DU: 7वीं लिस्ट होगी जारी, आरक्षित सीटों पर होगा फोकस

नई दिल्ली। दिल्ली यूनिवर्सिटी में अब तक करीब 55,500 सीटें भर चुकी हैं लेकिन फिर भी यूनिवर्सिटी एडमिशन की सातवीं लिस्ट निकालेगी. DU की एडमिशन कमेटी के चेयरमैन डॉ एम के पंडित ने बताया कि 7वीं कटऑफ लिस्ट के बाद 27 और 28 जुलाई को एडमिशन होंगे. इस लिस्ट में कॉलेज ज्यादातर reserved category को फोकस करेंगे.

डीयू की छठी लिस्ट में करीब 4 हजार एडमिशन हुए हैं. कॉलेजों का कहना है कि कई कोर्स में ओवर एडमिशन हो गए हैं. इसकी वजह से एडमिशन ज्यादा नजर आ रहे हैं, जबकि अभी कई कोर्स में जनरल के लिए भी सीटें खाली हैं. इसके अलावा आउट ऑफ कैंपस और ईवनिंग कॉलेज में कॉमर्स समेत कुछ कोर्सेज में ऐडमिशन कैंसल भी हुए हैं. आपको बता दें कि फीस के साथ अब तक करीब 53500 छात्रों ने एडमिशन कनफर्म कर लिया है. हालांकि अब भी रिजर्व्ड कैटिगरी की सीटें खाली हैं.

 

 

टीवी शो ‘एक श्रृंगार स्वाभिमान’ के सेट पर तेंदुए ने किया हमला

मुंबई। कलर्स के फेमस टीवी शो ‘एक श्रृंगार स्वाभिमान’ के सेट पर बड़ा हादसा हो गया है. शो के सेट के पास से एक तेंदुए ने दो साल के बच्चे को अपना शिकार बनाया और उसे मार डाला. मुंबई स्थित गोरेगांव के फिल्मसिटी में ‘एक श्रृंगार स्वाभिमान’ का सेट बना हुआ है जिस पर काफी लोग काम कर रहे थे पर बारिश के कारण लोगो की आवाजाही कम थी चूकिं सेट के चारों तरफ घना जंगल है. जहां जंगली जानवर आते जाते रहते हैं. अंदर शूटिंग जारी थी पर बाहर एक बड़ा हादसा हो गया. बताया जा रहा है कि सेट के पास एक दो साल का बच्चा खेल रहा था तभी अचानक एक तेंदुआ आ गया और बच्चे को गर्दन से पकड़कर अपने साथ ले गया. लोग जब तक बच्चे को बचाने के लिए आते तब तक वह उसे लेकर भाग चुका था हालांकि तेंदुए ने कुछ दूर जाने के बाद बच्चे को छोड़ दिया लेकिन तब तक बच्चे के मौत हो चुकी थी. इस घटना के बाद सारे एक्टर औऱ को-स्टार सभी लोग दुखी हैं और उन्होंने माना कि ऐसा किसी के साथ भी हो सकता है.    

योगी के शपथ ग्रहण में खर्च हुए 1.81 करोड़, होगी जांच

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शपथ ग्रहण समारोह में किया गया था जिसकी खबर मीडिया में आने के बाद सरकार की किरकीरी हो रही है. इसकी जांच के आदेश दे दिए गए हैं. जानकारी के मुताबिक मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण का जिम्मा लखनऊ विकास प्राधिकरण का होता है. LDA ने इस कार्यक्रम पर एक करोड़ इक्यायासी लाख रूपये खर्च कर दिए. इस खर्च के लिए प्राधिकरण के एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी शक के घेरे में है. सूत्रों के मुताबिक एलडीए के तत्कालीन उपाध्यक्ष सत्येंद्रवीर सिंह पर इस मामले मे गड़बड़ी करने का शक है.

राज्य में बीजेपी की सरकार बनने के बाद 19 मार्च को लखनऊ के स्मृति उपवन में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शपथ ली थी. जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती समेत बीजेपी के दिग्गज नेता शामिल हुए थे.

शपथ ग्रहण समारोह पर खर्च ये रकम मंच, टेंट, ऑडियो सिस्टम, सुरक्षा, फ्लीट और खाने-पीने की व्यवस्था पर खर्च हुई थी. सूत्रों के मुताबिक ये रकम पहले खर्च की रकम से काफी ज्यादा है. इसके मुकाबले साल 2012 में अखिलेश यादव के शपथ ग्रहण समारोह में सिर्फ 89.9 लाख रुपये खर्च हुए थे.

शक है कि इस मामले में फर्जी बिल या फिर ज्यादा दाम पर चीजों को लिया गया है. ये मामला सामने तब आया जब लखनऊ डेवलपमेंट अथॉरिटी ने सचिवालय को शपथ ग्रहण समारोह का बिल पिछले हफ्ते भेजा. शक होने पर उसकी जांच के आदेश दिए गए हैं जिसके बाद घोटाले के आरोपी का जल्द पता लग जायेगा.

 

सरकार ने माना- मोदी के आने से धर्म-जाति के नाम पर हिंसा 41 फीसदी बढ़ी

नई दिल्ली। बीजेपी सरकार आने के बाद सांप्रदायिक हिंसा जिस तेजी से बढ़ी है इसकी निंदा विदेश तक में हो रही है पर ताजा जानकारी गृह राज्य मंत्री गंगाराम अहिरवार ने जुटाई है जो चौकानें वाली है. नरेंद्र मोदी सरकार ने मंगलवार को लोक सभा में जानकारी दी कि पिछले तीन सालों में सांप्रदायिक, जातीय और नस्ली हिंसा को बढ़ावा देने वाली घटनाओं में 41 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है.

गृह राज्य मंत्री गंगाराम अहिरवार द्वारा सदन में पेश की गई राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के अनुसार साल 2014 में धर्म, नस्ल या जन्मस्थान को लेकर हुए विभिन्न समुदायों में हुई हिंसा की 336 घटनाएं हुई थीं. साल 2016 में ऐसी घटनाओं की संख्या बढ़कर 475 हो गई. अहिरवार एक गौरक्षकों द्वारा की जा रही हिंसा और सरकार द्वारा उन पर रोक लगाने से जुड़े एक सवाल का जवाब दे रहे थे.

अहिरवार ने सदन में कहा कि सरकार के पास गौरक्षकों से जुड़ी हिंसा का आंकड़ा नहीं है लेकिन सांप्रदायिक, जातीय या नस्ली विद्वेष को बढ़ाने वाली हिंसक घटनाओं का आंकड़ा मौजूद है. मंत्री अहिरवार द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार राज्यों में ऐसी घटनाओं में 49 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई. साल 2014 में राज्यों में 318 ऐसी घटनाएं हुई थीं जो साल 2016 में बढ़कर 474 हो गईं. वहीं दिल्ली समेत सभी केंद्र शासित प्रदेशों में ऐसी घटनाओं में भारी की कमी आई. राजधानी और केंद्र शासित प्रदेशों में  साल 2014 में ऐसी हिंसा की 18 घटनाएं हुई थीं लेकिन साल 2016 में ऐसी केवल एक घटना हुई.

