बिहार में SC-ST एक्ट का बुरा हाल, नहीं मिल रहा न्याय

बिहार में दलितों के खिलाफ लगातार बढ़ रहे अत्याचार के मामले बेहद चिंताजनक हैं। लेकिन उससे बड़ी चिंता की बात यह है कि ऐसे मामलों में एससी-एसटी एक्ट होने के बावजूद उनको न्याय नहीं मिल पा रहा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बीते 23 दिसंबर को एससी-एसटी अधिनियम मामलों की समीक्षा बैठक की थी। इस बैठक में एससी-एसटी के ऊपर अत्याचार के मामलों और न्याय मिलने को लेकर जो आंकड़े सामने आए हैं, वो चौंकाने वाले हैं।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इस समीक्षा बैठक से पता चला है कि वर्तमान में राज्य में एससी-एसटी अधिनियम से जुड़े कुल मामलों की संख्या 1,06,893 है। इनमें से तकरीबन आधे 44,986 मामलों में न्याय नहीं मिला है। बीते 10 सालों यानी जनवरी 2011 से नवंबर 2021 के बीच दर्ज 44,150 मामलों में से सिर्फ 872 मामलों में ही फैसला सुनाया गया है।

 बिहार पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक एससी-एसटी अधिनियम के तहत सबसे अधिक 7,574 मामले 2020 में दर्ज किए गए। इससे पहले 2018 में यह संख्या 7,125 और 2017 में 6,826 थी।

नहीं मिल पा रहा है न्याय

रिपोर्ट के मुताबिक उत्पीड़न की घटनाओं में न्याय नहीं मिल पाने की वजह मामलों की संख्या ज्यादा होने का हवाला दिया जा रहा है। इसकी एक वजह यह भी है कि मामलों का निपटारा होने पर पीड़ितों को मुआवजा देना पड़ेगा, जिसकी वजह से भी न्याय मिलना दुभर होता जा रहा है। दरअसल हत्या के मामले में पीड़ित परिवारों को 8.5 लाख रुपये का मुआवजा मिलने का प्रावधान है।

 ऐसे मुआवजे के मामले में 8,108 मामलों में अब तक सिर्फ 2,876 मामलों का ही निपटारा किया गया है और 5,232 मामले लंबित हैं। इसका कारण फंड का नहीं होना बताया जा रहा है।

क्या कहते हैं नियम

 इन आंकड़ों के सामने आने के बाद बिहार में दलितों और आदिवासियों की दयनीय स्थिति की तस्वीर सामने आ जाती है। तो बिहार की सत्ता पर लंबे समय से बैठे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का भी दलितों को न्याय दिलाने के बारे में रवैया सवालों के घेरे में है। क्योंकि नियम के अनुसार एससी-एसटी की स्थिति पर हर छह महीने में समीक्षा बैठक होनी चाहिए जो आमतौर पर नहीं हुई। 4 सितंबर 2020 को समीक्षा बैठक के बाद मुख्यमंत्री की भी नजर इसपर पंद्रह महीने बाद गई और 23 दिसंबर 2021 को एससी-एसटी अधिनियम मामलों की समीक्षा बैठक हुई। इससे साफ है कि बिहार की सरकार, प्रशासन और आय़ोग दलितों और आदिवासियों के खिलाफ अत्याचार रोकने और उनको न्याय दिलाने के लिए गंभीर नहीं है।

पंजाब में पीएम मोदी की भारी बेइज्जती, किसानों ने नहीं होने दी रैली

 कृषि कानूनों पर मोदी से लेकर भारत सरकार को हराने और अपनी मांग मंगवाने के बाद किसानों ने एक बार फिर भाजपा और पीएम मोदी को झटका दे दिया है। 5 जनवरी को पंजाब के फिरोजपुर दौरे पर गए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को किसानों ने रैली नहीं करने दी और पीएम को अपना कार्यक्रम रद्द कर वापस लौटना पड़ा। हालांकि अपनी इज्जत बचाने के लिए केंद्र सरकार इसके पीछे सुरक्षा कारणों का हवाला दे रही है, लेकिन स्थानीय रिपोर्ट के मुताबिक खाली कुर्सियों और किसानों के विरोध के कारण पीएम को अपना दौरा रद्द करना पड़ा। पीएम मोदी अपनी इस रैली से पंजाब चुनाव की शुरुआत करने वाले थे। इस दौरान वह फिरोजपुर में वह 42750 करोड़ रुपये की विकास योजनाओं की घोषणा करने वाले थे। इसके लिए प्रधानमंत्री मोदी सुबह बठिंडा पहुंचे थे। उन्हें वहां से हेलिकॉप्टर से हुसैनीवाला में राष्ट्रीय शहीद स्मारक जाना था। आसमान साफ नहीं था तो पीएम मोदी का सड़क मार्ग से जाना तय हुआ। लेकिन किसानों के प्रदर्शन के चलते पीएम मोदी को वापस लौटना पड़ा। हालांकि अब इस पूरे मामले को गृह मंत्रालय और भाजपा सुरक्षा की चूक मानकर पंजाब सरकार पर सारा ठिकरा फोड़ रही है।
लेकिन सच यह है कि किसान संगठनों ने पहले ही रैली का विरोध करने का ऐलान कर रखा था। किसान एमएसपी गारंटी कानून बनाने और प्रदूषण एक्ट में से किसानों को निकालने की मांग कर रहे थे। पीएम मोदी की इस रैली का विरोध सड़क से लेकर सोशल मीडिया पर तक देखने को मिला। सोशल मीडिया के पेज ट्रैक्टर टू ट्विटर पर बच्चे से लेकर नौजवान और बुजुर्ग भी मोदी की रैली का विरोध करते दिखे। देखते-देखते ट्विटर पर गो बैक मोदी टॉप ट्रेंड करने लगा। यहां लोगों का इस बात को लेकर गुस्सा था कि कृषि कानून के खिलाफ संघर्ष के दौरान 700 किसानों की शहादत होने के बाद प्रधानमंत्री ने कानून वापस लिया। अब भी किसानों की कई मांगें नहीं मानी गई हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री का पंजाब में स्वागत का सवाल ही नहीं है।
यानी कि जिस तरह पीएम मोदी और भाजपा यह मान रहे थे कि कृषि कानूनों की वापसी के बाद किसानों का गुस्सा शांत हो जाएगा, वैसा होता नहीं दिख रहा है। पीएम मोदी का विरोध कर पंजाब के किसानों ने साफ कर दिया है कि वह फिलहाल भाजपा और पीएम मोदी को पंजाब में घुसने देने के मूड में नहीं हैं।

क्या है सोशल मीडिया पर हंगामा मचाने वाला बुल्ली बाई ऐप

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 हैदराबाद शहर की पुलिस की साइबर अपराध शाखा ने सोमवार को बुल्ली बाई विवाद के संबंध में एक मामला दर्ज किया। बुल्ली बाई ऐप के खिलाफ ऐफआइआर तब दर्ज हुआ जब शहर की दो महिलाओं की तस्वीरों को एक ऐप के माध्यम से ‘नीलामी’ के लिए रखा गया, जिसमें कथित तौर पर उन्हें अपमानित करने के प्रयास में मुस्लिम महिलाओं को निशाना बनाया गया। वहीं कहा जा रहा है कि बुल्ली बाई ऐप ने करीब 100 मुस्लिम महिलाओं की नीलामी की तस्वीरें अपलोड की है, जिसे लेकर Bulli Bai मामले पर बवाल मचा हुआ है।

हालांकि ये पहली बार नहीं है जब नीलामी के लिए किसी महिला की तस्वीरें अपलोड की जा रही हैं इससे पहले भी Sulli Deals नाम से एक ऐप आया था, जिसमें Bulli Bai की ही तरह महिलाओं की नीलामी की जा रही थी।

अब जानते है कि जिस बुल्ली बाई ऐप पर इतना हंगामा हो रहा है वो आखिर है क्या?

