने नई एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर का पद संभाला। कहा जा सकता है कि दुनिया भर में खोजी पत्रकारिता (इंवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म) को बढ़ाने के लिए ग्लोबल इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म नेटवर्क शानदार काम कर रहा है। स्वीडन के गोथनबर्ग शहर में हुए इस कांफ्रेंस से इंवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म को और धार ही मिलेगी।

 

#GIJC23 स्वीडन डायरी, एपिसोड-01

GIJN Conference

 टर्किश एयरलाइंस में मेरे बग़ल में Yian Lee और Jewel Gomes बैठे हैं। Yian ताइवान में पत्रकार हैं और Jewel बांग्लादेश में पत्रकारिता कर रहे हैं। हम तीनों GIJN कांफ्रेंस के लिए स्वीडन जा रहे हैं। इस फ्लाइट में अलग- अलग देशों के तक़रीबन दो दर्जन से ज़्यादा जर्नलिस्ट हैं जो कांफ्रेंस के लिए जा रहे हैं। हर रंग, रूप और भाषा के लोग। We can say this is like a small world of journalist. हमारी बातचीत शुरू है। हम एक-दूसरे के बारे में जानने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी पत्रकारिता के बारे में जानने की कोशिश कर रहे हैं।

Yian और Jewel इस बात को जानकर हैरान थे की भारत के विपक्षी दलों ने लिस्ट जारी कर कुछ पत्रकारों को इसलिए बैन किया है क्योंकि वो सत्ता के पिछलग्गू बने हुए हैं। लेकिन दोनों ये भी कह रहे हैं कि मीडिया कहीं भी फ्री नहीं है। बावजूद इसके दुनिया भर के जर्नलिस्ट ईमानदारी से अपने हिस्से का काम कर रहे हैं। खोजी पत्रकारिता सहित अन्य विधा की पत्रकारिता को और बेहतर तरीक़े से कैसे किया जा सकता है, इस पर बात करने के लिए इकट्ठा हो रहे हैं।

19-22 सितंबर, 2023 तक स्वीडन के Gothenburg में Global Investigative Journalism Conference में 50 से ज़्यादा विषयों पर बात होनी है। 200 देशों के दो हज़ार से ज़्यादा पत्रकार इसमें शामिल हो रहे हैं। इसमें दुनिया भर के अपने विषयों के दिग्गज पत्रकार अपनी बात रखेंगे। सिखाएँगे। गोथेनबर्ग शहर दिखने लगा। मेरी फ्लाइट यूरोप के स्वीडन के धरती पर लैंड होने जा रही है। तापमान 18 डिग्री है।

(18 सितंबर, 2023 को भारत से स्वीडन जाते हुए टर्किश एयरलाइंस के विमान में)