उत्तर प्रदेश में सांप्रादायिक, जातीय और नस्ली विभेद को बढ़ावा देने वाली हिंसक घटनाओं में तेजी से बढ़ोतरी हुई. यूपी में तीन सालों में ऐसी घटनाएं 346 प्रतिशत बढ़ीं. साल 2014 में यूपी में ऐसी 26 घटनाएं हुई थीं तो साल 2016 में ऐसी 116 घटनाएं हुईं. उत्तराखंड में साल 2014 में ऐसी केवल चार घटनाएं हुई थीं लेकिन साल 2016 में राज्य में ऐसी 22 घटनाएं हुईं. यानी उत्तराखंड में ऐसी घटनाओं में 450 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई जिसके बाद बीजेपी के लिए दिक्कतें बढ़ने के पूरे आसार हैं.

   

6 किमी पैदल ले जाने पर भी नहीं हुआ इलाज, आदिवासी बच्चे की मौत

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बारन। भाजपा शासित राज्य राजस्थान में इलाज न होने के कारण सात महीने के आदिवासी बच्चे की मौत हो गई. उसके रिश्तेदार छह किलोमीटर तक पैदल अपने कंधे पर रखकर उपचार के लिए उसे एक स्वास्थ्य केंद्र ले गए थे. अफसरों ने हालांकि परिवार के आरोपों को खारिज कर दिया. उन्होंने कहा कि बच्चा निमोनिया से पीड़ित था और एक चिकित्सक ने दवाएं लिखीं. उसने बच्चे को सीएचसी में उनसे भर्ती कराने को भी कहा था लेकिन वे घर चले गए.

बच्चे की दादी कोसाबाई के अनुसार उनका पौत्र सनी देओल सहारिया बीते रविवार से कफ और सर्दी से पीड़ित था. कोसाबाई सोमवार को अपने पति और सनी की मां सुमंताबाई के साथ बच्चे को कंधे पर रखकर अपने गांव चोरखादी से छह किलोमीटर दूर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में दिखाने के लिए ले गए. उन्होंने आरोप लगाया कि वे दोपहर के समय सीएचसी पहुंचे तो उन्हें सूचित किया गया कि ड्यूटी पर तैनात चिकित्सक घर चले गए हैं क्योंकि उनकी ड्यूटी समाप्त हो चुकी है.

जब वे चिकित्सक के आवास पहुंचे तो उन्होंने उनसे शाम पांच बजे तक उपचार के लिए इंतजार करने या बारन में जिला अस्पताल ले जाने को कहा, जो 80 किलोमीटर दूर है. उन्होंने इस उम्मीद में कुछ समय के लिए इंतजार किया कि जिला अस्पताल जाने के लिए एंबुलेंस की व्यवस्था हो जाएगी लेकिन असफल रहे. आखिरकार वे अपने गांव के लिए रवाना हुए ताकि धन की व्यवस्था करके बारन अस्पताल पहुंच सकें. लेकिन सीएचसी से रवाना होने के तुरंत बाद सनी की उनकी बांहों में मौत हो गई. उन्हें अपने कंधे पर रखकर बच्चे के शव को वापस गांव लाना पड़ा क्योंकि उन्हें एंबुलेंस नहीं मिल सका.

बारन के मुख्य चिकित्सा और स्वास्थ्य अधिकारी ने कहा कि मामला प्रकाश में आने के बाद उन्हें उप मुख्य चिकित्सा और स्वास्थ्य अधिकारी राजेंद्र मीणा को घटना की जांच के लिए मंगलवार सुबह घटनास्थल भेजा. मीणा ने दावा किया कि जब परिवार ने चिकित्सक अशोक मीणा से उनके आवास पर संपर्क किया तो उन्होंने कुछ दवाएं लिख दी थीं और परिवार से बच्चे को सीएचसी में भर्ती कराने को कहा था. मीणा ने कहा कि परिवार के सदस्य वहां जाने की बजाय सीधा अपने घर चले गए. बच्चा गंभीर रूप से निमोनिया से पीड़ित था. उन्होंने कहा कि परिवार के सदस्यों का बयान दर्ज किया जाना बाकी है.

नवजातों की जान बचाने के लिए सरकारी डॉक्टर करा रहे हैं हवन!

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हैदराबाद। भारत में अंधविश्वास के असर से सरकारी अस्पताल तक अछूते नही हैं इसका बड़ा उदहारण तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद के एक सरकारी अस्पताल में देखने को मिला. वहां के प्रसूति वार्ड में कई मौतों को भूत-प्रेत आदि का असर माना गया जिससे निपटने के लिए सोमवार को अस्पताल में बड़ा हवन कराया गया है.

इस हवन का आयोजन वरिष्ठ डॉक्टर और कर्मचारियों ने मिलकर कराया था. यह हवन गर्भवती महिलाओं और नवजातों के कल्याण के लिए हवन कराया गया. करीब 150 साल पहले इस गांधी अस्पताल को तीन वार्ड के साथ शुरू किया गया था. आज यह 1800 बिस्तरों वाला अस्पताल है. यहां मेडिकल कॉलेज भी है. आंध्र प्रदेश का यह पहला ऐसा अस्पताल है, जहां ओपन हार्ट सर्जरी हुई थी.

दो-तीन महीने पहले तक यहां के प्रसूति विभाग में रोजाना 25-30 डिलिवरी कराई जाती थी, अब यह संख्या करीब दोगुनी हो गई है. डिलिवरी के लिए यहां आने वालों की संख्या में बढ़ोत्तरी के पीछे तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) की KCR Kits योजना है. इस योजना के तहत सरकारी अस्पतालों में डिलिवरी करवाने पर मां और नवजात को नकदी के साथ कई तरह तरह के जरूरी सामान दिए जाते हैं. ऐसी ही योजना तमिलनाडु में मुख्यमंत्री रहते हुए जयललिता लेकर आई थीं.

हाल के सप्ताह में यहां गांधी अस्पताल में डिलिवरी के दौरान करीब जच्चा बच्चा की मौत हुई है. इन मौतों पर गांधी अस्पताल के उप अधीक्षक एन नरसिम्हा राव ने कहा, ‘हमारे यहां ज्यादातर गंभीर मामले सामने आते हैं, हम उन्हें डिलिवरी के लिए मना नहीं कर सकते, इसी वजह से मौतें हो रही हैं.’ प्रसूति वार्ड में करीब चार घंटे तक महामृत्युंजय हवन कराया गया. हवन में शामिल होने वाले डॉक्टर ने कहा कि हवन से मां और नवजात को दैवीय आशीर्वाद प्राप्त होगा. इस मामले में उप अधीक्षक एन नरसिम्हा राव ने कहा कि इस मामले की जांच कराई जाएगी. साथ ही जो भी दोषी पाया जाएगा उसपर कार्रवाई की जाएगी साथ ही कहा इस तरह के किसी भी अंधविश्वास को बर्दाश्त नहीं किया जायेगा.