जुलाई 2021 में ‘Sulli Deals’ नाम का एक ऐप सामने आया था, जिसमें कई मुस्लिम महिलाओं की तस्वीरें लगाकर उनकी कथित नीलामी की जा रही थी। उस दौरान कई महिलाओं ने ‘Sulli Deals’ के खिलाफ आवाज उठाई थी। वहीं करीब 6 महीने बाद ‘Bulli Bai’ नाम का एक ऐप फिर से सामने आया है, जिसमें और अधिक महिलाओं की ‘नीलामी’ की जा रही है।।।

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि Sulli Deals और Bulli Bai को एक ही डेवलपर ने बनाया है। Sulli Deals और Bulli Bai ऐप को Github पर बनाया गया है। इस ऐप के खिलाफ मामला तब दर्ज किया जब पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्रों और प्रसिद्ध हस्तियों सहित कई महिलाओं ने Bulli Bai के खिलाफ शिकायत की और इसके डेवलपर के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की। जिसके बाद मुंबई और दिल्ली पुलिस की साइबर सेल ने मामले की जांच की और पाया कि सैकड़ों मुस्लिम महिलाओं को ऐप पर ‘नीलामी’ के लिए डाला गया था।

सोशल मीडिया में Bulli Bai की बात जैसे ही सामने आई तो सरकार हरकत में आई और तुरंत Bulli Bai ऐप पर बैन लगाया गया। फिलहाल इस मामले में अब तब तीन लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। इसमें मास्टरमाइंड के तौर पर 18 साल की लड़की श्वेता सिंह और 19 साल के विशाल झा की गिरफ्तारी हुई है, जबकि 20 साल के मयंक रावत को भी गिरफ्तार किया गया है।

Bulli Bai App पर मुस्लिम महिलाओं की निलामी मामले में दो गिरफ्तार

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 सोशल मीडिया में ‘बुली बाई’ एप पर मुस्लिम महिलाओं की निलामी पर देश भर में हंगामा मचा है। इस बीच बड़ी खबर यह है कि इस मामले में बुली बाई एप से जुड़े दो आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया है। इसमें बेंगलुरू से 21 साल के विशाल कुमार झा का नाम सामने आया है जबकि उत्तराखंड से एक महिला को गिरफ्तार किया गया है।

दरअसल इस ऐप पर सैकड़ों मुस्लिम महिलाओं को ‘नीलामी’ के लिए डाला गया था। जिसे लेकर सोशल मीडिया पर हंगामा मचा हुआ है। हैदराबाद पुलिस की साइबर अपराध शाखा ने सोमवार को बुल्ली बाई विवाद के संबंध में एक मामला दर्ज किया था। इस मामले की जांच दिल्ली और मुंबई की साइबर सेल ने भी की थी। जिसके बाद आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया है। दरअसल काफी दिनों से ‘बुली बाई’ एप को लेकर सोशल मीडिया पर बवाल मचा हुआ है। इस ऐप के जरिए करीब 100 मुस्लिम महिलाओं की नीलामी की तस्वीरें अपलोड की गई थी, जिसे लेकर कई पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्रों, प्रसिद्ध हस्तियों सहित कई महिलाओं ने Bulli Bai के खिलाफ शिकायत की थी। इस मामले में सरकार ने जांच का आदेश दिया था जिसके बाद इस एप को ब्लॉक कर दिया गया था और अब इस मामले में दो आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया है।

 पुलिस का कहना है कि मुख्य आरोपी महिला ‘बुली बाई’ एप से जुड़े कुल तीन अकाउंट हैंडल कर रही थी। एक अन्य आरोपी विशाल कुमार ने खालसा वर्चस्ववादी के नाम से खाता खोला था। 31 दिसंबर को, उसने अन्य खातों के नाम बदल दिए और सिख नाम से मिलता-जुलता नाम रख दिया, ताकि इसके खाताधारकों की असली पहचान छुपाई जा सके। नए साल के पहले दिन में जिस तरह सोशल मीडिया पर मुस्लिम महिलाओं को लेकर बुल्ली बाय डील नामक ऐप पर आपत्तिजनक बातें और तस्वीरों को पोस्ट किया गया है, उस पर दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग ने भी संज्ञान लिया था।

अब इस मामले में आरोपी के रूप में विशाल का नाम सामने आने के बाद हंगामा मचा है। विशाल की पहचान ब्राह्मण समाज की बताई जा रही है, इसको लेकर अंबेडकरवादी और मुस्लिम समाज हमलावर हैं। इसको हिन्दुवादी संगठनों की साजिश भी बताई जा रही है।

कोरोना की तेजी के बीच दिल्ली में वीकेंड कर्फ्यू का ऐलान

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कोरोना के लगातार बढ़ते मामले को देखते हुए और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के इसकी गिरफ्त में आने के बाद दिल्ली सरकार ने अहम फैसला किया है। मंगलवार को दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कोविड के नए गाइडलाएंस का एलान किया है। इसके मुताबिक अब दिल्ली में वीकेंड कर्फ्यू लगेगा। दरअसल दिल्ली में कोरोना के मामले पिछले 7 दिनों में काफी ज्यादा बढ़े हैं और इसके साथ ही 3 जनवरी को 4099 मामले सिर्फ दिल्ली में पाए गए हैं। इसको देखते हुए उप मुख्यमंत्री ने कोरोना के खिलाफ सख्ती बढ़ाने का ऐलान किया है।

उप मुख्यमंत्री ने कोविड को लेकर गाइडलाइंस जारी किए है। कोरोना के खिलाफ जो गाइडलांस जारी किए गए हैं उसके मुताबिक- • दिल्ली में वीकेंड कर्फ्यू लगेगा, यानी शनिवार और रविवार को कुछ जरूरी सेवाएं छोड़कर दिल्ली बंद रहेगी। इसका पहला दिन 7 जनवरी को होगा। • इसके अलावा कुछ जरूरी सेवाओं को छोड़ कर सभी सरकारी दफ्तर बंद रहेंगे। • सभी सरकरी दफ्तरों में वर्क फ्रॉम की बात कह दी गई है। • निजी दफ्तर 50% क्षमता के साथ खुलेंगे। • मैट्रो 100% क्षमता से चलेंगे लेकिन सभी को मास्क पहनने की अनिवार्यता रखी गई है। • सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने का निर्देश दिया गया है।

इसके अलावा उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा है कि सभी लोग जरूरत पड़ने पर ही घर से बाहर निकलें। आपको बता दें 3 जनवरी 2022 को कोरोना संक्रमण का ये आंकड़ा पिछले एक हफ्ते में 6.46% की दर के साथ 4099 हो गया था और 4 जनवरी को कोविड संक्रमितों की संख्या 5500 हो गई है। इससे देखा जा सकता है कि कितनी तेजी से कोरोना लोगों को अपनी चपेट में ले रहा है, हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार ये संक्रमण ज्यादा घातक नहीं है, लेकिन इसके बावजूद सतर्कता बरतने की बात कही जा रही है।

यूपी में भाजपा का भयंकर जातिवाद, डीएम-एसपी के पदों पर राजपूतों और ब्राह्मणों का कब्जा

 जरा बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के शासनकाल को याद करिए। बसपा शासनकाल में जैसे ही बड़े पदों पर दलितों की पोस्टिंग हो जाती है या फिर सपा शासनकाल में जैसे ही बड़े पदों पर यादव आ जाते थे, इन सरकारों पर जातिवादी होने का ठप्पा लगा दिया जाता था। इस काम में जातिवादी मीडिया और भाजपा के लोग सबसे आगे रहते हैं। लेकिन भाजपा सरकार में अधिकारियों की तैनाती का जो आंकड़ा सामने आया है, वह भाजपा के भीतर के जातिवाद की कहानी कहता है।