हरियाणा में भी दलित प्रेम दिखाएंगे अमित शाह

चंडीगढ़। हरियाणा में लोकसभा और विधानसभा चुनाव की एक साथ तैयारी कर रही भाजपा दलितों को रिझाने का कोई मौका नहीं चूकेगी. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के हरियाणा दौरे के दौरान पार्टी जहां जाटलैंड में दस्तक देगी, वहीं दलितों को लुभाने की हरसंभव कोशिश करेगी. इस कड़ी में शाह किसी दलित कार्यकर्ता के घर भोजन कर सकते हैं.

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के हरियाणा दौरे के कार्यक्रमों को जींद में हो रही दो दिवसीय बैठक में अंतिम रूप दिया जाएगा. भाजपा के चाणक्य माने जाने वाले शाह 2 से 4 अगस्त तक हरियाणा में रहेंगे. पहले उनका दौरा चंडीगढ़ से शुरू होकर रोहतक में खत्म होना था, मगर अब तीनों दिन शाह रोहतक में ही रहेंगे.

रोहतक जाटलैंड होने के साथ-साथ पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा का गढ़ है. हुड्डा ने आजकल हर जिले में किसान पंचायतों का दौर शुरू कर रखा है. अपने रोहतक दौरे के दौरान शाह यहां मुख्यमंत्री मनोहर लाल व भाजपा प्रभारी अनिल जैन के साथ-साथ पार्टी के तमाम पदाधिकारियों तथा राज्य सरकार के मंत्रियों से फीडबैक लेंगे.

सरकार और संगठन के बारे में मिले फीडबैक के आधार पर शाह कार्यकर्ताओं तथा मंत्रियों को नया चुनावी मूलमंत्र देकर जाएंगे. बूथ विस्तारक योजना के तहत शाह रोहतक जिले के किसी भी बूथ पर खुद चलकर जा सकते हैं और वहीं कार्यकर्ताओं के साथ मीटिंग करेंगे. इसी तरह जिस दलित कार्यकर्ता के घर शाह भोजन करने जाएंगे, उसके नाम का चयन भी मौके पर ही होगा.

भाजपा अध्यक्ष जिस भी राज्य में जा रहे हैं, वहां के चुनावी व जातीय गणित के मद्देनजर सरकार और संगठन में नई जान फूंक रहे हैं. भाजपा के प्रांतीय मीडिया प्रमुख राजीव जैन के अनुसार राष्ट्रीय अध्यक्ष के कार्यक्रमों को अंतिम रूप दिया जाना बाकी है, लेकिन यह तय है कि अपने प्रवास के दौरान वे न केवल बूथ पर जा सकते हैं बल्कि किसी दलित कार्यकर्ता के घर भोजन कर उसका मान-सम्मान बढ़ा सकते हैं.

घाटकोपर बिल्डिंग हादसे का दोषी शिवसेना नेता गिरफ्तार

मुंबई। कल मुंबई के घाटकोपर इलाके स्थित दामोदर पार्क के पास एक बिल्डिंग गिरने के कारण कई लोगों की जान चली गयी थी. इस मामले में मुंबई ने शिवसेना नेता को अरेस्ट किया गया है. बता दें की जिस इमारत में यह हादसा हुआ, उसमें शिवसेना नेता का नर्सिंग होम था. आरोप है कि इस नर्सिंग होम में मरम्मत के दौरान तोड़फोड़ करने की वजह से इमारत गिर गई. शिवसेना नेता को बुधवार को कोर्ट में पेश किया जाएगा. इस हादसे में अब तक 17 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 30 से ज्यादा लोग घायल बताए जा रहे हैं. मलबे में दबे लोगों को निकालने का काम जारी है.

निकट निवासियों के अनुसार, ग्राउंड फ्लोर में स्थित नर्सिंग होम में मरम्मत का काम चल रहा था जिस कारण इमारत के खंभे कमजोर हो गए थे. 15 फ्लैटों वाली इस बिल्डिंग में स्थित नर्सिंग होम में तोड़-फोड़ का काम चल रहा था. इसी कारण मंगलवार सुबह इमारत ढह गई. नर्सिंग होम कथित तौर पर शिवसेना के स्थानीय नेता सुनील शितप का है. शितप के खिलाफ आईपीसी की धारा 304, 336 और 338 के तहत मामला दर्ज किया गया है. पुलिस के एक सीनियर अधिकारी ने बताया कि शितप को बीती रात हिरासत में लिया गया था और पूछताछ के बाद गिरफ्तार कर लिया गया. वहीं, घटना की जांच के लिए डेप्युटी म्युनिसिपल कमिश्नर समेत 2 सदस्यों की टीम बनाई गई है, जो 15 दिन में रिपोर्ट देगी.

मिली जानकारी के मुताबिक, कुछ दिनों पहले नर्सिंग होम के मालिक सुनील सितप ने भाड़े पर चल रहे नर्सिंग होम को खाली करवा लिया था. आरोप है कि उस जगह पर गेस्ट हाउस बनवाया जा रहा था. यह भी आरोप है कि यह फेरबदल बीएमसी की अनुमति के बिना हो रहा था. मनमाने ढंग से किए जा रहे बदलाव में बिल्डिंग को काफी नुकसान पहुंचाया गया था जिस कारण यह बड़ा हादसा हुआ, दोषी नेता को गिरफ्तार कर मुकदमा कायम कर लिया गया है.

‘जंगल में छिपने वाले आदिवासी और सूअर खाने वाले दलित बने’

  • भगत सिंह ‘कम्युनिकेशन गैप’ के शिकार थे, वे राष्ट्रवादी थे, कम्युनिस्ट नहीं थे.
  • दलित शब्द में एक मार्क्सवादी नज़रिया है.
  • महाभारत के समय सभी हिंदुओं की एक ही जाति थी–ब्राह्मण.
ये विचार हैं भारत की समाज विज्ञान की शीर्ष शोध संस्था ‘इंडियन काउंसिल फॉर सोशल साइंस रिसर्च’ (आईसीएसएसआर) के चेयरमैन डॉक्टर ब्रज बिहारी कुमार के. उन्हें इसी साल मई में इस संस्था का प्रमुख बनाया गया है. समाज विज्ञान के क्षेत्र में अब तक प्रचलित और स्थापित लगभग सभी सिद्धांतों से डॉक्टर कुमार असहमत दिखते हैं, वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को ईमानदार मानते हैं लेकिन कहते हैं कि वे संघ से जुड़े नहीं हैं. उनकी नियुक्ति पर सवाल उठाए गए हैं, ‘चिंतन सृजन’ नाम की एक पत्रिका के संपादकीय लेखों में उन्होंने कई ऐसी ‘विवादित’ बातें लिखीं हैं जिन्हें कई अख़बारों ने उनकी नियुक्ति के समय छापा था . 76 साल के बीबी कुमार ने बीबीसी से बातचीत की शुरुआत में ही ज़ाहिर कर दिया कि अपनी नियुक्ति पर आए मीडिया कवरेज से वे ख़ुश नहीं हैं. आपकी अकादमिक यात्रा और सामाजिक विज्ञान से जुड़ाव के बारे में बताएं. मैंने बिहार के एक कॉलेज से केमिस्ट्री के लेक्चरर के तौर पर नौकरी शुरू की थी, फिर नागालैंड कोहिमा साइंस कॉलेज चला गया. आज से 39 साल पहले मैं नॉर्थ ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी की एकेडमिक काउंसिल का सदस्य था. तब एक मित्र के कहने पर एंथ्रोपॉलजी में एमएससी और पीचएडी दोनों की. फिर हिंदी में भी एमए किया. और वहीं से प्रिंसिपल पद पर रिटायर हुआ. समाज विज्ञान में शोध के क्षेत्र में आपका क्या योगदान रहा है? मैंने पूर्वोत्तर भारत की जनजातीय भाषाओं के कोश और व्याकरण देवनागरी में तैयार किया और प्रकाशित कराया. लगभग 13 हज़ार पृष्ठों का काम है. जाति व्यवस्था, इस्लाम, छोटे राज्यों के गठन पर मेरी किताबें हैं. मेरी 80 से अधिक पुस्तकें अमेरिकन लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस की सूची में शामिल हैं. लोगों ने मेरे बारे में कहा कि वे मुझे नहीं जानते. इस देश के लोग तो बहुतों को नहीं जानते. कुमारस्वामी और अरबिंदो को नहीं जानते. मुझे लोग जानें, ये मैं आवश्यक नहीं समझता. सामाजिक विज्ञान के शोध में हमसे कुछ ग़लतियां हुई हैं? बहुत कुछ अच्छा भी हुआ है, ग़लतियां भी हुई हैं. हम सर्वे कराने जा रहे हैं. सबसे बड़ी ग़लती ये है कि बहुत से विषयों पर कई-कई रिसर्च और डुप्लीकेशन हैं और बहुत सारे विषय अनछुए हैं. मुझे लगता है कि प्राथमिकता बदलने की ज़रूरत है. बहुत से लोगों ने बहुत अच्छा काम किया है. धर्मपाल का ज़िक्र करूंगा. उन्होंने सर्वे करके पाया कि हर गांव में पारंपरिक स्कूल होते थे और उनमें हर जाति के बच्चे पढ़ते थे. सामने आया कि अंग्रेज़ों के आने के पहले हमारे यहां शिक्षा का स्तर अच्छा था. अंग्रेज आए तो 40 साल में शिक्षा तिहाई रह गई. लेकिन मिथक ये रचे गए कि हिंदुओं ने अपनी तथाकथित नीची जाति के लोगों को पढ़ने नहीं दिया. क्या हमें धर्मपाल को पढ़ना नहीं चाहिए? लेकिन हमारी मुख्यधारा के अकादमिक लोग उनका बहिष्कार करते हैं. उनका नज़रिया औपनिवेशिक है. भारत में दलितों की मौजूदगी आप कब से मानते हैं? मैं विदेशी लेखक अल बरूनी से बात शुरू करूंगा. वो मध्य एशिया से एक हजार वर्ष पहले भारत में आए थे. उन्होंने कहा है कि भारत में केवल चार जातियां हैं. आठ अन्य लोगों की बात भी की है, लेकिन हिंदुओं में सिर्फ़ चार जातियों का ज़िक्र किया है और लिखा है कि वे लोग एक स्थान पर भोजन करते थे. तो छुआछूत कहां रही? ये उल्लेख एक विदेशी मुसलमान का है. फिर दस हज़ार जातियां बाद में कैसे बन गईं. इसके दो कारण रहे. हमारे यहां श्रेणियां होती थीं. वे अपनी जाति से बाहर विवाह करते थे, जैसे सुनार और लुहार में आपस में विवाह कर लेते थे. बाद में वे अंतर्विवाही बन गए. एक दूसरी वजह थी कि हिंदुओं ने ख़ुद में विश्वास करना छोड़ दिया. अल बरूनी ने कहा है कि महमूद के आक्रमण से हिंदू धूल की तरह बिखर गए. उनकी विद्या दूर चली गई. फिर वे मानसिक सिकुड़न के शिकार हो गए और उन्होंने दूर के स्थानों पर विवाह करना बंद कर दिया. लेकिन अल बरूनी का पूरा टेक्स्ट कुछ और है, उन्होंने लिखा है कि लोग एक स्थान पर खाते थे, लेकिन वे चार अलग-अलग समूहों मेंऔर एक समूह के लोगों को दूसरे में घुलने-मिलने की इजाज़त नहीं थी. जिसकी व्याख्या आप चार जातियों के तौर पर कर रहे हैं, अल बरूनी शायद चार वर्णों की बात कर रहे थे? ऐसा है कि जाति शब्द हमारे साहित्य में उस रूप में नहीं आया है, जिस रूप में आप सोच रहे हैं. पाणिनि ने जाति के उल्लेख को गोत्र और चारण से जोड़ा है. अगर जाति को आप इतिहास में पीछे ले जाते हैं तो जाति वर्ण से अलग नहीं है. और अलग खाने की बात आप कहते हैं तो अल बरूनी ये भी लिखता है कि दो भाइयों में हिंसक द्वंद्व है तो उनके बीच में एक पर्दा लगा दिया जाए और वो एक पंगत में न खाएं. छुआछूत की जिस परंपरा का बार-बार जिक्र होता है, उसमें एक स्थान में लोग नहीं खाते हैं. मैं कहूंगा कि संपादकीय में बातें संक्षिप्त होती हैं. मेरी बहुत मोटी किताब है, उसे आप पढ़ें तो लगेगा कि चीज़ें उतनी सरल नहीं हैं. क्या आज अंतर्जातीय विवाह होने चाहिए? हमारे यहां ऐसा होता रहा है. निषेध नहीं था. महाभारत में कहा गया है कि हिंदुओं में एक ही जाति थी- ब्राह्मण. सभी ब्राह्मण थे. इसलिए तथाकथित दलित, वैश्य, ब्राह्मण और क्षत्रिय के बीच आपस में विवाह नहीं होना चाहिए, इसे मैं नहीं मानता. दलित के आगे आपने तथाकथित दलित क्यों लगाया? इस शब्द में एक मार्क्सवादी नज़रिया है. मैं नहीं मानता कि एक वर्ग के साथ अन्याय नहीं हुआ. हुआ है. लेकिन कुछ बदलाव आए हैं, उसकी स्वीकृति तो आप नहीं देते. आज जो कुछ लिखा जा रहा है, क्या उसमें अंबेडकर और गांधी की स्वीकृति है? आप मानते हैं कि अंबेडकर के लाए आरक्षण से बदलाव आया है? आरक्षण की स्वीकृति है. कुछ लोग स्वीकृत नहीं करते हैं, लेकिन वे कम हैं. आरक्षण में ग़लतियां भी होती हैं. साधन संपन्न वर्ग अगर सब कुछ खा जाए तो उस वर्ग के लोगों को भी सोचना चाहिए. प्रयास उधर से होना चाहिए. जो सच में वंचित है उसे लाभ मिले. आपने ऐसा भी लिखा था कि मुग़लों के हमले की वजह से आदिवासी और