अभी यूपी में भाजपा की सरकार है और प्रदेश में अधिकारियों की तैनाती का 30 दिसंबर 2021 तक का जो आंकड़ा सामने आया है, वो इस बात की ओर इशारा करती है कि बीजेपी शासित उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में अधिकारियों की तैनाती उनकी जाति के हिसाब से हुई है। और इसमें ऊंची जाति के लोग भरे पड़े हैं। हम ये आंकड़े आपके सामने इसलिए रख रहे हैं क्योंकि यही बीजेपी सरकार जब अपोजिशन में थी तो उत्तर प्रदेश में बड़े पदों पर ओबीसी या एससी/ एसटी की तैनाती पर सवाल उठा रही थी और उसे सपा/बसपा का जातिवाद बता रही थी।

 जो डेटा हमारे पास है उसके मुताबिक यूपी के 75 जिलों में से 30 जिलाधिकारी यानी DM सामान्य वर्ग के हैं, इनमें सीएम योगी की जाति यानी राजपूत जाति के 20 डीएम हैं। तो करीब 11% ब्राह्मण जाति के डीएम हैं। अनुसूचित जाति की बात करें तो सिर्फ 4 DM दलित समाज से आते हैं।

अब उत्तर प्रदेश के जिलों में SSP/SP की तैनाती पर नजर डालेंगे तो वहां पर भी यही देखने को मिलता है… प्रदेश के 18 जिलों की कमान ठाकुर जाति के हाथ में है, जबकि इतने ही यानी 18 जिलों में ब्राह्मण जाति के SSP तैनात हैं। सिर्फ 5 जिलों के पुलिस कप्तान SC-ST समाज से  हैं।

OBC जाति की बात करें तो उनकी स्थिति थोड़ी बेहतर है। सूबे में ओबीसी समाज के 14 DM तैनात हैं। जबकि प्रदेश के 12 जिलों में ओबीसी पुलिस कप्तान हैं। हालांकि इसमें दिलचस्प यह भी है कि योगी सरकार ने यादव अधिकारियों पर भरोसा नहीं जताया है। और सिर्फ 1-1 जिले में DM और पुलिस कप्तान यादव रखे गए हैं।

 तो वहीं एक भी जिले की कमान मुस्लिम अधिकारियों को नहीं सौंपी गई है। हालांकि 1 सिख और 1 क्रिश्चियन को जिले की कमान डीएम के तौर पर सौंपी गई हैं।

 हालांकि तमाम सरकारें अपनी जाति के अधिकारियों की भर्ती करती रही है, लेकिन सवाल यह है कि सपा और बसपा के शासनकाल में ऐसी नियुक्तियों को जातिवाद कहने वाली भाजपा और उसके नेताओं को अपना जातिवाद क्यों नहीं दिख रहा? क्योंकि जिस तरह से इस सरकार में सवर्ण अधिकारियों को और खासकर सीएम योगी की जाति के अधिकारियों को विशेष तव्वजो दी जा रही है, वह जातिवाद नहीं तो और क्या है?

यूपी चुनाव को लेकर चुनाव आयोग की प्रेस कांफ्रेंस, आयोग ने की ये महत्वपूर्ण घोषणाएँ

 उत्तर प्रदेश चुनाव की समीक्षा को लेकर निर्वाचन आयोग की टीम तीन दिन के दौरे पर थी। इस दौरान तमाम राजनीतिक दलों से मिलने और उनकी प्रतिक्रिया लेने के बाद आयोग के अधिकारियों ने आज 30 दिसंबर को प्रेस कांफ्रेंस की। इस दौरान आयोग ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों को लेकर तमाम चीजें साफ की। मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील चंद्रा ने कई जरूरी ऐलान करते हुए साफ किया कि तमाम राजनीतिक दल समय पर चुनाव चाहते हैं। हालांकि आयोग ने अभी चुनाव की तारीखों का ऐलान नहीं किया।

 मुख्य चुनाव आयुक्त का कहना था कि आखिरी मतदाता सूची 5 जनवरी को आएगी। यानी कि माना जा सकता है कि उसके बाद चुनाव की तारीखों का ऐलान किया जाएगा। इस दौरान आय़ोग ने कई अन्य महत्वपूर्ण घोषणाएँ भी की। आयोग ने एक बड़ा ऐलान करते हुए विशेष लोगों को घर से ही वोटिंग की सुविधा देने का ऐलान किया। आयोग के मुताबिक आगामी यूपी के चुनाव में दिव्यांग और 80 साल से ज्यादा उम्र वालों को घर से ही मतदान की सुविधा मिलेगी। साथ ही इस बार कोरोना को देखते हुए भीड़ को नियंत्रित करने के लिए 11 हजार पोलिंग बूथ ज्यादा बनाए जाएंगे।

 मतदान के समय को लेकर भी आय़ोग ने बदलाव की बात कही है। अब सुबह 8 बजे से लेकर शाम को 6 बजे तक वोटिंग होगी। पहले यह शाम को पांच बजे तक ही होता था। आपको बता दें कि यूपी में 15 करोड़ मतदाता है। इनके लिए प्रदेश में कुल 11 हजार से अधिक बूथ बनाये जाएंगे। जिसमें कुल 11 लाख 74 हजार मतदान स्थल होंगे। आयोग ने वोटर कार्ड न होने की वजह से वोटिंग में होने वाली दिक्कतों पर राहत की घोषणा भी की है। आयोग का कहना था कि जिनके पास निर्वाचन कार्ड नहीं होंगे वो किसी भी आधिकारिक दास्तवेज के साथ वोट कर सकेंगे।

जानिए ओमिक्रॉन को लेकर क्या है ताजा अपडेट

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 नए साल की दस्तक हो चली है, लेकिन उससे पहले कोरोना वायरस के नए वैरिएंट ओमिक्रॉन ने आकर लोगों के उत्साह पर पानी फेर दिया है। कई देशों में डेल्टा की जगह ओमिक्रॉन वैरिएंट पूरी तरह हावी हो चुका है और ये देश महामारी की चौथी लहर झेल रहे हैं। वहीं भारत में अब तक कोरोना की दूसरी लहर देखी गई है। भारत में ओमिक्रॉन के बढ़ते मामले और कोविड मामलो में आई उछाल से तीसरी लहर के आने की आशंका तेज हो गई है।

 दरअसल भारत में 30 दिसंबर तक ओमिक्रॉन के 961 मामले सामने आ चुके हैं। इसी के साथ 29 दिसंबर को कोविड के मामलों में 44% की तेजी दर्ज की गई है। ऐसे में एक्सपर्ट्स का कहना है कि कोरोना के तेजी से बढ़े ये मामले ओमिक्रॉन की वजह से हैं और अनुमान है कि 2022 की शुरुआत में कोरोना के मामलो में उछाल आ सकता है। एक्सपर्ट्स और वैज्ञानिकों का अनुमान है कि भारत में बढ़े Covid-19 के मामलों की वजह से तीसरी लहर आने की संभावना है, लेकिन इसके साथ ही एक्सपर्ट्स ने एक राहत की खबर भी सुनाई है।

एक्सपर्ट्स ने कहा है कि जहां एक तरफ तीसरी लहर के आने की आशंका है वहीं एक बात ये भी है कि इसका प्रभाव पहली और दूसरी लहर की तरह गंभीर नहीं होगा। जानकारों के मुताबिक, ये लहर बहुत कम समय तक रहेगी। अब आपके ज़हन में एक सवाल आ रहा होगा की तीसरी लहर के आने की बात पुख्ता तरीके से क्यों कही जा रही है। तो हम आपको बता दें कि कोविड मामले पर लगातार रिसर्च करने वाले 4 अहम संस्थानों के एक्सपर्ट्स ने कोविड पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। आइए जानते हैं कि उन संस्थानों ने क्या कहा-

> कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने एक ट्रैकर बनाया है जिसके मुताबिक दिसंबर के अंतिम सप्ताह से नए संक्रमण के मामले बढ़ने लगेंगे।

> आईआईटी-कानपुर की एक स्टडी में बताया गया है कि भारत में महामारी की तीसरी लहर 3 फरवरी, 2022 तक पीक पर आ सकती है। इस भविष्यवाणी के अनुसार मामलों में वृद्धि, 15 दिसंबर तक शुरू होनी थी।

> नेशनल कोविड-19 सुपरमॉडल कमेटी ने अनुमान लगाया है कि कोरोना की तीसरी लहर 2022 की शुरुआत में पीक पर पहुंचने की उम्मीद है। कमेटी के सदस्यों ने कहा कि जैसे ही ओमिक्रॉन डेल्टा की जगह लेना शुरू कर देगा, वैसे ही हर दिन इसके मामले बढ़ने लगेंगे।

> ओमिक्रॉन वैरिएंट की पहचान करने वाले दक्षिण अफ्रीकी डॉक्टर एंजेलिक कोएत्जी ने कहा है कि ओमिक्रॉन की वजह से भारत में कोविड के मामलों में वृद्धि होगी, लेकिन इसका संक्रमण हल्का होगा। कोएत्जी ने कहा कि इसकी पॉजिटिविटी रेट ज्यादा होगी लेकिन उम्मीद है कि इसके अधिकांश मामले उतने ही हल्के होंगे जितने हम यहां दक्षिण अफ्रीका में देख रहे हैं।

इन सभी एक्सपर्ट्स की कोविड पर जो राय है इससे ये लगता है की कोविड की दूसरी लहर आ सकती है लेकिन इसके साथ ही अच्छी खबर ये बताई जा रही है की इससे नुकसान की संभावना कम है।
  • रिपोर्ट- आस्था गुप्ता

योगी के दिये टैबलेट को OXL पर बेच रहे हैं यूपी के छात्र, वजह जानकर हो जाएंगे हैरान

 भाजपा के घोषणा पत्र में यूपी के छात्रों को एक करोड़ टेबलेट और स्मार्टफोन बांटने की बात कही गई थी। चुनाव नजदीक देख मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती 25 दिसंबर को 60 हजार छात्रों को टैबलेट और स्मार्ट फोन बांटा। लेकिन टैबलेट की पहली खेप मिलते ही छात्र इसे OLX पर बेचने लगे हैं। और छात्र इसकी जो वजह बता रहे हैं, उसे जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे।

 छात्रों का कहना है कि उन्हें सरकार द्वारा दिये गए टैबलेट इस्तेमाल करने से डर लगता है क्योंकि इससे उन्हें अपनी प्राइवेसी की चिंता सता रही है। छात्र न तो इस टैबेलेट पर अपना व्हाट्सएप खोल रहे हैं और न हीं फेसबुक। उन्हें डर है कि ऐसा करते ही उनका सारा डेटा सरकार के पास चला जाएगा। और आज के युवाओं के लिए बिना व्हाट्सएप और फेसबुक के किसी फोन या टैब की कल्पना करना ही बेकार है।

 डर सिर्फ इतना ही नहीं है, बल्कि एक मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक एक छात्र ने बताया कि टैब के वॉलपेपर पर योगी सरकार की बड़ी तस्वीर होती है और अगर कोई उसे बदलने की कोशिश करता है तो पूरा फोन की ब्लॉक हो जाता है।

 छात्र यह भी कह रहे हैं कि टैब के ऊपर बारकोड के जरिए मैपिंग की गई है, जिसमें छात्रों का पूरा डेटा उस बारकोड में डाला गया है। जिसकी वजह से वह फोन किसी और के द्वारा नहीं चलाया जा सकता। ऐसे में इस फोन को निजी इस्तेमाल नहीं किया जा सकता और छात्र इसके जरिये सिर्फ पढ़ाई का काम ही कर पाएंगे।

इन्हीं मुश्किलों को देखते हुए अब OLX पर छात्र अपने टैब और स्मार्ट फोन को बेचने लगे हैं, जिससे सरकार की इस योजना की किरकिरी हो गई है। आपको बता दें कि समाजवादी पार्टी की सरकार में भी मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने लैपटॉप बांटा था, तब भी छात्रों द्वारा लैपटॉप को बेचने की खबर आई थी।

उच्च शिक्षण संस्थानों में बहुजनों की आत्महत्या पर आया चौंकाने वाला आंकड़ा

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 देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में पिछले सात सालों के दौरान 122 छात्र-छात्राओं ने आत्महत्या कर ली है। ये आंकड़ा केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने बीते संसद सत्र के दौरान बताया। हैरानी की बात यह है कि आत्महत्या करने वाले विद्यार्थियों में ज्यादातर दलित, आदिवासी, पिछड़े और मुस्लिम समाज के युवा हैं। ज्यादा मौतें आईआईटी, आईआईएम और मेडिकल संस्थानों के छात्र-छात्राओं ने किया है।

 मौतों के आंकड़े की बात करें तो देश में बीते सात सालों 2014 से 2021 के बीच दलित समाज के 24 विद्यार्थियों ने खुदकुशी की, जबकि आदिवासी वर्ग से 3 छात्रों ने मौत को गले लगा लिया। तो वहीं ओबीसी से 41 और धार्मिक अल्पसंख्यक वर्ग के 3 विद्यार्थियों ने आत्महत्या कर ली। इस खबर में एक अन्य चौंकाने वाली बात यह है कि बीते सात साल में सबसे ज्यादा 34 आत्महत्याएं आईआईटी संस्थानों के छात्र-छात्राओं ने किया है। इसमें पांच स्टूडेंट आदिवासी समाज से जबकि 13 स्टूडेंट ओबीसी वर्ग से थे।

सरकारी आंकड़े से यह भी सामने आया है कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों में आत्महत्या करने वाले विद्यार्थियों की संख्या 37 रही। इसके अलावा, आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में पांच विद्यार्थियों ने अपनी जान दे दी। हालांकि सामाजिक संगठन इस आंकड़े को पूरा सच नहीं मान रहे हैं और उनका दावा है कि मौत के आंकड़े ज्यादा होते हैं, क्योंकि छोटे शहरों के शिक्षण संस्थानों के मामले सामने नहीं आ पाते।

 शिक्षण संस्थानों में आत्महत्या को लेकर सबसे बड़ा बवाल साल 2016 में हुआ था, जब 17 जनवरी 2016 को हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के पीएचडी के छात्र रोहित वेमुला ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर तमाम आरोप लगाते हुए आत्महत्या कर लिया था। तो साल 2019 में मेडिकल की छात्रा पायल तड़वी ने सवर्ण समाज की अपनी सहकर्मियों पर भेदभाव का आरोप लगाते हुए आत्महत्या कर ली थी। रोहित वेमुला और पायल तडवी दोनों दलित समाज से थे। माना जा रहा था कि इन दोनों की आत्महत्या के बाद उठे तूफान से स्थिति सुधरेगी, लेकिन सरकार द्वारा जारी आंकड़े बताते हैं कि दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों के लिए देश के उच्च शिक्षण संस्थान कब्रगाह बनते जा रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और प्रियंका गांधी का बड़ा दांव

उत्तर प्रदेश में चुनाव का दौर चल रहा है ऐसे में सभी राजनीतिक पर्टियों ने वोट बटोरने के लिए अपना राजनीतिक एजेंडा सेट कर लिया है। वहीं कांग्रेस की महासचिव और उत्तर प्रदेश प्रभारी प्रियंका गांधी वाड्रा भी पीछे नहीं है। उत्तर प्रदेश की सियासत में सबसे पीछे चल रही कांग्रेस को संभालने का जिम्मा लेने वाली प्रियंका गांधी ने वोट की खातिर महिलाओं और युवा लड़कियों को निशाने पर लिया है।

  “लड़की हुं लड़ सकती हूं” के नारे के साथ प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश के चुनावी समर में उतर गई हैं। लड़कियों को अपने पाले में करने के लिए प्रियंका गांधी ने 28 दिसंबर को लखनऊ के इकाना स्टेडियम में एक मैराथन रेस आयोजित किया।इसमें बड़ी संख्या में लड़कियां शामिल हुईं। प्रियंका गांधी इस मैराथन में जीतने वाली लड़कियों को इनाम के तौर पर स्कूटी, टैबलेट और स्मार्ट वॉच बांट रही हैं। उनकी इस पहल से साफ लग रहा है कि उन्होंने चुनाव जीतने के लिए अपने राजनीतिक एजेंडे के लिए महिलाओं को चुना है।