दलित अस्तित्व में आए? अत्याचार के डर से हिंदू जंगलों में भागे और बहुत से हिंदू आदिवासी बन गए. इसका बड़ा भारी डेटा दिया है इतिहासकार अवकेश लाल ने. इसका एक और पहलू है जिसका उल्लेख मैंने भी किया है. वो ये है कि बहुत से हिंदुओं ने मुसलमानों के डर से सूअर का मांस खाना शुरू किया. उनका सामाजिक दर्जा नीचे हो गया और उनमें सभी जातियों के लोग थे. तीसरी बात, यहां समझने की है कि हिंदू जाति व्यवस्था में ऊपर जाने की प्रवृत्ति भी थी और नीचे आने की भी. मोबिलिटी दोतरफ़ा थी. मुग़ल तो भारत में बहुत बाद में आए. लेकिन हज़ारों साल पहले लिखी गई मनुस्मृति में दलितों का ज़िक्र है? आप 14वीं या 15वीं शताब्दी में ‘मनुस्मृति’ का कहीं कोई ज़िक्र पाते हैं. जितना अंग्रेज़ों ने उसे महत्व दिया. अंग्रेज़ों ने एक साज़िश के तहत मनुस्मृति को स्वीकृति दी. मनुस्मृति को आप पढ़िए. आप पाएंगे कि बहुत सहजता से बातें चल रही हैं और अचानक एक रूखापन आता है. उसमें बहुत कुछ क्षेपक है (बाद में जोड़ा गया). उस पर हमारे विद्वान अध्ययन नहीं कर रहे हैं. आप कह रहे हैं कि मनुस्मृति को संपादित किया गया? संपादित नहीं किया गया. उसमें जोड़ दिया गया. बहुत कुछ जोड़ा गया. उदाहरण मैं देता हूं. तुलसी की रामायण में शंबूक का उल्लेख नहीं है. अकेला संस्करण जो बॉम्बे से छपा, उस आदमी को अंग्रेज़ों ने पुरस्कृत किया. इस साज़िश से हम आंख मूंद नहीं सकते. क्षेपक की या चीज़ों को जो़ड़ने की बातें इस देश में छिपकर नहीं हुई हैं. उन पर रिसर्च होना चाहिए. लेकिन मनुस्मृति में एक ही अपराध के लिए ब्राह्मणों को कम सज़ा और शूद्रों को अधिक है. ब्राह्मणों को ज़्यादा दंडित करने का प्रावधान है. आप समग्रता में पढ़िए चीज़ों को. एक और बात. ब्राह्मण हर जाति में होता है. आप वाल्मीकि को पढ़िए. वो लिखते हैं कि रावण की अर्थी जा रही है और उसके पीछे राक्षस कुल के यजुर्वेदी ब्राह्मण अग्नि लेकर चल रहे हैं. जब राक्षस कुल में ब्राह्मण हो सकता है तो नस्ल कहां आई, सामाजिक दर्जा कहां रहा. जिस मोबिलिटी का ज़िक्र आप कर रहे हैं, उसके आधार पर क्या हम तथाकथित नीची जातियों को तथाकथित ऊंची जातियों में प्रवेश दे सकते हैं? आज कई जाति क्लस्टर के लोग मिल रहे हैं, समूह बना रहे हैं. जैसे ओडिशा का तेलियों का संगठन हुआ, कई तेलियों की जातियां जो एक दूसरे में शादियां नहीं करती थीं, वे साथ मिल गईं. यादवों में भी ऐसा ही बदलाव आया. लेकिन वे सभी समाज व्यवस्था के चौथे पायदान पर ही थीं और अब भी वही हैं. सिर्फ आपस में दूरियां घटी होंगी, लेकिन उनका सामाजिक दर्जा कहां बढ़ा? चौथा पायदान उतना बड़ा नहीं था. तीसरे से लोग चौथे में गए हैं. यानी नीचे की ओर मोबिलिटी थी, इसे आप स्वीकृत करें. और विवाह हो रहे हैं. अंतर्जातीय विवाह हो रहे हैं, उनमें सामाजिक स्वीकृति मिल रही है. मार्क्सवादी इतिहासकारों से आप ख़ासे नाराज़ हैं? मार्क्सवादी इतिहासकार औपनिवेशिक इतिहासकारों की नकल हैं. वो एक सिक्के के दो पहलू हैं. दोनों में कोई अंतर नहीं है. मार्क्स ने ब्रिटिश साम्राज्य की तारीफ़ की है. उसके कंस्ट्रक्टिव और डिस्ट्रक्टिव दोनों पहलुओं की तारीफ की है. वो उनके चेले हैं. इससे ज़्यादा मैं कुछ नहीं बोलूंगा. लेकिन भगत सिंह परंपरावादियों के प्रिय कैसे बने हुए हैं, जबकि उन्होंने खुलेआम मार्क्सवादी विचार लिखे हैं? नास्तिकवाद का उल्लेख आपने किया तो ये बतलाइए कि चार्वाक क्या मार्क्स के चेले थे. मैं आपसे पूछता हूं कि नास्तिक परंपरा तो बहुत पुरानी परंपरा है. वो कब से मार्क्स के शिष्य बन गए. लेकिन भगत सिंह ने अपने लेखों में मार्क्स को कोट किया है. मार्क्स की बात छोड़िए. जिस व्यवस्था में लाखों लोगों को मार डाला गया. सोवियत व्यवस्था इतनी क्रूर व्यवस्था थी. बहुत से अच्छे लोग भी उसमें विश्वास करते थे. उसको कम्युनिकेशन गैप कहते हैं. जानकारी पूरी तरह से स्थान पर नहीं आ पाई. भगत सिंह उस कम्युनिकेशन गैप के शिकार थे? ज़रूर थे. कई मामलों में थे. मार्क्स को कई लोगों ने अच्छा माना. मैंने एक किताब की समीक्षा लिखी थी, किताब का नाम अभी याद नहीं आ रहा पायनियर में छपी है. तथ्य यही है कि वो राष्ट्रवादी थे. उनका साम्यवाद से कुछ लेना देना नहीं था. मौजूदा सरकार कैसा काम कर रही है? प्रधानमंत्री मोदी फ़ैसले लेने वाले प्रधानमंत्री हैं. इसके लिए हौसला चाहिए. कई तो सामाजिक आंदोलन के रूप में उनकी पहल हैं. उसके परिणाम बहुत समय लेते हैं. दस साल-बीस साल. उन्होंने जोखिम भरे कदम लिए हैं. जैसे नोटबंदी को आप लें तो कोई कमज़ोर प्रधानमंत्री वो कदम नहीं उठा सकता था. और इस सरकार के मंत्रियों के बारे में कोई घोटाले जैसी बात भी नहीं कही गई है. लेकिन विपक्ष गोरक्षा के मुद्दे पर घेर रहा है? गोरक्षा होनी चाहिए. लेकिन उसके नाम हिंसा नहीं होनी चाहिए. अगर हिंसा होती है तो मुझे नहीं लगता कि प्रधानमंत्री या उनके कैबिनेट के लोग इसमें शामिल हैं. समाज है. हर समाज में विकृत बर्ताव वाले लोग होते हैं और उसका प्रतिकार भी सरकारी मशीनरी करती है. लेकिन उसका दोष प्रधानमंत्री या कैबिनेट पर नहीं लगाया जा सकता. क्या आपने प्रधानमंत्री को सबसे बेहतर प्रधानमंत्री कहा था? मैंने एक संपादकीय में लिखा था कि ‘मोदी को बर्दाश्त करना सीखो.’ मेरा ये दृढ़ विश्वास है कि मोदी पर विश्वास करके, उन पर लगातार आक्रमण न करके, हम उन्हें बर्दाश्त करना सीखेंगे तो देश का भला होगा. प्रधानमंत्री पूरी क्षमता से देश और समाज का काम करेंगे. मिथक और विज्ञान को जोड़ने के प्रयासों पर आपका क्या सोचना है? प्रधानमंत्री गणेश की ‘सर्जरी’ का उदाहरण दे चुके हैं. सुश्रुत को बहुत लोग पहला सर्जन बताते हैं. सुश्रुत सच में पहले सर्जरी करने वाले थे. इन चीज़ों को स्कूलों में पढ़ाया नहीं जाता. जानकारी के बीच में एक गैप है. इसकी जानकारी स्कूलों में बच्चों को होनी चाहिए. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में आप क्या सोचते हैं? मैं कभी आरएसएस का सदस्य नहीं रहा. लेकिन मैं ये भी मानता हूं कि संघ के लोग बड़े ईमानदार लोग हैं. ऐसा हमेशा मानता रहा. बाकी नासमझ और समझदार हर विचारधारा में हैं. यह साक्षात्कार बीबीसी से साभार लिया गया है. बीबीसी संवाददाता कुलदीप मिश्र ने आईसीएसएसआर के चैयरमेन ब्रजबिहारी कुमार का साक्षात्कार लिया है.

राष्ट्रपति चुनाव के बाद जयश्री राम का नारा लगना कितना खतरनाक?

नई दिल्ली। रामनाथ कोविंद मंगलवार को देश के 14वें राष्ट्रपति बन गए. संसद के सेंट्रल हॉल में आयोजित कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस जेएस खेहर ने उन्हें शपथ दिलवाई. यहां तक सब कुछ नियम और परंपरा के मुताबिक हुआ. लेकिन राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान एक ऐसी बात भी हुई जो न तो भारत की परंपरा रही है और न ही इसे सही ठहराया जा सकता है.

रामनाथ कोविंद के राष्ट्रपति पद का शपथ लेने के बाद भाजपा के तमाम नेताओं ने जयश्री राम के नारे लगाए. असल में देश के राष्ट्रपति के चुनाव के बाद भाजपा द्वारा लगाया जाने वाला यह नारा भाजपा के एजेंडे को दर्शा रहा है. यह इसलिए भी चुभने वाली बात है, क्योंकि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है. और एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में एक धर्म विशेष से जुड़े व्यक्ति के नारे लगाना, कहीं से भी सही नहीं ठहराया जा सकता.

बाद में कांग्रेस और अन्य दल के नेताओं ने इस पर आपत्ति भी दर्ज कराई. कांग्रेस पार्टी ने इस बात को लेकर भी अपनी आपत्ति दर्ज कराई की नवनिर्वाचित राष्ट्रपति ने देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का नाम नहीं लिया.

खुद दलित विरोधी बीजेपी मुझ पर उल्टा इल्जाम लगा रही है: सिंधिया

भोपाल। बीजेपी पर दलित विरोधी होने को लेकर लगातार सवाल उठते रहें हैं पर अब कांग्रेस के बड़े नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया जो दलित मुद्दो पर लगातार अपनी बात रखते हैं उनको दलित विरोधी साबित करने के लिए बीजेपी खूब जोर लगा रही है. मध्य प्रदेश के गुना संसदीय क्षेत्र से कांग्रेस सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मंगलवार को बीजेपी पर जबरदस्त निशाना साधा. उन्होंने कहा कि बीजेपी अगर साबित करे दें कि वह दलित विरोधी हैं तो मैं सदन की सदस्यता से इस्तीफा दे दूंगा. उन्होंने मध्य प्रदेश में एक घटना पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के आरोपों में भाजपा के दो सांसदों के खिलाफ विशेषाधिकार प्रस्ताव भी दायर किया. सोमवार को प्रश्नकाल के दौरान बीजेपी सांसद विरेंद्र कुमार तथा मनोहर उतवल ने इस मामले को उठाते हुए दावा किया कि सिंधिया ने संवेदनशील टिप्पणियां का प्रयोग किया और मध्य प्रदेश में ट्रॉमा सेंटर का उद्घाटन में दलित विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का दावा किया. अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज करते हुए सिंधिया ने कहा कि उनके ऊपर लगे आरोपों को आधारहीन और गलत बताते हुए कहा कि यह सदन के सम्मानित सदस्य की गरिमा का अपमान है. विशेषाधिकार प्रस्ताव में सिंधिया ने कहा कि यह आरोप सदन के अन्य सदस्यों और देश भर में टेलीविजन पर लोकसभा की कार्यवाही को देखने वाले लाखों लोगों को निर्दयतापूर्वक गुमराह कर रहे हैं. बीजेपी ने दावा किया था कि कांग्रेस ने दलित बीजेपी विधायक गोपीलाल जाटव द्वारा लोकार्पण किए जाने के बाद ट्रॉमा सेंटर को कथित तौर पर गंगाजल से धुलवाया था. इस मामले को लेकर मध्य प्रदेश विधानसभा में भी सोमवार को इस मुद्दे को लेकर जमकर हंगामा हुआ.

ट्रॉमा सेंटर का 22 जुलाई को सिंधिया को लोकार्पण करना था, मगर एक दिन पहले भाजपा विधायक जाटव ने लोकार्पण कर दिया. इस पर सिंधिया के सांसद प्रतिनिधि कथित तौर पर गंगाजल से ट्रॉमा सेंटर को गंगाजल से धुलवाने का बयान दिया. इसे भाजपा ने मुद्दा बना लिया. सांसद प्रतिनिधि को पद से हटाने के साथ कांग्रेस से निष्कासित किया जा चुका है. इस मामले में सिंधिया ने नंद कुमार चौहान को कानूनी नोटिस भी भेजा

कोविंद ने दिया विवादित भाषण, दीनदयाल उपाध्याय की तुलना गांधी से करने पर भड़की कांग्रेस

नई दिल्ली। नए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के शपथग्रहण के बाद पढ़े गए भाषण को लेकर राज्यसभा में ज़बरदस्त हंगामा हुआ. राष्ट्रपति ने दीनदयाल उपाध्याय की तुलना महात्मा गांधी से की थी, जो कांग्रेस को रास न आई और आज राज्यसभा में आनंद शर्मा ने इस पर सवाल उठाए, जिसके जवाब में अरुण जेटली उन पर भड़क गए और दोनों के बीच काफ़ी देर तक नोक-झोंक हुई. राष्ट्रपति के भाषण में जवाहर लाल नेहरु और इंदिरा गांधी का नाम न लेने पर भी कांग्रेस भड़क गई.