क्योंकि भाजपा के निशाने पर जहाँ हिंदू वोट हैं, बसपा का की नजर दलितों-पिछड़ों के साथ ब्राह्मण वोटरों पर है तो यादवों और मुस्लिम समाज पर सपा अपना दावा ठोक रही है। ऐसे में बिखरती हुई कांग्रेस के लिए भी ये जरूरी था कि वो एक ताकतवर एजेंडे के साथ अपना अस्तित्व बनाए रखे। ऐसे में जिस तरह से इस मैराथन के लिए स्टेडियम पर लड़कियों की भीड़ देखी गई उससे लगता है कि कांग्रेस अपने एजेंडे पर आगे बढ़ने में सफल होती दिख रही है। और प्रियंका का ये स्लोगन “लड़की हूं लड़ सकती हूं” उनकी पार्टी को वापस लड़ाई में लाता दिख रहा है।

क्योंकि जहां बात महिलाओं की आती है वहां हर जाति या धर्म की महिलाएं चाहे वो हिंदू या मुस्लिन, सवर्ण हों या दलित सभी शामिल होती हैं। वहीं उत्तर प्रदेश में महिलाओं की संख्या की बात करें तो 2011 के सेंसस के मुताबिक 1000  पुरुषों पर 908 महिलाएं हैं और इलैक्शन कमिशन के मुताबिक इनमें से 59.43 प्रतिशत पुरुषों के मुकाबले 63.26 प्रतिशत महिलाओं ने 2017 विधान सभा चुनाव में वोट किया था। यानी एक बहुत ही बड़े तबके पर कांग्रस का फोकस है। जो तख्ता पलट करने के लिए काफी है। अब देखना ये है कि कांग्रेस को अपने इस नए एजेंडे से 2022 में हो रहे यूपी के विधान सभा चुनाव में कितना फायदा होगा।

मध्य प्रदेश में कोर्ट के आदेश से ओबीसी आरक्षण को झटका

देश के हर राज्य में आरक्षण के अलग-अलग मानक है। हर राज्य में आरक्षण की व्यवस्था अलग-अलग है। देश का कथित सवर्ण समुदाया हमेशा ही इसके विरोध में नजर आती है और इसे लेकर विवाद अक्सर सुर्खियों में बनी रहती हैं। इस बार भी यही हुआ है। लेकिन इस बार ये आरक्षण को लेकर टकराव सरकार और कोर्ट के बीच हुआ है और जहां कोर्ट की बात आ जाती है वहां आखरी फैसला कोर्ट का ही माना जाता है। मामला मध्यप्रदेश का है, जहां अदालत ने ओबीसी समाज को झटका दे दिया है। मध्यप्रदेश की सरकार ने राज्य में ओबीसी आरक्षण 27 फीसदी लागू करने का फैसला किया था हालांकि सरकार की इस कोशिशों को झटका लगा है। दरअसल ओबीसी आरक्षण मामले में सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की वेकेशन बेंच ने सरकार द्वारा 27 फीसदी आरक्षण को 14 फीसदी तक ही रखने का आदेश दिया है। साथ ही ये भी कहा है कि ये नियम सभी सरकारी विभागों में लागु होना चाहिए। हालांकि हाईकोर्ट ने स्टे को बरकरार रखा है। अब हाईकोर्ट की रेगुलर बेंच इस पर सुनवाई करेगी। मामले की सुनवाई जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस विवेक अग्रवाल की अवकाशकालीन खंडपीठ ने की।

बता दें कि प्रदेश सरकार ने मेडिकल सीटों में ओबीसी वर्ग को 27 फीसदी आरक्षण देने का आदेश जारी किया था। जिसके खिलाफ पन्ना के एक छात्र ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की, जिस पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने मेडिकल सीटों में भी 27 फीसदी के बजाय 14 फीसदी आरक्षण लागू करने का आदेश दिया था। याचिकाकर्ता की ओर से वकील आदित्य संघी हाईकोर्ट में उपस्थित हुए। वहीं सरकार की तरफ से अतिरिक्त महाधिवक्ता आर के वर्मा कोर्ट में मौजूद रहे। आरक्षण से संबंधित सभी मामलों की सुनवाई नियमित पीठ द्वारा पहले के आदेश के अनुसार की जानी है। इससे पहले हाईकोर्ट ने नवंबर में आरक्षण मामले पर सुनवाई करते हुए मेडिकल सीटों में भी ओबीसी आरक्षण 14 फीसदी ही लागू करने का आदेश दिया था। एक बार फिर से अदालत का आदेश आने पर ओबीसी समाज को बड़ा झटका लगा है।

  • रिपोर्ट- आस्था

बहुजन बुलेटिन- 24 दिसंबर 2021

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  1. राजस्थान में बढ़ रहा है दलितों के साथ अत्याचार, दलित दूल्हें को घोड़ी पर बिंदोली निकालने की मिली सजा, सर्वणों ने दूल्हे के साथ की जमकर मारपीट, माहौल बिगड़ता देख पुलिस की गई तैनात। ये मामला उदयपुर के सालेरा खुर्द गांव का है जहां 27 नवंबर को अपनी शादी से पहले दूल्हे ने बिंदोली निकाली थी जिसका विरोध करते हुए गाँव के कुछ सवर्णों ने आगबूबला हो कर उसे पिटा और पथराव किया। जिसके बाद दूल्हे के घर के बाहर महीने भर से 24 घंटे पुलिस तैनात रखी गई है।
  2. उत्तराखंड के स्कूल में दलित महिला द्वारा बनाए गये खाने को मना करने वाले बच्चों के अभिवावकों की कड़ी आपत्ति जताने के बाद, दलित भोजनमाता को पद से हटा दिया गया है। वहीँ बढ़ते मामले को देखते हुए सीएम पुष्कर धामी ने जाँच के आदेश देते हुए कहा है कि मामले में दोषी पाए गये लोगों के खिलाफ सख्त कारवाई की जाएगी।
  3. बिहार में दलित समाज के लोगों ने प्रतिरोध मार्च निकाल कर गजेंद्र झा और दलित विरोधी मानसिकता रखने वाले लोगों पर कानूनी कार्रवाई की मांग की है। इस दौरान गजेन्द्र झा का पुतला भी फूंका गया और लोगों ने गजेंद्र झा मुर्दाबाद के नारे लगाकर उनकी गिरफ्तारी की मांग की।
  4. मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने बीजेपी की शिवराज सिंह चौहान सरकार पर निशाना साधा है। कमलनाथ ने कहा है कि खुद को आदिवासी वर्ग का हितैषी बताने वाली बीजेपी जरा बताए कि अगर वो आदिवासियों की इतनी ही हितैषी है तो अनुपूरक बजट में उसने आदिवासी वर्ग के लिए सिर्फ 400 रुपये क्यों रखे हैं।
  5. झारखंड सरकार आदिवासी जमीन के अवैध हस्तांतरण का पता लगाने के लिए बड़ा कदम उठाने जा रही है।खबर है कि भू राजस्व विभाग ने 89 साल का पूरा ब्योरा माँगा है इसके लिए सभी आयुक्तों व उपायुक्तों को पत्र लिखा गया है।
  6. बसपा सुप्रीमो मायावती ने बंद कमरे में पार्टी नेताओं के साथ मिल कर बनाई यूपी चुनाव जीतने की रणनीति, लोगों को गाँव-गाँव और शहर-शहर में उनके घरों तक जाकर विपक्ष के खिलाफ सावधान करने करने की होगी प्लानिंग।