दरअसल, मामला यह है कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मंगलवार को शपथग्रहण के तुरंत बाद राष्‍ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अपने भाषण में राष्ट्रपिता महात्‍मा गांधी और दीनदयाल उपाध्‍याय का एक साथ ज़िक्र किया था, जिस पर कांग्रेस ने आपत्त‍ि जताई थी, और बुधवार को राज्‍यसभा में कांग्रेस नेता आनंद शर्मा ने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने (महात्मा) गांधी और (पंडित जवाहरलाल) नेहरू का अपमान किया है. आनंद शर्मा के इस आरोप का जवाब देने के लिए वित्तमंत्री अरुण जेटली खड़े हुए और उसके बाद हंगामा शुरू हो गया.

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने शपथग्रहण के तुरंत बाद देश को संबोधित करते हुए कहा था, “हमें तेजी से विकसित होने वाली एक मजबूत अर्थव्यवस्था, एक शिक्षित, नैतिक और साझा समुदाय, समान मूल्यों वाले और समान अवसर देने वाले समाज का निर्माण करना होगा… एक ऐसा समाज, जिसकी कल्पना महात्मा गांधी और दीनदयाल उपाध्याय जी ने की थी… ये हमारे मानवीय मूल्यों के लिए भी महत्वपूर्ण है… ये हमारे सपनों का भारत होगा… एक ऐसा भारत, जो सभी को समान अवसर सुनिश्चित करेगा… ऐसा ही भारत, 21वीं सदी का भारत होगा…”

इसे लेकर कांग्रेस नेता आनंद शर्मा ने जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गांधी का अपमान करने का आरोप लगाते हुए दीनदयाल उपाध्याय की महात्मा गांधी से तुलना करने को लेकर सवाल किया. उनके सवाल पर वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कहा कि ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई सदस्य राष्ट्रपति के भाषण पर सवाल खड़ा करे. अरुण जेटली ने आनंद शर्मा के बयान को कार्यवाही से हटाने की मांग की, जिसके बाद सदन में हंगामा हो गया और कार्यवाही को 12 बजे तक के लिए स्थगित करना पड़ा.

गौरतलब है कि राष्ट्रपति के रूप में अपने पहले भाषण में रामनाथ कोविंद ने राष्ट्र निर्माता की अपनी परिभाषा कई उदाहरणों के ज़रिये समझाई थी. कोविंद ने अपने भाषण में देश के आठ नेताओं का ज़िक्र किया, और उनमें छह कांग्रेस के ही नेता थे, लेकिन पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी का ज़िक्र नहीं होने पर कांग्रेस ने ऐतराज जताया था.

योगी से तकरार के बाद मौर्य छोड़ेंगे डिप्टी CM पद

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत में अहम भूमिका निभाने वाले केशव प्रसाद मौर्य जल्द ही डिप्टी सीएम के पद से इस्तीफा दे सकते हैं. उम्मीद है केशव जल्द ही अब केंद्र में मोदी कैबिनेट में शामिल हो सकते है. फिलहाल वह यूपी के उपमुख्यमंत्री हैं. दरअसल, उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सरकार बने 4 महीने भी नहीं हुए है मगर अभी से टकराव की स्थिति बनती दिख रही है.

बताया जा रहा है कि मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के बीच सब कुछ सहज नहीं है. इसके अलावा अगर मौर्य उपमुख्यमंत्री बने रहते हैं तो उन्हें फूलपुर की सीट छोड़नी होगी. ऐसी भी खबरे आ रही है कि बीएसपी सुप्रीमो मायावती जो राज्यसभा से इस्तीफा दे चुकी हैं मौर्य के इस्तीफा देने की स्थिति में वह फूलपुर से लोकसभा उपचुनाव लड़ सकती हैं.

आपको बता दें कि बीएसपी ने अभी तक इस बात की पुष्टि नहीं की है हालांकि उसने हालिया चुनावों में मिली करारी हार के बाद बीएसपी को जमीनी स्तर पर मजबूत करने के लिए मायावती की रणनीति का खुलासा जरूर किया है. अगर मायावती फूलपुर से चुनाव लड़ती हैं तो उन्हें हराना बीजेपी के लिए मुश्किल हो सकता है ऐसे में पार्टी नहीं चाहेगी की वहां चुनाव हो.

यदि मौर्य केंद्र में जाते हैं तो मायावती को नुकसान होगा. फूलपुर सीट खाली हो सकती थी, उस पर मायावती चुनाव लड़ सकती थीं, शायद जीत भी सकती थीं.बताया जा रहा है कि अगले महीने मोदी कैबिनेट के विस्तार की संभावना है, इसी दौरान केशव प्रसाद मौर्य को भी मौका मिल सकता हैं. सूत्रों के अनुसार उत्तर प्रदेश की सरकार में मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के बीच सब ठीक नहीं है.

रामनाथ कोविंद ने की बाबासाहेब की अनदेखीः मायावती

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नई दिल्ली। बसपा प्रमुख मायावती ने रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनने पर बधाई दी है. उन्होंने कहा कि रामनाथ कोविंद दलित समाज से राष्ट्रपति बनने वाले दूसरे राष्ट्रपति है. कोविंद से पहले केआर नारायणन राष्ट्रपति  थे. मायावती ने उन्हें शुभकामनाएं और बधाई दी.

मायावती ने रामनाथ कोविंद पर निशाना साधते हुए कहा कि कोविंद को गांधी को फूल अर्पित करने के साथ-साथ बाबासाहेब की प्रतिमा पर भी फूल करना चाहिए था. रामनाथ कोविंद अपने शपथ ग्रहण के दिन राजघाट जाकर गांधीजी को फूल अर्पित करने गए थे. लेकिन संसद परिसर में लगी भारतीय संविधान के निर्माता बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की प्रतिमा पर फूल अर्पित नहीं किया.

मायावती ने कहा कि संसद परिसर में बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की प्रतिमा या फिर सेन्ट्रल हॉल में लगे इनके फोटो-चित्र पर भी, उन्हें पुष्प अर्पित नहीं करना एक ऐसा संकेत है जो भाजपा व इनके एनडीए एण्ड कम्पनी की अम्बेडकर-विरोधी सोच व मानसिकता को प्रदर्शित करता है, जिस पर देश के दलितों की खास नजर है.

बसपा अध्यक्ष ने कहा कि उन्हें यह नहीं भूलना चाहिये कि वे आज अगर राष्ट्रपति के पद पर बैठे हैं तो उसकी सबसे बड़ी देन परमपूज्य बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर की है. फिर उनके बाद मान्यवर कांशीराम और बसपा की है. जिसने भाजपा को दलित समाज के व्यक्ति को देश का राष्ट्रपति बनाने के लिये मजबूर कर दिया है.