बच्चों के मन में जातिवाद का जहर भर रहें हैं अभिभावक, चंपावत की घटना बनी उदहारण

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नई दिल्ली- कहते हैं कि बच्चे कच्ची मिट्टी के उस घड़े की तरह होते हैं जिसे जिस सांचे में ढाला जाए वो उसी का आकार ले लेते हैं इसलिए बच्चों को आदर्श सांचे में ढालने की जिम्मेदारी परिवार के ऊपर होती है, लेकिन क्या हो जब यही परिवार बच्चों के दिमाग में जातीयता का जहर भरने लगे और उन्हें ऊंची और नीची जाति में भेद करना सीखा दें। ऐसा ही कुछ उत्तराखंड के स्कूल में पढ़ रहे बच्चों में देखने को मिला है। उत्तराखंड के चंपावत जिले के सुखीढांग के एक स्कूल में करीब 230 छात्र–छत्राएं पढ़ाई करते हैं। इस कॉलेज में कक्षा 6 से 8वीं तक के 66 बच्चों को मिड–डे मील के तहत खाना दिया जाता है। मिड दे मील का खाना तैयार करने की जिम्मदारी भोजनमाता की होती है जिसके लिए एक दलित महिला सुनीता देवी को स्कूल में नियुक्त किया गया। लेकिन बीते कुछ दिनों से मिड दे मील को खाने वाले बच्चों की संख्या घट कर आधी से कम हो गई, जिसका कारण है इन मासूम बच्चों के दिमाग में भरा जातिवाद का जहर। जो किसी और ने नहीं बल्कि उनके ही अभिभावकों ने ही भरा है। मिड डे मील बनानी वाली भोजनमाता के हाथों पहले दिन तो बच्चे खाना खा लेते हैं लेकिन अगले ही दिन, मिड डे मील खाने वाले 66 बच्चों में से 40 सवर्ण बच्चे दलित भोजनमाता के हाथ का बना हुआ खाना बच्चे खाने से मना कर देते हैं और फिर इन बच्चों के माता-पिता स्कूल आकर दलित महिला को भोजनमाता बनाए जाने को लेकर हंगामा करते हैं। इन सवर्ण बच्चों के अभिवावकों का कहना है कि उनके बच्चे दलित महिला द्वारा बने गया खाना नहीं खायेंगे। उनका कहना था कि जब स्कूल में मिड दे मिल खाने वाले बच्चों में सवर्ण बच्चों की संख्या ज्यादा है तो प्रशासन ने एक दलित महिला को भोजनमाता के पद पर क्यों रखा?
इस मामले के तूल पकड़ने और बच्चों के अभिभावकों की कड़ी आपत्ति जताने के बाद भोजनमाता के पद पर रखी गई दलित महिला सुनीता देवी को ये कह कर हटा दिया गया कि नियुक्ति में मानदंडों का पालन नहीं किया गया था। भोजनमाता के पद पर नियुक्त सुनीता देवी इस घटना के बाद बेहद डरी हुई हैं, उन्हें बच्चों के माता-पिता द्वारा अपमानित किया गया कि वो अब स्कूल जाना ही नहीं चाहती। उत्तराखंड में जातिगत भेदभाव की जड़े बेहद गहरी हैं। पिछले दिनों एक दलित को महज इस बात के लिए पीट कर मार डाला गया था क्योंकि उनसे सवर्णों के बीच बैठ कर खाना खाने की जुर्रत की थी। इससे पहले भी हॉकी खिलाड़ी वंदना कटारिया के परिवार को जाति सूचक गालियां देने का मामला सामने आया था। हम बात सिर्फ उत्तराखंड की ही नहीं कर रहे बल्कि देश के बाक़ी राज्यों में भी दलितों के साथ इस तरह की सैंकड़ों घटनाएं सामने आती रहती हैं। ये घटनाएं साबित करती हैं कि भले ही समय बदल गया हो लेकिन जातिवाद का ज़हर आज भी समाज में जिंदा है।

बसपा की बड़ी बैठक, इन मुद्दों पर बहनजी खोलेंगी अपने चुनावी पत्ते

 जब सभी दलों के प्रमुख नेता यूपी विधानसभा चुनाव को लेकर जनता के बीच हैं, हर कोई बसपा प्रमुख मायावती को लेकर सवाल कर रहा है। क्योंकि जिस तेजी से बाकी दलों के नेता चुनावी रैलियां कर रहे हैं, अभी बहनजी की बड़ी रैलियां शुरू नहीं हुई है। लेकिन रुकिये, बसपा प्रमुख जल्दी ही जनता के बीच पूरे दम-खम के साथ आने वाली हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती द्वारा 23 दिसंबर को पार्टी मुख्यालय पर बैठक बुलाए जाने की खबर है। इसमें प्रदेश के सभी मुख्य सेक्टर प्रभारियों के साथ प्रदेश के 75 जिलों के जिलाध्यक्ष मौजूद रहेंगे। खबर है कि इस बैठक के दौरान मायावती विधानसभा चुनाव की अपनी रणनीति का खुलासा करेंगी। बसपा प्रमुख यह भी ऐलान कर सकती हैं कि वह चुनाव प्रचार के लिए कब से निकलेंगी।

 23 दिसंबर को होने वाली बैठक में मायावती मुख्य सेक्टर प्रभारियों और जिलाध्यक्षों से फीडबैक लेकर जमीनी हकीकत का पता लगाएंगी। इसके आधार पर पार्टी आगे की रणनीति तय करेगी। पार्टी सूत्रों का कहना है कि इसके बाद ही मायावती चुनावी समर में प्रचार के लिए उतरेंगी। उनका कार्यक्रम भी इसके आधार पर तय किया जाएगा।

 सबकी नजर इस पर है कि बहनजी पूर्वांचल से चुनावी अभियान की शुरुआत करती हैं या फिर वह पश्चिमी यूपी को चुनती हैं। बहनजी इन दिनों लखनऊ में ही रहकर विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों की सूची को अंतिम रूप दे रही हैं। कई नामो पर पार्टी की मुहर लग चुकी है, जबकि कुछ सीटों को अंतिम रुप दिया जाना बाकी है। दूसरी तरफ बसपा सुप्रीमो के निर्देश पर पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्र प्रदेश की सभी सुरक्षित 86 सीटों पर सम्मेलन कर रहे हैं। बसपा की कोशिश है कि इन सीटों पर दलितों और ब्राह्मण समाज को साथ लाकर और मुस्लिम समाज को जोड़कर जीत हासिल की जा सकती है। ऐसे में बसपा प्रमुख का चुनावी प्रचार जोर पकड़ने से निश्चित तौर पर बसपा के कार्यकर्ताओं में उत्साह आएगा।

सीएम हेमंत सोरेन का फैसला, झारखंड में अब स्कूलों में बनेंगे जाति प्रमाण पत्र

 जाति प्रमाण पत्र देश के करोड़ों लोगों के लिए एक ऐसी जरूरत है, जिससे उनका भविष्य निर्धारित होता है। लेकिन हालिया वक्त में जाति प्रमाण पत्र को लेकर मुश्लिकें बढ़ने लगी थी। इस मुश्किल को खत्म करने के लिए झारखंड सरकार ने बड़ा फैसला किया है। झारखंड सरकार के नए फैसले के मुताबिक अब स्कूलों में ही जाति प्रमाण पत्र बन जाएंगे। झारखंड विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान मुख्‍यमंत्री हेमंत सोरेन ने इसकी घोषणा की। सीएम हेमंत सोरेन ने कहा कि 29 दिसंबर के बाद से सरकारी और निजी स्‍कूलों में ही प्रमाणपत्र बनवाए जा सकेंगे। सभी कक्षा के छात्र जाति प्रमाणपत्र बना सकेंगे।