मायावती ने कहा कि वैसे तो रामनाथ कोविंद अपने राजनैतिक जीवनकाल में भाजपा व आरएसएस की संकीर्ण व जातिवादी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं. परन्तु सरकार में आने के बाद गांधीजी और बाबासाहेब डा. भीमराव अम्बेडकर का नाम लेते रहने की अब यह आम परम्परा बन चुकी है. आज यह काम रामनाथ कोविंद ने भी किया.

परन्तु रामनाथ कोविंद से यह उम्मीद नहीं की जा सकती थी कि वे गांधीजी के साथ-साथ बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर को भी अपने श्रद्धा के फूल नहीं चढ़ायेंगे. उन्हें आज बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर को भी अपने श्रद्धा के फूल जरूर अर्पित करने चाहिये थे. अन्य किसी से तो नहीं किन्तु दलित समाज से ताल्लुक रखने वाले व्यक्ति से तो यह उम्मीद की ही जा सकती है कि वह बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर के जीवन संघर्ष व उनके बलिदानों के प्रति हमेशा ही कृतज्ञ रहेगा.

इसके अलावा मायावती ने देश के कई हिस्सों में बाढ़ की स्थिति को लेकर भी पीएम मोदी पर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि वर्तमान में गुजरात के साथ-साथ देश के अन्य कई और राज्य काफी बुरी तरह से बाढ़ से प्रभावित हैं. ऐसी स्थिति में देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को केवल गुजरात का ही नहीं बल्कि अन्य और बाढ़-पीड़ित राज्यों का भी पूरा-पूरा ध्यान रखना चाहिये. क्योंकि अब वे गुजरात के मुख्यमन्त्री नहीं हैं, बल्कि पूरे देश के प्रधानमन्त्री हैं.

जस्टिस कर्णन ने राष्ट्रपति कोविंद को दी सजा माफ करने की अर्जी

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कोलकाता। कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व जस्टिस सीएस कर्णन अब अपने मामले को लेकर नवनियुक्त राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की शरण में पहुंचे हैं. पूर्व जस्टिस कर्णन ने अपनी कारावास की सजा माफ करवाने के लिए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के समक्ष आवेदन दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व जस्टिस कर्णन को 6 महीने के कैद की सजा सुनाई है.

विवादित पूर्व जस्टिस कर्णन के वकील मैथ्यूज जे नेदुंपारा ने राष्ट्रपति कार्यालय में उनका प्रतिनिधित्व किया. मैथ्यूज ने जानकारी दी कि राष्ट्रपति कार्यालय के सामने पूर्व जस्टिस कर्णन को मिली 6 महीने की कैद से माफी देने की अर्जी दी गई है. उन्होंने कहा कि हम जितनी जल्दी हो सके इस मामले में राष्ट्रपति से सुनवाई चाहते हैं और इस संदर्भ में राष्ट्रपति कार्यालय के संपर्क में हैं.

राष्ट्रपति कार्यालय के सामने कर्णन की अर्जी संविधान के अनुच्छेद 72 के अंतर्गत पेश की गई है. पूर्व जस्टिस कर्णन को सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की बेंच ने 9 मई को 6 महीने कैद की सजा सुनाई थी. इसके बाद से कर्णन कैद से बच रहे थे. 20 जून को पूर्व जस्टिस कर्णन को तमिलनाडु से गिरफ्तार किया गया था. फिलहाल कर्णन प्रेसीडेंसी सुधार गृह में कैद हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने कंटेप्ट ऑफ कोर्ट में कर्णन को 6 महीने कैद की सजा सुनाई थी. पूर्व जस्टिस कर्णन हाई कोर्ट के ऐसे पहले सिटिंग जज थे जिन्हें सर्वोच्च न्यायालय ने जेल की सजा सुनाई है.

UGC NET 2017: ऑफिशियल नोटिफिकेशन जारी

नई दिल्ली। CBSE ने यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) नेशनल एलिजिबिलिटी टेस्ट (NET) 2017 परीक्षा की ऑफिश‍यिल नोटिफिकेशन जारी कर दी है. कैंडिडेट्स CBSE की ऑफिशियल वेबसाइट, cbsenet.nic.in पर जाकर नोटिफिकेशन देख सकते हैं. आपको बता दें कि UGC NET के लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन 1 अगस्त 2017 से शुरू हो जाएगा. ये प्रक्रिया 30 अगस्त को खत्म हो जाएगी. कैसे देखें नोटिफिकेशन – CBSE की ऑफिशियल वेबसाइट cbsenet.nic.in पर जाएं – NET November 2017 Notification’ लिंक पर क्ल‍िक करें – योग्यता के अनुसार एप्लीकेशन प्रक्रिया पूरी करें CBSE यह परीक्षा Assistant Professor पद के लिए आयोजित करेगी. ये परीक्षा 05 November, 2017 को होगी जिसमेें लाखो लोग शामिल होंगे.    

वोडाफोन और आइडिया के मर्जर को CCI ने दी मंजूरी

मुंबई। भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) ने सोमवार को अतिरिक्त जांच के बिना वोडाफोन-आइडिया विलय के लिए बिना शर्त मंजूरी दे दी. सूत्रों के मुताबिक सीसीआई ने वोडाफोन और आइडिया को अनुमोदन पत्र भेजा है. सूत्र ने आगे बताया कि वोडाफोन और आइडिया को अब आवश्यक मंजूरी के लिए सेबी से संपर्क करना होगा.

सूत्र ने बताया, “विलय के लिए सभी विनियामक अनुमोदन 6 महीनों के भीतर होने की संभावना है. वोडाफोन और आइडिया दोनों ने ही आश्वासन दिया है कि वो सरकार को उन सर्कल्स के स्पेक्ट्रम को वापस कर देंगे जो जरूरी हैं. एनसीएलटी यह सुनिश्चित करेगा कि विलय डीओटी के मर्जर एंड एक्विजिशन दिशा निर्देशों के अनुसार है.”

मार्च महीने के दौरान वोडाफोन और आइडिया ने 23 बिलियन डॉलर (23 अरब डॉलर) में ऑपरेशंस के मर्जर के लिए डील की थी. इन्होंने यह फैसला इसलिए किया ताकि वो मिलकर देश की सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनी बना पाएं ताकि सेक्टर में जियो की एंट्री के बाद पैदा हुए प्राइस वार के हालात से लड़ा जा सके. इस डील के लिए भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग और अन्य नियामकीय मंजूरियों की दरकार थी.

आइडिया-वोडाफोन विलय से सभी बाजार में वोडाफोन इंडिया की स्थिति मजबूत होगी. आपको बता दें बीते दिनों चल रही खबरों में मुताबिक माना जा रहा था कि इस विलय के बाद ग्राहक और आय के लिहाज से यह सबसे बड़ी कंपनी बनकर सामने आएगी. इस मर्जर के बाद वोडाफोन की भारत में लिस्टिंग आसान हो जाएगी. ग्लोबल ब्रोकरेज हाउस सीएलएसए का मानना है कि डील के बाद वित्त वर्ष 2019 तक वोडाफोन का आय में 43 फीसदी, भारती एयरटेल का 33 फीसदी और रिलायंस जियो का 13 फीसदी मार्केट शेयर हो जाएगा.