 जाति प्रमाणपत्र बनाने के लिए स्‍व-घोषणापत्र को लेकर भाजपा विधायक नीलकंठ सिंह मुंडा ने विधानसभा सत्र के दौरान सवाल उठाया था, जिसके जवाब में मुख्यमंत्री ने यह ऐलान किया। भाजपा विधायक का कहना था कि बांग्‍लादेश से आने वालों के लिए स्‍व-घोषणापत्र और स्‍थानीय लोगों के लिए नहीं यह गलत है। इस पर मुख्‍यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा कि जाति प्रमाणपत्र पर सरकार ने संज्ञान लिया है। इसके साथ ही उन्‍होंने कहा कि 29 दिसंबर के बाद प्रदेश के निजी और सरकारी स्‍कूलों में छात्रों के जाति प्रमाणपत्र बनाए जा सकेंगे। यह सुविधा सिर्फ 8वीं या 9वीं कक्षा के छात्रों के लिए नहीं होगी, बल्कि सभी कक्षा के छात्र विद्यालय में ही जाति प्रमाणपत्र बनवा सकेंगे।

 प्रदेश सरकार के इस फैसले की सभी दलों ने सराहना की है। साथ ही छात्रों ने भी मुख्यमंत्री के इस बयान पर खुशी जताई है। गौरतलब है कि जाति प्रमाण पत्र बनाने का जो तरीका रहा है, उसके मुताबिक पहले छात्रों को तमाम लोगों से जाति प्रमाण पत्र के आवेदन को सत्यापित करवाना होता था। उसके बाद भी प्रमाण पत्र हासिल करने के लिए  तमाम अधिकारियों के चक्कर काटने पड़ते थे। लेकिन अब बदली स्थिति में स्कूलों में जाति प्रमाण पत्र बनने से छात्रों और उनके अभिभावकों की अनावश्यक भाग-दौड़ खत्म हो जाएगी।

बहुजन बुलेटिन: 20 दिसंबर 2021

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1- भाजपा को लगा झटका, नेता सुबोध राकेश ने छोड़ी, बसपा में हुए शामिल। उतराखंड चुनाव से पहले  भगवानपुर विधानसभा क्षेत्र के भाजपा नेता सुबोध राकेश ने बसपा का दामन थाम लिया है। बताया जा रहा है कि गाजियाबाद पहुंचकर सुबोध राकेश ने अपने समर्थकों के साथ बसपा की सदस्यता ली। सुबोध राकेश के बसपा में आने से जहां विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा को तगड़ा झटका लगा है तो वहीं बसपा कार्यकर्त्‍ता उत्साह में नजर आ रहे हैं। 2- खेत में चारा लेने गई दलित महिला से दो युवकों ने की रेप की कोशिश और नाकाम होने पर रेत दिया गला। ये मामला उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ से सामने आया है। आरोप है कि अलीगढ़ के थाना पिसावा इलाके में खेत में चारा लेने गई दलित महिला के साथ दो युवकों ने रेप की कोशिश की, लेकिन शोर सुनकर आते लोगों को देखकर, नाकाम महसूस कर उन्होंने महिला का गला रेता दिया। जिससे महिला की हालत गंभीर हो गई है। फ़िलहाल घायल महिला को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। 3- खुली जन-धन योजना की पोल, 8 लाख आदिवासियों के खाते में एक भी रुपया नहीं आया। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की अगुवाई में हुई एक बैठक के दौरान प्रदेश की आर्थिक प्रगति से जुड़ी एक रिपोर्ट पेश की गई जिसमें बताया गया है कि 1.23 करोड़ आबादी वाले आर्थिक रूप से कमजोर 9 आदिवासी जिलों में बीते 10 साल में 68.3 लाख बैंक खाते खोले गए है लेकिन इनमें से 8 लाख खातों में आजतक  एक रुपया भी जमा नहीं हुआ है जबकि इन खातों को खोलने में सरकार ने 8 करोड़ रु खर्च कर दिए। 4- ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटानयक ने दूर-दराज़ के आदिवासी बहुल जिलों के लिए ‘वायु स्वास्थ्य सेवा’ शुरू की है। इस योजना के तहत डॉक्टर दूर-दराज़ के इलाकों में जाकर गंभीर बीमारियों से ग्रस्त लोगों का इलाज करेंगे। सीएम पटनायक ने आदिवासी बहुल और माओवाद प्रभावित मल्कानगिरी जिले के लिए स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की टीम को ले जा रही एक उड़ान को रवाना करते हुए कहा है कि दूसरे जिलों को भी चरणबद्ध तरीके से इस कार्यक्रम में शामिल किया जाएगा। 5- भाजपा ने शुरू किया पिछड़ा सम्मेलन, पिछड़े वर्ग को साधने के लिये सभी जिलों में आयोजित किए जाएंगे कार्यक्रम। विधानसभा चुनाव 2022 के लिए भाजपा जातीय संतुलन बैठाने में लगी है और इसी के लिए पिछड़ा समाज सम्मेलन आयोजित  कर रही है। इन सम्मलनों मे भाजपा विभिन्न जाति- वर्ग तक अपनी सरकार की नीतियों और उपलब्धियां पहुंचाने का कार्य करेगी ताकि ओबीसी वोटरों का मन बदला सके।

जब ‘खुली सोच’ को लेकर डॉ आंबेडकर ने लड़ी थी ऐतिहासिक क़ानूनी लड़ाई….

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नई दिल्ली- हमारे समाज में यौन शिक्षा और खुल कर बोलने की आजादी होना, आज भी बहस का बड़ा मुद्दा है और कई बार ये बहसें हिंसात्मक भी हो जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये मसले समाज में आज ही, विवाद का कारण नहीं बने हैं बल्कि ये साल 1934 से ही समाज की आँखों में खटकते आ रहे हैं। हम उस समय की बात कर रहे हैं जब दलितों और वंचितों की आवाज़ उठाने वाले डॉ भीमराव आंबेडकर, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को न सिर्फ अपना समर्थन देते थे बल्कि उसके लिए क़ानूनी लड़ाई भी लड़ा करते थे। ये मामला एक पत्रिका से जुड़ा है जिसकी क़ानूनी लड़ाई डॉ आंबेडकर ने लड़ी थी। ये बात 20वीं सदी की शुरुआत की है जब महाराष्ट्र के रघुनाथ धोंडो कर्वे अपनी ‘खुले विचारों वाली’ पत्रिका के लिए रूढ़िवादियों के निशाने पर रहते थे। कर्वे अपनी इस ‘समाज स्वास्थ्य” नामक पत्रिका में यौन शिक्षा, परिवार नियोजन, नग्नता और नैतिकता जैसे उन विषयों पर लिखा करते थे जिस पर भारतीय समाज में खुले तौर पर चर्चा करना नामुमकिन था। कर्वे अपनी पत्रिका में सेफ सेक्स लाइफ और इसके लिए मेडिकल एडवाइस से जुड़े सवालों के जवाब तर्कसंगत और वैज्ञानिक रूप से दिया करते थे। कर्वे की इस पहल, उनकी सोच और उनकी इस पत्रिका से समाज के रूढ़िवादी लोग बेहद चिढ़ते थे और इसी वजह से उनके कई दुश्मन भी बन गये थे लेकिन कर्वे कभी निराश नहीं हुए और उन्होंने लिखने के साथ ही अपनी लड़ाई जारी रखी। फिर वो दिन भी आया जब कर्वे को 1931 में पहली बार रूढ़िवादी समूह ने उनके “व्यभिचार के प्रश्न” से जुड़े लेख को लेकर उन्हें अदालत में घसीटा। इसके लिए उन्हें गिरफ्तार किया गया और दोषी ठहराए जाने के बाद 100 रुपये जुर्माना भी लगाया गया। इसके बाद एक बार फिर फरवरी 1934 में कर्वे गिरफ़्तार किए गए। इस बार पत्रिका में पाठकों द्वारा उनकी पर्सनल सेक्स लाइफ से जुड़े, हस्तमैथुन और समलैंगिकता के सवालों के जवाबों पर रूढ़िवादीयों ने हंगामा मचा दिया और उन्हें फिर कोर्ट में घसीटा गया लेकिन इस बार कर्वे अकेले नहीं थे। इस बार उनके साथ थे मुंबई के वकील बैरिस्टर बीआर आंबेडकर।
रघुनाथ धोंडो कर्वे
डॉ आंबेडकर का कर्वे के साथ आना और इस लड़ाई को लड़ना भारत के सामाजिक सुधारों के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण क़ानूनी लड़ाई में से एक है जिसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए लड़ा गया था। आंबेडकर सिर्फ दलितों और वंचितों के नेता ही नहीं थे बल्कि वो पूरे समाज के लिए एक बेहतरीन सोच रखते थे। सभी वर्गों से बना आधुनिक समाज उनका सपना था और वो उसी दिशा में आगे बढ़ रहे थे। समाज स्वास्थ्य पत्रिका को लेकर शायद उन्होंने ये महसूस किया कि कट्टरपंथी ब्राह्मणवाद। व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के ख़िलाफ़ खड़ा था और इसलिए उन्होंने कर्वे का साथ देना सही समझा। इस बात को आप ऐसे भी समझ सकते हैं कि आंबेडकर ने 1927 में मनुस्मृति को जलाया था। क्योंकि वो मानते थे कि मनुस्मृति जैसा साहित्य व्यक्तिगत आज़ादी को दबाता है। कर्वे का मामला 28 फरवरी से 24 अप्रैल 1934 के बीच बॉम्बे हाई कोर्ट में चला और उस दौरान लंबी दलीलें चलीं। कर्वे के खिलाफ मुख्य आरोप, सवाल जवाब के जरिए अश्लीलता फैलाना था। जिस पर तर्क रखते हुए डॉ आंबेडकर ने कहा था कि अगर कोई यौन मामलों पर लिखता है तो इसे अश्लील नहीं कहा जा सकता। हर यौन विषय को अश्लील बताने की आदत को छोड़ दिया जाना चाहिए। इस मामले में हम केवल कर्वे के जवाबों पर नहीं सोच कर, सामूहिक रूप से इस पर विचार करने की ज़रूरत है। वहीँ, जब न्यायाधीश ने उनसे पूछा कि हमें इस तरह के विकृत सवालों को छापने की जरूरत क्यों है और यदि इस तरह के सवाल पूछे जाते हैं तो उनके जवाब ही क्यों दिये जाते हैं?  इस पर आंबेडकर ने कहा कि विकृति केवल ज्ञान से ही हार सकती है। इसके अलावा इसे और कैसे हटाया जा सकता है? इसलिए कर्वे को सभी सवालों को जवाब देने चाहिए थे। जरा सोचिए कि उस दौर में जब कोई भी यौन संबंधों पर बात करने से डरता था तब आंबेडकर समलैंगिकता पर अपने विचार रख रहे थे। भले ही कर्वे और डॉक्टर आंबेडकर 1934 की वो लड़ाई कोर्ट में हार गये थे लेकिन आज भी ऐसी लड़ाईयां हमारे आज और आने वाले कल को प्रभावित करती हैं और उनका असर किसी भी परिणाम से परे होता है।

बिहार में हंगामा, बदलेगी सत्ता, तेजस्वी होंगे CM!

डीडी डेस्क- बिहार में क्या भाजपा-जदयू गठबंधन मुश्किल में है? क्या बिहार में सत्ता की बाजी पलटने वाली है? क्या बिहार में तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री बनने वाले हैं? इन तमाम कयासों के पीछे जो नाम है, वह है पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी का। जी हां, जीतन राम मांझी बिहार की राजनीति में एक ऐसा नाम है, जो एक बार मुख्यमंत्री बनने के बाद अब मुख्यमंत्री बनाने की भूमिका में आ गए हैं। खासकर हालिया सरकार में तो सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच सीटों का फासला इतना कम है कि हर विधायक की अहमियत दूल्हे जैसी हो गई है। जहां तक बिहार में सत्ता बदलने के कयास की बात है तो जीतन राम मांझी के एक बयान ने इस कयास को हवा दे दी है। दरअसल बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और आवाम मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जीतन राम मांझी ने तेजस्वी यादव की बेरोजगारी यात्रा का समर्थन किया है। तेजस्वी यादव नए साल में 14 जनवरी से बेरोजगारी यात्रा निकालने जा रहे हैं। इस यात्रा का समर्थन करते हुए मांझी ने कहा, “बिहार में सबसे ज्यादा बेरोजगारी है और अगर इस मुद्दे को उठाने के लिए तेजस्वी यादव यात्रा करते हैं तो इस पर सवाल उठाने का क्या मतलब है?” मांझी बस यहीं नहीं रुकें, बल्कि तेजस्वी का समर्थन करने के साथ ही मांझी ने नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली अपनी ही सरकार पर बेरोजगारी के लिए हमला भी बोला। हालांकि कहा यह भी जा रहा है कि हाल ही में ब्राह्मणों को लेकर जीतनराम मांझी ने जो विवादित बयान दिया था, और सरकार के भीतर से भी उसकी जिस तरह आलोचना हुई थी, मांझी उसी के जवाबी हमले में तेजस्वी का गुणगान कर रहे हैं। संभव है कि मांझी भाजपा-जदयू को यह साफ करना चाहते हैं कि अगर उन्होंने उन्हें छेड़ने की कोशिश की तो उनके पास रास्ते और भी हैं। जहां तक बिहार की राजनीति की बात है तो जिस दिन हिन्दुस्तान आवाम मोर्चा के जीतन राम मांझी और VIP पार्टी के मुकेश साहनी अपना पाला बदल देंगे, उस दिन भाजपा-जदयू की सरकार गिर सकती है और राजद की सरकार बन सकती है।

मांझी के ‘हरामी’ वाले बयान पर बचाव में उतरे दिलीप मंडल, दिया ये तर्क…

नई दिल्ली- बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी का एक ताजा बयान खूब बवाल मचा रहा है। इस बयान में मांझी जहां दलितों में बढ़ रही धार्मिकता को लेकर उन्हें कोस रहे हैं तो वहीं ब्राह्मणवाद पर भी बरसे हैं। भावनाओं में बहते हुए मांझी ब्राह्मणों के लिए ऐसा शब्द बोल गए हैं, जिसके बाद बिहार में बवाल मचा है। इस विवाद के बाद, ब्राह्मण समाज जहां मांझी को चौरतफा घेरने में जुटा है तो वहीं उन्हें बिहार के भाजपा-जदयू गठबंधन से बाहर करने की मांग भी उठने लगी है। मांझी का यह बयान 18 दिसंबर का है, जब वह एक सभा को संबधित कर रहे थे। मांझी ने क्या कहा, आप खुद देखिए-
यह पहली बार नहीं है, जब जीतनराम मांझी ने विवादित बयान दिया है बल्कि मांझी राम और शराब को लेकर भी विवादित बयान दे चुके हैं। माँझी कई बार कह चुके हैं कि वह राम को भगवान नहीं मानते। वह सवर्ण जातियों को विदेशी मूल का भी बता चुके हैं। मांझी का मानना है कि केवल दलित और आदिवासी ही स्वदेशी हैं। मांझी के विवादित बयान के बाद जहां सवर्णों को मिर्ची लगी है तो बहुजन समाज के भीतर से कई लोग मांझी के बचाव में सामने आ गए हैं। वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने मांझी के बयान का बचाव करते हुए कहा- बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री माननीय जीतन राम माँझी जी और उनके पुरखों का हिंदू धर्म के साथ Interaction जो अनुभव रहा है, उसके हिसाब से वे जैसी आलोचना कर रहे हैं, वह बहुत विनम्र है। बग़ैर गाली दिए और अपशब्द बोले उन अनुभवों को दर्ज नहीं किया जा सकता। तो कई लोगों का कहना है कि जीतनराम मांझी का यह कहना बिल्कुल सही है कि ब्राह्मण पुरोहित वैसे तो दलितों से जातिवाद और छूआछूत करते हैं लेकिन जब उनसे दक्षिणा लेनी होती है तो उनका जातिवाद खत्म हो जाता है।